इस बात पर असल में मुझे अब थोड़ा टेंशन भी होने लगा था. चाची के साथ अकेले रहते हुए कोई उलटा सीधा काम न कर बैठूं इसका मुझे बहुत टेंशन था. सवाल सिर्फ़ मेरा नहीं था, हमारे परिवार के साथ उनके संबंधों का था. घर में पता चल गया कि मैं उनपर बुरी नजर रखता हूं तो सीधा फांसी पर लटका दिया जाऊंगा यह मुझे पता था. इसलिये कुछ दिन की दिलफेक चाची पूजा के बाद अब मैंने फ़िर से मन उनसे हटाने का प्रयत्न करना शुरू कर दिया था.
दूसरे ही दिन हमारा सारा कार्यक्रम अलट पलट सा हो गया, चाची अभी हफ़्ते भर रहने वाली थीं. मेरी ट्रेनिंग को भी तीन हफ़्ते थे, याने जैसा कंपनी ने पहले बताया था. पर दूसरे ही दिन उनका फोन आया कि अगले सोमवार को ही याने एक हफ़्ते बाद ही ट्रेनिंग शुरू हो रही है और मैं तुरंत वहां आकर रिपोर्ट करूं.
मुझे अब तुरंत जाना जरूरी था, ट्रेन का रिज़र्वेशन बाद का था, अब मिलने की उम्मीद भी नहीं थी. बस से ही जाना पड़ता. वहां गोआ वाले घर में नीलिमा भाभी अकेली थीं, मेरी उनकी पहचान भी नहीं थी, वे भी दिन में नौकरी पर निकल जाती थीं. ये सब कैसे संभाला जाये? अब चाची को कैसे कहें कि आप भी विनय के साथ जल्दी वापस जायेंगी क्या? और बस के टिकट भी एक दो दिन बाद के मिल रहे थे. एक हफ़्ते के बाद के टिकट फ़ुल थे.
पर चाची ने समस्या आसान कर दी. जब उनको पता चला तो बोलीं कि सीधे हम दोनों का कल रात का बस टिकट निकाल लिया जाये, अब मैं गोआ जा रहा ही हूं तो वे भी मेरे साथ ही जायेंगीं, उनको भी साथ हो जायेगा. मां ने कहा कि विनय चला जायेगा, आप आराम से बाद में ट्रेन से जाइये पर वे एक ना मानीं.
परसों मैं चाची के साथ गोआ जाऊंगा यह एहसास ही बड़ा मादक था. मादक भी और थोड़ा परेशान कर देने वाला भी. अब तक तो खूब मन के पुलाव पकाये थे कि ऐसा करूंगा, वैसा करूंगा, अगर चाची ऐसे करें तो मैं वैसा करूंगा आदि आदि. अब जब वो घड़ी आ गयी, तो पसीना छूटने लगा.
दो दिन तक मैंने अपने मन को खूब संभाला, किसी तरह चाची के प्रति मन में उमड़ने वाले सारे रंगीन खयाल उफ़नने के पहले ही दबा दिये. उनको जितना हो सकता था, उतना अवॉइड किया. चाची का भी अधिकतर समय पूना में दूसरे रिश्तेदारों के यहां मिलने जाने में ही बीता, जिनसे वे अगले हफ़्ते में मिलने वाली थीं. यहां तक कि दूसरे दिन मेरा और चाची का सामना ही नहीं हुआ. अगले दिन शाम को बस स्टैंड को जाते वक्त मुझे करीब करीब विश्वास हो गया कि अब मैं चाची के साथ बिलकुल वैसे पेश आ सकता हूं जैसे उनके एक रिश्ते के उमर में उनसे बहुत छोटे लड़के को आना चाहिये.
हम टैक्सी में साथ गये तो मैं आगे ड्राइवर के साथ बैठ गया. चाची पीछे बैठी थीं. मैं सोच रहा था कि अगर उनके साथ बैठूं तो फ़िर जरा विचलित हो सकता हूं. पर यह नहीं दिमाग में आया कि अब गोआ की बस में रात भर उनके साथ ही बैठकर जाना है. और हुआ यह कि आखरी मौके पर मेरी सारी तपस्या पर पानी फिर गया क्योंकि सामान नीचे लगेज में रखकर जब हम बस में चढ़ रहे थे, तब चाची आगे थीं. मैं उनके ठीक पीछे था. बस के स्टेप्स पर चाची की साड़ी थोड़ी ऊपर हुई और मुझे फ़िर से उनकी दोनों मांसल चिकनी पिंडलियां दिखीं. पिंडलियों के साथ साथ उनके गोरे पांव में दो इंच हील वाली स्मार्ट काली चप्पल दिखी, और चप्पल के सोल से उनका पांव उठा होने से उनके पांव के गुलाबी कोमल तलवे दिखे. मेरे मन में फ़िर एक लहर दौड़ गयी, क्या खूबसूरत पांव हैं चाची के! और तभी मेरा खयाल उनके कूल्हों पर गया. बस में चढ़ते वक्त उनकी साड़ी कूल्हों पर टाइट होने की वजह से उनमें उनके भारी भरकम नितंबों का आकार साफ़ नजर आ रहा था.
याने बस में बैठते बैठते मैं फ़िर उसी चाची जिंदाबाद के मूड में आ गया. अब कुछ कह भी नहीं सकता था, मन में चोर था इसलिये बस चुप बैठा रहा और एक किताब पढ़ने लगा. चाची को शायद लगा होगा कि हमेशा उनसे दिल खोलकर गप्पें मारने वाला विनय ऐसा चुप चुप क्यों है, पर वे कुछ बोली नहीं.
रात के करीब दस बजे थे. बस छूटकर काफ़ी समय हो गया था. बीच में बस एक होटल पर खाने पीने के लिये रुकी थी. वहां से छूटने के बाद सब सोने की तैयारी करने लगे थे. बस के लाइट बंद कर दिये गये थे और अधिकतर लोग सो भी गये थे. स्नेहल चाची बोलीं “अरे विनय बेटे, जरा वो शाल निकाल ले ना बैग में से, थोड़े ठंडक सी है”
मैंने ऊपर से बैग उतारा और शाल निकाल ली और उनको दी. उन्होंने उसे पूरा खोल कर अपने बदन पर लिया और मुझे भी ओढ़ा दी. मैं बोला “चाची … रहने दीजिये ना … आप ले लीजिये … मुझे इतनी ठंड नहीं लग रही”
“अरे वाह … सर्दी हो जायेगी तो? … चुपचाप ओढ़ ले, तुझे चार पांच दिन में ऑफ़िस जॉइन करना है, अब सर्दी वर्दी की झंझट मत मोल ले” उन्होंने कहा. मैंने भी शाल ओढ़ ली. सीटों के बीच का आर्मरेस्ट चाची ने ऊपर कर दिया था और एक शाल के नीचे अब हम दोनों के कंधे करीब करीब आपस में चिपक गये थे. चाची ने आज कोई सेंट लगाया था, उसकी हल्की भीनी खुशबू मुझे आ रही थी. वे सेंट कभी कभार ही लगाती थीं, जैसे शादी के मौकों पर. मैंने सोचा आज बस से जाना है तो फ़्रेश रहने के लिये लगा लिया होगा.
अब उनके साथ कंधे से कंधा भिड़ा कर बैठने के बाद एक एक करके मेरे सारे सुविचार ध्वस्त हो गये, इतना सोचा था कि अब चाची के बारे में उलटा सीधा नहीं सोचूंगा, मन पर काबू रखूंगा आदि आदि. पर अब बार बार दिमाग में कौंधते वही सीन जो मुझे विचलित कर देते थे, उनकी पिंडलियां, उनके पांव और तलवे, झुकने पर दिखे उनके स्तन, उनकी पीठ के ब्लाउज़ में से दिखती ब्रा की पट्टी ….! जो नहीं होने देना था वही हुआ, धीरे धीरे मेरा बदमाश लंड सिर उठाने लगा. मैं डेस्परेटली उसे बिठाने के लिये इधर उधर की सोचने लगा, कहीं चाची के सामने पर्दा फाश हो गया तो अनर्थ हो जायेगा.
शाल ओढ़ने के करीब दस मिनिट बाद अचानक मुझे महसूस हुआ कि चाची का हाथ मेरी जांघ पर आधा आ गया था, आधा नीचे सीट पर था. मैंने बिचक कर सिर घुमा कर उनकी ओर देखा वो वे आंखें बंद करके शांत बैठी हुई थीं. मैं जरा सीधा होकर बैठ गया. लगा कि आधी नींद में उनका हाथ सरक गया होगा. एक मिनिट बाद चाची ने हाथ हटाकर सीट पर रख दिया पर अब भी वो मेरी जांघ से सटा हुआ था. दो मिनिट बाद उन्होंने फिर हाथ उठाया और मेरी जांघ पर रख दिया. मैं चुप बैठा रहा, लगा अनजाने में स्नेह से रख दिया होगा, मुझे दिलासा देने के लिये.
पांच मिनिट बाद बस एक पॉटहोल पर से गयी और जरा धक्का सा लगा. उस धक्के से चाची का हाथ ऊपर होकर फ़िर नीचे हुआ और इस बार सीधे मेरी ज़िप पर ही पड़ा. पर उन्होंने हटाया नहीं; मुझे लगा कि उन्हें नींद आ गयी थी इसलिये नहीं हटाया. पर अब हाथ का वजन सीधा मेरे लंड पर पड़ रहा था. बस के चलने के साथ हाथ थोड़ा ऊपर नीचे होकर मेरे लंड पर दब रहा था. एक पल मैंने सोचा कि हाथ उठाकर बाजू में कर दूं, फ़िर लगा कि ऐसा किया तो वे न जाने क्या समझें कि जरा सा हाथ लग गया तो ये लड़का ऐसे बिचकता है … बुरा न मान जायें.
मैंने हाथ वैसे ही रहने दिया. उसका वजन और स्पर्ष मुझे बड़ा मादक लग रहा था. अब टेन्शन यह था कि मेरे लंड ने अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया तो चाची को जरूर पता चल जायेगा और फ़िर … सब स्वाहा! क्या करूं समझ में नहीं आ रहा था. किसी तरह अपने होंठ दांत तले दबाकर भजन वजन याद करता हुआ मैं अपना दिमाग उस मीठे स्पर्ष से हटाने की कोशिश करने लगा.
कुछ देर के बाद चाची ने एक दो बार मेरी पैंट को ऊपर से दबाया और फ़िर उसपर हाथ फिराने लगीं. अब शक की गुंजाइश ही नहीं थी, चाची ये सब जान बूझकर पूरे होश में कर रही थीं, सीधे कहा जाये तो मुझे ’ग्रोप’ कर रही थीं.
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. चाची के इस करम से एक क्षण को जैसे मुझे लकवा मार गया था, और मेरा सिर गरगराने लगा था …. कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि चाची के मन में ऐसा कुछ होगा. कितना छोटा था मैं उनसे! याने उनके बेटे से भी छोटा था. एक बार लगा कि यह ठीक नहीं है, उनका हाथ अलग कर दूं पर ऐसा करना उनकी इन्सल्ट करना होता. और मैं यह करना भी नहीं चाहता था, उनका हाथ मुझे जो सुख दे रहा था, उस सुख को मैं आखिर क्यों छोड़ देता? फ़िर जब मैंने याद किया कि पिछले हफ़्ते मैं उनके बारे में कैसी कैसी कल्पनायें करता था, खास कर हस्तमैथुन करते समय, तो मेरा लंड जैसे लगाम से छूट गया, फटाफट उसने अपना सिर उठाना शुरू कर दिया. चाची को भी मेरे लंड के खड़े होने का एहसास हो गया होगा क्योंकि उनके हाथ का दबाव बढ़ गया और वे और जोर से उसे पैंट के ऊपर से ही घिसने लगीं.
आखिर मैंने लंड में होती उस स्वर्गिक मीठे गुदगुदी के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. आंखें बंद करके बैठ गया और जो हो रहा था, उसका मजा लूटने लगा. वो कहते हैं ना कि ’नेवर लुक अ गिफ़्ट हॉर्स इन द माउथ’. अब अगर चाची ने ही पहल की थी तो मुझे कोई पागल कुत्ते ने नहीं काटा था, कि इस सुख से खुद ही वंचित हो जाऊं.
जल्द ही मेरा तन के खड़ा हो गया. मेरी टाइट पैंट के कपड़े को भी तानकर तंबू बनाने लगा. चाची अब उस तंबू को हथेली से पकड़कर मेरे लंड को दबाने लगीं. ऐसा लगने लगा कि झड़ ना जाऊं. मुझसे न रहा गया, मैंने चाची का हाथ पकड़कर उनका ये मीठा अत्याचार रोकने की कोशिश की तो उन्होंने मेरे हाथ पर जोर से चूंटी काट ली. तिलमिला कर मैंने उनकी ओर देखा तो आंखें बंद किये किये ही धीमे स्वर में बोलीं “ऐसा चुलबुल क्यों कर रहा है रे मूरख! ठीक से बैठा रह चुप चाप. लोग सो रहे हैं”
मैं चुप हो गया. चाची ने अब मुझे सताने का गियर बदला, याने और हाई गीयर लगाया. शाल के नीचे ही धीरे से मेरी ज़िप खोली, उसमें हाथ डालकर मेरे अंडरवीयर के फ़ोल्ड में हाथ डाला और मेरे लंड को पकड़कर धीरे धीरे बड़ी सावधानी से बाहर निकाला. अब आप को अगर यह मालूम है कि कस के खड़ा लंड ऐसा अपनी ब्रीफ़ के फ़ोल्ड में से निकालने में कितनी परेशानी होती है, तो आप समझ सकते हैं कि चाची ने कितनी सफ़ाई से और सधे हाथों से ये किया होगा.
लंड को बाहर निकालकर वे पहले उसे मुठ्ठी में पकड़कर दो मिनिट बैठी रहीं, शायद मुझे संभलने का मौका दे रही थीं कि मैं एकदम से झड़ ना जाऊं. फ़िर उन्होंने पूरे लंड को सहलाया, दबाया, हिला कर देखा. वे बिलकुल ऐसा कर रही थीं जैसे किसी नयी चीज को खरीदने के पहले पड़ताल कर देखते हैं, या जैसे कोई गन्ना लेने के पहले उसे देखे कि कितना रस है उसमें! फ़िर उन्होंने मेरे नंगे सुपाड़े को एक उंगली से सहलाया, जैसे उसकी नंगी स्किन की कोमलता का अंदाज ले रही हों. फ़िर अपना हाथ खोलकर हथेली बनाकर मेरे शिश्नाग्र पर अपनी हथेली रगड़ने लगीं.
मुझे यह सहन होने का सवाल ही नहीं था. ऐसे खुले नंगे सुपाड़े पर कुछ भी रगड़ा जाये, तो मैं सहन नहीं कर पाता. मजा आता है पर नस नस तन जाती है. मैंने एक गहरी सांस ली और किसी तरह सहन करता रहा. पर फ़िर शरीर अकड़ सा गया, सांस थम सी गयी. लगातार कोई झड़ने का इंतजार करे और झड़ न पाये तो कैसा होता है. आखिर मेरी सहनशक्ति जवाब दे गयी. पर मैंने फिर से चाची का हाथ पकड़ने का प्रयत्न नहीं किया, बस उनकी ओर देखकर धीरे से मिन्नत की “चाची … प्लीज़ … कैसा तो भी होता है … सहा नहीं जा रहा …”
“ये पहले सोचना था ना ऐसे गंदे गंदे खयाल आने के पहले? मेरी ओर बुरी नजर से देखता है ना? पिछले कई दिनों से मैं देख रही हूं तेरे रंग ढंग! समझ ले उसकी सजा दे रही हूं. अब चुपचाप आंखें बंद कर, और बैठा रह. सोया है ऐसे दिखा. और खबरदार मुझसे फ़िर बोला या मेरा हाथ पकड़ा तो” दो पल के लिये अपना हाथ रोककर स्नेहल चाची मेरे कान के पास अपना मुंह लाकर धीरे से बोलीं. फ़िर शुरू हो गयीं. अपनी हथेली से वे मेरे सुपाड़े को इस तरह से रोल कर रही थीं जैसे कोई आटे की गोली को परात में रोल कर रहा हो. बीच में लड्डू जैसा पकड़तीं, दबातीं पुचकारतीं और फ़िर शुरू हो जातीं. इसी तरह काफ़ी देर सुपाड़े को सता कर फ़िर उन्होंने लंड का डंडा पकड़ लिया और ऊपर नीचे करने लगीं. उनका अंगूठा अब मेरे सुपाड़े के निचले मांसल भाग पर जमा था और उसे मसल रहा था.
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं. तीव्र कामसुख में मैं गोते लगा रहा था. मजे ले लेकर मुठ्ठ मारना यह सिर्फ़ मर्दों को ही जमता है, लंड को कैसे पकड़ना, कैसे दबाना, कहां घिसना, यह अधिकतर स्त्रियों की समझ के बाहर है. चाची पहले थोड़ी देर मेरे लंड के ऊपर एक्सपेरिमेंट करती रहीं. मुझे अच्छा लगे या न लगे, इससे उनका कोई सरोकार नहीं था. मेरी परेशानी भी बढ़ गयी थी, और यह भी पल्ले नहीं पड़ रहा था कि कब इससे छुटकारा मिलेगा. पर जल्दी ही उन्होंने अचूक अंदाजा लगा लिया कि मुझे किसमें ज्यादा मजा आता है. उसके बाद तो उन्होंने मुझपर ऐसे ऐसे जुल्म किये कि क्या कहूं. मुझसे वे कैट एंड माउस का गेम खेलने लगीं. मुझे स्खलन की कगार पर लातीं और फ़िर हाथ हटा लेतीं, जब मेरा लंड थोड़ा शांत होकर अपना उछलना कूदना बंद करता, वे फ़िर शुरू हो जातीं.
दस मिनिट के इस तीव्र असहनीय सुख के बाद अब मैं ऐसी मानसिक स्थिति में आ गया था कि करीब करीब चाची का गुलाम हो गया था. मेरे लिये वे अब दुनिया की सबसे सेक्सी स्त्री बन गयी थीं, वे इस वक्त मुझे जो कहतीं मैं चुपचाप मान लेता. कब उनके उस मांसल खाये पिये नरम नरम बदन को बाहों में लेकर उनके जगह जगह चुंबन लेता हूं, ऐसा मुझे हो गया था. पर वह करना संभव नहीं था, बस में आखिर कोई कितना प्रेमालाप कर सकता है! और ऊपर से चाची ने मुझे सख्त हिदायत दी थी कि चुप बैठा रहूं, उनकी आज्ञा न मानने का मुझमें साहस नहीं था.
मेरी उस डेस्परेट अवस्था में कुछ न कुछ तो होना ही था. पागल न हो जाऊं इतने असीम सुख में डूब कर आखिर मैंने अपना हाथ उठाकर उनके स्तन को पकड़ने का प्रयत्न किया. अब नीचे रखा हाथ उलटा मोड़ कर ऊपर उनका स्तन पकड़ना मुझे नहीं जम रहा था. मैंने एक दो बार ट्राइ किया और फिर चाची ने अपने दूसरे हाथ से मेरा हाथ पकड़कर फिर नीचे कर दिया. दो मिनिट मैंने फ़िर से सहन किया और जब रहा नहीं गया तो उनकी जांघ पर हाथ रख दिया. वे कुछ नहीं बोलीं, उनका हाथ मेरे लंड को सताता रहा, हां उन्होंने अपने जांघें फैला दीं. याने अब तक वे अपनी जांघें आपस में जोड़ कर बैठी थीं.
अपनी टांगें फैलाना ये मेरे लिये उनकी एक हिंट थी. पर अब मैं पशोपेश में पड़ गया. याने उन्होंने सलवार वगैरह पहनी होती तो नाड़ी खोल कर हाथ अंदर डालने की कोशिश मैं कर सकता था. अब साड़ी होने की वजह से कैसे उनकी साड़ी और उसके नीचे के पेटीकोट में से हाथ अंदर डालता! कोशिश करता तो साड़ी खुलने का अंदेशा था. आखिर मैं साड़ी के ऊपर से ही उनकी जांघें दबाने लगा. सच में एकदम मोटी ताजी भरी हुई जांघें थीं. उनको दबा कर सहला कर आखिर मैंने अपना हाथ साड़ी के ऊपर से ही उनकी टांगों के बीच घुसा दिया. वे शायद इसी की राह देख रही थीं क्योंकि तुरंत उन्होंने अपनी टांगें फिर से समेट लीं और मेरा हाथ उनके बीच पकड़ लिया. मैंने हाथ और अंदर डाला और फ़िर चाची ने कस के मेरा हाथ अपनी योनि के ऊपर दबा कर जांघें आपस में घिसना शुरू कर दिया.
क्या समां था! स्नेहल चाची अब अपने हाथ से मेरा हस्तमैथुन करा रही थीं और खुद मेरे हाथ को अपनी टांगों के बीच लेकर रगड़ रगड़ कर स्वमैथुन कर रही थीं. मुझे ऐसा लगने लगा कि यह टॉर्चर रात भर चलेगा, मैं पागल हो जाऊंगा पर इस मीठी छुरी से मुझे छुटकारा नहीं मिलेगा, जब गोआ उतरूंगा तो सीधे पागलखाने में जाना पड़ेगा. शायद सच में यही मेरा पनिशमेंट था.
पर दस एक मिनिट में मुझे छुटकारा मिल ही गया. मेरा लंड अचानक उछलने लगा. चाची ने शायद रुमाल अपने दूसरे हाथ में तैयार रखा था क्योंकि तुरंत उन्होंने मेरे सुपाड़े को रुमाल में लपेटा, और दूसरे हाथ से मेरे लंड को हस्तमैथुन कराती रहीं. मैं एकदम स्खलित हो गया. दांतों तले होंठ दबाकर अपनी आवाज दबा ली, नहीं तो जरूर चिल्ला उठता. गजब की मिठास थी उस झड़ने में. मेरा लंड मच मचल कर वीर्य उगलता रहा और चाची उसे बड़ी सावधानी से रुमाल में इकठ्ठा करती रहीं.
मेरा लंड शांत होने पर चाची ने रुमाल से उसे पोछा और रुमाल बाजू में रख दिया. मेरा लंड अंदर पैंट में डाला और ज़िप बंद की. रुमाल को फ़ोल्ड करके उन्होंने अपनी पर्स में रख लिया. मैंने उनकी ओर देखा तो बस के नाइटलैंप के मंद प्रकाश में उनकी आंखों में मुझे एक बड़ी तृप्ति की भावना दिखी जैसे अपने मन की कर ली हो. मुझे अपनी ओर तकता देख कर जरा मुस्कराकर बोलीं “आज छोड़ दिया जल्दी तुझपर दया करके. चल अब सो जा. अब गोआ आने दे, फ़िर देखती हूं तुझओ. सब बदमाशी भूल जायेगा”
पर मेरा हाथ अब भी उनकी जांघों की गिरफ़्त में था. उसको अपनी क्रॉच में दबा कर वे लगातार जांघें आपस में घिस रही थीं. मैंने वैसे ही साड़ी पेटीकोट और पैंटी इन तीन तीन कपड़ों के ऊपर से जितना हाथ में आ रहा था, उनकी योनि का उतना भाग पकड़ा,और दबाने और घिसने लगा. पांच मिनिट के बाद चाची का बदन अचानक पथरा सा गया, वे दो मिनिट मेरे हाथ को कस के दबाये हुए एकदम स्थिर बैठी रहीं, फ़िर एक लंबी सांस छोड़कर उन्होंने मेरे हाथ को छोड़ा, अपनी साड़ी ठीक की और आंखें बंद कर लीं.
मेरे मन में विचारों का तूफ़ान सा उमड़ पड़ा था. बहुत देर तक मुझे नींद नहीं आयी. सुनहरे सपने आंखों के आगे तैर रहे थे. स्नेहल चाची – उस सादे रहन सहन और व्यक्तित्व के पीछे कितना कामुक और मस्तीभरा स्वभाव छुपा हुआ था! और अब तीन महने मैं उनके यहां रहने वाला था. वे मुझे क्या क्या करने देंगीं अपने साथ, इस शारीरिक सुख के स्वर्ग के किस किस कोने में ले जायेंगी यही मैं सोच रहा था. वैसे थोड़ा डर भी था मन में, उनकी वह स्ट्रिक्ट हेड मिस्ट्रेस वाली छवि मेरे दिमाग में से गयी नहीं थी, बल्कि और सुदृढ़ हो गयी थी. अब भी वे मुझे सबक सिखाने की धमकी दे रही थीं. उनसे कोई भी सबक सीखने को वैसे मैं तैयार था. फ़िर यह भी मेरे दिमाग में था कि वहां उस घर में मैं और वे अकेले नहीं रहने वाले थे. उनकी बहू, नीलिमा भाभी भी थी, और नौकर चाकर भी होंगे शायद. पर फ़िर मैंने इसपर ज्यादा सोचना बंद कर दिया. स्नेहल चाची ने इसका उपाय भी सोच रखा होगा.
यही सब बार बार मेरे दिमाग में घूम रहा था. चाची शायद जल्दी ही सो गयी थीं. एक बार लगा कि उनसे थोड़ा सा चिपक जाऊं, उनके मुलायम बदन को थोड़ा तो महसूस करूं, उन्हें नींद में पता भी नहीं चलेगा, पर फ़िर हिम्मत नहीं हुई. यही सब सोचते सोचते बहुत देर तक मैं बस इधर उधर सीट पर ही करवट बदलता रहा. शायद सुबह तीन बजे के करीब मेरी आंख लगी.
सुबह छह बजे हम पणजी पहुंचे. मेरी नींद नहीं हुई थी इसलिये थका थका सा लग रहा था. चाची फ़्रेश लग रही थीं, मेरे ऊपर वो करम करके वे आराम से सो गयी थीं. ऑटो से घर जाते वक्त मैंने चाची की ओर देखा. कल बस में जो हुआ, उसके बाद दिन की रोशनी में उनसे क्या और कैसे बोलूं ये मेरे लिये बड़ा धर्मसंकट था. उनसे आंखें भी नहीं मिला पा रहा था. इसलिये मैं बस चुप रहा. मेरा टेंशन देख कर ऑटो में स्नेहल चाची ने मेरी जांघ थपथपायी जैसे कह रही हों कि चिन्ता मत कर, इतना भी मत डर, सब ठीक हो जायेगा.
चाची का घर पणजी से पांच किलोमीटर पर पोर्वोरिम में था. वो भी शहर के थोड़ा बाहर. पुराना पोर्चुगीज़ बंगला था, आजू बाजू में गार्डन था. इतना बड़ा गार्डन था कि छोटे फ़ार्महाउस जैसा ही लग रहा था. आस पास दूर पर एक दो ऐसे ही बंगले और थे, बाकी तो सब हरियाली और बगीचे ही थे. मैं ऑटो को पैसे देने लगा तो चाची ने मेरा हाथ पकड़ लिया. “अब जब तक तू यहां है विनय, ऐसे बिना पूछे पैसे वैसे देना नहीं. मैं जो कहूंगी, बस वही करना. समझ गया ना? और खुद पर काबू रखना, दिमाग को ऐसे बहकने नहीं देना”
मैंने उनकी ओर देखा. उनकी आंखों में यह कहते हुए डिसिप्लिन के साथ थोड़ा आकर्षण भी झलक रहा था. मैं समझ गया, वे सजा देंगी तो भी शायद उसके पीछे उनका भी एक उद्देश्य होगा. चाची ये क्यों कह रही थीं, सिर्फ़ पैसे देने के बारे में नहीं, यहां रहते हुए हर चीज के बारे में कि वे कहें, मैं वैसा ही करूं. और जो उन्होंने कहा कि खुद कुछ मत करना, इसके पीछे उनका क्या मतलब था यह भी मैं थोड़ा समझ गया था. मैं धीमे स्वर में नीचे देख कर बोला “ठीक है चाची”
हम बंगले के अंदर आये. मैंने मन में सोच लिया था कि खुद कुछ करने की झंझट मैं अब नहीं करने वाला. जो करेंगी, वो चाची ही करेंगी. अंदर ड्राइंग रूम में हम पहुंचे तब तक नीलिमा, उनकी बहू वहां आ गयी थी. “ममी, मैंने देख लिया था अपने रूम से आपका ऑटो. नीचे आ ही रही थी. चलो अच्छा हुआ कि आप जल्दी आ गयीं.” फ़िर मेरी ओर देखकर बोली “यह विनय है ना? शादी में नहीं आया था पर एक पुराने फोटो पर से पहचान लिया मैंने”
सोफ़े पर बैठते हुए चाची बोलीं “हां और इसको मैं साथ ही ले आयी. इसकी ट्रेनिंग है पणजी में अगले हफ़्ते से. और यह कह रहा था कि वहां गेस्ट हाउस में रहेगा! मैं कान पकड़कर साथ ले आयी कि चुपचाप मेरे साथ चल”
नीलिमा हंस कर बोली “अच्छा किया ममी. यहां अपना घर होते हुए यह ऐसे वहां होस्टल में रहे? और चलिये अब इतने बड़े घर में बस हम दोनों बोर नहीं होंगे. आप नहीं थीं तो अकेले रह कर पागल हो जाऊंगी ऐसा लग रहा था. वैसे वो विमलाबाई रहती थीं सुबह और शाम को. तुम बैठो विनय, मैं चाय बना लाती हूं” जिस तरह से उसका चेहरा आनंदमय हो गया था, उससे यह साफ़ था कि इन सास बहू में अच्छी पटती थी. ऐसा बहुत कम सास बहुओं में होता है. इसलिये मुझे भी पारिवारिक सुख का यह प्रमाण देखकर प्रसन्नता हुई.
ड्राइंग रूम इतना बड़ा था कि लगता है हमारे दो रूम मिलाकर भी उतने बड़े नहीं होते. आखिर गोआ का पुराना बंगला था. बड़ा अच्छा सजा हुआ था. पुराना पर कीमती फ़र्निचर, दीवालों पर कुछ पुरानी सुंदर पेंटिंग्स, सजावट का सामान इत्यादि.
चाय पीते पीते मैंने नजर चुराकर नीलिमा भाभी को नजर भर कर देख लिया. चेहरा एकदम स्वीट था, सुंदर ही था. बाल भी लंबे थे जिसकी एक वेणी उसने बांधी हुई थी. पहली नजर में – फ़र्स्ट इम्प्रेशन – वह मुझे काफ़ी भरे हुए बदन की लगी, याने मोटी सी, जबकि वह चाची से दो इंच ऊंची ही थी. फ़िर कारण मुझे समझ में आया. असल में उसका शरीर प्रमाणबद्ध ही था, कमर भी पतली सी थी. गाउन में से उसके स्तनों का उभार भी मीडियम था याने न ज्यादा बड़े स्तन थे न एकदम छोटे. याने कमर के ऊपर का भाग एकदम ठीक था, हां कमर के नीचे उसके कूल्हे एकदम चौड़े थे. पैर गाउन में से दिख तो नहीं रहे थी पर ऐसा लग रहा था कि टांगें भी मजबूत ही होंगी. इसीलिये कुल मिलाकर एकदम देखो तो ऐसा लगता था कि वह थोड़ी मोटी है. पर वह केवल इल्यूझन जैसा था. वह मोटी नहीं थी, बस कमर के नीचे का भाग भारी था.
मैंने अपने विचारों को लगाम लगायी. खुद को एक गाली दी कि चाची के पीछे पागल होकर और फ़िर कल हुई घटना से अब क्या तू हर औरत को ऐसी वासना की नजर से देखेगा? उनके हर अंग का अंदाजा लगायेगा? माना कि कल जो हुआ वह बहुत मादक और उत्तेजक था पर इस बात की क्या गारंटी थी कि आज भी ऐसा होगा? और नीलिमा भाभी भी घर में थी. उनसे नजर छुपा कर कब और क्या होगा, यह भी पक्का नहीं था. मेरा मन थोड़ा निराश सा हो गया, याने बहुत मीठे लड्डू को टेस्ट करने के बाद बच्चा यह आशा करे कि अब पूरा लड्डू मिलेगा और फ़िर कोई उससे कहे कि बेटा, अब एक ग्लास पानी पी के सो जा.
चाय पीते पीते चाची और नीलिमा में घर के बारे और इधर उधर की बातें होती रहीं. तब तक मैं टहल कर घर देख रहा था. नीचे ड्राइंग रूम के साथ एक बड़ा किचन और एक बेडरूम था; ऊपर सीढ़ी जाती थी. मैंने सीढ़ी पर से देखा तो वहां तीन दरवाजे थे. थोड़ा ऊपर गया. ऊपर एक छोटा ड्राइंग रूम था और तीन बड़े बड़े बेडरूम थे. एक बड़ी बाल्कनी थी.
मैं नीचे आया तो नीलिमा और चाची की गप्पें अब भी चल रही थीं. मैं बैठकर अखबार पढ़ने लगा. आधे घंटे बाद नीलिमा उठी और चाय के कप समेटने लगी. “अरे बैठ ना, इतनी क्या जल्दी है तेरे को काम करने की? आज छुट्टी है ना?” चाची ने उसे कहा.
“कहां ममी! ऑफ़िस में ज्यादा काम है, इसलिये अब मुझे कई बार पूरे दिन के लिये जाना पड़ता है. आने में सात बज जायेंगे, इसलिये मैं खाना बनाकर जाऊंगी. विनय को भूख लगी हो तो परोस भी दूंगी उसे”
“खाना बनाने वो विमलाबाई आती हैं ना?” चाची ने पूछा.
“कल उनकी तबियत ठीक नहीं थी. अब शायद एक दो दिन ना आयें. पर आप चिंता मत करो ममीजी. मुझे कोई परेशानी नहीं है. विनय, तू अपना सामान रख ले बेडरूम में, तब तक मैं ब्रेकफ़ास्ट बनाती हूं. फ़िर रिलैक्स करना