अल्का

कई बार इंसान जीवन के जिस अध्याय को बंद कर देना चाहता है वही बारबार खुल कर उस के सामने आ जाता है. ममता के लिए अल्का ऐसे ही एक अध्याय का हिस्सा थी.

‘‘मम्मी, चयन समिति ने 5 नाम छांटे हैं. उन्होंने जिस की सिफारिश की है उस के पास योग्यता तो है परंतु अनुभव नहीं है.’’
‘‘कौन है?’
‘‘एक लड़की अल्का है.’’
‘‘बाकी?’’
‘‘बाकी के पास योग्यता के साथ अनुभव भी है परंतु चयन समिति का कहना है कि उन के पास क्रिएटिविटी का अभाव है. हम उसे कुछ दिन ट्रेनी के रूप में रख सकते हैं.’’
‘‘लेकिन हम ने कोई ट्रेनिंग सैंटर तो खोला नहीं है परंतु चयन समिति को जब काम सौंपा है तब उस पर विश्वास भी करना पड़ेगा. इस समिति की सलाह हमेशा सही ही साबित हुई है. फिर कोई भी हो, उस के साथ कुछ समय सिखाने में ही निकल जाता है.’’
यह बातचीत ‘अमित ग्रुप औफ इंडस्ट्रीज’ की चेयरपर्सन ममता और उन के बेटे अमित में हो रही थी. अमित बोला, ‘‘मम्मी, आप ने इस लड़की का बायोडाटा देखा?’
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‘‘क्यों?’’
‘‘उस की मम्मी का नाम अमिता है और उस के पापा का नाम भी वही है जो मेरे पापा का नाम है.’’
अमित की बात सुन कर ममता ने उस का बायोडाटा देखा और बोलीं, ‘‘यह संयोग भी हो सकता है, बेटा.’’
वैसे, बेटे की बात ने मां को भी सोचने को मजबूर कर दिया था. अमिता, जिस के नाम पर उन के पति ने अपनी कंपनी का नाम ‘अमिता ग्रुप औफ इंडस्ट्रीज’ रखा था, उन की प्रेमिका थी. उस के साथ उन की शादी नहीं हो पाई क्योंकि वे परिवार के दबावके आगे झुक गए थे. उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी से अपने प्रेमप्रसंग का खुलासा कर दिया था और कहा था कि मुझ से शादी करने पर तुम मेरे शरीर को तो पा लोगी लेकिन मेरे दिल को नहीं पा सकोगी क्योंकि उन के दिल में तो अमिता ही रहेगी. उन की होने वाली पत्नी यानी ममता ने यह कह कर क्लीनबोल्ड कर दिया था, ‘मैं अपने प्यार से आप के दिल में भी स्थान बना लूंगी.’

शादी हुई दोनों हनीमून पर भी गए. लेकिन जब नई कंपनी बनाई तब उस का ‘अमिता’ नाम रखने के लिए वे अड़ गए थे. जहां घर वाले उस की याद पूरी तरह मिटाना चाहते थे वहीं वे इस बहाने उस की याद बनाए रखना चाहते थे. इस बार उन की बात मान ली गई क्योंकि उन्होंने धमकी दे दी थी, ‘उस से मेरी शादी तो आप सब ने नहीं होने दी पर अब यदि मेरी बात नहीं मानी तो मैं घर छोड़ कर चला जाऊंगा.’ उस दिन पहली बार स्वीकार किया कि उन्होंने उस से मंदिर में शादी कर ली थी हालांकि इस का पत्थर की मूर्ति के अलावा कोई गवाह नहीं था और मूर्ति बोलती नहीं. लेकिन शादी के बाद वे अपनी पत्नी के प्रति वफादार रहे. इसलिए जब अमिता उन के पास आई तब उसे बेइज्जत कर भगा दिया. उस के यह कहने पर कि वह उन के बच्चे की मां बनने वाली है, तब उन्होंने कह दिया कि क्या पता, किस का दोष है जो मेरे ऊपर मढ़ रही है. वही सबकुछ, जो एक पैसे वाला करता है, उस को जितना बेइज्जत कर सकते थे, किया.
उस के जाने के बाद कई दिन तक वे सामान्य नहीं हो पाए थे.
जब बेटे का जन्म हुआ तब उन्होंने उस का नाम ‘अमित’ रखा. समय के साथ सबकुछ ठीक हो गया था. परंतु अल्का के आने से एक बार फिर पुराने घाव हरे हो गए. हालांकि अब पति तो इस दुनिया में नहीं रहे. पिछले साल उन का देहांत हो गया था.
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‘‘मम्मी, क्या सोचा है?’’
ममता ने मन ही मन सोचा, ‘तो यह है उन के पति का अंश. उस के बायोडाटा से और चयन समिति की सिफारिश से ममता खुश थीं और अगर आज अमित के पापा जिंदा होते तो अल्का को देख कर बहुत खुश होते. वे बोलीं, ‘‘उसे रख लो. तुम्हारे पापा के अंश को इस प्रकार छोड़ भी तो नहीं सकते.’’

‘‘लेकिन मम्मी, अभी यह क्लीयर तो नहीं हुआ है कि वह पापा की ही बेटी है?’’
‘‘उसे रख लो. उस में योग्यता तो है ही. उस पर नजर रखो.’’
अल्का को रख लिया गया. दो जोड़ी आंखें अल्का पर लगी हुई थीं. उस ने धीरेधीरे कंपनी में अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया. वह भूल गई कि वह मात्र एक ट्रेनी है. उस का व्यवहार ऐसा था जैसे वह इस कंपनी की मालकिन है. हर कर्मचारी को डांट देती, फिर फौरन माफी मांग लेती. यह नहीं देखती कि सामने वाला उस से पद में बड़ा है या छोटा. कोई उस की बात का बुरा नहीं मानता क्योंकि वह हर किसी की मदद को हमेशा तैयार रहती. सब यह कहने लगे कि ‘साहब वापस आ गए’ क्योंकि साहब भी यही करते थे. लेकिन उस की यह विशेषता अमित की नजरों में आ गई. वह अपनी मम्मी से बोला, ‘‘मम्मी, पापा भी तो ऐसा ही करते थे. पापा की इस आदत ने उन को कर्मचारियों में लोकप्रिय बनाया और इस की यह आदत भी इसे लोकप्रिय बना रही है.’’
ममता भी यह देख रही थीं. कभीकभी वह अमित को भी जवाब दे देती. वह इस का बुरा नहीं मानता. हंस कर रह जाता. हां, बाद में अपनी गलती का एहसास होने पर वह अमित से ‘सौरी सर’ कह कर माफी मांग लेती.
उस दिन ममता के पूछने पर बोली, ?‘‘मैडम, मेरा कोई भाई नहीं है. बौस में मुझे भाई की झलक दिखती है और मैं अपने भाई को गलती करते नहीं देख सकती. इसलिए भूल जाती हूं कि वे मेरे बौस हैं.’’
‘‘तुम जैसा आचारव्यवहार कर रही हो वैसे ही करती रहो. मुझे और अमित, किसी को भी तुम्हारा यह व्यवहार बुरा नहीं लगता. तुम्हारे पापा क्या करते हैं?’’
‘‘पापा नहीं हैं. बस, मैं हूं और मेरी मम्मी, 2 ही जने हैं. मम्मी और पापा ने अपनेअपने घर वालों से छिप कर मंदिर में शादी की थी पर पापा ने घर वालों के दबाव में परिवार द्वारा पसंद की लड़की से शादी कर ली. और जब मम्मी ने पापा से मुलाकात की तो उन को बेइज्जत कर बाहर निकाल दिया. वहां से निराश हो कर मम्मी ने आत्महत्या की कोशिश की पर बचा ली गईं. उन को दुख इस बात का नहीं था कि उन्होंने उस को ठुकरा दिया बल्कि दुख इस बात का था कि उन के चरित्र पर आक्षेप लगाया था.’’
ममता इस समय अल्का से यह कह नहीं पाईं कि उस के पापा भी कई दिन तक गुमसुम रहे क्योंकि उन को भी खुद पर क्रोध आया था कि उस की मम्मी के चरित्र पर शक किया था. ममता सुन रही थीं और उन का अनुमान सही साबित हो रहा था यानी अल्का उन के पति का ही अंश है. परंतु उन को लगा कि अभी उसे बताने का समय नहीं आया था. हां, उस के प्रति उन का व्यवहार अब एक अधिकारी और कर्मचारी भर का नहीं रह गया. कभी औफिस में देर हो जाने पर कंपनी की टैक्सी नहीं जाती बल्कि खुद अमित छोड़ने जाता और वहां पहुंच कर वह उस की मम्मी से जरूर मिलता.
कंपनी के मालिक अमित का जन्मदिन नजदीक आ रहा था. गहमागहमी बढ़ गई थी. इस बार का समारोह विशेष था. मांबेटा दोनों ही बातबात पर अल्का को ही पूछ रहे थे मानो वह ही सबकुछ है.
अल्का भी बिना किसी नानुकुर के अपना काम कर रही थी. एक बार उस ने कहा भी कि मैडम, मैं एक ट्रेनी ही हूं और अभी मेरा इस कंपनी में भविष्य निश्चित नहीं है, फिर भी आप मुझ पर इतना विश्वास कर रही हैं.
‘‘यह सोचने का काम हमारा है कि तुम क्या हो, तुम्हारा नहीं,’’
जवाब में ममता ने कह दिया. अल्का कुछ नहीं बोली. कल समारोह का दिन है, इसलिए आज काम ज्यादा था. काम खत्म होतेहोते रात के 8 बज गए थे. उसे आज घर जल्दी जाना था क्योंकि अगले दिन उस के पापा का भी जन्मदिन था. मां को बाजार जाना था परंतु यहां भी अगले दिन मनाए जाने वाले समारोह की तैयारी के कारण वह लेट हो गई. मां का फोन 2-3 बार आ गया. उस ने कह दिया कि वह आते हुए बाजार से मिठाई लेती आएगी. काम खत्म कर के वह घर जाने के लिए उठी ही थी कि ममता का फोन आ गया. उसे केबिन में बुलाया था. जब ममता ने कहा, ‘आज मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चलूंगी’ तब वह चौंक गई लेकिन ममता ने जब कहा कि वे उस की मम्मी से मिलना चाहेंगी तब वह चुप रही. ममता को मना भी कैसे करे वह. ममता और अमित दोनों ही साथ थे. उस ने रास्ते में मता को बताया था, उस के पापा का भी कल जन्मदिन है.
ममता ने पूछा, ‘‘जिस आदमी ने तुम्हारी मम्मी को छोड़ कर दूसरी महिला से शादी कर ली, फिर भी तुम्हारी मम्मी अब भी उन का जन्मदिन मनाती हैं?’’
‘‘मैडम, मम्मी कहती हैं कि वे जहां भी हों, खुश रहें. मेरे लिए अब भी वे ही सबकुछ हैं,’’ फिर उस ने ममता को बताया कि मम्मी ने पापा की पसंद की मिठाई लाने को कहा था. मैडम ने गाड़ी मिठाई वाले की दुकान पर रोक दी. उस ने पापा की पसंद की मिठाई ली. वहां से चल कर मैडम ने एक साड़ी के शोरूम पर गाड़ी रोक ली. वह चौंक गई. साड़ी के शोरूम में मैडम ने एक साड़ी को उसे दिखा कर पूछा, ‘‘तुम्हारी मम्मी के लिए कैसी रहेगी?’’
‘‘मैडम, यह पापा का पसंदीदा रंग है. आप को मेरे पापा की पसंद पता है, कैसे?’’
ममता हंस पड़ीं पर उन्होंने उस को कोई जवाब नहीं दिया. ममता ने साड़ी पसंद कर पैक करवा दी कि तुम्हारे पापा के जन्मदिन पर मेरी ओर से तुम्हारी मम्मी को उपहार है. फिर मुसकरा कर बोलीं, ‘‘तुम्हारे पापा को और क्याक्या पसंद है?’’
‘‘बाकी तो पता नहीं, हां, मम्मी पापा के जन्मदिन पर इसी रंग की साड़ी पहनती हैं और यही मिठाई मंगाती हैं.’’
रास्तेभर ममता उस के पापा के बारे में बातें करती रहीं. सब घर पहुंचे. उस की मम्मी को चिंता नहीं थी क्योंकि देर होने पर खुद उस के बौस छोड़ जाते हैं. लेकिन आज कुछ ज्यादा ही देर हो गई थी. वे इंतजार कर रही थीं.
आज अल्का के साथ आने वाली को देख कर चौंक गईं.
अल्का ने मां से उन का परिचय कराया, ‘‘मम्मी, ये हमारी कंपनी की चेयरपर्सन हैं.’’
‘‘आप हमारे घर!’’ उन्होंने उन के बैठने के लिए कुरसी खिसकाई तब ममता उस की मम्मी का हाथ पकड़ कर वहां बिछी चारपाई पर साथ ही बैठ गईं और बोलीं, ‘‘आज चाय ही नहीं, खाना भी यहीं खाएंगे.’’
‘‘आप?’’
‘‘तो क्या हुआ, आप हमारी सब से अच्छी एंपलौई की मां हैं.’’
अल्का की मां उठने लगीं तब ममता ने उन को रोक लिया और कहा, ‘‘खाना अल्का बनाएगी.’’ वह खाना बनाने के लिए चल दी. तब ममता ने अपने बेटे से कहा, ‘‘तू भी जा, रसोई में अपनी बड़ी बहन की मदद कर.’’
‘‘बड़ी बहन? वे तो उस के बौस हैं और रसोई में वे क्या मदद करेंगे?’’
मैडम बोलीं, ‘‘आप के पति ने परिवार के दबाव में जिस लड़की से शादी की वह मैं हूं.’’
अमिता कुछ बोल नहीं पाईं. रसोई की ओर जा रही अल्का भी रुक गई.
ममता ने अमिता से पूछा, ‘‘आप ने कभी यह नहीं सोचा कि आप की लड़की जिस कंपनी में काम कर रही है उस का नाम आप के नाम पर है और उस के मालिक का नाम आप के पति का नाम है?’’
‘‘इसलिए कि मुझे यह विश्वास नहीं था कि जिस व्यक्ति ने मुझे बुरी तरह बेइज्जत कर भगाया था वह ऐसा करेगा. फिर मैं ने इसे केवल संयोग माना.’’
‘‘आप गलत समझीं. उस समय उन का उद्देश्य तुम्हें बेइज्जत करने का नहीं था बल्कि तुम्हारे मन से अपनी याद मिटाने की कोशिश थी. परंतु न तो तुम्हारे मन से उन की याद मिटी और न ही वे तुम्हें भुला पाए. तुम्हारे नाम पर कंपनी का नाम रखा और बेटे का नाम भी अमित रखा जिस से इस बहाने वे आप को याद रख सकें.’’
अमिता कुछ नहीं बोल पा रही थीं ममता ही बोलीं, ‘‘पिछले साल उन की मौत हो गई परंतु अंतिम समय तक उन को यह मलाल रहा कि ‘अपनी उस के’ चरित्र पर आक्षेप किया. उन को यह भी मलाल रहा कि उस के गर्भवती होने का पहले पता होता तब वे मुझ से शादी नहीं करते.’’
‘‘आप को कब पता चला कि मैं उन की बेटी हूं?’’ अल्का बोली.
‘‘जब तुम्हारा बायोडाटा सामने आया था.’’
‘‘इस का मतलब है कि मुझे मेरी योग्यता के कारण जौब नहीं मिली बल्कि इस कंपनी के मालिक की बेटी होने के कारण मिली.’’
‘‘तुम्हें जौब तुम्हारी योग्यता के कारण ही मिली. चयन समिति ने जो पैनल दिया था उस में सब से ऊपर तुम्हारा नाम था. उस समय तक किसी को भी पता नहीं था कि तुम किस की बेटी हो. फिर तुम्हारे कार्यव्यवहार ने बता दिया कि तुम मेरे पति की बेटी हो. बेटा, तुम ने महसूस किया होगा कि तुम्हारे व्यवहार को देख कर सब क्या कहते हैं, ‘साहब वापस आ गए.’’’
‘‘हां, पर वे ऐसा क्यों कहते हैं?’’
‘‘तुम्हारे पापा के लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं था और गलती होने पर किसी से भी माफी मांगने में उन को कोई गुरेज नहीं थी और तुम भी वही कर रही हो. वास्तव में तुम अपने पापा के सच्चे प्यार की निशानी हो. तुम में अपने पिता की सभी खूबियां हैं. तुम्हारा एक मालिक की तरह व्यवहार भी यही बता रहा था.’’
‘‘इसीलिए आप और बौस मेरे व्यवहार को नजरअंदाज कर रहे थे? परंतु मैडम…’’
उस की बात पूरी होने से पूर्व ही ममता ने उसे टोक दिया, ‘‘मुझे मम्मी नहीं कह सकतीं?’’
अल्का बोली, ‘‘सौरी मम्मी, मैं आप को ‘छोटी मम्मी’ कहूंगी और अपनी मम्मी को ‘बड़ी मम्मी’ कहूंगी.’’ इतना कह कर उस ने अपनी मम्मी की ओर देखा. उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी.
‘‘मैं भी ऐसा ही करूंगा,’’ अमित बोला.
ममता ने उसे गले से लगा लिया और कहा, ‘‘यह तेरा बौस नहीं, बल्कि तेरा छोटा भाई है. तुझे इस का खयाल रखना है क्योंकि यह बहुत भोला है.’’
‘‘मम्मी, मेरे छोटे भाई और अपने बेटे को अंडरएस्टीमेट मत करो. पापा की मौत के बाद यही तो कंपनी को चला रहा है.’’
यह सुन कर ममता हंस पड़ीं और अमिता से बोलीं, ‘‘अपने भाई को अंडरएस्टीमेट नहीं करना चाहती. वे भी तो यही करते थे, किसी के सम्मान को कम नहीं होने देते थे. अब मुझे चिंता नहीं, दोनों भाईबहन इस कंपनी को नई ऊंचाई पर ले जाएंगे.’’
अगले दिन जन्मदिन समारोह बहुत धूमधाम से मनाया गया. अमिता को उस का सम्मान मिला. दोनों मम्मियों ने अपने बच्चों को ढेर सारा प्यार दिया.अपने अपने शिखर: भाग 1
‘‘अरे मम्मी छोडि़ए,’’ साखी ने बात काटते और रहस्योद्घाटन सा करते हुए कहा, ‘‘मम्मी, ये मेरी जुड़वां है. इस की और मेरी डेट औफ बर्थ एक ही है और यह भी रावनवाड़ा में पैदा हुई. है न को इंसीडैंट

पत्थरकोठी में नए साहब आ गए हैं, यह शहर के लिए नई खबर थी. डाक्टर साखी कांत को तो इस खबर का इंतजार था. यह जान कर उसे सुखद आश्चर्य हुआ था कि प्रशांत कुमार राय, आईएएस इस संभाग के नए कमिश्नर हो कर आ रहे हैं. वह यहां के मिशनरी अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञा है. एमडी की डिगरी पाते ही अनुभव प्राप्त करने की इच्छा से उस ने यहां जौइन किया था. उस के पहले और बाद में इस अस्पताल में कई डाक्टर आएगए. कुछ ने सरकारी नौकरी कर ली, तो कुछ ने धनी बनने की लालसा में अपने नर्सिंग होम खोल लिए.
यहां के वातावरण और अस्पताल प्रशासन के सेवा मिशन से उस का निश्छल मन कुछ ऐसे मिला कि वह यहां ठहर गई या कहा जाए कि यहां रम गई. यहां के शांत और नैसर्गिक हरेभरे वातावरण ने उसे बांध लिया. दिन, महीने, साल बीतते चले गए और समयबद्ध व्यस्त दिनचर्या में उस के 15 वर्ष कैसे बीते पता नहीं चला. अब वह यहां की अनुभवी और सम्मानित डाक्टर है.
चौड़ेऊंचे पठार पर बने अस्पताल के बाहर उसे एक सुसज्जित छोटा सा कौटेज मिला है, जिस के 3 तरफ हराभरा बगीचा और आसपास गुलमोहर और अमलतास के वृक्ष हैं. सामने दूसरे पठार पर चर्च की ऊंची इमारत और चर्च से लगी हुई तलहटी में पत्थरों की चारदीवारी से घिरा कब्रिस्तान है. उस के आगे पहाड़ीनुमा सब से ऊंचे पठार पर दूर हट कर पत्थर कोठी है, जिसे सरकारी भाषा में कमिश्नर हाउस कहा जाता है. चर्च के बगल से लगा हुआ कौन्वैंट स्कूल है. इस ऊंचेनीचे बसे शहर की उतारचढ़ाव व कम आवागमन वाली सड़क घुमावदार है, जो एक छोटे से पुल पर से हो कर गहरी पथरीली नदी को पार करती है. उस की कौटेज से यह नयनाभिराम दृश्य एक प्राकृतिक दृश्य सा दिखाई देता है.

पत्थर कोठी, कब्रिस्तान की चारदीवारी, गिरजाघर और अस्पताल की बिल्डिंग स्लेटी रंग के स्थानीय पत्थरों से बनी है. तलहटी में फैले कब्रिस्तान के सन्नाटे में साखी संगमरमरी समाधियों के शिलालेख पढ़तेपढ़ते इतना खो जाती है कि वहां पूरा दिन गुजार सकती है. वहां से वनस्पतियों और मौसमी फूलों से घिरी उस की कौटेज खूबसूरत पेंटिंग सी लगती है.
डिनर के बाद जब वह फूलों की खुशबू से महकते लौन में चहलकदमी कर रही होती है तो मेहंदी की बाड़ के पार कच्ची पगडंडी पर पत्थर कोठी से लौटता हुआ दीना अकसर दिखाई दे जाता है. दीना पत्थर कोठी में कुक है और कौटेज के पीछे बने स्टाफ क्वार्टर्स में रहता है. वह उस के पास आने पर उसे नमस्ते करता है, जिसे वह मौन रहते हुए सिर हिला कर स्वीकार करती है.
आज उसे दीना का बेसब्री से इंतजार था क्योंकि कब अपने जन्मदिन के फंक्शन पर अच्छा खाना बनाने के अनुरोध के बहाने वह उसे रोक कर उस से बात करना चाहती थी, जिस से पत्थर कोठी का हालचाल जान सके. दीना काम से छुट्टी पा कर थकावट भरी चाल में कोई अस्पष्ट सा गीत गुनगुनाते हुए लौट रहा था. उस के पास आने पर वह नमस्ते बोल कर ठिठक गया, जैसे कुछ कहना चाह रहा हो. उस के अकस्मात ठहराव को साखी ने अनदेखा नहीं किया. लैंप पोस्ट की रोशनी में ठहरे दीना से उस ने पूछा, ‘‘रुक क्यों गए? कुछ कहना चाहते हो?’’
‘‘जी डाक्टर साहब. आज हमारे नए साहब आ गए हैं. बीबीजी बहुत अच्छी हैं, आप जैसी. आप की बहन सी लगती हैं.’’
‘‘अच्छा, क्या नाम है उन का?’’ वह प्रश्न तो कर गई, परंतु मुसकरा उठी कि इस को कमिश्नर की पत्नी के नाम से क्या लेनादेना. इस के लिए तो बीबीजी नाम ही पर्याप्त है. वह चुप रहा. फिर सिर झुकाए थोड़ी देर खड़ा रह कर चल पड़ा. फिर दीना जब तक ओझल नहीं हो गया वह उसे जाते हुए देखते रही. उस के होंठों पर हंसी आई और ठहर गई. दीना की बात सच है. कौन उन्हें बहनें नहीं समझता था.

दोनों ने तीखे नैननक्श पाए थे और कदकाठी और रूपरंग भी एक से. सगी बहनों सा जुड़ाव था दोनों के बीच. बौद्धिक स्तर भी लगभग समान. कोई किसी से उन्नीस नहीं. संयोग ही था कि दोनों ने कालेज में उस वर्ष जीव विज्ञान वर्ग में 11वीं कक्षा में प्रवेश लिया था और पहले दिन दोनों क्लास में साथसाथ बैठी थीं.
टीचर ने हाजिरी लेते समय पुकारा, ‘‘सांची राय.’’
‘‘यस मैडम,’’ उस की साथी सांची ने हाजिरी दी.
‘‘साखी कांत.’’
‘‘यस मैडम.’’
‘‘टीचर ने मौन साधा और चश्मे को नाक पर नीचे खिसका कर उन की तरफ गौर से देखते हुए पूछा, ‘‘तुम दोनों जुड़वां हो क्या?’’
‘‘नहीं तो मैडम,’’ सांची ने उत्तर दिया.
‘‘तुम दोनों की डेट औफ बर्थ एक है और दोनों बहन लगती भी हो. नाम भी मिलतेजुलते पर सरनेम अलग,’’ टीचर ने बात वहीं खत्म कर हाजिरी लेना जारी रखा.
टीचर की बात पर दोनों एकदूसरे को आश्चर्य से देख गहराई से मुसकराई थीं, जैसे 2 भेदिए एकदूसरे का कोई भेद जान गए हों. पीरियड पूरा होने तक वे जान गईं कि उन का जन्मस्थान भी एक है. लेकिन वे यह नहीं जानती थीं कि उन का जन्म एक ही अस्पताल में हुआ है, लगभग एक ही समय पर.
उन के जन्म पर 2 परिवार खुश थे. बहुत खुश. दोनों के मातापिता का प्रथम परिचय नर्सिंग होम में ही हुआ. उन्होंने एकदूसरे को मिठाइयां खिलाते हुए बताया कि लड़कियां शुभ घड़ी में आई हैं. दोनों के पापा की पदोन्नति की सूचनाएं आज ही मिली हैं और स्थानांतरण के आदेश आते ही होंगे. खुशियों से सराबोर दोनों के द्वारा एकदूसरे को बधाइयां दी गईं और भविष्य में न भूलने का वादा किया गया. तभी दोनों के नामकरण एक ही अक्षर से किए गए सांची और साखी.
सांची राय के परिचय में उस के पिता आनंद भूषण राय के नाम का उल्लेख हो ही जाता. वे महत्त्वपूर्ण सरकारी अधिकारी जो थे. साखी कांत के नाम को पूर्णता उस के पिता के नाम अमर कांत से मिली. उसे अपना नाम अच्छा लगता था और पूर्ण भी, परंतु बहुतों को उस का नाम अधूरा लगता था क्योंकि उस से किसी जाति विशेष का आभास नहीं मिल पाता था. नाम सुन कर लोगों की जिज्ञासा अशांत सी रह जाती. उन का आशय समझ वह बहुत तेज मुसकराती, अपनी बड़ीबड़ी पलकें कई बार झपकाती और हंसी बिखेरते हुए खनकती आवाज में बात को हंसी में उड़ा देती, ‘‘जी, कांत कोई सरनेम नहीं है. मेरे पापा के नाम का हिस्सा है.’’ जिज्ञासु लगभग धराशायी हो जाता.

छुट्टी होने पर छात्राओं की भीड़ में वे साथसाथ कालेज के गेट से बाहर आईं. गेट के बाहर चौड़ी सड़क पर नेवीब्लू रंग की यूनीफौर्म में छात्राओं के झुंड थे और उन के स्वरों का कलरव. सड़क के उस पार अपनी कार के पास खड़ी साखी की मम्मी अपनी बेटी को भीड़ में पहचानने की कोशिश कर रही थीं. उन के आने का उद्देश्य अपनी बेटी को घर वापस ले जाने का तो था ही, उस से भी जरूरी था बेटी के रोज आनेजाने की व्यवस्था करना. इस के लिए वे एक औटो वाले से बात भी कर चुकी थीं. बड़े शहर की भीड़भाड़ को ले कर वे चिंतित थीं. जहां उन का निवास था, वहां से कालेज की दूरी काफी थी और उस रूट पर कालेज की बस सेवा नहीं थी.
छात्राओं की भीड़ में उन का ध्यान साखी ने भंग किया, ‘‘मम्मी, मैं इधर. इस से मिलिए, यह है मेरी नई फ्रैंड, सांची…सांची राय.’’
सांची ने प्रणाम के लिए हाथ जोडे़ ही थे कि साखी ने परिचय की दूसरी कड़ी पूर्ण कर दी, ‘‘सांची, ये हैं मेरी मम्मी.. बहुत प्यारी मम्मी.’’
मम्मी ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘कहां रहती हो बेटी?’’
‘‘जी, सिविल लाइंस में.’’
‘‘अरे मम्मी छोडि़ए,’’ साखी ने बात काटते और रहस्योद्घाटन सा करते हुए कहा, ‘‘मम्मी, ये मेरी जुड़वां है. इस की और मेरी डेट औफ बर्थ एक ही है और यह भी रावनवाड़ा में पैदा हुई. है न को इंसीडैंट?’’
‘‘अच्छा, वहीं की रहने वाली हो?’’
‘‘नहीं आंटी, उस समय मेरे पापा की पोस्टिंग वहां थी.’’
पास में खड़ी सरकारी गाड़ी का ड्राइवर उन के करीब आ खड़ा हुआ. सांची ने अपना बैग उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आंटी, ये मेरे पापा के ड्राइवर हैं, मुझे लेने आए हैं.’’
मम्मी ने घूम कर ड्राइवर की ओर देखा और पास खड़ी सरकारी गाड़ी को देखते हुए चौंक कर पूछा, ‘‘तुम ए.बी. राय साहब की बेटी तो नहीं?’’अपने अपने शिखर: भाग 2
तुम तो जानती हो कि मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता है. जिस चीज की जरूरत हो, हाजिर. अगर कभी बाजार से पेनपैंसिल, किताबकौपी खरीदने का मौका भी मिला तो एक चपरासी अंगरक्षक की तरह साथ में रहता है

‘‘जी आंटी.’’
‘‘अरे, तब तो तुम सच में जुड़वां की तरह ही हो. कैसा संयोग है. इतने सालों बाद तुम दोनों एकसाथ खड़ी हो.’’
साखी और सांची के चेहरों पर प्रसन्नता के भाव आ गए थे.
‘‘तब तो तुम ने अपने पापा की गाड़ी से कालेज आयाजाया करोगी?’’
‘‘नहीं आंटी, शायद बस से… लेकिन बस में तो बहुत समय बरबाद होता है. बहुत घूमघूम कर आती है.’’
‘‘तो औटो से आओजाओ न और लड़कियों के साथ. साखी के लिए तो मैं ने एक औटो वाले से बात कर ली है. कहो तो तुम्हारे लिए भी कर लूं, सिविल लाइंस तो रास्ते में ही पड़ेगा.’’
‘‘ठीक है आंटी, लेकिन पापा से पूछना पड़ेगा. अच्छा नमस्ते आंटी.’’
‘‘नमस्ते बेटा, अपनी मम्मी से मेरा नमस्ते बोलना. मैं उन से मिलने आऊंगी. मेरी उन से बहुत पुरानी पहचान है, उतनी पुरानी जितनी तुम्हारी उम्र है,’’ उन के स्वर में उत्साह आ गया था.
फिर दोनों ने साथ आना, साथ जाना शुरू कर दिया और एक ही कोचिंग में पढ़ते हुए 11वीं, फिर 12वीं की परीक्षाएं लगभग बराबर अंक पा कर पास कीं. दोनों का लक्ष्य था, प्री मैडिकल टैस्ट पास कर के एमबीबीएस करना. दोनों ने गंभीरता से पढ़ाई शुरू कर दी.
परीक्षाएं पूरी होने पर दोनों संतुष्ट थीं, परिणाम के प्रति आशान्वित भी. परिणाम घोषित हुआ तो वे अलगअलग शहरों में थीं क्योंकि अपनेअपने पिता के स्थानांतरण के कारण उन के शहर बदल गए थे. लेकिन समाचारपत्र में छपा अपना अनुक्रमांक व उच्च वरीयता क्रम देख कर साखी की आंखों से खुशियां नहीं आंसू छलके. कारण, सांची के अनुक्रमांक का कहीं अतापता नहीं था. उसे यह बहुत अविश्वसनीय सा लगा. साखी अपने वर्ग की मैरिट लिस्ट में बहुत ऊपर थी. उसे प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ मैडिकल कालेज में प्रवेश मिला.
एक दिन उस का सांची से सामना हो गया. वह अपने परिजनों के साथ किसी रिश्तेदार मरीज को देखने आई थी. उस से मिल कर साखी को अच्छा लगा. वह इतना हताशनिराश नहीं थी, जितना साखी ने सोच रखा था. उस ने बताया कि बी.एससी. के साथसाथ सीपीएमटी की तैयारी कर रही है. बड़ी आशा के साथ उस ने बताया कि वह इसी कालेज में आएगी, उस की जूनियर बन कर.

उस के बाद 2 वर्षों तक साखी को सीपीएमटी के परिणाम के समय इंतजार रहा कि शायद सांची के बारे में कोई अच्छी खबर मिले. लेकिन ऐसी कोई खबर न मिलने पर अपनी ओर से सीधे फोन कर के उस की असफलता का पता लगाना, उसे व्यावहारिक नहीं लगा. कुछ वर्ष बीतने के बाद उसे यहांवहां से पता चला था कि सांची एम.एससी. करने के बाद सिविल सर्विसेज के लिए कोशिश कर रही है. साखी फाइनल की लिखित परीक्षा से मुक्त हो कर वाइवा के तनावों से घिरी थी. पढ़ने का मन बना रही थी कि होस्टल के चौकीदार ने उस के नाम की पुकार दी. नीचे उतरी तो देखा कि सांची थी. उन्मुक्त भाव से दोनों एकदूसरे से लिपट गईं. उस का बैग लेते हुए साखी ने शिकायत की, ‘‘कोई खबर तो दी होती, इस तरह अचानक?’’
‘‘एक सैमिनार में आई थी. वहां इतना व्यस्त हो गई कि सूचना नहीं दे पाई. फिर सोचा कि चलो आज अपनी पुरानी सखी को सरप्राइज देते हैं. आज रात रुकूंगी तुम्हारे साथ अगर तुम्हें कोई असुविधा न हो तो.’’
‘‘अरे, बिलकुल नहीं,’’ कहते हुए साखी सांची का हाथ पकड़ सीढि़यों की ओर बढ़ने लगी. कमरे में पहुंच कर एक गिलास पानी देते हुए वह सांची से बोली, ‘‘तुम फ्रैश हो लो, मैं मैस से टिफिन मंगवाने का प्रबंध करती हूं. आज यहीं रूम में खाएंगे और खूब बातें करेंगे. मेरा तो पढ़ाई से जी ऊब गया है.’’
खाना खा कर वे खुली हवा में होस्टल की छत पर आ गईं. चांदनी रात थी. मुंडेर पर कोने में टिकते हुए सांची ने छेड़ा, ‘‘ऐ, शादी के बारे में क्या विचार है?’’
‘‘शादी? किस की?’’
‘‘तुम्हारी और किस की?’’
‘‘अरे मम्मीपापा तो पूरी कोशिश में लगे हैं 2-3 साल से. न्यूजपेपर में उन्होंने एड भी दिया, लेकिन अभी तक मेरे योग्य मिला ही नहीं,’’ हंसते हुए साखी ने कहा.
‘‘ये तो कोई नई बात नहीं. मांबाप तो भरपूर कोशिश करते ही हैं इस के लिए. मेरा मतलब है कि तुम ने क्या किया? कोई भाया यहां कालेज में या बाहर?’’
‘‘अरे, यहां कोई कमी है क्या? कितने पीछे लगे रहते हैं. कुछ बैच मेट्स हैं तो कुछ सीनियर्स. कुछ मरीज हैं तो कुछ मरीजों के तीमारदार. एकाध सर भी हैं. बहुत लोग हैं यहां मुहब्बत लुटाने वाले. कितने गिनाऊं तुझे कोई लिस्ट बनानी है क्या?’’
‘‘देख साखी, मैं सीरियसली बात कर रही हूं और तू बात को हवा में उड़ा रही है. सचसच बोल, कोई है?’’
‘‘है तो पर बताऊंगी नहीं.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘क्योंकि तुम अपने बारे में तो कुछ बताओगी नहीं.’’
‘‘कोई हो तो बताऊं.’’
‘‘तो समझ मेरा भी कोई नहीं.’’ फिर थोड़ी सी चुप्पी के बाद बोली, ‘‘अच्छा बताती हूं.’’
‘‘सच?’’
‘‘हां सच. आनन वर्मा को जानती है?’’ साखी ने पूछा.
‘‘वही आनन, जो अपने साथ बायो की कोचिंग में था, जो तुम्हें चाहता था.’’
‘‘चाहता तो वह दोनों को था, लेकिन तुम से डरता था तुम्हारे पापा के पद के कारण. आजकल यहीं है. मैडिकल में हो नहीं पाया तो बी फार्मा कर रहा है. कभीकभी मिलने आता है. मैं भी एकाध बार गई हूं उस के घर. उस के मांबाप मुझे बहुत चाहते हैं. उस के लिए मेरे दिल में भी सौफ्ट कौर्नर है.’’
‘‘तो फिर?’’
‘‘फिर क्या? मेरी लव स्टोरी यहीं खत्म. यहां पढ़ाई से फुरसत नहीं. तुम क्या समझती हो, यहां बौलीवुड की तर्ज पर मैं प्रेम कहानी तैयार कर रही हूं?’’
‘‘देखो साखी, तुम मेरी बात को हमेशा हवा में उड़ा देती हो.’’
‘‘देखो भई, मैं ने अपनी शादी का काम अपने मम्मीपापा पर छोड़ दिया है. जिस दिन वे मुझ से सुपर लड़का ढूंढ़ कर मुझे बता देंगे, मैं जा कर चुपचाप मंडप में बैठ जाऊंगी. लेकिन मैं जानती हूं कि वे अपनी बिरादरी में सुपर लड़का नहीं ढूंढ़ पाएंगे और इंटरकास्ट मैरिज तो मेरे परिवार में किसी के गले ही नहीं उतर सकती. वैसे एक बात बताऊं सांची, अब मेरी विवाह में कोई खास रुचि बची नहीं है. क्या मिलता है विवाह से? थोड़ी सी खुशी और बदले में झंझटों का झमेला. अगर सब ठीक हुआ तो जिंदगी ठीकठाक कट जाती है वरना पूरी जिंदगी ऐडजस्टमैंट करतेकरते गुजार दो, घुटते हुए. नहीं करो तो बस एक ही गम रहता है कि शादी नहीं हुई. अब तुम बताओ अपनी प्रेम कहानी, लेकिन कमरे में चल कर. यहां खड़ेखड़े थकान होने लगी है.’’
वे कमरे में आ गईं और अधलेटी हो कर बतियाने लगीं.
‘‘साखी, तुम तो जानती हो कि मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता है. जिस चीज की जरूरत हो, हाजिर. अगर कभी बाजार से पेनपैंसिल, किताबकौपी खरीदने का मौका भी मिला तो एक चपरासी अंगरक्षक की तरह साथ में रहता है. अभी तक ऐसा कोई टकराया ही नहीं, जो मुझ से खुल कर कुछ कहे और मुझे भी अभी तक कुछकुछ हुआ नहीं.’’
‘‘तो फिर आज शादी की परिचर्चा क्यों की जा रही है?’’
‘‘इसलिए कि आजकल मेरी शादी के प्रस्ताव बहुत आ रहे हैं. एक से बढ़ कर एक. मेरी बिरादरी में अच्छे रिश्तों की कोई कमी नहीं. कोई बड़ा व्यवसायी है, तो कोई प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार का होनहार. कोई छोटा अधिकारी है, तो कोई बड़ा अधिकारी. मेरे पापा जब से दिल्ली ट्रांसफर हुए हैं, तब से चर्चे कुछ ज्यादा ही हैं. पापा प्रिफर करते हैं कि आईएएस मिले और शायद यह उन के लिए मुश्किल नहीं,’’ सांची ने बिना झिझक के बताया.
साखी चुपचाप उस का मुंह देखती रही.
कुछ महीने बाद साखी को एक भारीभरकम निमंत्रण पत्र मिला, जो सांची के पिता द्वारा भेजा गया था. उस की शादी प्रशांत राय, आईएएस से दिल्ली के एक पंचसितारा होटल में होने जा रही थी. लेकिन शादी की तारीख वाले दिन साखी का पोस्ट ग्रैजुएशन मैडिकल ऐंट्रैंस ऐग्जामिनेशन था, इसलिए चाह कर भी वह शादी में न जा सकी.
जन्मदिन जीवन का खास दिन लगता है. हर साल आता है और चला जाता है. उस के बाद जीवन फिर उसी ढर्रे पर चलने लगता है. लेकिन साखी का पिछला जन्मदिन ऐसा नहीं था. उस दिन वर्षों से पड़ी उस के मन की एक गांठ खुल गई थी. डाक्टर होने के नाते वह अकसर जिस बात को ले कर शंकित रहती थी, परेशान हो उठती थी, उस का समाधान हो गया था. उस के बाद वह सामान्य नहीं रह पाई. बहुत से विचार उस के मस्तिष्क में घुमड़ते रहते थे. पूरा साल ऐसे ही व्यतीत हुआ.अपने अपने शिखर: भाग 3
मेट्रेन मारिया ने साखी का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और कहा, ‘‘मैं रावनवाड़ा के हौस्पिटिल में नर्स थी और उस वक्त यंग थी. मेरा अल्बर्ट से अफेयर था. अल्बर्ट टैंपरेरी ड्राइवर था हौस्पिटल में.

जन्मदिन के अवसर पर साखी सीमित लोगों को आमंत्रित करती थी, जिस में उस के विभाग में काम करने वाले डाक्टर्स व अन्य काम करने वाले लोग होते थे. उस बार उस ने मेट्रेन मारिया को आमंत्रित कर लिया था. मेट्रेन मारिया उम्रदराज और अनुभवी थीं. मिशन के दूसरे अस्पताल से तरक्की पा कर आई थीं. दीना उन का ही इकलौता बेटा था. कोई स्थायी नौकरी न मिलने के कारण दीना अपनी मां के साथ आया था और छोटेमोटे फंक्शन में कुक का काम कर लेता था. अच्छा कुक होने की तारीफ सुन कर खानपान का जिम्मा दीना को दिया गया था.
अतिथियों के जाने के बाद दीना और उस के सहायक बचा हुआ खाना व सामान समेट रहे थे. मेट्रेन मारिया को दीना के साथ वापस जाना था, इसलिए वे रुकी थीं. गार्डन के एक कोने में पड़ी कुरसियों पर मेट्रेन मारिया और साखी बैठी थीं. समय बिताने के लिए औपचारिक बातचीत में साखी ने ऐसे ही पूछ लिया, ‘‘मेट्रेन आप कहांकहां रहीं?’’
मेट्रेन मारिया ने कई जगहों के नाम गिनाए. उन में रावनवाड़ा का नाम भी आया. साखी चौंकना पड़ी. साखी का चौंकना मेट्रेन मारिया नहीं देख पाईं. उन्होंने अपना चश्मा उतार लिया था और उंगलियों से अपनी पलकें बंद कर के सहला रही थीं.
‘‘रावनवाड़ा, कब?’’ साखी के मुंह से निकल गया था.
‘‘आप रावनवाड़ा जानती हैं? वह तो कोई मशहूर जगह नहीं.’’
‘‘हां, नाम सुना है, क्योंकि मेरी एक क्लासमेट वहीं की थी,’’ साखी ने सामान्य होते हुए कहा. मेट्रेन ने जो कालाखंड बताया उस में साखी के जन्म का वर्ष भी था. साखी ने शरीर में सनसनी सी महसूस की और सचेत हो कर पूछा, ‘‘मेट्रेन, आप को तो बहुत तजरबा है. नर्स की नौकरी में आप ने बहुतों के दुखसुख और बहुत से जन्म और मृत्यु देखे होंगे. बहुतों के दुखसुख भी बांटे होंगे. कोई ऐसा वाकेआ जरूर होगा, जो आप के जेहन में बस गया होगा.’’

मेट्रेन मारिया कुछ देर को चुप रहीं, जैसे कुछ सोच रही हों. फिर दोनों हाथ उठा कर धीमे स्वर में बोलीं, ‘‘डाक्टर, मेरे इन हाथों से ऐसा कुछ हुआ है, जिस से एक ऐसी मां की गोद भरी है, जो हमेशा खाली रहने वाली थी. लेकिन जो कुछ मैं ने किया, वह मेरे पेशे के खिलाफ था और मुझे वह बात किसी से कहनी नहीं चाहिए. कम से कम एक डाक्टर के सामने तो बिलकुल ही नहीं.’’
इतना कह कर वे चुप हो गईं. साखी उन के चेहरे के भाव अंधेरे में पढ़ नहीं पा रही थी.
‘‘डाक्टर, इंसान कर्तव्य के प्रति कितना भी कठोर हो, लेकिन कभीकभी वह अपने मन की करता है, जो उसे नहीं करना चाहिए. कभी दिल के किसी कोमल भाव के कारण और कभी स्वार्थवश. मैं ने वह काम भावुकता में किया था और अपने स्वार्थ के लिए भी. वह राज मैं ने दिल में छिपाए रखा. लेकिन जब तक बहुत मजबूरी न हो तो कोई भी इंसान किसी गहरे राज को ले कर मरना नहीं चाहता. किसी को तो बताने का मन करता ही है. अभी तक मैं ने उस बात का जिक्र किसी से नहीं किया था, लेकिन डाक्टर आप ने बात छेड़ी है तो आज मैं आप को बताना चाहती हूं. आप का नेचर मुझे बहुत अच्छा लगता है इसलिए. हालांकि उस बात से अब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. बहुत साल हो गए, पता नहीं कौन कहां होगा. फिर भी मैं आप से एक वादा चाहूंगी कि उस घटना को आप एक डाक्टर की हैसियत से नहीं, एक खुले दिल के इंसान के रूप में सुनें.’’
‘‘वादा,’’ साखी ने अपना दाहिना हाथ मेट्रेन मारिया की ओर बढ़ाया.
c उस की सरकारी ड्राइवर की पक्की नौकरी का चक्कर चल रहा था. उन्हीं दिनों एक सरकारी औफिसर की वाइफ डिलिवरी के लिए हमारे हौस्पिटल में भरती हुई थीं. अल्बर्ट ने बताया था कि नौकरी देना इन्हीं साहब के हाथ में है. मुझे भरोसा था कि अपनी सेवा से अगर मैं मैडम का दिल जीत सकूं तो अल्बर्ट को नौकरी दिलवा सकती हूं.’’

मेट्रेन मारिया ने गहरी सांस ली. फिर बोलीं, ‘‘उन मैडम का केस कौंप्लिकेटेड था. उन्होंने काफी कोशिशों के बाद एक फीमेल बेबी को जन्म दिया. उस समय एक और प्रैगनैंट लेडी भी डिलिवरी के लिए हौस्पिटल में भरती थीं. उन को जुड़वां लड़कियां पैदा हुईं. एनआईसीयू में तीनों बच्चियां मेरी निगरानी में थीं. मेरे देखते ही देखते सरकारी औफिसर की वाइफ की बेबी नहीं रही. मुझे उस समय पता नहीं क्या सूझा, मैं ने एक जुड़वां बेबी से उसे बदल दिया. शायद मेरे मन में कोई ऐसी भावना रही होगी कि आगे और कोई संतान को जन्म देना उन के लिए बहुत रिस्की है. मैं उन्हें दुखी नहीं देखना चाहती थी, क्योंकि तब मैं उन से अल्बर्ट की नौकरी की सिफारिश न कर पाती. मेरी उस हरकत से उन की गोद सूनी नहीं रही और अल्बर्ट को सरकारी नौकरी मिल गई. बाद में अल्बर्ट ने मुझे धोखा दिया और शादी अपनी एक रिश्तेदार से कर ली. वह दिन मुझे अच्छी तरह याद है. वह भूलने वाला दिन नहीं है.’’
आगे मेट्रेन मारिया ने क्याक्या कहा, साखी ध्यान से नहीं सुन सकी. वह अपनेआप में खो चुकी थी.
बीते दिनों को याद कर साखी देर तक सो न सकी. रात के सन्नाटे में तेज रोशनी से नहाई पत्थर कोठी को उस ने कई बार देखा. पत्थर कोठी के पास या उस के अंदर जाने का उसे कभी अवसर नहीं मिला था. सोचती रही कि सांची का सच से सामना कैसे करा पाऊंगी? सोचतेसोचते उसे कब झपकी लगी, पता नहीं चला.
सुबह तैयार हो कर चर्च जाने के लिए निकलने ही वाली थी कि डोरबैल बजी. देखा तो दीना था. विनम्रता से बोला, ‘‘पत्थर कोठी वाली बीबीजी ने गाड़ी भेजी है. आप को बुलाने के लिए. प्लीज आप चलिए.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘साहब के बेटे की तबीयत खराब है.’’
‘‘क्या हुआ?’’
‘‘बुखार है.’’
‘‘तबीयत ज्यादा खराब तो नहीं?’’

‘‘नहीं, ज्यादा तो नहीं लगती. बीबीजी डाक्टर को बुलाने को कह रही थीं तो मैं आप को बुलाने चला आया.’’
यह सुन कर उसे अच्छा लगा. दीना से फोन मिला कर बात कराने को कहा.
साखी फोन पर बोली, ‘‘हैलो मैडम, बच्चे का बुखार कैसा है?’’
‘‘अब शायद नौर्मल है. सो रहा है.’’
‘‘चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं आ रही हूं… और मैडम, क्या मैं आप को हैप्पी बर्थडे बोल सकती हूं?’’
‘‘थैंकयू, आप कौन?’’
‘‘गेस कीजिए.’’ फिर कुछ देर चुप रह कर बोली, ‘‘नहीं पहचाना न? अरे, मैं तुम्हारे बेटे की मौसी बोल रही हूं… साखी… डाक्टर साखी कांत. कोई अपना बर्थडे भूल सकता है क्या?’’
साखी फोन रख कर दीना को डाक्टरी बैग उठाने का इशारा करते हुए तेजी से बाहर निकली. कौटेज के बाहर बत्ती वाली चमचमाती सफेद कार खड़ी थी. ड्राइवर ने आदर में झुक कर कार का दरवाजा खोल दिया. वह अभिवादन स्वीकार करते हुए कार में जा बैठी.
दोनों एकदूसरे को देख लिपट गईं. एक पुरानी सखी को पा कर अति उत्साहित थी तो दूसरी की भावुकता को मापा नहीं जा सकता था. वह अपनी बहन को पा कर आंसू नहीं रोक पा रही थी. ड्राइवर, दीना व अन्य नौकर उन का आगाध प्रेम देखते हुए चुपचाप खड़े खुश हो रहे थे.
साखी के अंदर की हलचल शांत नहीं हो पा रही थी. बड़ी मुश्किल से उस ने सामान्य दिखने की कोशिश में सोते हुए बच्चे को गोद में उठा लिया और कहा, ‘‘क्या नाम रखा है बच्चे का?’’
‘‘अशेष.’’
‘‘बहुत प्यार नाम है. जीजाजी कहां हैं?’’
‘‘आज सुबह ही अचानक उन्हें बाहर जाना पड़ा, कल वापस आएंगे.’’
‘‘ठीक है, आज तुम्हारी और मेरी जौइंट बर्थडे पार्टी है, मेरे कौटेज पर. तुम्हें रात वहीं रुकना होगा, मेरे साथ. बहुत सी बातें करनी हैं. माना अब तुम बड़े औफिसर की बीवी हो, लेकिन उस से पहले मेरी भी कुछ खास हो. फिर आज तो जीजाजी बाहर हैं. आओगी न? हां बोलो हां.’’
‘‘हां.’’
‘‘अशेष जाग गया था. साखी ने चूमचूम कर उसे बहुत लाड़प्यार किया. फिर बिस्तर पर लेटा कर चैकअप किया और बोली, ‘‘एकदम फर्स्ट क्लास है. एक दवा मैं अपने हाथ से पिलाए देती हूं, दूसरी दोपहर में पिला देना. चिंता की कोई बात नहीं. एकदम फिट रहेगा. शाम को अपनी मौसी और मदर की बर्थडे पार्टी ऐंजौय करेगा. शाम को जल्दी आ जाना और रात मेरे साथ ही रहने का मन बना कर आना. ओ.के.?’’
‘‘ओ.के.’’
साखी ने स्पैशल जौइंट केक बनवा कर केक पर डबल ‘एस’ लिखवाया और दीवार पर भी चमकीले कागज से डबल ‘एस’ चिपकाया. पार्टी में सौम्यता तो थी ही, सांची के आ जाने से भव्यता का भी समावेश हो गया. परिस्थिति ऐसी बनी कि मेट्रेन मारिया इस पार्टी में नहीं थीं. वे कहीं बाहर गई थीं. अगर होतीं तो जौइंट बर्थडे सैलिब्रेशन का कुछ न कुछ अनुमान जरूरी लेतीं.
मेहमानों के जाने के बाद वे दोनों बैड पर लेटी थीं. अशेष गहरी नींद में सो रहा था. सांची की बातें खत्म नहीं हो रही थीं, लेकिन साखी के मन में पिछले बर्थडे पर उजागर हुआ राज घुमड़ रहा था, जिसे वह आज सांची को बताना चाहती थी. वह राज हजम कर पाना उस के लिए बड़ा मुश्किल हो रहा था. वह इस के परिणाम की आशंका से दुविधाओं में घिरी थी. लेकिन इस से अच्छा अवसर और कब मिल सकता था. बैडरूम के एकांत और धीमी रोशनी में उसे अपनी बात कहने का संबल मिल रहा था. उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सांची, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि हम जुड़वां बहनें हैं.’’
‘‘लगता तो है. मैं इस के बारे में अपनी मम्मी से भी पूछ चुकी हूं.’’
‘‘मैं ने जब मैडिकल लाइन का वातावरण देखा तो मुझे भी लगने लगा है कि ऐसी संभावना है.’’
‘‘सचाई कैसे पता चल सकती है साखी?’’
‘‘सचाई पता चल चुकी है.’’
‘‘क्या?’’
‘‘तुम यकीन करो, हम जुड़वां बहनें ही हैं. चाहो तो डीएनए टैस्ट करवा लो,’’ कहते हुए साखी ने बगल में लेटी सांची को पूरी तरह अपने से लिपटा लिया.
सांची ने आश्चर्य से कहा, ‘‘सच?’’
‘‘हां सच. एकदम सच. मेरी मां की जुड़वां लड़कियां हुई थीं और उसी समय तुम्हारी मम्मी को एक कमजोर लड़की पैदा हुई थी. नवजात शिशु केयर रूम में उस की डैथ हो गई. वहां ड्यूटी पर जो नर्स थी, उस ने स्वार्थवश भावुकता में मृत लड़की को एक जुड़वां लड़की से बदल दिया. वह तुम हो और एक मैं हूं.’’
‘‘कैसे पता चला?’’
‘‘उसी नर्स ने बताया जो उस समय रावनवाड़ा के अस्पताल में थी और अब रिटायर होने वाली है. तुम चाहो तो कभी उस से मिलवा सकती हूं, अगर फिर भी डाउट रहता है तो डीएनए टैस्ट से प्रूव हो जाएगा.’’
सांची असमंजस में पड़ गई.
साखी ने कहा, ‘‘लेकिन अब यह राज अगर हम दोनों के बीच ही रहे तो अच्छा है. नहीं तो हमारे परिवारों में बहुत उथलपुथल होगी जिस का प्रभाव हमारे जीवन पर भी पड़ेगा. इस के दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे, सारे समीकरण बदल जाएंगे. तब पता नहीं क्या हो. इसलिए उलझनों से दूर रहना है तो फिलहाल यही उचित होगा कि सिर्फ हमतुम ही जानें कि हम जुड़वां बहनें हैं. सिर्फ हमतुम.’’अनोखा रिश्ता: भाग 1
पराग और शीतल दोनों को बेटी की चाह थी. उस की डिलिवरी का दिन करीब आ गया था. हम यहां बेसब्री से खुशखबरी का इंतजार कर रहे थे.

दिनचर्या के विपरीत आज कालेज से घर लौटने में मुझे काफी देर हो गई थी. भूख, शारीरिक थकान और मानसिक परेशानी से ग्रस्त मैं जब घर पहुंची, तो मैं ने बैग एक ओर फेंका और बिस्तर पर औंधी गिर पड़ी. खाने को घर में कुछ था नहीं और न कुछ बनाने की इच्छा थी. 2 दिन के लिए घर से जाते हुए मां ने मुझे सख्त हिदायत दी थी कि मैं बाहर का कुछ भी न खाऊं. सोना चाहती थी, पर भूखे पेट होने की वजह से नींद ने भी पास फटकने से इनकार कर दिया था. अचानक दरवाजे पर घंटी की आवाज सुन कर बेमन से भृकुटियों को ताने, शिथिल कदमों से चल कर जब मैं ने दरवाजा खोला, तो सामने शीतल खड़ी थी.
‘‘दीदी, आप के लिए खाना लाई हूं.’’
शीतल के मुंह से यह सुन कर ऐसा लगा जैसे मेरे निर्जीव शरीर में किसी ने प्राण फूंक दिए हों. मैं ने हंस कर उस का स्वागत किया. वैसे भी शीतल का आना हमेशा मुझे ग्रीष्म ऋतु में शीतल बयार के आने जैसा सुकून देता था.
शीतल मेरी मौसी की बेटी थी. उस की और मेरी मांएं चचेरी बहनें थीं. एक ही शहर तो क्या, एक ही महल्ले में रहने के कारण हमारे संबंध घनिष्ठ थे. हम दोनों बहनों का रिश्ता सहेलियों जैसा था. हालांकि शीतल मुझ से 6 साल छोटी थी लेकिन हम दोनों की आपस में बहुत बनती थी. किसी भी विषय में, किसी जानकारी की आवश्यकता हो तो शीतल मुझ से बेझिझक पूछती थी. मैं शीतल के हर प्रश्न का उत्तर देती और उसे ऊंचनीच भी समझाती थी. शीतल बुद्धि और सुंदरता का अच्छाखासा संगम थी. मेरी शादी के वक्त शीतल ने कालेज में प्रवेश ले लिया था. शादी के बाद मुझे दिल्ली छोड़ कर मुंबई जाना था, जहां मेरी ससुराल थी. यह जान कर शीतल बेहद उदास हो गई थी. मैं ने उसे समझाया कि जब कभी मेरी याद आए तो फोन कर लेना मुझे और छुट्टियों में मुंबई आ जाना.

आखिर वह दिन भी आ गया जब अपनों को छोड़ कर नए रिश्तों के बंधन में बंध कर मैं मुंबई आ गई. मेरी शादी के बाद भी शीतल और मेरा स्नेह पूर्ववत बना रहा. सुरेश, मेरे पति भी उस से बेटी जैसा स्नेह करते थे.
समय पंख लगा कर उड़ने लगा और देखते ही देखते मैं राहुल और रिया 2 बच्चों की मां बन गई. रिया की जचगी के लिए जब मैं दिल्ली मां के पास गई थी तो शीतल ने एम.बी.ए. का इम्तहान दे दिया था और नतीजे का इंतजार कर रही थी. नतीजा आने से पहले ही उसे मुंबई में नौकरी मिल गई. पर मौसीजी और मौसाजी शीतल को अपने से दूर नहीं करना चाहते थे. किसी तरह मैं ने और सुरेश ने उन्हें मना ही लिया. शीतल की खुशी का ठिकाना न रहा.
शीतल को मुंबई आए 4 महीने हो गए थे. साथ रहने से हमारी अंतरंगता और बढ़ गई थी. औफिस से घर लौटते ही वह बच्चों के साथ बच्ची बन कर खेलने लगती थी. बच्चे उस पर जान छिड़कते थे. एक दिन उस ने बच्चों की तोतली आवाज में कही कहानियों को टेप किया, तो मैं ने उस से गाना गाने को कहा क्योंकि गाती वह अच्छा थी. मैं ने उस के 4 गाने टेप किए.
उन दिनों मौसीजी शीतल के लिए जीजान से लड़का ढूंढ़ने में लगी हुई थीं. इत्तफाक से उन्हें एक अच्छा रिश्ता मिल गया. वर पक्ष के लोग मुंबई में ही रहते थे, पर उन का बेटा पराग कोलकाता में कार्यरत था. मौसीजी, मौसाजी के साथ मुंबई आईं. लड़का और उस के परिवार वालों से मिलने के बाद दोनों बेहद खुश थे. उन की अनुभवी आंखों ने परख लिया था कि लड़के के बाह्यरूप को यदि ताक पर रख कर देखा जाए तो लड़का हर लिहाज से शीतल के लायक था.

शीतल को देखते ही पराग और उस के घर वालों ने उसे पसंद कर लिया था, पर शीतल के मन में दुविधा थी. उस ने अपने जेहन में एक राजकुमार की तसवीर को बसा रखा था, जैसा कि इस उम्र की लड़कियों के साथ अकसर होता है. लेकिन वास्तविकता तो सपनों की दुनिया से कोसों दूर होती है. मौसीजी ने शीतल को समझाया, ‘‘बेटी, लड़के के रंगरूप पर मत जाओ. लड़का गुणों की खान है. इतनी सारी डिग्रियों से विभूषित, इस छोटी सी उम्र में इतने ऊंचे पद पर कार्यरत है. व्यवहार भी उस का अति शालीन है. मेरा मन कहता है, तुम वहां खुश रहोगी.’’
मौसीजी के समझाने पर शीतल पराग से मिलने के लिए तैयार हो गई. पराग से मिलने के बाद शीतल ने भी शादी के लिए अपनी रजामंदी दे दी. इस तरह शीतल की शादी हो गई और वह पराग के साथ कोलकाता चली गई.
शादी के बाद शीतल जब पराग के साथ पहली बार अपने ससुराल मुंबई आई, तो पहले ही दिन दोनों हम से मिलने चले आए. शीतल बेहद खुश नजर आ रही थी. उस का खिलाखिला रूप व बातबात पर चहकना, उस के सफल दांपत्य जीवन की दास्तान को बयां कर रहा था. फिर भी औपचारिकतावश मैं ने जब शीतल से उस का कुशलक्षेम पूछा, तो उस ने चहकते हुए कहा, ‘‘दीदी, आप, मांपापा सब सही थे. पराग सचमुच गुणों की खान हैं. वे मुझे पलकों पर बैठा कर रखते हैं. ससुराल में भी मुझ से सब बहुत स्नेह करते हैं.’’ सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा.
इस के बाद शीतल की जिंदगी में कुछ बुरा घटा, तो कुछ अच्छा. बुरी घटना यह थी कि हृदयगति रुक जाने के कारण मौसाजी गुजर गए. खुशखबरी यह थी कि शीतल मां बनने वाली थी. रीतिरिवाज यह कह रहे थे कि पहली जचगी के लिए शीतल को मायके जाना चाहिए. पर पराग को शीतल से इतने दिनों का अलगाव मंजूर नहीं था, इसलिए उस ने मौसीजी को ही कोलकाता बुला लिया.
पराग और शीतल दोनों को बेटी की चाह थी. उस की डिलिवरी का दिन करीब आ गया था. हम यहां बेसब्री से खुशखबरी का इंतजार कर रहे थे. खबर आई कि उन की इच्छानुसार उन्हें बेटी पैदा हुई थी. पर बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद शीतल की हालत बिगड़ने लगी थी. डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद शीतल को बचाया नहीं जा सका. यह खबर सुन कर मेरे हाथपैर कांपने लगे. मेरी हालत इतनी खराब हो गई थी कि सुरेश मुझे समझासमझा कर थक गए.
‘‘उमा, ऐसी नाजुक घड़ी में तुम्हें संयम बरतना ही होगा. तुम इस कदर टूट जाओगी तो मौसीजी, पराग इन सब को कौन संभालेगा? मैं कोलकाता के टिकट ले कर आता हूं. तुम जाने की तैयारी करो. इस वक्त हमारा वहां रहना बेहद जरूरी है,’’ कह कर सुरेश चले गए.
शाम की फ्लाइट से हम कोलकाता पहुंचे. हम ने अपने आने की सूचना पराग को दे दी थी. एअरपोर्ट से बाहर आने पर हम ने देखा कि पराग बेहद उदास मुद्रा में चल कर हमारी ओर आ रहा था. घर पहुंचने पर हम ने देखा कि मौसीजी एक कोने में दुबकी बैठी थीं. मैं ने उन्हें जा कर गले से लगा लिया. पर इकलौती बेटी की मौत ने उन्हें पत्थर बना दिया था. न रो रही थीं, न ही बातें कर रही थीं. पराग की मां की हालत भी ठीक नहीं थी. उन्हें दमे का दौरा पड़ गया था. पालने में शीतल की बेटी सोई थी, दुनिया से बेखबर.अनोखा रिश्ता: भाग 2
मैं ने उसे शादी की मुबारकबाद दी तो कुछ देर चुप रहने के बाद उस ने कहा, ‘‘दीदी, आप सोच रही होंगी कि मैं ने इतनी जल्दी शादी कैसे कर ली? क्या करता दीदी, मैं मजबूर हो गया था.

पराग एक रोबोट की तरह अपना काम निबटा कर दफ्तर जाया करता था और दफ्तर से लौट कर घर आने पर एक अंधेरे कोने में बैठ जाया करता था. शायद शीतल की याद के साथ रहना चाहता था. नवजात शिशु के रोने पर यंत्रचालित मशीन की तरह चल कर आता, उसे चुप करा कर फिर अंधेरे में बैठ जाता. यही उस की दिनचर्या थी. दोनों वृद्ध माताएं बच्ची की परवरिश में लगी रहती थीं. 2 दिन वहां रुक कर हम वापस मुंबई लौट आए. मैं ने और सुरेश ने सब को आश्वासन दिया कि जब भी हमारी जरूरत पड़े, हमें खबर कर दें. पराग ने शिशु की देखभाल के लिए एक दाई रख ली. मौसीजी कब तक पराग के घर में पड़ी रहतीं. आखिर उन का अपना कहलाने वाला इस दुनिया में कोई और था भी तो नहीं.
मैं ने आग्रह कर के मौसीजी को अपने पास बुला लिया. मौसीजी दिन भर शीतल की ही बातें किया करती थी. मैं भी उन्हें बातें करने को प्रोत्साहित किया करती थी. इस तरह खुल कर बातें करने से उन का दुख कुछ तो कम हो रहा था. 2 महीने मेरे पास रहने के बाद मौसीजी ने वापस लौटने की इच्छा जाहिर की. वे कुछ हद तक सामान्य भी हो गई थीं. मैं भी अब उन पर रुकने के लिए दबाव नहीं डालना चाहती थी. मैं ने उन से कहा, ‘‘जब भी मन हो, बेझिझक मेरे पास आ जाइएगा.’’शीतल को गुजरे करीब 3 महीने हुए थे कि मां ने मुझे खबर दी कि मौसीजी ने बताया है कि पराग शादी कर रहा है. मौसीजी जैसे सांसारिक बंधनों से, मोहमाया से अपनेआप को मुक्त कर चुकी थीं. उन्हें अब कोई खबर विचलित नहीं कर सकती थी. पर खबर सुन कर मैं अवाक रह गई. पराग तो शीतल के गुजरने के बाद इस कदर टूट गया था कि मुझे डर लग रहा था कि कहीं उस का नर्वस बे्रकडाउन न हो जाए. मेरा दिल इस बात पर विश्वास करने से इनकार कर रहा था. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि कोई इतनी जल्दी कैसे बदल सकता है. मैं सुरेश के दफ्तर से लौटने का इंतजार करने लगी. सुरेश ने घर के अंदर कदम रखा ही था कि उन्हें देखते ही मैं फट पड़ी, ‘‘सुरेश, जानते हो, पराग शादी कर रहा है. अभी मुश्किल से 3 महीने बीते होंगे शीतल को गुजरे और वह शादी के लिए तैयार हो गया. ये सारे मर्द एक जैसे होते हैं. एक नहीं तो दूसरी मिल जाएगी.’’

सुरेश भी खबर सुन कर अचरज में पड़ गए. फिर तुरंत ही संभल कर उन्होंने कहा, ‘‘उमा, ऐसा नहीं कहते. शीतल अगर नहीं रही तो इस में पराग का क्या दोष? वह कितने दिन उस के शोक में बैठा रहेगा? बच्ची को संभालने वाला भी तो कोई चाहिए न? उस की बूढ़ी मां कब तक उसे संभालेगी?’’
सुरेश की बातों ने मुझे सांत्वना देने के बजाय आग में घी का काम किया. मैं चीखने लगी, ‘‘हांहां, आप भी तो मर्द हो, पराग का पक्ष तो लोगे ही. कल अगर मुझे कुछ हो जाए तो आप भी दूसरी शादी करने से बाज नहीं आओगे. बच्ची का बहाना मत बनाओ. बच्ची की आड़ में अपनी इच्छा पूरी की जा रही है. यही काम यदि कोई औरत करे तो समाज उस पर शब्दों के बाण चलाने से नहीं चूकेगा,’’ मैं आक्रोश में आ कर पराग और सुरेश ही नहीं, बल्कि पूरी पुरुष जाति को कोसने लगी. सुरेश ने मेरे भड़कने पर भी अपना आपा नहीं खोया. शांत स्वर में मुझे समझाने लगे, ‘‘उमा, तुम अभी गुस्से में हो. गुस्से में जब लोग अपना संयम खो बैठते हैं तो सहीगलत का निर्णय नहीं ले पाते. इस तरह दूसरों पर इलजाम लगाना तुम्हें शोभा नहीं देता.’’
2 दिन बाद पराग का ईमेल आया, ‘‘दीदी, मैं शादी कर रहा हूं. बहुत ही सादे ढंग से मंदिर में हो रही है शादी. बाकी मिलने पर बताऊंगा.’’ मैं ने इस संक्षिप्त से मेल पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की.
एक दिन दोपहर का वक्त था. बच्चे स्कूल गए थे. काम निबटा कर मैं थोड़ा आराम कर रही थी. शीतल के बारे में ही सोच रही थी कि मुझे उस टेप की याद आई जिस में बच्चों की आवाज के साथसाथ शीतल की आवाज भी टेप थी. टेप चला का सुनने लगी कि दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो देखा सामने पराग खड़ा था. अभी तक पराग से मेरी नाराजगी दूर नहीं हुई थी फिर भी औपचारिकतावश मैं ने पराग को अंदर बुलाया. टेप में शीतल की आवाज सुन कर चौंक गया पराग. वह कुछ कहना चाहता था, पर इतना भावुक हो गया कि उस की आवाज भर्रा गई. अचानक अपनी भावना पर काबू न पा सकने के कारण फूटफूट कर रोने लगा. मैं ने उसे पीने को पानी दिया. वह कुछ देर यों ही बैठा रहा. फिर उस ने मुझ से फिर शुरू से टेप चलाने को कहा.
थोड़ा संयत होने पर मैं ने उसे खाना खाने को कहा. उस ने जवाब में कहा, ‘‘दीदी, मुझे भूख नहीं है. आप बस थोड़ी देर मेरे पास बैठिए. मैं औफिस के काम से मुंबई आया हूं. आप से अकेले में बातें करना चाहता था, इसलिए आप के पास चला आया.’’
मैं ने उसे शादी की मुबारकबाद दी तो कुछ देर चुप रहने के बाद उस ने कहा, ‘‘दीदी, आप सोच रही होंगी कि मैं ने इतनी जल्दी शादी कैसे कर ली? क्या करता दीदी, मैं मजबूर हो गया था. मां दमे की मरीज हैं कब तक श्रेया की देखभाल करतीं. मां की सहायता के लिए मैं ने 2 दाइयां रखीं. पहली आई बच्ची के मुंह में दूध का बोतल दे कर ऊंघती रहती थी. दूध किनारे से बह जाता था. दूसरी रखी तो घर से चीजें गायब होने लगीं. मामाजी आए थे, उन के समझाने पर मैं ने शादी के लिए हां कह दिया. मामाजी ने अखबारों में इश्तहार दे दिया. कई परिवारों की ओर से जवाब आया. मैं ने किसी भी लड़की की तसवीर की ओर नजर तक नहीं डाली. बस आए हुए पत्रों को पढ़ता रहा. तभी एक पत्र ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. यह पत्र गरिमा के पिता ने लिखा था. शादी के 1 साल बाद ही गरिमा के पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. पत्र पढ़ने के बाद मैं ने उन से संपर्क किया. मैं जब गरिमा से मिला तो मैं ने देखा कि गरिमा का बाह्यरूप अत्यंत साधारण था. पति की मृत्यु के बाद वह छोटीमोटी नौकरी करती हुई उद्देश्यहीन जीवन जी रही थी. गरिमा ने मुझे एक और बात बताई कि जब वह काफी छोटी थी, उस की मां नहीं रही थीं और विमाता ने ही उसे पाला था.
‘‘उस वक्त मुझे यही लगा कि जिस लड़की ने इस छोटी सी जिंदगी में इतने सारे उतारचढ़ाव देखे हों, वह मेरी श्रेया की देखभाल अवश्य अच्छी तरह करेगी. दूसरी बात जो उस वक्त मेरे जेहन में आई, वह यह थी कि गरिमा से शादी कर के मैं न सिर्फ श्रेया के लिए एक अच्छी मां ले कर आऊंगा, बल्कि एक अबला को भी नवजीवन दूंगा.’’ पराग के मुंह से उस के विचार जानने के बाद और यह जानने के बाद कि उस ने बाह्य रूप को ताक पर रख कर एक योग्य लड़की का चुनाव किया था, मुझे लज्जा आने लगी अपनेआप पर कि मैं ने पराग को कितना गलत समझा था. अकसर हम बिना पूरी जानकारी के लोगों के बारे में कितनी गलत राय बना लेते हैं.
श्रेया साल भर की हो गई थी. पराग ने उस के जन्मदिन की तसवीर भेजी थी. गुलाबी रंग की फ्रौक में परी लग रही थी श्रेया. श्रेया का जन्मदिन और शीतल की बरसी की तारीख एक ही थी. सुबह श्रेया को जन्म दे कर, उसी रात को नहीं रही थी शीतल. पराग ने लिखा था कि शीतल की खुशियों के लिए उस ने पूरे धूमधाम से श्रेया का जन्मदिन मनाया था, क्योंकि वह श्रेया की खुशियों के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहता थाअनोखा रिश्ता: भाग3
श्रेया जब तक भारत में रही गरिमा के ही गुणगान करती रही. शीतल के बारे में उस ने कुछ नहीं पूछा. राहुल और रिया के साथ चहकती फिरती रही. नियत दिन पर हम से आज्ञा ले कर वह अमेरिका लौट गई.

श्रेया जब 2 साल की हुई तो पराग को अमेरिका में अच्छी नौकरी मिल गई. अमेरिका जाने से पहले तीनों आए थे मुझ से मिलने. श्रेया को देख कर, शीतल को याद कर के मेरी आंखें गीली हो गई थीं. मेरा ध्यान गरिमा की ओर गया तो मैं ने मुसकरा कर उस का स्वागत किया. गरिमा को मैं तसवीर में तो देख चुकी थी, पर पहली बार उस से रूबरू होने का मौका मिला था. उस की शक्लसूरत तो अति साधारण थी ही, वह कुछ भीरू और संकोची भी लगी. मैं ने उस से बातचीत करने की कोशिश की तो धीरेधीरे मेरे स्नेहिल व्यवहार के कारण वह मुझ से खुल कर बातें करने लगी. जब वे जाने लगे तो मैं ने गरिमा से संपर्क बनाए रखने को कहा.
गरिमा ने अपना वादा निभाया और मुझ से संपर्क बनाए रखा. कभी फोन पर, तो कभी ई मेल भेज कर. श्रेया 3 साल की थी तो खबर आई कि गरिमा ने बेटे को जन्म दिया है. मैं ने उन्हें बधाई दी. पुत्र के जन्म के 1 साल बाद पूरा परिवार भारत आया तो वे जल्द ही मुझ से मिलने भी आए. श्रेया अब पटरपटर बोलने लगी थी. उस का भाई सांवला, दुबलापतला था. वह अपनी मां पर गया था. पराग और गरिमा बेहद आत्मीयता से हम से मिले.
लेकिन पहले की तरह उन्होंने हमारे साथ संपर्क बनाए रखा. पराग के मुकाबले गरिमा ही ज्यादा बातें किया करती थी. गरिमा ने मुझे बताया कि अब उन्होंने निश्चय किया है कि वे श्रेया को उस की मां का सच बताना चाहते हैं. पराग का मानना था कि अब श्रेया समझने लगी है, इसलिए इस बात का उसे किसी और से पता लगने पर उसे दुख होगा कि हम ने उस से क्यों छिपा कर रखा. यह सुन कर मैं घबरा गई. मैं सोचने लगी कि कहीं वास्तविकता जानने के बाद श्रेया का व्यवहार गरिमा के प्रति बदल गया तो? 2 दिन बाद पराग का ईमेल आया, ‘दीदी, हम ने श्रेया को शीतल के बारे में बता दिया है. सब कुछ जानने के बाद भी उस का व्यवहार सामान्य है. उस में कोई बदलाव नहीं है.’

पढ़ कर मैं ने राहत की सांस ली. इस बार पराग ने श्रेया को अकेले भारत भेजा. उस का कहना था कि अगर श्रेया अपनी दिवंगत मां के बारे में कुछ जानना चाहे तो अपनी नानी से या मुझ से बेझिझक पूछ सकती है. श्रेया को लेने हम एअरपोर्ट गए. श्रेया जब बाहर निकली तो मैं दंग रह गई उस 13 वर्षीय किशोरी को देख कर वह हूबहू शीतल की तरह दिख रही थी.
श्रेया घर आ कर रिया और राहुल के साथ खेलने में व्यस्त हो गई. मुझे तो जैसे लाइसैंस मिल गया था शीतल के बारे में बातें करने का. मैं जब उसे शीतल के बारे में चंद बातें बताने लगी, तो उस ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. फिर भी मैं चुप नहीं रही और श्रेया को कुछ और बताने लगी शीतल के बारे में, तो श्रेया ने कहा, ‘‘छोडि़ए न बड़ी मां. मुझे उन के बारे में जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है. मेरी मां तो गरिमा हैं.’’
श्रेया जब तक भारत में रही गरिमा के ही गुणगान करती रही. शीतल के बारे में उस ने कुछ नहीं पूछा. राहुल और रिया के साथ चहकती फिरती रही. नियत दिन पर हम से आज्ञा ले कर वह अमेरिका लौट गई.न्यूयार्क के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में राहुल को एम.एस. की पढ़ाई के लिए दाखिला मिल गया. रिया के लिए भी एक अच्छा सा वर मिल जाने के कारण मैं ने उस की शादी कर दी. सुरेश ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी. हम सब ने एकसाथ अमेरिका जाने का फैसला किया.
राहुल को भी क्रिसमस की 1 सप्ताह की छुट्टी मिली. हम सब पराग के घर पहुंचे. पराग और गरिमा ने हमारा दिल खोल कर स्वागत किया. श्रेया अब कालेज में दूसरे शहर में पढ़ती थी. पर उस की भी छुट्टियां शुरू हो गई थीं, इसलिए वह भी वहीं थी. श्रेया 21 साल की सुंदर युवती थी. दोनों बच्चों ने आगे बढ़ कर हमारा अभिवादन किया.
हमारे आने की खबर मिलते ही गरिमा ने ढेर सारी खाने की चीजें बना डाली थीं. नाश्ता करने के बाद सुरेश और पराग किसी चर्चा में मशगूल हो गए. गरिमा रसोईघर की ओर जाने लगी, तो उस के पीछेपीछे मैं ने भी रसोई में प्रवेश किया. मैं ने गरिमा की मदद करनी चाही तो उस ने एक कुरसी खींच कर उस में मुझे बैठा दिया, ‘‘आप यहां आराम से बैठ कर बातें कीजिए. मैं सब कर लूंगी.’’ फिर गरिमा वहां से जाने लगी तो मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘गरिमा, मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं. तुम ने बच्चों को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं. शीतल के गुजरने के बाद, श्रेया के बारे में सोच कर मैं बहुत परेशान हो गई थी कि बिन मां की बच्ची का क्या होगा? पर तुम ने तो उसे मां से भी बढ़ कर प्यार दिया.’’
‘‘दीदी, मुझे भी तो श्रेया के बदौलत ही समाज में इतनी इज्जत मिली. उसी की बदौलत तो मैं इस घर में आई.’’
मैं ने उसे गले से लगा लिया, ‘‘यह तुम्हारा बड़प्पन है गरिमा कि तुम ऐसा सोचती हो.’’
मेरा स्नेहसिक्त स्पर्श पा कर जैसे गरिमा के अंदर दबी हुई ज्वालामुखी फूट पड़ी. मैं ने महसूस किया, गरिमा कितनी आहत थी. आज उस ने मेरे सामने अपना दिल खोल कर रख दिया, ‘‘दीदी, पराग ने आज भी अपने मन में शीतल को बसा रखा है. वहां मेरे लिए अभी भी कोई जगह नहीं है. शादी के बाद कई सालों तक हम दोनों के बीच एक अभेद्य दीवार बनी रही. सिर्फ श्रेया की वजह से हम एकदूसरे से जुड़े थे. मुझे लगता है कि सिर्फ श्रेया के लिए ही पराग ने मुझ से शादी की थी. पराग ने मुझ से शादी के कई साल बाद शारीरिक संबंध बनाए, जिस का नतीजा अमित है. दीदी, आप ही बताइए, जैसा प्यार उन्होंने शीतल के साथ किया था, क्या मैं भी वैसे ही प्यार की हकदार नहीं हूं?’’
अचानक मुझे गरिमा बेहद खूबसूरत लगने लगी. उस की आंतरिक सुंदरता छलक कर बाहर आती हुई दिखाई दी मुझे. मैं ने सोच लिया कि मैं पराग से इस विषय पर अवश्य बात करूंगी. खाना खाने के बाद हम घूमने जाने के लिए निकले. गरिमा और पराग ने अपनीअपनी गाड़ी निकाली. गरिमा का एक और रूप देख कर मैं आश्चर्यचकित रह गई. पूरे आत्मविश्वास के साथ अमेरिका की सड़कों पर गाड़ी दौड़ा रही थी गरिमा. मेरे आश्चर्य प्रकट करने पर उस ने कहा, ‘‘शुरूशुरू में मैं बहुत डरती थी पर
कार चलाना मेरी मजबूरी थी. यहां सार्वजनिक वाहन नहीं मिलते न. कब तक छोटेछोटे कामों के लिए भी पराग पर निर्भर रहती?’’
मैं ने कहा, ‘‘वाह, गरिमा, तुम ने बहुत मेहनत की है अपनेआप को ऊपर उठाने में. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही संकोची गरिमा है.’’
सुबह उठने पर जब मैं ने देखा कि सूरज की उजली किरणें बगीचे को स्पर्श करने लगी हैं, तो अपने शरीर पर भी उन किरणों की छुअन महसूस करने के लिए अपने को रोक न पाई और बगीचे में चहलकदमी करने लगी. तभी पीछे से पराग ने पुकारा. मैं ने सोचा यही सही मौका है पराग से बातें करने का. कुछ औपचारिक बातों के बाद में सीधे मुद्दे पर आ गई, ‘‘पराग, गरिमा ने कितनी खूबसूरती से घर और बच्चों को संभाला और उन्हें बड़ा किया है न?’’
‘‘हां दीदी, रिश्तेदारों में अपनेआप को साबित करने के लिए गरिमा को न जाने कितनी बार अग्निपरीक्षा से हो कर गुजरना पड़ा. उसी की बदौलत तो निश्चिंत हो कर मैं नौकरी में अपना ध्यान लगा सका.’’
‘‘गरिमा के योगदान को मानते हो न पराग, फिर क्या तुम ने भी उसे वह सब कुछ दिया, जिस की वह हकदार है?’’
चौंक कर देखा पराग ने मेरी तरफ, ‘‘क्यों दीदी, मैं ने उसे क्या कुछ नहीं दिया? एक आरामदायक घर, पैसा, अपनी इच्छानुसार जीने की छूट और क्या चाहिए जिंदगी जीने के लिए?’’
‘‘पराग, एक स्त्री भौतिक सुखसुविधाओं से बढ़ कर अपने पति के सान्निध्य की भूखी होती है. अपना संकोच छोड़ कर तुम से पूछना चाहती हूं कि क्या तुम ने कभी गरिमा को अपने अंक में भर कर उस से टूट कर प्यार किया? क्या उसे वैसा प्यार देते हो जैसा तुम शीतल को दिया करते थे?’’
‘‘दीदी, क्या गरिमा ने आप से कुछ कहा?’’
‘‘यही तो विडंबना है पराग कि एक नारी अपने मुंह से कुछ नहीं कहेगी. उस की व्यथा को तुम्हें खुद समझना होगा. उस की भी तो शारीरिक जरूरतें हैं, जिन्हें सिर्फ तुम पूरा कर सकते हो. मुझे लगता है, तुम अभी भी शीतल को भुला नहीं पाए हो. शीतल तुम्हारा अतीत थी और गरिमा तुम्हारा वर्तमान. अतीत को वर्तमान पर हावी मत होने दो. इस से पहले कि गरिमा को अपना अस्तित्व बिखरता हुआ महसूस होने लगे, उस के साथ अकेले में वक्त बिताओ, उसे प्यार दो.’’
काफी देर तक सोच में डूबा रहा पराग, मैं ने उसे झकझोरा तो वह बोला, ‘‘दीदी, मुझ से बड़ी भूल हो गई है. आप चिंता न करें, मैं गरिमा को उस का हक दूंगा.’’
बातों ही बातों में पराग ने बताया कि श्रेया किसी विदेशी लड़के को चाहती है. शुरूशुरू में तो वह इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था पर गरिमा ने समझाया था उसे कि लड़का पढ़ालिखा और होनहार है. और फिर श्रेया इस रिश्ते को ले कर गंभीर है, इसलिए हमें श्रेया का दिल नहीं दुखाना चाहिए.
गरिमा के इस सोच ने फिर मुझे उस का कायल बना दिया. मैं ने कहा, ‘‘गरिमा बिलकुल सही कहती है, पराग. हमें समय के साथ बदलना चाहिए.’’
धूप तेज हो गई थी. हम घर के अंदर आ गए.
गरिमा और पराग भारत आ कर सभी रिश्तेदारों के सामने श्रेया की शादी करना चाहते थे. विदेश में बैठेबैठे ही पराग ने कंप्यूटर द्वारा मुंबई में शादी के लिए जगह, खानपान आदि का प्रबंध कर लिया. नियत दिन से 2 दिन पहले सब भारत आए. दिल्ली से मेरे मांपापा मौसीजी को ले कर मुंबई आए. एकांत मिलने पर गरिमा ने मुझे बताया कि पराग बहुत बदल गया है और उस का बहुत खयाल रखता है. सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा. मैं ने गरिमा की आंखों में चमक पहले ही देख ली थी.
नियत दिन पर श्रेया का विवाह हो गया. विवाह में उपस्थित सभी रिश्तेदारों को धन्यवाद देते हुए पराग ने सार्वजनिक रूप से गरिमा की दिल खोल कर प्रशंसा की. गरिमा ने संकोच से सिर झुका लिया, पर वह बहुत प्रसन्न थी. मैं सोचने लगी कि देर से ही सही, उसे न्याय तो मिला.
आज श्रेया की शादी कर के उस ने श्रेया के प्रति अपना यह कर्तव्य भी पूरा कर लिया था. उस ने यह साबित कर दिखाया था कि जन्म देने वाले से पालने वाला बड़ा होता है. गरिमा आज सब की नजरों में ऊपर उठ गई थी. मेरे मुख से बरबस निकल पड़ा, ‘‘गरिमा, तू धन्य है.’’क्या थी सलोनी की सच्चाई: भाग 1
सलोनी नाश्ते की प्लेट्स समेटने लगी. सचमुच फिर दुल्हन की तरह सजी संवरी सलोनी मुकेश के साथ स्वामी जी की कुटिया पर पहुंची , शाहपुर छोटी जगह ही है , कस्बे के बाहर की तरफ एक बड़ी सी ‘स्वामी कुटीर.

छोटे से कस्बे , शाहपुर की टीचर्स कॉलोनी से थोड़ी थोड़ी दूर बने छोटे छोटे घरों में से एक में सलोनी अपने पति मुकेश के साथ बैठी नाश्ता कर रही थी , दोनों बहुत ही अच्छे मूड में थे , मुकेश ने प्यार भरी नजर सलोनी पर डाल कर कहा , सलोनी , मैं बहुत खुश हूँ कि मेरा विवाह तुमसे हुआ , कहाँ तुम इतनी सुन्दर सलोनी , कहाँ मैं आम सा दिखने वाला ,’ कहकर मुकेश मुस्कुराया तो सलोनी ने बड़ी अदा से कहा ,” अब झूठी तारीफें बंद करो , वैसे लगता ही नहीं कि विवाह के दो साल पूरे हो गए हैं और आज हम इस ख़ुशी में स्वामी गोरखनाथ जी की कुटीर में उनका आशीर्वाद लेने जा रहे हैं.”
”हाँ , लगता तो नहीं कि दो साल हो गए , तुम्हारी सुंदरता तो और बढ़ गयी है.”
”चल , झूठे ,” कहकर सलोनी नाश्ते की प्लेट्स समेटने लगी. सचमुच फिर दुल्हन की तरह सजी संवरी सलोनी मुकेश के साथ स्वामी जी की कुटिया पर पहुंची , शाहपुर छोटी जगह ही है , कस्बे के बाहर की तरफ एक बड़ी सी ‘स्वामी कुटीर ‘ में कई लोग फर्श पर बैठे स्वामीजी से अपनी अपनी समस्याओं का समाधान पूछ रहे थे , स्वामी जी एक एक को अपने पास बुलाते , बिठाते और आँख बंद करके कुछ सोचते , फिर कोई उपाय बता देते , लोग एक तरफ रखे दान पात्र में कुछ डालते और चले जाते , सलोनी पर स्वामी जी की नजर पड़ी , उनकी नजरों में चमक उभर आयी , थोड़ा जल्दी जल्दी सबको निपटाया , फिर उन दोनों को अपने पास बुला लिया , मुकेश ने उनके पैर छूते हुए कहा ,” स्वामी जी , आशीर्वाद दें , आज हमारे विवाह को दो साल हो गए हैं. स्वामीजी ने दोनों के सर पर हाथ रखा , फिर धीरे से अपना हाथ सलोनी की कमर तक ले आये , सलोनी से नजरें मिलीं , सलोनी मुस्कुरा दी , मुकेश ने दो शातिर खिलाडियों की नजरों का यह खेल नहीं देखा , मुकेश ने कहा ,” बाकी तो सब आपकी कृपा है , बस यही आशीर्वाद दें कि अगली सालगिरह पर हम तीन हो जाएँ , हमारे जीवन में अब एक बच्चे की ही कमी है.” स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा ,” बच्चे तो ईश्वर की देन हैं , जब भी ईश्वर की मर्जी होगी , बच्चा हो जायेगा , इसमें चिंता कैसी , धैर्य रखो ”

इसके बाद दोनों शाहपुर से एक किलोमीटर दूर बाइक से एक पीर साहब, शौकत मियां से मिलने गए , वहां पीर साहब कई लोगों पर फूंक मार कर ही उनकी बीमारियां ठीक कर रहे थे , कुछ लोग अपने साथ पानी की बोतल लाये हुए थे , पीर साहब होठों में कुछ बुदबुदाते , फिर पानी पर फूंक मारते , लोग उनके आगे रखी चादर में कुछ रुपए रखते और कई बार उनके आगे सर झुकाते , उन्हें शुक्रिया कहते चले जाते.ये पीर साहब बड़े पहुंचे हुए थे , लोग बहुत दूर दूर से इनके पास पानी लेकर आते थे , इन्हे पानी वाले बाबा भी कहा जाता था लोगों का कहना था कि इनका पढ़ा हुआ पानी पीकर बड़ी बड़ी बीमारियां ठीक हो जाती हैं , पीर साहब का अपना भरा पूरा परिवार था , दूर खेतों में एक बढ़िया सा मकान इन्ही लोगों के विश्वास के पैसों से बन चुका था.धनी, अनपढ़ , मूर्ख लोगों की एक पूरी जमात थी जो अपने घर में किसी के बीमार होने पर इन्हे झाड़ फूंक करवाने घर भी ले जाती और अच्छी रकम भी देती. पीर बाबा शौकत मियां ने जब सलोनी को देखा तो उनका दिल धड़क उठा.दोनों उनके सामने बैठ गए , सलोनी ने कहा , बाबा , आज हमारी शादी को दो साल हो गए हैं , दुआ करें कि अगले साल मैं जब आज के दिन आपके पास आऊं तो मेरी गोद में एक बच्चा हो”
शौकत मियां करीब पचास की उम्र के तेज दिमाग के , कसरती बदन वाले इंसान थे , गंभीर सी आवाज में कहा ,’ बच्चा तो अल्लाह की देन है , जब अल्लाह की मर्जी होगी ,, तभी तुम्हारी गोद में बच्चा होगा , उसी की मर्जी से सब होता है , हाँ , इतना जरूर है कि मेरे पास आती रहो , तुम्हारे लिए कुछ अलग से पढ़कर दुआएं करूँगा”

दोनों ने हाँ में सर हिलाया , शौकत ने तरसती सी निगाहों से सलोनी को देखा , सलोनी इन निगाहों को खूब पहचानती , वह उठते उठते मुस्कुरा दी , शौकत उसके हुस्न को देखते रह गए.दोनों घर आ गए.मुकेश मुंबई में कई टैक्सी चलाता, चलवाता था , कुछ लोगों के साथ एक फ्लैट लेकर शेयर करता था , सलोनी यहीं शाहपुर में रहती , मुकेश ही आता जाता रहता , कभी दो महीने में , कभी पांच छह महीने भी हो जाते, दोनों का घर दूर गांव में था , जहाँ सलोनी को रहना बिलकुल सहन नहीं था , उसे आज़ादी पसंद थी , इसलिए वह कभी मुकेश के साथ जाने की ज़िद भी नहीं करती थी , उसके अकेलेपन की मुकेश चिंता करता तो वह कहती कि वह बस उसके आने के इंतज़ार में दिन काट लेती है , कुछ बच्चों को पढ़ाकर अपना टाइम पास कर लेती है , मुकेश ज्यादा कुछ न कहे , इसलिए कभी मायके , कभी ससुराल भी रह आती..
मुकेश और सलोनी दोनों को पीरों और बाबाओं के आश्रमों में जाने की बहुत आदत थी , दोनों ने ही अपने अपने घरों में हमेशा यही माहौल देखा था कि कोई परेशानी आयी नहीं और झट से पहुँच गए किसी बाबा या पीर के दर पर. दोनों इन्ही लोगों के पास चक्कर काटते रहते.मुकेश बहुत ही धर्मभीरु इंसान था , सलोनी तेज तर्रार , चालाक , सुंदर लड़की थी , मुकेश को अपने इशारों पर नचाना उसे खूब आता , दोनों को अपने गांव में जाने में कोई रूचि नहीं रहती थी , अब दोनों की अलग दुनिया थी. कुछ दिन हमेशा की तरह मुकेश और सलोनी ने खूब मस्ती करते हुए बिताए. फिर मुकेश के मुंबई जाने का टाइम आ गया.सलोनी ने कुछ उदास रहकर दिखाया , मुकेश ने अगले महीने फिर आने का वायदा किया , कहा , बहुत ड्राइवर्स के साथ रहता हूँ , काम अच्छा तो चल रहा है , जल्दी ही अलग घर ले कर तुम्हे साथ ही ले जाऊंगा.”क्या थी सलोनी की सच्चाई: भाग 2
सलोनी मुकेश से पूछती रहती , ”कब तक काम ख़तम होने वाला है ? अब तो बहुत दिन हो गए ” वह कहता , बस जल्दी ही आता हूँ ‘ काम ऐसा ही था , मुकेश को पता ही नहीं होता था.

मुकेश चला गया , सलोनी को कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा , उसकी एक अलग सोच थी , वह इस टाइम को खुलकर एन्जॉय करती , जहाँ मन होता , जाती , जो अच्छा लगता , वो करती
मुकेश को यही कहती , मुकेश , मैं अपने घर में ही ठीक हूँ , जगह छोटी है , आसपास का पड़ोस तो अच्छा है ही , तुम मेरी चिंता न करो , अपना ध्यान रखना.’
दोनों रोज फ़ोन पर बात करते , सलोनी अकेली जरूर थी , पर परेशान नहीं हो रही थी.अचानक सामने वाले घर में रहने वाले परिवार के सुनील ने एक दिन उसका दरवाजा खटखटाया , कहा , सलोनी , मेरी पत्नी नीता को तेज बुखार है , गुड्डू छोटा है , मैं संभाल नहीं पा रहा हूँ , तुम थोड़ी देर के लिए उसे संभाल सकती हो ? बड़ी मेहरबानी होगी.” सलोनी ने ख़ुशी ख़ुशी गुड्डू की जिम्मेदारी ले ली , गुड्डू ही क्या , सुनील भी आते जाते सलोनी को ऐसे दिल दे बैठा कि बात बहुत दूर तक पहुँच गयी. सलोनी कई दिन से अकेली थी ही , सुनील की पत्नी बीमार , दोनों ने एक दूसरे का अकेलापन ऐसा बांटा कि कानोकान किसी को खबर नहीं हुई. दोनों के सम्बन्ध बनने लगे , सारी दूरियां ख़तम हो गयी. सुनील धीरे धीरे सलोनी के लिए बहुत कुछ करने लगा , उसके खर्चों को खूब संभालता , मुकेश कई दिन से उसे पैसे ट्रांसफर नहीं कर पाया था , पर सुनील सलोनी की पैसों से खूब मदद करने लगा.
मुकेश को अपनी पत्नी पर नाज हो आता , कितनी सहनशक्ति है , सलोनी में , जरा नहीं घबराती. सलोनी की सुनील के साथ रासलीला दिनोदिन बढ़ती जा रही थी , उसकी पत्नी ठीक हो गयी थी और सलोनी की अहसानमंद थी कि उसने परेशानी के समय गुड्डू को संभाल कर बहुत हेल्प की. अब भले ही गुड्डू का बहाना नहीं था पर सुनील अब भी सबसे नजरें बचा कर सलोनी के साथ समय बिताता.अचानक सलोनी की एक सहेली उसके पास कुछ दिन रहने आ गयी , वह बीमार चल रही थी और सलोनी के कहने पर पीर बाबा का आशीर्वाद लेने आ गयी थी , सलोनी उसे बाबा के पास ले गयी , बाबा ने झाड़ फूंक शुरू की , कहा , रोज आना होगा.” सहेली मंजू तैयार हो गयी , मंजू का पति अनिल भी उसके साथ आया था , सलोनी का रंग रूप देख अनिल का दिल मचल उठा , मंजू और सलोनी एक ही गांव की थी , मंजू का एक बेटा था जिसे वह इस समय अपने ससुराल छोड़ कर आयी थी , अनिल आया तो था कि बस मंजू को छोड़कर चला जायेगा पर सलोनी के पास से जाने का उसका मन ही नहीं हुआ. मंजू रोज पीर बाबा के पास अकेली ही चली जाती , पीछे से अनिल ने मर्यादा लांघने की कोशिश की तो सलोनी को कहाँ ऐतराज हो सकता था , वह मुकेश की अनुपस्थिति को जी भर कर एन्जॉय कर रही थी. सलोनी ने उसके साथ कई बार सम्बन्ध बनाये , अभी सुनील नहीं आ सकता था , वह फ़ोन पर सलोनी से तड़प तड़प कर बात किया करता , मन ही मन उसे मूर्ख कहती हुई सलोनी इस समय तो अनिल में डूबी थी , उसे न तो मुकेश की याद आती , न सुनील की.

मंजू की झाड़ फूंक इक्कीस दिन चली , अनिल इस बीच कई बार आता रहा था , बाइक पर आता , इस तरह आता कि मंजू को भी पता नहीं चल पाया कि जब वह पीर बाबा के सामने बैठी होती है , अनिल उसकी सहेली के साथ बैठा होता है. झाड़फूंक और अंधविश्वास में डूबे लोग न जाने कितने तरीके से अपने आप को नुकसान पहुंचा लेते हैं . अनिल फिर आते रहने का वायदा करके मंजू को लेकर चला गया , सलोनी ने कह दिया था , फ़ोन करके ही आना , उसे पता था अब वह कुछ दिन सुनील के साथ गुजारेगी। अनिल और मंजू चले गए सलोनी ने फौरन सुनील को फोन किया , बहुत दिन हो गए , मैं तो मेहमानो में ही घिरी रही , कब आओगे ? बड़ी मुश्किल से कटे ये दिन ”
”जल्दी ही आता हूँ , सलोनी , बड़ा मुश्किल रहा तुम्हारे बिना जीना , आता हूँ ”
सलोनी मुकेश से पूछती रहती , ”कब तक काम ख़तम होने वाला है ? अब तो बहुत दिन हो गए ” वह कहता , बस जल्दी ही आता हूँ ‘ काम ऐसा ही था , मुकेश को पता ही नहीं होता था कि वह कब घर आ पायेगा , पर सलोनी की याद उसे खूब सताती , रोज फ़ोन पर बात हो जाती थी , सलोनी उसे बताती कि वह अपना सारा टाइम पूजा पाठ में , स्वामीजी की कुटीर में , पीर बाबा के पास जाकर लगाती है , मुकेश खूब खुश हो जाता कुछ दिन और बीते , मस्ती करने के चक्कर में सलोनी भूल ही गयी कि उसे काफी दिनों से पीरियड नहीं हुआ है , ध्यान गया तो हिसाब लगाया कि तीन महीने से ऊपर हो चुके हैं , खुद ही किट लेकर प्रेगनेंसी चेक भी कर ली , होश उड़ गए उसके , वह प्रेग्नेंट थी मुकेश को गए तो चार महीने से ऊपर हो चुके थे , अनिल उसके पास आता रहा था , सुनील से भी सम्बन्ध चल ही रहे थे , उसने हिसाब लगाया , बच्चा मुकेश का तो नहीं था , इतना बेवक़ूफ़ तो मुकेश भी नहीं था कि इतना न सोचता वह कुछ दिन सोचती रही , फिर एक लेडी डॉक्टर के पास पहुँच गयी , एबॉर्शन के लिए बात की तो डॉक्टर ने कहा ,” टाइम कुछ ज्यादा ही हो गया है , तुम कुछ कमजोर भी हो , यह तुम्हारे भविष्य के लिए ठीक नहीं रहेगा , अपने पति को ले आना , मैं उन्हें भी समझा दूंगी ” टाइम गुजरता जा रहा था , उसने दो और डॉक्टर्स से बात की , कोई भी एबॉर्शन के लिए तैयार नहीं हुआ उसने सुनील को बता दिया , सुनील ने तो सुनते ही हाथ झाड़ लिए ,” देखो , सलोनी , मैं कुछ नहीं कर सकता , तुम ही सोचो , क्या करना है , मैं इतना ही कर सकता हूँ कि आज के बाद तुमसे न मिलूं ” और वह सचमुच फिर कभी सलोनी से मिला भी नहीं सलोनी को जैसे बड़ा धक्का लगाक्या थी सलोनी की सच्चाई: भाग 3
मुकेश के चेहरे पर तनाव छाया , शौकत ने कारण पूछा तो मुकेश ने उसे भी अपनी शंका बता दी , शौकत ने कानो पर हाथ लगाकर ऊपर देख कर माफ़ी मांगी.

सलोनी ने अनिल को फोन करके बुलाया , बताया कि वह प्रेग्नेंट है ” अनिल भी हड़बड़ा गया , बोला ,” सलोनी , तुम एबॉर्शन ही करवा लो मैं तो तुम्हारी हेल्प नहीं कर पाउँगा ” इतने में ही मुकेश ने खबर दी , कि वह पंद्रह दिन बाद आ जायेगा , पूरे एक महीने की छुट्टी सलोनी का दिल और बुझ गया कसबे के बाहर एक मशहूर मंदिर था , दोनी इस मंदिर के दर्शन करने खूब आते थे , आज जब सलोनी का दिल दुखी था , वह यूँ ही उस मंदिर में जाकर बैठ गयी , घंटों भूखी प्यासी बैठी रही , वहां के पंडित जयदेव ने देखा तो उसे पीछे बने अपने कमरे में ले गए , पूछा , ”क्या हुआ , सलोनी , क्यों ऐसे सुबह से बैठी हो ?”
सलोनी ने पंडित जी से सोची समझी रणनीति से अपना दुःख बाँट लिया,” पंडित जी , भूल हो गयी मुझसे , मैं अपने प्राण देना चाहती हूँ , मुकेश यहाँ नहीं है और मैं गर्भवती हूँ ”
जयदेव का मन खिल उठा , बाहर से गंभीर स्वर में बोला ,” पहले तुम कुछ दिन यहाँ आराम करो , मैं अकेला ही रहता हूँ मन शांत हो जाए तो बात करेंगें चिंता मत करो , अब तुम भगवान् के घर बैठी हो , सब ठीक ही होगा ” सलोनी ने जैसा सोचा था , वैसा ही हुआ , वह कुछ दिन लगातार उदास सी जयदेव के पास आती रही , आने वाले समय में उसे जयदेव की जरुरत पड़ सकती थी क्योकि वह यह बिलकुल नहीं चाहती थी कि मुकेश उससे नाराज होकर उससे रिश्ता तोड़ ले , जयदेव ढोंगी पंडित था , सलोनी को मीठी मीठी बातें करके तसल्ली देता , वह यह नहीं जानता था कि सलोनी ऐसा होने दे रही है , सलोनी ने उसे सम्बन्ध भी बनाने दिए तो जयदेव ऐसे खुश हो गया कि जैसे उसकी लाटरी निकल आयी हो , सलोनी जैसी सुंदरी उससे रिश्ता जोड़ रही है , वह तो खिल उठा सलोनी घर जाती , थोड़ी देर आराम करती , खाना पीना तो जयदेव के भक्तों से ही इतना आ जाता कि जयदेव उसे घर भी खाना देकर ही भेजता सलोनी समय निकालकर पीर बाबा , शौकत मियां के पास भी पहुँच गयी , वहां भी उसने वैसे ही किया जैसे जयदेव के साथ किया था , शौकत मियां को तो उसने घर ही बुला लिया क्योकि शौकत जहाँ रहता था , वहां लोगों का आना जाना बहुत रहता । अब जयदेव और शौकत उसकी मुट्ठी में थे , अब उसकी चिंता कम हो गयी थी सलोनी ने जयदेव और शौकत को यह भरोसा दे दिया कि मुकेश के आने के बाद और बच्चा होने के बाद भी वह उन दोनों से हमेशा सम्बन्ध रखेगी , बस , मुकेश के सामने वे कुछ ऐसी बात करें कि सब ठीक रहे दोनों को एक भरपूर जवान , सुंदर लड़की का साथ मिल रहा था , दोनों ने सलोनी को पूरी मदद करने का भरोसा दिलाया

मुकेश आ गया , सलोनी हमेशा की तरह उसकी बाहों में लिपट गयी , मुकेश सलोनी के पेट के उभार पर बहुत हैरान हुआ , चौंक कर पूछा, अरे , यह मुझे क्यों नहीं बताया ?”
सलोनी ने शर्माते हुए कहा , ” तुम्हे सरप्राइज देना था’
”कितने दिन हुए ?”
सलोनी ने कहा ,” चौथा महीना ”
” पर मैं तो इस बार ज्यादा समय बाद आया हूँ , ” मुकेश हिसाब लगाने लगा , तो सलोनी ने पूरे कॉन्फिडेंस से कहा , क्या हिसाब लगा रहे हो ? बस , खुश होने की बात है , खुश हो जाओ ”
मुकेश के माथे पर बल पड़े , इतने में जयदेव ने दरवाजा नॉक किया , माहौल की गंभीरता समझी , मुकेश उनके पैर छू कर आशीर्वाद लेने लगा ,” अरे , पंडित जी , आप ? यहाँ ?”
”हाँ , यहाँ से निकल रहा था कि सोचा देख लूँ , सलोनी ठीक तो है , मुकेश , इतनी बड़ी भगवान् की पूजा करने वाली भक्त पत्नी मिली है , तुम बहुत किस्मत वाले हो , मुकेश पर बात क्या है ?”
मुकेश ने अपने मन की दुविधा जयदेव को बता दी क्योकि उसके हिसाब से पंडित जी तो भगवान् का सबसे बड़ा रूप थे , और वे उसकी सब प्रॉब्लम दूर कर सकते थे , जयदेव का कहा तो मुकेश के लिए ईश्वर की आवाज़ थी , जयदेव ने शांत स्वर में कहा ,” बेटा , यह सब ईश्वर की लीला है , अपनी देवी सामान पत्नी पर भूल कर भी शक मत करना , रोज दर्शन के लिए मंदिर आती , सत्संग सुनती है , कौन अपना इतना समय आजकल ईश्वर की भक्ति में लगाता है ? आने वाला बच्चा ईश्वर का प्रसाद है , खुश होकर इसका स्वागत करो , बेटा ।” सलोनी जितना भोला चेहरा इस बीच बना सकती थी , बनाकर अपने झूठे आंसू पोंछती रही . जयदेव सलोनी की तरफ बदमाशी से देख कर मुस्कुराता हुआ चला गया. मुकेश सर पकड़कर बैठा था , सलोनी ने उसके लिए खाना तैयार किया , वह चुप ही रहा , इतने में शौकत मियां आ गए , बाहर से ही आवाज दी , ” मुकेश , कैसे हो ? ठीक तो हो ?”

मुकेश ने उनका स्वागत करते हुए पूछा ,” आपको कैसे पता , बाबा ,कि मैं आ गया हूँ ”
”कल सलोनी आयी थी , तुम्हारे लिए दुआएं करवाने और यह ख़ुशी बताने कि तुम पिता बनने वाले हो ”
मुकेश के चेहरे पर तनाव छाया , शौकत ने कारण पूछा तो मुकेश ने उसे भी अपनी शंका बता दी , शौकत ने कानो पर हाथ लगाकर ऊपर देख कर माफ़ी मांगी ,” अरे , बच्चा तो अल्लाह की देन है , सलोनी जैसी बीबी पर शक कर रहे हो ? कैसा गुनाह कर रहे हो ? तुम अल्लाह के चमत्कार के बारे में जानते नहीं ? वो चाहे तो कुछ भी हो सकता है.”
धर्मभीरु मुकेश के मुँह पर हवाइयां उड़ने लगी , कुछ समझ नहीं पाया कि क्या वही सलोनी पर शक करके गलती कर रहा है , पहले जयदेव और अब पीर बाबा , जिन पर वह आँख मूँद कर भरोसा कर सकता है , वे दोनों गलत तो नहीं हो सकते , वे दोनों तो भगवान् का रूप हैं , उसने सलोनी पर नजर डाली , नहीं , मासूम सा चेहरा ऐसे उसे धोखा तो नहीं दे सकता , पर इतने महीनो का गर्भ ? मुकेश की जुबान जयदेव और पीर बाबा तो बंद कर ही गए थे , वह कुछ बोल ही नहीं पाया , सर पकड़कर सलोनी के भोले चेहरे को देखता रह गया.सलोनी सर नीचे किये बैठ गयी , उसके चेहरे पर छायी एक कुटिल हंसी मुकेश को दिख ही नहीं पायी. मुकेश जयदेव और शौकत की बातों के जवाब में चुप रहने के अलावा कुछ कर ही नहीं सका.दुविधा: आरती के जीवन को सुखी बनाने के लिए रघु ने क्या निर्णय लिया?
आरती ने शिशु को हृदय से लगा लिया. उस के दिल में ममता का स्रोत फूट निकला. उस नन्ही सी जान के प्रति उस के दिल में ढेर सारा प्यार उमड़ आया.

कपड़े तहियाते हुए आरती के हाथ थम गए. उस की आंखें नेपथ्य में जा टंगीं. मन में तरहतरह के विचार उमड़नेघुमड़ने लगे. उसे लगा कि वह एक स्वप्नलोक में विचर रही है. उसे अभी भी विश्वास न हो रहा था कि पूरे 10 साल बाद उस का प्रेमी मिहिर फिर उस की जिंदगी में आया था और उस ने उस की दुनिया में हलचल मचा दी थी. वह बैंक में अपने केबिन में सिर झुकाए काम में लगी थी कि मिहिर उस के सामने आ खड़ा हुआ. ‘‘अरे तुम?’’ वह अचकचाई. उस चिरपरिचित चेहरे को देख कर उस का दिल जोरों से धड़क उठा.
‘‘चकरा गईं न मुझे देख कर,’’ मिहिर मुसकराया.
‘‘हां, तुम तो विदेश चले गए थे न?’’ उस ने अपने चेहरे का भाव छिपाते हुए पूछा,
‘‘इस तरह अचानक कैसे चले आए?’’
‘‘बस यों ही चला आया. अपने देश की मिट्टी की महक खींच लाई. तुम अपनी सुनाओ, कैसी गुजर रही है हालांकि मुझे यह पूछने की जरूरत नहीं है. देख ही रहा हूं कि तुम मैनेजर की कुरसी पर विराजमान हो. इस का मतलब है कि तुम्हारी तरक्की हो गई है. लेकिन लगता है कि तुम्हारे निजी जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया है. तुम वैसी ही हो जैसी तुम्हें छोड़ कर गया था.’’
‘‘हां, मेरे जीवन में अब क्या नया घटने वाला है? जिंदगी एक ढर्रे से लग गई है. सब दिन एकसमान, न कोई उतार, न चढ़ाव,’’ उस ने सपाट स्वर में कहा.
‘‘यह रास्ता तुम्हारा खुद का अपनाया हुआ है,’’ मिहिर ने उलाहना दिया, ‘‘मैं ने तो तुम्हें शादी का औफर दिया था. तुम्हीं न मानीं.’’
आरती कुछ न बोली.
‘‘अच्छा यह बताओ, लंच के लिए चलोगी? तुम से मिले अरसा हो गया. मुझे तुम से ढेरों बातें करनी हैं.’’
वे दोनों काफी देर तक रेस्तरां में बैठे रहे. बातों के दौरान मिहिर ने कहा, ‘‘आरती, मेरा भाई अमेरिका में रहता है. उस ने मुझे वहां बुलवा लिया. शुरू में काफी संघर्ष करना पड़ा पर अब मुझे अच्छी नौकरी मिल गई है. मुझे वहां की नागरिकता भी मिल गई है. मैं ने वहां अपना घर खरीद लिया है. केवल गृहिणी यानी पत्नी की कमी है. मैं ने अभी तक शादी नहीं की है. मैं अभी भी तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं. तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूं. इतने दिन तुम्हारी याद के सहारे जिया. अब मैं चाहता हूं कि हम दोनों विवाहबंधन में बंध जाएं. बोलो, क्या कहती हो?’’

‘‘अब मैं क्या बोलूं?’’ वह सिर झुकाए बोली.
‘‘वाह, तुम नहीं तो तुम्हारी जिंदगी के अहम फैसले क्या कोई और लेगा? आरती, तुम्हारा भी जवाब नहीं. तुम्हें कब अक्ल आएगी. मैं और तुम बालिग हैं, अपनी मरजी के मालिक. हमें अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का हक है.’’
‘‘मुझे सोचने का थोड़ा वक्त दो,’’ उस ने कहा.
‘‘हरगिज नहीं,’’ मिहिर ने दृढ़ता से कहा, ‘‘सोचविचार में तुम ने अपनी आधी जिंदगी गंवा दी. अब मैं तुम्हारी एक न सुनूंगा. तुम्हें फैसला अभी, इसी वक्त लेना होगा. अभी नहीं तो कभी नहीं.’’
आरती के मन में उथलपुथल मच गई. जी में आया कि वह तुरंत अपनेआप को मिहिर की बांहों में डाल दे और उस से कहे, मैं तुम्हारी हूं, तुम जो चाहे करो, मुझे मंजूर है. इस के सिवा उस के पास और कोई चारा भी तो न था. वह अपनी एकाकी गतिहीन जिंदगी से बहुत उकता गई थी. अब तक मांबाप का साया सिर पर था पर आगे की सोच कर वह मन ही मन कांप जाती थी. उसे एक सहारे की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही थी. उस ने तय कर लिया कि वह मिहिर का हाथ थाम लेगी. यह निर्णय लेते ही उस के सिर से एक भारी बोझ उतर गया. उस के मन में हिलोरें उठने लगीं.
‘‘ठीक है,’’ वह बोली.
उसे वह दिन याद आया जब मिहिर से पहली बार मिली थी. पहली नजर में ही वह उस की ओर आकर्षित हो गई थी. वह बड़ा हंसोड़ और जिंदादिल था. धीरेधीरे उन में नजदीकियां बढ़ती गईं और एक दिन मिहिर ने विवाह का प्रस्ताव किया. आरती के मन में रस की फुहार फूट निकली. वह भविष्य के सुनहरे सपनों में खो गई. लेकिन उस के मातापिता को उस का प्रेमप्रसंग रास न आया. उन्होंने मिहिर का जम कर विरोध किया. उन्हें मिहिर में खामियां ही खामियां नजर आईं. वह पिछड़ी जाति का था और गरीब घर से था. उन्होंने आरती को समझाने की कोशिश की कि मिहिर उस के लायक नहीं है और वह उस से शादी कर के बहुत पछताएगी. जब उन्होंने देखा कि आरती पर उन की बातों का कोई असर नहीं हो रहा है तो उन्होंने अपना आखिरी दांव चलाया, ‘ठीक है, यदि तू अपनी मनमरजी करने पर तुली है तो यही सही. तू जाने, तेरा काम जाने. लेकिन इस के बाद हमारातुम्हारा रिश्ता खत्म. हम मरते दम तक तेरा मुंह न देखेंगे.’ आरती बहुत रोईधोई पर पिता की बात मानो पत्थर की लकीर थी. और मां ने भी पिता की हां में हां मिलाई.
आरती के मन में भय का संचार हुआ. उस में इतनी हिम्मत न थी कि वह मांबाप से बगावत कर के, समाज की अवहेलना कर के मिहिर से शादी रचाती. वह उधेड़बुन करती रही, सोच में डूबी रही, आगापीछा सोचती रही. दिन बीतते गए और एक दिन मिहिर उस से नाराज हो कर, उस से नाता तोड़ कर उस की दुनिया से दूर चला गया. आरती के मातापिता ने उस के लिए और लड़के तलाश किए पर आरती ने सब को नकार दिया. वह तो मिहिर से लौ लगाए थी. यादों में खोई आरती को मिहिर की आवाज ने झिंझोड़ा, ‘‘मैं कल शाम को तुम्हारे घर आऊंगा. हम अपने भावी जीवन के बारे में बात करेंगे और मैं तुम्हारे मातापिता से भी मिल लूंगा. पिछली बार उन्होंने हमारी शादी में अड़ंगा लगाया था. आशा है इस बार उन्हें कोई आपत्ति न होगी.’’
‘‘नहीं, और होगी भी तो अब मैं उन की सुनने वाली नहीं हूं,’’ वह जरा हिचकिचाई और बोली, ‘‘केवल एक समस्या है.’’
‘‘वह क्या?’’
‘‘रघु की समस्या.’’
‘‘यह रघु कौन है? क्या वह मेरा रकीब है?’’
‘‘हटो भी,’’ आरती हंस पड़ी, ‘‘रघु मेरा भतीजा है. मेरे बड़े भाई का बेटा. कुल 12 साल का है.’’
‘‘तो उस के साथ क्या प्रौब्लम है?’’
‘‘तुम कल घर आ रहे हो न. वहीं पर बातें होंगी.’’
मिहिर आरती के यहां बरामदे में बैठा हुआ था. आरती ने उसे रघु के बारे में विस्तार से बताया. उस के भाई सुरेश ने एक अति सुंदर कन्या से प्रेमविवाह कर लिया था. वे अपने नवजात शिशु को ले कर मुंबई रहने चले गए थे जहां सुरेश की नौकरी लगी थी. पर किन्हीं वजहों से उन में अनबन रहने लगी और एक रोज उस की पत्नी उस से लड़झगड़ कर उसे छोड़ कर चली गई. साथ ही, बच्चे को भी छोड़ गई. सुरेश मजबूरन रघु को बैंगलुरु ले आया क्योंकि मुंबई में उसे देखने वाला कोई न था. ‘तू चिंता मत कर,’ पिता माधवराव ने उसे आश्वासन दिया, ‘बच्चे को यहां छोड़ जा, यह यहां पल जाएगा.’ उन्होंने बच्चे को आरती की गोद में डालते हुए कहा, ‘ले बिटिया, अब तू ही इसे पाल. हमेशा कुत्तेबिल्ली के बच्चों के साथ खेलती रहती है. यह जीताजागता खिलौना आज से तेरे जिम्मे.’

आरती ने शिशु को हृदय से लगा लिया. उस के दिल में ममता का स्रोत फूट निकला. उस नन्ही सी जान के प्रति उस के दिल में ढेर सारा प्यार उमड़ आया. वह सचमुच बच्चे में खो गई. वह बैंक से लौटती तो रघु की देखभाल में लग जाती. रघु भी उस से बहुत हिलमिल गया था और हमेशा उस के आगेपीछे घूमता रहता. वह उसे छोड़ कर एक पल भी न रहता था. कभीकभी रघु को कलेजे से लगा कर वह सोचती कि क्या यही मेरी नियति है? और लड़कियों की तरह उस ने भी सपने देखे थे. उस के हृदय में भी अरमान मचलते थे. वह भी अपना एक घरबार चाहती थी, एक सहचर चाहती थी जो उस को दुलार करे, उस के नाजनखरे उठाए, उस के सुखदुख में साथी हो. पर वह अपनी अधूरी आकांक्षाएं लिए मन ही मन घुटती रही. उसे लगता कि प्रकृति ने उस के साथ अन्याय किया है. और उस के अपनों ने भी उस की अनदेखी की है. सुरेश ने दोबारा शादी कर ली और उस ने रघु को अपने साथ ले जाना चाहा. ‘बेशक ले जाओ,’ माधवराव बोले, ‘तुम्हारी ही थाती है आखिर. इतने दिन हम ने उस की देखभाल कर दी. अब अपनी अमानत को तुम संभालो. मैं और तुम्हारी मां बूढ़े हो चले. अशक्त हो गए हैं. कब हमारी आंखें बंद हो जाएं, इस का कोई ठिकाना नहीं.’
रघु से बिछड़ने की कल्पना से ही आरती का दिल बैठने लगा. ‘यदि मुझे मालूम होता कि इस बालक से एक दिन बिछड़ना होगा तो मैं इस के मोहजाल में न फंसती,’ उस ने आह भर कर सोचा. और जब 7 साल के रघु ने सुना कि उसे मुंबई जाना होगा तो उस ने रोरो कर सारा घर सिर पर उठा लिया, ‘मैं हरगिज मुंबई नहीं जाऊंगा. वहां मेरा मन नहीं लगेगा. मैं बूआ को छोड़ कर नहीं रह सकता.’ पर उस की कौन सुनने वाला था. सुरेश उसे जबरन ले गया. आरती ने बताया कि जबतब रघु फोन पर बहुत रोता और झींकता था. उसे वहां बिलकुल भी अच्छा न लगता था. एक दिन अचानक सुरेश का फोन आया कि रघु गायब है. सुबह स्कूल गया तो घर नहीं लौटा. वे सब परेशान हैं और उसे तलाश कर रहे हैं. घर के लोग चिंतातुर टैलीफोन के इर्दगिर्द जमे रहे. सुबह द्वार की घंटी बजी तो देखा कि रघु खड़ा है, अस्तव्यस्त, बदहवास.
आरती ने दौड़ कर उसे लिपटा लिया.
‘अरे रघु बेटा, तू अचानक ऐसे कैसे चला आया?’
‘बूआ,’ रघु सिसकने लगा, ‘मैं घर से भाग आया हूं. अब कभी लौट कर नहीं जाऊंगा. मुझे वहां बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था. मैं वहां रोज रोता था.’
‘सो क्यों मेरे बच्चे,’ आरती ने उस का सिर सहलाते हुए पूछा.
‘मेरा वहां कोई दोस्त नहीं है. स्कूल से वापस आता हूं तो मां पढ़ने बिठा देती हैं. जरा सा खेलने भी नहीं देतीं. टीवी भी नहीं देखने देतीं. पापा के सामने मुझे प्यार करने का दिखावा करती हैं पर उन की पीठपीछे मुझे फटकारती रहती हैं.’
‘अच्छा, अभी थोड़ा सुस्ता ले. बाद में बातें होंगी.’
‘बूआ, मुझे बहुत भूख लगी है. मैं ने कल से कुछ नहीं खाया.’ उस ने उस का मनपसंद नाश्ता बना कर अपनी गोद में बिठा कर उसे खिलाते हुए कहा, ‘यह तो बता कि तू इस तरह बिना किसी को बताए क्यों भाग आया? तुझे पता है, घर में सब तेरी कितनी फिक्र कर रहे हैं?’ रघु ने अपराधी की तरह सिर झुका लिया. जब सुरेश को सूचना दी गई तो वह बहुत आगबबूला हुआ, ‘इस पाजी लड़के को यह क्या पागलपन सूझा? यहां ऐसा कौन सा कांटों पर लेटा हुआ था? नर्मदा दिनरात उस की सेवाटहल करती थी. सच तो यह है कि आप लोगों के प्यार ने इसे बिगाड़ दिया है. खैर, मैं आ रहा हूं उसे लेने.’ रघु ने सुना तो रोना शुरू कर दिया, ‘मैं हरगिज वापस मुंबई नहीं जाऊंगा. अगर आप लोगों ने मुझे जबरदस्ती भेजा तो फिर घर से भाग जाऊंगा और इस बार वापस यहां भी न आऊंगा.’
‘छि: ऐसा नहीं कहते. हम तेरे पिता से बात करेंगे. कुछ हल निकालेंगे.’
मिहिर ने आरती की ये बातें सुनीं तो बोला, ‘‘इतना तो मेरी समझ में आ गया कि तुम ने रघु को बचपन से पाला है और तुम्हारा उस से गहरा लगाव है पर देखा जाए तो वह तुम्हारी जिम्मेदारी तो नहीं है. तुम ने उस की जिंदगी का ठेका नहीं लिया है. इतने दिन तुम ने उसे संभाल दिया, सो ठीक है. अब उस के मातापिता को उस की फिक्र करने दो. तुम अपनी सोचो.’’ आरती के माथे पर पड़े बल को देख कर उस ने झुंझला कर कहा, ‘‘आरती, मैं तुम्हें समझ नहीं पा रहा हूं. हमेशा दूसरों के लिए जीती आई हो. कभी अपने लिए भी सोचो. यह जीना भी कोई जीना है? बस, मैं ने कह दिया, सो कह दिया, कल हम कचहरी जाएंगे. तुम तैयार रहना.’’
‘‘ठीक है,’’ आरती ने कहा. उस ने एक विश्वास छोड़ा. वह मिहिर को कैसे समझाए कि अपना न होते हुए भी वह भावनात्मक रूप से रघु से जुड़ी हुई है. उस बालक ने मां की ममतामयी गोद न जानी. उस ने पिता का स्नेह व संरक्षण न पाया. आरती ही उस के लिए सबकुछ थी. आरती का उदास चेहरा देख कर मिहिर द्रवित हुआ, ‘‘आरती, अगर तुम रघु से बिछड़ना नहीं चाहतीं तो एक उपाय है. हम कानूनन रघु को गोद ले सकते हैं.’’
‘‘क्या यह संभव है?’’
‘‘क्यों नहीं. अमेरिका से कई संतानहीन दंपती भारत के अनाथालयों से अनाथ बच्चों को गोद लेते हैं. हां, इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है. बहुत कागजी कार्यवाही करनी पड़ती है, बहुत दौड़धूप करनी पड़ती है. अगर तुम चाहो और सुरेश इस के लिए राजी हो तो इस के लिए कोशिश की जा सकती है.’’
‘‘तुम इतना सब करोगे मेरे लिए?’’
‘‘हां, क्यों नहीं. एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के लिए कुछ भी कर सकता है.’’
आरती ने उसे स्नेहसिक्त नेत्रों से देखा. मिहिर उसे एकटक देख रहा था. उस की आंखों में कुछ ऐसा भाव था कि वह शरमा गई.
‘‘मैं तुम्हारे लिए चाय लाती हूं.’’
आरती ने चाय बना कर रघु को आवाज दी, ‘‘बेटा, जरा यह चाय बाहर बरामदे में बैठे अंकल को दे आओ. मैं कुछ गरम पकौड़े बना कर लाती हूं.’’
‘‘अंकल चाय,’’ रघु ने कहा.
‘‘थैंक यू. आओ बैठो. तुम रघु हो न?’’
‘‘जी हां.’’
‘‘तुम्हारी बूआ ने तुम्हारे बारे में बहुतकुछ बताया है. सुना है कि तुम पढ़ने में बहुत तेज हो. हमेशा अपनी क्लास में अव्वल आते हो.’’
‘‘जी.’’
‘‘अच्छा यह तो बताओ, तुम अमेरिका में पढ़ना चाहोगे?’’
‘‘मैं अमेरिका क्यों जाना चाहूंगा जबकि यहां एक से बढ़ कर एक अच्छे स्कूल हैं.’’
‘‘हां, यह तो है पर वहां तुम अपनी बूआ के साथ रह सकोगे.’’
‘‘बूआ का साथ कितने दिन नसीब होगा? एक न एक दिन तो मुझे उन से अलग होना ही पड़ेगा. स्कूली शिक्षा के बाद पता नहीं कौन से कालेज में, किस शहर में दाखिला मिलेगा.’’ मिहिर के जाने के बाद आरती ऊहापोह में पड़ी रही. उस की जिंदगी में भारी बदलाव आने वाला था. वह अपने कमरे में सोच में डूबी हुई बैठी थी कि रघु उस के पास आया, ‘‘बूआ, मैं तुम से एक बात कहना चाह रहा था.’’
‘‘बोल बेटा.’’
‘‘मैं बोर्डिंग में रह कर पढ़ना चाहता हूं.’’
‘‘अरे, सो क्यों?’’
‘‘मेरे कुछ दोस्त ऊटी के स्कूल में पढ़ने जा रहे हैं. वे मुझे बता रहे थे कि चूंकि मैं ने हमेशा अपनी क्लास में टौप किया है, मुझे आसानी से वहां दाखिला मिल सकता है. बूआ, मेरा बड़ा मन है कि मैं अपने साथियों के साथ उसी स्कूल में पढ़ूं. तुम मेरी मदद करोगी तो यह संभव होगा.’’
‘‘तू सच कह रहा है?’’
‘‘हां बूआ, बिलकुल सच.’’
आरती का मन हलका हो गया. उस ने सपने में भी न सोचा था कि उस की समस्याओं का हल इतनी आसानी से निकल आएगा. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि रघु की स्कूली पढ़ाई समाप्त हो जाने पर वह उसे अपने पास बुला लेगी. वह तुरंत मिहिर को फोन करने बैठ गई. रघु उस के पास ही मंडराता रहा. उस ने बूआ और मिहिर की बातें सुन ली थीं. वह जान गया था कि बूआ और मिहिर एकदूसरे को चाहते हैं और विवाह करना चाहते हैं और उस ने अचानक आ कर बूआ को उलझन में डाल दिया था.
उस ने सहसा बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने का निश्चय कर लिया. और सोच लिया कि यदि वहां दाखिला न मिला तो वह मुंबई चला जाएगा. उस ने पलक मारते तय कर लिया कि वह अपनी बूआ की खुशियों के आड़े नहीं आएगा. उस ने अपनी बूआ को करीब से देखा और जाना है. उसे उन के दर्द और तड़प का एहसास है. उस ने बचपन से ही देखा है कि किस तरह उस की बूआ ने पगपग पर सब की मरजी के आगे सिर झुकाया है. वे कितना रोई और कलपी हैं.
क्या रघु भी औरों की तरह बनेगा? नहीं, वह इतना निष्ठुर नहीं बनेगा. वह अपनी बूआ के प्रति संवेदनशील है. वह हमेशा उन का ऋणी रहेगा. उस का रोमरोम बूआ का आभारी है. यदि बचपन में उन्होंने उस की सारसंभाल न की होती तो पता नहीं आज वह किस हाल में होता. उस ने मन ही मन ठान लिया कि वह भरसक कोशिश करेगा कि अपनी बूआ का आगामी जीवन सुखमय बनाए.नादानियां: भाग 1
निखिल की तो नवाबी और बढ़ गई है. जब देखो,‘रचना चाय बनाओ, रचना पकौड़ी बनाओ. रचना आज खाने में पिज्जा बनाना. रचना ये, रचना वो. अरे, मैं क्या कोई नौकरनी हूँ इनसब की जो इनके हुक्म बजाती रहूँ.

अपने पीठ पीछे तकिया टिकाये पलंग के किनारे बैठी रचना आराम सेमैगज़ीन पढ़ रही थी. बड़ा सुकून मिल रहा था उसे अपनी मन-पसंद मैगज़ीन पढ़ते हुए. वरना, तो रोज उसे कहाँ समय मिल पाता था . सुबह हड़बड़ी में ऑफिस निकल जाती थी और फिर रात के 8 बजे ही घर वापस आती थी. थक कर इतना चूर हो जाती कि फिर कहाँ उसे कुछ पढ़ने लिखने का मन होता था. एक संडे की छुट्टी में घर-बाहर के ही इतने काम होते थे कि मैगज़ीन पढ़ना तो दूर, झाँकने तक का समय नहीं मिल पाता था उसे. अखबार वाला हर महीने का मैगज़ीन दे जरूर जाता था, पर वह उलट-पुलट कर देख भर लेती थी. लेकिन अब जब इस लॉकडाउन मेंउसे घर में रहने का मौका मिला है,तोवह सारे मैगज़ीन पढ़ लेना चाहती है.
लेकिन निखिल उसे पढ़ने दे तब न . कब उसे परेशान किए जा रहा है. कुछ-कुछ लिख कर कागज के बॉल बना-बना कर उस पर फेंक रहा है, ताकि वह डिस्टर्ब हो जाए और पढे ही न. इस बार फिर निखिल ने उस पर कागज का बॉल बनाकर फेंका तो वह तिलमिला उठी.
“निखिल………..चीखते हुए रचना बोली, “क्या है तुम्हें ?क्यों मुझे परेशान कर रहे हो ?एक और बॉल फेंका न तो बताती हूँ. “ लेकिन निखिल को तो आज बदमाशी सूझी थी, सो उसने फिर रचना के ऊपर कागज का बॉल फेंका. “प्लीज, निखिल, पढ़ने दो न मुझे. वैसे भी मुझे कुछ पढ़ने-लिखने का समय नहीं मिल पाता है और अभी मिला है तो तुम मुझे परेशान कर रहे हो. मैं तो कहती हूँ तुम भी पढ़ने की आदत बना लो, अच्छा टाइम पास हो जाएगा और कुछ सीखने को भी मिलगे. ये लो” एक मैगज़ीन उसकी तरफ बढ़ते हुए रचना बोली.
लेकिन निखिल कहने लगा, “हुम्म……… ये औरतों वाली मैगज़ीन मैं नहीं पढ़ता. होते ही क्या हैं इसमें? सिर्फ औरतों की बातें. “

“औरतों वाली? अरे, इसमें तुम पुरुषों के लिए भी बहुत कुछ होता है, पढ़ कर देखों तो” रचना के जिद करने पर निखिल ने मैगज़ीन ले तो लिया, पर उलट-पुलट कर यह बोलकर रख दिया कि उसे कुछ समझ नहीं आता और वैसे भी पढ़ना उसे कुछ खास पसंद नहीं है. “हाँ,सही बात है. तुम्हें तो सिर्फ मोबाइल चलाना और फालतू के वीडियो देखना अच्छा लगता है, है न ?देखती नहीं हूँ क्या कैसे दिन भर मोबाइल में आँख गड़ाए रहते हो. फालतू के वीडियो देख-देखकर ‘ही ही ही’ करते रहते हो . मोबाइल एडिक्ट हो गए हो तुम, मोबाइल एडिक्ट. “
“और तुम किताबी क्रीड़ा नहीं बन गई हो. जब देखों कोई न कोई किताब लेकर बैठ जाती हो. कब से बोल रहा हूँ चाय बनाओ, पर तुम हो की, तुम्हें तो पढ़ने से ही फुर्सत नहीं मिल रही है. अरे, है क्या इस किताब में, कोई ख़जाना?” खीजते हुए निखिल बोला, तो तुनक कर रचना बोल पड़ी.
“हाँ, ख़जाना ही समझा लो, पर तुम जैसे उल्लू को यह बात समझा नहीं आएगी. पढ़ना मुझे कोई खास पसंद नहीं है………..यही कहा था न तुमने ?” मुंह चिढ़ाते हुए रचना बोली, तो निखिल गुर्राया ! “ऐसे घूरो मत, चाय पीनी है, जाकर खुद बना लो, मैं नहीं बनाऊँगी समझे ?” बोलकर वह फिर किताब में घुस गई. सोच लिया उसने, वह बिल्कुल चाय बनाने नहीं उठेगी. ‘अरे, सुबह से काम कर के अभी तो बैठी हूँ, फिर भी किसी को चैन नहीं है. हर समय कुछ न कुछ चाहिए हीं इन्हें. अच्छा था जो ऑफिस जाती थी. भले थक जाती थी, पर इतना काम तो नहीं करना पड़ता था घर का. सोचा था लॉकडाउन में खूब सोऊंगी, पढ़ूँगी. लेकिन यहाँ तो घर कामों से ही फुरसत नहीं मुझे. सब घर में हैं, तो सब को कुछ न कुछ चाहिए ही होता है और ये निखिल की तो नवाबी और बढ़ गई है. जब देखो,‘रचना चाय बनाओ, रचना पकौड़ी बनाओ. रचना आज खाने में पिज्जा बनाना. रचना ये, रचना वो. अरे, मैं क्या कोई नौकरनी हूँ इनसब की जो इनके हुक्म बजाती रहूँ ?’अपने मन में ही सोच रचना भुनभुना उठी और किताबों में फिर से आँख गड़ा दिया कि तभी उसके सिर पर एक कागज का बॉल आकर गिरा. देखा तो निखिल शरारती अंदाज में मुस्कुरा रहा था.
“निखिल………मैं ने कहा न मैं कोई चाय-वाय नहीं बनाने वाली. तुम जीतने भी तंग कर लो मुझे मैं नहीं उठने वाली यहाँ से . तुम जाओ खुद ही चाय बना लो. “
“मुझसे चाय अच्छी नहींबनती रचना, नहीं तो क्या बना नहीं लेता” बहाने बनाते हुए निखिल बोला, “अच्छा एक काम करते हैं. चलो, हम लूडो खेलते हैं. जो हारा वह चाय पकौड़े बनाएगा. बोलो, मंजूर ?”
“हुंम………..कुछ सोचते हुए रचना बोली, “अच्छा चलो मंजूर, पर शर्त याद रखना ? और हाँ, जीतूगी तो मैं ही” हँसते हुए रचना ने किताब बंद की और शुरू हो गया लूडो के खेल.
जैसे-जैसे खेल बढ़ता जा रहा था रचना जीत की तरफ बढ़ती जा रही थी. वहीं निखिल को अपनी हार साफ नजर आने लगी थी. ‘कहीं हार गया तो चाय-पकौड़े बनाने पड़ेंगे. रचना खिल्ली उड़ाएगी सो अलग’ यह सोचकर निखिल बेईमानी पर उतर आया और जीतने के लिए उसने बेईमानी शुरू कर दी, जिससे खेल में वह आगे और रचना पीछे जाने लगी. निखिल को बेईमानी करते देख रचना तिलमिला उठी और उसने खेल पलट दिया.
खेल पलटते देख निखिल आगबबूला हो उठा ! क्योंकि वह खेल जीतने ही वाला था, मगर रचना ने उस पर पानी फेर दिया. “क्यों……..क्यों खेल बिगाड़ा तुमने?” लगभग चीख पड़ा निखिल.
“क्योंकि……….क्योंकि तुम बेईमानी कर रहे थे. “ बोलते हुए रचना ने निखिल को ठेल दिया और लूडो के भी दो टुकड़े कर डाले.
“क्या की बेईमानी मैंने, हूं?” कह कर निखिल ने भी रचना को एक धक्का दे दिया. फिर क्या था तिलमिलाई सी उसने भी उसे ऐसा कस कर धक्का मारा की वह जाकर दूर लुढ़क गया. एक छोटी सी बात पर दोनों के बीच लड़ाई शुरू हुई तो दोनों ‘तू तू मैं मैं’ पर उतर आएं. बेटे-बहू के कमरे से हल्ला-गुल्ला की आवाजें सुनकर जब मालती दौड़ी आई तो देखादोनों जुद्दम-जुद्दी लड़ें जा रहे थे. कोई किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं. मालती ने पूछा भी‘अरे, क्या हुआ, क्यों लड़ रहे हो तुम दोनों इस तरह से?’मगर उन्हेंलड़ने से फुर्सत मिले तब तो मालती की बात सुनें. हार कर मालती वहाँ से यह सोचकर खिसक गई कि यह पति-पत्नी के बीच का मामला है,अपने ही सुलझ लेंगे. मगर उनकी लड़ाई तो बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ती चली गई जैसे राई का पहाड़. दोनों एक-दूसरे पर उंगली उठाने लगें, एक-दुसरे की गलतियाँ गिनवाने लगें, एकदूसरे के परिवार को कोसने लगें और जाने वे एकदूसरे पर क्या-क्या अनाप-शनाप दोषारोपण लगाने लगें थे. लग रहा था दोनों एक दूसरे की जान ही ले लेंगे. अगर बीच में मालती ना आती, तो शायद कोई अनहोनी जरूर ही जाती आज.
“अरे, क्या हो गया तुम दोनों को…………..पागल हो गए हो क्या?” बेटे बहू की हरकतों ने मालती को चिल्लाने पर मजबूर कर दिया. “क्यों इस तरह से आपस में लड़ रहे हो बच्चे की तरह? और बहू,ये तुम्हारा मायका नहीं, ससुराल है, समझा नहीं आता ? एक बच्चे की तरह लूडो खेलती हो और फिर झगड़ा करते शर्म नहीं आती? क्या यही संस्कार दिये हैं तुम्हारे माँ-बाप ने ? क्या अच्छे घरों की बहू-बेटियाँ ऐसे करती हैं ? आसपड़ोस सुनेंगे तो क्या कहेंगे ?” सास की बात सुनकर रचना की त्योरियों पर और बल पड़ गये . झुंझुलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी. दहके भी क्यों न, कोई भी लड़की अपने लिए कुछ भी बर्दाश्त कर लेगी, मगर कोई उसके माँबाप के बारे में कुछ कहें, तो कोई कैसे सहन कर सकता है.नादानियां: भाग 2
मालती रचना को समझा-बूझकर उसका गुस्सा शांत करना चाह रही थी. निखिल से वह माफी मांगवाने को भी तैयार थी. मगर रचना कुछ सुने तब तो. मालती को यह सोचकर धकधकी उठ रही थी

“अच्छा…… तो आपको अपने बेटे की गलती नहीं दिखी, मगर मेरी दिख गई, क्योंकि मैं पराए घर की हूँ इसलिए ? और संस्कार आपने कैसे दिये हैं अपने बेटे को ? बेईमानी करने की?”रचना की बात पर मालती का मुंह खुला का खुला रह गया ! रचना अपनी सास का हमेशा से आदर करती आई थी. लेकिन आज उसके ऐसे तेवर देख वह आवक रह गई ! मालती भी अपनी बहू को बेटी से कम प्यार नहीं करती थी. वह तो गुस्से से उसके मुंह अपशब्द निकल गये, वरना,कभी वह उसे कुछ उल्टा-सीधा नहीं बोलती थी. हालांकि, अपने बेटे को भी उसने डांटा, फिर भी रचना को लग रहा है कि मालती ने उसके साथ पक्षपात किया. बेटे की लगती को तो नजरंदाज कर दिया और सारी गलती बहू के सिर मढ़ दी.
रचना को बुरा मानते देख मालती ने उसे समझना चाहा कि वह इस घर की बहू है. घर की इज्जत है, अगर वही इस तरह से व्यवहार करेगी, तो लोग क्या कहेंगे ? मगर रचना कहने लगी कि वह उसे समझाने के बजाय अपने बेटे को समझाये, तो ज्यादा बेहतर होगा. रचना को अपनी माँ से बहस लगाते देख, निखिल का पारा और चढ़ गया.
बोला,“देखो, देखो माँ, कैसे आपसे भी मुंह लगा रही है ये . धक्का दिया इसने पहले मुझे . छोटी सी बात को इतना बड़ा बना दिया और घर में बवाल मचा दिया. और तेवर तो देखों इसके ? खबरदार जो मेरी माँ से बत्तमीजी की तो! “ उंगली दिखाते हुए निखिल बोला, तो कस कर उसने उसकी उंगली मरोड़ दी और बोली।
“खबरदार अपने पास रखों, समझे और आगे से उंगली-टिंगली मत दिखाना मुझे, नहीं तो तोड़ दूँगी। और तुमने, तुमने क्या किया ? एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी……..तुमने धक्का नहीं दिया मुझे, बल्कि ज्यादा ज़ोर से दिया और मुझे चोट लगते-लगते बची? और मेरे माँबाप पर क्यों गए ? मेरे माँबाप क्या हैं मेरे लिए और उन्होंने मुझे कैसे संस्कार दिये हैं, यह मुझे तुम सब से जानने की जरूरत नहीं है, समझे ?” अपनी सास की तरफ देखते हुए रचना बोली. “और एक बात जान लो, मैं कोई तुम्हारी दासी-पोसी नहीं हूँ. तुम्हारे टुकड़ों पर नहीं पलती हूँ जो तुम्हारी धौंस सहूँगी . मैं खुद इतना कमा लेती हूँ की मुझे तुम्हारे पैसों की कोई जरूरत नहीं है. तुम्हारे पैसों की जरूरत होगी तुम्हारे परिवार को” रचना की बात पर निखिल तिलमिला उठा और कस कर एक तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया. एक तो वैसे ही उसने उसकी उंगली मरोड़ दी तो दर्द हो रहा था, ऊपर से बकवास पर बकवास किए जा रही थी तो कितना सहता वो? लगा दिया एक तमाचा।

लेकिन यह बात रचना के बर्दाश्त के बाहर हो गया. क्रोध के मारे उसका मुंह लाल हो गया। उसने भी जो सामान सामने पड़ा था, उठाकर निखिल की ओर ज़ोर से फेंका। निखिल ने हाथ आगे कर रोक लिया, वरना उसका सिर तो फटना ही था आज. मालती को समझ नहीं आ रहा था कि करें ? कैसे रोकें इनके झगड़े को ?दोनों के झगड़े की आवाजें सुन आसपड़ोस के लोग भी कान लगा कर सुनने लगें. अब लोगों की तो आदत ही होती मज़ा लेने की. किसी के घर झगड़ा हुआ नहीं, पहुँच जाते हैं तमाशा देखने. मालती जितना दोनों को शांत करने का प्रयास कर रही थी, मामला उतना ही बिगड़ता जा रहा था. रचना कहने लगी कि वह निखिल के खिलाफ हिंसा का केस करेगी. बतलाएगि पुलिस को की कैसे उसके पति ने उसे मारा-पीटा, उस पर जुल्म किया. और निखिल कह रहा था कि कौन डरता है पुलिस से. बुलाओ पुलिस को. दिखाऊँगा कि कैसे रचना ने उसे अपने नाखून से नोच डाला है. धक्का दिया और सिर भी फोड़ने जा रही थी,यह भी वह पुलिस को बताएगा. ‘अरे, पुरुष एक थप्पड़ भी चला दे, तो हिंसा हो जाता है और औरत नोच-खसोट ले,पति का सिर फोड़ दे, तो कुछ नहीं?’ दोनों के चिल्लम-चिल्ली से लग रहा था मालती के दोनों कान फट कर उड़ जाएंगे. उसने अपने दोनों हाथ से कान दबा लिए. लेकिन आवाज फिर भी रुक नहीं रहे थे.
गुस्से से फनफनाई रचना 112 नंबर पर कॉल करने ही जा रही थी कि मालती ने उसके हाथ से फोन छीन लिया और घर की इज्जत की दुहाई देने लगी. मालती के हाथ जोड़ने पर रुकी थी वह, मगर उसका फैसला बदला नहीं था. उसका गुस्सा तो अब भी सातवें आसमान पर विराजमान था. कहने लगी,‘लॉकडाउन टूटते ही वह निखिल पर हिंसा का केस करेगी. जेल भिजवा कर रहेगी उसे. फोन कर वह अपने मायके वालों को सब कुछ बताना चाहती थी, लेकिन इस लॉकडाउन में वह कर भी क्या सकते थे, सिवाय परेशान होने के ? इसलिए उन्हें न बताना ही उसे सही लगा.
क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भाँति कांपती हुए वह अपने कमरे में जाकर अंदर से दरवाजा लगा लिया। क्योंकि वह निखिल का मुंह भी नहीं देखना चाहती थी. मजबूरन निखिल को सोफ़े पर सोना पड़ा, पर एक तो गर्मी ऊपर से मच्छर उसे सोने भी नहीं दे रहा था. काट-काट कर उसका बुरा हाल किए हुए था. गुस्सा आ रहा था उसे खुद पर, की क्यों उसने ऐसी लड़की को अपनी जीवन संगनी बनाया जो बातबात पर उससे लड़ती-झगड़ती रहती है ?‘नहीं, अब मैं भी नहीं रह सकता ऐसे तुनकमिजाजी लकड़ी के साथ. छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनकर घर मे हँगामा कर देती है. हाँ, मैंने बेईमानी की, तो क्या हो गया ? बचपन में भी करता था तो क्या हो गया ? बड़ा पुलिस की धमकी दे रही है ! पुलिस से वे लोग डरते हैं जो गलत करते हैं और मैंने कोई गलती नहीं की, यह मैं जनाता हूँ . ?देखो, उसके नाखून के निशान अभी हैं मेरे हाथ पर, तो क्या यह हिंसा नहीं हुआ ? कितना खून निकल आया था मेरा, काश फोटो खींच लेता, तो पुलिस को दिखाता, फिर देखता पुलिस किसे जेल भेजती है. वैसे, जेल भी चला जाऊँ तो ठीक, कम से कम इस औरत से दूर तो रहूँगा’अपने आप में ही सोचते-सोचते निखिल की आँखें जाने कब लग गई.
उधर मालती के पैरों के नीचे से जमीन सरकने लगी थी. सोच कर ही वह कांप रही थीकि अगर बहू ने पुलिस में कम्पलेन कर दिया तो क्या होगा ?माँ-बेटे को जेल तो होंगी हीं, सालों की कमाई इज्जत भीमिट्टी में मिल जाएगी. लोग हसेंगे सो अलग.
किसी तरह मालती रचना को समझा-बूझकर उसका गुस्सा शांत करना चाह रही थी. निखिल से वह माफी मांगवाने को भी तैयार थी. मगर रचना कुछ सुने तब तो. मालती को यह सोचकर धकधकी उठ रही थी कि कल अगर उसके दरवाजे पर पुलिस आ गई और सारी बात मुहल्ले की औरतों को के सामने आ गई, तो क्या होगा ?‘वह तो खुश ही होंगी . उनकी आत्मा तो कब से हमारे घर के बारे में कुछ ऐसा-वैसा सुनने को बेचैन है. इस मुहल्ले में कुछ ऐसी कुटिल महिला भी हैं, जो मुझसे, मेरी बहू से जलती हैं, क्योंकि सुंदरता के साथ मेरी बहू कमाऊ जो है. मुझे मान-सम्मान भी देती है, जो उनकी बहुए नहीं देती हैं उन्हें, तो ईर्ष्या तो होगी ही न ? मेरी बहू गाड़ी से ऑफिस आती जाती है, तो कैसे सब देख जल-भून जाती हैं. जानती हूँ हाल-चाल पूछने के बहाने आकर मेरा दिल और जलाएगी. इन दुष्टटिनियों को हमारी बेबसी पर ताली बजने का मौका मिल जाएगा. आखिर जलती जो हैं वे लोग मुझसे’सोचते-सोचते जाने कब मालती की भी आँखें लग गई.
इधर रचना का गुस्सा अभी भी उफान पर था. गुस्से में एक तो खाया नहीं जाता है और खाली पेट गुस्सा और बढ़ता जाता है. कई बार मालती खाने की थाली ले कर आई भी, पर रचना ने उसे दरवाजे से ही लौटा दिया था, यह बोलकर कि उसे भूख नहीं है. जब भूख लगेगी, खुद ही खा लेगी.
रचना और निखिल एक कंपनी में साथ काम करते थे. दोस्ती के बाद दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए और फिर धीरे-धीरे उनका प्यार परवान चढ़ने लगा. जब उनका एक दिन भी न मिलना उन्हें बेचैन करने लगा, तो दोनों ने शादी करने का फैसला ले लिया. रचना के माता-पिता को तो कोई समस्या नहीं थी इस रिश्ते से, मगर मालती अपने एकलौते बेटे का विवाह किसी गैर जातिय लड़की से नहीं करना चाहती थी. मगर बेटे के प्यार के आगे वह झुक गई और जब वह रचना से मिली, तो उसके अच्छे व्यवहार ने उसे और पिघला दिया. जरा कड़क स्वभाव की रचना दिल की कितनी अच्छी है यह बात शादी के कुछ दिनों बाद ही मालती को मालूम पड़ गया.नादानियां: भाग 3
मालती जब रचना के कमरे में चाय-नास्ता लेकर गई, तो देखा रचना बिछावन पर लेटी छटपटा रही है. पूछने पर बताया कि उसे मासिक धर्म आया है इसलिए पेट में दर्द हो रहा है.

यह बात निखिल भी जानता था कि रचना ‘शॉर्ट-टेंपर लड़की है. उसे जल्दी गुस्सा आ जाता है. लेकिन उसकी यही आदत शादी के बाद निखिल को बुरी लगने लगी थी. उनके बीच बातचीत बंद हुए आज चार दिन हो चुके थे. घर अजीब सा लगने लगा था. एक तो लॉकडाउन में वैसे ही सब उदास-उदास लग रह था, ऊपर से घर का ऐसा माहौल, मालती को और बिचलित कर रहा था. वह माहौल को हल्का करने की कोशिश कर रही थी, पर कोई झुकने को तैयार नहीं था. माँ के समझाने पर, अगर निखिल रचना से बात करने की कोशिश भी करता, तो वह अपना मुंह दूसरी तरफ फेर लेती और कहती कि गलती हो गई उससे निखिल से शादी करने का फैसला लेकर. और निखिल का गुस्सा फिर बढ़ जाता. बात सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा था.
उस दिन मालती जब रचना के कमरे में चाय-नास्ता लेकर गई, तो देखा रचना बिछावन पर लेटी छटपटा रही है. पूछने पर बताया कि उसे मासिक धर्म आया है इसलिए पेट में दर्द हो रहा है. दर्द के मारे रात भर वह सो भी नहीं पाई. रचना को अक्सर ऐसा होता है, इसलिए वह पेट दर्द की दवाई रखती है, पर दवाई खत्म हो गई है और लॉकडाउन में लाए कैसे? निखिल को जब पता चला कि पेट दर्द के कारण रचना रात भर सो नहीं पायी, तो वह भी छटपटा उठा. रचना को लेकर उसके मन में जो गुस्सा था, वह पल भर में काफ़ुर हो गया. तुरंत निखिल दवाई लाने घर से निकल गया. यह भी नहीं सोचा उसने कि पुलिस उसे रोकेगी या डंडे बरसाएगी. इधर मालती रचना के सिर अपने गोद में लेकर सहलाने लगी ताकि उसे नींद आ जाए. मालती के प्यार भरे स्पर्श से कुछ ही पलों में रचना की आँखें लग गई. कुछ घंटे बाद जब उसकी आँखें खुली तो देखा मालती उसके सिहरने बैठी है. और निखिल बाहर से ही ताक-झांक कर रहा है।
“माँ……….आ आप……
“कुछ नहीं बेटा, अब तुम्हारा पेट दर्द कैसा है ? देखो निखिल दवाई भी ले आया जाकर. लेकिन पहले कुछ खा लो, फिर दवाई खाना” बोलकर मालती एक माँ की तरह ‘कौर कौर’ कर उसे खिलाने लगी. दवाई लेकर रचना सोने की फिर कोशिश करने लगी, पर नींद नहीं आ रही थी. उसके आँखों से टप-टप कर आँसू बहे जा रहे थे. उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था कि अगर वह चाहती तो बात खत्म हो सकती थी, पर वह जान-बूझकर रबर की तरह बात को खींचती चली गई.
माँ समान अपनी सास को भी उसने कितना कुछ सुना दिया. यहाँ तक की पुलिस में जाने की भी धमकी दे दी. यह भी नहीं सोचा कि कभी उसने बहू-बेटी में फर्क नहीं किया, फिर भी उन पर पक्षपात का इल्जाम लगा दिया. ‘अरे, वो तो बड़ी हैं, पर मैं छोटी होकर उनके संस्कार पर उंगली उठाकर क्या सही किया ? नहीं मुझे माँ जी से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी. कितनी पागल थी मैं जो पुलिस को फोन करने जा रही थी! अपने घर की इज्जत को चौराहे पर नीलाम करने जा रही थी ? ऐसा कैसे करने जा रही थी मैं ! खुद मेरे ही माँ-पापा मेरी इस गलती के लिए कभी माफ नहीं करते मुझे. और किस पति-पत्नी के बीच झगड़ें नहीं होते ? इसका मतलब यह तो नहीं कि पुलिस को फोन का हिंसा का केस कर दें ?और गलती मेरी भी तो कम नहीं थी . मैंने भी तो निखिल को कितना कुछ सुना दिया और यहाँ तक की……….. यहाँ तक की उसे अपने लंबे नाखून से भी नोच डाला. कितना खून बहा देखा मैंने, फिर भी मुझे उस पर दया नहीं आई. अगर वह अपना हाथ आगे न करता, तो उसका सिर तो फूट ही गया होता, फिर सी लॉकडाउन में………………. हाय……. क्या हो गया था मुझे ? कौन सा भूत सवार हो गया था मेरे सिर पर ?”अपने गुस्से पर गुस्सा आने लगा था रचना को अब. “और वह जरा सी मेरे पेट दर्द के लिए दवा लाने दौड़ पड़ा, वह भी इस लॉकडाउन में? ये मेरी नादानियाँ नहीं तो और क्या है.
‘नहीं, मुझे जाकर उनसे अपनी गलती की माफी मंगनी चाहिए’ अपने मन में ही सोच जैसे ही रचना कमरे से बाहर आई,देखा, एक कोने में बैठी मालती सुबक रही थी. वह निखल को कह रही थी कि गलती उसकी ही है उसने ही रचना को गुस्सा दिलाया तभी वह गरम हो गई होगी. वरना, दिल की बुरी नहीं है वह. और अगर ऐसे ही करना है, तो वह कहीं चली जाएगी, नहीं रहेगी इस घर में . तभी मालती की नजर रचना पर पड़ी तो हाथ जोड़ कर वह कहने लगी, “बहू, मैं क्षमा चाहती हूँ जो तुम्हें कुछ कह दिया तो” बोलते हुए जब मालती के आँखों से आँसू टपके तो रचना का रहा-सहा गुस्सा भी उन आंसुओं में बह गया. अपनी सास का हाथ अपने हाथों में लेकर वह खुद भी रोने लगी. सास बहू दोनों रोने लगी. मन का मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है.

निखिल को भीअब अपनी गलती का एहसास होने लगा था. पर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी रचना के समीप जाने की. उसे लगा कि उसने जान-बूझकर रचनाके गुस्से को भड़काया है. क्योंकि वह तो घर के काम निपटाकर पढ़ने बैठी थी. मगर उसने ही मधु मक्खी के छत्ते में हाथ डाला. तो गुस्सा तो आयेगा ही न. क्या चाय वह खुद जाकर नहीं बना सकता था? आखिर वह उसकी पत्नी है, कोई नौकरनी तो नहीं, जो हर वक़्त उसकी हुक्म बजाती रहेगी ? इस लॉकडाउन में आम इंसान से लेकर सेलिब्रिटीज तक अपनी पत्नियों की घर के काम में हाथ बटा रहे हैं, तो मैं कौन सा बड़ा लाट साहब हूँ जो कुछ कर नहीं सकता ?’
“हूं…….. सही सोच रहे हो बेटा और सिर्फ लॉकडाउन में ही नहीं, बल्कि हमेशा तुम घर-बाहर के कामों मे अपनी पत्नी की मदद करोगे” बेटे की मन की बात पढ़ते हुए मालती बोली, तो निखिल चौंक पड़ा कि उन्हें कैसे पता चला कि वह यही सब सोच रहा था ? “क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ. बचपन में जब कोई तुम्हारी तोतली भाषा नहीं समझ पाता = था, मैं समझ जाती थी कि तुम क्या कहना चाह रहे हो या तुम्हें क्या चाहिए” मालती की बातों पर जहां निखिल हंस पड़ा वहीं रचना भी खिलखिला कर हंसने लगी. लेकिन जैसे ही निखिल पर नजर पड़ी, मुंह बिचका दिया और कमरे में चली गई. कुछ देर बाद वह भी कमरे में गया कि लेकिन अब भी उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी रचना से कुछ कहने की.
देखा तो आसमान में चाँद खूब चमक रहा था. अपनी रौशनी से वह धरती को चमका रहा था, लेकिन दूर से. निखिल ने एक भरपूर नजर चाँद पर डाला और एक लंबी सांस भरते हुए बोला,‘आज रात चाँद बिल्कुल आप जैसा है………..वही खूबसूरती…….. वही नूर………वही गुरूर और वही आपकी तरह दूर……… बोलकर उसने रचना को कस कर अपनी बाहों पर भर लिया ताकि वह कितना भी कोशिश कर ले, निकल न पाए. वैसे, निकालना तो वह भी नहीं चाह रही थी, इसलिए अपने पति के आगोश में वह समाती चली गई और फिर पूरे कमरे मे अंधेरा छाह गया.
अपने बेटे बहू के कमरे से हंसने-खिलखिलाने की आवाज सुनकर मालती ने संतुष्टि भरी सांस ली और मन ही मन हँसते हुए बोली. ‘ मेरे नादान बच्चे. नादानियाँ गई नहीं इनकीअभी तक.’शेष जीवन: भाग 1
तुम्हीं लायक बन जाते उन के लिए.’’ ‘‘लायक होता तो तुम्हारी लताड़ सुनता. आजकल सब रुपयों के भूखे हैं. न मेरे पास रुपए थे, न ही परिवार वालों ने हमें तवज्जुह दी.

‘‘ननदोईजी ठीक कहते हैं कि आप नाम के वकील हैं,’’ सुमन चिढ़ कर बोली.
‘‘खोज लेतीं कोई नाम वाला वकील. 6 बेटियों को पैदा करते हुए तुम्हारे बाप ने यह नहीं सोचा कि मेरे जैसे वकील से ही शादी होगी,’’ सुमन के पति विनोद ने उसी लहजे में जवाब दिया.
‘‘सोचा होता तो 6 बेटियां पैदा ही क्यों करते?’’
‘‘तो चुप रहो. मेरी ओर देखने से पहले अपने बारे में सोचो. तुम्हारे ननदोई को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वह एक नंबर का लंपट है. सारी जिंदगी नौकरी छोड़ कर भागता रहा. एकमात्र बेटी की शादी ढंग से न कर सका. चला है हम पर उंगली उठाने. मैं तो कम से कम अपनी जातिबिरादरी में बेटी की शादी कर रहा हूं. उस से तो वह भी नहीं करते बना.’’ जब से दोनों की इकलौती बेटी रेखा की शादी सुमन के भाई राकेश ने तय कराई तब से आएदिन दोनों में तूतू मैंमैं होती. इस की वजह दहेज में दी जाने वाली रकम थी. विनोद सारी जिंदगी वकालत कर के उम्र के 65वें बरस में सिर्फ 10-12 लाख रुपए ही जुटा पाए. इस में से 10 लाख रुपए खर्च हो गए तो भविष्य के लिए क्या बचेगा? यही सोचसोच कर दोनों दुबले हुए जा रहे थे. विनोद को यह आशंका सता रही थी कि अब वे कितने दिन वकालत कर पाएंगे? 2-4 साल तक और खींचतान कर कचहरी जा सकेंगे. उस के बाद? पुत्र कोई है नहीं जो बुढ़ापे में दोनों का सहारा बने. रहीसही इकलौती संतान बेटी थी जो एक प्राइवेट संस्थान में नौकरी करती थी. कल वह भी विदा हो कर चली जाएगी तब क्या होगा? उन की देखभाल कौन करेगा? घरखर्च कैसे चलेगा?
दहेज में दिया जाने वाला एकएक पैसा विनोद पर भारी पड़ रहा था. जबजब बैंक से रुपया निकालने जाते तबतब उन्हें लगता अपने खून का एक अंश बेच कर आ रहे हैं. मन झल्लाता तो कहते, रेखा भी प्रेमविवाह कर लेती तो ठीक होता. कम से कम दहेज से तो बच जाते. जातिबिरादरी का यह हाल है कि कमाऊ लड़की भी चाहिए, दहेज भी. इन को इतनी भी तमीज नहीं कि जब लड़की कमा रही है तो दहेज कहां से बीच में आ गया? विनोद की रातों की नींद गायब थी. वे अचानक उठ कर टहलने लगते. जितना सोचते, दिल उतना ही बैठने लगता. भविष्य में क्या होगा अगर मैं बीमार पड़ गया तो? अभी तक तो वकालत कर ली. घर से रोजाना 10 किलोमीटर कचहरी जाना क्या आसान है? 65 का हो चला हूं. रेखा 28वीं में चल रही थी. जहां भी शादी की बात चलाते 10 लाख से नीचे कोई बात ही नहीं करता. 23 साल की उम्र में रेखा ने सरकारी पौलिटैक्निक संस्थान से डिप्लोमा किया था. नौकरी लगी तो सब ने सोचा कि चलो, लड़की अपने पैरों पर खड़ी है तो लड़के वाले दहेज नहीं मांगेंगे. इस के बावजूद दहेजलोभियों का लोभ कम नहीं हुआ. विनोद झुंझलाते, कोई पुत्र होता तो वे भी दहेज ले कर हिसाब पूरा कर लेते.

सुमन रोजाना कुछ न कुछ खरीदने के लिए बाजार जाती. अभी से थोड़ीथोड़ी चीजें जुटाएगी तभी तो शादी कर पाएगी. आसपास कोई इतना करीबी भी नहीं था जिसे साथ ले कर बाजार निकल जाए. ले दे कर भाभी थीं जो उस के घर से 5 किलोमीटर दूर रहती थीं. अंगूठी एक से एक थीं, मगर सब महंगी. बड़ी मुश्किल से एक अंगूठी पसंद आई. विनोद को लगा सुमन ने कुछ ज्यादा महंगी अंगूठी खरीद ली. इसी बात पर वह उलझ गया, ‘‘क्या जरूरत थी महंगी अंगूठी खरीदने की?’’ ‘‘सोने का भाव कहां जा रहा है, आप को कुछ पता है. सब से सस्ती ली है.’’ ‘‘सब ढकोसला है. क्या हमारे समय में इतना भव्य इंगेजमैंट होता था? अधिक से अधिक दोचार लोग लड़की की तरफ से, चार लोग लड़के वालों की तरफ से 5 किलो लड्डू दिए, कुछ मेवे और फलफूल. हो गई रस्म. मगर नहीं, आज सौ लोगों को खिलाओपिलाओ, उस के बाद नेग भी दो. वह भी लड़की वालों के बलबूते पर,’’ विनोद की त्यौरियां चढ़ गईं.
‘‘करना ही होगा वरना चार लोग थूकेंगे. अपनी बेटी को भी अच्छा नहीं लगेगा. वह भी दस जगह गई है. उस के भी कुछ अरमान होंगे. उस का सादासादा इंगेजमैंट होगा तो उस के दिल पर क्या गुजरेगी.’’ ‘‘क्या वह हमारे हालात से वाकिफ नहीं है?’’ ‘‘बच्चों को इस से क्या मतलब? उन की भी कुछ ख्वाहिशें होती हैं. उन्हें चाहे जैसे भी हों, पूरी करनी ही पड़ेंगी,’’ सुमन ने दोटूक कहा. वह आगे बोली, ‘‘हम ने रेखा को दिया ही क्या है. अब तक वह बेचारी अभावों में ही पलीबढ़ी. लोगों के बच्चे महंगे अंगरेजी स्कूलों में पढ़े जबकि हम ने उसे सरकारी स्कूल में पढ़ाया. न ढंग से कपड़ा दिया, न ही खाना. सिर्फ बचाते ही रहे ताकि उस की शादी अच्छे से कर सकें,’’ वह भावुक हो गई. विनोद का भी जी भर आया. एकाएक उन के सोचने की दिशा बदल गई. रेखा ही उन के घर रौनक थी. जब वह विदा हो कर चली जाएगी तब वे दोनों अकेले घर में क्या करेंगे? कैसे समय कटेगा? सोच कर उन की आंखें पनीली हो गईं. सुमन की नजरों से उन के जज्बात छिप न सके. वह बोली, ‘‘क्या आप भी वही सोच रहे हैं जो मैं?’’

अपने मन में उमड़ते भावों के ज्वार को छिपाते हुए वे बोले, ‘‘मैं समझा नहीं?’’ ‘‘बनते क्यों हैं? आप की यही आदत मुझे पसंद नहीं.’’
‘‘तुम्हें तो मैं हमेशा नापसंद रहा.’’
‘‘गलत क्या है? आप से शादी कर के मुझे कौन सा सुख मिला? आधाअधूरा आप के पिता का बनवाया यह मकान उस पर आप के पेशे की थोड़ी सी कमाई.’’
‘‘भूखों तो नहीं मरने दिया.’’
‘‘मन का भोजन न मिले तो समझो भूखे ही रहे. राशन की दुकान सभी ने छोड़ दी. कौन जाए पूरा दिन खराब करने? एक मैं ही थी जो आज तक 10 किलो गेहूं खरीदने के लिए दिनभर राशन की दुकान की लाइन में लगती रही. शर्म आती है मुझे एक वकील की बीवी कहते हुए.’’ ‘‘देखो, मेरा दिमाग मत खराब करो. बेटी की शादी कर लेने दो.’’
‘‘उस के बाद क्या कुबेर का खजाना मिलेगा?’’
‘‘मौत तो मिलेगी. कम से कम तुम्हारे उलाहने से मुक्ति तो मिलेगी,’’ विनोद का स्वर तल्ख था. तभी किसी के आने की आहट हुई. सुमन का भाई राकेश था. दोनों ने चुप्पी साध ली. सुमन को एक तरफ ले जा कर उस ने कुछ रुपए दिए. ‘‘ये 10 हजार रुपए हैं, रख लो. आगे भी जो बन पड़ेगा, देता रहूंगा. इस बार गांव में गेहूं की फसल अच्छी हुई है. आटे की चिंता मत करना.’’ सुमन की आंखें भर आईं. जैसे ही वह गया, सुमन फिर विनोद से उलझ पड़ी, ‘‘एक आप के परिवार के लोग हैं. मदद तो दूर झांकने भी नहीं आते.’’
‘‘झांकने लायक तुम ने किसी को छोड़ा है?’’
‘‘तुम्हीं लायक बन जाते उन के लिए.’’ ‘‘लायक होता तो तुम्हारी लताड़ सुनता. आजकल सब रुपयों के भूखे हैं. न मेरे पास रुपए थे, न ही परिवार वालों ने हमें तवज्जुह दी.’’
‘‘अब समझ में आया.’’
‘‘समझ तो मैं पहले ही गया था. तभी तो अपने बेटे की बीमारी में बड़ी बहन रुपए मांगती रही, मगर मैं ने फूटी कौड़ी भी नहीं दी. जबकि खेत बेचने के बाद उस समय मेरे पास रकम थी.’’ ‘‘अच्छा किया, दे देते तो आज भीख मांगते नजर आते.’’ इंगेजमैंट में सुमन ने सिर्फ अपने भाईबहनों को न बुला कर यही संदेश दिया कि उस की कूवत नहीं है बहुत ज्यादा लोगों को खिलानेपिलाने की. इस में दोराय नहीं, ऐसा ही था. मगरशेष जीवन: भाग 2
मम्मी,’’ रेखा ने डांटा, ‘‘आइंदा इस तरह की बातें कीं तो मैं आप से बात नहीं करूंगी,’’ उस ने बातचीत का विषय बदला, ‘‘जयपुर जा रही हूं,’’ रेखा के स्वर से खुशी स्पष्ट

थोड़े से रपए बचा कर बिलावजह रिश्तेदारों को नाराज करना कहां की समझदारी थी. सुमन के पास अपनी सास के चढ़ाए कुछ गहने थे, जो उस ने सहेज कर रखे थे. शादीब्याह में भी पहन कर नहीं जाती थी कि कहीं गिर गए तो? विनोद की इतनी कमाई नहीं थी कि वे उसे एक तगड़ी भी खरीद कर दे सकें. ताउम्र उस की साध ही रह गई कि पति की कमाई से एक तगड़ी और चूड़ी अपनी पसंद की खरीदें, यह कसक आज भी ज्यों की त्यों थी. सुमन संदूक खोल कर उन गहनों को देख रही थी. विनोद भी पास थे. ‘‘काफी वजनी गहने हैं मेरी मां के,’’ विनोद की आंखें चमक उठीं. ‘‘मां के ही न,’’ सुमन के चेहरे पर व्यंग्य की रेखा तिर गई.
‘‘तुम्हें तो बहाना चाहिए मुझे ताना मारने का.’’
‘‘क्यों न मारूं ताना? एक बाली तक खरीद कर ला न सके. जो हैं वही बेटी के काम आ रहे हैं. मुझे पहनने का मौका कब मिला?’’ ‘‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम,’’ विनोद ने हंसी की, ‘‘अब कौन सा सजसंवर कर बरात की शोभा बढ़ानी है तुम्हें.’’
‘‘जब थी तब ही कौन सा गहनों से लाद दिया था.’’
‘‘स्त्री का सब से बड़ा गहना उस का पति होता है.’’
‘‘रहने दीजिए, रहने दीजिए. खाली बातों से हम औरतों का दिल नहीं भरता. मैं मर्दों के चोंचले अच्छी तरह से जानती हूं. हजारों सालों से यही जुमले कह कर आप लोगों ने हम औरतों को बहलाया है.’’
‘‘तुम्हें कौन बहला सकता है.’’
‘‘बहकी हूं तभी तो 30 साल तुम्हारे साथ गुजार दिए.’’
‘‘नहीं तो क्या किसी के साथ भाग जातीं?’’
‘‘भाग ही जाती अगर कोई मालदार मिलता,’’ सुमन ने भी हंसी की. ‘‘भागना क्या आसान है? मुझ जैसा वफादार पति चिराग ले कर भी ढूंढ़तीं तो भी नहीं मिलता.’’ ‘‘वफादारी की चाशनी से पेट नहीं भरता. अंटी में रुपया भी चाहिए. वह तो आप से ताउम्र नहीं हुआ. थोड़े से गहने बचे हैं, उन्हें बेटी को दे कर खाली हो जाऊंगी,’’ सुमन जज्बाती हो गई, ‘‘औरतों की सब से बड़ी पूंजी यही होती है. बुरे वक्त में उन्हें इसी का सहारा होता है.’’ ‘‘कल कुछ बुरा हो गया तो दवादारू के लिए कुछ भी नहीं बचेगा.’’ सुमन के साथ विनोद भी गहरी चिंता में डूब गए, जब उबरे तो उसांस ले कर बोले, ‘‘यह मकान बेच देंगे.’’

‘‘बेच देंगे तो रहेंगे कहां?’’
‘‘किराए पर रह लेंगे.’’ ‘‘कितने दिन? वह भी पूंजी खत्म हो जाएगी तब क्या भीख मांगेंगे?’’ ‘‘तब की तब देखी जाएगी. अभी रेखा की शादी निबटाओ,’’ विनोद यथार्थ की तरफ लौटा. गहने लगभग 3 लाख रुपए के थे. एकाध सुमन अपने पास रखना चाहती थी. एकदम से खाली गले व कान से रहेगी तो समाज क्या कहेगा? खुद को भी अच्छा नहीं लगेगा. यही सोच कर सुमन ने तगड़ी और कान के टौप्स अपने पास रख लिए. वैसे भी 2 लाख रुपए के गहने ही देने का तय था. जैसेजैसे शादी के दिन नजदीक आ रहे थे वैसेवैसे चिंता के कारण सुमन का ब्लडप्रैशर बढ़ता जा रहा था. एकाध बार वह चक्कर खा कर गिर भी चुकी थी. विनोद ने जबरदस्ती ला कर दवा दी. खाने से आराम मिला मगर बीमारी तो बीमारी थी. अगर जरा सी लापरवाही करेगी तो कुछ भी हो सकता है. विनोद को शुगर और ब्लडप्रैशर दोनों था. तमाम परेशानियों के बाद भी वे आराम महसूस नहीं कर पाते. वकालत का पेशा ऐसा था कि कोई मुवक्किल बाजार का बना समोसा या मिठाई ला कर देता तो ना नहीं कर पाते. सुमन का हाल था कि वह अपने को देखे कि विनोद को. आखिर शादी का दिन आ ही गया, जिस को ले कर दोनों परेशान थे. रेखा सजने के लिए ब्यूटीपार्लर गई. विनोद की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘अब यह खर्चा कहां से दें? 5 हजार रुपए कम होते हैं. एकएक पैसा बचा रहा हूं जबकि मांबेटी बरबाद करने पर तुली हुई हैं.’’ ‘‘बेटी पैदा की है तो सहन करना भी सीखिए. इस का पेमैंट रेखा खुद करेगी. अब खुश.’’
यह सुन कर विनोद ने राहत की सास ली और चैन से बैठ गया. फुटकर सौ तरह के खर्च थे. शादी के चंद दिनों पहले वर के पिता बोले कि सिर्फ डीजे लाएंगे. अगर बैंड पार्टी करनी हो तो अपने खर्च पर करें. विनोद को तो कोई फर्क नहीं पड़ा, सुमन ने मुंह बना लिया, ‘‘कैसा लगेगा बिना बैंड पार्टी के?’’ ‘‘जैसा भी लगे, हमें क्या. हमें शादी से मतलब है. रेखा सात फेरे ले ले तो मैं गंगा नहाऊं.’’ विनोद के कथन पर सुमन चिढ़ गई, ‘‘चाहे तो अभी नहा लीजिए. लोकलाज भी कुछ चीज है. सादीसादी बरात आएगी तो कैसा लगेगा?’’ ‘‘जैसा भी लगे. मैं फूटी कौड़ी भी खर्च करने वाला नहीं,’’ थोड़ा रुक कर, ‘‘जब उन्हें कोई एतराज नहीं तो हम क्यों बिलावजह टांग अड़ाएं?’’

‘‘मुझे एतराज है,’’ सुमन बोली.
‘‘तो लगाओ अपनी जेब से रुपए,’’ विनोद खीझे.
‘‘मेरे पास रुपए होते तो मैं क्या आप का मुंह जोहती,’’ सुमन रोंआसी हो गई. तभी राकेश आया. दोनों का वार्त्तालाप उस के कानों में पड़ा. ‘‘दीदी, तुम बिलावजह परेशान होती हो. बाजे का मैं इंतजाम कर देता हूं.’’ सुमन ने जहां आंसू पोंछे वहीं विनोद के रुख पर वह लज्जित हुई. विनोद को अब भी आशंका थी कि लड़के वाले ऐन मौके पर कुछ और डिमांड न कर बैठें. सजधज कर रेखा बहुत ही सुंदर दिख रही थी. विनोद और सुमन की आंखें भर आईं. भला किस पिता को अपनी बेटी से लगाव नहीं रहेगा. विनोद को आज इस बात की कसक थी कि काश, उस की अच्छी कमाई होती तो निश्चय ही रेखा की बेहतर परवरिश करता. रातभर शादी का कार्यक्रम चलता रहा. भोर होते ही रेखा की विदाई होने लगी तो सभी की आंखें नम थीं. रेखा का रोरो कर बुरा हाल था. सिसकियों के बीच बोली, ‘‘मम्मी, पापा, मैं चली जाऊंगी तो आप लोगों का खयाल कौन करेगा?’’
‘‘उस की चिंता मत करो, बेटी,’’ सुमन नाक पोंछते हुए बोली. अपनी बड़ी मौसी की तरफ मुखातिब हो कर रेखा भर्राए कंठ से बोली, ‘‘मौसी, इन का खयाल रखना. इन का मेरे सिवा है ही कौन?’’
‘‘ऐसा नहीं कहते, हम लोग भरसक इन की देखभाल करेंगे,’’ मौसी रेखा के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं. ‘‘मम्मी को अकसर गरमी में डिहाइड्रेशन हो जाता है. आप खयाल कर के दवा का इंतजाम कर दीजिएगा ताकि रातबिरात मां की हालत बिगड़े तो संभाला जा सके.’’
‘‘तू उस की फिक्र मत कर. मैं अकसर आतीजाती रहूंगी.’’ सुमन इस कदर रोई कि उस की हालत बिगड़ गई. एक हफ्ता बिस्तर पर थी. विनोद का भी मन नहीं लग रहा था. ऐसा लग रहा था मानो उन के शरीर का कोई हिस्सा उन से अलग हो गया हो. हालांकि रेखा 2 साल से बाहर नौकरी कर रही थी लेकिन तब तक एहसास था कि वह विनोद के परिवार का हिस्सा थी. अब तो हमेशा के लिए दूसरे परिवार का हिस्सा बन गई. उन्हीं के तौरतरीके से जीना होगा उसे. सुमन की तबीयत संभली तो रेखा को फोन किया.

‘‘हैलो, बेटा…’’
‘‘कैसी हो, मम्मी,’’ रेखा का गला भर आया.
‘‘ठीक हूं.’’
‘‘अपना खयाल रखना.’’
‘‘अब रखने का क्या औचित्य? बेटाबहू होते तो जीने का बहाना होता,’’ सुमन का कंठ भीग गया.
‘‘मम्मी,’’ रेखा ने डांटा, ‘‘आइंदा इस तरह की बातें कीं तो मैं आप से बात नहीं करूंगी,’’ उस ने बातचीत का विषय बदला, ‘‘जयपुर जा रही हूं,’’ रेखा के स्वर से खुशी स्पष्ट थी. ‘‘यह तुम लोगों ने अच्छा सोचा. यही उम्र है घूमनेफिरने की. बाद में कहां मौका मिलता है, घरगृहस्थी में रम जाओगी.’’ रेखा ने फोन रख दिया. विनोद ने सुना तो खुश हो गए. यहां भी सुमन ताना मारने से बाज न आई, ‘‘एक हमारी शादी हुई. बहुत हुआ तो आप ने रिकशे पर बिठा कर किसी हाटबाजार के दर्शन करा दिए. हो गया हनीमून…’’
‘‘बुढ़ापे में तुम्हें हनीमून सूझ रहा है.’’
‘‘मैं जवानी की बात कर रही हूं. शादी के पहले दिन आप रुपयों का रोना ले कर बैठ गए. आज 30 साल बाद भी रोना गया नहीं. कम से कम रेखा का पति इतना तो समझदार है कि अपनी बीवी को जयपुर घुमाने ले जा रहा है.’’ ‘‘सारी दुनिया बनारस घूमने आती है और तुम्हें जयपुर की पड़ी है,’’ विनोद ने अपनी खीझ मिटाई. ‘‘आप से तो बहस करना ही बेकार है. नईनई शादी की कुछ ख्वाहिशें होती हैं. उन्हें क्या बुढ़ापे में पूरी करेंगे?’’ ‘‘अब ऊपर जा कर पूरी करना,’’ कह कर विनोद अपने काम में लग गए. 3 साल गुजर गए. इस बीच रेखा 1 बेटे की मां बनी. ससुराल वाले ननिहाल का मुख देखने लगे. सुमन ने अपने हाथों की एक जोड़ी चूड़ी बेच कर अपने नाती के लिए सोने की पतली सी चेन, कपड़े और फल व मिठाइयों का प्रबंध किया. विनोद की हालत ऐसी नहीं थी कि वे इस सामान को ले जा सकें. वजह, उन्हें माइनर हार्ट का दौरा पड़ा था. चूंकि घर में और कोई नहीं था सो वे ही किसी तरह इलाहाबाद गए.शेष जीवन: भाग 3
अब मुझ से काम नहीं होता. 70 साल की अवस्था हो गई है. रोजाना 10-12 किलोमीटर साइकिल चला कर कचहरी जाना संभव नहीं. सोचता हूं कि घर बैठ जाऊं पर घरखर्च कैसे

लौट कर आए तो तबीयत ठीक नहीं लग रही थी. दूसरे दिन कचहरी नहीं जाना चाहते थे, मगर गए. न जाने का मतलब अपना नुकसान. एक दिन सुमन से कहने लगे, ‘मेरा मन कचहरी जाने का नहीं करता. लोग कहते हैं कि वकील कभी रिटायर नहीं होता, क्यों नहीं होता. वह क्या हाड़मांस का नहीं बना होता? शरीर उस का भी कमजोर होता है. यह क्यों नहीं कहते कि वकील रोज कचहरी नहीं जाएगा तो खाएगा क्या?’ सुमन को विनोद व खुद पर तरस आया. सरकारी नौकरी में लोग बड़े आराम से अच्छी तनख्वाह लेते हैं. उस के बाद आजन्म पैंशन का लुत्फ उठा कर जिंदगी का सुख भोगते हैं. यहां तो न जवानी का सुख लिया, न ही बुढ़ापे का. मरते दम तक कोल्हू के बैल की तरह जुतो. काले कोट की लाज ढांपने में ही जीवन अभाव में गुजर जाता है. एक रात विनोद के सीने में दर्द उभरा. सुमन घबरा गई. पासपड़ोस के लोगों को बुलाया, मगर कोई नहीं आया. भाई को फोन लगाया. वह भागाभागा आया. उन्हें पास के निजी अस्पताल में ले जाया गया. वहां डाक्टरों ने कुछ दवाएं दीं. विनोद की हालत सुधर गई. अगले दिन डाक्टर ने सुमन से कहा कि वे इन्हें तत्काल दिल्ली ले जाएं. सुमन के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं. डाक्टर बोले, ‘‘इन के तीनों वौल्व जाम हो चुके हैं. अतिशीघ्र बाईपास सर्जरी न की गई तो जान जा सकती है.’’
सुमन की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. बाईपास सर्जरी का मतलब 3-4 लाख रुपए का खर्चा. एकाएक इतना रुपया आएगा कहां से. लेदे कर एकडेढ़ लाख रुपया होगा. इतने गहने भी नहीं बचे थे कि उन्हें बेच कर विनोद की जान बचाई जा सके. मकान बेचने का खयाल आया जो तत्काल संभव नहीं था. ऐसे समय सुमन अपनेआप को नितांत अकेला महसूस करने लगी. उस के मन में बुरेबुरे खयाल आने लगे. अगर विनोद को कुछ हो गया तब? वह भय से सिहर गई. अकेली जिंदगी किस के भरोसे काटेगी? क्या बेटी के पास जा कर रहेगी? लोग क्या कहेंगे? सुमन जितना सोचती, दिल उतना ही बैठता. उस की आंखों में आंसू आ गए. भाई राकेश की नजर पड़ी तो वह उस के करीब आया, ‘‘घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा. 1 लाख रुपए की मदद मैं कर दूंगा.’’ सुमन को थोड़ी राहत मिली. तभी रेखा का फोन आया, ‘‘मम्मी, रुपयों की चिंता मत करना. मैं तुरंत बनारस पहुंच रही हूं.’’

सुमन की जान में जान आई. अपने आंसू पोंछे. वह सोचने लगी कि अभी किसी तरह विनोद की जान बचनी चाहिए, बाद में जब वे ठीक हो जाएंगे तब मकान बेच कर सब का कर्ज चुका देंगे. विनोद को प्लेन से दिल्ली ले जाया गया. मगर इलाज से पूर्व ही विनोद की सांसें थम गईं. सुमन दहाड़ मारमार कर रोने लगी. वह बारबार यही रट लगाए हुए थी कि अब मैं किस के सहारे जिऊंगी. रेखा ने किसी तरह उन्हें संभाला. तेरहवीं खत्म होने के एक महीने तक रेखा सुमन के पास ही रही. राकेश उसे अपने पास ले जाना चाहता था जबकि रेखा चाहती थी कि मां उस के पास शेष जीवन गुजारे. सब से बड़ी समस्या थी जीविकोपार्जन की. विनोद के जाने के बाद आमदनी का स्रोत खत्म हो गया था. कचहरी से 50 हजार रुपए मिले थे. 50 हजार के आसपास बीमा के. कुछ वकीलों ने सहयोग किया. सुमन ने काफी सोचविचार कर दोनों से कहा, ‘‘मैं यहीं रह कर कोई छोटीमोटी दुकान कर लूंगी. अकेली जान, दालरोटी चल जाएगी. मैं तुम लोगों पर बोझ नहीं बनना चाहती.’’ ‘‘कैसी बात कर रही हो मम्मी,’’ रेखा नाराज हो गई, ‘‘तुम्हारे बेटा नहीं है तो क्या, बेटी तो है. मैं तुम्हारा खयाल रखूंगी. यहां रातबिरात आप की तबीयत बिगड़ेगी तो कौन संभालेगा?’’ ‘‘मैं मर भी गई तो क्या फर्क पड़ेगा. मेरी जिम्मेदारी तुम थीं जिसे मैं ने निभा दिया. जब तक अकेले रह पाना संभव होगा, रहूंगी. उस के बाद तुम लोग तो हो ही,’’ सुमन के इनकार से दोनों को निराशा हुई.
‘‘जैसी तुम्हारी मरजी. मैं तुम्हारी रोजाना खबर लेता रहूंगा. तुम भी निसंकोच फोन करती रहना. मोबाइल के रिचार्ज की चिंता मत करना, मैं समयसमय पर पैसे डलवाता रहूंगा,’’ राकेश बोला. सब चले गए. घर अकेला हो गया. विनोद थे तो इंतजार था. अब तो जैसी सुबह वैसी रात. 3 कमरों में सुमन टहलती रहती. एक रोज अलमारी की सफाई करते हुए उसे एक खत मिला. खत को गौर से देखा तो लिखावट विनोद की थी. वह पढ़ने लगी :

‘‘प्रिय सुमन,
अब मुझ से काम नहीं होता. 70 साल की अवस्था हो गई है. रोजाना 10-12 किलोमीटर साइकिल चला कर कचहरी जाना संभव नहीं. सोचता हूं कि घर बैठ जाऊं पर घरखर्च कैसे चलेगा. इस सवाल से मेरी रूह कांप जाती. ब्लडप्रैशर और शुगर ने जीना मुहाल कर दिया है, सो अलग. कभीकभी सोचता हूं खुदकुशी कर लूं. फिर तुम्हारा खयाल आता है कि तुम अकेली कैसे रहोगी? क्यों न हम दोनों एकसाथ खुदकुशी कर लें. हो सकता है कि यह सब तुम्हें बचकाना लगे. जरा सोचो, कौन है जो हमारी देखभाल करेगा? एक बेटा भी तो नहीं है. क्या बेटीदामाद से सेवा करवाना उचित होगा? बेटी का तो चल जाएगा मगर दामादजी, वे भला हमें क्यों रखना चाहेंगे? मैं तुम्हें कोई राय नहीं देना चाहूंगा क्योंकि हर आदमी को अपनी जिंदगी पर अधिकार है. हां, अगर मेरे करीब मौत आएगी तो मैं बचाव का प्रयास नहीं करूंगा. इस के लिए मुझे क्षमा करना. मैं ने मकान तुम्हारे नाम कर दिया है. मकान बेच कर तुम इतनी रकम पा सकती हो कि शेष जिंदगी तुम बेटीदामाद के यहां आसानी से काट सको.
तुम्हारा विनोद.’’
खत पढ़ कर सुमन की आंखें भीग गईं. तो क्या उन्हें अपनी मौत का भान था? यह सवाल सुमन के मस्तिष्क में कौंधा. सुमन ने अलमारी ठीक से खंगाली. उस में उसे एक जांच रिपोर्ट मिली. निश्चय ही रिपोर्ट में उन के हार्ट के संबंध में जानकारी होगी? रिपोर्ट 6 माह पुरानी थी. इस का मतलब विनोद को अपनी बीमारी की गंभीरता का पहले से ही पता था? उन्होंने जानबूझ कर इलाज नहीं करवाया. इलाज का मतलब लंबा खर्चा. कहां से इतना रुपया आएगा? यही सब सोच कर विनोद ने रिपोर्ट को छिपा दिया था. सुमन गहरी वेदना में डूब गई.उस का अंदाज: भाग 1
कमाल करती हैं, मैं ने बताया है न मैं जीनियस हूं. अगर मुझे पकड़ सकीं तो जो सजा देंगी, मंजूर है. वैसे कल आसमानी सलवारसूट में आप का चेहरा देख कर ऐसा लगा

फोन की घंटी सुनते ही नेहल ने फोन कान से लगाया था, ‘‘हैलो.’’
‘‘कहिए, ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म कैसी लगी? फिल्म पुरानी हो गई है, पर आप का उस के प्रति आकर्षण खत्म नहीं हुआ. कितनी बार देख चुकी हैं?’’ हलकी हंसी के साथ दूसरी ओर से आवाज आई थी.
‘‘हैलो, आप कौन?’’ नेहल को आवाज अपरिचित लगी थी.
‘‘समझ लीजिए एक इडियट ही पूछ रहा है,’’ फिर वही हंसी.
‘‘देखिए, या तो अपना नाम बताइए वरना इस दुनिया में इडियट्स की कमी नहीं है, उन में से आप को पहचान पाना कैसे संभव होगा. मैं फोन रखती हूं.’’
‘‘नहींनहीं, ऐसा गजब मत कीजिएगा. वैसे मेरे सवाल का जवाब नहीं मिला.’’
‘‘तुम्हारे सवाल का जवाब देने को मेरे पास फालतू टाइम नहीं है, इडियट कहीं का.’’
नेहल फोन पटकने ही वाली थी कि उधर से आवाज आई, ‘‘सौरी, गलती कर रही हैं, जीनियस इडियट कहिए. देखिए, किस आसानी से आप का मोबाइल नंबर मालूम कर लिया.’’
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‘‘इस में कौन सी खास बात है, तुम जैसे बेकार लड़कों का काम ही क्या होता है. दोस्तों पर रोब जमाने के लिए लड़कियों के नामपते जान कर उन्हें फोन कर के परेशान करते हो. पर एक बात जान लो, अगर फिर फोन किया तो पुलिस ऐक्शन लेगी, सारी मस्ती धरी रह जाएगी,’’ गुस्से से नेहल ने फोन लगभग पटक सा दिया.
एमए फाइनल की छात्रा, नेहल सौंदर्य और मेधा दोनों की धनी थी. ऐसा नहीं कि उसे देख लड़कों ने फब्तियां न कसी हों या उस के घर तक उस का पीछा न किया हो, पर नेहल की गंभीरता का कवच उन्हें आगे बढ़ने से रोक देता. उसे पाने और उस के साथ समय बिताने की आकांक्षा लिए न जाने कितने युवक आहें भरते थे. लेकिन आज तक किसी ने उसे इस तरह का फोन नहीं किया था.

मांबाप की इकलौती लाड़ली बेटी नेहल, अपने मन की बातें बस अपनी प्रिय सहेली पूजा के साथ ही शेयर करती थी. आज भी तमतमाए चेहरे के साथ जब वह यूनिवर्सिटी पहुंची तो पूजा देखते ही समझ गई कि नेहल का पारा हाई है. उस ने हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है नेहल, आज तेरा गुलाबी चेहरा तमतमा क्यों रहा है?’’
‘‘मैं उसे ठीक कर दूंगी. अपने को हीरो समझता है. कहता है वह ‘जीनियस इडियट’ है. सामने आ जाए तो दिमाग ठिकाने न लगा दूं तो मेरा नाम नेहल नहीं.’’
‘‘किस की बात कर रही है, किसे ठीक करेगी?’’ पूजा कुछ समझी नहीं थी.
‘‘था कोई, नाम बताने के लिए हिम्मत चाहिए. न जाने उसे कैसे पता लग गया, हम ‘थ्री इडियट्स’ देखने गए थे. पूछ रहा था, फिल्म हमें कैसी लगी.’’
‘‘बस, इतनी सी बात पर इतना गुस्सा? अरे, बता देती तुझे फिल्म अच्छी लगी. रही बात उसे कैसे पता लगा, तो भई होगा कोई तेरा चाहने वाला. तुझे पिक्चर हौल में देखा होगा. इतना गुस्सा तेरी सेहत के लिए अच्छा नहीं, मेरी सखी. काश, कोई मुझे भी फोन करता, पर क्या करें कुदरत ने सारी सुंदरता तुझे ही दे डाली,’’ पूजा के चेहरे पर शरारतभरी मुसकराहट थी.
‘‘अच्छी बात है, अगली बार कोई फोन आया तो तेरा नंबर दे दूंगी. अब क्लास में चलना है या आज भी कौफी के लिए क्लास बंक करेगी?’’
‘‘मेरा ऐसा समय कहां, तू भला उस नेक काम में साथ देगी, नेहल? फिर उसी बोरिंग लैक्चर को सहन करना होगा. यार, यह हिस्ट्री सब्जैक्ट क्यों लिया हम ने. रोज गड़े मुर्दे उखाड़ते रहो.’’
पूजा के चेहरे के भाव देख नेहल हंस पड़ी.
‘‘तेरी सोच ही गलत है, पूजा. अगर रुचि ले तो इस विषय में न जाने कितना रोमांच और थ्रिल है. चल, वरना हम लेट हो जाएंगे.’’
बेमन से पूजा नेहल के साथ चल दी.

रात में मोबाइल की घंटी ने नेहल की नींद तोड़ दी. दिल में घबराहट सी हुई, कहीं घर से तो फोन नहीं आया है. जब से नेहल पढ़ने के लिए इस शहर में आई थी, उस का मन घर के लिए चिंतित रहता था. शुरूशुरू में होस्टल में रहना उसे अच्छा नहीं लगा था. पूजा से मित्रता के बाद उसे घर की उतनी याद नहीं आती थी.
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‘‘हैलो.’’
‘‘जरा अपनी खिड़की का परदा उठा कर देखिए, मान जाएंगी क्या नजारा है. प्लीज इसे मिस मत कीजिए, मेरी रिक्वैस्ट है,’’ फिर वही परिचित आवाज.
‘‘दिमाग खराब है क्या मेरा जो रात के 2 बजे बाहर का नजारा देखूं? रात में जागना तुम जैसे उल्लू के लिए ही संभव है. लगता है तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आओगे, अब कोई ऐक्शन लेना ही होगा.’’
फोन तो नेहल ने बंद कर दिया, पर सोच में पड़ गई, आखिर वह उसे ऐसा क्या दिखाना चाहता है जिस के लिए आधी रात को उसे जगाया है. बिस्तर से सिर उठा कर जाली वाले झीने परदे से बाहर के नजारे को देखने का लोभ, वह संवरण नहीं कर सकी. बाहर पूर्णिमा का चांद अपने पूरे वैभव में साकार था. सारे पेड़पौधे चांदनी में नहाए खड़े थे. नेहल मुग्ध हो उठी. बिस्तर से उठ खिड़की के पास आ खड़ी हुई. उस के अंतर की कवयित्री जाग उठी. कविता की कुछ पंक्तियां मन में आई ही थीं कि मोबाइल फिर बजा.
‘‘मान गईं, क्या तिलिस्मी नजारा है. जरूर कोई कविता लिख डालेंगी, पर उस का क्रैडिट तो मुझे मिलेगा न?’’ फिर वही हंसी.
‘‘अब तक कितनों की नींद खराब कर चुके हो? तुम्हारा नंबर मेरे मोबाइल पर आ गया है, अब अपनी खैर मनाओ.’’
‘‘कमाल करती हैं, मैं ने बताया है न मैं जीनियस हूं. अगर मुझे पकड़ सकीं तो जो सजा देंगी, मंजूर है. वैसे कल आसमानी सलवारसूट में आप का चेहरा देख कर ऐसा लगा, नीले आकाश में चांद चमक रहा है. बाई द वे, आप का पसंदीदा रंग कौन सा है? नहीं बताएंगी तो भी मैं पता कर लूंगा. इतनी देर बरदाश्त करने के लिए थैंक्स ऐंड गुडनाइट.’’
फोन काट दिया गया.उस का अंदाज: भाग 2
यह तो गुड न्यूज है. कोई है वह जो हमारी नेहल को ले जाएगा. काश, मेरी शादी यहां आने के पहले ही तय न हो गई होती,’’ पूजा ने आह भरी

बिस्तर पर लेटी नेहल की आंखों से नींद उड़ गई. उस से ऐसी गलती कैसे हो गई, किसी अजनबी के फोन को तुरंत काट क्यों नहीं दिया, क्यों उस की बातें सुनती रही, जवाब देती रही. वह उस के कपड़ों को भी नोटिस करता है. जरूर उस के होस्टल के आसपास रहने वाला कोई आवारा है. कल उस के नंबर से पता करना होगा. काफी देर बाद ही वह सो सकी. सुबहसुबह मां के फोन से नींद टूटी थी.
‘‘क्या हुआ, मां, घर में सब ठीक तो हैं?’’ नेहल डर गई थी.
‘‘सब ठीक हैं, तुझ से एक जरूरी बात करनी थी. देख, कुछ दिनों में एक इंद्रनील नाम का लड़का तुझ से मिलने आएगा. तू उस से अच्छी तरह से बात करेगी. उस के बारे में जो जानना चाहे, पूछ लेना. अपना रोब जमाने की कोशिश मत करना.’’
‘‘क्यों मां, क्या मैं किसी से ठीक से बात नहीं करती? वैसे वह मुझ से मिलने क्यों आ रहा है, कहीं तुम ने फिर मेरी शादी का सपना देखना तो शुरू नहीं कर दिया? मुझे अभी शादी नहीं करनी है.’’
‘‘बस नेहल, बहुत हो गया. तू ने कहा था, पढ़ाई पूरी करने के बाद शादी करेगी. तेरा एमए फाइनल 2 महीने बाद पूरा हो जाएगा. अब अगर तू ने मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुझ से कभी बात नहीं करूंगी.’’
‘‘ठीक है मां, पर इंद्रनील हैं क्या चीज?’’
‘‘अरे, वह तो हीरा है. ऐसा प्यारा लड़का कि क्या बताऊं. हम से ऐसे मिला मानो बरसों से परिचित है. सब को हंसाना ही जानता है. आस्ट्रेलिया की एक बड़ी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी पर जा रहा है. जाने से पहले उस की मां उस की शादी कर देना चाहती हैं. जब तू उस से मिलेगी तब मेरी बातों की सचाई जान सकेगी, बेटी.’’
‘‘इस का मतलब है कि उस की मां को डर है कहीं वह आस्ट्रेलियन बहू न ले आए.’’

‘‘फिर तू ने अपनी बकवास शुरू कर दी. बस, इतना जान ले अगर तू ने मेरा कहा नहीं माना तो मैं भी तेरी कोई बात नहीं सुनूंगी,’’ इस बार मां का स्वर तीखा था.
‘‘ओके मां, मैं तुम्हारे इंद्रनीलजी से जरूर मिल लूंगी और कोई गलती भी नहीं करूंगी. अब तो खुश? हां, इतने लंबे नाम की जगह उसे कोई छोटा नाम नहीं मिला?’’
‘‘शादी के बाद तू उसे चाहे जिस नाम से पुकार, मुझे कोई लेनादेना नहीं है. अब तेरे कालेज का टाइम हो रहा है, बस, मेरी बातें याद रखना.’’
‘‘भला तुम्हारी बातें कभी भूली हूं मां, बाबा को प्रणाम कहना,’’ फोन रख, नेहल तैयार होने बाथरूम में घुस गई. कौन है यह इंद्रनील जिस ने मां को इस तरह मोह लिया है. वैसे उस को शादी की कोई जल्दी नहीं है, पर मां की बातों ने उस के मन में उत्सुकता जगा दी, जरा देखें तो कौन हैं यह इंद्रनील. पूजा से बातें करने का निर्णय ले नेहल चल दी. मां के फोन की वजह से वह पूजा से कैंटीन में भी नहीं मिल सकी थी. पूजा नेहल का इंतजार कर रही थी.
‘‘क्या हुआ, आज कैंटीन में नहीं आई? कहीं तेरे उस नए आशिक का फोन तो नहीं आ गया था?’’ पूजा के चेहरे पर हंसी थी.
‘‘आया था, रात के 2 बजे, चांद का दीदार कराने, पर सच वह दृश्य बड़ा सुंदर था. नहीं देख पाती तो इतनी सुंदर चांदनी में नहाई प्रकृति को मिस करती. शायद, जनाब को शायरी करने का शौक है. ऐसा लगता है उसे मेरे बारे में बहुतकुछ मालूम है, यहां तक कि मैं कविता लिखती हूं.’’
‘‘तब तो वह तेरा सच्चा आशिक है, नेहल.’’
‘‘सच्चे आशिक को अपना नामपता छिपाने की जरूरत नहीं होती, पूजा. वैसे एक बात है, वह बातें बड़े अंदाज से करता है. पता नहीं कहां से छिप कर मेरे बारे में सारी बातें पता कर लेता है. यहां तक कि मेरे पहने हुए कपड़ों के रंग भी याद रखता है.’’
‘‘सच कह, नेहल, तू उस की बातें एंजौय करती है या नहीं?’’
‘‘जब उस का फोन आता है तब तो गुस्सा आता है, पर बाद में उस की बातों पर हंसी आती है. वैसे, आज तक कभी उस ने कोई अश्लील बात नहीं कही है, जैसे कि अकसर सड़कछाप लड़के कहते हैं.’’
‘‘मुझे तो वह कोई सच्चा प्रेमी लगता है, नेहल. संभल के रहना.’’
‘‘अरे, क्या मुझे पागल समझती है? ये बातें छोड़, आज मां का फोन आया था, मेरी शादी के लिए मुझ से मिलने कोई आने वाला है. समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं? पता नहीं मांबाप को बेटियों की शादी की इतनी जल्दी क्यों होती है.’’
‘‘वाह, यह तो गुड न्यूज है. कोई है वह जो हमारी नेहल को ले जाएगा. काश, मेरी शादी यहां आने के पहले ही तय न हो गई होती,’’ पूजा ने आह भरी.
‘‘क्यों? क्या नितिन से कोई शिकायत है या किसी और पर दिल आ गया है?’’
नेहल ने पूजा को छेड़ा.
‘‘अरे नहीं, नितिन तो बहुत अच्छा है. बस, कभी लगता है, मैं प्रेमविवाह करती. शादी के पहले के रोमांस का मजा ही और होता है.’’
‘‘प्रेम शादी के बाद कर लेना. हमारे देश में कितनी लड़कियों को प्रेमविवाह की अनुमति मिलती है. किसी न किसी बात को ले कर, अकसर प्रेम का धागा तोड़ ही दिया जाता है. मेरी एक बात मानेगी पूजा, जब वह मुझ से मिलने आएगा तब तू मेरे साथ रहेगी?’’
‘‘न बाबा, मैं क्यों कबाब में हड्डी बनूं, और हर डिबेट में जीतने वाली नेहल किसी से डरे, असंभव. चल, आज इस खुशी में क्लास छोड़ ही दें, चाट चलेगी?’’
‘‘ठीक है, आज इंद्रनील के नाम पर तेरी ही सही.’’उस का अंदाज: भाग 3
मैं आती हूं,’’ कह कर नेहल ने सरसरी नजर अपने कपड़ों पर डाली. अब चेंज करने का सवाल नहीं था, निश्चय ही वह इंद्रनील ही होगा. बालों पर हाथ फेर.
डा. पुष्पा सक्सेना | April 20, 2020

शाम को लौटी नेहल कमरे में पहुंची ही थी कि मोबाइल बजा, ‘‘क्लास बंक करना अच्छी बात नहीं है, खासकर आप जैसी लड़की से तो कतई ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती. क्या कोई खास खुशी सैलिबे्रट की जा रही थी?’’
‘‘टु हैल विद यू. मैं क्या करती हूं, कहां जाती हूं तुम से मतलब? क्यों मुझे परेशान कर रहे हो, सामने क्यों नहीं आते?’’ नेहल नाराज हो उठी.
‘‘सौरी, आप को परेशान करना मेरा मकसद नहीं था.’’
इतना कहते ही फोन कट गया.
नेहल ने अपने मोबाइल पर आए नंबरों से उस फोन करने वाले का पता करना चाहा था, पर फोन हर बार किसी नए पीसीओ से किया गया था. उस ने ठीक कहा था, उसे पकड़ पाना कठिन था. कभी नेहल को फिल्मों में देखे गए कुछ पात्र याद आते जो पागल की तरह किसी लड़की के पीछे पड़, उस लड़की को परेशान कर देते थे. नेहल कभी सोचती, कहीं वह भी वैसा ही इंसान तो नहीं, पर उस की किसी भी बात से पागलपन नहीं झलकता था बल्कि बातों से वह पढ़ालिखा व्यक्ति लगता था.
‘‘आप से कोई मिलने आए हैं, विजिटर रूम में बैठे हैं,’’ होस्टल की केयरटेकर ने आ कर नेहल को सूचित किया.
‘‘ठीक है, मैं आती हूं,’’ कह कर नेहल ने सरसरी नजर अपने कपड़ों पर डाली. अब चेंज करने का सवाल नहीं था, निश्चय ही वह इंद्रनील ही होगा. बालों पर हाथ फेर
वह विजिटर रूम की ओर चल दी.
विजिटर रूम में एक सौम्य युवक उस की प्रतीक्षा कर रहा था. नेहल के प्रवेश करते ही वह खड़ा हो गया. एक नजर में ही नेहल समझ गई, उस के व्यक्तित्व से कोई भी प्रभावित हो जाएगा. स्लेटी सूट के साथ सफेद शर्ट में उस का व्यक्तित्व और भी निखर आया था. चेहरे की मुसकान किसी को भी मोहित कर सकती थी.

‘‘प्लीज, बैठिए. मैं नेहल और आप शायद इंद्रनीलजी हैं,’’ मीठी आवाज में नेहल बोली.
‘‘ओह, तो आप मेरे बिग ब्रदर का इंतजार कर रही हैं. सौरी, उन्हें किसी जरूरी काम की वजह से शहर के बाहर जाना पड़ गया. आप उन्हें एक्स्पैक्ट करेंगी इसलिए उन्होंने आप को अप्रूव करने की जिम्मेदारी मुझे दे दी है. हां, अपना परिचय देना तो भूल ही गया, मैं नीलेश, इंद्रनीलजी का छोटा भाई.’’
‘‘कमाल है, आप के भाई ने अपनी जगह आप को भेजा है. कैसे हैं आप के सो कौल्ड बिग ब्रदर?’’ नेहल के शब्दों में व्यंग्य स्पष्ट था.
‘‘अरे, उन के गुणों के लिए तो शब्द कम पड़ जाएंगे. वे बेहद गंभीर, तेजस्वी, मेधावी, स्नेही, योग्य अधिकारी और न जाने क्याक्या हैं. मुझ पर उन्हें अगाध विश्वास है. उन की तुलना में मैं तो उन के पांवों की धूल भी नहीं हूं.’’
‘‘भले ही वे आप के शब्दों में गुणों की खान हों, पर जिस के साथ जीवनभर का साथ निभाना है उस से मिलना भी जरूरी नहीं समझते. यह कैसा विश्वास है? शायद विवाह में उन की ज्यादा रुचि नहीं है,’’ नेहल ने स्पष्ट शब्दों में अपनी राय दे डाली.
‘‘वे जानते हैं कि आप की हर तरह की परीक्षा लेने के बाद ही मैं आप को अप्रूव करूंगा. वैसे मैं दावे के साथ कह सकता हूं, आप उन के लिए बहुत उपयुक्त जीवनसाथी हैं. बिग ब्रदर को भी यही बात समझाई है.’’
‘‘रुकिए, क्या कहा, आप मेरी परीक्षा लेंगे? आप मेरी परीक्षा लेने वाले होते कौन हैं?’’ नेहल का चेहरा तमतमा आया.
‘‘परीक्षा तो हो चुकी, और आप उस में पूरे अंक पा चुकी हैं,’’ फिर वही हंसी.
उस हंसी ने नेहल को किसी और की हंसी और बात करने के तरीके की याद दिला दी. निश्चय ही यह वही था जो फोन कर के उसे परेशान किया करता था. नेहल सोच में पड़ गई, उस जैसी बुद्धिमान लड़की पहले ही उसे क्यों नहीं पहचान गई.
अब शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी.
‘‘तुम…तुम, वही हो न जो मुझे फोन करते थे? क्या यही सब करने को तुम्हारे धीरगंभीर भाई ने इजाजत दी थी? साफसाफ सुन लो, मुझे तुम्हारे भाई या तुम्हारे साथ कोई भी रिश्ता मंजूर नहीं है,’’ नेहल का चेहरा लाल हो उठा.
‘‘भाई न सही, मेरे बारे में क्या राय है? आप की कितनी डांट सुनी है. सच कहता हूं, जिंदगीभर आप का गुलाम बन कर रहूंगा. अच्छीभली नौकरी है, आप को जिंदगी की हर खुशी देने का वादा रहेगा.’’
‘‘अपने आदरणीय बिग ब्रदर को क्या जवाब दोगे? तुम पर उन्हें अगाध विश्वास है. उन का विश्वास तोड़ना क्या ठीक होगा. नहीं मिस्टर नीलेश, आप अपने भाई का दिल नहीं तोड़ सकते. सच कहूं तो मुझे उन से हमदर्दी हो गई है. जो इंसान अपने भाई पर इतना विश्वास रखता है, वह अपनी पत्नी के तो सात खून भी माफ कर देगा. मुझे इंद्रनीलजी के साथ अपना रिश्ता मंजूर है.’’
‘‘शुक्रिया, आप ने मेरी आंखें खोल दीं. मैं सचमुच अपराध करने जा रहा था. अब मेरा मकसद पूरा हो गया. बिग ब्रदर तक आप की स्वीकृति पहुंच जाएगी,’’ फिर उस की मीठी हंसी देखसुन नेहल जैसे चिढ़ गई.
‘‘थैंक्स, मैं इंद्रनीलजी की प्रतीक्षा करूंगी और उन से कहिएगा मैं उन से मिलने को उत्सुक हूं. नमस्ते,’’ हाथ जोड़ नेहल ने अभिवादन किया.
नीलेश को और बात करने का अवसर न दे, नेहल तेजी से कमरे के बाहर चली गई. मुसकराते चेहरे के साथ नेहल पूजा के कमरे में जा पहुंची.
‘‘हाय नेहल, कैसी रही तेरी मुलाकात? लगता है, बात जम गई,’’ पूजा ने उत्सुकता से पूछा.
‘‘मुलाकात की छोड़, आज उस फोन करने वाले का रहस्य खुल गया.’’
‘‘सच, कौन है वह? उसे पुलिस के हवाले क्यों न कर दिया?’’
‘‘अरे, वह तो मेरे लिए मां द्वारा चुना गया उम्मीदवार इंद्रनील था. उस की बातों से समझ गई थी, अपने भाई का नाम ले कर मेरी परीक्षा ले रहे थे, जनाब. मैं ने भी अच्छा जवाब दिया है. देखें, अब उस दूसरे इंद्रनील को कहां से लाते हैं.’’
‘‘वाह, तेरी तो प्रेमकहानी बन गई नेहल. वैसे, कैसा लगा अपना मजनूं?’’
‘‘मुझे तो यही खुशी है, उसे करारा जवाब मिला है. वैसे देखने में खासा हीरो दिखता है. बातें भी अच्छी कर लेता है. पर अब मजा आएगा, मुझे बनाने चले थे और खुद बन गए,’’ नेहल के चेहरे पर शरारतभरी मुसकान थी.
‘‘मुझे तो यकीन है उस ने तेरा दिल चुरा लिया,’’ पूजा हंस रही थी.
‘‘जी नहीं, मेरा दिल यों आसानी से चोरी नहीं हो सकता. चलती हूं, शायद मां का फोन आए,’’ नेहा अपने कमरे में जाने को उठ गई.
किताब खोलने पर नेहल का मन नहीं लग रहा था. नीलेश का चेहरा आंखों के सामने आ रहा था. उस का क्या रिऐक्शन होगा, कहीं वह निराश तो नहीं हो गया, शायद वह हर दिन की तरह फोन करे और कहे, ‘आज आप ने मायूस कर दिया. इतना बुरा तो नहीं हूं मैं.’ देर रात तक कोई फोन न आने से नेहल ही निराश हो गई.
कल रविवार है, देर तक सोने के निर्णय के साथ न जाने कब सोई थी कि मोबाइल की घंटी सुनाई पड़ी. जरूर उसी का फोन होगा, पर दूसरी ओर से एक गंभीर पुरुषस्वर सुनाई दिया.
‘‘हैलो, नेहलजी, मैं इंद्रनील, जयपुर से बोल रहा हूं. माफ कीजिएगा, मैं आप से मिलने खुद नहीं पहुंच सका, बहुत जरूरी काम था, टाला नहीं जा सकता था. आप के बारे में नीलेश ने विस्तृत जानकारी दी है, मानो मैं स्वयं आप से मिला हूं. नीलेश ने आप का संदेश दिया है, जल्दी ही आप से मिलने पहुंचूंगा. मेरे बारे में नीलेश ने बताया ही होगा. और कुछ जानना चाहें तो बेहिचक पूछ सकती हैं.’’
‘‘जी नहीं, आप के भाई ने आप की बहुत प्रशंसा की है. एक बात पूछना चाहती हूं, आप अपने भाई पर इतना विश्वास रखते हैं कि अपनी जगह उसे भेज दिया, पर क्या आप जानते हैं कि आप की जगह वे खुद मेरे साथ अपनी शादी के लिए उत्सुक थे?’’
‘‘अरे, आप उस की बातों को सीरियसली न लें, मजाक करना उस का स्वभाव है. हां, आप ने मेरे साथ अपनी शादी की सहमति दी है, उस के लिए आभारी हूं. जल्द ही हम जरूर मिलेंगे. नीलेश ने जयपुर से आप के मनपसंद रंग की साड़ी लाने को कहा है, वह ला रहा हूं. यहां से और कुछ चाहिए तो बताइए.’’
‘‘थैंक्स, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बाय.’’
फोन बंद करतेकरते नेहल का मन रोनेरोने का हो आया. यह क्या हो गया. फोन जयपुर से ही आया था. कौन है यह इंद्रनील, उस से बिना मिले, बिना फोन पर बात किए उस के साथ शादी के लिए स्वीकृति दे बैठी. तभी मां का फोन आ गया, ‘‘आज मेरी चिंता दूर हो गई, बेटी. इंद्रनील जैसा दामाद और तेरे लिए वर, कुदरती तौर पर ही मिलता है. उस ने तुझ से होली के बाद मिलने की इजाजत मांगी है. तेरी परीक्षा के पहले वाली प्रिपरेशन लीव में ही पहुंचेगा.’’
‘‘मां, मुझ से गलती हो गई, मैं इंद्रनील से शादी नहीं कर सकती.’’
‘‘पागल मत बन. तू ने खुद सहमति दी है, किसी ने जबरदस्ती तो नहीं की है?’’
‘‘तुम नहीं समझोगी मां, मैं किसी और से…’’
‘‘मुझे कुछ समझना भी नहीं है. बहुत मनमानी कर ली. हम तेरे दुश्मन तो नहीं हैं, नेहल, इंद्रनील हर तरह से तेरे लिए उपयुक्त है. अब हमें परेशान मत कर, बेटी. बचपना छोड़, किसी को वचन दे कर वचन तोड़ना अक्षम्य अपराध है. मेरा यकीन कर, इंद्रनील के साथ तू बहुत सुखी रहेगी.’’
नेहल की समझ में नहीं आ रहा था, वह क्या करे? यह तो अपने पांव खुद कुल्हाड़ी मारने वाली बात हो गई. पूजा भी परेशान थी, पर उस का एक ही सुझाव था, फोन पर इंद्रनील को सचाई बता दे. जयपुर से इंद्रनील वापस जा चुका था, अब तो उस के फोन का इंतजार करना था.
प्रिपरेशन लीव की छुट्टियां शुरू हो गईं. नेहल का मन बेचैन था. इंद्रनील उस से मिलने कभी भी आ सकता है, क्या वह उस से कह सकेगी कि वह उस से नहीं, उस के छोटे भाई से विवाह करना चाहती है. छुट्टी के 3 दिनों बाद सुबहसुबह कलावती केयरटेकर ने आ कर कहा, ‘‘कोई नील बाबू आप से मिलने आए हैं. उन का पहला नाम याद नहीं रहा.’’
धड़कते दिल के साथ नेहल इंद्रनील से मिलने की हिम्मत जुटा पहुंची थी. सामने खड़े व्यक्ति को देख वह चौंक गई. अपनी उसी मोहक हंसी के साथ नीलेश खड़ा था. नेहल समझ नहीं सकी वह क्या कहे, पर खुद नीलेश आगे बढ़ आया.
‘‘कैसी हैं? चाहता तो था होली पर आ कर आप को रंगता, पर आ नहीं सका. अब तो बस कहना चाहूंगा जिंदगी की सारी खुशियां आप के जीवन में रंग भरती रहें.’’
‘‘इंद्रनीलजी की जगह क्या आज फिर उन की ओर से कोई नया संदेश लाए हैं?’’
‘‘नहीं, उन्होंने अपनी जगह हमेशाहमेशा के लिए मुझे दे दी, आखिर बिग ब्रदर को इतना तो करना ही चाहिए. वैसे भी वे जान गए थे कि आप मुझे चाहती हैं. आप का पीछा करने के लिए पूरे 10 दिन होम किए हैं, नेहलजी. सच कहिए, क्या मेरा फोन करना आप को खराब लगता था? मुझे तो लगता है, आप को मेरे फोन का इंतजार रहता था.’’
‘‘यह तुम्हारा भ्रम है, वैसे भी किसी के विकल्परूप में तुम्हें क्यों स्वीकार करूंगी? मैं ने तो इंद्रनील से मिलने आने का अनुरोध किया था, उन के विकल्प का नहीं.’’
‘‘अगर ऐसा है तो मिस नेहल, मैं किसी का विकल्प नहीं, स्वयं इंद्रनील हूं, अपने मातापिता का बड़ा बेटा. अब कहिए, क्या इरादा है? सौरी, मैं चाह कर भी आप के पास किसी दूसरे इंद्रनील को नहीं ला सकता. अब तो यही नील चलेगा, नेहल.’’
‘‘तुम इतने बड़े चीट हो, इंद्रनील? तुम से तो शादी करने में भी खतरा है.’’
‘‘फिर वही गलती कर रही हैं. मैं धोखेबाज नहीं, जीनियस इडियट हूं और मैं ने कहा था, मुझे आप पकड़ नहीं सकेंगी.’’
‘‘पर मैं ने तो तुम्हें पकड़ ही लिया. तुम्हें पहले दिन ही पहचान लिया था, मुझे फोन करने वाले तुम ही थे.’’
‘‘पर यह तो नहीं समझ सकी थीं कि मैं ही इंद्रनील था, वरना मां से उस इंद्रनील से शादी न करने को क्यों कह रही थीं. धोखा खा गई थीं न? मां को मुझे ही सचाई समझानी पड़ी थी, वरना तुम ने तो उन्हें भी डरा दिया था.’’
‘‘मानती हूं, इस जगह तो मैं धोखा खा ही गई, पर इसे मेरी हार मत समझना. तुम ने मेरी मां को अपने मोहजाल में बांध लिया वरना…’’
‘‘तुम किसी बेचारे इंद्रनील का ही इंतजार करती रहतीं. अब तुम्हारी इस गलती के बदले तुम्हें सजा देने का अधिकार तो मुझे मिलना ही चाहिए,’’ इंद्रनील शरारत से मुसकराया.
‘‘क्या सजा दोगे, नील? इतने दिनों तक फोन कर के परेशान करते रहे, सजा तो तुम्हें मिलनी चाहिए,’’ नेहल ने मानभरे स्वर में कहा.
‘‘अच्छाजी, जैसे मैं जानता नहीं था, मोहतरमा को फोन का कितना इंतजार रहता था.’’
‘‘यह तुम्हारा भ्रम है, अगर पकड़ पाती तो तुम्हारे हाथों में हथकड़ी जरूर पहनवाती,’’ नेहल के चेहरे पर परिहास की हंसी खिल आई.
‘‘तो अब सजा दे दो, पर लोहे की हथकड़ी की जगह तुम्हारे प्यार का बंधन मंजूर है.’’
बात खत्म करते इंद्रनील ने नेहल के माथे पर स्नेह चुंबन अंकित कर दिया. नेहल के गुलाबी चेहरे पर सिंदूरी आभा बिखर गई.

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