मेरा घर और मैं अध्याय 5
गीता अपनी मां की बात सुनाने बाद प्रयोग अहसास हुआ की उसकी मां सही कह रही थी। इस लिए गीता को अपनी मां पर बहुत प्यार आ गया और उसके साथ दूध करने काम करने लग गई। वही दसरी तारफ जब संतोष घर की तरफ आ रहा था का उपयोग एक और मिल गई।
“और देवर जी। आज कल रात कैसी काट रही है।” संतोष हमें औरत की बात सुन मुस्काना दिया और उसके पास आ कर बोला, “भाभी बात ही मत पूछो जब से आपकी देखी है न 24 घंटे खड़ा रहता है। क्या लूटी हो आप भी, जिस्की आवाज सुन कर मैं एक दिन वहां। “
“अच्छा जी बड़ा याद है, अगर इतना ही पसंद आ गया था तो चले आते, अगले दिन भी दीखा देती।” हमें औरत ने हंसते हुई बोली। फिर अपना एक हाथ आला ले जा कर अपनी बुरी को सादी के ऊपर से ही मसाला दी। “देख रहे हो देवर जी, कितनी आग लगी है, निगोड़ी बोर में है। एक तुम हो जो कुछ करते नहीं और एक तुम्हारा भाई जिस्के पास वक्त नहीं और नहीं उसके बस की बात रही।”
“देख कर लग ही रहा है, आग बहुत ज्यादा लगा है। वैसा भाभी इतना बन से जा कह रहा हो।” संतोष ने हंसते हुए पुचा।
“ये छोडो और ये बताता है कब आ रहा है। इस बार देखने से काम नहीं चलने वाला, दिखना भी पड़ेगा, की मेरे देवर जी का अपने भाई से छोटा है या बड़ा।” हमें औरत ने मुस्कुराते हुए बोली। और अपनी दर्दी नज़र संतोष के पंत की तराफ दाल दी।
“आरे ओह लाजवंती मुफली के दने के पास क्या कर रही है। पता भी नहीं लगेगा कब दाल और कब निकला।” एक औरत पिछे से आते हुए बोली। संतोष हमें औरत हो देखा कर छप्प सा गया। क्योकी इस औरत ने संतोष को एक बार पेशब करते हुए देखा था उसके लुंड को।
“तू बड़ा जनता है रे कजरी। मेरे देवर जी का मुफली जैसा है या सांड जैसा। कभी लिया है क्या आपने बोर में।” लाजवंती कजरी से बोली। कजरी लाजवंती के पास आते हुए बोली, “अरे लेने से ही पता नहीं चलता, कभी कभी देखने से भी पता चलता है। क्यू संतोष बाबू, सही बोली ना मैं।”
“अच्छा जी, हम दिन कितनी दूर खादी थी, अगर इतना ही पता करना था आ जाति उस दिन मेरे पास और पकड के देख लेई मेरे मुफली के दाने को। पता लग जाता है मुफली का दाना है की रेत का डंडा।” संतोष मस्कुराते हुए कजरी को लापेट लिया। लाजवंती संतोष की बात सुन कजरी को मस्कुराते हुए देखने लगी। “कहो तो अभी दीखा दू. पर एक शार्ट है।”
“अभी तो नहीं। हम शहर जा रही है। कल दोपहर में आ जाना मेरे घर पर। वही देख लेंगे और तुम्हारी तेज भी पूरी कर देंगे। क्योकी रे लाजवंती कर देंगे न अपने देवर जी की शरत पूरी।” कजरी ने संतोष को कल दोपहर का नौता दे दी थी। “हां क्यू नहीं आखिरी हमारे लड्डले देवर जी थारे।” लाजवंती बोली।
“अरे अब तो बता दो भाभी की शहर क्या लेने जा रही हो।” संतोष ने दोनो की कजरी के बड़े और लाजवंती के मध्यम आकार के प्यार को देखते हुए पुचा।
“अरे क्या है ना देवर जी, लेने तो हम दो कपड़े ही जा रही है। वो कपड़े आप तो पाएंगे नहीं तो बताने से क्या कह सकते हैं। अगर कहेंगे को बताते हैं। लाजवंती ने मुस्कुराते हुए बोली। सन्तोष ने हंसते हुए बोला, “लगता भइया जरुर पहचानने होंगे आप लोगो के कपड़े। इसलिये बेचेरे हमेश दबे दबे रहते हैं। पर मैं तो कपड़े उतरा हूं।”
“अपने भैया को छोड़ो। उन्होन तो पता नहीं क्या करना हुआ है, हम दोनो का। तुम अपना बताओ। वैसा भी कपड़े उतार के लिए घर तो आना ही मिलेगा।” कजरी ने एक बार फिर से संतोष को लापेट ली। लाजवंती भी हंसने लग गई।
“ओए देर से हो रहे हैं। और देवर जी आपको देखना है तो कल आ जाना दोपहर में, और हां मैं वादा करता हूं। जो भी ले कर आएंगे हम। वो आपको कहने कर देखेंगे।” लाजवंती ने संतोष को ऑफर ही दे दिया था। संतोष भी खुश हो गया।
“ठीक है भाभी आप दो जाओ और कपड़े हॉट और सेक्सी होने चाहिए। तकी देखते ही मेरा खड़ा हो जाना चाहिए और उतरने का मन न करे।” संतोष ने दोनो से कहा और अपने घर की तरफ चल दिया। अब वहां पर सिर्फ कजरी और लाजवंती ही रख गई थी।
“क्यू रे कजरी क्या तूने उसका सच में देखा है। फिर ऐसी ही उसे मजाक उड़ रही थी।” लाजवंती ने चलते हुए कजरी से संतोष के लिंग के नंगे में जाने के इच्छा से पुच ली।
“हां रे मेरी लज्जो मैं ने उसका हाथियार देखा है। पर मैं उस दिन थोड़ी दूर थी। पर दवे से कह सकती हूं उसका हाथियार 4 इंच लंबा और 1 इंच मोटो होगा।” कजरी बोली।
“तो इसमे कौनसी बड़ी बात है। ढिला होने पर इसी तरह दिखता है। क्यो रे तेरे पति का मुर्झा जाने के बाद बड़ा ही रहता है क्या।” लाजवंती बोली। कजरी मस्कुराते हुए कहने लगी, “मंती हु तू थिक कह रही है। पर संतोष का हमें दिन पूरा तना हुआ था। और हां हम दिन संतोष का दोस्त रामू और दीपक भी जब वे पेश कर रहे थे। जब भी तो मैं हू।”
“पर संतोष जी तराह बात कर रहा था, तो नहीं लगता था कि उसका हाथी छोटा होगा।” लाजवंती ने सॉल ही खादी कर दी थी। अब कजरी भी कुछ सोच में पड़ गई।
“चल कोई नहीं। पता तो चली ही जाएगा। वैसा हम ने बुलाया तो है, कल दोपहर में घर पर। आगर आ गया तो समझौता लेना उसका बड़ा है, और नहीं आया तो मैं ने जो बोली हूं वो 101% सच है। ” कजरी बोली। अभी लाजवंती कुछ कहती की बस आ गई। फिर दो बैठक कर वहां से चली गई शहर अपने लिए कपड़े लेने।”
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संतोष जब घर पाहुचा तो 10 बज गए। घर पर में सिरफ उसके मां चाची और बहनें ही रह गई थी। उसके पापा खेतो पर चले गए थे। और चाचा शहर चले गए अपनी बेटी से मिलने।
“संतोष आ गया तू। चल जल्दी से नहीं ले और खाना खा ले। आज मुझे शहर जाना है। तू मेरे साथ चल रहा है।” संध्या ने संतोष को हॉल में खड़ा देख कर बोली। संतोष भी अपनी मां की बात सुन जल्दी से ऊपर अपने कमरे में चला गया और कपड़े निकल कर बाथरूम में। वही आला हॉल में अब सिर्फ उसकी बहनें और मां चाची ही रह गई थी। सबी एक तराफ बैठी हुई बात कर रही थी।
“अच्छा बोलो क्या लेने कर आना है।” संध्या ने अपनी बेटीयों से पुची। कंचन भी कुछ सोच रही थी।
“मां मुझे तो 2 ब्रा और 4 पैंटी चाहिए। और वीट की 4 पैक।” गीता ने अपनी मां से कहा। संध्या उसे तारफ देखते हुए बोली, “पिचे महिने ही तो तू ने पैंटी और ब्रा मंगवी थी। फिर इतनी चली।”
“मां पिचे माहिन के ब्रा और पैंटी छोटी हो गई है। पहले मेरी ब्रा का साइज 32 थी और अब 34 हो गई है। पहले मेरी पैंटी की साइज 32 और अब पैंटी की साइज 36 हो गई है। ” गीता ने अपने जिस्म की उन भागो का वारन अपनी मां के आगे किया। संध्या भी गीता की बात सुन हेयरन हो गई, की एक ही महिने में इस तरह का विकास है। उपयोग करने पर मजार कर दिया कहीं उसकी बेटी गलत रास्ते पर तो नहीं चली गई।
“चल थिक में ले आउंगी। अब तीनो भी बता दो।” संध्या ने पिंकी नीतू और नीलम की और देखते हुए कहा।
“मां मुझे 2 पैंटी और 2 ब्रा न्यू डिजाइन के ले आना। साइज वही है जो पहले थी।” पिंकी ने अपनी मां से बोली। पिंकी की बात सुन संध्या खुश थी पर संध्या की सोच अपनी बेटी गीता की प्रति बदल गई थी।
“मां मुझे 3 ब्रा और 4 पैंटी चाहिए। मेरा भी साइज पहले से बढ़ गया है।” नीतू बोली. संध्या नीतू की बात सुन अब थोड़ा रहता की बिना ली। संध्या को अब लग रहा था कि खान पाना की वजह से उसकी बेटियों के शरिर में है तारह बदलवा आ रहा है। “अब अपना साइज भी बता दे।”
“मां पहले मेरी ब्रा की साइज 32 थी तो अब 36 हो गई है। वही जहां मेरी पहले पैंटी की साइज 33 थी तो अब 36 हो गई है।” नीतू बोली. संध्या ने नीलम को और देखने लग गई।
“माँ 3 ब्रा 34 की और 36 की पैंटी और हां ये कुछ लिस्ट है ये भी लेटी आना।” नीलम ने अपना साइज बताने के साथ ही लिस्ट पक्का दी। अभी संध्या कुछ कहती की संतोष आला हॉल में गया और बोला, “खाना दे दो। मैं जल्दी से खा लूं। फिर चलते हैं।”
“गीता जा अपने भाई के लिए खाना निकल दे और हां अनार का जूस जो निकल कर फ्रिज में रखा हुआ है इस्तेमाल भी दे देना। समझ आई मेरी बात।” गीता अपनी मां की बात सुन कर उठ गई और रसोई घर की तरफ चल दी। गीता के साथ ही नीलम भी चल दी। वही नीतू और पिंकी अपने रूम में चली गई। अब वहां पर कंचन और संध्या रह गई थी।
“दीदी मुझे लगता है की अब हम गीता की शादी कर देंगी।” कंचन अपनी जेठानी की और देखते हैं बोली। संध्या कंचन की बात सुन कर अपना बगीचा हां में हिला दी। “फिर मैं अपने पति से कोई अच्छा और पढ़ा लिखा लड़का धुंधने के लिए कहता हूं। और आप भी जेठ जी से कह दिजिये।”
“ठीक है। अच्छा अब अपना बताता क्या ले कर आना है।” संध्या ने अपनी देवरानी से कहा।
“दीदी 4 ब्रा और 4 पैंटी न्यू डिज़ाइन के लेना है आपको। ब्रा की साइज़ 36 और पैंटी की साइज़ 38।” कंचन ने कहा। संध्या हंसते हुए बोली, “लगता है देवर जी खूब मेहंदी कर रहे हैं तुम्हारे ऊपर। जब भी इनका आकार बढ़ गया है।” संध्या की बात सुन कर कंचन शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया।
“दीदी ये दवा भी ले आना और ये लिस्ट लिजिये।” कंचन बोली। जब संध्या ने हमें दवा का नाम पाढ़ी तो उसकी आंखें ही बड़ी हो गई।
“तू वेग्रा मांगवा रही है। वो भी 200mg पावर की। देवर जी तेरे साथ सही से कर नहीं पाते क्या।” संध्या ने कंचन से पुचने लगी।
“आरे दीदी ये मेरे लिए नहीं है। अपने पड़ोस में सिलपा है ना। ये उसके लिए है। बेचारी का मरद 5 मिनट में ही झड़ जाता है। और वो प्यासी ही रह जाति बाई।” कंचन की बात सुन कर संध्या बोली, “ठीक है मैं ले आऊंगी। पर तुझे पता है न इस्ले ज्यादा सेवन से क्या होता है।”
“हां मुझे पता है और मैं बता भी दिया है। ये लो पैसे मेडिसिन के।” कंचन ने पैसे बढ़ा दी। संध्या ने पैसे ले कर अपने पर्स में रख ली।
“माँ मेरा हो गया।” संतोष ने कहा। संध्या संतोष के पास आ गई और बोली, “तू 10 मिनट रुको कर। मैं कपड़े बदल कर आती हूं।” संध्या फिर अंदर चली गई। संतोष को जो अनार का जूस मिला था पीने को उसे 1 अनार उसका लाया हुआ भी था। पता नहीं आज उसके साथ क्या होने वाला था। ये तो वक्त ही बताएगा।
संध्या जब रूम से बहार आई तो सब कोई उसे देखते ही रह गया। संध्या ने एक डीप कट ब्लाउज पहला हुआ था, जिस में से उसकी चुची के कुछ भाग दिख रहे थे। उसे साड़ी भी नाभी के 4 इंच आला पाह्न राखी थी। संतोष का तो सबसे बुरा हाल था क्योकी उसके पंत के और खालबली मच गई थी पर किसी तरह खुद को संभल रखा था।
“वाह माँ। आप बहुत हॉट और सेक्सी लग रही हैं।” गीता ने बड़ी खुशी से बोली। संध्या भी अपनी बेटी की बात सुन कर मुस्कान दी। संतोष वही बस अपनी मां को घुरे जा रहा था, पर सब को यही लग रहा था कि वह बस ऐसे ही देख रहा था।
“धन्यवाद बेटा। जब तक मैं आऊं। तुम सब मिल कर घर का सारा काम कर लेना।” संध्या ने गीता के माथे पर किस करने के बाद बोली। गीता भी अपनी मां के गले लग गई। “अब चलेगा भी या मुझे ऐसे ही देखते रहेंगे।” संतोष भी बिना कुछ कहे घर से बहार निकल गया। वही संध्या भी उसके पीछे हो ली।
20 मिनट के बाद, संध्या और संतोष गांव से बहार आ गए थे और एक तरह से खड़े हो कर बस का इंतजार कर रहे थे। दोनो को ज्यादा देर तक नहीं करना पड़ा। जब बस आई तो बस भरा हुआ था। पहले संध्या बस में चढी उसके बाद संतोष चढ गया।
“माँ सीट तो एक भी खाली नहीं है। इस तरह तो हम खड़े हो जाएंगे।” संतोष ने कहा, जो संध्या के पिचे खड़ा था, थोड़ा सा गैप बना कर। संध्या अपना चेहरा पिचे किया और बोली, “कोई नहीं बेटा, शायद आगे खाली हो जाए और हम सीट मिल जाए बैठाने को।”
“आप ठीक कह रही है।” उसके बाद संतोष ने कुछ नहीं कहा और चुप चाप खड़ा हो गया। आगे जा कर कुछ लोग और बस में चढ़ गए। जिस वजह से संतोष अपनी मां से चिपक गया। गांव का रोड थिक ना होने के करन बस हिचकोले खा रही थी। जिस करन संतोष संध्या के पीछे से आगे पिचे ऊपर आला हो रहा था। संध्या को ऐसा लग रहा था की संतोष उसे पिच से छोड रहा हो। पर वह जनता थी की ये सब गांव के रोड की वजह से हो रहा था। इधर संतोष का भी लिंग खड़ा हो गया था और संध्या के गंड के ऊपर लगा हुआ था। संध्या के शरिर में भी हलचल होने लग गई थी। संध्या भी अब भूलभुलैया लेने के लिए अपनी गंद को पिचे दबने लग गई थी, जिस वजह से संतोष का लुंड संध्या के गंद में थोड़ा से धस गया था।
ऐसे ही भूलभुलैया करते हुए दोनो शहर पाहुच गया। संतोष के लुंड पूरी तरह खड़ा था इसलिय उसे छुपाने के लिए अपनी शर्ट बहार निकल ली, उतरने से पहले। वही संध्या का भी बुरा हाल हो गया था, उसकी भी पैंटी गीली हो गई थी। संध्या झडाने के बहुत ही करीब आ गई थी पर बस शहर पहुच गई थी। जिस कारण से हमें उतरना पड़ा। संध्या ने एक बात नोटिस कर ली थी की संतोष का लुंड काफ़ी बड़ा और मोटा है।
“मां अब किसी तरह चलन है।” संतोष ने कहा। संतोष की बात सुन कर संध्या मुस्कुराते हुए बोली, “मुझे पता है, आज तक मैं तुझे शहर नहीं लायी है तुझे तो ऐसे ही मैं नहीं मालुम है। पर आज मैं तुझे सब कुछ दूंगा। वक्त में अकेले ही तुझे ये करना है।”
“ठिक है माँ।” संतोष ने कहा। फिर संध्या ने अपने पिचे आने के लिए कहा का उपयोग करें। संतोष का ध्यान तो बस अपनी मां को बड़ी से गंद पर ही टिक गया था जो हिचकोले खा रही थी। संध्या प्रयोग हर एक बात बता रही थी। संतोष भी अपनी मां के पीछे चलते हैं सुन रहा था और ध्यान से देख रहा था, जो संध्या मार्केट में दिखी का उपयोग करें। पर साथ ही संतोष की नजर अपनी मां के गंद पर भी टिकी हुई थी।
“चल आज बेटा।” संध्या ने बड़ी सी कपड़े की दुकान देखने के बाद बोली। संतोष अपनी मां के पिचे हमें दुख में चला गया।
“आए बहन जी। क्या लेंगी आप।” दुखंदर ने संध्या को आया देख कर कहा।
“जी मुझे कुछ कपड़े चाहिए। क्या आपके…” संध्या ने अभी इतना ही कहा था की दुकान लगा दी, “नीलू जरा मैडम को कपड़े दिखें। बेटा आप यहीं पर बैठा जाओ।”
“जी नहीं ये मेरे साथ ही जाएगा।” संध्या ने दुखंदर की बात सुनाने के बाद बोली। दुखंदर ने भी फिर कुछ नहीं कहा। संध्या संतोष को ले कर एक तारफ चल दी, जहां पर एक महिला खादी थी।
“जी मैडम क्या दिखूं आपको।” नीलू ने कहा। संध्या संतोष की तरफ देखी और बोली, “जी मुझे कुछ ब्रा और पैंटी चाहिए। ये राही साइज।” संध्या ने के कजज का टुकड़ा हमें लेडी को बढ़ा दी।
“मैडम सिंपल हां डिजाइन वाले।” नीलू ने पुचा।
“नवीनतम डिज़ाइन होना चाहिए। पैसे कोई बात नहीं है।” संध्या ने कहा। संतोष बस वहां खड़ा हुआ देख रहा था, और सोच रहा था कि उसकी मां उसके सामने ही ब्रा और पैंटी क्यो ले रही है। अब संतोष को क्या पता था की संध्या अपने बेटे लुंड को देखना चाह रही थी जो उसे बस में महसूस किया था पिच से। हमें लेडी ने एक से खराब कर ब्रा और पैंटी संध्या के आगे रखने लग गई और उसके नंगे में बताने लगी।
ऐसे हमें लेडी ने संध्या के आगे एक से बढ़ कर के ब्रा और पैंटी रख दी। संध्या ने उन में से सबके लिए पैंटी और ब्रा ले ली। वही संतोष का लुंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था। संध्या ने जब संतोष की तरफ देखा तो उसकी आंखें ही बड़ी हो गई।
संतोष ने जब देखा की उसे मां उसे ही देख रही थी। जब संतोष ने अपनी मां की नजर का पिच किया तो पाया की उसकी मां का ध्यान उसके पंत ऊपर टीका हुई थी। उसके माँ उसके लिंग को ही देख रही थी, जो खड़े होने की वजह से साफ पता चल रहा था। संतोष ने जल्दी से एक बार और अपनी शर्ट निकला लिया। संध्या ये देख कर मस्कुरा दी और पैंटी और ब्रा खुद के लिए चुनिंदा करने लग गई। संध्या ने अपने लिए 3 ब्रा ली और 4 पैंटी ली। “ये सारे पैक कर दिजिये और बिल बता दे।”
“मैडम आप काउंटर पर चले। मैं इन पैक कर और लिस्ट बना कर लाती हूं।” नीलू ने कहा। संध्या आगे बढ़ गई, संतोष उसके पिचे हो लिया। वही नीलू संतोष के तारफ देख कर मुस्कान दी। संतोष एक बड़े नीलू के तार देखा और आगे बढ़ गया।
“बहन जी अपने कपड़े ले ली।” दुखंदर संध्या को काउंटर पर खड़ा होते देख कर बोला।
“जी मैं कपड़े ले लिए। आप बस बिल बता दिजिये तक मैं भुगतान कर सकु।” संध्या ने कहा। दुखंदर का ध्यान भी संध्या की चुटकी पर ही टीका हुआ था जब से वो यहां आई थी तबी और अब भी।
“नीलू तुम लिस्ट मत बनाओ। मैं यही पर बना दूंगा। तुम पैक कर के ले आओ।” दुखंदर की आवाज सुन कर नीलू ने लिस्ट बनाना बंद कर दी। और पैक करने में लग गई। 5 मिनट में ही पैक कर के सारा सामान दुकान के सामने रख दी। दुखंदर एक कर के साड़ी ब्रा और पैंटी देख कर लिस्ट बनने लग गया और इस पर 20 मिनट लगा दिया। क्या बिच दुखंदर संध्या के तार देखता रहा था। “बहन जी टोटल 6 हज़ार हुए।”
संध्या अपने पर्स से पैसे निकल कर दुकान दे दी। और अपना शॉपिंग बैग ले कर बहार को तारफ चल दी। ‘बहन जी आपने इतने पैसे को शॉपिंग किया है, और जो भी लेडीज इतने से ऊपर की खड़ीरी करती है, हमारी तरफ से गिफ्ट दिया जाता है। ये आपके लिए।” दुखंदर ने एक बहुत ही नवीनतम डिजाइन के ब्रा पैंटी का सेट निकल कर संध्या को दी दीये।
“ध्यानवाद आपका।” संध्या ने हमें सेट को लेने के बाद बोली और चलती बनी। संतोष भी उसके पीछे हो लिया। दुखंदर अभी कुछ कहता उपयोग पहले संध्या वहा से निकल गई थी।
“माँ दुआ पर अब नहीं आएगी।” संतोष ने थोड़ी दूर आने के बाद अपनी मां से कहा। संध्या अपने बेटे की बात सुन कर रुक गई और पिचे मिट्टी कर उसके तार देखते हुए बोली, “वो भला क्यों।”
“माँ हम दुखंदर की नियत अच्छी नहीं थी। वो आपको…..”संतोष इतना कहने के बाद चुप हो गया। संध्या समाज गई की उसका बेटा क्या कहना चाह रहा था उपयोग।
“ठीक है। अब से मैं दुखन पर नहीं आऊंगी। पर क्या तुम्हें पता है।” संध्या इतना कहने के बाद चुप हो गई और अपने बेटे की तरफ देखने लग गई। संतोष अपनी मां को अपनी और देखते हुए सोच में पड़ गया की अब उसके क्या कर दिया। “बेटा मैं जिस भी दुकान पर ये सब लेने जाउंगी तो वहा के लोग मुझे नजर से देखेंगे। इस लिए मैं ने तुम्हें अपने साथ रखा, तकी तुम देख कर समझ साको की एक औरत को कैसे कपड़े हैं। तुम्हें ही खरीद कर लाना होगा।”
“क्याआआआ? मैं ये सब। आपको पता है ना की दीदी नहीं बनेगा, आपकी तो मुझे टेंशन नहीं है क्योकी आपने तो मेरे सामने लिया है, तो मुझे कोई परशानी नहीं होगी।” संतोष ने कहा। संतोष की बात सुन कर संध्या कुछ सोचते हुए बोली, “संतोष मैं चाहता हूं कि तुम्हारी बहनो को तुम पर में कादर विश्वास होना चाहिए की वह तुम्हारे सामने अपने कपड़े भी बदल खातिर हैं। और तुम इसके लिए क्या करते हैं। चलो कुछ और भी समान लेने है।”
फिर संध्या संतोष अपने साथ ले कर एक लेडी कॉस्मेटिक शॉप पर आ गई। फिर वहां से समान लेने लग गई और संतोष हर हमें समान को देख रहा था जो उसकी मां उसके सामने ले राठी। सामने लेने के बाद संध्या ने भुगतान किया और संतोष की तरफ एक कागज़ बढ़ते हुए बोली, “बेटा ये दवा समाने के मेडिकल शॉप से ले आओ। ये लो पैसे।”
संतोष ने एक बार कागज पर लिखे हुए दवा का नाम को पढ़ा और आगे बढ़ गया। दुकान पर हमारे कागज को बढ़ा दिया। मेडिकल स्टोर पर एक लेडी थी। मेडिसिन के नाम पढने के बाद संतोष को ऊपर ऐ आला तक देखी और मेडिसिन लेने एक तारफ मिट्टी गई। कुछ पल के बाद संतोष के पास आई और मेडिसिन बढ़ा दिया।
“किटने ह्यू इस्के।” संतोष ने सामने वाली लेडी से पुचा।
“4 हज़ार ह्यू।” हमें लेडी ने संतोष को अमाउंट बताया। संतोष ने पैसे निकल कर उस महिला को दे लिया और मिट्टी कर जैसे चलने को हुआ की उस महिला ने आवाज दे कर दी।
“बेटा क्या नाम है तुम्हारा।” हमें लेडी ने संतोष से पुचा।
“जी मेरा नाम संतोष है।” संतोष बड़े प्यार से जवाब दिया। उस महिला को संतोष की बात करने का तारिका है तारफ पसंद आया था की वो मुस्कान दी।
“तुम्हे पता है ये दवा किस लिए है।” हमें लेडी ने पुचा का इस्तेमाल करें। संतोष ने न में अपना बगीचा हिला दिया। “मुझसे लगा ही था की तुमे इस के नंगे में नहीं पता होगा। वैसा जिसके लिए भी ले जा रहे हैं इसका उपयोग करना है का प्रयोग महिन एक ये दो बार करे। अगर उसे ये दवा ज्यादा मटर में लेटा है तो आगे चल कर इस्तेमाल करना है। बड़ी परशानी हो सकती है।”
“कैसी परशानी। क्या मुझे बता सकती है। तकी मैं बता सकता हूं।” संतोष ने बड़ी शांत भाव से कहा।
“देखो बेटा मैं एक डॉ. हुआ। मेरा नाम मंजुबाला है। याही बस मैं अस्पताल में काम करता हूं। इस लिए तुम्हें साफ शब्दों में बताता हूं। इस्का प्रयोग लुंड खड़ा करने के लिए किया जाता है तकी वह आदमी आपके साथी समय का साथ दे खातिर। पर इस्का अधिका मातृ में प्रयोग करने से, उस व्यक्ति के लुंड में तनव आना बंद हो जाता है। या यूं कह सकता है कि अभी जो उसका लुंड खड़ा हो रहा है जहां 5 मिनट ही क्यों न हो। पर बाद में वह भी नहीं होगा। दावा लेने के बाद भी 35 मिनट से ज्यादा खड़ा नहीं होगा। समझौता आई मेरी बात। ये लो मेरा कार्ड यूज मेरे पास भेज देना।” मंजुबाला ने संतोष को बड़ी साफ तारिके से समझौता दिया था। संतोष ने भी मंजुबाला का ध्यानवाद किया और कार्ड ले कर चला गया।
“बीटा इतना डर क्यू लग गया।” संध्या ने अपने बेटे को थोड़ा आने का करन पुचा जाने दो। संध्या ने देखा भी था की उस महिला ने संतोष को रोक उपयोग बात करने लग गई थी।
“माँ आप दवा जिसके लिए ले जा रही है। यू कार्ड दे कर कहना की एक बार यहां जा कर अपना इलज कर ले। मुझे डॉ मंजुबाला ने मेडिसिन को लेने से क्या हनी हो सकता है। राही थी।” संतोष ने कम शब्द में सब कुछ बोल दिया था।
“चल ठीक है। मैं समझूंगा। अब चल घर, घर के लिए जाने दो हैं।” संध्या ने अपने बेटे से बोली और बस स्टैंड की तरफ चल दी। संतोष भी अपनी मां के पिचे हो गया। जब बस स्टैंड पर दोनो पाहुच से बस जा चुकी थी। अगली बस 2 घंटे बाद की थी।
“अब क्या करें। इस तरह तो हम 8 बजे तक घर पाहुचेगे।” संतोष ने कहा।
“चल आ मेरे साथ।” संध्या संतोष को ले कर एक तरह से चल दी। फिर संध्या संतोष को ले कर टैक्सी स्टैंड चली आई थी। फिर वहा से एक टैक्सी बुक कर घर के लिए निकल गएसंतोष और संध्या 6 बजे घर पाहुचे। एक बैग संतोष के हाथ में तो दशहरा संध्या के हाथ में। जैसे ही दोनो घर के अंदर दखिल हुए ही ऊपर से आती पिंकी की नजर दोनो पर पड़ी।
“दीदी दीदी देखो मां और भाई आ गए हैं। जल्दी से काम छोड़ कर बहार आ जाओ।” पिंकी सीडियों से उतरते हुए चिल्ला कर अपनी बहनो को आवाज लगी। पिंकी आवाज़ सुन सबसे पहले रशोई घर से नीतू आई, उसके बाद नीलम। पिंकी तो आते ही अपनी मां के गले गई और वही नीतू और नीलम समान खादी हो गई। “माँ लाओ जल्दी दो। मुझे मेरे कपड़े और मेरे समान।” पिंकी कहते हुए अपनी मां के गाल को चुम्म लिया।
‘क्या पहले सेन्स तो ले लेने दे। इतनी दूर से थे हरे आए हैं। काम से एक गिलास पानी तो पिला।” संध्या हलका सा थप्पकी अपनी प्यारी और चुलबुली से बेटी के सर मरते हुए बोली। पिंकी अपनी मां की बात सुन वही से आवाज लगा दी, अपनी बड़ी बहन को, जो और अपनी बहन के साथ कर रही थी। “दीदी मां और भाई के लिए पानी और कुछ मीठा ले आओ।” पिंकी हरकत को देख कर संतोष मुस्कान दिया है
“मां आप तु बैग पकादो, मैं रशोई से पानी ले कर आता हूं, दीदी काम कर रही होगी। वर्ण अभी तक ले आति।” संतोष ने शॉपिंग बैग अपनी मां की तरफ बढ़ते हुए कहा। जैसे ही संतोष ने बैग आगे बढ़ पिंकी ने झट से आगे बढ़ कर हमें बैग को ले लिया। वही संतोष रशोई घर की तरफ बढ़ा गया। संतोष का जाना हुआ था की पिंकी ने बैग से ब्रा और पैंटी के डब्बे निकल कर सामने टेबल पर रखने लग गई।
“ओए झल्ली ये सब बाद में देख लिया। अभी संतोष आता ही होगा पानी ले कर।” नीतू ने दाताते हुई बोली। पर पिंकी को इससे क्या फरक पढ़ने वाला था, वाह तो अपने ही धुन में लगी हुई थी कुछ ही पल में सारे ब्रा और पैंटी उस टेबल पर रखे हुए थे। पिंकी जल्दी से अपने साइज की ब्रा और पैंटी चुन लिया।
“माँ ये तो बहुत ही लेटेस्ट डिज़ाइन की ब्रा और पैंटी है। माँ इनके विज्ञापन तो टीवी पर आते हैं। धन्यवाद मेरी प्यारी माँ। उम्मामा।” पिंकी ने अपने मां के गाल पर किस कर दी। संध्या ये देख कर मस्कुरा दी। वही संतोष जब रसोई घर के अंदर गया तो गीता आता सान रही थी और उसकी चाची सबजी बना रही थी। संतोष का ध्यान गीता के बड़े चुचियों पर टिक गया था, सामने का नज़र देखा कर। था ही इतना दिलकस नजरा, आटा आने के करन गीता की बड़ी चुचिया झुकने की वजह से साफ दिखाई दे रहे थे।
पर संतोष ने जल्दी से आपने आप पर कबू पा लिया और आगे बढ़ गया, गीता ने बात पर ध्यान ही नहीं गया था की उसका भाई उसके मस्त और कोमल, सच महसूस को देख रहा था जो झुकाने साफ दिख रहा था . संतोष ने फ्रिज का दरवाजा खुला किया और एक पानी का बोतल निकला कर दरवाजा बंद कर दिया। फिर एक बार अपनी चाची की तरफ देखा, जो अपनी बड़ी और भारी हुआ मदक गंड को हिला रही थी और सज्बी को कलछुल (कुदाल, लाडले) से चल रही थी।
“चाची कुछ मीठा है तो दे दो। मां खाने को मंगा रही है।” संतोष ने कहा। पर उसकी हलत खराब हो गई थी। यहाँ का नज़र देख कर और इस्का असर उसके पंत के बहार भी देखने लग गया था। बेचारा संतोष सुभाष से परशान हो गया था ऐसी नजर देख कर। कंचन सब्जी को चलन बंद कर दी और पिचे मिट्टी कर अपने भतीजे को देख और एक तार सरक गई। फिर कंचन ने ऊपर से एक डिब्बा उतर ऊंचा कर और फिर खोल कर 4 लड्डू निकल कर एक प्लेट में रख दी। वही दुसरी तारफ संतोष की हलत ही खराब हो गई थी कंचन के पिचवाड़े को देख कर, समय उसका लुंड पंत के अंदर खड़ा हो गया था। कंचन जब पिचे मिट्टी कर उस प्लेट को जैसे ही संतोष को देने के लिए आगे बढ़ उसकी नजर सिद्धे उसके लुंड पर जा टिकी। लुंड को देख कर तो कंचन की जिस्म ही कान गई। कंचन तो सतबाध हो गई थी, वही पर जहां खड़ी थी।
“हाय राम इतना बड़ा और मोटा लुंड, वो भी उर्म में है। जब और बड़ा होगा तो कितना बड़ा हो जाएगा। ये तो मेरी ही छुट को फड़ कर रख देगा अगर एक बार मेरे अंदर गया था। छोडने लग गई।” कंचन अपने मन ही सोचने लग गई थी। प्रयोग ये भी ध्यान नहीं था की संतोष और गीता वही पर थी और प्रयोग ही देख रहे थे। संतोष ने देखा की उसकी चाची पर उपयोग ही देखे जा रही थी तो उसे उनकी नजरो का पिच किया तो पाया की चाची उसके लुंड को देख रही थी, जो पंत के अंदर खड़ा था, और बहार से पता चल रहा था। संतोष ने जल्दी से अपनी शर्ट निकल दिया, जिस कारण उसके पंत बना हुआ ऊंचा धक गया, पर अब भी हलका सा दिख रहा था।
“चाची क्या हुआ।” संतोष ने बड़े प्यार पर तेज़ आवाज़ अपने कंचन को पुकारा था। कंचन अपने भतीजे की आवाज सुन कर हम सम-मोहन से बहार आ गई। वही दुसरी तारफ गीता ने अपने भाई का लुंड देख लिया था, उसकी आंखें भी बड़ी हो गई थी, पर अपने भाई की आवाज सुन, अपनी आंखें वहां से हटा ली। “चाची अब लड्डू के प्लेट दे भी दो, खुद ही खाने का विचार कर रही हो। अगर ऐसा है तो मैं चलता हूं।”
“अचा जी, अब तू अपनी चाची से ही मास्करी लार्ने लगा। मुझे नहीं पता था कि तू अब इतना बड़ा हो गया है। चल ये ले प्लेट।” कंचन ने मुस्कुराते हुए बोली और आगे बढ़ कर उस लड्डू के प्लेट को संतोष को दे दी। संतोष उस थाली को ले कर चला गया। वही अब जा कर कंचन और गीता के शरिर कुछ शांत हुई थी, पर अब भी उनकी छूत रह कर पानी के बुंद बहन रही थी। “चाची मैं जरा बाथरूम हो कर आई, आप जब तक रोटी सेक लो।”
“हां ठीक है। पर जल्दी आना मुझे जाना है।” कंचन ने भी गीता को जाते हुए देख कर पिच कहा। गीता अपना बगीचा हां में हिला कर रासोई से निकल गई।
वही संतोष जब संतोष हॉल में पाहुचा तो देखा की नीलम और नीतू अपनी ब्रा और पैंटी देख रही थी। संतोष बिना उनकी तरफ देखे अपनी मां के पास जा कर खड़ा हो गया और बोला, “मां ये लो पानी और लड्डू।”
संतोष की आवाज़ सुन, संध्या ने मस्कुराते हुए उसके हाथ से पानी और लड्डू के प्लेट ले ली और एक तरह से रखते हुए, अपने पास ही बैठा ली का इस्तेमाल करें। वही नीतू और नीलम जान ही हलक में आ गई थी अपने भाई की आवाज सुन कर। पर जब उन्होन संतोष की तरफ देखा तो उनकी जान में जान आई, क्योकी संतोष उनकी तरफ नहीं देख रहा था। यहां तक संध्या ने अपने पास बैठा था अब भी उसे अपनी बहनो की तरफ नहीं देखा।
“मां में आराम करने अपने कमरे में जा रहा हूं। मैं बहुत थाक गया हूं।” संतोष ने बैठने के बाद, अपनी मां की और देखते हुए बोला। संध्या भी मस्कुरा कर, अपना बगीचा हां में हिला कर, जाने की इज्जत दे दी का इस्तेमाल करें। संतोष ने बिना कुछ कहे वहां से उठ कर अपने कमरे की तरफ चल दिया। संतोष के जाने के बाद संध्या ने दोनो से कहा, “अपनी ब्रा और पैंटी यहां से उठाओ और अपने रूम में जा कर चेक कर लो। छोटा नहीं हो रहा है ना।”
“ठिक है माँ।” नीतू ने कहा और नीलम को साथ ले कर अपने कमरे में चली गई। फिर संध्या ने गीता को आवाज़ लग दी, जो रासोई घर में जा रही थी। अपनी मां की आवाज सुन कर गीता अपनी मां के पास आ गई।
“बेटा ये लो अपनी ब्रा और पैंटी। जा कर रूम में देख लो पहन कर, की ठीक है की नहीं।” संध्या ने ब्रा और पैंटी का 7 बड़े अपनी बेटी के तार बढ़ते हुए कहा। गीता उन ब्रा और पैंटी को ले कर अपने रूम की तरफ चल दी। वही संध्या ने अपने ब्रा और पैंटी एक तरफ कर, फिर अपनी देवरानी की ब्रा पैंटी हम शॉपिंग बैग में रख दी। फिर संध्या अपनी ब्रा और पैंटी को ले जा कर अपने कमरे में रख दी। फिर वाह रशोई घर में चल गई। “कंचन इन रोटी को देखना रहने दो। मैं ने बहार हॉल में तुम्हारी ब्रा और पैंटी शॉपिंग बैग में रख हुए हैं। तुम जा कर उन्हे देख लो।” कंचन अपनी जेठानी की बात सुन बोली, “वो तो थिक है दीदी, पर ये काम भी तो जरुरी है। आपके देवर आते ही होंगे और आने के साथ ही खाने की फरमाइश हो जाएगी।”
“तू उसकी चिंता मत कर। जो मैं ने कहा है वो कर पहले। रोटी मैं सेक लेति हूं जब तक।” संध्या ने कंचन के सर पर हाथ फेटे हुए बोली। संध्या की वजह से आज तक घर के दो टुकड़े नहीं हुए थे। वर्ना कब का ये घर टूट गया होता। संध्या के इसी प्यार भरे व्यवहार के आगे सब झुक जाते हैं।
“ठीक है दीदी।” कंचन इतना बोल, राशि से बहार चली गई वही कंचन के जाने के बाद संध्या रोटी सेकने लगी।तो देख ली अपने ब्रा और पैंटी। कोई दीकत तो नहीं है ना। और हां हमें मेडिसिन को मेरे पास ही रहने दे। मैं तुझे उस में से 10 – 12 टैबलेट दे दूंगा। तू उन्हे अपनी फ्रेंड को दे देना। और हां ये भी कह देना की एक हफ्ते में सिरफ 2 बार ही अपने पति को देगा।” संध्या ने कंचन रशोई घर में दखिल होते देख, उसे अपनी देवरानी को ये बात कही थी। कर अपनी जेठानी के गले लग गई।
“धन्यवाद दीदी। आपने मेरे लिए इतनी अच्छी ब्रा और पैंटी का सेट ला कर मुझे दी। इतना अच्छा तो मैं भी नहीं ला पति। ठीक आप मुझे दवा देना, मैं कल इस्तेमाल दे दूंगा और समझ भी दूंगा।” कंचन बोली। फिर वह अपनी जेठानी के गाल को चुम ली। “दीदी आप रहने दिजिये। बाकी का मैं बनाना लेटी हूं। जब तक आप अनार खा लो। मैं ने फ्रिज में छिल कर रखे हुए हैं।
“ठीक है। मैं खा लेटी हूं। पर क्या तूने खाए। यह फिर मेरे लिए ही बचाकर रखे हुए हैं।” संध्या ने फ्रिज से एक कटोरी निकली जिसमे अनार के दाने रखे हुए थे। “दान तो बहुत बड़े और रस से भरे हुए लग रहे हैं। तेरे जेठ जी ने तो अनार बड़े ही बढ़िया लाए हैं। अच्छा ये बात संतोष ने जो अनार मुझे दिए थे वो कहा है।”
“दीदी वो अनार तो मैं फ्रिज में रख द। और गीता ने भी जेठ जी के द्वारा लगाये हुए अनार भी फ्रिज में वही रख दी जहां मैं रखे थे। मुझे पता ही नहीं चला की कौन संतोष के और कौन जेठ जी के।” कंचन ने आते के लौइया (गोला) चक पर रख बेलन से हमें लौइया को रोटी का आकार देती हुई ये बात कहीं थी। रोटी का आकार देने के करन जब वह थोड़ा आगे पिचे होती तो उसके सख्त और बड़े उभार एक लाए में आगे पीछे हो जाते हैं। बहुत ही दिलकस नज़र पेस कर रहा था।
“चल कोई नहीं, अच्छा अब जो अनार बचा हुआ है ना। तुम रोटी बनाने के बाद हम अनार का एक गिलास जूस निकला कर संतोष के लिए रख देना। तकी मैं उपयोग संतोष को खाना खाने के बाद पीने के लिए।” संध्या ने बड़े शांत भाव और अपनेपन के साथ अपनी देवरानी से बोली। कंचन ने भी हां में अपना बगीचा हीला दी और रोटी को तावे पर दाल दी। ये आखिरी रोटी थी जो कंचन ने तावे पर डाली थी। कंचन एक तरह से बने हुए सिंक में अपने हाथ होते हुए बोली, “दीदी आप ने अपने ब्रा और पैंटी मुझे नहीं दिखे।”
“अच्छा तो तुझे मेरे ब्रा और पैंटी देखने है। तो ठीक है, पहले तू संतोष के किए जूस निकल दे। फिर मैं तुझे दिखी अपने ब्रा और पैंटी वो भी जाने कर।” संध्या ने अपनी देवरानी से बोली और अनार के कुछ देने अपने मुह दाल कर खाने लगी। कंचन हाथ ने किया के बाद अनार को छिल कर उसके लिए निकल ने लागी। वही संध्या अनार खाने में लगी थी।
वक़्त ने कैसा खेल खेला था परिवार के साथ, कहा ये परिवार संतोष से नफ़रत करता था। और अब कहा वो प्यार करने लगे का इस्तेमाल करेंगे। संतोष के द्वारा लाए हुए अनार को घर पंच लोगो ने खा लिए और वो संध्या, कंचन, नीलम, नीतू और गीता है। और आखिर अनार एक बार फिर से संतोष खाने वाला था। और हमें अनार के खाते हुए उसके शरिर में क्या बदला आने वाले थे कोई नहीं जनता था।
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संतोष ऊपर जाने के बाद सबसे पहले उसे अपने कमरे में दरवाजा बंद किया। फिर उसे अपने जींस निकला और उसके बाद अपना अंडरवियर निकला दिया। जैसे ही उसे अपना अंडरवियर निकला उसका लुंड ऊंचा कर बहार आ गया। संतोष का लुंड इस समय किस दानव की तरह दिखलाई दे रहा था। उसका लुंड अपना सर उठते हुए खड़ा था।
“आहा अब जा कर राहत मिला है मुझे और मेरे लुंड को। सुबाह से ही मेरी और मेरे लुंड की हलत खराब हुई पड़ी थी। मां ने तो कोई काम नहीं छोड़ी थी मेरी और मेरे लुंड की जान। राही थी। और ऊपर से हमें दुकान में था ही कर दिया था। कैसे पुछ रही थी मुझे अपनी ब्रा और पैंटी लेटे हुए। और वो सेल्स गर्ल, सॉरी सेल गर्ल थोड़ी थी बिक्री वाली महिला थी कैसे मुझे देखते हुए हर ब्रा और पैंटी नंगे में बता रही थी।” संतोष अपने ही धुन सोचते हुए अपने लुंड के साथ खेले जा रहा था। तो भनक तक ना लग की का उसके हाथ उसके विशाल और मोटे औजार पर चला गया था। और वह प्रयोग अपने हाथ से हिलाने में लगा था।
“आह सच में ही क्या दिल था नज़र था हम जहान का। आआआह माँ और हम में कैसे मेरा लिंग माँ की बड़े सी कुल्हो के बिचे धस गया था। संतोष के हाथ अपने विशाल और मोटे लिंग पर बहुत ही तेज हो गया। आगर समय कोई उपयोग करें को देख लेता तो वही पर बेहोश हो गया होता है। या उसकी जान ही हलक में अचानक गई होती है। “हाड तो तब हो गई जब मां ने अपने बड़े गंद को पिच की तरफ ढकेलने लगी थी, कैसे पिचे की तरफ ढकेल रही थी, जैसा मेरा लुंड निगल ही जाएगी अपनी हमें बड़ी से गंद के अंदर।”
“आह्ह्ह्ह मां आआह।” संतोष के मुह से ये सिकरी या मदद आवाज निकल गई थी। संतोष आंखे बंद किए हुए ये सब मन में ही बोले जा रहा था, पर उपयोग नहीं पता था की उसकी आवाज बाहर जा रही थी। वाह तो अपने ही खेल में लगा था, संतोष अपने अंतिम पड़ाव में कदम रख चुका था, किसी भी समय उसके लुंड से वीर्य की धार निकल कर परश को गंडा कर सकता था। पर इस के पहले वही काम करता है, उसके कामरे के दरवाजे पर दस्तक हो गई।
“संतोष जल्दी से आगे आओ। मां और पापा तुम्हारे खाने पर बुला रहे हैं।” ये गीत की आवाज़ थी जो अपने भाई को सपनों की दुनिया से बहार आने पर मजबूर कर दी थी। जैसे संतोष ने अपनी बहन की आवाज सुन उसकी आंखें खुल गई। उसका ध्यान सबसे पहले अपने हाथ पर गया, अपने लुंड को देख कर उसकी धड़कन ही एक पल के लिए रुक गई।
“ये क्या है। इतना बड़ा और मोटा। कहीं कोई बीमारी तो नहीं हो गई मुझे। 4 दिन में ही मेरा लुंड इतना बड़ा और मोटा हो गया। आज तो कल से ज्यादा ही लग रहा है।” संतोष अपने लुंड को देखते हुए बोल रहा था, पर आवाज बहुत ही धीमी थी। जो बस यूज़ ही सुना दे रही थी। हां फिर ये आवाज उसे भी सुनती है अगर कोई उसके आस होता है।
“ओए और क्या कर रहा है। की तुझे मेरी आवाज सुना नहीं दे रही।” गीता फिर से संतोष को आवाज लगाय और ये देखा कि। और ये सवाल लिए भी था क्योकी संतोष ने अपने तक जवाब नहीं दिया था। अपनी बहन की आवाज सुन कर फिर से एक बार संतोष अपनी ख्यालो की दुनिया ऐ बहार आया और बोला, “दीदी आप आला चलो, बस मैं 2 मिनट में आया।” गीता अपनी भाई का जवाब सुन आला चली गई। वही जल्दी से संतोष बाथरूम में गया और लूटने की कोषिश करने लगा तकी उसके लुंड शांत हो जाए। बड़े मुश्किल से उसके लुंड से पेशाब की एक छोटी से धर निकली। जिस कारण से उसका लुंड शांत हो सका। संतोष ने जल्दी से अपने लुंड को पानी से धोया और बाथरूम से बहार आ गया। फिर प्रयोग एक शॉर्ट पहले कर आला चला गया।
“बेटा सो गया था क्या?” संध्या ने कहा। जब संतोष आला आकार खाने के मेज पर आ कर बैठा। तो अपनी मां की बात सुन कर बोला, “क्या मां ऐसे आप कह रही हो।”
“वो इस लिए लाल क्योकी गीता से पहले तुझे पिंकी और नीतू बुलाने गई थी। और वो तुझे आवाज लगा कर आई थी।” संध्या ने एक थाली संतोष की तरफ बढ़ते हुए बोली। संतोष ये सुन हेयर हो गया की उपयोग बुलाने, गीता से पहले पिंकी और नितू भी आई थी। “अब क्या सोचने लगा। चल चुप चाप खाना खा।”
“हां मां मैं तो गया था। वो क्या है न सफर की वजह से थकन आ गई थी मुझे कुछ ज्यादा ही। सॉरी आगे से ध्यान रखूंगा।” संतोष ने कहा और एक रोटी तुकड़ा दाल में दुबो कर अपने मुह में दाल लिया और चबा कर खाने लगा। संध्या संतोष की बात सुन कर मस्कुरेट हुई बोली, “बेटा इसमे माफ़ी मांगे की क्या बात है। मुझे पता है सफर के करन थाक गए होंगे तो बिस्तर पर लेटे ही निंद आ गई होगी। अब तू आराम से खाना खा।”
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वही सुबा संतोष के जाने के बाद श्रीमती राधिका खन्ना ने नहीं के बाद अपने नाश्ता बनाया और साथ में संतोष के द्वारा दिए गए अनार से एक गिलास जूस बनायी थी। मिसेज राधिका ब्रेकफास्ट के बाद हमें जूस को पिया।
“सच में ही ये अनार तो बहुत ही मीठा है। पीने के बाद से तो मेरे जिस्म में काफ़ी एनर्जी आ गई है। ये अनार खतम हो जाने के बाद संतोष से और लेन को कह दूंगा।” श्रीमती राधिका बरतन समते हुए मन में बोली। और फिर उसे हमें बरतन को सिंक में राखी। फिर अपने रूम में आ कर ले गई। 1 घंटा जैसा ही बिता की मिसेज राधिका के जिस्म में पैदा हुआ की बडाने लग गई।
“यार आज मेरी बूर तो कल से ज्यादा ही रोने लगी है। और मेरी चुची तो बहुत ही ज्यादा कड़क हो गई है। कब तक में अपनी बुरी को अपनी उंगली से शांत करुगी।” मिसेज राधिका ने ये बात अपनी बुरी को पैंटी के ऊपर से ही रद्गदते हुई बोली। राधिका का दशहरा हाथ अपनी कुछ पर था और बड़े ही धीर मसाला रही थी का उपयोग करें।
“आह्ह्ह्ह पता नहीं आ मेरी निगोड़ी बोर की क्या हुआ है। सुबाह संतोष को देख कर रोने लगी थी तो बड़े मुश्किल से खुद को कबू किया था। राधिका बड़ी आवाज में बोल रही थी। वही अब राधिका अपनी पैंटी निकल एक तरह से रख दी थी और अपनी उनगली अपनी छुट में दाल कर और बाहर कर रही थी।
और ये सिलसिला जब तक चलता रहा, तब तक उसकी छुट ने अपना रस नहीं बहार दिया। और जब राधिका की छुट ने अपना रस बहाये उसका जिस्म पूरी तरह से अकड़ गया था। झड़ते समय उसका जिस्म झटके पर झटके खा रही थी ये सिलसिला जब तक चल जब तक वही वह झड़ नहीं गई।
राधिका झडने के बाद वैसे बिस्तर पर पड़ी रही। पता ही नहीं चला कब उसकी आंख लग गई का इस्तेमाल करें। आगर में कोई राधिका कोई देख लेता है तो खड़े खड़े झड़ जाता है क्योकी राधिका की छुट के होठ पूरी तरह फेल हुए और उसके अंदर का लाल रंग का छेद साफ दिख रहा था। हमारे छेद को देख ऐसा लग रहा था की मुश्किल से 3 बार ही राधिका चूड़ी हो।
शाम के 4 बजे राधिका की आंख खुल। वो भी तब जब उसका फोन बजने लगा। राधिका ने आधा खुली आंखों से अपना फोन की और देखा और अपना हाथ बढ़ा कर इस्तेमाल किया। अपने कान पर लगा ली। जैसे उस तरह से आवाज सुनी तो उससे मुह से एक ही शब्द निकला, “क्या? बस में आधे घंटे में पाहुच रही हूं।” राधिका जल्दी से तयार हुई और घर को लॉक किया और अपनी कार ले कर निकल गई।