मैं और मेरी स्नेहल चाची अध्याय 5

झड़ने से बचने के लिये बीच में काफ़ी देर बस लंड को गांड में दिये पड़ा रहता था, धक्के नहीं मारता था. नीलिमा ने अलग अलग आसनों में मुझसे गांड मरवायी, कुछ देर पलंग पर करवट पर लेट कर, फ़िर झुक कर खड़े होकर, उसके बाद फ़िर से पलंग पर पट लेट कर, फ़िर दीवार की ओर मुंह करके उससे सट कर खड़े होते हुए और अंत में मेरी गोद में बैठकर. जब वह मेरी गोद में बैठकर ऊपर नीचे होकर मेरे लंड को अपने चूतड़ों के बीच अंदर बाहर करते हुए मरवा रही थी, तब सामने आइना था. उस आइने में उसका नग्न शरीर देखते हुए, उसकी मोटी गोरी गांड में अपने लंड का डंडा अंदर बाहर होता देखते हुए, उसकी गोरी गोरी जांघों के बीच चूत से चिपकी तितली के पंख फड़फड़ाते हुए देख कर (… बिलकुल ऐसा लगता था जैसे तितली किसी फूल का रस पी रही हो, और क्या रस था इस गुलाबी फ़ूल का, टेस्ट मैं जानता था, उस नकली तितली से भी मुझे जलन होने लगी थी …) और मेरे हाथों में पिसते उसके नरम नरम मम्मे देखते हुए उसकी गांड मारना एक बहुत ही उन्मादक अनुभव था. इस बार नीलिमा ने ज्यादा गाली गलौज नहीं की क्योंकि अब उसको बिना ब्रेक के तीव्र सुख मिल रहा था. सिर्फ़ एक बार जब मैंने उसके मम्मे दबाना एक मिनिट को बंद किया – जरा हाथ दुखने लगे थे – तो वो चिल्लाई “अरे भड़ुए … दबा ना … साले रुक क्यों गया … दम नहीं है क्या ..” और मैंने तुरंत उसके स्तन मसलना शुरू कर दिया, ये भी ठान ली कि अब हाथ कितने भी दुखें, नीलिमा की चूंचियां पिचकाकर ही रहूंगा. मसलवा कुचलवा कर जब नीलिमा की चूंचियां नहीं दुखीं तो मेरे हाथ थक जायें ये बड़ा इन्सल्टिंग था.

उस दोपहर की मेरी मेहनत का बड़ा मीठा फल मुझे मिला. जब नीलिमा ने वो बटरफ़्लाइ अपनी बुर से निकाली तो उसका निचला रबर का भाग और वो छोटा डिल्डो उसकी चूत के रस से सराबोर था. नीलिमा ने उस गीली बटरफ़्लाइ को हाथ में लेकर जिस शोखी से मेरी ओर देखा था, उससे साफ़ था कि वह मुझसे क्या उम्मीद कर रही थी. इसलिये जब उसके बिना कुछ कहे मैंने उसके हाथ से बटरफ़्लाइ लेकर उसे जीभ से चाटा तो उसकी मुस्कान देखते बनती थी. उस सेक्स खिलौने को चाट कर साफ़ करने में इतना स्वाद आया कि कह नहीं सकता. बाद में नीलिमा ने बताया कि वह बटरफ़्लाइ उसे अरुण ने लाकर दी थी. “अरे उसे मालूम है मेरी गरम तबियत, पिछली बार आया था तो साथ लेकर आया था कि अकेले में चुपचाप मजे ले सकूं”

चाची देर दोपहर वापस आयीं तब तक मैं अपने कमरे में जाकर सो गया था और नीलिमा अपने कमरे में.

उसके बाद रविवार की दोपहर की वह रति याने गांड मारने का कार्यक्रम एकदम फ़िक्स हो गया था. फरक सिर्फ़ इतना हुआ कि नीलिमा भाभी किचन से मख्खन का एक छोटा डिब्बा साथ ले आती थी. वह इसलिये कि वह नहीं चाहती थी कि कोल्ड क्रीम के कड़वे स्वाद के कारण उसका गुदा चूसने की मेरी क्रिया में कोई खलल ना पड़े. “विनय राजा, उस दिन जल्दी में कोल्ड क्रीम यूज़ कर ली नहीं तो अरुण तो हमेशा मख्खन यूज़ करता है. कोल्ड क्रीम का स्वाद नहा धोकर भी कई दिन नहीं जाता. और जब तू इतने प्यार से वहां मेरे किस लेता है, जीभ से गुदगुदाता है तो मैं नहीं चाहती कि तुझे ऐसा कड़वा स्वाद आये”. और अब मैंन भी खुद नीलिमा की नरम नरम गांड के स्वाद का दीवाना हो गया था. गांड मारने के पहले उसके गोरे चूतड़ फैलाकर उनके बीच के नरम कोमल छेद को मुंह लगाने में जो जायका आता था, उसकी आदत सी पड़ गयी थी. और ऊपर से मख्खन लगी गांड को चाटने और चूसने में अलग ही स्वाद आता था, जैसे मख्खन लगी मोटी बनपाव वाली डबल रोटी खा रहा होऊं.

उन कुछ दिनों में मुझे नीलिमा भाभी की इतनी गांड मारने मिली थी कि फ़िर मैंने बीच के दिनों में चाची की गांड की मेरी आस को करीब करीब छोड़ ही दिया, सोचा बाद में देखूंगा. वैसे नीलिमा मुझे बोली “ऐसा निराश ना हो, मुझे नहीं लगता चाची को गांड मराने से परहेज है, सेक्स में तो उनका दिमाग मुझसे दूना चलता है, जरूर और कोई बात है, वैसे मेरा मन कहता है कि तुझे उनकी गांड मिलेगी जरूर. हां हो सकता है कि इतनी बेशकीमती चीज तुझे देने के पहले तुझसे कुछ रिटर्न में चाहती हों”

दो महने ऐसे ही कब गये पता भी नहीं चला. फ़िर एक दिन अरुण का फोन आया. वैसे वह हफ़्ते में दो तीन बार फ़ोन करता था, मेरी भी फ़ॉर्मल बात ’हाय हेलो’ होती थी. पर मैं फ़िर खिसक लेता था कि नीलिमा और चाची को खुल कर बात करने का मौका मिले.

इस बार फोन वीसा के बारे में था. नीलिमा ने स्पीकर ऑन किया था. अरुण ने कहा कि उसका ग्रीन कार्ड हो गया है और नीलिमा को भी वीसा मिल गया है. चाची का अभी प्रोसेस में है.

चाची ने अरुण को कहा कि वह नीलिमा को तुरंत बुला ले, वे बाद में आ जायेंगी. नीलिमा को ऐसे अकेले जाना अटपटा लग रहा था. वह चाची को भी साथ ले जाना चाहती थी.

चाची बोलीं “अरे बेटा, मेरी चिन्ता मत करो, मैं यहां अकेली थोड़े रहूंगी, विनय भी है. बाद में आ जाऊंगी. और मुझे नहीं लगता कि मैं वहां अमेरिका में हमेशा रह पाऊंगी, बस आ जाकर रहूंगी तो मन बहला रहेगा”

अरुण बोला कि मां तुम टूरिस्ट वीसा पर छह महने रह सकती हो. तब तक यह भी हो जायेगा.

चाची ने मेरी ओर देखा. मुझे जरा उदास सा लगने लगे था. दो माह स्वर्ग में बिताने के बाद अचानक अकेला रहना पड़ेगा यह विचार ही सहन नहीं हो रहा था. दूसरी ओर चाची के बारे में सोचता तो एक मां को भी तो आखिर बेटे के पास जाने का हक था और ऊपर से बोनस में यह सेक्सी बहू भी थी, दिन भर खेलने को. मैं धीरे से वहां से निकल लिया कि उन्हें आराम से अकेले में सोच विचार करने का मौका मिले.

बाहर से आया तब हमेशा हर रविवार की तरह चाची अपने महिला मंडल निकल गयी थीं. नीलिमा ने खाना तैयार रखा था. खाना खाकर हर रविवार की तरह हम दोनों उसके कमरे में पहुंचे. कपड़े निकाले. आज नीलिमा एकदम मूड में थी. बटरफ़्लाइ लगाकर खुद मेरी गोद में बैठ गयी, मेरा लंड अपनी गांड में लेकर, गांड मराने की यही स्टाइल उसे सबसे ज्यादा पसंद थी. मैंने उसका स्तनमर्दन करते हुए नीचे से धीरे धीरे गांड मारना शुरू कर दिया. नीलिमा ने एक सुख की लंबी सांस ली और फ़िर मुड़कर मेरी ओर देखा. कस के मेरा चुंबन लिया, आज उसके चेहरे पर अलग ही चमक थी.

“क्या बात है भाभी, आज बड़े मूड में हो. सैंया के यहां जाने की लाइन क्लीयर हो गयी इसलिये आज एकदम खुशी में लग रही हैं आप”

“हां विनय … मैं बहुत मिस करती हूं अरुण को … अब बस दस बीस दिन और और फ़िर मैं प्लेन में”

“भाभी …. अरुण भैया को अपने बारे में … कोई शक तो नहीं हुआ होगा ना? इस लिये पूछ रहा हूं कि उसे मालूम है तुम्हारा गरमागरम जोबन, ये चुदासी तड़प चैन नहीं लेने देती आप को, आखिर उसने खुद ही आप को ये बटरफ़्लाइ लाकर दी है, फ़िर अब शक हुआ तो कि साथ में जवान लड़का रह रहा है तो …”

“अरे नहीं, वो कभी शक वक नहीं करेगा. और अगर उसे मन में लगा भी कि ऐसा कुछ चल रहा है तो माइन्ड नहीं करेगा वो, उलटा खुश ही होगा. हमारा इतना प्रेम है एक दूसरे पर, एक दूसरे की सब जरूरतों को हम समझते हैं. अब तुझसे क्या छुपाऊं, पिछली बार आया था तो खुद मुझसे बोला कि यार, ऐसी प्यासी प्यासी ना रहो, कोई अच्छा यार दोस्त ढूंढ लो. मैंने बात टाली तो कहने लगा कि ऐसे टालो मत, बाद की खुशहाल जिंदगी के लिये अभी ये दूर रहना अवॉइड नहीं हो सकता, तो फ़िर ये एक दो साल प्यासे तड़पते निकाले जायें, इसमें क्या तुक है? इसपर मैंने उसकी जरा खींची याने बोली कि महाशय, आपने शायद पहले ही अपने अकेलेपन के लिये कोई ढूंढ ली है तो कुछ बोला नहीं, बस आंख मार कर हंस दिया. एक और बात बताती हूं विनय, पर किसी से कहना नहीं, ममी से भी नहीं …” मेरे कान को हौले से दांत से काट कर नीलिमा बोली, अब एकदम खेलने खिलाने के मूड में थी.

“बोलो ना भाभी, मुझे क्या पड़ी है किसी को बताने की!” पति पत्नी के बीच की ये गुप्त बातें सुनकर मुझे भी मस्ती चढ़ रही थी, ऊपर से यह समाधान था कि नीलिमा को मैं अब इतने करीब का लगने लगा था कि वो ये सब बातें मुझसे एक क्लोज़ फ़्रेन्ड जैसे शेयर करने लगी थी.

“उसने मुझे ये हिंट भी दी कि अमेरिका आने के बाद एक दो हसबैंड वाइफ़ कपल्स के साथ कुछ खास दोस्ती करेंगे. उसके दो दोस्त वहां यू एस में हैं पहले से और एक यहां उसके साथ ही नाइजीरिया में है, उसको पहले ही वीसा मिल चुका है. पिछले महने जब वो काम से यू एस गया था तो सब मिले थे, लगता है पार्टी की होगी सब ने मिलके, तो सब ने यही ठहरा लिया है कि अब सब वहां पहुंचने के बाद खास ग्रूप बनेगा. और ये अरुण बोल रहा था कि सब मेरे बारे में पूछ रहे थे कि नीलिमा कब आने वाली है, बाकी दो की वाइफ़ तो वहीं है और एक पहुंचने वाली है. और विनय, ऊपर से मेरे इस बदमाश नालायक पति ने उनको मेरे फोटो भी दिखाये. बोला कि देख कर अब बहुत एक्साइट हुए. और ऐसी सादगी से ये बोल रहे थे महाशय कि कुछ हुआ ही ना हो. मैंने जब डांट कर ऊंची आवाज में पूछा कि कौन से फोटो दिखाये, ऐसे एक्साइट करने वाला क्या था उसमें तो बदमाश बोला कि वो जिसमें तू बांसुरी बजा रही है, वो फोटो दिखाया. और वो जिसमें तू मेरे लिये सन्तरे का रस निकाल रही है”

“तो भाभी? मैं समझा नहीं”

“अरे ऐसा कोई फोटो नहीं है मेरा. हां कुछ फोटो उसने मेरे खास निकाले थे, याने सिर्फ़ उसके देखने के लिये, उसमें से एक था … उसके सुपाड़े को चूसते हुए … मुझे लगता है उसने वही दिखा दिया होगा” नीलिमा ने मेरे कान मे कहा. वह अच्छी खासी उत्तेजित हो गयी थी. मुझे लगता है कि अभी से वह तीन दोस्तों और उनकी तीन पत्नियों के बीच प्लान की जाने वाली मौज मस्ती के ख्वाब देखने लगी थी.

मेरा लंड मस्ती में टनटना गया “अच्छा! पर भाभी वो सन्तरे के रस वाली फोटो में ऐसा क्या है”

“अरे कहां का सन्तरे का रस! वो तो मेरी बुर चाट रहा था, टाइमर लगाकर उसने फोटो लिया था उसका. हमेशा कहता है कि रानी तेरी चूत के होंठ याने रसीले नागपुरी सन्तरे की फांकें. बदमाश आगे कह रहा था कि वे सब बोले कि यार, भाभी को जरा हमारे लिये भी सन्तरे का रस निकालने को बोलो प्लीज़. फ़िर मैंने पूछा कि उनको बोलो कि पहले अपनी घरवालियों को कहो कि तुमको खाने पर बुलायें.”

फ़िर नीलिमा मुझसे लिपट कर बोली “मैंने फ़िर पूछा कि तुम अब तक उनके यहां गये या नहीं तो बोला नहीं, तुम्हारा इंतजार है, पर फोटो पर से लगता है कि तीनों के घर का खाना स्वादिष्ट ही होगा. और बोला कि रानी, तुम भी बाहर खाने पीने की शौकीन हो मुझे मालूम है”

“भाभी, आप को अच्छा लगेगा वो वाइफ़ स्वैपिंग वगैरह, अरुण शायद उसी के बारे में हिंट कर रहा था”

“बहुत मजा आयेगा विनय, तीन तीन जवान मर्द और साथ में उनकी बीवियां. अरे सिर्फ़ सोच कर मेरा रस टपकने लगता है, अब जरा जोर से दबा ना और” नीलिमा ने रिमोट से बटरफ़्लाइ और तेज की और फ़िर खुद ही मेरी गोद में नीचे ऊपर होकर मेरा लंड गहरा अपनी गांड में लेने लगी.

थोड़ी देर से बोली “विनय … मेरी एक और फ़ेंटसी है. जरा विचित्र किस्म की है पर जब सोचती हूं तो बहुत मजा आता है … अब तेरे को बताने में हर्ज नहीं है क्योंकि वैसे भी मैं दस पंद्रह दिनों में जाने वाली हूं … मैं इमेजिन करती हूं कि मैं ऐसे ही, याने जैसे तुम्हारी गोद में बैठी हूं, वैसी ही अरुण की गोद में बैठी हूं, उसका वो शाही लंड गांड में लेकर …”

“अब यह क्या फ़ेंटसी हुई भाभी, ऐसा तो तुम सच में ही करती होगी अपने पति के साथ!”

“अरे आगे सुन तो … तो मैं अरुण की गोद में बैठ कर गांड मरा रही हूं, बटरफ़्लाइ नहीं लगायी है, बटरफ़्लाइ के बजाय … ममी मेरे सामने बैठी हैं और मेरी बुर चूस रही हैं …”

“अरे बाप रे … एक साथ पति और सास के साथ सेक्स! बहुत तगड़ी कल्पना शक्ति है आप की भाभी, पति और सास मिल कर प्यारी बहू के लाड़ प्यार कर रहे हैं, उसे सुख और आनंद दे रहे हैं … वाह … मजा आ गया भाभी” मैंने मस्ती में कस के नीलिमा की गांड में अंदर तक लंड पेला और उसके मम्मे जोर से हथेली में भर लिये.

“… और फ़िर हम जगह बदल लेते हैं, याने ममी अरुण की गोद में और मैं उनके सामने नीचे जमीन पर बैठ कर उनकी चूत का स्वाद ले रही हूं. मेरी आंखों के बिलकुल सामने तीन इंच दूरी पर उनकी गोरी मोटी गांड है और उसमें उनके ही बेटे का लंड घुसा हुआ है” मेरे हाथ अपनी चूंचियों पर दबाते हुए नीलिमा बोली, उसकी गांड का छल्ला अब मेरे लंड को कस के पकड़ा हुआ था “सुखी परिवार हमारा … मजे की बात है या नहीं?”

मेरे लंड ने नीलिमा की गांड में ही तन कर उसकी इस कल्पना शक्ति को सलाम किया, मैंने नीचे से दो चार कस के धक्के भी मारे. नीलिमा ने रिमोट का बटन और सरकाया और उसकी चूत से चिपकी वह बटरफ़्लाइ जोर जोर से भनभनाने लगी “हां … ऐसे ही मार ना विनय राजा … मुझे अरुण और ममी को इस तरह से लिपटे हुए देखना है … वे आपस में खुल कर संभोग कर रहे हैं और मैं उनके साथ लेटी हुई उस रतिरत मां बेटे की जोड़ी के बारी बारी से चुंबन ले रही हूं और उन्हें संभोग और तेज करने को कह रही हूं, और कस के चोदने को … उकसा रही हूं …आह … ओह ऽ … हां … आह ऽ ऽ …” और नीलिमा अचानक लस्त पड़ गयी.

उसकी यह अनूठी फ़ेंटसी को सुन कर मैं भी बेभान सा हो गया था, नीलिमा के झड़ते ही मैंने उसे वहीं सोफ़े पर पटका और उस पर चढ़ कर घचाघच उसकी गांड मार ली. “अरे ये क्या कर रहा है … जरा आराम से …” वह कहती रह गयी पर मैंने नहीं सुनी. मुझे नीलिमा पर जरा सा गुस्सा भी आ गया था, जब झड़ी नहीं थी तो तैश में आकर जोर जोर से मरा रही थी, अब खुद की बुर शांत हो गयी तो मुझे सबर करने को कहने लगी.

थोड़ी देर बाद नीलिमा उठ कर तृप्त भाव से टांगें फैलाकर सोफ़े में टिक कर बैठ गयी. “आज तूने डिसिप्लिन तोड़ दिया राजा, ऐसे चोद मारा मेरी गांड को. पर जाने दो, माफ़ किया, आज मैंने बातें भी जरा ज्यादा ही हरामीपन वाली की हैं” मैं सामने नीचे बैठकर अपना काम करने लगा, याने नीलिमा की बुर से बटरफ़्लाइ निकालना और फ़िर प्यार से सब बह आया रस चाट लेना. पिछले दो तीन रविवार नीलिमा ने यही क्रम बना दिया था.

“विनय … तेरे को भी मेरी फ़ेंटसी अच्छी लगी, है ना? झूठ मत बोल, कैसे एकदम से चढ़ गया था मेरे ऊपर!” मेरा सिर पकड़कर नीलिमा बोली.

मैंने अपना काम पूरा किया और उठ बैठा. “भाभी, आप तो पॉन्डी लेखक बन जाओ. मस्त बदमाशी से भरी हुई पॉन्डी लिखोगी तुम. पर भाभी, ये फ़ेंटसी फ़ेंटसी ही रहने वाली है या इसको सच करने को कुछ करने वाली हो? अब तो जल्दी ही आप तीनों वहां अमेरिका में होगे”

“हां देखती हूं, अभी सब प्लान जरा अधर में ही हैं, ममी ने भी कुछ कहा नहीं कि वे कब आने वाली हैं, मेरे साथ या बाद में”

एक दो दिन और ऐसे ही गये. फ़िर इस विषय पर चर्चा नहीं हुई क्योंकि ऐसा एकांत नहीं मिला. नीलिमा और चाची ने अमेरिका जाने की तैयारी शुरू कर दी थी. अभी मुझे कुछ ठीक से पता नहीं था कि चाची कितने दिन को जाने वाली हैं. वैसे हमारा रोज रात का तीन तरफ़ा संभोग जोर शोर से चल रहा था. अब कुछ दिनों के बाद वे दोनों यहां नहीं होंगीं, यह सोच कर मेरा जोश जरा बढ़ गया था कि रहे सहे समय में जितना हो सकता है उतना इन दोनों अप्सारों को भोग लूं. नीलिमा तो गरम थी ही, रविवार को अब वह गांड मराने के साथ साथ चुदाने भी लगी थी, हो सकता है कि उसे एहसास हो गया हो कि अब अरुण के पास जाने के बाद उसकी गांड की सिकाई वैसे ही ज्यादा होगी, तो चूत रानी की प्यास का इंतजाम अभी से कर लिया जाये.

उस रविवार को हमें पूरी दोपहर और शाम भी मिली क्योंकि चाची अपनी एक पुरानी सहेली से मिलने चली गयी थीं और देर रात वापस आयीं. उनका नाम लता सरनाइक था. चाची जब सुबह बता रही थीं कि लता का फोन आया है, वह अभी अभी गोआ वापस आयी है, दो साल से अमेरिका में थी, और मैं उससे मिलने जा रही हूं, रात को ही वापस आऊंगी तो नीलिमा के चेहरे पर एक हल्की मुसकान थी. मैं समझा कि अब मैं और वह अकेले रहेंगे इसलिये भाभी खुश हैं कि बिना रोक टोक जो भी मन में है, करने मिलेगा.

उस रविवार को हमने अपना पूरा दम लगा दिया, कितना भी चोदो, नीलिमा भाभी का मन नहीं भर रहा था. उस दिन रात को जब हम सोये तो मैं थक कर चूर हो गया था, लंड और गोटियां भी बुरी तरह दुख रही थीं पर मुझे गम नहीं था, एक खुशी ही थी कि जाते जाते आखिर के दिनों में भाभी मुझे इस तरह से भोग रही है जैसे जनम भर की कसर पूरी कर लेना चाहती हो. वैसे वह कहती थी कि विनय तू भी वहां अमेरिका आना, कुछ चक्कर चला ट्रेनिंग का अपनी कंपनी में, या कहती कि मैं हर साल एक बार तो जरूर आऊंगी. पर हम दोनों को मालूम था कि भले ही मुलाकात हो, पर इतने फ़ुरसत के दिन आपस में कभी नहीं मिलेंगे.

स्नेहल चाची भी अब जरा फ़ॉर्म में आने लगी थीं. आज कल मुझे काफ़ी रगड़ती थीं, याने चुदाती तो थीं पर अब मेरे साथ अकेले में धीरे धीरे कुछ अलग तरह की हरकतें ज्यादा करने लगी थीं. नीलिमा जब साथ होती थी तब वे बस हमेशा की तरह अपनी बहू के साथ मिलकर मुझसे संभोग करती थीं. पर शनिवार के अकेले संभोग में उन्होंने धीरे धीरे मुझे और रंगीन जलवे दिखाना शुरू कर दिया था.

अरुण का फोन आने के बाद वाले शनिवार को मैंने हमेशा की तरह उनकी बुर पूजा से संभोग का आरंभ किया. कुछ देर के बाद जब उनकी बुर देवी मुझे रस का प्रसाद दे रही थीं और मैं उसे ग्रहण कर रहा था तब चाची ने कुरसी में बैठे बैठे मेरे बालों में हाथ चलाते हुए कहा “बहुत अच्छा शांत और स्वीट लड़का है तू विनय. पर लगता है कि अब भी मुझसे शरमाता है. या घबराता है?”

“नहीं चाची … बस आपको .. बहुत रिस्पेक्ट करता हूं … चाहता भी हूं … आप की ही वजह से तो मुझे इतना सुख मिल रहा है वरना सबका ऐसा नसीब कहां होता है” मैंने उनकी बुर पर जीभ चलाना एक मिनिट को रोक कर कहा.

“मुझे भी तू बहुत प्यारा लगता है, लगता है जैसे तू मेरा गुड्डा है, सिर्फ़ मेरा अपना है, और किसी का नहीं है और फ़िर सोचने लगती हूं कि इस गुड्डे को कैसे और प्यार करूं, कैसे इसके साथ खेलूं” पहली बार चाची ऐसे खुल कर प्यार से मेरे साथ बोल रही थीं. मैं भी थोड़ा रिलैक्स हो गया, उनके पास खिसककर उनकी पिंडली पर अपना तन्नाया लंड रगड़ते हुए बोला “स्नेहल चाची … आप कुछ भी कहिये …कुछ भी कीजिये मेरे साथ … आप जो भी करेंगीं बहुत अच्छा लगेगा मुझे”

“हां बेटे वो तो मैं करूंगी पर अभी ये बता कि आज तुझे मेरे साथ क्या करने का मन है? आज थोड़ा तेरे मन जैसा हो जाने दे. रोज तो मैं अपने ही मन की चलाती हूं” उन्होंने एक पर एक पैर रखकर मेरे लंड को अपनी पिंडलियों में दबाते हुए कहा.

मेरे मन में आया कि तुरंत उनकी गांड मांग लूं जिसके लिये मैं मरा जा रहा था. नीलिमा की गांड मारते वक्त जब चाची की और भरी हुई, और भारी भरकम, और गुदाज गांड की याद आती थी तो बड़ी तकलीफ़ होती थी. फ़िर जरा सुबुद्धि से काम लिया, चाची भली भांति जानती थीं कि मेरे मन में क्या है, उन्हें जब ठीक लगेगा, खुद ही अपनी गांड मुझे दे देंगीं. उनको मालूम तो जरूर होगा कि मेरे मन में क्या है, फ़िर कोई वजह होगी जिससे वे मुझे तरसा रही हैं. फ़िर और क्या मांगूं!!

पर मेरे मन में एक दो बातें थीं, उनकी खूबसूरत मुलायम रबर की चप्पलों वाला खेल; वो कभी कभी चलता ही था पर उतना नहीं जितने की आस मुझे होने लगी थी. इसे भी मैंने अभी के लिये टाल दिया, जरा अजीब लगता था कहना कि चाची, मन भरके मुझे आपकी चप्पलों से खेलना है. फ़िर दूसरी एक बात जो मेरे मन में थी, मैंने आखिर हिम्मत करके बोल ही दी. “चाची … वो जब आप अकेली थीं तब क्या करती थीं?”

“अकेली थी याने? याने जब नीलिमा नहीं थी और मैं अकेली रहती थी?”

“हां चाची”

“अब तेरे को क्या बताऊं … वैसे तेरा इशारा सेक्स की तरफ़ है ना कि अपनी कामना मैं कैसे शांत करती थी?”

“हां चाची”

“अब अकेले रहने पर वासना शांति के लिये क्या किया जाता है, तुझे मालूम है विनय, उसमें क्या बड़ी बात है?”

“पर आपके बारे में वैसा सोच कर बहुत … एक्साइटिंग लगता है चाची, देखना चाहता हूं एक बार” मैंने हिम्मत करके कह ही डाला. “… आप को … हस्तमैथुन … याने खुद ही अपने हाथ से … करते देखना चाहता हूं.” मैंने उनकी ओर देखा, जरा टेंशन हो गया था, कहीं उन्हें गुस्सा ना आ गया हो. पर वे मुस्करा रही थीं. “बड़ा शरारती है, मेरे जितनी उमर की औरत की, बूढ़ी ही कह लो, आत्मरति देखना चाहता है!”

“नहीं चाची … याने … चाची आप उमर में बड़ी जरूर हैं पर बूढ़ी ना कहिये, आप तो इतनी सेक्सी हैं कि जवान लड़कियां भी बिरली ही होती हैं इतनी सेक्सी, आप को देखते ही जो मन करता है आप के साथ करने का … याने वो कहा नहीं जाता चाची” मैंने एक बार में अपने मन की कह डाली, एकदम खरी खरी.

चाची कुछ देर मेरी ओर देखती रहीं, फ़िर मुस्करा दीं “ठीक है, आज तुझे वही दिखाती हूं, एक नहीं दो चीजें करके दिखाती हूं पर एक शर्त है, तू एकदम शांत रहेगा, हाथ अपनी छाती पर बांध कर देखेगा, अपने इस मूसल को जरा भी नहीं टच करेगा, है मंजूर? मैं नहीं चाहती कि मुझे देखते देखते तू भी शुरू हो जाये, तेरे इस प्यारे मूसल की जगह सिर्फ़ यहां है” अपनी चूत पर हाथ रखती हुई चाची बोलीं. मैंने तुरंत प्रॉमिस कर दिया.

चाची ने मेरी ओर देखा और फ़िर हल्का मुस्कराकर कुरसी में टिक कर बैठ गयीं. मैं जरा पीछे खिसककर आराम से वहीं दूसरी कुरसी में बैठ गया. चाची ने अपनी टांगें आपस में मिला लीं और स्थिर सी हो गयीं. मैं सोच रहा था कि यह क्या कर रही हैं चाची, ऐसी शांत बैठी हैं! फ़िर गौर से देखा तो उनका बदन जरा सा हिल रहा था. नीचे की ओर देखा तो उनकी पैर अब थोड़े हिल रहे थे, उनके पांव की वे खूबसूरत रबर की चप्पलें जरा हिल डुल रही थीं. फिर समझ में आया कि वे अपनी जांघें आपस में रगड़ रही थीं. फ़िर उनकी ओर देखा तो वे बोलीं “एक मिनिट को चकरा गया था ना? यह मुझे अच्छा लगता है, और इस की खासियत ये है कि यह कभी भी कहीं भी किया जा सकता है, किसी को पता भी नहीं चलता, बस देर लगती है थोड़ी”

फ़िर अपने दोनों हाथों में उन्होंने अपने स्तन ले लिये और उनसे खेलने लगीं. उनके स्तनों का मर्दन उन्हें कितना प्रिय था, यह मैं पहले से जानता था. अब देख रहा था कि अकेले में भी वे उनसे वैसे ही खेलती थीं जैसा मुझसे करवाती थीं. खुद का स्तनमर्दन करते करते उनकी जांघें वैसे ही आपस में दबी हुई हौले हौले चल रही थीं.

करीब पांच मिनिट ऐसा करने के बाद उन्होंने टांगें फैलायीं और फ़िर धीरे धीरे अपनी बुर के भगोष्ठों को सहलाना शुरू कर दिया. शायद ज्यादा गरम हो गयी थीं और उन्हें भी अब यह मस्ती सहन नहीं हो रही थी. उनका दूसरा हाथ लगातार अपने स्तनों को सहला और दबा रहा था. मैं टक लगाकर देख रहा था. बीच बीच में वे अपनी चूत को जरा खोलतीं और थोड़ा अंदर वाले लिप्स को भी रगड़तीं. कुछ देर बाद उनकी सांस थोड़ी जोर से चलने लगी. उन्होंने मेरे खड़े लंड पर नजर जमायी और फ़िर दो उंगलियों में अपनी बुर का ऊपरी भाग कैंची जैसा लकर रगड़ने लगीं. उनका क्लिट भी अब तन कर एक अनार के दाने जैसा दिखने लगा था.

मैं मंत्रमुग्ध सा होकर उनकी इस स्वकामलीला को देखता रहा. चाची काफ़ी मजे ले लेकर अपने मम्मों को दबाते हुए, बीच में अपने निपलों को उंगलियों में लेकर रोल करते हुए हस्तमैथुन कर रही थीं. पिछले कुछ दिनों में मैंने उनसे खूब चुदाई की थी, उनके शरीर का उपभोग लिया था, नीलिमा के साथ उनकी समलिंगी रति में भी सहभागी हुआ था और हस्तमैथुन उस हिसाब से जरा सादा सा ही खेल था पर न जाने क्यों उनके इस करम को देखकर मैं बहुत उत्तेजित हो गया. कारण वही था, एक पचास साल की सीदी सादी हाउसवाइफ़ – हमारे घर की बड़ी संभ्रांत महिला – मेरे सामने मुठ्ठ मार रही थी.

शायद वे भी बहुत गरम हो गयी थीं क्योंकि अब उनके मुंह से बीच बीच में ’हं’ ’आह’ निकलने लगा था. अकेले में हस्तमैथुन करना अलग बात है और फ़िर किसी को दिखाने के लिये, वो भी उनके करीब करीब पोते की उमर की नौजवान को दिखाने के लिये अलग बात है! उन्होंने अचानक कहा “विनय बेटे … इस जगह आकर मैं अक्सर एक डिल्डो या वाइब्रेटर ले लेती हूं … अब वो कहीं पड़ा होगा मेरी अलमारी में … आज एक नया तरीका आजमाना चाहती … हूं … पर तुझे ऐसे ही … कंट्रोल रखना पड़ेगा …रखेगा? … जरा मुश्किल काम है … हं … आह ऽ … करेगा ? …”

“हां चाची, आप जो कहें” वैसे मेरा लंड अब बहुत तकलीफ़ दे रहा था पर सामने जो ए-वन लाइव ब्ल्यू फ़िल्म चल रही थी उसके लिये मैं कुछ भी प्रॉमिस कर सकता था.

“फ़िर चल बिस्तर पर” वे उठ कर पलंग पर आयीं और सिरहाने से टिक कर बैठ गयीं. मुझे उन्होंने इशारा किया कि उनके सामने अपनी करवट पर आड़ा लेट जाऊं . इस पोज़ में मेरा लंड उनकी बुर के ठीक सामने था और उनकी टांगें मेरे बदन के ऊपर थीं. जब मेरे शरीर की पोज़िशन उनके मन मुताबिक हो गयी, तो उन्होंने मेरे लंड को पकड़ा और सुपाड़े से अपनी बुर को रगड़ने लगीं.

अगले दस मिनिट मेरे लिये बड़े कठिन थे, याने इतना सुख मिल रहा था पर उस सुख का चरम आनन्द मैं नहीं ले सकता था, उनको प्रॉमिस किया था कि मैं झड़ूंगा नहीं. वैसे वे भी बीच बीच में रुक जातीं, अगर उनको लगता कि मैं कगार पर आ गया हूं. अपने तने हुए सूजे सुपाड़े पर उनकी मुलायम गीली बुर का एहसास और सुपाड़े की नाजुक चमड़ी में बार बार उनके अनार के दाने का चुभना ऐसी मीठी सजा थी कि बड़ी मुश्किल से मैं उसे सह रहा था.

चाची को भी शायद मेरे लंड के सुपाड़े से मुठ्ठ मारने में बहुत आनन्द आया होगा क्योंकि कुछ ही देर में वे हल्के से ’अं .. अं ..’ करके स्खलित हो गयीं, मेरे सुपाड़े को उन्होंने जोर से अपनी बुर पर दबा लिया और उसे वैसे ही दबाये रख कर एकदम स्थिर हो गयीं, उनका बदन तन सा गया, और वे बस सांस लेती हुई आंखें बंद करके बैठी रहीं.

जब उन्होंने मुझे छोड़ा तो मैं उठ कर बैठ गया. चाची का जोरदार स्खलन हुआ था, वे निढाल होकर पीछे टिक कर बैठी थीं. उनकी बुर एकदम गीली थी, यहां तक कि एक दो बूंदें नीचे चादर पर भी टपक गयी थीं. मैंने धीरे से उनकी टांगें फैलायीं और उस अमरित को चखने के लिये उनकी टांगों के बीच घुसने की कोशिश की तो उन्होंने रोक दिया.

“चाची … प्लीज़ …” मैंने तड़प कर कहा. सामने रस टपक रहा था और चाची मुझे चाटने से मना कर रही थीं.

“अरे रुक, अभी देती हूं तेरे को तेरी पसंद की चीज. विनय बेटे, आज ये करके बहुत अच्छा लगा, मैं भूल ही गयी थी यह सुख, और खास कर आज मुझे जो मजा आया, वो तू देख रहा था और तेरी फ़रमाइश पर मैं कर रही थी, इसलिये आया. तुझे इनाम देना चाहती हूं, और अभी मेरा भी मन नहीं भरा, तूने भी बड़े दम से कंट्रोल किया खुद को, उसका फल तो मिलना ही चाहिये तेरे को और साथ ही साथ थोड़ा और आनन्द लूटना चाहती हूं. जा जल्दी से नीच किचन में जा और वहां वो केले पड़े हैं वो ले आ”

मैं समझ गया, दिल झूम उठा. कोई नंगी हस्तमैथुन करती महिला केले मांगे तो उसका क्या मतलब हो सकता है! वैसे ही भाग कर नीचे गया, नंगा. किसी के देख लेने का कोई खतरा नहीं था, बंगले का दरवाजा बंद था, नीलिमा के बिना कोई लैच खोल कर आ भी नहीं सकता था. किचन में चार पांच केलों का बंच था, मैंने पूरा उठा लिया और भाग कर ऊपर आ गया.

चाची फ़िर से कुरसी में बैठ गयी थीं, और अपनी बुर सहला रही थीं लगता है फ़िर से गरम हो गयी थीं दो मिनिट में ही, या फ़िर कह सकते हैं कि ठंडी हुई ही नहीं थीं. “ये क्या? तू सब उठा लाया? अरे एक चाहिये था.” वे मेरी ओर देखकर बोलीं.

मैं क्या कहता. केले से काम उनको करना था, मुझे नहीं. चाची ने केले देखकर उनमें से एक चुना, मुझे लगा था कि सबसे बड़ा चुनेंगी पर उन्होंने लिया सबसे कम पका हुआ, थोड़ा कच्चा. मेरी नजर केले की ओर लगी देखकर वे मुस्करायीं “तूने तो देखी होंगी ऐसी ब्ल्यू फ़िल्म? मजा आत है ना?”

“हां चाची” मैंने स्वीकार किया. चाची ने अब वो केला छीला. यह जरा मेरे लिये नया था याने अब तक मैंने जो फ़िल्में देखी थीं उनमें की स्त्रियां केले को वैसे ही बिना छीले अंदर डालती थीं. चाची ने मुझे इशारा किया कि उनके सामने जमीन पर बैठूं. शायद उन्हें मुझे पास से बाल्कनी व्यू देना था. फ़िर उन्होंने अपनी टांगें खोलीं और पैर थोड़े ऊपर किये और केले के छिले हिस्से की नोक को अपने क्लिट पर धीरे धीरे रगड़ने लगीं. केले का दूसरा सिरा उन्होंने बिना छिले छोड़ दिया था ताकि पकड़ने में आसानी हो.

चाची के सामने मैं पास ही बैठा था. केले से हस्तमैथुन का वह नजारा मुझे साफ़ दिख रहा था. और उनके पैर भी मेरे बिलकुल पास थे जिनमें अब वे गुलाबी चप्पलें झूल रही थीं. उनकी बुर अब एकदम गीली हो गयी थी, रस चमक रहा था, क्लिट भी एकदम लाल हो गया था. थोड़ी देर केले से अपना क्लिट रगड़ने के बाद उन्होंने एक हाथ की उंगलियों से अपनी चूत खोली और दूसरे से केला धीरे धीरे अंदर कर दिया. अब मुझे समझ में आया कि उन्होंने आधा पका केला क्यों चुना था. पका हुआ तो अब तक टूट चुका होता. मेरी ओर देखकर वे मुस्करायीं पर अब उनकी मुस्कराहट में टेंशन था, वासना का टेंशन. हौले हौले वे केला अंदर बाहर करने लगीं.

केले से मुठ्ठ मारने का वह करम बस दस मिनिट चला होगा पर मेरा हालत खराब कर गया. केला जल्दी ही गीला होकर चमकने लगा था, जैसे शहद में डुबोया हो. अब उस गीले केले के अंदर बाहर होने से ’पुच’ ’पुच’ ’पुच’ की आवाज भी आ रही थी. जब भी वे केला बाहर खींचतीं तो रस की की कुछ बूंदें बाहर छलक छलक आतीं. लगता है रस अब नल के पानी की तरह बह रहा था उनकी चूत से. चाची जिस तरह से सांस ले रही थीं, उससे लगता था कि इस बार वे ज्यादा नहीं टिकेंगीं. मेरा मन हो रहा था कि लंड को पकड़कर मुठ्ठ मार लूं पर ऐसा करना याने अपनी दुर्गत को आमंत्रण देना था. चाची ने मेरी हालत देखी तो मुझे सांत्वना पुरस्कार दे दिया, अपना एक पैर थोड़ा बढ़ाकर अपनी लटकती चप्पल के पंजे को मेरे होंठों पर रगड़ने लगीं. उनकी वे नेल पेंट लगी हुईं गोरी सुडौल उंगलियां, मेरे मुंह में घुस रही थीं. आज तो मेरी किस्मत जोर पर थी, चाची एक के बाद एक उपहार मुझे दे रही थीं. मेरी क्या हालत हुए होगी, आप ही अंदाजा लगा सकते हैं. मैंने मुंह खोल कर उस मुलायम गुलाबी रबर की स्लीपर का सिरा और उनकी एक दो उंगलियां मुंह में लीं और चूसने लगा. किसी भी मिठाई से उन चीजों का स्वाद मेरे लिये ज्यादा जायकेदार था.

चाची का आखिर आखिर में संयम जाता ही रहा, वे अचानक लगातार केला अंदर बाहर पेलने लगीं. फ़िर एक सिसकी के साथ एकदम ढेर हो गयीं. वह केला भी टूट गया पर उसको उन्होंने अपनी उंगली से पूरा अपनी बुर के अंदर घुसेड़ दिया.

दो मिनिट वे थोड़ा हांफ़ते बैठी रहीं फ़िर अपनी बुर को हथेली से बंद करके उठकर बोलीं “अब ले अपना इनाम, अब काफ़ी होगा तेरे जैसे जवान बच्चे के लिये, नहीं तो बस कुछ चम्मच रस से हा काम चलाना पड़ता तेरे को. अब तो चाटने चूसने के अलावा खाने वाला प्तसाद भी है तेरे लिये” उठ कर उन्होंने अपनी चप्पलें निकाली और नीचे रख दीं. मुझे उनका सिरहाना करके लिटाया और फ़िर उलटी तरफ़ से मेरे ऊपर लेट गयीं. बिना कुछ कहे उन्होंने मेरे मुंह पर अपनी चूत जमाई और खुद मेरा लंड पूरा निगल लिया. मैं पागलों की तरह वह मिठाई खाने में लग गया, चूत की चासनी और बुर के शहद में बनाया हुआ केले का फ़्रूट सलाड उनकी बुर के कटोरे में से खाने मिलना, इससे ज्यादा लाजवाब लज्जतदार डिश और क्या हो सकती थी!

केले को मैंने बुर के अंदर से चूस चूस कर निकाला, केला खतम होने पर भी चूसता रहा क्योंकि अब भी तन मन में आग लगी थी. क्या भाग थे मेरे, चाची से लंड चुसवा रहा था, उनकी बुर में से मीठा केला खा रहा था और मेरे सिर के नीचे उनकी मुलायम खूबसूरत रबर की स्लीपरों का तकिया था. यह आग तब अचानक ठंडी हुई जब चाची ने मेरा लंड चूस कर उसमें की मलाई निकाल ली.

कुछ देर हम पड़े रहे फ़िर चाची उठ कर बैठ गयीं. अपने बाल ठीक करके बोलीं “मन भरा तेरा?”

मैंने उनके पांव चूम लिये. कुछ बोलने की जरूरत नहीं थी. मेरी आंखों में जो भक्तिभाव उमड़ आया होगा उसी से चाची को पता चल गया होगा. उन्होंने लाड़ से मेरे गाल सहला कर बोलीं “बहुत कंट्रोल किया तूने, मुझे भी बड़े दिनों के बाद हस्तमैथुन में इतना आनन्द आया. तभी तो कहती हूं कि तू याने एकदम गुड्डा है मेरा. पहले रोम की रानियां मैंने सुना है अपनी सेवा में खास लड़के रखती थीं, अब तूने मुझे सच में महारानी बना दिया विनय”

वह दोपहर मुझे हमेशा याद रहेगी क्योंकि वह दोपहर आगे मेरे साथ होने वाले किस्सों की रंगबिरंगी मूवी का ट्रेलर मात्र थी, वैसे यह मुझे बहुत बाद में समझ आया. और चाची के जाने के पहले फ़िर से वैसी शनिवार की दोपहर मुझे नहीं मिली. मेरे उस अद्भुत नाश्ते के बाद चाची को चोदने में भी जो मजा आया उसकी कोई गिनती नहीं है. केले से गीली हुई एकदम चिकनी चिपचिपी चूत में लंड ऐसे फ़िसल रहा था जैसे बढ़िया ऑइल डाले हुए एन्जिन में पिस्टन फिसलता है. चुदाई की आवाज भी अलग थी ’फच’ ’फच’ ’फच’, खास कर जब मैं कस के चोदता था.

उस दोपहर की चुदाई खतम होने के बाद को जब मैं अपने कमरे में जा रहा था तब चाची ने अचानक पूछा “विनय बेटे, तूने डिसाइड किया कि ट्रेनिंग के बाद कहां प्लेसमेंट लेगा? याने गोआ या नासिक?”

मैंने बिना सोचे तुरंत कह दिया “चाची, मैं तो कल ही उनको राइटिंग में देने वाला हूं कि मुझे गोआ की ही पोस्टिंग दी जाये” चाची बड़े प्यार से मुस्करायीं जैसे उन्हें यही अपेक्षित था.

बाद में जरूर मुझे लगा कि अगर चाची चली गयीं तो मैं यहां क्या झक मारूंगा! पर चाची पर मुझे पूरा भरोसा था, एक महारानी अपने प्यारे गुलाम को ऐसे नहीं छोड़ने वाली थी यह मेरा विश्वास था.

उस दोपहर वाली मस्ती के बारे में मैंने नीलिमा भाभी को कुछ न बताने का फ़ैसला किया, उस दिन हुए रंगीन अजीब संभोग के बारे में बताना मुझे थोड़ा खल रहा थ, वह चाची और मेरे बीच की बात थी, नहीं तो चाची ने मेरे साथ अकेले में वह न किया होता. नीलिमा के साथ फ़िर से अकेले में गप्पें लड़ाने का मौका मुझे तीन चार दिन बाद मिला. उस दिन बड़ा सुहाना मौसम था, मैं जल्दी ट्रेनिंग से वापस आ गया था, नीलिमा ने रिज़ाइन कर दिया था इसलिये अब वह घर पर ही रहती थी. मैं, नीलिमा और चाची बाहर बगीचे में गार्डन चेयर्स पर बैठे थे. उतने में बाजू के बंगले की बूढ़ी महिला किसी काम से आयीं तो वो उठ कर उनके साथ अंदर चली गयीं.

चाची अपनी शांत धीमी चाल से, जिसे ’गजगामिनी’ कहा गया है, जब अंदर जा रही थीं तो पीछे से उनके उन हौले हौले डोलते हुए विशाल नितंबों को देखकर नीलिमा धीरे से मुझे बोली “क्या मस्त गांड है ना ममी की, एकदम मोटी ताजी! अरुण का अब तक इनपर ध्यान नहीं गया, यह बड़े अचरज की बात है, वो तो दीवाना है इस चीज का.”

नीलिमा ने मेरी दुखती रग पर मानों उंगली रख दी थी. चाची की गांड के बारे में मुझे बताने की जरूरत नहीं थी, मैं वैसे ही दूर से चातक जैसा उसे देख देख कर आहें भरा करता था. पर अभी अपना दुखड़ा रोने का कोई मतलब नहीं था, इसलिये मैंने कहा “क्या बात करती हो भाभी! अरे वो मां हैं अरुण भैया की, ऐसा विचार भी अरुण के मन में नहीं आयेगा”

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