तो बच्चों का फ़र्ज़ भी है, कि वो उनकी भावनाओं का सम्मान करें…
फिर मेने दोनो भाइयों से मुखातिब होकर कहा – आप लोगों ने भी तो वही राह चुनी जो बाबूजी ने सुझाई थी, तो मे कैसे अलग राह चुन सकता हूँ…
मेरी बातें सुनकर सबकी आँखें नम हो गयी, और बारी-बारी से सबने मुझे सीने से लगाकर आशीर्वाद दिया.
बाबूजी ने मेरे सर पर हाथ रखकर कहा – अब मुझे पूरा विश्वास है, कि तू जो भी करेगा उसमें अवश्य सफल होगा…!
आज मे ईश्वर का बहुत अभारी हूँ, जिसने मुझे इतने लायक बेटे दिए… मेरा जीवन धन्य हो गया…!
आज अगर तुम्हारी माँ जिंदा होती, तो अपने बच्चों को देख कर कितनी खुश होती..ये बोलते – बोलते माँ की याद में उनकी आँखें भर आईं.
भाभी ने बाबूजी से कहा – वो अब भी हमारे बीच ही हैं बाबूजी… आज इस घर में जो खुशियाँ दिख रही हैं, वो उनके त्याग और आशीर्वाद का ही तो फल है…!
बाबूजी ने भाभी के सर पर आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ रख कर कहा – तुम सच कहती हो बेटी,
लेकिन इन सबके अलावा विमला के जाने के बाद जिस तरह से तुमने अपनी छोटी उमर में इस घर को संभाला है, वो भी कोई मामूली बात नही है…
ये घर तुम्हारा हमेशा एहसानमंद रहेगा बेटी….
भाभी – भला अपनों पर भी कोई एहसान करता है बाबूजी…! मेने तो बस वही किया जो माजी मुझसे बोलकर गयी थी…
माहौल थोड़ा एमोशनल सा हो गया था, सभी की आँखें नम हो चुकी थी, इससे पहले की मामला कुछ और सीरीयस रूप लेता, कि तभी रूचि बीच में कूद पड़ी…
मम्मी ! आप लोग बात ही करते रहोगे, मुझे भूख लगी है…, सभी को उसके अचानक इस तरह बोलने से हँसी आ गयी, भाभी ने उठ कर उसे दूध दिया, तो माहौल थोड़ा नॉर्मल हुआ…
कुछ देर के वार्तालाप के बाद डिसाइड हुआ कि मुझे लॉ करना चाहिए, वो भी किसी अच्छे कॉलेज से, सो दूसरे दिन ही बड़े भैया, देल्ही के एक अच्छे से कॉलेज का फॉर्म ले आए…
मेरे ग्रॅजुयेशन के अच्छे नंबरों की वजह से देल्ही के कॉलेज में मुझे अड्मिशन मिल गया…, मे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए देल्ही जाने की तैयारियों में जुट गया….!
देल्ही जाने से एक दिन पहले शाम को मे अपने सभी परिवार वालों से मिलने के लिए घर से निकला…
पहले बड़े चाचा के यहाँ, फिर मनझले चाचा-चाची से आशीर्वाद लेकर मे छोटी चाची के यहाँ पहुँचा…
चाचा कहीं बाहर गये थे.. चाची ने मुझे देखते ही, चारपाई पर बिठाया और अंश को रूचि के साथ खेलने को भेजकर वो मेरे पास आकर बैठ गयी…
सी. चाची – लल्ला ! सुना है, तुम दिल्ली जा रहे हो पढ़ने के लिए, इसमें तो सालों निकल जाएँगे…
मे – हां चाची लगभग 4 साल तो लग ही जाएँगे…!
वो – हाए राम ! 4 साल..? चाची दुखी सी दिखाई देने लगी ये सुनकर, फिर मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर बोली…
बहुत याद आओगे तुम, वैसे हम सबके बिना कैसे काटोगे इतने दिन अकेले…?
मे – क्या करूँ चाची काटने तो पड़ेंगे ही… अब बाबूजी की आग्या का पालन तो करना ही पड़ेगा… वैसे आप मुझे बहुत याद आओगी चाची…
मेरी बात सुनकर उनकी आँखें डॅब्डबॉ गयी, और मुझे अपने सीने से लगाकर बोली – सच बेटा…! तुम्हें अपनी चाची की याद आएगी..?
ना जाने क्यों , चाची के मुँह से पहली बार बेटा सुनकर मेरा भी मन भर आया, मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े, और मे कसकर उनके सीने से लिपट गया…!
फिर मेने उन्हें अलग करते हुए, उनके आँसू पोंच्छ कर कहा – चाची , एक बार फिरसे बेटा कहो ना… ये शब्द सुनने के लिए कान तरस गये थे मेरे…
चाची – सच बेटा…! मेरा बेटा कहना अच्छा लगा तुम्हें.. ?
मे उनके सीने से एक बार फिर लिपट गया, और हिचकी लेते हुए कहा – हां चाची… मुझे बेटा कहने वाला कोई नही है… आप मेरी माँ बन कर मुझे अपने गले से लगा लो..!
चाची की रुलाई फुट पड़ी, और रोते हुए उन्होने मुझे अपने कंठ से लगा लिया… फिर मेरी पीठ सहलाते हुए बोली – माँ की याद आ रही है मेरे बेटे को… मुझे अपनी माँ ही समझ मेरे बेटे…
मेने रोते हुए कहा – हां ! आप मेरी माँ ही तो हो, जिसने अपने बेटे की हर ख्वाहिश का ख़याल रखा है अबतक…
कुछ देर एमोशनल होने के बाद मेने थोड़ा माहौल चेंज करने की गरज से चाची के होंठों को चूम लिया..और उनकी आँखों में देखते हुए कहा…
वैसे मेरे तो आपसे और भी नाते हैं.. हैं ना चाची…?
वो भी मुस्करा पड़ी, और मेरे होंठों पर प्यारा सा चुंबन लेकर बोली – तुम तो मेरे सब कुछ हो, बेटा, जेठौत (भतीजा)…और..और…
मेने शरारत से उनके आमों को सहलाते हुए कहा- और क्या चाची.. बोलो..
चाची – और मेरे बच्चे के बाप भी…फिर वो मेरी जांघों को सहला कर बोली –
वैसे सच में बहुत याद आएगी तुम्हारी… ख़ासकर इसकी.. ये कहकर उन्होने मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में ले लिया…
मेने उनके आमों को ज़ोर से मसल दिया – सीधे-सीधे कहो ना कि एक बार और चाहिए ये आपको….
वो उसे ज़ोर से दबाते हुए बोली – अभी समय हो तो दे दो ना.. एक बार..
मे – यहीं…?,
ये सुनते ही वो झट से खड़ी हो गयी, और मेरा हाथ पकड़ कर अपने बेडरूम की तरफ चल दी…
मेने चाची को नंगा कर के उनकी भरी हुई, मस्त जवानी का लुफ्त लेते हुए एक बार जमकर छोड़ा, और उन्हें उनके मन्मुताविक खुशी देकर अपने घर आ गया.
रात के खाने पर यही सब चर्चा होती रही, सभी लोग अपनी अपनी तरह से समझाते रहे मुझे,
कैसे रहना है, क्या खाना है, क्या नही खाना है… अपनी पढ़ाई पर ध्यान रखना है, इधर-उधर की बातों से बचना है.. यही सब बातें.
फिर सब सोने चले गये, मे भी अपने कमरे आकर बेड पर लेट गया, और भविश्य के बारे में सोचने लगा…
नींद तो आँखों से कोसों दूर थी…बस पड़ा था कमरे की छत को घूरते हुए…
लगभग 11 बजे भाभी मेरे कमरे में आईं, गेट लॉक कर के वो जैसे ही मेरी तरफ पलटी, मे उन्हें देखता ही रह गया…
मात्र एक मिनी गओन, जिसमें से उनका मादक दूधिया बदन छलक पड़ने को तत्पर दिखाई दे रहा था…
उनकी आँखों में अपने लाड़ले से बिछड़ने की उदासी साफ-साफ दिखाई दे रही थी..उन्हें देखते ही मे उठ कर बेड के सिरहाने से टेक लेकर बैठ गया…
हल्के कदमों से बढ़ती हुई वो मेरे बेड तक आईं, और बेड के साइड में खड़े होकर उन्होने अपना वो नाम मात्र का गाउन भी अपने बदन से सरका दिया…
भाभी की आँखें नम थी, जिन्हें देखकर मे भी बेड से नीचे उतरकर उनके सामने खड़ा हो गया….
मेने उनके हाथ को अपने हाथ में लेकर पूछा – भाभी आप यहाँ मेरे कमरे में और इस तरह… भैया को छोड़कर… वो क्या सोच रहे होंगे…?
वो अपनी रुलाई पर काबू करते हुए बोली – तुम्हें बस अपने भैया की फिकर है…मुझ पर क्या बीत रही है, इसका कोई अंदाज़ा नही है…
तुम उनकी फिकर छोड़ो, उन्हें मेने नींद की गोली देकर सुला दिया है, अब वो सुबह से पहले नही उठेंगे…
उनकी बात सुनकर मेने उनके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उनके लरजते होंठों पर अपने होंठ रख दिए… और एक गमगीन सा किस लेकर कहा…
मुझे पता है भाभी की आप पर क्या बीत रही है…, मे खुद नही समझ पा रहा हूँ, कि आपके बिना इतने साल मे कैसे रह पवँगा..?
भाभी मेरे सीने से लिपटकर फुट-फूटकर रोने लगी… मत जाओ लल्ला.. नही रह पाउन्गी मे तुम्हारे बिना…
मेने उनके नंगे बदन को सहलाते हुए कहा – मे भी नही चाहता भाभी…आप बाबूजी को समझाओ ना… यहीं पास के शहर में रहकर कुछ कर लूँगा…
कुछ देर सुबकने के बाद वो मुझसे अलग हुई… फिर अपने आँसू पोन्छ्कर बोली – अब कुछ नही हो सकता लल्ला, मे बाबूजी से क्या कहूँगी… नही..नही…तुम जाओ, रह लेंगे तुम्हारी यादों के सहारे…
मे नही चाहती की, मेरी वजह से तुम अपना भविश्य बरवाद करो…और तुम्हें भी अपना जी कड़ा करना होगा…
इसलिए मे तुम्हारे भैया को सुला कर तुम्हारे सामने इस अवस्था में खड़ी हूँ, कि आने वाले कुछ सालों के लिए इस रात को यादगार बना सकूँ,
आओ मुझमें समा जाओ मेरे प्रियतम… मेरे दिलवर…. मेरे लाड़ले देवर…
ये कहकर वो मुझसे किसी बेल की तरह लिपट गयीं, और मेरे चेहरे पर जगह जगह अनगिनत चुंबन ले डाले…
उन्हें बाहों में समेटे, मे पलग पर ले आया और फिर मेने उनके बदन पर उपरर से नीचे तक चुंबनों की बौछार करदी…
वो जलबिन मछली की तरह पलंग पर पड़ी तड़पने लगी…, अपनी आँखें मीचे छन-प्रतिछन वासना की तरफ बढ़ने लगी…
चूमते हुए मे उनकी टाँगों के बीच आ गया और उनकी चिकनी चमेली को हाथ से सहला कर उनकी चुचियो को चूस लिया…
आआहह…..सस्स्सिईईईईईईईईईई….लल्लाआ….मुझे खूब सराअ…प्यार चाहिए…आजज्ज….हहुऊन्न्ं…
जब मेने उनकी रस गागर के मुँह पर अपनी जीभ लगाई… भाभी की कमर बुरी तरह से थिरकने लगी… मे अपनी एक उंगली चूत के अंदर डालकर उनकी क्लिट को चूसने लगा…
आआययईीीई….म्म्मा आ….चूसूऊ…आअहह…खा…जाओ… उन्होने मेरे सर को अपनी चूत पर दबा दिया और अपनी गान्ड को हवा में लहराते हुए झड़ने लगी.
भाभी ने मेरे बालों को पकड़कर अपने ऊपर खींचा, और मेरे होंठों को चूस्ते हुए बोली – तुम सच में जादूगर हो लल्ला… अब पता नही ऐसा मज़ा कब मिलेगा मुझे….?
मेने उनके आमों को सहलाते हुए कहा – ये सब आपने ही तो सिखाया है भाभी…
सच कहूँ तो इतना सकुन मुझे और कहीं नही मिलता, जितना आपके आगोश में मिलता है… आप ही मेरे लिए सब कुछ हो,
मेरी गुरु, मेरी प्रेयशी, मेरी भाभी, मेरी माँ…सब कुछ… आप हैं, तो मे हूँ, वरना आपके बिना मेरा कोई वजूद नही…
भाभी ने मेरे नीचे लेते हुए, मेरे शेर को अपने हाथ में लेकर अपनी रसीली के मुँह पर रखा और अपनी टाँगों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेटकर कस लिया…
मेरा लंड सरसरकार उनकी गीली चूत में चला गया….
सस्स्स्सिईईईईईईई…..आअहह….इतना प्यार करते हो अपनी भाभी से… उउफफफ्फ़…. रजाअ.. मत करो इतना प्यार…की ये मोहिनी कहीं मर ही ना जाए तुम्हारी जुदाई में…
भाभी के शब्द उनके मुँह में ही जप्त रह गये, क्योंकि मेने अपने होंठ जो टिका दिए उनके होंठों से… और अपनी कमर को और ज़ोर से दबा दिया….
मेरा पूरा लंड उनकी बच्चेदानी के मुँह तक दस्तक देने लगा… भाभी अपार सुख की सीमा लाँघ गयी… और ज़ोर से उन्होने मुझे अपने बदन से कस लिया….
मेने जैसे ही अपने मूसल को सुपादे तक बाहर लेकर एक जोरदार धक्का मारा…
उन्होने अपने दाँत मेरे कंधे में गढ़ा दिए.. और जोरदार सिसकारी भरते हुए अपनी कमर और ऊपर कर के मेरे शेर को गहरे और गहरे तक अपनी मान्द में समा लिया…
आज भाभी के साथ सेक्स करने में कुछ अलग सी ही फीलिंग हो रही थी, वो मशीनी अंदाज में अपनी कमर को झटके दे देकर चुदाई के मज़े को दुगना-तिगुना करने की कोशिश में लगी थी…
रात के अंतिम पहर तक भाभी मेरे पास ही रहीं, उनका मन ही नही था अलग होने का… लेकिन सामाजिक बाँधों में जकड़े उदास मन.. एक दूसरे से जुदा होना ही पड़ा..
उस रात मेरी माँ, मेरी अबतक की हमसफर, मेरी जान, मेरी सब कुछ, मोहिनी भाभी ने उस रात दिल्खोल कर अपने लाड़ले देवर को प्यार दिया…
मे उनके प्यार से सराबोर होकर, अपने परिवार की यादों को अपने साथ समेटे हुए, दूसरे दिन देल्ही लॉ की पढ़ाई करने के लिए निकल पड़ा….!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
चार साल बाद ………………..
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
आज मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी का दिन था… क्योंकि पूरे 4 साल के बाद मे अपने घर वापस जा रहा था,
बीते 4 सालों से मे देल्ही में रहकर एलएलबी की पढ़ाई करता रहा था…, इस बीच रामा दीदी के यहाँ भी जाता रहा, लेकिन धीरे-2 वो भी बंद सा हो गया…
पिच्छले एक साल से एक जाने माने लॉयर के अंडर में मेने प्रॅक्टीस की, जिनसे मेने लॉ की बारीकियों को अच्छे से जाना था…
आज अपने गुरु प्रोफ़ेसर. राम नारायण जो उसी लॉ कॉलेज में प्रोफेसर भी हैं, उनसे पर्मिशन लेकर मे अपने घर जा रहा था…
ट्रेन में बैठा मे अपने बीते हुए दिनो को याद कर रहा था… साथ ही अपनी भाभी और प्यारी भतीजी रूचि से मिलने की एग्ज़ाइट्मेंट, …
बाबूजी और भैया का स्नेह और आशीर्वाद मिलने वाला था मुझे आज.
बीते कुछ दिनों में निशा से भी कोई बात नही हो पाई थी.., मेने कितनी ही बार उसके घर फोन किया, लेकिन लगा ही नही,
ना जाने वो क्या कर रही होगी आजकल, … फिर अचानक एक अंजानी सी आसंका ने मुझे घेर लिया…
कहीं उसके घरवालों ने उसकी शादी ना करदी हो…ये सोचकर ही मेरे शरीर में एक अंजाने डर की लहर दौड़ गयी… और मे बैचैन हो उठा…
इधर कुछ दिनो से मेरे घरवालों ने भी एक तरह से मुझसे संबंध सा ही ख़तम कर लिया था…
बस महीने के महीने मुझे खर्चा मिल जाया करता था, वो भी मनी ऑर्डर के ज़रिए….
मे जब भी फोन करता, लाइन मिलती, और मेरी आवाज़ सुनते ही कट कर दिया जाता…
जब पिछले कई महीनों से कोई खैर खबर नही मिली, तो मे बैचैन रहने लगा, जिसे प्रोफ़ेसर साब ने भाँप लिया और पुच्छ बैठे…
जब मेने सारी बात उन्हें बताई, तो उन्होने ही मुझे घर जाकर पता करने की बात कही…
फिर मेरी सोचों पर भाभी ने कब्जा कर लिया, उनके साथ बिताए वो स्वर्णिम दिन याद आने लगे, भाभी ने मेरी खुशी को कैसे अपनी जिंदगी ही बना लिया था…,
प्यार और स्नेह के साथ साथ उन्होने मुझे दुनियादारी भी सिखाई थी…, एक तरह से उन्होने ही मुझे इस काबिल बनाया था, मे उनके त्याग और ममता का ऋण कैसे उतार पाउन्गा…?
अपनी सोचों में गुम मुझे पता भी नही चला, कब मेरा स्टेशन आ गया…जब गाड़ी खड़ी हुई, तब जाकर मेरी सोचों पर भी ब्रेक लगे…
मेने लोगों से स्टेशन के बारे में पूछा.., हड़बड़ा कर मेने अपना बॅग लिया और डिब्बे से बाहर आया…
यहाँ से मुझे अपने घर तक बस से ही जाना था… जो करीब 1 घंटे बाद निकलने वाली थी…
मे जब अपने घर की चौपाल पर पहुँचा … जहाँ किसी समय बाबूजी की मौजूदगी में लोगों की जमात लगी होती थी वहीं आज सन्नाटा सा पसरा हुआ था..
बैठक का दरवाजा तो खुला था… इसका मतलव बाबूजी बैठक में हैं… लेकिन इतनी शांति क्यों है…
मे धड़कते दिल से बैठक के गेट पर पहुँचा… अंदर बाबूजी अकेले अपनी ही सोच में डूबे हुए आराम कुर्सी पर बैठे झूल रहे थे…,
वो आज मुझे कुछ थके-थके से दिखाई दिए.
मुझे सामने देखकर वो झटके से खड़े हो गये, मेने जाकर उनके पैर छुये, उन्होने मेरे सर पर हाथ फेर्कर आशीर्वाद दिया…
बाबूजी ने मुझे अपने गले से लगा लिया…, ना जाने क्यों उनकी आँखों से दो बूँद टपक कर मेरे कंधे पर गिरी…
मेने उनकी तरफ देखा… तो वो रुँधे गले से बोले… जा बेटा घर जाकर फ्रेश होले.. हारा थका आया है… थोड़ा आराम करले.. फिर बैठेंगे साथ में…
मे उनके पास से उठ कर अपना बॅग उठाए घर के अंदर पहुँचा…मेरी बिटिया रानी मेरी भतीजी… रूचि जो अब काफ़ी बड़ी हो गयी थी.. आँगन में खेल रही थी..
मुझे देखते ही दौड़कर मेरे पैरों से लिपट गयी… और चिल्लाते हुए बोली –
चाचू आ गये…. मम्मी… मौसी… देखो चाचू आ गये…
उसकी आवाज़ सुनकर भाभी और निशा दौड़ कर बाहर आई… मुझे देखते ही भाभी ने मुझे अपने कलेजे से लगा लिया… लाख कोशिशों के बाद भी उनकी रुलाई फुट पड़ी.. और उनकी आँखें बरसने लगी…
उनके पीछे खड़ी निशा भी रो रही थी…
मेने भाभी के कंधों को पकड़ कर उनसे कहा – क्या भाभी ! अपने लाड़ले का आँसुओं से स्वागत करोगी.. अब तो मे आ गया हूँ ना ! फिर ये आँसू क्यों..?
उन्होने अपने ऊपर कंट्रोल किया और बोली – ये तो मेरे खुशी के आँसू थे जो 4 साल से रुके पड़े थे… तुम्हें देखते ही कम्बख़्त दगा दे गये.. और छलक पड़े…
जाओ तुम पहले फ्रेश हो जाओ… फिर निशा की तरफ मुड़कर बोली… जा निशा लल्ला के लिए चाय नाश्ते का इंतज़ाम कर, ये थके हारे आए हैं..
भाभी मेरे हाथ से बॅग लेकर मेरे कमरे में चली गयी.. उनके साथ-2 रूचि भी थी.…
मे जब बाथरूम से लौट रहा था… तब रूचि भाभी से पुच्छ रही थी…
मम्मी..! आपने चाचू से झूठ क्यों कहा…? उन्हें सच क्यों नही बताया कि आप और मौसी क्यों रो रही थी ?
भाभी – नही बेटा ! चाचू अभी थके हुए हैं ना ! इसलिए मम्मी उन्हें परेशान नही करना चाहती थी… इसलिए..
रात को जब पापा आजाएँगे ना, तब दादू और हम सब मिलकर चाचू को बताएँगे… अभी तू चाचू को कुछ मत बताना.. ठीक है, मेरा अच्छा बच्चा..
रूचि ने हां में गर्दन हिला दी… लेकिन इन बातों ने मुझे अंदर तक हिला दिया था… ना जाने ऐसा क्या हुआ है यहाँ…? और ये निशा यहाँ क्यों हैं..?
अब मुझे चैन नही पड़ रहा था..मेरे अंदर उथल-पुथल होने लगी, मुझे किसी उन्होनी का आभास सा हो रहा था.
मे जानना चाहता था.. कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है.. जिससे सब लोग दुखी हैं..
पर जब भाभी एक बार बोल चुकी हैं कि वो मुझे परेशान नही करना चाहती..
तो मे भी अब उनको पुच्छ कर उनकी परेशानी नही बढ़ाउंगा….. , ये सोचकर मे किचन की ओर बढ़ गया…
किचन में निशा मेरे लिए चाय बना रही थी.. मेने उसके पास जा कर उसको आवाज़ दी – निशु…!
मेरी आवाज़ सुनते ही वो पलट कर मेरे सीने से लिपट गयी और सूबकने लगी….
मेने उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा – हुआ क्या है यहाँ…? मुझे कुछ बताओ तो सही…
ये सुनकर वो एक झटके में मुझसे अलग हो गयी… और अपने आँसू पोन्छते हुए बोली –
मे आपको कुछ भी नही बता पाउन्गि… प्लीज़ मुझसे कुछ मत पुछिये….
मेने झल्लाकर कहा… आख़िर बात क्या है.. तुम बता नही सकती, भाभी बताना नही चाहती… लगता है आप लोग मुझे पागल बनाक छोड़ोगे…
तभी वहाँ भाभी आ गयी… और बोली – थोड़ा सा इंतेज़ार कर लो लल्ला.. प्लीज़ अपने भैया को भी आ जाने दो…फिर बात करते हैं.. हां..!
मे – लेकिन भैया हैं कहाँ…? रात होने को आई.. अभी तो कॉलेज भी बंद हो गया होगा…
भाभी – वो थोड़ा शहर गये हैं, आते ही होंगे… अभी हम ये बात कर ही रहे थे.. कि भैया की गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी.. रूचि भागते हुए बाहर गयी…
कुछ देर बाद भैया भी आ गये… मेने उनके पैर छुये, तो उन्होने मुझे आशीर्वाद दिया…
कुछ देर बाद उनके पीछे ही बाबूजी भी घर के अंदर आ गये… अब हम सब एक साथ बैठे थे…
बाबूजी ने भैया से पूछा… आज कुछ हुआ राम…?
भैया ने मेरी तरफ देखा… और बोले…, बाबूजी ! इससे पहले कि आज क्या हुआ… मे अपने भाई को सब कुछ साफ-2 बता देना बेहतर समझता हूँ…
भैया – छोटू ! मेरे भाई मुझे पता है, कि घर के बदले हुए हालत देख कर इसके बारे में जानने को तू उत्सुक है.. और मे आज कहाँ से आरहा हूँ…?
तो सुन , मोहिनी का भाई राजेश इस समय जैल में है… उसपर इरादतन कत्ल करने का संगीन इल्ज़ाम है.. दफ़ा 307 के तहत उसे जैल में डाला हुआ है,
पिच्छले 6 महीनों से धक्के खाने के बाद भी अभी तक उसकी जमानत नही हो सकी है..
भैया की बात सुन कर मेरा मुँह खुला का खुला रह गया… मेरे मुँह से आवाज़ तक नही निकली….
मेरी ऐसी अवस्था देख कर उन्होने मेरा हाथ पकड़ते हुए आगे कहना शुरू किया – ये क्यों हुआ… कैसे हुआ… मेरे ख़याल से ये सब आगे निशा ही बताए तो ज़्यादा सही होगा…
भैया की बात सुन कर मेने निशा की तरफ देखा… जो गर्दन झुकाए..बस रोए जा रही थी…..
बहुत देर की चुप्पी के बाद बाबूजी बोले – बता दे बेटी… तेरे ऊपर जो बीती है.. वो तुझसे अच्छा और कॉन बता सकता है… !
मे लगभग चीख ही पड़ा – क्या……? क्या हुआ था निशा के साथ..?
बोलो निशा ! क्या हुआ था तुम्हारे साथ……
निशा तो बस रोए ही जा रही थी, उसकी हालत देखकर लग रहा था कि वो कुछ भी बताने की स्थिति में नही है…
मेरे सब्र का बाँध टूटने लगा था… सो ये भी भूल गया कि मेरे सामने कॉन-कॉन बैठा है…, और उसको कंधों से पकड़ का झकझोरते हुए बोला…
बताओ निशु ! मुझे सब कुछ सच सुनना है… तुम्हें अपने प्यार की कसम अब अगर अब भी तुम कुकच्छ नही बोली तो…मे तुम्हें कभी माफ़ नही करूँगा…
सब मेरे मुँह की तरफ देखने लगे… निशा किन्कर्तब्यविमूढ़ सी कुछ देर यौही बैठी सुबक्ती रही, मेरे इस तरह चीखने से उसकी रुलाई तो थम गयी थी, लेकिन फिर भी कुछ बोल नही पा रही थी,
फिर कुछ साहस बटोरकर सुबक्ते हुए वो अपनी आप बीती बताने लगी…!
निशा की आप बीती –
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मेरी सहेली मालती… उसकी शादी एक साल पहले ठाकुर सुर्य प्रताप के बेटे भानु प्रताप से हुई थी.. अब ये क्यों हुई कैसे हुई.. इस बारे में हमें ज़्यादा कुछ मालूम नही पड़ा..
हां ! इतना पता है कि भानु के पिता खुद मालती के दादा के पास आकर उसका हाथ माँगने आए थे…
शादी बड़ी धूम धाम से हुई, मालती के दादा के पास भी ज़्यादा तो नही पर अच्छी-ख़ासी ज़मीन जयदाद है.. सो उन्होने अपनी पोती की शादी में कोई कसर नही रखी…
भानु कभी –2 मालती के साथ हमारे गाँव आता था, जैसे और वाकी के रिस्तेदार भी आते हैं…
6 महीने पहले.. एक दिन मालती हमारे घर आई.. और मुझे अपने साथ अपने घर ले गयी… उसके साथ घर पर उसका पति भी मौजूद था…
उसके दादा – दादी कहीं बाहर किसी रिस्तेदार के यहाँ गये हुए थे.. घर पर वो दोनो ही थे…
मालती ने मुझे चाय बना कर दी… उस चाय के पीने के कुछ देर बाद ही मेरा सर चकराने लगा… मेने मालती को ये बात बताई तो उसने कहा – वैसे ही सर चकरा रहा होगा.. तू बैठ मे अभी आती हूँ..
मे उसके रूम में बैठी थी… मेरी आँखें बार-2 बंद खुल रही थी… तो मे कुछ देर बाद उसी पलंग के सिरहाने से टेक लेकर बैठ गयी…
मेरी आँखें बंद थी… कि तभी किसी के हाथों का स्पर्श मेने अपने शरीर पर किया… मेने जैसे तैसे कर के अपनी आँखें खोली – देखा तो मालती का पति मेरे बदन को सहला रहा था..
मे झट से उठ खड़ी हुई… और मेने उससे कहा – जीजा जी ये आप क्या कर रहे हैं..? मालती कहाँ है…?
वो मक्कारी भरी हसी के साथ बोला – वो तो किसी पड़ोसी के यहाँ गयी है… और मेरा हाथ पकड़ कर बोला – मे अपनी साली साहिबा को प्यार कर रहा हूँ…
आओ रानी मेरे पास आओ.. और ये कह कर उसने मुझे अपनी बाहों में भरना चाहा…
मे किसी तरह उससे छूट कर वहाँ से बाहर जाने के लिए भागी.. लेकिन देखा तो गेट अंदर से बंद था…
इससे पहले कि मे दरवाजे को खोल पाती, कि उसने मुझे फिरसे पकड़ लिया.. और मेरे साथ ज़ोर जबर्जस्ती करने लगा… छीना झपटी में मेरे कपड़े भी फट गये..
जिन्हें वो और तार-तार करने लगा…
मे बेबस और लाचार, नशे से बोझिल हो रही आँखों को किसी तरह खोले हुए रखकर उसके बंधन से छूटने की जी तोड़ कोशिश करती रही…
निशा अपनी आप-बीती सुनाते हुए सुबक्ती जा रही थी…. वो हिचकी सी लेकर फिर आगे बोली –
उसी दिन मेरे निकलते ही भैया घर आए थे, उन्हें ऑफीस में बहुत अच्छा प्रमोशन मिला था, वो बड़े खुश थे और सबके लिए कुछ ना कुछ गिफ्ट लेकर आए थे…
घर आकर जब उन्होने मेरे बारे में पूछा तो माँ बाबूजी ने बताया कि मे मालती के यहाँ गयी हूँ…
जब काफ़ी देर हो गयी.. और मे घर नही लौटी.. अंधेरा घिरने लगा था,.. तो घर पर सब लोग चिंता करने लगे…
कुछ देर और इंतेज़ार करने के बाद भैया मुझे लेने उसके घर पहुँच गये…
घर में सन्नाटा पसरा हुआ था… वो उसके चौक में जाकर आवाज़ लगाने लगे…
उनकी आवाज़ सुन कर मे अपनी पूरी ताक़त जुटाकर चिल्लाते हुए मेने भैया को मदद के लिए पुकारा..
भानु ने मेरे गाल पर एक जोरदार चान्टा जड़ दिया… और गाली देते हुए बोला.. साली चिल्लाकर अपने भाई को बुलाना चाहती है… और फिर उसने मेरा मुँह दबा दिया…
भैया ने मेरी आवाज़ सुन ली थी… वो गेट खटखटने लगे… और साथ ही साथ मुझे आवाज़ भी देते जा रहे थे…
भानु का थोड़ा ध्यान गेट की तरफ भटका… मेने मौके का फ़ायदा उठा कर उसके हाथ को बुरी तरह काट लिया… वो चीखते हुए दर्द के मारे ज़मीन पर बैठ गया…
इतने में मेने भाग कर गेट खोल दिया… और मे भैया से लिपट कर रोने लगी…
मेरे कपड़े फट चुके थे.. होंठों से खून रिस रहा था..मेरी हालत देख कर भैया की आँखें गुस्से से लाल हो उठी..
उन्होने मेरी पीठ सहलाते हुए.. मुझे अपने पीछे खड़ा किया और गुर्राते हुए भानु तरफ बढ़े….
तूने ये अच्छा नही किया हरम्जादे…, मेरी बहन की इज़्ज़त पर हाथ डालकर अपनी आफ़त मोल ले ली है तूने…
इससे पहले की वो उस तक पहुँच पाते… भानु के हाथों में ना जाने कहाँ से एक लंबा सा चाकू लहराने लगा…
उसने चाकू का बार भैया के ऊपर करना चाहा…,लेकिन उन्होने अपने आप को बचाते हुए उसकी चाकू वाले हाथ की कलाई थाम ली…
अब वो दोनो एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो चुके थे… कभी लगता की चाकू भैया की तरफ मूड गया, तो कुछ देर बाद उसका रुख़ भानु की ओर हो जाता…
मे खड़ी – 2 डर से थर-थर काँप रही थी…, मे किकरतव्यविमूढ़ सी कभी उसकी तरफ देखती, तो कभी भैया की तरफ…
उन दोनो में बहुत देर तक जद्दो जहद चलती रही, भानु की कोशिश थी कि वो चाकू का वार भैया पर कर सके, लेकिन उनकी मजबूत पकड़ उसकी कलाई पर बनी हुई थी…
फिर कुछ ऐसा हुआ कि चाकू वाला हाथ दोनो के बीच आ गया… और एक भयंकर चीख कमरे में गूँज उठी..
भानु का चाकू उसकी अंतड़ियाँ फाड़ते हुए उसकी पसलियों में जा घुसा था…
वो धडाम से फर्श पर गिर पड़ा.. चाकू उसके पेट में घुसा पड़ा था… भैया के कपड़े उसके खून से सन गये थे…
मे दौड़ कर भैया से जा लिपटी और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी… उन्होने मुझे चुप करते हुए वहाँ से निकल चलने को कहा…
अभी हम वहाँ से निकलने ही वाले थे कि तभी वहाँ मालती आ गयी.. वहाँ का मंज़र देखकर वो चीखने चिल्लाने लगी…
उसकी चीखें सुन कर मोहल्ले के लोग इकट्ठा हो गये…
उन्होने मेरी हालत देखी और फिर उनकी नज़र ज़मीन पर पड़े भानु के घायल शरीर पर पड़ी, जो दर्द से तड़प रहा था…
इतने में किसी ने पोलीस को इत्तला कर दी.. पोलीस ने आव ना देखा ताव… भैया को हथकड़ी लगा दी और अपने साथ थाने ले जाकर हवालात में बंद कर दिया…
इतना कहते-2 निशा बुरी तरह रोने लगी… भाभी उसे अपने से लिपटकर शांत करने की कोशिश करने लगी…
निशा की कहानी सुनकर मेरी हालत किसी लकवे के मरीज़ जैसी हो गयी, मे समझ नही पा रहा था, कि मुझे किस तरह से रिएक्ट करना चाहिए…
एक तरफ भानु और मल्टी के प्रति गुस्से का भाव भी था, तो दूसरी तरफ राजेश को बाहर निकालने की बैचैनि…
कुछ देर सबके बीच चुप्पी छाइ रही, फिर उसको तोड़ते हुए भैया ने आगे कहना शुरू किया…
हमने पोलीस को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन शायद वो शुर्य प्रताप के रुआब के कारण हमारी बात अनसुनी करते रहे… और उन्होने राजेश के ऊपर इरादतन हत्या की कोशिश करने का चार्ज लगा कर दफ़ा 307 के तहत जैल भेज दिया…
मेने किसी तरह अपने मनोभावों पर काबू करते हुए पूछा – आपने कृष्णा भैया को ये बात नही बताई…? उन्होने कुछ नही किया..
भैया – कहा था… उसने शुरुआत में तहकीकात भी की… लेकिन फिर पता नही क्यों वो भी पीछे हट गया…
और ये कह कर पल्ला झाड़ लिया कि एक बार चार्ज शीट फाइल हो गयी.. और अपराधी को जैल भेज दिया तो फिर कोर्ट से ही अब कुछ हो पाएगा…
तबसे लेकर आज तक मेने और मोहिनी के पिताजी ने खूब जी तोड़ कोशिश की… लेकिन हम राजेश की जमानत तक नही करवा पाए हैं…
मे – आपने किसी वकील से बात की…? कोई हाइयर किया है…?
भैया – हां बात की थी एक वकील से लेकिन थोड़ी बहुत खाना पूर्ति कर के वो भी पीछे हट गया…
इस डर से की भानु या उसका बाप निशा को और कोई नुकसान ना पहुँचा दे हम उसे यहाँ ले आए…
इसके लिए भी कृष्णा ने बाबूजी पर दबाब डाला कि, एक मुजरिम की बेहन को यहाँ क्यों रखा है…,
तब तेरी भाभी ने बाबूजी को बताया कि निशा इस घर की धरोहर है… इसे तेरे सुपुर्द करने की हमारी ज़िम्मेदारी है…
अब तक हमने ये ज़िम्मेदारी जैसे-तैसे निभाई है मेरे भाई… अब तू इसे संभाल आज से ये तेरी ज़िम्मेदारी है…
मेने हैरत से भैया की तरफ देखा, तो वो बोले… हमें तेरी भाभी ने सब कुछ बता दिया है.. इसी वजह से इसके माँ-पिताजी ने इसकी शादी नही की थी.. वरना ये नौबत ही नही आती…
मेने भभक्ते लहजे मे कहा – भैया ! अब मे निशा से शादी तभी करूँगा… जब इसका भाई खुद इसे अपने हाथों से विदा करेगा… तब तक ये आपकी ही ज़िम्मेदारी रहेगी…
भैया – ये तू क्या कह रहा है मेरे भाई… हम अपनी पूरी कोशिश कर के थक चुके हैं, अब तो एक तरह से आस ही छोड़ दी हैं हमने…
मेने उनसे ठहरे हुए लहजे में कहा – ठीक एक हफ्ते में राजेश भाई हमारे पास होंगे, ये मेरा वादा है आप सबसे.. उसके बाद ही मे और निशा एक होंगे…
मेरी बात सुन कर सभी मुँह बाए मेरी तरफ देखने लगे…, मेने उनसे कहा – इसमें इतना चकित होने की क्या बात है.. ?
क्या आप भूल गये, बाबूजी ने ऐसे ही कुछ मौकों के लिए मुझे लॉ करने के लिए कहा था…. अब आगे कैसे और क्या करना है वो आप सब मुझ पर छोड़ दीजिए….
अब मे भानु को ही नही, पोलीस को भी क़ानून का वो सबक सिखाउन्गा कि कुछ समय तक याद रखेंगे..
मेरे इतना कहने से सबके चेहरों पर आशा की एक किरण दिखाई देने लगी….!
निशा की रुलाई अब थम चुकी थी, और अब वो अपने मन में एक शांति सी अनुभव कर रही थी.
भाभी ने अपने आँसू पोन्छ्ते हुए मेरे माथे को चूम लिया…., उनके चेहरे से अब चिंता की सारी लकीरें मिट चुकी थी…
जैसे उन्हें अब पूर्ण विश्वास हो गया हो, कि उनका लाड़ला देवर अब सब कुछ ठीक कर देगा..….!
कस्बे में कॉलेज के समय के मेरे बहुत सारे ऐसे दोस्त थे जो किसी के बिना दबाब में आए मेरा साथ देते रहे थे.…
मेने अपनी उन्हीं सोर्स से पता किया कि इस समय मालती और भानु कहाँ हैं…? और क्या कर रहे हैं…?
दो घंटे में ही मुझे उनके बारे मे पता चल गया.
ठीक होने के बावजूद भी भानु ड्रामा कर के शहर के हॉस्पिटल में ही पड़ा हुआ है…
उसकी पत्नी मालती भी शहर में उसके शहर वाले घर पर ही रहती है..
दिखावे के लिए कि वो उसकी सेवा कर रही है.. लेकिन वो दोनो वहाँ ऐश कर रहे हैं…
जब मर्ज़ी होती है, घर आ जाते हैं, जब मर्ज़ी होती है.. हॉस्पिटल में भरती हो जाता है, पैसे और पवर का इस्तेमाल कर के डॉक्टर भी मन मर्ज़ी रिपोर्ट बनाकर दे देता है.
ये इन्फर्मेशन मेरे लिए किसी रामबाण से कम नही थी, बस फिर क्या था, अपनी बुलेट रानी उठाई, जो बेचारी सालों से धूल में पड़ी अपने असली राजा के इंतजार में बस खड़ी थी…,
उसकी सॉफ सफाई की, और निकल लिया शहर की तरफ………………….
शहर का नामी गिरामी सहयोग हॉस्पिटल, जहाँ की डॉक्टर. वीना जैन, निहायत ही सुंदर और परफेक्ट फिगर की मालिकिन, जिसकी शादी को कुछेक ही साल हुए थे…
पति पत्नी दोनो ही इसी हॉस्पिटल में डॉक्टर हैं.., वो इस समय अपने कॅबिन में बैठी मरीजों को चेक कर रही थी…
नंबर बाइ नंबर मरीज आते वो उन्हें चेक करती…और मर्ज़ के मुतविक उन्हें प्रिस्क्रिप्षन लिख देती..
1मे आइ कम इन डॉक्टर…! अगले मरीज़ ने जब अंदर आने की पर्मिशन माँगी.. तो डॉक्टर वीना ने अपनी शरवती आँहें उठाकर आवाज़ की दिशा में देखा…
आगंतुक को देखते ही वो उसकी पर्सनॅलिटी मे जैसे खो ही गयी… 6’2” की हाइट… गोरा रंग.. उँचे कंधे… चौड़ा विशाल सीना. वेल शेप्ड सीने के नीचे का बदन..
लाल रंग की फिटिंग वाली एक टीशर्ट और जीन्स में वो किसी कामदेव की तरह उसके गेट से धीरे-2 उसकी टेबल की तरफ बढ़ रहा था… वो मंत्रमुग्ध होकेर उसकी मर्दानी चाल में खो सी गयी…
एक्सक्यूस मी डॉक्टर ! युवक ने जब उसके सामने खड़े होकर कहा – तो जैसे वो नींद से जागी हो… और झेन्प्ते हुए बोली – यस प्लीज़…,
एर अपने सामने पड़ी चेयर पर बैठने का इशारा करते हुए बोली – व्हाट कॅन आइ डू फॉर यू…मिस्टर्र्र्र्र्र्र्र्ररर…
माइ नेम ईज़ अंकुश शर्मा ! कुछ दिनो से मे एक अजीब से दर्द से परेशान हूँ..
वीना – कहाँ पर है ये पेन…?
अंकुश (मे) – डॉक्टर, वो मेरी नबल के नीचे होता है.. और कभी – 2 इतना तेज होता है जैसे ये मेरी जान ही निकाल देगा…
वीना – चलिए वहाँ चेक-अप टेबल पर लेट जाइए.. और हां अपनी टीशर्ट उतार देना..
मेने अपनी टीशर्ट उतार कर वहीं चेक-अप टेबल के पास पड़े स्टूल पर रख दी…
वीना मेरे शरीर की कसावट और सिक्स पॅक देख कर प्रभावित हुए बिना रह ना सकी…
मे जाकर टेबल पर लेट गया…, वो मेरे बगल में खड़ी हो गयी.. और बोली – अब बताइए.. एग्ज़ॅक्ट्ली कहाँ पर होता है पेन… मेने कहा कि मेरे नबल से कोई एक इंच नीचे से शुरू होता है…
उसने मेरी जीन्स का बटन खोलने को कहा.. तो मेने वो भी खोल दिया… अब वो अपनी नरम-2 नाज़ुक पतली-पतली उंगलियों से मेरी नाभि के इर्द-गिर्द हल्के-2, दबा-2 कर देखने लगी…
फिर वो थोड़ा नीचे को जाने लगी.. और जहाँ से झान्ट के बाल शुरू होते हैं.. जो फिलहाल तो सॉफ मैदान था.. लेकिन कुछ दिन पहले ही सॉफ किया था.. तो उनके ठूंठ निकल आए थे…
वहाँ तक वो अपनी उंगलियों से दबाते हुए मेरे चेहरे के एक्सप्रेशन नोट करती जा रही थी.., उसकी उंगलियों के इशारे से मेरी जीन्स की ज़िप काफ़ी नीचे तक खुल चुकी थी…
उसके दबाते ही मे दर्द में होने का नाटक करने लगता… लेकिन जैसे-2 उसकी उंगलियाँ नीचे को बढ़ रही थी… मेरे फ्रेंची में कसाब भी बढ़ता जा रहा था…जिसे उसने भी नोट किया…
वो अपनी उंगलियों का दबाब डालते हुए नीचे की तरफ बढ़ती जा रही थी, और मुझे पुछ भी लेती कि यहाँ दर्द है.. मे कह देता की, हां यहीं.. हां यहीं…
बीच बीच में वो उस जगह को सहला भी देती, ऐसा करते -2 आख़िरकार उसकी उंगलियाँ मेरे लौडे को छु गयीं.. जो काफ़ी कुछ अपने असली रूप में आ चुका था…
जीन्स की जिप तो कभी की नीचे हो चुकी थी, सो डॉक्टर वीना मेरे फ्रेंची में बने तंबू को बड़ी चाहत भरी नज़रों से देख रही थी…
तंबू पर नज़र गढ़ाए हुए ही उसने अपने लिपीसटिक से पुते होंठों पर जीभ की नोक फिराई….
एक बार उसने एक नशीली सी स्माइल करते हुए मेरी तरफ देखा, और अपनी उंगलियों को मेरे फ्रेंची में सरका कर, ऐन लंड की जड़ में दबाब डालते हुए बोली…
क्या यहाँ भी दर्द होता है…?
मेने आअहह भरते हुए कहा.. आअहह…डॉक्टर ज़ोर से नही, प्लीज़ बहुत दर्द है….
लौडे की जड़ पर उसकी मुलायम पतली-पतली उंगलियों के स्पर्श ने उसके लिए किसी टॉनिक का काम कर दिया, और वो फुल मस्ती में खड़ा हो गया…
अंडरवेर के ऊपर से ही उसके आकर को देखकर डॉक्टर. वीना की आँखों में वासना तैरने लगी, जो धीरे-2 उसके सर पर पहुँच रही थी…
स्वतः ही उसका हाथ मेरे लंड की तरफ जाने लगा, और उसने मेरे लंड को अंडरवेर के ऊपर से ही अपनी मुट्ठी में भर लिया और बोली – क्या यहाँ भी दर्द होता है…
मेने नाटक करते हुए अपना एक हाथ झटके से उसके कूल्हे पर मारा और लगभग अपनी जगह से उठते हुए दूसरे हाथ से उसकी बाजू पकड़ कर कराहते हुए बोला…
आअहह…डॉक्टर… यहाँ ज़्यादा होता है….…..
वो मेरी आँखों में देखकर शरारत से मुस्कराते हुए बोली – नॉटी बॉय… !
और उसने अपने दूसरे हाथ को मेरे सीने पर रख कर दबाब डालकर मुझे लेटे रहने का इशारा किया.. और वो मेरे बालों भरे सीने को सहलाने लगी…
मेरा एक हाथ अभी भी पीछे से उसकी मस्त गद्देदार गान्ड पर रखा हुआ था… जो अब धीरे-2 उसे सहलाने भी लगा था…
वीना का धीरे-2 कंट्रोल छूटता जा रहा था.. वो मेरे फ्रेंची को नीचे सरकाने लगी… और आखिकार उसने मेरे लंड को नंगा कर ही लिया…
मेरे साडे 8” लंबे और मस्त सोट जैसे मोटे, और गोरे लंड की सुंदरता देख कर बुद-बुदाने लगी…
आहह… क्या मस्त है ये…
मेने कहा – क्या..?
वो – यही तुम्हारा हथियार…
मे – आपको अच्छा लगा…?
वो – हां ! बहुत…
मे – तो इसे प्यार करिए ना..डॉक्टर ! अच्छी चीज़ को ज़्यादा देर खुला छोड़ना अच्छी बात नही…वरना किसी और की नज़र में आ गया तो……
नॉटी स्माइल देते हुए, उसने अपने नीचे के होंठ को किनारे पर दाँतों से काटा, फिर वो उसके ऊपर झुकने लगी,
छन-प्रतिक्षण मेरी उत्तेजना बढ़ रही थी, मे नज़र टिकाते उसके चेहरे को ही देख रहा था,
इतने सुंदर और रसीले होंठों को अपने लंड की तरफ बढ़ते हुए देखकर मेरी सारी उत्तेजना सिमट कर लंड में आ गयी…और उसने एक जोरदार झटका मारा…
तभी वीना के होंठ भी वहाँ तक पहुँच चुके थे, सो वो ठुमक कर उसके होंठों पर फिट हो गया…
मुस्काराकार उसने पहले मेरे लंड को चूमा… और फिर उसे मुट्ठी में लेकर आगे-पीछे करने लगी…
मेरे लाल सेब जैसे सुपाडे को देख कर वो बाबली हो गयी और उसने उसे अपने पतले रसीले गुलाबी होंठों में क़ैद कर लिया…
मेने उसकी गान्ड को ज़ोर से मसल दिया… वो मेरी आँखों में देखकर मुस्कराते हुए मेरा लंड चूसने लगी…
मे उठ कर बैठ गया और उसकी 34” की मस्त गोल-गोल मक्खन जैसी मुलायम चुचियों को उसके कसे हुए ब्लाउज और ब्रा से बाहर निकालकर ज़ोर-ज़ोर से दबाने लगा…
कुछ देर वो पूरे मन से मेरा लंड चुस्ती रही…, मेरा हाथ उसकी गान्ड को सहलाते हुए उसकी दरार में भी घूमने लगा…
जब मुझे लगने लगा.. कि इसे अब रोका ना गया.. तो कभी भी मेरा पानी निकल सकता है…, मेने अपने माल को यौंही बर्बाद कभी नही किया था…
सो मेने उसके सर को पकड़ कर अपने लंड से हटाया… वो थोड़ा नाखुशी वाले अंदाज में मेरी तरफ देखने लगी…
मेने उसके होंठ चूमते हुए कहा – बस इतना सा ट्रेलर ही काफ़ी है डॉक्टर अभी के लिए…पूरी फिल्म फिर कभी तसल्ली से देखना…
अभी इसका समय नही है… क्योंकि मुझे ऐसे जल्दबाज़ी में सेक्स करने में मज़ा नही आता..
उसकी आस अधूरी रह गयी… चूत पानी छोड़ने लगी थी… सो अपने हाथ से टाँगें चौड़ी कर के चूत को कपड़ों के ऊपर से ही रगड़ते हुए बोली – कब..दिखाओगे पूरी फिल्म..?
मे – जब आप कहो.. अभी मे थोड़ा अर्जेंट काम से यहाँ आया था… दरअसल मेरा एक फ्रेंड यहाँ अड्मिट है.. मे उसे ही मिलने आया था.. तो सोचा अपनी प्राब्लम भी दिखा डून..
वो मुस्कुराकर अपनी नसीली आँखों को नचाते हुए बोली – लेकिन तुम्हारी प्राब्लम तो मिली ही नही अभी तक..?
मे – कोई बात नही फिर कभी देख लेना.. अभी मुझे आपकी थोड़ी हेल्प चाहिए..
वो – हां ! बोलो ना, तुम्हारी हेल्प कर के मुझे बड़ी खुशी होगी…
फिर मेने उसको भानु के बारे में बताया.. तो वो बोली – कि वो तो वैसे ही यहाँ टाइम पास कर रहा है.. वो तो कब का ठीक हो चुका है…
मेने चोन्कंने की आक्टिंग करते हुए कहा – क्या कह रही हो…? उसके पिताजी बेचारे कितने परेशान हो रहे हैं.. उसकी इस बीमारी को लेकर.. सारा बिज़्नेस चौपट पड़ा है…, क्या आप उसकी रिपोर्ट दे सकती हैं मुझे….?
वो कुछ देर सोचती रही फिर बोली – एक शर्त पर..!
मे – बोलिए.. क्या शर्त है आपकी… हालाँकि मे उसकी शर्त जानता था..
वो मुस्कराते हुए बोली – मुझे वो पूरी फिल्म देखनी है.. जो तुम दिखाने वाले थे…
मे – ऑफ कोर्स ! समय और जगह बता दीजिए.. मे पहुँच जाउन्गा.. आप जैसी हसीना के साथ पूरी फिल्म शूट करने में मुझे भी बहुत खुशी होगी…
फिर वो हँसते हुए अपने कॅबिन से बाहर चली गयी… और 10 मिनिट के बाद जब वापस आई तो उसके हाथ में भानु की फिटनेस रिपोर्ट थी..
मेने वो रिपोर्ट लेकर उसे थॅंक्स बोला… उसने अपना कार्ड मुझे दिया.. और बोली – दो दिन बाद इस नंबर पर कॉल करना.. इंतेज़ार करूँगी…
मेने उसके होंठों पर एक जोरदार किस किया और उसे बाइ बोलकर उसके कॅबिन से बाहर आ गया…
आज तो ऊपरवाला मेरे ऊपर अपनी मेहरवानियों की जैसे बारिश करने पर तुला हुआ था………….
डॉक्टर वीना के रूम से निकल कर मे जैसे ही गलेरी में आया… सामने से मुझे मालती आती नज़र आई… मे थोड़ा इधर – उधर देखते हुए उसकी तरफ बढ़ता रहा…
जैसे ही वो मेरे नज़दीक आई… मेने चहकते हुए कहा… ओह्ह…हाई.. मालती…! व्हाट आ प्रेज़ेंट सर्प्राइज़… तुम यहाँ कैसे…?
वो मुझे एकदम से अपने सामने देख कर हड़बड़ा गयी…. फिर कुछ संभालते हुए बोली – बस ऐसे ही कुछ काम था.. आप यहाँ कैसे..?
मे – तुम्हें तो पता ही होगा… मे अब गाँव में तो रहता नही हूँ, देल्ही में मेने अपना बिज़्नेस सेटप कर लिया है..
उसी सिलसिले में यहाँ आया था.. कि अचानक से कुछ प्राब्लम हो गयी.. तो यहाँ चेक-अप कराने चला आया…
खैर छोड़ो ये सब बातें ! तुम बताओ.. शादी-वादी की या नही…?
वो अपने मन में सोचने लगी.., लगता है इसको गाँव की परिस्थितियो के बारे में कुछ पता नही है…,
सो फटाक से बोली – हां मेरी तो शादी हो गयी.. आप बताओ.. निशा से कब शादी करने वाले हो..?
मेने उपेक्षा भरे लहजे में कहा – ओह .. कम ऑन डार्लिंग… किस बहनजी टाइप लड़की की बात छेड़ दी तुमने…!
मे उसे कब का भूल चुका हूँ.. मेरी अपनी भी लाइफ है यार !… घरवालों के सिद्धांतों से मेरा फ्यूचर थोड़ी ना बनने वाला है..
इसलिए बहुत पहले ही मे सब कुछ छोड़-छाड़ कर देल्ही सेट हो गया हूँ, … अब मुझे उसके बारे में कुछ पता नही है…
और बताओ.. अपनी वो मुलाकात याद आती है तुम्हें या भूल गयी…?
वो – आपने ही तो याद रखने को मना किया था… वैसे वो लम्हे तो मे चाह कर भी नही भूल सकती…
मे – तो फिरसे जीना चाहोगी उन लम्हों को…?
वो मेरी बात सुनकर खुश होते हुए बोली … क्या सच में ऐसा हो सकता है.. ?
मेने कहा – अगर तुम चाहो तो, ज़रूर हो सकता है…
वो एक्शिटेड होते हुए बोली – कब..?… कहाँ…?
मे – अगर समय हो तो आज ही 9 बजे होटेल आशियाना, रूम नंबर. 321 में आ जाओ.. रात भर एंजाय करेंगे..
वो तो जैसे तैयार ही बैठी थी, सो फ़ौरन आने को तैयार हो गयी, और इसी खुशी में झूमती हुई भानु के रूम की तरफ चली गयी…, मे अपनी कामयाबी की खुशी में हॉस्पिटल से बाहर की तरफ चल दिया…
मेने होटेल में ये कमरा सुबह ही बुक करा दिया था…
शहर के चक्कर लगाते – 2 शाम हो गयी… इस बीच मेने ये भी पता लगा लिया.. कि राजेश का केस कोन्सि अदालत और किस मॅजिस्ट्रेट के अंडर में है.
मेने अपने गुरु प्रोफ़ेसर. राम नारायण जी को फोन लगा कर सारा वृतांत कह सुनाया… उन्होने कहा..
चलो अच्छा है.. आगे बढ़ो मेरी शुभ कामनाएँ तुम्हारे साथ हैं..
अपनी जिंदगी के पहले इनडिपेंडेंट केस में तुम सफल रहो, यही कामना है मेरी..
मे – सर मेरी सफलता आपके सहयोग पर डिपेंड करती है.. फिर मेने उन्हें उस जज का नाम बताया जिसके यहाँ इस केस की सुनवाई होनी थी…
उसका नाम सुनकर वो बोले – अरे ये तो अपना लन्गोटिया यार रहा है.. तुम चिंता मत करो.. मे उससे बात कर लूँगा.. वो हर संभव तुम्हारी हेल्प करेगा…
वैसे केस की सफलता या असफलता तुम्हारी अपनी काबिलियत पर ही डिपेंड करेगी..
मे – सर आपका शिष्य हूँ, निराश नही करूँगा.. बस थोड़ी सी इतनी हेल्प मिल जाए की वो मेरे मन मुताविक सुनवाई की डेट दे दे..
वो – वो तो तुम्हें मिल ही जाएगी.. उससे मिल लेना… बेस्ट ऑफ लक…
मेने उन्हें थॅंक्स बोलकर फोन डिसकनेक्ट कर दिया…
रात 8 बजे से ही में अपनी तैयारियों में जुट गया… कमरे में मेने कुछ कैमरे इस तरह से फिट किए कि उनमें मेरी कोई इमेज ना आए और मेरे सेक्स पार्ट्नर को पूरा दिखाया जा सके…
फिर मेने कुछ बीयर मॅंगा कर फ्रीज़र में रखवा दी.. और मालती का वेट करने लगा.. अभी 9 बजे भी नही थे कि डोरबेल बज उठी…
मेने उठ कर डोर खोला… आशानुकूल सामने मालती ही खड़ी थी.. जो इस समय एक वन पीस ड्रेस में थी.. ग्रीन कलर की ड्रेस जिसका एक शोल्डर तो था ही नही..
मालती पहले से भी ज़्यादा सेक्सी हो गयी थी… लंड की मार सहते-2 उसका बदन और ज़्यादा भर गया था, लेकिन सिर्फ़ उन जगहों पर जहाँ एक औरत को ज़रूरत होती है…
36 की बड़ी बड़ी चुचियाँ और 38 की गान्ड इस कसी हुई ड्रेस में मानो उबल ही पड़ रही थी…
मे उसे देखता ही रह गया… मेने एक तरफ को होकर उसे अंदर आने का रास्ता दिया…
डोर बोल्ट कर के उसकी गान्ड पर हाथ रख कर उसे अंदर सोफे तक लाया.. और खड़े-2 एक किस लेकर हम सोफे पर बैठ गये…
मेने उसकी मखमली जाँघ सहलाते हुए कहा – आज तो कुछ ज़्यादा ही हॉट लग रही हो जानेमन… सच कहूँ तो मेरी कामना तुम जैसी हॉट आंड बोल्ड लड़की की थी….मेने उसे चढ़ाते हुए कहा
वो – क्या सच में…! मे आपको बोल्ड और हॉट लगती हूँ..
मे – बहुत…! , अच्छा ये बताओ क्या लेना चाहोगी… कुछ हॉट, या कोल्ड या फिर और कुछ…
वो – आप प्यार से जो भी पिलाएँगे, पी लेंगे जनाब…
मे – तो फिर एक-एक बीयर हो जाए…
वो तपाक से बोली – मुझे कोई प्राब्लम नही है…
उसकी बोल्डनेस देख कर मे हैरान था.. और सोचने लगा कि ये वही मालती है.. गाँव की भोली-भाली… लड़की.
मेने फ़्रीज़ से दो चिल बीयर टीन निकाली, एक उसे ओपन कर के दी, और दूसरी मेने अपने होंठों से लगा कर सीप करने लगा…
मेने दो-चार सीप लेकर, उसे दिखाने के लिए एक सिगरेट सुलगा ली.. और फिर उसे भी ऑफर की…
ये तो कमाल ही हो गया… उसने पॅक से एक सिगरेट निकली जिसे मेने लाइटर से जला दिया..
मेने चुटकी लेते हुए कहा – काफ़ी मॉर्डन हो गयी हो… क्या बात है.. वैसे तुम्हारे पति देव का नाम क्या है.. और वो करते क्या हैं…?
वो मेरा सवाल सुन कर कुछ हड़बड़ा गयी … फिर संभाल कर स्माइल करती हुई बोली – क्या करेंगे जान कर…? आपको मेरे पति से क्या लेना देना… मे हूँ तो सही आपके सामने..
मे सोचने लगा… मछलि काफ़ी होशियार हो गयी है.. कोई नही थोड़ा और रुकते है.. और मे फिर से बीयर सीप करने लगा..
धीरे-2 कर के हम दोनो ने एक-एक तीन ख़तम कर दी.. फिर मेने खाना ऑर्डर कर दिया… खाने के साथ-2 एक- एक बीयर और ख़तम कर दी…
अब वो कुछ नशे में दिखने लगी थी…
हम दोनो अब बेड पर पहुँच गये थे… मेने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे अपनी ओर खींचा और उसके होंठों को चूमते हुए बोला –
वैसे मालती तुम हॉस्पिटल में भानु के कमरे में क्यों गयी थी…?
वो नशे और मदहोशी के आलम में एकदम से बोल पड़ी… वो मेरा पति है.. इसलिए उसके पास तो जाना ही था ना…!
मेने चोन्कने का नाटक करते हुए कहा – क्या..? वो साला गुंडा तुम्हारा पति..है..
वो नशे से बोझिल आँखें तरेर कर बोली– आए मिसटर … ज़ुबान संभाल कर बात करो ! वो मेरा पति है… फिर हहेहहे.. कर के हँसते हुए बोली – वैसे आपने सही कहा.. है तो साला वो गुंडा ही है…
मेने उसकी चुचियों को मसल्ते हुए कहा – लेकिन तुम्हें उससे शादी करने की क्या ज़रूरत पड़ गयी…
इसस्शह….आहह… अंकुसजी…. आपको क्या पता मेने किन मजबूरियों में उस साले हरामी से शादी की…
वो नशे की झोंक में अनाप सनाप गाली बकते हुए बोली
अरे उस मादरचोद के हरामी बाप ने मेरे दादाजी को धमकाया था… कि अगर उन्होने अपनी पोती का व्याह उसके बेटे से नही किया तो वो उनका जीना मुश्किल कर देंगे..
अब वो बेचारे बड़े-बूढ़े आदमी वो भी अकेले… डर गये..और मेरी शादी उस गुंडे से हो गयी… हहेहहे…!
मे – तो इन सब आदतों को भी उसने ही सिखाया होगा तुम्हें…
वो – हां ! वरना मुझे इन सब का क्या पता था, … वो अब नशे में झूमने लगी थी, … उसकी आँखें नशे के कारण बंद होने लगी…,
इससे पहले कि वो अपने होश खोए, मेने उसका ड्रेस निकाल कर उसे सेक्स की तरफ लेजाने की कोशिश शुरू कर दी…….
उसकी ड्रेस निकालते ही बिना ब्रा के उसकी बड़ी-2 चुचियाँ थिरकति हुई मेरे सामने लहरा उठी…
मालती वाकई में पहले से ज़्यादा हॉट हो गयी थी,
उसके दशहरी आमों से खेलते हुए मेने पूछा – अब तुम्हारे दादा-दादी कहाँ रहते हैं…?
आह्ह्ह्ह… वो तो अभी भी गाँव में ही हैं…, थोड़ा और ज़ोर से दबाओ ना …सस्स्सिईइ…हाआंणन्न्, आआयययययीीई….ईीसस्शह…!
मेने उसके कड़क हो चुके निपल मरोड़कर कहा – वो अकेले ही गाँव में हैं…
मेरे निपल मरोडने से वो बिलबिला उठी – आआययययीीई…ज़ोर से नही…हां अब वो बेचारे अकेले ही हैं वहाँ…और कॉन रहेगा…
फिर मेने उसकी पेंटी भी निकाल दी, और उसकी गरम चूत को सहलाते हुए.. अपनी दो उंगलिया उसकी चाशनी से भरी चूत में डाल कर पूछा – तुम तो उनसे मिलने जाती रहती होगी ना…
आहह…………जीजू….क्या बताऊ… उस हरामी ने वहाँ जाने लायक रहने ही नही दिया मुझे.…सीईईईईईई….. हइई…..जल्दी कुछ कारूव….नाआ…बातें बाद में आआययईीीई…..कर लेना…आआ….
मेने अपनी उंगलियों की रफ़्तार थोड़ी बढ़ते हुए पूछा – क्यों ? ऐसा क्या किया उसने…? सवाल दागते हुए मे उसकी चूत में उंगलियाँ अंदर- बाहर करने लगा…
उफफफफ्फ़……..हइईई…. उसने मेरी बेस्ट फ्रेंड निशा के साथ जबर्जस्ती बलात्कार करने की कोशिश की….हाईए… बहुत जालिम है वो हरामी…सआलाआ…आआ…
अब मुझे उससे फाइनल जबाब चाहिए थे… सो उसकी रसीली चूत पर हाथ फेरा और अपने मूसल को उसकी गीली चूत के मुँह पर रख कर रगड़ते हुए बोला…
तो क्या वो उसका बलात्कार कर पाया…?
आहह……….जिजुउुउ थोड़ा अंदर तो करो ईसीए….…. जल्दी…. उईईई…मेरी चुउउउत में चिंतियाँ सी काट रही हैं… प्लीज़….. जल्दी करूऊओ…वाकई बातें बाद मेंन्न…..
मेने अपने सुपाडे को थोड़ा सा उसके छेद के मुँह पर अड़ा कर कहा – करता हूँ… पहले बताओ तो सही, फिर क्या हुआ…?
सस्सिईईई…… नही कर पाया सालाअ…! इससे पहले कि वो कुछ कर पाता…, निशा का भाई वहाँ आ गया… और उसने उसे बचा लिया….!
मेने अपना आधा लंड उसकी चूत में डाल दिया.. और वहीं रुक कर बोला – तो अब वो हॉस्पिटल में क्या कर रहा है..?
वो – सीईईईईईईईईईई… उऊहह….बहुत बड़े जालिम हो जीजू… भेन्चोद.. चोद ना मुझे…. सीईईई.… आअहह….रोक क्यों लियाआअ….पूरा तो डालूओ…
मेने अपना लंड पूरा डालने की वजाय, उल्टा सुपाडे तक बाहर खींच लिया और उतना ही डाले हुए बोला – आगे बता ना साली रंडी… बोल ना वो मादरचोद अब भी हॉस्पिटल में क्या कर रहा है..?
मालती की चूत में आग लगी हुई थी, उसे एक-एक क्षण भारी लग रहा था, सो जल्दी से बातों का सिलसिला ख़तम करना चाहती थी…
अब जल्दी से जल्दी मेरे सवाल ख़तम हों इसलिए वो बिना हिचकिचाए बोली –
आहह…. उन दोनो की हाथापाई में उसका खुद का चाकू उसको लग गया और वो घायल हो गयाआ…आआईयईई…..धीरे…. झटके से लंड अंदर जाते ही वो बिलबिलाई…
मेने उसे दो चार तगड़े से धक्के मार कर फिर पूछा… तो क्या वो अब तक घायल ही है… ठीक नही हो पाया…इतने दिनो में ?
आहह… अब तो नाटक कर रहा है… मदर्चोद..ऊद्द्द….सीईईईई….… भोसड़ी का बहुत हर्राामी हाीइ….सीईईई…डालो ना….
मेने धक्के लगाते हुए पूछा – क्यों..? अब नाटक क्यों कर रहा है..?
वो – सस्सिईईई….आअहह… ताकि निशा के भाई को जमानत ना मिले….उफफफ्फ़ माआ…. हाइईईई…ज़ोर से कारूव….उूउउ…आययईीीई…
अब मुझे लगभग मेरे सवालों के जबाब मिल चुके थे…
सो मेने उसको अच्छी तरह से जमकर चोदा… वो भी किसी चुदाई मशीन की तरह कमर धकेल-धकेल कर जबरदस्त तरीक़े से चुदाई और बीयर की मस्ती में चूर चुदने लगी…
30 मिनिट तक धमाल चुदाई के बाद मेने उसकी चूत को अपने लंड के पानी से भर दिया…इतनी देर में मालती दो बार झड़कर मस्त हो गयी थी…
कुछ देर बाद फ्रेश होकर वापस हम पलंग पर आ गये… वो मेरी गोद में ही बैठी थी… मेने उसके बड़े-2 कलमी आमों से खेलते हुए पूछा-
मालती मुझे अब सारी बातें डीटेल में बताओ, तुम्हारी शादी भानु से किन हालातों में हुई, उसने ये हरकत निशा के साथ क्यों की… और ये भी की तुमने उसका साथ क्यों दिया…
वो – आप ये सब क्यों जानना चाहते हो… आपको तो उन लोगों से अब कोई मतलव नही है ना.. ! फिर !
मे – अगर मत्लव होता तो नही बताती…? इसका मतलब तुम मुझसे बस सेक्स तक का ही रिश्ता मानती हो…!
देखो मालती मे जानता हूँ.. ये सब तुमने अपनी मर्ज़ी से नही किया है, .. मे बस ये जानना चाहता हूँ.. कि ऐसी क्या बात थी जो ये सब हुआ…!
मे चाहता हूँ, कि फ्यूचर में भानु तुम्हें इस तरह से इस्तेमाल ना करे, और एक अच्छे पति की तरह ही बर्ताव रखे, इसके लिए मेरा सच जानना ज़रूरी है,
मेरी बात से वो कुछ देर सोच में पड़ गयी, लेकिन फिर कुछ सोच कर कहने लगी
– वैसे भानु अब मेरा पति है.. चाहे जैसा भी हो…, लेकिन सच कहूँ तो मे आपसे कोई बात चाह कर भी छुपा नही सकती..,
क्योंकि जो सुख आपने मुझे दिया है, वो मेरा पति शायद ही अपने जीवन में कभी दे पाए, इसलिए मे आपको सब कुछ सच-सच बताती हूँ…
बात आज से एक साल पहले की है… एक दिन मेरे दादा के पास ठाकुर सुर्य प्रताप आए.. और उन्होने अपने बेटे के लिए मेरा हाथ माँगा…,
दादाजी जानते थे कि उनका बेटा कैसा है.. और वो खुद भी कोई अच्छी छवि नही रखते थे.. सो उन्होने शादी करने से मना कर दिया…
उनकी ना सुनकर सूर्य प्रताप भड़क गये.. और उन्होने दादाजी को ताबड करने की धमकी दे डाली, और कहा – कि अगर तुम्हारी पोती की शादी मेरे बेटे से नही हुई.. तो वो किसी और से भी नही होने देगा…
दादा जी ने हथियार डाल दिए और हमारी शादी हो गयी… कुछ दिन तो हसी खुशी से निकल गये, लेकिन कुछ ही महीनों बाद भानु अपना रंग दिखाने लगा.. मेरे साथ मनमानियाँ करने लगा…
धीरे-2 कर के उसने मुझे भी नशे की आदत लगा दी.. फिर एक दिन हम दादा-दादी से मिलने गाँव आए हुए थे…
निशा मुझसे मिलने आई हुई थी… उसके बाद एक दिन उसने मुझे कहा कि तुम अपनी सहेली निशा से मेरे संबंध कर्वाओ.. मेने ना-नुकुर की, तो वो मुझे मारने पीटने लगा…
धमकी दी कि अगर मेने उसकी बात नही मानी तो वो मुझे तलाक़ देकर किसी कोठे पर बिठा देगा..
मेने जब ये कहा कि मे उससे ये सबके लिए नही बोल सकती.. तो फिर उसने ये प्लान बनाया, कि तुम उसे चाइ में नशा मिलकर पिला देना, और कुछ देर के लिए घर से गायब हो जाना, वाकी मे देख लूँगा…
मे – लेकिन वो ये सब करना क्यों चाहता था… निशा ही क्यों…?
वो – मुझे भी शक़ हुआ और मेने उसे पूछा भी… तो उसने मुझसे बस इतना ही कहा.. कि ऐसा करने से उसको बहुत बड़ा फ़ायदा होने वाला है.. लेकिन क्या ये नही बताया…
लेकिन जीजू…प्लीज़ ये बातें भानु को पता ना चले, वरना वो मुझे कहीं का नही छोड़ेगा…
मेने उसके होंठ चूमकर कहा – मेरा विश्वास करो मालती, आइन्दा भानु तुम्हें एक पत्नी का सम्मान ही देगा…
फिर मेने टॉपिक चेंज कर दिया और उसको सेक्स की तरफ मोड़ कर उसके साथ जम कर सुबह तक मस्ती की, उसकी अच्छी तरह से भूख शांत कर के, सुवह उसको घर विदा कर दिया….!
…………………………………………………………………………………………..
आज सनडे था, कोर्ट की तो छुट्टी थी, सुवह होटेल में फ्रेश हुआ.. चाय नाश्ता कर के… 10 बजे जस्टीस ढीनगरा जो राजेश का केस देख रहे थे.. उनके बंगले पर पहुँचा….
गेट पर प्रोफ़ेसर. राम नारायण जी का रेफरेन्स देकर अपना कार्ड दिया…
वो उनसे बात कर चुके थे, सो मेरा कार्ड देखते ही उन्होने मुझे अंदर बुलवा लिया…
मेने उन्हें सारी बातें डीटेल में बताई… उन्होने मुझे दो दिन बाद की बेल की सुनवाई की डेट देने का प्रॉमिस कर दिया….!
जस्टीस ढीनगरा के यहाँ से निकल कर, मेने एक वकालत नामा तैयार किया और चल दिया सेंट्रल जैल की तरफ…
जेलर को अपना परिचय दिया और उससे राजेश से मिलने का समय माँगा…
जैसे ही राजेश भाई मेरे सामने आए… मे उन्हें देखता ही रह गया…
क्या हालत हो गयी थी बेचारे की… आँखें सूजी हुई थी… उनके नीचे काले-2 निशान बनने लगे थे.. और वो गड्ढे से में धँस चुकी थीं…
राजेश मुझे अपने सामने देख कर भावुक हो गया… मेने उसके कंधे पर हाथ रखकर हौसला बनाए रखने के लिए कहा….
मेने वकालत नामे को उसके सामने रखते हुए कहा – राजेश भाई… आप इस पर साइन कर दीजिए…
राजेश – ये क्या है… अंकुश जी…?
मे – ये मेरा वकालत नामा है… आज से मे आपका केस लड़ रहा हूँ.. ?
वो – आप ! आप मेरा केस लड़ेंगे…?
मे – क्यों..? मेने भी वकालत की है…! क्या आपको मेरे ऊपर भरोसा नही है…?
वो – ऐसी बात नही है.. अंकुश जी, असल में मुझे अब आशा की कोई किरण ही नज़र आती दिखाई नही दे रही थी… सो इसलिए पुच्छ लिया… सॉरी !
मे – अब आप सारी चिंताएँ मुझ पर छोड़ दीजिए… बस दो दिन और.. उसके बाद आप खुली हवा में साँस ले रहे होंगे…
वो अविश्वसनीय नज़रों से मुझे देखने लगे… मेने कहा – मे सही कह रहा हूँ…, दो दिन बाद हम सभी एक साथ बैठे होंगे… विश्वास कीजिए मेरा..
वो – मुझे तो ये सपना सा ही लग रहा है… क्या सच में मे दो दिन बाद आज़ाद हो जाउन्गा…?
मे – पूरी आज़ादी मिलने में कुछ वक़्त ज़रूर लग सकता है… लेकिन दो दिन बाद आप जैल में तो नही होंगे… ये पक्का है.
उनको हौसला देकर मे अपने घर लौट आया…
शाम को हम सब एक साथ बैठे हुए थे… अभी तक घर में किसी को कुछ पता नही था कि बीते दो-तीन दिन में मे कहाँ और क्या कर रहा था…
बस उनको ये भरोसा ज़रूर था कि मे जो भी कर रहा हूँ.. वो राजेश की रिहाई से संबंधित ही होगा…
मेने बात शुरू की – भैया ! दो दिन बाद राजेश भाई की बैल की हियरिंग है… मे चाहता हूँ.. आप सब लोग उस समय अदालत में उपस्थित हों…
भैया – क्या..? इतनी जल्दी डेट भी मिल गयी..?
मे – हां ! मेने आप लोगों को एक हफ्ते का समय दिया था, तो ये सब करना तो ज़रूरी ही था !
भैया – लेकिन वो जड्ज तो बहुत नलायक था, हमें तो उसने मिलने तक का समय नही दिया था…!
मे – भैया ! कुछ चीज़ें क़ानूनी दाव पेंच से ही संभव हो पाती हैं..!
पिताजी – तुम्हें क्या लगता बेटा ! राजेश को बैल मिल जाएगी…?
मे – अपने बेटे पर भरोसा रखिए बाबूजी..! दुनिया का कोई क़ानून अब उन्हें जैल में नही रख पाएगा…!
मेने ऐसे – 2 एविडॅन्स इकट्ठा कर लिए हैं.. कि अगर अदालती प्रक्रिया अपने सिस्टम के हिसाब से ना चलती होती तो सीधे केस ही ख़तम हो जाता…इसी डेट को.
भाभी अपना आपा खो बैठी… उन्होने मेरे पास आकर मेरा माथा चूम लिया… और रोते हुए बोली – मुझे तुम पर नाज़ है लल्ला… माँ जी की आत्मा तुम्हें देख कर आज कितनी खुश हो रही होगी..
मेने उनके आँसू पोन्छते हुए कहा – नाज़ दो दिन बाद करना भाभी… जब आपके भाई आपके साथ होंगे…
रात को भाभी मेरे लिए दूध लेकर कमरे मैं आईं…साथ में निशा भी थी.
भाभी मेरे पास बिस्तर पर बैठ गयी… निशा उनके बाजू में खड़ी रही…
मेने भाभी के हाथ से दूध का ग्लास लेकर निशा से सवाल किया – निशा ! तुम्हें ठीक से याद है वो वाक़या…?
वो नज़र नीची किए हुए बोली – हां मुझे आज भी अच्छे से याद है,… उन मनहूस पलों को भला कैसे भूल सकती हूँ मे.. !
मे – तो एक बार याद कर के बताना… जब राजेश भाई और भानु के बीच हाथापाई हो रही थी,… तो क्या कभी भी ऐसा मौका आया था जब चाकू उनके हाथ लगा हो…?
वो – नही ! मुझे तो एक बार भी नही दिखा कि भैया का हाथ कभी भी उसके चाकू पर गया हो… वो तो उसकी कलाई ही पकड़ कर उसके हाथ को अपनी तरफ आने से रोकते रहे थे…
मे सोच में पड़ गया… की पोलीस का ध्यान इस तरफ क्यों नही गया…? चलो मान लिया कि पोलीस ठाकुर के दबाब में आ गयी… लेकिन भैया तो एसपी हैं.. उन्होने इस तरफ ध्यान क्यों नही दिया..?
मुझे सोच में डूबे हुए देख कर भाभी बोली – किस सोच में डूब गये लल्ला..?
मे – अच्छा भाभी ! एक बात बताइए… उस हादसे के बाद कृष्णा भैया यहाँ आए थे…?
भाभी – एक बार आए थे… तुम्हारे भैया के बुलाने पर…
मे – तो उनका व्यवहार इस केस को लेकर कैसा लगा…? आइ मीन वो मदद करना चाहते थे या कुछ और..? क्योंकि आप तो लोगों की साइकोलजी अच्छे से जान लेती हैं…
भाभी – शुरू में तो लगा कि वो इस मामले में मदद करना चाहते हैं… थोड़ी बहुत भाग दौड़ भी की थी, … कुछ उनकी बातों से लगा भी कि बात बन रही है…फिर…
मे – फिर..! फिर क्या हुआ भाभी…?
भाभी – शाम को जब यहाँ उस विषय पर बातें हो रही थी.. कि आगे क्या और कैसे करना है कि तभी उनको एक फोन आया… बातों से लगा कि शायद कामिनी का ही था…
वो हमारे पास से उठ कर फोन पर बात करते हुए बाहर निकल गये… जब वापस अंदर आए… तो उनका रुख़ बदला हुआ सा था…!
मे – तो क्या उन्होने आगे मदद करने के लिए मना कर दिया था…?
भाभी – सीधे -2 तो नही.. पर घुमा फिरा कर उन्होने जता दिया की अब बहुत देर हो चुकी है…, मामला अदालत में पहुँच चुका है, पोलीस अब इस मामले में कुछ नही कर सकती…!
फिर थोड़ा और कुछ इधर उधर की बात कर के भाभी उठ खड़ी हुई और बोली – तुम दोनो बात करो.. मे चलती हूँ… तुम्हारे भैया राह देख रहे होंगे…
मे मज़ाक करते हुए बोला – हां भाभी ! जल्दी जाओ, भैया बेचारे बैचैन हो रहे होंगे.., पता नही उनकी खूबसूरत बीवी कहाँ चली गयी…?
भाभी ने हँसते हुए मेरे गाल पर चिकोटी ली और बोली – शैतान… ! कितने बेशर्म हो गये हो.. अपने भैया के लिए ऐसा बोलते हो…?
मेने हँसते हुए कहा – इसमें मेने कुछ ग़लत कहा…? आप सुन्दर नही हो…?
कहो तो मे भैया को बोलकर आपसे शादी कर लेता हूँ.. क्यों निशा तुम्हें कोई प्राब्लम तो नही है ना..?
निशा नज़र झुकाए, मंद-मंद मुस्कराते हुए बोली – देवेर भाभी के बीच, मे कुछ नही बोलने वाली…
मेरी बात सुनकर भाभी बुरी तरह शर्मा गयी… और हँसते हुए कमरे से बाहर चली गयीं……
भाभी के जाते ही मेने निशा का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया… वो झटके से मेरी गोद में आ गिरी…
मेने उसके रसीले होंठों को चूमते हुए कहा – कितनी कमजोर हो गयी हो जान ! मुझे माफ़ कर देना… तुम इतना दुख झेलती रही और मुझे पता तक नही चलने दिया…!
वो – आप आ गये… अब मुझे कोई दुख नही है…! जो आप हमारे लिए कर रहे हैं… उसका एहसान कैसे चुका पाएँगे हम लोग…?
मे – एक थप्पड़ लगाउन्गा अगर एहसान-वहसान की बात की तो… क्या मुझे अपने से अलग समझती हो…?
भैया तो कितना भाग दौड़ कर रहे हैं.. तो क्या वो कोई एहसान कर रहे हैं किसी पर ?
वो रुआंसी सी होकर बोली – सॉरी जानू… मुझे माफ़ करदो… प्लीज़ … मुझे पता नही था की आप हम लोगों से इतना प्यार करते हैं…!
मेने उसके गाल पर अपनी नाक रगड़ते हुए कहा – हम सब तुमसे बहुत प्यार करते हैं.. ऐसा नही होता तो आज राजेश भाई जैल में क्यों होते…?
क्या उन्होने कोई एहसान किया तुम्हारे ऊपर.. ये एक प्यार ही तो था…उनका बेहन – भाई वाला प्यार, और मेरा अपनी जानेबहार वाला… !
खैर अब तुम बिल्कुल फिकर मत करो…मे सब कुछ ठीक कर दूँगा… और उन लोगों को भी अच्छा सबक सिखा दूँगा… जिन्होने मेरे अपनों को इतने दुख दिए हैं…!
मेने निशा को और ज़ोर से कसते हुए उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए… उसने अपनी आँखे बंद कर ली थी…
एक बात करनी थी तुमसे जान ! मेने उसको बोला, तो वो अपनी आँखें खोलकर मेरी ओर देखते हुए बोली… क्या..?
मे – मानलो अगर कल को तुम्हें ये पता चले, कि मेरे शारीरिक संबंध किसी और के साथ भी हैं तो तुम कैसे रिक्ट करोगी…?
वो मेरे सीने के बालों में अपनी उंगलियाँ घूमाते हुए बोली – मुझे सब पता है… !
सच कहूँ तो आपने वो संबंध अपनी भूख मिटाने के लिए नही बनाए हैं, … बल्कि उनकी ज़रूरत पूरी करने के लिए बनाए हैं…मे सही कह रही हूँ ना..!
मेने आश्चर्य से उसे देखते हुए पूछा – तुम्हें कैसे पता…?
वो मेरी आँखों में शरारत से देखते हुए बोली– आप क्या समझते हैं… भाभी देवर ही आपस में घुल-मिल सकते हैं…? बहनें नही..?
दीदी ने मुझे आपकी सारी बातें बता दी हैं.. !
उनका मानना हैं कि रिश्तों में सच्चाई बनाए रखना उनकी मजबूती की नीव होती है,…आप बेफ़िक्रा रहिए, मुझे आपकी पर्सनल लाइफ से कोई प्राब्लम नही..बस मुझे मेरे हिस्से का प्यार देते रहना…
इतना कहकर उसने मेरे चुचकों को सहला दिया…
मे मुँह फाडे उसकी बातें सुनता रहा… जब वो चुप हुई तो मेने उसे अपने सीने से लगाकर बोला…
ओह..निशु… इतना भरोसा करती हो मुझ पर…! सच में तुम दोनो ही बहनें महान हो… हम लोग कितने भाग्यशाली हैं.. जो तुम हमें मिली हो…
बातों के दौरान मे उसके पेट को सहला रहा था, जो अब धीरे-धीरे ऊपर को बढ़ता जा रहा था…
निशा भी मेरी छाती, और गले पर सहला रही थी…
फिर जैसे ही मेरे हाथ उसके संतरों पर पहुँचे, उसने झट से मेरे हाथों को रोक दिया, और एक नसीली मुस्कान के साथ बोली…
जानू ! एक रिक्वेस्ट हैं, अगर मानो तो,
मे उसकी तरफ सवालिया नज़रों से देखने लगा तो वो बोली – अब इतने दिन इंतेज़ार किया है, तो कुछ दिन और सही…
मे शरीर की सारी ज़रूरतों का अनुभव उस रात को ही पाना चाहती हूँ….!
उसकी मासूमियत भरी बात सुनकर मुझे उसपर इतना प्यार उमड़ा की मेने उसे कसकर अपने आलिंगन में भर लिया, और एक प्यार भरा चुंबन लेकर कहा –
अपनी जानेमन की हर इक्षा का सम्मान करना मेरा फ़र्ज़ है, ये कहकर मेने उसे अपनी गोद से उतारते हुए कहा – अब तुम जाओ और जाकर निश्चिंत होकर सो जाओ…
बस दो दिन और, उसके बाद अब हम एक दूसरे के साथ शादी के बंधन में बंधने के बाद ही मिलेंगे…
…………………………………………………………………..
आज राजेश भाई की बैल की सुनवाई थी,… जस्टीस ढीनगरा के कोर्ट ने नोटीस जारी कर के पोलीस और दोनो पक्षों को बता दिया था…
पोलीस और ठाकुर को अचानक से इतनी जल्दी डेट मिलने की अपेक्षा नही थी.. लेकिन कोर्ट के आदेश को टालना किसी के बस में नही था.. सो उन्हें राजेश को कोर्ट में हाज़िर करना ही पड़ा…
सरकारी वकील ने वही रटी रटाई दलीलें पेश की जो पहले ही पोलीस ने दे रखी थी…
मेने अपना वकालत नामा कोर्ट के सामने पेश करते हुए अपने आप को राजेश का वकील के तौर पर परिचय दिया,
मेरी उम्र देखकर सरकारी वकील के चेहरे पर उपेक्षित सी स्माइल आ गयी…
मेने सरकारी वकील से सवाल पुछ्ने के उद्देश्य से कहा – मी लॉर्ड ! मे सरकारी वकील से कुछ सवाल करना चाहूँगा…
जड्ज साब की पर्मिशन ग्रांट होते ही मेने पूछा – आपके पास ऐसा कोई सबूत है जो ये साबित कर सके कि भानु प्रताप को चाकू मेरे मुवक्किल राजेश ने ही मारा था…
वो (सरकारी.वकील.) – ये कैसा सवाल हैं मी लॉर्ड ! जबकि पोलीस रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा है.. , अभी इस सवाल का कोई मतलव नही है मी लॉर्ड !
मे – मी लॉर्ड ! रिपोर्ट में कहीं ये नही लिखा है कि राजेश ने चाकू से भानु प्रताप पर वार किया था…!
सरकारी.वकील. – मी लॉर्ड ! मौकाए वारदात पर अपराधी की बेहन मौजूद थी, और भानु प्रताप की पत्नी ने उन्हें घायल अवस्था में पाया, तभी तो उन्होने शोर मचाकर लोगों को इकट्ठा किया..
मे – मी लॉर्ड ! मे सरकारी वकील की बात से इतेफ़ाक़ रखता हूँ, चस्म्दीद के तौर पर केवल मेरे मुवक्किल की बेहन ही मजूद थी…
लेकिन उन्होने अपने बयान में ये कहीं नही कहा है, कि राजेश ने ही भानु प्रताप पर वार किया था.…
ये भी तो हो सकता है कि चाकू से भानु ने मेरे मुवक्किल पर वार किया हो और उन्होने सिर्फ़ अपना बचाव किया हो, जैसा कि मिस निशा अपने बयान में कह चुकी हैं…
इसी हाथापाई में भानु का चाकू खुद उसके पेट में घुस गया हो…!
सरकारी वजिल – मी लॉर्ड ! मेरे फाज़िल दोस्त अब एक नयी कहानी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो शायद ये नही जानते कि अदालत के फ़ैसले कहनियों से नही सबूतों के आधार पर दिए जाते हैं…
मेने तुरंत कहा – मे भी यही कहना चाहता हूँ मी लॉर्ड ! पोलीस द्वारा बनाई गयी कहानी को सच साबित करने के लिए कुछ सबूतों की ज़रूरत पड़ेगी, जो मुझे अभी तक देखने को नही मिले…
अतः मे कोर्ट का ध्यान उन्हीं सबूतों की तरफ ले जाना चाहता हूँ,
इसलिए अब मे कोर्ट से दरखास्त करूँगा कि उस दौरान की मेडिकल रिपोर्ट, मौकाए वारदात पर लिए गये फोटोस और चाकू पर मिले फिंगर प्रिंट्स अदालत में पेश किए जाएँ…!
मेरी बात सुनकर कोर्ट रूम में ख़ुसर-पुसर होने लगी…
जड्ज साब ने ऑर्डर ! ऑर्डर बोल कर सबको शांत किया… और सरकारी वकील से बोला – यस मिस्टर. सरकारी वकील.. ये सारे सबूत अभी तक कोर्ट में पेश क्यों नही हुए..?
अभी इसी वक़्त ये सारे सबूत अदालत में पेश किए जाएँ…
सरकारी वकील ने पोलीस इनस्पेक्टर की तरफ देखा.. तो वो बग्लें झाँकने लगा.. आख़िरकार कोई जबाब नही मिला तो वो बोला…
मे लॉर्ड… दुर्भाग्य वश.. पोलीस उस समय चाकू से फिंगर प्रिंट्स तो नही ले पाई..
लेकिन ये कुछ मौकाए वारदात के फोटोस और मेडिकल रिपोर्ट है.. जिसे उसने जड्ज के सामने पेश कर दिया…
मेने जड्ज साब से वो दोनो चीज़ देखने के रिक्वेस्ट की तो उन्होने अपने अरदली के हाथों मुझ तक भिजवाई…
मेने वो रिपोर्ट और फोटो को गौर से देखा… उसे देख कर मेरे चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गयी…
मेने फोटो से नज़र हटाकर जड्ज साब से कहा – मी लॉर्ड ! कैसी हास्यास्पद बात है…….
हम यहाँ एक संगीन जुर्म, अटेंप्ट तो मर्डर के ऊपर बहस कर रहे हैं.. जिसमें एक व्यक्ति के दोषी या निर्दोष साबित होने पर उसकी पूरी जिंदगी निर्भर करती है…
इतना संगीन जुर्म होने के बावजूद भी, पर्याप्त सबूत इकट्ठे करने चाहिए थे
वो भी पोलीस द्वारा नही किए गये…
इस्तेमाल में लिए गये वेपन से फिंगर प्रिंट्स नही लिए गये…इसको आप क्या कहेंगे…? पोलीस की काम करने की क्षमता या उदासीनता…या फरीक से मिली भगत…?
ऐसा लगता है, जैसे सारी बातों को दरकिनार करते हुए, पोलीस का ध्यान सिर्फ़ मेरे मुवक्किल को सज़ा दिलाना ही था…
मेरी बात सुनकर सरकारी वकील और पोलीस इनस्पेक्टर नज़रें चुराने लगे…! अपनी झेंप मिटाने के लिए वो जड्ज साब से बोला –
ऑब्जेक्षन मी लॉर्ड, मेरे काबिल दोस्त बिना वजह पोलीस की कार गुजारी पर शक़ कर रहे हैं…!
जड्ज साब को मेरी दलील सही लगी, इसलिए उन्होने कहा – ऑब्जेक्षन ओवर-रूल्ड…
सरकारी वकील, खिसियानी शकल लेकर अपनी सीट पर बैठ गया…
मेने आगे कहा – खैर मी लॉर्ड ! अब जो बात हुई ही नही उस विषय पर मे समय बरवाद नही करूँगा, पर जो मौजूद है उसी से मे कोर्ट का ध्यान इस फोटो पर आकर्षित करना चाहता हूँ…
फिर मेने उस फोटो को एक प्रोजेक्टर के ज़रिए कोर्ट रूम की बड़ी सी स्क्रीन पर लगाया जिससे वहाँ मौजूद सभी लोग देख सकें…
मी लॉर्ड ! गौर कीजिए.. ! भानु के पेट मे जो चाकू घुसा हुआ है.. उसका डाइरेक्षन ऊपर से नीचे की तरफ है… जबकि आम तौर पर जब कोई सामने से वार करता है तो वो कभी भी ऊपर से पेट पर वार नही कर सकता,
पेट पर वार वो अपने सामने से ही कर पाएगा, और उस स्थिति में चाकू या और कोई हथियार एग्ज़ॅक्ट्ली हॉरिज़ॉंटल स्थिति में ही हो सकता है…
क्या मेरे काबिल दोस्त ने कभी किसी पर इस तरह से वार किया है…?
मेरी बात सुनकर दर्शक दीर्घा में हँसी फैल गयी… और सरकारी वकील झेंप कर रह गया…
मेने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा – इससे सॉफ जाहिर होता है मी लॉर्ड !.. कि वार सामने से नही बल्कि घायल की खुद की बॉडी की तरफ से यानी ऊपर से हुआ है..
जो एक ही सूरत में संभव है.. कि घायल के खुद के हाथ में वो वेपन रहा होगा…
और सामने वाले व्यक्ति ने उसकी कल्लाई थामकर अपना बचाव किया हो, उसी कसम कश में भानु का हाथ नीचे आया होगा और खुद को घायल कर लिया…
मेरी दलील सुनकर सरकारी वकील और इंस्प्रेक्टोर के तोते उड़ गये.. वहीं पब्लिक दीर्घा में तालियाँ बजने लगी…
मेने आगे कहा – मी लॉर्ड… रिपोर्ट में किसी भी चस्म्दीद के बयान में ये नही है कि चाकू किसने मारा सिवाय भानु के,
जो अभी भी घायल होने का नाटक कर के हॉस्पिटल में पड़ा है.. जिससे मेरे मुवक्किल को बैल ना मिल सके..
सरकारी.वकील – ये आप किस बिना पर कह सकते हैं कि वो घायल नही है और नाटक कर रहा है…?
अब मेने फाइनल हथौड़ा मारते हुए कहा – ये मे नही कह रहा हूँ मी लॉर्ड ! ये उस हॉस्पिटल की रिपोर्ट बता रही है..
फिर मेने डॉक्टर. वीना से प्राप्त की हुई रिपोर्ट को हवा में लहराते हुए कहा – इस रिपोर्ट के मुताविक.. वो घटना के 15 दिन बाद ही पूरी तरह से ठीक हो चुका था..
और वैसे भी इस फोटो में चाकू की स्थिति साफ-साफ बता रही है, कि जख्म ज़्यादा गहरा नही होना चाहिए…
मेने वो फिटनेस रिपोर्ट कोर्ट को सममित कर दी… मेने फिर कहा – मी लॉर्ड ! इस केस में पोलीस की मिली भगत साफ-2 दिखाई दे रही है..
क्योंकि जो एविडेन्स इकट्ठा करने चाहिए थे वो कोर्ट को नही दिए गये.. और वहीं फरीक और पोलीस ने मिलकर मेरे मुवक्किल को चीट कर के उसकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया है…
कोई भी भाई अपनी बेहन की इज़्ज़त की रक्षा के लिए जो कर सकता है मेरे मुवक्किल ने वही किया,… मेरी नज़र में अपराधी राजेश नही भानु है…
अतः.. मेरी कोर्ट से द्रखास्त है.. कि मेरे मुवक्किल को शीघ्र से शीघ्र बैल देकर जमानत पर रिहा किया जाए..
और पोलीस के खिलाफ मेरे मुवक्किल के साथ जानबूझकर नाइंसाफी करने के कारण मान हानि का केस दर्ज किया जाए..
जिसकी वजह से या मे तो कहूँगा, भानु का साथ देने के कारण मेरे मुवक्किल को इतने महीने जैल में काटने पड़े..
कोर्ट रूम में कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा.. जस्टीस ढीनगरा कुछ लिखते रहे फिर उन्होने राजेश को बैल पर रिहा करने का आदेश पारित कर दिया.. और पोलीस को आगे के लिए उचित सबूत मुहैया करने की हिदायत दी.
मेरे और निशा के घरवालों के चेहरे खुशी से चमक रहे थे, खुशी से सबकी आँखें छलक आईं…
कोर्ट रूम से बाहर आकर सबने मुझे गले से लगाकर आशीर्वाद दिया…बाबूजी मेरी पहली कामयाबी से बहुत खुश थे…
मुझे अपने गले लगा कर बोले – तूने मेरी ज़िम्मेदारियों को आज पूरा कर दिया… मुझे नही पता था, मेरा बेटा इतना काबिल है…!
भैया ने भी मेरी बहुत तारीफ़ की… भाभी की खुशी की तो कोई सीमा ही नही थी… उन्होने अपनी बरसती आँखों से मेरे माथे को चूम कर अपना प्यार जताया.
राजेश और उनके माता-पिता की आँखो में मेरे प्रति कृताग्यता के भाव साफ-साफ दिखाई दे रहे थे…
फिर खुशी – 2 हम सब अपने घर की ओर लौट लिए…. …………….
आज हमारे घर पर भाभी के माता-पिता और राजेश सहित सभी लोग मौजूद थे, इसी मौके पर बाबूजी ने जिकर चलाते हुए कहा….
समधी जी… अंकुश के आने के बाद हमने उससे शादी की बात चलाई थी, तो उसने कहा था.. कि निशा का भाई जब तक अपनी बेहन को विदा नही करेगा वो शादी नही करेगा…
अब राजेश को जैल से बाहर निकाल कर उसने तो अपना वादा पूरा कर दिया है,.. तो अब क्यों ना हम भी अपना वादा पूरा करदें..!
निशा के पापा – समधी साब ! इसके लिए हमें पूछ कर आप शर्मिंदा मत करिए…
निशा अब आपकी बेटी, बहू जो भी आप समझें आपकी अमानत है… आप जब, जिस तरह से आदेश देंगे हम दोनो उसका कन्यादान कर देंगे…!
बाबूजी – तो फिर शुभ काम में देरी नही करनी चाहिए… क्यों ना आज ही पंडितजी को बुलाकर शुभ मुहूर्त निकलवा लिया जाए…
वो –बहुत ही नेक विचार है आपका…!
तभी भाभी ने निशा की तरफ देखते हुए कहा, लेकिन बाबूजी, इसकी शक्ल देख कर तो लगता नही कि ये इस शादी से खुश है…!
भाभी के मुँह से ये शब्द सुनते ही, वो तुरंत बोल पड़ी, नही.. नही दीदी, मे बहुत खुश हूँ…, उसकी बात सुनते ही सभी ठहाके लगाकर हँसने लगे…
वो बेचारी बुरी तरह झेंप गयी, और भागकर कमरे में चली गयी…
मुस्कराते हुए भाभी ने मुझे इशारा किया, तो मे वहाँ से उठाकर उसके पीछे-2 चला गया, वो दरवाजे की तरफ पीठ कर के खड़ी थर-थर काँप रही थी,
मेने पीछे से उसे बाहों में भर लिया, वो और ज़्यादा काँपने लगी, फिर मेने जैसे ही अपने तपते होंठ उसकी गर्दन पर रखे…
वो बुरी तरह से सिहरकर पलटी और मेरे शरीर से लिपट गयी, उसने अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया…!
मेने बड़े प्यार से उसके चेहरे को उठाया, वो पलकें झुकाए खड़ी रही..
जब मेने उसके कान की लौ को चूमते हुए हौले से कहा – निशा क्या तुम सच में इस शादी से खुश नही हो…!
उसने झट से अपनी पलकें खोल दी, और मेरे होंठों को चूम लिया, फिर मेरी आँखों में झाँक कर बोली – क्या आप मुझे अपने काबिल समझते हैं..?
मेने शरारत से कहा – अगर तुम खुश हो तो मे भी काम चला लूँगा.., वैसे इतनी शर्मीली लड़की को झेलना थोड़ा मुश्किल तो होगा…
वो बुरी तरह से लिपट गयी, और मेरे चेहरे को अपने चुंबनों से भर दिया और उसी एग्ज़ाइट्मेंट में बोली – थॅंक यू जानू, आप बहुत अच्छे हैं,
अब किसी ने आपको मुझसे छीनने की कोशिश भी की तो मे उसका खून कर दूँगी..
मे – अच्छा ! सबके सामने तो भीगी बिल्ली बन जाती हो, और यहाँ बड़ी शेरनी बन रही हो…
अब चलो बाहर सबके साथ बैठते हैं, देखें तो सही क्या बातें हो रही हैं, ये कहकर हम बाहर आ गये…
मुझे देखते ही बाबूजी ने पंडित जी को बुलाने के लिए कहा … मे खुश होता हुआ पंडित जी के घर पहुँचा… वो मुझे अपने घर के बाहर ही मिल गये…
मेने उन्हें बाबूजी के पास भेजा और खुद उनके घर के अंदर चला गया…
अंदर उनकी बहू अपने बच्चे के साथ खेल रही थी, जो अब बड़ा हो गया था..
मुझे देखते ही वो मेरे गले से लिपट गयी… और अपने बेटे से बोली – पिंटू.. बेटा देख तेरे पापा आए हैं… चल इनके पाँव छुकर आशीर्वाद ले…
बच्चा बड़ा अग्यकारी था, उसने फ़ौरन मेरे पैर छुये.. मेने उसे गोद में उठा लिया.. और उसके गाल पर किस कर के प्यार करने लगा…
मे – कितना प्यारा बच्चा है आपका भौजी… बड़ा होकर एकदम हीरो लगेगा…
वो – खून तो आपका ही है ना.. ! गौर से देखो… बिल्कुल आपका दूसरा रूप लगता है…
मेने उसका माथा चूमकर कहा – कोई शक़ तो नही करता.. कि ये ऐसा क्यों दिखता है…
वो – करने दो मुझे किसी का डर नही है… इसके दादा- दादी और वो सो कॉल्ड बाप तो घर में बच्चे के होने से ही खुश हैं… बाहरवालों की परवाह कॉन करता है…!
आप सूनाओ, बड़े दिनो बाद दिखाई दिए हो.. कहाँ थे अब तक.. फिर मेने उसे सारी बातें कही… और बोला – मेरी शादी हो रही है.. आओगी ना !
वो खुश होते हुए बोली… अच्छा ! कब..? किसके साथ..?
मे – मेरी भाभी की बेहन निशा के साथ… पंडित जी को इसलिए बुलाया है बाबूजी ने, तारीख पक्का करने के लिए…!
वो – ये तो बड़ी खुशी की बात बताई है आपने, सच में निशा बहुत खुश किस्मत है, जिसे आप जैसा पूर्ण पुरुष जीवन साथी के रूप में मिल रहा है..
चाहे कोई कुछ भी कहे मे तो आपकी शादी में खूब नाचूंगी… लेकिन देवर जी.. मुझे आपकी बहुत याद आती है… क्या आपको कभी मेरी याद नही आई..?
मे – आती तो है भौजी… पर पढ़ाई भी तो ज़रूरी थी.. अब शायद मे यहीं रहूँगा.. तो कभी-2 चान्स मिल सकता है…
वो – अभी मारलो ना चान्स… जल्दी से वैसे इसकी दादी पड़ोस में ही गयी है.. आती ही होगी.. तब तक…??
मे – नही ऐसे नही.. कभी फ़ुर्सत से…चिंता मत करो.. मौका मिलेगा.. और उसके होंठों को चूमकर मे वहाँ से निकल आया.. वाहहन से सीधा छोटी चाची के घर पहुँचा….!
चाची किसी काम में लगी थी… उनका बेटा वहीं आँगन में खेल रहा था… मेने उसे कहा.. अरे अंश बेटा.. मम्मी कहाँ हैं…?
वो मुझे देखते ही चिल्लाया… मम्मी … देखो कोई आया है….!
उसकी आवाज़ सुनकर चाची बाहर आई.. और मुझे देखते ही दौड़ कर मेरे सीने से लिपट गयी…
फिर अपने बेटे से बोली.. अंश बेटा इनके पाँव तो छुओ.. ये तुम्हारे बड़े भाई हैं… रूचि के पापा की तरह…
उसने भी मेरे पैर छुये… मेने उसे गोद में उठा लिया और गाल चूम कर उसे प्यार करने लगा… फिर चाची के कान में कहा… सिर्फ़ भाई…!
वो शरमा कर बोली – पापा भी… लेकिन इसको नही बता सकती ना ! फिर मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बोली –
लल्ला ! बहुत याद आती है तुम्हारी… कितनी ही रातें तुम्हें याद कर-कर के काटी हैं मेने… इस शरीर को तो जैसे तुम्हारी ही आदत लग गयी थी…..
मे – अब क्या करूँ चाची… मुझे भी तो अपना भविश्य बनाना था…!
वो – हां ! सच कहा तुमने, यहाँ देखो क्या मुसीबत आन पड़ी है.., बेचारे राम और मोहिनी अपने भाई को लेकर कितने परेशान हैं…
मे – अब सारी परेशानी दूर हो गयी चाची… राजेश घर आ गया है.. कभी बाहर निकल कर भी देख लिया करो…
वो – क्या कह रहे हो ! सच में..! कहाँ है.. वो ?
मे – हमारे घर पर ही हैं सब लोग… निशा के मम्मी-पापा भी आए हुए हैं..
फिर बातों – 2 में मेने अपनी और निशा की शादी की बात बताई तो वो एकदम से भड़क गयी.. और अपने बेटे और मुझे साथ लेकर हमारे घर की तरफ लपक ली…!
घर में घुसते ही चाची पैर पटकते हुए बोली – जेठ जी आपने हमें बिल्कुल ही पराया कर दिया…? इतनी बड़ी खुशी और हमें बताया तक नही…!
भैया – अरे चाची.. अभी खुशी के लिए बैठे ही हैं.. अभी कुछ तय नही हुया…
बहू तो आपने देखी ही है.. और बताइए आपकी क्या इच्छा है.. वो भी रख देते हैं इनके सामने…
चाची – बड़े लल्ला जी मेरी क्या इच्छा होगी,.. इस घर की खुशी से बढ़कर मेरी और कोई इच्छा नही है.. मे तो बस इतना कह रही थी.. कि हमें भी इस खुशी में शामिल कर लेते तो मुझे अच्छा लगता…
भाभी – सॉरी चाची… हम आपको खबर करने ही वाले थे.. लल्ला जी के आने के बाद उन्हें आपके पास ही भेजते.., पर वो देखो हमारे कहने से पहले ही आपको ले आए… अब बताइए क्या ग़लत हुआ…!
चाची चुप रह गयी.. फिर बाबूजी ने कहा.. अंकुश ! बेटा जा अपने दोनो चाचा – चाची को भी खबर कर्दे.. सब मिल बैठ कर बात करते हैं.. वरना रश्मि की तरह वो लोग भी नाराज़ होंगे..
चाची – जेठ जी ! मे तो बस… ऐसे ही…
बाबूजी – मे जानता हूँ रश्मि .. तुम हम लोगों से कितना हित रखती हो.. इसलिए तुमने अपना हक़ जताया है,…
हम सच में माफी माँगते हैं तुमसे कि हमने पहले तुम्हें नही बुलाया…
इतने में और लोग भी आ गये.. और सबके सामने मेरी शादी की बात तय हुई…
मेरे कहने पर शादी को बड़े सादगी ढंग से करने का निर्णय लिया गया.. कोई ज़्यादा शोर-शराबा या हंगामा नही करना था..
बस अपने घरवालों की मौजूदगी में ही सात फेरे लेने थे.. और सबका आशीर्वाद लेकर अपना घर संसार बसा लेना था..
वाकी लोगों की मनसा थी कि सारे रिस्ते-नातेदारो को बुलाया जाए.. लेकिन मेने मना कर दिया.. जिसे भैया और भाभी ने भी उचित ठहराया,…इसके पीछे मेरा आगे का मक़सद जुड़ा हुआ था…
किसी और सगे संबंधी को ना बुलाना पड़े, इस वजह से हमने रामा दीदी को भी खबर नही की, वरना चाचा की बेटियों को भी बुलाना पड़ता…
मे नही चाहता था कि मेरी शादी की बात ज़यादा लोगों को पता लगे…
और एक दिन सभी घर परिवार की मौजूदगी में हम दोनो एक हो गये.. हमने गाँव के अन्य लोगों को भी शामिल नही किया था…
आज निशा मेरी थी.. मे निशा का था…, दोनो ने बंधन में बँधने के बाद सभी बड़ों का आशीर्वाद लिया…
भाभी के पैर लगते हुए मे उनके कान में फुसफुसाया…
भाभी , आख़िर तोता – मैना एक हो ही गये,… उन्होने मुस्करा कर आशीर्वाद देते हुए कहा…ये जोड़ी सदा यौंही बनी रहे.. एश्वर से बस यही प्रार्थना है मेरी..
आज मेरी तपस्या का फल मुझे मिल गया है,… फिर वो आँसुओं भरे चेहरे को ऊपर उठा कर बोली – माजी मेरी ज़िम्मेदारियों में कोई कमी रह गयी हो तो अपनी बेटी समझ कर मुझे माफ़ कर देना…
बाबूजी भी अपनी भावनाओं को काबू में नही रख पाए,.. रोते हुए उन्होने
भाभी को अपने गले से लगा लिया.. और रुँधे स्वर में बोले…
नही मेरी बच्ची… तूने अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी श्रद्धा और लगान से निभाईं हैं… शायद इतनी अच्छी तरह से विमला भी ना निभा पाती…!
ये देख कर वहाँ मौजूद सभी की आँखें भी नम हो गयी…… !
सारे रीति-रिवाजों को संपन्न करने के बाद, निशा के मम्मी पापा और भैया कुछ घंटे रुक कर दोपहर ढलते ही अपने घर लौट गये…
भाभी ने मुझे कहा… लल्ला जी आज तुम दोनो के मिलन की पहली रात है, तो सगुण के तौर पर निशा को ऐसा कुछ देना जो उसे पसंद आए…
मेने कहा – सब तरह के गहने-जेवर तो आपने उसे दे ही दिए हैं… अब मे ऐसा क्या दूँ.. आप ही कुछ बता दो…
भाभी – एक लड़की गहने-जेवर से बढ़कर अपने पति द्वारा प्यार से दिया हुआ तोहफा ज़्यादा पसंद करती है…, तो जो भी तुम्हें पसंद हो वो दे देना…
मे सोच में पड़ गया… मेने कभी अपनी पसंद-नापसंद के बारे में सोचा ही नही था… सारी इक्षाएँ तो भाभी ही पूरा करती आईं थीं…तो ऐसा क्या दूँ, जो उसे भी पसंद आए…
क्या इसके बारे में निशा को ही पूछा जाए…? लेकिन वो तो कहेगी कि उसे और कुछ नही चाहिए… तो फिर क्या दिया जाए…?
फिर मेरे दिमाग़ में आया… क्यों ना उसे ऐसा कुछ दिया जाए… जिसकी वजह से वो हर समय मेरे करीब ही रहे…तो मेरे दिमाग़ ने कहा “मोबाइल” .
हां यही ठीक रहेगा, एक स्मार्ट फोन उसे देता हूँ, जिससे हम चाहे पास हों या दूर, जब मन करे, एकदुसरे से बात कर के करीब ही रह सकते हैं…
ये सोच कर मेने गाड़ी उठाई और शहर की तरफ चल दिया…
शहर जाकर मेने एक अच्छी सी कंपनी का स्मार्ट फोन खरीदा और चल पड़ा अपने घर की ओर… अपने प्रथम मिलन की कल्पना करते हुए…
अभी मे शहर से कोई 10 किमी ही निकला था कि, बीच रास्ते में मुझे एक जीप खड़ी दिखाई दी…
सिंगल रोड होने के कारण उसके साइड से बचा कर बयके निकलने के लिए मुझे अपनी स्पीड कुछ ज़्यादा ही कम करनी पड़ी…
मे अभी उस जीप के बगल से निकल ही रहा था कि, जीप में बैठे लोगों मे से एक ने मेरे ऊपर हॉकी से वार किया…
हॉकी के वार को तो में झुकाई देकर बचा गया, लेकिन मेरा बॅलेन्स बिगड़ गया और मे बाइक समेत रोड के साइड को लुढ़कता चला गया…
मेरा बदन कयि जगह से छिल गया, जिसमें से तेज टीस सी उठने लगी…
ख़तरे का आभास होते ही मेरी सभी इंद्रिया सजग हो उठी…मे अपने दर्द की परवाह किए वगैर उठ खड़ा हुआ…
लेकिन इससे पहले कि मे ठीक से खड़ा हो पता, उनमें से दो लोगों ने मुझे दोनो तरफ से मेरे बाजुओं से जकड लिया…!
वो चार लोग थे… दो ने मुझे दोनो बाजुओं से जकड़ा हुआ था, एक अभी भी जीप में ही बैठा रहा, और चौथा आदमी चाकू हाथ में लिए मेरी ओर बढ़ने लगा….!
मेने लगभग चीखते हुए कहा – कॉन हो तुम लोग, और क्यों मारना चाहते हो मुझे..?
वो चाकू वाला गुर्राया… तेरी वजह से हमारे मालिक को बड़ा धक्का लगा है.. इसलिए अब तुझे तो मरना ही होगा…
मे – कॉन हैं तुम्हारा मलिक..?
वो – ये जानना तेरे लिए ज़रूरी नही है.. और वैसे भी मरने के बाद तू करेगा भी क्या जान कर…!
मे समझ गया कि ये ऐसे बताने वाला नही है…, अब मेने इनसे निपटने का मन ही मन फ़ैसला कर लिया था, …
वो मेरे पास आकर मुझसे दो फुट दूर रुक गया और अपने चाकू को संभाल कर वो अपना हाथ पीछे को ले गया…
इससे पहले की वो अपना चाकू वाला हाथ, मुझे मारने के लिए आगे लता… मेने अपनी बॉडी को उन दोनो गुण्डों की पकड़ के सहारे बॅलेन्स किया और उच्छल कर भड़ाक से अपने पैर की किक उसकी नाक पर जड़ दी…
किक इतनी सटीक और जोरदार थी… की वो अपनी जगह से 10 फुट दूर पीछे जाकर गिरा.. उसकी नाक बुरी तरह से फट गयी,… और उसका पूरा चेहरा उसीके खून से लाल होने लगा.
उसके गिरते ही वो दोनो कुछ हड़बड़ा गये… और उनकी पकड़ कुछ समय के लिए ढीली पड़ गयी, उसी का फ़ायदा उठाकर मेने अपने बाजुओं को ज़ोर से झटका दिया.. और अपने को उन दोनो की पकड़ से आज़ाद कर लिया…
वो मुझे दोबारा पकड़ने के लिए झप्टे… तो मेने दो कदम पीछे हट कर एक की कनपटी पर घूँसा जड़ दिया और दूसरे को एक लात जमा दी..
एक साथ हुए हमले से वो दोनो लड़खड़ा गये… इससे पहले की वो सम्भल पाते मेने उन दोनो की गर्दन अपने बाजुओं में कस ली…
आज मेरी भाभी के डिसिप्लिन द्वारा कराई गयी कशारत मेरे काम आरहि थी..
मेरे बाजुओं की पकड़ उनकी गर्दन पर इतनी मजबूत थी कि उनके गले की नसें फूलने लगी, उन्हें अपनी साँस अटकती सी महसूस हो रही थी.., दोनो के चेहरे लाल पड़ चुके थे…
मेने दाँत पीसते हुए कहा… बोलो.. क्यों मारना चाहते थे मुझे…
इससे पहले कि वो कोई जबाब दे पाते.. जीप में बैठा चौथा आदमी रिवॉल्वार लहराता हुआ मेरी तरफ आने लगा….…!
वो चौथा आदमी मेरी तरफ आते हुए गुर्राया – मे नही चाहता था, कि मुझे तेरे खून से हाथ रंगने पड़ें.. ये लोग ही तुझे संभाल लेंगे.. लेकिन तू तो कुछ ज़्यादा ही शातिर निकला…
वो चाकू वाला जिसकी नाक फट गयी थी… कराहते हुए बोला… अब बातों में समय बर्बाद मत करो जग्गा भाई.. उड़ा दो साले को, वरना कोई आ निकलेगा इधर, और सब गड़बड़ हो जाएगी….
उसने उसकी बात मानते हुए मुझे निशाना बना कर गोली चला दी… उसी क्षण मेने उनमें से एक को उसके निशाने के आगे कर दिया और गोली ने उसका भेजा उड़ा दिया…
वो रिवॉल्वार वाला हक्का-बक्का सा खड़ा अपने मारे हुए साथी को देख ही रहा था कि मेने दूसरे को उसके उपेर धकेल दिया… और वो दोनो एक दूसरे से उलझ गये…
इसी चक्कर में उसकी रिवॉल्वार का लीवर फिरसे दब गया और गोली उस दूसरे आदमी के पेट में घुस गयी… और वो भी ज़मीन पर पड़ा तड़फड़ाने लगा..
अपने दो दो साथियों का हश्र देख कर वो बुरी तरह भिन्ना गया, अपनी ही गोली से घायल साथी जो लगभग अंतिम साँसें गिन रहा था को एक तरफ धकेला, और गुस्से से भन्नाते हुए एक बार फिर मेरी तरफ पलटा…
लेकिन तब तक मे उसके सर पर पहुँच चुका था.. और उसकी रिवॉल्वार वाली कलाई थाम ली… उसकी कलाई पर मेरे हाथ की मजबूत पकड़ के आगे उसकी एक ना चली… और उसकी कलाई को मोड़ कर रिवॉल्वार की नाल उसकी कनपटी की तरफ कर दी…
मे गुर्राया – अब चला गोली हरामी…, फिरसे मे उसके कान के पास इतनी ज़ोर से चिल्लाया… चलाआ…नाअ…, डर के मारे उसकी उंगली ट्रिग्गर पर दब गयी… और रिवॉल्वार की गोली ने उसके सर के परखच्चे उड़ा दिए….
अब रिवॉल्वार मेरे हाथ में था… वो फटी नाक वाला अपने खून से सने सुर्ख चेहरे को लिए, सूखे पत्ते की तरह काँपते हुए मुझे ऐसे देख रहा था मानो उसके सामने कोई इंसान नही, भूत खड़ा हो…
वो बुरी तरह मिमियाते हुए बोला – म.म.म्मूँहेछोड़ दो…
मेने गुर्राते हुए सवाल किया – तो फिर बता किसने भेजा है तुम लोगों को…?
व.वउूओ… भानु प्रताप ने…,
मेने फिर सवाल किया… इस समय कहाँ मिलेगा वो..?
वो – ये मुझे नही पता… प्लीज़ मुझे छोड़ दो, मे तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ.. ये कहते हुए वो सचमुच मेरे पैरों में लेट गया….
मेने उसे जीवित छोड़ना ही उचित समझा… जिससे वो उस हरामी के पिल्ले को जाकर सब कुछ बता सके…
रिवॉल्वार अपनी बेल्ट में खोंसा, बयके उठाई और किक मार कर बुलेट घर की ओर दौड़ा दी…!
घर पहुँचते – 2 मुझे अंधेरा हो चुका था,.. मेरे ज़मीन पर घिसटने से कपड़े जगह -2 से फट गये थे, और बदन पर भी कयि जगह खरौन्च आ गयी थी…
मेने उन गुण्डों की रिवॉल्वार को बुलेट की डिकी में डाला, और घर के अंदर चला गया….!
मे जैसे ही घर में कदम रखा… मेरी हालत देख कर भैया और भाभी लपक कर मेरे पास आए और तरह – तरह के सवालों की झड़ी लगा दी…
मेने उन्हें कहा… घबराने की कोई ज़रूरत नही है… अंधेरे में बाइक एक सड़क पर पड़े पत्थर से स्लिप हो गयी थी.. और में गिर गया था…!
भैया ने डाँटते हुए कहा – लेकिन तू गया ही क्यों था शहर, आज ही शादी हुई है, और चला गया बिना किसी को बताए…!
अब इतना बड़ा हो गया है, कि किसी से कुछ पुछ्ने की भी ज़रूरत नही समझता,…
राजेश के केस के बाद हमारे दुश्मन भी पैदा हो गये हैं, कहीं भी कोई भी कुछ भी करवा सकता है…!
कोई ज़रूरी काम था, तो सोनू को साथ ले जा सकता था…
मेने भाभी की तरफ देखा, जो एकदम भावशून्य खड़ी हमें देख सुन रही थी..
मेने अपनी नज़र नीची कर के कहा – सॉरी भैया, ग़लती हो गयी, एक ज़रूरी काम था, उसे निपटाने गया था…वैसे भाभी को पता है..
भाभी का नाम आते ही भैया का गुस्सा छ्छूमंतर हो गया, और प्यार से दुलार्ते हुए बोले… तुझे कुछ हो जाता तो..?
मेने भैया से कहा – मुझे कुछ नही होगा भैया, आप चिंता ना करो, थोड़ी बहुत खरौन्च है… जल्दी ही ठीक हो जाएगी..
भाभी ने हुकुम दनदनाते हुए कहा – अब यहाँ खड़े मत रहो, जल्दी से फ्रेश होकर कपड़े चेंज करो, और अपने कमरे में जाकर निशा से दवा लगवा लो….
मे बाथरूम में जाकर फ्रेश हुआ… कपड़े उतार कर वहीं बाथ रूम में फेंके…और एक तौलिया लपेट कर अपने कमरे में पहुँचा…
जहाँ निशा नयी दुल्हन के लिबास में बैठी मेरा इंतेज़ार कर रही थी…
मुझे तौलिए में देखकर और मेरे बदन पर खरौन्च के निशान देख कर वो तड़प उठी…, दौड़ कर मेरे पास आई… और जैसे बाहर सवालों की झड़ी लगी थी…वही उसने भी रिपीट कर्दिये.
मेने उसे भी वही जबाब दिया जो भैया भाभी को दिया था, तो वो तड़प कर बोली –
मे आपके लिए कितनी बड़ी अशुभ हूँ…, मेरे आपकी जिंदगी में कदम रखते ही मुसीवतो की शुरुआत हो गयी…!
मेने प्यार से उसके गाल पर एक थपकी दी और कहा – ये क्या फालतू बकवास कर रही हो तुम..?
अब कहा सो कहा, आइन्दा ऐसी बात भी की तो समझ लेना, कभी बात नही करूँगा तुमसे..
ना जाने क्या-क्या अनप शनाप बोलती रहती हो… रास्ते में वो पत्थर तुमने रखा था क्या…? जो होना था सो होगया…, ऐसी बातों के लिए अपने आप को दोष कभी मत देना…
वो सुबक्ते हुए मेरे सीने से लिपट गयी… मेने उसके कंधे पकड़ कर अपने से अलग किया और बोला –
अब चलो, भाभी ने कहा है कि थोडा अपने पति की सेवा करनी चाहिए.., तो बाहर से दवा लाकर मेरे खरोंचों पर लगाओ…
मेरी बात सुनकर वो गर्दन झुकाए बाहर चली गयी.. भाभी से दवा लेने…
मुझे बहुत ज़्यादा चोट नही थी, बस हल्की सी खरॉच ही थी… निशा जब अपने नरम- 2 हाथों से मेरे बदन पर दवा लगा रही थी तो मुझे उसके बदन से उठती खुसबु मदहोश करने लगी..
और मेने उसे अपनी बाहों में जकड कर उसके होंठों को चूम लिया,…वो कसमसा कर मुझे अपने से दूर करने की कोशिश करने लगी…
मेने उसे अपने बंधन से आज़ाद किया तो वो बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोली – अभी शरीर पर चोटें लगी हैं… और जनाब को आशिक़ी सूझ रही है.. पहले इन्हें ठीक कर लो उसके बाद…
मेने उसके छोटे-छोटे गोल-मटोल कुल्हों को मसल्ते हुए कहा – आज तो मे सुहागरात मना कर ही रहूँगा मेरी जान…
क्या पता.. तुमने अपना इरादा बदल लिया तो.. मे तो रह जाउन्गा ना… ठन-ठन गोपाल…
ये कहकर मेने फिरसे उसे अपनी बाहों में जकड लिया…, वो बोली – पहले खाना पीना तो खा लीजिए.. आपके इंतेज़ार में वाकी सब भी भूखे हैं…
मे – ओह्ह्ह…सॉरी, ये कहकर हम बाहर डाइनिंग टेबल की तरफ चल दिए…
हम सबने मिल कर खाना खाया…, बाबूजी को भी जब पता लगा मेरे आक्सिडेंट के बारे में तो वो भी परेशान हो उठे… लेकिन जब मेने बताया कि बस मामूली सी खरौन्चे हैं.. तब जाकर वो कुछ अस्वस्त हुए….
खाना ख़ाके, थोड़ी देर हम सब आपस में बातें करते रहे,
भाभी, निशा को सुहाग रात की कुछ टिप्स देने उसके पास चली गयी…
कुछ देर मे बाबूजी और भैया के साथ बैठकर राजेश के केस से संम्बंधित बातें करते रहे,
वो दोनो अभी भी इस विषय पर चिंतित दिख रहे थे, लेकिन मेने उन्हें बिल्कुल असवास्त रहने के लिए कहा…
कुछ देर बाद बाबूजी और भैया उठ कर सोने चले गये तो मे भी अपने कमरे की तरफ बढ़ गया, जहाँ दोनो बहनें मेरा इंतेज़ार कर रही थीं.
मेरा कमरा गॅलर्री में लास्ट था, अभी में गॅलर्री में ही था, कि मेरे कमरे से निकल कर भाभी आती हुई दिखाई दी,
मे वहीं ठिठक गया, जब वो मेरे पास आ गयी मेरा हाथ पकड़ कर दीवार की तरफ कर के वो मुझे समझने लगी…
देवेर जी… आज तुम पहली बार निशा के पास एक पति के रूप मे जा रहे हो…
और वो एक पत्नी की तरह तुम्हारे सामने होगी, तो आज तुम दोनो के बीच की सारी दीवारें ढह जानी चाहिए…, जिससे एक दूसरे के बीच की हिचक दूर हो जाए….
एक और बात, निशा अपने दिलो-दिमाग़ से परिपक्व लड़की है… लेकिन शारीरिक तौर पर नही…जो आज तुम्हे यूज़ करना है…
मेने भाभी को पकड़ कर दीवार से सटा दिया, उनकी कमर में हाथ डालकर अपनी तरफ खींचा और आँखों में झाँकते हुए बोला….
हमारी सुहाग रात की साक्षी नही बनाना चाहोगी भाभी, उसे शारीरिक तौर पर परिपक्व बांबने में अपने लाड़ले की मदद नही करोगी..?
अपनी छोटी बेहन को गाइड भी करती जाना…!
भाभी ने मुस्कराते हुए प्यार से मेरे गाल पर चपत लगाई, और बोली – ये रात किसी और के साथ शेयर नही की जाती देवर्जी…!
और वैसे भी अब तुम अनाड़ी नही रहे, कइयों की सील चटखा चुके हो, तो अपनी पत्नी की नही कर पाओगे क्या..?
मेने झटके से भाभी को अपने शरीर से सटा लिया, अब उनकी गदाराई हुई चुचियाँ मेरे सीने से दब रही थी,
फिर भाभी के मस्त गदराए हुए कुल्हों को मसलकर और ज़ोर से अपनी तरफ दबाया, मेरा पप्पू उनकी मुनिया के दरवाजे को खट-खटा रहा था,
भाभी की आँखों में भी वासना के डोरे तैरने लगे, लेकिन अपनी भावनाओं पर कंट्रोल करते हुए, मेरे सीने पर हाथ का दबाब देकर मुझे अपने से अलग किया……
फिर मुस्करा कर उन्होने मेरे होंठ चूम लिए और, मेरे पप्पू को दबाते हुए बोली – अब इसके आगे और कोई शैतानी नही…
आज इस पर सिर्फ़ इसकी असली मालकिन का हक़ है, अब अंदर जाओ एक पति के अधिकार के साथ, और निशा को वो तोहफा दो…जिसके लिए हर लड़की अपने जीवन में सपने संजोती है…!
ये कह कर भाभी ने मुझे धकेल कर रूम के अंदर कर दिया और बाहर से गेट बंद कर के खुद भैया के पास चली गयीं…
मेने पलट कर जैसे ही कमरे के अंदर कदम रखा, सामने के नज़ारे को देख कर मेरा मन मयूर होकर नाच उठा…….!
सामने फक्क सफेद चादर से ढका बेड जिसपर लाल गुलाब के फूलों की पंखुड़ियों बिछि हुई थीं…!
कमरे के अंदर बिखरी हुई सुगंध, किसी को भी मदहोश कर्दे, लगता है भाभी ने ये सब करने में काफ़ी मेहनत की होगी…!
बेड के सिरहाने एक लाल सुर्ख जोड़े में, सर पर लंबा सा घूँघट लिए, सिकुड़ी सीमिटि सी निशा… अपने प्रियतम के इंतेज़ार में बैठी थी…
अभी – 2 कमरे से बाहर निकलने से पहले उसकी दीदी उसे आने वाले पलों के बारे में बहुत कुछ ज्ञान देकर गयी होंगी सुहाग रात के बारे में…
मे धीरे-2 चलते हुए बेड तक गया… और उसके साइड में जाकर खड़ा हो गया…
निशा मुझे अपने नज़दीक खड़ा पाकर और ज़्यादा अपने आप में सिमट गयी…, मे धीरे से उसके पास बैठ गया, और उसके कंधे पर हाथ रखा- उसके शरीर में एक कंपकपि सी दौड़ गयी…, जो मेने साफ महसूस की.
मेने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा – जान ! ये चाँद सा मुखड़ा घूँघट में क्यों छुपा रखा है…?
हम दोनो के बीच अब इस घूँघट का क्या काम…? हटाओ इसे….
उसने ना में अपनी गर्दन हिला दी…, मेने मुस्कराते हुए.. उसके घूँघट को अपने हाथों में लेकर उलट दिया…
वाउ ! हल्के से मेक-अप और गहनों से लदी, अपनी नज़रें पलंग पर गढ़ाए… वो शर्मो-हया की मूरत बनी बैठी थी…
नाक में नथुनि, माथे पर टीका, गले में मन्गल्सुत्र के साथ एक बड़ा सा हार,… कानों में बड़े-2 झुमके… हाथों में हतफुल.
मेहदी लगे हाथों की सभी उंगलियाँ अंगूठियों से भरी हुई, कुहनी तक लाल और हरी-हरी चूड़ीयाँ, जिनके आगे और पीछे एक –एक सोने के कंगन…!
वो इस समय साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप लग रही थी, मेरे मन ने कहा की क्यों ना इस छबि को हमेशा के लिए एक यादगार बना लिया जाए,
सो अपना स्मार्ट फोन निकाल कर उसका फोटो लेना चाहा, लेकिन वो तो अपनी नज़रें नीचे किए हुए थी…!
मेने अपने हाथ का सहारा उसकी तोड़ी पर लगाकर उसके चेहरे को ऊपर किया… फिर भी उसकी पलकें झुकी ही रही…
मेरी तरफ देखो निशु..! उसने फिरसे अपनी गर्दन ना में हिला दी…
मे – क्यों ? मुझसे नाराज़ हो..?
वो – लाज आती है…!
मे – मुझसे अब कैसी लाज ! अब हम पति-पत्नी हैं.. जान ! अब हम दोनो के बीच शर्मो-हया का ये परदा क्यों..? ज़रा मेरी तरफ देखो तो सही, मे तुम्हारी इस छबि को कमरे में क़ैद करना चाहता हूँ..
एक क्षण को उसने मेरी तरफ देखा, और उसी पल मेने उसकी उस छबि को अपने फोन में क़ैद कर लिया…
उसके लव थरथरा रहे थे… मेने उसके माथे के टीके को एक ओर कर के उसे चूम लिया… उसकी पलकें फिरसे बंद हो गयी…
उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर मेने कहा – मेरी तरफ देखो मेरी जान…
उसने जैसे-तैसे कर के अपनी पलकों को उठाया, मानो उनके ऊपर ना जाने कितना भर पड़ रहा हो,…
मे उसकी झील सी गहरी शरवती आँखों का तो हमेशा से ही दीवाना था… उनमें झाँकते हुए बोला – तुम सच में बहुत सुन्दर हो प्रिय…
उसकी पलकें शर्म से फिर एक बार झुक गयी… आज तो वो कुछ ज़्यादा ही लजा रही थी…
मेने उसके सर से सारी का पल्लू उतार कर एक तरफ रख दिया और उसके गोरे-गोरे हल्की लाली लिए हुए गालों को चूम लिया…
उसकी नथुनि मेरे और उसके होंठों के बीच दीवार बन रही थी… सो उसको निकाल कर मेने उसके होंठों की तरफ अपने होंठ बढ़ा दिए…
मेरी साँसों की गर्मी महसूस कर के उसके होंठ लरज उठे… मेने जैसे ही उसके रसीले लाल – 2 लिपीसटिक लगे होंठों को किस किया….
निशा ने अपने मेहदी लगे दोनो हाथों से अपने चेहरे को ढांप लिया…
वो अपने घुटने मोड बैठी हुई थी, तो मेने उसके घुटनों को सीधा कर के उसके गोरे – गोरे सपाट पेट को सहलाते हुए अपना हाथ उसके वक्षों तक लाया…
वो अभी भी अपने चेहरे को ढके हुए थी… मेने उसके दोनो संतरों के ऊपर हल्के से हाथ फिराया, फिर अपने दोनो हाथों से उसके हाथों को चेहरे से अलग किया..
उसने अपनी आँखों पर पलकों के पर्दे डाल कर फिरसे बंद करली….
मेने उसकी सारी की गाँठ खोल दी, और एक-एक कर के उसके शरीर से सारे गहने नोच डाले, अब वो ब्लाउज और पेटिकोट में थी,
मेने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूमने लगा….
निशा अपनी सुध-बुध खोती जा रही थी… वो तो बस जैसे अपने प्रियतम के इशारों पर चलने वाली एक कठपुतली बन चुकी थी…
मेने उसके होंठ चूस्ते हुए अपने दोनो हाथ उसके संतरों के ऊपर रख दिए… और उन्हें ब्लाउज के ऊपर से ही मसल्ने लगा…
उसकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगे…और अपनी मरमरी बाहें मेरे गले में डाल दी.
थोड़ा सा मसलने के बाद मेरी उंगलियों ने उसके ब्लाउज के बटन खोल दिए…
एकदुसरे के होंठ अभी भी एक दूसरे का रस चूसने में ही व्यस्त थे…
वो एक पिंक कलर की ब्रा में आ चुकी थी, जिसमें क़ैद उसकी 32” की गोलाइयाँ किसी टेनिस की बॉल के आकार की गोरी – 2 निहायत ही सुंदर लग रही थी..
मेने अपनी टीशर्ट निकाल फेंकी और उसे कमर से पकड़ कर अपनी गोद में बिठा लिया…
वो मेरे सीने से चिपक गयी… जिससे उसके छोटे-2 सुडौल वक्ष मेरे सीने में दब गये…
मेने निशा की ब्रा निकाल कर उसे बिस्तर पर लिटा दिया… और उसके बदन को सहलाते हुए उसकी गर्दन से चूमना स्टार्ट किया… और धीरे – 2 कर के उसके स्तनों तक आ पहुँचा…
वो किसी जल बिन मछलि की तरह बिस्तर पर पड़ी तड़पने लगी… गुलाब की पंखुड़ियों समेत उसने बेड शीट अपनी मुत्ठियों में कस ली थी..
मेने उसके निप्पलो को एक बार जीभ लगा कर चाटा,…. निशा के मुँह से एक मादक सिसकी फुट पड़ी…., और अपने पैरों की एडियों को आपस में रगड़ने लगी…
इष्ह……उफफफफ्फ़…. अब उसने मेरा सर अपने दोनो हाथों में ले लिया था…
जब मेने उसकी एक चुचि को अपने मुँह में भरकर चूसा.. और दूसरी को अपनी बड़ी सी हथेली से सहलाया…
तो वो अपनी एडियों को पलंग पर रगड़ते हुए सिसकने लगी….
आआहह………..मत..करूऊऊऊऊऊओ…..प्लेआस्ीईईईई………मुझीई….कुकचह….होताआ….हाईईइ…..
मेने उसकी तरफ मुँह उठा कर पूछा – क्या होता है मेरी जान…?
वो मेरी बात सुनकर बुरी तरह शरमा गयी, और बिना कोई जबाब दिए ही उसने अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया और आँखें बंद कर के सिसकने लगी….
उसकी चुचियों को चूस्ते हुए… मे अपने दोनो हाथों से उसके बगलों को सहलाते हुए… नीचे को लाया… और उसके पेट और नाभि को चूमते हुए उसके पेटिकोट का नाडा खोल दिया…
अब वो मात्र एक छोटी सी पेंटी में थी… जो अब बहुत गीली हो गयी थी…
मेने एक बार फिर उसके होंठों और गर्दन को चूमा, और अपना एक हाथ नीचे ले जाकर उसकी गीली पेंटी पर रख दिया…
अपनी मुनिया पर मेरा हाथ महसूस करते ही निशा ने अपनी दोनो जांघें जोड़ दी…, मेने अपना हाथ उसकी पेंटी से हटाकर उसकी जांघों पर ले आया और उन्हें सहलाने लगा…
अपना लोवर निकाल कर मेने एक तरफ फेंका, अब में भी मात्र अपनी फ्रेंची में ही था…
उसकी टाँगों के बीच आकर मे अपने घुटने मोड़ कर बैठ गया…और मेने उसकी बगलों को अपने हाथों में भर कर उसे किसी गुड़िया की तरह उठाकर अपनी जांघों पर बिठा लिया…
वो अब अपने पैर मेरे दोनो ओर निकाल कर मेरी गोद में बैठी थी…उसकी छोटी सी कुँवारी मुनिया, कामरस से भीगी पेंटी में धकि, मेरे मुन्ने के ठीक ऊपर थी…
उसके कुल्हों को अपनी मुत्ठियों मे भरते हुए मे उसके होंठ चूसने लगा…
निशा अब बहुत गरम होने लगी थी… उसका बदन अब उसकी नही सुन रहा था.. और वो ऊपर से नीचे थिरकने लगा…
मेरे हाथ कभी उसकी पीठ सहलाते तो कभी उसके गोल-मटोल कुल्हों को मसल देते…
उसकी मुनिया, मेरे मुन्ने से मिलने के लिए तड़पने लगी… और वो दोनो कपड़े की एक पतली सी दीवार के पीछे से ही एकदुसरे से प्रेमलाप में लिप्त हो गये…
मेरे कड़क लंड की रगड़ से उसकी मुनिया… जल्दी ही खुश हो गयी… और उसका बदन अकड़ कर मेरे शरीर से चिपक गया…
मेने उसकी चुचियों को हल्के से मसल दिया, वो सिसक पड़ी ….और ऊओह….जानुउऊउउ…उूउउ….बोलते हुए पेंटी में ही झड़ने लगी,..
और मेरे कंधे पर सर टिका कर धीरे-धीरे हाँफने लगी…
मेने उसकी पीठ सहलाते हुए उसे आवाज़ दी… निशु…!
वो उसी खुमारी में बोली – हूंम्म्म…
मे – आर यू ओके…..
वो – हूंम्म…..
अब मेने उसे पलंग पर सीधा लिटा दिया, और उसकी कामरस से तर पेंटी को निकालकर एक तरफ को उछाल दिया …
अहह…. उसनकी छोटी सी मुनिया… एकदम चिकनी चमेली… जो रस से सराबोर होकर लेड की रोशनी में और ज़्यादा चमक उठी थी…,
मे अपने सामने खुली, दोनो पतले-पतले होंठों को बंद किए हुए उसकी मुनिया को कुछ पल देखता रहा…
उसके निचले सिरे पर कामरस की एक बूँद मोती जैसी चमक रही थी… जो मानो कह रही हो.. कि आओ मेरे प्रियवर…. ये तुम्हारे लिए तोहफा है… आकर अपना तोहफा कबूल करो.
मेने भी उसका स्वागत ठुकराया नही, और इससे पहले की वो उसकी मुनिया के बंद होंठों से जुदा होकर बेड की चादर में विलीन होता, मेने झुक कर हौले से उसे अपनी जीभ से चाट लिया….!
मेरी जीभ को अपनी रसीली मुनिया पर महसूस होते ही निशा एकदम से उछल पड़ी..
हाईए….ये.. क्ककयाआअ……किय्ाआ… आपनीई….उफफफफफ्फ़…सस्सिईईईईईईईईईईई……आअहह….
मेने उस मोती जैसी कमरस की बूँद को चाटने के बाद पूरी जीभ से एक बार उसकी मुनिया के बंद होंठों को नीचे से ऊपर तक चाट लिया……..
निशा ने बेड की चादर को ज़ोर से अपनी मुट्ठी में कस लिया… और अपने होंठों को चबाने लगी…
वो शर्म की वजह से अपने अंदर की उत्तेजना को भी खुलकर व्यक्त नही कर पा रही थी…
उसका बदन बेड पर किसी जल बिन मछलि की तरह तड़प रहा था….
मेने अब उसे और ज़्यादा तड़पाना उचित नही समझा… और अपना फ्रेंची उतार कर एक ओर उछाल दिया…
मेरा 8 इंची बब्बर शेर, पूरी तरह अपने शिकार को दबोचने के लिए तैयार था…
मेने अपने लॉड को थोड़ा मुट्ठी में लेकर मसला और उस पर थूक लगा कर
निशा की मुनिया के होंठों के ऊपर रख कर दो-तीन बार ऊपर नीचे फिराया … ताकि वो एक दूसरे को अच्छे से पहचान सकें…
उसके काम रस से मेरा मूसल भी चिकना हो गया…
फिर मेने अपने हाथों के अंगूठों की मदद से उसनकी मुनिया के बंद होंठों को खोला, उसका गुलाबी छेद बहुत ही छोटा सा था…शायद अभी तक उंगली भी नही गयी होगी उसमें…
ब-मुश्किल थोड़ी सी जगह बना कर मेने अपने लंड के मोटे से सुपाडे को उसके द्वार पर टीकाया….
उसके अहसास से ही निशा की साँसें तेज होने लगी,… और वो मुट्ठी भींचे आँख बंद कर के आने वाले तूफान के इंतेज़ार में लंबी-लंबी साँसें भरने लगी…
मेने अपने लंड को थोड़ा सा पुश किया जिससे उसका सुपाडा अच्छे से उसकी मुनिया के होंठों के बीच सेट हो गया…
मेरे सुपाडे के दबाब को अपनी मुनिया के ऊपर महसूस कर के वो सिहर गयी…उसके शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गये….
मेने झुक कर पहले उसके होंठों को चूमा और फिर उसकी चुचियों को प्यार से सहलाकर कहा – जान ! थोड़ा मॅनेज करना पड़ेगा…
वो बस हूंम्म्म… कर के अपनी सहमति दे पाई…
उसके बाजुओं पर हाथों का दबाब रखते हुए मेने एक धक्का अपनी कमर को दिया… , मेरा सुपाडा… उसकी मुनिया की पतली-पतली गुलाबी पंखुड़ियों को फैलाता हुआ… लगभग फिट गया…
वो केरेन लगी…, उसने अपने होंठों को कसकर, चीख को अपने मुँह में जप्त कर लिया…, लेकिन दर्द की रेखायें उसके चेहरे पर नज़र आने लगी…
उसके होंठों को चूमकर मेने उसके गालों को सहलाया और एक तगड़ा सा धक्का अपनी कमर में लगा दिया…
निशा की कोरी करारी मुनिया, किसी ककड़ी की तरह चीरती चली गयी….
लाख कोशिश के बाद भी उसके मुँह से एक मरमान्तडक चीख उबल पड़ी…
माआआआआआआआ…………..मररर्र्र्र्र्र्ररर……….गाइिईईईईईईईईईईई…..रीईईईईईईईई….
मे वहीं ठहर गया, और उसके बालों को सहलाते हुए उसे पुच्कार्ते हुए बोला –
बस मेरी जान… तकलीफ़ की दीवार टूट चुकी है… बस थोड़ा सा और सहन करना होगा…
मेरा लंड उसकी झिल्ली तो तोड़ चुका था…वो आधे से अधिक उसकी सन्करि प्रेम गली में प्रवेश कर चुका था…
निशा से दर्द सहन नही हुआ, वो मिन्नतें करते हुए मुझे एक बार अपना लंड बाहर निकालने के लिए बोली….
मेने भी थोड़ा रुकना बेहतर समझा और धीरे से एक बार अपना मूसल बाहर निकाल लिया…, लंड बाहर आते ही निशा ने राहत की साँस ली…
जब मेरी नज़र उसपर गयी, तो सुपाडा खून से लाल हो चुका था…
खून की एक लकीर उसकी मुनिया से भी निकल रही थी…
मेने निशा को इस बारे में बताना सही नही समझा, और फिर से उसके होंठों को चूस्ते हुए, उसकी चुचियों को सहलाने लगा…
जब उसका कराहना थोड़ा कम हुआ तो मेने पूछा – मेरी जान ! अब आगे बढ़ें…
उसने हूंम्म…कर के पर्मिशन ग्रांट कर दी.. और मेने अपने शेर को फिरसे उसकी चिकनी चमेली के मुँह पर रख कर धक्का दे दिया…
मेरा 2.5” परिधि का सोट जैसा लंड अपनी पहली वाली मंज़िल को पीछे छोड़ते हुए कुछ और आगे तक अंदर चला गया… जो अब बस मंज़िल से थोड़ा ही दूर था…
निशा एक बार फिर तडपी…और अपने सर को इधर से उधर पटकने लगी…, उसकी आँखों की कोरों में आँसू की बूँदें झलकने लगी…
मेने उसके गाल सहलाते हुए पूछा – क्या हुआ जान ! सहन नही हो रहा…?
वो कराहते हुए बोली – हूंम्म….ये बहुत ज़्यादा मोटा है….आअहह… मेरी जान निकली जा रही है…आअहह….थोड़ा रूको…प्लेअसस्ससी…
मेने रुक कर उसे फिरसे चूमना शुरू कर दिया और उसके कड़क हो रहे निप्प्लो से खेलने लगा…साथ साथ में हल्के-हल्के अपने लंड को मूवमेंट भी देता रहा…
मेरे कुछ देर के प्रयास के बाद उसका दर्द कम हुआ… अब वो अपने मज़े की तरफ ध्यान देने लगी थी…
जिससे उसके रस गागर से थोड़ा – 2 रस रिसने लगा… और मेरे शेर को अंदर बाहर होने में आसानी होने लगी..
मेरा लंड अभी भी 2” दूर था अपनी मंज़िल से, जो उसके आने वेल सेन्सेशन के कारण आसानी से पा गया.. और वो अब पूरी तरह से अंदर फिट हो चुका था…
हल्की सी कराह के साथ निशा उसे अपनी अंतिम गहराई तक फील करने में कामयाब रही.., अब उसकी रसीली मुनिया और ज़्यादा रस बहाने लगी थी…,
क्योंकि मेरे शेर ने उसके रस के खजाने का मुँह पूरी तरह खोल दिया था…
मेने उसको चूमते हुए अपने धक्कों को गति प्रदान की और आधी लंबाई के शॉट लगाने शुरू कर दिए….
उतने से ही कुछ देर बाद ही उसका बदन एक बार ज़ोर से आकड़ा और उसने जिंदगी का पहला स्खलन लंड के ज़रिए प्राप्त कर लिया…
वो बुरी तरह से मेरे सीने से चिपक कर हाँफने लगी…
उसे सीने से चिपकाए मे थोड़ा ठहर गया…, कुछ देर बाद उसके बदन को सहलाते हुए.. मेने उसे फिर से धीरे-धीरे चोदना शुरू कर दिया….
कुछ मिनटों में ही वो एक बार फिरसे उत्तेजना के भंवर में फँस गयी, और अब उसने भी मेरा साथ देना शुरू कर दिया…
अब मेने पूरी लंबाई के शॉट लगाने शुरू कर दिए…, रास्ता खुल चुका था, सो गीली चूत में लंड को सुपाडे तक बाहर लाता… और फिर एक साथ पूरा डाल देता… !
मे अपने घुटनों पर हो गया, और निशा के कुल्हों को अपनी जांघों पर रखा, और अपने धक्कों में तेज़ी लाना शुरू कर दिया…
निशा…सिसकारी भरती…हुई……अपनी कमर उचका देती…..इतना मज़ा मुझे आ रहा था…. जिनका शब्दों में बयान करना नामुमकिन है….
सच में इतना आनंद मेने पहले कभी नही पाया था….,
धक्कों के कारण उसकी काँच की चूड़ियों और पैरों की पायल का मिला जुला मधुर संगीत कानों में रस घोल रहा था…
हम दोनो ही अपने अपने प्रयास में जुटे हुए थे, एक दूसरे को ज़्यादा से ज़्यादा आनंद देने की कोशिश में.
इसी प्रयास में दोनो के बदन पसीने से नहा चुके थे….
अंत में वो समय भी आ ही गया जब हम दोनो एक साथ अपने-अपने मुकाम को पा गये और लंबी-लंबी साँसें लेते हुए एक दूसरे में समा गये….
कितनी ही देर यूँ ही एकदुसरे से चिपके हम पड़े रहे…वो मेरे नीचे दबी पड़ी थी, फिर भी ना कोई शिकायत, ना शिकवा…
मुझे जब होश आया तो मे उसके ऊपर से हटा… लंड को उसकी नयी चूड़ी मुनिया सॉरी ! अब चूत कह सकता हूँ से बाहर निकाला…
जिसके साथ-साथ हम दोनो का वीर्य, खून मिश्रित बाहर आने लगा…और बेड शीट पर हमारी सुहाग रात के सबूत छोड़ता रहा…..
कुछ देर बाद मेने निशा को गोद में उठाया और बात रूम की तरफ चल दिया… उसने कहा भी की मे चली जाउन्गि…
मेने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया.. और उसके फूल जैसे नाज़ुक शरीर को बाथ रूम में ले जाकर उसे खड़ा किया…
हम दोनो ने एकदुसरे के बदन साफ किए,
पहली बार निशा की नज़र मेरे लंड पर पड़ी,
वो अपने मुँह पर हाथ रख कर उसे बड़े ताज्जुब से अपनी आँखें चौड़ी कर के देख रही थी, जो उसका हाथ लगते ही, फिरसे फुल फॉर्म में आ चुका था…
मेने मुस्कुरा कर पूछा – ऐसे क्या देख रही हो जानेमन… ये अब तुम्हारी सेवा के लिए ही है…
वो अपने मुँह पर हाथ रखकर बोली – हाईए… राम… इतना बड़ा..? ये कैसे मेरे अंदर गया होगा…? तभी मेरी जान निकली जा रही थी…
मेने उसकी गोलाईयों को सहलाते हुए कहा – तो इसका मतलब ये तुम्हें पसंद नही आया…!
वो झेन्प्ते हुए बोली – ऐसी बात नही है जानू ! बाद में मज़ा भी बहुत दिया इसने… नाउ आइ लाइक इट, और ये कहकर उसने उसे चूम लिया…!
मेने मेरे मूसल की मार झेल चुकी उसकी घायल मुनिया को साफ कर के चूम लिया, उसके बाद फिर उसे गोद में उठाकर बेड पर लाकर लिटा दिया…
अलमारी से एक गिफ्ट पॅकेट निकाला और उसे निशा को देते हुए मेने कहा – लो जान ! ये तुम्हारी आज की खरी कमाई…
वो – ये क्या है जानू ..?
मे – खोल कर देख लो…..
जब उसने वो खोला… तो एक स्मार्ट फोन देख कर वो मेरे गले से लग गयी..
मेने कहा – पसंद आया…?
वो – बहुत ! लेकिन इसकी क्या ज़रूरत थी…!
मेने कहा – ज़रूरत थी…! अब इसके ज़रिए… हम दूर रह कर भी हर समय पास रह सकते हैं.. एक दूसरे से वीडियो कॉल कर के बात कर सकते हैं…
निशा मेरा तोहफा पाकर बहुत खुश हुई… फिर मे उसे उसके फंक्षन वग़ैरह समझाने लगा….
कुछ देर बाद उसने टेबल से उठा कर एक ग्लास दूध का मुझे पकड़ा दिया.. जिसमें भाभी का लाड शामिल था…
हम दोनो ने मिलकर वो दूध ख़तम किया… और फिर से एक दूसरे से लिपट गये…
थोड़ी सी आपस की छेड़-छाड़ और प्रयासों से एक बार फिरसे हम उसी तूफान के भंवर में जा फँसे, जिसमें से बाहर निकलने का शायद ही किसी का मन करता होगा…
और जब बाहर निकले तो एक नये शुकून, एक नये मुकाम के साथ एक दूसरे के करीब और करीब होते हुए…
सारी रात हम दोनो एक दूसरे के प्यार में डूबे रहे, और अपनी पहली रात के सफ़र में आगे बढ़ते रहे..
फिर एक नयी सुबह की आगाज़ के साथ, एक दूसरे की बाहों में लिपटे ना जाने कब नींद ने हमें अपने आगोस में ले लिया……!
दूसरे दिन मेरी नींद बहुत देर से खुली… किसी ने मुझे जगाया भी नही… लेकिन जब नाश्ते का समय हो गया.. तब भाभी ने आकर मुझे जगाया…
मेने सीधे उठ कर पहले भाभी के पैर छुये, फिर उनके गाल पर किस किया, उन्हें निशा और मुझे मिलाने के लिए थॅंक यू कहा.. और फ्रेश होने चला गया…
भाभी अपने गाल को प्यार से सहला कर मुस्कुराती हुई मुझे बाथरूम की तरफ जाते हुए देखती रही…
आधे घंटे में ही में रेडी होकर किचिन में पहुँचा ,… वहाँ निशा स्लॅब के साथ खड़ी नाश्ता तैयार कर रही थी…
मेने उसे पीछे से जाकर अपनी बाहों में भर लिया… वो इस समय एक हल्की सी साड़ी में थी, रात की खुमारी की वजह से उसकी पलकें अभी भी भारी हो रही थीं..
मेने पीछे से उसे बाहों में लेकर उसकी गर्दन पर किस करते हुए मॉर्निंग विश किया…
मेरे किस करते ही, पहले तो वो सिहर उठी, और फिर हँसते हुए वेरी गुड मॉरिंग जानू कहा और कसमसा कर मुझे छोड़ने के लिए रिक्वेस्ट करने लगी…
छोड़िए ना जानू ! कोई आ जाएगा… वो बोली
मेने अपनी कमर को उसकी गोल-गोल थोड़ी सी पीछे को उठी हुई गान्ड पर दबाते हुए कहा – आने दो.. !
कोई चोरी थोड़ी ना कर रहे हैं हम…! अपनी जान को प्यार ही तो कर रहा हूँ.., अब इसमें भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है…
निशा मेरे लंड का अहसास अपनी गान्ड की दरार के ठीक ऊपर महसूस कर के गन्गना उठी और सिसकते हुए बोली – आअहह….फिर भी अच्छा नही लगता..
प्लीज़ जानू छोड़ो ना, कोई देखेगा तो क्या कहेगा.. की देखो कैसे बेशर्म हैं ये दोनो, कल ही शादी हुई है.. और आज ही कैसे एक दूसरे से चिपके हुए है…
हम अभी ये बातें कर ही रहे थे कि, बड़े भैया पीछे से आ गये…
हमें इस तरह खड़े देख कर वो उल्टे पाँव लौट गये… निशा को कुछ आभास हुआ तो उसने कहा…
सीईईई….जानू अभी कोई था गेट पर… प्लीज़ छोड़ो ना… !
मेने उसे छोड़ दिया और उसके गाल और होंठों पर किस किया..…, मेरे ट्राउज़र में आगे तंबू बन गया था, जिसे अड्जस्ट करते हुए बाहर की ओर निकल गया….
आँगन में भैया भाभी से कुछ बात कर रहे थे… जब उनकी बातें मेरे कानो में पड़ी तो पता लगा कि वो हमारे बारे में ही बोल रहे थे..
भैया – मोहिनी ये छोटू कितना बेशर्म हो गया है… वहाँ किचन में ही वो निशा को पकड़ कर प्यार करने लगा… कुछ तो लिहाज करना चाहिए इसे…
भाभी – तो इसमें किसी को क्यों एतराज होना चाहिए… पति-पत्नी हैं वो दोनो.., नयी-नयी शादी हुई है…, प्यार ही तो कर रहे हैं… कोई झगड़ा तो नही कर रहे…
भैया – फिर भी कुछ तो मर्यादा होनी चाहिए…
भाभी – आप भी क्या सुबह-सुबह मर्यादा का पाठ लेकर बैठ गये… अब सब आपके जैसे तो नही हो सकते ना…!
मुझसे रहा नही गया और उनके पास जाकर बीच में बोल पड़ा – भैया..!
कभी – 2 ज़रूरत से ज़्यादा मर्यादायों में जकड कर आदमी अपने जीवन साथी की अपेक्षाओं की भी उपेक्षा करने लगता है…
भूल जाता है कि उसकी मर्यादाओं की उसके साथी को क्या कीमत चुकानी पड़ेगी..
मेरी बात सुन कर भैया, एकदम चुप पड़ गये… शायद अपने अंतर्मन में बीते हुए दिनो का मंथन कर रहे होंगे…
मेने आगे बढ़कर दोनो के पैर छुये और उनका आशीर्वाद लिया…
आशीर्वाद देने के बाद भैया बोले – शायद तू ठीक कह रहा था भाई… ज़रूरत से ज़्यादा मर्यादाओं का पालन, आदमी को बंधनों में जकड लेता है…
जो कभी-कभी शायद उसके आस-पास के लोगों के लिए हितकर नही होता… फिर वो भाभी को संबोधित कर के बोले – मेरा भाई काफ़ी समझदार हो गया है, क्यों मोहिनी..!
भाभी ने हूंम्म… कर के जबाब दिया और आगे बढ़ कर मेरा माथा चूम लिया..
फिर हम सबने मिलकर नाश्ता किया… भैया अपने कॉलेज चले गये और मे बाबूजी का नाश्ता लेकर खेतों की ओर चला गया, उनका भी आशीर्वाद लेने…
घर लौट कर मेने निशा को पकड़ा, और शाम तक, फिर देर रात तक हम दोनो एक दूसरे के प्यार में डूबे रहे…!
निशा की सारी झिझक, शर्म जो उसके नेचर में भरी हुई थी, कुछ घंटों में ही हवा हो चुकी थी, सेक्स को एंजाय करने में वो कोई मौका हाथ से नही जाने दे रही थी…!
दूसरे दिन सुबह का नाश्ता कर के मे भी भैया के जाने के बाद ही घर से निकल लिया, और सीधा शहर जा पहुँचा….
मेने अपनी बुलेट सीधे सहयोग हॉस्पिटल की पार्किंग में ही जाकर रोकी… बाइक स्टॅंड कर के सीधा डॉक्टर. वीना के कॅबिन की तरफ बढ़ गया…
वो अभी – 2 सुबह के राउंड में मरीज़ों को चेक कर के ही आई थी..और कुछ रिपोर्ट को सीरियस्ली रिव्यू करने में व्यस्त थी…
मे आइ कम इन डॉक्टर…मेने गेट पर खड़े होकर अंदर आने के लिए पूछा…
उसका ध्यान रिपोर्ट से हटकर आवाज़ की दिशा में गया…, मुझे देखते ही फ़ौरन उसके चेहरे के एक्सप्रेशन चेंज हो गये…
जो एक पल पहले तक सीरियस्ली किसी केस की स्टडी में लगी थी, अब वो एकदम से चहक उठी… और बोली ….
आओ-आओ..अंकुश ..! अरे भाई आप तो एकदम से गायब ही हो गये,… ना कोई फोन कॉल, ना और कोई खैर खबर…
मे उसके सामने जाकर बैठ गया.. और बोला –
सॉरी डॉक्टर ! मे थोड़ा ज़्यादा ही बिज़ी हो गया था अपने कामों में…. आज ही फ़ुर्सत हुआ हूँ,.. और देखिए आपके सामने हाज़िर हो गया…
वो – एनीवेस ! कहिए.. क्या सेवा की जाए तुम्हारी..? आइ मीन क्या लोगे.. ठंडा… , गरम… या और कुछ.. ये कहकर उसने अपनी एक आँख दबाई…
मे मुस्करा कर बोला – ये बंदा तो आपके हुक्म का गुलाम है.. आप जो देना चाहेंगी.. ले लूँगा…!
वो – अभी तो चाय-कॉफी से ही काम चलाना पड़ेगा.. वाकी के लिए समय नही है.. तो बोलो क्या लोगे.. चाय या कॉफी…
मे – जो आप लेना चाहें…वही मे भी ले लूँगा…
उसने बेल बजाकर ऑफीस बॉय को अंदर बुलाया और उसको दो कॉफी लाने को कहा…फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोली …
और कोई सेवा हो तो बताओ… अरे हां उसका क्या हुआ जो तुमने रिपोर्ट ली थी.. वो तो अभी भी यहीं बहाने बनाए पड़ा हुआ है…!
मे – दर्सल मे उसी सिलसिले में आपसे बात करने आया था..
वो – हां बोलो… मे और क्या कर सकती हूँ तुम्हारे लिए..?
मे – असल में घी सीधी उंगली से नही निकल रहा.. तो उंगली अब टेडी करनी ही पड़ेगी.. और उसमें मुझे आपकी थोड़ी मदद चाहिए..
वो – हुक्म करो मेरे आका ! कह कर वो खिल-खिला पड़ी..!
मे – आप उसे डिसचार्ज क्यों नही कर देते…, वो ज़बरदस्ती तो कर नही सकता यहाँ रहने के लिए…
वीना – नही कर सकते ना, हॉस्पिटल के ही एक बड़े ट्रस्टी का सिफारिश है, उसे यहाँ रखने का, जब तक वो चाहे…
मे – तो फिर अब एक ही रास्ता है,… अब उसे यहाँ से ज़बरदस्ती उठाना पड़ेगा.. और उसके लिए आपको उसे कोई ऐसा ड्रग देना पड़ेगा.. जिससे वो शारीरिक तौर पर तो काम करे लेकिन मानसिक तौर पर अचेत रहे…
वो कुछ देर सोच में पड़ गयी… मेने कहा – अगर आपके लिए कोई मुश्किल हो तो रहने दीजिए.. मे कोई और रास्ता निकाल लूँगा…
वो – नही ऐसी बात नही है.. ऐसा ड्रग तो है मेरे पास पर…, लेकिन कोई रिस्क ना हो.
मे – उसकी आप चिंता मत करो, वापस आपके पास ऐसी कोई कंप्लेंट नही आएगी इसके लिए…
फिर वो मेरी हेल्प करने को तैयार हो गयी…, तब तक कॉफी भी आ गयी..हम दोनो ने कॉफी पी, फिर मेने उसको अपना नंबर शेयर किया..
जब भी वो फ्री हो मुझे कॉल कर्दे.. मे हाज़िर हो जाउन्गा उसकी सेवा में..
डॉक्टर वीना उसके बाद भानु के रूम में गयी, जो एक स्पेशल रूम लेकर मौज ले रहा था.. और उसको चेक-अप के बहाने एक इंजेक्षन दे दिया…
इस समय वो अकेला ही था… मालती अपने फ्लॅट पर थी… कुछ देर बाद उसे इंजेक्षन का असर होने लगा…
डॉक्टर वीना ने इशारा किया कि अब वो उस ड्रग के असर में आ चुका है.. और दो-ढाई घंटे से पहले नॉर्मल नही होगा…
इशारा पाते ही मे उसे एक वॉर्डबॉय की मदद से अपनी बाइक तक लाया, उसे पीछे बिठाया और ले उड़ा उसे हॉस्पिटल से कहीं दूर एकांत में,
जहाँ अकेले में उससे सारे राज उगलवाए जा सकें, जो उसने अपने जेहन में छिपा रखे थे अब तक..….!
मे भानु को लेकर जंगल की ओर निकल गया… जहाँ मेने एक बार दूसरे शहर से आते वक़्त जंगल के बीचो बीच एक खंडहर को देखा था…!
वैसे तो खंडहर बिल्कुल टूटा-फूटा पड़ा था, ये शायद किसी जमाने में किसी का चरागाह रहा होगा… ज़यादा बड़ा भी नही था…
इसमें एक कमरा कुछ ठीक-ठाक हालत में था, मेने भानु को उसी कमरे में लाकर बिठा दिया… उसका शरीर तो काम कर रहा था… लेकिन दिमाग़ जैसे सोया पड़ा था…
वहाँ बिठाते ही वो वहीं ज़मीन पर पसर गया… और कुछ देर में ही नींद में चला गया…
मे उस कमरे के टूटे फूटे गेट को बाहर से बंद कर के जंगल में ऐसे ही समय पास करने घूमने निकल गया… कुछ दूरी पर एक छोटी सी नदी बह रही थी…
उसी के किनारे पेड़ों की छाया में आके मे बैठ गया.. और नदी के बहते पानी में छोटे- 2 पत्थर फेंकने लगा…
बैठे – 2 मे अपने पुराने दिनो की याद में खो गया… स्कूल और फिर कॉलेज के दिनो की घटनायें, फिर ग्रॅजुयेशन के बाद घरवालों का प्रेशर डाल कर मुझे लॉ कॉलेज भेजना…
मेरा सपना था… साइन्स में कुछ रिसर्च फील्ड में आगे बढ़ने का.. लेकिन बाबूजी के सुझाव पर सबने मिलकर मुझे लॉ करने के लिए प्रेशर डाला…
और देल्ही के मशहूर कॉलेज में अड्मिशन करा दिया… और ना चाहते हुए मुझे देल्ही जाना पड़ा…
वहीं कॉलेज के हॉस्टिल में रहकर मे पढ़ाई करने लगा… और धीरे – 2 मुझे लॉ के सब्जेक्ट्स में इंटेरेस्ट आने लगा और हमेशा की तरह अपने बॅच का फ्रंट रो स्टूडेंट बन गया….
शुरू-2 में घर की यादें, भाभी, डीडियों और चाची के साथ बिताए वो लम्हे याद कर के दुखी भी हो जाता…
निशा से सारे कॉंटॅक्ट टूट चुके थे… लेकिन अपने घर पर में फोन से बात करता रहता, और भाभी से ही उसके बारे में पता कर लेता था…
इन्ही सब में कब एक साल निकल गया.. पता ही नही चला…
दूसरा साल शुरू हो चुका था.., अब मे भी कॉलेज के माहौल मे अपने आपको ढल चुका था, हॉस्टिल की लाइफ रास आने लगी थी मुझे…!
बारिश का सीज़न शुरू होने जा रहा था…, ऐसे समय में देल्ही की उबाउ गर्मी.. बहुत परेशान करती है…
मे एक दिन सनडे की शाम को पास ही एक थियेटर में मूवी देखने निकल गया…
लौटते में शाम घिर आई थी… थियेटर से बाहर निकला तो देखा.. मौसम एकदम बदला हुआ था…
एकदम से अंधेरा सा छा गया था, घटायें उमड़-गुमड़ रहीं थी आसमान में, हवायें भी तेज चल रही थी, लगभग आँधी का रूप धारण कर चुकी थी…
तेज हवा के साथ, धूल मिट्टी, आँखों को बंद होने पर मजबूर कर रही थी…
इससे पहले की बारिस शुरू हो मे वहाँ से तेज-तेज कदमों से अपने हॉस्टिल की तरफ बढ़ने लगा… मेरा हॉस्टिल वहाँ से कोई 2 या 2.5 किमी की दूरी पर ही था…,
सो कोई साधन ना मिलने की वजह से पैदल ही निकल पड़ा…
अभी में कुछ दूर ही निकला था, .. कि जोरदार आँधी के साथ बूंदा-बंदी शुरू हो गयी… जो एक आम बात थी, देल्ही में इस मौसम में..
मेने अपनी चाल और तेज करदी… लेकिन मौसम से तेज नही चल सका… और तेज बौछारो के साथ बारिश ने मुझे घेर लिया…,
अब भीगने के अलावा और कोई चारा नही बचा था मेरे पास..
तो अपनी सामान्य गति से ही चलता हुआ आ रहा था, पहली बारिश का लुफ्त उठाते हुए…
वैसे भी तेज हवाओं के कारण बारिस की बूँदें इतनी तेज शरीर पर पड़ रही थी मानो शरीर में कोई सूइयां चुभा रहा हो..
मुँह पर बारिस की तेज बूँदें इतनी तेज पड़ती की आँखें खोलना दूभर हो रहा था… रोड पर ट्रॅफिक ना के बराबर हो गया था…
मे अपने हॉस्टिल की ओर जाने वाले कॉलोने के सिंगल रोड पर जैसे ही मुड़ा… सामने का दृश्य देख कर मेरे पैर जहाँ के तहाँ जम गये…
घनघोर बारिश में चार बदमाश एक लड़की के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती कर रहे थे… उनके एक तरफ एक मारुति वॅन खड़ी थी,
जो शायद उन बदमाशों की थी…, दूसरी साइड में एक सफेद रंग की अक्तिवा लुढ़की पड़ी थी, जो शायद उस लड़की की होनी चाहिए…
वो लड़की अपने को उन बदमाशों से बचने का हर संभव प्रयास कर रही थी…और चीख पुकार भी करती जा रही थी…
लेकिन इस तेज हवा और बारिस में उसकी पुकार सुनने वाला वहाँ कोई नही था, और वैसे भी दिल्ली जैसे शहर में कोई किसी का साथ देने नही आता…
मे कुछ देर वहीं खड़ा ये सब देखता रहा…
वो कभी एक बदमाश के हाथ से छूटती, तो दूसरा पकड़ लेता, उससे छूटती तो तीसरा…
सच कहूँ तो मेरी भी हिम्मत नही हो रही थी कि मे उस लड़की की कोई मदद कर सकूँ…
क्योंकि देल्ही की गुंडागर्दी के बारे में पिच्छले एक साल में बहुत कुछ सुन चुका था मे…
यहाँ आए दिन मर्डर… बीच सड़क पर बलात्कार होना आम बात थी… लोग देख कर भी अनदेखा कर के निकल जाते हैं…
ऐसे में बैठे बिठाए मुशिबत मोल लेना बेवकूफी ही थी…, लेकिन एक मजबूर लड़की की मदद ना करना…कहीं ना कहीं ये भी ग़लत लग रहा था मुझे.
मेरा जमीर मुझे अनदेखा कर के वहाँ से जाने भी नही दे रहा था…
मे अभी कोई निर्णय नही ले पाया था… की वो लड़की ना जाने कैसे उन गुण्डों के चंगुल से निकल भागी… शायद उसकी नज़र मेरे ऊपर पड़ गयी थी…
सो भागते हुए वो मेरे पास आ गयी… और हाथ जोड़ कर मुझसे मदद करने के लिए गिडगिडाने लगी….
मे बुत बना उस भीगी हुई लड़की को देखता रहा…, भीगने से उसके टाइट फिटिंग टॉप और जीन्स और ज़्यादा शरीर से चिपक गये थे, जिसकी वजह से उसके अन्तर्वस्त्र भी साफ-साफ उजागर हो रहे थे…
तब तक उनमें से दो बंदे वहाँ आ पहुँचे और उन्होने उस लड़की के दोनो बाजुओं को फिरसे थाम लिया…
वो अभी भी अपने हाथ जोड़े मुझसे मदद की भीख माँग रही थी, साथ ही साथ उनसे अपने आप को छुड़ाने का प्रयास भी करती जा रही थी…
तभी उनमें से एक गुंडा बोला… अबबे साली चल, ये लौंडा क्या बचाएगा तुझे… इसे क्या अपनी जान प्यारी नही है क्या…
ओये हीरो…! चल निकल ले यहाँ से… वरना खम्खा मारा जाएगा…
बात अब अपनी मर्दानगी पर आ गयी थी, सो मेने अब अपनी टाँग अड़ाने का फ़ैसला कर लिया…, और उस गुंडे की बात ख़तम होते ही बोल पड़ा…
अरे भाई लोगो… क्यों बेचारी अकेली लड़की को परेशान करते हो … जाने दो ना उसे…
वही गुंडा – अब्बे ! मेरी बात तेरे भेजे ना पड़ी के… निकल ले यहाँ से वरना…!
मेने उसकी बात में ही काटते हुए कहा – वरना के..?
ये सुनते ही उसकी झान्टे सुलग गयी, और उस लड़की का बाजू छोड़कर मेरी तरफ झपटा… उसका इरादा मेरे मुँह पर घूँसा जड़ने का था…
मेने पीछे हटके उसका वार खाली कर दिया और साइड में होकर उसका वही हाथ थामा…, पलटा…, उसे अपनी पीठ पर लिया और इतनी ज़ोर से से रोड पर धोबी पछाड़ मारा… कि उसकी कमर कड़क से टूट गयी…
अब वो लाख कोशिशों के बाद भी उठने की स्थिति में नही था…
अपने साथी का हश्र देख कर वो दूसरा उस लड़की को छोड़ कर अपने दूसरे दो साथियों की तरफ भागा…
उसने जैसे ही वहाँ से भागने की कोशिश की मेने उसका गिरेबान पीछे से पकड़ा…वो एक हल्के शरीर का बंदा था, तो उसे भी गले से पकड़ कर ऊपर उठाया और दे पटका रोड पर…
तब तक वो दोनो परिस्थिति को समझ चुके थे और भागते हुए मेरी ओर झपटे…
उनमें से एक के हाथ में रिवॉल्वार था… और दूसरे के हाथ में रामपुरी चाकू…
वो लड़की डर के मारे थर-थर काँप रही थी… मेने उसे अपने पीछे खड़े होने को कहा..
वो मेरी पीठ से चिपक कर खड़ी, थर-थर काँप रही थी,
इतने में वो दोनो हमारे पास तक पहुच गये…
वो रेवोल्वर वाला अपने दोनो साथियों को, ज़मीन पर पड़े तड़पते हुए देख कर गुस्से से लाल भभुका हो उठा और अपना रेवोल्वर मेरे ऊपर तान कर गुर्राया…
बहुत हेरोपंति हो गयी..छोरे…इब तेरा खेल ख़तम करना ही पड़ेगा… इतना कहते ही उसने मेरे ऊपर गोली चला दी…
मेने बचने की कोशिश भी की लेकिन फिर भी वो मेरे बायें कंधे में घुस गयी…
मुझे लगा मानो कोई गरम लोहा मेरे कंधे में घुसकर जला रहा हो…गोली लगते ही में पीछे को चक्कर ख़ाता चला गया…
अपने को संभालने की सारी कोशिशों के बाद भी मे ज़मीन पर गिर पड़ा…
सीधे हाथ से अपने कंधे को दबाए हुए मे दर्द से तड़प रहा था…
वो रेवोल्वर वाला ठहाके मरता हुआ मेरे सर पर आकर खड़ा हो गया…और मुझे गालियाँ बकते हुए वो मेरे सीने में गोली उतारने के लिए उसने निशाना ले लिया…,
मुझे आज अपना अंतिम समय नज़दीक दिखाई दे रहा था,
लेकिन कहते हैं ना कि जाको राखे साईयाँ मार सके ना कोई…
इससे पहले की वो ट्रिग्गर दबाता, कि तभी एक लोहे के पाइप का वार उसके रिवॉल्वार वाले हाथ पर पड़ा…,
उसकी रेवोल्वर हाथ से छूट कर कहीं गिर पड़ी, और वो अपना हाथ पकड़ कर दर्द से बिलबिलाता हुआ ज़मीन पर बैठता चला गया……..!
हुआ यौं कि, जैसे ही पहली गोली जो मेरे कंधे मैं लगी थी, मुझे गोली लगते ही वो लड़की डर के मारे पीछे को भाग खड़ी हुई….
वो थोड़ा सा ही पीछे हटी थी, कि उसका पैर वहीं साइड में पड़े एक दो फुट लंबे 1” मोटे लोहे के पाइप से टकरा गया…
उसने वो पाइप का टुकड़ा उठा लिया…, उसे हाथ में लेकर वो सोचने लगी, कि एक अंजान आदमी जो उसकी मदद करने की वजह से मौत के मुँह मैं घिर चुका है, उसे इस तरह अकेला छोड़कर यौं भागना ठीक नही है…
उसे उसकी मदद करनी ही चाहिए, अभी वो ये सब सोच ही रही थी, कि तभी उसके कानों में उस गुंडे के ठहाके सुनाई पड़े,
पाइप पर उसके हाथों की पकड़ मजबूत हो गयी, और वो हिम्मत जुटाकर पलटी,… इससे पहले की वो गुंडा मेरे सीने में गोली उतारता, पूरी ताक़त से उसने वो पाइप उस गुंडे के रेवोल्वर वाले हाथ पर दे मारा…
रेवोल्वर उसके हाथ से छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ी, और वो गुंडा अपनी कलाई थामे ज़मीन पर बैठ गया, दर्द के कारण बिलबिलाता हुआ वो अपनी कलाई थामे दर्द कम होने के इंतेज़ार में था..
तब तक उस चाकू वाले ने एक हाथ से उस लड़की का गला पकड़ लिया..और दूसरे हाथ में थामे चाकू को उसके पेट में घुसाने वाला ही था कि…
मे अपनी पूरी चेतना शक्ति समेट कर उठ खड़ा हुआ और उस चाकू वाले गुंडे की कमर में लपेटा मारा और पूरी ताक़त से ज़मीन पर दे मारा…
जोश में आकर पटकने के कारण उसका सर सबसे पहले नीचे आया… और सड़क पर टकराने की वजह से उसका सर फट गया…
इतने में उस रेवोल्वर वाले ने अपने दर्द पर काबू पाकर पीछे से मेरे घायल कंधे को जकड लिया…और जोरे देकर मेरे जख्म पर दबाब डालने लगा…
मेरे गोली लगे कंधे में दर्द की एक तेज लहर दौड़ गयी, और लाख रोकने के बावजूद भी मेरी चीख निकल गयी…
जख्म से खून का रिसाब तेज हो गया…, दर्द और खून की कमी होने की वजह से मेरी आँखें बंद होने लगी…
तभी उस लड़की ने उसी पाइप का एक जोरदार प्रहार उसके सर पर किया… वो अपना सर पकड़ कर लहराता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा… और बेहोश हो गया…
इधर मे भी दर्द के कारण अपनी चेतना खोता जा रहा था, मेरे कंधे से लगातार खून बहरहा था,…
इससे पहले की मे चक्कर खाकर ज़मीन पर गिरता… उस लड़की ने मुझे थाम लिया और जैसे तैसे कर के मुझे घसीटती हुई अपनी स्कूटी तक ले गयी….
उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नही चला…जब मेरी आँख खुली तो मे एक बेड पर लेटा हुआ था….
मेने धीरे से अपनी आँखें खोली और इधर-उधर देखने लगा…
अपने को एक अजनबी जगह पर पाकर मे झटके से उठ कर बैठ गया…झटके के कारण मेरे कंधे में दर्द की एक टीस सी उठी.. और मेरे मुँह से एक कराह निकल गयी…
मेरी कराह सुन कर पास में बैठी वो लड़की जो एक कुर्सी पर बैठी उंघ रही थी… उठ कर उसने मेरे बाजू को थाम कर फिर से लिटा दिया और बोली ….
लेटे रहो … अभी तुम्हारा घाव ताज़ा है… !
मेने उसे पूछा – मे कहाँ हूँ…?
वो – मेरे घर में हो, अब हम सुरच्छित हैं… तुम्हारी गोली निकाल दी गयी है.. लेकिन घाव ठीक होने में कुछ वक़्त लगेगा… तुम सो जाओ, सुबह बात करते हैं..
मेने अपने खुश्क होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा – मुझे प्यास लगी है… तो उसने मुझे पानी पिलाया और बोली – कुछ खाना चाहोगे…?
मे – नही… पर अभी वक़्त कितना हुआ है…? तो उसने अपनी घड़ी पर नज़र डाली और बोली – अभी रात के 3 बजे हैं…
मे – तो क्या में इतनी देर तक बेहोश रहा…?
वो – हां ! डॉक्टर ने तुम्हें बेहोसी का इंजेक्षन दिया था, गोली निकालने से पहले… शायद उसी का असर रहा होगा इतनी देर तक…
पानी के साथ ही उसने मुझे एक गोली और खाने को दी, जिसके असर से मुझे कुछ देर बाद फिरसे नींद आ गयी और फिर जाकर सुबह ही आँख खुली…
जब मेरी आँख खुली, तो वो लड़की इस समय मेरे पास नही थी… मे बेड से उठ खड़ा हुआ और गेट खोल कर बाहर आ गया…जो एक बड़े से हॉल में खुलता था…
मुझे देखते ही हॉल में बैठे अधेड़ दंपति… मेरी ओर लपके और मुझे पकड़ कर सोफे पर बिठा दिया…
मे उन्हें देख कर चोंक गया… और मेरे मुँह से निकल पड़ा… सर आप ?
वो अधेड़ कोई और नही हमारे लॉ कॉलेज के सबसे काबिल सीनियर प्रोफेसर राम नारायण श्रीवास्तव थे…
प्रोफ़ेसर – हां ! और तुम शायद मेरे स्टूडेंट अंकुश शर्मा हो..? नेहा मेरी बेटी है…
मे – कॉन नेहा ?
प्रोफ़ेसर – जिसकी तुमने उन गुण्डों से इज़्ज़त बचाई है…वो मेरी बेटी नेहा है… लॉ करने के बाद मेरे साथ ही प्रॅक्टीस कर रही है…
जिन गुण्डों ने उसपर ये हमला किया था, दो दिन पहले उनके लीडर को हमने कत्ल के जुर्म में सज़ा दिलाई थी… शायद इसी कारण वो नेहा से बदला लेना चाहते होंगे..
लेकिन भगवान ने किसी फरिश्ते की तरह तुम्हें वहाँ भेज दिया… और एक अनहोनी होने से बच गयी…
हम ये बातें कर ही रहे थे… कि तभी वहाँ नेहा आ गयी.. उसने अपने मम्मी-दादी को गुड मॉर्निंग कहा, फिर मुझे गुड मॉर्निंग कह कर मेरा हाल चाल पूछा…
प्रोफ़ेसर – बेटी ये अंकुश शर्मा है, मेरा सेकेंड एअर का बहुत होनहार स्टूडेंट… देखो एश्वर ने क्या संयोग रचा.. कि इसे वहाँ तुम्हारी मदद के लिए भेज दिया…
इसकी जगह कोई और होता तो शायद वो वहाँ रुकता ही नही…हमें इसका एहसानमंद होना चाहिए…
मे – सर ! ये कह कर आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं… मे नही जानता था, कि ये आपकी बेटी हैं…
बस मेरे जमीर ने कहा.. कि मुझे इनकी मदद करनी चाहिए.. सो वहाँ रुक गया…और जो बन पड़ा वो किया…
नेहा – नही ! तुमने जिस साहस और दिलेरी से उन गुण्डों का सामना किया, ये हर किसी के बस की बात नही थी… थॅंक यू वेरी मच अंकुश..! मे तुम्हारा ये एहसान जिंदगी भर नही भूलूंगी..
मे – आप भूल रही हैं नेहा जी, थॅंक यू तो मुझे कहना चाहिए आपको, कि आपकी दिलेरी और सूझ-बुझ के कारण आज मे यहाँ जिंदा बैठा हूँ…
प्रोफेसर और उनकी पत्नी यानी नेहा की मम्मी किनकर्तव्यविमूढ़ से हम दोनो की बातें सुन रहे थे… तो मेने उन्हें सारा वाकीया डीटेल में बता दिया…
वो दोनो अपनी बेटी को प्रशंसा भरी नज़रों से देख रहे थे… फिर वो बोले – चलो अच्छा हुआ कि तुम दोनो ने ही मिलकर एक दूसरे की मदद की…
लेकिन बेटे.. ये बात भी अपनी जगह बहुत मायने रखती है कि, तुमने जो एक अंजान लड़की के लिए किया है, आज के जमाने में कोई किसी के लिए अपनी जान जोखिम में नही डालता…!
इन्ही बातों के दौरान हम सबने नाश्ता किया… नेहा की मम्मी किसी एनजीओ के लिए काम करती थी, कुछ देर बाद वो दोनो अपने-अपने काम पर निकल गये….!
मेने भी अपने हॉस्टिल जाने के लिए नेहा से कहा, तो वो मुझे घुड़कते हुए बोली…
बिल्कुल नही… तुम कहीं नही जाओगे… जब तक कि पूरी तरह से ठीक नही हो जाते..इट्स आन ऑर्डर… और ये कह कर वो मुस्कराने लगी…
मे – लेकिन मी लॉर्ड ! मेरे कपड़े तो देखो.. खून से सने हुए हैं.. फ्रेश भी होना है.. तो जाना तो पड़ेगा ही ना…
वो ऑर्डर देते हुए बोली – कोई ज़रूरत नही, अपने रूम की चावी दो मुझे.. मे अभी तुम्हारे कपड़े मँगावती हूँ तुम्हारे रूम से…
मेने हथियार डालते हुए.. अपनी जेब से उसे चावी निकाल कर दी, और अपना रूम नंबर. बताया…
उसने फ़ौरन अपने नौकर को भेज कर मेरे कपड़े मंगवा दिए.. फिर मे वहीं फ्रेश हुआ, जिसमें नेहा ने भी मेरी मदद की,
मुझे फ्रेश करते समय, नहाने के दौरान मेरी कसरती बॉडी को देखकर वो बिना इंप्रेस हुए नही रह पाई…
फिर नेहा ने मुझे दवा दी… और बैठ कर एक दूसरे से गप्पें लगाने लगे…
मुझे नेहा और प्रोफेसर ने एक हफ्ते अपने घर पर ही रखा… इन दिनो में नेहा हर संभव मेरी हर ज़रूरत का ख्याल रखती थी,
यहाँ तक कि शुरू के, एक दो दिन तो उसने अपने हाथों से मुझे फ्रेश होने में मेरी मदद की…
उसके मुलायम हाथों का स्पर्श अपने नंगे बदन पर पाकर में सिहर उठता, और शायद वो भी उत्तेजित होने लगती…..,
कंधे को सेफ रख कर वो मुझे नहलाती भी… उसके बदन की खुसबु, और स्पर्श से मेरी उत्तेजना बढ़ने लगती..
नहाने के दौरान कुछ पानी उसके कपड़ों को भी गीला कर देता, जिससे उसके कपड़े बदन से चिपक जाते, और उसके बदन के कटाव झलकने लगते..
जिसे देखकर मे और ज़्यादा उत्तेजित होने लगता था, और इकलौते अंडरवेर में मेरा लंड तंबू बनके खड़ा हो जाता.. जिसे वो बड़े गौर से निहारती रहती….
जब मेरी नज़र उसकी नज़रों से टकराती.. तो वो शर्म से अपनी नज़र वहाँ से हटा लेती… और मन ही मन मुस्करा उठती…
मेरी हाइट उससे कुछ ज़्यादा ही थी, तो जब वो तौलिए से मेरे सर को सुखाती, तो उसे अपने हाथ ऊपर करने पड़ते, जिससे उसके मुलायम बूब्स मेरे शरीर से टच हो जाते…,
वो भी शायद उत्तेजित हो जाती थी, जिस कारण से मेरा सर रगड़ने के बहाने अपने बूब्स मेरे बदन के साथ रगड़ देती…
कभी कभी मेरा खड़ा लंड उसकी कमर पर टच हो जाता, तो वो अपने पंजों पर उचक कर उसे अपनी मुनिया पर फील करने की कोशिश करती…
मे जान बूझकर और अपनी गर्दन अकडा देता, तो उसे और ज़्यादा उचकना पड़ता, जिससे मेरा पप्पू उसकी मुनिया के साथ और ज़्यादा खिलवाड़ करने लगता, वो धीरे से सिसक पड़ती..
ऐसी ही प्यार भरी छेड़-छाड़ और खट्टी-मीठी यादों के चलते मेरा एक हफ़्ता उनके घर पर कब निकल गया मुझे पता ही नही चला..
आख़िर कार मे बिल्कुल ठीक होकर एक दिन अपने हॉस्टिल वापस लौट गया….!
अभी मे अपने अतीत के पन्ने पलटने में खोया हुआ कुछ और आगे बढ़ता, कि तभी मुझे भानु की याद आ गयी,…ओये तेरी का !!…
साला में तो भूल ही गया था उसको…, मेने तुरंत अपनी घड़ी . पर नज़र डाली…
यहाँ बैठे बैठे मुझे दो घंटे हो चुके थे, … मे वहाँ से फटाफट भागा और खंडहर मे पहुँचते ही उस कमरे का दरवाजा खोला…
भानु जाग चुका था, और ज़मीन पर बैठा गुस्से में भुन्भुना रहा था…
मुझे देखते ही वो भड़क उठा.., झटके से खड़ा होकर मेरी तरफ लपका, और तेज आवाज़ में गुर्राते हुए बोला – तो तू मुझे यहाँ लाया है हरामजादे…!
अपना बदला लेना चाहता है ना… ? चल मार डाल मुझे.. ,ले-ले अपना बदला..
मेने उसके कंधे पकड़ कर एकदम शांत लहजे में कहा – भानु भैया… शांत हो जाओ…, और ज़रा ठंडे दिमाग़ से सोचो,
मुझे तुम्हें मार कर ही बदला लेना होता तो यहाँ लाने की ज़रूरत ही क्या थी, और क्यों तुम्हें होश में आने देता…
जब चाहता, तुम्हारा गेम बजा सकता था…क्यों कुछ ग़लत कह रहा हूँ मे .. ?
वो सोचने लगा, मेरी बात भी सही थी… फिर क्या वजह है, जो मे उसे यहाँ उठा लाया था, यही सब सोचने लगा वो, जब किसी नतीजे पर नही पहुँच पाया तो आख़िर में पुच्छने लगा…
तो इस तरह यहाँ क्यों लेकर आए हो मुझे…?
मे – देखो भानु भैया..! तुम्हारे पिताजी ने मेरे घर आकर तुम्हारे कुकार्मों की एक बार माफी माँगी थी,… और अश्वाशन दिया था कि आइन्दा ऐसा कुछ भी तुम हमारे साथ नही करोगे…
और भविष्य में दोनो परिवारों के बीच संबंध अच्छे रहें, इसकी भरसक कोशिश करते रहेंगे…
बावजूद इसके तुमने वो घिनोना काम कर दिया.. जो किसी भी डिस्कनारी में माफी के लायक नही है, ऊपर से तुमने मुझे मारने के लिए गुंडे भी भेजे..
फिर भी मेने सोचा कि चलो कोई बात नही, अपने इलाक़े के ज़मींदार की इज़्ज़त का सवाल है, अब उन्हें कोई तकलीफ़ है, तो आपस में मिल बैठ कर सुलटा लेते हैं….!
मुझे ये भी पता था कि तुम सीधी तरह से मेरे साथ बात करने वाले थे नही, तो इसलिए तुम्हें यहाँ इस तरह लाना पड़ा…!
अब इसमें तुम्हें कोई तकलीफ़ हुई हो तो माफ़ करना…
वैसे जिस तरह से मुझे तुम्हारे खानदान की इज़्ज़त की फिकर है, क्या उसी तरह तुम्हें भी अपने परिवार की मान –मर्यादा की फिकर है..?
वो एकदम तैश में आते हुए बोला – मे किसी की जान भी ले सकता हूँ, अगर मेरे परिवार की इज़्ज़त पर आँच भी आई तो…
मेने आगे कहा – बहुत अच्छी बात कही तुमने ! सुनकर खुशी हुई.. कि तुम्हें अपनी मान-मर्यादा का इतना ख़याल है…
लेकिन भाई मेरे दूसरे की इज़्ज़त का ज़रा भी ख़याल नही किया तुमने…! क्या दूसरों की कोई इज़्ज़त नही होती..?
वो घमंड के साथ अकड़ कर बोला – हुन्न्ह… ऐसे छोटे-मोटे लोगों की भी कोई इज़्ज़त होती है…, जो तुम उसकी हमारे खानदान से तुलना करने लगे…
मे – तो तुम्हारा कहने का मतलब है, कि तुम्हारी इज़्ज़त, इज़्ज़त है, दूसरे की कोई इज़्ज़त नही…!
मेरी बात सुनकर उसने उपेक्षा से सर घुमा लिया…
फिर मेने अपने मोबाइल में एक फोटो ओपन कर के उसके सामने कर दिया जिसमें
मालती नंग-धड़ंग अपने घुटनों पर बैठी, अपनी चूत में उंगली डाले हुए मेरा लंड चूस रही थी…
मेरा चेहरा तो उसमें था नही… वो फोटो दिखाते हुए मेने कहा – इस फोटो को देख कर बताना… ये कॉन है…?
फोटो देखते ही भानु के होश उड़ गये… उसके होंठ सुख गये, आवाज़ गले में ही अटकी रह गयी…
मेने फिर पूछा – बताओ भानु भैया… ये कॉन है…?
वो हकलाते हुए बोला – य.ये.ये…ये फोटो तुम्हें कहाँ से मिली… और ये लड़का कॉन है…?
मे – मेने इस फोटो के बारे में पूछा है.. क्या तुम इस लड़की को जानते हो…?
वो – नही ! मे नही जानता ये कॉन है…!
मे – चलो कोई नही, फिर तो कोई बात ही नही है…, चलो ऐसा करते हैं, थोड़ा मनोरंजन करवा देता हूँ तुम्हें और मेने मालती के साथ की हुई चुदाई का वीडियो चला दिया,
जिसमें मेरी आवाज़ म्युट की हुई थी, और सिर्फ़ मेरा पिच्छवाड़ा ही दिखाई दे रहा था..,
अगर कहीं मेरा थोबड़ा दिखना होता, वहाँ शेड कर दिया था,
ऑडियो और वीडियो जैसे- 2 चलता गया…, भानु के होश गुम होते गये… गुस्से में उसकी आँखें लाल हो गयी…गला सूखने लगा…
इससे पहले की वो छोटी सी क्लिप ख़तम हो पाती उसके गले से गुर्राहट निकलने लगी.. और वो मेरे मोबाइल की ओर झपटा…
मेने अपना हाथ पीछे खींच लिया…, तो वो गुर्राते हुए बोला – मे तेरा खून पी जाउन्गा हरामजादे…ये कहते ही उसने मेरे ऊपर झपट्टा मारा…
तडाक….मेरा भरपूर तमाचा उसके गाल पर पड़ा…., वो पीछे को उलट गया…, फिर मेने उसका गिरेबान थाम कर एक और तमाचा उल्टे हाथ का दूसरे गाल पर जड़ दिया..
और सर्द लहजे में मेने उससे कहा – जब तुझे पता है, कि तू मेरी झान्टे भी नही उखाड़ सकता तो ये हिमाकत क्यों की…?
दूसरी बात ! जब तू इस लड़की को जानता ही नही.. तो फिर इतना भड़क क्यों रहा है…?
वो चिल्लाते हुए बोला – ये मेरी बीवी है हरामज़ादे… बता ये वीडियो कब और किसके साथ लिया है तूने…?
मे – चिल्लाना बंद कर भानु..! वरना वो गत करूँगा.. कि तेरा बाप भी तुझे पहचानने से इनकार कर देगा…!
इससे पहले कि में तेरे खानदान की इज़्ज़त की और धज्जियाँ उड़ा दूं.. और इस वीडियो को इंटरनेट पर डाउनलोड करूँ,
जिसे सारी दुनिया के मर्द देख-देख कर तेरी मस्त जवान बीवी के बदन को सोच-सोच कर मूठ मारें…!
और अगर फिर भी तुझे अपनी बीवी की इज़्ज़त प्यारी ना हो तो मे इसे अदालत में भी पेश कर सकता हूँ, जहाँ दो मिनिट में ये साबित हो जाएगा की तू कितना बड़ा झूठा है,
तू सारी दुनिया के सामने नंगा हो जाएगा…, फिर बजाते रहना अपने खानदान की इज़्ज़त की धज्जियाँ…
इसलिए अब मेरी बात ध्यान से सुन…अगर तू चाहता है कि ये वीडियो कोई और ना देखे, या अदालत के सामने ना आए…, तो तुझे मेरी कुछ शर्तें माननी पड़ेंगी…
वो झट से मेरी तरफ देखने लगा, उसके पास और कोई चारा नही बचा था, सो अपने कंधे झुका कर हथियार डाल दिए और गिड-गिडाते हुए बोला…
मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है अंकुश, पर इस वीडियो को किसी और को मत दिखाना प्लीज़… वरना मेरे खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी…,
हम किसी को मुँह दिखाने लायक नही रहेंगे, हम बर्बाद हो जाएँगे…
मे – तो अब मेरी शर्तें सुन…
शर्त नंबर. 1 – तुझे राजेश के खिलाफ किया गया केस वापस लेना होगा, ये कह कर कि चाकू मेरी ही ग़लती से लगा था, वो तो सिर्फ़ अपना बचाव कर रहा था…
वो – लेकिन ऐसे तो मे फँस जाउन्गा…
मे – तुझे जैल नही होगी, ये वादा है मेरा, हां कुछ मुआवज़ा ज़रूर देना पड़ेगा… जो तेरे लिए कोई बड़ी बात नही है…
उसने हां में गर्दन हिला दी…
शर्त नंबर. 2 – तू मालती से कुछ नही कहेगा, और उसे एक अच्छे पति की तरह ही रखेगा… अगर तूने उसे कुछ भी नुकसान पहुँचाया तो समझ ले मे क्या कर सकता हूँ…,
वो तुरंत बोल पड़ा – मुझे मंजूर है…
शर्त नंबर. 3 – निशा की इज़्ज़त पर तूने किसी के कहने पर हाथ डाला था, मुझे उसका नाम और कारण चाहिए…
मेरी ये शर्त सुनकर वो सोच में पड़ गया… जब बहुत देर तक उसने कुछ नही बका… तो मेने उसे फिरसे धमकाया…
देख भानु… मुझे पता है… कि ये काम तूने किसी के कहने पर किया था… जिसके लिए तुझे मोटी रकम भी मिली थी…
मेरे मुँह से ये सब सुनकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया… लेकिन फिर भी वो बोला कुछ नही… तो मेने फिर आगे कहा…
अगर तूने सच नही बताया तो ये मत समझना कि मे इसका पता नही लगा पाउन्गा… आज नही तो कल, मे ये जानकार ही रहूँगा कि इस सब के पीछे कॉन है…
लेकिन उस सूरत में मेरी कोई गारंटी नही होगी, कि ये वीडियो कोई और ना देख पाए.. तो बेहतर होगा..कि तू इस काम में मेरी मदद कर…
जब सारे रास्ते बंद होते दिखाई दिए तो वो किसी तोते की तरह शुरू हो गया… और उसने सारा राज उगल दिया…. जिसे सुन कर मेरी आँखें फटी रह गयीं…!
मेने भानु को उसकी बिल्डिंग के पास छोड़ा, उसके बाद अपनी बुलेट रानी को घर की तरफ दौड़ा दिया…!
रास्ते में एक बस स्टॉप था, जब मे वहाँ से गुजर रहा था, तो दूर से ही मुझे बीच सड़क पर एक औरत खड़ी दिखाई दी, जो अपने दोनो हाथ ऊपर कर के मुझे रुकने का इशारा कर रही थी…
जैसे ही मे थोड़ा उसके नज़दीक पहुँचा, तो उसे देखते ही मे चोंक पड़ा…, और गाड़ी उसके पास लेजा कर रोड की साइड में खड़ी कर के बोला – अरे वर्षा भौजी आप और यहाँ…?
तब तक उसका पति रवि, बेटे को गोद में लिए वहाँ आ पहुँचा..! मेने उसे देखते हुए कहा-
अरे वाह ! आज तो मियाँ-बीवी दोनो ही शहर में, क्या बात है, भाई… भौजी को साथ रखने लगे हो क्या..?, ये बहुत अच्छा किया आपने…,
कम से कम दोनो साथ रहोगे तो आपस में प्यार बढ़ेगा, और आपको भी खाने-पीने की चिंता नही रहेगी…!
इससे पहले की रवि कुछ बोलता, की वर्षा मुँह बीसूरते हुए बोली – उउन्न्नह…ऐसी अपनी किस्मेट कहाँ देवेर्जी, जो ये हमें शहर में रख सकें… !
वो तो बिट्टू को बड़े हॉस्पिटल में दिखाने लाए थे, इसलिए आ गयी, वरना तो वहीं चूल्हे चौके में ही सारी जिंदगी निकल जाएगी मेरी तो…!
मेने चिंतित होते हुए पूछा – अरे क्या हुआ बिट्टू को..? मुझे बताती, मे अच्छे हॉस्पिटल में दिखा देता, मेरी पहचान की डॉक्टर भी है यहाँ सहयोग में…!
रवि – वहीं दिखाया था, कई दिनो से फीवर था इसको, जा ही नही रहा था, पिताजी ने मुझे खबर भेजी, तब मे इन दोनो को ले आया…! वैसे अब ठीक है ये..!
मे – तो अब दो-चार दिन तो और रखोगे भौजी को यहाँ शहर में…!
रवि – अरे भाई कहाँ से रखूं, इतनी जगह ही नही है, शेरिंग में एक कमरा ले रखा है दूसरे एक दोस्त के साथ…!
अभी सोच ही रहा था, कि इन दोनो को गाँव छोड़कर कैसे जल्दी आउ, नाइट शिफ्ट भी करनी है आज…!
तुम्हारी बुलेट की आवाज़ सुनकर वर्षा ही बोली, की शायद ये तो अंकुश देवर्जी की गाड़ी की आवाज़ लगती है, सो इसने रोक लिया…
अब अगर तुम गाँव की तरफ जा रहे हो तो इन दोनो को भी ले जाओ प्लीज़…, मेरी परेशानी बच जाएगी, और आज रात की शिफ्ट भी कर लूँगा…
मे – अरे रवि भैया…, इसमें प्लीज़ कहने की क्या ज़रूरत है, मे तो जा ही रहा हूँ गाँव, ले जाउन्गा, फिर मेने वर्षा की तरफ मुस्कराते हुए कहा-
लेकिन क्या भौजी मेरे साथ आना चाहेंगी…?
वो मेरी मज़ाक को समझते हुए मेरी तरफ देखकर शरारत के साथ इठलाते हुए बोली – हुनह…मे ऐसे ही किसी के साथ कैसे चली जाउ..,
रवि उसकी बात सुनकर हड़बड़ाते हुए बोला…अरे ! ये कैसी बात कर रही हो तुम, अंकुश अपने घर के मेंबर जैसा है, तुम इसके ऊपर शक़ कर रही हो…?
वर्षा और अपने पति की परेशानी बढ़ाते हुए बोली – शक़ की क्या बात है, ये गबरू जवान आदमी, मे बेचारी अकेली जान, कहीं इनकी नीयत बदल गयी तो, ये कहकर उसने मेरी तरफ एक आँख मार दी…!
रवि बैचैन सा होकर बोला– ये कैसी बातें कर रही हो तुम… पागल तो नही हो गयी कहीं…?
इतने भले परिवार का लड़का है, और अभी-अभी शादी हुई है इसकी…
इसपर ऐसा इल्ज़ाम लगा रही हो.. कुछ तो लिहाज करो.. ये बेचारा तो हमारी मदद कर रहा है, और तुम उसी पर शक़ कर रही हो…
मे अपनी बुलेट रानी की सीट पर बैठा, उन दोनो मियाँ बीवी की नोक-झोंक का मज़ा लेते हुए मन ही मन मुस्करा रहा था…!
वर्षा ने एक बार मेरी तरफ तिर्छि नज़र से देखा, जिसमें एक प्रणय निवेदन छिपा था, फिर वो अपने बेटे से बोली – अच्छा तू बता बिट्टू, इन अंकल के साथ गाँव चलें क्या..?
बिट्टू तपाक से बोला – हां मम्मी, मे तो अंकल के साथ ही जाउन्गा, ये अंकल मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, मुझे बहुत प्यार करते हैं…!
रवि – देखा ! बिट्टू भी अच्छे बुरे को समझता है, और तुम हो की…
वो बेचारा अभी अपनी बात ठीक से ख़तम भी नही कर पाया था, कि वर्षा मुँह मटकाते हुए बोली – ठीक है, ज़्यादा सफाई देने की ज़रूरत नही है, चले जाएँगे हम इनके साथ, आप अपनी ड्यूटी करो…
ये बात उसने ऐसे अंदाज में कही मानो, कोई बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो बेचारे के ऊपर…
मेने बिट्टू को अपने आगे बिठाया, और वर्षा रानी मेरे पीछे ऐसे बैठ गयी, जैसे कोई बहुत बड़ी पतिव्रता स्त्री, मजबूरी में किसी के साथ बैठ कर जा रही हो…
रवि को बाइ बोलकर हम वहाँ से चल दिए, वो जैसे ही वर्षा की आँखों से ओझल हुआ, कि वो पट्ठी मेरी पीठ से किसी छिपकलि की तरह चिपक गयी…
और मेरे गले पर किस कर के मेरे कान में फुफुसा कर बोली – बिट्टू के पापा ! बहुत दिनो में हाथ आए हो, आज नही छोड़ूँगी तुम्हें…
मेने थोड़ा सर उसकी तरफ मोड़ कर कहा – ये क्या कह रही हो..? बिट्टू साथ में है, कैसे वो सब….?
वो ठुनक कर बोली – वो सब मुझे कुछ नही पता, बस आज होना है तो होना है..चाहे कैसे भी करो…!
मेने गाड़ी चलाते हुए ही सारा प्लान बना लिया था, फिर दोनो माँ बेटों को एक अच्छी सी दुकान में ले गया, उनके मन पसंद के कपड़े दिलवाए…
फिर कुछ और शॉपिंग करवाई, बिट्टू को खिलौने दिलवाए, दोनो बहुत खुश हो गये…, उसके बाद एक पार्क में ले जाकर घुमाया, बिट्टू को झूलों पर झूलाया..
शाम तक उन्हें शहर घुमाकर एक होटेल में ले गया, और एक रूम रात भर के लिए किराए पर लेकर रात गुजारने की सोची…
मेरी प्लॅनिंग देखकर वर्षा भाव-भिभोर हो गयी…
कमरे में आकर फ्रेश हुए, जल्दी खाना खाया, खाना खाते हुए मेने बिट्टू से पूछा – बिट्टू बेटा ! कैसा लगा अपने अंकल के साथ घूमकर…
उसने जबाब देने से पहले मेरे बगल में खड़े होकर गाल पर किस किया और तब बोला – थॅंक यू अंकल, बहुत मज़ा आया मुझे…!
मे – लेकिन बेटा अंकल की एक बात मानोगे..? वो मेरी तरफ देखने लगा, मानो पुच्छ रहा हो कि क्या..?
मेने कहा – मे तुम्हें ऐसे ही खिलौने और चॉकलेट खिलाया करूँगा अगर ये बात किसी को नही बताओगे तो, कि तुमने आज मेरे साथ मज़ा किया…
उसने अपना सर हिलाकर हामी भर दी, फिर सारे दिन की भागदौड़, और बिट्टू की तबीयत अभी भी थोड़ी नाज़ुक थी, सो दवा देकर वो टॅप से सो गया…!
वर्षा इसी पल के इंतेज़ार में थी, सो उसके सोते ही वो मेरे बदन से जोंक की तरह चिपक गयी, चुंबनों से उसने मेरे पूरे चेहरे को गीला कर दिया और नम आँखों से बोली…
थॅंक यू देवर जी, आज मेरी इच्छा का सम्मान कर के आपने साबित कर दिया कि अभी भी आपके दिल में हमारे लिए कितना प्यार है…!
आज हमारे बेटे ने भी जाना है, कि माँ-बाप का बच्चों के प्रति कैसा प्यार होना चाहिए…, बेचारा ऐसे प्यार के लिए कब्से तड़प रहा था…!
मेने उसे अपनी बाहों में भरकर उसके रसीले होंठों को चूमकर कहा – लेकिन बिट्टू को समझा देना कि ये सब बातें वो घर पर किसी को ना बताए, वरना खम्खा सब लोग शक़ करेंगे..!
वो मेरे बालों भरे सीने में अपनी उंगलिया घूमाते हुए बोली – वो सब आप मुझपर छोड़ दो, वैसे भी मे घर में किसी की परवाह नही करती..
ये कहकर वो मेरे लंड को नंगा कर के अपने हाथ में लेकर सहलाने लगी…
कुछ ही पलों में हम दोनो के शरीर से कपड़े गायब हो गये…वर्षा इतनी चुदासी हो रही थी, उससे सब्र करना दूभर हो रहा था,
सो मुझे पलंग पर धक्का देकर, मेरे मूसल जैसे लंड को अपनी मुट्ठी में लेकर अपनी रस से लब-लबा रही चूत के मुँह पर रखा, और उसपर बैठती चली गयी..!
बहुत दिनो बाद वो मेरे लंड को अपनी चूत में ले रही थी, सो जब मेरा मोटा सोट जैसा लंड उसकी कसी हुई चूत को चीरता हुआ अंदर गया…
दर्द की एक लहर उसके बदन में दौड़ गयी, लेकिन उसने अपने होंठों को कसकर भींच लिया, और धीरे-2 कर के मेरे पूरे लंड को अपनी चूत में निगल लिया…
फिर हाँफती हुई सी वो मेरे ऊपर लेट गयी, और मेरे होंठों को चूमकर बोली – आअहह…..कितने दिनो से राह देख रही थी इसकी…असल लंड तो ये है…
अबतक तो जैसे उंगली से ही काम चला रही थी…, आज मुझे इतना प्यार दो मेरे राजा, कि मे सारी दुनिया को भूल जाउ…
फिर उसने धीरे – 2 मेरे लंड पर उठना-बैठना शुरू किया…मेने उसकी गदराई हुई गोल-गोल दूध जैसी गोरी-गोरी मखमल जैसी मुलायम चुचियों को अपने हाथों में भर लिया…
चुचियों को मीजते ही वो सिसकियाँ भरने लगी और अपनी कमर को तेज़ी से चलाने लगी…
उसकी कसी हुई चूत मारने में मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था…
उस रात वर्षा, ना तो खुद सोई, और ना ही मुझे सोने दिया.. सारी रात अलग-अलग तरीकों से मेने उसकी सालों पुरानी प्यास को बुझा दिया…!
कितनी ही देर वो सुबक्ते हुए मेरे सीने पर पड़ी रही…फिर जब लगा कि अब बिट्टू जागने वाला है, तब हम दोनो अलग हुए…
फ्रेश होकर चाय नाश्ता किया और उन दोनो माँ-बेटों को अपनी बुलेट पर बिठाकर गाँव की तरफ चल दिया…!
आज राजेश के केस की सुनवाई थी…, एक दिन पहले मे राजेश को लेकर उनकी ससुराल गया….
उनके जैल जाने के बाद ही उनकी पत्नी भी घर छोड़कर अपने मायके जाकर बैठ गयी थी.. जो ये दर्शाता था, कि उसको भी अपने पति पर विश्वास नही था…
राजेश तो जाने से ही मना कर रहे थे, लेकिन मेरे और वाकी लोगों के समझाने के बाद वो जाने के लिए तैयार हुए…
राजेश की पत्नी शर्मिंदगी के मारे नज़र चुरा रही थी… मेने उससे कहा –
भाभी जी, पति पत्नी के रिश्ते की नींव एक अटूट विश्वास पर टिकी होती है.. भले ही दुनिया उसके पति के खिलाफ खड़ी क्यों ना हो जाए, अगर उसकी पत्नी उसके साथ है तो वो हर कठिनाई का मुकाबला कर सकता है…
लेकिन आपने तो उनका साथ उस समय पर छोड़ दिया, जब उन्हें आपके साथ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, क्या सात फेरों में यही वचन याद किए थे आपने…?
वो रोते हुए बोली – मुझे माफ़ कर दीजिए जीजा जी… मेने इन पर विश्वास नही किया… अब मे अपने बच्चे की कसम खाती हूँ आइन्दा ऐसी ग़लती कभी नही होगी..
और वो राजेश के पैरों में गिर पड़ी, रोते गिड-गिडाते हुए माफी माँगने लगी.. राजेश ने मेरी तरफ देखा…
मेने इशारा किया.. तो उसने उसके कंधे पकड़ कर उठाया.. और उसके आँसू पोन्छ्ते हुए कहा – कोई बात नही नीलू ग़लती इंसान से ही होती है…
फिर वो हमारे साथ ही विदा होकर आ गयी.., राजेश भाई उसे अपने घर लेगये…
दूसरे दिन कोर्ट में…………….,
अब मात्र फॉरमॅलिटीस ही वाकी थी, मुझे पता था भानु अपनी ग़लती मान कर केस वापस ले लेगा..
और हुआ भी यही…, पोलीस कोई सबूत दे नही पाई, और भानु ने अपना गुनाह कबूल कर लिया…
कोर्ट ने उसे गुमराह करने के जुर्म में 10 लाख जुर्माने के तौर पर रकम राजेश को देने के लिए कहा.. जो उसने मान लिया…
सूर्या प्रताप इसके लिए तैयार नही था, वो तो अपने लड़के द्वारा लिए गये इस निर्णय के ही खिलाफ था, फिर ना जाने भानु ने उसे क्या कहा कि वो भी ठंडा पड़ गया…
राजेश को कोर्ट ने बा-इज़्ज़त बरी कर दिया… सभी खुश थे…
लेकिन मे इस जड्ज्मेंट से खुश नही था, इसलिए मेने पोलीस पर मान हानि का केस डाल दिया… जिसकी लापरवाही, या कहें मुजरिम का साथ देने का मामला बनाया गया…
उस समय कोर्ट में उस एरिया का इनस्पेक्टर ही उपस्थित था… जिसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी…
जड्ज साब ने पोलीस को फटकार लगाते हुए… मामले पर सफाई देने को कहा… और जल्दी से जल्दी अगली तारीख मुक़र्रर कर दी…
घर के सभी बड़े लोगों ने मुझे समझाने की कोशिश की लेकिन मेने उनसे कहा… कि राजेश भाई को सताने वालों को अपनी करनी का ख़ामियाजा भुगतना ही होगा…
मेरी पहली सफलता जो कि पहली ही सुनवाई में एक 307 के केस को रफ़ा दफ़ा करा दिया था.. पूरे डिस्टिक लेवल पर फैल गयी… और लोगों की ज़ुबान पर मेरा नाम आने लगा…
अब मेने डिसाइड कर लिया कि मुझे यहीं रह कर अपनी प्रॅक्टीस शुरू कर देनी चाहिए..
अपने गुरु की पर्मिशन और आशीर्वाद लेकर, डिस्टिक कोर्ट के बाहर मेने भी अपनी दुकान जमा दी… और एक लड़के को वहाँ बिठा दिया………!
एक रोज़ सनडे का दिन था, हम सभी चौपाल पर बैठे ऐसे ही घर गाँव की चर्चा कर रहे थे आपस में,
भैया और बाबूजी के अलावा छोटे और मनझले चाचा और उनका बेटा सोनू भी थे..
तभी हमें पोलीस सायरेन की आवाज़ सुनाई दी जो धीरे- 2 हमारे घर की तरफ ही बढ़ रही थी…
हम सब चौपाल की तरफ आने वाले रास्ते पर देखने लगे… मुझे कुछ- 2 संभावना थी इसकी, लेकिन वाकी लोगों को ये किसी अनिष्ट की आशंका लग रही थी सो बाबूजी बोल पड़े..
अब ये पोलीस हमारे यहाँ क्यों आ रही है…?
मे – आने दीजिए बाबूजी… ? उन्हें हमसे कोई काम होगा..?
भैया – लेकिन हमसे पोलीस को अब क्या काम पड़ गया… पहले तो कभी आई नही..
मे – आप लोग इतने चिंतित क्यों हो रहे हैं.. आने दीजिए, देखते हैं.. क्या काम है…!
इतने में सिटी एसपी की कार, उसके पीछे को की जीप और एक लोकल थाने की जीप हमारे चौपाल के पास आकर रुकी…
पोलीस की तीन-2 गाड़ियों को हमारे यहाँ आया देख मोहल्ले के दूसरे लोग भी आ गये…
एसपी की गाड़ी से कृष्णा भैया..उतर कर चौपाल पर आए… पीछे – 2 अन्य पोलीस वाले भी थे…
हमने सबके बैठने की लिए कुर्सी डाल दी… लेकिन वो अपने ऑफीसर के सामने बैठ नही सकते थे… सो आकर खड़े हो गये…
भैया ने बाबूजी के पाँव छुये… मुझे ये देख कर बड़ा ताज्जुब हुआ कि उन्होने भैया और वाकी बड़ों के पैर नही छुये…
खैर मेने बड़े भाई के नाते उनके पैर छुये… तो वो कॉँमेंट पास करते हुए बोले – अरे आप रहने दीजिए वकील साब… वरना और कोई केस लाद देंगे हमारे ऊपर…
बाबूजी को उनकी ये बात नागवार गुज़री, अतः वो थोड़े नाराज़गी वाले स्वर में बोले–
आते ही ऐसी बातें ना करो कृष्णा.. वो छोटे भाई के नाते तुम्हारे पैर लग रहा है…, पद के घमंड में तुम तो अपने बड़ों को भूल ही गये हो…
बाबूजी की बात सुनकर वो खिसियानी सी हसी हँसते हुए बोले – ऐसा कुछ नही है बाबूजी.. और फिर भैया और चाचों के भी पैर छु लिए…
फिर बाबूजी ने मुझसे कहा – जा बेटा, अंदर जा कर सबके लिए चाय पानी का इंतेज़ाम करवा दे…
मे अंदर जाने लगा तो कृष्णा भैया ने रोकते हुए कहा – चाय –वाय रहने दे अंकुश, तू यहीं बैठ, मुझे तुमसे ही बात करनी थी…
मे – बस 10 मिनिट की बात है, तब तक आप बाबूजी से बात करिए.. मे अभी चाय लेकर आता हूँ..
इतना कहकर मे अंदर गया, तो भाभी ने पुच्छ लिया – ये बड़े देवर जी क्यों आए हैं अब यहाँ…?
मे – आपको तो पता ही है, पोलीस बिना गर्ज के तो आती नही है… मुझसे ही काम है.. नाक में नकेल जो डाल रखी है मेने…
निशा – मुझे तो डर लग रहा है दीदी… कहीं कुछ गड़बड़ ना हो…
मेने हँसते हुए कहा – तुम किधर से पढ़ लिख गयी हो यार निशु… इतना भी नही समझती.. कि मेने पोलीस के ऊपर मानहानि का केस किया हुआ है.. तो डर किसको होगा…?
भाभी – पोलीस का कोई भरोसा नही होता है लल्ला जी… कब क्या केस लगा दे..
मे – आप चिंता छोड़ो, और फिलहाल 8-10 चाय का जल्दी से इंतेज़ाम करो… वाकी सब अपने इस लाड़ले पर छोड़ दो… मे सब संभाल लूँगा…
मे जब चाय लेकर बाहर आया, सबको चाय सर्व की, फिर चाय पीते हुए बाबूजी बोले – बेटा छोटू, कृष्णा का कहना है, कि तुमने पोलीस के ऊपर जो केस किया है, उसे वापस ले लो..
सुनकर मेरे चहरे पर मुस्कान आ गयी.. और मेने उनसे कहा – आप क्या कहते हो बाबूजी… क्या मेने कुछ ग़लत किया है…?
पोलीस की ग़लती की वजह से एक इंसान को 6-7 महीने जैल में काटने पड़े… उसके परिवार को कितनी मुशीवतें उठानी पड़ी…
यही नही.. आप लोग कितने परेशान रहे.. राजेश भाई की बीवी अपने बच्चे को लेकर चली गयी… उसको नौकरी से निकाल दिया गया… किसकी वजह से, क्या ये ग़लत नही हुआ उनके साथ…?
एक तरह से उनकी पूरी लाइफ बरवाद हो गयी, किसकी ग़लती की वजह से..?
कृष्णा – मे मानता हूँ भाई… कि राजेश के साथ ग़लत हुआ है… और उसके लिए मेने उस सारे स्टाफ को लाइन हाज़िर कर दिया है…
मे – वाह भैया… वाह ! क्या सज़ा दी है. उन चोरों को आपने जिन्होने सूर्य प्रताप से पैसे खाकर एक निर्दोष को फसाया… और उसे जैल में सड़ने पर मजबूर कर दिया..
ऐसा कर के तो आपने अपने चम्चो की गिनती ही बढ़ा ली है…
वो – इससे ज़्यादा मे उन्हें सज़ा नही दे सकता था… लेकिन अब इस केस का सीधा असर मेरे ऊपर पड़ सकता है, इस सबका मुझे ही जबाब देना पड़ रहा है… ये तो तुम भी जानते हो..
मे – तो क्या आप ज़िम्मेदार नही हो इसके..? आज आप भाई के रिश्ते की दुहाई दे रहे हो, उस दिन तो बाबूजी का भी मान नही रखा था आपने… और कोर्ट की दुहाई देकर चले गये थे…
क्या मे ये भी समझाऊ कि उस वक़्त आप क्या कर सकते थे, या आपको पता नही था, कि आपकी पोलीस क्या कर रही है..?
वो – तू कहना क्या चाहता है.. कि मेने इसे जानबूझ कर नज़र अंदाज़ किया था…?
मे – बिल्कुल ! मे यही कहना ही नही चाहता… बल्कि कह रहा हूँ…! अगर आप चाहते तो राजेश भाई एक दिन भी जैल में नही रहते… लेकिन आपने ऐसा नही किया…
वो – मे भला ऐसा क्यों चाहूँगा… वो मेरा भी रिश्तेदार है…
मे – एग्ज़ॅक्ट्ली ! यही तो वो कारण था, जिसने आपको हम लोगों की मदद करने से रोक दिया था…,
और वो वजह मे जानता हूँ… तो बेहतर होगा… कि अब हम कोर्ट में ही मिलें….!
मेरी कोर्ट में मिलने की धमकी से कृष्णा भैया सकपका गये, उनके चेहरे पर मायूसी छा गयी…
उन्होने अपने मात-हतों को बाहर भेज दिया…, और गिड गिडाते हुए बोले….
मे मानता हूँ मुझसे ग़लती हुई थी, और वो भी किसी के दबाब में आकर, अब मे तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ…
किसी तरह अपने भाई की इज़्ज़त बचा ले भाई…, वरना तू तो जानता है, कि अगर ये मामला कोर्ट के थ्रू सेट्ल हुआ तो मुझे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ सकता है…
उनकी गिड-गिडाहट देख कर बाबूजी समेत वाकी के चेहरों पर दया के भाव दिखाई देने लगे… फिर भी उनमें से किसी ने हमारे बीच में बोलने की कोई कोशिश नही की…