ये कैसा संजोग माँ बेटे का
दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और मस्त कहानी लेकर हाजिर हूँ और उम्मीद करता हूँ कि मेरी बाकी कहानियों की तरह ये कहानी भी आपको पसंद आएगी
दोस्तो ये एक ऐसा संयोग था अपनी माँ के साथ जिसके बारे में मैं आपको बताने जा रहा हूँ . दोस्तो ये तभी होता है जब सितारे किसी बहुत खास मौके पर किसी खास दिशा में लाइन बद्ध हों. मेरे ख़याल से इसे और किसी तरीके से परभाषित नही किया जा सकता. मैं घर के पिछवाड़े में क्यारियों में खोई अपनी बॉल ढूढ़ रहा था जब मैने माँ की आवाज़ अपने माता पिता के कमरे के साथ अटॅच्ड बाथरूम की छोटी सी खिड़की से आती सुनी. खिड़की थोड़ी सी खुली थी और मैं उसमे से अपनी माँ की फुसफुसाती आवाज़ को सुन सकता था जब वो फोन पर किसी से बात कर रही थी.
वो वास्तव में एक अदुभूत संयोग था. वो शायद बाथरूम में टाय्लेट इस्तेमाल करने आई थी और संजोग वश उसके पास मोबाइल था, जो अपने आप में एक दुर्लभ बात थी क्योंकि माँ बाथरूम में कभी मोबाइल लेकर नही जाती थी और संयोगवश मैं भी खिड़की के इतने नज़दीक था कि वो क्या बातें कर रही है सॉफ सॉफ सुन सकता था.
मैं कोई जानबूझकर उसकी बातें नही सुन रहा था मैं तो अपनी बॉल ढूँढ रहा था मगर कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे होते हैं कि आदमी चाह कर भी उन्हे नज़रअंदाज़ नही कर सकता, खास कर अगर वो अल्फ़ाज़ अपनी सग़ी माँ के मुँह से सुन रहा हो तो. जब मैने माँ को वो बात कहते सुना तो मेरे कान खड़े हो गये: “अब मैं तुम्हे क्या बताऊ. मुझे तो अब यह भी याद नही है कि लंड का स्पर्श कैसा होता है. इतना समय हो गया है मुझे बिना सेक्स के”
पहले पहल तो मुझे अपने कानों पर यकीन ही नही हुआ कि शायद मैने सही से सुना ही नही है, मैं अपनी साँसे रोक कर बिना कोई आवाज़ किए पूरे ध्यान से सुनने लगा.
तब वो काफ़ी समय तक चुप रही जैसे वो फोन पर दूसरी और से बोलने वाले को सुन रही थी और बीच बीच ‘हाँ’, ‘हुंग’, ‘मैं जानती हूँ’ कर रही थी. आख़िरकार अंत में वो बोली “मैं वो सब करके देख चुकी हूँ मगर कोई फ़ायदा नही. अब हमारी ज़िंदगी उस पड़ाव पर पहुँच गयी है जिसमे सेक्स हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की ज़रूरत नही रहा”
उफफफ्फ़ मैं अब जाकर समझा था. मेरी माँ अपनी सेक्स लाइफ से संतुष्ट नही थी और फोन पर किसी से शिकायत कर रही थी या अपना दुखड़ा रो रही थी. फोन के दूसरे सिरे पर कॉन था मुझे मालूम नही था मगर जो कोई भी था जाहिर था माँ के बहुत नज़दीक था. इसीलिए वो उस शख्स से इतने खुलेपन और भरोसे से बात कर रही थी.
फिर से एक लंबी चुप्पी छा जाती है और वो सिर्फ़ सुनती रहती है. तब वो बोलती है “मुझे नही मालूम मैं क्या करूँ, मेरी समझ में कुछ नही आता. कभी कभी मुझे इतनी इच्छा होती है चुदवाने की, मेरी चूत जैसे जल रही होती है, कामोउत्तेजना जैसे सर चढ़ कर बोलती है, और मैं रात भर सो नही पाती और वो दूसरी और करवट लेकर ऐसे सोता है जैसे सब कुछ सही है, कुछ भी ग़लत नही है”
मैने कभी भी माँ को कामोउत्तेजना शब्द के साथ जोड़ कर नही देखा था. वो मेरे लिए इतनी पूर्ण, इतनी निष्कलंक थी कि मैं जानता भी नही था कि उसकी भी शारीरिक ज़रूरतें थीं मेरी…मेरी ही तरह. वो मेरे लिए सिर्फ़ माँ थी सिर्फ़ माँ, एक औरत कभी नही.
मैं जानता था माँ और पिताजी एक साथ सोते हैं और मेरे मन के किसी कोने मे यह बात भी अंकित थी कि उनके बीच आत्मीय संबंध थे मगर अब जब मैने अपने मन को दौड़ाया और इस बात की ओर ध्यान दिया कि आत्मीयता का असली मतलब यहाँ चुदाई से था. मैने कभी यह बात नही सोची थी कि मेरे पिताजी ने मेरी माँ को चोदा है और अपना लंड माँ की चूत में घुसेड़ा है, वो लंड जिसका एहसास माँ के अनुसार वो कब की भूल चुकी थी.
माँ और चूत यह दो ऐसे लफ़्ज थे जो मेरे लिए एक लाइन में नही हो सकते थे. मेरी माँ तो बस माँ थी, पूरी शुद्ध और पवित्र. जब उसकी बातचीत ने इस ओर इशारा किया कि उसके पास भी एक चूत है जो लंड के लिए तड़प रही है. बस, मैं और कुछ नही सुनना चाहता था. मैं यह भी भूल गया कि मैं वहाँ क्या कर रहा था जा क्या करने गया था. मैं वहाँ से दूर हट जाना चाहता था इतना दूर के माँ की आवाज़ ना सुन सकूँ
उस दिन के बाद में जब मैने उसे रसोई में देखा तो मुझे उसकी उपस्थिती में बेचैनी सी महसूस होने लगी. मुझे थोड़ा अपराध बोध भी महसूस हो रहा था के मैं उसकी अंतरंग दूबिधा को जान गया था और उसे इस बात की कोई जानकारी नही थी. उस अपराधबोध ने माँ के लिए मेरी सोच को थोड़ा बदल दिया था. उसकी समस्या की जानकारी ने उसके प्रति मेरे नज़रिए में भी तब्दीली ला दी थी. मैं शायद इसे सही ढंग से बता तो नही सकता मगर मेरे अंदर कुछ अहसास जनम लेने लग थे.
उस दिन जब वो ड्रॉयिंग रूम में आई तो बरबस मेरा ध्यान उसकी टाँगो की ओर गया. मैं चाहता नही था मगर फिर भी खुद को रोक नही पाया. सिर्फ़ इतना ही नही, मेरी नज़र उसकी टाँगो से सीधे उस स्थान पर पहुँच गयी जहाँ उसकी टाँगे आपस में मिल रही थीं, उस स्थान पर जहाँ उसने ना जाने कितने समय से लंड महसूस नही किया था. उपर से वो टाइट जीन्स पहने हुए थी और उसने अपनी टीशर्ट जीन्स के अंदर दबा रखी थी जिस से उसकी टाँगो का वो मध्य भाग मुझे बहुत अच्छे से दिखाई दे रहा था बल्कि थोड़ा उभरा हुआ नज़र आ रहा था. उसके वो लफाज़ मेरे कानो में गूँज रहे थे जब मैं उसकी जाँघो को घूर रहा था.
वो अपनी फॅवुरेट जीन्स पहने हुए थी और वो स्थान जहाँ उसकी जांघे आपस में मिल रही थी वहाँ थोड़ा गॅप था जो उसकी चूत को हाइलाइट कर रहा था……..खूब उभर कर. मैने माँ को पहले भी उस जीन्स में देखा था मगर टाँगो के बीच का वो गॅप मुझे कभी नज़र नही आया था ना ही वो तिकोने आकर का भाग. असलियत में, शायद मैने वो उभरा हुआ हिस्सा देखा ही नही था, शायद वो मेरी कल्पना मात्र थी. उसकी जीन्स काफ़ी मोटे कपड़े की बनी हुई थी इसलिए उस हिस्से को देखना बहुत मुश्किल था मगर आज मैं उसे एक अलग ही रूप में देख रहा था..
उसकी चूत की ओर बार बार ध्यान जाने से मुझे कुछ बेचिनी महसूस होने लगी थी. उस रात मैं सो ना सका.
स रात जब मेरे माता पिता अपने कमरे में सोने के लिए चले गये तो मैं कल्पना करने लगा कैसे मेरी माँ मेरे पिताजी के नीचे होगी और उस लंड को अपनी चूत में ले रही होगी जो उसने ना जाने कितने समय से महसूस भी नही किया था. मैने यह सब फितूर अपने दिमाग़ से निकालने की बहुत कोशिश की मगर घूम फिर कर वो बातें फिर से मेरे दिमाग़ में आ जाती. मेरा ध्यान उसकी पॅंट के उस गॅप वाले हिस्से की ओर चला जाता और मैं कल्पना में अपने पिताजी के लंड को उस गॅप को भरते देखता.
मेरे ख़याल मुझे बैचैन कर रहे थे और मैं ठीक से कह नही सकता कि मुझे किस बात से ज़यादा परेशानी हो रही थी, इस बात से कि माँ की चूत बार बार मेरी आँखो के सामने घूम रही थी या फिर इस ख़याल से कि मेरे पिताजी उसे चोद रहे होंगे.
अगले दिन मेरा मूड बहुत उखड़ा हुया था. मेरे हाव भाव मेरी हालत बता रहे थे, खुद माँ ने भी पूछा कि मैं ठीक तो हूँ. वो उस दिन भी वोही जीन्स पहने हुए थी मगर उसके साथ एक फॉर्म फिटिंग टी-शर्ट डाली हुई थी. उस दिन जिंदगी में पहली बार मेरा ध्यान माँ के मम्मों की ओर गया. एक बारगी तो मुझे यकीन ही नही हुआ कि उसके मम्मे इतने बड़े और इतने सुंदर थे. उसके भारी मम्मो के एहसास ने मेरी हालत और भी पतली कर दी थी.
बाकी का पूरा दिन मेरा मन उसकी टाँगो के जोड़ से उसके मम्मो, उसके उन गोल-मटोल भारी मम्मों के बीच उछलता रहा. मेरे कानो में बार बार उसकी वो बात गूँज उठती कि उसे अब लंड का एहसास भी भूल गया था कि कभी कभी उसको चुदवाने का कितना मन होता था.
मैं मानता हू उसे मात्र एक माँ की तरह देखने की वजाय एक सुंदर, कामनीय नारी के रूप में देखने का बदलाव मेरे लिए अप्रत्याशित था . ऐसा लगता था जैसे एक परदा उठ गया था और जहाँ पहले एक धुन्धलका था वहाँ अब मैं एक औरत की तस्वीर सॉफ सॉफ देख सकता था. लगता था जैसे मेरी कुछ इच्छाएँ मन की गहराइयों में कहीं दबी हुई थीं जो यह सुनने के बाद उभर कर सामने आ गयी थी कि उसको कभी कभी चुदवाने का कितना मन होता था. वो जैसे बदल कर कोई और हो गयी थी और मेरे लिए सर्वथा नयी थी. जहाँ पहले मुझे उसके मम्मो और उसकी जाँघो के जोड़ पर देखने से अपराधबोध, झिजक महसूस होती थी, अब हर बितते दिन के साथ मैं उन्हे आसानी से बिना किसी झिजक के देखने लगा था बल्कि जो भी मैं देखता उसकी अपने मन में खूब जम कर उसकी तारीफ भी करता. मुझे नही मालूम उसने इस बदलाव पर कोई ध्यान दिया था या नही मगर कयि मौकों पर मैं बड़ी आसानी से पकड़ा जा सकता था.
एक दिन आधी रात को मैं टीवी देख रहा था, मुझे किचन में माँ के कदमो की आहट सुनाई दी. उस समय उसे सोते होना चाहिए था मगर वो जाग रही थी. वो ड्रॉयिंग रूम में मेरे पास आई. उसके हाथ में जूस का ग्लास था.
“मैं भी तुम्हारे साथ टीवी देखूँगी?” वो छोटे सोफे पर बैठ गयी जो बड़े सोफे से नब्बे डिग्री के कोने पर था जिस पे मैं बैठा हुआ था. उसने नाइटी पहनी हुई थी जिसका मतलब था वो सोई थी मगर फिर उठ गई थी.
“नींद नही आ रही” मैने पूछा. मेरे दिमाग़ में उसकी टेलिफोन वाली बातचीत गूँज उठी जिसमे उसने कहा था कि कभी कभी उसे चुदवाने की इतनी जबरदस्त इच्छा होती थी कि उसे नींद नही आती. मैं सोचने लगा क्या उस समय भी उसकी वोही हालत है, कि शायद वो काम की आग यानी कामाग्नी में जल रही है और उसे नींद नही आ रही है, इसीलिए वो टीवी देखने आई है. इस बात का एहसास होने पर कि मैं अती कामोत्तेजित नारी के साथ हूँ मेरा बदन सिहर उठा.
वो वहाँ बैठकर आराम से जूस पीने लगी , उसे देखकर लगता था जैसे उसे कोई जल्दबाज़ी नही थी, जूस ख़तम करके वापस अपने बेडरूम में जाने की. जब उसका ध्यान टीवी की ओर था तो मेरी नज़रें चोरी चोरी उसके बदन का मुआइना कर रही थी. उसके मोटे और ठोस मम्मों की ओर मेरा ध्यान पहले ही जा चुका था मगर इस बार मैने गौर किया उसकी टाँगे भी बेहद खूबसूरत थी. सोफे पे बैठने से उसकी नाइटी थोड़ी उपर उठ गयी थी और उसके घुटनो से थोड़ा उपर तक उसकी जाँघो को ढांप रही थी.
शायद रात बहुत गुज़र चुकी थी, या टीवी पर आधी रात को परवीन बाबी के दिलकश जलवे देखने का असर था, मगर मुझे माँ की जांघे बहुत प्यारी लग रहीं थी. बल्कि सही लफ़्ज़ों में बहुत सेक्सी लग रही थी. सेक्सी, यही वो लफ़्ज था जो मेरे दिमाग़ में गूंजा था जब हम दोनो टीवी देख रहे थे या मेरे केस में मैं, टीवी देखने का नाटक कर रहा था. असलियत में अगर मुझे कुछ दिखाई दे रहा था तो वो उसकी सेक्सी जांघे थी और यह ख़याल मेरे दिमाग़ में घूम रहा था कि वो इस समय शायद वो बहुत कामोत्तेजित है.
वो काफ़ी समय वहाँ बैठी रही, अंत में बोलते हुए उठ खड़ी हुई “ओफफ्फ़! रात बहुत गुज़र गयी है. मैं अब सोने जा रही हूँ”
मैं कुछ नही बोला. वो उठ कर मेरे पास गुडनाइट बोलने को आई. नॉर्मली रात को माँ विदा लेते हुए मेरे होंठो पर एक हल्का सा चुंबन लेती थी जैसा मेरे बचपन से चला आ रहा था. वो सिर्फ़ सूखे होंठो से सूखे होंठो का क्षणिक स्पर्श मात्र होता था और उस रात भी कुछ ऐसा ही था, एक सूखा, हल्का सा लगभग ना मालूम होने वाला चुंबन. मगर उस रात उस चुंबन के अर्थ बदल गये थे, क्योंकि मेरे दिमाग़ में उसके कामुक अंगो की धुंधली सी तस्वीरें उभर रही थीं. वो एक हल्का सा अच्छी महक वाला पर्फ्यूम डाले हुए थी जिसने मेरी दशा और भी खराब कर दी. मैं उत्तेजित होने लगा था.
मैं उसे मूड कर रूम की ओर जाते देखता रहा. उसका सिल्की, सॉफ्ट नाइट्गाउन उसके बदन के हर कटाव हर मोड़ हर गोलाई का अनुसरण कर रहा था. वो उसकी गान्ड के उभार और ढलान से चिपका हुआ उसके चुतड़ों के बीच की खाई में हल्का सा धंसा हुआ था. उस दृश्य से माँ को एक सुंदर, कामनीय नारी के रूप में देखने के मेरे बदलाव को पूर्ण कर दिया था.
“माँ कितनी सुंदर है, कितनी सेक्सी है” मैं खुद से दोहराता जा रहा था. मगर उसकी सुंदरता किस काम की! वो आकर्षक और कामनीय नारी हर रात मेरे पिताजी के पास उनके बेड पर होती थी मगर फिर भी उनके अंदर वो इच्छा नही होती थी कि उस कामोत्तेजित नारी से कुछ करें. मुझे पिताजी के इस रवैये पर वाकाई में बहुत हैरत हो रही थी.
मुझे इस बात पर भी ताज्जुब हो रहा था कि मेरी माँ अचानक से मुझे इतनी सुंदर और आकर्षक क्यों लगने लगी थी. वैसे ये इतना भी अचानक से नही था मगर यकायक माँ मेरे लिए इतनी खूबसूरत, इतनी कामनीय हो गयी थी इस बात का कुछ मतलब तो निकलता था. क्यों मुझे वो इतनी आकर्षक और सेक्सी लगने लगी थी? मुझे एहसास था कि इस सबकी शुरुआत मुझे माँ की अपूर्ण जिस्मानी ख्वाहिशों की जानकारी होने के बाद हुई थी, लेकिन फिर भी वो मेरी माँ थी और मैं उसका बेटा और एक बेटा होने के नाते मेरे लिए उन बातों का ज़्यादा मतलब नही होना चाहिए था. उसकी हसरतें किसी और के लिए थीं, मेरे लिए नही, मेरे लिए बिल्कुल भी नही.
अगर उस समय मैं कुछ सोच सकता था तो सिर्फ़ अपनी हसरतों के बारे में, और माँ के लिए मेरे दिल में पैदा हो रही हसरतें. मगर फिर मैं उसकी ख्वाहिश क्यों कर रहा था? क्या वाकाई वो मेरी खावहिश बन गयी थी? मेरे पास किसी सवाल का जवाब नही था. यह बात कि वो कभी कभी बहुत उत्तेजित हो जाती थी और यह बात कि उसकी जिस्मानी हसरतें पूरी नही होती थीं,
इसी बात ना माँ के प्रति मेरे अंदर कुछ एहसास जगा दिए थे. यह बात कि वो चुदवाने के लिए तरसती है, मगर मेरा पिता उसे चोदता नही है, इस बात से मेरे दिमाग़ में यह विचार आने लगा कि शायद इसमे मैं उसकी कुछ मदद कर सकता था. मगर हमारा रिश्ता रास्ते में एक बहुत बड़ी बढ़ा थी, इसलिए वास्तव में उसके साथ कुछ कर पाने की संभावना मेरे लिए नाबराबार ही थी. मगर मेरे दिमाग़ के किसी कोने में यह विचार ज़रूर जनम ले चुका था कि कोशिस करने में कोई हर्ज नही है. उस संभावना ने एक मर्द होने के नाते माँ के लिए मेरे जज़्बातों को और भी मज़बूत कर दिया था चाहे वो संभावना ना के बराबर थी.
ज़्यादातर मैं रात को काफ़ी लेट सोता था, यह आदत मेरी स्कूल दिनो से बन गयी थी जब मैं आधी रात तक पढ़ाई करता था, कॉलेज जाय्न करने के बाद से यह आदत और भी पक्की हो गयी थी. मेरा ज़्यादातर वक़्त कंप्यूटर पर काम करते गुज़रता था मगर माँ के बारे में वो जानकारी हासिल होने के बाद, और जब से मुझे इस बात का एहसास हुया था कि माँ का बदन कितना कामुक है वो कितनी सेक्सी है, और उसकी उपस्थिति में जो कामनीय आनंद मुझे प्राप्त होने लगा था उससे मैं अब टीवी देखने को महत्व देने लगा था. मैं अक्सर ड्रॉयिंग रूम में बैठ कर टीवी देखता और आशा करता कि वो आएगी और मुझे फिर से वोही आनंद प्राप्त होगा.
माँ का ध्यान मेरी नयी दिनचर्या की ओर जाने में थोड़ा वक़्त लगा. शुरू शुरू में वो कभी कभी संयोग से वहाँ आ जाती और थोड़ा वेकार बैठती, और टीवी पर मेर साथ कुछ देखती. मगर जल्द ही वो नियमित तौर पर मेरे साथ बैठने लगी. मगर वो कभी भी लंबे समय तक नही बैठती थी मगर इतना समय काफ़ी होता था एक सुखद एहसास के लिए. मुझे लगा वो घर में अपनी मोजूदगी का किसी को एहसास करवाना चाहती थी
रात को जाने के टाइम उसकी विशेज़ कयि बार ज़ुबानी होती थी, वो हल्के से गुडनाइट बोल देती थी और कयि बार वो हल्का सा होंठो से होंठो का स्पर्श, वो एक सूखा सा स्पर्श मात्र होता था और मेरे ख्याल से वो किसी भी प्रकार चुंबन कह कर नही पुकारा जा सकता था. जो गर्माहट मुझे पहले पहले माँ के चुंबन से होती थी वो समय के साथ उनकी आदत होने से जाती रही. उन चुंबनो में ना कोई असर होता था और ना ही उनका कोई खास मतलब होता था. वो तो सिर्फ़ हमारे विदा लेने की औपचारिकता मात्र थी, एक ऐसी औपचारिकता जिसकी मुझे कोई खास परवाह नही थी.
मैं अपनी पुरानी दिनचर्या की ओर लौट गया और अपना सारा समय फिर से अपने कंप्यूटर पे बिताने लगा. अब आधी रात तक टीवी देखने में वो मज़ा ही नही था जैसा पहले आया करता था. माँ को मेरे फ़ैसले की मालूमात नही थी. पहले ही दिन जब उसने मुझे ड्रॉयिंग रूम से नदारद पाया तो वो मेरे रूम में मुझे देखने को आई.
“आज टीवी नही देखोगे क्या”
“नही, मुझे अपना प्रॉजेक्ट पूरा करना है” मैने बहाना बनाया.
“ओह!” वो थोड़ी निराश लगी, कम से कम मुझे तो ऐसा ही जान पड़ा.
कहने के लिए और कुछ नही था, मगर वो अभी जाना नही चाहती थी. वो बेड के किनारे पर बैठ गयी और टेबल पर से एक मॅगज़ीन उठाकर उसके पन्ने पलटने लगी. मैं बिज़ी होने का नाटक करता रहा, और वो चुपचाप मॅगज़ीन में खोई रही. कुछ देर बाद मैने उसे मॅगज़ीन वापस रखते सुना. “ठीक है, मैं चलती हूँ” वो खड़ी होकर बोली.
मैने अपनी कुर्सी उसकी ओर घुमा ली और कहा, “मेरा काम लगभग ख़तम हो चुका है माँ, अगर तुम चाहो तो थोड़ी देर में हम टीवी देखने चलते हैं”
“नही, नही. तुम पढ़ाई करो” उसने जबाब दिया और मेरी तरफ आई. अब यह हिस्सा कुछ अर्थ लिए हुए था.
शायद मेरा ये अंदाज़ा ग़लत हो के मुझे ड्रॉयिंग रूम में टीवी देखते ना पाकर वो थोड़ा निराश हो गयी थी, मगर जब वो मुझसे विदा लेने के समय चुंबन लेने आई तो मैने उसके हाव भाव में एक निस्चय देखा और इस बार मेरे मान में कोई संदेह नही था जैसे ज़ुबानी विदा की जेगह वो चुंबन लेकर कोई बात जताना चाहती थी.
मैं थोड़ा आगे को झुक गया और उसके गुडनाइट चुंबन का इंतेज़ार करने लगा. आम तौर पर वो थोड़ा सा झुक कर अपने होंठ मेरे होंठो से छुया देती थी. उसके हाथ उसकी कमर पर होते थे. मगर उस रात उसने अपना दायां हाथ मेरे बाएँ कंधे पर रखा और फिर मुझे वो चुंबन दिया या मेरा चुंबन लिया. मैने इसे महज इतेफ़ाक़ माना और इसे कोई गुप्त इशारा समझ कर इसका कोई दूसरा अर्थ नही निकाला. कारण यह था कि मैं कुर्सी पर बैठा हुआ था ना के सोफे पर, इसीलिए उसे बॅलेन्स के लिए मेरे कंधे पर हाथ रखना पड़ा था. मगर वो चुंबन आज कुछ अलग तरह का था, इसमे कोई शक नही था.
यह कोई बहहुत बड़ी बात नही थी, मगर मुझे लगा कि वो हमारे इकट्ठे बैठने, साथ साथ टीवी देखने की आस लगाए बैठे थी, उसे किसी के साथ की ज़रूरत थी. शायद वो हमारे आधी रात तक ड्रॉयिंग रूम के साथ की आदि हो गयी थी और मेरे वहाँ ना होने पर उससे रहा नही गया था. मुझे उसके चुंबन से उसकी निराशा झलकती दिखाई दी.
तभी वो ख़याल मेरे मन मे आया था.
अगर उसके लिए चुंबन का एहसास बदलना संभव था तो मेरे लिए भी संभव था चाहे किसी और तरीके से ही सही.
जितना ज़्यादा मैं इस बारे में सोचता उतना ही ज़्यादा इसके नतीजे को लेकर उत्तेजित होता गया. जब से मैने उसे कहते सुना था कि वो चुदवाने के लिए तड़प रही है तबसे मेरे अंदर एक ज्वाला सी धधक रही थी. उस ज्वाला की लपटें और भी तेज़ हो जाती जब वो मेरे साथ अकेली आधी रात तक टीवी देखती थी. उसकी फोन वाली बातचीत से मैं जानता था के वो कभी कभी इतनी उत्तेजित होती थी कि उसे रात को नींद नही आती थी. मुझे लगता था कि जब जब वो आधी रात को टीवी देखने आती थी उसकी वोही हालत होती होगी, चाहे मेरे कारण नही मगर अती कामोत्तेजना की हालत में तो वो होती ही थी.
अगर उस दिन भी उसकी वोही हालत थी जब वो मेरे साथ थी तो क्या वो मेरी ओर हसरत से देखेगी? जैसे मैं उसकी ओर देखता था? क्या उसके हृदय मैं भी वोही आग जल रही थी जो मेरे दिल में जल रही थी? क्या यह संभव था कि उसके अंदर की आग को प्रोक्ष रूप से और भड़का दिया जाए ताकि कम से कम वो मेरी ओर किसी दूसरी भावना से देख सके जैसे मैं उसकी ओर देखता था? क्या मैं उसके दिमाग़ में वो विचार डाल सकता था कि मैं उसकी समस्याओ के समाधान की एक संभावना हो सकता हूँ, चाहे वो सिरफ़ एक विचार होता इससे ज़्यादा कुछ नही.
मेरे लिए इन सवालों के जबाब जानने का कोई साधन नही था, मेरा मतलब कि अगर मैं शुरुआत भी करता तो कहाँ से. केयी बार मुझे लगता जैसे मैं उसकी बैचैनि को उसकी अकुलाहट को महसूस कर सकता हूँ मगर वो सिर्फ़ एक अंदाज़ा होता. मैं यकीन से कुछ नही कह सकता था. कोई ऐसा रास्ता नही था जिससे एक इशारा भर ही मिल जाता कि वो कैसे महसूस करती है.
उसके चुंबन ने उसकी कुछ भावनाओ से बग़ावत ज़रूर की थी मगर उनका उस सब से कोई वास्ता नही था जो मैं जानना चाहता था. ज़रूर उसे निराशा हुई थी जब मैं उसका साथ देने के लिए वहाँ नही था मगर वो प्रभाव एक मनोवैग्यानिक था. उसे मेरा साथ अच्छा लगता था इसलिए उसका निराश होना संभव था जब उसका बेटा उसे कंपनी देने के लिए वहाँ मोजूद नही था. मैं उसे किसी और वेजह से निराश देखना चाहता था. चाहे एक अलग तरीके से ही सही मगर मैं एक ज़रूरत पूरी कर रहा था, एक बेटे की तेरह नही बल्कि एक मर्द की तरह. मैं वो जानना चाहता था. मैं महसूस करना चाहता था कि जिस्मानी ज़रूरत पूरी करने की संभावना हमारे बीच मोजूद थी, चाहे वो सिर्फ़ एक संभावना होती और हम उस पर कभी अमल ना करते.
अब अचानक से मैने महसूस किया कि मेरे पास एक मौका है कम से कम ये पता करने का मैं कितने पानी में हूँ. अगर मैं चुंबन को अपनी तरफ से किसी तरह कोई अलग रूप दे सकूँ, उसे एक इशारा भर कर सकूँ, उसे एक अलग एहसास करा सकूँ, उस चिंगारी को जो उसके अंदर दहक रही थी हवा देकर एक मर्द की तरह भड़का सकूँ ना कि एक बेटे की तरह तब शायद मैं किसी संभावना का पता लगा सकूँगा.
उस रात मैं बहुत बहुत देर तक सोचता रहा, और एक योजना बनाने लगा कि किस तरह मैं हमारी रात्रि के चुंबनो में कुछ बदलाव कर उनमे कुछ एहसास डाल सकूँ.
जब मैं नतीजे के बारे में अलग अलग दिशाओं से सोचा तो उत्तेजना से मेरा बदन काँपने लगा. एक तरफ यहाँ मैं यह सोच कर बहुत उत्तेजित हो रहा था कि अगर मैने अपनी योजना अनुसार काम किया तो उसका नतीजा क्या होगा. वहीं दूसरी ओर मुझे अपनी योजना के विपरीत नतीजे से भय भी महसूस हो रहा था. उसकी प्रतिक्रिया या तो सकारात्मक हो सकती थी, जिसमे वो कुछ एसी प्रतिक्रिया देती जो इस आग को और भड़का देती, या फिर उसकी प्रतिक्रिया नकारात्मक होती जिससे उस संभावना के सभी द्वार हमेशा हमेशा के लिए बंद हो जाते जो संभावना असलियत में कभी मोजूद ही नही थी.
अब योजना बहुत ही साधारण सी थी. मैं उसकी सूक्ष्म प्रतिक्रिया को एक इशारा मान कर चल रहा था और इसके साथ अपने तरीके से एक प्रयोग करके देखना चाहता था. चाहे यह कुछ बेवकूफ़काना ज़रूर लग सकता था मगर मेरी योजना से मुझे वो सुई मिल सकती थी जो मैं उस घास फूस के भारी ढेर से ढूँढ रहा था
जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ हमारे रात्रि विदा के चुंबन हमेशा सूखे, हल्के से और नमालूम होने वाले होंठो का होंठो से स्पर्श मात्र होते थे. अगर–मैं खुद से दोहराता जा रहा था—-अगर वो इतने सूखे ना रहें तो? मैं अपने होंठ उसके होंठो पर दबा तो नही सकता था क्योंकि वो मर्यादा के खिलाफ होता लेकिन अगर मेरे होंठ सूखे ना रहें तो? अगर उसको होंठो पर मुखरस का एहसास होगा तो? तब उसकी प्रतिकिरया क्या होगी? क्या वो इसका ज्वाब देगी?!
जितना ज़्यादा मैं अपनी योजना को व्यावहारिक रूप देने के बारे में सोचता रहा उतना ही ज़्यादा मैं आंदोलित होता गया. मेरी हालत एसी थी कि उस रात मैं सो भी ना सका, बस उससे पॉज़िटिव रियेक्शन मिलने के बारे में सोचता रहा.
अगली रात मैं प्लान के मुताबिक टीवी के आगे था. वो आई, जैसी मैं उम्मीद लगाए बैठा था कि वो आएगी और मुझे वहाँ मोजूद देखकर शायद थोड़ी एग्ज़ाइटेड होगी. मगर वो चेहरे से कुछ भी एग्ज़ाइट्मेंट या खुशी दिखा नही रही थी, इससे मुझे निराशा हुई और अपनी योजना को लेकर मैं फिर से सोचने लगा कि मुझे वो करना चाहिए या नही मगर निराश होने के बावजूद मैने प्लान को अमल में लाने का फ़ैसला किया. हमेशा की तरह हम कुछ समय तक टीवी देखते रहे, अंत मैं वो बोली, “मुझे सोना चाहिए बेटा! रात बहुत हो गयी है”
” ओके” मैने जबाब दिया और अपने सूखे होंठो पर जल्दी से जीभ फेरी.
वो मेरी ओर नही देख रही थी जब मैने अपने होंठो पर जीभ फेरी. मैने फिर से चार पाँच वार ऐसे ही किया ताकि होंठ अच्छे से गीले हो जाएँ. मैं होंठो से लार नही टपकाना चाहता था मगर उन्हे इतना गीला कर लेना चाहता था कि वो उस गीलेपन को, मेरे रस को महसूस कर सके. उसके बाद मैने खुद को उसकी प्रतिक्रिया के लिए तैयार कर लिया.
मेरा दिल बड़े ज़ोरों से धड़कने लगा जब वो मेरे सोफे की ओर आई. मैं थोड़ा सा आगे जो झुक गया ताकि उसको मेरे होंठों तक पहुँचने में आसानी हो सके. मैं खुद को संयत करने के लिए मुख से साँस लेने लगा जिसके फलसरूप मेरे होंठ कुछ सूख गये. मैने जल्दी जल्दी जीभ निकाल होंठो पर फेरी ताक़ि उन्हे फिर से गीला कर सकूँ बिल्कुल उसके चुंबन से पहले, मुझे नही मालूम उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था या नही.
जब माँ के होंठ मेरे होंठो से छुए तो मेरी आँख बंद हो गयी. मेरा चेहरा आवेश में जलते हुए लाल हो गया था. मुझे अपनी साँस रोकनी पड़ी, क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरी भारी हो चुकी साँस उसके चेहरे पर इतने ज़ोर से टकराए.
होंठो के गीले होने से चुंबन की सनसनाहट बढ़ गयी थी. यह वो पहले वाला आम सा, लगभग ना मालूम चलने वाला होंठो का स्पर्श नही था. आज मैं हमारे होंठो के स्पर्श को भली भाँति महसूस कर सकता था, और मुझे यकीन था उसने भी इसे महसूस किया था.
वो धीरे से ‘गुडनाइट’ फुसफुसाई और अपने रूम में जाने के लिए मूड गयी. उसकी ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नज़र नही आई थी हालाँकि मुझे यकीन था वो अपने होंठो पर मेरा मुखरस लेकर गयी थी. कुछ भी ऐसा असाधारण नही था जिस पर मैं उंगली रख सकता. ऐसा लगता था जैसे हमारा वो चुंबन उसके लिए बाकी दिनो जैसा ही आम चुंबन था. कुछ भी फरक नही था. मैं उसे अलग बनाना चाहता था, और उम्मीद लगाए बैठा था कि उसका ध्यान उस अंतर की ओर जाएगा मगर नही ऐसा कुछ भी नही हुआ. अब निराश होने की बारी मेरी थी. जितना मैं पहले आवेशित था अब उतना ही हताश हो गया था.
मैने किसी सकरात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया की आशा की थी. अपने बेड पे लेटा हुआ मैं उस रात बहुत थका हुआ, जज़्बाती तौर पर निराश और हताश था. मैं किसी नकारात्मक प्रतिक्रिया को आसानी से स्वीकार कर लेता मगर कोई भी प्रतिक्रिया ना मिलने की स्थिति के लिए मैं बिल्कुल भी तैयार नही था. उस रात जब मैं नींद के लिए बेड पर करवटें बदल रहा था, तो मेरा ध्यान अपने लंड पर गया जो मेरे जोश से थोड़ा आकड़ा हुया था इसके बावजूद कि बाद में मुझे निराशा हाथ लगी थी.
मेरी निराशा अगले दिन भी मेरे साथ रही. निराशा के साथ साथ आत्मग्लानी और शरम का एहसास हो रहा था. जो मैने किया था वो समाज, कुदरत, मान मरियादा के खिलाफ था इसलिए मेरे मन में ऐसा करने के लिए पछतावे का एहसास भी हो रहा था. अगली रात जब हमारे ड्रॉयिंग रूम में टीवी देखने का टाइम हो गया तो मैं लगभग नही जाने वाला था. मैं शायद अपने कमरे मे ही रुकता मगर ये बात कि मेरे नजानें से वो मेरे रूम में आ सकती है मैने टीवी रूम जाने मे ही भलाई समझी. अब मैने जो धुन बनाई थी, उसका सामना करने का वक़्त था.
उसके व्यवहार में कोई भी बदलाव दिखाई नही दे रहा था जो शायद एक अच्छी बात थी. उसकी कोई भी प्रतिक्रिया ना देख मुझे बड़ी राहत हुई थी नाकी पिछली रात की तरह जब उसकी कोई भी प्रतिक्रिया ना देख मैं निराश हो गया था. मुझे एहसास हुआ कि हमारी दिनचर्या मे किसी तब्दीली के लिए मैं अभी तैयार नही था. मैने अचानक महसूस किया कि रात को माँ के साथ इकट्ठे समय बिताने से मुझे भी खुशी मिलती है. इस साथ से माँ के द्वारा मेरी भी एक ज़रूरत पूरी होती थी चाहे मनोवैग्यानिक तौर पर ही सही.
मैने हमारे चुंबन मे थोड़ा सा बदलाव कर उनको थोड़ा ठोस बनाने की कोशिश की थी और मैं ऐसा बिना कोई संकेत दिए या बिना कुछ जताए करने में सफल रहा था. मेरी शरम और आत्मग्लानि धीरे धीरे इस राहत से गायब होने लगी कि मैं बिना कोई कीमत चुकाए या बिना कोई सज़ा पाए सॉफ बच निकला था.
हालाँकि मेरे वार्ताव में तब्दीली आ गयी थी. मेरा उसको देखने का नज़रिया बदल गया था. उसे देखते हुए मुझे अब उतनी बैचैनि महसूस नही हो रही थी. मैने एक कदम और आगे बढ़ा दिया था और उसने मुझे ना कोसा था था ना ही कोई आपत्ति जताई थी. उस रात माँ को निहारने में मुझे एक अलग ही आनंद प्राप्त हो रहा था. यह बात जुदा थी कि मैं यकीन से नही कह सकता था कि जो कुछ हुआ था उसे उसकी कोई भनक भी लगी थी.
फिर से वही सब कुछ, हम बैठे टीवी देख रहे थे , उसने कहा “बेटा! मैं चलती हूँ, रात बहुत हो गयी है”. इस वार मैने अपने होंठ गीले नही किए. चाहे मुझे कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नही मिली थी फिर भी मैने रात का तजुर्बा दोहराने की हिम्मत नही की. मैं आगे को होकर थोड़ा सा झुक गया और उसके चूमने का इंतजार करने लगा ताकि मैं भी अपने रूम मे जा सकूँ और उस सुखद मीठे एहसास में खुद को डुबो सकूँ जिसकी लहरें मेरे जिस्म में घूम रही थी.
उसके होंठ रोजाना की तरह मेरे होंठो से छुए जिसमे मेरे महसूस करने के लिए कुछ भी ख़ास नही था.
मगर मैने कुछ महसूस किया, कुछ हल्का सा, अलग सा.
यह बिल्कुल हल्का सा था, लगभग ना महसूस होने वाला. मेरे दिलो दिमाग़ में कोई संदेह नही था कि मैने उसके होंठो को हल्के से, बिल्कुल हल्के से सिकुड़ते महसूस किया था. जैसे हमारे होंठ किसी के गाल पर चुंबन लेते हुए सिकुड़ते हैं ठीक वैसे ही लेकिन बहुत महीन से. ये मेरी माँ का होंठो से होंठो का स्पर्श नही था बल्कि एक चुंबन था. यह पहली बार था जब माँ के होंठो ने मेरे होंठो पर कोई हलचल की थी.. आम हालातों में, मैं इसे उसके होंठो का असमय सिकुड़ना मान कर रद्द कर देता मगर ये कुदरती तौर पर होने की वजाय स्वैच्छिक ज़्यादा लग रहा था. एक हल्का चुंबन होने के अलावा एक हल्का सा, महीन सा दबाब भी था जो उसके होंठो ने मेरे होंठो पर लगाया था.
अगले दिन भर मैं बहुत परेशान रहा. मैं बस यही सोचे जा रहा था कि यह वास्तव में हुआ था या यह सब मेरी कल्पना की उपज थी क्योंकि मैं पहले से कुछ अच्छा होने की उम्मीद लगाए बैठा था. क्या वो भी मेरी तरह हमारे चुंबन को और ज़्यादा गहरा बनाना चाहती थी या फिर इसके उलट वो चुंबन को और गहरा होने से रोकने की महज कोशिश कर रही थी जैसे मेरे होंठो के गीलेपान ने जो एहसास हमारे चुंबन में भरा था वो उसको रोकना चाहती होगी जिससे होंठो को सिकोड़ने से वो शायद पक्का कर रही थी कि उसके होंठो का कम से कम हिस्सा मेरे होंठो को छुए.
अपनी जिग्यासा शांत करने के लिए ज़रूरी था कि मैं इसे एक बार फिर से महसूस करता. मुझे उसके साथ कल रात जैसी स्थिति में होना था और इस बार मैं हमारे शुभ रात्रि चुंबन की हर तफ़सील पर पूरा ध्यान देने वाला था. मैं इस बात पर भी तर्क वितर्क कर रहा था कि मुझे अपने होंठ गीले करने चाहिए या नही मगर इससे हालातों में बदलाव हो जाता. मुझे कल ही की तरह आज भी अपने होंठ सूखे रखने थे और फिर देखना था कि उसके होंठ क्या कमाल दिखाते हैं!
वो शाम और रात शुरू होने का समय और भी बैचैनि भरा था, मगर उतना बैचैनि भरा नही था जितना जब हम टीवी देख रहे थे, तब था जब मैं अपने शुभरात्रि चुंबन का इंतजार कर रहा था और समय लग रह था जैसे थम गया हो. वो इंतजार बहुत कष्टदाई था.
मगर अंत मैं उसके जाने का समय हो गया और हमारे रात्रि विदा के उस चुंबन का भी.
मैं हमेशा की तरह आगे को झुक गया. मैने अपनी आँखे बंद कर लीं ताकि मैं अपना पूरा ध्यान उस चुंबन पर केंद्रित कर सकूँ.
मैने उसके होंठ अपने होंठो पर महसूस किए.
मगर मैने उसके होंठो का कोई भी दबाब अपने होंठो पर महसूस नही किया जैसा मैने पिछली रात महसूस किया था. उसने अपने होंठ भी नही सिकोडे जैसे उसने पिछली दफ़ा किया था.
मगर फिर भी कुछ अलग था, कुछ अंतर था. मेरा उपर का होंठ उसके बंद होंठो की गहराई में आसानी से फिसल गया.
जाहिर था इस बार उसने अपने होंठ गीले किए थे.
अब यह मात्र एक संजोग था या फिर उसने जानबूझकर उन्हे गीला किया था, मैं कुछ नही कह सकता था क्योंकि मैने उसे अपने होंठ गीले करते नही देखा था. मैने उनका गीलापन तभी महसूस किया था जब उसने मेरे होंठ छुए थे. मैं यह मान कर नही चल सकता था कि उसने ऐसा जानबूझकर किया था, चाहे उसने ऐसा जानबूझकर किया हो तो भी. मगर एक बात तय थी; अगर उसने उन्हे जानबूझकर गीला किया था तो इसका मतलब वो भी हमारे रात्रि चुंबन को और ठोस बनाना चाहती थी, उसमे और ज़यादा गहराई चाहती थी, ठीक वैसे ही जैसे मैने कोशिश की थी हमारे चुंबन को और गहरा बनाने की, उसमे और एहसास जगाने की.
मैं उसके होंठो की नमी अपने होंठो पर महसूस कर सकता था बल्कि जब बाद में मैने अपने होंठ चाटे तो उसका स्वाद भी ले सकता था. मैं सोच रहा था कि क्या उसने भी मेरे होंठो का गीलापन ऐसे ही महसूस किया था और क्या उसने भी उसका स्वाद चखा था जैसे मैने उसका चखा था. क्या उसको भी मेरा मुखरस मीठा लगा था जैसे उसका मुखरस मुझे मीठा लगा था. मैं उसके जाने के काफ़ी समय बाद तक अपने होंठो को चाटता रहा ताकि चुंबन का वो स्वाद और सनसनाहट बनी रहे.
मेरी माँ ने मुझे शुभरात्रि के लिए नही चूमा था. मेरी माँ ने मुझे असलियत में चूमा था चाहे बहुत हल्के से ही सही. चाहे वो जानबूझकर किया था चाहे वो सिरफ़ एक संजोग था, मेरी जाँघो के बीच पत्थर की तरह कठोर लंड को उस अंतर का पता नही था. उस रात मुझे नींद बहुत देर बाद आई क्योंकि मुझे बुरी तरह आकड़े लंड के साथ सोना पड़ा था.
हैरत की बात थी कि अगले दिन मुझे शरम और आत्मग्लानि का एहसास पहले की तुलना बहुत कम हो रहा था. मैने अपनी सग़ी माँ के कारण हुई अपनी उत्तेजना को स्वीकार लिया था और उसके कारण होने वाली अपनी उत्तेजना को लेकर अब शांत था. अपनी माँ के बारे में एसी भावनाएँ रखना सही था—- जब तक कि वो सिर्फ़ मेरे दिमाग़ तक सीमित थी. हालाँकि हमारे बीच हानि रहित मन को गुद-गुदाने वाला एक खेल चल रहा था, मगर अन्ततः यह एक खेल ही था, मुझे नही लगता था ये बहुत आगे तक बढ़ेगा. आख़िरकार वो मेरी माँ थी. मैं उसके कारण उत्तेजित हो सकता था और शायद इसमे कुछ ग़लत नही था. मगर मैं उसके साथ वो सब नही कर सकता था, जो एक मर्द मेरी माँ जैसी सुंदर, कामुक और मादकता से भरपूर नारी के साथ करना चाहेगा. हमारा रिश्ता इसकी इजाज़त नही देता था.
चाहे हम दोनो ने एक दूसरे को गीले होंठो से चूमा था, मगर ये हमारे बीच कुछ बदलने के लिए नाकाफ़ी था. अगर उसने भी अपने होंठ स्वैच्छा से गीले किए थे तो हम ने यह मान कर ऐसा किया था कि दूसरे को हमारी मंशा की मालूमात नही है, और हम ने यह संभावित अस्वीकारता के तहत किया था. मतलब अगर हम मे से एक ऐतराज जताता तो दूसरा भोलेपन का नाटक कर सॉफ सॉफ मुकर सकता था कि हमारे उन चुंबनो में उसने कुछ भी जोड़ा है और वो सिर्फ़ माँ बेटे के बीच साधारण ‘गुडनाइट’ चुंबन हैं. हम उस सीमा पे हल्का सा दबाब बना रहे थे मगर असलियत में हम यह कभी कबूल नही कर सकते थे कि हम सीमा पर कोई दबाब डाल रहे थे. कुछ था तो ज़रूर मगर हम उस कुछ को ठीक से पढ़ नही पा रहे थे. और हम उस कुछ पर अमल तो बिल्कुल भी नही कर सकते थे. जिस पल हममे एक उस कुछ पर अमल करता तो दूसरा खूदबखुद उससे भाग खड़ा होता. यही हमारी नियती थी.
मैने अपने प्रयोग को कुछ और में विकसित होने की उम्मीद नही की थी. यह हर तरह से एक हानिरहित प्रयोग था जो हमारे तन्हा दिलों को रात के अकेलेपन में थोड़ा गुदगुदा सकता, हममे थोड़ा जोश भर सकता, नसों में बहते ठंडे खून में थोड़ी गर्मी ला सकता मगर यह कुछ बड़ा होने की भूमिका नही बन सकता था. वो मेरी माँ थी और मैं उसका बेटा था. कुदरत की ओर से मर्यादा की रेखा खींची गयी थी और वो रेखा कभी भी पार नही की जा सकती थी—कभी भी नही.
मैं थोड़ा सा उदास और कुछ निराश था इस सोच से कि उस रेखा को कभी पार नही किया जा सकता. ज़रूर हमारे पास एक दूसरे को देने के लिए कुछ था मगर हम वो दूसरे को दे नही सकते थे. मैं बिना किसी स्पष्ट कारण के खुद को हताश महसूस कर रहा था और दिल पर इतना बोझ महसूस हो रहा था कि अगले दिन मैं टीवी देखने भी नही गया.
एक बार फिर से मैं अपने रूम में ही रहा. असलियत में, मैं उसका ध्यान और भी अपनी ओर खींचना चाहता था, क्योंकि मुझे यकीन था कि टीवी रूम में मेरी अनुपस्थिति की ओर उसका ध्यान जाएगा और वो ज़रूर कोशिश करेगी दिखाने कि कि उसे हमारे रात के साथ की कमी महसूस हो रही है. असलियत में, मैं एक प्रमाण के लिए तरस रहा था कि उसे भी हमारे साथ की बहुत ज़रूरत है.
वो मुझे देखने आई, जैसी मैने उम्मीद की थी कि वो आएगी, जैसे मेरा दिल चाहता था कि वो आए.
मैं अपने कंप्यूटर पर काम नही कर रहा था इसलिए पिछली बार का बहाना नही बना सकता था. मैं बेड पर बैठा हुआ था और सोच रहा था.
“बेटा तुम ठीक तो हो” उसने नरम स्वर में पूछा.
“हां, मैं ठीक हूँ माँ. बस थोड़ी थकावट सी महसूस हो रही है”
वो थोड़ी असमंजस में नज़र आ रही थी. मैं लेटा हुआ नही था जैसा कि मुझे होना चाहिए था अगर मैं वाकाई में बहुत थका हुआ होता. मैं तो बस बेड पर आराम से बैठा हुआ था. उसके चेहरे पर चिंता के बादल मंडराने लगे और मैं बता नही सकता था कि वो चिंता किस विषय में कर रही है. मैं उसके हाव-भाव पढ़ने की कोशिशकर रहा था कि शायद मुझे कुछ संकेत मिल जाए. मगर मुझे कुछ ना मिला.
मुझे ऐसा लग जैसे वो कुछ कहना चाहती थी मगर वो अल्फ़ाज़ कहने के लिए वो खुद को तैयार ना कर सकी. मैं भी कुछ कहना चाहता था मगर क्या कहूँ ये मेरी समझ में नही आ रहा था. अंततः वो डोर की ओर मूडी और बिना गुडनाइट बोले जाने लगी.
उसका इस तरह बिना कुछ बोले जाना खुद में एक खास बात थी. मैं शायद उसके साथ ज़्यादती कर रहा था. मैने उसको इस समस्या से उबारने का फ़ैसला किया. मैने खुद को भी इस समस्या से बच निकलने का मौका दिया.
“अगर तुम थोड़ा सा समय दोगि तो मैं अभी आता हूँ. फिर मिलकर टीवी देखेंगे माँ” हमारी दूबिधा, हमारा संकोच, हमारी शरम, अगर हम ये सब महसूस करते थे तो इसे ख़तम करने और वापस पहले वाले हालातों में लौटने का सबसे बढ़िया तरीका यही था कि हम सब कुछ भूल कर ऐसे वार्ताव करते जैसे कुछ हुआ ही ना हो.
मैं देख सकता था कि उसके कंधों से एक भारी बोझ उतर गया था क्योंकि वो एकदम से खिल उठी थी, मुझे भी एकदम से अच्छा महसूस होने लगा. पिछली रात कुछ भी घटित नही हुआ था. हम ने कुछ भी नही किया था, और हमने ग़लत तो बिल्कुल भी कुछ नही किया था.
हम ने टीवी ऑन किया. इस बार हम ने एक दो विषयों पर हल्की फुल्की बातें भी की. किसी कारण हमारे बीच पहले के मुक़ाबले ज़्यादा हेल-मेल था. हम में कुछ दोस्ताना हो गया था. हालांकी हमारा रात्रि मिलन छोटा था मगर पहले के मुकाबले ज़्यादा अर्थपूर्ण था. हम ने इसे एक दूसरे को गुडनाइट बोल ख़तम किया और एक दूसरे के होंठो पे हल्का सा चुंबन लिया- एक हल्का, सूखा और नमालूम पड़ने वाला चुंबन. उसके बाद हम दोनो अपने अपने कमरों में चले गये.
उसके बाद के आने वाले दिनो में मैने उसके चुंबन के उस मीठे स्वाद को अपनी यादाश्त में ताज़ा रखने की बहुत कोशिश की. हमने अपनी रोज़ाना की जिंदगी वैसे ही चालू रखी जिसमे हम इकट्ठे बैठकर टीवी देखते, कुछ बातचीत करते और फिर रात का अंत एक रात्रि चुंबन से करते- एक हल्के, सूखे और नमालूम चलने वाले चुंबन से.
मैं इतना ज़रूर कहूँगा कि हमारे बीच गीले चुंबनो के पहले की तुलना में अब हेल-मेल बढ़ गया था. हमारे बीच एक ऐसा संबंध विकसित हो रहा था जिसने हमे और भी करीब ला दिया था. हम अब वास्तव में एक दूसरे से और एक दूसरे के बारे में खुल कर ज़्यादा बातचीत करने लगे थे. ऐसा लगता था जैसे उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ था क्योंकि मैं बहुत देर तक बैठा उसकी बातें सुनता रहता जो आम तौर पर रोजमर्रा की जिंदगी की साधारण घटनायों पर होती थीं.
अब इस पड़ाव पर मैं दो चीज़ें ज़रूर बताना चाहूँगा. पहली तो यह कि बिना अपने पिता का ध्यान खींचे हमारे लिए ये कैसे मुमकिन था इतना समय एकसाथ बैठ पाना? दूसरा, अपनी दिनचर्या उसकी पिताजी के साथ दिनचर्या से अलग रखना हमारे लिए कैसे मुमकिन था?
हमारा घर इंग्लीश के यू-शॅप के आकर में बना हुआ है. मेरे पिताजी का बेडरूम लेफ्ट लेग के आख़िरी कोने पे है, जबकि किचन राइट लेग के आख़िरी कोने पे है. किचन के बाद ड्रॉयिंग रूम है जिसमे हम टीवी देखते हैं. ड्रॉयिंग रूम के बाद मेरा कमरा है. मेरे कमरे के बाद एक और कमरा है. उसके बाद पिताजी के साइड वाली लेफ्ट लेग सुरू होती है, जहाँ एक कमरा है और उसके बाद मेरे माता पिता का बेडरूम. मेरे पिताजी की साइड के कॉरिडर मे एक बड़ा ग्लास डोर था जो एक वरान्डे में खुलता था जिसके दूसरे सिरे पर मेरी तरफ के कॉरिडर और किचन के बीचो बीच था. दिन के समय माँ अपने कॉरिडर से उस ग्लास डोर का इस्तेमाल कर किचन में आती जाती थी. रात के समय वरामदे के डोर बंद होते थे इसलिए पहले उसे किचन से ड्राइंग रूम जाना पड़ता था और वहाँ से कॉरिडर में जो मेरे रूम के सामने से गुज़रता था फिर मेरे रूम के साथ वाला कमरा, फिर दूसरी तरफ का कमरा और अंत में पिताजी का कमरा.
पिताजी के कमरे से ड्रॉयिंग रूम की दूरी काफ़ी लंबी थी जिससे उनके लिए घर की इस साइड पर क्या हो रहा है, सुन पाना या देख पाना नामुमकिन था. हम कम आवाज़ में बिना उनको परेशान किए टीवी देख सकते थे जा बातचीत कर सकते थे क्योंकि टीवी की आवाज़ कभी भी उन तक नही पहुँच सकती थी और ना ही टीवी या किचन की लाइट उनके लिए परेशानी का सबब बन सकती थी. इसके बावजूद हम अपनी आवाज़ बिल्कुल धीमी रखते ता कि वो जाग ना सके. हमें देखने का एक ही तरीका था कि वो खुद ड्रॉयिंग रूम में चलकर आते मगर मेरे माता पिता के पास उनकी एक अपनी छोटी फ्रिड्ज थी और साथ ही मे चाइ और कॉफी मेकर भी उनके पास था. इसलिए जब वो खाने के बाद एक बार अपने कमरे में चले जाते थे तो उनको कभी भी इस और वापस आने की ज़रूरत नही पड़ती थी.
मैं सुबेह कॉलेज जाता था. कॉलेज से दोपेहर को लौटता था और फिर रात को ट्यूशन जाता था जबके मेरे पिता सुबह आठ से पाँच तक काम करते थे. वो सुबह छे बजे के करीब निकलते थे क्योंकि उनको थोड़ा दूर जाना पड़ता था. वो शाम को सात बजे के करीब लौट आते, खाना खाते, कुछ टाइम टीवी देखते और लगभग नौ बजे के करीब अपने रूम में चले जाते. जब मैं ट्यूशन से वापस आता तब तक पिताजी सो चुके होते. मैं नहा धोकर खाना ख़ाता और फिर टीवी देखने बैठ जाता जिसमे अब मेरी माँ भी मेरा साथ निभाने आ जाती. इससे मेरी माँ को इतना समय मिल जाता कि उसकी दिनचर्या का एक हिस्सा पिताजी के साथ गुज़रता और दूसरा हिस्सा वो मेरे साथ टीवी देख कर गुज़रती. इस दिनचर्या से उसे ना तो पिताजी की चिंता रहती और ना ही जल्द सोने की.
जैसे जैसे मैं और मेरी माँ दोनो ज़्यादा से ज़्यादा समय एक साथ बिताने लगे, धीरे धीरे हमारी आत्मीयता बढ़ने लगी. कभी कभी माँ उसी सोफे पर बैठती जिस पर मैं बैठा होता, हालांके वो दूसरी तरफ के कोने पर बैठती. यह सिरफ़ समय की बात थी कि हममे से कोई एक फिर से हमारे चुंबनो में कुछ और जोड़ने की कोशिश करता. अब सवाल यह था कि पहल कौन करेगा और दूसरा उसका जवाब कैसे देगा.
एक वार वीकेंड पर मेरे पिताजी एक सेमिनार मे हिस्सा लेने शहर से बाहर गये हुए थे. उनके जाने से हम एक दूसरे के साथ और भी खुल कर पेश आ रहे थे. मैं एक नयी फिल्म बाज़ार से खरीद लाया. हम दोनो आराम से बेफिकर होकर फिल्म देख रहे थे क्योंकि आज उसको जाने की कोई जल्दी नही थी. हम दोनो उस रात और रातों की तुलना में बहुत देर तक एक दूसरे के साथ बैठे रहे. जहाँ तक कि दिन मे खरीदी फिल्म ख़तम होने के बाद हम टीवी पर एक दूसरी फिल्म देखने लगे. उस रात वाकाई हम बहुत देर तक ड्रॉयिंग रूम में बैठे रहे. अंत में खुद मैने, और माँ ने कहा के अब हमे सोना चाहिए.
मैने डीवीडी प्लेयर से डीवीडी निकाली उसको उसके कवर में वापस डाला और फिर;टीवी बंद कर दिया. जबकि वो किचन में झूठे बर्तन सींक मे डालने लगी ताकि सुबेह को उन्हे धो सके.
अब जैसा के मैं पहले ही बता चुका हूँ हमारे घर के कॉरिडर ड्रॉयिंग रूम से सुरू होते थे, सबसे पहले मेरे रूम के सामने से गुज़रते थे, उसके बाद दो गेस्ट रूम और अंत में उसके बेडरूम पे जाकर ख़तम होता था.
मैने ड्रॉयिंग रूम का वरामदे मे खुलने वाला डोर बंद किया जबकि उसने किचन और ड्रॉयिंग रूम की लाइट्स बंद की. उसके बाद हम नीम अंधेरे में चलते हुए कॉरिडर में आ गये.
आम तौर पर हमारे रात्रि चुंबन के समय मैं सोफे पर बैठा थोड़ा आगे को झुकता था और वो मेरे सामने खड़ी होकर नीचे झुक कर मेरे होंठो पर चुंबन देती थी मगर उस दिन वो उस जेगह होना था जहाँ कॉरिडर से वो अपने रूम में चली जाती और मैं अपने रूम में जो के मेरे बेडरूम के सामने होना था. हम दोनो मेरे बेडरूम के दरवाजे के आगे एक दूसरे को सुभरात्रि बोलने के लिए रुक गये. अब हमे वो चुंबन हम दोनो के एक दूसरे के सामने खड़े होकर करना था जिसमे कि उसे अपना चेहरा उपर को उठाना था जबके मुझे अपना चेहरा नीचे को झुकाना था.
उस चुंबन की आत्मीयता और गहराई पहले चुंबनो के मुक़ाबले खुद ब खुद बढ़ गयी थी, रात के अंधेरे की सरसराहट उसे रहास्यपूर्ण बना रही थी. हम इतने करीब थे कि मैं उसके मम्मो को अपनी छाती के नज़दीक महसूस कर सकता था, यह पहली वार था जब हम ऐसे इतने करीब थे. मुझे नही मालूम कि उसके मामए वाकाई मुझे छू रहे थे या नही मगर वो मेरी पसलियों के बहुत करीब थे, बहुत बहुत करीब! उसके माममे हैं ही इतने बड़े बड़े!
हम दोनो ने उस दिन काफ़ी वाक़त एकसाथ गुज़ारा था, खूब मज़ा किया था, एक दूसरे के साथ का बहुत आनंद मिला था. मन में आनंद की तरंगे फूट रही थी और जो अतम्ग्लानि मैने पिछले गीले चुंबनो को लेकर महसूस की थी वो पूरी तेरह से गायब हो चुकी थी. महॉल की रोमांचिकता में तब और भी इज़ाफा हो गया जब उसने अपना हाथ (असावधानी से) मेरे बाएँ बाजू पर सहारे के लिए रख दिया.
जब उसने उपर तक पहुँचने के लिए खुद को उपर की ओर उठाया तो मैने निश्चित तौर पे उसके भारी मम्मो को अपनी छाती से रगड़ते महसूस किया. मैने खुद को एकदम से उत्तेजित होते महसूस किया और फिर ना जाने कैसे, खुद बा खुद मेरी जीब बाहर निकली और मेरे होंठो को पूरा गीला कर दिया जब वो उसके होंठो को लगभग छूने वेल थे. वो मुझे इतने अंधेरे में होंठ गीले करते नही देख पाई होगी.
जैसे ही हमारे होंठ एक दूसरे से छुए, प्रतिकिरिया में खुद बा खुद उसका दूसरा हाथ मेरे दूसरे बाजू पर चला गया और इसे संकेत मान मेरे होंठो ने खुद बा खुद उसके होंठो पर हल्का सा दबाब बढ़ा दिया.
यह एक छोटा सा चुंबन था मगर लंबे समय तक अपना असर छोड़ने वाला था.
उसके होंठ भी नम थे. उसने उन्हे नम किया था जैसे मैने अपने होंठ नम किए थे. क्योंकि मैं उसके उपर झुका हुआ था, इसलिए जब हमारे होंठ आपस में मिले और उन्होने एक दूसरे पर हल्का सा दवाब डाला तो दोनो की नमी के कारण उसका उपर का होंठ मेरे होंठो की गहराई में फिसल गया जबकि मेरा नीचे वाला होंठ उसके होंठो की गहराई में फिसल गया. और सहजता से दोनो ने एक दूसरे के होंठो को अपने होंठो में समेटे रखा. मैने उसका मुखरस चखा और वो बहुत ही मीठा था. मुझे यकीन था उसने भी मेरा मुख रस चखा था.
जैसे ही उसको एहसास हुआ के हमारा शुभरात्रि का वो हल्का सा चुंबन एक असली चुंबन में तब्दील हो चुका है तो वो एकदम परेशान हो उठी. उसके हाथों ने मुझे धीरे से दूर किया और उसने अपना मुख मेरे मुख से दूर हटा लिया. हमारा चुंबन थोड़ा हड़बड़ी में ख़तम हुया, वो धीरे से गुडनाइट बुदबुदाई और जल्दी जल्दी अपने रूम को निकल गयी.
मैं कम से कम वहाँ दस मिनिट खड़ा रहा होऊँगा फिर थोड़ा होश आने पर खुद को घसीटता अपने बेडरूम में गया और जाकर अपने बेड पर लेट गया.
मेरे लिए यह स्वाभाविक ही था कि मैं अगले दिन कुछ बुरा महसूस करते हुए जागता. हम ने एक दूसरे को ऐसे चूमा था जैसा हमारे रिश्ते में बिल्कुल भी स्विकार्य नही था और फिर यह बात कि वो लगभग वहाँ से भागते हुए गयी थी, से साबित होता था कि हम ने कुछ ग़लत किया था. मुझे समझ नही आ रहा था कि हम एक दूसरे का सामना कैसे करेंगे
हम इसे एक बुरा हादसा मान कर भूल सकते थे और अपनी ज़िंदगी की ओर लौट सकते थे, मगर असलियत में यह कोई हादशा नही था. हम ने इसे स्वैच्छा से किया था इसमे कोई शक नही था.
- मैने वास्तव में अपनी सग़ी माँ को चूमा था और वो जानती थी कि मैने उसे जिस तरह चूमा था वैसे मैं उसे चूम नही सकता था. यह बात कि वो लगभग वहाँ से भागती हुई गयी थी, साबित करती थी कि मेरा उसे चूमना ग़लत था और वो खुद यह जानती थी कि यह ग़लत है इसलिए उसने इस पर वहीं विराम लगा दिया इससे पहले के हम इस रास्ते पर और आगे बढ़ते.
मगर हम ने इस समस्या से निजात पाने का आसान तरीका चुना. हम ने ऐसे दिखावा किया जैसे कुछ हुआ ही नही था. वैसे भी ऐसा कुछ कैसे घट सकता था? वो मेरी माँ थी और मैं उसका बेटा. कुछ ग़लत नही घट सकता था. जो भी पछतावा था जा शरम थी वो सिर्फ़ हमारी चंचलता और शरारत की वेजह से थी.
मुझे जल्द ही समझ में आ गया के इंसानी दिमाग़ की यही फ़ितरत होती है कि वो किसी ग़लती की वेजह से होने वाली आत्मग्लानी को यही कह कर टाल देता है कि ग़लती की वेजह अवशयन्भावि थी. हम ने एक सुखद, आत्मीयता से भरपूर शाम बिताई थी इसलिए यह स्वाभाविक ही था हम एक दूसरे को खुद के इतने नज़दीक महसूस कर रहे थे कि वो चुंबन स्वाभाविक ही था. इसके इलावा इतना गहरा अंधेरा था कि हमे कुछ दिखाई भी तो नही दे रहा था.
जब एक बार पछतावे की भावना दिल से निकल गयी और उस ‘शरारत’ को न्यायोचित ठहरा दिया गया तो मेरे लिए माँ को नयी रोशनी में देखना बहुत मुश्किल नही रह गया था. मैं वाकाई में माँ को एक नयी रोशनी में देख रहा था. मैं उसे ऐसे रूप में देख रहा था जिसकी ओर पहले कभी मेरा ध्यान ही नही गया था.
मैने ध्यान दिया कि वो नये और आधुनिक कपड़ों की तुलना में पुराने कपड़ों में कहीं ज़्यादा अच्छी लगती है. वो नयी और महँगी स्कर्ट्स की तुलना में अपनी पुरानी फीकी पड़ चुकी जीन्स में कहीं ज़यादा अच्छी दिखती थी. वो ब्लाउस के मुक़ाबले टी-शर्ट में ज़्यादा सुंदर लगती थी. उसके बाल चोटी में बँधे ज़्यादा अच्छे लगते थे ना कि जब वो हेर सलून से कोई स्टाइल बनवा कर आती थे. यहाँ जिस खास बिंदु की ओर मैं इशारा करना चाहता हूँ वो यह है कि वो मुझे वास्तव में बहुत सुंदर नज़र आने लगी थी—–एक सुंदर नारी की तरह.
माँ कैसी दिखती है, मैं इसमे ख़ासी दिलचस्पी लेने लगा. मेरी नज़रें चोरी चोरी उसके बदन का मुआईना करने लगी जैसे वो मुझे सुंदर नज़र आने वाली किसी सुंदर लड़की क्या करती. मुझे माँ को, उसके बदन और उसके बदन की विशेषताओ का इस तरह चोरी चोरी अवलोकन करने में बहुत आनंद आने लगा. वो मुझे हर दिन ज़्यादा, और ज़्यादा सुंदर दिखने लगी और मैं भी खुद को अक्सर उत्तेजित होते महसूस करने लगा.
माँ की तरफ से भी कुछ बदलाव देखने को मिल रहा था. मैने महसूस किया कि वो अब ज़्यादा हँसमुख हो गयी थी. वो पहले की अपेक्षा ज़्यादा मुस्कराती थी, उसकी चाल मे कुछ ज़्यादा लचक आ गयी थी, और तो और मैने उसे कयि बार कुछ गुनगुनाते भी सुना था. उसके स्वभाव मैं हमारी ‘उस मज़े की रात’ के बाद निश्चित तौर पर बदलाव आ गया था. चाहे उसने उस रात मुझे दूर हटा दिया था और जो कुछ हमारे बीच हो रहा था उसे रोक दिया था इसके बावजूद हमारे बीच घनिष्टता पहले के मुक़ाबले बढ़ गयी थी. हम एक दूसरे के नज़दीक आ गये थे- अध्यात्मिक दृष्टिसे भी और शारीरिक दृष्टि से भी.
वो मुझे अच्छी लगने लगी थी और मैने उसे एक दो मौकों पर बोला भी था कि वो बहुत अच्छी लग रही है. उसने भी दो तीन बार मेरी प्रशंसा की थी, मतलब एक तरह से मुझे विश्वास दिलाया था कि हमारे बीच जो कुछ भी हो रहा था वो दोनो और से था ना कि सिर्फ़ मेरी और से. कम से कम मेरी सोच अनुसार तो ऐसा ही था, मैं पूरा दिन माँ के ख़यालों में ही गुम रहने लगा था. एक दिन उमंग में मैने उसके लिए चॉक्लेट्स भी खरीदे.
मैने उसके मम्मे देखने के हर मौके का फ़ायदा उठाया. उसके मम्मे इतने बढ़िया, इतने बड़े-बड़े और इतने सुंदर थे कि मेरा मन उनकी प्रशंसा से भर उठता. हो सकता है इस बात का तालुक्क इस बात से हो कि कभी उन पर मेरा हक़ था मगर वो थे बहुत सुंदर. मैं नही जानता उसका ध्यान मेरी नज़र पर गया कि नही मगर अगर उसने ध्यान दिया था तो उसने मेरी तान्क झाँक को स्वीकार कर लिया था और इसकी आदि हो गयी थी.
मेरा ध्यान उसकी पीठ पर भी गया जब भी वो मुझसे विपरीत दिशा की ओर मुख किए होती. उसकी पीठ बहुत ही सुंदर थी. उसकी गंद का आकर बहुत दिलकश था, उभरी हुई और गोल मटोल, बहुत ही मादक थी. और उसे उस मादक गान्ड का इस्तेमाल करना भी खूब आता था. उसकी चाल मैं एसी कामुक सी लचक थी कि मैं अक्सर उससे सम्मोहित हो जाता था.
एक दिन मुझे देखने का अच्छा मौका मिला, मेरा मतलब पूरी तरह खुल कर उसका चेहरा देखने का मौका. वो कुछ कर रही थी और उसकी आँखे कहीं और ज़मीन हुई थीं, इस तरह से कि वो मुझे अपनी ओर घूरते नही देख सकती थी. मैने उसका चेहरा, उसके गाल, उसके होंठ और उसकी तोढी देखी और मेरा मन उसकी सुंदरता से मोहित हो उठा. मैने ध्यान दिया कि माँ के होंठ बड़ी खूबसूरती से गढ़े हुए थे जो अपने आप में बहुत मादक थे. उन्हे देख कर चूमने का मन होता था. इनसे हमारे चुंबनो को लेकर मेरी भावनाएँ और भी प्राघड़ हो गयी थीं जब मेरे दिल में यह ख़याल आया कि हमारे रात्रि चुंबनो के समय यही वो होंठ थे जिन्हे मेरे होंठो ने स्पर्श किया था. वो याद आते ही मुँह में पानी आ गया.
मैने इस बात पर भी ध्यान दिया कि वो बहुत प्यारी, बहुत आकर्षक है. वो अक्सर कुछ न कुछ ऐसा करती थी कि मैं अभिभूत हो उठता. किचन में कुछ ग़लत हो जाने पर जिस तरह वो मुँह फुलाती थी, जब कभी किसी काम में व्यस्त होने पर फोन की घंटी बजती थी और उसकी थयोरियाँ चढ़ जाती थीं, जब वो बगीचे में किसी फूल को देखकर मुस्कराती थी. मुझे उसमे एक बहुत ही प्यारी और बहुत ही सुंदर नारी नज़र आने लगी थी.
जितना ज़्यादा मेरी उसमे दिलचपसी बढ़ती गयी उतना ही ज़्यादा मैं उसके प्रेम में पागल होता गया. ‘पागल’ यही वो लगेज है जो मैं समझता हूँ मेरी हालत को सही बयान कर सकता है. मगर मैं नही जानता था कि उसकी भावनाएँ कैसी थी जा वो क्या महसूस करती थी.
यह जैसे अवश्यंभावी था कि मेरे पिता को फिर से शहर से बाहर जाना था और लगता था जैसे वो इसी मौके का इंतेज़ार कर रही थी. इस बार खुद उसने हमारे रात को देखने के लिए फिल्म खरीदी थी और मैं उस फिल्म को उसके साथ देखने के लिए सहमत था. हम ने रात के खाने को बाहर के एक रेस्तराँ से मँगवाया और दोनो ने एकसाथ उस खाने का बहुत आनंद लिया. हम दोनो ने सोफे पर बैठकर फिल्म देखी, जिसमे मैं सोफे की एक तरफ बैठा हुया था और वो दूसरी तरफ. फिल्म ख़तम होने के बाद हम ने टीवी पर थोड़ा समय कुछ और देखा, अंत में हम टीवी देख देख कर थक गये. अपने कमरों में जाने की हमे कोई जल्दबाज़ी नही थी और ना ही सुभरात्रि कहने की कोई जल्दबाज़ी थी. हम तभी उठे जब और बैठना मुश्किल हो गया था और हमे उठना ही था.
उसने किचन की लाइट्स बंद की और दरवाजे चेक किए कि वो सही से बंद हैं जा नही जबके मैने डीवीडी से फिल्म निकाल कर उसके कवर में डाली और रिमोट्स के साथ दूसरी जगह रखी और सभी एलेकट्रॉनिक उपकर्नो को बंद कर दिया. पिछली बार की अचानक और रूखी समाप्ति के बावजूद, हमारे बीच कोई अटपटापन नही था. सब कुछ सही, सहज और शांत लग रहा था. जब हम ड्रॉयिंग रूम से उठकर कॉरिडोर की ओर चलने लगे तो मेरा दिल थोड़ी तेज़ी से धड़कने लगा. मैं आस लगाए बैठ था कि शायद आज फिर से मुझे हमारी और रातों के चुंबनो की तुलना मे थोड़ा गहरा, थोड़ा ठोस चुंबन लेने को मिलेगा. हमारी पिछली रात जब मेरे पिता घर से बाहर गये हुए थे, बहुत आत्मीयता से गुज़री थी और हमारा सुभरात्रि चुंबन हमारे आमतौर के चुंबनो से ज़्यादा ठोस था. मैं उम्मीद कर रहा था कि अगर पिछली रात से ज़्यादा नही तो कम से कम हमारे चुंबन की गहराई उस रात जितनी तो होगी, मैं उम्मीद कर रहा था कि शायद मुझे उसके मुखरस का स्वाद चखने को मिलेगा जा हो सकता है मुझे उसके होंठो के अन्द्रुनि हिस्से को महसूस करने का मौका भी मिल जाए.
चलते चलते जब हम मेरे बेडरूम के डोर के आगे रुके, तो मेरे दिल की धड़कने बहुत तेज़ हो गयी थीं. मेरी साँसे उखाड़ने लगी थीं. मगर हाए! उसने मुझे कुछ करने का मौका नही दिया. वो मेरे ज़्यादा नज़दीक भी नही आई. मैने ध्यान दिया उसने हमारे बीच एक खास दूरी बनाए रखी थी.
मुझे बहुत निराशा हुई. उसने हमारे बीच आत्मीयता को एक हद्द तक रखने का जो फ़ैसला किया था, मुझे उसका सम्मान करना था. यह मानते हुए कि हम दोनो में ऐसी आत्मीयता संभव नही हो सकती, उसके लिए अपने होंठ सूखे रखना आसान था ताकि वो चुंबन सिरफ़ सुभरात्रि की सूभकामना मात्र होता. मगर फिर भी कम से कम मैं, उसके साथ बिताई उस सुखद रात के आनंद की लहरों में खुद को तैरता महसूस कर सकता था. कम से कम हमारा साथ पहले की तुलना में ज़्यादा अर्थपूर्ण था, ज़्यादा दोस्ताना हो गया था.
वो अपने कमरे में चली गयी और मैं अपने.
सब कुछ सही था. पहले भी कुछ ग़लत घटित नही हुआ था और ना ही अब हुआ था. यह बहुत बड़ी राहत थी के हम ने शाम और रात का अधिकतर समय एक साथ बिताया था और मर्यादा की रेखा ना तो छुई गयी थी, ना ही पार की गयी थी और ना ही उसे मिटाया गया था. और हम ने पूरा समय खूब मज़ा भी किया था!
मैं राहत महसूस कर रहा था और शांति भी कि हम ने मिलकर पूरा समय अच्छे से बिताया था और इस बार उसे ना तो मुझे धकेलना पड़ा था और नही अपने रूम की ओर भागना पड़ा था. हमारा रिश्ता लगता था और भी परिपक्व हो गया था जिसने ठीक ऐसी ही पिछली रात को हुई ग़लतियों से बहुत कुछ सीख लिया था, और साथ ही उन ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करना भी सीख लिया था .
कोई पँद्रेह बीस मिनिट बाद मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई.
“कम इन” मैं बोला तो उसने दरवाजा खोला और अंदर दाखिल हुई.
उसने कपड़े बदल कर नाइटी पहन ली थी और तभी मुझे एहसास हुया कि हमारी रात भिन्न होने का एक कारण यह भी था कि फिल्म देखने के समय उसने जीन्स और टी-शर्ट पहनी हुई थी ना कि नाइटी जैसे वो आम तौर पर रात को हमारे इकट्ठे समय बिताने के समय पहनती थी.
मैने उसे उस नाइटी में पहले कभी नही देखा था. वो देखने में नयी लग रही थी. वो उसके मम्मो पर बड़ी खूबसूरती से झूल रही थी. नाइटी की डोरियाँ उसे इतनी अच्छे से नही संभाले हुई थीं जितने अच्छे से उसके मम्मे उसे संभाले हुए थे. उसके नंगे काढ़े और अर्धनगन जंघे मेरी आँखो के सामने अपने पुर शबाब पर थी और उसकी पतली सी नाइटी से झँकता उसका गड्राया बदन बहुत कामुक लग रह था.
“मुझे नींद नही आ रही” वो बोली. “मैने सोचा मैं तुम्हारे साथ थोड़ा और समय बिता लूँ”
“मुझे नींद नही आ रही” वो बोली “मैने सोचा क्यों ना तुम्हारे साथ कुछ और समय बिता लूँ”
उसने कहा कि उसे नींद नही आ रही और मेरा ध्यान एकदम से उसकी उस बात पर चला गया जिसमे उसने कहा था के कभी कभी वो इतनी कामोत्तेजित होती है के उसे नींद भी नही आती. क्या यह संभव था कि मेरी माँ उस समय उस पल कामोत्तेजित थी? मैं जानता था अगर वो कामोत्तेजित है तो निश्चित तौर पर मेरी वेजह से है. यह विचार कि मेरी माँ मेरे कारण इतनी कामोत्तेजित है कि वो सो भी नही सकती , ने मेरे अंदर जल रही कामोत्तेजना की आग को और भड़का दिया.
“हां, हां माँ! क्यों नही! मुझे बहुत अच्छा लगेगा. मुझे खुद नींद नही आ रही!” मैने उसे कहा.
“थॅंक्स” उसे मेरे जबाब से काफ़ी खुशी महसूस हुई लगती थी. वो मेरे कंप्यूटर वाली कुर्सी पर बैठ गयी. मुझे ऐसा लगा जैसे वो कुछ परेशान सी है. वो कुर्सी को अपने कुल्हों से दाईं से बाईं और बाईं से दाईं ओर घूमती मेरे कमरे में इधर उधर देख रही थी. मैं अपने बेड पर बैठा बस उसे देख रहा था. वो मुझे नही देख रही थी.
कुछ समय बाद उसने पूछा “तुम्हे फिल्म कैसी लगी?” उसकी साँस थोड़ी सी उखड़ी हुई थी.
“अच्छी थी. मुझे बहुत मज़ा आया” मैने उसे जबाब दिया. मुझे अच्छे से याद था वो सवाल हम कुछ समय पहले ड्रॉयिंग रूम में एक दूसरे से पूछ चुके थे मगर फिर भी मैने उससे पूछा “तुम्हे कैसी लगी माँ”
जब भी वो कुछ बोलती तो उसकी साँस उखड़ी हुई महसूस होती. मेरी साथ भी अब यही समस्या थी, मगर उतनी नही जितनी उसके साथ. जब हम वहाँ खामोशी से बैठे थे तब मुझे ध्यान आया कि उसने मेरे साथ सिरफ़ और ज़्यादा समय ही नही बिताना बल्कि उसके मन में इसके इलावा और भी कुछ था. मगर तकलीफ़ इस बात की थी इस ‘और कुछ’ का कोई सुरुआती बिंदु नही था. मैं कोई ग़लत अंदाज़ा लगाने का ख़तरा उठाना नही चाहता था और वो अंदाज़ा लगाने मैं मेरी मदद करने के लिए अपनी तरफ से कोई संकेत कोई इशारा कर नही रही थी.
मैं फिर भी खुश था, वो वहाँ मेरे पास मोजूद थी और मैं उसे उस नाइटी में देख पा रहा था. उसके मम्मे वाकई में बहुत सुंदर थे. मैं उनसे अपनी नज़रें नही हटा पा रहा था. मुझे ताज्जुब था अगर उसने ध्यान भी नही था के किस तेरह मेरी नज़रें उसके बदन की तारीफ कर रही थी. उसने अपनी नज़रें फरश पर ज़माई हुई थी और अपने पाँव मोड़ कर कुर्सी के नीचे रखे हुए थे.
एक बार जब खामोशी बर्दाशत से बाहर हो गयी , वो कुर्सी से उठ खड़ी हो गयी और मेरे कमरे की दीवार पर लगे पोस्टर्स को देखने लगी और फिर वो मेरे बुक्ससेल को देखने लगी जिसमे मेरी कुछ किताबें पड़ी थीं. उसके कमरे में टहलने से उसकी ओर से कुछ हवा मेरी तरफ आई और वो हवा अपने साथ एक बहुत मनमोहक सी सुगंध लेकर आई जिसे मेरी इंद्रियों ने महसूस किया. मैने उससे उसी पल पूछा “माँ, तुमने आज नया पर्फ्यूम लगाया है?”
वो मेरी तरफ मूडी. उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी और मैं नही जानता उस मुस्कराहट का कारण क्या था. लगता था जैसे मैं बस उसके बदन पर नये पर्फ्यूम की पहचान करके ही उसे खुश कर सकता था. “हां, नया है. तुम्हे अच्छा लगा?”
उसका स्वाल स्वाभाविक ही था. “हुउँ माँ, बहुत अच्छा है” मैने उसे ज्वाब दिया.
“थॅंक्स” वो बोली. वो मेरे नज़दीक आई, जो मैं यकीन से कह सकता हूँ कि उसकी कोशिश थी कि मैं उसके पर्फ्यूम की महक अच्छे से ले सकूँ. वो मेरे बेड के साथ रखे नाट्स्टॉंड के पास आई तो नाइट्स्टॉंड के टेबल लॅंप से निकलती रोशनी से उसका जिस्म नहा उठा. तब जाकर मैने ध्यान दिया कि उसके चेहरे पर हल्का सा शृंगार लगा हुया था.
अब जाकर मुझे एहसास हुया कि वो अपने कमरे में खुद को तैयार करने के लिए गयी थी क्योंकि उसे मेरे कमरे में आना था. उसने मेरे कमरे में आने की योजना पहले से बना रखी थी और आने से पहले उसने खुद को थोड़ा सा सजाया था, सँवारा था. चेतन या अचेतन मन से, उसने कोशिश की थी कि वो अच्छी लगे, जाहिर था उसने मुझे अच्छी लगने लिए किया था. और यह विचार के उसने इस लिए शृंगार किया था कि मुझे सुंदर लग सके बहुत बहुत उत्तेजक था, कामुक था.
हमारे बीच कुछ घट रहा था. इतना मैं पूरे विश्वास से कह सकता था कि हमारे बीच कुछ खास घट रहा था. मैं उसके पर्फ्यूम की सुगंध नज़दीक से लेने के बहाने उस पर थोड़ा सा झुक सकता था और हो सकता था हमारे बीच वो “कुछ खास” होने का सुरुआती बिंदु बन जाता. मगर मुझे तब सुघा जब वो नाइट्स्टॉंड से दूर हॅट गयी. मैने एक बेहतरीन मौका गँवा दिया था जो शायद उसने मुझे खुद दिया था.
तब मैने फ़ैसला किया कि मुझे बेड से उठ जाना चाहिए और उसके थोड़ा नज़दीक होने की कोशिश करनी चाहिए, सही मैं मुझे ऐसा ही करना चाहिए था. मैं जानता था अगर मैने उसके नज़दीक जाने की कोशिश की तो कुछ ना कुछ होना तय था. मुझे एक बहाना चाहिए था उठने का और बेड से उतरने का. तब हम जिस्मानी तौर पर एक दूसरे के करीब आ जाते और कौन जानता है तब क्या होता. मैं सिरफ़ एक ही बहाना बना सकता था; बाथरूम जाने का.
जब मैं बाथरूम से बाहर आया तो देखा वो फिर से उसी कुर्सी पर बैठी हुई है और मेरे बाहर आने का इंतेज़ार कर रही है. जिस अंदाज़ में वो बैठी थी, बड़ा ही कामुक था. वो कुर्सी के किनारे पर बैठी हुई थी, उसके हाथ कुर्सी को आगे से और जाँघो के बाहर से पकड़े हुए थे, उसकी टाँगे सीधी तनी हुई थी, और उसका जिस्म थोड़ा सा आगे को झुका हुआ था. उसकी नाइटी उसके घुटनो से थोड़ा सा उपर उठी हुई थी और उसकी जाँघो का काफ़ी हिस्सा नग्न था, उसकी जांघे बहुत ही सुंदर दिख रही थी.
मुझे अपनी अलमारी तक जाने के लिए उसके पास से गुज़रना था. जब मैं उसके पास से उसके पाँव के उपर से गुज़रा तो मैने उसके पाँव एकदम से हिलते देखे जैसे उसे मेरे इतने पास से गुज़रने के कारण मेरे द्वारा कुछ करने की आशंका हो. शायद वो स्पर्श पाना चाहती थी. उस समय वो बहुत ही मादक लग रही थी और मैं उसे छूने के लिए मरा जा रहा था.
मैं बेड पर उस स्थान पर बैठा जो उसकी कुर्सी के बिल्कुल नज़दीक था. अब हम एक दूसरे के सामने बैठे थे और हमारे बीच दूरी बहुत कम थी. मेरे पाँव लगभग उसके पाँव को छू रहे थे. हम दोनो वहाँ खामोशी से बैठे थे क्योंकि हमारे पास कहने के लिए कुछ भी नही था. कहते भी तो आख़िर क्या कहते? माहौल बहुत ही प्यारनुमा था मगर हम एक दूसरे से प्यार जता नही सकते थे. मैं आगे बढ़कर उसका हाथ नही थाम सकता था. वो अपनी जगह से उठकर बेड पर मेरे साथ नही बैठ सकती थी. हमारे हिलने डुलने पर जैसे यह एक बंधन लगा हुआ था, जो हमें वहाँ इस तेरह बैठाए हुए था. हम पत्थर की मूर्तियों की तरह जड़वत थे और उम्मीद कर रहे थे कि कुछ हो और हमे इस बंधन से छुटकारा मिल जाए.
अगर कुछ हो सकता था तो वो यही था कि वो कहती;”मुझे अब चलना चाहिए”
मैं उसे जाने नही देना चाहता था और मुझे यकीन था वो भी जाना नही चाहती है. मगर कहीं पर, मन के किसी अंधेरे कोने मैं एक आवाज़ हमें हमारे उस रात्रि साथ को वहीं ख़तम कर देने के लिए बार बार आगाह का रही थी. उस महॉल मैं बहुत कुछ हो जाने की संभावना थी.
उसने सिर्फ़ इतना कहा था कि उसे अब सोने के लिए जाना चाहिए मगर उसने अपनी जगह से उठने जी कोई कोशिश ना की, वो वैसे ही बैठी थी. तब मुझे लगा कि उसने मुझे एक छोटा सा अवसर दिया है.
“मगर क्यों? तुम क्यों जाना चाहती हो माँ?” जब मेरे मुँह से वो लफ़्ज निकले तो मैं उसकी प्रतिकिरिया को लेकर डरा हुआ था
मैं डर रहा था क्योंक मुझे लग रहा था कि उसने मुझे जो मौका दिया है वो अचेतन मन से दिया है, इसलिए हो सकता है वो मेरे लफ्जो के पीछे छिपे मेरे मकसद को पढ़ ना पाए. मैं नही चाहता था कि वो जाने के लिए सामने टरक दे; कि वो थकि हुई है या उसे नींद आ रही है जा रात बहुत हो गयी गई. मैं उसे यह कहते हुए सुनना चाहता था कि वो इसलिए जाना चाहती है क्योंकि उसे डर था कि अगर वो वहाँ और ज़्यादा देर तक रुकी तो कुछ ऐसा हो सकता था जो नही होना चाहिए था.
मैं जानता था कि वो भी इस बात को महसूस कर सकती है कि हमारे बीच कुछ होने की संभावना है, इसलिए वो यह बात अपने होंठो पर ला सकती थी. असल मैं खुद मुझे कोई अंदाज़ा नही था कि अगर वो वहाँ रुकी तो क्या हो सकता था. हमारे रिश्ते की मर्यादा इतनी उँची थी कि उस समय भी, उन हालातों मैं वहाँ इस तरह उसके सामने बैठ कर मैं ज़्यादा से ज़्यादा एक मधुर चुंबन की उम्मीद कर सकता था. हालांकी मेरी पेंट में मेरा पत्थर की तरह तना हुआ लॉडा इस बात की गवाही भर रहा था कि अगर वो ज़्यादा देर वहाँ रुकती तो क्या क्या हो सकता था.
मेरा लॉडा तना हुया था! मैं कामोउन्माद में जल रहा था! और मैं कबूल करता हूँ कि मेरी इस हालत की वेजह मेरी माँ थी, मगर रोना भी इसी बात का था कि वो मेरी माँ थी.
मैं जानता था कि उसकी हालत भी कुछ कुछ मेरे जैसे ही है. हम एक दूसरे के इतने पास पास बैठे थे कि एक दूसरे के जिस्म की गर्मी को महसूस कर सकते थे. मगर इस धरती पर जीते जी यह नामुमकिन था कि हम अपनी उत्तेजना की उस हालत को एक दूसरे के समने स्वीकार कर लेते, या एक दूसरे को इस बारे में कोई इशारा कर सकते या वास्तव में हम अपनी उत्तेजना को लेकर कुछ कर सकते.
उसने मेरी बात का जवाब बहुत देर से दिया. वो अपने पैरों पर नज़र टिकाए फुसफसाई, “मुझे नही मालूम”
मुझे लगा कि अनुकूल परिस्थितियों मैं उसका जबाब एकदम सही था. उसने उन चन्द लफ़्ज़ों में बहुत कुछ कह दिया था.
“यहाँ पर हमारे सिवा और कोई नही है” मैने भी फुसफसा कर कहा. मेरी बात सीधी सी थी, मगर उन हालातों के मद्देनज़र उनके मायने बहुत गहरे थे.
“लेकिन अगर मैं रुकती भी हूँ तो हम करेंगे क्या?” उसका जबाव बहुत जल्दी और सहजता से आया मगर मुझे नही लगता था कि वास्तव में उन लफ़्ज़ों का कोई खास मतलब भी था.
मेरे पास लाखों सुझाव थे कि उसके रुकने पर हम क्या क्या कर सकते थे मगर मेरे मुँह से सिर्फ़ इतना ही निकला, “कुछ भी माँ, जो तुम्हे अच्छा लगे”
हम वहाँ कुछ देर बिना कुछ किए ऐसे ही खामोशी से बैठे रहे. शायद यही था जो हम कर सकते थे, बॅस खामोशी से बैठ सकत थे, यह सोते हुए कि वास्तव में हम क्या क्या कर सकते थे, बिना कुछ भी वैसा किए.
अंततः खामोशी असहाय हो गई. वो और ज़्यादा देर स्थिर नही बैठ सकती थी. वो एकदम से उठकर खड़ी हो गयी.
मैं उसके उस तरह एकदम से उठ जाने से डर सा गया. मैं भी उसके साथ उठ कर खड़ा हो गया, इसके फलस्वरूप अब हम एक दूसरे के सामने खड़े थे.
हम एक दूसरे के बेहद पास पास खड़े थे. हम एक दूसरे के सामने रात के गेहन सन्नाटे में चेहरे के सामने चेहरा किए खड़े थे.
उसने पहला कदम उठाया, शायद वो इसके लिए वो मुझसे ज़यादा तय्यार थी.
वो आगे बढ़ी और उसने मुझे आलिंगन में ले लिया. मुझे इसकी कतयि उम्मीद नही थी;इसलिए मैं उसके आलिंगन के लिए तैयार भी नही था.
उसने अपनी बाहें मेरी कमर के गिर्द लप्पेट दी और तेज़ी से मुझे अपने आलिंगन में कस लिया. मैने प्रतिक्रिया में ऐसा कुछ भी नही किया जिसकी उसने उम्मीद की होगी. मैने बहुत ही बेढंग और अनुउपयुक्त तरीके से उसे अपने आलिंगन में लेने की कोशिश की मगर इससे पहले कि मैं उसे अपने आलिंगन में ले पाता , उसने तेज़ी से मुझे छोड़ दिया और उतनी ही तेज़ी से वो वहाँ से निकल गयी.
उसने अपने अंदर जो भावनाओं का आवेश दबाया हुया था मैं उसे महसूस कर सकता था. मुझे उम्मीद थी उसने भी मेरे अंदर के उस आवेश को महसूस किया होगा. अगर इशारों की बात की जाए तो हम दोनो पूरी तेरह से तैयार थे मगर हमारे कुछ करने पर मर्यादा का परम प्रतिबंध लगा हुया था. हम सिर्फ़ वोही कर सकते थे जो हमारे रिश्ते में स्वीकार्या था; पहले के हालातों के मद्देनज़र एक चुंबन; अब के हालातों अनुसार एक आलिंगन.
यह सिर्फ़ एक आलिंगन था, और कुछ भी नही मगर उसके मम्मे मेरे सीने पर दो नरम, मुलायम गर्माहट लिए जलते हुए निशान छोड़ गये थे. उसके जाने के बहुत देर बाद तक भी मैं उस आलोकिक आनंद में डूबता इतराता रहा.
यह पूरी तेरह से स्थापित हो चुका था कि कुछ ना कुछ घट रहा था और यह सॉफ था कि हम दोनो उस ‘कुछ ना कुछ’ मैं हिस्सा ले रहे थे. मगर समस्या यह थी कि हम ज़्यादा से ज़्यादा एक दूसरे के गीले होंठो को चूम सकते थे या होंठो से होंठो पर हल्का सा दबाब डाल सकते थे या आलिंगंबद्ध हो सकते थे. मैं उसकी पीठ को अपने हाथो से सहला नही सकता था जैसा मैं करना चाहता था. मैं उसके होंठो में होंठ डाल उसे खुले दिल से चूम नही सकता था. मैं उसके मम्मो को इच्छानुसार छू नही सकता था. मेरे हाथ उसके मम्मो को छूने के लिए तरसते थे मगर मैं ऐसा नही कर सकता था.
मैं सोच रहा था कि मेरी तरह उसके भी अरमान होंगे. जिस तरह मैं उसे छूने के लिए तरसता था क्या वो भी एसी इच्छाएँ पाले बैठी थी. अब तक जो कुछ हमारे बीच हुआ हुआ था उस हिसाब से तो उसके भी मेरे जैसे कुछ अरमान होंगे. मगर मुझसे ज़यादा शायद वो खुद के अरमानो को काबू किए हुए थी. आख़िरकार मैं एक मर्द था, और एक मर्द होने के नाते, मेरे लिए अपनी सग़ी माँ के लिए कामनीय भावनाएँ रखना कोई बहुत बड़ी बात नही थी. मगर एक माँ होने के नाते, उसके लिए अपने बेटे के लिए एसी भावनाएँ रखना बहुत ग़लत बात थी. मगर इसमे, कोई शक नही था कि हमारे बीच वो कामनीय भावनाएँ मोजूद थी
मैने फ़ैसला कर लिया था की अब मैं सीधे सीधे हमारे बीच जिस्मानी संपर्क बढ़ाने की कोशिश करूँगा.
उस रात ने हमारे रिश्ते में और भी घणिष्टता ला दी थी. हमारी अगली रात सबसे बढ़िया रही. हम एक दूसरे से काफ़ी सहजता से बात कर रहे थे, बल्कि बीच बीच में एक दूसरे को छेड़ भी रहे थे. ऐसा लगता था जैसे हमारे रिश्ते ने नयी उँचाई को छू लिया था मगर इस सब के बावजूद थोड़ी दूरी थी जो शायद हमे अपने बीच बनाई रखनी ज़रूरी थी.
अगली रात जब उसने कहा कि उसे जाना चाहिए तो मैं भी उसके साथ जाने के लिए उठ खड़ा हुआ. मुझे उसके बाद वहाँ अकेले बैठने का मन नही था. यह हमर नयी दिनचर्या बन चुकी थी और मैं इसका ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाना चाहता था.
हमने बत्तियाँ बंद की, दरवाज़ों को बंद किया और कॉरिडोर की ओर बढ़ गये. जब हम मेरे रूम के सामने पहुँच गये तो मैं उसे ‘गुडनाइट’ कहने के लिए रुक गया.
जब उसने देखा कि मैं कॉरिडोर के बीचो बीच रुक गया हूँ, उसने कॉरिडोर के दूसरे सिरे की ओर देखा जहाँ से कॉरिडोर उसके बेडरूम की साइड को मूड़ जाता था. मैं समझ गया कि वो यही देखने की कोशिश कर रही थी कि वहाँ कोई है तो नही, जिसका सीधा मतलब था कि वो यकीन बनाना चाहती थी कि कहीं मेरे पिताजी तो वहाँ से हमे नही देख रहे थे. उसने मुझे दरवाजे की ओर धकेला. जाहिर था वो कॉरिडोर में ‘गुडनाइट’ नही कहना चाहती थी.
ये अपने आप में बहुत रोमांचकारी था. कॉरिडोर में किसी द्वारा देखे जाने से बचने के लिए उसे मेरी ओर झुकना था. ऐसा करते वक़्त उसे ना चाहते हुए भी अपना जिस्म मेरे जिस्म पर धीरे से दबाना पड़ा. मैं उसे अपनी बाहों में लेना चाहता था मगर मैं ऐसा कर ना सका. मैं उससे उस तरह आलिंगंबद्ध नही हो सकता था. उसने अपना जिस्म उपर को उठाया ताकि उसके होंठ मेरे होंठो तक पहुँच सके, जिससे असावधानी में उसने अपने मम्मे मेरी छाती पर रगडे और फिर मुझे एक चुंबन दिया.
वो एक नाम चुंबन था. हम दोनो ने अपने होंठ गीले किए हुए थे बिना इस बात की परवाह किए के दूसरा इस पर एतराज जाता सकता है. चुंबन में थोड़ा सा दबाब भी था. हमारी दिनचर्या अब एक सादे शुभरात्रि चुंबन की जगह एक आलिंगंबद्ध शुभरात्रि चुंबन में बदल चुकी थी. हमारा चुंबन अब सूखे होंठो का नाममात्र का स्पर्श ना रहकर अब नम लबों का मिलन था जिसमे होंठो का होंठो पर हल्का सा दबाब भी होता था. उसके मम्मे मेरी छाती पर बहुत सुंदर सा एहसास छोड़ गये थे और पकड़े जाने की संभावना का रोमांच अलग से था. हम कुछ ऐसा कर रहे थे जो हमे नही करना चाहिए था और वैसा करते हम आराम से पकड़े भी जा सकते थे. यह बहुत ही रोमांचपुराण था, एक से बढ़कर कयि मायनों में. यह बात कि वो पकड़े जाने से बचने की कोशिश कर रही थी, उसके इस षडयंत्र में शामिल होने की खुलेआम गवाही दे रही थी. यह एक तरफ़ा नही था.
यह बात कि वो मुझसे चिप कर गोपनीयता से चूमना और आलिंगन करना चाहती थी, यह साबित करती थी कि उसकी समझ अनुसार हमारा वैसा करना शरमनाक था. और इस बात के बावजूद, कि हमारा वो वार्ताव उसकी नज़र में शरमनाक था, वो फिर भी मुझे चूमना चाहती थी, मुझे आलिंगन करना चाहती थी, साबित करता था कि वो कुछ ऐसा कर रही थी जो उसे नही करना चाहिए था मतलब वो कुछ ऐसा ऐसा कर रही थी जो एक माँ होने के नाते उसे नही करना चाहिए था मगर वो, वो सब करने की दिली ख्वाइशमंद थी.
मैं कामोत्तेजित था! मेरे अंदाज़े से वो भी पूरी कामोत्तेजित थी. मुझे उसके बदन का मेरे बदन से स्पर्श बहुत आनंदमयी लग रहा था. मगर, यहीं हमारे लिए एक बहुत बड़ी समस्या थी, वो हमारी हद थी, हम उसके आगे नही बढ़ सकते थे. मैं आगे बढ़कर उसके जिस्म को अपनी हसरत अनुसार छू नही सकता था. वो अपनी हसरत मुझ पर जाहिर नही कर सकती थी. हालाँकि सभी संकेत एक खास दिशा में इशारा कर रहे थे, मगर हमे ऐसे दिखावा करना था कि वो दिशा है ही नही.
वो वहाँ मेरे सामने क्षण भर के लिए रुकी थी, जैसे कुछ सोच रही थी. फिर उसने मेरे हाथ अपने हाथों में लिए और उन्हे धीरे से दबाया और फिर वो वहाँ से चली गयी. मैं वहाँ खड़ा रहा और उसे कॉरिडोर के कोने से अपने रूम की तरफ मुड़ते देखता रहा. मैने उसकी भावनाओं की प्रबलता महसूस की थी. मुझे बुरा लग रहा था कि मैं उसे अपने भावावेश की परचंडता नही दिखा सका. मैं उससे कहीं ज़्यादा खुद पर काबू किए हुए था.
हमारे बीच कोई चक्कर चल रहा है, बिना शक फिर से यह बात उभर कर सामने आ गयी थी. उसका मेरे हाथो को थामना और उन्हे दबाना बहुत ही कामुक था. मैं कामना कर रहा था कि काश मैने उसे आज किसी अलग प्रकार से चूमा होता. मगर अब तो वो जा चुकी थी, सो मेरी कामना कामना ही रही. मैं बहुत ही उत्तेजित था. मैने खुद से वायदा किया कि अगली बार मैं सब कुछ बेहतर तरीके से करने की कोशिश करूँगा.
अगली रात, मैं टीवी देखने ड्रॉयिंग रूम में नही गया. मैं देखना चाहता था कि वो मुझे देखने आती है जा नही. मैं देखना चाहता था कि क्या वो हमारे बीच किसी और जिस्मानी संपर्क के लिए आती है जैसे वो उस रात आई थी. मैने दरवाजा थोड़ा सा खुला छोड़ दिया, एक संकेत के तौर पर कि मैं उसके आने की उम्मीद कर रहा हूँ.
मैने ड्रॉयिंग रूम से टीवी की आवाज़ सुनी और बहुत निराश हुआ, बल्कि बहुत हताश भी हो गया. हो सकता है वो मेरे वहाँ आने की उम्मीद लगाए बैठी हो. मगर मैं उसका मेरे कमरे में आने का इंतजार कर रहा था. मुझे ऐसी हसरत करने के लिए बहुत बुरा महसूस हुआ, मगर वो हसरत पूरी ना होने पर और भी बुरा महसूस हुआ. ऐसा नही हो सकता था. अभी रात होने की शुरुआत हुई थी, इतनी जल्दी उसका मेरे कमरे में आना और वो सब होना जिसकी मैं आस लगाए बैठा था बहुत मुश्किल था.
मुझे बहुत जल्द एहसास हो गया कि मैं बहुत ज़्यादा उम्मीदे लगाए बैठा हूँ. यह इतना भी आसान नही था. वो सिर्फ़ एक औरत नही थी जिसके साथ मैं इतनी ज़िद्द पकड़े बैठा था, वो मेरी माँ थी. वो सीधे सीधे वो सब नही कर सकती थी, वो उन आम तरीकों से मुझसे पेश नही आ सकती थी, एक माँ होने के नाते मेरे साथ उसका व्यवहार वो आमतौर पर वाला नही हो सकता था जो मेरे और किसी पार्री नारी के बीच संभव होता. उसने खुद को थोड़ी ढील ज़रूर दी थी मगर वो किसी भी सूरत मैं इसके आगे नही बढ़ सकती थी.
मुझे शांत होने मैं थोड़ा वक़्त लगा, मगर जब मैं एक बार शांत हो गया तो मैं ड्रॉयिंग रूम में चला गया.
“तुम ठीक तो हो ना” उसने चिंतत स्वर में पूछा.
वो मेरी और जिग्यासापूर्वक देख रही थी, मेरा चेहरा मेरे हाव भाव पढ़ने की कोशिश कर रही थी. मगर अब मैं अपने जज़्बातों पर काबू पा चुका था, और अब सब सही था, अब सब सामने था, जैसे होना चाहिए था.
यह पानी की तरह सॉफ था कि मैं अपनी माँ को पाना चाहता था, उसे पाने के लिए तड़प रहा था. यह भी सॉफ था कि मैं एक ख़तरनाक खेल खेल रहा था. जिस चीज़ को मैं हासिल करने पर तुला हुआ था वो मेरी हो ही नही सकती थी. वो किसी भी कीमत पर मेरी नही हो सकती थी. और इस से भी दिलचस्प बात यह थी कि मैं चाहता था कि माँ भी मुझे उसी तरह चाहे जिस तरह मैं उसे चाहता था! मैं चाहता था उसके अंदर भी मेरे लिए वैसे ही जज़्बात हों जैसे उसके लिए मेरे अंदर थे जो शायद उसके अंदर नही थे. असलियत में वो जज़्बात उसके अंदर थे, मुझे पूरा यकीन था वो थे मगर वो उन्हे जाहिर नही कर सकती थी. यह हमारी दूबिधा थी, कशमकश थी. हमारे अंदर एक दूसरे के लिए जज़्बात थे मगर हम उन्हे एक दूसरे पर जाहिर नही कर सकते थे.
मैं जानना चाहता था कि उसके दिमाग़ में क्या चल रहा था. मैं जानना चाहता था कि वो क्या सोच रही है. मुझे पूरा आभास था मगर अंततः यह सारी अटकलबाज़ी थी. मैं सब कुछ पूरी तरह सॉफ सॉफ जानना चाहता था. उससे जानने का कोई रास्ता नही था, इस लिए हम दोनो चुपचाप टीवी देखने लगे, हमेशा की तरह. मुझे जिग्यासा हो रही थी कि शायद वो मुझसे किसी इशारे या संकेत की उम्मीद कर रही होगी. मगर फिर यह भी एक अंदाज़ा ही था, कुछ भी स्पष्ट नही था.
मैं इस बार भी उसके साथ ही ड्रॉयिंग रूम से निकला. हम मेरे रूम के आगे खड़े थे और इस बार मैं मेरे कमरे के दरवाजे की ओर बढ़ा ताकि उसे पिछली बार की तरह मुझे धकेलना ना पड़े. जब वो मेरी ओर बढ़ी और मेरे नज़दीक आई तो मेरा बदन तनाव से कसने लगा.मैं नही जानता था मैं क्या चाहता हूँ क्योंकि मुझे मालूम नही था मैं क्या पा सकता हूँ. मगर एक बात मैं पूरे विश्वास से जानता था कि मैं पहले की तुलना में ज़्यादा पाना चाहता था. मैं बुरी तरह से उत्तेजित था और मेरा लंड पत्थर के समान कठोर हो चुका था.
मैने ध्यान दिया वो आज वोही वाला पर्फ्यूम लगाए हुए है जिसकी मैने उस दिन हमारे कमरे में तारीफ की थी. आज मैं इसे अच्छे से सूंघ सकता था क्योंकि वो उस रात के मुक़ाबले आज बिल्कुल मेरे पास खड़ी थी और वो महक मेरे अंदर कमौन्माद की जल रही ज्वाला को हवा देकर और भड़का रही थी.
“माँ तुम्हारे बदन से कितनी प्यारी सुगंध आ रही है” मैं धीरे से फुसफसाया और अपने होंठ अच्छे से गीले कर लिए. होंठ गीले करना अब हमारे लिए आम बात थी, या मैं कह सकता हूँ कि हम उससे काफ़ी आगे बढ़ चुके थे. होंठो की नमी सुभरात्रि के चुंबन को और भी बेहतर बना देती थी, और क्योंकि इस पर अब तक माँ ने कोई एतराज़ नही जताया था, इसलिए मैने इसे हमारी दिनचर्या का अनिवार्या हिस्सा बना लिया था. मैने हमारे आलिंगन को और भी आत्मीय बनाने का फ़ैसला कर लिया था. यह माँ थी जिसने आलिंगन की सुरुआत की थी इसलिए मुझे लगा कि उसे थोड़ा सा और ठोस बनाने में कोई हर्ज नही है.
उसे अपनी बाहों मे लेते ही उसके मम्मे मेरी छाती से सट गये और मेरे पूरे जिस्म में सनसननाट दौड़ गयी. मुझे डर था वो पीछे हट जाएगी मगर वो नही हटी. मुझे एहसास हुआ कि उसके होंठ भी पूरे नम थे इसलिए मेरा उपर वाला होंठ उसके होंठो में फिसल गया और उसका निचला होंठ मेरे होंठो में फिसल गया. मैने उसे अपनी बाहों में थामे हुए उसके होंठो पर हल्का सा दबाब बढ़ाया. उसके बदन ने एक हल्का सा झटका खाया मगर उसने मुझे हटाया नही और खुद भी पीछे नही हटी. जब उसके बदन ने झटका खाया और उसका जिस्म थोड़ा सा हिला डुला तो मैने भी उसके हिलने डुलने के हिसाब से खुद को व्यवस्थित किया. जब हम फिर से स्थिर हुए तो मैने पाया मेरा लंड उसके जिस्म में चुभ रहा था.
हम जल्द ही जुदा हो गये और वो अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी. मैं नही जानता था कि मेरा खड़ा लंड उसके जिस्म के किस हिस्से पे चुभा था मगर मैं इतना ज़रूर जानता था कि हमारे जिस्मो के बीच उस खास संपर्क को हम दोनो ने बखूबी महसूस किया था. उस चुभन को महसूस करने के बाद उसके मन मे कोई शक बाकी ना रहा होगा कि मैं उत्तेजित था, कि मैं उसकी वजह से उत्तेजित था, कि मैं उसके द्वारा लगाई कमौन्माद की आग में जल रहा था.
मैने अपने जज़्बात उस पर जानबूझकर जाहिर नही किए थे, यह बस अपने आप हो गया था. यह एक संयोग था. मगर मेरा लंड बहुत कठोर था, बहुत ज़्यादा कठोर और उसका इस ओर ध्यान जाना लाज़िम था.
उसके जाने के बाद मैं समझ नही पा रहा था कि मुझे किस तरह महसूस करना चाहिए. क्या मुझे इस बात से डरना चाहिए कि वो हमेशा हमेशा के लिए हमारे बीच दीवार खड़ी कर देगी और हमारे उस देर रातों के साथ का अंत हो जाएगा? क्या मुझे निराश होना चाहिए था कि मेरे आकड़े लंड को महसूस करने के बाद भी उसने कोई प्रतिकिरिया नही दी थी? या मुझे खुश होना चाहिए कि मेरे जज़्बात उसके सामने उजागर हो गये थे चाहे वो एक संयोग ही था.
अगर मैं कुछ कर सकता था तो वो था आने वाले अगले दिन का इंतेज़ार. मगर अगली रात वो मेरे साथ टीवी देखने के लिए ड्रॉयिंग रूम में नही आई.
मैं उसका इंतेज़ार पे इंतेज़ार करता रहा, वो अब आई कि अब आई, मगर वो नही आई. मैं उसे देखने उसके कमरे में नही जा सकता था क्योंकि वहाँ मेरे पिताजी सोए हुए थे. मुझे लगा उसने फ़ैसला कर लिया था कि अब हमारे उस आनंदमयी, कमौन्माद से लबरेज ख्वाब का अंत करने का समय आ गया है, बल्कि मेरे उस सुंदर, कामुक ख्वाब का अंत करने का समय आ गया है. सभी संकेत सॉफ सॉफ बता रहे थे कि हमारे बीच क्या चल रहा था, मगर जब मेरे लंड की चुबन उसे महसूस हुई होगी तो उसे खुद ब खुद एहसास हुआ होगा कि मेरी तमन्ना क्या थी, मेरी अभिलाषा क्या थी और मैं किस चीज़ की कामना कर रहा था और यह एहसास होते ही उसने सब कुछ बंद कर देने का फ़ैसला किया था. मैं बहुत उदास हो गया और मुझे बहुत हताशा भी हुई. मैने जानबूझकर अपना लंड उसके बदन पर नही दबाया था, वो असावधानी में हो गया था मगर अब मुझे इसकी कीमत तो चुकानी ही थी.
दूसरी रात को माँ टीवी देखने आई ज़रूर मगर वो ज़्यादा देर वहाँ ना रुकी. मुझे मौका ना मिला कि मैं उससे पूछ सकता कि वो पिछली रात क्यों नही आई, या कि सब कुछ ठीक था, या फिर क्या मैने कुछ ग़लत किया था? वो इत्तेफ़ाक़न हो गया था मगर अब उसे ज़रूर हमारे उस खेल की भयावहता का एहसास हो गया होगा. जब वो गयी तो उसने मुझे चूमा नही था. उसने सिर्फ़ जुवानी ‘गुडनाइट’ कहा था.
वो मुझे बहुत स्पष्टता से इस बात के संकेत दे रही थी कि हमारे बीच वो सब कुछ ख़तम हो चुका था जिसकी हम ने शुरुआत की थी. उसने ज़रूर महसूस किया होगा कि हम हद से आगे बढ़ते जा रहे थे और इसलिए उसे इस ख़तम कर देना चाहिए था इससे पहले कि बात हाथ से निकल जाती जिसकी योजना मैं पहले ही बना चुका था. उसका दृष्टिकोण बिल्कुल सही था इसीलिए उसने सब कुछ वहीं का वहीं ख़तम कर देना उचित समझा था.
मैं बहुत ब्याकुल था, बहुत अशांत था. मुझे एक गेहन उदासी की अनुभूति हो रही थी जो हमारे आसपास और हमारे बीच छाई हुई थी. ऐसा लगता था जैसे हमारे बीच कोई रिश्ता बनने से पहले ही टूट गया था. जो कुछ हुआ था उसकी हम आपस में चर्चा तक नही कर सकते थे क्योंकि वास्तव में कुछ हुआ ही नही था.
हमारे बीच जो कुछ था उसके खो जाने के बाद मुझे उसकी बहुत याद आ रही थी. मगर वो जो कुछ भी कर रही थी मैने उसे कबूल कर लिया था. मुझे एहसास हो गया था वो खुद किन हालातों से गुज़र रही है. अगर मैं अपनी प्रतिक्रिया को देखता और मेरी तकलीफ़ जैसे अपनी माँ की तकलीफ़ को भी समझता तो मुझे उसके लिए भी बहुत दुख महसूस हो रहा था.
अब ना तो वो नाम शुभरात्रि चुंबन थे और ना ही वो सुखद एहसास करने वाले आलिंगन. उस रात के बाद भी आने वाली रातों को वो मेरे साथ टीवी देखने को आती मगर अच्छी रात गुज़रने की उसकी शुभकामना हमेशा जुवानी होती.
जब अगली बार मेरे पिताजी शहर से बाहर गये, तो मुझे नही मालूम था अगर हम पहले की ही भाँति कोई फिल्म देखेंगे और देर रात तक इकट्ठे समय ब्यतीत करेंगे. मुझे उम्मीद थी कि हम पहले की ही तरह समय बिताएँगे मगर मैने खुद को बदले हालातों के अनुसार छोटे से रात्रि मिलन के साथ के लिए तैयार रखा.
वाकाई में हमारे पिताजी के जाने के बाद उस रात हमारा साथ थोड़े समय के लिए ही था मगर ये मेन था जिसने हमारे उस रात्रि के साथ को छोटा कर दिया था. मैने वहाँ से जल्दी उठने और अपने कमरे में जाने का फ़ैसला कर लिया. मैं हमारे बीच की उस दूरी को बर्दाश्त नही कर सकता था और वैसे भी फिल्म देखने का मेरा बिल्कुल भी मन नही था क्योंकि पहले जैसा कुछ भी नही था या कम से कम जैसा मैं चाहता था वैसा कुछ भी नही था. मैने उसे गुडनाइट बोला और उस अकेले टीवी देखने के लिए छोड़ वहाँ से चल गया.
उसे ज़रूर मालूम था कि मैं परेशान था. उसने महसूस किया होगा कि मैं खुश नही था.
मैं अपने कमरे में गया और दरवाजा बंद कर दिया. अपने बेड पर लेटा मैं करवटें बदल रहा था.
मेरा दिल जोरों से धड़क उठा जब उस रात कुछ समय बाद मैने अपने दरवाजे पर दस्तक सुनी.
अपने दरवाजे पर उस रात थोड़ी देर बाद दस्तक सुन मेरा दिल ज़ोरों से धड़क उठा. मैं लगभग भाग कर दरवाजा खोलने गया. वो मेरे सामने वोही उस रात वाली नाइटी पहने वोही पर्फ्यूम लगाए महकती हुई खड़ी थी, उसने हल्का सा शृंगार किया हुआ था और बहुत ही प्यारी लग रही थी.
उसने अपना हाथ आगे मेरी ओर बढ़ाया और कहा, “आओ बेटा टीवी देखते हैं. इतनी भी क्या जल्दी सोने की!”
मैने अपना हाथ उसके हाथ में दिया और वो मेरा हाथ थामे मुझे वापिस ड्रॉयिंग रूम में ले गयी. मैं इस अचानक बदलाव से अत्यधिक खुश था, हालाँकि मैं नही जानता था इस सबका मतलब क्या है या वो चाहती क्या है. हम उसी सोफे पर बैठ टीवी पर कुछ देखने लगे. मुझे याद नही हम देख क्या रहे थे. मैं अपने विचारों में खोया हुआ हालातों में आए अचानक बदलाव के बारे में सोच रहा था.
हम कुछ देर तक वहाँ बैठे रहे मगर जल्द ही हम ने फ़ैसला किया कि अब सोना चाहिए. हम दोनो एक साथ उठ खड़े हुए, ड्रॉयिंगरूम और रसोई की सभी बत्तियाँ बंद की और कॉरिडोर की ओर चल पड़े जहाँ मेरा कमरा था और जहाँ जायदातर हम एक दूसरे को सुभरात्रि की सूभकामना करते थे. मेरा दिल दुगनी रफ़्तार से धड़क रहा था और मेरा दिमाग़ हसरत पे हसरत किए जा रहा था.
मैने अपने जज़्बातों को दम घुटने की हद तक दबा कर रखा हुआ था. नाम होंठो के सुभरात्रि चुंबन या आलिंगन के दोहराने को लेकर मैं पूरी तेरह से आश्वस्त नही था. मुझे अपनी भावनाओ को इस हद्द तक दबाना पड़ रहा था कि मैं बेसूध सा होता जा रहा था.
मगर जैसा सामने आया वो खुद अपनी भावनाओ को दबाए हुए थी, एक बार जब हम मेरे कमरे के दरवाजे पर पहुँचे तो वो मेरी ओर बढ़ी. उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन में डालने के लिए उपर उठाई. मैने अपनी बाहें उसकी कमर पर लपेट दीं और उसे अपनी ओर खींच कर पूर्ण आलिंगन में ले लिया. हमारी गर्दने आपस में सटी हुई थी, हमारी छातियाँ पूरे संपर्क में थी और मेरी बाहें उसे थोड़े ज़ोर से अपने आलिंगन में लिए हुए थी. मैं उसे कस कर अपने से चिपटाये हुए था. उसने ज़रूर मेरे आलिंगन में मेरी नाराज़गी महसूस की होगी.
जब हम इतनी ज़ोर से आलिंगंबद्ध हो गये थे तो कुदतरन हमारे होंठो का मिलना भी लाज़मी था. मैने अपनी जीभ अपने होंठो पर रगड़ उन्हे अच्छे से गीला कर लिया. जैसे ही मैने अपना सर पीछे को खींचा ताकि हमारे चेहरे आमने सामने हों, उसका मुख मेरी ओर आया और मेरा मुख उसकी ओर बढ़ गया. मैने अपनी भावनाएँ बहुत दबा कर रखी थी मगर अब उन्हे उभरने का मौका दे दिया था. मैने अपने होंठ माँ के होंठो पर रखे और उन्हे थोड़ा सा खोल कर उसके निचले होंठ को अपने होंठो में ले लिया.
मैं नही जानता कैसे मैं उस अदुभूत एहसास को लफ़्ज़ों में बयान करू, वो एहसास जब मेरी माँ ने मेरा उपर का होंठ अपने होंठो में ले लिया और मुझे हल्के से चूमा. उसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों की तरह नाज़ुक थे. मैने उन्हे पहले ऐसे नही महसूस किया था. फिर उसने अपना मुख नीचे को किया और मेरा निचला होंठ अपने होंठो में लेकर मुझे फिर से चूमा. उसके होंठ मेरे होंठो पर फिसलने लगे, वो अपने पीछे मीठे मुखरास की लकीर सी छोड़ते जाते क्योंकि मेरे होंठ उसके दाँतों को स्पर्श कर रहे थे. मैने उसका उपर का होंठ अपने होंठो में भर लिया और उस पर अपने होंठ घूमाते हुए उसे धीरे धीरे चूसने लगा., उसके होंठ को अपने मुख में सहलाने लगा.
चुंबन इतना लंबा था कि हम एक दूसरे की मिठास को अच्छे से चख सकते थे. हमारे जिसम खुद ब खुद और ज़ोर से एक दूसरे से सट गये थे. मैने अपना आकड़ा लंड उसके जिस्म पर दबाया, और इस बार मैने यह जानबूझकर किया था; वो पीछे ना हटी. मगर उसने अपना जिसम भी मेरे लंड पर प्रतिकिरिया में नही दबाया बहरहाल कम से कम वो पीछे तो नही हटी थी.
मगर चुंबन को ख़तम तो होना ही था, जब हम अपनी भावनाएँ खुल कर एक दूसरे से बयान कर चुके थे. उसने अपना सर मेरी छाती पर टिका दिया और मैं उसे नर्मी से बाहों में थामे खड़ा रहा. एक लंबी खामोशी छा गयी थी और हम दोनो एक दूसरे को थामे खड़े थे.
उस खामोशी को माँ ने तोड़ा. “ये मैं क्या कर रही हूँ?” वो फुसफसाई. वो एक ऐसा सवाल था जो वो मुझसे ज़यादा खुद से कर रही थी इसलिए मैने कोई जबाब नही दिया. असल मैं मेरे पास उस सवाल का कोई जबाब था ही नही. फिर से खामोशी छा गयी और फिर वो अलग हो गयी. हम एक दूसरे के सामने खड़े थे और हमारे बीच दूरी बहुत कम थी. उसने अपने हाथ उपर किए और अपने बाल सँवारने लगी. मैं उसे अपने बाल सँवारते देख रहा था साथ ही मेरा ध्यान उसके मम्मो पर था जो बाहें उपर होने के कारण आगे को उभर आए थे. वो इतनी कामुक लग रही थी कि मैं आगे बढ़कर उसे फिरसे अपनी बाहों में भर लेना चाहता था. मगर मुझे किसी अंजान शक्ति ने रोक लिया, एसी शक्ति जिसको शायद मैं कभी स्पष्ट ना कर सकूँ.
उसने अपने बाल सही किए और फिर उसने अपनी निगाहें सही की. फिर उसने मेरा चेहरा अपने दोनो हाथों में थामा और धीमे से मेरे होंठो पर चूमा. उसने उस चुंबन को कुछ देर तक खींचा और फिर मुझे “गॉडगिफ्ट” कहा. और फिर एकदम से वो वहाँ से चली गयी.
वो वहाँ से एकदम से हड़बड़ा कर चली गयी!
अंततः हम एक दूसरे को खुल कर जता चुके थे, बता चुके थे कि हम एक दूसरे से क्या चाहते हैं. और उसी समय वो सवाल कर उसने यह भी जता दिया था कि हमारा ऐसा करना ग़लत था. उसका इस तरह अचानक चले जाना इस बात का संकेत था ये कितना ग़लत था. हमारी उस गहरी आत्मीयता के साथ साथ आतांग्लानि की भावना भी मोजूद थी और आतांग्लानि की उस भावना की तीव्रता इतनी थी कि उसे वहाँ से लगभग भागना पड़ा था.
हमारे पछतावे से बचने का एक ही तरीका था कि हम ऐसे दिखावा करते जैसे कुछ हुआ ही नही था जैसे हम हमेशा पहले करते आए थे जब हमे वो आतांग्लानि की भावना घेर लेट लेती और मैं और माँ दिखावा करते कि कुछ भी ग़लत घटित नही हुआ है. मगर इस बार कुछ ऐसा हुआ था जिसे हम अनदेखा नही कर सकते थे. मेरे पिताजी अभी भी शहर से बाहर रहने वाले थे. हमारे पास एक और रात थी. मैं जानता था यह समय था कि हम उस सवाल का सामना करते जा फिर सब कुछ बंद कर देते. यह संभव नही था कि हम उसी तरह अधर में लटके रहते. हमें फ़ैसला लेना था कि हम हमारे रिश्ते से क्या चाहते हैं.
मगर कैसे? कैसे मैं उसे अपना दिल खोलने को कहता? क्या मैं उसके पास जाता और उससे पूछता कि मेरे द्वारा लंड दबाने पर वो इस तरह भाग क्यों रही है? वो विचार ही बेहूदा था. मैं उसे किसी भी प्रकार हमारे उस रिश्ते को लेकर उसे अपनी मंशा जाहिर करने के लिए नही कह सकता था. मैं सिर्फ़ छिप सकता था.
वहाँ कुछ देर खड़ा रहने के पश्चात मैं अपने कमरे में चला गया. मैने बत्ती बंद की और चादर लेकर बेड पर सोने की कोशिश मैं करवटें बदलने लगा. मेरी आँखो मैं नींद का कोई नामोनिशान नही था मगर मैं जागना भी नही चाहता था.
उस वक़्त रात काफ़ी गुज़र चुकी होगी जब मैने दरवाजे पर हल्की सी दस्तक सुनी. पहले पहल तो मैने ध्यान नही दिया, मुझे लगा मेरा वहम था मगर तीसरी बार दस्तक होने पर मुझे जबाब देना पड़ा. मुझे नही मालूम था अगर मुझे कमरे में अंधेरा ही रहने देना चाहिए या बेड के साथ लगे साइड लंप को जला देना चाहिए. मैं उठ गया और उसे बोला, “हां माँ, आ जाओ”
उसने धीरे से दरवाजा खोला और धीरे से फुसफसाई ” अभी तक जाग रहे हो?”
“हां माँ, मैं जाग रहा हूँ. अंदर आ जाओ” मुझे लगा उन हालातों में लाइट्स बंद रखना मुनासिब नही था. इसीलिए मैने बेड की साइड स्टॅंड की लाइट जला दी.
वो एक गाउन पहने थी जो उसे सर से पाँव तक ढके हुए था—ऐसा उसने आज पहली बार किया था. मैं चाह कर भी खुद को वश में ना रख सका और गाउन का बारीकी से मुयाना करने लगा मगर मेरे हाथ निराशा लगी. उसने जानबूझ कर वो गाउन पहना था जिसने उसका पूरा बदन ढक दिया था और मुझे उसके चेहरे के सिवा कुछ भी नज़र नही आ रहा था. मैं आश्चर्याचकित था कि आख़िर उसको ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी. शायद मेरे लिए उसमे एक गेहन इशारा, एक ज़ोरदार संदेश छिपा हुया था.
उसने मेरी कंप्यूटर वाली कुर्सी ली और उस पर थोड़े वक़्त के लिए बैठ गयी. उसकी नज़रें उसके पाँवो पर जमी हुई थी, वो उन अल्फाज़ों को ढूँढने का प्रयास कर रही थी जिनसे वो अपनी बात की शुरूआर् कर सकती. मैं चुपचाप उसे देखे जा रहा था, इस विचार से ख़ौफज़दा कि वो मुझे यही बताने आई थी कि हमें सब कुछ बंद करना पड़ेगा.
वो खामोशी आसेहनीय थी.
अंततः, बहुत लंबे समय बाद, उसने खांस कर अपना गला सॉफ किया और बोली: “क्या तुम मुझसे नाराज़ हो?”
मैं, असल में उसके सवाल से थोड़ा हैरत में पड़ गया था और मैने उसे जल्दी से जबाव दिया कि मैं उससे नाराज़ नही था. मगर जवाब देने से पहले मैं सोचने के लिए एक पल रुका. मैं असमंजस में था कि वो यह क्यों सोच रही है कि मैं उससे नाराज़ हूँ जबके मैं इस सारे घटनाक्रम के समय यही सोच सोच कर परेशान था कि वो मुझसे नाराज़ होगी. आख़िरकार वो मेरा लंड था जो उसके जिस्म पर चुभा था, जिसने मेरी उन कामुक भावनाओ को उजागर कर दिया था जो उसके लिए मेरे मन में थी. और इस पर भी वो मुझसे पूछ रही थी कि कहीं मैं उससे नाराज़ तो नही था जैसे उसने मेरे साथ कुछ बुरा कुछ ग़लत किया था.
आख़िरकार मैं बोला : “नाराज़? नही माँ मैं तुमसे बिल्कुल भी नाराज़ नही हूँ” इसके साथ ही मैने यह भी जोड़ दिया “भला मैं तुमसे नाराज़ क्यों होयुंगा?”
“मुझे लगा, मुझे लगा शायद ……….” उसने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया. मैं उसकी परेशानी की वजह समझ गया था. उसके मन मैं ज़रूर कुछ और भी था और मैं जानना चाहता था कि वो क्या था.
“शायद क्या माँ?” मैने उसे उकसाया.
वो कुछ पल सोचती रही और फिर एक गहरी साँस लेकर तपाक से बोली: “मुझे लगा…….जो कुछ हमारे बीच कुछ समय पहले हुआ तुम उसको लेकर मुझसे नाराज़ होगे”
“मगर मैं नाराज़ क्यों होउंगा?” मैं अभी भी असमंजस में था. जहाँ तक मैं जानता था उसमे हम दोनो की रज़ामंदी शामिल थी.
“मुझे लगा शायद मैं हद से कुछ ज़यादा ही आगे बढ़ गयी थी जब हम ने गुडनाइट कहा था”
मैने उसके अंदर गहराई में झाँकने की कोशिश की. वो सिरफ़ अपने बर्ताव के बारे में सोच रही थी. उसे खुद से कुछ ग़लत हो जाने का भय सता रहा था. मुझे लगा वो मेरे लंड की अपने बदन पर चुभन के बारे में सोच भी नही रही थी, ना ही इस बात के बारे में कि मैने भी उसे उतनी ही तम्माना से चूमा था जितनी तमन्ना से उसने मुझे. वो सिर्फ़ अपने चूमने के बारे में सोच रही थी, जैसे ये सब पूरी तरह से एकतरफ़ा था, जैसे हमारे प्रेम संबंध में सिर्फ़ वोही हिस्सा ले रही थी.
“क्या मतलब कि तुम हद से आगे बढ़ गयी थी” मैने जानबूझकर अंजान बनते हुए पूछा. मेरे लिए यह बात बहुत राहत देने वाली थी कि वो खुद को कसूरवार ठहरा रही थी और मुझ पर कोई दोष नही मढ़ रही थी. मुझे लगा स्थिती मेरे नियनतरण में है क्योंकि वो रक्षात्मक मुद्रा में थी जबके मुझे अब डरने की कोई ज़रूरत नही थी जैसा मैं पहले सोचे बैठा था.
वो दूबिधा में थी. मुझे अच्छी तरह से मालूम था वो किस बारे में बात कर रही है मगर मैं उसके मुख से सुनना चाहता था कि उसका इशारा किस ओर है.
वो कुछ देर तक अपने जवाब के बारे में सोचती रही. अचानक से वो बहुत पस्त ब थकि हुई नज़र आने लगी. वो उस कुर्सी पर चुपचाप बैठी अपने पावं को देखे जा रही थी और उसके हाथ दोनो बगलों से कुर्सी को कस कर पकड़े हुए थे.
खामोशी के वो कुछ पल कुछ घंटो के बराबर थे, उसने अपना चेहरा उपर उठाया और मेरी ओर देखा; “क्या यह संभव है कि तुम वाकाई में नही जानते मैं किस बारे में बात कर रही हूँ?!”
“क्या यह संभव है कि तुम वाकाई में नही जानते मैं किस बारे मैं बात कर रही हूँ?!”
मैने उसे देखा और वो मुझे देख रही थी. उसकी आँखे में बहुत गंभीरता थी. बल्कि मुझे उसकी आँखो मैं एक अंजना डर भी नज़र आया. उसे डर था कि वो उस बात को बहुत बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रही है, जबके मैं इस बात से अंजान था कि हमारे बीच क्या चल रहा है. दूसरे लफ़्ज़ों में कहिए तो, वो उस मुद्दे को तूल दे रही थी जिसे छेड़ने की उसे कोई आवश्यकता नही थी. मैं देख सकता था कि उसे अपनी सांसो पर काबू रखने में दिक्कत हो रही थी.
मैं उस सवाल का जवाब नही देना चाहता था. मगर अब जब उसने सवाल पूछा था तो मुझे जवाब देना ही था. “मैं जानता हूँ तुम किस बारे में बात कर रही हो.” मैने बिना कुछ और जोड़े बात को वहीं तक सीमित रखा.
वो चुपचाप बैठी थी, बॅस सोचती जा रही थी. उसके माथे की गहरी शिकन बता रही थी कि वो कितनी गहराई से सोच रही थी. वो किसी विचार को जाँच रही थी मगर उसे कह नही पा रही थी. वो उसे कहने के सही लफ़्ज़ों को ढूँढने की कोशिश कर रही थी. आख़िरकार, उसने एक गहरी साँस ली ताकि अपने दिल की धड़कनो को काबू कर सके और चेहरे पर अपार गंभीरता लिए मुझे पूछा: “तो बताओ मैं किस बारे में बात कर रही थी?”
उसने सीधे सीधे मुझे मौका दिया था कि मैं सब कुछ खुले में ले आता. अब वक़्त आ गया था कि जो भी हमारे बीच चल रहा था उस पर खुल कर बात की जाए क्योंकि उसने बहुत सॉफ सॉफ पूछा था कि हमारे बीच चल क्या रहा था.
मुझे कुछ समय लगा एक उपयुक्त ज्वाब सोचने के लिए, और जब मैने अपना जवाब सोच लिया तो उसकी आँखो में आँखे डाल कर देखा और कहा: “बात पूरी तरह से सॉफ है कि हम दोनो मैं से कोई भी पहल नही करना चाहता.”
मैने देखा उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था और दूसरा जा रहा था और फिर वो कुछ नॉर्मल हो गयी. हालाँकि मैने बहुत सॉफ सॉफ इशारा कर दिया था कि क्या चल रहा है, वो प्रत्यक्ष बात पूरी सॉफ और सीधे लफ़्ज़ों में सुनना चाहती थी ना कि अनिश्चित लफ़्ज़ों में कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूँ. उसकी प्रतिक्रिया स्पष्ट और मेरी उम्मीद के मुताबिक ही थी: “क्या मतलब तुम्हारा? किस बात के लिए पहल?”
मैं बेहिचक सॉफ सॉफ लफ़्ज़ों में बयान कर सकता था मगर हमारे बीच जो चल रहा था उसके साथ एक ऐसा गहरा कलंक जुड़ा हुआ था, वो इतना शरमशार कर देने वाला था कि उस पल भी जब सब कुछ खुले में आ चुका था हम उसे स्वीकार करने से कतरा रहे थे. इतना ही नही कि हम मे से कोई भी पहला कदम नही उठाना चाहता था बल्कि हममे से कोई भी यह भी स्वीकार नही करना चाहता था कि किसी बात के लिए पहल करने की ज़रूरत थी.
कमरे मे छाई गंभीरता की प्रबलता अविश्वसनीय थी. वो अपनी उखड़ी सांसो पर काबू पाने के लिए अपने मुख से साँस ले रही थी. मेरे दिल की धड़कने भी बेकाबू हो रही थी जब मैं जवाब के लिए उपयुक्त लफ़्ज़ों का चुनाब कर रहा था. मेरी नसों में खून इतनी तेज़ी से दौड़ रहा था कि मेरे सारे विचार भटक रहे थे. मैं जानता था वो समय एकदम उपयुक्त था, मैं जानता था कि हम दोनो हर बात से पूरी तरह अवगत थे, मैं जानता था कि हममें से किसी एक को मर्यादा की उस लक्षमण रेखा को पार करना था, मगर यह करना कैसे था, यह एक समस्या थी.
उसके सवाल का जवाब देने की वजाय मैने उसके सामने अपना एक विचार रखा: “तुम जानती हो माँ जब हम दोनो इस बारे में बात नही करते थे तो सब कुछ कितना आसान था, कोई भी परेशानी नही थी”
उसने राहत की लंबी सांस ली और उसके चेहरे पर मुस्कराहट छा गयी. मैने महसूस किया कि उसकी वो मुस्कराहट उन सब मुश्कुराहट से ज़यादा प्यारी थी जितनी मैने आज तक किसी भी औरत के चेहरे पर देखी थी. अपना बदन ढीला छोड़ते हुए उसने मुझे ज्वाब दिया : “हूँ, तुम्हारी इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ.
मैने उसके सुंदर मुखड़े और तराशे हुए होंठो को देखा. वो बहुत मोहक लग रही थी हालाँकि उसका बदन पूरी तरह से ढँका हुआ था. एक बात तो पक्की थी कि हमारे बीच बरफ की वो दीवार पिघल चुकी थी. हमारे बीच जो कुछ चल रहा था उस पर अप्रत्याशिस रूप से हम दोनो सहमत थे और हम दोनो जानते थे कि हम अपरिचित और वर्जित क्षेत्र में दाखिल हो चुके हैं.
मैं बहुत ही उत्तेजित था. मेरा लंड इतना आकड़ा हुया था कि मुझे दर्द महसूस हो रहा था. मैं उसे अपनी बाहों में भर लेना चाहता था और उसके जिस्म को अपने जिस्म के साथ दबा हुआ महसूस करना चाहता था. मैं उसके मम्मो को अपनी छाती पर रगड़ते महसूस करना चाहता था. मैं अपने हाथों से उसकी पीठ सहलाना चाहता था, उसकी गान्ड मसलना चाहता था. मैं उसके होंठो में होंठ डाल कर खुले दिल से चूमना चाहता था और चाहता था कि वो भी मुझे उतनी ही हसरत से खुल कर चूमे.
हम वहाँ चुपचाप बैठे थे, मेरी नज़र उस पर जमी हुई थी और उसकी नज़र फर्श पर जमी हुई थी. मेरा कितना मन था कि मैं जान सकता उसके दिमाग़ में उस वक़्त क्या चल रहा था. वो अपने विचारों और भावनाओ में ध्यांमग्न जान पड़ती थी जैसे मैं अपने विचारों में था. वो बीच बीच में गहरी साँसे ले रही थी ताकि खुद को शांत कर सके. मुझे नही मालूम था अब हमे क्या करना चाहिए.
आख़िरकार कुछ समय पश्चात, जो कि अनंतकाल लग रहा था वो धीरे से फुसफसाई: “क्या यह संभव है”
वो इतने धीरे से फुसफसाई थी कि मैं उसके लफ़्ज़ों को ठीक से सुन भी नही पाया था. मैं कुछ नही बोला.मैं उस सवाल का जबाब नही देना चाहता था.
फिर से एक चुप्पी छा गयी जब वो मेरे जबाव का इंतेज़ार कर रही थी. जब मैने कोई जबाव नही दिया तो उसने मेरी ओर नज़र उठाकर देखा और इस बार अधीरता से पूछा: “क्या हमारे बीच यह संभव है”
मैं बहुत उत्तेजित होता जा रहा था, मेरी नसों में दौड़ता खून उबलने लगा था क्योंकि मेरा मन उस समय बहुत सारी संभावनाओ के बारे में सोच रहा था. उसने लगभग सब कुछ सॉफ सॉफ कह दिया था और अपनी भावनाओं और हसरातों को खुले रूप से जाहिर कर दिया था. अब मेरी तरफ से संयत वार्ताव उसके साथ अन्याय होता. मैने उसकी आँखो में झाँका और अपनी नज़र बनाए रखी. अपने लफ़्ज़ों में जितनी हसरत मैं भर सकता था, भर कर मैने कहा: “तुम्हे कैसे बताऊ माँ, मेरा तो रोम रोम इसके संभव होने के लिए मनोकामना करता है
हम दोनो फिर से चुप हो गये थे. उसकी घोसना और मेरी स्वीकारोक्ति की भयावहता हम दोनो को ज़हरीले नाग की तरह डस रही थी. हम यकायक बहुत गंभीर हो गये थे. सब कुछ खुल कर सामने आ चुका था और हम एक दूसरे से क्या चाहते थे इसका संकेत सॉफ सॉफ था मगर हम फिर भी चुप चाप बैठे थे, दोनो नही जानते थे आगे क्या करना चाहिए.
खामोशी इतनी गहरी थी कि आख़िरकार जब उसने मेरी ओर देखा तो मैं उसके जिस्म की हिलडुल को भी सुन सकता था. उसके चेहरे पर वो अजीब भाव देख सकता था, डर और कामना, उम्मीद और आतंक का मिला जुला रूप था वो. उसने हमारी दूबिधा को लफ़्ज़ों में बयान कर दिया; “अब?…….अब क्या?” वो बोली.
हूँ, मैं भी यही सोचे जा रहा था: अब क्या? अब इसके आगे बढ़ने की हमारी क्या संभावना थी? सामान्यतः हमारा आगे बढ़ने वाला रास्ता स्पष्ट था मगर हमारे बीच कुछ भी सामने नही था. सबसे पहले हम नामुमकिन के मुमकिन होने के इच्छुक थे और अब जब वो नामुमकिन मुमकिन बन गया था, हम यकीन नही कर पा रहे थे कि यह वास्तविक है, सच है. हम समझ नही पा रहे थे कि हम अपने भाग्य का फ़ायदा कैसे उठाएँ, क्योंकि हमारे आगे बढ़ने के लिए कोई निर्धारित योजना नही थी.
अंत में मैने पहला कदम उठाने का फ़ैसला किया. एक गहरी साँस लेकर, मैने अपनी चादर हटाई और धृड निस्चय के साथ बेड की उस तरफ को बढ़ा जिसके नज़दीक उसकी कुर्सी थी. वो संभवत मेरा इंतेज़ार कर रही थी, मैं बेड के किनारे पर चला गया और अपने हाथ उसकी ओर बढ़ा दिए. यह मेरा उसके “अब क्या?” का जवाब था.
वो पहले तो हिचकिचाई, मेरे कदम का जबाव देने के लिए वो अपनी हिम्मत जुटा रही थी. धीरे धीरे उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए और मेरे हाथों में दे दिए.
वो हमारा पहला वास्तविक स्पर्श था जब मैने उसे हसरत से छुआ था, हसरत जो उसके लिए थी और उसके जिस्म के लिए थी. उसने इसे स्वीकार कर किया था बल्कि परस्पर मेरी हसरत का जबाव उसने अपने स्पर्श से दिया था. उसके हाथ बहुत नाज़ुक महसूस हो रहे थे. बहुत नरम, खूबसूरत हाथ थे माँ के और मेरे लंबे हाथों में पूरी तरह से समा गये थे.
हमारा स्पर्श रोमांचक था ऐसा कहना कम ना होगा, ऐसे लग रहा था जैसे एक के जिस्म से विधुत की तरंगे निकल कर दूसरे के जिस्म में समा रही थी. यह स्पर्श रोमांचकता से उत्तेजना से बढ़कर था, यह एक स्पर्श मॅटर नही था, उससे कहीं अधिक था. हम ने उंगलियों के संपर्क मॅटर से एक दूसरे से अपने दिल की हज़ारों बातें को साझा किया था. हमारे हाथों का यह स्पर्श पिछली बार के उस स्पर्श से कहीं अधिक आत्मीय था जब उसने कॉरिडोर में मेरे हाथ थामे और दबाए थे. मैने अपनी उँगुलियों को उसकी हथेलियों पर रगड़ा. वो अपनी जगह पर स्थिर खड़ी रहने का प्रयास कर रही थी क्योंकि उसका जिस्म हल्के हल्के झटके खा रहा था.
मैं उसकी उंगलियाँ उसकी हथेलियों की बॅक को अपने अंगूठो से सहला रहा था. वो गहरी साँसे ले रही थी और मैं उसके जिस्म को हल्के से काँपते महसूस कर सकता था. उसके खामोश समर्पण से उत्साहित होकर मैने बेड से उतरने और उसके सामने खड़े होने का फ़ैसला किया. मैं अभी भी उसके हाथ थामे हुए था, सो मेरे बेड से उठने के समय उसके हाथ भी थोड़ा सा उपर को उठे जिस कारण उसका बदन भी थोड़ा उपर को उठा. उसने इशारा समझा और वो भी उठ कर खड़ी हो गयी. अब हम एक दूसरे के सामने खड़े थे; हाथों में हाथ थामे हम एक दूसरे की गहरी सांसो को सुन रहे थे.
वो पहले आगे बढ़ी, वो मेरे पास आ गयी और उसने अपना चेहरा मेरी और बढ़ाया. मैने अपना चेहरा उसके चेहरे पर झुकाया और वो मुझे चूमने के लिए थोड़ा सा और आगे बढ़ी. मैने उसके हाथ छोड़ दिए और उसे अपनी बाहों में भर लिया. हमारे होंठ आपस में परस्पर जुड़ गये, हमारे अंदर कामुकता का जुनून लावे की तरह फूट पड़ने को बेकरार हो उठा.
हम एक दूसरे को थामे चूम रहे थे. कभी नर्मी से, कभी मजबूती से, कभी आवेश से, कभी जोश से. हम ने इस पल का अपनी कल्पनाओं में इतनी बार अभ्यास किया था कि जब यह वास्तव में हुआ तो यह एकदम स्वाभिवीक था. हमने पूरी कठोरता से और गहराई से एकदुसरे को चूमा. हमारे होंठ एक दूसरे के होंठो को चूस रहे थे और हमारी जिभें आपस में लड़ रही थी. बल्कि हमने एक दूसरे की जिव्हा को भी बारी बारी से अपने मुख मन भर कर चूसा उसे अपनी जिव्हा से सहलाया.
उसके होंठ बहुत नाज़ुक थे मगर उनमे कितनी कामुकता भरी पड़ी थी. उसके चुंबन बहुत नरम थे मगर कितने आनन्ददाइ थे. उसकी जिव्हा बहुत मीठी थी मगर कितनी मादक थी.
वो लम्हे अद्भुत थे और हमारा चुंबन बहुत लंबा चला था. हमने उन सभी व्यर्थ गुज़रे पलों की कमी दूर कर दी थी जब हमारे होंठ इतने नज़दीक होते थे और हम सूखे होंठो के चुंबन से कहीं अधिक करने के इच्छुक होते थे. मुझे यकीन नही हो पा रहा था हमारे चुंबन कितने आनंदमयी थे, उसके होंठ कितने स्वादिष्ट थे, और उसने अपना चेहरा कितने जोश से मेरे चेहरे पे दबाया हुआ था.
जब हमने अपनी भावुकता, अपनी व्याग्रता, अपने जोश को पूर्णतया एक दूसरे को जता दिया तो मैने खुद को उससे अलग किया और उसे देखने लगा. अब मैं उसे एक नारी की तरह देख सकता था ना कि एक माँ की तरह. वो उस समय मुझे असचर्यजनक रूप से सुंदर लग रही थी और मैने उसे बताया भी कि वो कितनी खूबसूरत है, कितनी मनमोहक है, कितनी आकर्षक है.
फिर मैं धीरे से उसके कान में फुसफसाया “माँ! मैं तुम्हे नंगी देखना चाहता हूँ”
एक बार फिर से वो जवाब देने में हिचकिचा रही थी. मैने उसके गाउन की डोरियाँ पकड़ी और उन्हे धीरे से खींचा. गाँठ खुलते ही उसने अपने आप को मुझसे थोड़ा सा दूर हटा लिया. वो मुझसे बाजू भर की दूरी पर थी और उसके गाउन की डोरियाँ खुल रही थी. एक बार डोरियाँ पूरी खुल गयी तो उसने उन्हे वैसे ही लटकते रहने दिया. वो अपनी बाहें लटकाए मेरे सामने बड़े ही कामोत्तेजित ढंग से खड़ी थी. उसका गाउन सामने से हल्का सा खुल गया था.
तब मैने जो देखा……..उसे देखकर मैं विस्मित हो उठा. मुझे उम्मीद थी उसने गाउन के अंदर पूरे कपड़े पहने होंगे, मगर जब मैने अपने काँपते हाथ आगे बढ़ाए और उसके गाउन को थोड़ा सा और खोला, जैसे मैं किसी तोहफे को खोल रहा था, तब मैने जाना कि उसने अंदर कुछ भी नही पहना था.
वो उस गाउन के अंदर पूर्णतया नग्न थी. उसने वास्तव में मेरे कमरे में आने के लिए कपड़े उतारे थे, इस बात के उलट के उसे कपड़े पहनने चाहिए थे. यह विचार अपने आप में बड़ा ही कामुक था कि वो मेरे कमरे में पूरी तरह तैयार होकर एक ही संभावना के तहत आई थी, और यह ठीक वैसे ही हो भी रहा था जैसी उसने ज़रूर उम्मीद की होगी- या योजना बनाई होगी- कि यह हो.
सबसे पहले मेरी नज़र उसके सपाट पेट पर गयी. मेरी साँस रुकने लगी जब उसका पेट और उसके नीचे का हिस्सा मेरी नज़र के सामने खुल गया. पेट के नीचे मुझे उसकी जाँघो के जोड़ पे बिल्कुल छोटे छोटे से बालों का एक त्रिकोना आकर दिखाई दिया उसके बाद उसकी जांघे और उसकी टाँगे पूरी तरह से मेरी नज़र के सामने थी. इसके बाद मैने उसके गाउन के उपर के हिस्से को खोलना शुरू किया और उसके मम्मे धीरे धीरे मेरी प्यासी नज़रों के सामने नुमाया हो गये.
वो अतुलनीय थे. मैं जानता था माँ के मम्मे बहुत मोटे हैं, मगर जब वो मेरे सामने अपना रूप विखेरते पूरी शानो शौकत में गर्व से तन कर खड़े थे, तो मैं उनकी सुंदरता देख आश्चर्यचकित हो उठा. वो भव्य थे, मादकता से लबरेज. मैं एकदम से बैसब्रा हो उठा और तेज़ी से हाथ बढ़ा कर उन्हे पकड़ लिया. मैने अपनी हथेलियाँ उसके मम्मों के इर्द गिर्द जमा दी. उसके निपल्स मेरे हाथों के बिल्कुल बीचो बीच थे. मैने उनकी कोमलता महसूस करने के लिए उन्हे धीरे से दबाया. उसके निपल एकदम आकड़े थे. उसके मम्मे विपुल और तने हुए थे.
मेरे मम्मे दबाते ही उसने एक दबी सी सिसकी भरी जिसने मेरे कानो में शहद घोल दिया. उसे मेरे स्पर्श में आनंद मिल रहा था और मुझे उसे स्पर्श करने में आनंद मिल रहा था. जल्द ही मेरे हाथ उसके पूरे मम्मों पर फिरने लगे.
मैने ध्यान ही नही दिया कब उसने अपना गाउन अपने कंधो से सरका दिया और उसे फर्श पर गिरने दिया. वो मेरे सामने खड़ी थी, पूरी नग्न, कितनी मोहक, कितनी चित्ताकर्षक और अविश्वशनीय तौर से मादक लग एही थी. मैने उसे फिर से अपनी बाहों में भर लिया और उसे जल्दी जल्दी और कठोरता से चूमने लगा. मैं उसके मम्मों को अपनी छाती पर रगड़ते महसूस कर रहा था और मेरे हाथ उसकी पीठ से लेकर उसकी गान्ड तक सहला रहे थे. जैसे ही मेरे हाथ उसके नग्न नितंबो पर पहुँचे तो उसके साथ साथ मेरे बदन को भी झटका लगा मैं तुरंत उन्हे सहलाने लग गया.
मैं उसे चूम रहा था, उसके मम्मो पर अपनी छाती रगड़ रहा था, उसके नितंबो को भींच रहा था, सहला रहा था, और नितंबो की दरार में अपनी उंगलियाँ फिरा रहा था. मेरे हाथ उसकी पीठ पर घूम रहे थे, उसके कुल्हों पर, उसकी बगलों पर, उसके कंधो पर, उसकी गर्दन पर, उसके चेहरे पर, उसके बालों में, और फिर अंत में वापस उसके मम्मों पर. मैं फ़ैसला नही कर पा रहा था कि मुझे उसे चूमना चाहिए, दुलारना,-पुचकारना चाहिए या सहलाना चाहिए. मैं सब कुछ एक साथ करने की कोशिश कर रहा था, इसलिए बहुत जल्दी मेरी साँस फूलने लगी.
मैं वापस होश में आया जब मैने माँ को मेरी टी-शर्ट को नीचे से पकड़ते देखा और फिर वो उसे मेरे बदन से उतारने की कोशिश करने लगी. मेरी माँ मेरे कपड़े उतार रही थी. वो मुझे पूरा नग्न करना चाहती थी ताक़ि अपनी त्वचा से मेरी त्वचा के स्पर्श के एहसास को महसूस कर सके. माँ के इस कार्य में इतनी मादकता भरी थी कि मेरी उत्तेजना और भी बढ़ गयी, मेरा लंड पहले से भी ज़्यादा कड़ा हो गया था.
जब वो मेरी टी-शर्ट को मेरे सर से निकाल रही थी तो मैं थोड़ा सा पीछे हॅट गया. जैसे ही टी-शर्ट गले से निकली मैं वापस उससे चिपक गया और इस बार उसके नग्न मम्मे मेरी नंगी छाती पर दब गये थे. हमारा त्वचा से त्वचा का वो स्पर्श अकथनीय था. मैने अपनी पूरी जिंदगी में इतना अच्छा कभी महसूस नही किया था जितना अब कर रहा था जब मेरी माँ के मम्मे मेरी छाती पर दबे हुए थे, मेरे हाथ उसके नितंबो को थामे हुए उसे थोड़ा सा उपर उठाए हुए थे और मेरे होंठ उसके होंठो को लगभग चबा रहे थे.
आख़िरकार माँ ने मेरे जनून पर विराम लगाया. उसने मुझे चूमना बंद कर दिया, मुझे उसको सहलाने से रोक दिया, और मेरे कंधे पर सर रखकर मुझसे सट गयी. मैं उसे उसी तरह अपनी बाहों में थामे खड़ा रहा और अपनी धड़कनो पर काबू पाने की कोशिश करने लगा. हम कुछ देर ऐसे ही एक दूसरे को बाहों में लिए खड़े थे और उन सुखद लम्हो का आनंद ले रहे थे.
अंत-तेह, काफ़ी समय बाद, मैने खुद को उससे थोड़ा सा दूर हटाया. मैं उसे इतने कस कर खुद से चिपटाये हुए था कि उसके मम्मे मेरी छाती में इस तरह धँस गये थे कि मुझे उन्हे झटके से अलग करना पड़ा. मैं, माँ और बेड के बीचोबीच खड़ा था. एकतरफ को हाथ कर मैने माँ को बेड पर चढ़ने का इशारा किया.
इसके बाद उसने जो किया वो सबसे बढ़कर कामुक चीज़ होगी जो मैने अपनी पूरी ज़िंदगी में देखी होगी. वो मेरे बेड की ओर बढ़ी और मैं उसकी नंगी काया को निहारने लगा. उसने बेड पर झुकते हुए सबसे पहले अपने हाथ उस पर रखे. उसके मम्मे उसकी छाती से नीचे की ओर लटक रहे थे और उसकी पीठ और गान्ड एक बहुत ही मनमोहक सी कर्व बना रही थी. फिर उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए और अपना दाहिना घुटना उठाकर बेड पर रख दिया जबकि बाईं टाँग पीछे को फैलाकर, उसने अपना जिस्म अत्यंत भड़कायु, मादक, कामुक और अत्यधिक उत्तेजित मुद्रा में ताना. मैने विस्मय से उसकी नग्न देह को निहारा और मेरे लंड ने उसकी उस मुद्रा की प्रतिक्रिया में एक जोरदार झटका खाया. उसने अपना बाया घुटना उठाकर उसे भी बेड पर रख दिया. अब उसकी मुद्रा बदलकर एक चौपाए की तरह हो गयी थी, वो अब अपने हाथों और घुटनो के बल बेड पर बैठी थी,
उसकी गान्ड हवा मे उभरकर छत की ओर उठी हुई थी, उसकी पीठ एक बेहद सुंदर सी कर्व बना रही थी, और उसके मम्मे मेरे दिल की धड़कनो के साथ हिलडुल रहे थे. वो घुटनो के बल कुछ कदम आगे बढ़ाकर मेरे तकिये के नज़दीक चली गयी. फिर उसने अपने जिस्म का अग्रभाग उपर उठाया और दो तीन सेकेंड के लिए घुटनो पर बैठ गयी. फिर, वो जल्दी से मेरे तकिये पर सर रखकर मेरे बेड पर पीठ के बल लेट गयी और मुझे देखने लगी. उसके चेहरे की भाव भंगिमाएँ और उसकी आँखे जैसे पुकार पुकार कर कह रही थी ‘ आओ, मेरे उपर चढ़ जाओ और मुझे चोद डालो’
वो मेरी ओर देख रही थी और उसकी आँखे उसका चेहरा जैसे कह रहा था ‘आओ और मुझे चोद डालो’
मैं यकायक जैसे नींद से जागा. मैने फुर्ती से अपना पयज़ामा और शॉर्ट्स उतार फैंके और बेड पर चढ़कर उसके पास चला गया. उसके जिस्म में जल्द से जल्द समा जाने की उस जबरदस्त कामना से मेरा लंड पत्थर की तरह कठोर हो चुका था. उसे पाने की हसरत में मेरा जिस्म बुखार की तरह तपने लगा था. मैं उस वक़्त इतना कामोत्तेजित था कि उसके साथ सहवास करने की ख्वाहिश ने मेरे दिमाग़ को कुन्द कर दिया था. मैं उसके अंदर समा जाने के सिवा और कुछ भी सोच नही पा रहा था जैसे मेरी जिंदगी इस बात पर निर्भर करती थी कि मैं कितनी तेज़ी से उसके अंदर दाखिल हो सकता हूँ.
मैं बेड पर उसकी बगल में चला गया और उसके मम्मों को मसलने लगा. उसकी बगल में जाते ही मैने उसके होंठो को अपने होंठो में भर लिया और उन्हे चूमने और चूसने लगा और फिर मैं उसके उपर चढ़ने लगा, मैने अपने होंठ उसके होंठो पर पूरी तरह चिपकाए रखे. उसके उपर चढ़ कर मैने खुद को उसकी टाँगो के बीच में व्यवस्थित किया तो मेरा लंड उसके पेट पर चुभ रहा था. उसने अपनी टाँगे थोड़ी सी खोल दी ताकि मैं उनके बीच अपने घुटने रखकर उसके उपर लेट सकूँ.
मैं उसके बदन पर लेटे लेटे आगे पीछे होने लगा, उसके मम्मो पर अपनी छाती रगड़ने लगा, मैं बिना चुंबन तोड़े अपना लंड सीधा उपरी की ओर करना चाहता था. एक बार मेरा लंड उसकी कमर पर सीधा हो गया तो मैं अपना जिस्म नीचे को खिसकाने लगा. धीरे धीरे मैं अपना जिस्म तब तक नीचे को खिसकाता रहा जब तक मैने अपना लंड उसकी चूत के छोटे छोटे बालों में फिसलता महसूस नही किया, और नीचे जहाँ उसकी चूत थी. जल्द ही मैने महसूस किया कि मेरा लंड उसकी चूत को चूम रहा है.
मैं बेसूध होता जा रहा था. मैं अपनी माँ को चोदने के लिए इतना बेताब हो चुका था कि अब बिना एक पल की भी देरी किए मैं उसके अंदर समा जाना चाहता था. मैं उसके मुख पर मुख चिपकाए, उसे चूमते, चाटते, चुस्त हुए आगे पीछे होने लगा इस कोशिश में कि मुझे उसका छेद मिल जाए. शायद उसको भी एहसास हो गया था कि मेरा इरादा क्या है, इसीलिए उसने अपने घुटने उपर को उठाए, अपनी टाँगे खोलकर अपने पेडू को उपर को मेरे लंड की ओर धकेला.
जब मैं उसे भूखो की तरह चूमे, चूसे जा रहा था, जब मेरा जिस्म इतनी उत्कंठा से उसका छेद ढूँढ रहा था, उसने अपना हाथ हमारे बीच नीचे करके मेरा लंड अपनी उंगलियों में पकड़ लिया और मुझे अपनी अपनी चूत का रास्ता दिखाया. जैसे ही मैने अपना लंड उसकी चूत के होंठो के बीच पाया, जैसे ही मैने अपने लंड के सिरे पर उसकी चूत के गीलेपान को महसूस किया, मैने अपना लंड उसकी चूत पर दबा दिया.
मैं उस समय इतना उत्तेजित हो चुका था कि कुछ भी सुन नही पा रहा था. मेरे कान गूँज रहे थे. मैं इतना कामोत्तेजित था कि उसे अपनी पूरी ताक़त से चोदना चाहता था. उसने ज़रूर मेरी अधिरता को महसूस किया होगा जैसे मुझे यकीन है उसने ज़रूर मेरी उत्तेजना की चरम सीमा को महसूस किया था. उसने मुझे अपने अंदर लेने के लिए खुद को हिल डुल कर व्यवस्थित किया. मैने महसूस किया वो मुझे अपने होंठो के बीच सही जगह दिखा रही थी. उसने मेरा लंड अपनी चूत के होंठो पर रगड़ा और फिर उसे थोड़ा उपर नीचे किया, अंत मैं मैने महसूस किया मेरे लंड की टोपी एकदम उसकी चूत के छेद के उपर थी. फिर उसने अपने नितंब उपर को और उँचे किए और उसके घुटने उसके मम्मो से सट गये. उसने अपने हाथ मेरी पीठ पर रखे और तोड़ा सा द्वब देकर मुझे घुसने का इशारा किया.
मैने घुसाया. मैं इतनी ताक़त से घुसाना चाहता था जितनी ताक़त से मैं घुसा सकता था मगर इसके उलट मैने आराम से घुसाना सुरू किया. उसके अंदर समा जाने की अपनी ज़बरदस्त इच्छा और उसमे धीरे धीरे समाने का वो फरक अविस्वसनीय था. बल्कि एक बार मैने अपने लंड को वापस पीछे को खींचा ताकि एकदम सही तरीके से डाल सकूँ, मैं माँ की चूत में पहली बार लंड घुसने को एक यादगार बना देना चाहता था.
मैने उसकी चूत को खुलते हुए महसूस किया. वो बहुत गीली थी इसलिए घुसने में कोई खास ज़ोर नही लगाना पड़ा. मैं अपने लंड को उसकी चूत में समाते महसूस कर रहा था. मैं महसूस कर रहा था किस तेरह मेरा लंड उसकी चूत में जगह बनाते आगे बढ़ रहा था. मैने अपने लंड का सिरा उसकी चूत में समाते महसूस किया. वो एकदम स्थिर थी और उसके हाथों का मेरी पीठ पर दवाब मुझे तेज़ी से अंदर घुसा देने के लिए मज़बूर कर रहा था.
मैं उसके अंदर समा चुका था. मैने अपनी पूरी जिंदगी मैं ऐसा आनंद ऐसा लुत्फ़ कभी महसूस नही किया जितना तब कर रहा था जब मेरा लंड उसकी चूत में पूरी तेरह समा चुका था. मैने उसे इतना अंदर धकेला जितना मैं धकेल सकता था और फिर मैं उसके उपर लेट गया और उसे इस बेकरारी से चूमने लगा जैसे मैं कल का सूरज नही देखने वाला था.
मैं अपनी माँ को चूमे रहा था जब मैं अपनी माँ को चोद रहा था. मैं उसके मम्मे अपनी छाती पर महसूस कर रहा था और उसकी जांघे अपने कुल्हो पर. मैं उसकी जिव्हा अपने मुख में महसूस कर रहा था और उसकी आइडियाँ अपने नितंबो पर. मैं उसके जिस्म के अंग अंग को महसूस कर रहा था, बाहर से भी और अंदर से भी. मैं उस सनसनी को बयान नही कर सकता जो मेरे लंड से मेरे दिमाग़ और मेरे पावं के बीच दौड़ रही थी.
हम बहुत बहुत देर तक ऐसे ही चूमते रहे जबके मेरा लंड उसकी चूत में घुसा हुआ था. कयि बार मैं उसे अंदर बाहर करता मगर ज़्यादातर मैं उसे उसके अंदर घुसाए बिना कुछ किए पड़ा रहा जबके मेरा मुख उसके मुख पर अपना कमाल दिखा रहा था. मैने उसके होंठ चूमे, उसके गाल चूमे, उसकी आँखे, उसकी भवें, उसका माथा, उसकी तोड़ी, उसकी गर्दन और उसके कान की लौ को चाटा और अपने मुँह में भरकर चूसा. मैने उसके मम्मे चूसने की भी कोशिश की मगर उसके गुलाबी निपल चूस्ते हुए मैं अपना लंड उसकी चूत के अंदर नही रख पा रहा था.
आधी रात के उस वक़्त जब मुझे उसकी चूत में लंड घुसाए ना जाने कितना वक़्त गुज़ार चुका था मैने ध्यान दिया हम उस व्याग्रता से चूमना बंद कर चुके थे जिस व्याग्रता से अब वो मुझे मेरा लंड उसकी चूत मैं अंदर बाहर करने के लिए उकसा रही थी. मैने धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू किया, मेरी पीठ पर उसके हाथ मुझे उसकी चूत में पंप करते रहने को उकसा रहे थे. अंत-तहा उसके हाथ मुझे और भी तेज़ी से धक्के मारने को उकसाने लगे, अब मैं उसे चूम नही रहा था बस उसे चोद रहा था. मैं अपने कूल्हे आगे पीछे करते हुए, अपना लंड उसकी चूत में तेज़ी से ज़ोर लगा कर अंदर बाहर कर रहा था. उसने मेरी पीठ पर अपनी टाँगे कैंची की तरह कस कर इस बात को पक्का कर दिया कि मेरा लंड उसकी चूत के अंदर घुसा रहे और फिसल कर बाहर ना निकल जाए. उसके मम्मे मेरे धक्कों की रफ़्तार के साथ ठुमके लगा रहे थे और उसके चेहरे पर वो जबरदस्त भाव थे जिन्हे ना मैं सिर्फ़ देख सकता था बल्कि महसूस भी कर सकता था. वो हमारी कामक्रीड़ा की मधुरता को महसूस कर रही थी और उसका जिस्म बड़े अच्छे से प्रतिक्रिया मे ताल से ताल मिला कर जबाव दे रहा था.
इसी तरह प्रेमरस में भीगे उन लम्हो में एक समय ऐसा भी आया जब उसके जिस्म में तनाव आने लगा और मैं उसके जिस्म को अकड़ते हुए महसूस कर सकता था. अपने लंड के उसकी चूत में अंदर बाहर होने की प्रतिक्रिया स्वरूप मैं उसके जिस्म को अकड़ते हुए महसूस कर सकता था. असलियत में उसे चोदने के समय उसकी प्रतिक्रिया के लिए मैं तैयार नही था जब उसका बदन वास्तव में हिचकोले खाने लगा. उसने मेरी पीठ पर अपनी टाँगे और भी ज़ोर से कस दी और उपर की ओर इतने ज़ोर से धक्के मारने लगी जितने ज़ोर से मैं नीचे को नही मार पा रहा था. उसके धक्के इतने तेज़ इतने ज़ोरदार थे कि मैं आख़िरकार स्थिर हो गया जबकि वो नीचे से अपनी गान्ड उछाल उछाल कर मेरे लंड को पूरी ताक़त से अपनी चूत में पंप कर रही थी. उसकी कराह अजीबो ग़रीब थीं. वो सिसक रही थी मगर उसकी सिसकियाँ उसके गले से रुंध रुंध कर बाहर आ रही थी.
आख़िरकार मेरे खुद को स्थिर रखने के प्रयास के काफ़ी समय बाद यह हुआ. उसने कुछ समय तक बहुत ज़ोरदार धक्के लगाए. तब उसने अपनी पूरी ताक़त से खुद को उपर और मुझ पे दबा दिया और स्थिर हो गयी. फिर वो दाएँ बाएँ छटपताती हुई चीखने लगी. वो अपने होश हवास गँवा कर चीख रही थी. वो इतने ज़ोर से सखलित हो रही थी कि उसने लगभग मुझे अपने उपर से हटा ही दिया था
आख़िरकार उसका जिस्म नरम पड़ गया और मैने उसे फिर से चोदना चालू कर दिया. इस बार धीरे धीरे और एक सी रफ़्तार से. मैं अपने जिस्म में होने वाली सनसनाहट को अच्छे से महसूस कर सकता था. मैं भी अपना स्खलन नज़दीक आता महसूस कर रहा था और मैं उस चुदाई को ज़्यादा से ज़्यादा खींचना चाहता था जब वो एकदम नरम पड़ गयी थी. मुझे उसे इस तरह चोदने में ज़्यादा मज़ा आ रहा था क्योंकि अब में अपनी सनसनाहट पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकता था और उसकी चूत में अपना पूरा लंड पेलते हुए उसकी चूत से ज़्यादा से ज़्यादा मज़ा ले सकता था.
मैने अपने अंडकोषों में हल्का सा करेंट दौड़ते महसूस किया और मुझे मालूम चल गया कि अब कुछ ही पल बचे हैं. मैं और भी तेज़ी से लंड चूत में पेलने लगा क्योंकि अब वो मज़ेदार सनसनाहट का एहसास बढ़ गया था. मेरी रफ़्तार लगातार बढ़ती जा रही थी, पूरी श्रष्टी का आनंद मैं अपने लंड के सिरे पर महसूस कर रहा था और अंत में मेरी हालत एसी थी कि मैं खुद को उसके जिस्म में समाहित कर देना चाहता था.
मैं इतने ज़ोर से स्खलित होने लगा कि मेरा जिस्म बेसूध सा हो गया. वो एक जबरदस्त स्खलन था और मैं बहुत जोश से उसके अंदर छूटने लगा. पहले मेरे लंड ने थोड़े से झटके खाएँ और फिर बहुत दबाव से मेरे वीर्य की फुहारे लंड से छूटने लगी. मुझे पक्का विश्वास है उसने भी मेरे वीर्य की चोट अपनी चूत के अंदर महसूस की होगी. एक के बाद एक वीर्य की फुहारें निकलती रही. मैं लंबे समय तक छूटता रहा. मैने खुद को पूरी ताक़त से उससे चिपटाये रखा जब तक वीर्यपतन रुक ना गया. आख़िरकार मैं उसके उपर ढह गया.
मैं थक कर चूर हो चुका था और वो मुझे अपनी बाहों में थामे हुए थी. कितना सुखदायी था जब माँ मुझे अपनी बाहों में थामे हुए थी और मेरा लंड उसकी चूत में घुसा हुआ था. आख़िरकार मेरा लंड नरम पड़ कर इतना सिकुड गया कि अब मैं उसे उसकी चूत के अंदर घुसाए नही रख सकता था. वो फिसल कर बाहर आ गया. वो मेरे लिए भी संकेत था, मैं उसके उपर से फिसल कर उसकी बगल मे लेट गया.
उसने मेरी ओर करवट ले ली और मुझे देखने लगी जबकि मैं अपनी सांसो पर काबू पाने का प्रयास कर रहा था. . आख़िरकार, जब मैं खुद पर नियंत्रण पाने में सफल हो गया, वो मुस्कराई, मेरे होंठो पर एक नरम सा चुंबन अंकित कर उसने पूछा: “तो, कैसा था? कैसा लगा तुम्हे?”
“मेरे पास शब्द नही हैं माँ कि तुम्हे बता सकूँ ये कितना अदुभूत था! कितना ज़बरदस्त! एकदम अनोखा एहसास था!”
“हूँ, सच में बहुत जबरदस्त था” वो बहुत खुश जान पड़ती थी. “मैने अपनी पूरी जिंदगी में इतना अच्छा कभी महसूस नही किया जितना अब कर रही हूँ”
वो उस मिलन हमारे मिलन के कयि मौकों में से पहला मौका था. हम ने बार बार दिल खोल कर एक दूसरे को प्यार किया. हम एक दूसरे के एहसासो को, एक दूसरे की भावनाओं को अच्छे से समझे और हम एक दूसरे के प्रति अपनी गहरी इच्छाओं को अपनी ख्वाहिशों को कामनाओं को भी बखूबी जान चुके थे और एक दूसरे को जता भी चुके थे. मेरे पिताजी के आने के बाद भी हम अपनी रात्रि दिनचर्या बनाए रखने में सफल रहे बल्कि हम ने इसका विस्तार कर इसे अपनी सुबह की दिनचर्या भी बना लिया जब मेरे पिताजी के ऑफीस के लिए निकलने के बाद वो मेरे कमरे में आ जाती और हम तब तक प्यार करते जब तक मेरे कॉलेज जाने का समय ना हो जाता. यह हक़ीक़त कि हमारा प्यार हमारा रिश्ता वर्जित है, हमारे मिलन को हमारे प्रेम संबंध को आज भी इतना आनंदमयी इतना तीब्र बना देता है जितना यह तब था जब कुछ महीनो पहले हमने इसकी शुरुआत की थी
समाप्त