मेरा घर और मैं अध्याय 2
अब वहा का आलम ये था की एक तरफ रामू अपने चार्म पर पाहुच अपने ढकके की गति बड़ा थी। वही संतोष भी अपने अखरी पड़वा पर था तो उसके भी ढक्को की गति बढ़ गई थी। पिंकी को ऐसा लग रहा था की लुंड भी उसकी कोमल और नज़ुक बुरे के अंदर परवेश कर जाएगा।
“आहाओ माँ मैं गइइइइइइइ।” हमें शांत और कामुक वातवरन में ये आवाज गुंज गई। रामू भी इसके ले साथ झड़ गया। कमला अपने अंदर गरम वीर्य का महसूस कर पा रही थी।
वही दुसरी तारफ पिंकी की बोर ने भी अपना रस बहा दिया था। संतोष का भी हाल कुछ रामू जैसा ही था। संतोष के लुंड से जैसे ही वीर्य की अखाड़ी बंद निकला, वह पिंकी को छोड वही आला बैठा था। पिंकी ने जैसे अपने आप को हमें पक्का से आज़ाद पाया, जल्दी से अपनी सलवार ऊपर बंद वहां से निकल गई। उसे पलट कर ये भी नहीं देखा की उसके साथ करने वाला कौन था।
संतोष वही पर बैठा था, झडने के बाद से। क्योकी आज पहले बार जिंदगी में वो इस तरह से झटका था। संतोष में इतनी हिम्मत नहीं थी वो उथ खातिर। 5 मिनट के बाद रामू कमला के ऊपर से हट कर खड़ा हो गया। जैसे कमला के बुरे से रामू का लुंड बहार निकला उसकी बुरी से विर्या निकलने लगी।
“क्या कमला तेरी बोर में इतना भी दम नहीं है क्या जो मेरे माल को अपने अंदर रख खातिर। जरा देख तो कैसा बहार निकल रही है।” रामू ने हस्ते हुए तंज खास कमला के ऊपर। कमला भी रामू की बात सुन कर जल्दबाजी हुई अपनी पैंटी उठा कर अपने बुरे से निकल रहे विर्या को साफ करते हुए बोली, “जगा तो इतना है मेरी बोर के अंदर की तुझे क्या तेरे बाप को और का हाजम कर।”
“अरे नरज़ क्यो होती है मेरी जान। मैं तो मज़ाक का रहा था। मुझे नहीं पता था की मेरी बात सुन कर तेरी छुट और गंद दोनो जल जाएगी।” रामू अपना शर्ट पहंते हुए कहा। रामू की बात सुन कर कमला हंस पड़ी। और अपनी सलवार का नाडा बंधते हुए बोली, “देख रामू आज तो मैं यहां पर आ गई। पर अगली बार मैं यहां नहीं आऊंगी। बाल्की तुझे मेरे घर के बहार जो भैंसो का तबेला है न वहां आना पड़ेगा। समझौता आई मेरी बात।”
“ठीक है मेरी जान।” रामू ने उसे एक गोले को दबते हुए बोला।
“अच्छा सुन तू हमें संतोष को अपने साथ मत लेकर आ जाना। तू उसके साथ रह कर तेरे हाल भी उसके जैसा हो जाए।” कमला ने कहा। रामू कमला की बात सुन कर कुछ समझ नहीं पाया है लिया उसे कमला पुछ ही लिया, “तुझे ऐसा क्यों लगता है कि मैं भी उसके जैसा हो जाऊंगा। कहीं तुझे ये तो नहीं लगता की मैं भी संतोष में लगा हूं। जाउंगा।”
“अरे मेरा वो मतलब नहीं था। मैं ये कहना चाहता हूं तू कही हम संतोष की तरह फुसी ना हो जाए।” रामू को जैसी कमला की बात समझ आई उसे एक प्यार को कास के मीस दिया। “आहा माँ बिक्री रंदी की औदल, तेरे बाप का माल नहीं है जो इस तरह से मीस दिया है।”
“रंदी तुझे पता तू क्या बोल रही है। कुछ सोच समझ कर बोला कर। साली कहा मेरा लुंड 6 इंच लंबा और 2 इंच मोटा, कहा उसका 4 इंच लंबा और 1 इंच मोटा। उसके लुंड को देख कर ऐसा लगता है किसी 5 साल के बच्चे की नन्नी हो।” रामू ने कमला से कहा। कमला रामू की बात सुन कर हेयरा हो गई, यूज़ ये बिलकुल भी अंदाज़ नहीं था इस बारे में।
“तुझे पता है तू क्या बोल रहा है।” कमला ने कहा। रामू हंसा हुआ बोला, “थिक है कल तुझे अपने फोन में उसकी फोटो दीखा दूंगा। चल जा देख रोशनी होने लगी है।” रामू की बात सुन कर कमला वहां से चली गई। कमला ने संतोष को वहां पर बैठे हुए देख और उसके पयाजामा के आगे गिलापन को भी, जब वो वहां से जा रही थी। कमला ये देख कर हंस दी की उसकी रासलीला देख कर ही ये झड़ कर बैठा था।
“ओए उठ जा ऐसा क्यों बैठा हुआ है। तेरा पायजामा आए से गिला क्यों है।” रामू ने संतोष हिलाते हुए बोला, क्योकी उसे उसे काई बार आवाज दे चुका था। जब रामू के आवाज़ देने के बाद भी संतोष ने कोई जवाब नहीं दिया हाथ लगाना ही पड़ा का इस्तेमाल करने के लिए।
“भाई क्या कहू। मैं तो तुझे ये भी नहीं बता सकता की आज मेरे साथ क्या हुआ है। चल हाथ दे।” संतोष ने अपना हाथ बढ़ते हुए कहा का उपयोग करें। रामू ने भी अपना हाथ आया कर दिया। फिर संतोष उसका हाथ पक्का कर उठा और खेतो की तसरा चल दिए। “अच्छा रामू तुझे पता है हम कमला के साथ जो लड़की आई थी वो कौन थी।”
“मुझे नहीं पता यार, पर तू ये क्यु पुच रहा है। कहीं तुझे उसकी लेना का तो मन नहीं कर रहा। भाई सोचियो भी मत, तेरा लेने के बाद कुछ भी पता नहीं चलेगा।” रामू ने जल्दबाजी हुई बोला। संतोष रामू को हंसते हुए देख कर बहुत गुसा हुआ, उसका मन तो किया एक बार अपना लुंड निकला कर दिखा दे। पर कुछ सोचते हुए कहा, “तेरी बात एक दम सही है। तेरी मां और बहन को भी कुछ पता नहीं चलेगा।” इतना कहने के बाद संतोष जोर से हंस लग गया।
“सेल हंस क्यों रहा है। तू ने थिक ही तो कहा है, की मेरी और बहन को तेरा ये बच्चे को नन्नी लेने से कुछ नहीं होने वाली। चल समय बरबाद मत कर, खेतो में पानी लग चुका होगा।” रामू आगे चलते हुए बोला। संतोष भी हंसते हुए खेतो की तरफ चल दिया। जब दोनो खेतो पर पाहुचे तो देखा के खेतो में पानी लग चुका था। फिर संतोष ने जा कर पानी बंद कर दिया। उसके बाद वो दोनो घर चल दिए।
वही पिंकी घर पाहुच कर सिद्ध अपने कामरे में चली गई। कामरे का दरवाजा बंद करने के बाद अपने कपड़े निकल दी, फिर बिस्तर पर बैठे अपने तांगो को फेला कर अपने बुरे को देखने लगी, कुछ कुछ हो तो नहीं गया। पिंकी अपने हाथ से बार बार फेला कर देख रही थी, क्योकी संतोष का अंतिम ढकका बहुत ही जोर का लगा था, अगर उसका लुंड पयाजामे के और नहीं होता तो पक्का उसे बुरा के अंदर समा गया होता। ये बात पिंकी भी अच्छी तरह जनता थी इसलिये वो बार अपनी बुरी को देख रही थी।
“भगवान का लाख लाख शुक्र है, मैं उसे लड़के से बच गई, अगर उसका लुंड पयाजामे के अंदर नहीं होता तो मेरी बोर के अंदर ही समा जाता है। उसका सूपा भी कितना मोटा था।” पिंकी उस लड़के के बारे में सोचते हुए अपनी छुट के दने को रागद रही थी। पिंकी हमारे लड़कों के बारे में सोचने और अपने बुरे के साथ खेलने में है कदर खोई हुई थी इस्तेमाल ये तक नहीं पता चला कि कमर बहार इस्तेमाल कोई आवाज लगा रहा था।
“उठ जा कितना सोयगी देख दिन सर पर आ गया है। मां तुझे आला बुला रही है।” ये पिंकी की बड़ी बहन गीता थी जो बहार से ही आवाज लगा रही थी। ” अरे उठ भी जा, स्कूल नहीं जाना क्या।” गीता ने दरवाजे पर जोर से मरते हुए बोली। दरवाजा पर मार की आवाज सुन कर उसका था अपने बुरे पर ही रुका गया। पिंकी बहुत गुसा आया पर अपने गुसे को कबू करते हुए बोली, “दीदी आप चलो में नहीं कर आती हूं।” गीता पिंकी की बात सुनाने के बाद आला चली गई। वही पिंकी अपने कहां को गली देते हैं अपने बाथरूम में।
“उठ जा कितना सोयगी देख दिन सर पर आ गया है। मां तुझे आला बुला रही है।” ये पिंकी की बड़ी बहन गीता थी जो बहार से ही आवाज लगा रही थी। ” अरे उठ भी जा, स्कूल नहीं जाना क्या।” गीता ने दरवाजे पर जोर से मरते हुए बोली। दरवाजा पर मार की आवाज सुन कर उसका था अपने बुरे पर ही रुका गया। पिंकी बहुत गुसा आया पर अपने गुसे को कबू करते हुए बोली, “दीदी आप चलो में नहीं कर आती हूं।” गीता पिंकी की बात सुनाने के बाद आला चली गई। वही पिंकी अपने बहन को गली मिलते हैं अपने बाथरूम में
संतोष घर आने के बाद सबसे पहले बहार नालके पर ही हाथ जोड़ी धोने लगा। फिर संतोष जब घर के अंदर गया तो देख की माँ रसोई घर में खाना बना रही थी चाची के साथ। और हमें तीनो बहने हॉल में बैठी थी। बिना किसी को कुछ कहे बेगैर अपने काम में चला गया। उसके बाद कमर का दरवाजा और से बंद कर के अपने सारे कपड़े निकल दिया सिरफ अंडरवियर को छोड़ कर। उसे देखा की उसका अंडरवियर अब से बहुत ही ज्यादा गिला हो गया था। संतोष को विश्वास ही नहीं हो रहा था की वह इतनी मात्रा में उसके लुंड से वीर्य निकल गया था।
संतोष बाथरूम में जा कर नहीं है अपना अंडरवियर वही छोड़ दिया। कामरे के अंदर नंगा ही आ गया, फिर अपने अलमारी से स्कूल ड्रेस निकला कर पहन लिया। उसके बाद संतोष ने अपने बालो में कंघी कर, अपना बैग उठा आला चला गया।
“आ जल्दी से बैठा और बुरा। स्कूल के लिए लेट हो जाएगा।” संतोष को एक तरह से बैठाना का इशारा करते हुए संध्या ने बोला। संतोष भी अपनी मां की बात सुन कर पिंकी के बगल में बैठा गया। फिर शाम ने नस्ते दिया, जिसमे 1 गिलास दूध, 2 अल्लू के परांठे। संतोष आज का नास्ते देख अपनी मां की तरफ देखने लग गया। “ऐसा क्या देख रहा है। ये तेरे लिए हज बनाया है। चुपचप नास्ता कर और स्कूल के लिए निकला।”
संतोष बिना कुछ कहे अपना बुरा करने लग गया। वही उसके चारो अपनी मां का बदला हुआ रूप देख हेयर थी। अखिर मां को क्या हो गया जो संतोष का इतना ख्याल रखा जा रहा था। कंचन को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसकी जेठानी को आखिर क्या हो गया था,
“मेरा मुह देखना बंद करो, अपना बुरा करो। कंचन 2 पराठे और ला कर संतोष के प्लेट में रख दे।” संध्या ने अपनी देवरानी से बोली। कंचन ने भी बिना कुछ कहे अंदर चली गई, और पराठे ला कर संतोष के थाली रख दी। संतोष ने भी बिना कुछ कहे अपना खराब खतम किया और बैग उठा कर स्कूल के लिए निकल गया। पिंकी भी उसके पिचे हो ली।
“दीदी ये सब क्या है। संतोष की इस तरह ख्याल रखना, मैं कुछ समझी नहीं।” कंचन ने संध्या से पुचा। गीता, नीतू और नीलम भी बैठक हुई अपनी चाची की बात को सुन रही थी, जैसे उनके मन की ही बात कह दी हो।
“कंचन इस बारे में बाद में बात करेंगे। फिल्हाल तुम जा कर अपने पति को जगा दो, नहीं तो स्कूल के लिए देर हो जाएगी। और तुम तीनो अपना नास्ता खतम कर घर के काम में लग जाओ। हू।” संध्या ने सबको आदेश देते हुए बोली, उसके बाद अपने कामरे में चली गई अपने पति को जगाने के लिए।
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वही रास्ते में पिंकी संतोष पिचे चल रही थी। फिर कुछ सोच कर वो अपनी बाद में तेज कर संतोष के बगल में आ गई। संतोष अपने बगल में किसी को आए महसूस कर, उस तरह देख, फिर से सामने की तरफ देखते हुए चले लगा।
“क्या बात है संतोष आज तो माँ ने तुझे दूध और पराठे खिलाए।” पिंकी ने तना मरते हुए बोली। संतोष पिंकी की बात सुन कर एक बार उसकी और देख मुस्कान दिया।
“क्यू? तुझे बुरा लगा क्या? मां ने मुझे ये सब खाने के लिए।” संतोष ने कहा।
“मुझे क्यों बुरा लगेगा। मुझे अच्छा ही लगा की कुछ अच्छा लगने के लिए दिया गया। वारन वही बस रोटी और चटनी।” पिंकी ने जल्दबाजी हुई कहा। संतोष को पिंकी की बात का बहुत बुरा लगा पर उसे कुछ कहा नहीं। क्योकी उपयोग पाता था अगर वो कुछ कहा से घर पर जा एक चार कहेगी, उसके लिए अच्छा नहीं होता। “मुझे तो तारफ देख रहा है, खाएगा क्या मुझे है, तारफ देख रहा है।”
“मन तो कर रहा है की तुझे इसका जवाब दू। पर रहने दे, घर पर जा कर मेरी सिकायत करने लगेगी।” संतोष ने पिंकी को कहा और तेज कदमो स्कूल के अंदर प्रवेश कर गया। पिंकी ने भी कुछ नहीं बोली, और स्कूल के अंदर चली गई। फिर पिंकी अपने सहेलियां के पास चली गई। वही संतोष रामू और दीपक के पास चला गया।
“तुझे पता है दीपक, आज मेरी और कमला की चुदाई देख कर संतोष ने पयाजामे में झड़ गया।” रामू ने संतोष का मज़ाक उड़ते हुए कहा। दीपक रामू की बात सुन कर जोर से दिया है।
“सेल तेरे साथ अब कहीं नहीं जाउंगा। चाह तेरी कोई आगे गंद ही क्यू ना मार ले।” संतोष ने गुस्सा होते हुए कहा, संतोष को इस तरह से में देख दीपक सच्ते में आ गया।
“सेल तू तो अपना मुह बंद कर। संतोष ने पहली बार ऐसा कुछ देखा था। दीपक ने रामू का एक राज ही संतोष के सामने खोल कर रख दिया था। ये बात हमें समय की थी जब दीपक और रामू अपने खेतो की तरफ जा रहे थे, जब रामू अपने खेत के पास पाहुचा तो खेत के और किसी को पेश करते हुए देख।
रामू ने मुझे इशारा से तारा देखने को कहा, जिस तरह उसकी बहन पेशब कर रही थी। “भाई ये कौन है जो अपनी टंगे खोल कर अपनी बुरी पानी बहा रही है।” दीपक ने कहा। दीपक की बात सुन रामू बोला, “भाई है लड़की की बालो से भारी बुरा देख कर मेरा पानी ही निकल गया।” जब दीपक ने रामू के पंत की तरफ देखा तो सच में ही गिला हो गया था। “सेल तेरा कुछ नहीं हो सकता। चल छोड ये लड़की कौन है जो तेरी खेत में बैठी हुई लूट रही है।” दीपक बोला. अभी रामू कुछ कहता की वो लड़की खादी हो गई। हमें लड़की को देख कर दीपक बोला पड़ा, “सेल ये तेरी बहन है, क्या बात है अपनी बुरी को देख कर ही झड़ गया।” हम दिन रामू बहुत शर्मिंदा हुआ।
“छोड़ ना यार दीपक, रामू मज़ाक कर रहा था मुझे। अच्छा ये बताता आज तो कोई नया शिक्षक आने वाला था गणित के लिए, उसका क्या हुआ।” संतोष को अच्छा नहीं लगा रामू इस्लिये उसे बात का रुख ही बदल दिया था। दीपक ने भी संतोष का साथ लिया दिया था की तकी वो उसकी पढाई में मदद करता रहा है।
“भाई पता है मठ के लिए, बहुत ही हॉट और सेक्सी मैडम आई है सहर से। भाई आकार तुम ने एक बार हमें मैडम को देख लिया तो खड़े खड़े ही पंत गिला कर दूंगा, रामू की तरह।” दीपक ने बार फिर से रामू का मज़ाक बनते हुए बोला, साथ ही हम मैडम की तरफ की। तबी पार्थन के लिए घंटा बाजी और तीनो उस तरफ चल दिए।
उठ जयिये। सुबाह के 9 बज रहे हैं।” शांधे ने अपने पति को उठे हुए बोली। रमेश अपने बीवी की मधुर आवाज सुन अपनी आंखे खोल दिया। और उठा के बैठने के बाद अपनी बीवी को अपनी बहों में भर के लिया, फिर सी हममें भर के लिया, फिर बोला “सॉरी जान, कल रात मेरी वजह से तुम्हारे अधुरा रहना पद गया।”
“कोई नहीं मुझे पता है, आप काम के करन ठक जाते हैं, और आप भुदे भी हो चुके हो।” शांधे ने जल्दबाजी हुई बोली। संध्या ने अपने पति को कल रात के लिए माफ़ी मागते हुए देख कर खुश हो गई थी। और भला एक औरत को क्या चाहिए था। “अच्छा ये सब छोडो जल्दी से तयार हो जाओ। आज आपको शहर भी जाना है।”
“अच्छा वो सब छोडो, ये बताता शहर से मैं तुम्हारे लिए क्या ले कर आऊं।” रमेश ने अपनी बीवी से पुचा। संध्या ये सुन कर बहुत खुश हो गई, क्योकी बहुत ही दिनो के बाद रमेश ने उसके लिए कुछ लाने ले लिए इस्तेमाल किया था।
“तुम्हे याद है, जब हम शहर गए तो मैं ने दुकान पर एक ड्रेस देख आप इस्तेमाल करने के लिए कहा था।” संध्या ने अपने पति को याद दिलाती हुई बोली। रमेश ने भी अपना बगीचा है में हिलाते हुए बताया दिया था की उसे याद है। “तो मुझे वही ड्रेस चाहिए। बोलो लाओगे न मेरे लिए, हमें ड्रेस को।”
“ठीक है मैं ले आउंगा। पर अगर वो नहीं मिला तो,” रमेश ने अपनी बात बिच में ही छोड़ अपनी बीवी की तरफ देखने लग गया। की वो क्या कहेगी। और उसका जवाब जल्दी ही मिल गया।
“मुझे पता है। आप लाना ही नहीं चाहते, इसलिय ऐसी बात कर रहे हैं।” संध्या ने नराज होते हुए बोली। रमेश अपनी बीवी के चेहरे को अपनी और करते हुए बोला, “संध्या ये बताओ कभी ऐसा हुआ है, जो तुमने मुझे मांगा हो और वो मैं लाकर तुझे ना दी हो। मैं तो यह है के लिए बात कही क्योकी हम ड्रेस 1 से देखे हुए हैं। ऊपर हो गया है। क्या तुम्हें लगता है, वो ड्रेस अभी वही होगी।”
“मुझे माफ़ कर दिजिये। मैं भी बिना मतलब के ऐसी बात कर बैठी। आप तैयार हो जाओ, 9:30 हो गए हैं। और आपको जो अच्छा लगे ले आना।” संध्या ने बिस्तर से उठते हुए बोली। रमेश भी बिस्तर से उठा और अपनी बीवी के पास आ कर उसके होठो किस कर के बाथरूम में नहीं चला गया। जब संध्या बहार आई तो देखा की बेटी काम में लगी थी, और कंचन अपने पति को खाना खिला रही थी।
“नमस्ते भाभी।” रूपेश ने अपनी भाभी को अपनी और आते देख कर अभिवंद करा। संध्या भी अपने देवर के पास आ कर उसके सर प्यार से सहला कर उसके पास ही बैठा गई। “क्या बात है भाभी आप गर्म आज कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही है। कटल करने के लिए आज तो।”
“कटाल कर दून तुम्हारा, पर अपनी लड्डली देवरानी के कारण से छोड़ देता हूं। कही है को ये ना लगे का पति अपना …” संध्या ने अपनी बात को बिचे में ही रोक कर जोर से हंस दी। रूपेश भी अपनी भाभी के अखरी शब्द समझ गया था, उसकी भाभी उपयोग क्या कहना चाहता था।
“भाभी मुझे जो चाहते बनाना लेना, पर कंचन के सामने मुझे उसका पति ही रहने देना।” रूपेश बोल कर हसने लग गया। कंचन भी हंस रही थी अपने पति और जेठानी के बात सुन कर।
“बाटे बहुत हो गई जल्दी से नास्ता खतम कर निकलो यहां से वारन स्कूल में प्रिंसिपल की सुनानी पद जाएगी।” रूपेश ने अपनी भाभी की बात सुन कर जब अपने हाथ में कहने वाले घड़ी पर नजर पड़ी तो 5 मिनट ही रह गए द 10 बजने में।
‘भाभी आज तो मारवा दिया मुझे। आज तो साली प्रिंसिपल मुझे छोडने वाली नहीं है।” रूपेश ने कुर्सी पर से उठते हुए बोला। संध्या और कंचन रूपेश की बात सुन कर हाथ दी। “कंचन मैं जब तक अपना हाथ बाहर धोता हूं तुम और से मेरा बैग ले आओ।”
उसके बाद कंचन अपने कामरे की और बैग लेने चली गई। कंचन के जाते ही रमेश भी अपनी बीवी के पास आ कर बैठा गया। संध्या ने नास्ते की थाली रमेश के तार कर दी, जो पहले से ही निकल राखी हुई थी। रमेश संध्या के सर बात करते हुए हुए नास्ता करने लग गया।
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“हां तो बचाओ ये आपकी नई गणित की टीचर। आज से ये आपको गणित सिखाएगी।” प्रिंसिपल ने एक लेडी टीचर को क्लास में इंट्रोड्यूस कर कर चला गया। वही प्रिंसिपल के जाने के बाद हमें लेडी टीचर ने पूरी क्लास को ध्यान से देखने लग गई।
“भाई ये तो गर्म माल है यार। अपना प्रिंसिपल इसे छोडने वाला नहीं है। साली को जरूर ले कर रहेगा। जैसे मिसेज कौशिक की लेता है।” दीपक ने संतोष से कहा जो ठीक उसके बगल में ही बैठा हुआ था।
“बात तो तेरी बिल्कुल थिक है। पर इसे देख कर मुझे नहीं लगता है कि हम बुद्ध को घास भी डालेंगे। इस्का कपड़े देख कर तो मुझे लगता है ये कोई बड़े घर की रहने वाली है।” संतोष ने दीपक बात सुनाने और हमें महिला शिक्षक को ध्यान से देखने के बाद अपनी बात कही थी। दीपक भी संतोष की बात से पूरी तरह सहमत था।
“तो बचाओ मैं तुम्हारी मठ की नई टीचर। मेरा नाम है राधिका खन्ना। मैं यहां पर 6 माहिन के लिए आई हूं। मठ से संबंधित कोई भी सवाल आप बे-झिझक मुझे पुच सकते हैं। ये मेरा परिचय। और अब आप अपना परिचय दिजिये।” राधिका मैडम की बात सुन के बाद, सभी बच्चे एक कर के अपना परिचय देने लगे। फिर बारी आई रामू की।
“मैडम मेरा नाम रामू है।” रामू ने अपना बता कर बैठा गया। उसके बाद दीपक बारी आई, दीपक ने भी रामू की तरह किया। फिर बारी आई मेरी और मैं ने भी यही किया, जो उन दोनो ने किया था। परिचय होने के बाद राधिका मैम ने गणित पढने लगी।
परिचय स्कूल स्टाफ।
1. राधिका खन्ना (राधिका के पिता डीआईजी है, जो सहर 2 में रहते हैं। राधिका भी वही रहती है। ये बहुत ही बोल्ड है। इसकी शादी हो चुकी है। राधिका का पति अमेरिका में जॉब करता है। राधिका अपनी सास-सरूर को छोड कर अपने पति के साथ अमेरिका जाने से मन कर दिया। उसके पति को भी राधिका के निर्णय पर बहुत ही गर्व हुआ। राधिका का फिगर भी कमल का है। 36 की बड़ी बड़ी चुची, 28 कमर और 38 की भारी गांड, देखते ही मार्ने को जी चाहते हैं।)
2. महेंद्र सिंह (ये है हमारे स्कूल का प्रिंसिपल पाल। बहुत ही कामना इंशान इस्का बस चले तो स्कूल की लड़कियों की भी न छोड़े पर इस्का बस नहीं चलता। अभी किसी को भी पता नहीं है, ये उसके साथ क्या करता है। इस्का शरिर भी अच्छा थाक है, लुंड की बात करते तो 7 इंच लंबा और 3 इंच मोटा। ये हमारे गांव में ही रहता है।)
3. मिसेज कौशिक (इंका पुरा नाम रुक्मणी कौशिक है। ये बहुत ही चालू है। इसके हाथ जो छड़ गया वो समझो काम से गया। लड़कियों को छोटी नहीं और लड़कों की गंद मार लेटी है। ये पास के ही गांव की है। चित्र भी 38 30 40 की है।)
4. तनु शर्मा (ये है हमरी कंप्यूटर टीचर। बहुत ही फास्टवर्ड। ये हमरे हीरो संतोष के पिच 1 साल से पड़ी हुई है। पर संतोष अभी तक इसके हाथ नहीं लगा है। ये शादी हुई है। सीधी के 2 साल हो गए हैं।) इस्का पति शहर में नौकरी करता है। और ये गांव में रहती है। फिगुर भी बहुत ही दिलकाश है, 34 की चुची, 28 की कमर, 38 की गांड।”
अब आते हैं कहानी पर।
“अगर किसी को भी कोई शक है तो मुझे अभी पुछ सकता है या बाद में भी पुछ सकता है।” राधिका ने अपना आज का अखरी गणित का प्रश्न हल करने के बाद बचाओ से बोली। किसी भी ने भी कुछ नहीं कहा तो राधिका समझ गई की उन सब समझ आ गया है। “अच्छा ये बताओ पास में कोई कामरा मिला जाएगा जहान पर में रह सकती हूं।”
“मैडम आप मेरे घर पर रह सकती है।” एक लड़की ने कहा। राधिका ने उसे और देख कर बोली, “मुझे ऐसी जग चाहिए जहां पर मैं आराम से रह सकू और मुझे कोई भी परेशान ना कर खातिर..”
“मैडम आप मेरे घर रह सकती है।” संतोष ने कहा। राधिका संतोष की पहली बार ध्यान से देख रही थी। उसका शरिर देख कर कोई भी नहीं कह सकता था कि अभी वो 10वीं में है। राधिका बोली, “शायद तुम ने मेरी बात ध्यान से नहीं सुनी।”
“मैडम अपने घर नहीं कह रहा। मैं तो ये कह रहा था कि स्कूल से पास ही मेरा एक घर है। जहां पर कोई नहीं रहता है। आप वहां पर रह सकती है। हां वहां पर अभी हल्का नहीं है।” संतोष ने कहा। संतोष ने अपने खेत के पास बना हुआ घर को बताया था, जो कभी कभी रहने के लिए प्रयोग किया था, ज्यादा तार खेतो की फसल काटने के दौरन।
“ठीक है। स्कूल के बाद मुझे देखा देना।” राधिका ने कहा। तबी बेल ला गई। अगली कक्षा श्रीमती कौशिक की थी। जैसे ही क्लास में दखिल हुई सारे बच्चे चुप चाप खड़े हो गए। राधिका ने भी ये नोट किया। “मैडम आपको तांग को नहीं किया न किसी ने। अगर किया है तो आप मुझे उसका नाम बताइये।” श्रीमती कौशिक ने आते ही राधिका से पुचा।
“नहीं मिसेज कौशिक मुझे किसी ने भी तंग नहीं किया। सभी बच्चे बहुत अच्छे हैं।” राधिका बोली.
“मैडम राधिका अभी आप में बचो को नहीं जनता अगर इनका बस चले तो सर पर ही नाचने लग जाए। जरा ध्यान रखिएगा।” श्रीमती कौशिक ने संतोष की तरफ देख कर कहा। जो दीपक के साथ बातो में लगा हुआ था। आज संतोष श्रीमती कौशिक के हाथ छड ही गया था। पता नहीं उसका क्या होने वाला था।
“अच्छा मिसेज कौशिक चलती हूं। लंच के टाइम मिला है।” राधिका बोली और क्लास से निकल गई। राधिका के जाने के बाद श्रीमती कौशिक ने अपनी सीट पर जाते हुए संतोष को आवाज दे कर दमक कर दिया। मिसेज कौशिक ने संतोष से इतिहास के कुछ सवाल मुझे, जिसमे से संतोष ने 5 का ही जवाब सही से दे पाया।
“संतोष आज लंच के टाइम मेरे केबिन मुझे मिलना। और अभी तू बहार जा कर खड़ा हो जाओ। सब को पता तो चले स्कूल लायाक स्टूडेंट कैसा नालायक हो गया है।” श्रीमती कौशिक ने कहा। संतोष चुपचाप जा कर बहार खड़ा हो गया। मिसेज कौशिक को संतोष पर गुसा इस लिए था क्योंकि पढ़ाते हैं संतोष ने के बार इनकी गलत निकल दी थी, और बच्चे हैंने लग गए थे।