मां बेटी और बेटा CHAPTER 10

 

              मां बेटी  और बेटा  CHAPTER 10




ममता का पूरा चेहरा और बाल भीग चुके थे। उसके कंधों और चुच्चियों से जय का गरमा गरम मूत बह रहा था। ममता की आंखें अभी बंद थी। उसने चेहरा अलग हटाया और आंखों को अपने हाथों से पोछा। फिर कनखियों से देखा तो जय अपना लण्ड हाथ मे पकड़कर उसके ऊपर मूत रहा था। वो मुस्कुरा रहा था। तभी ममता बोली,” जय ये क्या कर दिया तुम, हमही पर मूत दिए। हमको पेशाब करवाने लाये थे और तुम हम पर पेशाब कर रहे हो। अरे हटाओ ना लण्ड अपना, हम पर मूतने में तुमको मज़ा आ रहा है। देखो पूरे गीले हो गए हैं।”

जय ने देखा कि ममता का मुंह खुला हुआ है तो, उसके मुंह में लण्ड से निशाना लगाकर में मूतने लगा। जय की मूत की पीली धार सीधा ममता की जीभ से टकराई। ममता का मुंह तुरंत मूत से भर गया, उसने उसे उगल दिया। जय ये सब देख हंसता रहा, फिर बोला,” अरे इसीमें तो मज़ा आता है, हमको। तुम अभी बहुत अच्छी लग रही हो माँ। हमारे ख्याल से हर औरत को ये ज़रूर करना चाहिए। अपने मर्द के मूत/ पेशाब से नहाना चाहिए और उसका मूत भी अमृत समझकर पीना चाहिए। ये औरत के समर्पण को दर्शाता। हां, भले ही थोड़ा सा अजीब लग सकता है, और पहली बार में ये सब कर भी नहीं सकता। पर जिनकी आत्माएं एक हो जाये, उनके लिए ये तो कुछ भी नहीं। और अपनी पत्नी से तो इसकी कामना कर ही सकते हैं। सेक्स का ये एक घिनौना और गंदा रूप है, पर तुमको इसमें खुदको ढालना होगा। तुमको तो इसके भी आगे बढ़ना है। तुमको पूरी निर्लज्ज होना पड़ेगा और इन चीज़ों के परहेज से बचना होगा।”

जय के लण्ड से पेशाब गिरना बंद हो चुका था। ममता खड़ी हो गयी और अपने चेहरे को पोछने के लिए आगे बढ़ने लगी। उसके बाल गीले हो चुके थे, चेहरा भी गीला था। चुचकों पर मूत की बूंदे मोतियों की तरह लटककर चू रही थी। उसका साया भी थोड़ा सा गीला हो चुका था। 

जय ने उसे देखा और अपनी बांहों में पकड़ लिया। ममता बोली,” जय हमको छोड़ो ना, धोने दो देखो पूरा पेशाब से गीला कर दिए हो। हमको बहुत शर्म आ रहा है। पूरा बदबू है।”

ममता- तुम कैसी बात करते हो जय? हम पेशाब कैसे पी सकते हैं। छी बहुत गंदा है। तुम हमारा मूत पी सकते हो क्या?

जय- हम तो तुम्हारा हर चीज़ पी जाएंगे। मूत क्या चीज़ है।

ममता बांहों में कसमसाती हुई,” झूठ, तुम पी नही पाओगे। बहुत गंदा स्वाद होता है।”

जय- और अगर पी लिए तो?

ममता- तो हम भी तुम्हारा पेशाब बेहिचक पियेंगे। 

जय- पक्का ना?

ममता- पक्का।

जय- तुमको बदबू आ रहा है। एक मिनट रुको।” जय ने ममता का साया उठाया और मूत से गीले बुर को पूरे मुंह में भर लिया। और जीभ से पूरे बुर को चाटा। ममता की खट्टी और खारे पेशाब का स्वाद उसके मुंह में समा गया। पर जय को वो चासनी जैसी लगी। वो चाट रहा था और ममता इस पूरे प्रक्रिया के दौरान उसको बोले जा रही थी,” जय ये क्या कर रहे हो? गंदा है वो , हमारा मूत क्यों पी रहे हो?  हालांकि वो ये बोल रही थी। पर उसे जय के जीभ से टकराते बुर के दाने का एहसास पागल कर रहा था। इस वजह से उसके बुर से और मूत निकल गया। जय उसे बिना किसी झिझक के पी गया।  वो जय की ओर देखी। जय और उसकी आंखें टकराई। फिर जय ने उसको छोड़ा और कहा,” माँ, तुम्हारी कोई भी चीज़ गंदी नहीं। ये तो तुम्हारे अंदर था। हम तुमको प्यार करते हैं।”

ममता उसे देखी तो उसे एहसास हुआ कि जय उसको कितना चाहता है, की उसके मूत को भी पानी की ही तरह पी गया। ममता ने उसे चूम लिया और बोली,” बेटा सैयांजी, तुम तो बहुत ही अच्छे हो, पर हम कैसे हैं कि तुम्हारा दिल दुखाये। कैसा लगा अपनी माँ की मूत का स्वाद?

जय- मस्त बिल्कुल चासनी थी।” 

ममता- चल हट…. वैसे तुम्हारे मूत का स्वाद तो खाड़ा था। 

जय- कोई बात नहीं, कुछ दिन में तुमको इसकी आदत हो जाएगी। बाद में खूब पियोगी।


तभी पीछे से आवाज़ आई” भाई, हमारे मूत का स्वाद चखना चाहोगे, हमको मूत लगी है।” जय और ममता आलिंगन में थे दोनों ने देखा, तो कविता मुस्कुराते हुए खड़ी थी।  ममता के सामने ही वो बेबाक होकर बोली थी। जय ने कहा,” तुम्हारी पैंटी से तो तुम्हारे बुर और मूत का स्वाद खूब चखा है, पर आज तुम्हारा ताज़ा पेशाब पिऊंगा। आ जाओ।” कविता उसके पास आ गयी। जय घुटनो पर बैठ गया और कविता अपना साया उठाके बुर को उसके मुंह पर सेट की। ममता वहीं पास में खड़ी थी। कविता के बुर से सिटी की तरह आवाज़ गुनगुनायी फिर उसके मूत्रद्वार से पेशाब की पतली धार निकली। वो सीधा जय के नाक से टकराई। कविता फिर बुर को पीछे की तो धार उसके मुंह मे गिरने लगी। कविता की आंखें बंद थी। वो भी बहुत देर से नहीं मूती थी। जय उसके मूत को बेहिचक पीने लगा। कमरे में भीगी पुआर की महक आ रही थी। जो कि कविता की मूत की थी। कोई तीन चार मिनट मूतने के बाद कविता ने आंखें खोली तो देखा, जय का सीना, पेट, जाँघे और लण्ड सब गीला हो चुका है। जय ने उसका बहुत मूत पिया भी था। जय उठा तो उसने कविता से कहा,” दीदी तुम मां के बदन को चाटो, अभी अभी हम मां को मूत से नहलाये हैं।” ममता बोल उठी,” नहीं अभी नहीं बाद में।” शायद उसको शर्म आ रही थी। कविता,” जय मां तो शर्मा रही है। माँ अब हमको इसकी आदत लगा लेनी चाहिए। क्योंकि ये सब तो चलता ही रहेगा।” ये बोलकर कविता ममता को पकड़ उसको चूमने लगी। दोनों के होंठ एक दूसरे में उलझ गए। ममता के पूरे बदन से जय के पेशाब की गंध आ रही थी। उसके मुंह से वही गंध कविता खूब मज़े से सूंघते हुए उसको चाट रही थी। मूत का खाड़ा स्वाद उसकी जुबान पर घर कर गया। फिर वो ममता के पूरे चेहरे को चाटने लगी। इसके बाद कविता ममता के गर्दन को चूमते हुए उसकी उन्नत चुच्चियों को चूसने लगी। पीली पेशाब की बूंदे उसके प्यासे होंठों पर ओस की बूंदों की तरह गीला कर रही थी। ममता उसे रोक नहीं रही थी, बल्कि और उत्तेजित हो चुकी थी। दोनों एक दूसरे को जकड़े हुए थी। जय उन दोनों को देखकर खुश और उत्तेजित होने लगा। 

जय- तुमदोनों को ऐसे देख बहुत अच्छा लगता है।” जय अपना लण्ड पकड़कर बोला,” अभी और पेशाब है, पियोगी।” 

कविता जय की ओर देखकर बोली,” तुम्हारा पेशाब हमारे लिए अमृत ही है। तुम भी तो हमारा पेशाब पिये हो। तो हमदोनों भी पियेंगे। क्यों माँ??

ममता- अभी अभी तो शर्त हारे हैं। पूरा तो करना पड़ेगा? जय ने हमारा मूत पिया है अब हमको भी बेहिचक इसका मूत पीकर इसकी हर इच्छा पूरी करनी होगी।” ये कहते हुए वो दोनों घुटनों पर बैठ गयी। वो दोनों मुस्कुरा रही थी।  दोनों उसके सामने अपना मुंह खोलके इंतज़ार करने लगी। जय उन दोनों को देख हंसा फिर बोला,” दोनों चिपकी रही तो पिलाने में आसानी होगी।” जय के लण्ड से मूत की धार फूट पड़ी। जय उन दोनों के मुंह पर मूत की पीली धार बरसाने लगा। दोनों औरतें चेहरे पर गरम मूत की धार के एहसास से ” ऊऊऊ” बोल उठी। जय,” बताओ कैसा लग रहा है दीदी? 

कविता अपने चेहरे से मुंह मे चूते पेशाब का स्वाद लेते हुए बोली,” खट्टा और खाड़ा है, नमकीन है। अभी तो इतना अच्छा नहीं लग रहा है। पीते पीते आदत लग जायेगा। मूठ भी तो पीते पीते ही अच्छा लगता है।” बोलते बोलते उसे उबकाई आ गयी। जय उसे देखकर हसने लगा। वो खुद भी मुस्कुराई। उसकी आँखों में पानी आ गया था। लेकिन फिर दुबारा हिम्मत करके पेशाब की पीली धार के नीचे आ गयी। जय ने उसे अपने पेशाब से माथे से लेकर घुटनों तक भिगो दिया। उसकी सख्त जवान चुच्चियाँ तन कर खड़ी थी। बाल गीले हो चुके थे। उसके खुले मुंह से पेशाब भरकर तेजी से चू रहा था। दूसरी ओर ममता घुटनों पर बैठी अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। कविता के बदन से छींटे उड़कर उससे टकड़ा रही थी। तभी जय ने पेशाब की धार उसके गोरे मुखड़े पर मारी। उसकी आंखें अनायास बंद हो गयी और पूरे चेहरे  पर जय का बदबूदार पेशाब फैल गया। तभी कविता ने जय का लण्ड पकड़ लिया, जो अब तक वो पकड़े था। उसने जय का हाथ हटा दिया जैसे कह रही हो कि आप क्यों तकलीफ करते हैं। और खुद उसकी आँखों में देखकर लण्ड को ऊपर नीचे करके ममता को भिगोने लगी। ममता हिम्मत करके करीब एक डेढ़ कप पेशाब पी गयी होगी। इस बार भी उसे कई बार उबकाई आई लेकिन वो बेचारी डटी रही। जय उन दोनों को इस स्थिति में देख बहुत संतुष्ट था। दोनों ने बहुत ही अभूतपूर्व प्रयास किया था। कविता – कैसा है माँ, इसका स्वाद?

ममता- बिल्कुल वैसा जैसा तुमने कहा। बारिश में भीगी हुई कच्ची पुआर की खुशबू है। बचपन से लेकर आजतक ऐसा ही पेशाब करता है ये। बचपन में भी हमको गीला कर देता था, अब बड़ा होकर तो नेहलायेगा अपना मूत से।” बोलकर वो हंस पड़ी। जय और कविता भी हसने लगे।

जय- तुम दोनों को इसकी आदत लगाने के लिए बियर पीनी चाहिए। बियर का स्वाद बिल्कुल अच्छा नहीं होता।”

ममता- तुम कबसे बियर पीने लगा? तुम तो दारू हाथ नहीं लगाते? 

जय- हम आज भी दारू नहीं पीते हैं, माँ। वो तो दोस्तों ने एक बार पिलाया था। हमको बहुत खराब लगा था।”

कविता- फिर ठीक है, हमलोग आज ही बियर पियेंगे देखते हैं, कैसा लगता है।”

ममता- लेकिन जय तुम मत पीना, दारू बेहद खराब चीज़ है।

कविता- अरे मां, बियर में दारू उतना नहीं होता है। उसे पीने में कोई खतरा नहीं है।”

ममता- ना एक ही बेटा है हमको वो भी ये सब करेगा। ना ना। 

कविता- बेटा तुम्हारा अब हम दोनों का पति है, माँ। तुम कब तक इसको समझाती रहोगी। ये बड़ा हो चुका है। सही गलत समझता है।”

ममता- ठीक है पहले हम पियेंगे, तभी जय पियेगा।” 

कविता- सब साथ में पियेंगे, ये हमारा फैसला है भूलना मत हम तुमसे बड़े हैं। हम जय की पहली बीवी हैं और तुम दूसरी।

जय उन दोनों को देख मुस्कुराया। अब तीनों बाथरूम में भीग चुके थे। पूरे कमरे में पेशाब की महक आ रही थी। जय ने फैसला लिया कि अभी उन तीनों को नहा लेना चाहिए। जय ने शावर ऑन किया और तीनों उसमें भीगने लगे। जय उन दोनों को बांहों में भर चुका था। इस वक़्त वो शाहरुख और कविता और ममता करिश्मा और माधुरी लग रही थी, बिल्कुल दिल तो पागल है जैसे। दोनों उससे चिपकी हुई थी। जय को वो दोनों रगड़कर नहला रही थी। दोनों का साया उनसे गीला होकर चिपक गया था। उनकी गाँड़ उनकी जांघ सबका उभार साफ पता चल रहा था। गाँड़ की दरार में साया घुस गया था। जय उनको हर संभव जगह स्पर्श कर रहा था। कभी उनकी चुच्चियों को दबाता तो कभी गाँड़ को। जब उन्होंने जय को नहला दिया तो फिर दोनों ने एक दूजे को पकड़ लिया और एक दूसरे को रगड़ने लगी। तभी अचानक दोनों चुम्मा में उलझ पड़ी। उफ्फ क्या दृश्य था। दो औरतें जिनकी चुच्चियाँ नंगी थी, साया घुटनो तक उठा हुआ था और गीला होकर बदन से चिपक गया था। पूरे बदन से पानी चू रहा था। और दोनों चुम्बन करते हुए जय को कनखियों से देख रही थी। जय का लण्ड ये देख खड़ा हो गया। ममता और कविता भी कामुक हो चुकी थी। जय के लण्ड को पकड़कर कविता हिलाने लगी। उसने शावर बंद कर दिया और दोनों को टॉवल दे दिया। ममता ने टॉवल से जय को पोछा फिर कविता को। कविता ने ममता को पोछा। दोनों ने अपना साया बाथरूम में ही खोल दिया। अपनी कमर हिलाकर साया को नीचे सरकाया। वो धाराक से नीचे गिर गया। दोनों माँ बेटी पूरी तरह नग्न थे। फिर दोनों उसी अवस्था में जय से चिपककर बाथरूम से बाहर आई। जय उनके चूतड़ों को सहलाते मसलते हुए मज़े ले रहा था। दोनों जय को सोफे पर बिठा कमरे में चली गयी। वहां उन दोनों ने फिर से श्रृंगार किया और अपनी नग्नता को सिर्फ टॉवल से ढके थी। जय ने तभी सत्यप्रकाश को फ़ोन किया यानी उसका मामा जो अब साला था। उधर से माया की हंसी ठिठोली की आवाज़ आ रही थी। जय बोला,” सुनो बे साले एक कार्टून बियर की बोतल भेजवा दो।” सत्य बोला,” जी जीजाजी 10 मिनट में पहुंच जाएगा।”

उसने फिर फोन काट दिया। 10 मिनट के भीतर एक लड़का पूरा कार्टून लेकर आ गया। जय ने वो ले लिया और बियर को फ्रिज में डाल दिया। उसकी दोनों पत्नियों ने सिर्फ साया और ब्रा पहनी हुई थी। जय ने उनको अपनी तरफ बुलाया। ममता उसके पास पहुंची बोली,” कुछ खाओगे नहीं ताक़त कैसे आएगी? दो दो बीवियां चोदना है तुमको। हम खाना लगाते हैं। कविता बोली,” उसके पहले बियर पियेंगे हमलोग। क्यों जय?

जय- बिल्कुल, खाने से पहले  बियर पियेंगे, फिर खाएंगे।” 

कविता- माँ हम बियर लेकर आते हैं, तुम चखना लेकर आओ।” दोनों काम पर लग गयी और थोड़े ही देर में बियर और चखने से टेबल सज गयी। ममता ने कभी पी नही थी, इसलिए वो चियर्स का मतलब समझ नहीं पाई। तीनों ने एक एक सिप लिया। कविता और ममता का मुंह पीने के साथ ही वैसे बन गया जैसे, मूत पीने से हो गया था। दोनों ने एक साथ चखना उठाकर मुंह में डाला। 

ममता- इससे अच्छा तो मूत पीना है।”

जय- धीरे धीरे पियो अच्छा लगेगा।” थोड़ी देर बाद तीनों आधी आधी बोतल पी चुके थे। और अब उनपर मस्ती चढ़ रही थी। ममता और कविता को तो अब हल्का नशा भी हो गया था। 

कविता- माँ, हम तीनों एक साथ हनीमून मनाने चले। हम तो गोआ जाएंगे। तुम्हारा कहां मन है, और तुम भी बताओ जय।

जय- ठीक है, कविता दीदी। बहुत मस्त जगह है। 

ममता- हमको क्या पता? हम कहां जाएंगे। तुम दोनों सोच लो और हो आयो। तुम दोनों जवान हो जाकर मजा करो।

जय- माँ तुमको तो साथ चलना ही पड़ेगा, नहीं तो मज़ा नहीं आएगा। 

कविता- माँ, तुमको जाने की इच्छा नहीं है क्या? 

ममता- नहीं कविता, तुमलोग हो आओ।

जय- पर तुम नहीं जाओगी, तो हम भी नहीं जाएंगे।

कविता- अरे झगड़ो मत, इसका फैसला हो जाएगा। पहले खाना खाते हैं। ममता जाओ खाना लगाओ।

ममता हंसते हुए बोली- जी ठीक है दीदी। अभी लाते हैं। 

कहकर वो चली गयी। उसके जाते ही कविता नशे में उठकर जय के पास आ गयी और बोली,” जय क्यों ना हम दोनों ही चलें। मां को यहीं छोड़ देते हैं। ताकि हम तुमको अच्छे से प्यार कर सकें। तुम जो बोलोगे हम सब करेंगे। तुम्हारा हर गंदा से गंदा फरमाइश पूरा करेंगे। वो रहेगी तो हम पर ध्यान ठीक से नहीं दे पाओगे।”

जय कविता की ओर देखा और बोला,” साली आ गयी ना औकात पर। यही करना था, तो क्यों मां को अपनी सौतन बनाई। हम तुमको उतना ही चाहते हैं जितना मां को। तुमदोनो हमारे लिए बराबर हो। तुमने सिर्फ हमारे साथ कसमें खाई हैं, पर हम तो तुम दोनों के साथ सात फेरे लिए हैं। चलोगी तो दोनों हमारे साथ। हमको तुमदोनों के साथ हनीमून मनाना है।”

कविता हंस पड़ी,” अरे भैया हम तो मज़ाक कर रहे थे। हमदोनों ही तुम्हारे साथ चलेंगी। तुम्हारा पूरा मनोरंजन करेंगे। तुम्हारा प्यार हम दोनों माँ बेटी के लिए कितना गहरा है, ये आज पता चल गया। मां हमारी सौतन बाद में बनी, उससे पहले तुम्हारी छोटी पत्नी है।”

जय- कविता ऐसा मज़ाक कभी मत करना।

तभी ममता खाना लेकर आई,” दीदी इनको छोड़ोगी। तभी तो खाओगी।”

तीनों बियर पी चुके थे, और खाना खाने लगे। कविता खाना परोस रही थी। तब ममता बोली,” जय को अच्छे से खिलाओ।”

जय- तुमभी अच्छे से खाओ। 

खाने खाने के दौरान जय ममता और कविता को और खाने के लिए बोलता रहा। 

थाली वाली वैसे ही छोड़कर सब उठ गए। तीनों फिर कमरे में चले आये। कमरे का दरवाजा बंद होने से पहले दोनों की ब्रा कमरे के बाहर फेंक दी गयी।

 


नशे में दोनों माँ बेटी मस्त हो रही थी। उनको तो पता भी नहीं चला कि कब जय ने उनकी ब्रा उतार दी और चुच्चियों को नंगा कर दिया। उनके बदन पर सिर्फ साया था। ममता का भरा पूरा शरीर, खुले बाल, चाल में उछाल, मस्ती से डोलता उसका पूरा बदन जय के लण्ड में तनाव लाने के लिए काफी था। दूसरी ओर उसकी माँ की जवान प्रतिबिम्ब उसकी सगी बड़ी बहन कविता बिल्कुल लापरवाह होकर जय को चूमती जा रही थी। अपनी नंगी चुच्चियों को खुद से निचोड़कर जय को पिलाने के लिए बेताब थी। जय कविता के भूरे चुचकों को एक एक करके चूस रहा था। दूसरी ओर ममता के बड़े चुच्चियों को हाथों से मसल रहा था। कविता के चूचक खजूर के बीज की तरह तने हुए थे। कविता जय के सर को पकड़ अपने चुच्चियों में समा लेना चाहती थी। वो जय के माथे को चूम रही थी। जय की लार से चुच्चियाँ काफी गीली हो चुकी थी।

कविता- भैया, तुम जब हमारे चूचियों को चूसते हो, तो बदन में उमंग तैरने लगता है। हम औरतों को भगवान ने बच्चों को दूध पिलाने के लिए चुच्चियाँ दी है, पर जब मर्द सेक्स के दौरान इनको मसलकर दूध पीते हैं, तो बुर में चुदने की प्यास उठ जाती है। बुर से पानी अनायास बहने लगता है। तुम भी तो हमारे दूध को पियोगे ही, जब हम तुम्हारे बच्चे की माँ बनेंगे। इस्सस…. काटते क्यों हो….. अप…..

ममता- इसने हमारा दूध पिया है, और आज बियर पिलाकर, हमारा बुर का पानी पियेगा। क्यों है ना? तुम बड़े ही मादरचोद बेटा हो। 

जय जोश में था, पर उनकी ओर देखकर हंसा, और ममता को अपने पास खींच लिया,” अब तो तुमदोनो और मस्त होकर चुदवाओगी। दोनों का सेक्स का प्यास चुच्चियों को मसलने से बढ़ता है। इधर आना रंडी कहीं की।”

जय भी थोड़ा नशे में था, उसने कविता और ममता के चेहरों को एक साथ चिपका दिया और उनके होंठों को एक साथ चूमने लगा। उनके होंठ जय के जबरदस्त चुम्बन से कांपने लगे। जय ने उनका साया उठाना चाहा, पर वो जल्दी से उठ नहीं रहा था। शायद नशे की वजह से वो ठीक से खींच नहीं पाया। उसने बगल से कैंची ली, और ममता के साये को घुटनों के पास से काटकर अलग कर दिया। अब ममता के घुटनों से ऊपर के हिस्से ही ढके थे। मतलब ममता की जाँघे, दूसरी ओर कविता ने अपना साया उतार दिया, और अपने भाई की तरह बिल्कुल नंगी हो गयी। जय ने कविता को उसके गाँड़ पर सहलाते हुए 3 4 थप्पड़ मारे। हर थप्पड़ जे बाद कविता, आउच बोलती पर उसको रोकती नहीं थी। 

जय उसकी ओर देख बोला- क्यों रे रंडी, क्या चाहती है तुम?

कविता- आपका मस्त लौड़ा, चुदवाने के लिए।

जय- क्या चुदवायेगी?

कविता- अपनी बुर और गाँड़ मरवाऊंगी जमके।

जय- और तू रे रंडी के माँ। तुमको भी गाँड़ मरवाने का मन है।

ममता मुस्कुराते हुए- हमसे पूछ रहे हो, की अपनी मर्ज़ी बता रहे हो?

जय चुच्ची पर एक थप्पड़ मारा, जिससे ममता कराह उठी।” जितना पूछे उतना बोल कुत्ती की बच्ची, बुरमरानी गदही, हरामखोर की पिल्ली।

ममता- हहम्म, हां गाँड़ मरवाने को बेताब हैं। मारो ना।

जय- लौड़ा चाहिए, तो तुमदोनों को अब हमको खुश करना पड़ेगा। कविता चल हमारा गाँड़ चाटो, ममता तुम हमारा लौरा चुसो।”

दोनों बिना देर किये घुटनों पर बैठ गयी। और ममता सीधा लौरा के पीछे पर गयी। उससे भी फुर्ती दिखाई, कविता ने उसने जय के पीछे जाकर, उसके चूतड़ अलग किये। वहां जय के गाँड़ के छेद के पास काफी बाल थे। कविता ने बिना देर किए, उसके गाँड़ के छेद को, अपनी जीभ से चाटा। वहां से बदबू आ रही थी, पसीने की पर नशे में वो सब सूंघ रही थी। आगे उसकी मां, जय के लण्ड को प्यार करने में मशगूल थी। दोनों जय को अपने स्तर से खुश करने में लगी थी। जय का ये सपना था, की दो औरतें उसको ऐसे प्यार करें। जय तो सातवें आसमान पर था। उसने दोनों के माथे को दाएं और बाएं हाथ से पकड़ रखा था। कविता धीरे धीरे और आक्रामक तरीके से चूसने लगी। जय के चूतड़ों को बीच की दरार को जीभ से साफ कर रही थी। जय की गाँड़ में ज़ुबान भी घुसाना चाह रही थी। उधर ममता अपने कौशल का परिचय दे रही थी। वो जय का पूरा लण्ड समेत आंड़ भी मुंह में भर ली थी। और जय के झाँटों तक होंठ चिपकाए हुए थी। इस तरह की माँ और बहन पाकर, किसको मज़ा ना आये। दोनों, एक से बढ़कर एक सेक्स की प्यासी, रंडियों की तरह चुदनी की तड़प शायद ही जय ने ब्लू फिल्म की हीरोइनों में भी देखी हो। जय खुद को किसी जन्नत में महसूस कर रहा था। उसने ममता को देखा और इनाम के तौर पर मुंह से थूक फेंका, जो सीधा ममता के माथे पर गिरा। 

जय- तुम दोनों से हम कितना खुश हो रहे हैं, ये तय ऐसे होगा, की जब हमको अच्छा लगेगा, हम उसके मुंह पर थूकेंगे। और जिसके ऊपर जितना बार थूकेंगे, इसका मतलब वो हमको खूब खुश कर रही है। ये सुनकर दोनों के कान खड़े हो गए। कविता अपने भाई के गाँड़ को चाट चाटके साफ कर रही थी। उसकी जीभ जय के गाँड़ के छेद के अंदरूनी हिस्से को छू गयी। जिससे उसकी जीभ पर बदबूदार महक फैल गयी। पर बेचारी ने उसको सुगंध समझ चाट लिया। जय को ये पसंद आया, उसने कविता के ऊपर भी गर्दन घुमाकर थूका, कविता जैसे इसी इंतज़ार में थी। वो उसके थूक को सीधे मुंह खोलकर ले ली और पी गयी। जय उन दोनों का समर्पण देख बहुत खुश था। उसकी थूक को अपना मैडल समझ रही उसकी माँ बेक़रार थी, की कब जय और थूके। इस तरह कुछ ही देर बाद दोनों का चेहरा जय की थूक से तर हो चुका था। जय ममता के चेहरे पर लौरा से पिटाई कर रहा था। कभी गालों पर, तो कभी होंठों पर, कभी माथे पर तो कभी ठुड्ढी पर। जय ने आखिर ममता और कविता को कुत्ती की तरह चौपाया कर दिया और दोनों के बाल पकड़ उनको बिस्तर की ओर ले चला। दोनों के बदन में मस्ती चढ़ चुकी थी। दोनों बिस्तर में चढ़ गई, और अपने अपने चूतड़ों को मसल रही थी। दोनों लण्ड की प्यासी हो गई थी। उनके बुर से पानी लगातार चू रहा था। उनदोनों के पिछवाड़े को आपस में चिपका दिया। और उनके बुर और गाँड़ एक साथ चाटने लगा। इस चटाई के दौरान उनका मुंह कभी बन्द ही नहीं हुआ, दोनों कराह रही थी और मौका मिलने पर किस कर लेती थी। जय की जीभ ने अपना जादू कर दिया आखिर ममता बोल उठी,” अब देर ना करो, चोदो ना।

जय- आज तो तुम्हारा खाली गाँड़ चोदेंगे।

ममता- तो मारो ना हमारी गाँड़, ये तो मरवाने के लिए ही बनी है।

जय- बिल्कुल सही, और तुमको पता है, औरतों के बाल लंबे क्यों होते हैं, ताकि हम चुदाई के दौरान इनको हैंडल की तरह इस्तेमाल कर सकें।” कहकर उसने ममता के बाल कसके खींच लिए, जिससे उसका सर ऊपर की ओर तन गया। जय ने उसके गाँड़ पर थूक दिया और लण्ड से फैला दिया। कविता ने अपने मुंह से थूक निकालकर ममता की गाँड़ के छेद पर मल दिया। उसने अपनी दो उंगलियां भी गाँड़ में घुसा दी, ताकि थोड़ा ढीला हो जाये। कुछ ही देर में ममता की गाँड़ की भूरी छेद, तैयार हो चुकी थी। जय ने अपना लण्ड उसकी गाँड़ में घुसाने लगा। ममता के मुंह से आँहें निकल रही थी, आखिर लण्ड को गाँड़ में एडजस्ट करने तक हर औरत कराहती है। जय इससे परिचित था, इसलिए कुछ देर रुका। जब ममता की कराह, मस्ती भरी आहों में तब्दील हो गयी, तो उसकी कमर में भी चाल आ गयी। चोदते हुए उसने कविता से कहा,” कविता दीदी अपना बट्ट प्लग गाँड़ में डाल के रखो। हम चाहते हैं, की तुम अपना गाँड़ लण्ड के लिए तैयार रखो।” कविता प्यासी नज़रों से देख कर बोली,” जय, बट्ट प्लग बाहर है।

जय- तो चली जाओ, और लगाके आओ।” कविता बोली,” हम बाहर नहीं जाएंगे अभी।” ये बोलकर उसने अपनी गाँड़ में थूक लगाकर सीधे तीन उंगलियों को घुसा लिया। जय की ओर देखते हुए अंदर बाहर करने लगी। जय को ये बहुत उत्तेजक लग रहा था।जय उसकी बुर पर थप्पड़ मारते हुए बोला,” क्या मस्त गाँड़ और बुर पाई हो तुम, बिल्कुल चिकने चूतड़, और रसेदार बुर। तुम दोनों बिल्कुल पोर्नस्टार जैसी हरक़तें कर रही हो। दीदी तुमको तो मॉडलिंग करनी चाहिए। माँ भी थोड़ी फिट हो जाये, तो हम तुम दोनों को न्यूड मॉडलिंग करवाएंगे।”

कविता- तुम जो चाहे करवाओ, अब तो हम बीवी है तुम्हारे, हमको बीच बाजार नंगी करवाओगे, तो भी होना पड़ेगा। अब तो तुम्हारी इच्छा को पूरा करना, हमारी मान मर्यादा से कहीं ऊपर है।

जय- सच।

कविता- आजमा के देख लो।

जय- तो फिर तुम अपनी गाँड़ में अब मुट्ठी बनाके घुसा लो। तुम्हारी गाँड़ देखते हैं, कितना सह पाती है। 

कविता मुस्कुराते हुए,” बड़े, गंदे हो भैया। गाँड़ में मुट्ठी से गाँड़ का तो छेद पूरा फैल जाएगा और दर्द भी होगा।”

जय- तो क्या हुआ तुम्हारा हाथ और हमारा लण्ड एक ही साइज तो है। घुसाओ ना।

कविता ने और थूक मला, और बची हुई दोनों उंगली, गाँड़ की कसी हुई छेद में किसी तरह घुसानी चाही। उसका दर्द से बुरा हाल हो गया। पर उस बेचारी का समर्पण, था कि वो हिली नहीं। दर्द को सहते हुए, पांचों उंगली गाँड़ में घुसा ली। ममता चुदते, हुए अपनी बेटी से बनी सौतन का हौसला बढ़ा रही थी। ममता,”बेटी, तुम बहुत, लायक बीवी हो, जो अपने पति, के लिए हर हद पार कर रही हो।”

इसके तुरंत बाद ही कविता ने देखते देखते, पूरा मुट्ठी गाँड़ में घुसा ली। फिर आगे पीछे करने लगी। उसकी गाँड़ का लचीलापन अद्भुत था। पूरी की पूरी मुट्ठी घुस गई थी। उसको ऐसा महसूस हुआ, की जैसे उसका हाथ किसी गद्देदार रुई में फंसा है। उसका हाथ उसके मलाशय की गहराई नाप रहा था। जय ने उसका हाथ पकड़के पहले धीरे धीरे आगे पीछे किया, फिर तेजी से। कविता को मज़ा आ रहा था। दर्द काफूर था। तीनों नशे में थी। उधर ममता की गाँड़ भी जय भका भक मारे जा रहा था। उसके अंदर भी एक अजीब सी मस्ती चढ़ी थी। तभी जय ने लण्ड निकाला और कविता की ओर दे दिया। कविता समझ गयी उसे क्या करना है। उसने जय का लण्ड पकड़ा, और चाटने लगी। कविता ने देखा, की जय के लण्ड पर पीलापन था। कविता समझ गयी, पर भोली बनकर पूूूछ बैठी,” भैया ये पीला पीला क्या लगा हैै ? 

जय- ये माँ की गाँड़, में लण्ड से कुटाई की वजह से तैयार हलवा है।

कविता- वाओ, हमको हलवा पसंद है, हम तो पूरा सफाचट कर जाएंगे। और वो चाटने लगी। पहले उसने थोड़ा सा जीभ निकाल कर चाटा। फिर बोली,” ह्हम्म, ये तो बहुत मीठा है।” और जोर से ठहाका मारते हुए हंसी। फिर जय की ओर देख पूरा लण्ड अपने जीभ से चाटने लगी, और साफ कर दिया। फिर कविता जय की ओर देखकर बोली,” ह्हम्म, हम बहुत गंदी लड़की हैं। बहुत….. बहुत …… गंदी।” फिर मुस्कुराई और लण्ड चूसने लगी। जय को ये देख बड़ा अच्छा लगा कि कविता को बिल्कुल घिन्न नहीं आया, ये जानते हुए भी की वो क्या था। जय फिर से ममता की अधखुली गाँड़ के छेद में लण्ड घुसा दिया, और थप्पड़ मारते हुए ममता की गाँड़ चोदने लगा। कविता ममता जे चूतड़ों को चाट रही थी। जय के लण्ड का दबाव बहुत था, इस बार ममता को अपने पेट मे एहसास हुआ कि प्रेशर बन रहा था। जय की ताबड़तोड़ चुदाई से उसका मलाशय कब भर गया, पता ही नहीं चला। उसकी गाँड़ में जय का लण्ड केहर बरपा रहा था। जय ने ममता की परवाह नहीं, किया और उसकी आहों को दरकिनार करते हुए पेलम पेलाई चालू रखा। हालात ये हो गयी कि ममता की गाँड़ के छेद के चारों तरफ हल्का पीला पीला पदार्थ लग गया। लण्ड बार बार अंदर  बाहर होने की वजह से गाँड़ का छेद पूरी तरह खुल गया था, बिल्कुल किसी सांप की बिल की तरह। जय का लण्ड सांप ही तो था, और ममता की गाँड़ बिल। जय ने फिर लण्ड निकाल ममता, को चूसने का इशारा किया।

ममता ने लण्ड की ओर देखा पर नशे की हालत में लण्ड को सीधे मुंह में ले ली और अपने गाँड़ का स्वाद चख ली। जय ने लण्ड को ममता के गालों पर भी रगड़ दिया। ममता के पूरे चेहरे पर गाँड़ का रस लग गया। वो बेचारी तो उसकी हरकतों से हंस रही थी। कविता भी पास में आ गयी और जय के हाथ से लण्ड निकाल खुद चूसने लगी। जय ने फिर कविता से कहा,” अरे हमारी रंडी दीदी, तुमको चुदवाने के लिए निमंत्रण देंगे क्या? चलो कुतिया बन जाओ और अपनी गाँड़ हमारे लण्ड के लिए परोस दो। ही ही

कविता बिना देर किए, कुत्ती बन गयी और, बोली,” अपनी दीदी को रंडियों की तरह चोदो, हमारे राजा भैया। हमारी गाँड़, तुम्हारे लण्ड के स्वागत के लिए बेताब है। तुम गाँड़ बहुत अच्छे से चोदते हो।

जय उसके गाँड़ पर लण्ड सेट करके बोला,” और तुम बहुत अच्छे से गाँड़ मरवाती हो, गांडू दीदी।”

जय का लण्ड, कविता की फैली, गाँड़ में पहले की अपेक्षा आराम से घुस गया। जय उसके चूतड़ों को पकड़ चोद रहा था। तभी कविता बोली,” भैया तुम कुछ भूल रहे हो, अपनी घोड़ी की लगाम तो पकड़ो।” जय ने उसके बाल पकड़ लिए, कविता के बाल खिंच गए, उसके चेहरे पर दर्द की हल्की शिकन आ गयी। पर बियर की मस्ती में वो सब जाती रही। जय ने उसको इसी तरह आधे घंटे तक चोदा, कविता की गाँड़ की भी वही हालात हुई, जो ममता की हुई थी। उसके पेट में भी प्रेशर से मलाशय भर गया और जय का लण्ड उसमें तर हो गया। जय ने लण्ड निकाल फिर ममता को चटवाया। दोनों ने ऐसे एक दूसरे की गाँड़ का स्वाद चखा। इसी तरह उन दोनों को बारी बारी वो पूरी रात चोदता रहा। और वो दोनों भी, सुध बुध खोकर चुदवाती रही। आखिर उसके अलावे उनके पास कोई चारा नहीं था। पूरी रात हुई इस गंदी और घमासान चुदाई से तीनों आखिर थक चुके थे, जय ने उन दोनों को उनका हक दिया जो उसके आंड़ से उबलकर लण्ड के माध्यम से उनके पेट में समा गया। सुबह के चार बजे तक, उन दोनों की इतनी पेलाई हुई कि कब दोनों नंद धरंग हो सो गई, उनको पता ही नहीं चला। दोनों के बाल पूरी तरह अस्त व्यस्त थे, और चेहरे से दोनों सस्ती कोठे की रंडियां लग रही थी। वो दोनों जय के दोनों जांघों पर सर रखे सोई थी। जय का लण्ड उनके चेहरे के करीब ही था, कविता के होंठों से थूक के धागे जय के लण्ड से चिपके हुए थे। उनके चेहरे पर कहीं कहीं मूठ सूख चुका था, और फेविकॉल की तरह कड़क हो चुका था। जय भी सोया हुआ था। 

इस तरह खूब चुदाई के बीच तीन दिन बाद उनके गोआ जाने का समय, आ गया था। वो तीनों काफी उत्साहित थे। तभी, उनके यहां एक फोन आया।


जय कमरे से बाहर आया, तो देखा ममता फोन पर बात कर चुकी थी और ठीक है, बोलकर फोन काट दी। जय ने उसकी ओर देखा, और पूछा,” कौन था?” 

ममता- तेरी मौसी बोलें या साली। वो लोग भी हमारे साथ गोआ चलेंगे और वहीं हनीमून मनाएंगे। 

कविता- अच्छा, लेकिन ऐसा हुआ तो हमलोग एन्जॉय कैसे करेंगे। उनलोगों को कोई और जगह जाना चाहिए था। वो लोग भी खुलके मज़ा कर पाते। 

जय- कोई बात नहीं, तुम दोनों तो हमारे साथ रहोगी और दिन में साथ घूमेंगे रात को तो हम तीनों अलग और वो अलग। कोई टेंशन नहीं है।

कविता- हां ये भी ठीक है। चलो मौसी भी साथ में रहेगी, तो इतना बुरा भी नहीं है। 

फिर सब तैयार हुए। थोड़ी देर बाद घर के बाहर हॉर्न सुनाई दी। सब बाहर आये सामान के साथ, तो देखा सत्य और माया कैब में थे। सब सामान रख तीनों कार में सवार हुए। बैठने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी। पर सब किसी तरह एयरपोर्ट पहुँच गए। फिर अगले तीन घंटों में सब पणजी एयरपोर्ट पर थे। जहां उनके रिसोर्ट की गाड़ी उनका इंतजार कर रही थी। सब उसमें सवार होकर रिसोर्ट पहुंचे। तीनों औरतें आपस में हंसी मजाक कर रही थी। उनके खिलखिलाने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। जय और सत्य उनको देख सुकून महसूस कर रहे थे। जय ने ममता और कविता को होटल के रजिस्टर में बहन लिखा। और कविता को अपनी बीवी बताया। सत्य और माया तो खुद को पति पत्नी ही बताया। सबने निर्णय लिया कि पहले नहाया जाय और फिर इकट्ठे लंच करेंगे। सब अपने अपने कमरों में चल दिये। सत्य और माया दोनों एक साथ बाथरूम में घुस गए। पलभर के अंदर माया और सत्य नग्न होकर बाथ टब में घुस गए। माया सत्य के ऊपर लेटी थी। दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। माया के तन बदन पर सत्य के हाथ रेंग रहे थे, और उसकी छाती पर माया उंगलियों से जलेबियाँ बना रही थी। 

माया- सत्य, हम कोई बुरी औरत तो नहीं है। कल तक तुम्हारा हमारा भाई बहन का रिश्ता था, पर अब दोनों प्रेमी प्रेमिका हो चुके हैं। क्या ये सही है?

सत्य- तुम्हारा दिल क्या कहता है? क्या हमारे प्यार में तुमको कोई खोट नज़र आता है दीदी? क्या पिछले कुछ दिनों से तुम्हारे हमारे बीच जो रिश्ता उभरा है, वो एक धोखा या छलावा है? क्या प्रेमी प्रेमिका का रिश्ता पवित्र नहीं? तुम्हारे मन मंदिर में ना जाने किसकी तस्वीर लगी है, पर हमारे अंदर शुरू से तुम्हारी प्रतिमा रखी है। अपने दिल से पूछो दीदी, क्या तुम पहले खुश थी, या अब हो? इस पल को महसूस करो, इसमें तुम्हारे और हमारे सिवा बस हमारा प्यार है। और तुम्हारी ये बढ़ती दिल की धड़कन हमारे प्यार की दस्तक है। दरवाज़े खोल दो, देखो कौन आया है, दिल में। झांको अपने मन में देखो कौन है। एक बार देखो अगर हम दिखें तो समझना तुम्हारा प्यार हमारे लिए है। 

माया ने आंखें बंद की, फिर थोड़ी देर बाद मुस्कुराते हुए, आंखें खोली। वो भले ही मुस्कुराई पर आंखों में आंसू छलक उठे थे। 

सत्य- कोई दिखा?? 

माया सर हिलाके बोली,” ह्हम्म”।

सत्य- कौन??

माया मुस्कुराई और उसके होंठों पर अपने होंठ जमा दिए। दोनों का चुम्बन बेहद गहरा और लंबा था। फिर बाथरूम के अंदर माया की आँहें जोर पकड़ने लगी। 

करीब एक घंटे बाद सब लंच पर मिले। कविता ने टॉप और डेनिम शॉर्ट्स पहना हुआ था। जबकि माया और ममता साड़ी में थी।  तीनों मस्त लग रही थी। जय और सत्य बस अपनी किस्मत पर खुश थे। सबने खाना खाया और उस दिन कहीं बाहर का ट्रिप नहीं था, तो सब वापिस कमरों में चले गए। कमरे में आकर सब सो गए, क्योंकि रात में सब बहुत व्यस्त होने वाले थे। 

एक ओर जहां माया और सत्य एक दूसरे की बांहों में सोए थे, वहीं दूसरी ओर ममता और कविता जय को अपने बीच लेकर सोईं हुई थी। शाम के तकरीबन सात बजे उनकी नींद खुली। अब सब फ्रेश हुए और आपस में बातें करने लगे। ममता बाथरूम में थी। जय और कविता बाहर कॉफ़ी पी रहे थे। कविता उसे देख बोली,” जय तुमको कॉफ़ी अच्छी लग रही है? 

जय- हां, क्यों अच्छी तो है??

कविता- तुम चाहो तो और अच्छी बन सकती है??

जय- कैसे??

कविता उसके सामने आ गयी और हंसते हुए, अपनी टॉप उतार दी और अपनी नंगी चुच्चियाँ दिखाते हुए बोली,” अपनी दीदी की चुच्चियों की चुस्कियां लोगे तो और मज़ा आएगा।”

जय ने उसके शॉर्ट्स पैंटी के साथ जांघों तक कर दिया और बोला,” कॉफी के साथ, दीदी के रसीली बुर का नमकीन पानी मिलेगा तो और मज़ा आएगा।” और बुर को उंगलियों से टटोलकर, उसके बुर का पानी चख लिया। कविता तो यही चाहती थी, वो तो बेशर्मों की तरह खुलकर चुदवाने आई थी। उसने खुदको पूरा नंगा कर लिया, फिर जय को अपना बुर फैलाकर दिखाते हुए बोली,” बहन की बुर हाज़िर है, अपने चोदू भाई के लिए। यहीं चूसोगे, की हमको उठाके बिस्तर तक ले जाओगे।” जय ने कविता की ओर देखा, कविता की मांग में उसका सिंदूर था, बाल खुले हुए थे और उसके कमर तक लहरा रहे थे। आंखों में चुदने की प्यास, कांपते होंठ उसके छलकते जाम की तरह होंठों का सहारा ढूंढ रहे थे। गले में चुच्ची की गलियों में लटकता चमकता मंगलसूत्र। सुहागन होकर उसका ये रूप जय को पागल कर गया। उसने कविता को अपनी गोद में उठाया, कविता ने उसके चेहरे को पकड़ चूम लिया। जय के हाथ कविता के चूतड़ों पर टिके थे। जय ने बिस्तर पर कविता को पटक दिया और कविता मचलकर उसके गले में बांहे डाले थी। दोनों इस स्थिति में एक दूसरे को देख रहे थे। तभी ममता ने दरवाजा खोला, उसने सामने उन दोनों को देखा, तो देखती रह गयी। दोनों युवा नवविवाहित युगल को देख उसको सुकून मिला। आखिर हनीमून युवा लोगों के लिए है। उसने देखा, कविता बेहद खुश थी। और हो भी क्यों ना, उसके जीवन में शादी का पहला अनुभव था। अब तक तो, वो भी अधेड़ होकर, उनके साथ, खूब मज़े कर रही थी। पर उसे लगा कि ये वक़्त उन दोनों का है। उसने दरवाजा वापिस बंद कर दिया। उसने मन ही मन सोचा, कविता कितनी महान है, अपने भाई के लिए पहले शादी नहीं की, फिर जब शादी कर ली तो अपना सुहाग भी बांट लिया। यहां तक कि सुहागरात की सेज पर, जहां हर लड़की, अकेले ही पति के साथ विवाहित जीवन की पहली रात, गुजारती है, उसपर भी ममता अपनी बेटी के साथ थी। वो तो ये सब पहले भी कर चुकी थी, पर कविता को ये मौका, कभी नहीं मिला, की वो अकेले,जय के साथ वक़्त गुजारे। शादी को पूरे 15 दिन हो चुके थे। ममता की आंखों में आंसू आ गए, उसके मुंह से बस इतना निकला,” हमरी बच्ची…….जुग जुग जियो।”

उधर, माया अपना साया उठाके, सत्य से बुर के बाल साफ करवा रही थी। सत्य, उसकी झांठों को बिल्कुल साफ कर दिया। माया की बुर सालों बाद झांठों कि कैद से आज़ाद हुई थी। 

सत्य- अब तुमको बिकिनी पहनना चाहिए। अब तुम्हारी बुर पर बालों का गुच्छेदार पहरा नहीं है। 

माया लजाते हुए बोली,” हम बिकिनी पहनेंगे। सत्य तुम क्या बोल रहे हो?

सत्य- सच कह रहे हैं, ये देखो तुम्हारे लिए लाए हैं। उसने अलमारी से निकाल दिखाया। पीले रंग की, बेहद छोटी बिकिनी थी। ” कल तुमको समुद्र किनारे, इसीमें चलना है।”

माया उसको देख बोली,” ये तो बहुत छोटी है, इसमें तो सब दिख जाएगा। गाँड़ तो पूरा नंगा ही रहेगा, और चुच्ची का निप्पल ही किसी तरह ढकेगा। और बुर तो, बड़ी मुश्किल से ढकेगा। इससे अच्छा तो हम नंगी होकर चले जायेंगे।”

सत्य- तो वैसे ही चलो, क्या दिक्कत है।

माया उसके सीने पर हाथ मारते हुए बोली,” क्या बोलते हो भैया? अपनी दीदी को गोआ में नंगे घुमाओगे।”

सत्य- अरे दीदी, यहां आएं हैं तो लहँगा चोली, साड़ी साया सब छोड़ो। जैसा देश वैसा भेष। यहां हर दूसरी लड़की, ऐसे ही बीच पर घूमती है। सब अपने में मस्त रहते हैं। कोई तुम पर ध्यान भी नहीं देगा, सिवाय हमारे। 

माया- अच्छा, ज़रा देखे तो, कैसे ध्यान दोगे।

और सत्य माया के साये को उठा उसकी जांघों के बीच बुर को जीभ से चाटने लगा। माया सिसकारियां मारने लगी। 

दूसरी ओर जय, कविता की बुर चुसाई, करते हुए उठा, जहां उसकी सांसें उखड़ने लगी थी। कविता की गुलाबी बुर जय के थूक, लार से भीग चुकी थी। कविता अपने भाई को देख बोली,” हमारे पास आओ, जय। जय उसके पास गया तो कविता ने उसका पैंट खोल, उसका लौड़ा, बाहर निकाला और उसपर अपने थूक का लौंदा गिराया। फिर हाथों से मिलाई, और लण्ड के फूले सुपाड़े को पुच पुच कर चूमने लगी। फिर जय की ओर देख, बोली,” भाई, ये मस्त लौड़ा, जिस लड़की को मिलता वो, खुश रहती। हम खुशनसीब हैं, की ये हमारे नसीब आया है।” ये बोल वो लण्ड चूसने लगी। जय की आंखें उसके लण्ड पर महसूस होते, कविता की मुंह की गर्मी से अनायास बंद हो गयी। कविता उसके सुपाड़े, के आगे और निचले हिस्से पर अपनी जीभ रगड़ती हुई, लण्ड को चूसने में व्यस्त थी। जय कविता के खुले, बाल को सहला रहा था। कविता उसकी आंड़ भी सहला रही थी। जय अब धीरे धीरे कविता के मुंह में धक्के मारने लगा। कविता, मुंह थोड़ा और फैला, उसका स्वागत करने लगी। इस क्रम में उसके मुंह से लार भी धागों की तरह होंठों से लटकने लगी। 

बिस्तर गीला हो रहा था। पर इससे किसको फर्क पड़ता था। जय के धक्के, बढ़ते ही जा रहे थे। कविता की आंखों में अब पानी आना शुरू हो चुका था। जय का लण्ड फिसलकर उसके गालों से टकड़ा जाता था। ऐसा एक दो बार हुआ, तो दोनों हसने लगे। जय ने कविता के खुले मुंह में थूक दिया, जो सीधे उसके जीभ पर गिरा। कविता उसे पी गयी। 

जय- यू आर माय व्होर, माय स्लट। ओह्ह दीदी, हमारे लण्ड को तुम्हारा, ये रंडीपना, एक दम मस्त कर देता है। 

कविता बिल्कुल चुदास स्वर में बोली,” तुम्हारी रंडी ही तो है हम, बस तुम्हारी। हमको तुम्हारे, लिए ही तो भगवान ने बनाया है, तुम्हारी बहन बनाकर, तुम्हारे पास रखा और अब बहन से बीवी हो गए।”

जय- तो फिर, हमको भी तो पति बना लिया, भाई से। और पति को पत्नी का सबकुछ चाहिए।

कविता मचलते हुए,” ले लो, सब ले लो जो चाहिए। बीवी हैं, पति की हर इच्छा पूरा करेंगे।

जय- अरे, इस लण्ड को बुर चाहिए। अपना बुर में इसको जाने दो।”

कविता- बुर तो इसको लेने के लिए पहले से पागल है। घुसा दो।”

जय कविता के पीछे चिपक कर लेट गया और दोनों करवट लिए हुए एक दूसरे से चिपके थे। जय कविता के कंधों को चूम रहा था। कविता उसका लण्ड पकड़ अपनी जाँघे, फैलाकर बुर में लण्ड घुसा रही थी। दोनों चंदन और सांप की तरह लिपटे थे। जय के दोनों हाथ कविता के दोनों स्तनों को मसल रहा था। बुर में लण्ड घुसते ही जय का कमर अपने आप हरकत करने लगा। कविता जय के माथे को थामे थी। दोनों चुदाई के दौरान चुम्बन भी कर रहे थे। इस तरह दोनों के बीच एक रोमांस से भरपूर, चुदाई चल रहा था। दोनों अभी वाइल्ड सेक्स नहीं बल्कि, बेहद कोमल अंदाज़ में काम वासना को शांत कर रहे थे। हालांकि इतने दिनों में जय ने कविता को कितनी बार नहीं चोदा, पर आज हनीमून की पहली चुदाई का एहसास ही दूसरा था। दोनों एक दूसरे के आलिंगन में जैसे दुनिया को भूल गए थे। कविता की आँहें, और जय के कमर के प्रहार से कविता के चूतड़ों से थप थप की आवाज़, कामोत्सर्जन की चिंगारियों को आग बना दिया था। दोनों पसीने से लतपथ, ऐ सी को निकम्मा साबित कर रहे थे। 

उधर सत्य माया को अपनी घोड़ी बनाके, उसकी सवारी कर रहा था। सजे बाल सत्य के लिए लगाम थे। सत्य का लण्ड, माया की बुर में नई गहराईयां, तलाश रहा था। माया एक हाथ से दीवार पकड़े थी और एक हाथ से अपने दाहिने चूतड़ को पकड़े थी। सत्य के आंड़ जब उससे टकराते तो माया को और अच्छा लगता था। माया, की बुर में तेजी से अंदर बाहर घुसता लौड़ा, कभी कभी चिकनाई की वजह से बाहर फिसल जाता। माया तुरंत लण्ड पकड़, उसको बुर में घुसा लेती। सत्य उसको इस पर चूतड़ पर थप्पड़ जमा देता था। पर ये माया को और मस्त कर देती थी। माया खुद गाँड़ हिलाकर, लण्ड बुर में लेने के लिए उल्टे धक्के मार रही थी। सत्य लण्ड निकाल उसके चूतड़ों पर पटकता और फिर बुर में पेल देता। माया को थोड़ी देर बाद सत्य ने उठने को कहा और, खुद बिस्तर पर किनारे बैठ गया। माया अपना साया कमर तक उठाये, उसके गोद में उसकी ओर मुड़कर बैठ गयी। माया ने मुंह से थूक हाथ पर निकाला, और लण्ड पर बेहिचक मल दी। सत्य ने लण्ड माया के बुर में फिर घुसा दिया। माया सत्य के चेहरे को अपने भारी स्तनों के बीच चिपकाए हुए थी। सत्य भी उसकी बांहों में बेफिक्र हो कुछ देर ऐसे ही रहा।

सत्य- दीदी, हमको ऐसे ही प्यार दो। हम तुम्हारे प्यार के प्यासे हैं। 

माया- हम अब तुम्हारे हैं, सत्य। हमको भी तुमसे बहुत प्यार चाहिए। 

माया हौले हौले, अपनी गाँड़ उठाके बुर में लण्ड को लेने लगी। सत्य माया की कमर पकड़े, उसके चुच्चियों और गर्दन पर चुम्मे की बौछार कर रहा था। माया अपने हाथ उसके कंधों पर टिकाए हुए थी। तभी माया का मोबाइल, बजा, माया के मुंह से निकला,” कौन कमबख्त है,? उसने देखा,” ममता का फोन था। उसने लण्ड पर उछलते हुए, ही फोन उठाया।

माया- हेलो।

ममता- माया सुनो हमको कुछ बात करना है।

माया हांफते हुए- दीदी, बाद में प्लीज हम बाद में कॉल करेंगे।

ममता- ओह्ह अच्छा, ठीक है, समझ गए। हमारे प्यारे भाई तुमको खूब पेल रहे हैं। कोई बात नहीं खूब मजा करो।

सत्य- क्या बोल रही थी दीदी? 

माया- कुछ बात करना था उनको, हम बोल दिए बाद में।

सत्य- क्यों?? क्या बात हो गया?

माया सत्य को चूम ली और बोली,” पहले जो काम कर रहे हैं, उसको पूरा करो ना। अपनी इस दीदी को जमकर चोदो।”

सत्य- माया दीदी, उसका चिंता क्यों करती हो?? अभी तो शुरुवात है, रातभर पेलेंगे तुमको।

माया- जरूर पेलना, हम भी पेलवाएँगे, तुम्हारी दुल्हन नहीं बने हैं तो क्या?, तुम्हारी रंडी हैं। और रंडियों को अपने मालिक का लण्ड लेकर, खुश होना चाहिए और पेलवाते रहना चाहिए। 

सत्य- तुम जैसी स्कूल टीचर, ऐसा मस्त ज्ञान देती हो तो मज़ा आता है।

माया- अभी मज़ा लो स्कूल टीचर का, बाद में गुरु दक्षिणा भी लेंगे तुमसे।आह आआहह…. आआहह…. हहम्ममम्म.. ससस..तत्त यय…हमारा छूटने वाला है, आआहह…. हाय्य…. ऊफ़्फ़…ओह्ह। माया की कमर अकड़ने लगी। उसके हाथ सत्य के चेहरे को स्तनों में समा लेना चाहते थे। सत्य माया को कसके जकड़े हुए थे। माया के बुर के पानी से  सत्य के लण्ड का अभिषेक हो गया। सत्य भी इस एहसास को झेल नहीं पाया और बोल उठा,” माया दीदी, हमारा भी छूटने वाला है।” माया ये सुनकर, झट से फर्श पर घुटनों के बल बैठ गयी और सत्य के लण्ड से निकलते मूठ की धार के सामने अपना खूबसूरत चेहरा रख दिया। मूठ की पहली धार, सीधे उसकी मांग पर गिरी, फिर माथे तक चिपक गयी। अगली धार बांयी आंख के पलकों से टकराई और गालों से चिपक गयी। अगली धार माया के गुलाबी होंठों से चिपक गयी। इस तरह 6 7 मूठ की धार से उसका चेहरा गीला हो गया। माया जीभ निकाल सब चाट गयी। फिर बोली, अपने लण्ड की दुल्हन बना दिये हो, मूठ से मांग भरकर।” सत्य हंस पड़ा। 


” आहहहहह, चोदो चोदो बस चोदते रहो, हमारी प्यास बुझा, दो जय। अपनी दीदी को वो सुख दो, जो शादी के बाद तुम्हारा जीजा, हमको देता। अब तो तुम खुद ही अपने जीजा हो। अपनी दीदी के सुहाग।” कविता जय के नीचे मचलते हुए बोली। जय कविता के ऊपर, लेटा, उसके बुर में लण्ड घुसाए था। कविता बेशर्मों, की तरह बड़बड़ाये जा रही थी। जय उसके हाथों को दबा रखा, था। कविता की कांख जो कि थोड़ी साँवली थी, साफ दिख रही थी। 

जय- कविता दीदी, तुम फिक्र ना करो। हम अपने जीजा होनेका फ़र्ज़ भी पूरा करेंगे। तुमको बहुत पेलेंगे। तुम्हारे साथ, अब तो सारी जिंदगी, ऐसे ही कटेगी। कभी तुम हमारे ऊपर, कभी हम तुम्हारे ऊपर। चोदम चोदाई, का ये खेल बचपन के छुप्पम छुपाई की तरह खेलेंगे।”

कविता- ओह्ह, तुम क्या जानो, उस खेल में वो मज़ा नहीं, जो इस खेल में है। 

जय- हमारी रंडी दीदी, ये जो तुम्हारा बेबाकपन है ना ये हमको बहुत पसंद आता है। 

कविता- अब जल्दी करो ना। माँ, आ गयी तो बोलेगी की उनके बिना ही शुरू हो गए। 

जय- ह्हम्म, तो क्या हुआ? वो भी तो हमारी रंडी है। तुम माँ बेटी भी ना हद हो। इतने दिनों से एक साथ चुदवा रही हो फिर भी एक दूसरे से शर्माती ही हो। 

कविता- राजा भैया, ये रिश्ता ही ऐसा है क्या करे। पर जब हम दोनों अभी लगे हैं तो इस काम को पूरा कर लें। आआहह…..आहठह…

कविता अब झड़ने वाली थी। कविता की बुर के अंदर समुंदर का तूफान उठने लगा। जय ने भी अपने अंदर के तूफान को नहीं रोका और दोनों एक साथ एक दूसरे की बांहों में झड़ गए। कविता जय के सीने में अपना, मुंह छुपाए थी। थोड़ी देर बाद जय का लण्ड अपने आप निकल गया। और बुर से मूठ की धार बह गई। वो दोनों इस बात से अनजान थे कि ममता उनको देख रही थी। 

” कविता, आई लव यू,। जय उसको बांहों में भरकर माथा चूमते हुए बोला।जय के सीने से चिपकी कविता उसकी छाती चूमकर बोली,” आई लव यू,।

 

माया सत्य के गोद में निर्वस्त्र बैठी थी। सत्य माया के सीने पर सर दबाए था, जिससे माया की स्पंज समान चुच्चियाँ दबी हुई थी। माया उसके सर को पकड़ अपने सीने से लगाये हुए थी। सत्य किसी बच्चे की तरह उससे चिपका था। अगर माया की चुच्ची में दूध होता, तो शायद माया उसे पिला भी देती। माया की मस्त चूतड़ों पर सत्य के पंजे कब्ज़ा जमाये थे। दोनों की सांसे भी टकड़ा रही थी। माया के बाल बिखरे हुए थे, और अव्यवस्थित होने के कारण वो और सुंदर लग रही थी। चुदाई के बाद कमरे में एक औपचारिक खामोशी थी, क्योंकि कामक्रीड़ा में दोनों थक चुके थे। सत्य माया की बांहों में खोया था। माया उसको सीने से लगाये, कुछ सोच रही थी। उसके जीवन में सत्य तीसरा मर्द था। थोड़ी देर बाद, माया को सत्य के खर्राटे की आवाज़ आई। वो उसे बांहों में लिए उसी तरह बिस्तर पर लेट गयी। सत्य की नींद हल्की खुली तो, वो उसे ” ससससस…. ससससस ” बोलकर थपकी देते हुए सुला दी। इस क्रम में माया उसके बगल में वैसे ही लेट गयी, जैसा भगवान ने उसे पैदा किया था। सत्य भी नंगा ही सो गया। उसके सोते ही माया बिस्तर से उठी और नंगी ही खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गयी। अभी अभी हुई चुदाई से उसके कामपिपासी नंगे बदन पर पसीने की बूंदे, समुंदर की प्यारी हवा के टकराने से विलीन हो रही थी। उसने, अपने चेहरे को खिड़की से बाहर निकाला, और पलकें उठाकर, चांद को निहारने लगी, जैसे किसीको ढूंढ रही हो। कमरे की बत्तियां बंद थी और बाहर चांदनी अपनी चादर फैलाये थी। माया का बदन भी उस चांदनी में नहा गया। उसकी जुल्फें हवा के साथ लहरा रही थी। माया चांद को लगातार निहारे जा रही थी। निहारते हुए अचानक उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसके होंठ कांपने लगे। उसने अपनी बांहे फैलाई जैसे किसीको गले लगाना चाहती हो। कांपते हुए होंठों से उसके मुंह से शब्द निकले,” र.. रवी… हमको माफ कर दीजिएगा, आज हम फिर आपके प्यार को अपने शारीरिक भूख के आगे नीचा दिखाए।”

तभी रविकांत की रूह जो उसकी बांहों में थी, बोल उठी,” माया, आंखें खोलो। हमने कभी तुमको इसके लिए गुनहगार नहीं ठहराया है। तुम हमारे ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत ख्वाब थी। तुम्हारा प्यार हमारे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सौगात था। और ये क्या कम है कि आज भी हमारे जाने के बाद, तुम उस प्यार के दिये को अपने मन मंदिर में जलाए हुए हो। तुम्हारे साथ बिताए हर लम्हा, इस दूसरी दुनिया में भी हमारे साथ रहते हैं।”

माया उसकी ओर देख बोली,” लेकिन, आपने जो हमारे साथ किया वो ठीक नहीं किया। हमको, यहां छोड़ गए, आपके बिना जीने के लिए। आपसे अलग एक पल भी सदी के समान होता है और अब तो आठ साल बीत चुके हैं। आपको क्या पता कि कैसे काटे हैं हम। आपका साथ पाने के लिए हम आपके भाई से शादी तक कर लिए।”

रवि- माया, तुम भी जानती हो कि रिश्ता तुम्हारे लिए ही भेजा था, पर तुम्हारे बाबूजी को ममता की शादी की जल्दी थी। उन्होंने जोर देकर हमारी शादी करवा दी। रही बात तुम्हारा साथ, छोड़ने की बात तो वो हम जीते जी तो क्या, मरने के बाद भी नहीं छोड़े हैं। ज़िंदगी और मौत तो भगवान के हाथ की बात है, उस पर किसका बस है। अगर तुम ज़िंदा हो तो इसके पीछे भी वजह होगी। शशि बेचारे को क्या पता, की उसकी बीवी उसके बड़े भाई की प्रेमिका थी।

माया गुस्से से बोली- बेचारा मत बोलिये उसे, उसीकी वजह से आज आप और हम साथ नहीं है। ये जानकर की आप बाप नहीं बन सकते, उसने हम दोनों बहनों को रख लिया। आपकी माँ की वजह से ये सब हुआ। वो तो चली गयी। और हम दोनों बहनों को सौतन बना गयी। आपकी मौत भी उसीके कारण हुई है। 

रवि- नहीं, ऐसी बात नहीं है।

माया- झूठ मत बोलिये, आप हमेशा से उसको बचाते आये हैं। उस रात जब वो दारू पीकर आया और आपसे नदी के पास की ज़मीन के लिए बहस हुई। तब उसने आपको क्या कुछ नहीं कहा, आपको नपुंशक, वंशहीन और ना जाने क्या क्या बोला। आपकी आंखों का दर्द उस दिन सिर्फ हमको दिखा था। वो रात आपके साथ हमारी आखरी रात थी। सोए तो आपके साथ थे, पर उठे तो आपकी लाश के साथ। ब्रेन हैमरेज हो गया था आपको।” ये कहते कहते वो फफक फफक कर रोने लगी। 

रवि- वो रात भूले नहीं भुलाती। “

और दोनों जैसे खो गए उस रात में……

बिस्तर पर माया शशिकांत के साथ लेटी थी। शशिकांत दारू पीकर सो चुका था। उसने उसको हिलाकर एक बार जांच की। फिर हौले से बिस्तर से उतरी। रात के अंधेरे में माया चोरी छिपे कमरे का दरवाजा खोलती है। कमरे की कुंडी बाहर से बंद करती है, और दांये बांए देखती है। वो धीरे धीरे चुपके से उस कमरे की ओर बढ़ती है, जहां रविकांत सोया था। ममता और बच्चे दूसरे कमरे में सोए थे। चूंकि उस रात लड़ाई जो हुई थी। माया दरवाज़े पर पहुंचकर गेट खटखटाई। अंदर से रवि बोला,” माया क्या तुम हो??”

माया- हाँ, आइस्ता बोलिये। दरवाजा खोलिए।

रवि ने दरवाजा खोला। माया अंदर घुस गई और फौरन दरवाजा बंद कर दिया। फिर रविकांत की ओर पलटी। रवि- तुमको यहां नहीं आना चाहिए था।” माया उसके सर को पकड़ लेती है और चुम्मों कि बौछार करने लगती है। रवि ने उसको नहीं रोका। हालांकि, वो रिश्ते में उसका जेठ था, पर पहले उसका प्रेमी था। माया ने पहले, रवि को बच्चे की तरह चेहरे को टटोला, फिर उसके कंधों को। फिर बोली,” आप ठीक है ना। हमको आपकी चिंता हो रही थी।” रविकांत मुड़कर बिस्तर की ओर जाने लगा। तो माया ने उसका हाथ थाम लिया और बोली,” आपने हमारे सवाल का जवाब नहीं दिया।” रविकांत ने उसकी ओर देखा और कमर में हाथ डालते हुए बोला,” आओ ना।”

दोनों बिस्तर की ओर चल दिये। बिस्तर पर रवि बैठ गया और माया सामने खड़ी हो गयी।

माया उसके चेहरे पर हाथ फेडते हुए बोली,” आप बहुत उदास हैं। हमसे आपका उदासी देखा नहीं जाता है। आपको उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।”

रवि- चलो, इस घर में कोई तो है, जो हमारा इतना ध्यान रखता है। 

माया- हम आपके भाई की बीवी बाद में हैं, और आपकी प्रेमिका पहले। आपका सुख हमारा सुख है, और आपका दुख हमारा।” ये बोलकर वो उसके बगल में बैठ गयी। रवि उसकी ओर देख बोला,” थक गए हैं हम, माया । इस समाज से लड़ते लड़ते, लोगों को मनवाते मनवाते की ये तीनों बच्चे, हमारे हैं और उनका बाप रविकांत है। और घर में ये बात सबको पता होते हुए, भी इसकी चर्चा नहीं हुई थी। पर आज वो भी हो गया। अब तो भगवान बस मुक्ति दे दे इस जीवन से बस…..।”

माया- छी…. क्या बोलते हैं आप। आप बाप नहीं बन सके तो क्या हुआ?? बाप का फर्ज तो निभा रहे हैं। वो आपका खून, भले ही ना हो पर आप कर्म से उनके बाप हो। आइए हमारे बांहों में आइए।” कहकर माया ने रविकांत को अपने बांहे फैलाकर आने का इशारा किया। रवि उसकी ब्लाउज से झांकती, अधनंगी चुच्चियों पर सर रख दिया। माया ने उसको एक मां की तरह सांत्वना दी।” आप नपुंशक नहीं है, आपका तो लण्ड खड़ा होता है, आपका स्पर्म काउंट बस कम है। और इसलिए आप दीदी को बच्चा नहीं दे पाए। आप हमारे नज़र में मर्द है, नामर्द नहीं। काश हम आपकी पत्नी बनते। प्रेमी प्रेमिकाओं के बीच हमेशा से भगवान समाज के रूप में दीवार खड़ा कर देते हैं। दोनों का मिलन जल्दी नहीं होता या होता ही नहीं। फिर भी दोनों समाज के बंधनों को तोड़कर, मिलते रहते हैं। जैसे हम और आप इस वक़्त हैं। समाज ने हमको आपसे जेठ का रिश्ता जोड़ दिया है। पर ना तो हमने और ना कभी आपने इस रिश्ते को मान दिया है। हम तो आपकी प्रेमिका बैंकर सारा जीवन बिताना चाहते थे। पर आपने ही हमको अपने पास रखने जे लिए, अपने छोटे भाई से शादी करने को कहा। आपके साथ और आपके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए हमने ये भी कर लिया। पर आपको इस तरह देखते हैं तो, लगता है कि आपका सारा दुख हमको मिल जाये।”

रवि ने उसकी ओर देखा तो, माया ने उसके माथे को चूम लिया। रवि ने उसको पकड़कर उसके होंठ पर अपने होंठ रगड़ने लगा, ऐसा करते हुए उसने माया को बिस्तर के बीच ले आया। माया उसका भरपूर साथ दे रही थी। उसके होंठ और जीभ रवि के होंठों के साथ पकड़म पकड़ाई का खेल खेलने लगे। दोनों एक दूसरे में लीन थे, चुम्बन का कोई अंत ही नज़र नहीं आ रहा था। माया रवि को अपने ऊपर खींच रही थी, अपने बांहों से पकड़ उसको अपने अंदर समा लेना चाहती थी। रवि माया के होंठों पर बुरी तरह टूट चुका था। वो, उसके अधरों के यौवन का रसपान कर रहा था। कभी वो नीचे होता तो कभी माया। दोनों किसी बिछड़े प्यासे प्रेमी युगल की तरह, खो गए थे। तभी माया ने शशि के कपड़े उतार दिए, और खुदकी, ब्लाउज उतारने लगी। रवि ने उसका ब्लाउज उतारने में उसकी मदद की और, माया के सुडौल चुच्चियों को आज़ाद कर दिया। उसने माया की साड़ी को कमर से पकड़ा और उसका सूक्ष्म चीरहरण कर साड़ी को उसके जिस्म से अलग कर दिया। माया अब सिर्फ साया में थी। साया को खोलने की बजाय, उसने साया उठा लिया, और पैंटी, उताड़ फेंक दी। फिर रवि के मुंह के पास आकर, अपनी बुर को उसके मुंह पर रगड़ने लगी। रवि को बुर चाटना बड़ा अच्छा लगता था, माया की बुर से बेहिसाब नमकीन पानी चू रहा था। वो कमर हिलाकर, बुर रगड़ रही थी। रवि उसके चूतड़ थामे हुआ था। माया की बुर के फांक के बीच रवि की जीभ, जब टकराती तो, उसके मुंह से आआहह निकल जाती। माया को ये एहसास पागल कर जाता था। फिर तो वो अपना बुर उसके चेहरे पर मलने लगी। उसकी कमर में एक चाल सी थी। रवि ने माया के बुर को अपने थूक से पूरा गीला कर दिया था। वो कभी कभी बीच में दांत भी गड़ा देता था। माया छटपटाती, पर अपने जेठ को कुछ नहीं, बोलती थी। उसे अपने साथ इतनी छेड़खानी अच्छी लगती थी। माया अपने बाल खोलने के लिए हाथ ऊपर की, और क्लिप निकाल दिया। उसकी जुल्फें, काली घटाओं सी रात में अंधेरा कर गयी। रवि ने बुर चाटने के साथ साथ उसकी नाजुक गाँड़ में उंगली, घुसा दी। गाँड़ में उंगली घुसना और बुर चटाई से, माया मदमस्त हो रही थी। माया की गाँड़, में रवि को उंगली करने में, बहुत मज़ा आता था। माया उसकी ओर देखी,” आप नहीं, सुधरेंगे ना। हमको इस तरह गाँड़ में उंगली करना आपको बहुत पसंद है।”

सत्य- तुम्हारी गाँड़ है, बड़ी मस्त। इसको छेड़े बिना कैसे रह सकते हैं। 

थोड़ी देर उसकी बुर चाटने के बाद, माया खुद उसके लण्ड पर बैठ गयी और लौड़ा, बुर में घुसाने लगी। सत्य का लण्ड कड़क था, पर उतना नहीं। माया सब जानती थी। इसलिए वो, अपनी गाँड़, रवि की ओर कर दी और बोली,” हमारे गाँड़ में खूब उंगली कीजिये। हमको अपना लौड़ा चूसने दीजिए। तब आपका और सख्त हो जायेगा। देखिए ना हमारी नंगी गाँड़ को। कितने चिकने चूतड़ है, मुलायम सेब की तरह। आपके लिए। ” वो लण्ड को और कड़क होता महसूस की। फिर लण्ड चूसने लगी। रवि माया के गाँड़ में उंगली करते हुए, उसके नंगे चूतड़ों पर काटने के निशान भी छोड़ रहा था। उसकी उंगली माया की तंग, सिंकुड़ी, कसी हुई गाँड़ में रास्ता बनाके पूरी तरह भीतर घुस गई। माया की गाँड़, से वो खिलवाड़ कर रहा था। तभी उसने दूसरी उंगली भी घुसा दी। माया के मुंह में लण्ड की वजह से सिर्फ,” हहम्ममम्म….. बोल पाई। पर वो पीछे नहीं हटी। वो अपनी बुर भी सहला रही थी साथ में। थोड़ी ही देर में, बुर में लौड़ा घुसाने के लिए वो परेशान हो गयी। लौड़ा को चूसना छोड़, उसकी ओर उठके लपकी।

माया- आपके घोड़े को एक सवारी की जरूरत है। और चढ़ गयी अपना साया उठाकर। बुर की फांकों को फैलाकर लण्ड का सुपाड़ा अपनी बुर में माखन की तरह उतारती चली गयी। वो फिर झुककर, अपने जेठजी, की आंखों में देखते हुए, कमर हिलाकर, चुदने लगी। माया की चुच्चियाँ उसके जेठ के सीने से टकड़ाकर और कड़क और चूसने योग्य हो गयी थी। माया ने रवि को अपने मस्त मस्त चुच्चियों को उसके मुंह में घुसाने लगी। वो हंस रही थी। दोनों मज़े ले रहे थे। 

माया- आप नामर्द नहीं है, जेठजी। आपका लौड़ा हमारा बुर को पेल रहा है। 

आपको, औरत का दूध पीना चाहिए। उससे आपको ताक़त मिलेगा। अपनी बहू का दूध पियेंगे। चूस कर देखिए, आपके लिए चुच्ची में दूध है कि नहीं। काश हम आपको, अपना दूध पिला पाते। आपके सिवा किसी और का बच्चा हमारे पेट में पलेगा नहीं। हम माँ बनेंगे, तो सिर्फ आपके बच्चे का। हमको माँ बना दीजिए। 

माया की ये बात सुनकर, रवि का रुकना मुश्किल था। वो बोल उठा,” माया हमारा चूने वाला है।” माया बोली,” इसीलिए तो हम ऊपर चढ़े हैं  ताकि हम आपके साथ ही झड़े। माया तेज़ी से कमर हिलाने लगी। और दोनों एक साथ झड़ गए। दोनों बिस्तर पर निढाल हो गए। माया के बुर में ही रवि ने मूठ गिराया था, पर माया के माँ बनने की संभावना बिलकल नही थी। माया उसके ऊपर ही लेटी थी। दोनों हांफ रहे थे। कुछ देर ऐसे लेटने के बाद। माया बिस्तर से उठी और अपने जेठ के लिए पानी लाने गयी। वो नंगी ही कमरे में रखी पानी की सुराही से पानी ले आई। रवि उठकर बिस्टेर के सिरहाने पीठ टिकाकर, बैठ गया। माया उसकी ठुड्ढी पकड़ पानी पिलाने लगी। फिर वो उसकी छाती से चिपककर, उसके बगल में उसी तरह लेट गयी। तूफान थम चुका था। उसने रवि की ओर देखा,फिर बोली,” क्या सोच रहें हैं आप?

रवि,” तुमको हम माँ नहीं बना पाए।तुम्हारी इच्छा पूरा नहीं कर पाएंगे।”

माया- आपको इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं हैं। हम आपकी प्रेमिका बने, यही बहुत है। 

रवि- ना तो तुमको बीवी ही बना पाए?

माया- अगर आप हमको रखैल समझते हैं, तो भी हम खुश हैं। मांग में सिंदूर हम रोज सिर्फ आपजे नाम से लगाते हैं। और इसमें सिर्फ आपका ही नाम रहेगा।”

रवि- ये तो तुम्हारा बड़प्पन है। माया क्या हम तुमसे कुछ मांगे तो दोगी?

माया- दिल जान सब तो आपको दे चुके हैं, और क्या दे सकते हैं आपको।

रवि- मज़ाक नहीं, वादा करो ना दोगी।

माया- आपकी कसम खाते हैं, आपकी खुशी के लिए सब मंज़ूर है। 

रवि- तो हमसे वादा करो, अगर हमको कुछ हो गया, तो तुम जियोगी हमारे प्यार की खातिर। और इस दौरान तुमको प्यार करनेवाला, अगर कोई मिलेगा तो तुम उसके साथ खुशी खुशी रहोगी। हम जानते हैं कि तुम शशि की पहली पसंद नहीं हो। उसको ममता पसंद है। इसलिए हमारे बाद तुमको अगर कोई चाहनेवाला मिले, तो तुमको हमारी कसम है, तुम पीछे मत हटना।”

माया- ये क्या बोल रहे हैं आप ? हम सिर्फ आपके हैं। इस तन पर इस आत्मा पर सिर्फ आपका हक़ है।ये हमसे नहीं हो पायेगा। आपने हमको धर्मसंकट में डाल दिया है। 

रवि- तुम हमसे बहुत छोटी हो। तुम्हारे अंदर सेक्स की जो भूख है, उसको सिर्फ एक मर्द ही शांत कर सकता है। शशि तुमको चोदता तो होगा, पर तुमको वो एहसास नहीं मिलता होगा। हमारे जाने के बाद तुमको, कोई ना कोई तो चाहिए।

माया- आप बार बार अपने जाने की बात क्यों कर रहें हैं। आप हमारे साथ ही रहेंगे। कुछ नहीं होगा आपको।” माया सजे गाल सहलाते हुए बोली। 

रवि- तुम वादा करो बस।

माया- आप सो जाइये, रात बहुत हो गयी है। आपको आराम की जरूरत है। हम कल बात करेंगे।” माया ये कह कर बिस्तर से उठी और अपनी साड़ी फर्श से उठने लगी। रवि उसका हाथ पकड़ बोला,” आज रात यहीं सो जाओ। हमको अपने बांहों में सुलाओ। माया मुस्कुरा पड़ी। उसने घड़ी की ओर देखा रात के 2 बज रहे थे। दो घंटे का समय था उसके पास। वो उसके पास लेट गयी और, उसे अपने नंगे सीने से लगाके, थपकियाँ देकर सुलाने लगी। जैसे माँ अपने बच्चे को सुलाती है। पर रवि को नींद नहीं आ रही थी। उसने माया से फिर कहा,” प्लीज वादा करो ना।” माया बोली,” अरे हमारे राजाजी आप आराम से सोइये अभी।” रवि बे जवाब दिया,” जब तक तुम वादा नहीं करती, तब तक हमको नींद नहीं आएगी। प्लीज कह दो।”

माया ,” ऊफ़्फ़, आप भी जिद्दी हैं। ठीक है वादा, अब खुश। अब सो जाइये।”

फिर रविकांत और माया आपस में सो गए। पर रविकांत शायद अब कभी नहीं उठने वाले था। 

सुबह के चार बजे, माया उठी। उसने देखा भोर होनेवाली थी। वो झटपट उठी, और पहले अपने कपड़े पहन ली। साड़ी ब्लाउज सब पहनकर, वो सोते हुये रवि का माथा चूमने नीचे झुकी और बोली,” हम जा रहे हैं।” और उसको चूम ली। सामान्यतः ऐसे करने पर रविकांत जग जाता था। पर आज ने कोई हरकत नहीं की। माया को लगा वो नाटक कर रहा है। इसलिए उसने उसके होंठों पर चुम्मा दिया। पर फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उसने महसूस किया कि उसकी सांसें नहीं चल रही है। उसने उसके चेहरे को हिलाया तो, वो लुढ़क गया। वो अवाक रह गयी। ये तय था, की वो मर चुका था। वो वहां से रोते हुए चली गयी। 

कुछ देर बाद घर के आंगन में उसकी लाश थी। ममता और कविता फूट फूट कर रो रहे थे। कंचन भी रोये जा रही थी। माया के आंसू तो सूख से गए थे। सिर्फ ममता ही समझ सकती थी, उसका ये हाल। पर वो खुद ही कहाँ संभल पाई थी। 


वो दिन याद करके माया के आंसू बहने लगे। वो रोते जा रही थी। फिर बोली,” आपको दिया हुआ वादा हम आज भी पूरा कर रहे हैं। खुद को ज़िंदा रखे हुए हैं, बस आपके लिए। हमको प्यार दुबारा मिला तो, अपने भाई में ही।” तब तक वो अकेले, ही खिड़की से लगे चांद में रविकांत का चेहरा जाते हुए देख रही थी।


आपके जाने के बाद, हम रोज जलते हैं और शशिकांत के साथ होते हुए भी, उसके साथ सोते हुए भी, हम उससे बदला लेने की सोचते थे। आपकी मृत्यु का जिम्मेदार वही है, हम उससे बदला जरूर लेंगे। और हमारा भाई सत्य हमारी मदद करेगा उसको ही हथियार बनाएंगे।”

माया वैसे ही खड़ी बाहर निहार रही थी।


दरवाज़े पर दस्तक हुई, जय ने पूछा,” कौन है??

उधर से आवाज़ आई,” सर, रूम सर्विस, योर डिनर।”

कविता ने खुद को सफेद चादर से ढक लिया। और हड़बड़ाते हुए उठकर जल्दबाजी में बाथरूम में घुस गई। वो बाथरूम में घुसी तो, दरवाज़े की ओर ही देख रही थी। तभी उसे लगा कि उसके पैरों को किसीने पकड़ लिया। उसने झटके से नीचे देखा तो ममता उसके पैरों में गिरकर रो रही थी। कविता ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा फिर उसे उठाने की कोशिश की पर वो उसके पैर नहीं छोड़ रही थी। 

कविता- माँ, ये क्या कर रही हो तुम? चलो उठो ना। 

ममता- नहीं, दीदी हम आपके चरण की धूल के बराबर हैं। जो पाप हम किये हैं, उसके लिए माफी माँगना चाहते हैं।

कविता- क्या किया तुमने माँ? कौनसा पाप, कैसी माफी?

ममता- दीदी, कोई भी औरत अपने हनीमून पर अपनी सौतन को नहीं ले जाती। ये हनीमून तो आपदोनों का था पर हम बीच में आ गए। आपका हक़ पहले बनता है, जय पर। आप अपना हनीमून भी सौतन के साथ मना रही है। और हम बेशर्म चले भी आये, ये भी नहीं सोचा कि हम सौतन होने से पहले तुमदोनों की माँ भी है। अपने बच्चों के बीच, हम भी किसी बच्चे की तरह चले आये। यहां तो तुमदोनों का हक़ है।

कविता- माँ, हमारे पैर छोड़ो, हमको तुम्हारा पैर छूना चाहिए। और उल्टा तुम हमारा पैर छू रही हो। तुम हमसे बड़ी हो, और ये क्या आप आप बोल रही हो….उठो ना प्लीज…

ममता- नहीं, हम आपके माँ जरूर हैं, आपसे उम्र में बड़े हैं, पर आप हमसे बहुत बड़ी हैं सोच से। हमको माफ करेंगी की नहीं। तभी हम पैर छोड़ेंगे।

कविता- माँ, उफ्फ्फ अच्छा ठीक है, माफ कर देंगे पहले हमारी बात तो सुनो।

ममता- नहीं, पहले माफ करो।

कविता- अच्छा, ठीक है । उठो

ममता के कंधे पकड़के उसने उसको उठाया और फिर उसके आंसू पोछने लगी। फिर उसकी ओर देखा कविता बोली,” ये बताओ, तुम जय की बीवी हो और हम भी उसकी पत्नी हैं। उसने तो हमदोनों को अपनी जीवनसंगिनी बनाया है। हम दोनों को ही उसका खुशी का ध्यान रखना है। हम दोनों पर उसका समान अधिकार है। और जितना अधिकार हमारा उसपर है, उतना ही तुम्हारा भी है। वो भले ही हम दोनों को अभी भी माँ और बहन माने,पर हमको तो अब उसकी पत्नी बनकर रहना है। ये बात सच है कि उसने हमसे पहले शादी की पर, उसने तुम्हारे साथ भी सात फेरे ही लिए, और मांग में वही लाल सिंदूर डाला, और गले में वैसे ही मंगलसूत्र डाला। अब ये कौन तय करेगा, कि उसपर हममें से किसका अधिकार पहले या ज्यादा है?? 

ममता- तुम्हारा अधिकार पहला है, और ज़्यादा भी। आखिर तुम राज़ी नहीं होती, तो हमदोनो की शादी कैसे हो पाती? 

कविता- शादी तो तुम दोनों कर चुके थे, खजुराहो में। और रहा बात राज़ी होने का, तो जय के साथ हमारी शादी की मंजूरी तूम ही दी थी। तो दोनों बराबर हैं। 

ममता- पर……

कविता- पर…..वर….. कुछ नहीं। आजसे हमारा हमदोनों के पति के साथ हनीमून है। और हनीमून में पति को इंतज़ार नहीं कराते। चलो ना मज़ा करना है।” बोलकर वो जैसे ही ममता का हाथ पकड़ बाहर निकलने को हुई, तो देखा सामने, जय था। वो जय को देख मुस्कुराई और बोली,” चलो खाना खाते हैं।” उसने दोनों की ओर देखा, और बोला,” दोनों बाथरूम में क्या बातें कर रही थी? सब ठीक है ना। 

कविता- आपकी दूसरी पत्नी, हमारी माँ को लगता है कि वो हमदोनों के बीच कबाब में हड्डी हैं, इस हनीमून पर। अब आप समझाइए इनको।”

जय- माँ ये क्या सोच रही हो तुम? तुमदोनों अब हमारे जीवन के हर हिस्से की बराबर की हक़दार हो। तुमको ये सब सोचना बंद कर देना चाहिए। तुम दोनों को अंतिम साँस तत….”

ममता और कविता दोनों ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया, और एक साथ बोली,” क्या अनाप शनाप बोलते हैं, आपको हमारी उम्र लग जाये।” जय ने उनका हाथ हटाकर, उन दोनों को अपने गले से लगा लिया। दोनों के माथे को चूम लिया और उसके होंठ बुदबुदाए,” भारतीय नारी” फिर मुस्कुराने लगा। 

ममता और कविता ने बदले में उसके दोनों गालों को चूम लिया। जय बोला,” खाना आ गया है। लेकिन उसके पहले हमको नहाना है। क्या तुम दोनों हमको नहलाना चाहोगी? हम बहुत थक चुके हैं।”

ममता बोली,” आइए हुज़ूर हम दोनों मिलके अपने स्वामी को खूब मज़े से नहलायेंगी। क्यों कविता ?

कविता,”इसमें तो बहुत मज़ा आएगा। अपने पति का, भाई का हर अंग हम खुद अपने हाथों से साफ करेंगे। चलिए ना जल्दी से अंदर।

दोनों जय की बांह पकड़ अंदर ले गयी। अंदर टब में पानी भरा हुआ था। कविता ने जय का तौलिया निकाल दिया। उसको फिर टब में उतारने के लिए दोनों माँ बेटी ने अपने कंधे झुकाए। जय उनके कंधों पर हाथ रखके, आराम से टब में उतर गया। वो लेटने ही वाला था कि, कविता ने उसे रोक दिया। फिर ममता और कविता भी टब में उतर आई। ममता और कविता दोनों किनारों पर थी। फिर दोनों ने बेशर्मों की तरह हंसते हुए अपने बदन से कपड़े उतार फेंक दिए। जय दोनों की ओर बारी बारी से देख रहा था। दोनों ने बाल खोल दिये। दोनों अपने अपने किनारों पर खड़ी अपने नंगे बदन की कामुक नुमाइश में लगी थी। जय ममता के चुच्चियों को देख पागल हो रहा था, तो उधर कविता अपने नन्हे बुर को मसलते हुए अटखेलियां कर रही थी। फिर उन दोनों ने उसे लेटने का इशारा किया। जय पानी के अंदर बैठ लेट गया। उसके लेटने के साथ दोनों, भी पीठ टब के किनारों पर टिका बैठ गयी। जय का सर ममता और पैर कविता की ओर था। उसका सर ममता की चूचियों पर टिक गया। पैर कविता की कोमल जांघों पर। कविता उसके पैर धोने लगी। ममता उसकी ओर कामुकता से देखते हुए, उसकी छाती रगड़ रही थी। जय के हाथ ममता के ममतामयी चूचियों पर शिकंजा कस हुए थे। वो उनमें से दूध निचोड़ने की कोशिश में लगा था। ममता ने बड़े प्यार से अपनी बांयी चुच्ची के चूचक को उसके होंठों के बीच दे दिए और बोली,” बहुत दिन हो गए ने बेटा सैयांजी, माँ का दूध पिये। पीलो बेटा, माँ का दूध। तब तो ताक़त आएगी और दोनों बीवियों को जमकर चोदोगे।” और मुस्कुराने लगी। जय मुंह से चूचक चूसते हुए, हंस पड़ा। ममता भी हंसते हुए, उसकी छाती पीठ सहला रही थी। नीचे कविता उसके तलवे रगड़ रही थी। जिससे उसे हल्की गुदगुदी भी हो रही थी। तीनों का बदन पानी में पूरी तरह भीग चुका था। ममता और कविता की नग्नता पानी में भीगने से और भी कामुक हो चुकी थी। वैसे उनमें कामुकता की कोई कमी नहीं थी, पर पानी में गीले होकर उनके उभार, चुच्चियाँ, गाँड़ और जांघें कामुकता की नई परिभाषा लिख रहे थे। भूरे चूचकों के कड़क होने से पानी की बूंदे मोतियों जैसे उस पर लटकी हुई थी। चुच्ची चूसते हुए वो कविता, की ओर देख रहा था। कविता की जवान कड़क, सुडौल, गोल चुच्चियाँ को इस तरह देख, उसका लण्ड खड़ा होने लगा। कविता इस बात से अंजान, किसी दासी की तरह, अपने छोटे भाई के पैरों को साफ कर रही थी। उधर ममता, अपने बेटे की छाती सहलाते हुए, दूसरे हाथ से उसके बाल भी सहला रही थी। कविता पैरों को साफ करते हुए अब जांघों तक आ पहुंची थी। उसकी नज़र जय के सलामी देते हुए लण्ड, पर पड़ी। वो देख, उसके होंठों पर मुस्कान तैर गयी। पर उसने उसे छुवा नहीं, बल्कि उसकी जांघों को रगड़ते हुए साफ करने लगी। 

उधर ममता भी अब जय की पीठ पर अपने कोमल हाथों से सफाई कर रही थी। जय के लिए तो ये किसी राजा के हरम जैसा था। कविता और ममता भी उत्तेजित हो चुकी थी। हालांकि, कविता कुछ देर पहले ही जय से चुदी थी, पर इस माहौल में तो कोई भी कामुक हो जाये। तभी जय उठा और कविता की ओर बढ़ा, वो कविता के चुचकों पर बाज की तरह लपका। दोनों चूचियों को भींचकर, चूचक मुंह में भर चूसने लगा। ममता ये देख, मुस्कुराई फिर जय के कमर और जांघों को धोने लगी। कविता उसे अपनी बांहों में भर ली और उसके माथे को चूमने लगी। ममता ने इस समय कविता की आंखों में जय के लिए जो प्यार देखा था, उसे देख वो सोचने लगी,” हाय रे दोनों की किस्मत, कविता जय को प्यार दीवानियों की तरह करती है, पर दोनों हमारे कोख से ही पैदा हुए और भाई बहन हुए। दोनों की किस्मत की एक ही माँ के बच्चे हैं, पर पैदा हुए थे एक दूजे के लिए।” दोनों बहुत ही खोए हुए थे। ममता की आंखों से आंसू गिर गए। वो जय के आंड़ औ लण्ड को सहलाने लगी। वो बड़े प्यार से लण्ड को घूर रही थी। तब जय को एहसास हुआ उसने ममता को लण्ड चूसने का इशारा किया। ममता बिना एक पल गवाए, झटके से लण्ड के फूले सुपाड़े को मुंह में धर ली। ममता लण्ड को पूरा मगन होकर चूसने लगी। जय आनंद के सागर में डूबा था, और ममता बुर को अपने पैरों की उंगलियों से छेड़ रहा था। ममता तो उसके अंगूठे को बुर में घुसता महसूस की तो उसपर बैठ गयी। जय के पैर की दो उंगलियां ममता की बुर में घुस चुकी थी। ये होते ही जय के हाथ कविता की बुर को टटोलने लगे। चुच्ची का मर्दन जैसे कविता के लिए काफी ही नहीं था, उसने खुद ही सिसकते हुए चूचियों को मसलना शुरू कर दिया। नीचे से बुर के अंदर जय की उंगलियां अंदर बाहर हो रही थी। दोनों की चुच्चियाँ चूस कर वो पूरा आनंद उठा चुका था। फिर जय ने ममता के बाल पकड़के अपने लण्ड से उठाया और कविता के भी बाल पकड़ बोला,” दोनों खड़ी हो जाओ। दोनों माँ बेटी कामुकता से लबरेज़ उसके इशारे पर खड़ी हो गयी। जय ने दोनों को पीछे घूमने को कहा ताकि दोनों की गाँड़ उसकी ओर हो। जय बोला,” चिपक कर खड़ी रहो। आआहह, हाँ शाबाश अब दोनों अपने कमर को झुका गाँड़ बाहर की ओर निकालो। दोनों के बुर और गाँड़ साफ दिखने लगा, क्योंकि दोनों ने अपने हाथों से चूतड़ों को फैलाया हुआ था। जय ने पहले ममता के बुर को जीभ से चाटा और कविता की बुर में उंगली घुसा दी। दोनों माँ बेटी के मुंह से लंबी सिसकारी निकल गयी। ईईसससससससस…….. उनके मुंह से लगातार सिसकारियां निकल रही थी। जय ममता की बुर में भी उंगली घुसाए था। दोनों के भीगे बुर से मादक गंध आ रही थी। वो बुर की गीलेपन का सहारा लेकर उंगलियां बार बार घुसा के निकाल रहा था। वो दोनों इसका बड़े अच्छे से आनंद उठा रही थी। कभी कविता की बुर जय की जीभ का शिकार होती तो कभी उसकी माँ की बुर। पर दोनों ही उसका भरपूर सहयोग कर रही थी। बुर के पानी को वो चूसकर कामुकता का जाम पी रहा था। तब जय ने उनकी भूरी सिंकुड़ी कली के जैसे गाँड़ की सिंकुड़ी छेद पर गयी। जय ने उनके अंदर भी मोटी वाली उंगलियां घुसा दी। दोनों का सिसकना अब अचानक आहों में बदल गया। अपनी नन्हें छेदों में हमले से उनको थोड़ा दर्द हुआ, पर कुछ बोला नहीं। बल्कि दोनों एक दूसरे के चेहरे की ओर देख एक दूसरे के चेहरे को सहला रही थी। जय का हमला अब तेज हो रहा था। दोनों के छेदों को बरी बारी से चूसते हुए, वो उंगलियों को बुर और गाँड़ में तेज़ी से अंदर बाहर करने लगा। क्या स्वाद था! वो औरत के इस स्वाद का दीवाना था। उसकी लप्लापायी जीभ कभी गाँड़ के छेद के भीतर घुसती तो कभी बाहरी सिंकुड़ी सतह को चूसती। ऐसे करने से उन दोनों की कमर मस्ती में डोलने लगी थी। कभी भीगी बुर से रिसते पानी से वो अपनी प्यास बुझाता तो कभी बुर पर अपनी लार लगाता। तीनों एक दम मस्ती में डूबे थे। असली काम क्रीड़ा का असल आनंद ले रहे थे। गाँड़ और बुर से अंदर बाहर होती उंगलियां बहुत कामुक लग रही थी, और उससे भी कामुक उनकी आँहें थी। जय का लण्ड अब तनकर लोहा हो चुका था। ममता और कविता भी बुर में लण्ड लेने को मचलने लगी थी। जय ने ममता को झुकाया, ममता दीवार पकड़ झुक गयी। जय ने लण्ड सीधा अपनी जन्मस्थली में घुसा दिया, जिससे शायद बहुत जल्दी उसका बच्चा जन्म लेनेवाला था। 

ममता- उफ़्फ़फ़, आआहह, हे भगवान ऊयईई…. 

जय- आआहहहहह…. ममता तुम्हारा बुर तपता हुआ भट्ठी है। पूरे लण्ड को तुम्हारे बुर की गर्मी का एहसास हो रहा है। तुम्हारे बुर में एक नयापन लग रहा है। 

ममता- बेटा सैयांजी, आज आपने हमको हमारे नाम से बुलाया है, और हमको आपकी पत्नी होने का एहसास हुआ है। इसी तरह हमको चोदिये। अपने लण्ड से बुर को छितरा दीजिए। बुर टाइट करने के लिए कविता ने एक क्रीम दिया था, वही लगाए हैं। इसलिए आपको नयापन का एहसास हो रहा है। हमको खुद बुर में लण्ड होने का एहसास पहली रात जैसा हो रहा है। इस औरत को बिल्कुल जवान लड़की की तरह महसूस हो रहा है। कविता तुम्हारा धन्यवाद।” कविता की ओर मुड़कर बोली। 

कविता उन दोनों को कामुकता से देखते हुए बोली,” अरे हमारी सौतन माँ, अब तो उसका इस्तेमाल सीख गई ना। अब खूब चुदवाओ अपने बेटे के लण्ड से। तुमको तो इस बार जय, अपने बच्चे की माँ बना देगा। और हमको एक भाई मिलेगा या भतीजा।”

ममता- ऊँह…ऊँह…ऊऊ आ… हां हमको तो बच्चा चाहिए। हमारे बच्चे का बच्चा। तुमको भी तो बच्चा पैदा करना होगा।

कविता- माँ, हमको बच्चा अभी 2- 3 साल नहीं चाहिए। अभी तो खूब मस्ती करना है। 

जय-अरे अभी तो हमको सेक्स का मज़ा लेने दो। बच्चा ठहरेगा, तो दोनों पेट फुलाकर बैठ जाओगी। 

कविता- तभी तो, हम तीन साल का समय मांग रहे हैं। जब माँ प्रेग्नेंट होगी, तब तुम हमको चोदना। 

जय- आआहह…. आह… आह… क्या मस्त बीवियां पाए हैं हम। मौज मस्ती के लिए तुमदोनों एकदम तैयार रहती हो।

ममता- उफ़्फ़फ़…. ऊँह.. यही तो पत्नी का काम है। पति के साथ हनीमून पर मौज मस्ती करना।

जय- सही कहा तुमने ममता। तुम अब पहले से ज्यादा खुल गयी हो और नटखट भी।

कविता- माँ की आदत है खाने में मसाला तेज डालने की।

ममता- अच्छा इधर आ तो। अभी बताती हूँ मसाला तेज़ कैसे होता है। 

ये बोलकर ममता कविता को चुम्मा लेने लगी। बहुत ही तेज चुम्मा। 

जय ये देखकर पागल हो उठा। उसने ममता की गाँड़ पर पांच छै थप्पड़ जड़ दिए। ममता की गाँड़ लाल हो गयी। वो सिसकारी मारती हुई, कविता को चूम रही थी, पर उसने ऊफ़्फ़ नहीं की। जय ममता की बुर को हुमच हुमच कर चोद रहा था। वो करीब 10 मिनट तक, ममता की बुर का फैलाव बढ़ा रहा था। उधर उन दोनों का चुम्बन टूटते ही, कविता बोली,” हमारी बुर को भी तो चोदोगे ना, इस लण्ड पर हमारी बुर का हक़ है। खाली अपनी माँ की ही बुर चोद रहें हैं।”

जय कविता के गाल पर एक तमाचा मारा और बोला,” साली, कुत्ती की बच्ची, अभी अभी तो चोदा था, तुम्हारी बुर को। बहुत ज़्यादा बुर चोदवाने के लिए मचल रही हो। पहले तुम्हारे माँ को चोदेंगे, फिर तुमको।”

कविता अपना गाल सहलाते हुए बोली,” छब्बीस साल की हो गए हैं। अब तक हमको तीन बच्चों की माँ बन जाना था। लेकिन ले देकर अब एक लौड़ा मिला है, वो भी अपने सगे भाई का। सारा कसर पूरा करेंगे।” ये बोलकर वो जय का लण्ड पकड़ ली, और निकालकर अपने बुर में घुसा ली। 

कविता- अब हमारे बुर की खबर लो, अपने लण्ड से।”

ममता- चोदो बेटा, हमारी बेटी को चोदो। अपनी दीदी को चोदो। हम माँ बेटी को अदल बदल कर चोदो। हाय रे औरतों की बुर, क्या क्या करवाती है? माँ से बेटी, भाई का लौड़ा छीन अपने बुर में पेलवाती है। हमारी बेटी को, लण्ड की कमी मत होने देना।” ममता जय का हाथ थाम बोली।” ये हमारी बच्ची अब आपके, पल्ले बांध दी है, जमाईजी।”

जय- ममता तुम और तुम्हारी ये बेटी, हमारी मस्त छिनालों की तरह रहना सिख जाओ। दोनों को कोई कमी नहीं होने देंगे। तुम तो हमारी सास और माँ दोनों हो। 

कविता- अरे भैया सैयांजी, अपनी इस बीवी को तो पेलो। कबसे बुर में लण्ड घुसा झुके हुए हम।

जय कविता की बात सुन उसकी कमर को पकड़ ताबड़तोड़ धक्के मारने लगा। कविता के मुंह से आँहें निकलने लगी। उसकी चूचियों और गाँड़ में धक्कों की वजह से थिरकन होने लगी। उसका नंगा शरीर भीगने की वजह से, चमक रहा था। जय उसके चूतड़ों को दबोचे हुए, धक्के मार रहा था। इस तरह दोनों माँ बेटी, झुके हुए दीवार से चिपकी हुई, अपना नंगा नारीत्व लुटा रही थी। जय लगातार चोदते हुए उन दोनों की काम पिपासा शांत कर रहा था। इस क्रम में उसने कविता की गाँड़ में उंगली भी घुसा दी। 

कविता बोली,” हाँ, आआहह…. तुम्हारा लण्ड बुर में और उंगली गाँड़ में एक साथ हो तो क्या मज़ा आता है…आआ…. उई… अमामाँ ये क्या गाँड़ के भीतर चिकोटी काट रहे हो, आह दर्द हो रहा है। 

जय अपनी दो उंगलियां उसकी गाँड़ में घुसाए था। उसे अंदर गुदा मांस की सतह छेड़ने में मज़ा आ रहा था। जय ने तभी उसको पकड़के चिकोटी काट ली। उसे कविता को इस तरह छेड़ने में बड़ा मजा आ रहा था। कविता को दर्द तो हुआ, पर उसे भी इसमें मज़ा आ रहा था। फिर जय ने लण्ड निकालकर ममता के खुले मुंह में दे दिया। कविता को उसकी गाँड़ से उंगली निकाल उसे ही चटवाने लगा। कविता पूरे लगन से चटखारे ले लेकर उसका स्वाद लेने लगी। वो किसी भूखी भिखारन की तरह लग रही थी, जिसे कोई आइस क्रीम दे दिया हो। जय की उंगलियों पर लगे अपने गाँड़ रस को चट कर गयी। उधर उसकी माँ जय के भीगे लण्ड को चूस रही थी जो कविता के बुर के पानी से भीगा हुआ था। जय उन दोनों की भूखी नज़रों की तत्परता देख मंत्रमुग्ध हो गया। 

कविता- ऐसे क्या देख रहे हो?

जय- कुछ नहीं।

जय ने फिर ममता की बुर में लण्ड पेल दिया। इस बार उसने ममता को घोड़ी बनाया। उसका आधा शरीर पानी मे डूबा हुआ था। बुर तक पानी का स्तर था। जय के लण्ड का निचला आधा हिस्सा, पानी में डूबा था। धक्का मारने की वजह से पानी छलक कर बाहर गिर रहा था। कविता अपने बुर को फैलाये हुए अपने भाई को अपना बुर चखने के लिए परोस दी थी। जय उसकी बुर को चाट रहा था। एक तरफ माँ की बुर चोद रहा था और दूसरी ओर अपनी दीदी की बुर चाट रहा था। ममता और कविता की आँहें पूरे बाथरूम की दीवारें फाड़कर बाहर आना चाहती थी। इस तरह ना जाने कितने देर तक वो ममता को चोद रहा था। ममता तब तक दो बार झर चुकी थी, और कविता बुर चटाते हुए, लगभग मूतते हुए झड़ी थी। अंत मे जय के अंदर का सैलाब फूट पड़ा। 

जय- दोनों सामने बैठ जाओ, हमारा निकलने वाला है। पीना चाहती हो ना हमारा मूठ। 

कविता झटपट बैठते हुए बोली,” यही तो पीना चाहते हैं हम। आज हम दोनों आपका कीमती मूठ पीकर, ही खाना खाएंगे।” और मुंह खोलकर जीभ बाहर निकाल ली। 

ममता- ये इसीका आईडिया है, की हम दोनों अबसे रोज़ आपके मूठ का सेवन करें। ये हमारे लिए पौष्टिक, है। अगर हम दोनों गर्भवती भी रहेंगे तो, भी मूठ पीते रहेंगे। 

जय- ये तो तुम दोनों के लिए ही है। जितना चाहो निकालो और पीओ। ये लो रानी.. आ गया तुम दोनों के लिए स्वादिष्ट पौष्टिक आहार…आआहह

जय के लण्ड से मूठ की मोटी गढ़ी 8-9 धार निकली, जो कविता के मुंह में भर गया। ममता मुस्कुराई और कविता को चूमने के लिए आगे बढ़ी। कविता ने पूरा का पूरा मूठ, ममता के मुंह में भर दिया, चुम्बन के दौरान। दोनों एक दूसरे को पकड़ चूम रही थी। फिर ममता ने भी ऐसा ही किया। फिर दोनों ने आधा आधा हिस्सा बांट लिया और जय को दिखाके पी गयी। 

जय उनकी ओर देखा और बोला,” तुम दोनों को मूठ पीना बहुत पसंद है ना? तुमदोनों जब चाहो, इसे पी सकती हो। ये तुम्हारा है कितना प्यारी लगती हो दोनों जब पीती रहती हो।”

ममता- यही तो हम औरतों का असली सम्मान है। चुदाई के बाद औरत को ये मूठ पीने को मिल जाये तो, उसका चुदना सफल हो जाता है। ये हमारी फसल है, जिसे चुदाई के बाद काटा जाता है।

कविता- ये औरतों के बीच की बातें हैं। आप नहीं समझेंगे। जाइये आप अब हम दोनों को नहाने दीजिए। 

जय हंसता हुआ बोला,” जाऊंगा पर हमको अभी मूत लग रहा है। चलो दोनों बाहर आओ। पहले हमारे मूत से नहा लो।”

दोनों को टब से बाहर निकालकर,घुटनों पर बिठाके, जय उनके ऊपर हंसते हुए मूतने लगा। जय की मूत की धार उनके गोर मुखड़े पर बरसने लगी। गर्म मूत से पूरा बदन गीला होने लगा। जय उन दोनों के चेहरे पर बार बार पीली धार मार रहा था। दोनों आंखें मूंदे हुए, अंदाज़ा लगती की मूत की धार किधर से आएगी। उन दोनों का सारा मेक अप धुल चुका था। देखते ही देखते दोनों पूरी गीली हो गयी। जय की धार को दोनों ने कई बार पिया भी, पर उबकाई के साथ। कभी मूत की धार उनके आँखों पर बरसता, तो कभी गालों पर, कभी होंठों पर, कभी गर्दन पर, कभी पूरे जिस्म पर, कभी माथे पर। दोनों को मूत से नहलाने के बाद, जय फिर उनपर थूक दिया। 

कविता और ममता मुस्कुराती रही। फिर जय बाहर निकल आया और दोनों माँ बेटी अंदर नहाने लगी।

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