मैं और मेरी स्नेहल चाची अध्याय 4

वे दोनों अब भी धीमी आवाज में बोल रही थीं पर मुझे अब साफ़ सुनाई दे रहा था. शायद मेरे कान अब ट्यून हो गये थे.

“तो क्या हुआ? क्या मेरा अधिकार नहीं है विनय पर? उसकी मां मेरी छोटी बहन जैसी है, मुझे इतना मानती है. और ये बता … विनय को यहां लाया कौन? वैसे ही छोड़ देती तो वो या तो दूसरी नौकरी पकड़ लेता या यहां गेस्ट हाउस में चला जाता. वो तो अच्छा हुआ कि उस दिन …” फ़िर उन्होंने नीलिमा के कान में कुछ कहना शुरू किया. दो मिनिट तक न जाने क्या बताती रहीं, नीलिमा बस मुंह पर हाथ रखकर हंसती रही. चाची ने फ़िर मेरे कमरे की ओर देखा और नीलिमा से कुछ बोलीं. नीलिमा ने भी देखा और अपनी मुंडी हिला दी. फ़िर बोली “लगता है बेचारा सो गया है. चाची, पर वो रुमाल कहां है?”

“कौनसा रुमाल?”

“जिसमें आपने उस बेचारे कमसिन लड़के का रस निकाला था. धो डाला क्या? आपका भी जवाब नहीं ममी, मुझे तो उस बेचारे पर दया आ रही है. एक बार आपने उसे चंगुल में लेने की ठान ली, उसके बाद उसकी क्या बिसात कि आप से छूट पाये? शेरनी के पंजे से हिरन का बच्चा बचता है क्या कभी?” नीलिमा बोली और फ़िर हंसने लगी.

“चल कुछ भी बोलती है. बहुत अच्छा बच्चा है विनय. बहुत स्वीट है. अभी जरा भोला भाला सा है, जवानी तो चढ़ी है पर अब तक उसका क्या करना है यह नहीं सोचा बेचारे ने. और रही उसे फंसाने की बात, अब पहल तो उसीने की थी ना! ऐसा मेरी ओर देखता था जैसे आंखों से ही खा जाना चाहता हो. अब अगर मेमना ही इस शेरनी से शिकार करवाना चाहता था तो मैं क्या करती?”

“सब पता है ममी कि आप क्या चीज हो. आप के आगे कोई टिका है आज तक!!! कोई एक्स्प्लेनेशन देने की जरूरत नहीं है. पर वो रुमाल का तो बताइये, धो डाला क्या?”

“अब तुझे क्या करना है उससे?”

“पुरुष सेंट है वो ममी, वो भी एक इतने जवान छोकरे का, अच्छी लगती है उसकी खुशबू, बहुत दिन हो गये मैं तरस गयी”

“अरे नीचे पर्स रखी है, ऊपर लाना भूल गयी, उसी में है, मैं ले आती हूं”

“ऐसी ही जायेंगी नीचे?” नीलिमा ने पूछा.

“तो क्या हुआ? पहली बार कर रही हूं क्या? तू भी तो नंगी घूमती है इतनी बार. घर में और है ही कौन? चल ले आती हूं”

“थोड़ी देर से ले आना ममी, अभी बस मेरे पास रहो” नीलिमा चाची की छातियों में मुंह छुपा कर बोली. चाची ने खुद ही अपना एक स्तनाग्र उसके मुंह में दे दिया. “एकदम बच्ची बन जाती है तू कभी कभी”

“बच्ची ही तो हूं आप की, अब बच्चों जैसा करने दो” नीलिमा ने कहा और फ़िर चाची का निपल चूसने में मग्न हो गयी.

थोड़ी देर के बाद चाची बोलीं “वैसे स्वाद चखना हो तो है मेरे पास”

“कौनसा स्वाद ममीजी? इतने सारे स्वाद हैं आपने अंगों में, हर अंग का टेस्ट अलग अलग है और मुझे सब अच्छे लगते हैं”

“अरी विनय की जवानी के टेस्ट के बारे में कह रही हूं. अभी होगा यहां देख, भले सूख गया होगा पर फ़िर भी स्वाद तो होगा. मैंने नहाया नहीं उसके बाद” अपनी जांघें खोल कर नीलिमा को दिखाती हुई चाची बोलीं.”

“और मैं तब से ट्राइ कर रही थी तो आप ने मुंह ही नहीं लगाने दिया” नीलिमा ने शिकायत की.

“अरी मजा आता है तेरे को थोड़ा तंग करने में”

नीलिमा ने चाची को बिस्तर पर लिटाया और उनकी टांगों में घुसने की कोशिश करने लगी. चाची ने उसे दूर किया और उठ कर बैठ गयीं “आज आप मुझे रुला कर छोड़ेंगी ना सासूमां?” नीलिमा ने उनकी ओर देखकर शिकायत की.

“अरे नहीं पगली, वहां चेयर पर बैठती हूं, बहुत देर हो गयी लेटे लेटे. फ़िर आराम से चखना तेरे को जो चाहे” स्नेहल चाची उठ कर कुरसी में बैठ गयीं. नीलिमा को सामने नीचे बैठाकर टांगें फैलाकर उन्होंने नीलिमा का सिर उनके बीच दबा लिया. मेरी पहचान का आसन था. ये जो चल रहा था वो देखना याने मेरे ऊपर घोर अत्याचार था. पर क्या करता, देखता रहा. नीलिमा मन लगाकर स्वाद चख रही थी. चाची ने उसका सिर पकड़कर और अपनी बुर पर दबाया और कहा “अरे बेटी, जरा जीभ अंदर तक डाल, तब तो आयेगा टेस्ट”

“थोड़ा अलग स्वाद तो है पर ठीक से ले नहीं पा रही” उसने सिर उठाकर चाची से कहा.

“अरे सात आठ घंटे हो गये अब. और मेरे रस में एकदम मिल भी गया होगा. अगली बार तेरे को एकदम फ़्रेश टेस्ट दूंगी.” चाची ने अपनी टांगें आपस में जोड़ कर नीलिमा के सिर को उनकी गिरफ़्त में ले लिया और फ़िर आगे पीछे होकर धीमे धीमे धक्के मारने लगीं. फ़िर एक जोर की सांस ली और टांगें कस के नीलिमा भाभी के सिर को भींच कर स्थिर हो गयीं. दो मिनिट बाद एक लंबी सांस ली और नीलिमा को छोड़ा. “बहुत प्यार से चूसती है तू बेटी, बहुत सुख देती है. अब तू जरा बैठ, मैं नीचे जाकर वो रुमाल लेकर आती हूं”

मैं बैठा बैठा जरा चिंतित हो गया था. चाची ने नीलिमा को सब बता दिया था. अब कल कैसे उसके सामने जाऊंगा और उससे क्या बातें करूंगा, यही समझ में नहीं आ रहा था. शरम सी आ रही थी, पर उन सास बहू के वे कारनामे देखकर लंड की तो हालत बहुत खस्ता हो गयी थी. किसी तरह टाइम पास करना ही था क्योंकि अब यह लाइव लेस्बियन रति देखना बंद करना मेरे बस की बात नहीं थी.

चाची के बाहर जाने के बाद नीलिमा उठी और टेबल के पास जाकर वहां रखी बॉटल से पानी पीने लगी. मेरी ओर उसकी पीठ थी. क्या नितंब थे, एकदम गोल भरे तरबूज. उसकी कमर और कमर के ऊपर के शरीर की तुलना में वे महाकाय थे. असल में शायद बहुत लोग नीलिमा के फ़िगर को बेडौल या बॉटम हेवी ही कहते पर मेरे लिये तो वो साक्षात मेनका थी. इस तरबूजों पर सिर रखकर सोने में क्या मजा आयेगा! और उनके बीच अगर लंड गाड़ने का मौका मिले तो!!!

मैं यह सब सोचते सोचते लंड को पुचकारते पुचकारते अपनी रंगीन खयालों की दुनिया में खोया हुआ था कि अचानक कमरे का दरवाजा खुला और लाइट ऑन हो गयी. चाची वहां खड़ी थीं और मेरी ओर देख रही थीं. मुझे थोड़ा शॉक ही लगा. मैंने नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ होगा. वे दोनों तो यही मान कर चल रही थीं ना कि मैं सोया हुआ हूं! मैं लंड हाथ में लिये भोंचक्का होकर बस उनकी ओर देखता रहा.

“चल कपड़े निकाल” चाची ने पास आकर आदेश दिया. वे वैसी ही पूर्ण नग्नावस्था में मेरे सामने खड़ी थीं. हाथ में वही रुमाल था. उसको सूंघ कर वे मेरी ओर देखकर मुस्करायीं “नीलिमा को भी सुगंध अच्छी लगेगी, इसीलिये मैंने अब तक धोया नहीं. जवान वीर्य की खुशबू अलग ही होती है. चल जल्दी कर”

मैंने चुपचाप कपड़े निकाले, और कर भी क्या सकता था! चाची ने मेरे लंड को पकड़ा और लंड से ही मुझे खींचती हुई अपने बेडरूम में ले गयीं.

“ले नीलिमा … तेरे लिये रुमाल ले आयी और रुमाल में रस निकालने वाले को भी ले आयी”

“सरप्राइज़ !!! … आओ विनय … वेलकम … कितने प्यारे लग रहे हो, ये क्या ममी, आप तो इसे ऐसे खींच कर लाई हैं जैसे जैसे सईस लगाम पकड़कर घोड़े को ले जाता है.” नीलिमा ने कहा और हंसने लगी. फ़िर मेरे पास आयी और मुझे पास लेकर मेरा प्यार भरा चुंबन ले लिया “अरे मजाक कर रही थी, भाभी हूं, मजाक तो कर सकती हूं, बुरा मत मान” उसके जवान भरे भरे स्तन मेरी छाती पर गड़ रहे थे.

“मैं क्यों बुरा मानूंगा भाभी. आप जैसी अप्सरायें कुछ भी करें तो भी कौन ऐसा मूर्ख होगा कि माइंड करे” मैंने कहा. मेरा मन अब अपार सुख के सागर में गोते लगा रहा था. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं इस स्वर्ग में हूं.

“सच में घोड़ा है यह” चाची ने बड़े गर्व से कहा “मस्त स्टेमिना है इसका. पहली बार है पर इतना कंट्रोल करता है बेचारा कि हद नहीं. और विनय, तुझे क्या लगा कि रात को मैं तेरे को ऐसे ही अकेला तड़पने को छोड़ दूंगी?”

नीलिमा ने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया और मेरा लंड हाथ में लेकर खेलने लगी “अरे ममी ने तो मुझे आते ही बता दिया था सब. आज ऑफ़िस का काम भी मेरा तीन बजे तक हो गया था पर फ़िर एक सहेली के यहां चली गयी मैं कि ममी को तेरे साथ अकेले में टाइम मिले. मैं तो कह रही थी कि रहने दो ममी, क्यों नाटक करके बेचारे को टेन्शन देती हो, सीधे एक साथ विनय को गोआ में वेल्कम करेंगे. पर ममी बोलीं कि मुझे देखना है उसका स्वभाव कैसा है, ओवरस्मार्ट लड़कों जैसा अपनी अपनी चलाता है या शांत और थोड़ा नरम स्वभाव का है जिससे हमारी पट सके. फ़िर ममी ने अभी शाम को बताया कि आज दोपहर को क्या हुआ.”

मैंने चाची की ओर देखा तो वे मुस्करायीं. नीलिमा आगे बोली “अरे विनय राजा, तेरी चाची और मुझमें कुछ छुपा नहीं है, हम अपने दिल की बात खुल कर एक दूसरे को कहते हैं. फ़िर अभी सोचा कि थोड़ा तेरे से मजाक किया जाये. तू कहां सोने वाला था, ममी ने बताया भी मुझे कि दरवाजे के पास बैठा होगा.” नीलिमा मेरे लंड को अब ऐसे पकड़े थी जैसे छोड़ना ही न चाहती हो.

“और यह सच में बैठा था दरवाजे के पास लंबी लंबी सांसें भरते” चाची बोलीं. फ़िर मुझे बिस्तर पर धकेलते हुए बोलीं “चल, अब टाइम वेस्ट मत कर. सीधा लेट जा”

मैं चुपचाप लेट गया पर मेरा झंडा ऊंचा था. “अब ऐसा ही पड़ा रह, हमें जो करना है वो करने दे. और हम जो कहें वो करना. ठीक है?” मैंने मुंडी से हां कहा.

नीलिमा अब तक मेरे लंड को चूमने में व्यस्त हो गयी थी. “ममी … एकदम मस्त है …आपकी भी पसंद की दाद देनी पड़ेगी … एकदम फ़ीस्ट है फ़ीस्ट”

“मैंने कहा था ना तुझसे कि सब्र करना सीख, उसका फल हमेशा मीठा होता है. अब ये क्या कर रही है? इतने दिन बाद मिला है तो जरा ठीक से सलीके से उसका उपयोग कर” चाची ने नीलिमा का मुंह मेरे लंड से हटाते हुए बोलीं. नीलिमा अब भूखे की तरह मेरा लंड निगलने में लगी हुई थी.

“चूसने दीजिये ना ममी, इतने दिन हो गये मेरे को” नीलिमा ने मिन्नत की.

“अरे विनय कहीं भागा जा रहा है? बाद में कर लेना, चल उठ, जरा ठीक से मजा ले”

“फ़िर मैं ही करूंगी पहले ममीजी, आप ने तो दोपहर में खूब मस्ती कर ली होगी” नीलिमा को और सबर करना मुश्किल हो रहा था.

“कर लेना बेटी पर पहले विनय की तो सोच, वो ऐसा ही भूखा प्यासा बैठा है, उसको तो कुछ मीठा चखा पहले”

नीलिमा मेरी ओर मुड़ कर शैतानी से बोली “सॉरी विनय, मुझे याद ही नहीं रहा. तेरे लिये काफ़ी कुछ है मेरे पास चखाने को” फ़िर उसने अपनी उंगलियों से अपनी चूत खोल कर मुझे दिखाई “यहीं चखेगा कि बैठूं कुरसी में – ममी के फ़ेवरेट पोज़ में?” उसकी गुलाबी बुर पास से एकदम गीली चिपचिपी दिख रही थी.

“अब उसे क्यों उठाती है, अभी तो लिटाया है उसे. तू ही चखा दे ना तेरे फ़ेवरेट पोज़ में” स्नेहल चाची ने उलटा ताना मारा.

नीलिमा झट से आकर मेरे सिर के दोनों ओर घुटने टेक कर बैठ गयी. उसकी चूत का खुला मुंह भी एकदम रसीला लग रहा था. मैंने जीभ लगायी और नीलिमा नीचे बैठ कर मेरे होंठों पर अपनी बुर रगड़ने लगी. वह बहुत उत्तेजित थी, उत्तेजना से उसकी बुर के भगोष्ठ थरथरा से रहे थे और वह निचला मुंह बार बार खुल और बंद हो रहा था. आंखें बंद कर लो तो ऐसा ही लग रहा था कि कोई मुंह खोल कर होंठों के चुंबन ले रहा है, मैं उस चासनी को चखने में जुट गया.

चाची हमारे पास बैठकर आराम से अपने बहू के करतब देख रही थीं. नीलिमा के पास सरककर उन्होंने नीलिमा की चूंचियां हथेली में ले लीं और उन्हें दबाने और मसलने लगीं. उनकी उंगलियां बीच बीच में नीलिमा के निपलों को पकड़कर पिन्च करने लगतीं. यह तो अच्छा हुआ कि मेरे लंड को उन्होंने नहीं पकड़ा नहीं तो उसका बचना मुश्किल था.

जल्दी ही नीलिमा ने अपना एक दो चम्मच शहद मुझे पिला ही दिया. पर वह अब भी मस्ती में थी, उसका सारा ध्यान मेरे लंड पर लगा हुआ था. “ये तो और तन गया है ममी”

“तू ही देख ले, ऐसे दूर से देख कर आह भरती रहेगी तो गाड़ी छूट जायेगी तेरी” चाची ने उसकी प्यार भरी चुटकी ली. नीलिमा उठ कर मेरे शरीर के दोनों ओर पैर रखकर बैठ गयी और मेरा लंड धीरे धीरे पर बिना रुके एक बार में अपनी चूत में घुसेड़ लिया. फ़िर आनंद की सिसकारी छोड़ कर बोली “एकदम कड़ा है ममीजी, गन्ने जैसा, कैसा उछल रहा है मेरे अंदर”

“ठीक से कर, ज्यादा उछल कूद मत कर, आराम से मजा ले, विनय बहुत दिन रहने वाला है यहां” नीलिमा ऊपर नीचे होकर मेरे लंड से चुदवाने लगी. उसकी गीली तपती बुर में से ’सप’ ’सप’ ’सप’ की आवाजें आ रही थीं. “ओह मां ऽ ऽ … कितने दिनों बाद चुदवा रही हूं आज … लंड से चुदवाना क्या होता है मैं तो भूल ही चली थी”

चाची नीलिमा के पास बैठी बैठी उसकी पीठ पर हाथ फेर रही थीं. उनकी जांघें मेरे चेहरे के पास थीं. मैंने अपना सिर मोड़ कर उनकी मोटी जांघ पर होंठ रख दिये. उधर नीलिमा की सांसें अब तेज हो चली थीं. जिस तरह से उसकी आंखें पथरा सी गयी थीं, वह अपने चरम बिन्दु के करीब पहुंच गयी थी. चाची ने उसकी बुर अपनी हथेली में ली और नीलिमा के बदन के साथ ही उनका हाथ ऊपर नीचे होने लगा. मैंने ध्यान से देखा तो उनकी उंगली नीलिमा के क्लिट पर चल रही थी. नीलिमा ’ओह ऽ .. ममी … ममी … उई मां ऽ ..” करने लगी तो चाची ने झट उसे बाहों में लेकर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये. नीलिमा दो मिनिट में अपने बंद मुंह से ’अं .. अं … अं’ करती स्खलित हो गयी.

चाची थोड़ा सरकीं तो अब उनका पांव मेरे चेहरे के सामने आ गया. पास से पहली बार देख रहा था. दूर से वे पैर जितने क्यूट लगते थे, पास से और भी ज्यादा थे. एकदम साफ़ सुथरे गुलाबी तलवे, गोरी नाजुक उंगलियां और उनपर पर्ल कलर का नेल पेंट, मांसल चिकनी ऐड़ी …. मैंने धीरे से अपने मन की कर ही ली, उनके पांव का चुम्मा ले लिया. मुझे लगा कि चाची शायद बिचक जायें पर उन्होंने ऐसा दर्शाया कि कुछ हुआ ही नहीं. धीरे से अपना पांव सरकाकर मेरे चेहरे पर टिका दिया कि मैं एक दो चुम्मे और ले सकूं.

नीलिमा उठ बैठी. उसकी सांस चल रही थी, चेहरे पर एकदम तृप्ति के भाव थे. चाची बोलीं “बस हो गया? मुझे तो लगा था कि आज रात भर तू इसे नहीं छोड़ेगी.

“इतनी सेल्फ़िश नहीं हूं ममीजी, अब आप करो”

“मैं भी करूंगी, तेरा हो जाने के बाद. और कर ले नहीं तो कहेगी कि ममी ने जल्दबाजी मचा दी. ऐसा कर तू अब कि ठीक से नीचे लेट और विनय को मेहनत करने दे, बहुत देर से बस आराम कर रहा है. क्यों विनय, अभी दम है और? या तेरा ये सोंटा …” लंड को पकड़कर बोलीं “हार मानने को आ गया है?”

“चाची …. मैं ….

“अरे बोल बेटे, अब भी घबरा रहा है क्या मुझसे?” चाची बड़े स्नेह से बोलीं.

“चाची, मुझे नहीं लगता कि मैं अब पांच मिनिट से ज्यादा टिकूंगा. मुझको तो ऐसा लग रहा है कि स्वर्ग पहुंच गया हूं और खुद रंभा और उर्वशी मुझसे सेवा करवा रही हैं. पर इतना विश्वास है कि अभी झड़ भी गया तो भी बस थोड़ी देर में आप दोनों की सेवा करने के काबिल हो जाऊंगा, अब क्या बताऊं आप को, पिहले हफ़्ते में तो आप को चोरी छुपे देखकर और आपके बारे में सोच कर मैंने दिन में चार चार बार … याने …” फ़िर मैं चुप हो गया. मुझे खुद सुखद आश्चर्य हुआ, इतना बड़ा वाक्य मैं उनसे पहली बार बोला था.

नीलिमा ने ताली बजाई “वाह … क्या स्पीच दी है! कहां से ढूंढ कर ले आयीं आप इस हीरे को ममी, ये तो सच में ’काम’ का लड़का है”

“अरे वैसे ये मेरी नजर में तीन चार साल से था. उसके पहले तो बहुत छोटा था, पर था बड़ा क्यूट. फ़िर तीन साल पहले ये जिस तरह से मेरी ओर देख रहा था …. याद है विनय वो शादी वाले दिन जब मैं साड़ी बदल रही थी?”

“हां चाची … ” मैं शर्मा कर बोला.

“हां तुझे तो याद होगा ही …बदमाश कहीं का! तो तब से मुझे लगा कि यह जरा छुपे रुस्तम जैसा है. अब इस बार जब इसने मेरी छाती की ओर देखा, याने जब मैं चश्मा उठा रही थी … इसकी आंखों के भाव देखने लायक थे”

“चाची … याने आपने तभी पहचान लिया कि मेरे मन में क्या चल रहा है” मैंने आश्चर्य से पूछा.

“तो क्या मैं इतनी मूर्ख लगी तुझे? पर नीलिमा बेटी, तभी मैंने इसकी नस पहचान ली, और फ़िर इसे जरा धीरे धीरे और दिखाना शुरू किया, वैसे इसकी नजर हमेशा मेरी छाती पर ज्यादा रहती थी”

“आप की छाती … या छतियां कहूं ममीजी … ग्रेट ही हैं, कोई भी इनकी ओर देखेगा” नीलिमा मुंह पर हाथ रखकर हंसने लगी.

“चलो गप्पें बहुत हो गयीं, तो विनय, तू कहता है ना कि तेरा इतना दम है, चल देखते हैं” चाची ने मुझे हाथ पकड़कर उठाते हुए कहा.

उस रात यह रति दो घंटे और चली. अब डीटेल में क्या बताऊं, इतना सब हो रहा था पर संक्षिप्त में यह कह सकता हूं कि दोनों ने मिलकर मेरा लंड चूसा और बड़े स्वाद के साथ मेरी मलाई का भोग लगाया. उसके अलावा दोनों को मैंने एक एक बार चोदा, और बड़े गर्व से कह सकता हूं कि बड़े जोश से चोदा. आखिर जब मैं अपने कमरे में वापस आने को उठा तो चाची बोलीं “नींद आयेगी ना तेरे को? या गोली दूं? आखिर कल तुझे जॉइन करना है” मैंने कहा कि जरूरत नहीं है. मेरी नस नस इतनी झनझना गयी थी कि बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गयी. गोटियां भी दुख रही थीं पर इसकी मुझे आदत थी, आखिर बार बार मुठ्ठ मारकर भी वे दुखती ही हैं.

दूसरे दिन लेट उठा, वो भी जब नीलिमा भाभी ने उठाया कि चल, आज जॉइन करना है तुझे. जल्दी जल्दी तैयार होकर भागा. चाची बोलीं “कल से ऐसे जल्दी नहीं करना पड़ेगी बेटे, वो एक और स्कूटर गैरेज में पड़ा है बहुत दिन से, कल ही मेकेनिक से सर्विस करके बुलवा लेती हूं, फ़िर आराम से जाया कर, दस मिनिट में पहुंच जाया करेगा.

जाने के पहले नीलिमा मुझे अकेले में ले गयी और फ़िर जोर से मेरा चुंबन लिया. बोली “विनय, तुझे मालूम नहीं है कल तूने कितना सुख दिया है मेरे को, मैं तो तरस गयी थी. ममी बहुत प्यार करती हैं मेरे को पर सिर्फ़ मीठा कोई कितने दिन खा सकता है, नमकीन और चटपटा भी तो चाहिये ही ना”

रात को फ़िर वही तीन देहों का मिलन. मुझसे ज्यादा उत्सुक नीलिमा थी और चाची भी पीछे नहीं थीं. और उनको तो ऐसा हो गया था कि जैसे कोई नया खिलौना, गुड्डा मिल गया हो खेलने, उनका मन ही नहीं भरता था.

अब कहानी को हम सीधे दो तीन हफ़्ते आगे ले जा सकते हैं पर उसके पहले संक्षिप्त में इन तीन हफ़्तों में क्या हुआ, वह बताना चाहूंगा.

एक हफ़्ते के अंदर हमारा एक टाइम टेबल फिक्स हो गया, सलाह चाची की ही थी. सोमवार से शुक्रवार तो मेरी ट्रेनिंग रहती थी, सो सिर्फ़ रात मिलती थी. उसमें भी शुक्रवार रात चाची ने पाबंदी लगा दी थी, स्ट्रिक्ट इन्स्ट्रक्शन दिये कि सब सिर्फ़ रेस्ट करेंगे, कम से कम एक दिन का पूरा रेस्ट जरूरी है. मेरा वीक एन्ड ऑफ़ था, उस दौरान दोपहर के खेल के लिये उन दोनों सास बहू ने समय आपस में बांट लिया था कि मेरे साथ हरेक को एकांत भी मिले, बिना हिचकिचाहट के जो मन चाहे करने के लिये. शनिवार को नीलिमा का ऑफ़िस हाफ़ डे लगता था और वह और दो घंटे लेट ही आती थी याने चाची को दोपहर भर अपना गुड्डा अकेले में खेलने को मिलता था. रविवार को चाची का महिला मंडल होता था या कोई न कोई फ़ंक्शन होता था, उसमें वे दोपहर को जाती थीं और तब नीलिमा मुझसे मस्त मेहनत करवा लेती थी. और शनिवार रविवार रात तो थे ही सामूहिक कुश्ती के लिये.

अकेले में नीलिमा को मुझसे बस दो काम रहते थे, मेरा लंड चूसना, और खूब चुदवाना, तरह तरह के पोज़ में चुदवाना, कभी नीचे लेट कर, कभी ऊपर से, कभी कुरसी में मेरी गोद में बैठकर और कभी दीवाल के सहारे खड़े खड़े. मैं समझ सकता था, आखिर बेचारी अपने पति से – अरुण से – इतनी दूर थी और इतने दिनों से दूर थी. नीलिमा बहुत एथेलेटिक थी, उसे उछल कूद, मेहनत और कुश्ती करते हुए चोदना भाता था.

इसके विपरीत चाची बस एक महारानी की तरह अपने मन की सेवा मुझसे करवा लेती थीं. आधा समय उनका कुरसी में बैठकर मेरे सिर को अपनी टांगों में दबाये जाता था, लगता था ये उनका फ़ेवरेट पोज़ था. शायद अपने भक्त को भरपेट अपनी चूत के अमरित का प्रसाद देना वे अपनी ड्यूटी समझती थीं. बाकी आधे वक्त वे पलंग पर लेट कर मुझसे घंटे घंटे चुदवाती थीं. इसके अलावा उनका मन लगता था अपने स्तनों की मालिश करवाने में, उन्हें दबवाने और मसलवाने में, अक्सर वे लेट जाती थीं और मैं उनके सामने बैठ कर उनके बड़े बड़े मैदे के गोलों को आटे की तरह गूंधता था. इनाम स्वरूप मुझे उन्हें चूसने का मौका मिलता था. और चाची चुसवाते चुसवाते अक्सर मेरे मुंह में निपल के साथ साथ अपने स्तन का भी काफ़ी भाग घुसेड़ देतीं थीं, कभी मूड में होतीं तो खेल खेल में जितना मम्मा मुंह में जा सकता था उतना ठूंस देतीं, एक बार तो मुझे लगता है उन्होंने आधा उरोज मेरे मुंह में डाल दिया था और फ़िर मुझे नीचे लिये मेरे चेहरे को छाती से ढक कर बहुत देर लेटी रहीं और मुझे चोदती रहीं. मैं बस उस नरम मांस को मुंह में लेकर पड़ा रहा. मुझे तो लगता है कि वे उस दिन जिस मूड में थीं, उनका बस चलता तो वे पूरी चूंची ही घुसेड़ देतीं पर वो फ़िज़िकली इम्पॉसिबल था.

चाची के पैरों की ओर मेरी आसक्ति इन दिनों में बढ़ती जा रही थी. वैसे इसके पहले मेरा ध्यान लड़कियों के पैर की ओर इतना नहीं गया, वैसे अच्छे सैंडल पहने हुए खूबसूरत पैर किसको अच्छे नहीं लगते, पर चाची के पैरों की ओर मैं जरा ज्यादा ही आकर्षित हो गया था. हो सकता है कि एक बार उनके प्रति मन में सेक्स फ़ीलिंग आने से ऐसा हुआ हो. यह आकर्षण अब इतना तीव्र हो गया था कि कई बार उनके सामने बैठकर उनकी बुर चूसने के पहले मैं उनके पैरों से खेल लिया करता था, उनके चुंबन लेता, उनकी प्रशंसा करता कि चाची आपके पैर कितने खूबसूरत हैं, आपको तो सैंडल्स की मॉडलिंग करनी चाहिये. चाची बस मुस्करा देती थीं. उन्हें भी पता था कि उनके पांव एकदम शेपली हैं. उन्हें शायद यह भी पता था कि उनके पैरों के प्रति यह आकर्षण कोई सादा आकर्षण नहीं है, बल्कि एक ऑब्सेशन बनता जा रहा है पर उन्होंने इस मामले में न तो मुझे रोका न कभी ज्यादा प्रोत्साहन दिया.

इसी चक्कर में धीरे धीरे मैं एक कदम आगे बढ़कर उनके स्लीपरों तक पहुंच गया. वैसे मुझे फ़ेतिश वगैरह नहीं है पर न जाने क्यों एक बार जब चाची के पैरों से इश्क हो गया तो निगाह उनकी घर में पहनने की स्लीपर पर भी जाने लगी. गुलाबी रंग की नाजुक सी स्लीपर थी, गहरे गुलाबी रंग के पतले स्ट्रैप और हल्के गुलाबी और क्रीम कलर के एकदम पतले पतले सोल. एकदम साफ़ सुथरी थी. स्लीपर अच्छी थी पर चाची ने पहनी थी इसलिये मुझे ज्यादा सेक्सी लगने लगी. एक बार जब मैं उनके सामने नीचे बैठकर उनकी बुर चूसने की तैयारी कर रहा था तब चाची मेरा इंतजार करते करते एक पर एक पैर रखकर हिला रही थीं और वो स्लीपर उनकी उंगलियों पर लटककर नाच रही थी. वह झूलती चप्पल एकदम से मेरे दिल में उतर गयी. जोश में आकर मैंने उनकी स्लीपर को भी चूम लिया. वे बस हल्के से मेरी ओर देखकर जरा सा मुस्करा दीं, ये नहीं बोलीं कि बेटा, मेरी चप्पल से क्यों मुंह लगा रहे हो, याने उनको ये मेरी भक्ति का ही एक भाग लगी होगी. अगली बार जब मैं उनकी चूत चूस रहा था तो उन्होंने मुझे रोक कर अपनी दोनों स्लीपरें उतारीं और मेरे तन्नाये लंड में फंसा दीं. बोलीं “इसे भी जरा स्वाद लेने दे, तेरे को अच्छी लगती हैं ना? इसे भी भायेंगी”

उस दिन बाद में उनको चोदते वक्त मैं बस पांच मिनिट में ही झड़ गया, मेरा कंट्रोल ही नहीं था, लंड जैसे पागल हो गया था. चाची ने मुझे झड़ने दिया और फ़िर कान पकड़कर बोलीं “इस बार माफ़ कर देती हूं पर फ़िर ऐसा किया तो इसी चप्पल से मारूंगी, मूरख कहीं का.” उसके बाद मैंने फ़िर उनकी रबर की चप्पल के मामले में जरा अपने आप पर काबू रखा, वैसे एक बार मन में आया कि यार, शायद मार खाकर भी मजा आयेगा, अगर मार इस मुलायम खूबसूरत चप्पल से पड़े. हां पर हर शनिवार पांच दस मिनिट अपनी तरह से मैं चाची की चरण पूजा कर लेता था. ये मैं सिर्फ़ इसलिये बता रहा हूं कि पता चले कि धीरे धीरे चाची मुझसे अपनी गुलामी करवाने में कैसे एक एक कदम और रख रही थीं.

और सबसे अहम बात याने चाची अकेले में घंटे भर मुझे ट्रेनिंग देती थीं, न झड़ने की ट्रेनिंग. तरह तरह से मेरे लंड से खेलना, उसको पुचकारना, अपने मोटे मोटे स्तनों में दबाना, कभी अपने खूबसूरत पांव से रगड़ना पर ये सब सहन करते वक्त मुझे कड़क हिदायत होती कि स्खलित न होऊं. मैं कभी परेशान हो जाता तो कहतीं कि मेरी सेक्स लाइफ़ और अच्छी बनाने के लिये मुझे कंट्रोल करना सिखाना जरूरी है. मुझे कभी कभी लगता कि सच में चाची मेरी सेक्स लाइफ़ इम्प्रूव करना चाहती हैं या वो इन्टरनेट पर होते हैं वैसे सेक्स स्लेव या कुकोल्ड बनाने की तो नहीं सोच रही हैं, पर उनसे सेक्स करने में इतनी मादकता थी कि इस बात को मैं नजरंदाज कर देता था.

अब कहानी पर वापस आते हैं दो हफ़्ते बाद की बात है. रविवार की दोपहर थी. मैं नीलिमा भाभी पर पड़े पड़े उनको हौले हौले चोद रहा था. वैसे दो बार मैं उन्हें झड़ा चुका था, पर अब सिर्फ़ अगली चुदाई के पहले उनको गरम करने को उनकी गीली झड़ी हुई बुर में लंड डालकर बस जरा सा आगे पीछे कर रहा था, और उनका एक स्तनाग्र मुंह में लिये था.

बहुत दिनों से एक प्रश्न मेरे को सता रहा था. ये सास बहू का लफ़ड़ा शुरू कैसे हुआ होगा? ऐसा कहानियों में भले पढ़ें, होता बहुत कम है, ससुर बहू का भले हो जाये, पर सास बहू का? वो भी हमारे जैसे संभ्रांत मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग में! हमारे प्रतिष्ठित परिवार में कहीं भी ऐसा कुछ हो सकता है, ये किसी के सपने में भी नहीं आता. चाची को पूछने का दम तो मुझमें था नहीं, सोचा नीलिमा को ही पूछा जाये, और अब अच्छा मौका था जब वो दो बार चुद कर एकदम तृप्त हो गयी थी.

मेरा काम नीलिमा ने आसान कर दिया, बड़े लाड़ के मूड में थी, मेरे बाल बिखरा कर बोली “बहुत प्यारा है तू विनय, अब तो मुझे यह समझ में ही नहीं आता कि तू नहीं था तब मैं कैसे ये अकेलापन सहन करती थी”

“क्यों भाभी? आप सास बहू के लाड़ प्यार तो मस्ती में चलते थे ना?” मैंने मौका देखकर पूछ ही डाला.

“अरे वो ठीक है, बहुत सुख मिलता था उससे, पर ऐसा सोंटा …” मेरे लंड को चूत से पकड़कर वो बोली ” … नहीं था ना, तुझे नहीं समझेगा, इस लंड की जगह कोई वाइब्रेटर या डिल्डो नहीं ले सकता”

“आप के पास है भाभी? तो दिखाओ ना मेरे को. अब तक चाची के साथ की चुदाई में तो आप लोगों ने कभी इस्तेमाल नहीं किया!” मैंने इंटरेस्ट से पूछा.

“अब क्या करेगा देख कर? बहुत दिन हो गये, कहीं अंदर रखा है, अब तो जरूरत भी नहीं है. और ममीजी को भी वो ज्यादा पसंद नहीं है, उनको तो बस ऐसे मुंह लगाकर चूसने और चुसवाने में ही मजा आता है. हां पहले मुझे कभी कभी वे वाइब्रेटर से चोद देती थीं, मेरा मन रखने को”

“स्नेहल चाची वैसे आप को बहुत प्यार करती हैं भाभी, उनकी आंखों में ही दिखता है” मैंने कहा.

“हां मुझे मालूम है. मेरी सास ने मुझे जो सुख दिया है वो मैं कभी भूल नहीं सकती. याने ममता वाला प्यार भी है और वासना – लस्ट वाला भी प्यार है”

“भाभी एक बात पूछूं, नाराज तो नहीं होंगी?”

“अरे पूछ ना, तुझपर मैं और नाराज?”

“आप दोनों में ये … याने ऐसे संबंध की शुरुआत कैसे हुई? मुझे आपकी प्राइवेट लाइफ़ में दखल नहीं देना पर बार बार यही सोचता हूं …. याने सास बहू में झगड़ा तो हर जगह दिखता है पर प्रेम और वो भी ऐसा प्रेम … दो एक्स्ट्रीम हों जैसे सास बहू के बीच में … बड़ा अनयूज़ुअल है”

“अरे अपनी चाची से पूछ ना” शोखी से हंस कर नीलिमा बोली.

“हिम्मत नहीं होती भाभी, वो अपनी चप्पल से ही मारेंगी मेरे को. वैसे उनकी उस नाजुक सी चप्पल से भी मैं मार खा लूंगा चुपचाप पर …. बताओ ना भाभी प्लीज़” मैंने आग्रह किया.

“अब कैसे बताऊं .. कहां से शुरू करूं … एक बात हो तो बताऊं …वैसे तेरी स्नेहल चाची बड़ी ग्रेट पर्सनालिटी हैं विनय. तुझे तो उनके बारे में टेन परसेंट भी पता नहीं है …. हां … हां … ऐसे ही चोद ना हौले हौले …. बहुत अच्छा लग रहा है”

मैंने धीरे धीरे फ़िर से स्ट्रोक लगाने शुरू कर दिये “बताओ ना भाभी प्लीज़”

“ठीक है बाबा, बताती हूं … बताने जैसा बहुत कुछ है पर … बताना नहीं चाहिये तेरे को … आखिर उनकी पर्सनल लाइफ़ है पर चलो ठीक है … पहले यह समझ ले कि एक बात में मेरा और चाची … ममी का स्वभाव करीब करीब एक सा है … याने सेक्स के बारे में … हम दोनों जरा ज्यादा ही गरम तबियत की हैं. दूसरे यह कि हम दोनों ए.सी. डी.सी. हैं … समझ रहा है ना? याने सेक्स के मामले में पार्टनर मर्द हो या औरत इसका फरक नहीं पड़ता, इसका मतलब यह नहीं कि कभी भी किसी के साथ जानवरों जैसा कर लिया … जो सच में अच्छे लगते हैं, मन को भाते हैं …उनके साथ सेक्स करने में बहुत मजा आता है … जैसा तू .. एकदम स्वीट जवान लड़का और वो भी अपने पास का …. अगर मान लो तू विनय के बजाय एक जवान लड़की विनीता होता और चाची को विनीता पसंद आती और अगर बाकी सर्कमस्टेंसेस फ़ेवरेबल होतीं तो तब भी यही होता जो आज तेरे साथ हुआ है … समझा?”

“हां भाभी, थैंक यू”

“अरे थैंक यू क्या बोलता है, सच में तू चिकना है, हमें इतना सुख देता है. अब अरुण … मेरी शादी के एक महने के बाद ही मेरे हसबैंड के परदेश जाने से हम दोनों मां बेटी जरा अकेली पड़ गयीं गोआ में. दिन रात बस एक दूसरे का साथ ही था, और दोनों का ऐसा गरम नेचर! फ़िर आगे क्या होना है यह तो पक्का ही है. छोटी सी शुरूआत हुई, एक बार शुरुआत हुई तो तेज बहाव में बहते गये हम दोनों. वैसे तेरी चाची याने सच में … माल … हैं. और उनको भी अपनी यह बहू भा गयी. तब तक हम दोनों अलग बेडरूम में थे. फ़िर ममी ही बोलीं कि अकेले में कौन देखता है, तू आ जा मेरे ही बेडरूम में” कुछ देर नीलिमा चुप रही, शायद पुरानी यादों में खो गयी थी.

“पर एग्ज़ैक्ट शुरुआत कैसे हुई, बताइये ना भाभी, याने पहली बार क्या हुआ, पहला कदम किसने उठाया?” मैंने उनको कस के चूम कर फ़िर आग्रह किया. मेरे धक्कों का जोर अब बढ़ गया था. नीलिमा भी नीचे से धीरे धीरे चूतड़ उछाल कर साथ दे रही थी.

“तुझे क्या लगता है?” नीलिमा भाभी ने शैतानी भरी आवाज में पूछा.

“चाची ने किया होगा, जैसा मेरे साथ किया बस में. सॉलिड एग्रेसिव पर्सनालिटी है उनकी”

“पर उनको प्रोत्साहन तूने ही दिया ना? परिवार में और किसीके साथ ऐसा किया है क्या उन्होंने? उनकी ओर घूरकर, ऐसे चोरी छिपे देख देख कर तुझे वे अच्छी लगती हैं यह संकेत तूने ही दिया ना उन्हें! बस ऐसा ही मेरे बारे में हुआ. अरुण नहीं था, और ये सौतन चूत मेरी … बहुत तंग करती थी. उस मूड में ममी की ओर आकर्षण बढ़ने लगा मेरा. और दो औरतों के बीच कपड़े बदलते वक्त वगैरह इतनी प्राइवेसी भी नहीं होती, खास कर जब वे एक ही घर की हों. मेरी निगाहें ऐसे वक्त उनपर टिक जाती थीं. उनको वह समझ में आ गया होगा, किसी की भी नजर पहचानने में वे एकदम उस्ताद हैं … तुझे तो खुद अनुभव है इसका. फ़िर एक दिन हमें दाबोलिम एक शादी में जाना था तो मुझे उन्होंने बुलाया, बोलीं कि ब्लाउज़ टाइट है, जरा बटन लगा दे”

मेरे चेहरे के भाव देख कर नीलिमा हंसने लगी “अरे ऐसा क्यों देख रहा है? तुझे भी उनके इस रामबाण ने ही वश में किया ना? उनको मालूम है कि उनकी छातियां याने क्या चीज हैं. उस दिन उन्होंने एकदम पुरानी ब्रा पहनी थी … शायद जान बूझकर. फ़िर मेरे मुंह से निकल गया कि ममी, ये ब्रा अच्छी नहीं है. फ़िर क्या था, वे बोलीं कि तू ही बता कौन सी पहनूं. फ़िर मैंने उनकी सब ब्रा देखीं. एक से एक स्टॉक है उनके पास. देखते देखते ही मेरी गीली होने लगी थी. उनकी डार्क ब्राउन साड़ी थी इसलिये मैंने वो काली वाली चुनी, तो उन्होंने मेरे सामने ही बदली, याने पूरा नहीं दिखाया, दांत में आंचल पकड़कर उसके पीछे पुरानी ब्रा निकाली और नयी पहनी पर इतनी झीनी थी वो साड़ी, उसमें से सब दिखता था. फ़िर बोलीं कि उस ब्रा के हुक का लूप टाइट है, उसे जरा फैला दे.”

नीलिमा एक मिनिट रुकी, शायद उस पहले मिलन के क्षण को याद कर रही थी. फ़िर आगे बोली “अब मौके पर कुछ था भी नहीं वो वायर का लूप खोलने के लिये तो मैंने दांत से ही कर दिया, तब मेरा चेहरा उनकी पीठ के इतना पास पहुंच गया मैंने कि … अब क्या बताऊं तुझे … अच्छा वो ब्रा कम से कम दो इंच टाइट थी, मुझे खींचना पड़ी, किसी तरह मैंने फ़िर ब्रा को खींचकर उसके हुक लगाये. पता है विनय, मेरे हाथ इतने थरथरा रहे थे कि हुक स्लिप हो गया दो तीन बार, मुझसे लग ही नहीं रहे थे. मन में आ रहा था कि वैसे ही उनको पकड़कर उनके उन ठस कर भरे हुए स्तनों के खूब चुंबन लूं … उनकी उस सपाट चिकनी गोरी पीठ को चूमूं. पर किसी तरह अपने आप को रोका. उस दिन शादी के हॉल में हम चार पांच घंटे थे और सारे समय उनसे ठीक से बात करने का भी साहस नहीं हो रहा था मुझे, बार बार यही लगता कि उन्होंने मेरी नजर में छुपी वासना पहचान ली होगी तो सोच रही होंगी कि कैसी बिगड़ी लड़की है. वो तो बाद में पता चला मुझे कि ये सब तो उन्होंने जान बूझकर किया था.”

नीलिमा चुप हो गयी, पर उसकी नीचे से चोदने की स्पीड बढ़ गयी थी. मैं भी अब अच्छे लंबे स्ट्रोक लगाकर उसे चोद रहा था.

नीलिमा आगे बोली “रात को शादी के डिनर के बाद जब हम वापस आये तो उन्होंने फ़िर मुझे बुलाया “नीलिमा बेटी, ब्रा के हुक निकाल दे. और उसके बाद ब्रा निकाल कर मुड़ कर मेरे सामने खड़ी हो गयीं, मैं तो देखती ही रह गयी उनके उस लावण्य को … याने क्या कहते हैं वो … हां जोबन को … और सबसे बड़ी बात तो यह है विनय कि उनमें कोई झिझक नहीं थी, बड़ा बॉडी कॉन्फ़िडेंस था कि मैं तो सुंदर और सेक्सी हूं और मेरी बहू को भी सेक्सी ही लगूंगी … फ़िर खुद मुझे बाहों में लेकर मेरा चुंबन ले लिया और … मैं उनसे लिपट गयी. उसके बाद तो ऐसी जल्दी हुई मुझे कि ठीक से कपड़े निकालने का भी धीरज नहीं था मुझमें … क्या क्या नहीं किया उस रात हमने !!! वो रात मुझे उतनी ही याद रहेगी जितनी मेरी हनीमून की रात याद है. उसके बाद तो हम जैसे नवविवाहित पति पत्नी ही हो गये. एक दूसरे से जरा भी दूर नहीं रह सकते थे. और ममी भी मेरे जितनी ही प्यासी थीं. वैसे मुझे लगता है कि उनकी प्यास इतनी जबरदस्त है कि कोई उसे शांत नहीं कर सकता.”

दो मिनिट बाद नीलिमा बोली “हो गया तेरा समाधान? वैसे इतनी बातें हैं गरमागरम उनके बारे में पर तुझे नहीं बताऊंगी, तुझे खुद ही पता चल जायेगा, आज के लिये बहुत हो गया. अब जरा स्पीड बढ़ा और जल्दी चोद मेरे को”

ये सब सुनकर मैं भी ऐसा गरम हो गया था कि मैंने नीलिमा को घचाघच चोद डाला, बिना उसके स्खलन की परवा किये, वो बात अलग है कि वो भी ऐसी उत्तेजित थी कि चार पांच धक्कों में ढेर हो गयी.

सांस धीमी होने के बाद मैंने और पूछने की कोशिश की पर नीलिमा टाल गयी, बोली और डीटेल्स चाहिये तो अपनी चाची से ही लो. उस शाम को जब चाची महिला मंडल से वापस आयीं और हम चाय पी रहे थे तो नीलिमा भाभी शैतानी पर उतर आयी. मुझे बार बार आंखों से इशारा कर रही थी कि पूछ ना चाची से. आखिर जब चाची किचन में गयीं तो मैंने कान को हाथ लगाकर इशारे से भाभी से मिन्नत की कि क्यों मुझे मार पड़वाने पर तुली हो तब उसने उझे सताना बंद किया.

इन दोनों कामिनियों के संग मेरी जिंदगी एकदम मजे में कट रही थी. कभी कभी लगता कि जरूर पिछले जनम में कुछ अच्छा किया होगा इसलिये इतना कामसुख मुझे मिल रहा है. दोनों की स्टाइल बहुत अलग थी. जहां नीलिमा भाभी से मैं अब बिलकुल घुलमिल गया था, उनसे कुछ भी कह सकता था, वैसा चाची के साथ नहीं था. नीलिमा को मैं अगर कहता कि भाभी, आज डॉगी स्टाइल करेंगे तो तुरंत तैयार हो जाती. या कहता कि आज तो भाभी, बस लंड चुसवाऊंगा तुमसे, तो वो मना नहीं करती थी.

चाची से यह सब कहने की हिम्मत नहीं होती थी. चाची मेरे सुख का खयाल जरूर रखती थीं पर अपनी तरह से. करवाती मुझसे वो वैसा ही थीं जैसा उनके मन में था. बिना कहे अगर कुरसी में बैठतीं तो साफ़ था कि अब मुझे उनकी बुर चूसना है. या मेरी ओर पीठ करके लेट जाती थीं और खुद मेरे हाथ अपने स्तनों पर रख कर दबा लेतीं तो मैं समझ जाता था कि आज उनको ठीक से गूंधना है. मजाल थी मेरी जो उनसे कहूं कि चाची, मेरा लंड चूसिये.

और अब एक सबसे ज्यादा खटकने वाली बात पर आता हूं. एक महना होने को आया था पर अब तक मुझे उनमें से किसी से गुदा संभोग का मौका नहीं मिला था. अब टीन एज में और नये नये हॉर्मोन उबाल पर आने के बाद किशोर लड़कों के मन में ’गांड मारना’ इस क्रिया के बारे में बहुत उत्सुकता होती है. इन्टरनेट पर भी ’ऐनल सेक्स’ सबसे ज्यादा पॉपुलर है. अब उन दोनों रूपवती नारियों के वे भरे भरे नितंब देखकर बार बार लगता था कि ये मेरे नसीब में हैं या नहीं! और मेरे सामने तो दो तरह के खूबसूरत नितंब थे. जहां चाची के गोले गोरे गोरे, मांसल भरे हुए और मुलायम थे, भले थोड़े से लटक गये हों, वहीं नीलिमा के बड़े भी थे और एकदम कसे हुए गोल मटोल थे. सॉलिड !! संभोग के समय उनको हाथ लगाने का, कभी कभी चूमने का मौका तो मिलता था पर लंड तो क्या, उंगली भी डालने का साहस मैं नहीं जुटा पाया था.

आखिर एक शनिवार को मैंने ठान ली कि आज चाची की गांड में उंगली तो जरूर करूंगा. उनकी बुर चूसने के बाद जब वे बिस्तर पर लेटीं और मुझे अपने पीछे लिटा लिया तो सीधे उनके स्तन दबाने के बजाय मैं ने उनके नितंबों पर हाथ फ़ेरा. वे कुछ बोली नहीं, अपने स्खलन का आनंद लेती आंखें बंद करके पड़े रहीं. फ़िर मैंने धीरे से उन गोलों को चूमा, दो तीन चुंबन ही हुए थे कि उन्होंने पलट कर मुझे पास खींच लिया. मैं समझ गया कि उनकी इच्छा नहीं है कि मैं ऐसे उनके चूतड़ों से खेलूं.

बाद में जब मैं उनके पीछे लेटा उनका स्तनमर्दन करते करते उनके कंधे चूम रहा था, जैसा उन्हें अच्छा लगता था, तो मैंने अपना खड़ा लंड उनके नितंबों के बीच की गहरी लकीर में आड़ा फंसाया और घिसने लगा. अंदर भले ना डालने मिले पर कम से कम उनके गुदा पर लंड तो रगड़ने को मिलेगा ये सोच रहा था. एक दो बार ही किया था कि वे मुझे बोलीं “ये क्या इधर उधर हिलडुल रहा है बेटे, जरा ठीक से कर ना” तो मैं चुपचाप उनके स्तन दबाने लगा, पर लंड तो अब भी उनके उन गुदाज नितंबों पर ही दबा था. उनको वैसे ही मैंने रगड़ने की कोशिश की तो चाची ने पलट कर कहा “चल लेट नीचे” लेटने के बाद वे मुझपर चढ़ गयीं और चोदने लगीं. ऐसा वे बहुत कम करती थीं पर उस दिन उन्होंने मुझे आधा घंटा चोदा. और झड़ने नहीं दिया, अंत तक तड़पाया, आखिर में जब उस मीठी आग से मैं रोने को आ गया तब उन्होंने मुझे ऊपर चढ़ कर चोदने दिया, मुझे शायद अपने अंदाज में पनिश कर रही थीं. उसके बाद मैंने कसम खा ली कि अब ट्राइ भी नहीं करूंगा. वैसे फ़्रस्ट्रेट हो गया था, सोच रहा था कि कैसे चाची की गांड मारी जाये, उनसे यह सीधे कहने की हिम्मत नहीं थी मेरी कि चाची, पट लेटिये, गांड मारनी है आपकी.

मैंने पूरी हार नहीं मानी. उसी दिन रात को जब हम तीनों लगे हुए थे और एक चुदाई के बाद चाची बाथरूम में गयी थीं, तब मैंने नीलिमा के साथ चांस लिया. नीलिमा पट सोयी हुई थी. मैं तुरंत उसके पास बैठ गया और उसके नितंबों पर हाथ फेरने लगा “भाभी … कितना गुदाज चिकना बदन है आपका!”

नीलिमा मुस्कराकर आंखें बंद किये किये ही बोली “आज बड़ा लाड़ आ रहा है. कोई खास बात?”

“भाभी, रहा नहीं जा रहा, इनके चुंबन लेने की इच्छा होती है”

“तो मैंने कब मना किया तेरे को! हमेशा तो करता है वहां चूमाचाटी”

उसकी मंजूरी है यह समझ कर मैं उसके चूतड़ों पर टूट पड़ा. उनको दबाया, मसला, साथ ही पटापट उनके चुम्मे लिये, थोड़ा दांत से हल्के से काटा और फ़िर उसके नितंब का मांस जितना हो सकता था मुंह में भरके चूसने लगा. नीलिमा ने बस ’हं .. हं ..” किया जैसे उसे अच्छा लग रहा हो. मैंने अब आगे का स्टेप लिया, उसकी गांड की लकीर में नाक डाली और फ़िर जीभ से गुदगुदाने लगा. “अरे गुदगुदी होती है ना …” कहकर नीलिमा हंसने लगी. उसने मुझे रोकने की जरा भी कोशिश नहीं की. तभी फ़्लश की आवाज आयी और मैं बिचक कर अलग हो गया.

“अरे क्या हो गया? और कर ना! चाची कुछ नहीं कहेंगीं” उसने मुझे धीरे से कहा भी पर मेरी हिम्मत नहीं हुई. हां उसी रात मैंने नीलिमा की गांड में उंगली की और उसने बिना रोक टोक करने दी. ये मुझे चाची से छुपाकर करना पड़ा. वे दोनों आपस में लिपटी हुई चूमा चाटी कर रही थीं, ओपन माउथ किसिंग और जीभ चूसना जारी था. मैं नीलिमा के पीछे लेटा था. मैंने उसके गुदा पर उंगली रखी और घुमाने लगा. जब वो कुछ नहीं बोली तो धीरे से मैंने उसकी बुर के पानी से उंगली गीली की और फ़िर गुदा पर रखकर दबाने लगा. फ़िर कमाल हो गया, नीलिमा ने अपनी गांड ढीली की और ’पच’ से मेरी उंगली आराम से अंदर चली गयी. नीलिमा ने क्षण भर को अपना छल्ला सिकोड़ा और मेरी उंगली कस के पकड़ ली. फ़िर ढीली छोड़ी तो मैं उंगली अंदर बाहर करने लगा.

ये बहुत देर तक चलता रहा. लगता था कि नीलिमा भाभी को उंगली करवाने में मजा आ रहा था. मैंने खूब मजा लिया. नीलिमा को ये गांड मस्ती अच्छी लगी यह देखकर मुझे फ़िर से जोश आ गया था. दूसरे दिन रविवार था, मेरा और नीलिमा का दिन. मैंने ठान ली कि कल जितना हो सकता है, गांड पूजा के इस सफ़र पर आगे जाऊंगा.

मैं लेट उठा. ग्यारा बज गये थे. सीधा नहा धो कर ही नीचे आया. चाची अपने महिला मंडल को जा चुकी थीं. भाभी ने चाय बना दी. मैंने चाय ली, अखबार पढ़ा और फ़िर किचन में जाकर बैठ गया. रविवार को हम ब्रन्च करते थे. नीलिमा भाभी पराठे बना रही थी. आज उसने साड़ी पहनी थी जबकि घर में वह गाउन में ही रहती थी.

“ये क्या भाभी, आज अपना रोमांस का दिन है और आप बाहर जा रही हैं” मैंने शिकायत की.

“नहीं मेरे राजा, जरा अर्जेंटली जाना पड़ा, वो बाजू के बंगले की दादी आयी थीं, बोली कि नीलिमा, आज मंदिर जाना है, और कोई नहीं है, तू ले चल तो क्या करती. मुझे मालूम है आज अपना स्पेशल अपॉइन्टमेंट रहता है. अब आप बताइये आप के क्या हाल हैं मिस्टर विनय? कल रात तो जरा ज्यादा ही मूड में थे आप, कहां कहां हाथ लगा रहे थे, उंगली डाल रहे थे” भाभी आज खिलवाड़ के मूड में थीं.

“कहां कहां नहीं भाभी, खास जगह. मुझे तो कब से हाथ लगाना था, हाथ क्या और कुछ भी लगाना था, मौका ही नहीं मिल रहा था. मुझे ये भी पता नहीं कि ऐसे आप के पिछवाड़े खेलना आप को अच्छा लगता है या नहीं”

“याने जनाब को भी शौक है इसका, वही मैं सोच रही थी कि जो सब मर्द करने को मरे जाते हैं, वह आप ने अभी कैसे नहीं किया” भाभी मुझे चिढ़ाते हुए बोलीं. मेरी तरफ़ पीठ करके वो पराठे बेल रही थी, उसने साड़ी जरा कस के बांधी थी इसलिये उसके उन विशाल चूतड़ों का आकार साड़ी में से भी दिख रहा था.

मेरा माथा भनक गया. मैं सीधा जाकर नीलिमा के पीछे जमीन पर घुटने टेक कर बैठ गया. उसके चौड़े कूल्हों को बाहों में भरके मैंने उसके नितंबों पर अपना सिर दबा दिया. ऐसा लग रहा था जैसे दो मुलायम बड़े डनलोपिलो के तकियों के बीच मैंने चेहरा छुपा दिया है. बदन से भी भीनी भीनी खुशबू आ रही थी. मैंने अपना चेहरा उसके पार्श्वभाग पर रगड़ा और फ़िर मुंह खोल कर साड़ी के ऊपर से ही उसके नितंब को हल्के से काट लिया. नीलिमा ने ठिठोली के स्वर में कहा “मेरी साड़ी इतनी अच्छी लगी कि उसको खा जाने का इरादा है?”

“भाभी, आप की साड़ी ही क्या, आप की हर चीज मुझे अच्छी लगती है. वैसे एक बात बताऊं, बचपन में जब कोई मुझे चॉकलेट देता था तो मैं उसके रैपर से ही खेलने लगता था. उस मीठे खजाने को खाने के पहले उसपर लिपटे उस रैपर से खेलना मुझे बहुत अच्छा लगता था, आज भी ऐसा ही कुछ हो रहा है मुझे” कहकर मैंने फ़िर से एक बड़ा भाग मुंह में लिया और इस बार कस के दांतों के बीच चबाया.

“उई मां ऽ ऽ … कितने जोर से काट खाया रे? साड़ी नहीं होती तो तूने तो एक टुकड़ा ही तोड़ लिया था मेरे चूतड़ का” दर्द से बिलबिला कर नीलिमा भाभी चिल्लाई.

मैंने सॉरी कहा. “क्या करूं भाभी, इन बड़े बड़े तरबूजों को देख कर यही मन होता है कि चबा चबा कर खा जाऊं”

नीलिमा बोली “चल उठ … जा अब … मुझे अपना काम करने दे, अभी टाइम है अपनी कुश्ती में” पर उसने अपने आप को मेरी बाहों की गिरफ़्त से छुड़ाने का कोई प्रयत्न नहीं किया. उलटे खेल खेल में अपनी कमर हिला कर मेरे सिर को अपने नितंबों से एक धक्का दिया. मैंने एक हाथ उसकी साड़ी के नीचे से डाला और उसके नितंबों को सहलाने लगा. मेरा हाथ सीधे उसकी चिकनी त्वचा पर ही पड़ा, उसने पैंटी ही नहीं पहनी थी. अब उसने पहले ही नहीं पहनी थी और वैसे ही बाहर भी हो आयी थी, या बाहर से आने के बाद निकाल दी थी इसका कोई जवाब मेरे पास नहीं था. हो सकता है कि मैं लेट उठा इसलिये गरमी चढ़ने पर पैंटी निकाल कर एकाध बार उसने हस्तमैथुन कर लिया हो, ऐसी गरम मिजाज की नारी कब क्या करेगी, यह कहना मुश्किल है.

मैंने फ़िर से उसके नितंबों को हथेली में लेकर दबाया और उनके बीच की लकीर में उंगली ऊपर से नीचे तक घुमाने लगा. नीलिमा कुछ नहीं बोली, पराठे बनाती रही. मेरे इस कृत्य को उसकी मूक सम्मति थी, यह मैंने समझ लिया. याने कल का खेल आगे शुरू करने में कोई हर्ज नहीं था.

थोड़ा भटक कर मेरे हाथ उसकी जांघों पर उतर आये. रोज उसकी मदमत्त जांघों के विशाल विस्तार पर मैं इतना खेलता था फ़िर भी मन नहीं भरा था, अपने आप को रोक नहीं पाया. एक बार मन में आया कि इस पोज़ में उसकी बुर चूस लूं क्योंकि अब पास से चूत रस की खुशबू आ रही थी, मेरे लिये भाभी की चासनी तैयार थी. लगता है उसकी भट्टी अब पूरी गरम हो गयी थी. पर जब हाथ बढ़ाकर मैंने उसकी चूत को पकड़ना चाहा तब उसने कस के अपनी टांगें भींच कर मुझे रोक दिया. ये मुझे वार्निंग थी कि इसके आगे न जाऊं. याने उसके नितंबों से खेलने की मंजूरी थी मुझे पर और कहीं हाथ लगाना वर्ज्य था. उसकी चूत तक कैसे पहुंचा जाये यह सोचता मैं उसकी जांघों के बीच हाथ फंसाये दो मिनिट बैठा रहा.

“अब उठो भी ना! ऐसे क्या बैठे हो?” नीलिमा बोली. उसके स्वर में रूखापन तो नहीं पर हां प्यार की कमी थी. लगता है किसी बात पर वह थोड़ा अपसेट हो गयी थी. पर हाथ आया यह मौका छोड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं था. मैंने चुपचाप अपना हाथ उसकी जांघों के बीच से निकाला और उसकी साड़ी और पेटीकोट ऊपर कर दिये. उसका मोटा गोरा गोरा पार्श्वभाग अब मेरे सामने था. इतनी बार मैंने देखा था पर फ़िर भी किचन में दिन के उजाले में दिखती वो भारी भरकम गांड याने जैसे मेरे लिये छप्पन भोग के समान थे. दो बड़े बड़े मैदे के सफ़ेद गोले, नरम और चिकने और एकदम कसे हुए और उनके बीच की गहरी दरार ! सिर्फ़ चुंबन से काम नहीं चलने वाला था, ये तो खा जाने वाला माल था

मैंने उनको प्यार से सहलाया, फ़िर चुंबन लिया. एक दो चुंबनों के बाद मैं जगह जगह उनको चूमने लगा, फ़िर जीभ निकाल कर चाटना शुरू कर दिया कि कुछ टेस्ट भी आये उन खोये के परवतों का.

“जिस तरह से तू स्वाद ले रहा है, तेरी पसंद की मिठाई लगती है विनय” नीलिमा ने कहा.

“हां भाभी. कल ज्यादा टेस्ट नहीं कर पाया, और आज ये जो स्वाद लग रहा है, उससे भूख और बढ़ गयी है, प्योर खोये के ये पहाड़ देखकर इनको खा जाने का खयाल किसके दिल में नहीं आयेगा!”

“तो खा डाल ना, तेरे को किसने रोका है” अपने चूतड़ों को थोड़ा हिला कर नीलिमा बोली. उसकी आवाज में अब फ़िर मिठास आ गयी थी. याने मैडम को ऐसा उनके नितंबों की पूजा करना बहुत अच्छा लग रहा था, तभी दो मिनिट पहले जब मैंने गांड छोड़ कर चूत को टटोलना शुरू कर दिया था, वो फ़्रस्ट्रेट होकर चिढ़ गयी थी. याने अच्छा मुहूरत था, नीलिमा को भी आज गांड पूजा करवाने का ही मूड था.

अब ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद क्या पहले करूं समझ में नहीं आ रहा था. एक मन हो रहा था कि खड़ा होकर तुरंत लंड गाड़ दूं, पर अब पास से वे नितंब इतने सेक्सी लग रहे थे कि छोड़ने की इच्छा नहीं हो रही थी. इस माल का और गहरा स्वाद लेने की इच्छा जागृत हो गयी थी. मैंने नीलिमा भाभी के चूतड़ हाथों से पकड़कर फ़ैलाये. उनके बीच का हल्का भूरा छेद थोड़ा खुल गया और अंदर की गुलाबी नली दिखने लगी. मैंने क्षण भर देखा और फ़िर उनपर होंठ जमा दिये. चुंबन लिया, फ़िर जीभ से चाटने लगा. सपनों में मैंने ये किया था अनजान काल्पनिक कामिनियों के साथ, आखिर आज सचमुच करने का मौका मिला था.

“हं … ओह ऽ .. अरे ये क्या कर रहा है! होश में तो है ना?” नीलिमा सिहरकर बोली.

मैं कुछ न बोला, बस उसकी गांड चूसता और चाटता रहा. जरा और मन लगाकर चखने लगा.

“अरे ये क्या कर रहा है, होश में तो है कि कहां मुंह लगाया है? …” नीलिमा बोली पर उसके स्वरों में जो चासनी घुली थी, उस चासनी के मिठास ही ऐसी थी कि रुकने का सवाल ही नहीं था.

“भाभी, जरा रुको ना, अभी कहां स्वाद आया, जरा ठीक से चखने तो दो” कहकर मैंने जोर लगाकर उसके चूतड़ और चौड़े किये और उसके गुदा का जितना भाग मुंह में आ रहा था, लेकर चूसने लगा. एकदम अलग स्वाद था, एकदम अलग अनुभव था, एक मादक चीज़ी स्मेल थी उस चीज में, मैं ने जीभ की नोक से उसे गुदगुदाया और जीभ अंदर डालने का प्रयत्न करने लगा. चूत का स्वाद इस तरह से मैंने बहुत लिया था, दोनों का, भाभी का और चाची का, वो सरल भी था, चूत तो आराम से खुल जाती है, यहां जरा कठिनाई हो रही थी. पर उसकी वजह से मेरा निश्चय और पक्का हो गया कि अब तो टेस्ट लेकर ही रहूंगा.

ये सब मैं कर रहा था, तब तक नीलिमा ने पराठे बनाना बंद नहीं किया था. पर अब उसके हाथ रुक गये. वो वैसी ही खड़ी रही, कुछ बोली नहीं पर उसके मुंह से एक सिस्कारी सी निकली. बहुत एक्साइट हो गयी थी. मेरे मन में पटाखे फूटने लगे, आज मेरी ये इच्छा पूरी होगी, ये मैंने जान लिया.

नीलिमा ने खुद अपना गुदा और ढीला छोड़ा और मेरी जीभ एक इंच अंदर घुस गयी. मैं जीभ अंदर बाहर करके जीभ से ही उस छेद को चोदने लगा. मेरा लंड अब ऐसा तन गया था कि तकलीफ़ होने लगी थी, रिलीफ़ के लिये मैं उसे नीलिमा की पिंडलियों पर घिसने लगा.

“हं ऽ … हं ऽ … आह ऽ … बहुत अच्छा लग रहा है विनय … हां ऽ … तू तो सच्चा रसिक निकला … हं ऽ … बहुत अच्छा कर रहा है रे … ओह ऽ … ओह ऽ … थोड़ा रुक ना …. ” नीलिमा सिसक कर बोली. उसके स्वरों में अब वासना का पुट आ गया था. मैंने उसके चूतड़ों के बीच के उस मुलायम मांस को खा जाने की अपनी मेहनत दूनी कर दी.

नीलिमा ने बेलन नीचे रखा और गैस बंद किया. फ़िर बिना कुछ बोले मुझे हाथ से पकड़कर खींचती हुई ऊपर ले गयी. बेडरूमे में जाते जाते उसे इतना भी धैर्य नहीं बचा था कि कपड़े निकाले. उसने साड़ी ऊपर करके कमर पर बांधी और पलंग का सिरहाना पकड़कर झुक कर खड़ी हो गयी. “चल वो क्रीम ले आ ड्रेसिंग टेबल से और डाल जल्दी”

नीलिमा भाभी खुद मुझे गांड मारने का आमंत्रण दे रही थी यह देख कर दिल बाग बाग हो गया. मैं झट से ड्रेसिंग टेबल पर गया, वहां एक कोल्ड क्रीम की बॉटल थी. मैंने उंगली पर ढेर सारा लेकर भाभी के गुदा में चुपड़ा, अंदर भी डाला एक उंगली से, थोड़ा सा अपने सुपाड़े पर चुपड़ लिया और हाथ पोछकर नीलिमा के पीछे आकर खड़ा हो गया. नीलिमा ने अपने हाथ अपने नितंबों पर रखे और खुद ही उनको फ़ैलाया, उसका गुदा जो अब क्रीम से चमक रहा था, खुल गया और अंदर का मुलायम भाग मुझे दिखने लगा.

“डाल जल्दी” मुझसे ज्यादा उसी को ज्यादा जल्दी थी. मैंने सुपाड़े की नोक टिकाई और पेल दिया. एक ही धक्के में ’पुक’ की आवाज के साथ वह अंदर हो गया. मुझे लगा था कि शायद वह दर्द से थोड़ा कराहेगी पर उसने चूं तक नहीं की. “हां … हां … अब डाल दे पूरा राजा” उसके स्वर में बेहद मादकता थी.

मैंने जोर लगाया तो एक स्मूथ मोशन में पूरा लंड जड़ तक अंदर घुस गया और मेरी झांटें उसके नितंबों से आ भिड़ीं. मुझे रोमांच सा हो आया. ’कितनी गरम और मुलायम होती है गांड’ मेरे मन में आया. किसी तपती मखमली म्यान जैसी थी. नीलिमा भाभी ने मेरे हाथ पकड़कर अपने कूल्हों पर रखे और खुद फ़िर से पलंग के सिरहाने को पकड़कर झुक कर जम गयी “चल मार अब फटाफट”

किसी की गांड मार रहा हूं, यह कल्पना ही मेरे लिये बहुत उत्तेजक थी. मैं आगे पीछे होकर लंड पेलने लगा. गांड चूत जैसी ही मुलायम था, लंड आसानी से अंदर बाहर हो रहा था. बीच में नीलिमा अपना गुदा सिकोड़ कर मेरे लंड को कस कर पकड़ती और फ़िर छोड़ देती. उसकी सांस तेज चल रही थी. वह बार बार दायीं ओर देख रही थी. मैंने देखा तो वहां ड्रेसिंग टेबल के ऊपर जो बड़ा आइना लगा था, उसमें हम दोनों साफ़ दिख रहे थे. मेरे लंड का साइड व्यू था जो उसके गोरे गोरे चूतड़ों के बीच अंदर बाहर हो रहा था, जैसे ब्ल्यू फ़िल्म चल रही हो. उसको देखते देखते नीलिमा ने एक हाथ पलंग से हटाया और अपनी जांघों के बीच डालकर हिलाने लगी. भाभी हस्तमैथुन कर रही थी, अच्छी खासी गरमा गयी थी. जोर से अपनी बुर को घिसते हुए बोली “अरे जोर से मार ना … ये क्या पुकुर पुकुर कर रहा है … और देख … जल्दी झड़ा साले तो … कोड़े से मारूंगी पकड़कर”

उसकी आवाज में जो अथाह कामुकता भरी थी, उसने जैसे मेरे ऊपर मदिरा का काम किया. मेरे मुंह से अनजाने में निकल गया “भाभी … आज तो तुम्हारी गांड फाड़ कर रहूंगा …”

“है हिम्मत? … हरामी कहीं का … जरा दिखा फाड़ कर … तेरे जैसे कल के छोकरे को तो मैं पूरा गांड में ले लूं … तू क्या फाड़ेगा मेरी साले …”

पहली बार नीलिमा भाभी ने ऐसी भाषा का प्रयोग किया था, उसकी वासना कितनी चरम सीमा पर पहुंच गयी थी इसका यह प्रमाण था. मेरा भी माथा घूम गया “भाभी … आज तेरी गांड का भोसड़ा बना दूंगा … चौड़ी गुफा कर दूंगी इसकी … आज के बाद कोई हाथ डालेगा तो वो भी चला जायेगा कंधे तक … गांड मारना क्या होता है आज तू समझेगी …” और नीलिमा के कूल्हे पकड़कर मैं सपासप अपना लंड पेलने लगा.

भाभी अब पूरी ताकत से मुठ्ठ मार रही थी. एक हाथ से अपना वजन संभालना उसे कठिन हो रहा था पर बुर पर से हाथ नहीं हट रहा था. उसकी सांसें भी अब बहुत तेज हो गयी थीं. मैंने एक हाथ से उसका कूल्हा पकड़े रखा और दूसरा हाथ लंबा कर उसके लटकते मम्मे पकड़ कर मसलने लगा.

“उई ऽ ऽ मां ऽ ऽ” की जोरदार चीख लगाकर नीलिमा झड़ गयी. पिछले तीन चार हफ़्ते में चाची ने मुझे इतना ट्रेन किया था पर फ़िर भी आज मैं कंट्रोल नहीं कर पाया और दो चार कस के धक्के लगाकर नीलिमा के पीछे पीछे स्खलित हो गया. हांफ़ते हांफ़ते हम दो मिनिट वैसे ही खड़े रहे और फ़िर नीलिमा सरककर पलंग पर सो गयी. साथ में मुझे भी नीचे खींच लिया, और मुझे बेतहाशा चूमने लगी.

“विनय … जो मैं बोली उससे शॉक लगा क्या तेरे को? याने ऐसी गंदी लैंग्वेज मेरे मुंह से तूने एक्सपेक्ट नहीं की होगी?”

“हां भाभी लगा तो पर मजा भी बहुत आया” मैंने कहा. वैसे इसके पहले कभी दिमाग में नहीं आया था कि नीलिमा ऐसे बोलेगी.

“अरे सेक्स करते वक्त ऐसा उलटा सीधा बोलना मेरे को भाता है, अरुण को भी, वो तो कैसी कैसी गालियां देता है, उसीने मुझे सिखाया, बोला मजा करना चाहिये, मन पर लगाम नहीं देना चाहिये पर अब ममीजी के साथ ऐसा कैसे बोलूं. वैसे उनके भी दिमाग में क्या क्या आता है इसका अंदाजा है मुझे, तू नहीं जानता यह अच्छा है, उनकी इमेज है तेरे मन में वो वैसी ही रख, और वे बोलती भी नहीं हैं ऐसा कुछ अनाप शनाप. ममी के सामने इसलिये मैं कंट्रोल रखती हूं. पर आज तूने मेरी मारी तो रहा नहीं गया, कितने दिनों के बाद गांड मरवायी है … बहुत सुकून मिला!”

“भाभी … आप को तो गुस्सा नहीं आया ना? शुरुआत मैंने ही की थी ’आज गांड फाड़ दूंगा आपकी’ कहकर”

नीलिमा मुझे लिपटकर बोली “अरे मजा आ गया. पर सच बता, तुझे ये मेरा भारी भरकम पिछवाड़ा सच में अच्छा लगा? मुझे तो कभी कभी शरम आती है कि कैसे बेकार बेडौल मोटी दिखती होऊंगी मैं इसके कारण”

“भाभी, बहुत सेक्सी दिखती हैं आप इन बड़े बड़े कूल्हों की वजह से. क्या गुदाज नितंब हैं आप के. वो आपने पुरानी पिक्चरें देखी हैं? उनमें कुछ हीरोइनें इस मामले में एकदम ए-वन थीं. उनके भी कूल्हे कितने चौड़े थे पर एकदम सेक्सी लगते थे”

“अरुण को भी बहुत पसंद हैं मेरे ये तरबूज … पर ये बता मूरखनाथ … तेरे को एक महना लगा ये सब मुझे बताने में? टाइम वेस्ट किया ना! अरुण तो हनीमून में ही शुरू हो गया था इनपर. एकदम पगला गया था. मुझे लगता है उस एक हफ़्ते के हनीमून में उसने मुझे इस पीछे के छेद में ही ज्यादा चोदा होगा. खैर जाने दे, मुझे लगता है तू शरमा रहा होगा मुझसे ये बात करने में, मैं भी आखिर कैसे भूल जाती हूं कि तू अभी छोटा है, अभी अभी तो शुरू किया है तूने ये सब.”

मैंने फ़िर चाची के साथ के अपने एक्सपीरियेंस को बताया ” भाभी, चाची से एक दो बार कहने की कोशिश की, शुरू भी किया था पर मुझे लगता है वे नाराज हो जाती थीं इसलिये रोक देती थीं. फ़िर मेरी हिम्मत नहीं हुई. आप के साथ चांस इस लिये नहीं लिया कि मुझे किसी को नाराज नहीं करना था, अब आप में से कोई भी मुझसे नाराज हो जाये तो मेरा तो कबाड़ा ही हो जायेगा ना!”

हम दोनों कुछ देर पड़े रहे. फ़िर मैंने हाथ बढ़ाकर नीलिमा के नितंबों को दबाना शुरू कर दिया. उसके गुदा का छेद अब एकदम नरम और चिपचिपा गीला था, खुला हुआ भी लगता था. मैंने अपनी बीच की उंगली डाल दी और अंदर बाहर करने लगा.

नीलिमा मस्ती से गुनगुना उठी “हां … और कर ना … अच्छा लगता है … कितनी अच्छी उंगली करता है तू”

मैं अब उनकी गांड में उंगली इधर उधर घुमा कर खोद रहा था “भाभी आप को अच्छा लगा ये तो मस्त बात है, ऐसे किसी खुबसूरत औरत की गांड में उंगली करने में जो मजा है वह आप नहीं जानतीं. पर भाभी, मैंने पढ़ा है कि अधिकतर औरतों को ये अच्छा नहीं लगता?”

“उनकी मैं नहीं जानती, पर मुझे बहुत मजा आता है. अरुण ने जब पहली बार मारी मेरी तब इतना दुखा फ़िर भी मैंने उसे नहीं रोका क्योंकि तभी मेरे को दर्द के साथ बड़ी मीठी फ़ीलिंग हुई थी. उसके बाद तो आदत लग गयी, अरुण से चुदाने के साथ साथ मैं रोज मराती भी थी. एक भी दिन अगर उसने नहीं मारी तो मुझे अतृप्त जैसा लगने लगता था. अब वो नहीं है तो इस मामले में मेरी कैसी हालत हो रही है वह तू ही समझ सकता है. वैसे ममी के साथ चूत का सुख खूब मिलता है मुझे पर ये पीछेवाली चूत पागल कर देती है … एक दो बार तो मैंने कैंडल डाल कर भी देखा … मजा नहीं आया. अब तू आ गया है ना, अब हर रविवार को तेरी यही ड्यूटी है समझ ले”

मैं उसकी गांड में उंगली करता रहा. नीलिमा ने अचानक मुझे प्यार से चूम लिया “मुझे बहुत याद आती है अरुण की. उसके साथ सेक्स याने … वो ऐसी नयी नयी चीजें करता है … क्या दिमाग चलता है उसका … पर ममी ने भी मुझे खूब सुख दिया है और अब तू मुझे करीब करीब अरुण जैसा ही भोग रहा है इसलिये सोच रही हूं कि अगर वीसा मिल जाये तो … जरा खट्टा मीठा किस्सा हो जायेगा. मन तो बहुत है कि तुरंत अरुण के पास चली जाऊं पर तुमको और ममी को छोड़कर जाने का भी मन नहीं करेगा”

फ़िर उसने उठ कर कपड़े ठीक किये और बोली “ब्रन्च क्या अब लन्च का टाइम हो गया. चल मुझे भूख लगी है. फ़िर दोपहर को तुझसे जरा मेहनत कराती हूं. एक मस्त खास चीज भी दिखाऊंगी तेरे को”

खाना खाकर हम आधा घंटे के बाद ऊपर आये. मैंने नीलिमा से कहा कि ’भाभी, आप ऊपर जाइये, आज खाने के बाद की साफ़ सफ़ायी मैं करूंगा. उसे मेरा ये जेश्चर बड़ा अच्छा लगा, मुझे प्यार से किस किया और ऊपर चली गयी.

जब मैं ऊपर आया तो नीलिमा अलमारी में कुछ ढूंढ रही थी. मैंने कपड़े निकाले और तैयार होकर नंगा बिस्तर पर लेट गया. जब पांछ मिनिट हो गये तो रहा नहीं गया. “भाभी अब आओ ना, कितनी देर लगा रही हो, अब देखो, क्या सुताई करता हूं तुम्हारी गांड की!”

“आई मेरे राजा, एक चीज ढूंढ रही हूं, मेरी खास पसंद की, मिल जाये तो सोने में सुहागा हो जायेगा, बहुत दिन से यूज़ नहीं की है इसलिये जरा याद नहीं आ रहा कि कहां रख दी थी” फ़िर उसने अलमारी के नीचे वाले कोने से अरुण का पुराना ब्रीफ़केस निकाला. आखिर जो वह ढूंढ रही थी, उसे मिल ही गया. लेकर मेरे पास आयी.”ये बटरफ़्लाइ लगा लेती हूं, उसके बाद तू मेरी मारना, जितनी चाहे मारना”

उसके हाथ में एक प्लास्टिक और रबर का खिलौना सा था, तितली के शेप का. दो रबर के बड़े फ़्लैप्स थे, और नीचे एक तरफ़ एक छोटा डिल्डो जैसा निकला हुआ था. उसके बाजू में एक नरम रबर का पीस था जिसपर छोटे छोटे मुलायम दाने से उभरे हुए थे. दोनों तरफ़ बांधने के लिये स्ट्रैप्स थे.

“कभी देखा नहीं भाभी इसको” मैं उत्सुकता से बोला. “एक दो बार एक साइट पर फोटो देखा था पर कुछ समझ में नहीं आया. सादे वाइब्रेटर से अलग सा लगता है”

“अरे वो वाइब्रेटर अंदर डालना पड़ता है, एक हाथ हमेशा बिज़ी हो जाता है, कभी कभी दोनों हाथ भी लगते हैं. हैन्ड्स फ़्री मजा लेनी हो तो ये बटरफ़्लाइ बेस्ट है, रिमोट भी है, एक बार बांध लो, बस मजा ही मजा, ठहर तुझे दिखाती हूं” उसने उस बटरफ़्लाइ के पीछे जो छोटा सा डिल्डो सा था, अपनी चूत में घुसेड़ लिया, फ़िर क्लिप से अपने भगोष्ठों पर उसके विंग फ़िट कर लिये. इसके बाद उसने दोनों स्ट्रैप अपनी कमर में लपेटे और बकल लगा लिया.

“देख, फ़िट हो गया, अब मजा देख” उसने रिमोट दबाया तो धीमी धीमी ’भन्न’ ऐसी आवाज होने लगी. वो पूरा उपकरण अब कांप रहा था. “आह … आह … मजा आ रहा है विनय … वो दाने दाने थे ना ? … वो ठीक मेरे क्लिट पर फ़िट होते हैं … ये वाइब्रेट होता है तो लगता है कोई कस के मुठ्ठ मार रहा हो … हाय … आ जा ना अब जल्दी ..” नीलिमा रिमोट ऑफ़ करके करवट पर सो गयी. अब भी उसके गुदा में क्रीम लगी थी इसलिये मैं फ़िर से क्रीम लगाने के चक्कर में नहीं पड़ा. उसके पीछे लेटकर मैंने अपना लंड उसके चूतड़ों के बीच घुसेड़ दिया. आराम से अंदर चला गया. अब मुझे समझ में आया कि कैसे नीलिमा भाभी इतनी आसानी से लंड गांड में ले लेती है, आखिर अरुण से इतना मरवाती थी, उसका असर तो हुआ ही होगा.

मैंने भी अपनी करवट पर लेटे लेटे धक्के लगाना शुरू कर दिये. नीलिमा ने मेरे हाथ अपने बदन के इर्द गिर्द लेकर मेरी हथेलियां अपने स्तनों पर रख दीं. मैं उनको दबाने लगा. जल्दी ही लय मिल गयी और मैं फचाफच फचाफच उसकी गांड में लंड पेलने लगा. जब नीलिमा ने देखा कि अब अच्छे से उसकी गांड चुद रही है तो उसने रिमोट ऑन कर दिया. ’भन्न ऽ ऽ’ की आवाज के साथ वह तितली उसकी चूत को सुख देने लगी.

“अब मम्मे दबा और गांड मार मेरे राजा … बहुत अच्छा लग रहा है …. मेरी कसम विनय … बहुत देर मारना प्लीज़ … बहुत दिन के बाद यह सुख मिला है मुझे” नीलिमा सिसकती हुई बोली.

नीलिमा भाभी को उस दिन मैंने भरपूर सुख दिया. दोपहर भर उसकी गांड मारी, दो बार झड़ा जरूर पर बीच में एक ब्रेक छोड़ कर उसकी गांड में लंड डाले दो घंटे गुजार दिये. जब जब झड़ा तब भी वैसे ही मुरझाया लंड अंदर दिये पड़ा रहा. उस वक्त नीलिमा ने भी अपना गुदा सिकोड़ कर मेरे लंड को पकड़ कर रखा था कि निकल ना जाये.

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