चोरी का माल Chapter 5
तीन पत्ती गुलाब
भाग 27
आप सभी तो बहुत गुणी और अनुभवी हैं पर एक बात आपको बता देता हूँ कई बार मिठाई के साथ अगर बीच में नमकीन खा लिया जाए तो आनन्द दुगना नहीं चार गुणा हो जाता है। कुछ लड़कियों और शादीशुदा औरतों को चुदाई के दौरान थोड़ा गंदा बोलना और नितम्बों पर थप्पड़ खाना और अपने प्रेमी या पति द्वारा दांतों से काटना बहुत अच्छा लगता है।
शायद गौरी को भी उसके नितम्बों पर लगाया गया मेरा हल्का थप्पड़ (थपकी) बहुत अच्छा लगा था। मुझे लगता है उसने इन्टरनेट पर पोर्न में जरूर ऐसा देखा होगा! यह भी संभव है उसकी किसी सहेली ने उसे अपनी सुहागरात या अपने किसी प्रेमी के साथ किये सम्भोग के बारे में जरूर बताया होगा फिर किसी घर के सदस्य को उसने चुदाई करते जरूर देखा होगा।
ओह … मैं भी क्या फजूल बातें ले बैठा।
मैंने अब गौरी के दोनों नितम्बों पर बारी-बारी से थप्पड़ लगाने शुरू कर दिए। उसके नितम्बों का रंग अब लाल नज़र आने लगा था। गौरी ने इसके लिए मना नहीं किया वह तो रोमांच में डूबी अपने नितम्बों को और जोर-जोर से आगे पीछे करने लगी थी।
अब तो धक्कों के उसके गांड का गुलाबी छेद भी नज़र आने लगा था। मैंने एक हाथ में थोड़ी से क्रीम ली और अपने अंगूठे पर लगाकर उसली गांड के छेद पर लगा कर अंगूठे को थोड़ा सा छेद पर दबा दिया।
गौरी थोड़ा कसमसाई पर रोमांच और उत्तेजना में उसने कोई विरोध नहीं किया। अब तो गांड का छेद खुलने और बंद होने लगा था। मैं बीच-बीच में उसके उरोजों की घुंडियों घुंडियों को भी मसलता जा रहा था।
अब मैंने अपना एक हाथ नीचे करके उसकी सु-सु को टटोला। उसके चीरे पर अंगुली फिराई और फिर उसकी मदनमणि को चिमटी में पकड़ कर मसलने लगा।
“उईईईई ईईईई माआअ … आह … लुको … आह … ईईईईईई …”
गौरी अपनी चरम उत्तेजना पर पहुँच गई थी। गौरी का शरीर थोड़ा सा अकड़ा और वह झटके से खाने लगी और अपने नितम्बों को जोर-जोर से आगे पीछे करने लगी।
मैंने उसकी कमर को कसकर पकड़ लिया और 4-5 धक्के जो जोर से लगा दिये। मुझे लगा मेरे लंड के चारों ओर एक चिकनाई सी लिपट गई है और अब लंड आराम से अन्दर बाहर होने लगा है। शायद गौरी की बुर ने रतिरस छोड़ दिया था।
गौरी ने लम्बे लम्बे सांस लिए और फिर थोड़ा सीधी हो गई।
मैंने उसे पीठ की तरफ से अपने शरीर से चिपका लिया। मेर लंड अभी भी गौरी की सु-सु में फंसा था। गौरी ने अपने हाथ ऊपर करके मेरे गले में डाल लिए। मैंने एक हाथ से उसकी कमर को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से उसकी सु-सु को मसलने लगा।
और साथ ही उसकी कांख पर पहले तो अपने होंठ लगाए और फिर जीभ से उसे चाटने लगा। कौमार्य की एक तीखी गंध मेरे नथुनों में समा गई।
स्त्री का यह भाग बहुत संवेदनशील होता है। अगर गर्दन और कांख को चूमा जाए तो गुदगुदी के साथ-साथ अत्यधिक रोमांच पैदा होता है और स्त्री कामविह्वल हो जाती है।
गौरी की भी यही हालत थी, उसने मेरे लंड को अपनी सु-सु में जोर से भींच लिया; गौरी की मीठी सीत्कार निकल गई “ईईई ईईईईई … ”
मैंने उसके कानों की लोब को मुंह में लेकर चुभलाना शुरू कर दिया। गौरी की सु-सु ने एक बार फिर से संकोचन किया। उसकी साँसें एक बार फिर से तेज़ हो गयी थी उसका शरीर एक बार फिर से थोड़ा अकड़ा। मुझे लगा उसने एक बार फिर से ओर्गस्म प्राप्त कर लिया है।
गौरी की पीठ मेरे सीने से चिपकी हुई थी। अचानक गौरी पलट गई और मेरा लंड उसकी सु-सु से निकल गया। उसने अपना मुंह मेरी ओर करके मेरे सिर को अपने हाथों में पकड़कर चूमना शुरू कर दिया।
मुझे तो एक पल के लिए कुछ समझ ही नहीं आया। इस अप्रत्याशित घटना से मेरा संतुलन थोड़ा बिगड़ गया और मैं गीले फर्श पर फिसल कर नीचे गिर गया। गौरी का नंगा बदन मेरे ऊपर आ गया। गौरी ने मुझे अब भी नहीं छोड़ा और वह मेरे गालों, होंठों और गले पर बेतहाशा चुम्बन लिए ही जा रही थी। अब उसने अपने दोनों पैर मेरी कमर के दोनों और कर लिए और अपनी सु-सु को मेरे लंड पर जैसे घिसने लगी।
मैंने एक हाथ से उसली कमर कमर पकड़ ली और दूसरे हाथ से अपने पप्पू को उसकी सु-सु के छेद पर लगा दिया। जिस प्रकार गौरी ऊपर नीचे होती हुई अपनी सु-सु को मेरे पप्पू पर घिस रही थी पप्पू महाराज एक झटके में फिर से अन्दर घुस गए। गौरी की रोमांच के मारे एक बार फिर से मीठी किलकारी निकल गई।
गौरी अब उकड़ू होकर मेरे ऊपर बैठ गई और जोर-जोर से मेरे लंड पर उछलने लगी। यह उसकी यौन उत्तेजना की पराकाष्ठा थी। उसके बालों का जूड़ा खुल गया था और खुले बाल कभी चहरे पर फ़ैल जाते कभी उड़ने लगते।
मैंने उसकी कमर को पकड़ लिया और उसे सहारा देते हुए ऊपर नीचे होने में मदद करने लगा।
“आह … मेले साजन … आपने तो मेले ऊपर जादू ही कल दिया है … मैं तो इस लोमांच के कालन मल ही जाऊँगी … आह … ईईईईईईइ …” गौरी ने झुककर मेरे होंठों को फिर से चूम लिया और मेरे ऊपर जैसे निढाल सी होकर पसर गई।
ऐसी अवस्था में भले ही पुरुष हो या स्त्री उसका भार बिलकुल नहीं लगता। थोड़ी देर हम इसी अवस्था में एक दूसरे की बांहों में लिपटे नंगे फर्श पर पड़े रहे।
“गौरी मेरी जान … तुम्हें कैसा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“मेले साजन तुम तो कोई जादुगल हो … मुझे कील दिया है तुमने … आह … मैं तो इसी तलह आपकी बांहों में यह पूली जिन्दगी बिता देना चाहती हूँ।” कहकर गौरी ने एकबार आँखें खोलकर मुझे देखा और फिर से मेरे होंठों को चूमते हुए मेरे सीने से लग गई।
“हाँ मेरी प्रियतमा … तुमने भी मुझे अपना दीवाना बना लिया है।” कहते हुए मैंने उसे बांहों में पकड़े हुए एक पलटी मारते हुए उसे नीचे कर लिया और मैं ऊपर आ गया। मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि मेरा पप्पू उसकी सु-सु में फस रहे बाहर ना निकल पाए।
गौरी ने अब अपनी जांघें जितना हो सकता था चौड़ी कर ली। इससे मेरे लंड को और सुविधा हो गई थी। अब मैंने अपने घुटने मोड़ते हुए जोर-जोर से धक्के लगाने लगा था। गौरी ने अपने दोनों पैर ऊपर करके मेरी कमर पर कस लिए।
अब हर धक्के के साथ उसके नितम्ब पहले तो ऊपर उठते और फिर फर्श पर लगते तो धच्च की आवाज निकलती और साथ ही उसने पैरों में जो पायल पहन रखी थी वो रुनझुन करने लगती।
गौरी ने अपने दोनों पैर ओर जोर से कस लिए।
हम दोनों ही उत्तेजना के उच्चतम स्तर पर पहुँच गए थे। हम दोनों का यह प्रेमयुद्ध और शुद्धि स्नान पिछले आधे घंटे से बिना रुके चल रहा था। अब मुझे लगने लगा था मेरी मंजिल पास आ गई है।
“गौरी मेरी जान एकबार तुम कहो तो डॉगी स्टाइल में करें?”
“हओ … ” बेख्याली में गौरी के मुंह से निकल गया लेकिन बाद में वह फिर से शर्मा गई।
गौरी ने अपने पैरों की कैंची खोल दी और अपने घुटनों के बल हो गई। मैं भी अब घुटनों के बल होकर उसके पीछे आ गया और अपने लंड को पीछे से उसकी सु-सु में उतार दिया। जैसे ही मैंने धक्का लगाया गौरी की मीठी आह … निकल गई।
हालांकि नंगे फर्श पर घुटनों के बल होकर सेक्स करना थोड़ा कठिन होता है पर रोमांच के इन पलों में यह तकलीफ ज्यादा नहीं लगती। मैंने गौरी के नितम्बों पर 3-4 थप्पड़ से लगाए और फिर कसकर उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए।
“गौरी मेरी जान … अब असली बारिश होने वाली है … क्या तुम भीगने के लिए तैयार हो?”
“हाँ मेले साजन मैं तो तब की प्यासी हूँ आज मुझे अपने वील्य से सींच दो … आह … ईईईईईइ …” गौरी की सु-सु ने संकोचन शुरू कर दिया।
और फिर मैंने भी एक हुंकार लेते हुए उसकी सु-सु में फुहारें छोड़नी शुरू कर दी।
हम दोनों का स्खलन एक साथ हो गया। मैं झुककर गौरी की पीठ से चिपक गया। गौरी ने अपने पैर थोड़े पीछे करते हुए पसार से दिए। गौरी के सु-सु अब भी संकोचन कर रही थी जैसे मेरे वीर्य का एक-एक करता चूस लेना चाहती हो।
थोड़ी देर बाद मेरा लंड फिसल कर बाहर आ गया। अब मैं उसके ऊपर से उठ खडा हुआ और गौरी भी उकड़ू होकर बैठ गई। मैं पास बैठकर उसकी सु-सु को देखने लगा। उसकी सु-सु के पपोटे रक्त संचार बढ़ने से फूल से गए थे और उसका चीरा भी थोड़ा खुल सा गया था। अन्दर का लाल सुर्ख खजाना साफ़ नज़र आने लगा था। उसमें से धीरे-धीरे मेरा वीर्य और गौरी के रति रस का मिलाजुला तरल मिश्रण बाहर निकलने लगा था।
मुझे अपनी सु-सु की ओर देखता पाकर गौरी शर्मा सी गई और उसने अपनी जांघें भींच ली- आप इधल मत देखो; मुझे शल्म आती है!
“गौरी प्लीज … मुझे आज किसी बात के लिए मत रोको … बहुत खूबसूरत लग रही है तुम्हारी सु-सु … मेरा तो मन कर रहा है इसे चूम लूं!”
“हट!” गौरी ने ‘हट’ तो जरूर कहा था पर आज इसके माने सच वाला ‘हट’ नहीं था अलबत्ता रूपगर्विता और पूर्ण संतुष्टि वाला ‘हट’ था।
“गौरी प्लीज अपनी जांघें थोड़ी सी चौड़ी कर लो ना प्लीज … इसमें से निकलते हुए कामरस की बूंदें अमृत की बूंदों जैसी लग रही है … और अब तुम्हारा सु-सु भी निकलने वाला होगा … मैं उसकी लम्बी पतली और छर्ररर … करती हुई धार देखना चाहता हूँ … प्लीज …”
गौरी ने पहले तो तिरछी नज़रों से मेरी ओर देखा और फिर शर्माते हुए अपनी आँखों पर हाथ रख लिया और फिर हौले से अपनी जांघों के पट खोल दिए।
कितना नयनाभिराम दृश्य था आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। हल्के-हल्के रोयें जैसे रेशमी बालों ढकी उसकी गुलाबी बुर और गुलाब की पत्तियों जैसी कलिकाएं उफ्फ्फ्फ़ … ! आपको याद होगा एक बार लिंग देव के दर्शन करके लौटते समय मैंने मिक्की को इसी प्रकार सु-सु करते हुए देखा था। (याद करें तीन चुम्बन)
थोड़ी देर कामरस बहाने के बाद पेशाब की एक पतली धार गौरी की सु-सु से निकलने लगी। पहले तो उसकी 2-4 बूँदें निकल कर उसकी गांड के छेद से होती नीचे गिरी और फिर एक तेज़ छर्ररर की आवाज के साथ पतली धार निकल कर फर्श पर फ़ैलने लगी। मेरा अंदाज़ा है सु-सु की वह धार एक डेढ़ फुट ऊंची तो जरूर रही होगी और कम से कम 2 फुट दूर तक जाकर गिर रही थी।
मेरा मन तो कर रहा था मैं अपने मुंह नहीं तो कम से कम अपनी अँगुलियों को इस धार के बीच में लगा कर महसूस करके देखूं। पर इससे पहले मैं कुछ कर पाता गौरी के सु-सु की धार कुछ मंदी पड़ती चली गई और फिर एक अंतिम पिचकारी छर्ररर … फिच्च सी ईईईईई … की आवाज के साथ निकली और फिर कुछ बूँदें उसके चीरे से निकलती हुई उसके गुलाबी गांड के छेद से होती हुए नीचे फर्श पर दम तोड़ने लगी।
गौरी अब खड़ी हो गई। मैं तो अपने होंठों पर जीभ फिराता ही रह गया।
“गौरी लाओ मैं इसे धो देता हूँ.”
“हटो पले गंदे कहीं ते!” गौरी ने शर्मा कर अपनी सु-सु को अपने हाथों से ढक लिया और फिर से शॉवर के नीचे अपनी मुंडी लगा दी।
मैंने उसे एक बार फिर से अपनी बांहों में भर लिया। मेरा मन अभी भरा नहीं था। मेरा मन तो कर रहा था आज इसकी महारानी (गांड) की मुंह दिखाई की रस्म पूरी कर दूं।
“गौरी मेरा तो मन ही नहीं भरा तुम्हारे इस रूप और यौवन की कशिश ही इतनी है कि बार-बार तुम्हें प्रेम करने का मन करता है।”
“मेले साजन … मैं तो हर पल आपकी बांहों में ही बिताना चाहती हूँ पर आज अब और नहीं। दो दिन से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेली सु-सु में चीरा लगा दिया है मेले से तो ठीक से चला भी नहीं जा लहा। अगर दीदी को कोई शक हो गया तो मुसीबत हो जायेगी।
गौरी का सोचना और उसकी आशंका सही थी। हम दोनों नहाकर कर बाथरूम से बाहर आ गए।
कहानी जारी हैहै
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 28
मधुर का जन्मदिन उत्सव और गुलाब की दूसरी पत्ती
अगस्त महीने में मधुर का जन्मदिन आता है। एक बात आपको बता दूं कि मधुर के जन्मदिन का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता है। उस दिन हम लोग गांडबाजी भरपूर आनन्द लेते हैं।
आप तो जानते ही हैं आजकल गांडबाज़ी तो दूर की बात है पिछले एक महीने से मधुर ने तो मुझे चूत के लिए भी तरसा दिया है। हाल यह है कि वह तो मुझे छूने भी नहीं देती बहाना तो सावन में व्रत का है। एक लम्बे इंतज़ार के बाद बड़ी मुश्किल से कल ही सावन ख़त्म हुआ है। आप मेरी उत्सुकता का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उसके जन्मदिन पर मिलने वाले उस अनमोल तोहफे (गांडबाजी) का मैं कितनी सिद्दत से इंतज़ार कर रहा हूँ।
आज मधुर का जन्म दिन है। वैसे उसे इस प्रकार की प्राइवेट पार्टी (निजी उत्सव) में ज्यादा तामझाम पसंद नहीं है। वह ‘बस हम दोनों हमारा कोई नहीं’ वाला हिसाब रखती है। किसी तीसरे व्यक्ति को उत्सव में शामिल होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
पर इस बार पता नहीं 2-3 दिनों से मधुर के जन्मदिन की तैयारियां बहुत जोरों पर है। मधुर ने पिछले 2 दिनों से स्कूल से छुट्टी ले रखी है और गौरी के साथ मिलकर पूरे घर की अच्छे से सफाई की है। कमरे और हॉल के परदे नये बनवाये हैं। हॉल में रखा सिंगल बेड ड्राइंग रूम में शिफ्ट कर दिया है और सोफे को एक तरफ कोने में सेट कर के हॉल के बीच में डाइनिंग टेबल लगा दी है।
कल दोनों ने बाज़ार से भरपूर खरीददारी भी की लगती है। स्टोर रूम में पड़े पैकेट्स देखकर तो लगता है जैसे पूरा बाज़ार ही खरीद लाई हों।
आज मेरा मन भी छुट्टी करने का था पर ऑफिस में काम ज्यादा था तो मुझे जाना पड़ा अलबत्ता मैंने आज थोड़ा जल्दी आने का वादा जरूर किया था।
आज सानिया मिर्ज़ा (मीठी बाई) भी सुबह ही आ गई थी। आज पूरे घर की सफाई का जिम्मा उसके ऊपर ही डाला हुआ था। उसने काले रंग की धारियों वाली पेंट और लाल रंग की गोल गले की टी-शर्ट पहन रखी थी। इन कपड़ों में उसके गोल कसे हुए नितम्ब और चीकू बहुत ही खूबसूरत लग रहे थे। आज सानिया का उत्साह तो देखने लायक था। वह बहुत खुश नज़र आ रही थी।
पर आज सुबह-सुबह गौरी ने उसे जिस प्रकार झिड़की लगाई थी बेचारी सानिया की शक्ल तो रोने जैसी हो गई थी। मुझे गौरी का यह बर्ताव अच्छा तो नहीं लगा पर मैंने कहा कुछ नहीं। अब बेचारी मीठी बाई (सानिया) को क्या पता कि यहाँ आने के बाद मेरी तोतेजान अब ‘महारानी गौरी’ बन बैठी है भला उसे ‘तोते दीदी’ कहलाना गवारा कैसे हो सकता है?
मधुर ने मेगा साइज़ केक का आर्डर पहले ही दे रखा था पर ऑफिस से आते समय केक और मिठाइयां आदि लेकर घर पहुँचने में 6:30 बज ही गए। लगता है गौरी और मधुर ने तो पूरा घर ही सजा दिया था। दरवाजों पर बंदरवार, हॉल में रंग बिरंगे फर वाले कागजों की झालर और उनके बीच में बहुत से गुब्बारे। सामने वाली दीवार पर मोटे-मोटे अक्षरों में हैप्पी बर्थडे लिखा पेपर लगा था जिसके चारों ओर रंगीन रोशनी वाली लड़ियाँ लगाईं हुई थी।
मुझे हैरानी हो रही थी मधुर अपना जन्म दिन पर इतना तामझाम पहले तो कभी नहीं करती थी। इस बार तो ग्रेट ग्रांड फिनाले जैसा प्रोग्राम लगता है।
मैंने साथ में लाया सारा सामान डाइनिंग टेबल पर रख दिया। मधुर और गौरी नज़र नहीं आ रही थी। मैंने मधुर को आवाज लगाईं तो सानिया (गौरी की बहन) स्टडी रूम से बाहर आई।
उसने गहरे सुनहरी रंग का लाचा (जवान लड़कियों का एक परिधान- भारी लहंगा, छोटी कुर्ती और चुनरी जैसा दुपट्टा) पहन रखा था जिसके बटन खुले हुए और अस्त-व्यस्त से लग रहे थे। सानिया बटनों को बंद करने की कोशिश कर रही लग रही थी। पर जिस प्रकार वो कुर्ती के बटन बंद करने की कोशिश कर रही थी मुझे लगता है या तो इस कुर्ती की साइज़ कुछ छोटी है या फिर सानिया के दोनों परिंदे इस तंग कुर्ती में कैद होने से इनकार कर रहे हैं।
हे भगवान् … इन कपड़ों में तो वह पूरी फुलझड़ी ही लग रही थी। आज उसने बालों को ढंग से संवारा था। उसने बालों का जूड़ा बना रखा था और उस पर एक गज़रा भी लगा रखा था। कटार जैसी पैनी आँखों में काजल, माथे पर बिंदी, होंठों पर लाल लिपस्टिक और चहरे पर फेशियल भी किया लगता था।
एक खास बात तो आपको और बताता हूँ उसने हाथों की कलाइयों में लाल रंग की चूड़ियाँ पहन रखी थी और अपने दोनों बाजुओं पर भी एक-एक गज़रा बाँध रखा था जैसे कोई बाजूबंद पहना हो।
“वो … आंटी ओल तोते दीदी बेडलूम में तैयाल हो लही हैं।”
मैं सानिया की आवाज सुनकर चौंका, मैं तो उसके मस्त कबूतरों की हिलजुल में हो खोया हुआ था।
“ओह … अच्छा” कह कर मैं सोफे पर बैठ गया।
“आपके लिए पानी लाऊँ?”
“ओह … हाँ” मेरी नज़र तो सानिया के खूबसूरत टेनिस की गेंद तरह गोल उरोजों से हट ही नहीं रही थी। उसने कुर्ती के अन्दर ब्रा की जगह छोटी साइज़ की झीनी सी समीज पहन रखी थी। जिसमें हल्के ताम्बे जैसे गुलाबी रंगत लिए ये परिंदे तो मानो कह रहे हैं हमें आजाद कर दो … उड़ जाने दो।
आइलाआआआ …
सानिया एक हाथ से अपने ब्लाउज को पकड़े रसोई में पानी लेने जाने लगी। हालांकि उसके नितम्ब इतने ज्यादा बड़े तो नहीं थे पर उनकी हिलजुल से तो पता चलता है बस थोड़े ही दिनों में यह किसी को भी क़त्ल करने में सक्षम हो जायेंगे। एकबार मुझे अंगूर या गौरी ने बताया था कि यह गौरी से केवल 9 महीने ही छोटी है इसका मतलब उम्र के हिसाब से तो यह पूरी जवान हो चुकी है।
सानिया ठन्डे पानी की बोतल और उस पर खाली गिलास को ओंधा रखकर ले आई। दूसरे हाथ से वह अपना ब्लाउज संभालने की भी कोशिश कर रही थी जिसके बटन शायद बंद नहीं हो रहे थे। पानी की बोतल टेबल पर रखने के लिए जैसे ही वह झुकी उसके कसे ब्लाउज ने साथ छोड़ दिया और दोनों परिंदे उस झीनी कुर्ती को जैसे फाड़ कर बाहर निकलने को बेताब से नज़र आने लगे।
हे भगवान् !!! शरीर के अन्य भागों से थोड़े गोरे रंग के उभरे हुए से दो गोल अमरुद और उनके ऊपर छोटे से जामुन जैसे चूचक। उफ्फ्फ … क्या गज़ब की नक्कासही है … काश! मैं इन रसभरे गोल इलाहाबादी अमरूदों को छू सकता, होले से दबा सकता और मुंह में लेकर चूस सकता!
हे लिंग महादेव! एक बार फिर से तेरी जय हो!!
सानिया थोड़ा सा पीछे हटकर फिर से अपने ब्लाउज के बटन बंद करने की कोशिश करने लगी।
“अरे सानिया! क्या हुआ?”
“ये बटन तो बंद ही नहीं हो लहे?”
“ओह … लाओ … मुझे दिखाओ?”
सानिया मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। मेरा दिल जोर से धक-धक करने लगा था और पप्पू महाराज को आपा खोने की आदत ही पड़ी है।
“अरे पागल लड़की!” मैंने हंसते हुए कहा।
“क्या हुआ?”
“तुमने यह ब्लाउज ही उलटा पहना है, इसके हुक पिछली ओर बंद होते हैं.”
“ओह … अच्छा … तभी यह बंद नहीं हो लहा है.”
“लाओ मैं बंद कर देता हूँ? इसे उतारकर पिछली तरफ से पहनो.”
“हओ”
लगता है इस परिवार के सभी सदस्यों को ‘हओ’ और ‘किच्च’ बोलने की आदत खानदानी विरासत में मिली है।
अब सानिया ने वह कुर्ती उतार दी। कुर्ती उतारते समय मेरा ध्यान उसकी बगलों (कांख) पर चला गया। हल्के-हल्के बाल थोड़ी सी दूर में उगे हुए उसके जवानी की दहलीज पर खड़ी होने का संकेत कर रहे थे। अब वह सिर्फ झीनी समीज में थी और नीचे लहंगा।
याल्लाह … फिर तो उसने लहंगे के नीचे पेंटी भी कहाँ पहनी होगी!!!
उसकी पिक्की के गुलाबी पपोटे और उनके बीच की झिर्री तो जरूर लाल रंग को होगी। याखुदा … उसकी पिक्की पर भी इसी तरह के नर्म मुलायम रेशम जैसे हल्के-हल्के बाल होंगे। मैं तो अपने होंठों पर जीभ फिराता ही रह गया।
उफ्फ्फ … पतली कमर में पहना लहंगा तो ऐसे लग रहा था जैसे अभी सरक कर नीचे आ जाएगा। उभरा हुआ सा पेडू और गोल मटोल से पेट के बीच गहरी नाभि। पतली छछहरी लम्बी सुतवां बाहें और पसलियों से थोड़ा ऊपर उस झीनी सी समीज में झांकते हुए हल्के गुलाबी रंग के दो नन्हे परिंदे ऐसे लग रहे थे जैसे अभी अपने पंख खोल कर उड़ जायेंगे।
उसके चूचक तो स्पंज की तरह गोल उभरे हुए से लग रहे हैं इसका मतलब अभी उसकी घुन्डियाँ (निप्पल्स) नहीं बनी हैं। मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा जैसे मेरा दिल हलक के रास्ते अभी बाहर आ जाएगा।
मैंने कुर्ती को अपने हाथ में ले लिया और फिर सानिया से उसमें एक हाथ डालने को कहा। उसने कुर्ती की एक बांह में हाथ डालने के लिए जैसे ही अपना हाथ थोड़ा सा ऊपर उठाया तो उसकी नर्म मुलायम स्निग्ध हल्के रेशमी बालों युक्त कांख एक बार फिर से नज़र आ गई।
वाह … क्या सांचे में ढला बुत तराशा है। अब मैं सोच रहा था इसे भगवान् की कारीगरी कहूँ या फिर गुलाबो का धन्यवाद करूँ!
सानिया ने अब थोड़ा घूमकर अपना दूसरा हाथ भी कुर्ती की बांह में डाल दिया। अब उसकी नर्म मुलायम चिकनी पीठ मेरे सामने थी। मैंने अब हुक लगाने की कोशिश की। कुर्ती कुछ तंग (कसी हुई) लग रही थी। अगर उसके चीकुओं को आगे से थोड़ा सा सेट कर दिया जाए तो फिर कुर्ती के हुक आसानी से बंद हो जायेंगे। मैंने अपना एक हाथ उसकी कुर्ती के अन्दर डालकर उसके एक चीकू को हाथ में पकड़ कर एडजस्ट किया।
आह … फोम के तरह गुदाज़ और नर्म मखमली सा अहसास बताने के लिए मेरे पास कोई शब्द ही नहीं हैं।
प्रिय पाठको! अगर मैं कोई बहुत बड़ा कवि या महान लेखक होता तो सानिया के इस सौन्दर्य का वर्णन करते हुए जरूर कोई ग़ज़ल, कविता या प्रेम-ग्रन्थ ही लिख डालता पर मैं कोई महान लेखक या कवि या लेखक कहाँ हूँ? जो देखा और महसूस किया साधारण सी भाषा में लिख दिया है।
“उईईईई …” सानिया थोड़ा सा झुककर हंसने लगी।
“क्या हुआ?”
“मुझे गुदगुदी हो लही है.”
“बस हो गया … हो गया … बस एक मिनिट … इस दूसरे दूद्दू को भी एडजस्ट कर दूं.”
और फिर मैंने उसके दूसरे चीकू को अपने हाथ में लेकर थोड़ा एडजस्ट किया सानिया थोड़ा झुककर फिर हंसने लगी।
मेरा मन कर रहा था काश! वक़्त थम जाए और मैं सानिया के इन नन्हे परिंदों का मखमली और स्पंजी स्पर्श इसी तरह महसूस करता रहूँ।
मैंने एक बार फिर से अपनी अंगुलिओं को उसके चुचकों पर फिराई और अब तो हुक बंद करने की मजबूरी थी।
हुक अब तो ठीक से बंद हो गए थे। मैंने सानिया के नितम्बों पर एक हल्की सी थपकी लगाईं और फिर कहा- लो भई सानिया मिर्ज़ा! अब तुम आराम से टेनिस खेल सकती हो. तुम्हारे दूद्दू यानि हुक्स की समस्या ख़त्म।
“थैंक यू अंकल.” सानिया ने हंसते हुए मेरा धन्यवाद किया।
यह ‘थैंक यू’ तो ठीक था पर उसका मुझे अंकल संबोधन बिलकुल अच्छा नहीं लगा। मैंने ध्यान दिया इस आपाधापी में उसके होंठों पर लगी लिपस्टिक भी थोड़ी फ़ैल सी गयी है और गालों पर भी जो रंग रोगन किया हुआ है वह भी फ़ैल सा गया है।
मेरे लिए तो यह सुनहरी मौक़ा था।
मैंने सानिया को अपने पास आने का इशारा करते हुए कहा- अरे सानिया, यह तुम्हारी लिपस्टिक तो लगता है खराब हो गई है. लाओ मैं इसे भी साफ़ कर दूं.
सानिया इठलाती सी मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। मेरा मन तो उसे बांहों में भर लेने या गोद में बैठा लेने को करने लगा था और पप्पू तो पैंट में कोहराम ही मचाने लगा था। मधुर और गौरी तो कमरे में पता नहीं अभी कितनी देर और लगाएंगी, तब तक तो मैं इस नादान और कमसिन फुलझड़ी के गालों और होंठों को कम से कम छूकर तो देख ही सकता हूँ।
सानिया अब मेरे पास आकर मेरे सामने फर्श पर बैठ गई। मैं तो चाहता था सानिया मेरे पास सोफे पर ही मेरी बगल में चिपक कर बैठ जाए पर यह कहाँ संभव था।
साली ये मधुर भी गौरी और सानिया को कितना डराकर रखती है? मजाल है कोई बेअदबी (अशिष्टता) कर दे।
मैंने अब उसका चेहरा अपने हाथों में भर लिया। रूई के फोहे जैसे रेशम से मुलायम गाल मेरे हाथों के बीच में थे। मुझे गौरी का वह पहला चुम्बन याद आ गया। अगर इस समय गौरी मेरे सामने होती तो मैं उसके होंठों को जबरदस्ती चूम लेता पर सानिया के साथ अभी यह सब कहाँ संभव था।
अब मैंने उसके होंठों पर हाथ फिराया। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे नाजुक होंठ फड़फड़ा से रहे थे। मैंने जेब से रुमाल निकाला और उसके होंठों पर फैली लिपस्टिक को करीने से साफ़ कर दिया। अब मैंने सानिया को अपने होंठों पर जीभ फिराने को कहा। सानिया ने मेरे कहे मुताबिक़ किया तो सच कहता हूँ मुझे एकबार यही विचार आया अगर यह मेरे पप्पू के सुपारे पर इसी तरह जीभ फिरा दे तो साला दूसरे जन्म (पुनर्जन्म) का झंझट ही ख़त्म हो जाए।
अब मैंने फिर से उसके गालों पर हाथ फिराया और अपने उसी रुमाल से उसके चहरे लगे पाउडर और रूज को थोड़ा ठीक कर दिया। और फिर मैंने सानिया के गालों पर एक हल्की सी चिकोटी काटते हुए कहा- लो भई सानिया मैडम तुम्हारे गाल और होंठ भी अब मस्त हो गए हैं।
‘आआईईईई …” करती हुई सानिया स्टडी रूम में भाग गई और मैं लोल की तरह बैठा अपने हाथों की उन खुशकिस्मत अँगुलियों को देख और चूम रहा था जिसने अभी-अभी दो खूबसूरत परिंदों की हिलजुल और उसके नरम रेशमी गालों और गुलाबी होंठों का स्पर्श महसूस किया था।
और फिर मैं अपनी आँखें बंद कर बैडरूम का दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार करने लगा जिसमें मधुर और गौरी आज मुझ पर बिजलियाँ गिराने के लिए पता नहीं कौन-कौन से अस्त्र-शस्त्र से अपने आप को लेश करने वाली हैं??
प्रिया पाठको और पाठिकाओ! आप लोग जरूर सोच रहे होंगे इन छोटी-छोटी बातों को लिखने का यहाँ क्या अभिप्राय है? यह कहानी तो गौरी के बारे में है? फिर इस नए मुजसम्मे (गुलाब की दूसरी पत्ती) का किस्सा यहाँ लिखने क्या प्रयोजन है?
दोस्तो! मुझे लगता है मैं कोई पिछले जन्म की अभिशप्त आत्मा हूँ। सच कहूं तो जब भी मैं सुतवां जाँघों के ऊपर कसे हुए नितम्ब देखता हूँ मुझे लगता है मैं किसी भूल भुलैया में भटक रहा हूँ पता नहीं यह तलाश कब ख़त्म होगी
मैं अभी इन विचारों में खोया हुआ था कि बैडरूम का दरवाज़ा खुला और …
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 29
अभी इन विचारों में खोया हुआ था कि बैडरूम का दरवाज़ा खुला और … Click to expand… मधुर और गौरी ने हँसते हुए नितम्बों को ख़ास अंदाज़ में मटकाते हुए हॉल में प्रवेश किया। दोनों ने एक जैसे कपड़े और मेकअप कर रखा था।
सच कहता हूँ दोनों ऐसी लग रही थी जैसे अचानक किसी विवाह के मंडप से उठकर आई हों।
दोनों ने एक जैसा गहरे सुनहरे रंग का वैसा ही लाचा पहना था जैसा सानिया ने पहन रखा था। पैरों में जोधपुरी कामदार जूतियाँ। दोनों किसी दुल्हन की तरह सजी हुई थी।
इन कपड़ों में दोनों एक जैसी लग रही थी जैसे जुड़वां बहनें हों।
मधुर की कमर 2-4 इंच ज्यादा रही होगी बाकी नितम्ब तो दोनों के एक जैसे गोल मटोल ही लग रहे थे।
सिर के बालों का जूड़ा बना रखा था और उस पर भी एक गज़रा पहना हुआ था। कानों में वही जानलेवा सोने की पतली-पतली बालियाँ। दोनों हाथों की कलाइयों में लाल और हरे रंग की चूड़ियाँ और दोनों बाजुओं पर बाजूबंद की तरह गज़रे बांधे हुए थे।
आँखों के मेकअप से तो यही लगता है आज दोनों ने ब्यूटी पार्लर में जाकर रूप सज्जा करवाई होगी। जिस प्रकार उन दोनों ने तीखे आई ब्रो बनवाये थे मुझे लगता है नीचे की केशर क्यारी भी आज जरुर वैक्सिंग से हटाई होगी।
आइलाआआ … अपनी मुनिया को उन दोनों ने कितनी चिकनी बनाया होगा आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। ऐसा मेकअप तो मधुर ने हमारी सुहागरात (सॉरी … मधुर प्रेम मिलन) को किया था। मेरा लंड तो उछालने ही लगा था।
बालों की एक आवारा लट जानबूझ कर माथे के बाईं तरफ छोड़ी हुई थी। आँखों में काजल, माथे पर बिंदी की जगह गोल रखड़ी (विवाहित महिलाओं के माथे पर पहनने का एक गहना) पहनी थी। आँखें तो आज कटार की तरह लग रही थी।
पतली कमर में बंधा नाभि दर्शाना घाघरा और ऊपर तंग कुर्ती जो बस उनके उरोजों को ही ढक रही थी। मेरी आँखें तो जैसे फटी की फटी ही रह गई। मैं तो मुंह बाए उन दोनों को देखता ही रह गया। आज तो मेरे क़त्ल करने का पूरा इंतजाम किया था उन दोनों नहीं बल्कि तीनों ने।
“अरे आप कब आये?” मधुर ने मेरी ओर देखते हुए पूछा।
“हुजूर हम तो कब से महारानी मधुर और गौरी का इंतज़ार फरमा रहे हैं.” मैंने सिर झुकाकर कोर्निश के अन्दाज़ में सलाम बजाया तो दोनों हंस पड़ी।
“आप भी तैयार हो जाओ फिर सेलिब्रेट करते हैं.” कहकर मधुर डाईनिंग टेबल की ओर जाने लगी तो मैंने पहले तो हाथों से गौरी की ओर खूबसूरत लगने का इशारा किया और फिर उसकी तरफ आँख मार दी।
गौरी तो बेचारी शर्माकर मधुर के पीछे लपकी।
फिर मधुर ने सानिया को आवाज लगाई और फिर उन दोनों को कुछ समझाने लगी।
मैं बाथरूम में घुस गया।
मैंने नहाकर बढ़िया खुशबूदार बॉडी स्प्रे किया था और सुनहरी रंग का कामदार कुर्ता और पतला चूड़ीदार पजामा और पैरों में जोधपुरी कामदार जूतियाँ पहन ली थी।
मैंने असली गुलाब का इत्र लगाया भी लगाया था। यह इत्र मुझे मधुर ने मेरे किसी जन्मदिन पर गिफ्ट किया था और बहुत ही ख़ास मौकों पर मैं इसे लगाता हूँ। और आज तो मौक़ा ख़ास ही नहीं ख़ासमखास था।
आपको शायद अटपटा लगे … मैंने अपने होंठों पर हलकी सी गुलाबी रंग की लिपस्टिक भी लगा ली थी। अब तो मेरे होंठ थोड़े गुलाबी से नज़र आने लगे थे।
फिर मैंने शीशे में अपने आप को देखा। मैंने शीशे में अपने अक्श को आँख मारते हुए कहा- क्या जंच रहे हो गुरु!
जब तक मैं तैयार होकर हॉल में आया, मधुर और गौरी ने सारा सामान डाईनिंग पर सजा दिया था। हॉल के एक कोने में दो छोटे स्पीकर लगाए हुए थे। दीवार पर दिल के आकार के थर्मोकोल शीट पर बीच में हैप्पी बर्थडे मधुर लिखा हुआ था जिसके चारों ओर रंगीन लाइटें जगमगा रही थी।
डाईनिंग टेबल पर दिल की आकर का मेगा साइज़ केक रखा था जिसपर अंग्रेजी में ‘हैप्पी बर्थ डे मधुर’ लिखा था
मुझे बाहर आया देखकर मधुर मेरी ओर आई बोली- आओ, सभी पहले भगवान का आशीर्वाद ले लेते हैं।
और फिर हम सभी हॉल के कोने में बने में बने भगवान के मंदिर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। मधुर ने दीपक जलाया और अपना सिर झुकाकर मन्नत सी मांगी।
हम तीनों ने भी भगवान के सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाकर आशीर्वाद लिया। और फिर हम वापस डाइनिंग टेबल के पास आ गए।
मधुर ने केक के पास रही मोमबत्तियां जला दी। मुझे हैरानी हो रही थी मधुर पहले तो केवल दो मोमबत्तियां ही जलाया करती थी आज पता नहीं 3 क्यों जलाई हैं?
और अब केक काटने की बारी थी।
“प्रेम आओ केक काटते हैं.” मधुर ने मेरी ओर देखते हुए कहा।
“भई इतने सुन्दर दिल के आकार के केक पर छुरी चलाने का काम तो बस आप जैसी हसीनाएं ही कर सकती हैं.” मेरी इस बात कर सभी हंसने लगे।
“आओ ना … प्लीज …” मधुर ने मुस्कुराते हुए कहा।
अब मैंने भी मधुर के हाथ में पकड़ा चाक़ू पकड़ लिया। फिर मधुर ने गौरी की ओर इशारा किया। गौरी बेचारी शर्माती हुई पास आ गई और उसने भी मेरे हाथ के पास से चाकू को पकड़ लिया। सानिया यह सब देख रही थी।
मैंने उसकी ओर देखा तो मधुर ने उसे भी पास बुला लिया। सानिया ने पास आकर आकर चाकू को थोड़ा सा पकड़ लिया। उसके कमसिन बदन की खुशबू मेरे नथुनों में एक बार फिर से समा गई। फिर हम सब ने मिलकर उस केक के सीने पर चाक़ू चला दिया।
सबसे पहले मैंने मधुर को हैप्पी बर्थ डे बोलते हुए उसे जन्मदिन बधाई दी और केक का छोटा सा टुकड़ा लेकर खिलाया। अब मधुर ने भी केक का एक बड़ा सा टुकड़ा लिया और आधा मेरे मुंह में डाल दिया और बाकी का हंसते हुए मेरे गालों पर लगा दिया।
मैंने उसे गले से लगाते हुए एकबार फिर से विश किया और अपने गालों को उसके गालों से रगड़ दिया। ऐसा करने से मेरे गालों पर लगा केक उसके गालों पर भी लग गया।
“ओह … क्या करते हो.”
“जैसे को तैसा.” कहकर मैं हंसने लगा।
अब गौरी की बारी थी उसने भी एक चम्मच में थोड़ा सा केक लिया और मधुर को खिलाते हुए उसे हैप्पी बर्थ डे विश किया। मधुर ने गौरी को अपने गले लगाकर चूम लिया।
मधुर जब गौरी को चूम रही थी तो मैंने उसे अपने गले लगने का इशारा करते हुए उसकी ओर आँख मार दी।
गौरी शरमाकर दूसरी ओर देखने लगी।
फिर सानिया ने भी मधुर को थोड़ा केक खिलाया और विश किया। मधुर ने उसे भी गले लगाकर किस किया। मैंने गौर किया गौरी के चहरे पर अब मुस्कान की जगह थोड़े तनाव के से भाव थे, लगता है उसे सानिया का पास आना उसे शायद अच्छा नहीं लगा है।
नारी सुलभ ईर्ष्या तो हर स्त्री में होती ही है अब बेचारी गौरी का इसमें क्या दोष है।
और फिर मधुर ने सबके साथ सेल्फी ली। एक सेल्फी तो अपने होंठों को मेरे गालों पर चूमते हुए ली। पता नहीं कभी-कभी मधुर इतनी चुलबुली और रोमांटिक कैसे हो जाती है? और फिर गौरी और सानिया को मेरे दोनों तरफ खड़ा करके भी मोबाइल से 2-3 फोटो लिए।
मैं मधुर के लिए डाईमण्ड का एक सेट लेकर आया था। इसमें गले का एक हार और उससे मिलते जुलते कानों के बूँदे और एक अंगूठी थी।
एकबार मधुर ने यह सेट किसी ज्वेलरी की दुकान पर देखा था। उसे पसंद तो बहुत था पर बजट के कारण उस दिन हम ले नहीं पाए थे।
जब मधुर ने इसे देखा तो उसकी ख़ुशी देखने लायक थी, उसने एक बार फिर मेरे गले से लगकर थैंक यू कहा।
अब उसने टेबल पर रखे 2 पैकेट उठाये और सानिया को पकड़ाते हुए कहा- इसमें तुम्हारे लिए एक पैकेट में विडियो गेम है और दूसरे में तुम्हारे लिए एक बढ़िया लेडीज रिस्ट वाच है। एक और गिफ्ट है इसमें तुम्हारे लिए एक टीशर्ट और जीन पैंट है इनमें तुम बहुत खूबसूरत लगोगी।
कहकर मधुर ने उसके उसके गालों को प्यार से थपका दिया।
सानिया तो ख़ुशी के मारे झूम ही उठी। उसने उन पैकेट्स को इस प्रकार अपनी छाती से लगा लिया जैसे थोड़ा सा ढीला छोड़ते ही कोई इसे छीन लेगा।
“थैंक यू दीदी.” सानिया ने मासूमियत के साथ कहा।
अब मधुर ने एक छोटा सा पैकेट और उठाया और गौरी को पकड़ा दिया। इसमें डाईमंड की एक अंगूठी और कानों के बुँदे थे। गौरी ने झट से उस गिफ्ट के पैकेट को पकड़ लिया और बहुत देर तक उस पर हाथ फिराती रही।
लगता है मधुर ने तो आज गौरी और सानिया के लिए जैसे खजाना ही खोल दिया है। गौरी को कानों की बालियाँ, पायल और कपड़े (लाचा) आदि तो पहले ही मधुर ने दे दी थी और अब सब गिफ्ट पाकर तो दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था।
मैं सोच रहा था मधुर आजकल इतनी उदार हृदय कैसे हो चली है.
“देखो यह तो बिलकुल ही नाइंसाफी है?” अचानक मैंने कहा तो सबने हैरानी से मेरी ओर देखा।
“क्या मतलब?” मधुर ने पूछा।
“मुझे तो किसी ने कोई गिफ्ट दिया ही नहीं? ना मधुर ने ना ही गौरी ने?” मैंने किसी छोटे बच्चे की तरह ठुमकते हुए कहा।
“हा … हा … हा …” सभी जोर जोर से हंसने लगे।
माहौल खुशनुमा हो गया था। गौरी ने कनखियों से मेरी ओर देखा शायद उसकी आँखें कह रही थी ‘मैंने जो गिफ्ट दिया है उसके आगे सारे गिफ्ट तो फीके हैं।’
अब गौरी और सानिया ने सब के लिए प्लेट्स में केक और मिठाइयां आदि डाल दी। भरपूर नाश्ता करने के बाद डांस का प्रोग्राम चला। गौरी ने अपना मोबाइल स्पीकर्स के साथ जोड़ कर गाना लगा दिया था।
पहले गौरी ने घूमर डांस किया और जबरदस्त ठुमके लगाए और उसके बाद सानिया ने भी कबीर सिंह फिल्म के गाने ‘तुम्हें कितना चाहने लगे’ पर डांस किया। उसका डांस देखकर तो ऐसा लग रहा था जैसे यह कोई प्रोफेशनल डांसर है।
और उसके बाद ‘ओ साकी-साकी’ गाने पर मधुर ने जो बेली डांस किया मैं तो उसकी कमर और बेली (पेट और कमर को घुमाते हुए) डांस देखते ही रह गया। ऐसे में उसके नितम्ब कितने खूबसूरत लगते हैं। काश आज की रात वह महारानी (गांड) की सेवा करने का मौक़ा दे दे तो पिछले एक महीने का सूखा एक ही रात में ख़त्म हो जाए।
कमाल का डांस करती है मधुर भी। उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे भी डांस में शामिल कर लिया और दिलबर दिलबर गाने पर मैंने भी अपने हाथ पैरों को हिला लिया।
आप तो जानते ही हैं मुझे ज्यादा डांस नहीं आता बस थोड़ा बहुत हाथ पैर चला लेता हूँ।
इस गाने में डांस के दौरान गौरी औरे सानिया भी शामिल हो गई। फिर हम चारों ने एक साथ डांस किया। मधुर और गौरी ने मिलकर डांस किया और मैंने सानिया के साथ मिलकर खूब ठुमके लगाए।
उसकी पीठ और कमर पर हाथ फिराने से मैं अपने आप को नहीं रोक पाया। एक दो बार तो सानिया के नितम्बों पर भी हाथ फिराया।
हे भगवान, इतने कसे हुए गोल नितम्ब … उफ़ … मेरा लंड तो हिनहिनाने ही लगा था। मेरा मन तो उसे बांहों में भर कर चूम लेने को करने लगा था पर इस समय वो सब कहाँ संभव था।
और उसके बाद गौरी ने और मधुर ने एक मारवाड़ी गाने ‘म्हारी हथेल्यां रै बीच छाला पड़ग्या म्हारा मारुजी म्हे पालो कैयां काटां जी’ पर डांस किया।
जिस प्रकार गौरी रहस्यमई ढंग से मुस्कुराते हुए अपने हाथों और आँखों का एक्शन कर रही थी मुझे लग रहा था जैसे वह मुझे उलाहना दे रही हो कि आपने मेरी चूत रानी को बजा-बजा के इतना सुजा दिया कि अब और चुदाई नहीं हो सकती.
और अंत में तो सानिया ने कमाल ही कर दिया था। उसने एक पुरानी फिल्म गाइड के एक क्लासिकल गाने पर डांस किया जिसके बोल थे ‘मोसेSS … छल किये जा … सैंया बे-ईमान’
मेरी तो जैसे सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई। अब पता नहीं इस गाने का चुनाव मधुर के कहने पर किया था या मात्र एक संयोग था।
और फिर यह पार्टी और डांस प्रोग्राम रात के बारह-साढ़े बारह एक बजे तक चला।
गौरी और सानिया स्टडी रूम में सोने चली गई और मैं और मधुर बैडरूम में आ गए।
बैडरूम में आते ही मैंने मधुर को अपनी बाहों में भर लिया।
“ओहो … क्या कर रहे हो?”
“मेरी जान अब मैं तुम्हारी एक भी नहीं सुनूँगा। आज पूरा एक महीना हो गया है तुम्हें क्या पता यह सूखा मैंने कैसे काटा है.”
“नहीं आज नहीं … मैं बहुत थक गई हूँ.” मधुर ने अपने उसकी पुराने चिर परिचित अंदाज़ बहना बनाया।
पर मैं आज कहाँ मानने वाला था। मैंने उसे बाहों में दबोच लिया और पलंग पर पटक कर उसके ऊपर आ गया। मैंने तड़ा-तड़ कई चुम्बन उसके गालों पर ले लिए और उसकी मुनिया को घाघरे के ऊपर से ही जोर से अपने हाथों में भींच लिया।
“उईईईईईइ … ओहो … रुको तो सही!” मधुर ने कसमसाते हुए कहा- ओहो मुझे कपड़े तो बदल लेने दो प्लीज!
और फिर मधुर ने बाथरूम में जाकर अपने कपड़े बदल लिए। आज उसने वही लाल रंग वाली नाइटी पहनी थी जो उसने सुहागरात में पहनी थी। साली यह मधुर भी चीजों को किसी ख़ास मौकों के लिए कितना संभाल कर रखती है कमाल है।
मैंने भी अपने कपड़े उतार दिए और फिर हमारा यह प्रेम-युद्ध अगले आधे पौन घंटे तक निर्विघ्न चला था। अब आप जैसे प्रबुद्ध पाठकों और पाठिकाओं को यह सब विस्तार से बताना कहाँ जरूरी है।
मैं मधुर के गालों को चूमते हुए और उसके नितम्बों पर हाथ फिराते हुए यही सोच रहा था पता नहीं गौरी के नितम्बों को चूमने और मसलने का मौक़ा कब मिलेगा।
एक बात मैं आपसे जरूर सांझा करूंगा कि मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था मधुर आज प्रेम के इन लम्हों में भी ज्यादा रूचि नहीं दिखा रही थी।
पता नहीं क्या बात थी?
यही सोचते हुए एक दूसरे की बाहों में लिपटे हुए पता नहीं कब हमारी आँख लग गई।
कथानक के अगले भाग में हम नया सोपान “ये गांड मुझे दे दे गौरी!” बस थोड़ा सा इंतज़ार …
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 30
Gulabi Gand
कामकला (सेक्स) विशेषज्ञों का मानना है कि गौरी गांड और काली चूत बहुत मजेदार होती है।
आप तो जानते ही हैं मधुर ने तो शादी के बाद 3 साल तक मुझे गांड देने के लिए तरसाया था। कल रात को मधुर की गांड (सॉरी महारानी) मारने का मेरा बहुत मन कर रहा था और कल तो मौक़ा भी था और दस्तूर भी था पर पता नहीं मधुर तो आजकल सेक्स में ज्यादा रूचि दिखाती ही नहीं है। अब गांड के लिए तो उसे मनाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है।
आप तो जानते ही हैं उसने तो इस सम्बन्ध में पहले से ही फतवा जारी कर रखा है कि जब तक वह गर्भवती नहीं हो जाती गांडबाज़ी बिलकुल बंद। अब उसके फरमान और फतवे के आगे मेरी क्या मजाल कि मैं कोई जोर जबरदस्ती करूँ?
जब से गौरी आई है उसकी कसी हुई खरबूजे जैसी खूबसूरत गुलाबी गांड मारने के लिए तो मैं जैसे मरा ही जा रहा हूँ। चूत रानी का उदघाटन तो थोड़ी मान-मनौव्वल से हो गया था पर उसे गांड देने के लिए तैयार करना जरा मुश्किल काम लग रहा है।
शारीरिक रूप से तो वह मेरा लंड पूरा अपनी गांड में लेने के लिए सक्षम है पर अभी मानसिक रूप से भी उसे पहले से तैयार करना बहुत जरूरी है।
और एक बार अगर उसने अपने आप को इसके लिए तैयार कर लिया तो बस उसके बाद तो वह खुद कहेगी ‘मेरे साजन इस महारानी की मुंह दिखाई और सेवा की रस्म भी पूरी कर दो ताकि मैं आपकी पूर्ण समर्पिता बन जाऊं।’
मुझे लगता है गौरी ने इन्टरनेट पर जरूर कामुक फ़िल्में देखी होंगी जिनमें तीनों छेदों का स्वाद बड़े खूबसूरत अंदाज़ में दिखाया जाता है।
जिस प्रकार गौरी ने हमारे प्रथम सम्भोग (गौरी प्रेम मिलन में) के समय संतुलित और सुन्दर शब्दों और भाषा का प्रयोग किया था, लगता है मधुर की बताई बातें उसे बहुत ही पसंद आई हैं और वह भी उन लम्हों को ठीक उसी प्रकार भोगना चाहती थी जैसे मधुर ने उसे अपनी आपबीती में बताया होगा।
और यह भी संभव है कि मधुर ने अपनी सुहागरात के साथ-साथ दूसरी सुहागरात (गांड देने) के बारे में भी जरूर बताया होगा कि उसने कितनी मिन्नतों के बाद मुझे अपनी गांड मारने दी थी।
मेरा लंड तो जैसे कह रहा है कि गुरु आज ही ठोक दो साली को। जितने सलीके से उसने चूत का उदघाटन करवाया है गांड के लिए भी राजी हो जाएगी तुम कोशिश तो करो।
हाँ यह बात तो सही है पर मेरा अनुभव कहता है अधिकतर महिलायें उतावलापन पसंद नहीं करती वे हर काम तसल्ली से करना पसंद करती है। चाहे प्रेम सम्बन्ध हों या कोई और काम। अब गांड के लिए उसे तैयार करने में थोड़ा समय तो जरूर लगेगा।
अब इंतज़ार के सिवा और क्या किया जा सकता है?
आज से ‘ये गांड मुझे दे दे गौरी’ अभियान गंभीरता पूर्वक शुरू करते हैं।
कंजूस पाठको! ‘आमीन’ तो बोल दो।
रात को इतने खूबसूरत प्रेमयुद्ध के बाद कितनी मजेदार गहरी नींद आती है आप तो जानते ही हैं। सुबह जब मैं बाथरूम से फ्रेश होकर आया तब तक सानिया चाय बनाकर ले आई थी। गौरी शायद नहा रही थी।
मैं और मधुर चाय पीने लगे। लगता है मधुर ने आज भी स्कूल से छुट्टी ले रखी है। पता नहीं मधुर आजकल किन चक्करों में लगी रहती है। पहले तो वह जरूरी काम होने या बीमार होने के बावजूद भी एक भी दिन स्कूल मिस नहीं किया करती थी पर आजकल पता नहीं वह स्कूल की तरफ से इतनी लापरवाह कैसे हो गई है?
“प्रेम वो ताईजी का फ़ोन आया था.”
“क … कौन ताईजी?”
“ओहो … मैं तुम्हारी मुंबई वाली मौसीजी की बात कर रही हूँ.” मेरे पुराने पाठक जानते हैं मधुर के ताऊजी मेरे भी मौसा लगते हैं और मुंबई में रहते हैं। मीनल उनकी बेटी है जो आजकल कनाडा में रह रही है।
“ओह … हाँ … अच्छा? फोन कब आया था? सब ठीक है ना?”
“वो ताऊ जी की तबियत आजकल खराब चल रही है। उनको हार्ट की दिक्कत हो गई है और ताईजी के भी घुटनों में दर्द रहता है। मैं सोच रही हूँ एक बार हम भी मिल आयें!”
“भई मेरे लिए तो अभी ऑफिस से छुट्टी लेना संभव नहीं हो पायेगा पर तुम हो आओ। मैं टिकट की व्यवस्था कर देता हूँ।”
“हम्म … आपको अकेले में 5-7 दिन दिक्कत तो होगी पर गौरी दिन में खाना और साफ़ सफाई आदि कर जाया करेगी।” मधुर कुछ सोचने लगी थी।
“हाँ … ठीक है।”
मैंने ‘ठीक है’ कह तो दिया था पर अब तो मुझे संदेह नहीं पूरा यकीन सा होने लगा है कि सब कुछ ठीक नहीं है। मधुर के दिमाग में कोई ना कोई तो खुराफात तो जरूर चल रही है। बेचारी गौरी का भगवान भला करे।
इतने में गौरी नहाकर बाथरूम से बाहर आई। उसके खुले भीगे बालों से पानी बूंदे टपक रही थी ऐसा लग रहा था जैसे शबनम (ओस) की बूँदें मोती बनकर टपक रही हों। आज उसने पजामा और हाफ बाजू की कमीज पहनी थी।
मुझे लगा इन 4-5 दिनों में उसके नितम्ब और भी ज्यादा खूबसूरत हो गए हैं।
“अरे गौरी! सानिया को साथ लगाकर काम ज़रा जल्दी निपटा ले हमें आज 2-3 काम करवाने हैं.”
“हओ” कहते हुए गौरी स्टडी रूम में चली गई। मैं तो उसके थिरकते नितम्बों और बल खाती कमर को ही देखता रह गया।
आज तो सुबह निराशा भरी ही रही थी।
शाम को जब मैं घर आया तो सानिया वापस चली गई थी। मैं और मधुर टीवी देख रहे थे। गौरी रसोई में खाना बना रही थी।
“प्रेम! यह सानिया है ना?”
“हम्म!”
“पता है क्या बोल रही थी?” मधुर ने हंसते हुए मेरी ओर देखा।
जब भी मधुर इस प्रकार रहस्यमई ढंग से बात करती है मुझे लगता है जरूर कोई बम फोड़ने वाली है। हे लिंग देव! कहीं लौड़े तो नहीं लगाने वाले हो?
“क … क्या?”
“बेचारी बहुत मासूम है.” कहकर मधुर कुछ पलों के लिए चुप हो गई।
मुझे मधुर की इस बात पर कई बार बहुत गुस्सा आता है वह एक बार में कभी पूरी बात नहीं बताती।
बाद में उसने बताया कि जब वह और गौरी बाज़ार से आये तो वह पहले तो दौड़ कर पानी लाई और फिर चाय का बनाने का पूछा। मैंने कहा कि चाय थोड़ी देर रुक कर पियेंगे। मैं थक गई हूँ पहले थोड़ा सुस्ता लेती हूँ। तो वह बोली आप थके हैं तो मैं आपके पैर दबा देती हूँ. कह कर मधुर हंसने लगी।
मुझे कुछ समझ नहीं आया। पता नहीं मधुर क्या बताना चाह रही है।
“फिर पता है सानिया ने क्या बोला?”
“क्या?”
वह बोली- दीदी … आप मुझे भी अपने पास यही रख लो। मैं रोज घर का सारा काम भी कर दूँगी और रात को आपके पैर भी दबा दिया करुँगी. फिर उसने बड़ी आशा भरी नज़रों से मेरी ओर देखा।
“फिर तुमने क्या जवाब दिया?” मैंने पूछा।
“मुझे उस पर दया सी भी आई। ये गरीब की बेटियाँ भी घर में कितने अभावों में पलकर बड़ी होती हैं। ज़रा सा प्यार मिल जाए तो अपनी जान भी कुर्बान कर देती हैं।”
“हाँ … सही कहा तुमने … पुरुष घर में निकम्मे बने बैठे रहते हैं। ये बेचारी दूसरों के घरों में जाकर मजदूरी करती हैं, घर का खर्च भी चलाती हैं, उन्हें दारु के पैसे भी देती हैं और उनकी मार भी खाती हैं।”
“मैंने उसे दिलासा दी कि जब भी तुम्हारा मन करे यहाँ आ जाया करो और जो भी चीज तुम्हें चाहिए या खाने का मन करे बता दिया करो।”
“हम्म … ठीक किया!”
“उसने एक और बात बोली.”
“क्या?”
उसने बोला कि ‘आप तोते दीदी को यह बात मत बताना?’ कह कर मधुर हंसने लगी।
मैं सोच रहा था यह साली गौरी तो अपने आप को पटरानी ही समझने लगी है। कोई बात नहीं पटरानी जी! जल्दी ही मेरा लैंडर-रोवर तुम्हारे ऑर्बिटर में प्रवेश करने ही वाला है।
इतने में गौरी रसोई से बाहर आकर बोली- दीदी! खाना तैयार है लगा दूं क्या?
“हाँ लगा दो।”
डिनर के बाद मधुर सोने जाने लगी तो गौरी रसोई के दरवाजे के पास खड़ी हुई थी।
उसने गौरी की ओर देखते हुए कहा- प्रेम! ये गौरी तो आजकल पढ़ाई लिखाई में बिलकुल ध्यान नहीं देती। बहुत मस्ती मार ली इसने, आज से इसकी नियमित पढ़ाई फिर से चालू करो।
गौरी तो बेचारी सकपका कर ही रह गई। वह अपनी किताबें आदि लेकर मेरे सामने आकर बैठ गई। उसने मुंह सा फुला लिया था। मेरी तोतापरी तो अब प्रेमग्रन्थ पढ़ने लगी है तो इसका मन अब इन किताबों में कहाँ लगेगा?
“गौरी आज बाज़ार से क्या-क्या खरीदा?”
“खरीदा कुछ नहीं बस वो मेला आधार काल्ड बनवाना था औल राशन काल्ड में नाम ठीक कलवाना था.”
“हो गया?”
“हओ”
“कहाँ है?”
“वो दीदी के पास है।”
पता नहीं यह आधार कार्ड और नाम का क्या चक्कर है।
“ओके … वो … गौरी अब तुम्हारे मुंहासों के क्या हाल हैं?
“ठीक हैं …”
“इन दिनों में तो तुमने ना तो वो दवाई पीयी ना लगाई?”
“हट! … आपने इन मुहासों के चक्कर में मुझ भोली-भाली लड़की को फंसा लिया.”
“वाह जी एक तो मुहासे ठीक करने की दवा दी और फिर हमें ही दोष दे रही हो?”
“और क्या?”
“गौरी प्लीज … पास आओ ना इतनी दूर क्यों बैठी हो?” मैंने मस्का लगाने की कोशिश की तो गौरी बोलो- आज पढ़ाना नहीं है क्या?
“अरे पढ़ाई लिखाई तो चलती रहेगी … थोड़ी देर बात करते हैं फिर पढ़ाई भी कर लेना.”
“बोलो?”
“गौरी तुमने कल तो कमाल का डांस किया … बहुत खूबसूरत डांस करती हो. कहाँ से सीखा?” मैं तो मर ही मिटा तुम्हारी कमर और नितम्बों के लटके झटकों पर!”
गौरी ने अविश्वास के साथ मेरी ओर ताका।
“सच्ची … तुम तो किसी प्रोफेशनल डांसर की तरह डांस करती हो।”
गौरी ने गर्वीली मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा। मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपने पास सोफे पर बैठा लिया। और उसे बांहों में भर कर उसके होंठों पर एक चुम्बन ले लिया।
गौरी अपने होंठों को पौंछते हुए थोड़ा सा हट कर बैठ गई।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“नहीं यह सब गलत है.”
“इसमें गलत क्या है?”
“अगल दीदी तो पता चल गया तो?”
“उसे बिना हमारे बताये कैसे पता चलेगा?”
“उन्हें पता चले या ना चले लेकिन यह सब गलत तो है ही ना? दीदी मेले ऊपर तित्ता विस्वास तलती है?”
भेनचोद अब यह क्या नया नाटक शुरू कर दिया गौरी ने। कल तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था। सुबह अगर मधुर स्कूल चली जाती तो बस सुबह-सुबह ही इस तोतापरी को प्रेम का अंतिम सोपान सिखा देता पर लगता है अब तो हाथ आई मछली फिसलने ही वाली है। किसी तरह अब स्थिति को संभालना ही होगा।
“पर मधुर तो खुद कहती है कि वह तुम्हें हमेशा के लिए यहीं रखने वाली है.”
“हाँ वो कहती तो जलूल हैं पल क्या यह सब संभव हो पायेगा?”
“गौरी तुम अगर चाहो तो यह सब हो सकता है?”
“तैसे?”
“देखो तुम्हारे यहाँ रहने से ना तो मधुर को कोई ऐतराज़ नहीं है और ना ही मुझे। तुम तो जानती हो ट्रेनिंग के बाद मेरा ट्रान्सफर दूसरी जगह होने वाला है। हम तीनो ही यहाँ से किसी दूसरी जगह चले जायेंगे वहाँ हमें ज्यादा जानने वाले लोग नहीं होंगे और फिर आराम से सारी जिन्दगी हंसते खेलते हुए बिता देंगे.”
“सल! यह सब किसी हसीं ख्वाब (खूबसूरत सपने) जैसा लगता है। पर मेरी ऐसी तिस्मत तहां? एक ना एक दिन तो मुझे यहाँ से जाना ही होगा.”
हालांकि मैंने गौरी को पूरी तसल्ली दी थी पर गौरी की आशंका निर्मूल नहीं थी। जो कुछ गौरी ने कहा वह कठोर सत्य था।
पर मुझे अभी स्थिति संभालनी थी तो मैंने कहा- गौरी, तुम ऐसा क्यों सोचती हो? तुम बहुत भाग्यशाली हो और किस्मत को दोष तो निकम्मे लोग देते हैं। आदमी अपनी किस्मत खुद बनाता है।
“नहीं सल! हकीकत तो हकीकत ही लहेगी उसे झुठलाया नहीं जा सकता। मैं तो बस आपके और मधुर दीदी के साथ अपनी जिन्दगी के जो सुनहरे पल बिताएं हैं उसकी याद जिन्दगी भर संजोये रखना चाहती हूँ।”
लगता है आज गौरी का मूड ठीक नहीं है। चलो कल सुबह बात करते हैं। और फिर मैंने गौरी को 1 घंटे तक अंग्रेजी और मैथ पढ़ाया। सोने के लिए जाते समय मैंने गौरी को अपनी बांहों में लेकर गुड नाईट किस किया। गौरी ने कोई विरोध नहीं किया।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 30
अपनी कामवाली की चूत चोद चुका था और अब उसकी गांड मारने को उतावला था. लेकिन उसे गांड के लिए मानना थोड़ा मुश्किल लग रहा था.
मैंने गौरी को 1 घंटे तक अंग्रेजी और मैथ पढ़ाया। सोने के लिए जाते समय मैंने गौरी को अपनी बांहों में लेकर गुड नाईट किस किया। गौरी ने कोई विरोध नहीं किया। Click to expand… अगली सुबह मधुर स्कूल चली गई। मैं जब फ्रेश होकर बाहर आया तो गौरी रसोई में चाय बना रही थी। मैं भी रसोई में आ गया। आज उसने पतली पजामी और गोल गले की टी-शर्ट पहन रखी थी। बालों की दो चोटियाँ बना रखी थी।
“गुड मोर्निंग डार्लिंग क्या हो रहा है?”
“आपके लिए गुडमोल्निंग बना लही हूँ?” कह कर गौरी हंसने लगी।
गौरी चाय बनाने में लगी थी तो मैं चुपके से उसके पीछे जाकर उसे अपनी बांहों में भर लिया और एक हाथ से उसकी सु-सु को पकड़ कर भींच लिया और दूसरे हाथ से उसके बूब्स को अपने हाथों में पकड़ कर दबाने लगा।
“उईईईई … त्या कल लहे हो?”
“गौरी मेरी जान तुम बहुत खूबसूरत हो.”
“ओहो … हटो परे … मेली चाय उफन जायेगी.”
“उफनती है तो उफनने दो … ” कहकर मैंने उसकी गर्दन पर चुम्बन ले लिया। और फिर उसके कानों और गालों पर भी चुम्बन लेने लगा।
“प्लीज … लुको … आह … आप बाहल बैठो, मैं चाय लेकल आती हूँ।”
मेरा एक हाथ अभी भी गौरी की सु-सु को दबाने में व्यस्त था। गौरी ने मेरे हाथ को हटाने की कोशिश की पर मेरी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरा हाथ हटाना उसके लिए संभव नहीं था। हार कर उसने अपना हाथ मेरे हाथ के ऊपर ही रख लिया।
मेरा लंड खडा होकर उसके नितम्बों के खाई से जा टकराया। उसने भी इसे महसूस कर लिया था। उसने अपने नितम्बों को थोड़ा भींच लिया था। काश गौरी आज रसोई की शेल्फ पर अपने हाथ आगे रख कर खड़ी हो जाए और मैं पीछे से अपना लंड उसकी सु-सु में उतार दूं तो कसम से आज की सुबह तो एक हसीन ही यादगार बन जाए। मेरा लंड उसकी पतली पजामी में कैद नितम्बों के बीच हिलजुल करने लगा था।
“गौरी मेरी जान तुम बहुत खूबसूरत हो.”
गौरी ने अपने दोनों हाथ ऊपर करके मेरी गर्दन पर लगा लिए और अपनी आँखें बंद ली। मैंने उसकी सु-सु के पपोटों को मसलना चालू कर दिया।
गौरी की मीठी सीत्कार निकलने लगी- आआआईईई ईईई …
वह अपने पैर पटकने लगी थी। फिर वह पलटकर मेरे सीने से लग गई।
“गौरी पता है मेरा मन आज क्या कर रहा है?”
“हम … त्या?” गौरी ने आँखें बंद किये हुए ही पूछा।
“गौरी आज रसोई में ही कर लें क्या?”
“हट! रसोई में गंदा काम नहीं कलते.”
“इसमें गंदा क्या है यह तो परमात्मा की सेवा का काम है। प्रेम करना कोई गंदा काम थोड़े ही होता है?”
“हट! कुछ भी बोलते हो? अब आप जाओ मैं चाय लेकल आती हूँ। आज कोई शलालत नहीं करनी?” गौरी ने मुझे थोड़ा धकेलते हुए से कहा।
फिर वह चाय छानने में लग गई।
मुझे लगा रसोई में तो आज वह नहीं मानेगी चलो आज सोफे पर ही बैठकर उसकी गांड चुदाई ना सही गोद भराई (मेरा मतलब चुदाई) का आनंद तो ले ही सकते हैं।
मैं बाहर आकर सोफे पर बैठ गया और अखबार पढ़ने लगा।
5-4 मिनट के बाद गौरी चाय लेकर आ गई। उसने दो गिलासों में चाय डाल ली और एक गिलास मुझे पकड़ा दिया। आज चाय में चीनी थोड़ी कम रह गई थी।
गौरी ने चाय की एक सुड़की लगाई। उसके चहरे को देखकर लगा जैसे चाय में चीनी कम है।
मैंने कहा- गौरी अपना गिलास देना एक बार?
गौरी को कुछ समझ तो नहीं आया पर उसने अपना गिलास मुझे पकड़ा दिया। अब जहां गौरी ने अपने होंठ लगाए थे मैने ठीक उसी जगह अपनी जीभ फिराई और फिर एक सुड़का लगाते हुए चाय की चुस्की ली।
गौरी यह सब देख रही थी- अले … ओह … मेली झूठी चाय?
“कोई बात नहीं तुम्हारे होंठों की मिठास इतनी ज्यादा है कि मैं अपने आपको रोक नहीं पा रहा हूँ। वैसे भी आज चाय में तुमने चीनी कम डाली थी तो हिसाब बरोबर हो जाएगा।” कह कर मैं हंसने लगा।
अब बेचारी गौरी मंद-मंद मुस्कुराने के अलावा और क्या कर सकती थी। दोस्तो! किसी लौंडिया को पटाने के लिए यह सब टोटके बहुत जरूरी होते हैं।
मैंने आज बर्मूडा और लाल रंग का टी-शर्ट पहन रखा था। मेरा लंड पूरा खड़ा होकर कलाबाजियां लगा रहा था। उसका उभार बर्मूडा के ऊपर साफ़ देखा जा सकता था। मैंने गौर किया गौरी कनखियों से बार-बार उसी तरफ देखे जा रही थी। उसने अपने एक टांग दूसरी टांग पर रख ली थी और अपनी जांघें भी भींच रखी थी। पता नहीं वह क्या सोचे जा रही थी।
“गौरी तुम तो रात को भी दूर ही बैठती हो और दिन में भी?”
अब गौरी ने चौंक कर मेरी ओर देखा। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपने पास खींच लिया।
“नहीं … आज मेला मन नहीं है प्लीज …”
दोस्तो, यह सब हसीनाओं के नखरे होते हैं। मधुर भी चूत और गांड देने से पहले इसी तरह के नखरे और ना नुकुर जरूर करती है। अगर मैं शुद्ध देशी भाषा का प्रयोग करूँ तो कहूँगा बकरी दूध देती जरूर है मेंगनी करने के बाद।
अब मैंने गौरी को अपनी गोद में बैठा लिया था। और उसके गालों को चूमने लगा था।
“आप फिल शलालत करने लग गए ना? आह …”
“गौरी एक बात पूछूं?”
“हओ” गौरी की आवाज में थोड़ा कम्पन सा था और उसका शरीर रोमांच के मारे लरजने सा लगा था।
“अच्छा एक बात बताओ तुम्हारा सबसे खूबसूरत अंग कौन सा है?”
“मुझे त्या पता?”
“ऐसा थोड़े ही होता है? सब खूबसूरत लड़कियों को पता होता कि उनका कौन सा अंग सबसे खूबसूरत है जिन पर लड़के मर मिटते हैं?”
“पता नहीं? आप बताओ?” गौरी मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा।
“वैसे तो तुम्हारा हर अंग सांचे में ढला हुआ है पर मैं सच कहता हूँ तुम्हारे नितम्ब बहुत ही ज्यादा खूबसूरत हैं।”
मुझे लगा गौरी शरमाकर ‘हट’ जरूर बोलेगी पर गौरी तो जोर जोर से हंसने लगी थी।
“पता है दीदी ने भी सेम टू सेम यही बात बोली थी.” गौरी अपनी झोंक में बोल तो गई पर फिर उसने शर्म के मारे अपनी मुंडी नीचे कर ली।
“अच्छा कब?”
अब गौरी बेचारी क्या बोलती?
मैंने दुबारा पूछा तब वह बोली- दीदी के बल्थ डे वाले दिन!
“प्लीज … पूरी बात बताओ ना?”
“वो … वो … जब हम पाल्टी ते लिए तैयाल हो लहे थे तब कपड़े बदलते समय उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक कई बार देखा और फिर अपनी बांहों में लेकर चूमा था और फिर यह बात बोली थी।”
“क्या तुमने सारे कपड़े उतार दिए थे?”
“हओ.” गौरी झिझकते हुए हामी भरी।
“अच्छा नितम्बों वाली क्या बात आ गयी थी?”
फिर गौरी ने बहुत शर्माते हुए बताया कि दीदी मेरे नंगे नितम्बों को देखकर बोली- गौरी तुम्हारे नितम्ब इतने खूबसूरत हैं कि तुम्हारा पति तो इन्हें देखकर इनके ऊपर लट्टू ही हो जाएगा और तुम्हें आगे और पीछे दोनों तरफ से खूब प्यार करेगा।
गौरी तो बताकर चुप भी हो गई और शर्मा भी गई पर आप मेरी हालत का अंदाजा लगा सकते हैं। मेरा लंड तो बर्मूडा में तूफ़ान ही मचाने लगा था। बार-बार ख़ुदकुशी करने पर आमादा हो चुका था। मेरी कानों में सांय-सांय सी होने लगी थी और साँसें और दिल की धड़कन भी तेज हो गई थी। मन कर रहा था अभी गौरी को सोफे पर पटक कर इसका गेम बजा डालूँ।
लगता है मधुर ने गौरी को हमारी दूसरी सुहागरात (पहली बार मधुर ने गांड मारने दी थी) के बारे में जरूर बताया होगा।
गौरी ने अपनी मुंडी अभी भी झुका रखी थी। उसकी साँसें भी बहुत तेज़ हो रही थी। मैंने गौर किया उसके माथे हल्का सा पसीना सा आ गया है और कनपटियाँ भी लाल सी हो गई हैं।
मैंने गौरी को अपनी बांहों में भर लिया और कई चुम्बन एक साथ ले लिए और उसके नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया था।
“गौरी मेरी जान … क्या तुम भी मुझे उतना ही प्रेम करती हो जितना मैं तुम्हें दिल की गहराइयों से चाहता हूँ?”
“हाँ मेले साजन!” कह कर गौरी ने मेरे होंठों को चूम लिया।
“गौरी आज मेरी एक बात मान लो प्लीज?”
“मेले साजन! आपके लिए तो मैं अपनी जान भी दे सकती हूँ?”
“गौरी मेरी एक बहुत बड़ी इच्छा है.”
“त्या?”
“गौरी पहले वादा करो तुम बुरा नहीं मानोगी और शरमाओगी नहीं?”
गौरी ने भय मिश्रित आंशंका से मेरी ओर ताकते हुए कहा “हम … ठीक है”
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। मुझे तो लगने लगा मेरी जबान लड़खड़ाने सी लगी है और शायद मैं कुछ बोल ही नहीं पाऊंगा। अब मैं गौरी से किन शब्दों में अपनी इस ख्वाहिश का इजहार (इच्छा प्रकट करना) करूँ मेरे समझ में ही नहीं आ रहा था।
“गौरी मेरा भी म … मन तुम्हारे नितम्बों को प्रेम करने का कर रहा है …” मुझे लगा गौरी शरमाकर ‘हट’ बोलेगी और फिर हो सकता है मान-मनौव्वल के बाद राजी भी हो जाए। हे लिंग देव! तेरी जय हो …
“क … क्या?” अचानक गौरी मेरे आगोश से छिटक कर दूर हो गई जैसे उसे 370 डिग्री का बिजली का झटका सा लगा हो।
“क … क्या हुआ?”
“ना बाबा ना … मैं तो मल जाऊंगी …”
“अरे नहीं मेरी जान ऐसे कोई नहीं मरता।”
“ना … बा … ना इसमें बहुत दल्द होता है.” गौरी ने घबराए अंदाज़ में कहा।
“तुम्हें कैसे पता कि इसमें करने से दर्द होता है?”
“वो … वो त … क … तालू … भ …”
“क्या … मतलब … कौन तालू?”
“तमलेश भैया … ” (कमलेश-गौरी का बड़ा भाई)
“ओह … क्या किया कहीं … ठ … ठोक तो नहीं दिया? उस मादर … ” मेरे मुंह से गाली निकलते-निकलते बची।
मैं इतना जोर से बोला था कि गौरी तो एक बार सकपका सी गई उसके मुंह से तो आवाज ही नहीं निकल पा रही थी।
“बताओ ना … क्या किया उसने?”
“वो … बबली भाभी …” गौरी ने डरते-डरते बताने की कोशिश की।
“अब बीच में ये भाभी कहाँ से आ गई?”
“भैया ने अपनी सुहागलात में … बबली भाभी … ” कहकर गौरी एक बार फिर चुप हो गई। मेरी उलझन और असमंजस बढ़ता ही जा रहा था।
“हाँ … क्या किया कालू ने … तुम्हारे साथ?”
“मेले साथ नहीं …”
“तो?”
“वो भाभी के साथ पीछे से किया था”
“ओह … फिर?”
“तो भाभी को बहुत दल्द हुआ था वो तो जोल-जोल से रोने लगी थी। बहुत देल बाद उनका दल्द ठीक हुआ था।”
“पर सुहागरात तो पति-पत्नी मनाते हैं तुम्हें यह सब कैसे पता? क्या तुम्हारी भाभी ने बताया?”
“नहीं हमने छुपकल उनकी सुहागलात देखी थी।”
“हमने मतलब? तो क्या तुम्हारे साथ किसी और ने भी उनकी सुहागरात देखी थी?”
“हओ … ”
“और कौन था?”
“मेले साथ अ.. अंगूल दीदी भी थी हम दोनों ने देखी थी।”
“हम” मैंने एक लम्बी राहत की सांस ली। मुझे तो लगा था साले उस कालू ने कहीं गौरी को ही तो नहीं ठोक दिया था। शुक्र है ऐसा कुछ नहीं हुआ था। मेरी उत्सुकता बढती ही जा रही थी।
सुहागरात में ही अपनी पत्नी के साथ गुदा मैथुन की नौबत कैसे आ गई? समझ से परे था। सुहागरात में तो चूत ही बड़ी मिन्नतों के बाद मिलती है यहाँ तो उसने पहली ही रात में कैसेट को दोनों तरफ से बजा लिया था, भई … यह तो सरासर कमाल है।
गौरी प्लीज … पूरी बात विस्तार से बताओ ना? ऐसी क्या बात हो गई थी कि कालू ने पहली ही रात में अपनी पत्नी के साथ गुदा मैथुन करके उसके नितम्बों का मज़ा ले लिया?”
“वो … वो … मुझे शल्म आती है?” गौरी अब थोड़ी संयत तो हो चुकी थी। पर उसकी शर्म वाली आदत मुझे इस समय वाकई अच्छी नहीं लग रही थी।
“यार इसमें शर्म की क्या बात है? प्लीज बताओ ना? तुम्हें मेरी कसम?”
और फिर गौरी ने जो बताया वह मैं उसी की जबानी आप सभी को बता रहा हूँ …
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 31
गौरी ने जो बताया, वह मैं उसी की जबानी आप सभी को बता रहा हूँ:
प्रिय पाठको और पाठिकाओ! मैं माफ़ी चाहता हूँ आपको लग रहा होगा यह कथानक अपने मूल विषय से भटक रहा है और थोड़ा लंबा भी होते जा रहा है पर मुझे पूरा यकीन है इस देशी सुहागरात का किस्सा सुन और पढ़कर आप सभी मस्ती से झूम उठेंगे और आपको इसकी प्रासंगिकता का अंदाज़ा भी हो जाएगा। हालांकि यह किस्सा गौरी की जबानी है पर इसमें तोतली भाषा के स्थान पर साधारण शब्दों का प्रयोग किया गया है।
अथ श्री एक देशी सुहागरात सोपान प्रारंभ:
कमलेश भैया (घर का नाम कालू) की शादी नवम्बर माह में थी। गुलाबी सी ठण्ड थी। शादी बहुत अच्छे ढंग से हो गई थी और आज उनकी सुहागरात थी।
मैंने और अंगूर दीदी ने भाभी को खूब सजाया था। उनके जूड़े और बाजुओं पर मोगरे के गज़रे भी लगा दिए थे। नाक में नथ, कानों में सुन्दर झुमके, कलाइयों में कोहनियों तक लाल रंग की चूड़ियाँ, पैरों में पायल और अँगुलियों में बिछिया।
हाथों में मेहंदी और पैरों में महावर तो पहले से लगी थी हमने उनका खूब मेकअप भी किया था।
अंगूर दीदी ने उन्हें यह भी समझा दिया था कि हमारे भैया को ज्यादा तरसाना मत जल्दी से अपना खजाना उन्हें सौम्प देना वरना वो फिर सारी रात तुम्हारी हालत बिगाड़ देंगे।
भाभी लंबा घूंघट निकाल कर बैड पर बैठ गई थी। हमने कमरे में ट्यूब लाइट जला कर रोशनी कर दी थी। बैड के पास रखी छोटी टेबल पर एक थर्मोस में केशर और शिलाजीत मिला गर्म दूध, पानी की बोतल और मिठाइयां और पान की दो गिलोरी का इंतजाम करके रख दिया था।
अंगूर दीदी ने क्रीम की एक शीशी भी टेबल पर रख दी थी। लगता है अंगूर दीदी सुहागरात की पूरी एक्सपर्ट (विशेषज्ञ) बनी हुई थी।
हमने सुहागरात का कमरा (छत पर बना चौबारा) भी थोड़ा सजा दिया था। बैड पर नई सफ़ेद चादर बिछा दी थी और उस पर गुलाब की पत्तियाँ भी बिखेर दी थी।
मैंने गौर किया अंगूर दीदी वैसे तो हमेशा खिसियाई सी ही रहती है पर आज तो वह बहुत ही खुश नज़र आ रही थी। उन्होंने आज गहरे सुनहरी रंग का लाचा (भारी लहंगा, छोटी कुर्ती और चुन्नी वाला एक परिधान) पहन रखा था। कलाई में सोनाटा की घड़ी, हाथ में बढ़िया मोबाइल और ऊंची एड़ी की सैंडिल और कंधे पर लेडीज पर्श। इन कपड़ों में तो वह दुल्हन सी लग रही थी।
ऐसे ही कपड़े पहनने का मेरा भी कितना मन होता है आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं। मैंने तो मौसी और माँ-बाप दोनों के यहाँ अभाव ही देखे हैं। काश! मेरी शादी किसी अच्छे घर में हो जाए तो मैं भी अपनी इन दमित इच्छाओं को पूरा कर लूं।
ओह … मैं भी कई बार क्या-क्या ख्वाब देखने लग जाती हूँ।
बाहर जब भैया के कदमों की आहट सुनाई दी तो मैं और अंगूर दीदी सुहागरात वाले कमरे के दरवाजे पर आकर खड़े हो गई।
भैया ने बिना कुछ बोले हमें पांच सौ रुपये बाड़-रुकाई (एक रस्म का शगुन) के दिए तो हम लोगों ने उन्हें अन्दर जाने दिया।
भैया ने कुर्ता पाजामा पहना हुआ था और हाथ की कलाई पर एक गज़रा भी बांधा हुआ था। वे जल्दी से कमरे में घुस गए और अन्दर से दरवाजे की सिटकनी (कुण्डी) लगा ली।
अब वो दोनों आजाद पंक्षी थे बिना किसी खटके और डर के हुड़दंग मचा सकते थे। मैं नीचे जाने के लिए सीढ़ियों की ओर जाने लगी तो अंगूर दीदी ने मुझे इशारे से रुकने के लिए कहा। उसने सीढ़ियों पर लगे दरवाजे को अन्दर से बंद करके सांकल (कुण्डी) लगा दी और फिर मेरा हाथ पकड़कर चौबारे के पिछली ओर बनी खिड़की के पास ले आई।
उन्होंने अपनी एक अंगुली होंठों पर रखकर मुझे खामोश रहने का इशारा किया। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। अब वह खिड़की से कमरे के अन्दर झांकने लगी। यह कमरा पुराना बना हुआ था और खिड़की के दरवाजों के बीच में थोड़ा गैप सा था जिसकी झिर्री से अन्दर का नजारा देखा जा सकता था। बाहर तो घुप्प अन्धेरा था पर अन्दर पूरी रोशनी थी।
फिर अंगूर दीदी ने मुझे भी अन्दर देखने का इशारा किया। मैंने डरते-डरते पहले तो इधर उधर देखा और फिर खिड़की दरवाजों के बीच की झिर्री से अन्दर देखने की कोशिश की।
भाभी बैड के एक कोने में बैठी हुई थी। उसने अपना घूंघट दोनों हाथों से कसकर पकड़ रखा था। भैया उसके पास आकर बैठ गए और अपना हाथ बढ़ाकर उसका घूंघट उठाने की कोशिश करने लगे। पर भाभी ने अपना घूंघट नहीं उठाने दिया अलबत्ता उन्होंने अपना घूंघट और जोर से कस लिया।
दो-तीन कोशिशों के बाद जब बात नहीं बनी तो भैया ने उसके पैरों की पिंडलियों पर हाथ फिरना चालू कर दिया। अब भाभी ने एक हाथ से उनको परे हटाने की कोशिश की। फिर भैया ने दूसरे हाथ से घूंघट को थोड़ा सा हटाया तो भाभी के पीछे हटते हुए मुंह से मना करने के अंदाज़ में ऊं … ऊं … की आवाज निकली और उन्होंने अपनी कोहनी को ऊंचा करते हुए भैया का हाथ परे हटा दिया।
मेरी कुछ समझ नहीं आया कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? सुहागरात के बारे में मैंने ज्यादा तो नहीं पर थोड़ा बहुत सुना जरूर था कि इस रात को पति पत्नी पहली बार मिलते हैं और फिर पति अपनी पत्नी को कुछ गिफ्ट देकर उसका घूंघट उठता है और फिर दोनों आपस में शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं।
पर यहाँ तो मामला कुछ और ही लग रहा है। भाभी तो मरखने सांड की तरह भैया को हाथ ही नहीं लगाने दे रही।
फिर मैंने अंगूर दीदी से पूछने की कोशिश की। अंगूर दीदी ने मुझे फिर चुप रहकर देखने का इशारा किया और वह फिर से अन्दर झांकने लगी। अब मैंने भी फिर से अन्दर देखना शुरू कर दिया।
“हम्म … अच्छा तो यह बात है?” कहकर भैया ने अपने कुरते की जेब से बटुआ निकाला और उसमें से पांच सौ के दो नोट निकाल कर भाभी की ओर बढ़ाए।
भाभी ने पहले तो घूंघट के अन्दर से ही नोटों की ओर देखा और फिर वही ऊं … की आवाज निकाली।
फिर भैया ने वो पांच सौ वाले नोट वापस रख कर दो हज़ार का एक नोट निकाल कर भाभी की ओर बढ़ाया तो नोट पकड़ लिया और तकिये के पास रखे अपने लेडीज पर्स में रख लिया। अब भैया उसके पास आ गए और उसका घूंघट धीरे-धीरे खोलने लगे।
भाभी थोड़ा शर्मा रही थी।
“यार बबिता जानू! तु तो आज बड़ी मस्त लगेली है?” कह कर भैया ने भाभी के गालों पर हाथ फिराने की कोशिश की तो भाभी थोड़ा सा पीछे हट गई।
आपको भैया की बोली सुनकर हैरानी हो रही होगी। दरअसल 2-3 साल पुरानी बात है एकबार कमलेश भैया ने मोहल्ले के कुछ लड़कों के साथ मिलकर किसी के साथ मार-कुटाई कर दी थी और फिर पापा के डर के कारण वह मुंबई भाग गया था और फिर वहीं किसी अस्पताल में नौकरी कर ली और अब वहीं की भाषा बोलने लग गए।
“देख जानी, अपुन को पेली (पहली) रात में कोई लफड़ा नई माँगता। अब तो तेरे को मूँ दिखाई भी दे दियेला है। अब जास्ती नाटक नई करने का … क्या?”
और फिर भैया ने उसके गालों पर हाथ फिराया और फिर उसके मोटे-मोटे दुद्दुओं (सॉरी बोबे) को दबाने लगे।
अब भाभी ने ज्यादा नखरे नहीं किये। फिर भैया ने हाथ बढ़ा कर टेबल पर रखी मिठाई के डिब्बे से बर्फी का एक टुकड़ा उठाया और भाभी के मुंह की ओर बढ़ाया।
“देख बे चिकनी! इसे पूरा मत खा जाना। इसी तरह मुंह में दबा के इच रखने का। अपुन बी तेरे साथ खाएंगा।”
भाभी ने अपने होंठों और दांतों के बीच बर्फी का टुकड़ा दबा लिया और भैया ने अपना मुंह उसके होंठों में दबी बर्फी पर लगा कर पहले तो आधा टुकड़ा अपने मुंह में डाला और बाद में भाभी के होंठों को अपने होंठों में दबा लिया।
भाभी तो गूं … गूं करती ही रह गई।
“जिओ मेरे राजा भैया! वाह … क्या शुरुआत की है.” अचानक अंगूर दीदी की धीमी पर रोमांच भरी आवाज सुनकर मैं चौंकी।
अब तो भैया ने भाभी को अपनी बांहों में भर लिया और एक हाथ उसके सिर के पीछे करके उसके होंठों, गालों और गले पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। दूसरे हाथ से उसके बोबे दबाने लगे। भाभी थोड़ा कसमसा जरूर रही थी पर लगता है उसे भी मज़ा आ रहा था।
फिर भैया ने पहले तो अपना हाथ उसके नितम्बों पर फिराया और फिर उसकी साड़ी को ऊपर उठाने की कोशिश करने लगे।
“ऊँहू … किच्च … ” भाभी ने उनका हाथ पकड़ कर रोकने की कोशिश की।
“देख जानी! तेरे को मूँ दिखाई तो पेले इच दे दी है अब नखरे काये को?”
“इसकी मुंह दिखाई कहाँ दी है?” भाभी ने नीचे की ओर इशारा करते हुए कहा।
“ओह … चल कोई बात नहीं तू भी क्या याद रखेगी?” कहकर भैया ने जेब से पांच सौ का एक नोट निकाल कर भाभी के ओर बढाया।
“किच्च …” भाभी ने ना में सिर हिलाते हुए मुंह से आवाज निकाली।
“अच्छा … एक काम कर! में (मैं) नोट फर्श पर रखेला हे लेकिन इनको अपने हाथ से नई उठाने का?” भैया ने अपने बटुए से नोट निकालते हुए कहा।
भाभी ने आश्चर्य से भैया की ओर देखा तो भैया बोले “इनको तु अपनी चिकनी की फांकों से उठा सकती है तो उठा ले में (मैं) पांच सौ के नोट मोड़ कर आडे खड़े करके रखता है? तेरे पास बस पांच मिनट का टैम (टाइम) रहेंगा.”
फिर भैया ने कुछ नोट आधे मोड़कर (अंग्रेजी के उलटे V के आकार में) फर्श पर रख दिए।
“आप अपना मुंह उधर कर लो, मुझे शर्म आ रही है.” भाभी ने शर्माते हुए कहा।
“अपुन को ऐड़ा (बेवकूफ) समझा क्या? तुम चीटिंग किया तो?”
“किच्च”
“यार अब तेरे को नोट लेने का हो तो उठा ले नई तो कोई बात नहीं.”
भाभी असमंजस में थी पर मन में थोड़ा लालच भी था तो उन्होंने बेड से नीचे उतरकर पहले तो अपनी साड़ी को जाँघों तक ऊपर उठाया और फिर अन्दर दोनों हाथ डालकर अपनी पेंटी खींचकर बाहर निकाल कर बेड पर रख दी। भैया ने वह काली पेंटी झट से लपक ली और अपनी नाक से लगा कर सूंघने लगे।
“छी …” मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी भला किसी की पेंटी सूंघने में क्या मज़ा आता होगा?
मैंने अंगूर दीदी से पूछा तो वह फुसफुसाते हुए बोली- तुम भी निरी पूपड़ी ही है … जवान बीवी की पेंटी से उसकी जवानी की खुश्बू सूंघकर आदमी मतवाला हो जाता है और फिर वह दुगने जोश के साथ उसकी खूब चुदाई करता है।
मैं सोच रही थी अंगूर दीदी भी कितना गन्दा बोलने लगी है।
अब भाभी ने झिझकते हुए अपनी साड़ी को थोड़ा और ऊपर उठाया और फिर भैया से बोली- मुझे शर्म आ रही है … आप थोड़ा सा मुंह उधर कर लो मैं चीटिंग नहीं करुँगी.
“चल आज की रात तेरे को माफ़ किया … में मूँ फेरता है लेकिन चीटिंग नई करने का?”
फिर भैया ने अपनी मुंडी दूसरे तरफ कर ली और भाभी ने अपनी साड़ी को पेट तक ऊपर उठा लिया। मोटी-मोटी गदराई हुई जाँघों के ठीक बीच में उनकी बुर तो काले लम्बे झांटों से पूरी तरह ढकी हुई थी। बीच में थोड़ा काले और कत्थई से रंग का गहरा चीरा दिखाई दे रहा था और चीरे के बीच में सिकुड़ी हुई सी दो मोटी-मोटी पत्तियाँ (लीबिया)।
मुझे आश्चर्य हो रहा था भाभी ने अपनी झांटें क्यों नहीं काटी? शादी के समय तो दुल्हन अपने हाथों और पैरों के भी बाल हटवाती हैं तो भाभी ने ये बाल क्यों साफ़ नहीं करवाए।
इस बाबत अंगूर दीदी से पूछा तो उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ के रिवाज के अनुसार सगाई होने के बाद लड़कियां अपनी बुर के बाल नहीं काटती हैं और सुहागरात मनाने के बाद उनका पति दूसरे दिन उनकी बुर के बालों को अपने हाथों से साफ़ करता है। मान्यता है कि ऐसा करने से दोनों पति पत्नी का प्रेम बढ़ता है और दाम्पत्य जीवन लंबा और मधुर बनाता है।
“क्या आपके भी बाल जीजू ने ही साफ़ किये थे?” मैंने पूछा तो दीदी गुस्सा हो गई और बोली- चुप कर हरामजादी!
पता नहीं दीदी इतना गुस्सा क्यों हो रही थी?
हम दोनों फिर से अन्दर का नजारा देखने लगी।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 32
भाभी धीरे-धीरे अपने भारी और मोटे नितम्बों को नीचे करने लगी और अपनी बुर की फांकों को अँगुलियों से चौड़ा किया। अन्दर से लाल चीरा ऐसा लग रहा था जैसे किसी तरबूज की गिरी हो। फिर एक नोट को अपनी बुर की फांकों के बीच में करते हुए उठाने की कोशिश की पर नोट नीचे गिर गया।
भाभी पहले तो भैया की ओर देखा और चुपके से नोट को फिर से आड़ा खड़ा कर दिया। दूसरे प्रयास में उन्होंने एक नोट उठा लिया। अब भाभी दूसरा नोट उठाने में लगी थी।
इतने में भैया ने चुपके से मुड़कर भाभी की ओर देखना शुरू कर दिया। उनका पायजामा पेशाब करने वाली जगह से उभरा हुआ सा लग रहा था। और वह अपने लंड को पायजामे के ऊपर से ही जोर-जोर से दबा रहे थे और अपने होंठों पर जीभ फिरा रहे थे।
भाभी ने अब तक 3 नोट उठा लिए थे और चौथे नोट को उठाने में लगी थी।
“कोई चीटिंग तो नई किएला ना?”
अचानक भैया कि आवाज सुनकर और उन्हें अपनी ओर देखता पाकर भाभी हड़बड़ा सी गई और चौथा नोट नीचे गिर गया।
“चीटिंग आपने की है मैंने नहीं! आप इधर नहीं देखते तो मैं यह नोट भी उठा लेती.” भाभी ने कहकर उस नोट को भी उठा लिया और झट से खड़ी हो गई।
उनकी साड़ी और लहंगा नीचे आ गिरा।
अब भैया उनके पास आ गए और उनको बांहों में भरकर बैड पर ले आये। अब दोनों बैड पर बैठ गए।
“जान अब अपुन का दिल तेरी छमिया को प्यार करने का होने लगेला है। अब अपुन से रुका नई जाएंगा।”
कहकर भैया ने अपना कुर्ता और पायजामा उतार फेंका। उन्होंने जांघिया तो पहना ही नहीं था। उसका काले रंग का कोई 7-8 इंच का लंड फनफनाकर हिलने लगा। भैया ने उसे अपने हाथ में पकड़ लिया और उस पर हाथ फिराते हुए उसे हिलाने लगे। उसका सुपारा तो ट्यूब लाईट की रोशनी में ऐसे चमक रहा था जैसे किसी सांप का फन हो।
अंगूर दीदी के मुंह से अचानक निकला- वाह … मेरे राजा भैया क्या हथियार है! यह साली तो इसे पूरा का पूरा खाकर मस्त हो जायेगी.
मैंने आश्चर्य से दीदी की ओर देखा।
उनके गुलाबी रंगत वाले चहरे पर बहुत बड़ी ख़ुशी की लहर सी दौड़ने लगी थी। अंगूर दीदी सिसकारियाँ सी लेने लगी थी उनका एक हाथ लाचा के लहंगे के अन्दर था। मुझे लगा वह भी अपनी सु-सु को मसलने लगी हैं।
उधर भाभी बार-बार कनखियों से भैया के लंड को ही देखे जा रही थी। उनकी आँखों में ऐसी चमक सी आ गई थी जैसे किसी मोटे से चूहे को देखकर बिल्ली की आँखों में आ जाती है।
भैया अपने खड़े लंड को मसलते और हिलाते जा रहे थे। फिर अपने घुटनों के बल होकर भाभी की ओर सरक कर आ गए और बोले- क्यों है ना टनाटन?
भाभी ने नाक चढ़ाकर मुंह सा बनाया। अलबत्ता उनकी निगाहें तो लंड पर से हट ही नहीं रही थी।
“मेरी जान … ये देख कितना तड़फेला हे तेरी छमिया के लिए … इसे हाथ में लेके तो देख?”
भैया ने अपना लंड भाभी के मुंह के सामने कर दिया।
भाभी ने उसे हाथ में तो नहीं पकड़ा लेकिन वह बिना पलक झपकाए उसे देखती ही रही।
“साली अभी कितने नखरे दिखा रही है बाद में तो हाथ में तो क्या पूरा का पूरा अपनी गांड में भी ले लेगी.” अंगूर दीदी ने आह भरते हुए बोली- आह … कितना शानदार लंड है। हाय … इतना लंबा और मोटा तो प्रेम का था।
“कौन प्रेम?” मैंने आश्चर्य से दीदी की ओर देखते हुए पूछा।
“चुप कर हरामजादी … कब से बेकार पटर-पटर किये जा रही है।” अंगूर दीदी ने मुझे जोर से डांट दिया।
मैं अपना सा मुंह लेकर रह गई।
और फिर भैया ने भाभी की साड़ी उतारनी शुरू कर दी। भाभी ने ज्यादा ना-नुकुर नहीं की। फिर उन्होंने उनका ब्लाउज भी उतार दिया अब तो भाभी के शरीर पर सिर्फ पेटीकोट और काले रंग की ब्रा ही बचे थे।
भैया ने ब्रा के भी हुक खोल कर दोनों उरोजों को आजाद कर दिया। छोटे नारियल जैसी साइज के थोड़े लम्बूतरे से मोटे-मोटे उरोजों के ऊपर काले से रंग का अरोला और बीच में जामुन जैसे चूचुक। उरोजों का रंग शरीर के अन्य अंगों के बजाय थोड़ा गेहूंआ सा था।
अब भैया ने उसका पेटीकोट उतारने की कोशिश की तो भाभी बोली- ना … इसे मत उतारो मुझे शर्म आती है पहले लाईट बंद करो.
“हट साली! अपुन को ऐड़ा समझा क्या? आज की रात कोई शर्म नई करने का … क्या?”
“ओह … पर धीरे करना … इतना मोटा और लंबा इतने छोटे से छेद में कैसे जाएगा? मुझे बहुत डर लग रहा है।” भाभी शायद बहुत डर रही थी।
भैया ने अपने लंड को नीचे जड़ की तरफ से अपनी मुट्ठी में पकड़ रखा था और अभी भी उनका लंड 4-5 इंच उनकी अँगुलियों के बाहर तक निकला हुआ था और उसकी ऊपर गोल मोटा काले रंग का सुपारा नज़र आ रहा था ऐसा लगता था जैसे कोई काले रंग का मोटा सा बैंगन हो या खीरा।
कई बार मैंने लड़कों को पेशाब करते समय उनकी लुल्लियाँ देखी थी पर इतना बड़ा और मोटा लंड तो मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था। मैंने एक दो बार मौसा और मौसी को चुदाई करते और लंड चूसते हुए भी देखा तो था पर उनका भी इतना बड़ा तो नहीं था।
मैंने अपनी कुछ सहेलियों से सुना जरूर था कि कुंवारी लड़कियां मोटे और लम्बे लंड की कामना करती रहती हैं।
“देखो साली कितने नाटक कर रही है? थोड़ी देर बाद देखना उछल-उछल कर चुदवाएगी.” अंगूर दीदी की आवाज सुनकर मैं चौंकी।
“अंगूर दीदी, सच में इतना मोटा इसकी सु-सु में चला जाएगा क्या?” मैंने डरते डरते पूछा।
मुझे लगा अंगूर दीदी मुझे फिर डांट देगी।
दीदी ने मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोली- अरे मेरी भोली बन्नो, तू इस चूत रानी की महिमा नहीं जानती। लंड चाहे जितना मोटा और लंबा हो अगर मस्ती में आ जाये तो ये गधे और बुलडॉग का भी घोंट जाती है।
अब भाभी बैड पर लेट गई। भैया उसके बगल में आ गए और उसके पेटीकोट को ऊपर कर दिया। फिर उन्होंने पहले तो उनकी मोटी-मोटी जाँघों पर हाथ फिराया और फिर उसकी बुर को सहलाने लगे।
भाभी आह … ऊंह … करने लगी थी।
“यार तू तो अख्खा आइटम लगेली है? बहुत मस्त है तेरी पूपड़ी (बुर) तो! अपुन को ऐसी इच मांगता था।”
अब भैया ने भाभी की बुर की फांकों को अपने हाथों की चिमटी में पकड़ कर खोल दिया। अन्दर ला रंग का चीरा अब साफ़ नज़र आने लगा था। भैया ने एक चुम्बन उस चीरे ऊपर लिया और फिर अपनी जीभ को अपने होंठों पर फिराने लगे।
छी … मुझे बड़ा अजीब सा लगा कोई सु-सु को कैसे चूम सकता है। मैंने डरते डरते अंगूर दीदी की ओर देखा।
वह तो अन्दर का नजारा देखने में इतनी मस्त हो रही थी कि उनके मुंह से सीत्कार सी निकलने लगी थी और उनका हाथ लहंगे के अन्दर जोर-जोर से चलने लगा था।
“चल अब एक बार पलट के बी दिखा तेरी गूपड़ी (पिछवाड़ा-गांड और नितम्ब) बड़ी मस्त लगेली है।”
भाभी डरते-डरते अपने पेट के बल हो गई। उनके मोटे-मोटे नितम्ब ट्यूब लाईट की दूधिया रोशनी में ऐसे लग रहे थे जैसे कोई दो मोटे-मोटे तरबूज एक साथ रख दिए हों। भैया ने उन पर बारी-बारी से एक-एक थप्पड़ लगाया और फिर उन पर एक चुम्बन ले लिया।
फिर उन्होंने उन दोनों नितम्बों को अपने हाथों से पहले तो दबाया और थोड़ा खोलकर उसके बीच का छेद देखने लगे।
और फिर उन्होंने उस छेद पर भी एक चुम्बन ले लिया।
“हट! क्या कर रहे हो?” कहकर भाभी अचानक पलट कर फिर से सीधी हो गई।
“यार कसम चमेली जान की तेरा पिछवाड़ा तो बड़ा इच मस्त है.” कहकर भैया हंस पड़े।
भाभी तो बेचारी शर्मा ही गई।
“हाय … मेरे राजा भैया! पीछे से भी ठोक दे साली को ताकि दो दिन ठीक से चल ही ना पाए.” अंगूर दीदी ने अपनी तरफ से नया गुरु मंत्र दिया हो जैसे।
अब भैया मेरी नयी नवेली भाभी की टांगों के बीच आ गए तो भाभी ने अपनी जांघें थोड़ी खोल दी।
भैया ने अपने पास पड़ी शीशी उठाई और उसमें से क्रीम निकालकर अपने हथियार पर लगाया। उनका लंड तो हाथ में ही उछलकूद मचा रहा था जैसे कोई अड़ियल घोड़ा हिनहिना रहा हो।
भाभी ने एकबार तसल्ली से उसकी ओर देखा और फिर अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर रख लिए। लगता है उम्हें शर्म आ रही थी।
“ए क्या बोलती … मैच शुरू करें क्या?”
“ऊं … ” भाभी के मुंह से हलकी सी आवाज आई- मुझे बहुत डर लग रहा है प्लीज धीरे करना!
“फिकर नई करने का अपुन इस मामले में पूरा एक्सपर्ट खिलाड़ी है।”
अब भैया ने थोड़ी सी क्रीम भाभी की बुर के चीरे और फांकों पर भी लगा दी और फिर एक हाथ के अंगूठे और तर्जनी अंगुली से उसकी फांकों को चौड़ा किया और फिर अपने खड़े लंड का सुपारा उसके छेद पर लगा दिया और भाभी के ऊपर आ गए।
उन्होंने अपने पैर भाभी की जाँघों के दोनों ओर करके कस से लिए और एक हाथ भाभी की गर्दन के नीचे लगा लिया। और फिर उन्होंने एक जोर का धक्का लगाया। उसके साथ ही भाभी की एक चीख पूरे कमरे में गूँज उठी- “ओ … माँ … मर गई … ओह धीरे … मेरी चूत फट जायेगी.
भाभी अपने पैर पटकने लगी थी और अपने हाथों से भैया को परे धकलने की कोशिश सी करने लगी थी। पर इन बातों का भैया पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने 2-3 धक्के और लगा दिए।
“वाह … जिओ मेरे राजा भैया क्या सटीक (परफेक्ट) निशाने के साथ सही एंट्री मारी है। साली के सारे कस बल निकाल दो आज।” अंगूर दीदी पता नहीं क्या बड़बड़ाते जा रही थी।
मेरी तो जैसे साँसें ही अटक सी गयी थी। मुझे लगा मेरे शरीर में भी कुछ सनसनी सी दौड़ने लगी है और मेरी सु-सु में भी सुरसराहट सी होने लगी है। मेरे कानों में सांय-सांय होने लगी थी और गला तो जैसे सूखने ही लगा था।
उधर भाभी कमरे के अन्दर अभी भी ‘आ … आई … मर गइईईई … ’ कर रही थी।
“बस मेरी छमिया अपना हीरो तेरे घर में चला गया है अब कोई ज्यास्ती फिकर की बात नहीं.” कहकर भैया ने उसके गालों और होंठों पर पर चुम्बन लेने शुरू कर दिए।
“देखा ना साली किस तरह नाटक कर रही थी … दर्द होगा? बहुत बड़ा है? कैसे जाएगा? मेरी तो फट जायेगी?” इतनी देर बार अंगूर दीदी के मुंह से निकला।
हमें भाभी की बुर और उसमें धंसा लंड तो दिखाई नहीं दे रहा था पर मेरा अंदाज़ा है पूरा का पूरा लंड अन्दर गर्भाशय तक चला गया है। थोड़ी देर दोनों ऐसे ही पड़े रहे।
“ओह … बहुत दर्द हो रहा है … कोई इतना जोर से पहली बार डालता है क्या? तुम तो कहते थे बड़ा अनुभव है? मार ही डाला मुझे!” भाभी ने उलाहना सा दिया।
“मेरी बुलबुल पेली बार में थोड़ा दर्द तो होता इच है अब देखना तेरे को बी कित्ता मज़ा आयेंगा?” कहकर भैया ने दनादन धक्के लगाने शुरू कर दिए।
अब तो भाभी ने अपने दोनों हाथ भैया की पीठ पर कस लिए और अपने टांगें भी और ज्यादा फैला दी।
“बोल … मेरी चिकनी अब मज़ा आएला हे के नई?” भैया ने उसके होंठों को चूमते हए धक्के लगाने शुरू कर दिए।
“आह … साथ में बहुत दर्द भी हो रहा है … ” भाभी ने अपनी आँखें बंद कर ली थी।
“साली छिनाल है एक नंबर की। पहले कितने नखरे कर रही थी अब देखो कैसे मज़े ले लेकर चुदवा रही है.” अंगूर दीदी अपनी धुन में अपनी सु-सु को सहलाती जा रही थी और साथ में धीमे-धीमे बड़बड़ाती भी जा रही थी।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 33
भाभी ने अपने दोनों हाथ भैया की पीठ पर कस लिए और अपने टांगें भी और ज्यादा फैला दी। भैया ने उसके होंठों को चूमते हए धक्के लगाने शुरू कर दिए। भाभी ने अपनी आँखें बंद कर ली थी।
“साली छिनाल है एक नंबर की। पहले कितने नखरे कर रही थी अब देखो कैसे मज़े ले लेकर चुदवा रही है.” अंगूर दीदी अपनी धुन में अपनी सु-सु को सहलाती जा रही थी और साथ में धीमे-धीमे बड़बड़ाती भी जा रही थी। Click to expand… मैंने ध्यान दिया भैया जब भी जोर का धक्का लगाते तो फिच्च की सी आवाज आती और उसके साथ ही भाभी की एक मीठी आह सी निकलती। थोड़ी देर इसी प्रकार धक्कमपेल करने के बाद भैया थोड़े से ऊपर उठ गए और अपने लंड को भाभी की चूत से बाहर निकालने लगे।
“क्या हुआ?” भाभी ने उनकी कमर पकड़ कर नितम्बों को अपने ओर दबाते हुए पूछा।
“एक मिनट रुक.” कहकर भैया ने अपना लंड बाहर निकाल लिया। भाभी तो उनको रोकती ही रह गई।
फिर उन्होंने अपने लंड की ओर गौर से देखा। लंड पर हल्का चिपचिपा सा लेप लगा था। अब उन्होंने भाभी की बुर की ओर ध्यान से देखा। भाभी ने अपनी बुर पर हाथ रख लिया शायद उन्हें शर्म आ रही थी।
“ओह क्या हुआ? रुक क्यों गए?” भाभी ने पूछा।
“अपुन एक बात सोचेला हे?”
“क … क्या?” भाभी ने घबराते हुए पूछा।
“ये साला तेरी चूत से खून तो निकला इच नहीं? क्या चक्कर पड़ेला … बाप?”
“म … मुझे क्या पता?” भाभी की तो जैसे हवा ही खराब हो गई थी। उनके चहरे पर जैसे हवाइयां सी उड़ने लगी थी।
“अपुन को ऐड़ा समझा क्या? जरूर कोई ना कोई लोचा होएंगा? सच्ची बोल पेले से सील टूटेली थी ना?”
भाभी उठकर बैठ गई। वह कुछ नहीं बोली और उन्होंने अपनी मुंडी झुका ली।
“अब चुप काएको होएली है जल्दी जवाब दे नई तो अपुन का भेजा सटक जायेंगा?” भैया ने थोड़ा कड़क लहजे में पूछा।
“मुझे माफ़ कर दो … गलती हो गई थी.” भाभी की आवाज ऐसे काँप सी रही थी जैसे अभी रोने लगेगी।
“साला अपुन पेले इच सोचेला था इतना कटीला आइटम अभी तक खालिश केसे रह गएला?”
“किसके साथ किएला था?”
“वो … वो … हमारे पड़ोस में?”
“कौन था?”
“मेरी एक सहेली के भाई ने एक बार मेरे साथ जबरदस्ती किया था तो सील टूर गई।” और फिर सच में भाभी की आँखों से आंसू निकलने लगे थे।
“एक बात और बता?”
भाभी ने प्रश्नवाचक निगाहों से भैया की ओर देखा।
“वो तेरा पिछवाड़े का गेम तो नई बजाया ना?”
“किच्च” भाभी ने कातर नज़रों से भैया की ओर देखा और फिर मरियल सी आवाज में बोली- सच्ची बोलती उसमें कभी नहीं करवाया।
“हम्म …”
“प्लीज मुझे माफ़ कर दो … मैं आपके पैर पकड़ती हूँ.” भाभी ने रोते-रोते फिर मिन्नत की।
“हम्म …” भैया कुछ सोचने लगे थे।
थोड़ी देर बाद भैया बोले- देख मेरी पपोटी … अब सील तो दुबारा जुड़ नई सकेला अब तो बस एक इच इलाज़ हो सकता है?
“क्या?” भाभी ने आशा भरी नज़रों से भैया की ओर देखा।
“देख अपुन अब तेरी गूपड़ी (पिछवाड़ा) की सील तोड़कर मन को तसल्ली दे लेंगा। बोल तेरे को मंजूर?”
“ओह … पर उसमें तो बहुत दर्द होता है?”
“अब दर्द होएंगा के नई होएंगा अपुन नई जानता, तेरे को शर्त मंजूर हो तो बोल नई तो तेरे को अभी इच तेरे बाप के घर भेज देंगा।”
“ओह …” कह कर भाभी कुछ सोचने लगी।
उनकी हालत तो इस प्रकार हो रही थी जैसे बिना आर.सी. के उनका भारी रकम का चालान काट दिया हो जिसकी भरपाई अब उनके लिए कतई संभव नहीं थी।
थोड़ी देर बाद भाभी के मुंह से मरियल सी आवाज निकली- ठीक है.
“अपुन का एक और शर्त है?”
“अ … और क … क्या?” भाभी ने सकपकाते हुए पूछा।
“वो प्रीति है ना? तुम्हारी छोटी बहन?”
“हओ?”
“अपुन का दिल उस पर आ गएला है। अपुन की शादी वाले दिन उसने गज़ब का डांस किएला था। कित्ता मस्त कमर और पिछवाड़ा है साली का। अपुन उसी दिन सोच लिएला था कि इसका बी एकबार गेम जरूर बजाने का।”
“पर वो इसके लिए कैसे मानेगी?”
“ये … इच तो अपुन बोलता है … उसको मनाने का जिम्मा तेरा!”
“वो … वो … ” भाभी कुछ बोल ही नहीं पा रही थी।
शायद वह सोच रही थी किसी तरह यह मामला हाल फिलहाल यहीं सुलझ जाए और घरवालों तक बात ना पहुंचे तो ठीक है।
“तू बोलेंगी तो वो नक्की मान जायेंगी.”
“ठीक है मैं कोशिश करुँगी.” कहकर भाभी ने फिर से अपना सिर झुका लिया। वह कुछ सोचे जा रही थी।
अब दीदी ने मेरी ओर देखकर फुसफुसाते हुए ग़मगीन लहजे में बोली- साली ने सारा मज़ा किरकिरा ही कर दिया। पता नहीं कहाँ-कहाँ ठुकवा कर आई है।
“दीदी एक बात पूछूं?” मैंने डरते डरते कहा।
“हाँ बोल?”
“पहली बार में सील टूटने पर सबको खून निकलता है क्या?”
“हाँ अगर शादी होने तक कुंवारी है तभी निकलता है। अगर सुहागरात को बिना खून खराबे (रक्तपात) के युद्ध समाप्त हो जाता है तो…. समझ लेना चाहिये कि ये देश पहले से ही आजाद हो चुका है।” कहकर अंगूर दीदी हंसने लगी।
मेरी प्रबल इच्छा हो रही थी अंगूर दीदी से उसकी सुहागरात के बारे में पूछूं पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी।
फिर मैंने डरते-डरते पूछा- दीदी, आपको तो पहली रात में बहुत खून निकला होगा?
“चुप! तू मार खाएगी अब!” कहकर दीदी फिर हंसने लगी थी और फिर एक आह सी भरते हुए उदास हो गई।
पता नहीं क्या बात थी।
अब हमने फिर से कमरे के अन्दर झाँका।
“चल मेरी रानी अब थोड़ा पलट जा … अपने पीओके का नजारा बी दिखा दे.”
“प्लीज मुझे बहुत डर लग रहा है … इसमें करने से बहुत दर्द होता है. आज-आज रहने दो इसमें कल कर लेना.” भाभी ने फिर मिन्नत की।
“ना … धारा 370 तो आज ही हटाने को माँगता.”
“ओह … मैं तो मर ही जाऊंगी. इसमें बहुत दर्द होता है.”
“देख … ग़ालिब चचा ने बी बोला हे गांड मरवाने से कोई नई मरता ग़ालिब, बस चलने का अंदाज़ बदल जाता है.”
“मैं वही तो बोल रही हूँ मेरे से तो दर्द के मारे चला ही नहीं जाएगा.”
“तेरे को कैसे मालूम कि इसमें बहुत दर्द होएंगा? बोल?”
“वो … वो.. हमारे पड़ोस में मेरी एक सहेली के पति ने एक बार उसके साथ पीछे से किया था.”
“तो? क्या वो मर गई थी?”
“उसने बताया कि उसे बहुत दर्द हुआ था और फिर 2-3 दिन उससे तो चला ही नहीं गया था।”
“वो कोई फत्तू (अनाड़ी) रहा होएंगा अपुन इस मामले में पूरा एक्सपर्ट है।”
“क … कैसे?”
“अपुन इधर था तब बी दो-तीन छोकरे लोग की गांड मारेला था और एक आंटी की बी पूपड़ी और गूपड़ी दोनों तसल्ली से बजाएला था और फिर मुंबई में बी एक चिकनी का आगे और पीछे से कई बार अपुन का गेम बजायेला है।”
“मुंबई में कौन थी?”
“वो हमारी चाल के पास में रेहती थी। वो रोज अपुन की ओर देखकर इशारे किया करती थी। एक दिन उसका बाथरूम का वाटर टैंक खराब था तो अपुन को ठीक करने को बुलाया था। जब टैंक ठीक हो गया तो उसने नल चलाकर चेक किया। गलती से शॉवर चालू हो गया तो मेरे और उस चिकनी के कपड़े भीग गए। फिर वो चिकनी बोली तेरे तो कपड़े भीग गए तू नहा ले। अपुन नहाने लगा तो अपुन का सिकंदर खड़ा हो गया। वो चिकनी उधर इच खड़ी होके अपुन को देखेली थी। वो बोली तेरा हथियार तो बहुत बड़ा लगता है रे, तेरी बीवी तो मस्त हो जायेंगी। ऐसा करके बोली और फिर उसने अपुन के सिकंदर को हाथ में पकड़ लिया.”
इतना कहकर भैया रुक गए। अब तो उनका सिकंदर जोर-जोर से उछलकूद मचाने लगा था।
“फिर क्या हुआ?” भाभी ने पूछा।
“अरे … होने को क्या था वहीं इच साली का गेम बजा डाला। बाप … क्या मस्त पूपड़ी थी अपुन को भोत मज़ा आया। उसने खुश होकर अपुन को पहनने को नए कपड़े दिए, एक हज़ार रुपया बी दिया और नाश्ता बी करवाया.”
“और … वो … पीछे से कब किया?”
“हा … हा … उसके बाद उस चिकनी को कई बार और बजाया। एक दिन अपुन उससे बोला तेरा पिछवाड़ा बड़ा मस्त लगेला है। अपना इसमें करने का मन होएला है तो वो बोली इसमें बड़ा दर्द होता है मेरे राजा तू आगे ही कर लिया कर। अपुन ने आगे करने से मना कर दिया तब वो चिकनी पीछे से करवाने को राजी हुई। उसने पेले तो उसने अपुन का जी भर के चूसा और फिर सिकंदर का खूब तेल मालिश किया और अपनी गूपड़ी (गांड) में बी क्रीम और तेल लगाया। फिर अपुन ने उसको मोरनी बना के उसका पिछवाड़ा बजाया। उसको पेले तो थोड़ा दर्द तो हुआ पर बाद में उसे बी बहोत मज़ा आया।”
“तो फिर उसी के पास रह जाते यहाँ क्यों आये?” भाभी थोड़ा नाराज़ सी होकर बोली।
“अरे मेरी जान फिर तू मेरे को केसे मिलती? सच में तू बहुत खूबसूरत है। पेली बार देखते इच अपुन का दिल तेरे पे आ गयेला था।”
भाभी गुमसुम हुई पता नहीं किन ख्यालों में डूबी थी। पर मैं जरूर यह सोच रही थी इस समाज में पुरुष और स्त्री के लिए अलग-अलग मानदंड क्यों बनाए हुए हैं? पुरुष अपनी मर्जी के अनुसार शादी से पहले और शादी के बाद भी किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है पर स्त्री अगर गलती से या अनजाने में भी किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना ले तो सारा दोष स्त्री पर ही क्यों आता है?
“ए स्याणी अब ज्यास्ती सोचने का नई जल्दी फेसला करने का … क्या?”
“ओह … पर आराम से तो करोगे ना? मुझे बड़ा डर लग रहा है.” भाभी ने सच में डरते हुए मिन्नत की।
“तेरे को बोला ना … अपुन इस मामले का एक्सपर्ट है … और आज तक कोई बी चूत और गांड मरवाने से नहीं मरा। में तेरे को प्रॉमिस देता आराम से करेगा बस …”
“वो … वो … क्रीम और तेल लगा लेना प्लीज …”
“फिकर नई करने का अपुन सब देख लेंगा … बस अब तू पलट जा.”
वाह … जिओ मेरे राजा भैया … साली को बिना तेल लगाए ही पेल दे बड़े नखरे दिखा रही है.” अंगूर दीदी ने बड़ी देर के बाद चुप्पी तोड़ी।
सच में मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई अपनी पत्नी के साथ इस प्रकार पीछे से भी करता है क्या!
बचपन में लड़कों के बारे में तो जरूर सुना था कि लड़के आपस में कई बार एक दूसरे की गांड मार लेते हैं पर मेरे लिए पति-पत्नी द्वारा किया जाने वाला यह काम नितांत नया और विस्मित करने वाला था।
मेरा मन अंगूर दीदी से पूछने का हो रहा था कि कभी जीजू ने उनके साथ इस प्रकार किया है क्या? पर मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी। मैंने बात नोटिस की है कि जब भी जीजू का जिक्र आता है अंगूर दीदी को बिलकुल अच्छा नहीं लगता और वह गुस्सा हो जाती है। पता नहीं क्यों?
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भाग 34
“उईई … मुझे गुदगुदी हो रही है.” भाभी ने अपने नितम्ब भींचते हुए कहा।
शायद भैया ने गांड के छेद में अपनी अपनी अंगुली को गोल-गोल घुमाने लगे। भाभी आह … ऊंह करती रही।
फिर उन्होंने अपनी अंगुली भाभी की गांड से निकाल ली और उसके नितम्बों को चौड़ा करके गौर से देखने लगे। शायद वह उसकी गांड का छेद देख रहे थे।
इतनी दूर से हमें भाभी की गांड का छेद तो नज़र नहीं आ रहा था पर भैया के चेहरे पर आई मुस्कान देखकर लगता है उन्हें वह छेद जरूर पसंद आ गया था।
“वाह … मेरी पपोटी क्या मस्त गांड है तेरी। चल अब मेरे शेर का गृहप्रवेश करवा देते हैं.”
भाभी ने बिना कुछ बोले घुटनों के बल होकर अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए। भैया ने उसके नितम्बों को थोड़ा और खोल दिया। हालांकि इतनी दूर से गांड का छेद साफ़ तो नहीं दिख रहा था पर सांवले से छेद का अंदाज़ा तो हो ही रहा था।
भैया ने भाभी के नितम्बों पर थपकी सी लगाई जैसे घुड़सवारी करने से पहले घोड़ी को थपथपाया जाता है।
अब भैया उसके पीछे आ गए और भाभी को अपने नितम्बों को अपने हाथों से थोड़ा चौड़ा करने को कहा। भाभी ने अपना सिर तकिये पर रख लिया और अपने दोनों हाथों को पीछे करके अपने नितम्बों को और खोल दिया।
अब भैया ने अपने सिकंदर पर एक बार फिर से हाथ फिराया और भाभी की गांड के छेद पर अपना सुपारा लगा दिया। भाभी मन ही मन कुछ बुदबुदा सी रही थी। शायद डर के मारे हनुमान चालीसा पढ़ने लगी थी।
“प्लीज … धीरे करना!”
“बस तू अपनी गूपड़ी को ढीला छोड़ने का … बाकि काम में अपने आप कर देगा।”
अब भैया ने अपना निशाना साधकर दोनों हाथों से भाभी की कमर को कसकर पकड़ लिया। और फिर एक जोर का धक्का लगाया।
धक्का इतना जबरदस्त था कि एक ही झटके में सुपारे सहित आधा लंड भाभी की गांड में बिना किसी रोक टोक के घुस गया … और उसके साथ ही भाभी की दर्द भरी एक चीख पूरे कमरे में गूँज गई- मर गईई … अबे साले … मादरचोद … मार डाला रे … हाय … आह … मैं मर गई.
तीन पत्ती गुलाब-35
(Teen Patti Gulab- Part 35
अब भाभी बैड पर पेट के बल लेटी गई थी और भै ने उनका पेटीकोट भी उतार दिया था। अब दोनों मादरजात नंगे थे। भैया उसके दोनों नितम्बों के बीच अपना हाथ फिराना चालू कर दिया। फिर उन्होंने क्रीम वाली शीशी का ढक्कन खोला और लगभग आधी शीशी क्रीम अपनी हथेली पर उंडेल ली। अब एक हाथ की अँगुलियों से उसके नितम्बों की खाई में क्रीम लगाने लगे।
“उईई … मुझे गुदगुदी हो रही है.” भाभी ने अपने नितम्ब भींचते हुए कहा।
शायद भैया ने गांड के छेद में अपनी अंगुली घुसा दी थी।
“उसमें बी तो क्रीम लगाने दे … नई तो फिर बोलेगी दर्द होयरेला है?”
भैया ने अपनी अंगुली पर फिर क्रीम लगाई और गांड के छेद पर लगाकर अपनी अंगुली को गोल-गोल घुमाने लगे। भाभी आह … ऊंह करती रही।
फिर उन्होंने अपनी अंगुली भाभी की गांड से निकाल ली और उसके नितम्बों को चौड़ा करके गौर से देखने लगे। शायद वह उसकी गांड का छेद देख रहे थे।
इतनी दूर से हमें भाभी की गांड का छेद तो नज़र नहीं आ रहा था पर भैया के चेहरे पर आई मुस्कान देखकर लगता है उन्हें वह छेद जरूर पसंद आ गया था।
“वाह … मेरी पपोटी क्या मस्त गांड है तेरी। चल अब मेरे शेर का गृहप्रवेश करवा देते हैं.”
भाभी ने बिना कुछ बोले घुटनों के बल होकर अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए। भैया ने उसके नितम्बों को थोड़ा और खोल दिया। हालांकि इतनी दूर से गांड का छेद साफ़ तो नहीं दिख रहा था पर सांवले से छेद का अंदाज़ा तो हो ही रहा था।
भैया ने भाभी के नितम्बों पर थपकी सी लगाई जैसे घुड़सवारी करने से पहले घोड़ी को थपथपाया जाता है।
अब भैया उसके पीछे आ गए और भाभी को अपने नितम्बों को अपने हाथों से थोड़ा चौड़ा करने को कहा। भाभी ने अपना सिर तकिये पर रख लिया और अपने दोनों हाथों को पीछे करके अपने नितम्बों को और खोल दिया।
अब भैया ने अपने सिकंदर पर एक बार फिर से हाथ फिराया और भाभी की गांड के छेद पर अपना सुपारा लगा दिया। भाभी मन ही मन कुछ बुदबुदा सी रही थी। शायद डर के मारे हनुमान चालीसा पढ़ने लगी थी।
“प्लीज … धीरे करना!”
“बस तू अपनी गूपड़ी को ढीला छोड़ने का … बाकि काम में अपने आप कर देगा।”
अब भैया ने अपना निशाना साधकर दोनों हाथों से भाभी की कमर को कसकर पकड़ लिया। और फिर एक जोर का धक्का लगाया।
धक्का इतना जबरदस्त था कि एक ही झटके में सुपारे सहित आधा लंड भाभी की गांड में बिना किसी रोक टोक के घुस गया … और उसके साथ ही भाभी की दर्द भरी एक चीख पूरे कमरे में गूँज गई- मर गईई … अबे साले … मादरचोद … मार डाला रे … हाय … आह … मैं मर गई.
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भैया ने कोई रहम ना करते हुए 2-3 धक्के और लगा दिए। अब तो लगता था उनका पूरा लंड भाभी की गांड में चला गया था। भाभी दर्द के मारे कराहे जा रही थी। वह भैया की पकड़ से अपने आपको छुड़ाने की भरपूर कोशिश कर रही थी और अपने हाथों को उनकी जाँघों पर लगाकर पीछे धकलने की कोशिश भी कर रही थी।
“अबे भोसड़ी के … मार डालेगा क्या … निकाल ले बाहर … मैं मर जाऊँगी … आईई माआआआ!” भाभी की आँखों से आंसू निकलते जा रहे थे।
“अरे मेरी जान अब बाहर निकालने का क्या फ़ायदा … जो होना था हो गया। फिकर मत करो दो मिनट में सब ठीक हो जाएंगा … बस तू अपनी गूपड़ी को ढीला छोड़ दे।”
“तुम एक नंबर के कसाई हो. ओईईईई माँ … कोई तो मुझे बचा लो …” भाभी रोये जा रही थी पर लगता था भैया रहम करने के मूड में कतई नहीं थे। उन्होंने भाभी की कमर को और जोर से कस कर पकड़ लिया था।
थोड़ी देर भाभी कसमसाती और छटपटाती रही और फिर उन्होंने अपने आप को ढीला छोड़ दिया। उनकी आँखों से अब भी आंसू तो निकल रहे थे पर हाय-तोबा अब जरूर कम हो गई थी।
“साले बहनचोद … मैं तेरी बातों में आ गई … लगता है मेरी तो फट ही गई है … बाहर निकाल ले … साले हरामी …”
“बस मेरी जान अब तू काये को फिकर कर रयेली है? किला फ़तेह हो गयेला है। बस दर्द बी ठीक हो जायेंगा। बस थोड़ी देर एसे इच रहने का … हिलने का नई!” भैया उसे तसल्ली देते जा रहे थे।
थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद भाभी का रोना अब सिसकारियों में बदल गया था। भैया ने उसके नितम्बों और पीठ पर हाथ फिराना चालू कर दिया था।
“ऐसे तो कोई दुश्मन या कसाई भी नहीं करता … मैंने बोला था ना … धीरे करना … मैं … मैं … ”
“ओह … मैं सॉरी मांगेला है जान … मुझे लगा धीरे करने से तेरे को जास्ती दर्द होएंगा …”
“ओह … अब तो बाहर निकाल लो … या मुझे जान से ही मारोगे?”
“अरे मेरी बुलबुल … अब बाहर निकालने का क्या फायदा … बस मेरे खातिर थोड़ा सा कष्ट और सह ले … में तेरे को प्रोमिज देता तेरे को बहोत प्यार करेंगा … ” कहकर भैया ने अपनी मुंडी झुकाते हुए भाभी की पीठ पर एक चुम्बन ले लिया।
“मेरे तो पैर दुखने लगे हैं.”
“तू एक काम कर धीरे-धीरे अपने पैर पीछे करले इससे तेरे को आराम मिलेगा।”
“एक बार बाहर निकाल लो बाद में जब दर्द ठीक हो जाए तब कर लेना.”
“अपुन को सटकेला समझा क्या? किता मुश्किल से अन्दर किएला है अब बाहर निकल गया तो फिर अन्दर डालने में बहुत मुश्किल होएंगा और तेरे को दर्द बी बहुत ज्यास्ती होएंगा जैसा बोला तू अपने पैर पीछे कर तो सही!”
अब भाभी धीरे धीरे अपने घुटने और पैर पीछे की ओर करने लगी तो उनके नितम्ब भी नीचे होने लगे।
भैया उनके नितम्बों से चिपके रहे और ध्यान रखा कि उनके मूसल का संपर्क भाभी की ओखली से नहीं टूटे।
हौले-हौले भाभी ने अपने पैर पीछे की ओर सीधे कर दिए। भैया अब भी उनके ऊपर थे और उनका लंड पूरा भाभी की गांड में धंसा हुआ था।
थोड़ी देर दोनों इसकी प्रकार पड़े रहे।
अब भैया ने भाभी के कानों और गर्दन पर चुम्बन लेने शुरू कर दिए और अपने हाथ नीचे करके उसके उरोजों की घुन्डियाँ मसलने लगे थे। भाभी का दर्द ख़त्म तो नहीं हुआ था पर शायद उनके गूपड़ी अब तक भैया के गबरू सिकंदर से अच्छी तरह परिचित जरूर हो गई थी।
अब भैया ने हाथ बढ़ाकर टेबल पर रखी पान की गिलोरियां उठाकर एक अपने मुंह में डाल ली और दूसरी भाभी के मुंह की ओर बढ़ा दी।
“क्या है?”
“ये केशर कस्तूरी वाला पेशल पान है इसको खाकर तू सारा दर्द भूल जायेंगी … क्या?”
अब भाभी ने भी वह पान की गिलोरी अपने मुंह में ले ली और साथ ही भैया की एक अंगुली भी दांतों से काट खाई।
“क्या करती बे साली? दर्द कर दियेला ना?”
“अब पता चला ना मुझे कित्ता दर्द हुआ है?”
“अच्छा ये बात … तो ले फिर … ” और भैया ने धीरे से अपने नितम्ब उठाकर एक धक्का और लगा दिया।
“अईई … ” भाभी के मुंह से फिर आह सी निकली पर अब लगता था उसमें दर्द नहीं था।
“जान … तेरा पिछवाड़ा बहुत ही मस्त हे। सच में ऐसा तो उस चिकनी का बी नई था.”
“निकालो बाहर इसे … और चले जाओ अपनी उसी चिकनी के पास!”
“हाय … मेरी रानी … तेरे को छोड़ के अब किधर जायेंगा? तेरे को प्रोमिज देता अपुन तेरे को रानी बनाके रखेगा.”
“चल झूठे … अब मैं दुबारा तेरी बातों में नहीं आने वाली!”
लगता है भाभी का दर्द अब कम हो गया था। भैया ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। भाभी की आँखें बंद थी और अब उन्होंने अपनी टांगें और ज्यादा खोल दी थी और कभी-कभी जब भैया धक्के लगाने के लिए अपना लंड थोड़ा बाहर निकालते तो वह भी साथ में अपने नितम्ब उठाने लगी थी।
भैया उसके गालों, कानों, और गले पर चुम्बन लिए जा रहे थे। एक हाथ से उसकी बुर के पपोटे भी शायद मसल रहे थे और दूसरे हाथ की चिमटी से उसके उरोजों की घुन्डियाँ भी मसल रहे थे। भाभी की अब हल्की-हल्की सित्कारें सी निकालने लगी थी।
“क्यों मेरी रानी मजा आयेला ना अब?”
“हट! तुमने तो मेरी जान ही निकाल दी अपने मजे के लिए!”
“तेरी जान लेके अपुन किधर जाएगा रे। तूने तो अपुन को दीवाना बना लिएला है एक इच रात में!”
“आह … धीरे … ” भाभी ने एक मीठी सिसकारी सी ली।
लगता था अब भाभी का दर्द ख़त्म हो चुका था और अब तो उनकी गूपड़ी को भी मज़ा आने लगा था। भैया ने हल्के धक्के लगाने चालू रखे।
“जान मैं क्या बोलता तू फिर से घुटनों के बल हो जा इससे तेरे को बी बड़ा मज़ा आयेंगा।”
“मेरे से तो हिला ही नहीं जा रहा … लगता है तेरा गधे जितना बड़ा हथियार मेरे पेट के अन्दर से गले तक आ गया है।” कह कर भाभी हंसने लगी।
फिर भाभी ने अपनी गूपड़ी पर हाथ लगा कर चेक किया कि कितना अन्दर है। और फिर धीरे धीरे भाभी ने अपने नितम्ब उठाते हुए अपने घुटनों को मोड़ा और फिर से डॉगी स्टाइल में हो गई।
भैया ने कस कर उनकी कमर पकड़ी रखी ताकि उनका सिकंदर अपने लक्ष्य से कहीं भटक ना जाए।
अब भैया ने फिर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। वह अपना लंड सुपारे तक बाहर निकालते और फिर किसी पिस्टन की तरह अन्दर कर देते। उन्होंने थोड़ी क्रीम अपने लंड पर और लगा ली इससे लंड को अन्दर बाहर होने में अब कोई दिक्कत महसूस नहीं हो रही थी।
लंड तो फूलकर बहुत मोटा हो गया था। अब तो भाभी की गांड का छेद भी पूरा दिखाई देने लग गया था। बाहर से तो काला छल्ला सा लग रहा था पर जब भैया अपना लंड बाहर निकालते तो अन्दर का गुलाबी रंग नज़र आ जाता था।
“हाय … क्या मस्त चुदाई करता है? साली के जोर-जोर से धक्के लगा ना मेरे राजा भैया? आह … ईईईईई …” अंगूर दीदी अब जोर जोर से बदबुदाने लगी थी और लहंगे के अन्दर उनका हाथ तेजी से चल रहा था और फिर एक किलकारी के साथ वो लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी और उनका हाथ अब रुक गया था।
“क्या हुआ दीदी?” मैंने देखा दीदी की अँगुलियों पर चिपचिपा सा पानी लगा था। दीदी ने अपने पर्स से रुमाल निकालकर उसे साफ़ करने लगी थी।
मुझे थोड़ा तो पता था कि कुंवारी लड़कियां को अपनी सु-सु सहलाने में और उसके ऊपर बने दाने को छेड़ने में बड़ा मजा आता है पर दीदी की तो शादी हो चुकी थी तो उसे अब अपनी सु-सु को इस तरह सहलाने की क्या जरूरत थी? मेरे समझ में नहीं आ रहा था।
“तेरी शादी हो जायेगी तब पता चल जाएगा … ” कहकर दीदी फिर से अन्दर देखने लगी।
अन्दर अब भैया ने पूरे जोर जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। भाभी को भी शायद अब मज़ा आने लगा था।
“दीदी अब तो लगता है भाभी को दर्द बिल्कुल नहीं हो रहा?” मैंने डरते डरते कहा.
“हाँ … यह सब उस पान की गिलोरी का कमाल है अब देखना साली कैसे मस्त होकर गांड में लेने लगी है पहले कितना नखरा दिखा रही थी।”
भैया एक हाथ नीचे करके उसकी चूत के दाने को भी मसलने लगे थे। भाभी आह … ऊंह करते जा रही थी।
और फिर कोई 15 मिनट के बाद एक लम्बी हुँकार के साथ भैया ने आखिरी 5-6 धक्के जोर-जोर से लगाए और भाभी की पीठ से चिपक गए। लगता है उनका वीर्य भाभी की गांड में निकल गया था।
थोड़ी देर बाद भैया का लंड एक पुच्च की आवाज के साथ बाहर निकल गया। भैया का लंड सिकुड़ने के बाद भी 4-5 इंच का तो जरूर लग रहा था। और भाभी की गांड का छेद अंग्रेजी के ‘ओ’ अक्षर की तरह खुला हुआ सा दिखने लगा था।
अब भाभी घुटनों के बल बैठ गई। ऐसा करने से उनकी गांड से वीर्य बाहर निकल कर चादर पर गिरने लगा और चादर पर कोई 4-5 इंच के दायरे में वह फ़ैल गया।
उसे देख कर भैया बोले- देख मेरी रानी, ऐसेइच अभी तो 4-5 निशान और बनाने का है आज!
पहले तो भाभी को कुछ समझ नहीं आया बाद में वह शर्मा सी गई।
और उसके बाद उन दोनों ने थर्मोस से केशर और शिलाजीत मिला दूध पीया और मिठाई खाई।
फिर भैया ने उसे एक बार फिर से अपनी बांहों में दबोच लिया।
भाभी थोड़ी सी कसमसाई और बोली- ओहो … आपने तो एक ही बार में मेरी हालत बिगाड़ दी है अब और नहीं बाकी कल कर लेना। मुझे लगता है मैं तो कल ठीक से चल भी नहीं पाऊँगी, घर और रिश्तेदार औरतें क्या सोचेंगी?
“अरे मेरी पपोटी … ! उन औरतों के बीच तेरी कितनी इज्जत बन जायेगी ये तो सोच?” भैया ने उन्हें चूमते हुए कहा कहा।
“कैसे?” भाभी ने आश्चर्य से पूछा।
“कल जब तू अपनी टांगें चौड़ी करके चलेंगी तो औरतें सोचेंगी कि तुम कितनी किस्मत वाली हो कि इतने लम्बे और बड़े हथियार से रोज चुदाने को मिलेंगा … क्या?” भैया ने हंसते हुए कहा।
भाभी एक बार फिर से शर्मा गई।
और फिर इनका यह प्रेम-युद्ध सुबह 5 बजे तक चला था। भैया ने 4 बार खूब जोर-जोर से भाभी की चूत को बजाया था। भैया तो और एक बार उसकी गूपड़ी को प्यार करना चाहते थे पर भाभी ने मना कर दिया कि आज केवल उसकी पूपड़ी को ही प्यार करो। भैया एक आज्ञाकारी पति की तरह पूपड़ी को प्यार करने लगे।
इतना कह कर गौरी चुप हो गई।
“भई वाह … क्या कमाल की सुहागरात मनाई है दोनों ने!” कहकर मैंने गौरी को एक बार फिर से अपनी बांहों में भर कर चूम लिया।
“गौरी … आओ हम भी वैसी ही सुहागरात मना लें?”
“हट! मुझे जान से मारने का इरादा है क्या?”
“वो तुम्हारे भैया और ग़ालिब चचा ने भी अब तो साबित कर दिया है कि गांड मरवाने से … ”
“बस … बस … ज्यादा बातें रहने दें। मैं अब आपकी चिकनी चुपड़ी बातों में नहीं आने वाली। अब आप ऑफिस जाओ आपको देर हो जायेगी।” गौरी ने मुझे दूर धकलते हुए कहा।
“गौरी प्लीज मान जाओ ना?”
“मेरे साजन! मैंने आपको कभी किसी चीज के लिए मना नहीं किया पर इसके लिए मुझे पहले मानसिक रूप से तैयार हो लेने दो फिर आप जो चाहो कर लेना मैं कौन सी भागी जा रही हूँ?” गौरी ने तो मुझे निरुत्तर ही कर दिया था अब मैं क्या बोलता।
मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार होने बैडरूम में चला आया और गौरी रसोई में।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 35
मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार होने बैडरूम में चला आया और गौरी रसोई में।
पूरा दिन गौरी के नितम्बों के बारे में सोचते ही बीत गया।
शाम को जब मैं घर आया तो रास्ते में देखा कि गुप्ताजी का घर रंगीन रोशनी से जगमगा रहा था।
घर आकर जब मैंने इस बाबत मधुर से पूछा तो उसने बताया- गुप्ताजी की बेटी नेहा की कल शादी है। चौमासे के दिनों में अमूमन शादी-विवाह के मुहूर्त नहीं हुआ करते पर लगता है बड़ी मुश्किल से यह रिश्ता मिला है कोई गड़बड़ ना हो जाए इसलिए गुप्ताजी ने लड़के वालों को अपने स्वास्थ्य का हवाला देकर जल्दी ही शादी का मूहूर्त निकलवा लिया था।
गौरी की तबियत आज कुछ ठीक नहीं लग रही थी, वह अपने कमरे में सोने चली गई थी।
खाना निपटाने के बाद मधुर और मैं टीवी देखने लगे। आज मधुर कुछ ज्यादा ही खुश नज़र आ रही थी।
“आज शाम को सामने वाली नेहा आई थी।” मधुर ने बताया।
“कौन नेहा?”
“वही गुप्ताजी की बेटी जिनकी बात अभी मैंने बतायी कि शादी है! 3 नंबर ब्लाक में!”
“ओह … अच्छा? वो पूपड़ी? क्या बोल रही थी?”
“कल उसकी शादी है तो मुझे विशेष रूप से सारे दिन अपने साथ रहने की रिक्वेस्ट करने आई थी। और बोल रही थी कल रात में भी आप विदाई तक मेरे साथ ही रहना मुझे बहुत घबराहट सी हो रही है।”
“हम्म …” मुझे भी हंसी आ गई।
“पता है और क्या बोल रही थी?” मधुर ने हँसते हुए कहा।
“क्या?”
“बोलती है दीदी मुझे तो बहुत डर लग रहा है।”
“शादी में डरने वाली क्या बात है?”
“अरे … आप भी ना … वो बोल रही थी मुझे सुहागरात में जो होगा उससे डर लग रहा है.” कह कर मधुर जोर-जोर से हंसने लगी।
“अच्छा फिर?”
“पूपड़ी है एक नंबर की। बोलती है कि मैंने सुना है शुरू में बड़ा दर्द भी होता है और खून भी निकलता है? मुझे तो बहुत डर लग रहा है। क्या सच में बहुत दर्द होता है?”
सुनकर मेरी भी हंसी निकल गई।
“35-36 साल की हो गई है और ऐसे नाटक कर रही है जैसे 19 साल की हो.”
“फिर तुमने क्या बोला?”
“बोलना क्या था मैंने उसे बोला तुम तो बस चुपचाप अपनी टांगें चौड़ी करके लेट जाना फिर जो करना होगा तुम्हारा पति अपने आप कर लेगा.” कहकर मधुर ठहाका लगा कर हंसने लगी।
“तुमने अपने दाव-पेंच नहीं बताये क्या उसे?”
“ए … हे … हे … मेरे जैसी सीधी थोड़े ही होती हैं सभी लड़कियाँ? मुझे तो तुमने ठीक से मनाया भी नहीं उस रात? हूंह …” कहकर मधुर ने नाराज़ सा होने का नाटक किया।
“आओ आज मना लेता हूँ।” कहकर मैंने मधुर को अपनी बांहों में भरने की कोशिश की।
“हटो परे! वो.. वो … गौरी देख लेगी।” कहकर मधुर शर्मा सी गई।
“अरे … हाँ वो गौरी को क्या हुआ आज?” मैंने पूछा।
“पता नहीं उसकी तबियत सी ठीक नहीं है। ये खाने पीने का ध्यान नहीं रखती। सिर दर्द और पेट की गड़बड़ बता रही है। बोलती है कि जी खराब है। आज खाना भी नहीं खाया।”
“ओह … ”
हे लिंग देव! कहीं लौड़े तो नहीं लग गए … कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई। गौरी तो बता रही थी उसके पीरियड्स आने ही वाले हैं! फिर यह जी मिचलाने वाला क्या किस्सा है?
अचानक मुझे अपने कानों के पास मधुर की गर्म साँसें सी महसूस हुई। इससे पहले की मैं कुछ समझ पाता मधुर ने मेरे कानों की लोब को अपने मुंह में लेकर दांतों से हल्का सा काट लिया। आज मधुर बहुत चुलबुली सी हो रही थी।
प्रिया पाठको और पाठिकाओ! स्त्री कभी भी खुलकर प्रणय निवेदन नहीं करती है। वह तो बस इशारों में ही बहुत कुछ कह देती है। अब मेरे लिए उसके इशारे समझना इतना भी मुश्किल काम नहीं था।
मैंने मधुर को अपनी गोद में उठा लिया और फिर हम अपने बैडरूम में आ गए।
और उसके बाद मधुर ने आज जी भर के 2 बार चुदवाया। दूसरी बार तो उसने खुद मेरे ऊपर आकर किया।
दोस्तो! अब मैं इसे विस्तार से बताकर आपको बोर नहीं करना चाहता। हाँ यह बात अवश्य सांझा करूंगा के मधुर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए भी मुझे यही लग रहा था जैसे गौरी मेरी बांहों हो और वह कह रही हो मेरे साजन … आज मेरी गोद भराई करके मुझे पूर्ण स्त्री बना दो।
सुबह मधुर ने स्कूल से फिर बंक (छुट्टी) मार लिया. बहाना पूपड़ी की शादी का था। सच कहूं तो मुझे और गौरी दोनों को आज की रात का बेसब्री से इंतज़ार था।
दिन में लगभग 2 बजे मधुर का फ़ोन आया उसने बताया कि वह गुप्ताजी के यहाँ जा रही है और रात को भी विदाई तक वही रहेगी।
हे लिंग देव! आज तो तेरी सच में जय हो। आज ऑफिस से घर जाते समय तुम्हें एक सौ एक रुपये का प्रसाद जरूर चढाऊँगा।
एक तो साली यह नौकरी भी आदमी के लिए फजीहत ही होती है। जब भी घर जल्दी जाने का होता है कोई ना कोई काम ऐसा आता है कि चाहते हुए भी ऑफिस से नहीं निकला जा सकता।
आज हैड ऑफिस में स्टॉक की रिपोर्ट भेजनी थी। सम्बंधित क्लर्क आया नहीं था तो नताशा के साथ मिलकर रिपोर्ट तैयार करके मेल करते-करते 7:30 बज ही गए। मेरा तो मन कर रहा था उड़कर ही घर पहुँच जाऊं।
जब मैं घर पहुंचा गौरी बाहर मुख्य दरवाजे पर मेरा इंतज़ार ही कर रही थी। मेरे अन्दर आते ही गौरी ने अन्दर से सांकल लगा ली। मैंने अपना बैग टेबल पर फेंक दिया और मधुर को आवाज लगाई। वैसे तो मुझे मधुर ने बता दिया था कि वह आज शाम को गुप्ताजी के यहाँ जाने वाली है पर मैं पूरी तसल्ली कर लेना चाहता था।
“दीदी तो आपकी पूपड़ी की शादी में गई हैं।” गौरी ने हंसते हुए बताया। (गौरी की भाषा तोतली ना लिख कर स्पष्ट लिख रहा हूँ.)
“अच्छा … वह मेरी … पूपड़ी कब से हो गई?” कहते हुए मैंने गौरी को अपनी बांहों में भर लिया। गौरी तो उईईइ … करती ही रह गई।
अब हम दोनों सोफे पर बैठ गए।
“ओहो … रुको … आपके लिए पानी लाती हूँ.”
मेरा लंड पैंट में ही उछलकूद मचाने लगा था। गौरी पानी लेने रसोई में चली गई। आज उसने सलवार सूट पहन रखा था जिसकी कुर्ती बहुत कसी हुई थी। आँखों में काजल भी डाल रखा था और ऐसा करने से उसकी आँखें किसी कटार की तरह लगने लगी थी।
लगता था वह अभी थोड़ी देर पहले ही नहाकर आई है और उसने आज कोई बढ़िया परफ्यूम भी लगाया है। आज उसने बालों की दो चोटियाँ भी बना रखी थी। आप तो जानते ही हैं मधुर जब बहुत खुश होती है और उसे कोई काम करवाना होता तब वह इस प्रकार बालों की दो चोटियाँ बनाती है। आज तो गौरी ने भी दो चोटियाँ बनाई हैं हो सकता है यह संयोग मात्र रहा हो पर मेरा दिल तो अभी से जोर-जोर से धड़कने लगा था।
गौरी पानी ले आई और थोड़ी परे सी हटकर बोली- चाय बना दूं?
“किच्च … आज चाय पानी कुछ नहीं बस तुम मेरी बांहों में आ जाओ।” कहकर मैंने गौरी का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा।
गौरी का संतुलन बिगड़ सा गया और वह मेरी गोद में आ गिरी। वह थोड़ा कसमसाई तो जरूर पर उसने मेरी गोद से हटने की ज्यादा कोशिश नहीं की। मेरा लंड पैंट के अन्दर ठुमके लगाने लगा था जिसे गौरी ने भी महसूस कर लिया था। उसने थोड़ा सा ऊपर होकर अपने नितम्बों को मेरी गोद में सेट कर लिया। मैंने उसके गालों पर एक चुम्बन ले लिया।
“ओह … आप फिल शरारत करने लगे?”
“गौरी मेरी जान आज पूरे दिन ऑफिस में मैं बस तुम्हें ही याद करता रहा.”
“क्यों?” गौरी ने मेरी ओर तिरछी नज़रों से देखा।
वह मंद-मंद मुस्कुरा भी रही थी।
“गौरी तुम बहुत खूबसूरत हो मेरी जान!”
“बस … बस झूठी तारीफ़ रहने दो … आप कपड़े चेंज कर लो। मैं चाय बनाती हूँ, वैसे खाना भी तैयार है आप बोलो तो गर्म करके लगा दूं?”
“गौरी तुम्हें अपनी बांहों से अलग करने का मन ही नहीं हो रहा.”
“क्यों?”
“मेरा मन तो करता है सारी रात तुम्हें ऐसे अपने सीने से चिपकाए रखूँ।”
गौरी ने कोई जवाब नहीं दिया। पता नहीं गौरी क्या सोचे जा रही थी। उसके चहरे पर एक अनजानी सी मुस्कराहट के साथ-साथ भय भी नज़र आ रहा था। जैसे वह किसी निर्णय के लिए अपने आप को तैयार कर रही हो।
“आप पहले फ्रेश हो लो.” कहकर गौरी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अपनी मुंडी झुका ली।
मैं बहुत कुछ सोचते हुए कपड़े बदलने बैडरूम में चला आया। पहले तो मेरा मन हाथ मुंह धोने का ही था पर बाद में मैंने एक शॉवर ले लिया और अपने पप्पू को साबुन से धोकर उस पर सुगन्धित क्रीम भी लगा ली। मैंने कुर्ता पायजमा पहन लिया था।
जब तक मैं हॉल में आया गौरी चाय बना कर ले आई थी। मेरा इच्छा चाय पीने की कतई नहीं थी मैं तो जल्द से जल्द गौरी के साथ अपने प्रेम का अंतिम सोपान पूरा कर लेना चाहता था। पर आप तो जानते हैं स्त्रियां जल्दबाजी में कोई भी काम करना पसंद नहीं करती हैं।
अब चाय पीने के मजबूरी थी।
“गौरी … ”
“हओ?”
“पता नहीं क्यों मेरा मन आज तुम्हें अपनी बांहों में भरकर रखने को कर रहा है।”
“नहीं मैं आज कोई शरारत नहीं करने दूँगी.”
“गौरी तुम्हें ज़रा भी दया नहीं आती?”
“कैसे?”
“क्यों मुझे तड़फा रही हो?”
“मैंने क्या किया?”
“तुमने मुझे अपना दीवाना बना लिया है। ए गौरी! आओ ना मेरी बांहों में आ जाओ … प्लीज …”
“आप पहले खाना खा लो, फिर सोचेंगे?” गौरी ने रहस्यमई ढंग से मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा।
आप मेरे दिल, दिमाग और लंड की हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
“चलो ठीक है पर आज खाना हम दोनों साथ-साथ खायेंगे और वह भी तुम्हें अपनी गोद में बैठाकर!”
“हट!” गौरी ने शरमाकर अपनी मुंडी झुका ली थी।
ईईइ … स्स्स्सस …
याल्लाह … उसकी आँखों की चमक, गालों की लाली और उन पर पड़ने वाले डिम्पल तो आज जानलेवा ही थे। मुझे तो लगने लगा था कि उसकी यह अदा मेरा कलेजा ही चीर देंगे। मेरा दिल इतना जोर से धड़क रहा था कि मुझे लगने लगा साला यह कहीं धोखा ही ना दे दे।
गौरी ने खाना लगा दिया था और अब मैंने गौरी को अपनी गोद में बैठा लिया।
आज गौरी ने मेरे लिए खीर बनाई थी। हम दोनों ने एक दूसरे को खाना खिलाया और बीच-बीच में मैं उसके गालों को भी चूमता रहा और नितम्बों और उरोजों पर भी हाथ फिराता रहा।
हमने जल्दी खाना निपटाया और फिर गौरी जूठे बर्तन लेकर रसोई में चली गई। मैं तो चाहता था गौरी जल्दी से आ जाए और इसी सोफे पर उसे मोरनी बनाकर प्रेम का अंतिम सोपान जल्दी से जल्दी पूरा कर लूं।
दोस्तो! दिल थाम लेना अब वो मरहला आने वाला है जिसका मैं पिछले 2 महीनों से करता आ रहा था। ये दो महीने नहीं जैसे दो सदियों के बराबर था।
गौरी हाथ मुंह धोकर रसोई से बाहर आ गई। मैं उसे अपनी बांहों में दबोचने के लिए जैसे ही सोफे से उठाने लगा गौरी बोली- आप बैडरूम में चलो, मैं कपड़े बदलकर आती हूँ.
मैं सोच रहा था कि अब कपड़े बदलने की नहीं उतारने का समय है। पता नहीं गौरी देर क्यों कर रही है। मैं इस समय गौरी को किसी भी प्रकार नाराज़ नहीं करना चाहता था। मैं चुपचाप बैडरूम में आकर बिस्तर पर बैठ गया।
कोई 8-10 मिनट के बाद गौरी ने बैडरूम में प्रवेश किया। उसने वही लाल रंग की नाइटी पहन रखी थी। यह नाइटी उसके सौन्दर्य और सांचे में ढला खूबसूरत बदन ढकने में भला कहाँ समर्थ था। उसके अंग-अंग से फूटती जवानी तो हर तरफ से अपना सौंदर्य बिखेर रही थी।
मैं अपलक उसे देखता ही रह गया। एक हाथ में उसने सुनहरे रंग का दुपट्टा भी पकड़ रखा था।
मैंने उसे अपनी बांहों में भर कर अपनी गोद में बैठा लिया। गौरी ने अपनी आँखें बंद कर ली थी। उसके अधर कुछ काँप से रहे थे और साँसें तो जैसे उसके नियंत्रण में ही नहीं थी।
मैंने उसके लरजते लबों पर अपने जलते होंठ रख दिए। फिर हमारा यह चुम्बन कोई 4-5 मिनट तो जरूर चला होगा। इस बीच मैं उसके पेट जाँघों और नितम्बों पर भी हाथ फिरता रहा। मेरा लंड अब बेकाबू होने लगा था।
“गौरी मेरी जान! क्या तुम मेरी पूर्ण समर्पिता बनाने के लिए तैयार हो?”
“हाँ मेरे साजन मैं तो सदा से ही आपकी समर्पिता हूँ मैंने कभी आपको किसी भी चीज या क्रिया के लिए मना नहीं किया। आज मुझे पूर्ण समर्पिता बना दो।”
“गौरी मैं तुम्हें वचन देता हूँ मैं कोई जोर जबरदस्ती नहीं करूंगा और ना ही तुम्हें कोई कष्ट होने दूंगा।”
“मेरे साजन! आपकी ख़ुशी के लिए तो मैं अपनी जान भी दे सकती हूँ उसके आगे यह कष्ट कोई मायने नहीं रखता. पर मेरी एक शर्त है?” गौरी ने अपनी आँखें मेरी आँखों में डाल कर पूछा।
हे लिंग देव! अब रोमांच के इन अंतिम पलों में गौरी ने यह क्या नया नाटक शुरू कर दिया। कहीं लौड़े तो नहीं लगने वाले!
“श … शर्त? क … कैसी शर्त?” मैंने हकलाते से पूछा।
“आपको मेरी एक बात माननी पड़ेगी?” साली यह गौरी भी मधुर की संगत में रहकर उसके सारे दाव-पेंच सीख गई है और किसी भी बात को घुमा फिराकर कहने में भी माहिर हो गई है।
“ओके … बोलो।”
फिर शर्माते हुए गौरी ने कहा “आज की रात जो भी करना है वो मैं करुँगी, आप ना तो कुछ बोलेंगे और ना ही मेरे कहे बिना कुछ करेंगे.”
मेरी समझ में तो घंटा भी नहीं आया। मैं गूंगे लंड की तरह मुंह बाए बस सोचता ही रह गया।
“क … क्या … मतलब?”
“बस आप चुपचाप बैड पर लेट जाओ। मैं आपकी आँखों पर यह दुपट्टा बाँध देती हूँ। जो भी करना होगा, मैं स्वयं करुँगी।”
“ओह …”
मैं तो हक्का बक्का सा ही रह गया। अब तो मामला शीशे की तरह बिलकुल साफ़ हो गया था।
…
मुझे पहले तो थोड़ा संशय था पर अब तो मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि मधुर ने गौरी को अपनी दूसरी सुहागरात मनाने वाली सारी बातें विस्तार से बताई होंगी और उस आनंद के बारे में भी बताया होगा जो हम दोनों ने उस रात भोगा था।
“क्या हुआ मेरे … भोले … सा..ज … न?” गौरी की आवाज सुनकर मैं चौंका।
“ओह … हाँ … ठीक है.” अब मेरे पास उसकी बात मान लेने के अलावा और क्या चारा बचा था.
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 36
गौरी ने पहले तो मेरे सारे कपड़े उतार दिए और फिर मेरी आँखों पर वही दुपट्टा कसकर बाँध दिया जो वह साथ लेकर आई थी। गौरी ने भी अपनी नाइटी उतार दी। मैं देख तो नहीं सकता था पर अपने अंतर्मन की आँखों से महसूस तो कर ही सकता था।
और फिर मैंने गौरी के हाथों की नाजुक और पतली अँगुलियों को अपने पप्पू के चारों ओर महसूस किया। मैं चित लेटा था और गौरी मेरे पास आकर बैठ गई थी।
उसने पहले तो मेरे लिंग मुंड को अपने होंठों पर फिराया और फिर उसको मुंह में लेकर चूसने लगी। लंड तो ठुमके पर ठुमके लगाने लगा था। थोड़ी देर चूसने के बाद गौरी ने उसे मुंह से बाहर निकाल दिया और फिर मुझे अपने लंड पर चिकनाई सी महसूस हुई। शायद गौरी ने कोई ढेर सारी सुगन्धित क्रीम उस पर लगा दी थी।
अब गौरी ने अपने दोनों पैरों को मेरी कमर के दोनों ओर कर लिया और एक हाथ से मेरे पप्पू की गर्दन पकड़ कर अपनी महारानी (गांड) के छेद पर लगाकर घिसना शुरू कर दिया। जिस प्रकार उसके गांड का छेद चिकना सा लग रहा था मुझे लगता है उसने अपनी गांड के छेद पर और अन्दर भी ढेर सारी क्रीम जरूर लगाई होगी।
मैंने अपने हाथ उसके नितम्बों पर फिराने की कोशिश की तो गौरी ने मना कर दिया- ना … आप कुछ नहीं करेंगे।
मेरा मन तो उसके नितम्बों और गांड के छेद को भी सहलाने का कर रहा था पर मन मार कर मैंने अपना हाथ हटा लिया।
अब गौरी ने मेरे लंड को और जोर से कस लिया। लंड तो इतना सख्त हो चला था जैसे कोई लोहे की सलाख हो।
फिर गौरी ने मेरे पप्पू को अपनी गांड के छेद पर लगा कर अपने नितम्बों को नीचे करना शुरू कर दिया। हालांकि मैं देख तो नहीं सकता था पर मैंने महसूस किया कि मेरा पप्पू उसकी गांड के सुनहरे छल्ले के ठीक बीच में लग गया है।
मेरा मन तो कर रहा था कि अपनी आँखों पर बंधे दुपट्टे को निकाल फेंकूं और इस सारे नज़ारे को अपनी आँखों से देखूं; पर मैं अभी ऐसा करना ठीक नहीं था।
गौरी ने एक लंबा साँस लिया और मुझे लगा गौरी ने अपनी आँखें बंद कर के अपने दांत भींच लिए है। उसने अपने नितम्बों को नीचे करने की कोशिश की पर जल्दबाजी में लंड थोड़ा सा मुड़कर फिसल गया।
अब गौरी ने फिर से निशाना लगाया और 2-3 बार धीरे-धीरे अपने नितम्बों को ऊपर नीचे किया और फिर अगले प्रयास में पप्पू तो उसकी गांड में धंसता ही चला गया जैसे किसी कुशल शिकारी का तीर सटीक निशाने पर अपना लक्ष्य भेद देता है।
और उसके साथ ही गौरी की एक चीख पूरे कमरे में गूँज गई- उइइईईई ईईईइइ मा!
गौरी जोर जोर से सांस लेने लगी थी। उसने अपने आप को स्थिर सा कर लिया था। ये पल उसके लिए बहुत ही नाजुक और संवेदनशील थे। उसका सारा शरीर कांपने सा लगा था।
मेरा मन तो उसकी गांड के छल्ले में फंसे मेरे लंड को अँगुलियों से छूने का कर रहा था पर इस समय मेरा थोड़ा सा भी हिलना गौरी के नाजुक अंग को नुकसान पहुंचा सकता था। मैंने भी अपना दम साध लिया।
मुझे लगा गौरी अपने दर्द पर काबू पाने की जी तोड़ कोशिश कर रही है। थोड़ी देर वह इसी मुद्रा में बनी रही और फिर धीरे-धीरे वह अपने सिर को नीचे करके मेरे सीने से लग गई।
अब मैंने अपना एक हाथ उसकी नितम्बों की ओर बढ़ाया और अंदाज़े से उसके छेद को टटोलने की कोशिश की।
मेरा लंड तो केवल 1-2 इंच ही बाहर था, बाकी तो पूरा अन्दर समाया हुआ था।
मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी जल्दी मेरा लंड गृह प्रवेश कर जाएगा। मेरे लंड की हालत यह थी कि जैसे प्लास्टिक की बोतल में अंगूठा फंस गया हो। सच में गौरी की गांड बहुत ही कसी हुई थी।
अब पता नहीं उसने यह सब इन्टरनेट पर देखा था या यह सब मधुर ने उसे बताया था। यह तो अच्छा हुआ कि गौरी ने पहले से ही मेरे लंड पर खूब सारी क्रीम लगा थी और अपनी गूपड़ी (गांड) के अन्दर भी लगा ली थी।
और सबसे ख़ास बात तो यह थी कि उसने बड़े इत्मीनान से मेरे लंड का गृह प्रवेश करवाया था। अगर वह ज़रा भी जल्दी करती तो निश्चित ही उसकी गांड का छल्ला जख्मी हो जाता।
थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद गौरी कुछ संयत हुई तो उसने अपने होंठ मेरे होंठों से लगा दिए।
अब मैंने एक हाथ गौरी की पीठ पर फिराना शुरू कर दिया। गौरी ने मना नहीं किया। शायद उसे भी अपनी कमर और नितम्बों पर मेरा हाथ फिराना किसी मरहम की तरह लग रहा होगा।
अब मैंने दूसरे हाथ से अपनी आँखों पर बंधा दुपट्टा निकाल फेंका। गौरी की आँखें बंद थी और उसके गालों पर आंसू लुढ़क आये थे। मैंने उन आंसुओं को अपनी जीभ से चाट लिया और फिर गौरी के होंठों को भी चूम लिया।
“मेरी प्रियतमा … आज तुम मेरी पूर्ण समर्पिता बन गई हो तुम्हारे इस समर्पण के लिए मैं तमाम उम्र बहुत आभारी रहूंगा.”
“आह … थोड़ी देर हिलो मत!” गौरी के चेहरे पर दर्द की झलक सी लग रही थी। लेकिन मैंने देखा उसके चेहरे पर एक संतोष भी झलक रहा था। क्यों ना हो, आख़िर एक लंबी प्रतीक्षा, हिचक, लाज़ और डर के बाद आज उसने मेरा महीनों से संजोया ख्वाब पूरा जो कर दिया था।
स्त्री और पुरुष की सोच में कितना विरोधाभास होता है। पुरुष अपने लक्ष्य को पाकर आनंदित होता रहता है और स्त्री अपना कौमार्य अपने प्रियतम को सौम्पकर ख़ुशी महसूस करती है कि उसने अपने प्रियतम के मन की इच्छा को पूर्ण कर दिया है।
जैसे ही मैंने उसके चूचुक को अपने दांतों से थोड़ा सा दबाया तो गौरी थोड़ी सी ऊपर हो गई तो पप्पू थोड़ा सा और आगे सरक गया। गौरी झट से फिर नीचे हो गई और उसने अपना सिर फिर से मेरी छाती से लगा लिया। उसने एक हाथ पीछे करके पहले तो अपनी गांड के छल्ले को देखा और फिर मेरे पप्पू पर अंगुलियाँ फिरा कर देखा। मुझे लगता है वह यह देखना चाहती कि मेरा पप्पू कितनी गहराई तक अन्दर चला गया है।
मैंने उसकी पीठ और नितम्बों पर हाथ फिराना चालू रखा। उसके गदराये उरोज मेरी छाती से लगे हुए थे। मैंने महसूस किया उसके चूचुक आगे की ओर तन से गए हैं। मैंने उसके एक उरोज को पकड़ कर फिर से उसके चूचक को मुंह में भर लिया और चूसने लगा।
गौरी के मुंह से एक मीठी सीत्कार सी निकल गई- आह …
“गौरी … मेरी जान … अब दर्द तो नहीं हो रहा ना?”
“हट!” कहकर गौरी ने मेरे होंठों को अपने दांतों से काट लिया।
मुझे लगा गौरी का दर्द अब थोड़ा कम हो गया है। ऐसे समय में गांड के छल्ले में चुनमुनाहट सी होती है और बार-बार वहाँ घर्षण करवाने या खुजलाने की प्रबल इच्छा होती है। मैंने महसूस किया उसने अपने नितम्बों का संकोचन किया है। और ऐसा करने से मेरे लंड ने एक ठुमका सा लगाया। मुझे लगा मेरा लंड अन्दर फूल सा गया है।
गौरी एक दो बार फिर से थोड़ा ऊपर नीचे हुई। उसने अब अपने नितम्बों को हिलाना शुरू कर दिया था। मैंने देखा उसके चेहरे पर ख़ुशी और हल्के दर्द के मिलेजुले भाव तरंगित हो रहे हैं।
ऐसी स्थिति में गांड के छल्ले के आसपास की संवेदनशीलता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। मुझे लगा इस समय गौरी के लिए इस मीठी-मीठी जलन, पीड़ा, गुदगुदी और कसक भरी मिठास का आनन्द तो अपने शिखर पर था। वह मुंह से तो नहीं बोलेगी पर वह चाहती है कि अब पप्पू को कुछ व्यस्त किया जाए और काम पर लगा दिया जाए।
अब गौरी ने अपना एक हाथ फिर से पीछे किया और सीधी हो गई। उसे थोड़ा दर्द तो महसूस हुआ पर अब तो पप्पू महाराज पूरा अन्दर चले गए थे। गौरी ने अपनी गांड का संकोचन किया और फिर धीरे-धीरे ऊपर नीचे होना शुरू कर दिया।
रोमांच तो इस समय सातवें आसमान पर था। गौरी की आँखें अब भी बंद थी और उसकी हल्की हल्की सीत्कारें भी निकलने लगी थी। लगता है पप्पू और गांड की अब तक पक्की दोस्ती हो गई है।
“गौरी … अब दर्द कैसा है?”
“ज्यादा नहीं … पर गुदगुदी और चुनमुनाहट सी हो रही है।”
“एक काम करोगी … प्लीज?”
“हम्म?”
“तुम अपना एक पैर मोड़कर दूसरी तरफ करके थोड़ा घूम जाओ, फिर हम दोनों करवट के बल लेट जायेंगे तो तुम्हें और भी ज्यादा आनंद आयेगा।”
गौरी मेरी ओर देख कर मुस्कुराने लग गई थी। लगता है उसे अपने भैया और भाभी वाली बात याद आ गई थी। और फिर गौरी मेरे कहे मुताबिक़ हो गई। अब उसने अपनी पीठ धीरे-धीरे मेरे सीने से लगाते हुए अपने पैर सीधे कर दिए।
मैंने उसका पेट और कमर पकड़े रखा ताकि मेरा पप्पू बाहर फिसलकर धोखा ना दे दे। और फिर हम दोनों करवट के बल हो गए। गौरी ने अपनी एक जांघ थोड़ी सी मोड़ ली थी और मैंने अपनी एक जांघ उसके दोनों टांगों के बीच कर ली।
मैं एक हाथ से उसका उरोज पकड़ लिया और उसे दबाने लगा।
मैंने धीरे से एक धक्का लगाया।
“उईईईई … आह … थोड़ा धीरे … आह …” गौरी ने अपनी जांघ थोड़ी और ऊपर कर ली और अपने आप को थोड़ा और ढीला कर लिया।
अब तो पप्पू बिना किसी रोक-टोक और झिझक के आराम से अन्दर बाहर होने लगा था। हर धक्के के साथ गौरी का रोमांच बढ़ता ही जा रहा था।
मैंने अपने एक हाथ से गौरी की सु-सु को टटोला। उसके पपोटे फूलकर मोटे-मोटे से हो गए थे और उसका चीरा तो रतिरस से लबालब भर गया था। उसकी मदनमणि भी फूल कर मूंगफली के दाने जितनी हो गई थीड़ा मैंने अपनी चिमटी में पकड़ कर उसे भी थोड़ा मसलना चालू कर दिया।
अब मैंने गौरी को पेट के बल होने को कहा। गौरी धीरे-धीरे अपने पेट के बल औंधी हो गई और मैं उसके ऊपर आ गया। गौरी ने अपनी जांघें जितनी चौड़ी हो सकती थी कर दी थी। अब तो पप्पू बड़े आराम से उछलकूद मचा सकता था।
गौरी बार-बार अपने नितम्बों का संकोचन करती जा रही थी। मैंने एक हाथ से उसके उरोज को पकड़ लिया और दूसरे हाथ को नीचे कर के उसकी सु-सु को फिर से पकड़कर मसलना चालू कर दिया।
सुविधा के लिए गौरी ने अपने नितम्ब थोड़े ऊपर उठाकर एक तकिया पेट के नीचे लगा लिया। पता नहीं यह सब फार्मूले उसे मधुर ने बताये थे या अपनी भैया और भाभी की देशी सुहागरात से प्रेरित थे।
कुछ भी कहो ऐसा करने से मेरा पूरा लंड अब गौरी की गांड में जाने लगा था।
हर धक्के के साथ मेरा और गौरी का रोमांच बढ़ता ही जा रहा था। मैं तो चाह रहा था यह समय रुक जाए और मैं इसी प्रकार गौरी को अपने आगोश में लिए जिन्दगी बिता दूं।
“आह … उईई … माआअ …” गौरी की मीठी सीत्कारें कमरे में गूंजने लगी थी।
मैंने गौरी के कान की लोब को मुंह में ले लिया और अपनी दांतों से उसे हल्का हल्का काटने लगा तो गौरी ने मेरे धक्कों के साथ अपने नितम्ब उचकाने शुरू कर दिए।
कोई 10-12 मिनट के बाद मुझे लगने लगा कि मेरी उत्तेजना इस समय अपने चरम पर है और अब मेरी मंजिल करीब आने को है। मेरा मन तो उसे डॉगी स्टाइल में करके उसके नितम्बों पर कस-कस कर थप्पड़ लगाते हुए पीछे से धक्के लगाऊँ पर बाद में मैंने अपना इरादा बदल लिया।
इस डॉगी स्टाइल के चक्कर में अगर पप्पू बाहर निकल गया तो दुबारा अन्दर करने में बहुत समय और ऊर्जा की जरूरत होगी और अगर फिर से अन्दर नहीं डाल पाया तो मेरा पप्पू बाहर ही शहीद हो जाएगा। मैं कतई ऐसा नहीं चाहता था।
गौरी की मीठी कराहें पूरे कमरे में गूँज रही थी- आह … उईइ … याआ … मैं अपना लंड सुपारे तक बाहर निकालता और फिर से एक धक्के के साथ अन्दर कर देता। उसके साथ ही गौरी के नितम्बों से ठप्प की सी आवाज निकलती।
“आह … मेरी जान … गौरी आज तुमने मुझे मेरे जीवन का बहुत बड़ा सुख दिया है इसे मैं जिन्दगी भर नहीं भूलूंगा। अईई … मेरा … तो … निकलने … जा रहा है …”
मैंने अपने एक हाथ से गौरी की सु-सु को मसलना चलू कर दिया और दूसरे हाथ से उसके उरोज की घुंडी को मसलने लगा। गौरी रोमांच से उछलने लगी और उसने अपने नितम्बों का संकोचन शुरू कर दिया। उसका पूरा शरीर लरजने सा लगा था। मुझे लगा उसका ओर्गास्म भी होने ही वाला है।
इसके साथ ही गौरी की एक किलकारी सी हवा में गूँज उठी। मुझे अपने हाथ पर चिपचिपा सा रस अनुभव हुआ। मुझे लगता है उसका भी स्खलन हो गया है।
मैंने एक जोर का धक्का लगाया और अपने लंड को पूरी गहराई तक अन्दर डाल दिया। इसके साथ ही मुझे लगा मेरा लंड गौरी की गांड में फूलने और पिचकने सा लगा है और उससे प्रेमरस की फुहारें निकलने लगी है।
गौरी ने अपनी गांड को जोर से भींच लिया जैसे वह इस सारे रस को अन्दर चूस लेना चाहती हो।
मैंने कसकर गौरी को अपनी बांहों में भर लिया और उसके गालों पर चुम्बनों की झड़ी सी लगा दी। गौरी ने अपनी गांड का संकोचन जारी रखा। मेरी साँसें बहुत तेज हो गई थी और दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। मेरा लंड 8-10 पिचकारियाँ मार कर शांत हो गया। और मैं गौरी के ऊपर पसर सा गया।
मैंने 2-3 मिनट ऐसे गौरी को अपनी बांहों में भींचे रखा। थोड़ी देर बाद मेरा लंड फिसल कर बाहर निकल गया। और गौरी की गांड से धीरे-धीरे प्रेम रस बाहर निकाल कर उसकी सु-सु के छेद से होता हुआ नीचे तकिये को भिगोने लगा।
“आईईईई … ” अब गौरी थोड़ी कसमसाने सी लगी थी।
“क्या हुआ?”
“मुझे गुदगुदी सी हो रही है.”
मैं गौरी के ऊपर से उठ गया। गौरी लम्बी लाबी साँसें ले रही थी। मैंने उसके नितम्बों पर पहले तो हाथ फिराया और फिर दोनों हाथों से उसके नितम्बों को थोड़ा चौड़ा कर दिया। उसके गांड से अभी भी सफ़ेद गाढ़ा रस निकलता जा रहा था।
अब गौरी पलट कर बैड से उतरकर नीचे खड़ी हो गई। उसकी गांड से झरता हुआ रस उसकी जाँघों तक बहने लगा था। गौरी अपनी टांगों को चौड़ा कर के बाथरूम में भाग गई।
मेरी निगाह अब तकिये पर पड़ी। तकिया तो 5-6 इंच के व्यास में गीला हो गया था। मुझे हंसी सी आ गई। मैं आँखें बंद करके अभी-अभी भोगे उस अनूठे आनंद के बारे में ही सोचता जा रहा था।
कोई 10 मिनट के बाद गौरी अपने शरीर को तौलिये से ढके हुए वापस आई। अब उसकी निगाह तकिये पर पड़ी।
“ओह … यह तकिया तो खराब हो गया?” कहकर उसने मेरी ओर देखा।
“ओए भिडू … तकिया खराब नई होएला है इसकी तो किस्मत इच चमक गयेली है और अबी तो अपुन को ऐसे इच 3-4 तकियों की किस्मत चमकाने का है … क्या?” कहकर मैंने फिर से गौरी को अपनी बांहों में दबोच लिया।
गौरी तो आह … उईई … करती ही रह गई।
सच कहूं तो सम्भोग की यह क्रिया है ही ऐसी कि इससे मन ही नहीं भरता। आपका इस बारे में क्या विचार है? अपनी कीमती राय लिखेंगे तो मुझे ख़ुशी होगी।
अथ श्री ‘ये गांड मुझे दे दे गौरी’ सोपान इति !!!
अगले भाग में गौरी की गोद भराई की रस्म पूरी होगी … बस थोड़ा सा इंतज़ार …
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 37
हे लिंग देव !!! आज तो तुमने सच में ही लौड़े लगा ही दिए। सुबह-सुबह गौरी के घर से समाचार आया कि उसकी भाभी को लेबरपेन (जचगी का दर्द) शुरू हो गया है और उसे अस्पताल ले जाना होगा।
रात के घमासान के बाद गौरी की तो उठने की भी हिम्मत नहीं थी। मैंने देखा गौरी के चहरे पर थकान और उनींदापन सा था। उसे यहाँ से जाना कतई पसंद नहीं आया था। पर क्या किया जा सकता था गौरी को तो घर जाना ही पड़ा।
मधुर ने उसे पांच हज़ार रुपये देते हुए यह भी कहा कि वह ज्यादा दिन उसे वहाँ नहीं रुकने देगी और गुलाबो को कहकर वहाँ अंगूर या किसी और को बुलाने के लिए बोल देगी।
मधुर के पीछे स्कूटी के पीछे बैठकर घर जाते समय उसने कातर नज़रों से मेरी ओर देखा।
मुझे लगा वह अभी रोने लगेगी।
अगले 3-4 दिन तो बस गौरी की याद में ही बीते। मधुर तो वैसे भी आजकल सेक्स में ज्यादा रूचि नहीं दिखाती है। सितम्बर माह शुरू हो चुका है और इसी महीने के अंत तक मुझे भी ट्रेनिंग के लिए बंगलुरु जाना पड़ेगा।
कई बार तो मन करता है यह नौकरी का झेमला छोड़-छाड़कर किसी शांत जगह पर किसी आश्रम में ही रहना शुरू कर दूं।
और फिर एक अनहोनी जैसे हम सब का इंतज़ार ही कर रही थी।
कोई 3 बजे होने मधुर का फ़ोन आया।
“प्रेम! वो … वो … गौरी के साथ एक अप्रिय घटना हो गई है.” मधुर की आवाज काँप सी रही थी।
“क … क्या हुआ? कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया?” मेरी तो जैसे रूह ही कांप उठी और मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा था।
“प्लीज एक बार आप घर आ सकते हो तो जल्दी आ जाओ.”
“ओह … गौरी ठीक है ना?”
“आप जल्दी आ जाओ हमें गौरी के घर चलना होगा.”
मुझे तो लगा मुझे सन्निपात (लकवा) हो गया है।
हे लिंग देव! ये क्या हो गया।
मैं ऑफिस का काम समझाकर घर पहुंचा तो मधुर मेरा इंतज़ार ही कर रही थी।
हम दोनों गुलाबो के घर पहुंचे। मधुर तो यहाँ कई बार आई भी है पर मेरे लिए यह पहला मौक़ा था। मधुर कार से उतर कर जल्दी से घर के अन्दर चली गई और मैं बाहर ही खड़ा रहा।
कोई आधे घंटे के बाद मधुर गौरी को साथ लिए बाहर आई।
गौरी के कपड़े अस्त व्यस्त से थे और वह बहुत घबराई हुई सी लग रही थी। मधुर उसे सांत्वना दे रही थी।
घर आने के बाद मधुर ने गौरी से कहा- तुम हाथ मुंह धोकर कपड़े बदल लो मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ। पता नहीं सुबह से कुछ खाया भी है या नहीं?
“मेली इच्छा नहीं है.” गौरी ने कहा।
“मैंने गुलाबो को बोला भी था किसी और को बुला लो पर घर वाले तो सब बस तुम्हारी जान के पीछे पड़े हैं.”
गौरी तो अब रोने ही लगी थी।
“ना … मेरी लाडो … अब तुम उस घटना को भूल जाओ। किसी से कुछ बताने की जरूरत नहीं है और अब मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर दुबारा वहाँ नहीं जाने दूँगी. मैंने बोल दिया है गुलाबो को।”
फिर गौरी बाथरूम चली गई और मधुर चाय नास्ता बनाने रसोई में चली गई।
“मैं थोड़ी देर मार्किट में जाकर आता हूँ.” कहकर मैं घर से बाहर आ गया।
इस आपाधापी में शाम के 6 बज गए थे। मुझे कोई विशेष काम तो नहीं था पर अभी थोड़ी देर गौरी और मधुर को अकेले छोड़ना जरूरी था। पता नहीं क्या बात हुई थी? गौरी के सामने मैं यह सब नहीं पूछना चाहता था।
रात को गौरी तो सोने चली गई और फिर मधुर ने जो बताया वो संक्षेप में इस प्रकार था।
गौरी की भाभी के लड़का हुआ था। बच्चा कमजोर था तो उसे आईसीयू में रखना पड़ा था। डॉक्टर बता रहे थे कि नवजात को इन्फेक्शन है और साथ में पीलिया भी है। बेचारी गौरी पहले घर का काम करती और फिर भाभी और अन्य लोगों का खाना लेकर अस्पताल के चक्कर काटती रहती है।
3-4 दिन बाद जच्चा-बच्चा घर आ गए।
तीन दिन बाद आज सुबह गौरी दवाई लेने अस्पताल अस्पताल गई थी तो आते समय उसी अस्पताल में भर्ती किसी मरीज को देखने आये मोहल्ले के एक जानकार लड़के ने गौरी को अपनी बाइक पर घर छोड़ देने के लिए कहा।
रास्ते में उसने सुनसान जगह पर उसने गौरी के साथ छेड़-छाड़ करने की कोशिश की। गौरी ने अपने आप को किसी तरह छुड़ाया और उसके शोर मचाने से वहाँ कुछ लोग आ गए। और फिर उस लड़के को पकड़ कर खूब पिटाई की.
और बाद में गौरी के घरवालों को समाचार दिया तो गौरी का बाप 8-10 लोगों को लेकर मौके पर आ गया। वह सब तो उस लड़के को जान से मार देने पर उतारू हो गए थे। इस बीच लड़के के घर वाले भी आ गए। वह लड़का बार-बार बोलता जा रहा था उसने कुछ नहीं किया। गौरी के अस्त व्यस्त कपड़ों पर खून के दाग लगे देखकर सभी यह सोचे जा रहे थे कि जरूर इसके साथ दुष्कर्म हुआ है।
गौरी का बाप पुलिस बुलाने पर जोर देने लगा। लड़के वाले घबरा गए थे और बीच बचाव करने लगे थे। साथ के लोगों ने समझाया बुझाया और फिर एक नेता टाइप के आदमी ने, जो लड़के वालों के साथ आया था गौरी के बापू को एक तरफ ले जाकर कुछ समझाया। और फिर उसने लड़के वालों से एक लाख बीस हज़ार रुपये गौरी के बाप को देने का फैसला किया कि यह मामला पुलिस तक ले जाने के बजाय यहीं निपटा दिया जाए।
चूंकि लड़की का मामला है इसलिए उसकी और परिवार की भी इज्जत की दुहाई देकर मामला वहीं रफा दफा कर दिया। बेचारी गौरी से तो किसी ने कुछ पूछने की भी जरूरत नहीं समझी।
बाद में गौरी ने मधुर को फ़ोन पर इस घटना की जानकारी दी। आगे की कहानी तो आप जान ही चुके हैं।
“प्रेम! इस समय गौरी की मानसिक हालत ठीक नहीं है। उसे बहुत बड़ा सदमा पहुंचा है। तुम भी 2-4 दिन उससे कुछ मत पूछना और कहना।”
“हुम्म …” मेरे मुंह से बस यही निकला। ये गौरी के घर वाले भी अजीब हैं।
अगले 2-3 दिन स्कूल से छुट्टी लेकर घर पर ही रही। गौरी अब कुछ संयत (नार्मल) होने लगी है। आज सुबह मधुर स्कूल चली गई है। गौरी ने चाय बना दी थी और हम दोनों चाय पी रहे थे। गौरी पता नहीं किन ख्यालों में डूबी थी।
“गौरी एक बात पूछूं?”
“अं… हाँ…” आज गौरी के मुंह से ‘हओ’ के बजाय ‘हाँ’ निकला था।
“तुम्हारी तबीयत अब ठीक है ना?”
“हओ” उसने उदास स्वर में जवाब दिया।
“गौरी मैं तुम्हारी मानसिक हालत समझ सकता हूँ और अब उन बातों को एक बुरा सपना समझ कर भूलने की कोशिश करो और फिर से नई जिन्दगी शुरू करो।”
गौरी ने मेरी ओर देखा। मुझे लगा गौरी की आँखें डबडबा आई हैं। मैं उठकर गौरी के पास आ गया और उसके पास बैठ कर उसके सिर पर हाथ फिराने लगा। गौरी की आँखों से तो जैसे आंसुओं का झरना ही निकल पड़ा।
“इससे अच्छा तो मैं मलर जाती।”
“ओह… तुम ऐसा क्यों बोलती हो?”
“अब मैं जी कर क्या करुँगी? किसी को मेरी परवाह कहाँ हैं, सबके अपने-अपने मतलब के हैं। पैसा मिलते ही बाप तो दारु की बोतल ले आया। मोती (गौरी का भाई) इन पैसों से बाइक लेने के लिए झगड़ा करने लगा और अनार दवाई और घर खर्च के लिए पैसे माँगने लगी। सब मेरे बदले मिली खैरात से मजे करना चाहते हैं किसी को मेरी ना तो परवाह है और ना ही मेरे साथ हुई इस दुर्घटना का दुःख। सच कहूं तो मेरा मन तो आत्मह्त्या कर लेने का कर रहा है।” कहकर गौरी सुबकने लगी थी।
गौरी अपनी जगह सही कह रही थी। सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं और सभी गौरी को इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसे गौरी एक जिन्स (मंडी में बिकने वाली वस्तु) है।
“नहीं मेरी प्रियतमा… ऐसा नहीं बोलते… तुम्हारे बिना मैं और मधुर कैसे रह पायेंगे? ज़रा सोचो?”
कहकर मैंने रोती हुई गौरी को अपने सीने से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फिराने लगा।
“अब मैंने भी फैसला कर लिया है, मैं ना तो अब घर जाऊँगी ना कभी घरवालों का मुंह देखूँगी। अगर उन लोगों ने ज्यादा कुछ किया तो मैं जहर खा लूंगी। अब मैंने भी अपने हिसाब से अपनी जिन्दगी जीने का फैसला आकर लिया है।”
“ओह… तुम चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा। मैं नहा लेता हूँ तुम आज मेरी पसंद का बढ़िया सा नाश्ता बनाओ हम दोनों साथ में नाश्ता करेंगे… शाबाश अच्छे बच्चे.” कहकर मैंने गौरी के गालों को थपथपाया। लगता है गौरी आज गौरी का मूड बहुत खराब है।
नाश्ता करते समय मैंने गौरी द्वारा बनाए पराठों की तारीफ़ करते हुए पूछा- गौरी तुम्हें थोड़ा अच्छा तो नहीं लगेगा पर एक बात पूछूं?
“क्या?”
“वो… दरअसल उस दिन उस लड़के ने तुम्हारे साथ किया क्या था?” मुझे लगा गौरी आनाकानी करेगी।
“मुझे इसी बात का तो दुःख है.”
“क्या मतलब?” अब मेरे चौंकने की बारी थी।
“किसी ने भी मेरे से यह जानने की जरूरत ही नहीं समझी कि हुआ क्या था?”
“ओह… क… क्या हुआ था?” मैंने झिझकते हुए पूछा।
“उस लड़के ने रास्ते में सु-सु करने के लिए एक सुनसान सी जगह पर बाइक रोकी। मुझे भी लग रहा था कि मेरा एमसी पैड सरक गया है। मुझे डर था कहीं कपड़े ना खराब हो जाए तो मैं भी झाड़ियों में सु-सु करने और पैड ठीक करने बैठ गई। मुझे क्या पता वह लड़का मुझे पीछे से देख रहा था। अचानक वह मेरे पीछे आ गया और मुझे पकड़कर अपनी ओर खींचने लगा। फिर वह मुझे पैसों का लालच भी देने लगा तो मैं जोर-जोर से चिल्लाने लगी तो वहाँ पर 3-4 आदमी आ गए मेरे अस्त व्यस्त कपड़े और नीचे के कपड़ों पर लगा खून देखकर उन्होंने समझा कि यह लड़का मेरे साथ दुष्कर्म कर रहा था। पहले तो उन लोगों ने उसे खूब मारा और फिर मेरे मोबाइल से घर वालों को फोन करके बुला लिया।”
“और वो दुष्कर्म वाली बात?”
“मैंने बताया ना उसने मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचने की कोशिश की थी। मैंने अपना हाथ छुड़ाकर उसे धक्का दे दिया था और सड़क की ओर भाग आई थी। वह दौड़ता हुआ मेरे पीछे आया फिर मेरे शोर मचाने से लोग आ गए थे।”
“इसका मतलब उसने तुम्हारे साथ दुष्कर्म जैसा तो कुछ किया ही नहीं?”
“किच्च…”
“क्या मधुर को तो इस बात का पता है?”
“पता नहीं … मुझे रोता हुआ देखकर दीदी ने मुझे अपनी कसम देकर कहा कि अब तुम्हें इस बारे में किसी से कोई बात नहीं करनी है, जो हुआ उसे भूल जाओ.”
“ओह…” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला।
प्रिय पाठको और पाठिकाओ! मुझे मधुर के इस व्यवहार पर जरूर शक हो रहा है। मधुर तो उड़ते हुए कौवों के टट्टे (आंड) गिन लेती है तो यह बात उससे कैसे छिपी रह सकती है कि गौरी को उस दिन महीना (पीरियड) आया हुआ था? पता नहीं मधुर के मन में क्या चल रहा है। सबसे बड़ी हैरानी की बात तो यह है कि ना तो उसने गौरी से दुष्कर्म के बारे में कोई सवाल किया ना ही उसे कोई दवाई या पिल्स लेने को कहा.
मैं मधुर से इन सब बातों को पूछना तो चाहता था पर बाद में मैंने अपना इरादा बदल लिया।
चलो आज 4-5 दिन के बाद गौरी से सम्बंधित चिंता ख़त्म हो गई। मैंने आज जान बूझकर गौरी के साथ तो कोई अन्यथा हरकत (बकोल गौरी-शलालत) नहीं की अलबत्ता रात में मधुर को दो बार कस-कस के रगड़ा।
दूसरे दिन वह जिस प्रकार वह चल रही थी आप जैसे अनुभवी लोग अंदाज़ा लगा सकते हैं कि रात को उसके क्या हालत हुई होगी।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 38
औ
मीठी
“हओ”
और फिर दूसरे दिन सुबह जब मधुर स्कूल चली गई तो गौरी मेनगेट बंद करके सोफे पर आकर बैठ गई। मैंने प्यार से गौरी को अपनी ओर खींचकर उसे अपनी बांहों में भर लिया।
गौरी ने कोई आनाकानी नहीं की।
मुझे बड़ी हैरानी सी हो रही थी आज पहली बार गौरी ने मेरे होंठों का चुम्बन लेने में पहल की थी।
“गौरी! पिछले 8-10 दिन से तुम्हारे बिना तो यह पूरा घर ही सूना-सूना सा लग रहा था। तुम्हारे आने से रौनक फिर से लौट आई है।”
“मैं भी आपको कित्ता याद किया… मालूम?”
“मैं समझ सकता हूँ.” कह कर मैंने उसे एक बार फिर से चूम लिया और जोर से बांहों में भींच लिया। गौरी तो उईईईई… करती ही रह गई। मेरा लंड पायजामे में उछलने लगा था। उसके गुलाबी होंठों को देखकर अपना लंड चुसवाने को करने लगा था।
“गौरी एक बात बोलूं?”
“हम्म” कहकर गौरी ने मेरी नाक को चूम लिया।
“तुमने अगर वो मुहांसों की दवा नहीं ली तो ये मुहांसे फिर से हो जायेंगे.” मैंने हंसते हुए कहा।
मुझे लगा गौरी जरूर ‘हट’ बोलेगी और फिर मैंने उसके नितम्बों की खाई में हाथ फिराना चालू कर दिया।
“अब मुझे मुंहासों का कोई फिक्र नहीं है.”
“ऐसा क्यों?”
“मुझे अब कौन सी शादी करवानी है?” कहकर गौरी जोर-जोर से हंसने लगी थी।
“ओह…”
“गौरी क्या तुम्हारा मन प्यार करने और करवाने का बिल्कुल नहीं होता?”
“हट! प्यार करने से थोड़े ही होता है वह तो अपने आप हो जाता है?”
अब मैंने गौरी की सु-सु के पपोटों को पकड़कर भींचना शुरू कर दिया। गौरी की मीठी सीत्कार निकलने लगी।
“गौरी आज मेरा मन बहुत कर रहा है तुम अपने लड्डू को अपने होंठों से प्यार करो.”
“अच्छा जी … मेरे लड्डू को इतने दिनों बाद इन होंठों की याद आई? मुझे तो लगा वह तो मेरे होंठों को भूल ही गया है.”
और फिर गौरी मेरी गोद से उठकर सामने आ गई और मेरे पायजामे का नाड़ा खोल दिया। लंड तो किसी स्प्रिंग की तरह उछलकर खड़ा हो गया। गौरी ने मेरे लंड को कसकर मुट्ठी में पकड़ लिया और पहले तो सुपारे पर अपनी जीभ फिराई और फिर अपने मुंह में लेकर चूसने लगी।
कितने दिनों बाद उसके होंठों और मुंह का गुनगुना सा अहसास महसूस हुआ था। मुंह के अन्दर-बाहर होता लंड तो ठुमके लगाता हुआ मस्त हो गया।
थोड़ी देर चूसने के बाद गौरी ने उठ कर खड़ी हो गई और मुझे धक्का सा देते हुए सोफे पर लेट जाने का इशारा किया। अब गौरी मेरे ऊपर आ गई और अपनी पजामी के उपर से ही अपनी सु-सु को मेरे लंड पर घिसने लगी थी। आज तो गौरी की यह अदा सच में ही दिल फरेब थी।
और फिर उसने अपने इलास्टिक वाली पजामी को नीचे किया और फिर से अपनी सुसु को मेरे लंड पर रगड़ने लगी। लंड जब भी उसके दाने से टकराता उसकी हलकी सी सीत्कार और किलकारी सी गूँज जाती। उसके सु-सु तो रतिरस से लबालब भर सी गई थी।
मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया- गौरी ऐसे रगड़ने से तुम्हें अच्छा लग रहा है ना?
“किच्च…” कह कर गौरी ने मेरे होंठों को जोर से चूम लिया।
नारी सुलभ लज्जा के कारण स्त्री कभी भी खुलकर अपनी इच्छा को प्रकट नहीं करना चाहती। यह तो उसके हाव भाव और अदाओं से ही समझना होता है।
“गौरी प्लीज… बताओ ना?”
“हट! मुझे शर्म आती है।”
मैं गौरी के नितम्बों की खाई में हाथ फिराता जा रहा था। अब मैं अपनी एक अंगुली उसकी गांड के छेद पर भी फिराने लगा था और साथ में उसके बूब्स भी चूसने चालू कर दिए थे। अब तक गौरी ने अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ कर अपनी सु-सु में सेट कर लिया था और अपने नितम्बों को ऊपर नीचे करने लगी थी।
“आपको एक बात बताऊँ?”
“हओ”
“वो… अंगूर दीदी है ना?”
“हम?”
“कई बार वह बहुत बेशर्म और गन्दी बातें करती है.”
“कैसे?”
“पता है क्या बोलती है?”
“क्या?”
“वो… वो… बोलती है मरद के मुंह पर अपनी सु-सु रगड़ने में बहुत मजा आता है?”
“हा… हा… हा… वो अपने आदमी के मुंह पर रगड़ती है क्या?”
“मुझे क्या पता? मुझे तो उन्होंने उस सुहागरात वाली रात को बताया था।”
“हम्म… और क्या बताया?”
“और … और …” कहते हुए गौरी फिर से शर्मा गयी।
इस्स्स्सस…
“यार अब बता भी दो? एक तो तुम बेवजह शर्माती बहुत हो.” कहकर मैंने उसकी कमर पकड़कर अपने नितम्बों को उचकाते हुए एक धक्का लगा दिया।
“वो दीदी बोलती है… कसम से किसी मर्द के मुंह में मूतने का मजा ही कुछ और होता है। जब मूत की धार उसकी चूत से सटी हुई मर्द की जीभ से टकराती है और वो चूत के घुंडी को अपनी जीभ से सहला रहा होता है तो पूरा शरीर रोमांच से गनगना उठाता है।”
“वाह… अंगूर तो फिर खूब मजे करती होगी?”
“वो एक बात और भी बोलती है?”
“क्या?”
“हाय … छर्र-छर्र मूत की धार में लण्ड की तलवार जब अचानक से उसके बहाव को रोकने के लिए चूत में घुस जाए तो कसम से औरत को स्वर्ग जैसे आनंद की अनूभूति होती है।”
“ए गौरी आज हम भी करें क्या?”
“हट! मुझे नहीं करना गंदा काम!”
शायद अंगूर को मेरे साथ बिताए पल बहुत याद आते होंगे। मुझे याद पड़ता है एकबार हम दोनों ने घंटों बाथरूम में नहाते हुए एक दूसरे के गुप्तांगों को चूमा और चूसा था और फिर अंगूर का तो रोमांच के कारण सु-सु ही निकल गया था। आह… उन पलों की याद और कसक आज भी मेरे जेहन में उमड़ती रहती हैं।
“एक बात पूछूं?” गौरी की आवाज मेरे कानों के पास सुनाई दी तब मैं अपने ख्यालों से बाहर आया।
“हओ”
“ये मोरनी कैसे बनती है?”
“मोरनी…? क्या मतलब?”
“वो कालू … भैया … ने उस चिकनी को मोरनी बनाया था ना?”
“ओह… अच्छा वो…? हा… हा… हां…” मेरी हंसी निकल गई।
“गौरी तुम कहो तो आज वैसे ही करें क्या?”
“हट! … मैं तो केवल पूछ रही थी.”
“प्लीज … आओ ना… वैसे ही करते हैं तुम्हें भी बहुत मज़ा आएगा.”
“ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना?”
“अरे नहीं मेरी जान… तुम तो सच में मोरनी की तरह मस्त हो जाओगी. मैं सच कहता हूँ मधुर तो इस आसन की दीवानी है.”
“सच्ची?”
“और नहीं तो क्या!”
गौरी मेरे ऊपर से उठ खड़ी हुई। मैंने अपने कपड़े झट से निकाल दिए और गौरी को भी सारे कपड़े उतारने का इशारा किया। गौरी ने शर्माते हुए अपने पायजामे और कुर्ती को उतार दिया। शर्म के मारे उसने अपने एक हाथ से अपने उरोजों को ढकने की कोशिश की और दूसरा हाथ अपनी सु-सु पर रख लिया।
मुझे अपने नंगे बदन की ओर घूरते हुए देखकर उसने अपनी पीठ मेरी ओर कर दी। याल्लाह… उसके खूबसूरत गोल कसे हुए नितम्बों को देख कर तो मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। इतने गद्देदार और कसे हुए नितम्ब देखकर तो कोई मुर्दा भी जी उठे।
सच कहता हूँ उसके कसे हुए नितम्बों को देख कर मेरा मन करने लगा था कि उसे सोफे पर अपनी गोद में बैठाकर अपना लंड उसकी गांड में डाल दूं पर इस समय तो उसे मोरनी आसन का फितूर चढ़ा था जिसे पूरा करना जरूरी था।
मैंने झट से सिंगल सीटर सोफे की दोनों गद्दियाँ उठाकर सामने वाले सोफे पर रख दी। अब मैंने गौरी को अपनी गोद में उठा लिया और उसे उन गद्दियों पर लेटा दिया। ऐसा करने से उसके पैर नीचे लटकने लगे। मैंने उसे अपने पैर ऊपर हवा में उठाने को कहा। गौरी ने धीरे-धीरे अपने दोनों पैर ऊपर उठा दिए। अब मैंने गौरी के दोनों हाथों को उसके पैरों के बीच से निकालते हुए उसे कहा कि अपने पैरों को सपोर्ट देने के लिए हाथों से अपने पैरों के पंजों को पकड़ ले।
अब तो उसकी सु-सु के मोटे-मोटे पपोटों के नीचे उसकी गांड का गुलाबी छेद नज़र आने लगा था। सु-सु का चीरा जहां ख़त्म होता है उसके एक डेढ़ इंच नीचे गांड का गुलाबी छेद और उसके चारों ओर हल्का सा बादामी रंग का घेरा सा बना था।
मैंने झुककर पहले तो उसके पपोटों पर अपनी अंगुलियाँ फिराई और फिर धीरे-धीरे उसकी गांड के छेद को सहलाने लगा। और फिर मैंने अपनी जीभ उसके चीरे पर फिराते हुए जैसे हो उसके मूलबंद (पेरीनियम) पर जीभ को फिराया तो गौरी की अति रोमांच के कारण किलकारी सी निकल गई।
मेरा पप्पू तो झटके पर झटके से खाने लगा था। अब मैं खड़ा और एक हाथ से अपने पप्पू को पकड़ कर उसे गौरी की फांकों और चीरे पर फिराने लगा। गौरी की तो मीठी सीत्कारें निकलने लगी थी। चीरा तो पहले से ही रतिरस से लबालब भरा था, पप्पू को अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचने में कोई दिक्कत कहाँ हो सकती थी।
मैं सीधा खड़ा था और गौरी के पैर मेरे सीने से होते हुए मेरे कन्धों पर आ गए थे। अब मैंने थोड़ा सा झुककर एक धक्का लगाया। मुझे लगा एक ही झटके में मेरा लंड पूरा का पूरा गौरी के गर्भाशय तक चला गया है।
गौरी की आँखें बंद थी और होंठ लरज से रहे थे। अब मैं धीरे-धीरे धक्के लगाने लगा था। हर धक्के के साथ गौरी के नितम्बों की थिरकन बढ़ाती ही जा रही थी।
हालांकि गौरी अपने नितम्बों से धक्के तो नहीं लगा सकती थी पर उसने अपनी सु-सु का संकोचन जरूर शुरू कर दिया था। उसकी बुर अन्दर से इतनी कस गई थी कि मुझे लग रहा था जैसे किसी ने मेरे पप्पू की गर्दन ही दबोच रखी है। जैसे ही मैं धक्का लगाता उसके नितम्ब थिरकने से लगते और थप्प की आवाज आती और उसके साथ गौरी की मीठी आह… सी निकल जाती।
मैंने अपने हाथ नीचे करके गौरी के उरोजों को पकड़ लिया और उसके फुनगियों को मसलने लगा। इससे तो गौरी का उन्माद तो अपने चरम पर आ गया। अब मैंने एक हाथ से उसकी गांड का छेद टटोला। चूत से निकलता हुआ रतिरस उसकी गांड के छेद को भी गीला करने लगा था।
मैंने अपनी अंगुलियाँ उस छेद पर फिरानी शुरू कर दी और अपनी अंगुली का एक पोर उसकी गांड के छेद में डाल दिया। गौरी थोड़ी सी उछली और उसका शरीर झटके से खाने लगा। मैंने अपने धक्कों की तीव्रता बढ़ा दी और उसके साथ ही गौरी की किलकारी पूरे हॉल में गूँज उठी।
‘आआऐईई ईईईईई … मैं तो गईईईईई … आह… मेरे सा…जा…न्न…’
शायद गौरी को परमानन्द मिल गया था।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 39
मैंने कसकर गौरी की जांघें पकड़ ली। गौरी का शरीर अब कुछ ढीला सा पड़ने लगा था। उसने अपने घुटने मोड़ लिए थे। मैं उसके ऊपर हो गया और उसके होंठों को चूमने लगा।
मुझे लगा वह इस आसन में थोड़ी असहज सी होने लगी है। अब आसन बदलने का समय था।
“गौरी मेरी जान आओ अब एक बार डॉगी स्टाइल में करते हैं.”
मैं गौरी के ऊपर से उठकर खड़ा हो गया और फिर से उन गद्दियों को दुबारा सोफे पर रख दिया। गौरी झट से सोफे पर अपने घुटनों को मोड़ कर डॉगी स्टाइल में हो गई। अब तो उसके नितम्ब खुलकर मेरे सामने थे। गांड का छेद खुलने और बंद होने लगा था जैसे मुझे निमंत्रण दे रहा हो। मेरा मन तो उसके गांड मार लेने को करने लगा था पर इस समय गौरी अपनी चूत की प्यास बुझाने को तरस रही थी।
मैंने अपने खड़े लंड को हाथ में पकड़ कर गौरी की पनियाई चूत के रसीले छेद पर फिर से लगाकर उसकी कमर को पकड़ लिया। मेरा आधा लंड उसके चूत में था। मैं थोड़ी देर रुक सा गया।
“आह… क्या हुआ? प्लीज… करो ना?… रूक क्यों गए? आह…” कहते हुए गौरी ने अपने नितम्बों को पीछे धकेला।
कसकर गौरी की कमर पकड़ी और एक जोर का धक्का लगाया। फच्च की आवाज के साथ मेरा लंड गौरी की बुर के अंतिम सिरे तक जा पहुंचा और उसके साथ ही गौरी की एक चीख सी निकल गई… आईईई… धीरे … प्लीज… आह…
अब तो लंड महाराज आराम से अन्दर-बाहर होने लगे थे। आज तो गौरी की सु-सु ने इतना रस बहाया था कि किसी क्रीम या तेल की कोई आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई थी।
अब तो गौरी ने भी अपने नितम्ब हिलाने शुरू कर दिए थे। मैंने अपना हाथ नीचे करके उसके मदनमणि (योनि मुकुट) को एक हाथ की चिमटी में लेकर मसलना शुरू कर दिया था और दूसरे हाथ से उसके उरोजों की घुंडियों को भी साथ-साथ मसलना चालू कर दिया।
तीन तरफ से हो रहे आक्रमण से बेचारी गौरी अपने आप को कैसे बचा पाती। वह तो अब जोर-जोर से उछलकूद मचाने लगी थी साथ में आह… उईई… भी करती जा रही थी।
अब हमने लयबद्ध तरीके से धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। हर धक्के के साथ गौरी के नितम्ब थिरकते और नीचे उसके उरोज भी हिलते। मैं धक्के भी लगा रहा था और साथ में उसके उरोजों को भी मसलता जा रहा था। कभी-कभी उसकी बुर के दाने को भी मसल रहा था।
मैं बीच बीच में उसके नितम्बों पर हलके थप्पड़ भी लगा रहा था। थप्पड़ों से उसके नितम्ब लाल से हो गए थे। जब भी मैं उसके नितम्बों पर थप्पड़ लगाता गौरी की एक मीठी सीत्कार सी निकल जाती।
आपको आश्चर्य हो रहा होगा ना?
कई स्त्रियों को सम्भोग के दौरान थोड़ी पीड़ा दी जाए तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है जैसे नितम्बों पर थप्पड़ लगाना उरोजों की घुन्डियाँ मसलना, गालों को दांतों से काटना और नाखूनों से हल्का खुरचना। इससे स्त्री का रोमांच और उन्माद बहुत जल्दी अपने चरम पर पहुँच जाता है और स्त्री कामातुर हो जाती है।
प्रिय पाठको और पाठिकाओ। हर कोई अपने सम्भोग और इन अन्तरंग संबंधों को एक लम्बे समय तक भोगना चाहता है। यही मन करता है कि इसी तरह हम समागम करते जाए और यह क्रिया कभी ख़त्म ही ना हो पर प्रकृति के अपने नियम भी हैं और उनके आगे आदमी मजबूर है।
अब मुझे लगने लगा था मेरा तोता उड़ने वाला है। अब तक गौरी को दो बार ओर्गास्म हो चुका था। उसने अपने आप को ढीला छोड़ दिया था और अपना सिर नीचे करके सोफे पर लगा लिया था।
मैंने गौरी के नितम्बों पर फिर से थपकी लगाईं और जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। अब गौरी भी जान चुकी थी कि अमृत की बारिश होने वाली है। उसने अपनी सु-सु का संकोचन शुरू कर दिया था।
और फिर उसके बाद पिछले आधे घंटे से मेरे अन्दर कुलबुलाता लावा पिंघलने सा लगा और रस की फुहारें छोड़ने लगा। पता नहीं आज कितनी पिचकारियाँ मेरे लंड से निकली होंगी हमें गिनने की फुर्सत कहाँ थी? प्रकृति ने अपना काम सम्पूर्ण कर लिया था।
मैंने झुककर गौरी को अपनी बांहों में भर लिया और उसकी पीठ और गर्दन पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। गौरी भी आँखें बंद किये अपने प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति के आनंद को महसूस करके अपने आपको रूपगर्विता समझ रही थी।
थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद मैंने अपना लंड बाहर निकाल लिया लेकिन गौरी आँखें बंद किये लम्बी-लम्बी साँसें लेती उसी मुद्रा में बनी रही जैसे पिछले दिनों मधुर रहा करती थी। गौरी की इस बात से मुझे बड़ी हैरानी सी हो रही थी।
साधारणतया स्खलन के बाद स्त्री को अपने गुप्तांगों अन्दर गुदगुदी सी महसूस होने लगती है और स्त्री सुलभ लज्जा के कारण भी सम्भोग के बाद स्त्री जल्दी से उठकर अपने गुप्तांगों को ढकने की कोशिश करती है। पर गौरी तो अपने नितम्बों को ऊपर किये पता नहीं किन ख्यालों या आनंद में डूबी थी। है ना हैरानी वाली बात?
मैं गौरी के पास सोफे पर बैठ गया। मैंने अपना एक हाथ गौरी की पीठ पर फिराना चालू कर दिया और धीरे-धीरे उसके नितम्बों की खाई की ओर ले जाने लगा तब गौरी चौंकी।
इससे पहले कि वह उठकर बैठती या बाथरूम की ओर भागती मैंने उसकी कमर पकड़ कर उसका सिर अपनी गोद में रख लिया और नीचे होकर उसके होंठों को चूम लिया।
“मेरी प्रियतमा … तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद!”
“मेरे साजन आपने भी मुझे अपने जीवन का एक अद्भुत आनंद दिया है मैं इन पलों को कभी नहीं भूल पाऊँगी।” कहकर गौरी ने भी मेरे होंठों को चूम लिया।
“गौरी, तुमने वो पिल्स तो ले ली थी ना?”
“अरे … आप चिंता मत करो … मैं तो रोज पिल्स लेती हूँ.”
“क… क्या मतलब?”
“दीदी ने मुझे टेबलेट्स लाकर दी हैं?”
“क… कैसी टेबलेट्स?” मेरा दिल किसी आशंका से धड़कने लगा था।
“वो बोलती है तुम्हें कमजोरी बहुत है तो रोज यह दवाई और एक टेबलेट लिया करो.”
“उसे कैसे पता कि तुम्हें कोई कमजोरी है?”
“वो उन्होंने मेरा खून ओल पेशाब टेस्ट करवाया था.”
“ओह… फिर?”
उन्होंने डॉक्टर से पूछकर मुझे पीने के दवाई और टेबलेट्स लाकर दी हैं.”
“प्लीज मुझे दिखाओ कैसी टेबलेट्स हैं?”
गौरी अपने कपड़े उठाकर बाथरूम में भाग गई। वह 5-7 मिनट के बाद बाहर आई। शायद वह हल्का शॉवर लेकर आई थी। उसने जीन वाला निक्कर और लाल रंग का टॉप पहन लिया था। वह जानकर अपने नितम्बों को मटका कर चल रही थी। पता नहीं ये हसीनाएं इतने नखरे कहाँ से सीख लेती हैं।
फिर अपने कमरे में जाकर एक थैली सी उठा कर ले आई जिसमें दवाई की शीशी और गोलियों के 2-3 पत्ते थे।
ओह… मैं तो गर्भनिरोधक गोलियों की बात सोच रहा था और पर यह तो विटामिन बी और ई की गोलियां थी।
यह मधुर तो मुझे मरवाकर छोड़ेगी। अगर गौरी गलती से भी प्रेग्नेंट हो गई तो निश्चित ही लौड़े लग जायेंगे। मैंने सोच लिया अगली बार से मैं निरोध का प्रयोग जरूर करूंगा।
“क्या हुआ?”
“ओह… हाँ.. वो.. वो…” मेरे दिमाग ने तो जैसे सोचना ही बंद कर दिया था।
“आप भी नहा लो, मैं नाश्ता बनाती हूँ.” कहकर गौरी रसोई में चली गई।
मैं बोझिल कदमों से बाथरूम में चला आया। नहाते समय मैं मधुर के बारे में ही सोच रहा था। कुछ ना कुछ खुराफात तो मधुर के दिमाग में जरूर चल रही है। उस दिन गौरी के घर वालों ने उसके साथ हुए दुष्कर्म के बारे में तो जरूर बताया ही होगा. पर मुझे हैरानी हो रही है कि उसने ना तो गौरी से उस दिन की बात पर ज्यादा सवाल किये और ना ही गर्भ निरोधक पिल्स ही लेने को कहा। कमाल है? गौरी प्रेग्नेंट हो गई तो?
हे लिंग देव! अब तो बाद तेरा ही एक सहारा बचा है।
अचानक मेरे दिमाग कि जैसे बत्ती ही जल उठी।
ओह… मैं भी निरा गाउदी ही हूँ? यह बात मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आई? सब की नज़रों में गौरी के साथ दुष्कर्म हुआ था और अगर अब वह गर्भवती हो भी जाती है तो इसे उसी के परिणाम स्वरूप देखा जाएगा। ओह … कहीं मधुर बेचारी इस गौरी को इस्तेमाल तो नहीं कर रही?
पता नहीं आगे क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है. पर मुझे लगा जैसे एक साथ बहुत बड़ा बोझ मेरे सिर से उतर गया है और मैं अपने आप को बहुत हल्का महसूस करने लगा हूँ। पिछले 1 महीने से मेरे दिमाग में चल रही सारी चिंताएं एक ही झटके में दूर हो गई है। अब तो बिना किसी चिंता और फिक्र के गौरी को मर्ज़ी आये वैसे तोड़ा मरोड़ा जा सकता है।
हे लिंग देव! आज तो तेरी सच में जय हो!
मैं बाथरूम में फर्श पर बैठ गया और नल चलाकर अपने लंड को उसकी तेज़ धार के नीचे लगा दिया। मन तो कर रहा था गौरी को पकड़ कर बाथरूम में ले आऊँ और फिर हम दोनों साथ नहायें और फिर गौरी अपनी सु-सु को मेरे मुंह पर रगड़ने लगे तो खुदा कसम मज़ा ही आ जाए।
मेरा लंड तो इन्ही ख्यालों में फिर से झटके खाने लगा। हे भगवान्! उसके नितम्ब तो दिन पर दिन क़यामत ही बनते जा रहे हैं। उस रात तो बस एक बार ही उसने मुझे अपनी गांड का मज़ा लेने दिया था।
उस रात मेरा कितना मन था कि उसे डॉगी स्टाइल में करके उसकी गांड का मज़ा लिया जाए। मुझे लगता है गौरी ने सुहागरात में अपने भैया को इसी स्टाइल में भाभी की गांड मारते देखा था तो उसे भी यह अनुभव ले लेने का मन तो जरूर करता होगा।
काश! आज सोफे पर गौरी को अपनी गोद में बैठाकर अपने पप्पू को उसकी गांड में डालने का मौक़ा मिल जाए तो खुदा कसम यह जिन्दगी की सबसे हसीन यादगार बन जाए। पता नहीं मुझे क्यों ऐसा लग रहा था कि अंगूर की तरह दुबारा इसकी गांड मारने का मौक़ा मुझे नहीं मिलेगा। पता नहीं मुझे आज इतनी असुरक्षा क्यों महसूस हो रही थी। किसी भी तरह आज गौरी को इसके लिए मनाना ही पड़ेगा।
मैंने नहाने के बाद कपड़े नहीं पहने थे बस बनियान और लुंगी ही पहनी थी। जब मैं बाथरूम से बाहर आया तब तक गौरी नाश्ता तैयार कर चुकी थी। उसने आज प्याज और हरी मिर्च डालकर बेसन के चीले बनाए थे और साथ में बढ़िया कॉफ़ी।
आजकल मधुर की अनुपस्थिति गौरी नाश्ते के समय मेरी बगल में ही बैठ जाती है और फिर हम दोनों साथ में नाश्ता करते हैं। मैंने गौरी को बाजू से पकड़ कर अपनी गोद में बैठा लिया। गौरी थोड़ी कसमसाई तो जरूर पर उसने ज्यादा हील-हुज्जत नहीं की।
फिर हम दोनों ने एक दूसरे को अपने हाथों से नाश्ता करवाया। मेरा लंड बारबार ठुमके लगाने लगा था। गौरी ने जब इसे महसूस किया तो उसने अपने नितम्बों को मेरी गोद में ठीक से सेट कर लिया।
“ये लड्डू तो हमेशा भूखा ही रहता है.” गौरी ने हंसते हुए कहा।
“गौरी तुम इतनी खूबसूरत हो कि मन ही नहीं भरता.” कह कर मैंने गौरी के गालों पर एक चुम्बन ले लिया।
“हट!”
“ए जान! आओ न एक बार फिर से कर लें?”
“अभी तो किया था? ऐसे जल्दी-जल्दी करने से आपको कमजोरी आ जायेगी? अब आप ऑफिस जाओ देर हो जायेगी.”
“गौरी प्लीज मान जाओ ना?” मैंने किसी बच्चे की तरह गौरी से मनुहार की तो उसकी हंसी निकल गई।
“पता है मेरे से तो ठीक से चला भी नहीं जा रहा.”
“प्लीज… गौरी यह दर्द तो बस थोड़ी देर का है पर वह आनंद तो हमें कितना रोमांच से भर देता है तुम अच्छे से जानती हो.” मैंने एक बार फिर से मनुहार की।
अब बेचारी गौरी कैसे मना कर सकती थी।
“आप मुझे फिर से गंदा कर देंगे तो मुझे फिर नहाना पड़ेगा?”
“अरे… मेरी जान … प्रेम करने से कुछ गंदा नहीं होता.”
कह कर मैंने गौरी को अपनी गोद में उठा लिया।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 40
मैंने गौरी को अपनी गोद में उठा लिया।
“ओह… रुको तो सही? मुझे कुल्ला करके हाथ तो धो लेने दो प्लीज…”
मैं गौरी को अपनी गोद में उठाए वाशबेसिन की ओर ले आया। उसने किसी तरह हाथ धोये और कुल्ला किया। अब मैं उसे उसे लेकर आर्म्स वाले सिंगल सोफे पर बैठ गया और उसे अपनी गोद में बैठा लिया। मेरी लुंगी इस आपाधापी में खुल कर नीचे गिर गई।
“गौरी इन कपड़ों में तुम्हारे नितम्ब बहुत खूबसूरत लगते हैं। गौरी मेरा मन इनको प्यार करने को कर रहा है.”
“ओह… उस रात मुझे बहुत दर्द हुआ था.”
“मेरी जान … पहली बार में थोड़ा दर्द होता है उसके बाद तो बस एक मीठी और मदहोश करने वाली चुनमुनाहट सी ही होती है और अगले कई दिनों तक उसकी याद रोमांचित करती रहती है.”
“प्लीज … आज रहने दो… कल कर लेना.” गौरी ने मेरी आँखों में आँखें डालते हुए कहा।
दोस्तो, यह खूबसूरत लौंडियों के नखरे होते हैं। उनकी ना में भी एक हाँ छिपी होती है।
“गौरी प्लीज… कल तक का इंतज़ार अब मैं सहन नहीं कर सकूंगा। पता नहीं तुम्हारे रूप में ऐसी क्या कशिश है कि तुम्हें बार-बार अपनी बांहों में भरकर प्रेम करने को मन करता है। कहीं तुमने मेरे ऊपर कोई जादू तो नहीं कर दिया?” कह कर मैं हंसने लगा।
अब गौरी के पास रूप गर्विता बनकर मुस्कुराने ले सिवा क्या बचा था।
“अच्छा आप रुको … मैं अभी आती हूँ.” कहकर गौरी दुबारा बाथरूम में चली गई।
कोई 5-7 मिनट के बाद गौरी वापस आई। उसके एक हाथ में नारियल तेल की शीशी पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से अपने अपने शरीर पर लिपटे हुए तौलिए को कसकर पकड़ रखा था। वह बेचारा तौलिया उसकी उफनती जवानी को ढक पाने में कहाँ सक्षम था, वह तो केवल उसके उरोजों और सु-सु को ही थोड़ा ढक सकता था।
मैं तो फटी आँखों से अपलक उसे देखता ही रह गया। गौरी मेरे सामने आकर खड़ी हो गई और उसने अपनी आँखें बंद कर के अपनी मुंडी झुका ली थी।
मैंने उसके तौलिये को हाथ से खींचकर हटा दिया। शर्म के मारे गौरी ने अपने दोनों हाथों से अपनी सु-सु को ढक लिया। अब मैंने उसे अपनी गोद में बैठा लिया।
“आप तो मुझे पूरा ही बेशर्म बनाकर छोड़ोगे?”
“मेरी जान … भोजन और भोग में शर्म नहीं की जाती.” कहते हुए मैंने गौरी की गर्दन और कानों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी और उसके उरोजों को मसलना शुरू कर दिया। मेरा लंड उसके कसे हुए नितम्बों के नीचे दबा कसमसा रहा था। गौरी जान बूझकर अपने नितम्बों से मेरे लंड को दबा सा रही थी।
“गौरी तुम्हारा लड्डू तुम्हारे प्यार के लिए तरस रहा है मेरी जान!”
“आह… तरसने दो…” कह कर गौरी ने एक बार अपने नितम्बों को थोड़ा सा उठाया और फिर से मेरे लंड को दबाने लगी।
“गौरी तुम अपने पैर इस सोफे की आर्म्स पर रख लो तो आसानी होगी।”
गौरी ने मेरे कहे अनुसार अपने पैरों को सोफे की आर्म्स पर रख लिया। मेरा लंड उछलकर उसके नितम्बों की दरार से होता हुआ आगे की तरफ निकलकर उसकी सु-सु के चीरे से लग गया था। अब मैंने पास पड़ी शीशी से तेल निकाल कर अपने पप्पू पर लगा लिया। फिर मैंने गौरी की गांड के छेद को टटोला तो मुझे उस पर चिकनाई का अनुभव हुआ। मुझे लगता है गौरी पूरी तैयारी के साथ आई थी। गौरी ने अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया और मेरे पप्पू को पकड़ कर अपनी गांड के छेद पर लगा लिया।
नितम्बों में बीच लंड के चुभन स्त्री को बहुत जल्दी कामतुर बना देती है। अब मैं एक हाथ से उसकी सु-सु के पपोटे मसल रहा था और दूसरे हाथ से उसके उरोजों की नुकीली फुनगियों को मसलने लगा था। साथ में उसके गालों और गर्दन पर चुम्बन की बौछारें भी चालू कर दी थी।
गौरी तो अब उछलने ही लगी थी। मेरी जाँघों पर उसके गद्देदार नितम्बों स्पर्श पाकर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि अपने लैंडर रोवर को उसके ऑर्बिटर में डालने मेरी इच्छा कितनी बलवती होती जा रही थी।
“गौरी मेरी जान… अब बेचारे पप्पू को और ज्यादा मत तरसाओ.” मैंने उसके गालों को चूमते हुए कहा।
“आह… उईइ माँ… आपने पता नहीं मेरे ऊपर क्या जादू-टोना कर दिया है? आप पूरे कामदेव हो… आआईईई…”
गौरी का पूरा शरीर लरजने लगा था। गौरी तो रोमांच के मारे उछलने ही लगी थी। इस समय मेरा पप्पू अपने पूरे जलाल पर था। उसका सुपारा फूल सा गया था और लंड पूरा कठोर हो गया था।
मेरा मन तो कर रहा था जैसे ही गौरी जल्दी से थोड़ी ऊपर उठे मैं अपने पप्पू को उसकी गांड के गुलाबी छेद के ठीक नीचे लगा दूं। और जैसे ही वह नीचे आये मेरा पप्पू एक ही झटके में अन्दर चला जाए। पर अभी जल्दबाजी में ऐसा नहीं किया जा सकता था।
मैंने उसकी मदनमणि पर अपनी तर्जनी अंगुली फिरा दी।
“आआआईईई” रोमांच के कारण गौरी की किलकारी निकल गई।
“गौरी तुम एक बार थोड़ा सा ऊपर उठो मैं अपने पप्पू को सेट करता हूँ फिर धीरे-धीरे उस पर बैठ जाना.
”
“ओहो… आप रुको… तो सही… एक मिनट…” कहते हुए गौरी ने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा लिए। उसने मेरे पप्पू की गर्दन पकड़ ली और मेरे लिंगमुंड को अपनी गांड के गुलाबी छेद पर लगा लिया।
लगता है वह पहले से ही अपने आप को इस स्थिति के लिए तैयार कर चुकी थी। वह धीरे-धीरे नीचे होने लगी। एक दो बार तो लंड थोड़ा फिसला पर गौरी ने 2-3 बार निशाना साधे हुए अपने नितम्बों को ऊपर नीचे किया तो मेरा सुपारा उसकी गांड में सरकने लगा।
ये पल गौरी के लिए बहुत ही संवेदनशील थे। मैं दम साधे उसी तरह बैठा रहा। हाँ मैंने उसकी कमर को जरूर सहारा दिए रखा। वह थोड़ा सा रुकी और फिर धीरे-धीरे उसने अपने नितम्बों को नीचे करना शुरू कर दिया।
मेरा पप्पू उसकी गांड को चीरता हुआ अन्दर समा गया।
उसके साथ ही गौरी की हल्की चीख सी निकल गई- उईईईईई…
मैंने कसकर उसे अपनी बांहों में भर लिया। उसने मेरी जाँघों पर हाथ रखकर थोड़ा उठने की कोशिश की पर मैंने उसे अपनी बांहों में जकड़ रखा था तो उसकी कोशिश बेकार थी। वह जोर-जोर से साँसें लेने लगी थी। उसका शरीर कांपने सा लगा था।
थोड़ी देर हम ऐसे ही बैठे रहे। गौरी अब थोड़ा संयत हो गई थी। अब मैंने गौरी को फिर से चूमना शुरू कर दिया। लंड अन्दर और ज्यादा कठोर होकर ठुमके लगाने लगा था।
“गौरी तुम अपने शरीर को ढीला छोड़ दो फिर कोई दिक्कत नहीं होगी.”
“आप मेरी जान लेकर मानोगे? आह…”
“अरे नहीं मेरी जान … कोई अपनी जान कैसे ले सकता है… तुम तो मेरी जान हो… आई लव यू…”
गौरी को थोड़ा दर्द तो जरूर हो रहा था पर गौरी ने खूब सारी क्रीम और तेल अपनी गांड में लगा लिया था और मैंने भी अपने पप्पू पर ढेर सारा तेल लगा लिया था तो चिकनाई के कारण पूरा लंड झेलने में उसे ज्यादा परेशानी नहीं आई।
और अब तो वैसे भी मेरी तोतेजान की गूपड़ी इसकी अभ्यस्त हो ही गई है। गौरी ने अपने नितम्बों का संकोचन शुरू कर दिया था। सच कहता हूँ उसकी गांड अन्दर से इतनी कसी हुई थी कि मुझे लग रहा था जैसे किसी ने मेरे पप्पू की गर्दन ही दबोच रखी है।
अब तो गौरी ने भी अपने नितम्ब हिलाने शुरू कर दिए थे। मैं उसके गालों गर्दन पर चुम्बन लेते जा रहा था। फिर मैंने अपना हाथ नीचे करके उसकी भगनासा को उँगलियों में लेकर मसलना शुरू कर दिया और दूसरे हाथ से उसके स्तन के निप्पल को भी मसलना चालू कर दिया। वह तो अब जोर-जोर से उछलने लगी थी साथ में आह… उईई… भी करती जा रही थी।
मैंने उसके चीरे पर अंगुलियाँ फिरानी चालू रखी और कभी-कभी उसके मदनमणि को भी मसलता जा रहा था। अचानक मुझे लगा गौरी की साँसें तेज होने लगी है और बुर ने संकोचन शुरू कर दिया है और उसका शरीर भी हिचकोले से खाने लगा है। और फिर अचानक उसके मुंह से एक रोमांच भरी किलकारी सी निकली और उसके साथ ही उसकी बुर ने पानी छोड़ दिया। मेरी अँगुलियों पर चिपचिपा सा पानी महसूस होने लगा।
लंड तो गांड के अन्दर बैठा अपने भाग्य को सराह रहा था। गौरी 3-4 बार और ऊपर-नीचे उछली और फिर उसका शरीर ढीला सा पड़ गया और वह लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगी। मैंने उसे बांहों में भरे रखा और उसके गालों को चूमता रहा।
गौरी के पैर अभी भी सोफे के हत्थे पर ही थे। उसने अपने नितम्बों को थोड़ा ऊपर कर लिया था। अब मैंने नीचे से हलके हलके धक्के लगाना शुरू आकर दिया था। गौरी की मीठी सित्कारें निकलने लगी थी।
कोई 8-10 मिनट के बाद मुझे लगा गौरी थोड़ा थक सी गई है। पर मेरी ख़ुशी के लिए हर दर्द सहन कर रही है।
“गौरी मेरी जान… अब दर्द तो नहीं हो रहा ना?”
“दर्द तो इतना नहीं है पर मेरे पैर दुखने लगे हैं?”
“तुम अपने पैर नीचे रख लो फिर आराम मिलेगा.”
गौरी ने धीरे-धीरे अपने पैर नीचे जमीन पर कर लिए। ऐसा करने से उसकी गांड का छेद बहुत ही कस गया था और अब धक्के नहीं लगाए जा सकते थे। बस उस आनंद को महसूस किया जा सकता था कि मेरा पूरा लंड गौरी के अन्दर समाया हुआ है। उसकी मखमली जांघें मेरी जाँघों से सटी हुई थी।
“एक… बात बोलूं?” गौरी ने शर्माते हुए कहा।
“हम्म?” मैंने गौरी की कांख पर जीभ फिराते हुए कहा।
“वो… वो…”
ईइईस्सस्स स्सस… गौरी की यह शर्माने की आदत तो मेरा कलेजा ही चीर देगी।
“प्लीज बोलो ना?”
“वो डॉगी स्टाइल में हो जाऊं क्या?”
“अरे वाह… मेरी जान… तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली? नेकी और पूछ-पूछ?”
“ज्यादा दर्द तो नहीं होगा ना?”
“अरे मेरी जान … तुम्हारे भैया की तरह मैं कोई अनाड़ी थोड़े ही हूँ? तुम चिंता मत करो.”
मेरे ऐसा कहने पर गौरी ने मेरी गोद से उठने का प्रयास किया तो मैंने उसके कमर पकड़ते हुए उठने से मना कर दिया। मैं जानता था एक बार अगर मेरा लंड बाहर निकल गया तो वापस डालने में बड़ी दिक्कत हो सकती है। इसलिए लंड अन्दर डाले हुए ही गौरी को डॉगी स्टाइल में करना ठीक रहेगा।
“गौरी मैं तुम्हें कमर से पकड़ कर गोद में उठाता हूँ फिर हम धीरे-धीरे बड़े वाले सोफे पर शिफ्ट हो जाते हैं. पर आराम से, जल्दबाजी मत करना!”
“हओ”
गौरी को अपनी गोद में उठाये हुए मैं बड़े वाले सोफे की ओर आ गया। गौरी ने अपने घुटने मोड़ दिए और डॉगी स्टाइल में हो गई। लंड थोड़ा तो बाहर निकला था पर आधा तो अन्दर ही फंसा रहा था।
[size=large]तीन पत्ती गुलाब
भाग 41
गौरी को अपनी गोद में उठाये हुए मैं बड़े वाले सोफे की ओर आ गया। गौरी ने अपने घुटने मोड़ दिए और डॉगी स्टाइल में हो गई। लंड थोड़ा तो बाहर निकला था पर आधा तो अन्दर ही फंसा रहा था। Click to expand… मैं फर्श पर खड़ा हो गया और गौरी ने अपना सिर सोफे पर टिका दिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब अब खुलकर मेरे सामने नुमाया हो गए। उसकी गांड का गुलाबी छल्ला तो ऐसे लग रहा था जैसे किसी छोटे बच्चे की कलाई में कोई चूड़ी फंसी हुई हो। मैं तो बस उसे देखता ही रह गया।
गौरी के नितम्ब अब भी लाल से लग रहे थे। थोड़ी देर पहले जब हमने इसी मुद्रा में सेक्स किया था उस समय मैंने गौरी के नितम्बों पर थप्पड़ लगाये थे उनकी लाली अभी भी बरकरार थे।
मैंने प्यार से उसके नितम्बों पर हाथ फिराना चालू किया और फिर हल्का सा धक्के लगाया।
“आईईई …” गौरी की मीठी सीत्कार निकल गई।
गांड के अन्दर-बाहर होता लंड तो किसी पिस्टन की तरह लग रहा था। गौरी ने एक बार अपनी गांड का संकोचन किया। इस अदा से मेरा लंड तो निहाल ही हो गया।
गौरी ने अपना एक हाथ पीछे कर के मेरे लंड को टटोला और फिर अपनी गांड के छल्ले पर अंगुलियाँ फिराई। शायद वह यह जानना चाहती थी कि मेरा इतना बड़ा और मोटा लंड वास्तव में ही गांड के अन्दर चला गया है।
खैर उसका जो भी सोचना था पानी जगह था पर मेरे रोमांच का पारावार ही नहीं था। कई बार मैंने मधुर के साथ भी इसी मुद्रा में कई बार गुदा मैथुन किया है पर गौरी की कसी हुई गांड तो वास्तव में ही लाजवाब है।
मुझे लगता है वो ऑफिस वाला नताशा नाम का जो मुजसम्मा है उसकी गांड भी गौरी की तरह बहुत ही खूबसूरत और कसी हुई होगी। जिस प्रकार वह अपने नितम्बों को मटकाकर चलती है लगता है उसे भी अपने नितम्बों की खूबसूरती का अहसास जरूर है। काश! एक बार उसकी गांड मारने को मिल जाए तो मज़ा आ जाए। मेरा तो मन करता है उसे बाथरूम में घोड़ी बनाकर एक ही झटके में अपना पप्पू उसकी गुलाबी गांड में डाल दूं।
कितना अजीब सी बात है ना? पुरुष और स्त्री की मानसिकता में? पुरुष एकाधिकारी बनाना चाहता है उसका प्रेम बस किसी वस्तु या सुन्दर स्त्री को प्राप्त के लेने से पूर्ण हो जाता है जबकि स्त्री अपने प्रेम को दीर्घायु बनाना चाहती है। जब तक मुझे गौरी की चूत और गांड नहीं मिली थी तब तक मैं उसके लिए जैसे मरा ही जा रहा था और जब गौरी मुझे अपना सब कुछ सोंप कर पूर्ण समर्पिता बन गई है मेरा मन फिर से किसी ओर की तरफ आकर्षित होने लगा है।
“क्या हुआ?” मैं गौरी की आवाज सुनकर चौंका।
“ओह… हाँ…” मैं अपने ख्यालों से वापस हकीकत के धरातल पर आया।
मैंने उसकी कमर पकड़ कर फिर से धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए। गौरी की फिर से मीठी किलकारियां निकलने लगी थी। मैंने थोड़ा सा तेल अपने लंड पर और उंडेल लिया था. अब तो पप्पू महाराज हंसते हुए अन्दर बाहर होने लगे थे।
मैंने अब अपना हाथ नीचे किया और उसके उरोजों को भी मसलना चालू कर दिया। दूसरे हाथ से उसकी सु-सु के मोटे मोटे पपोटों और फांकों को मसलना चालू कर दिया। अपनी अँगुलियों पर चूत से निकला चिपचिपा सा तरल लेप सा महसूस करने से मुझे लगा गौरी का एक बार फिर से स्खलन हो गया है।
हमें 15-20 मिनट तो हो ही गए थे गौरी की सु-सु को मसलना चालू रखा। अब तक गौरी की गूपड़ी ने पप्पू से पक्की दोस्ती कर ली थी। अब मैं भी अपनी अंतिम मंजिल पा लेना चाहता था।
“गौरी मेरी जान … अब मेरा प्रेम बरसने वाला है क्या तुम तैयार हो?”
“आह… हाँ… मेरे साजन… अपनी इस रानी को पटरानी बना दो.”
और फिर मेरे लंड ने पिचकारियाँ मारनी शुरू कर दी। गौरी ने पूरा साथ दिया और मेरे पूरे वीर्य को अपने अन्दर सहेज लिया। मैं गौरी की पीठ से चिपक गया था।
अब गौरी ने अपने पैर सीधे करके नीचे कर लिए थे। थोड़ी देर में मेरा लंड फिसल कर बाहर आ गया। गौरी की गांड का छल्ला भी धीरे-धीरे संकोचन करता सिकुड़ता गया और उसमें से गाढ़ा वीर्य निकल कर उसकी मोटी-मोटी फांकों और चीरे को भिगोने लगा था।
मैं अब सोफे पर बैठ गया था। गौरी भी सरक कर उकड़ू सी होकर फर्श पर बैठ गई और अपनी मुंडी झुकाकर नीचे देखने लगी। शायद वह अपनी गांड की हालत और उससे निकलते रस को देख रही थी।
मेरा मन भी उस दृश्य को देखने का कर रहा था पर मुझे लगा शायद गौरी को यह अन्तरंग बात पसंद नहीं आएगी। मैंने गौरी का सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया।
गौरी तो उईईई… करती ही रह गई।
और फिर अगले 8-10 दिन हमने लगभग रोज ही इस आनंद अलग-अलग आसनों में भोगा। कभी बाथरूम में, कभी रसोई में, कभी इसी सोफे पर और कभी नंगे फर्श पर।
अब तो गौरी मेरे लंड की मलाई पीने को में भी माहिर सी हो गई है।
भगवान् ने हर प्राणी मात्र में काम भावना को कूट-कूट कर भरा है और उसमें इतना माधुर्य और आनंद भरा है कि इसे कितना भी भोग लें पर मन कभी नहीं अघाता (भरता)।
बीच-बीच में मधुर ने भी अहसान सा दिखाते हुए अपना पत्नी धर्म निभाती रही। हेड ऑफिस से मेल आ गया था कि मुझे अब थोड़े ही दिनों में ट्रेनिंग के लिए बंगलुरु पहुँचना होगा।
आज मधुर की शायद छुट्टी थी। जब मैं शाम को ऑफिस से घर आया तो गौरी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। बाद में मधुर ने बताया कि गौरी की तबियत ठीक नहीं है। उसे थोड़ा बुखार सा भी है और पेट गड़बड़ी की वजह से जी मिचलाता है।
सुबह मैंने भी देखा तो था गौरी वाश-बेसिन पर जब हाथ मुंह धो रही थी तो उसे उबकाई सी आई थी। पर उस समय मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था।
रात को मधुर ने जी भर के चुदवाया। आज तो उसने मेरे ऊपर बैठ कर अपनी मुनिया को मेरे मुंह पर भी रगड़ा और मेरे लंड को भी कई महीनों के बाद चूसा था। और फिर हमने सारी रात पति पत्नी धर्म निभाया।
और फिर दूसरे दिन मधुर ने शाम को खुशखबरी सुनाई कि उसकी मनोकामना सिद्ध हो गई है और वह पेट से रह गई है। चलो 8-9 महीने की कठोर तपस्या का फल लिंग देव ने आखिर दे ही दिया।
मधुर ने अपने भैया-भाभी और रिश्तेदारों को भी यह खुशखबरी सुना डाली थी।
और फिर अचानक रात को कोई 9 बजे उसकी मुंबई वाली ताईजी का फ़ोन आया। ताऊजी की तबियत बहुत खराब है उनको फिर से हार्ट की परेशानी हो गई है। मधुर तो रोने ही लगी थी।
किसी तरह उसे समझाया कि तुम मुंबई जल्दी से जल्दी चली जाओ।
वह तो मुझे भी साथ ले जाना चाहती थी पर मेरी ऑफिस की मजबूरी थी।
और फिर मधुर के कहने पर मैंने अगले दिन सुबह ही हवाई जहाज के दो टिकट बुक करवा दिए। मुझे हैरानी हो रही थी मधुर ने दो टिकट मधुर माथुर और मधु के नाम से बुक करवाने को कहा था।
मधुर तो अपने साथ गौरी को ले जाने वाली थी. यह मधु का क्या चक्कर है? मेरी समझ से परे था.
मुझे हैरानी हो रही थी. भरतपुर से सीधी उड़ान तो नहीं थी पर आगरा तक टेक्सी से और फिर वहाँ से मुंबई के लिए सीधी उड़ान थी।
दोस्तो! नियति के खेल बड़े अजीब होते हैं। आदमी अपने आप को कितना भी गुरु घंटाल या बुद्धिमान समझे भविष्य में क्या होगा कोई नहीं जानता। आगरा तक मैं भी मधुर के साथ गया और उन दोनों को एअरपोर्ट छोड़कर मैं वापस आ गया। मैंने मधुर को गले लगाकर विदा किया।
मधुर ने गौरी की ओर इशारा किया तो गौरी झिझकते हुए मेरे पास आई और वह भी मेरे गले लग गई। उसके चेहरे को देख कर लग रहा था वह अभी रो पड़ेगी।
पास में खड़े एक आदमी के मोबाइल पर कॉलर ट्यून बज रही थी:
लग जा गले से फिर ये हसीं रात हो ना हो!
शायद इस जन्म में फिर मुलाक़ात हो ना हो!
फिर मधुर बोली- प्रेम! 10-5 दिन की बात है मैंने गुलाबो को कुछ पैसे भिजवा दिए हैं और उससे बात कर ली है. सानिया रोज घर की सफाई कर दिया करेगी और खाना-नाश्ता भी बना दिया करेगी।
मुंबई पहुँच कर मधुर ने फ़ोन पर बताया कि ताऊजी को अस्पताल में भर्ती करवा दिया है। भैया भी जयपुर से कल सुबह आ रहे हैं। अब चिंता की बात नहीं है पर 2-3 महीने उसकी देखभाल के लिए वहाँ रहना पड़ेगा।
ताई जी ने कई बार मुझे भी मुंबई में आकर अपने ताऊ जी का कारोबार संभालने के लिए कहा है पर इस नौकरी को छोड़कर मुंबई जाने से थोड़ा हिचकिचा सा रहा था।
ऑफिस में अभी मेरी जगह नए आदमी ने ज्वाइन नहीं किया है, उसके ज्वाइन करने के बाद ही मैं बंगलुरु जा सकूंगा।
गौरी के जाने के बाद मेरी हालत का अंदाज़ा आप लगा सकते हैं। मेरा किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था। बस अब तो नताशा नाम के उस नए मुजसम्मे का ही सहारा बचा था।
नताशा आजकल बहुत खुश नज़र आ रही है। मेरे कहने पर उसकी भी 10 दिनों की छुट्टी मंजूर हो गई है और वह रोज पूछती है कि साथ में क्या क्या बनाकर ले चलूँ? आपके रहने की व्यवस्था कहाँ होगी? मैं आपसे मिलने जरूर आऊँगी।
उसकी आँखों में अजीब सा नशा दिखाई देता है और वह बार बार कोई ना कोई बहाना लेकर मेरे केबिन में आने का प्रयास करती है। कई बार तो अपने घर से खाना और मिठाई भी लेकर आती है।
साधारण लड़कियां करियर बनाने के लिए मन लगाकर खूब पढ़ती हैं और खूबसूरत लड़कियां मजे करती हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कोई ना कोई उल्लू का पट्ठा उनके लिए डॉक्टरी या इंजीनियरिंग कर रहा है।
नताशा के बारे में मुझे बाद में पता चला कि उसके वाला कबूतर (उल्लू का पट्ठा) विद्युत निगम में किसी तकनीकी पद पर है और बिजली के खम्बे की तरह दुबला पतला है।
अब नताशा के गदराये बदन को संभालना उस बेचारे के लिए कहाँ संभव था।
मैंने देखा नताशा की आँखों के नीचे हल्का सा सांवलापन सा नज़र आता है। अक्सर सेक्स में असंतुष्ट और ज्यादा आत्म रति (मुट्ठ मारने) करने से ऐसा हो जाता है।
और आज शाम को संजीवनी बूटी मतलब मेरी बंगाली पड़ोसन संजया बनर्जी सुहाना को लेकर घर आ पहुंची। मैं तो उन दोनों को अपने घर के दरवाजे पर देख कर चौंक ही पड़ा। सुहाना ने सफ़ेद रंग का छोटा निक्कर और लाल रंग का टॉप पहन रखा था।
हे भगवान्! यह तो इन 2-3 महीनों में ही कलि से खिलकर फूल बन गई है। डोरी वाले टॉप में उसके चीकू तो अब रस भरे अनार जैसे लगने लगे है। गोरी शफ्फाक जांघें देख कर तो मेरा दिल हलक के रास्ते बाहर ही आने को करने लगा था।
“आ… आइए मैम!”
“माथुर साहब! आपसे एक काम था.”
“ओह … आइए अन्दर तो आइए!”
“वो मिसेज माथुर दिखाई नहीं दे रही?”
“ओह … हाँ वो 5-7 दिन के लिए मुंबई गई हुई हैं.”
“ओह … आपको खाने-पीने की बड़ी दिक्कत होती होगी. आप हमारे यहाँ खाना खा लिया करें।” संजीवनी बूंटी ने जिस अंदाज़ में यह प्रस्ताव रखा था मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था।
मेरे निगाहें तो बस सुहाना को ही घूरती जा रही थी। छोटे से निक्कर में फंसे उसके नितम्ब तो गौरी से भी ज्यादा कसे हुए लग रहे थे और उसकी जांघें तो बस मुझे छू लेने का निमंत्रण सा देने लगी थी। मैं तो बस अपने होंठों पर जबान ही फिराता रह गया।
“ओह … थैंक यू! बताइए आपकी क्या सेवा करूँ?”
“वो दरअसल सुहाना का एक प्रोजेक्ट है.”
“कैसा प्रोजेक्ट?”
जैसे किसी अमराई में कोई कोयल कूकी हो या किसी ने जलतरंग छेड़ दिया हो। कितने बरसों के बाद निशा जैसी (दो नंबर का बदमाश) मधुर आवाज सुनी थी।
हे भगवान् … इसके गुलाबी रंगत वाले संतरे की फांकों जैसे होंठ और मोटी-मोटी आँखें और कमान की तरह तनी काली घनी भोंहें उफ्फ्फ … क़यामत जैसे मेरे सामने बैठी मुझे क़त्ल करने पर आमादा हो।
“ओह … बहुत खूबसूरत … आई मीन बहुत बढ़िया प्रोजेक्ट है. श्योर मैं हेल्प कर दूंगा।”
“इसे आपके ऑफिस में भेजूं या आप यहीं इसे गाइड कर देंगे?” संजया ने पूछा.
“कक्क … कोई बात नहीं, इसे दिन में ऑफिस भेज दें और शाम को एक घंटे घर भी आप कहेंगी तो मैं हेल्प कर दूंगा पर … इसे मेहनत बहुत करनी पड़ेगी.”
“हा … हा … हा … शी इज क्वाइट हार्ड वर्किंग एंड सिरियस गर्ल!” संजया ने हंसते हुए कहा।
हे भगवान् संजया के गालों पर पड़ने वाले गड्ढों को देखकर तो मेरा पप्पू पैंट में कसमसाने ही लगा था।
“आपके लिए चाय बना देता हूँ?”
“अरे नहीं आप अकेले हैं परेशानी होगी? आप हमारे यहाँ चलें वही चाय पीते हैं और प्लीज मना मत करना आज का खाना भी आपको हमारे साथ ही खाना पड़ेगा।”
अब इतनी प्यार भरी मनुहार को नकारना मेरे लिए कितना मुश्किल था।
प्रिय पाठको और पाठिकाओ!
इस समय आप मेरी हालत और परिस्थितियों को अच्छी तरह समझ सकते हैं। इस समय मैं जिन्दगी के दोराहे पर नहीं चौराहे पर खड़ा हूँ। एक तरफ नौकरी और घर गृहस्थी है और दूसरी तरफ नताशा नामक मुजसम्मा है, तीसरी ओर सानिया और चौथे रास्ते पर संजीवनी बूटी सुहाना को अपने साथ लिए खड़ी मुझे आमंत्रण दे रही हैं।
मेरे तो कुछ समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूँ?
अगर आप इस सम्बन्ध में अपनी कीमती राय लिखेंगे तो अन्य पाठको को अपनी जिन्दगी का अहम् फैसला लेने में बड़ी सहायता मिलेगी।
विदा मित्रो! आप सभी ने इस लम्बी कहानी कहानी को धैर्यपूर्वक पढ़ा उसके लिए आप सभी का हृदय से आभार। मैं अपने उन पाठकों की भी क्षमा प्रार्थी हूँ जिनको इस कहानी की लम्बाई को लेकर शिकायत रही।
समाप्त