खूनी हवेली की वासना पार्ट –1

 


खूनी हवेली की वासना

खूनी हवेली की वासना पार्ट –1


गतान्क से आगे……………………


किसी शायर ने क्या खूब कहा है


सोचो तो बड़ी बात है तमीज़ जिस्म की,


वरना तो ये सिर्फ़ आग बुझाने के लिए हैं ……


यही सोचती वो खामोशी से आगे बढ़ी. ये बात कितनी सच थी इस बात का अंदाज़ा उसको बहुत अच्छी तरह से हो गया था. हाथ में चाइ की ट्रे लिए वो ठाकुर के कमरे की तरफ बढ़ी पर ये ट्रे पर रखी चाइ तो सिर्फ़ एक बहाना थी. असल में तो वो ठाकुर को अपना जिस्म परोसने जा रही थी.


ये किस्सा ऐसी ही जाने कब्से चला आ रहा था. वो रोज़ रात को 9 बजे ठाकुर को चाइ देने के बहाने उसके कमरे में जाती. चाइ को वॉश बेसिन में गिराकर कप को खाली कर देती जिससे देखने वाले को लगे के चाइ ठाकुर ने पी ली, और फिर ठाकुर को अपना जिस्म परोसती और 15 मिनट बाद कमरे से बाहर आ जाती. यूँ तो ये चाइ का नाटक ज़रूरी नही था क्यूंकी रात के 9 बजने तक हवेली में रहने वाला हर कोई अपने कमरे में बंद हो जाता था और अगर वो यूँ भी ठाकुर के कमरे में चली जाती तो ना कोई देखता ना सवाल करता पर फिर भी वो रोज़ाना चाइ लेकर ही जाती थी. या तो इसको शरम कह लो या बस अपने दिल को बहलाने का एक बहाना, पर ट्रे में चाइ रोज़ाना होती थी.


रोज़ की तरह आज भी उसने ठाकुर के कमरे पर हल्की सी दस्तक दी और बिना जवाब का इंतेज़ार किए अंदर दाखिल हो गयी. कमरे में कोई नही था पर बाथरूम से शवर की आवाज़ आ रही थी. वो समझ गयी के ठाकुर नहा रहा था. ट्रे टेबल पर रखी और कप उठाकर रोज़ाना की तरह बाथरूम की तरफ बढ़ी.


बाथरूम का दरवाज़ा खुला हुआ था. वो दरवाज़े के पास पहुँची तो अंदर ठाकुर शवर के नीचे पूरा नंगा खड़ा हुआ था. उसने ठाकुर पर एक नज़र डाली और ठाकुर की नज़र उसपर पड़ी. ठाकुर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई और उसे देखकर अपने लंड धीरे धीरे हिलाते हुए उसको बिस्तर की तरफ जाने का इशारा किया.


हाथ में पकड़े कप से उसने चाइ वहीं वॉश बेसिन में गिराई और फिर वापिस कमरे में आ गयी. कमरे में आकर कप वापिस ट्रे पर रखा और चुप चाप वहीं बिस्तर के किनारे खड़ी हो गयी.


कुच्छ पल बाद ही ठाकुर भी बाथरूम से नंगा ही बाहर आ गया. एक पल के लिए ठाकुर ने उसको देखा और फिर उसकी टाँगो की तरफ नज़र डाली. वो इशारा समझ गयी और चुप चाप अपनी कमीज़ उपेर उठाकर सलवार का नाडा खोलने लगी.


जब तक सलवार का नाडा खुलता, ठाकुर उसके पिछे आ चुका था. सलवार ढीली होते ही पिछे से ठाकुर ने उसकी सलवार को पकड़कर हल्का सा नीचे खींच दिया और उसकी गांद को नंगा कर दिया. कमरे में चल रहे ए.सी. की ठंडी हवा और ठाकुर का गीला हाथ उसकी नंगी गांद में एक ठंडक की सिहरन दौड़ा गया. ठाकुर थोडा और नज़दीक आया तो खड़ा लंड उसकी गांद से रगड़ने लगा. आगे क्या करना है वो जानती थी और अपने हाथ बिस्तर पर रखकर झुक गयी.


पीछे से ठाकुर ने अपना लंड निशाने पर लगाया और धीरे धीरे पूरा का पूरा उसकी चूत में दाखिल कर दिया. लंड के पूरा अंदर होते ही खुद उसके मुँह से भी एक आह निकल पड़ी. भले वो कितना अपने दिल को समझाती, कितना शराफ़त के पर्दों में छुपाटी, वो ये बात अच्छी तरफ से जानती थी के खुद उसका जिस्म भी उसको दॉखा दे जाता था. और आज भी कुच्छ ऐसा हो रहा था. ठाकुर पिछे से उसकी चूत पर धक्के लगा रहा था और वो खुद भी बेहेक्ति जा रही थी.


एक नज़र उसने कमरे में फुल साइज़ मिरर पर डाली तो खुद उसका जोश दुगुना हो गया. वो बिस्तर के किनारे पर हाथ रखे झुकी खड़ी थी. सलवार ढीली हल्की सी नीचे हो रखी थी. बस इतनी ही के ठाकुर के लिए पिछे से लंड डालना मुमकिन हो सके. उसको खुद अपने जिस्म का कोई हिस्सा शीशे में नज़र नही आ रहा था पर फिर भी वो इस वक़्त एक तरह से पूरी नंगी थी.


ठाकुर की स्पीड बढ़ती चली गयी और धक्को में दुगुनी रफ़्तार आ गयी. गांद पर पड़ रहे पुर ज़ोर के धक्को के कारण उसके पावं लड़खड़ा गये और वो बिस्तर पर आगे की और हुई और उल्टी लेट गयी. अब ठाकुर उसकी गांद पर बैठा था और उसके दोनो कूल्हो को पकड़े पूरी जान से धक्के लगा रहा था. वो जानती थी के काम ख़तम होने वाला है. तेज़ी से पड़ते धक्को ने उसकी चूत में जैसे आग सी लगा दी. दोनो हाथों से उसके अपनी मुट्ठी में चादर को ज़ोर से पकड़ लिया और आँखें मूंद ली …… और जैसी उसकी चूत से नदियाँ बह चली.


और ठीक उसी वक़्त ठाकुर के मुँह से ज़ोर की आह निकली और लंड से निकला वीर्य उसकी चूत में भरने लगा. वो खुद भी झाड़ रही थी, चूत की गर्मी पानी और वीर्य बनकर उसकी चूत से बह रही थी.


थोड़ी देर बाद हाथ में ट्रे उठाए, अपने कपड़े ठीक करती वो कमरे से बाहर निकली. उसपर एक नज़र डालते ही कोई भी कह सकता था के वो अभी अभी चुद्कर आई है पर नज़र डालने वाला था ही कौन. चुप चाप वो किचन तक पहुँची औट ट्रे वहीं छ्चोड़कर अपने कमरे की तरफ बढ़ चली. कमरे में जाकर उसने एक छ्होटी सी गोली पानी के साथ खाई ताकि उसको ठाकुर का बच्चा ना ठहर जाए और बिस्तर पर लेट गयी.


थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.


नींद की उबासी लेती वो अपने कमरे की तरफ बढ़ी. ड्रॉयिंग रूम में घड़ी पर नज़र डाली तो 9.15 बज रहे थे. यूँ तो वो अक्सर रात को देर तक जागती रहती थी पर आज सुबह से ही काम इतना ज़्यादा था के हालत खराब हो रखी थी.


अपने कमरे तक पहुँचकर वो अंदर दाखिल होने ही लगी थी के याद आया के दोपहर के सुखाए कपड़े अभी भी हवेली के पिच्छले हिस्से में अब भी सूख रहे हैं. एक पल को उसने सोचा के कपड़े सुबह जाकर ले आए पर वो जानती के बाहर आसमान पर बदल छाए हुए हैं और रात को बारिश हो सकती थी. मौसम को कोस्ती वो हवेली के पिच्छले दरवाज़े की तरफ चली.


बाहर आकर उसने एक एक करके अपने सारे कपड़े उतारे. जहाँ वो खड़ी थी वहाँ से ठाकुर के कमरे की खिड़की सॉफ नज़र आती थी. कमरे की लाइट जली हुई थी.


कपड़े लेकर वो वापिस अंदर जाने लगी तो एक नज़र ठाकुर के खिड़की पर फिर पड़ी और कमरे के अंदर उसको ठाकुर खड़े हुए दिखाई दिए. यूँ तो ये कोई ख़ास बात नही थी क्यूंकी कमरा खुद उन्ही का था पर जिस बात ने उसके पैर रोक दिए वो थे उनके चेहरे पर आते जाते हुए भाव. लग रहा था जैसे ख़ासी तकलीफ़ में है. कमरे की खिड़की ज़रा ऊँची थी इसलिए उसको सिर्फ़ उनका सर और कंधे नज़र आ रहे थे जो नंगे थे पर इस बात का अंदाज़ा उसको हो गया के ठाकुर साहब उपेर से नंगे थे. दूसरी बात जो उसको थोड़ा अजीब लगी के उनका पूरा जिस्म हिल रहा था और चेहरे के भाव बदल रहे थे.


जाने क्या सोचकर वो खिड़की के थोड़ा नज़दीक आई. क्यूंकी खिड़की उसके खुद की हाइट से ऊँची थी इसलिए जब वो खिड़की के पास आकर खड़ी हुई तो अंदर कुच्छ भी दिखाई देना बंद हो गया. पर तभी उसके कानो में एक आवाज़ पड़ी जिससे उसके दोनो कान खड़े हो गये. आवाज़ एक औरत की थी. थोड़ी देर खामोशी हुई और फिर से वही एक औरत की आवाज़ आई, और फिर आई, और फिर आई और फिर रुक रुक कर आवाज़ आती रही.


वो एक मिनट तक चुप चाप खड़ी वो आवाज़ सुनती रही. एक पल के लिए उसके कदम वापिस हवेली के दरवाज़े की ओर बढ़े और फिर ना जाने क्यूँ रुक गये.वो अच्छी तरह जानती थी के कमरे के अंदर क्या हो रहा है और एक औरत इस तरह की आवाज़ किस वक़्त निकालती है. वो समझ गयी थी के क्यूँ ठाकुर के कंधे नंगे थे और क्यूँ उनके चेहरे के भाव बदल रहे थे.


“अंदर कमरे में वो औरत ठाकुर साहब से चुद रही है”


ये ख्याल दिल में आया ही था के उसके जिस्म में एक सनसनी सी दौड़ गयी. घुटने जैसे कमज़ोर पड़ने लगी और टाँगो के बीच की जगह अपने आप गीली सी होने लगी. उसको खुद को याद नही था के वो आखरी बार कब चुदी थी. अक्सर रात को चूत में एक अजीब बेचैनी सी होती और वो यूँ ही करवटें बदलती रहती थी और कभी कभी तकिया उठाकर अपनी टाँगो के बीच दबा लेती थी. उसका एक हाथ अपने आप ही उसकी चूत पर चला गया और उसने पास पड़ा एक पत्थर लुढ़का कर खिड़की के पास किया. एक पावं उसने पत्थर पर रखा और धीरे से खिड़की से झाँक कर अंदर देखा.


अंदर का माजरा देखकर उसके मुँह से आह निकलते निकलते रह गयी. एक औरत बिस्तर पर उल्टी पड़ी हुई थी और ठाकुर साहब नंगे उसके उपेर सवार थे. औरत ने अपने चेहरा बिस्तर में घुसा रखा था और ठाकुर के हर धक्के पर घुटि घुटि सी आवाज़ निकलती थी. बिस्तर पर चादर बिछि होने के कारण और उस औरत के उल्टी होने से वो चाहकर भी ये ने देख पाई के बिस्तर पर कौन चुद रही है. औरत ने कपड़े पूरे पहेन रखे थे पर जिस तरह से ठाकुर साहब ने उसकी गांद पकड़ रखी थी और धक्के लगा रहे थे वो समझ गयी के अंदर बिस्तर पर पड़ी औरत ने सलवार नीचे सरका रखी थी और ठाकुर पिछे से चूत मार रहे थे.


वहीं खड़े खड़े उसने अपना एक हाथ अपनी चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया और ध्यान से ठाकुर का नंगा जिस्म देखने लगी. चौड़े कंधे, कसरती और तना हुआ शरीर, वो डैड दिए बिना ना रह सकी. धीरे धीरे उसकी नज़र ठाकुर की टाँगो के बीच पहुँची और उसके दिल में चाह उठी के एक बार ठाकुर का लंड दिखाई दे. पर वो तो उस औरत की गांद के अंदर कहीं छुपा हुआ था. वो बाहर खड़ी बेसब्री से इंतेज़ार करने लगी के चुदाई का खेल ख़तम हो और ठाकुर लंड बाहर निकले ताकि वो उसको लंड के दर्शन हो सकें. ठाकुर का शानदार जिस्म देखकर उसके दिमाग़ में सिर्फ़ ठकुराइन के लिए अफ़सोस और ठाकुर के लिए हमदर्दी आई.


इसी इंतेज़ार में वो बाहर खड़ी चूत पर हाथ चला रही थी के ठाकुर ने एक झटका पूरे ज़ोर से मारा और बिस्तर पर पड़ी औरत ने दर्द और मज़े के कारण एक पल के लिए अपना चेहरा उपेर किया. बाहर खड़े उसका हाथ फ़ौरन चूत पर चलना बंद हो गया. उसको आँखें हैरत से फेल्ती चली गयी. उसको यकीन नही हुआ के बिस्तर पर वही औरत है जो उसको एक पल के लिए लगा के है. उसको यकीन था के उसकी आँखें धोखा खा रही है. उसने फिर गौर से देखने की कोशिश में अपनी नज़र अंदर गढ़ाई पर नज़र ठाकुर की टाँगों के बीच नही, उस औरत के चेहरे की तरफ थी.


अचानक उसको अपने पिछे कुच्छ आवाज़ महसूस हुई. किसी के चलने की आवाज़ थी जो नज़दीक थी और वो समझ गयी की कोई इसी तरफ आ रहा था. जल्दी से वो खिड़की से हटी और हवेली के दरवाज़े की तरफ बढ़ी. दिमाग़ अब भी हैरत में था के क्या सच में ठाकुर के बिस्तर पर वही औरत है जो उसको लगा के है? यही सोचती वो अपने कमरे तक पहुचि.


थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.


“आअहह … और ज़ोर से”


नीचे लेटी हुई मज़े में आहें भरते हुए बोली. तेजविंदर उसके उपेर लेटा हुआ था. वो दोनो ही पूरी तरह नंगे थे. रेखा की दोनो टांगे हवा में, टाँगो के बीच तेजविंदर, दोनो छातियाँ तेजविंदर के हाथों में और लंड चूत में तेज़ी से अंदर बाहर हो रहा था.


रेखा की उमर 40 के पार थी, शकल सूरत भी कोई ख़ास नही पर जिस्म ऐसा था के 20 साल की लड़की को मात दे जाए और यही वजह थी के तेज हर रात उसी के पास खींचा चला आता था. यूँ तो बाज़ार में एक से बढ़के एक हसीन थी पर रेखा को चोदने के बाज़ शायद ही कभी ऐसा हुआ था के तेज किसी और रंडी के पास गया था.


“कमाल है तेरी चूत” वो पूरी जान से धक्के मारता हुआ बोला “साला लंड घुसाओ तो ऐसा लगता है जैसे किसी 15-16 साल की लड़की की चूत में लंड घुसाया हो”


“तो आपका लंड कौन सा कम है. जो आपके नीचे से निकल गयी, कसम ख़ाके कहती हूँ के किसी और के सामने अपना भोसड़ा खोलेगी नही” मुस्कुराते हुए रेखा ने जवाब दिया


“तुम तो खोलती हो” तेज ने उसको छेड़ते हुए कहा


“आप रोज़ रात आने का वादा कीजिए. कसम है मुझे अगर इस चूत की हवा भी किसी और लंड को लगे”


उसकी बात सुनकर तेज हल्का सा हसा और फिर पूरी जान से धक्के लगाने लगा


“आआहह ठाकुर साहब धीएरे ….. “रेखा की मुँह से निकला पर तेज नही रुका और अगले 5 मिनिट तक उसने रेखा का जैसे बिस्तर पर पागल बना दिया. कभी चूचियाँ दबाता, कभी चूस्ता, कभी काट लेता, कभी दोनो टांगे हवा में होती तो कभी बिस्तर पर पर धक्को की तेज़ी में कोई कमी नही आई. आख़िर 5 मिनट बाद तेज तक कर साँस लेने के लिए रुका. वो रुका तो रेखा की जान में भी जान आई.


“ठाकुर साहब” वो हाँफती हुई बोली “मेरी चूत क्या आज रात गाओं छ्चोड़कर जा रही है जो ऐसे चोद रहे हो”


तेज हस्ते हुए अपने माथे से पसीना पोंच्छने लगा


“थक गये हैं” रेखा ने प्यार से बालों में हाथ फिराते हुए कहा “मैं उपेर आ जाऊं?”


“रंडी होकर ठाकुरों के उपेर आने का सपना देख रही हो?” तेज ने कहा


ये बात जैसे रेखा के दिल में नश्तर की तरह चुध गयी. उसने तो प्यार में आकर तेज से उपेर आने को कही थी ताकि वो आराम से नीचे लेट जाए पर उसके बदले में जब तेज का का जवाब सुना तो एकदम गुस्से में किलस गयी.



“रंडी हूँ तो क्या हुआ” वो गुस्से में बोल पड़ी “कम से कम रोज़ रात को अपने जिस्म का सौदा करके कमाती हूँ तब 2 वक़्त की रोटी खाती हूँ. बाप के पैसे पे अययाशी नही करती”


“क्या बोली तू?” तेज उसपे उपेर से हटकर बिस्तर पे बैठ गया


“जो सुना वही बोल रही हूँ” रेखा भी उठकर बैठी और चादर अपने नंगे जिस्म पर लपेटने लगी “मुझे ये याद दिलाने से पहले के मैं एक रंडी हूँ ये सोच लिया करो के मैं फिर भी आपसे बेहतर हूँ. कम से कम मेरे पास अपना ये एक मकान है. आपके पास क्या है? बाप की हवेली और ज़मीन और बड़े भाई के फेंके हुए कुच्छ पैसे जिनपर आप पल रहे हो?”


एक तो शराब का नशा दूसरे रेखा के मुँह से कड़वी सच्चाई. तेज का हाथ उठा और रेखा के मुँह पर पाँचो उंगलियाँ छप गयी.


“थप्पड़ मारता है” रेखा भी गुस्से में आग बाबूला हो उठी “बाप और भाई के टुकड़ो पर कुत्ते की तरह पल रहा है और मुझे थप्पड़ मारता है”


इस बात ने आग में घी का काम किया और तेज के गुस्से का ठिकाना नही रहा.


थोड़ी देर बाद जब अपनी कार में बैठा हवेली की तरफ जा रहा था. पीछे रेखा का वो मार मारकर बुरा हाल करके आया था. गुस्से में उसका दिमाग़ भन्ना चुका था और उसने फ़ैसला कर लिया था के इसी वक़्त अपने पिता से जाकर बात करेगा.


थोड़ी देर बाद वो हवेली में दाखिल हुआ. दरवाजे के पास ही उसको हवेली का पुराना नौकर भूषण मिल गया.


“पिताजी कहाँ हैं?” उसने भूषण से पुछा


“जी अपने कमरे में” भूषण ने कहा


कुच्छ देर बाद तेज अपने पिता ठाकुर शौर्या सिंग के कमरे में खड़ा था. ठाकुर साहब अपने कमरे की चादर ठीक कर रहे थे.


“क्या मतलब के तुम्हें अपना हिस्सा चाहिए?” चादर ठीक करते करते उन्होने तेज से पुछा


“मतलब के मुझे ज़मीन वामीन में कोई दिलचस्पी नही. मेरे हिस्से का जितना बनता है आप मुझसे कॅश में दे दीजिए” तेज अब भी शराब के नशे में था.


“ताकि तुम उसको रंडियों के यहाँ उड़ाते फ़िरो? बिल्कुल नही” ठाकुर साहब ने जवाब दिया.


तेज के गुस्से का पारा आसमान च्छुने लगा.


थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.


“सुनो ना” रूपाली ने पिछे से पुरुषोत्तम के गले में अपनी बाहें डाली


“ह्म्‍म्म्म … कहो” पुरुषोत्तम अपनी टेबल पर सामने रखे कुच्छ पेपर्स में बिज़ी था


रूपाली ने धीरे से पुरुषोत्तम के गले पर किस किया और उसके कान को अपने दांतो के बीच लेकर बाइट किया.


“आउच” पुरुषोत्तम ने अपले गले को झटका ” क्या करती हो”


“वही जो के आक्च्युयली तुम्हें शुरू करना चाहिए पर उल्टा हो रहा है. तुम्हारा काम मैं कर रही हूँ और मेरे डाइलॉग तुम बोल रहे हो”


“शाम के 8 बज रहे हैं. थोड़ी देर में डिन्नर लग जाएगा. ये कोई टाइम है भला?”


“प्यार का कोई टाइम नही होता” रूपाली पिछे से पुरुषोत्तम के साथ चिपक गयी और अपनी चूचियाँ उसके कंधो पर रगड़ने लगी.


“नही नही नही ….. ” पुरुषोत्तम ने उसकी बाहें अपने गले से निकाली और फिर पेपर्स में सर झुका कर अपना काम करने लगा,


रूपाली ने उसके गले से बाहें निकाली और थोड़ा पिछे होकर अपना सारी खोलनी शुरू कर दी. उसने नीले रंग की सारी प्लेन पहेन रखी थी. सारी उतारकर वहीं ज़मीन पर गिरा दी और एक ब्रा और ब्लाउस में पुरुषोत्तम के सामने आ खड़ी हुई.


पुरुषोत्तम ने नज़र उठाकर अपनी बीवी की तरफ देखा. नीले रंग का ब्लाउस और पेटिकट उसके गोरे रंग के साथ जैसे ग़ज़ब ढा रहा था. 36 साइज़ की बड़ी बड़ी चूचियाँ ब्लाउस फाड़ कर बाहर आने को उतावली हो रही थी. नीचे गोरा मखमली पेट जिसपर चरबी का निशान तक नही थी. लंबी सुडोल टांगे और किसी पहाड़ की तरफ शानदार तरीके से उठी हुई गांद. सामने अगर ऐसी औरत आधी नंगी चुदवाने के लिए खड़ी हो तो किसी नमार्द का भी लंड जोश मार जाए, पुरुषोत्तम तो खैर उसका पति था.


वो रूपाली की ओर देखकर मुस्कुराया और रूपाली उसकी और. पुरुषोत्तम एक कुर्सी पर बैठा हुआ था और रूपाली ठीक उसके सामने खड़ी थी. उसने आगे बढ़कर उसके नंगे पेट पर अपने होंठ टीका दिए और पेटिकट का नाडा खोल दिया.


रूपाली ने नीचे पॅंटी नही पहेन रखी थी. पेटिकट सरसारा कर उसके कदमो में जा गिरा और वो कमर के नीचे से नंगी हो गयी. जिस्म पर अब सिर्फ़ एक ब्लाउस बचा था.


पुरुषोत्तम ने एक नज़र अपनी बीवी की नंगी चूत पर दौड़ाई. वो पहले चूत क्लीन शेव रखती थी पर पुरुषोत्तम के कहने पर अब हल्के हल्के से बॉल रखती थी. पुरुषोत्तम ने धीरे से अपने एक हाथ रूपाली की चूत पर फेरा और दूसरे हाथ से उसकी गांद सहलाने लगा.


रूपाली से एक हल्का सा टच भी बर्दाश्त ना हुआ और वो फ़ौरन घुटनो पर जा बैठी. पुरुषोत्तम एक कुर्सी पर बैठा हुआ था. रूपाली ने जल्दी जल्दी उसकी पेंट के हुक्स खोलने शुरू कर दिए. आगे जो होने वाला था वो पुरुषोत्तम जानता था. उसने अपना जिस्म कुर्सी पर ढीला छ्चोड़ दिया और आँखें बंद करके बैठ गया.


रूपाली ने उसकी पेंट खोलकर लंड बाहर निकाला और धीरे धीरे सहलाने लगी. मुरझाए हुए लंड में हल्का सा हाथ फिराते ही जान आने लगी और उसका साइज़ बढ़ने लगा. रूपाली आगे को झुकी और अपनी जीब लंड पर फिराने लगी. उसकी जीभ लंड पर ऐसे हिल रही थी जैसे कोई बिल्ली दूध पी रही हो. नीचे एक हाथ लंड को हिला रहा था और दूसरे पुरुषोत्तम के टटटे सहला रहा था.


“आअहह रूपाली” जैसे ही रूपाली ने उसका लंड अपने मुँह में भरा, पुरुषोत्तम के मुँह से आह निकल पड़ी.


रूपाली ने पूरा लंड अपने मुँह में लिया और टटटे सहलाते हुए लंड को चूसना शुरू कर दिया. उसका सर लंड पर तेज़ी के साथ उपेर नीचे होने लगा. मुश्किल से एक मिनट भी नही हुआ था के पुरुषोत्तम का जिस्म एक पल के लिए काँप उठा और इससे पहले के रूपाली कुच्छ समझ या कर पाती, उसके मुँह में वीर्य की एक धार आ लगी.


“रूको” रूपाली ने लंड फ़ौरन अपने मुँह से बाहर निकाला पर देर हो चुकी थी. कुच्छ वीर्य उसके मुँह में और कुच्छ लंड बाहर निकलते ही उसके चेहरा और ब्लाउस पर आ गिरा.


“आइ आम सॉरी” पुरुषोत्तम ने आँखें खोली और रूपाली की तरफ देखा. रूपाली ने कहा कुच्छ नही पर जिस तरह से वो देख रही थी वही पुरुषोत्तम के लिए काफ़ी था.


“आइ आम सॉरी मैं रोक नही पाया. वी कॅन डू इट अगेन इन दा नाइट” वो बोला


रूपाली ने उठकर टेबल पर रखे पुरुषोत्तम के रुमाल से अपने मुँह और चेहरे पर गिरे वीर्य को सॉफ किया, पेटिकट कमर पर बँधा और सारी पहेन्ने लगी. तभी उसको अपने ब्लाउस पर पड़े पुरुषोत्तम के वीर्य के धब्बे नज़र आए इसलिए उसने सारी और ब्लाउस उतारकर एक तरफ फेंक दिया और एक गुलाबी रंग का सलवार सूट निकालकर पहेन लिया.


“हां ताकि रात को तुम फिर एक मिनट में निपट जाओ और मैं अनसॅटिस्फाइड बिस्तर पर रात भर पड़ी रहूं. है ना?”


“रूपाली” पुरुषोत्तम थोड़े ज़ोर से बोला


“चिल्लइए मत” रूपाली ने भी वैसे ही जवाब दिया “अपनी नमार्दानगी को अपनी आवाज़ के शोर में दबाने की कोशिश मत कीजिए.”


“इतनी गर्मी है अगर जिस्म में तो एक सांड़ लाकर बांड दूँ? फिर भी अगर टाँगो के बीच की आग ठंडी ना हो तो कहीं किसी और के पास पहुँच जाओ”


पुरुषोत्तम ने कहा और गुस्से में पैर पटकता कमरे से बाहर निकल गया. वो हवेली से बाहर आया और अपनी कार निकालकर गुस्से में बाहर चला आया. रास्ते में वो एक शराब की दुकान पर रुका, एक बॉटल खरीदी और गाओं से बाहर नहर के किनारे आ गया. उसने कार एक अंधेरी जगह पर रोकी और बाहर कार के बोनेट पर बैठ कर दारू पीने लगा.


वो खुद जानता था के बिस्तर पर वो अपनी बीवी को खुश करने में नाकाम है, उसको प्रिमेच्यूर ईजॅक्युलेशन की बीमारी थी और अक्सर रूपाली से पहले ही उसका काम ख़तम हो जाता था. कई बार उसने सोचा के किसी डॉक्टर के पास जाए पर वो इस इलाक़े के ठाकुर खानदान का सबसे बड़ा लड़का था. अगर बात फैल जाती के ठाकुर पुरुषोत्तम को नमार्दानगी की बीमारी है तो वो कहीं मुँह दिखाने लायक ना रहता. इसी डर से वो कभी किसी डॉक्टर के पास भी ना जा सका.


कोई एक घंटे बाद वो शराब के नशे में धुत वापिस हवेली पहुँचा. कार बाहर खड़ी करके वो हवेली में दाखिल हुआ और अपने कमरे की तरफ बढ़ा. उसका कमरा फर्स्ट फ्लोर पर था. वो किसी तरह सीढ़ियाँ चढ़कर उपेर पहुँचा पर फिर नौकर को डिन्नर कमरे में ही सर्व करने के बोलने के इरादे से वो रुका और फिर नीचे किचन की तरफ बढ़ चला.


अचानक ही पवर कट हुआ और पूरी हवेली अंधेरे में डूब गयी. पुरुषोत्तम ध्यान से सीढ़ियाँ उतर रहा था. ड्रॉयिंग हॉल में पूरा अंधेरा था. अचानक उसने देखा था हॉल के दूसरी तरफ उसके पिता के कमरे का दरवाज़ा खुला और एक औरत कमरे से बाहर निकली. अंधेरा होने की वजह से सिर्फ़ अंदर ठाकुर के कमरे से आती हल्की रोशनी में वो औरत उसको नज़र आई. उस औरत का चेहरा उसको अंधेरे की वजह से दिखाई नही दिया.


“अर्रे सुनो” कहते हुए ठाकुर साहब ने हल्का सा दरवाज़ा खोला. हल्की सी रोशनी में पुरुषोत्तम को अंदाज़ा हो गया था के उसका बाप सिर्फ़ एक अंडरवेर में है.


“तुम ये भूल गयी थी कल. ये ले जाओ” कहते हुए उसके बाप ने उस औरत के हाथ में एक ब्रा थमा दी.


जहाँ पुरुषोत्तम खड़ा था वहाँ से उसको उस औरत के पीठ नज़र आ रही थी. ठाकुर के कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही फिर अंधेरा हो गया. बाहर निकली औरत कौन थी ये तो वो देख नही सका पर कमरे से आती हल्की सी रोशनी में उसने ये ज़रूर देख लिया था के उसने एक गुलाबी रंग का सलवार कमीज़ पहेन रखा था और उस सलवार कमीज़ को पुरुषोत्तम बहुत खूब पहचानता था.


वो औरत कमरे से निकलकर किचन की तरफ बढ़ चली.


थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.


भूषण अपने कमरे में बैठा हुआ था के टेबल पर रखी घंटी बज उठी. इसका मतलब सॉफ था. के ठाकुर साहब ने उसको याद किया है.


भूषण हवेली में पिच्छले 40 साल से नौकरी कर रहा था. उसकी उमर 70 के पार थी. इससे पहले उसके पिता ठाकुर खानदान के खेत में पहरा दिया करते थे. बाद में भूषण ने हवेली में काम करना शुरू कर दिया और फिर वहीं का होकर रह गया. हवेली के बाहर कोने में एक छ्होटा सा कमरा उसका था जहाँ वो अकेला रहता था.


वो धीरे धीरे चलता हवेली में दाखिल हुआ और ठाकुर साहब के कमरे में पहुँचा. अंदर ठाकुर और ठकुराइन दोनो ही कमरे में मौजूद थे. ठाकुर उस वक़्त बाथरूम में थे और ठकुराइन सरिता देवी अपनी व्हील चेर पर बिस्तर के पास बैठी थी.


“हुकुम मालिक” भूषण ने कहा


“गाड़ी निकालो. अभी इसी वक़्त” ठाकुर ने बाथरूम के अंदर से कहा


भूषण ने एक नज़र सरिता देवी पर डाली और दूसरी नज़र घड़ी पर.


“रात के इस वक़्त कहाँ जाएँगे” उसने मंन ही मंन सोचा पर ये पुच्छने की हिम्मत नही हुई. वो चुपचाप जी मालिक कहकर कमरे से बाहर निकल आया.


ये कयि सालों का दस्तूर था के ठाकुर शौर्या सिंग के गाड़ी भूषण ही चलाता था. वो खुद काफ़ी बुड्ढ़ा हो चुका था और नज़र भी काफ़ी कमज़ोर हो चली थी पर ठाकुर साहब सिर्फ़ उसी की ड्राइविंग पर यकीन रखते थे.


धीरे धीरे भूषण पार्किंग लॉट तक पहुँचा. कुल मिलकर वहाँ 10 गाड़ियाँ खड़ी थी, सब इंपोर्टेड. वो ठाकुर साहब की मर्सिडीस तक गया और चाबी निकालने के लिए अपनी जेब में हाथ डाला तो याद आया के चाबी खुद ठाकुर के पास ही थी. वो आज दिन में गाड़ी कहीं खुद लेकर गये थे और तबसे चाभी उन्ही के पास थी. वो फिर ठाकुर के कमरे की तरफ वापिस चला.



हवेली के गेट के बाहर कॉरिडर में सरिता देवी हाथ में विस्की का ग्लास लिए बैठी थी. ये हर शाम होता था. खाने के बाद ठकुराइन हाथ में शराब का ग्लास लिए अपनी व्हील चेर को गेट के पास लाकर बैठ खुली हवा में बैठ जाती थी. जहाँ तक भूषण को याद आता था, शराब की ये आदत ठकुराइन को उस आक्सिडेंट के बाद पड़ी जब वो सीढ़ियों से गिर गयी थी और फिर कमर में चोट आ जाने की वजह से कभी अपने पैरों पर खड़ी ना हो सकी. पिच्छले 15 साल से वो व्हील चेर पर ही थी.


भूषण ठाकुर के कमरे के अंदर पहुँचा. ठाकुर अब भी बाथरूम के अंदर ही थे पर दरवाज़ा खुला हुआ था.


“मालिक” उसने ज़रा ऊँच आवाज़ में कहा


“गाड़ी निकाली?” ठाकुर की अंदर से ही आवाज़ आई.


“मालिक चाभी आपके पास है” भूषण ने कहा


“एक गाड़ी निकालने में इतना वक़्त लग रहा है? पहले याद नही आया था? चाभी सामने टेबल पर रखी है. जल्दी से गाड़ी निकालो” ठाकुर ने अंदर से चिल्लाते हुए कहा


कमरे में लगे फुल साइज़ मिरर में एक पल के लिए भूषण को बाथरूम में खड़े ठाकुर साहब नज़र आए. वो बाथरूम में शीशे के सामने खड़े थे वॉश बेसिन पर झुके खड़े थे.


भूषण फिर कमरे से बाहर निकला और कॉरिडर में आया ही था के एक कार हवेली के सामने आकर रुकी और उसमें से जै निकला.


जै ठाकुर साहब का भतीजा था, ठाकुर के सगे छ्होटे भाई का बेटा. उमर कोई 35 साल. जहाँ तक भूषण जानता था, उसके माँ बाप एक कार आक्सिडेंट में मर गये थे. उसके बाद कुच्छ टाइम तक वो हवेली में ही रहा पर एक दिन किसी बात पर ठाकुर ने उसको हवेली से निकाल फेंका और जायदाद में से एक छ्होटा सा हिस्सा उसको दे दिया जो कि जै को लगता था के कम है जिसकी वजह से वो आज भी ठाकुर साहब से साथ कोर्ट में केस लड़ रहा था.


“ताया जी कहाँ हैं?” जै ने कार से निकलते हुए सवाल भूषण और कॉरिडर में बैठी सरिता देवी, दोनो से पुछा.


“अपने कमरे में” जवाब भूषण ने दिया.


जै गुस्से में था ये उसके चेहरे से साफ नज़र आ रहा था. वो गुस्से में पावं पटकता हवेली के अंदर चला गया और भूषण फिर गॅरेज की तरफ चला. उसने ठाकुर साहब की मर्सिडीस निकाली और चलकर हवेली के गेट तक लाया और कार से बाहर निकला.


तभी पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.


रात के तकरीबन 11 बज रहे थे जब इनस्पेक्टर मुनव्वर ख़ान की गाड़ी हवेली के बाहर जा कर रुकी. उसके पिछे पोलीस की एक और जीप थी जिसमें 6 पोलिसेवाले और मौजूद थे. वो फ़ौरन गाड़ी से बाहर निकला और हवेली के अंदर घुसा.


ड्रॉयिंग रूम में जैसे तूफान आया हुआ था. काफ़ी सारे लोग ड्रॉयिंग में खड़े हुए थे जिनमें से कुच्छ एक दरवाज़े को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे.


“क्या हो रहा है?” इनस्पेक्टर ने चिल्लाते हुए पुच्छे. उसके पिच्चे बाकी पोलिसेवाले भी हवेली में दाखिल हो चुके थे.


“तुझे किसने बुलाया बे?” दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश कर रहे लोगों में से एक आगे आया जिसको इनस्पेक्टर पहचानता था. वो तेज था.


“मुझे एक फोन आया था के यहाँ बड़े ठाकुर का खून हो गया है” ख़ान ने जवाब दिया.


“ये हमारा घरेलू मामला है. चल बाहर निकल” कहता हुआ टेक उसकी तरफ आया.


ख़ान जानता था के ये होगा इसलिए अपने साथ जितने हो सके, पोलिसेवाले लाया था.


“ठाकुर साहब यहाँ एक खून हुआ है” ख़ान ने कहा “और ये घरेलू मामला नही है”


“तू जाता है या…..?” कहता हुआ तेज आगे बढ़ा ही था के ख़ान ने अपनी रेवोल्वेर उसकी तरफ तान दी.


“देखिए मैं जानता हूँ के दिस ईज़ ए डिफिकल्ट टाइम राइट नाउ पर मैं भी सिर्फ़ अपना काम ही कर रहा हूँ. बेहतर ये है के आप प्लीज़ को-ऑपरेट करें वरना मुझे ज़ोर ज़बरदस्ती करनी पड़ेगी”


तेज उसका इशारा समझ गया. ख़ान के पिछे 6 हथ्यार बंद पोलिसेवाले खड़े थे.


“तेज” व्हीलचार पर बैठी एक औरत ने कहा जो कि ख़ान जानता था के ठकुराइन सरिता देवी थी


तेज अपनी माँ का इशारा समझकर पिछे हो गया.


“कौन है कमरे के अंदर?” ख़ान ने पुछा


“जै” एक दूसरे आदमी ने जवाब दिया जिसको ख़ान ठाकुर के बड़े बेटे पुरुषोत्तम सिंग के नाम से जानता था “साला बाबूजी पर हमला करके अंदर किचन में जा छुपा है”


“और ठाकुर साहब?” ख़ान ने पुछा तो पुरुषोत्तम ने एक कमरे की तरफ इशारा किया. ख़ान ने 2 पोलिसेवालो की तरफ देखा और उन्हें हाथ के इशारे से कमरे में देखने को कहा.


वो खुद किचन के दरवाज़े तक पहुँचा. जै को वो खुद भी जानता था. ठाकुर साहब का भतीजा था वो.


“जै बाहर आ जाओ वरना मुझे दरवाज़ा तोड़ना पड़ेगा” ख़ान ने चिल्लाते हुए कहा


“ये लोग मार डालेंगे मुझे” अंदर से जै ने चिल्लाकर कहा “मैने कोई खून नही किया है”


“कोई कुच्छ नही करेगा ये मेरा वादा है. पोलीस यहाँ आ चुकी है. पर अगर तुम बाहर नही आए तो मौका-ए-वारदात से भागने की कोशिश करने के जुर्म में मैं खुद गोली मार सकता हूँ तुम्हें”


“मैं भाग कहाँ रहा हूँ” जै ने अंदर से कहा “मैं तो यहाँ किचन में बंद खड़ा हूँ साले. चाहूं भी तो नही भाग सकता”


“जानता हूँ पर मुझे तो तुम्हें गोली मारने के लिए कोई बहाना चाहिए ना. तो तुम भाग रहे थे से अच्छा बहाना क्या है” ख़ान ने जवाब दिया


थोड़ी देर के लिए खामोशी च्छा गयी.


“कितने पोलिसेवाले हैं तुम्हारे साथ?” अंदर से जै ने पुछा.


“6 कॉन्स्टेबल्स और मुझे और मेरे ड्राइवर को मिलाके 8. बाहर आ जाओ. कोई तुम पर हमला नही करेगा” ख़ान ने और अपने पिछे खड़े पुरुषोत्तम और जै को आख़िरी से वॉर्निंग दी के कुच्छ करने की कोशिश ना करें.


तभी 2 पोलिसेवाले जो कमरे के अंदर गये थे बाहर आए.ख़ान ने उसकी तरफ देखा.


“अंदर बड़े ठाकुर हैं” एक ने कहा “मर चुके हैं”


इतना कहते ही चेर पर बैठी सरिता देवी फिर रोने लगी और तेज फिर से किचन की तरफ बढ़ा.


“प्लीज़ ठाकुर साहब” ख़ान ने उसको रोक दिया “लेट मी हॅंडल दिस”


“मैने कोई खून नही किया है. जब मैं आया तो वो ऑलरेडी मर चुके थे” अंदर से फिर जै चिल्लाया


“बाहर आ जाओ जै” ख़ान ने कहा “इसमें तुम्हारी ही भलाई है”


“ठीक है मैं बाहर आ रहा हूँ” जै ने कहा


कोई 3 मिनट बाद किचन का दरवाज़ा खुला और जै बाहर आया. वो पूरा खून में सना हुआ था और हाथ में एक बड़ा सा चाकू था.


उस पूरी रात और अगला पूरा दिन मुनव्वर ख़ान को बैठने का मौका नही मिला. ठाकुर की लाश को पोस्टमॉर्टम के लिए शहर भेज दिया गया था और खुद जै को भी ठाकुर के खून के इंटेज़ाम में मुक़दमा होने तक शहर की ही एक जैल में शिफ्ट कर दिया गया था. ठाकुर की मौत एक लंग पंक्चर होने की वजह से हुई थी. एक स्क्रू ड्राइवर उनकी छाती में घुसाया गया था जिसने उनका राइट लंग पंक्चर किया और जो की मौत की वजह बना.


केस का प्रोफाइल बड़ा था, खून एक नामी ठाकुर का हुआ था जो इलाक़े का सबसे बड़ा रईस था और कई पोलिटिकल कनेक्षन्स थे इसलिए खुद ख़ान भी जानता था के इस केस को सॉल्व करने के लिए उसके पास वक़्त बहुत कम है. प्रेशर बढ़ेगा और अगर वो रिज़ल्ट्स ना दे पाया तो केस किसी और को थमा दिया जाएगा.


ख़ान की उमर कोई 30 के आस पास थी. उसका रेकॉर्ड क्लीन था और वो 6 महीने पहले तक एक टॉप कॉप माना जाता था. 6 महीने पहले एक एनकाउंटर के दौरान क्रॉस फाइयर में उसकी गोली से एक सब-इनस्पेक्टर की मौत हो गयी थी. पोलिसेवालो ने मामला बाहर नही आने दिया और बात दबा दी गयी पर ख़ान को उठाकर इस छ्होटे से गाओं में डाल दिया.


वो पोलीस स्टेशन में बैठा सोच ही रहा था उसका मोबाइल बज उठा. नंबर अननोन था.


“ख़ान” उसने फोन उठाते हुए कहा


“हेलो इनस्पेक्टर” दूसरी तरफ से एक लड़की की आवाज़ आई. उस आवाज़ को वो बहुत खून जानता था.


“किरण” उसने धीरे से कहा


“ओह” दूसरी तरफ से लड़की ने कहा “आवाज़ पहचानते हो अब भी मेरी”


“तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ” ख़ान के गुस्सा धीरे धीरे बढ़ रहा था “दोबारा अगर मुझे फोन किया तो कसम खुदा की, इस बार घर में घुसके मारूँगा. डोंट पुट माइ पेशियेन्स ऑन टेस्ट”


कहते हुए ख़ान ने फोन काट दिया. वो जानता था के फोन फिर बजेगा इसलिए सेल स्विच ऑफ कर दिया. पुरानी यादें ताज़ा होनी शुरू हुई तो वो सर पकड़कर बैठ गया.


“दिन काफ़ी लंबा रहा सर” आवाज़ आई तो ख़ान ने सर उठाकर देखा. वो हेड कॉन्स्टेबल शर्मा था.


“दिन भी और रात भी” ख़ान ने कहा “नींद आ रही है यार”


“लीजिए चाइ पीजिए” शर्मा ने चाइ का एक कप ख़ान के हाथ में दिया और उसके सामने बैठ गया.


“हिम्मत मानता हूँ लौंदे की सिर. घर में घुसके अपने चाचा को मार दिया” शर्मा ने कहा


“शर्मा मुझे नही लगता के जै ने मारा है ठाकुर को” ख़ान ने कहा “मुझे लगता है के वो बेचारा बस ग़लत टाइम पर ग़लत जगह पे पहुँच गया”


“ह्म्‍म्म्म” शर्मा ने कहा “बयान क्या दिया उसने?”


ख़ान ने सामने रखी एक फाइल उठाई


“उसके हिसाब से वो हवेली पहुँचा तो ठाकुर साहब ऑलरेडी ज़मीन पर गिरे पड़े थे. वो उनके करीब पहुँचा और उनको उठाने लगा के तभी घर की नौकरानी वहाँ आ पहुँची और उसने चीख मारी जिसके चलते पुरुषोत्तम और तेज वहाँ आ गये. उन दोनो को लगा के हमला खुद जै ने किया है इसलिए उन्होने उसको मारना शुरू कर दिया. जान बचाकर जै भागता हुआ किचन में घुस गया और उसके बाद वहीं रहा जब तक हम नही आ गये.”


“ये मैं आपसे पुच्छना चाहता था सर” शर्मा ने कहा “हमें किसने इनफॉर्म किया के खून हुआ है?”


“हवेली से एक औरत ने फोन किया था” ख़ान बोला


“किसने?”


“फिलहाल पता नही. अब तक सबकी स्टेट्मेंट्स ली गयी हैं पर किसी ने इस बात का इक़रार नही किया के वो फोन उसने किया था. मैं सबसे बात करूँगा अभी तो शायद पता चल जाए” ख़ान बोला


कुच्छ देर तक दोनो खामोशी से चाइ पीते रहे.


“तुम्हें घर जाना होगा अब?” ख़ान ने थोड़ी देर बाद कहा “तुम भी तो कल रात से घर नही गये”


“जाऊँगा सर” शर्मा ने कहा “बीवी तो वैसे ही डंडा लिए बैठी होगी तो आराम से जाऊँगा और कुच्छ रास्ते में खरीदके ले जाऊँगा ताकि उसका गुस्सा ठंडा हो”


शर्मा की बात पर दोनो हस्ने लगे.


“एक बात बताओ शर्मा” थोड़ी देर बाद ख़ान बोला “मैं यहाँ नया हूँ इसलिए सिर्फ़ ठाकुर के 2 बेटो को जानता हूँ वो भी नाम से और जै को मैने कल पहली बार देखा था. इससे पहले बस नाम ही सुना था. इसके अलावा किसी को नही पहचानता. मैं सिर्फ़ नाम जानता हूँ के कल रात हवेली में कौन कौन था. उन लोगों के बारे में तुम कुच्छ जानते हो?”


“मैं तो हमेशा से यहीं रहा हूँ सर” शर्मा ने कहा “यहीं पैदा हुआ और यहीं पाला बढ़ा. सबको जानता हूँ”


“तो बताओ कुच्छ इन लोगों के बारे में” ख़ान ने कहा


“हवेली में जब हम पहुँचे तो वहाँ कुल मिलाके 12 लोग थे, एक मुर्दा यानी के ठाकुर साहब और 11 ज़िंदा यानी के उनका परिवार. जै हमें किचन मिला और बाकी सब किचन के बाहर. वैसे एक बात बताइए सर, उस जै ने ये बताया के वो इतनी रात को हवेली में करने क्या गया था?”


“यही एक बात नही बताई उसने” ख़ान बोला “मैं बहुत पुछा पर जवाब नही दिया साले ने. बता देगा. अपनी जान प्यारी है तो बताना पड़ेगा उसको”



“ह्म्‍म्म” शर्मा ने कहना शुरू किया “तो सर जिस वक़्त खून हुआ उस वक़्त हवेली में 11 लोग थे.


1. पुरुषोत्तम सिंग – ठाकुर साहब का सबसे बड़ा बेटा. बेहद शरीफ इंसान. काम सार खुद देखता है. या ये कह लीजिए के ठाकुर साहब का पूरा बिज़्नेस अकेले ही चलाता है. स्कूल कुच्छ टाइम तक यहाँ शहर में गया और उसके बाद ठाकुर साहब ने उसको लंडन पढ़ने के लिए भेज दिया. वो अपनी पढ़ाई पूरी करके आया तो ठाकुर साहब ने उसकी शादी करा दी और अब पूरा काम वही देखता है. उसके बारे में जो यहाँ आस पास बात उड़ी हुई है वो ये है पुरुसोत्तम नमार्द है साला”


“नमार्द?” ख़ान ने सवालिया नज़र से शर्मा की तरफ देखा


“खड़ा नही होता साले का” शर्मा हस्ते हुए बोला “और आप तो जानते ही हो सर, ये बातें च्छुपति नही. कहते हैं के शादी से पहले दोस्तों के साथ एक पार्टी करी, वहाँ कुच्छ रंडिया बुलाई गयी पर बेचारे ठाकुर साहब कुच्छ कर ही नही सके क्यूंकी उनका खड़ा ही नही हुआ. कितनी सच्चाई है ये तो बस पुरुषोत्तम ही जानता है”


“ह्म्‍म्म्म” ख़ान ने हामी भरी”


“दूसरा तेजविंदर” शर्मा ने बात जारी रखी “ठाकुर साहब का दूसरा बेटा. एक नंबर का आय्याश और रंडीबाज. इलाक़े में शायद ही कोई रंडी बची हो जिसके साथ वो ना सोया हो. ज़्यादातर वक़्त शराब के नशे में रहता है और अपने बड़े भाई की तरह वो पढ़ने के लिए लंडन नही गया. उसके बारे में बात ये उड़ी हुई है के वो आजकल ठाकुर साहब से बटवारे को लेकर अक्सर लड़ता था. उसका गुस्सा बहुत मश-हूर है. माथा गरम हो जाए तो फिर वो कुच्छ नही देखता”


“ओके” ख़ान ने कहा


“तीसरा कुलदीप. ठाकुर साहब का सबसे छ्होटा बेटा. उसके बारे में ज़्यादा कुच्छ नही जानता क्यूंकी वो बहुत छ्होटा था जब उसको लंडन भेज दिया गया था. उस वक़्त पुरुषोत्तम भी लंडन में ही था इसलिए वो अपने भाई के साथ रहा. बाद में पुरुषोत्तम वापिस आ गया पर कुलदीप पढ़ाई पूरी करने के लिए वहीं रुका रहा. आजकल च्छुतटियों में आया हुआ है”


“ह्म्‍म्म्म”


“कामिनी. ठाकुर साहब की एकलौती बेटी और उनकी आँखों का सितारा. उसको बहुत चाहते थे ठाकुर साहब. उसको लोग या तो गूंगी कामिनी कहते हैं या पागल कामिनी”


“ऐसा क्यूँ?” ख़ान ने पुचछा


“कुच्छ बोलती नही सर” शर्मा बोला “चुप रहती है बिल्कुल. आजकल शायद ही गाओं में किसी ने उसको बात करते सुना हो. कुच्छ लोग कहते हैं के उसपर भूत का साया है और कुच्छ कहते हैं के पागल है दिमाग़ से और इसलिए ही ठाकुर साहब इतना लाड करते थे उसको”


“जै. ठाकुर साहब के छ्होटे भाई के बेटा और आक्च्युयली खानदान का सबसे बड़ा बेटा. ठाकुर साहब के तीनो बेटे हैं बेटी उससे छ्होटी हैं. वो कोई 15-16 साल का होगा जब उसके माँ बाप एक कार आक्सिडेंट में मारे गये और उसके बाद वो कुच्छ टाइम तक हवेली में रहा. फिर एक दिन अचानक ठाकुर साहब ने उसको हवेली से निकाल दिया और जायदाद का एक छ्होटा सा हिस्सा उसके नाम कर दिया. कोई नही जानता के ऐसा क्यूँ हुआ पर जै प्रॉपर्टी को लेकर ठाकुर साहब से केस लड़ रहा था”


“रूपाली” शर्मा बोला “ठाकुर साहब की बहू. उसके बारे में क्या बताऊं सर. बहुत सारी बातें उड़ी हुई हैं”


“जैसे के?” ख़ान बोला


“जैसे के लोग कहते हैं उसका कॅरक्टर एक रंडी की सलवार के नाडे से भी ज़्यादा ढीला है”


“अच्छा?” ख़ान हस्ता हुआ बोला “और?”


“ठाकुर खानदान से ही है और उसका बाप भी काफ़ी रईस है. लोग कहते हैं के जब उसकी शादी हुई उससे पहले वो पेट से थी और बच्चा गिराया गया था इसलिए उसके घर वालों ने जल्दी जल्दी में शादी कर दी. कुच्छ तो ये तक कहते हैं के ठाकुर साहब को अपनी बहू का कॅरक्टर पता था पर वो ये भी जानते थे के उनका बेटा नमार्द है इसलिए उन्होने भी शादी से इनकार नही किया”


“ह्म्‍म्म्मम” ख़ान ने गर्दन हिलाई


“इंद्रासेन राणा” शर्मा बोला “या शॉर्ट में इंदर. रूपाली का भाई. उसके बारे में मैं कुच्छ नही जानता सर सिवाय इसके के शहर में ही रहता है और कुच्छ बिज़्नेस करता है. उस रात अपनी बेहन से मिलने आया हुआ था”


“ओके” ख़ान बोला


“सरिता देवी” शर्मा ने बात जारी रखी “ठाकुर साहब की धरम पत्नी यानी के ठकुराइन. कई साल पहले सीढ़ियो से गिर गयी थी जिसके बाद से व्हील चेर पर ही बैठ गयी. ठाकुर साहब ने बहुत इलाज कराये, देसी और विदेशी दोनो पर कुच्छ नही हुआ. उनके बारे में यही है के बहुत बड़ी पुजारन हैं, धरम करम में पूरा विश्वास है बस. चल फिर नही सकती इसलिए हर काम एक नौकरानी ही करती है”


“अब आते हैं नौकरों पर सर” शर्मा बोला “यूँ तो हवेली में बहुत सारे नौकर हैं पर सब सुबह आते हैं और शाम तक अपने अपने घर चले जाते हैं. 4 ऐसे हैं जो हवेली में ही रहते हैं. उनमें से वो जो बुड्ढ़ा एक खड़ा था वहाँ वो था भूषण. हवेली का सबसे पुराना और वफ़ादार नौकर. ठाकुर साहब की गाड़ी चलाता था और ज़्यादातर काम वही देखता था. शादी उसने कभी की नही और अपनी सारी ज़िंदगी ठाकुर खानदान की नौकरी करने में ही गुज़री है”


“ओके”


“वो जो ठकुराइन के पिछे उनकी व्हील चेर पकड़े खड़ी थी वो थी बिंदिया. गाओं की ही एक औरत है. उसका पति ठाकुर साहब के खेतों में काम करता था. जब वो मरा तो ठाकुर साहब ने उसको हवेली में ही रख लिया ताकि ठकुराइन की देख-भाल कर सके.”


“पायल. बिंदिया की बेटी. वहीं हवेली में अपनी माँ के साथ रहती है”


“चंदर या चंदू कह लीजिए. गूंगा है, बोल नही पाता. उसके माँ बाप जब वो छ्होटा था तब ही मर गये थे उसके बाद से बिंदिया ने उसको पाल पोसकर बड़ा किया. अपना बेटा कहती है उसको. वो भी वहीं उसके पास ही हवेली में रहता है”


“ह्म्‍म्म्मम” ख़ान ने एक सिगरेट जलाई “अब देखना ये है के इनमें से किसके पास ठाकुर साहब को मारने की वजह थी और किसने उस रात ये काम किया. मुझे पूरा यकीन है के बाहर का कोई नही था. इन्ही में से किसी ने ये काम किया है और ग़लत टाइम पर वहाँ पहुँच गया जै”


“सर आपको इतना यकीन कैसे है के उसने ही मर्डर नही किया?” शर्मा ने पुछा


“पता नही यार. किया भी हो सकता है पर जाने क्यूँ मुझे लगता है के वो वहाँ बस ग़लत टाइम पर था. इतना बेवकूफ़ नही लगता वो शकल से. अगर उसको ठाकुर का खून करना ही होता तो उस वक़्त क्यूँ करता जब पूरी दुनिया हवेली में मौजूद थी और वो पकड़ा जाता”


“ह्म्‍म्म .. ” शर्मा ने गर्दन हिलाई.


रूपाली का जन्म एक ज़मींदार के घर में हुआ था इसलिए बचपन से ही उसको कोई कमी नही थी. जो चीज़ चाही, वो माँग ली और मिल भी जाती थी. घर पर सिर्फ़ उसके पिता, उसकी माँ और एक छ्होटा भाई था. बड़ा सा घर जिसमें बहुत सारे नौकर और एक छ्होटा सा परिवार. यही वजह थी के बहुत ही कम उमर में उसने बडो वाले खेल देख भी लिए थे और खेल भी लिए थे.


उसकी उमर कोई 14-15 साल की रही होगी जब उसने पहली बार एक आदमी और एक औरत को जिस्मानी संबंध बनाते हुए देखा. सनडे का दिन था. उस दिन उसके माँ बाप मंदिर जाया करते थे. सुबह सुबह तड़के निकल जाते थे और 11 बजे तक वापिस नही आते थे. उन्होने लाख कोशिश की थी के रूपाली भी सुबह सुबह उठकर उनके साथ चले पर रूपाली ना तो कभी इतनी सुबह उठ पाती थी और ना ही वो कभी मंदिर गयी.


हर सनडे की तरह उस दिन भी घर पर वो अकेली थी. माँ बाप भाई मंदिर के लिए जा चुके थे जहाँ से उन्होने 11 बजे तक वापिस नही आना था. सनडे के दिन सब नौकरो की छुट्टी होती थी. सिर्फ़ दो नौकर घर पर होते थे. एक सफाई करने वाली कल्लो और दूसरे उनके घर पर खाना बनाने वाले शंभू काका. 11 बजे तक वो दोनो अपना काम करते रहते थे और रूपाली अपने कमरे में पड़ी सोती रहती थी.


शंभू की उमर कोई 60 के पार थी और वो रोज़ ही आकर 3 वक़्त का खाना बना जाया करता था. कल्लो की उमर भी 40 के आस पास ही थी. उसके रंग एक दम उल्टे तवे जैसा काला था जिसकी वजह से सब उसको कल्लो कहा करते थे. उसका असली नाम क्या था, ये तो शायद बस वो खुद ही बता सकती थी.


यूँ तो रूपाली सनडे को 10-11 बजे से पहले बिस्तर नही छ्चोड़ती थी पर उस दिन नींद ना आने की वजह से वो 8 बजे ही बिस्तर से निकल गयी. थोड़ी देर यूँ ही बेड पर बैठे रहने के बाद उसने शंभू काका को चाइ के लिए बोलने की सोची और बिस्तर से निकली.


पूरा घर खाली पड़ा था. वो खुद भी जानती थी के आज घर पर सिर्फ़ कल्लो और शम्भी काका ही होंगे. आँखें मलति वो किचन तक पहुँची पर वहाँ कोई भी नही था. उसने ड्रॉयिंग रूम की तरफ देखा पर उधर भी कोई नज़र नही आया. वो शंभू काका का नाम पुकारने ही वाली थी के एक हसी की आवाज़ सुनकर चुप हो गयी. आवाज़ उसके माँ बाप के कमरे से आ रही थी.


एक पल के लिए रूपाली को लगा के उसके माँ बाप घर पर ही हैं पर जब हसी की आवाज़ दोबारा आई तो वो समझ गयी के ये आवाज़ उसके माँ बाप की नही है. रूपाली को कुच्छ ठीक नही लगा और उसने फिर शंभू काका का नाम पुकारना ठीक नही समझा. दबे पावं से वो अपने माँ बाप के कमरे तक पहुँची. दरवाज़ा बंद था और अंदर से लॉक्ड था.


रूपाली कमरे के बाहर खड़ी सोच ही रही थी के वो हसी की आवाज़ फिर से आई और इस बार रूपाली समझ गयी के आवाज़ कल्लो की थी. रूपाली सोच में पड़ गयी. कल्लो उसके माँ बाप के कमरे में, अंदर से दरवाज़ा बंद, रूपाली को कुच्छ ठीक नही लगा. अंदर क्या हो रहा था वो नही जानती थी पर ये समझ गयी के वो कुच्छ था ग़लत था इसलिए ही दरवाज़ा बंद है. वरना नौकरों का उसके माँ बाप के कमरे में क्या काम.


रूपाली के छ्होटे भाई इंदर का कमरा बिल्कुल उसके माँ बाप के कमरे से लगता हुआ था जबकि खुद रूपाली का कमरा 1स्ट्रीट फ्लोर पर था. पहले नीचे का वो कमरा रूपाली का हुआ करता था पर जब वो थोड़ा बड़ी हुई तो उसको उपेर वाला कमरा दे दिया गया और उसका छ्होटा भाई जो पहले अपने माँ बाप के साथ सोया करता था अब उस कमरे में सोने लगा. दोनो कमरो के बीच एक अडजाय्निंग दरवाज़ा था जिसका मकसद सिर्फ़ ये थे के अगर बच्चा रात को डरकर उठे तो उसके माँ बाप फ़ौरन वहाँ पर आ सकें. रूपाली को याद था के वो जब वो छ्होटी थी तो बहुत डरती थी जिसकी वजह से उसके माँ बाप उस दरवाज़े को अक्सर खुला रखते थे ताकि वो दोनो उसको देख सकें और रूपाली डरे नही.


धीरे धीरे रूपाली खामोशी से अपने भाई के कमरे में दाखिल हुई. वो कमरा कभी उसका खुद का हुआ करता था इसलिए वो अच्छी तरह से उस कमरे को पहचानती थी. 2 कमरो के बीच का दरवाज़ा पुराने ज़माने के दरवाज़ो की तरह था यानी किसी खिड़की की तरह 2 किवाड़ थे जो बंद करके बीच में एक कुण्डा लगाया जाता था. एक साल बहुत ज़्यादा बारिश की वजह से दरवाज़ा सील गया था जिसकी वजह से ढंग से बंद नही होता था. बंद होने के बाद भी दोनो किवाडो के बीच इतनी जगह बच जाती थी के उसमें से दूसरे कमरे में देखा जा सके. रूपाली दरवाज़े के पास पहुँची और झाँक कर अपने माँ बाप के कमरे में देखा. यूँ तो उस दरवाज़े पर एक परदा हुआ करता था पर किस्मत से आज परदा खुला हुआ नही था. दरवाज़े में से देखते ही रूपाली को जो नज़र आया उसने उसकी आँखें खोलकर रख दी.


एक पल के लिए रूपाली को समझ नही आया के वो क्या देख रही है या जो वो देख रही है वो क्या है. आँखें मलकर उसने दोबारा देखा तो मंज़र वैसा ही था. रूपाली ने गौर से देखना शुरू किया और समझना चाहा के अंदर हो क्या रहा है.


पहली चीज़ जो उसको दिखी वो था कल्लो का चेहरा. बॉल बिखरे हुए, माथे पर पसीना, आँखें फेली हुई, और मुँह खुला हुआ. उसकी एल्बोस बेड पर थी और जो झुकी हुई थी जिसकी वजह से उसके बॉल बार बार उसके चेहरे पर गिर जाते थे जिनको वो एक हाथ से अपने चेहरे से हटा देती थी. उसका सर आगे पिछे हो रहा था जैसे वो हिल रही हो और हर बार जैसे ही हो आगे को होती, उसके मुँह से आह ऊह जैसी आवाज़ निकलती.


अगली चीज़ जिसपर रूपाली का ध्यान गया वो थी कल्लो की चूचियाँ जिन्हें देखकर रूपाली का मुँह खुला रह गया. उसने एक 2 बार अपनी माँ को ब्रा में देखा था पर कल्लो की छातियाँ देखकर तो वो हैरत मान गयी. कल्लो आगे को झुकी हुई थी जिसकी वजह से उसकी चूचियाँ उसके शरीर और नीचे बेड के बीच में लटक रही थी. वो इतनो बड़ी बड़ी थी के शरीर और बेड के बीच थोडा फासला होने के बाद भी उसके निपल्स नीचे बेड पर टच कर रहे थे. जैसे ही कल्लो को शरीर हिलता, वो दोनो भी आगे पिछे को झूलती.


रूपाली की आँखों के लिए ये सब कुच्छ नया था. पहली नज़र पड़ते ही उसको एक झटका सा लगा था जो अब धीरे धीरे कम हो रहा था. उसकी आँख जो एक पल के लिए सामने के मंज़र पर यकीन नही कर पाई थी अब धीरे धीरे अड्जस्ट हो रही थी.


पहली बार रूपाली ने गौर से सिर्फ़ चूचियो से फोकस हटाकर कमरे में पूरी तरह नज़र फिराई.


“ह्म्‍म्म” शर्मा ने कहना शुरू किया “तो सर जिस वक़्त खून हुआ उस वक़्त हवेली में 11 लोग थे.


1. पुरुषोत्तम सिंग – ठाकुर साहब का सबसे बड़ा बेटा. बेहद शरीफ इंसान. काम सार खुद देखता है. या ये कह लीजिए के ठाकुर साहब का पूरा बिज़्नेस अकेले ही चलाता है. स्कूल कुच्छ टाइम तक यहाँ शहर में गया और उसके बाद ठाकुर साहब ने उसको लंडन पढ़ने के लिए भेज दिया. वो अपनी पढ़ाई पूरी करके आया तो ठाकुर साहब ने उसकी शादी करा दी और अब पूरा काम वही देखता है. उसके बारे में जो यहाँ आस पास बात उड़ी हुई है वो ये है पुरुसोत्तम नमार्द है साला”


“नमार्द?” ख़ान ने सवालिया नज़र से शर्मा की तरफ देखा


“खड़ा नही होता साले का” शर्मा हस्ते हुए बोला “और आप तो जानते ही हो सर, ये बातें च्छुपति नही. कहते हैं के शादी से पहले दोस्तों के साथ एक पार्टी करी, वहाँ कुच्छ रंडिया बुलाई गयी पर बेचारे ठाकुर साहब कुच्छ कर ही नही सके क्यूंकी उनका खड़ा ही नही हुआ. कितनी सच्चाई है ये तो बस पुरुषोत्तम ही जानता है”


“ह्म्‍म्म्म” ख़ान ने हामी भरी”


“दूसरा तेजविंदर” शर्मा ने बात जारी रखी “ठाकुर साहब का दूसरा बेटा. एक नंबर का आय्याश और रंडीबाज. इलाक़े में शायद ही कोई रंडी बची हो जिसके साथ वो ना सोया हो. ज़्यादातर वक़्त शराब के नशे में रहता है और अपने बड़े भाई की तरह वो पढ़ने के लिए लंडन नही गया. उसके बारे में बात ये उड़ी हुई है के वो आजकल ठाकुर साहब से बटवारे को लेकर अक्सर लड़ता था. उसका गुस्सा बहुत मश-हूर है. माथा गरम हो जाए तो फिर वो कुच्छ नही देखता”


“ओके” ख़ान ने कहा


“तीसरा कुलदीप. ठाकुर साहब का सबसे छ्होटा बेटा. उसके बारे में ज़्यादा कुच्छ नही जानता क्यूंकी वो बहुत छ्होटा था जब उसको लंडन भेज दिया गया था. उस वक़्त पुरुषोत्तम भी लंडन में ही था इसलिए वो अपने भाई के साथ रहा. बाद में पुरुषोत्तम वापिस आ गया पर कुलदीप पढ़ाई पूरी करने के लिए वहीं रुका रहा. आजकल च्छुतटियों में आया हुआ है”


“ह्म्‍म्म्म”


“कामिनी. ठाकुर साहब की एकलौती बेटी और उनकी आँखों का सितारा. उसको बहुत चाहते थे ठाकुर साहब. उसको लोग या तो गूंगी कामिनी कहते हैं या पागल कामिनी”


“ऐसा क्यूँ?” ख़ान ने पुचछा


“कुच्छ बोलती नही सर” शर्मा बोला “चुप रहती है बिल्कुल. आजकल शायद ही गाओं में किसी ने उसको बात करते सुना हो. कुच्छ लोग कहते हैं के उसपर भूत का साया है और कुच्छ कहते हैं के पागल है दिमाग़ से और इसलिए ही ठाकुर साहब इतना लाड करते थे उसको”


“जै. ठाकुर साहब के छ्होटे भाई के बेटा और आक्च्युयली खानदान का सबसे बड़ा बेटा. ठाकुर साहब के तीनो बेटे हैं बेटी उससे छ्होटी हैं. वो कोई 15-16 साल का होगा जब उसके माँ बाप एक कार आक्सिडेंट में मारे गये और उसके बाद वो कुच्छ टाइम तक हवेली में रहा. फिर एक दिन अचानक ठाकुर साहब ने उसको हवेली से निकाल दिया और जायदाद का एक छ्होटा सा हिस्सा उसके नाम कर दिया. कोई नही जानता के ऐसा क्यूँ हुआ पर जै प्रॉपर्टी को लेकर ठाकुर साहब से केस लड़ रहा था”


“रूपाली” शर्मा बोला “ठाकुर साहब की बहू. उसके बारे में क्या बताऊं सर. बहुत सारी बातें उड़ी हुई हैं”


“जैसे के?” ख़ान बोला


“जैसे के लोग कहते हैं उसका कॅरक्टर एक रंडी की सलवार के नाडे से भी ज़्यादा ढीला है”


“अच्छा?” ख़ान हस्ता हुआ बोला “और?”


“ठाकुर खानदान से ही है और उसका बाप भी काफ़ी रईस है. लोग कहते हैं के जब उसकी शादी हुई उससे पहले वो पेट से थी और बच्चा गिराया गया था इसलिए उसके घर वालों ने जल्दी जल्दी में शादी कर दी. कुच्छ तो ये तक कहते हैं के ठाकुर साहब को अपनी बहू का कॅरक्टर पता था पर वो ये भी जानते थे के उनका बेटा नमार्द है इसलिए उन्होने भी शादी से इनकार नही किया”


“ह्म्‍म्म्मम” ख़ान ने गर्दन हिलाई


“इंद्रासेन राणा” शर्मा बोला “या शॉर्ट में इंदर. रूपाली का भाई. उसके बारे में मैं कुच्छ नही जानता सर सिवाय इसके के शहर में ही रहता है और कुच्छ बिज़्नेस करता है. उस रात अपनी बेहन से मिलने आया हुआ था”


“ओके” ख़ान बोला


“सरिता देवी” शर्मा ने बात जारी रखी “ठाकुर साहब की धरम पत्नी यानी के ठकुराइन. कई साल पहले सीढ़ियो से गिर गयी थी जिसके बाद से व्हील चेर पर ही बैठ गयी. ठाकुर साहब ने बहुत इलाज कराये, देसी और विदेशी दोनो पर कुच्छ नही हुआ. उनके बारे में यही है के बहुत बड़ी पुजारन हैं, धरम करम में पूरा विश्वास है बस. चल फिर नही सकती इसलिए हर काम एक नौकरानी ही करती है”


“अब आते हैं नौकरों पर सर” शर्मा बोला “यूँ तो हवेली में बहुत सारे नौकर हैं पर सब सुबह आते हैं और शाम तक अपने अपने घर चले जाते हैं. 4 ऐसे हैं जो हवेली में ही रहते हैं. उनमें से वो जो बुड्ढ़ा एक खड़ा था वहाँ वो था भूषण. हवेली का सबसे पुराना और वफ़ादार नौकर. ठाकुर साहब की गाड़ी चलाता था और ज़्यादातर काम वही देखता था. शादी उसने कभी की नही और अपनी सारी ज़िंदगी ठाकुर खानदान की नौकरी करने में ही गुज़री है”


“ओके”


“वो जो ठकुराइन के पिछे उनकी व्हील चेर पकड़े खड़ी थी वो थी बिंदिया. गाओं की ही एक औरत है. उसका पति ठाकुर साहब के खेतों में काम करता था. जब वो मरा तो ठाकुर साहब ने उसको हवेली में ही रख लिया ताकि ठकुराइन की देख-भाल कर सके.”


“पायल. बिंदिया की बेटी. वहीं हवेली में अपनी माँ के साथ रहती है”


“चंदर या चंदू कह लीजिए. गूंगा है, बोल नही पाता. उसके माँ बाप जब वो छ्होटा था तब ही मर गये थे उसके बाद से बिंदिया ने उसको पाल पोसकर बड़ा किया. अपना बेटा कहती है उसको. वो भी वहीं उसके पास ही हवेली में रहता है”


“ह्म्‍म्म्मम” ख़ान ने एक सिगरेट जलाई “अब देखना ये है के इनमें से किसके पास ठाकुर साहब को मारने की वजह थी और किसने उस रात ये काम किया. मुझे पूरा यकीन है के बाहर का कोई नही था. इन्ही में से किसी ने ये काम किया है और ग़लत टाइम पर वहाँ पहुँच गया जै”


“सर आपको इतना यकीन कैसे है के उसने ही मर्डर नही किया?” शर्मा ने पुछा


“पता नही यार. किया भी हो सकता है पर जाने क्यूँ मुझे लगता है के वो वहाँ बस ग़लत टाइम पर था. इतना बेवकूफ़ नही लगता वो शकल से. अगर उसको ठाकुर का खून करना ही होता तो उस वक़्त क्यूँ करता जब पूरी दुनिया हवेली में मौजूद थी और वो पकड़ा जाता”


“ह्म्‍म्म .. ” शर्मा ने गर्दन हिलाई.


रूपाली का जन्म एक ज़मींदार के घर में हुआ था इसलिए बचपन से ही उसको कोई कमी नही थी. जो चीज़ चाही, वो माँग ली और मिल भी जाती थी. घर पर सिर्फ़ उसके पिता, उसकी माँ और एक छ्होटा भाई था. बड़ा सा घर जिसमें बहुत सारे नौकर और एक छ्होटा सा परिवार. यही वजह थी के बहुत ही कम उमर में उसने बडो वाले खेल देख भी लिए थे और खेल भी लिए थे.


उसकी उमर कोई 14-15 साल की रही होगी जब उसने पहली बार एक आदमी और एक औरत को जिस्मानी संबंध बनाते हुए देखा. सनडे का दिन था. उस दिन उसके माँ बाप मंदिर जाया करते थे. सुबह सुबह तड़के निकल जाते थे और 11 बजे तक वापिस नही आते थे. उन्होने लाख कोशिश की थी के रूपाली भी सुबह सुबह उठकर उनके साथ चले पर रूपाली ना तो कभी इतनी सुबह उठ पाती थी और ना ही वो कभी मंदिर गयी.


हर सनडे की तरह उस दिन भी घर पर वो अकेली थी. माँ बाप भाई मंदिर के लिए जा चुके थे जहाँ से उन्होने 11 बजे तक वापिस नही आना था. सनडे के दिन सब नौकरो की छुट्टी होती थी. सिर्फ़ दो नौकर घर पर होते थे. एक सफाई करने वाली कल्लो और दूसरे उनके घर पर खाना बनाने वाले शंभू काका. 11 बजे तक वो दोनो अपना काम करते रहते थे और रूपाली अपने कमरे में पड़ी सोती रहती थी.


शंभू की उमर कोई 60 के पार थी और वो रोज़ ही आकर 3 वक़्त का खाना बना जाया करता था. कल्लो की उमर भी 40 के आस पास ही थी. उसके रंग एक दम उल्टे तवे जैसा काला था जिसकी वजह से सब उसको कल्लो कहा करते थे. उसका असली नाम क्या था, ये तो शायद बस वो खुद ही बता सकती थी.


यूँ तो रूपाली सनडे को 10-11 बजे से पहले बिस्तर नही छ्चोड़ती थी पर उस दिन नींद ना आने की वजह से वो 8 बजे ही बिस्तर से निकल गयी. थोड़ी देर यूँ ही बेड पर बैठे रहने के बाद उसने शंभू काका को चाइ के लिए बोलने की सोची और बिस्तर से निकली.


पूरा घर खाली पड़ा था. वो खुद भी जानती थी के आज घर पर सिर्फ़ कल्लो और शम्भी काका ही होंगे. आँखें मलति वो किचन तक पहुँची पर वहाँ कोई भी नही था. उसने ड्रॉयिंग रूम की तरफ देखा पर उधर भी कोई नज़र नही आया. वो शंभू काका का नाम पुकारने ही वाली थी के एक हसी की आवाज़ सुनकर चुप हो गयी. आवाज़ उसके माँ बाप के कमरे से आ रही थी.


एक पल के लिए रूपाली को लगा के उसके माँ बाप घर पर ही हैं पर जब हसी की आवाज़ दोबारा आई तो वो समझ गयी के ये आवाज़ उसके माँ बाप की नही है. रूपाली को कुच्छ ठीक नही लगा और उसने फिर शंभू काका का नाम पुकारना ठीक नही समझा. दबे पावं से वो अपने माँ बाप के कमरे तक पहुँची. दरवाज़ा बंद था और अंदर से लॉक्ड था.


रूपाली कमरे के बाहर खड़ी सोच ही रही थी के वो हसी की आवाज़ फिर से आई और इस बार रूपाली समझ गयी के आवाज़ कल्लो की थी. रूपाली सोच में पड़ गयी. कल्लो उसके माँ बाप के कमरे में, अंदर से दरवाज़ा बंद, रूपाली को कुच्छ ठीक नही लगा. अंदर क्या हो रहा था वो नही जानती थी पर ये समझ गयी के वो कुच्छ था ग़लत था इसलिए ही दरवाज़ा बंद है. वरना नौकरों का उसके माँ बाप के कमरे में क्या काम.


रूपाली के छ्होटे भाई इंदर का कमरा बिल्कुल उसके माँ बाप के कमरे से लगता हुआ था जबकि खुद रूपाली का कमरा 1स्ट्रीट फ्लोर पर था. पहले नीचे का वो कमरा रूपाली का हुआ करता था पर जब वो थोड़ा बड़ी हुई तो उसको उपेर वाला कमरा दे दिया गया और उसका छ्होटा भाई जो पहले अपने माँ बाप के साथ सोया करता था अब उस कमरे में सोने लगा. दोनो कमरो के बीच एक अडजाय्निंग दरवाज़ा था जिसका मकसद सिर्फ़ ये थे के अगर बच्चा रात को डरकर उठे तो उसके माँ बाप फ़ौरन वहाँ पर आ सकें. रूपाली को याद था के वो जब वो छ्होटी थी तो बहुत डरती थी जिसकी वजह से उसके माँ बाप उस दरवाज़े को अक्सर खुला रखते थे ताकि वो दोनो उसको देख सकें और रूपाली डरे नही.


धीरे धीरे रूपाली खामोशी से अपने भाई के कमरे में दाखिल हुई. वो कमरा कभी उसका खुद का हुआ करता था इसलिए वो अच्छी तरह से उस कमरे को पहचानती थी. 2 कमरो के बीच का दरवाज़ा पुराने ज़माने के दरवाज़ो की तरह था यानी किसी खिड़की की तरह 2 किवाड़ थे जो बंद करके बीच में एक कुण्डा लगाया जाता था. एक साल बहुत ज़्यादा बारिश की वजह से दरवाज़ा सील गया था जिसकी वजह से ढंग से बंद नही होता था. बंद होने के बाद भी दोनो किवाडो के बीच इतनी जगह बच जाती थी के उसमें से दूसरे कमरे में देखा जा सके. रूपाली दरवाज़े के पास पहुँची और झाँक कर अपने माँ बाप के कमरे में देखा. यूँ तो उस दरवाज़े पर एक परदा हुआ करता था पर किस्मत से आज परदा खुला हुआ नही था. दरवाज़े में से देखते ही रूपाली को जो नज़र आया उसने उसकी आँखें खोलकर रख दी.


एक पल के लिए रूपाली को समझ नही आया के वो क्या देख रही है या जो वो देख रही है वो क्या है. आँखें मलकर उसने दोबारा देखा तो मंज़र वैसा ही था. रूपाली ने गौर से देखना शुरू किया और समझना चाहा के अंदर हो क्या रहा है.


पहली चीज़ जो उसको दिखी वो था कल्लो का चेहरा. बॉल बिखरे हुए, माथे पर पसीना, आँखें फेली हुई, और मुँह खुला हुआ. उसकी एल्बोस बेड पर थी और जो झुकी हुई थी जिसकी वजह से उसके बॉल बार बार उसके चेहरे पर गिर जाते थे जिनको वो एक हाथ से अपने चेहरे से हटा देती थी. उसका सर आगे पिछे हो रहा था जैसे वो हिल रही हो और हर बार जैसे ही हो आगे को होती, उसके मुँह से आह ऊह जैसी आवाज़ निकलती.


अगली चीज़ जिसपर रूपाली का ध्यान गया वो थी कल्लो की चूचियाँ जिन्हें देखकर रूपाली का मुँह खुला रह गया. उसने एक 2 बार अपनी माँ को ब्रा में देखा था पर कल्लो की छातियाँ देखकर तो वो हैरत मान गयी. कल्लो आगे को झुकी हुई थी जिसकी वजह से उसकी चूचियाँ उसके शरीर और नीचे बेड के बीच में लटक रही थी. वो इतनो बड़ी बड़ी थी के शरीर और बेड के बीच थोडा फासला होने के बाद भी उसके निपल्स नीचे बेड पर टच कर रहे थे. जैसे ही कल्लो को शरीर हिलता, वो दोनो भी आगे पिछे को झूलती.


रूपाली की आँखों के लिए ये सब कुच्छ नया था. पहली नज़र पड़ते ही उसको एक झटका सा लगा था जो अब धीरे धीरे कम हो रहा था. उसकी आँख जो एक पल के लिए सामने के मंज़र पर यकीन नही कर पाई थी अब धीरे धीरे अड्जस्ट हो रही थी.


पहली बार रूपाली ने गौर से सिर्फ़ चूचियो से फोकस हटाकर कमरे में पूरी तरह नज़र फिराई.



“किस्में मज़ा आ रहा है?” पापा जैसे सवाल पर सवाल कर रहे थे


“गांद मरवाने में” मम्मी भी अब बिना रुके जवाब दे रही थी.


“ज़ोर से मारु या धीरे से?”


“अब कुच्छ नही बोलूँगी” मम्मी ने आँखें खोली “पहले बेड पर लेट जाने दो उसके बाद जो पुच्छना है पुच्छ लेना”


पापा हस्ने लगे और मम्मी को छ्चोड़ते हुए धीरे से पिछे हुए.


तब रूपाली को पहली बार अंदाज़ा हुआ के हो क्या रहा था और उसको एक झटका सा लगा. पापा जब पिछे हुए तो उनकी लड़को वाली चीज़ मम्मी के पिछे से बाहर आई. दो चीज़ें जो रूपाली को नज़र नही आ रही थी वो अब अचानक से दिखी. अपने बाप का खड़ा हुआ लंड और अपनी माँ की गांद. ये उसकी आँखों के लिए बहुत ज़्यादा हो गया था, अपने माँ बाप को यूँ नंगे देखना. गिल्ट और शरम की एक फीलिंग उसके पूरे शरीर में दौड़ गयी और वो फ़ौरन दरवाज़े से हटी, कमरे से बाहर निकली और अपने कमरे में आ गयी.


ख़ान अपने घर पहुँचा तो दिमाग़ में बस एक ही ख्याल और एक ही नाम घूम रहा था.


किरण चतुर्वेदी


किरण से वो पहली बार कॉलेज में मिला था. किरण के पिछे कॉलेज का हर लड़का था, हर ख्याल के साथ. कोई उससे दोस्ती करना चाहता था, कोई उससे अफेर रखना चाहता था, कोई उससे प्यार करना चाहता था, कोई बस उसको चोदना चाहता था और कोई उससे शादी करना चाहता था.


पर किस्मत खुली तो ख़ान की. किरण से उसकी दोस्ती धीरे धीरे प्यार में बदलती चली गयी. वो दोनो एक दूसरे के करीब आते चले गये और जल्दी ही प्यार शादी के इरादे में बदल गया.


मुसीबत आई कॉलेज ख़तम होने के बाद. किरण के घरवाले उसकी शादी करना चाहते थे और ख़ान को समझ नही आ रहा था के क्या करे. वो एक पठान था और किरण एक ब्रामिन. उसके उपेर से वो एक ग़रीब घर से था और किरण का बाप करोड़पति था.


उन दोनो को ये मालूम था के किरण का बाप उनकी शादी होने नही देगा इसलिए दोनो ने भागने का प्लान बनाया.


ख़ान को आज भी याद था के जिस दिन उनका शाम को भागने का प्लान था उसी दिन उसके घर पर कुच्छ लोग आए. उन्होने घर में घुसकर ख़ान और उसकी माँ को इतना मारा था के उसकी माँ की वहीं मौत हो गयी थी और ख़ान 1 महीने तक हॉस्पिटल में रहा था.


बाहर आया तो पता चला के किरण की शादी हो चुकी था. उसकी दोस्तों से मालूम किया तो खबर मिली के किरण ने खुद ही अपने बाप को उस दिन भाग जाने के प्लान के बारे में बता दिया था. वो जानता था के जिन लोगों ने उसकी माँ को मारा वो कौन था पर उसकी लाख कोशिश पर भी पोलीस ने किरण के बाप के खिलाफ एक एफआइआर तक दर्ज नही की और ना ही कोई कार्यवाही हुई. उल्टा ख़ान पर इल्ज़ाम डाल दिया गया के उसकी संगत ग़लत थी और उसने कुच्छ ग़लत लोगों से पैसे उधार ले रखे थे जिन्होने पैसे वापिस ने मिलने की वजह से ख़ान और उसकी माँ पर हमला किया.


सिर्फ़ किरण के बाप से अपनी माँ की मौत का बदला लेने के लिए ख़ान पोलीस में भरती हुआ पर उसकी फूटी किस्मत के जिस दिन उसने पोलीस फोर्स जाय्न की, उसी दिन किरण के बाप की हार्ट अटॅक से मौत हो गयी. बदले का इरादा सिर्फ़ इरादा रह गया.


एक बुरा सपना समझकर ख़ान सारी बातों को भूलकर ज़िंदगी में आगे बढ़ गया. किरण से उसका कोई वास्ता ना रहा और उसने उसके बारे में सोचना भी बंद कर दिया था. एक दिन जब एक एनकाउंटर में ख़ान की गोली से एक सब-इनस्पेक्टर की मौत हुई तो उसकी ज़िंदगी में वापिस किरण दाखिल हुई.


उस दिन ख़ान ने पहली बार कई सालों बाद किरण को देखा था. उसको तो पता भी नही था के किरण एक जर्नलिस्ट बन गयी थी और एक काफ़ी बड़े चॅनेल के लिए काम करती थी. जो सब-इनस्पेक्टर ख़ान की गोली से मरा था वो किरण की किसी सहेली का भाई था और पता नही कैसे पर किरण को ये इन्फर्मेशन मिल गयी के जो गोली सब-इंस्पेकोर को लगी थी, वो पोलीस रेवोल्वेर से चली थी और उस एनकाउंटर के दौरान रेवोल्वेर सिर्फ़ एक ख़ान के पास था.


वो किरण ही थी जिसने इस बात को लेकर मीडीया में बवाल मचा दिया था. बात यहाँ तक बढ़ गयी थी ख़ान की नौकरी पर बन आई थी. वो तो पोलीस कमिशनर से उसकी बहुत अच्छी बनती थी जिसकी वजह से इस बात को दबा दिया गया और कुच्छ टाइम के लिए ख़ान को इस छ्होटे से गाओं में पोस्ट कर दिया गया ताकि वो कुच्छ दिन के लिए गायब हो सके.


और आज फिर कुच्छ महीनो बाद किरण ने उसको फोन किया. क्यूँ, ये बात वो नही जानता था.


“किरण किरण कम्बख़्त किरण” ख़ान अपने आप से बोला “मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी पनौती”


दूसरा केस में एक ऐसे इनस्पेक्टर की इन्वॉल्व्मेंट जिसपर खुद कभी अपने एक कॉलेग, एक सब इनस्पेक्टर को मारने का इल्ज़ाम था पोलीस वाले नही चाहते थे. इसलिए पोलीस कमिशनर के फोर्स करने पर ख़ान ने चार्ज शीट पर साइन कर दिया पर जाने क्यूँ उसको लगता था के कहीं कुच्छ मिस्सिंग था. हो सकता था के खून जै ने ही किया हो पर बिना किसी छान बीन के यूँ सीधे सीधे जै को ही फंदे पर टंगा देना उसको ठीक नही लग रहा था. ये भी तो हो सकता था के खून किसी और ने किया हो और जै बस ग़लत वक़्त पर वहाँ पहुँच गया हो.


ख़ान ये भी जानता था के हर कोई जल्दी से जल्दी जै को खून के इल्ज़ाम में टंगा देना चाहेगा. पोलीस वाले इतनी एविडेन्स दे देंगे के ये केस कोर्ट में ओपन आंड शूट केस साबित होगा और जै का काम तमाम कर दिया जाएगा. उसको जो करना था, जल्दी करना था.


यही सोचते हुए उसने ड्रॉयर से एक पेन और नोटपॅड निकाला और बेड पर एक कप चाइ लेकर बैठ गया.


केस के बारे में जो बातें वो जानता था उसने नोटपेड में लिखनी शुरू कर दी.


1. क़त्ल की रात ठाकुर ने अपने कमरे में ही डिन्नर किया था. उनको अपने कमरे के बाहर आखरी बार 8 बजे देखा गया था, ड्रॉयिंग हॉल में टीवी देखते हुए.


2. 8:15 के करीब वो अपने कमरे में चले गये थे और उसके बाद उनकी नौकरानी पायल खाना देने कमरे में गयी.


3. 8:30 के आस पास नौकरानी ठाकुर के बुलाने पर वापिस उनके कमरे में पहुँची. ठाकुर ने ज़्यादा कुच्छ नही खाया था और उसको प्लेट्स ले जाने के लिए कहा.


4. इसके बाद 9:15 के आस पास उनकी बहू रूपाली कपड़े लेने के लिए हवेली की पिछे वाले हिस्से में गयी जहाँ ठाकुर के कमरे की खिड़की खुलती थी और खिड़की से ठाकुर उसको अपने कमरे में खड़े हुए दिखाई दिए. वो अकेले थे.


5. उसके बाद तकरीबन 9.30 बजे तेज अपने बाप के कमरे में उनसे बात करने पहुँचा था. क्या बात करनी थी ये उसने नही बताया. सिर्फ़ कुच्छ बात करनी थी.


6. 9:40 के करीब सरिता देवी अपने पति के कमरे में पहुँची. उनके आने के बाद तेज वहाँ से चला गया.


7. 9:45 के करीब ठाकुर ने भूषण को बुलाकर गाड़ी निकालने को कहा. कहाँ जाना था ये नही बताया और खुद सरिता देवी भी ये नही जानती थी के उनके पति कहाँ जा रहे हैं.


8. 10:00 बजे के करीब भूषण वापिस ठाकुर के कमरे में चाबी लेने गया. ठाकुर उस वक़्त कमरे में अकेले थे और सरिता देवी बाहर कॉरिडर में बैठी थी.


9. 10:00 के करीब ही जब भूषण ठाकुर के कमरे से बाहर निकला तो पायल कमरे में गयी ये पुच्छने के लिए के ठाकुर को और कुच्छ तो नही चाहिए था. ठाकुर ने उसको मना कर दिया.


10. 10:05 के करीब जब भूषण कार पार्किंग की ओर जा रहा था तब उसने और ठकुराइन ने जै को हवेली में दाखिल होते हुए देखा.


11. 10:15 पर जब पायल किचन बंद करके अपने कमरे की ओर जा रही थी तब उसने ठाकुर के कमरे से जै को बाहर निकलते देखा. वो पूरा खून में सना हुआ था जिसके बाद उसने चीख मारी.


12. उसकी चीख की आवाज़ सुनकर जै को समझ नही आया के क्या करे. वो पायल को बताने लगा के अंदर ठाकुर साहब ज़ख़्मी हैं और इसी वक़्त पुरुषोत्तम और तेज आ गये. जब उन्होने जै को खून में सना देखा और अपने बाप को अंदर नीचे ज़मीन पर पड़ा देखा तो वो जै को मारने लगे.


13. जै भागकर किचन में घुस गया और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया.


14. 10:45 के करीब ख़ान को फोन आया था के ठाकुर का खून हो गया है जिसके बाद वो हवेली पहुँचा.


पूरा लिखकर ख़ान ने अपनी लिस्ट को दोबारा देखा. जब जै हवेली में आया था उस वक़्त ठाकुर ज़िंदा थे इस बात की गवाही घर के 3 लोग दे सकते हैं. जै का कहना है जब वो कमरे में दाखिल हुआ था तब ठाकुर साहब मरे पड़े थे. यानी के जो हुआ, बीच के कुल 10 मिनट में हुआ.


“10 मिनट में खून? वाउ” ख़ान ने सोचा


जो बातें उसको अब तक पता नही थी वो ये थी के जै इतनी रात को हवेली क्या करने गया था और घर की कौन सी औरत ने ख़ान को फोन करके खून के बारे में बताया था.


और सबसे बड़ा सवाल ये था के अगर जै ने ठाकुर को नही मारा, तो किसने मारा. और 10 मिनट के अंदर अंदर कैसे मारा.


उस रात के इन्सिडेंट ने रूपाली के दिल और दिमाग़ को जैसे झंझोड़ दिया था. एक ही हफ्ते में उसने 2 आदमियों और 2 औरतों को नंगा देखा था, आपस में कुच्छ ऐसा करते हुए जो उसकी समझ में अब तक नही आया था पर हां इतना ज़रूर समझ गयी थी के वो जो भी कर रहे थे, उन्हें ऐसा करते हुए बहुत अच्छा लग रहा था.


वो जवानी की दहलीज़ पर अभी कदम रख ही रही थी. बचपाना अभी तक गया नही था और जवानी पूरी तरह आई नही थी. सीने पर उभार उठ गया था और उसने कुच्छ दिन पहले ही ब्रा पहननी शुरू की थी. टाँगो के बीच हल्के हल्के बाल आ गये थे. वो एक बच्ची से एक जवान लड़की में तब्दील हो रही थी पर जवानी के खेल से पूरी तरह अंजान थी. स्कूल में उसकी सहेलियाँ गिनी चुनी ही थी और जो थी उनको किताबों से फ़ुर्सत नही होती थी. खुद रूपाली भी आधा वक़्त किताबों में घुसी रहती और बाकी आधा वक़्त अपनी सहेलियों से गप्पे लड़ाती रहती.


उस रात के बाद अपने माँ बाप को नंगा देखकर वो सहम सी गयी थी. उसका दिमाग़ कन्फ्यूज़्ड था के रिक्ट करे तो कैसे करे. उसके दिल में एक तरफ तो एक ये डर था के अगर किसी भी तरह मम्मी पापा को पता चल गया के उसने उस रात उन दोनो को देखा था तो उसका क्या होगा तो दूसरी तरफ ये गिल्ट के उसने अपने मम्मी पापा को नंगा देखा.


ज़्यादा गिल्ट इस बात का था के उसे उन दोनो को देखते वक़्त बहुत अच्छा लग रहा था.


अगले कुच्छ दिन तक वो बहुत खोई खोई सी रही. दिल में एक अजीब सी बेचैनी और घबराहट रहती थी. वो ना तो अपने माँ बाप से नज़रे मिला पाती और ना ही कल्लो और शंभू से. हर पल यही लगता के वो सब जानते हैं के उसने क्या किया था और किसी भी वक़्त उससे पुच्छ लेंगे के उसने ऐसा क्यूँ किया.


उसकी हालत ऐसी हो गयी थी के उसकी माँ को फिकर होने लगी के कहीं वो बीमार तो नही.


ज़्यादा परेशान रूपाली को ये बात कर रही थी के वो समझ नही पा रही थी के उसने क्या देखा और कहीं उसका दिमाग़ उसके माँ बाप से नाराज़ था के वो अकेले में ऐसे गंदे काम करते हैं. वो 2 लोग जिन्हें वो इतना प्यार करती थी उन दोनो को ऐसा काम करते देख उसका दिमाग़ सहम गया था. कभी कभी दिल करता था के चिल्ला कर बोल पड़े के आप लोग गंदे हो, मैने देखा था आपको उस रात.


इसी कन्फ्यूषन के चलते उसने अगले कुच्छ हफ़्तो तक दोबारा कल्लो और शंभू को भी देखने की कोशिश नही की जबकि वो जानती थी के उन्होने फिर से वही काम सनडे को किया तो ज़रूर होगा.


और जैसे ये सब कन्फ्यूषन एक दिन अचानक शुरू हो गया था, वैसे ही सब कुच्छ एक दिन अचानक ख़तम हो गया.



उस रात बहुत गर्मी थी. रूपाली ने सोने से पहले नहाने की सोची और बाथरूम में दाखिल हुई. बाथरूम में जाकर कपड़े उतारे तो पता चला के वो टवल लाना भूल गयी थी. उसका बाथरूम उसके कमरे से अट्ष्ड था जिसका दरवाज़ा उसके कमरे में ही खुलता था. कमरा सिर्फ़ उसका था और अंदर से लॉक्ड था इसलिए वो नंगी ही बाथरूम से टवल लेने के लिए बाहर निकली.


टवल बेड पर पड़ा हुआ था. रूपाली ने टवल उठाया और वापिस बाथरूम में जा ही रही थी के उसकी नज़र अपने कमरे में लगे फुल साइज़ मिरर पर पड़ी.


रूपाली उस वक़्त पूरी तरह नंगी थी. जिस्म पर कपड़े के नाम पर एक धागा तक नही था. बॉल खुले हुए थे और उसका कच्चा जिस्म कमरे में जल रही ट्यूब लाइट की रोशनी में चमक सा रहा था. वो बाथरूम में जाती जाती एक पल के लिए रुकी और एक नज़र अपने उपेर डाली.


रूपाली को याद भी नही था के उसने कभी अपने आपको यूँ आईने में पूरी तरह नंगा देखा हो, कम से कम होश संभालने के बाद तो नही. वो बाथरूम में ही जाकर कपड़े उतारती और अक्सर एक टवल लपेटकर बाहर आती थी. कमरे में आकर कपड़े पहेन लेती थी. अगर कपड़े बदलने भी होते तो पूरी तरह से नंगी नही होती थी. पहले सलवार उतारती और नीचे कुच्छ और पहेन्ने के बाद कमीज़ उतारती थी.


आज अपनी 15 साल की ज़िंदगी में पहली बार होश संभालने के बाद वो आईने में अपने आपको नंगी देखने के इरादे से अपने आपको पूरी तरह नंगी देख रही थी.


एक पल के लिए वो खुद को देखकर ही शर्मा गयी. नज़रें शरम से नीचे झूल गयी और वो फिर बाथरूम की और बढ़ी. जाते जाते फिर रुकी, झिझकी, और फिर बाथरूम की तरफ बढ़ी.


और फिर ना जाने क्यूँ वो फिर वापिस आई, टवल फिर बेड पर रखा और अपने आपको एक बार और आईने में देखा.


उसके बाल काफ़ी लंबे थे जो कि बचपन से ही कटे नही थे. बाल पूरे खुलने पर उसकी पूरी कमर को ढक लेते थे. इस वक़्त भी कुच्छ बाल खुलकर उसके कमर पर तो कुच्छ उसके सीने पर गिरे हुए थे.


रूपाली ने अपने बाल सारे के सारे पिछे को किए और खुद पर नज़र डाली.


वो जानती थी के वो देखने में बेहद खूबसूरत है क्यूंकी आए दिन लोग या तो उसको ही कहते थे के वो बहुत सुंदर है या उसके माँ बाप को कहते के आपकी बेटी कितनी सुंदर हो गयी है. मासूम चेहरा, बड़ी बड़ी आँखें और मुलायम छ्होटे छ्होटे होंठ.


नज़र चेहरे से हटी और नीचे छातियो पर गयी.


कोई 3 साल पहले उसके सीने पर उभार आना शुरू हो गया था और अभी कुच्छ महीने पहले ही उसकी माँ ने उसको ब्रा पहेन्ने को कहा था. उसको ब्रा पहेन्ने पर बड़ा अजीब सा लगता था क्यूंकी एक तो उसका दम सा घुटना लगता था और दूसरा बार बार खुजली सी होती रहती थी. उसने एक दो बार पहेन्ने से इनकार भी किया पर माँ को ज़ोर डालने पर पहेनना पड़ा.


रूपाली ने गौर से अपनी छातियो की तरफ देखा.


उसकी छातियाँ दूध की तरह सफेद थी जिनपर लाइट ब्राउन कलर के छ्होटे छ्होटे निपल्स. अपनी छातियो पर नज़र पड़ते ही उसके दिमाग़ में पहला ख्याल कल्लो की चूचियो का आया और उसके दिमाग़ ने जैसे अपने आप ही कंपेर करना शुरू कर दिया. कल्लो की चूचियाँ रूपाली की चूचियो के मुक़ाबले बहुत काली थी. इतनी काली की जो निपल्स रूपाली की चूचियो पर सॉफ नज़र आ रहे हैं वो कल्लो के शरीर पर तो जैसे नज़र ही नही आ रहे थे. पूरी की पूरी छाती काले रंग की थी.


निपल्स का सोचते ही अगला ख्याल ये था के रूपाली के निपल्स बहुत छ्होटे छ्होटे से थे, एक 15 साल की लड़की के निपल्स पर कल्लो के निपल्स तो कितने बड़े बड़े थे. निपल्स ही क्या कल्लो की छातियाँ ही कितनी बड़ी थी. उसकी चूचियो में से रूपाली के बराबर की 3 चूचिया बन जाएँ.


और फिर जैसे अपने आप ही उसके बेकाबू हो रहे दिमाग़ ने अगला नज़ारा उसके माँ के नंगे जिस्म का पेश कर दिया. उसने अपनी माँ को ज़्यादा गौर से नही देखा था, बस एक हल्की सी नज़र ही डाली थी पर जितना देखा था उससे ये पता चल गया था के उसकी माँ की चूचियाँ भी काफ़ी बड़ी बड़ी थी. कल्लो जितनी बड़ी नही पर फिर भी काफ़ी बड़ी और उसकी माँ की छातियाँ भी रूपाली की तरह गोरी थी.


इससे पहले के उसकी सोच और आगे बढ़ती, रूपाली ने फ़ौरन अपने दिमाग़ से अपनी माँ के ख्याल को झटक दिया.


उसकी नज़र चूचियो से होती अपनी टाँगो के बीच पहुँची.


उसने आज तक अपने जिस्म के इस हिस्से को गौर से नही देखा था. गौर से क्या कभी देखा ही नही था. बस नहाते हुए हाथ पर साबुन लेकर अपनी टाँगो के बीच रगड़ लेती और बस. पर आज उसने पहली बार अपनी टाँगो के बीच नज़र डाली. उसकी चूत पर बाल आने शुरू हो गये थे जो उसने कभी काटे नही थे. बाल हल्के हल्के से लंबे थे पर इतने नही जितने के कल्लो के. कल्लो के बालों के बीच तो चूत नज़र ही नही आ रही थी जबकि रूपाली की चूत बॉल होते हुए भी हल्की हल्की दिखाई दे रही थी.


यही सब सोचते सोचते रूपाली को एहसास हुआ के उसकी टाँगो के ठीक बीच उसको कुच्छ गीला गीला महसूस हो रहा था. उसको कुच्छ समझ नही आया के ये क्या था और चेक करने के इरादे से वो अपना हाथ टाँगो के बीच ले गयी.


और जैसे ग़ज़ब हो गया.


हाथ लगते ही जैसे उसी वक़्त उसके जिस्म में एक करेंट सा दौड़ गया हो. उसका अपनी टाँगो के बीच हाथ लगाना उसके शरीर को हिला गया. एक अजीब सी फीलिंग पूरे शरीर में दौड़ गयी. रूपाली का हाथ जहाँ था वही रुक गया और उसने एक गहरी साँस ली.


उसने एक बार फिर अपने हाथ को अपनी चूत पर दबाया और उसके मुँह से आह निकल पड़ी.


और फिर तो जैसे हाथ रुका ही नही. वो बार बार अपना हाथ अपने चूत पर दबाने लगी. जो टाँगें पहले फेली हुई थी वो दोनो सिकुड गयी. वो अब भी आईने के सामने खड़ी थी पर अब अपने आपको नही देख रही थी. दोनो आँखें बंद थी और टाँगें सिकोड रखी थी जिनके बीच उसका हाथ धीरे धीरे उसकी चूत को दबा रहा था और सहला रहा था.


और तभी जैसे आसमान टूट पड़ा.


उसकी टाँगो के बीच से एक अजीब लहर सी उठी जो सीधा उसके दिमाग़ तक पहुँची. रूपाली की दोनो टाँगें काँप गयी, घुटने कमज़ोर पड़ गये, मुँह से आह निकल पड़ी और वो वहीं लड़खडकर नीचे गिर सी पड़ी. टाँगो के बीच उसका हाथ अब बुरी तरह गीला हो चुका था.


इस पूरे काम में मुश्किल से 1 मिनट लगा थे पर इस 1 मिनट में रूपाली ये समझ चुकी थी के उसकी माँ क्यूँ उसके बाप से और कल्लो क्यूँ शंभू काका से अकेले में लिपट रहे थे.


…………………..


ख़ान हवेली के उस कमरे में खड़ा था जहाँ खून हुआ था, यानी के ठाकुर का कमरा. उसने घर के लोगों से उसको कमरे में कुच्छ देर अकेला छ्चोड़ देने के लिए कहा था इसलिए उस वक़्त उस कमरे में उसके सिवा और कोई नही था.


“आप कुच्छ लेंगें? चाइ या कुच्छ ठंडा?” पीछे से आवाज़ आई तो ख़ान ने पलटकर देखा.


कमरे के दरवाज़े पर एक लड़की खड़ी थी. ख़ान ने उसकी तरफ गौर से देखा. उमर कोई 20-21 साल, रंग हल्का सांवला, बड़ी बड़ी आँखे, लंबे बालों की बँधी हुई चोटी. देखने में ना तो वो सुंदर थी और ना ही बदसूरत. बस एक आम सी लड़की. उसने एक सलवार कमीज़ पहेन रखा था जो देखने से ही काफ़ी पुराना लग रहा था. उसने उमर और पहनावे को देखकर ख़ान ने अंदाज़ा लगा लिया के वो घर की नौकरानी की बेटी पायल है जो हवेली में ही रहकर काम करती है.


“तुम पायल हो?” उसने लड़की से पुछा


“जी हां” पायल ने कहा


“उस रात जै को तुमने ही देखा था ठाकुर के कमरे में?” ख़ान ने पुचछा


पायल के चेहरे पर एक पल के लए कई भाव आकर चले गये जिनको ख़ान समझ नही सका. पायल ने हाँ में सर हिलाया


“नही फिलहाल मुझे कुच्छ नही चाहिए” उसने कहा तो पायल ने हामी में सर हिलाया और वापिस जाने लगी.


“सुनो” ख़ान ने कहा तो वो रुक कर पलटी


“तुम्हे याद है के उस रात कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था या बंद था?” ख़ान ने पुछा तो पायल ने चौंक कर चेहरा उपर उठाया


“जी?” वो बोली


“अर्रे उस रात जब ठाकुर साहब का खून हुआ था, तब ये दरवाज़ा खुला था या बंद था?”


“जी पहले बंद था पर बाद में आधा खुला हुआ था” पायल सहम कर बोली.


ख़ान ने एक पल के लिए उससे और पुच्छना चाहा पर रुक गया. वो इस लड़की से बाद में आराम से बैठ कर बात करना चाहता था, इस तरह से नही क्यूंकी इसी लड़की ने ठाकुर साहब को आखरी बार ज़िंदा देखा था और इसने ही ठाकुर ही उन्हें सबसे पहले मुर्दा देखा था, जै के बाद.


“कितना खुला हुआ था?” उसने पुछा


“जी?” पायल ने फिर सवालिया नज़रों से उसकी तरफ देखा


“अर्रे कितना खुला हुआ था दरवाज़ा? आधा, पूरा या थोड़ा सा?”


“जी तकरीबन आधा खुला हुआ था” पायल बोली


“जितना उस रात दरवाज़ा खुला था उतना ही खोल दो और जाओ” उसने पायल से कहा.


हवेली काफ़ी पुरानी बनी हुई थी पर दरवाज़े सब नये थे यानी के पुराने 2 किवाड़ वाले दरवाज़ो को हटाकर सिंगल पेन डोर थे जिनपर मॉडर्न लॉकिंग सिस्टम था. टाला लगाने की ज़रूरत नही थी. दरवाज़े में ही इनबिल्ट लॉक था .


पायल ने दरवाज़े को तकरीबन आधा खोल दिया और चली गयी.


ख़ान ने एक बार फिर कमरे में नज़र फिराई. कमरा वैसा ही था जैसा के एक अमीर ठाकुर का होना चाहिए था. एक बड़ा सा कमरा जिसके बीचे बीच एक बड़ा सा बिस्तर लगा हुआ था. कमरे में चारो तरफ महेंगे रेशमी पर्दे लगे हुए थे. बिस्तर इतना बड़ा था के उसपर 10 लोग आराम से सो सकते थे. एक तरफ एक सोफा सेट रखा हुआ था जिसके सामने एक छ्होटी सी टेबल थी. सामने दीवार पर एक बड़ा सा फ्लॅट स्क्रीन टीवी लगा हुआ था. पूरे कमरे में एक नीले रंग का मखमली कालीन बिच्छा हुआ था.


ख़ान उस जगह पर पहुँचा जहाँ उस रात ठाकुर की लाश पड़ी हुई थी. नीले रंग पर खून के धब्बे नज़र तो आ रहे थे पर लाल रंग दिखाई नही दे रहा था. उसने हवेली में हिदायत की थी के बिना पोलीस की पर्मिशन के कमरे में कुच्छ भी बदला ना जाए और ना ही कोई चीज़ हटाई जाए. इसी वजह से वो कालीन अब तक कमरे से हटाया नही गया था.


जिस जगह पर ठाकुर की लाश पड़ी थी वो कमरे के दरवाज़े के काफ़ी करीब थी. भूषण के दिए स्टेट्मेंट में ये कहा गया था के वो हवेली के दरवाज़े पर था और उसके पास ही सरिता देवी अपनी व्हील चेर पर बैठी थी. ख़ान ने जिस जगह पर लाश पड़ी थी वहाँ खड़े होकर कमरे के बाहर देखा. बिल्कुल सामने ड्रॉयिंग हॉल था और नज़र सीधी हवेली के गेट पर पड़ी. ड्रॉयिंग हॉल काफ़ी बड़ा था और ये काफ़ी मुश्किल था के गेट से ठाकुर के कमरे के अंदर कुच्छ नज़र आता पर अगर खून हुआ था और दरवाज़ा आधा खुला था, तो ये नामुमकिन भी नही था के हवेली के दरवाज़े पर खड़े शख़्श को कुच्छ दिखाई या सुनाई ना दे.


कमरे के एक कोने पर एक खिड़की थी जो हवेली के पिच्छले हिस्से की तरफ खुलती थी. रूपाली के दिए स्टेट्मेंट में ये लिखा गया था के वो उस रात कपड़े उतारने के लिए यहाँ आई थी और उसने ठाकुर को अपने कमरे में ज़िंदा देखा था. खिड़की उस वक़्त खुली हुई थी.


जो एक बात ख़ान के ज़हन में सबसे ज़्यादा खटक रही थी. पहली तो ये के उसको अच्छी तरह से याद था खून की रात जब वो इस कमरे में आया तो ये खिड़की अंदर से बंद थी जो उसकी इस थियरी को नाकाम करती थी के क़ातिल खून करके इस खिड़की से निकल गया.


“आर यू डन?” पीछे से आवाज़ आई तो ख़ान ने पलटकर देखा. दरवाज़े पर ठाकुर का बड़ा बेटा पुरुषोत्तम खड़ा था.


“यस आइ आम डन” ख़ान ने कहा




“मुझे समझ नही आता के जब जै रंगे हाथ पकड़ा ही गया है तो इस सब की क्या ज़रूरत है?” पुरुषोत्तम ने पुछा


“मैं सिर्फ़ अपनी तसल्ली करना चाहता हूँ ठाकुर साहब” ख़ान ने कहा “आइ जस्ट वाना मेक शुवर दट दा पर्सन हू किल्ड युवर फादर ईज़ इनडीड गेटिंग पनिश्ड फॉर इट आंड नोट रोमिंग अराउंड फ्री”


“आइ अप्रीशियेट इट” पुरुषोत्तम ने कहा “यू हॅव अवर फुल को-ऑपरेशन”


“तो फिर मैं चाहूँगा के मैं हवेली के हर मेंबर से एक बार बात करूँ. यू माइट फाइंड इट अफेन्सिव बट आइ अश्यूर इट इट्स जस्ट आ फॉरमॅलिटी, जस्ट फॉर पेपर वर्क” ख़ान ने कहा


“मैं सबसे कह दूँगा के आपके हर सवाल का जवाब आपको दिया जाए” पुरुषोत्तम ने कहा


“थॅंक्स आ लॉट” ख़ान ने कहा “आइ विल टेक यौर लीव नाउ”


कहकर ख़ान हवेली से निकल ही रहा था के पिछे से पुरुषोत्तम की आवाज़ आई


“क्या अब हम कमरे में चीज़ें बदल सकते हैं? यू सी आइ आम रियली नोट कंफर्टबल विथ लीविंग माइ फादर’स ब्लड ऑन दट रग”


“जी ज़ुरूर” ख़ान ने कहा “आप वो कालीन अब हटा सकते हैं”


हवेली से बाहर जाते ख़ान की नज़र ड्रॉयिंग रूम में बैठी लड़की पर पड़ी. वो बेहद खूबसूरत थी और इसी वजह से ख़ान की नज़र जैसे उसपर अटक कर रह गयी. ख़ान जानता था के वो ठाकुर की बेटी कामिनी है. दिल ही दिल में खूबसूरती की तारीफ़ करता ख़ान हवेली से बाहर आ गया.


……………………….


उस दिन के बाद अगले कुच्छ वीक्स तक रूपाली अजीब उलझन से गुज़री. दिन में बार बार उसके शरीर में अजीब सी फीलिंग होती जिसके बाद वो फ़ौरन कहीं अकेले में जाती और अपनी टांगी के बीच हाथ लगाती. एक अजीब सा नशा और मज़ा जिस्म में दौड़ जाता, फिर बढ़ता जाता और अचानक उसकी टाँगो के बीच सब गीला हो जाता.


जहाँ रूपाली को ये करने में बहुत मज़ा आता था वहीं मज़ा ख़तम होने के बाद फिर से वही गिल्ट फीलिंग दिमाग़ पर सवार हो जाती. उसको लगता के वो कितनी गंदी हो गयी है के ऐसे गंदे गंदे काम कर रही है. अगर किसी को पता चल गया तो? इसी डर से वो उस दिन के बाद ना तो फिर से अपने माँ बाप को देखने की हिम्मत जुटा पाई और ना ही शंभू काका और कल्लो को देखने की.


कुच्छ हफ़्तो बाद एक दिन उसके भाई की तबीयत काफ़ी खराब हो गयी. तेज़ बुखार था और मम्मी कुच्छ दिन से उसको अपने पास ही सुला रही थी. उस रात रूपाली भी अपने मम्मी पापा के कमरे में ही बैठी थी. उसका भाई सो चुका था और वो मम्मी पापा के साथ बैठी एक मूवी देख रही थी. मूवी देखते देखते वो वहीं बिस्तर पर लेट गयी और पता ही ना चला के कब आँख लग गयी.


उसको किसी ने हिलाया तो रूपाली की नींद टूटी. पापा उसको बिस्तर के बीच से उठाकर एक तरफ लिटा रहे थे.


“पापा” उसने नींद में कहा


“सो जाओ बेटा” पापा ने कहा और उसको थोड़ा साइड करके लिटा दिया.


आँखें बंद करने से पहले रूपाली ने देखा के बिस्तर के एक तरफ उसके भाई लेटा था, फिर वो और उसके साइड में पापा खुद लेटे हुए थे. उसने फिर से आँख बंद कर ली और सो गयी.


किसी के बात करने की आवाज़ सुनकर उसकी कच्ची नींद फिर से खुल गयी. उसने आँखें खोल कर देखा तो वो अब भी मम्मी पापा के कमरे में ही सो रही थी. कमरे में नाइट बल्ब जल रहा था और लाल रंग की हल्की सी रोशनी फेली हुई थी. मम्मी पापा कुच्छ बात कर रहे थे. रूपाली ने फिर आँख बंद करके सोने की कोशिश की पर अपने माँ बाप की बातें उसके कानो में पड़ने लगी.


“रूपाली को उसके कमरे में ही सुला आते ना” मम्मी कह रही थी


“नींद खराब हो जाती उसकी. सोने दो यहीं” पापा ने कहा


“तो आज रात ना करो फिर. जवान बेटी बगल में सो रही है कुच्छ तो शरम करो” मम्मी ने हल्के से हस्ते हुए कहा.


“अर्रे तो मैं कौन सा सब कुच्छ करने को कह रहा हो. बस ज़रा मुझे ठंडा कर दो वरना नींद नही आ रही” पापा की आवाज़ आई


“खुद तो आप ठंडे हो लोगे” मम्मी ने कहा “और मैं?”


“अर्रे तुम खुद ही तो कह रही हो के तुम्हारा महीना चल रहा है” पापा बोले तो रूपाली समझ गयी के वो किस बारे में बात कर रहे हैं.


जब उसके पीरियड्स शुरू हुए थे तो मम्मी ने समझाया था के ये हर औरत को हर महीने होता है. रूपाली ने बच्पने में पुछ लिया था के क्या उन्हें भी होता है और मम्मी ने हस्ते हुए कहा था के हां उन्हें भी हर महीने ऐसा ही होता है. पर मम्मी के पीरियड्स से पापा को क्या मतलब?


“वैसे अगर तुम चाहो तो कर तो मैं अब भी कर सकता हूँ” पापा बोले “थोड़े बहुत खून से ना तो मुझे कभी घबराहट हुई और ना ही डर लगा”


“छियैयियी” मम्मी ने कहा “बिल्कुल भी नही”


रूपाली फ़ौरन समझ गयी के पापा क्या करने की बात कर रहे थे. वो खेल जो उसने कुच्छ टाइम पहले देखा था आज रात फिर वही होना था.


रूपाली के दिमाग़ ने चिल्ला कर कहा के वो फ़ौरन अपने माँ बाप को बता दे के वो जाग रही है ताकि वो रुक जाएँ. उसने अपनी आँखें बंद कर रखी थी पर जानती थी पापा उसके बिल्कुल बगल में लेटे हुए थे और जो कुच्छ भी होता वो सब देखने वाली थी. वो इसके लिए अभी तैइय्यार नही थी. उसने अब तक अपने आपको उस दिन मम्मी पापा के कमरे में झाँकने के लिए माफ़ नही किया था और अब फिर से? नही ये नही हो सकता. वो ऐसा नही कर सकती.


सोचते हुए रूपाली ने अपनी आँखें खोली. कमरे में बस नाम बराबर की रोशनी थी इसलिए अगर उसकी आँखें खुली भी होती तो उसके माँ बाप को पता ना चलता. रूपाली ने कुच्छ कहने के लिए मुँह खोला ही था के सामने नज़र पड़ते ही उसकी ज़ुबान अटक गयी.


पापा अब भी बिस्तर पर उसके साइड में लेती हुए थे और मम्मी सामने शीसे के सामने खड़ी अपने बॉल बाँध रही थी. उनकी पीठ रूपाली की तरफ थी और हल्की सी रोशनी में रूपाली को पता चल गया के उन्होने सिर्फ़ एक पेटिकट पहेन रखा था. ना तो जिस्म पर सारी थी और ना ही ब्लाउस.


रूपाली समझ गयी के काफ़ी देर हो चुकी थी. उसको समझ नही आया के अब जबकि उसकी माँ कमरे में आधी नंगी खड़ी है तो वो कैसे ये एलान करे के वो जाग रही है.


तभी उसकी माँ पलटी और रूपाली के दिमाग़ ने जैसे काम करना बंद कर दिया.


उसकी माँ उपेर से पूरी नंगी थी. नाभि से थोड़ा सा नीचे पेटिकट बँधा हुआ था और उसके उपेर कुच्छ नही. रोशनी बहुत कम थी इसलिए रूपाली को सॉफ कुच्छ भी नही दिख रहा था पर उस हल्की सी रोशनी में उसकी नज़र अपनी माँ की चूचियो पर अटक गयी.


उसकी माँ की चूचियाँ काफ़ी बड़ी बड़ी थी और अपने ही वज़न से हल्की सी ढालाक कर नीचे को हो रखी थी. रूपाली को इससे पहला को वो दिन याद आया जब उसने अपनी माँ को नंगी देखा था. उस दिन मम्मी दीवार से सटी खड़ी थी इसलिए वो उन बड़ी बड़ी चूचियो को बस साइड से ही देख पाई थी पर आज सामने से देख रही थी. कमरे में अंधेरा होने की वजह से बस चूचियो की जैसे आउटलाइन ही नज़र आ रही थी.


रूपाली को एक पल के लिए अंधेरे का अफ़सोस हुआ और उसको लगा के काश रोशनी होती तो वो अच्छे से अपनी माँ को देख पाती.


और अगले ही पल वो शरम से पानी पानी हो गयी. उसके दिमाग़ ने उसको धिक्कारा के अपनी माँ के बारे में ऐसा सोच रही है.


मम्मी धीरे धीरे चलती बेड के नज़दीक आई. वो बेड के पास पापा के पैरों की तरफ आकर खड़ी हो गयी और धीरे से अपने हाथ उठाकर अपनी दोनो चूचिया अपने हाथ में पकड़ ली.


और धीरे धीरे दोनो चूचियाँ दबाने लगी.


रूपाली को ये बड़ा अजीब और अच्छा भी लगा. वो गौर से अपनी माँ को देखने लगी.


“अर्रे वहाँ क्या खड़ी हो. जल्दी यहाँ आओ ना” पापा की आवाज़ आई तो


रूपाली को एहसास हुआ के पापा उसके बिल्कुल बगल में लेटे हुए हैं. वो और पापा दोनो ही सीधे अपनी कमर पर आस पास लेटे हुए थे. रूपाली ने बिना अपनी गर्दन हिलाए अपनी नज़र घुमाई और पापा की तरफ देखा.


पापा भी कमर के उपेर बिल्कुल नंगे थे और उन्होने नीचे सिर्फ़ पाजामा पहेन रखा था. रूपाली ने देखा के उनके अपनी लड़कों वाली चीज़ को धीरे धीरे पाजामे के उपेर से रगड़ रहे थे और पाजामा वहाँ से उपेर को उठा हुआ था. वो जानती थी के ऐसा क्यूँ है. उस दिन भी उसने देखा था के पापा का एकदम टाइट हो रखा था और अब भी शायद पाजामे के अंदर ऐसे ही टाइट है जिसकी वजह से पाजामा उपेर है.


“क्या हमेशा लड़कों का ऐसा ही रहता है?” उसने सोचा “अगर हां तो आज से पहले पापा के पाजामे में ऐसा उठा हुआ क्यूँ नही दिखा?”


अगले ही पल रूपाली को उसके दिल ने फिर धिक्कारा के अपने पापा के बारे में ऐसा सोच रही है.


“रूपाली सो गयी ना?” उसकी माँ ने कहा तो पापा और मम्मी दोनो ने एक साथ रूपाली की तरफ देखा.


रूपाली ने फ़ौरन अपनी आँखें बंद कर ली.


“हां सो गयी वो” पापा बोले “अब उसको छ्चोड़ो और मेरे छ्होटे भाई को सुलाओ ताकि उसके बाद मैं भी आराम से सो सकूँ”


“छ्होटा भाई” रूपाली ने आँखें बंद किए हुए सोचा.


थोड़ी देर तक वो ऐसे ही चुप चाप आँखें बंद किए लेटी रही. आवाज़ और बेड के हिलने से उसको अंदाज़ा हो गया के मम्मी भी बेड पर आ चुकी हैं. थोड़ी देर तक बेड पर यूँ ही कभी किसी के हिलने की और कभी कपड़ो की आवाज़ होती रही.


“क्या आज भी पापा ऐसे ही मम्मी के पिछे से कर रहे हैं?” रूपाली ने सोचा


थोड़ी देर बाद आवाज़ आनी बंद हो गयी और सब खामोश सा हो गया.


“आअहह मेरी जान” पापा की आवाज़ आई.


रूपाली ने हिम्मत करके आँखें फिर खोली और कुच्छ पल के लिए समझने की कोशिश करने लगी के कमरे में हो क्या रहा है.


उसके पापा अब भी वैसे ही उसके बगल में लेटे हुए थे. मम्मी उनके पैरों के बीच बैठी हुई थी और आगे को झुकी हुई थी. उनके बॉल उनके चेहरे पर बिखर कर पापा के पेट पर गिरे हुए थे.


पापा के पेट पर नज़र पड़ते ही रूपाली समझ गयी के पापा ने पाजामा सरकाकर घुटनो तक कर रखा है.


उसकी माँ का सर उपेर नीचे हो रहा था और रूपाली समझ नही पा रही थी के माँ कर क्या रही है.


“ये बाल काट लो यहाँ से” कहते हुए उसकी माँ ने अपना सर उठाया.


अंधेरे में रूपाली ने देखा के उन्होने हाथ में एक डंडे जैसी चीज़ पकड़ रखी थी जो रूपाली अच्छी तरह जानती थी के क्या है. मम्मी उसको हाथ में पकड़ कर उपेर नीचे कर रही थी.


“क्यूँ तुम्हें मेरे बालों से क्या तकलीफ़ है?” पापा ने कहा


“अर्रे मैं मुँह में नही ले पाती ढंग से” मम्मी बोली “बाल मुँह में आते हैं तो अजीब सा लगता है”



“रूपाली को जैसा झटका सा लगा. मुँह में? तो क्या मम्मी ने पापा की लड़कों वाली चीज़ मुँह में ले रखी थी? और अगले ही पल उसका शक सही साबित हो गया.


“हां काट लूँगा” कहते हुए पापा ने मम्मी का सर पकड़ा और नीचे को झुकाया. मम्मी ने मुँह खोला और पापा का अपने मुँह में ले लिया.


“छियैयियी मम्मी” रूपाली को जैसे उल्टी सी आ गयी.


उसकी माँ पापा का अपने मुँह में लेकर मुँह में अंदर बाहर कर रही थी. एक हाथ से उन्होने पापा का अपने हाथ में नीचे से पकड़ा हुआ था और धीरे धीरे हिला भी रही थी. जब वो मुँह में लेती तो हाथ नीचे चला जाता और जब मुँह से बाहर निकलती तो हाथ उपेर को आता.


“आउच” पापा ने अचानक कहा “काट क्यूँ रही हो?”


“आप तो बाल काटोगे नही” मम्मी ने अपने मुँह से बाहर निकाला और बोली “तो मैने सोचा के मैं ही काट लूँ”


“ये काटने के लिए नही मेरी जान चूसने के लिए है” पापा बोले और मम्मी ने फिर उनका मुँह में ले लिया


अब रूपाली को समझ आया के मम्मी क्या कर रही थी. वो पापा का चूस रही थी.


“छीयियी मम्मी” रूपाली ने देखते हुए सोचा “ये भी कोई चूसने की चीज़ है?”


उस हल्की सी रोशनी में कुच्छ देर तक यूँ ही मम्मी का सर उपेर नीचे होता रहा. कभी वो मुँह में लेके चूस्ति तो कभी जीभ बाहर निकाल कर चाटने लगती. कर वो रही थी और रूपाली को लग रहा था के जैसे उल्टी उसको आ जाएगी.


“निकलने वाला है मेरा” पापा की साँसें तेज़ हो चली थी “आज मुँह में ही निकाल लो ना प्लीज़”


“बिल्कुल नही” मम्मी ने कहा “चूस्टे हुए तुम्हारा थोड़ा सा भी अगर निकल आता है तो मुझे उबकाई आने लगती है”


“अच्छा ज़रा तेज़ तेज़ करो” पापा ने कहा


“बता देना जब निकलने लगे तो” मम्मी ने कहा और फिर मुँह में लेकर चूसने लगी


अब उनका सर तेज़ी से उपेर नीचे हो रहा था और मुँह के साथ साथ नीचे से हाथ भी उतनी ही तेज़ी से हिल रहा था. वो अब इतनी तेज़ी से चूस रही थी के कमरे में उनके चूसने की आवाज़ उठने लगी थी. रूपाली के साइड में लेटे पापा भी आह आह की आवाज़ कर रहे थे और उनकी साँस तेज़ हो गयी.


“निकल गया” अचानक पापा ने कहा


उनके कहते ही मम्मी ने फ़ौरन मुँह से निकाला और सीधी होकर बैठ गयी. उन्होने अब भी हाथ में पकड़ रखा था और हाथ तेज़ी से उपेर नीचे हो रहा था.


“आअहह” पापा ने आवाज़ की ओर उनका जिस्म जैसे काँपने लगा. क्या हुआ रूपाली को समझ नही आया पर अब जब मम्मी हिला रही थी तो कुच्छ फ़च फ़च की आवाज़ आने लगी.


और फिर रूपाली को लगा के कुच्छ गीला गीला सा आकर उसके हाथ पर गिरा. उसने अपने उंगलियाँ हिलाई तो कोई लिपलिपि सी चीज़ उसके हाथ पर पड़ी थी.


इस पूरे दौरान जो नयी बात हुई वो ये थी के रूपाली को ज़रा भी बुरा नही लगा और ना ही वो गिल्ट फीलिंग आई जिसने उसे काफ़ी दिन से परेशान कर रखा था.


ख़ान इनटेरगेशन रूम में बहा था. सामने कुर्सी पर था जै.


“मैं ज़्यादा बकवास करने वाला आदमी नही हूँ जाई” ख़ान ने कहा “और ना ही ज़्यादा बकवास सुनना पसंद करता हूँ”


जै चुप रहा.


“तो मैं तुमसे भी सीधी सीधी बात ही करता हूँ और उम्मीद करता हूँ के तुम भी मुझे सीधे सीधे ही जवाब दोगे” ख़ान ने बात जारी रखी और सवालिया नज़रों से जै की तरफ देखा.


जै फिर भी नज़रें झुकाए चुप ही रहा.


“देखो जै. तुम्हारे खिलाफ एक ओपन आंड शूट केस है. तुम फिलहाल पोलीस कस्टडी में हो इसलिए जब तक पोलीस सारे सबूत फाइनलाइस करके कोर्ट में केस सब्मिट नही करती तब तक तुम्हारा केस शुरू नही होगा पर उसमें ज़्यादा वक़्त नही लगेगा. कोर्ट में पुरुषोत्तम का वकील एक घंटे में ये साबित कर देगा के खून तुमने किया है और बस फिर हो गया तुम्हारा काम. ठाकुर खानदान का रुतबा और पहुँच काफ़ी आगे तक है इसलिए तुम ये मानकर ही चलो के तुम्हें सीधे फंदे पर ही लटकाया जाएगा. उमर क़ैद की उम्मीद तो करना ही मत.


जै ने नज़र उठाकर ख़ान की तरफ देखा. आँखों में डर सॉफ नज़र आ रहा था.


“तुम्हारे और तुम्हारी मौत के बीचे तुम बस ये मान लो के सिर्फ़ मैं खड़ा हूँ. यहाँ मैने हाथ खड़े किए और वहाँ तुम गये उपेर” ख़ान ने हाथ से आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा


“पर क्यूँ?” जै ने कहा


“क्या मतलब?” ख़ान बोला “क्यूँ क्या?”


“आप क्यूँ खड़े हैं? जै धीरे से बोला


“अजीब एहसान फारमोश हो यार” ख़ान बोला “मैं तुम्हारी जान बचाने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम कहते हो के क्यूँ? क्यूँ भाई? मरने का बहुत शौक है?


जै ने फिर कुच्छ नही कहा


“तो सुनो” ख़ान बोला “मैं सिर्फ़ ये इसलिए कर रहा हूँ के तुमसे हमदर्दी है मुझे. फॉर सम रीज़न मेरा दिल कहता है के तुमने खून नही किया. मैं ये नही कहता के मैं बहुत ईमानदार और शरीफ पोलिकवाला हूँ बट फॉर सम पर्सनल रीज़न्स, किसी के साथ ना-इंसाफी होते नही देख सकता मैं. इसलिए तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा हूँ”


जै ने हां में गर्दन हिलाई.


“गुड. तो अब हम बात करें या अब भी मरने की ख्वाहिश है तुम्हारे दिल में? अगर ऐसा है तो बता दो. मेरा पास और भी काम है. जाके वो करूँगा, तुम्हारे साथ टाइम वेस्ट क्यूँ करूँगा”


जै कुच्छ देर खामोश रहा और फिर बोला.


“पूछिए क्या पुच्छना है”


जै की उमर कोई 35 के आस पास होगी. देखने में वो पक्का ठाकुर लगता था. लंबा कद, चौड़ा सीना, गाथा हुआ शरीर, गोरा रंग, तीखे नैन नक्श, चेहरे पर पूरा रौब. पर उस वक़्त वो अपनी उमर से 10 साल बड़ा और कई हफ़्तो का बीमार लग रहा था.


“गुड” ख़ान हाथ मलते हुए बोला “वैसे तो इस सवाल का जवाब क्वाइट ऑब्वियस है पर फिर भी मैं पुछ ही लेता हूँ. ठाकुर साहब को तुमने मारा?”


जै ने इनकार में गर्दन हिलाई


“ह्म्‍म्म्म” ख़ान ने कहा “तुम मौका-ए-वारदात से रंगे हाथ पकड़े गये थे. तुम्हारे आने से 10 मिनट पहले ठाकुर साहब को ज़िंदा देखा गया था. फिर तुम आए और ठाकुर साहब मारे गये. इस बीच उनके कमरे में कोई नही गया इस बात के गवाह कई लोग हैं. मतलब ठाकुर साहब को लोगों ने ज़िंदा देखा, फिर तुम कमरे में गये और ठाकुर साहब मुर्दा.


“उनको मेरे आने से पहले ही किसी ने मार दिया था. जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तो वो ज़मीन पर पड़े हुए थे. मैने सिर्फ़ उनको सहारा देकर उठाने की कोशिश कर रहा था क्यूंकी मुझे लगा के वो गिर गये हैं जिसकी वजह से उनको चोट लगी और खून निकल रहा था. मुझे क्या पता था के वो मरे पड़े थे. मैं उनको उठाने की कोशिश कर ही रहा था के तभी वो मनहूस नौकरानी आ गयी”


ख़ान ने सामने पड़ी एक फाइल उठाई


“ये बात तो मैं तुम्हारे स्टेट्मेंट में ऑलरेडी पढ़ चुका हूँ. जो एक बात तुम्हारे सॅट्मेंट में नही थी वो ये थी के इतनी रात को तुम वहाँ करने क्या गये थे?”


“चाचा जी ने बुलाया था” जै बोला


“ठाकुर साहब ने?” ख़ान फाइल वापिस बंद करते हुए बोला


“हां” जै बोला “उन्होने मुझे फोन करके फ़ौरन आने को कहा था जिसकी वजह से मैं उस मनहूस घड़ी में हवेली जा पहुँचा”


“क्यूँ बुलाया था?” ख़ान ने कहा


“पता नही. फोन पर बताया नही उन्होने. बस आने को कहा था”


ख़ान कुच्छ देर तक मुस्कुराते हुए जै को देखता रहा


“सही जा रहे हो दोस्त. पहले जब तुमसे पुछा गया था के तुम हवेली क्यूँ पहुँचे तो तुमने बताया नही क्यूंकी उस वक़्त तुम सच च्छूपा रहे थे. अब आराम से बैठके 2 दिन तक अच्छे से सोचकर मुझे ये कहानी सुना रहे हो?”


“नही” जै ने फ़ौरन जवाब दिया “यही सच है. आप चाहें तो मेरे फोन रेकॉर्ड्स चेक कर सकते हैं. उस रात मेरे मोबाइल पर हवेली से फोन आया”


“वो तो मैं चेक करूँगा ही जै पर तुम मुझे ये बताओ के जब तुमसे ये पहले पुछा गया था के तुम हवेली में क्या कर रहे थे तो तुम चुप क्यूँ रहे. तब क्यूँ नही बताया के ठाकुर साहब ने बुलाया था?”


“मैं कहता भी तो कौन मानता ख़ान साहब” जै ने बोला “उस वक़्त मैं डर गया था. मेरे अपने ही मेरे खिलाफ खड़े थे. हर कोई मुझे खूनी कह रहा था, अपने ही चाहा का खूनी. उस वक़्त सब कुच्छ इतना अचानक हुआ के मुझे समझ ही नही आया के किस बात का क्या जवाब दूँ”


ख़ान हल्के से हसा.


“कमाल हैं यार. तुम्हें इतना समझ आ गया के तुम सबको ये बता दो के तुमने खून नही किया और जब तुम वहाँ पहुँचे तो खून ऑलरेडी हो चुका था पर तुम्हें ये समझ नही आया के तुम सबको ये बता दो के ठाकुर साहब ने ही तुम्हें उस रात हवेली में बुलाया था? ह्म्‍म्म्मम?


“अब आप जो चाहे कह लें” जै बोला “सच यही है”


“चलो मान लेते हैं तुम्हारी बात” ख़ान आगे को झुका “वैसे तुम्हारी शकल देखकर लग नही रहा के अपने चाचा के मारने का ज़रा भी अफ़सोस है तुम्हें”


“जिस इंसान से मैं पिच्छले 10 साल में सिर्फ़ कोर्ट में ही मिला, कभी जिससे सीधे मुँह बात नही हुई, जिसके साथ मैं कोर्ट में केस लड़ रहा हूँ उसके मरने पर क्या अफ़सोस हो सकता है ख़ान साहब?” जै बोला


“बात तो सही कह रहे हो” ख़ान ने कहा “वैसे ये कोर्ट केस प्रॉपर्टी को लेकर ही है ना?”


“हाँ” जै बोला “मेरे पिता और चाचा जी जायदाद में बराबर के हिस्सेदार थे तो इस हिसाब से मेरा आधी प्रॉपर्टी पर हक़ बनता है पर मुझे मिला क्या? एक शहर में मकान और थोड़ी सी ज़मीन.”


“ह्म्‍म्म्म” ख़ान ने गर्दन हिलाई


“आप ये सोचिए ना ख़ान साहब. मैं उनके साथ कोर्ट में केस लड़ रहा था जिसके जीतने पर मैं प्रॉपर्टी से और हिस्सा ले सकता था. उनको मारके मुझे क्या मिलता, मिलता तो उनसे केस जीतकर. उनके मरने से तो बल्कि मुझे नुकसान हुआ. अब प्रॉपर्टी जाने कितने हिस्सो में बट जाएगी. पहले जहाँ मैं सिर्फ़ एक चाचा जी से केस लड़ रहा था, अब उनके 3 बेटों से लडूँगा”


“बात तो सही कह रहे हो” ख़ान बोला “ये पॉइंट यूज़ कर सकते हैं हम तुम्हारे फेवर में कोर्ट में बट फॉर नाउ, इट ब्रिंग्स उस टू अनदर पॉइंट. तुम्हारे साथ ऐसा सलूक क्यूँ हुआ?”


“मतलब?” जै ने सवालिया नज़र से ख़ान की तरफ देखा.


“मतलब के जहाँ तक मुझे पता है, तुम्हारे माँ बाप काफ़ी पहले मर गये थे, जब तुम काफ़ी छ्होटे थे. उसके बाद ठाकुर साहब ने पाल पोसकर तुम्हें बड़ा किया और एक दिन अचानक हवेली से निकाल दिया. क्यूँ?”


“क्यूंकी मैने प्रॉपर्टी में हिस्सा माँगा था” जै बोला


“कॅरी ऑन … बोलते रहो” ख़ान ने इशारा किया


“जब तक मैं उनके टुकड़ो पर पलता रहा तब तक सब ठीक था. कोई प्राब्लम नही, कोई इश्यू नही पर जिस दिन मैने उनसे प्रॉपर्टी में अपने हिस्से की बात की उसी दिन मुझे लात मारकर निकाल दिया गया” जै ने कहा


“उमर क्या है तुम्हारी?” ख़ान ने अचानक पुछा


“जी?” जै अचानक उठे इस सवाल से चौंक पड़ा


“एज… हाउ ओल्ड आर यू?” ख़ान ने सवाल दोहराया


“33. क्यूँ?” जै ने पुछा


“ह्म्‍म्म्मम” ख़ान ने दोबारा फाइल खोली “इसमें 35 लिखी है. खैर. अब तुम 33 के हो और ये कॅब्की बात है, जब तुम्हें निकाल दिया गया था?”


“कोई 10 साल पहले की” जै जे जवाब दिया


“यानी तब तुम 23 के थे. डोंट यू थिंक यू वर ए लील यंग टू अस्क फॉर युवर शेर इन दा प्रॉपर्टी?”




“आइ नो” जै बोला “और शायद मैं ये बात करता भी नही पर एक दिन मैने चाचा जी को उनके वक़ील देवधर से बात करते सुना. मैं उनके कमरे के बाहर से गुज़र रहा था के अचानक उनकी आवाज़ मेरे कानो में पड़ी. वो अपनी विल की बात कर रहे थे जिसके अनुसार सारी प्रॉपर्टी उनको 3 बेटों और बेटी कामिनी में बराबर बाट दी जाती यानी के मेरे हिस्से में आता बाबाजी का घंटा जिसको मैं सारी उमर बैठके हिलाता रहता”


ख़ान हल्के से हसा.


“. ये बात बर्दाश्त ना हुई” जै ने बात जारी रखी “मैं छोटा ज़रूर था पर इतनी समझ थी मुझ में. उसी दिन रात को डिन्नर के बाद मैने चाचा जी से प्रॉपर्टी में अपने हिस्से की बात की जिसको लेकर वो मुझपर बहुत चिल्लाए और अगले ही दिन मुझे हवेली से निकाल दिया गया.”


“एक आखरी सवाल” ख़ान अपनी कॅप उठाते हुए बोला “जब तुम कमरे में दाखिल हुए या जब कमरे की तरफ जा रहे थे, तब किसी और को तुमने कमरे से निकलते देखा?


जै ने इनकार में सर हिलाया


“ठाकुर साहब के कमरे में एक खिड़की है जो हवेली के पिच्छले हिस्से की तरफ खुलती है. जब तुम कमरे में गये तो खिड़की बंद थी या खुली हुई? ख़ान ने खड़े होते हुए कहा


जै सोचने लगा और फिर गर्दन हिलाता हुआ बोला


“कह नही सकता. ध्यान ही नही दिया मैने. मेरे सामने चाचा जी पड़े थे और मेरा पूरा ध्यान उन्ही पर था”


करीब 15 मिनट बाद ख़ान पोलीस स्टेशन से निकला और अपनी जीप में बैठकर गाँव की तरफ चल पड़ा. उसका ये यकीन के जै ने खून नही किया और पक्का हो गया था और वो जानता था के अपनी तरफ से वो जै को बचाने की पूरी कोशिश करेगा क्यूंकी वो जानता था के जै के साथ ना-इंसाफी होगी अगर उसको सज़ा हुई तो. बहुत साल पहले खुद ख़ान के साथ ना-इंसाफी हुई थी जिसकी वजह से उसकी माँ की मौत हो गयी थी पर उसको किसी ने इंसाफ़ नही दिया था तबसे ही उसको हमदर्दी थी जै जैसे लोगों से जो बेकार ही सूली चढ़ा दिए जाते थे.


सबसे बड़ा सवाल अब भी ख़ान के सामने वैसा ही खड़ा था. अगर जै ने ठाकुर को नही मारा तो किसने मारा, और 10 मिनट के अंदर अंदर कैसे मारा?


……………………………………………


उस रात अपने माँ बाप के बेडरूम में सोने के बाद रूपाली के लिए जैसे सब कुच्छ बदल गया था. जो भी झिझक दिल में बची थी सब जाती रही. वो समझ गयी थी के यूँ आपस में लिपटा लिपटी करने में मज़ा आता है. वो अक्सर अब अपने आप से खेलने लगी थी.


अगले 2 हफ़्तो तक वो इंतेज़ार करती रही के फिर से शंभू और कल्लो का खेल देखे पर किस्मत ने साथ नही दिया. तबीयत खराब होने की वजह से उसके माँ बाप खुद तो मंदिर गये पर उसके भाई को साथ नही ले गये. वो घर पर ही होता और उसकी देख रेख करने के लिए एक नौकरानी और घर में रहती. रूपाली का दिल ऐसे टूटा जैसे किसी बच्चे का खिलोना छिन गया हो. वो कल्लो और शंभू का खेल देखने के लिए मरी जा रही थी, उन दोनो को फिर से नंगा देखने की उत्सुकता बढ़ रही थी.


ऐसे ही एक दिन शाम को रूपाली बैठी टीवी देख रही थी के हाथ में झाड़ू उठाए कल्लो कमरे में दाखिल हुई. रूपाली का पूरा ध्यान टीवी की तरफ था और कल्लो कमरे में झाड़ू लगा रही थी. झाड़ू लगाती लगती कल्लो उस सोफा के सामने आई जिस पर रूपाली बैठी हुई थी.


“पावं थोड़ा उपर करना बीबी” कल्लो ने कहा


रूपाली ने टीवी की तरफ देखते देखते ही अपने पावं उपेर करके सोफे पर रख लिए. कल्लो सोफा के नीच से झाड़ू लगाने के लिए अपने घुटनो पर बैठ गयी और झुक कर झाड़ू निकालने लगी. तभी रूपाली की नज़र एक पल के लिए उसपर पड़ी और वहीं थम कर रह गयी.


कल्लो ठीक उसके सामने घुटनो पर बैठी ज़मीन पर झुक कर सोफा के नीचे झाड़ू घुमा रही थी. उसने एक काले रंग का सलवार सूट पहेन रखा था जिसका गला काफ़ी बड़ा था. झुकी होने के वजह से गला खुल सा गया था और रूपाली की नज़र कमीज़ से होती हुई सीधी कल्लो के सीने पर पड़ी.


कल्लो ने सफेद रंग का ब्रा पहें रखा था. उस सफेद ब्रा में क़ैद उसकी काली रंग की चूचियाँ मुश्किल से ब्रा के अंदर समा पा रही थी. रूपाली पहले भी एक बार इन छातियों को देख चुकी थी पर ब्रा के अंदर नही. उसकी खुद की छ्होटी छ्होटी छातियो ब्रा के अंदर गायब हो जाती थी, बल्कि ब्रा हल्का ढीला ही रह जाता था पर कल्लो का ब्रा देख कर तो ऐसा लग रहा था जैसे फॅट जाएगा. ब्लॅक & वाइट का वो कॉंबिनेशन देख कर रूपाली की नज़र कुच्छ पल के लिए वहीं अटक गयी थी.


तभी उसको एहसास हुआ के कल्लो एक ही जगह पर रुकी हुई है और झाड़ू के लिए उसका हाथ अब हिल नही रहा था. रूपाली ने फ़ौरन नज़र उठाई और उसकी नज़र सीधी कल्लो की नज़र से टकराई. कल्लो सीधा रूपाली की तरफ देख रही थी पर वैसे ही आराम से झुकी हुई थी, जैसे खुद रूपाली को अपनी छातियों दिखा र्है हो. उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी.


अपनी चोरी पकड़े जाने पर रूपाली एकदम हड़बड़ा गयी. वो फ़ौरन उठ खड़ी हुई और टीवी ऐसे ही ऑन छ्चोड़ कर अपने कमरे की तरफ चल पड़ी. पीछे खड़ी कल्लो अब भी मुस्कुरा रही थी.


रूपाली कुच्छ देर तक यूँ ही अपने बिस्तर पर पड़ी रही. उसकी समझ नही आ रहा था के क्या करे.. डर लग रहा था के कल्लो ने अगर किसी को कुच्छ कह दिया तो? अगर कल्लो ने उसकी माँ से शिकायत कर दी के रूपाली क्या देख रही थी तो?


तभी दिल में ख्याल आया के अगर कल्लो ने कुच्छ कहा तो वो भी अपनी माँ को कह देगी के कल्लो और शंभू सनडे को उनके कमरे में ही क्या करते थे. इस ख्याल ने उसको थोड़ा हौसला दिया पर उसकी हिम्मत अब भी कल्लो से आँख मिलाने की नही हो रही थी.


उसने घड़ी पर नज़र डाली. शाम के 4 बज रहे थे. रूपाली का कुच्छ खाने का दिल हुआ और वो अपने कमरे से निकल कर किचन की तरफ बढ़ी.दिल ही दिल में वो ये दुआ कर रही थी के कल्लो से सामना ना हो और उसकी दुआ जैसे क़बूल हो गयी. उसको कल्लो घर में कहीं दिखाई नही दी. रूपाली किचन में पहुँची तो वहाँ उसको शंभू काका भी दिखाई नही दिए.


रूपाली को बहुत भूख लगी थी और अक्सर वो अपनी माँ से ही खाने को कुच्छ माँगा करती थी पर इस वक़्त उसके माँ बाप घर पर नही थे. उसके पास सिवाय शंभू काका से कुच्छ बनाने को कहने के अलावा कोई चारा नही था.


“शायद स्टोर से कुच्छ लाने को गये हों” सोचकर रूपाली स्टोर रूम की तरफ बढ़ी.


स्टोर रूम घर के पिछे बना हुआ था. रूपाली के पिता भी एक ठाकुर थे और अपने खेत थे. अक्सर उन खेतों से आया गेहूँ और चावल घर के पिछे बने हुए एक स्टोर रूम में रखा होता था. घर की आधी से ज़्यादा ज़रूरत की चीज़ें उसी स्टोर रूम में होती थी इसलिए शंभू के पास हमेशा उसकी चाबी होती थी.


धीरे कदमो से चलती रूपाली स्टोर के पास आई. दरवाज़े पर ताला नही था पर दरवाज़ा बंद था. रूपाली जैसे ही दरवाज़े के नज़दीक आई उसको एक जानी पहचानी आवाज़ सुनाई पड़ी.


आवाज़ कल्लो की थी.


रूपाली आवाज़ सुनते ही पहचान गयी के ऐसी आवाज़ कल्लो के मुँह से कब निकलती है. घर से कल्लो और शंभू काका दोनो ही गायब थे. उसको एक पल में समझ आ गया के वो दोनो अंदर स्टोर में था और क्या कर रहे थे.


रूपाली के दिल की धड़कन बढ़ चली. एक पल को तो उसको ख्याल आया के वापिस चली जाए पर अगले ही पल उसने अपना इरादा बदल दिया. वो तो खुद कब्से ये नज़ारा देखने के लिए सनडे का इंतेज़ार कर रही ही. उसने अपना मंन अंदर देखने का बना लिया और उस वक़्त ये काम ज़्यादा मुश्किल भी साबित नही हुआ.


स्टोर का दरवाज़ा लकड़ी का था और बहुत पुराना था. वो दरवाज़ा नीचे के हिस्से से हल्का सा टूटा हुआ था जिसकी वजह से ज़मीन और दरवाज़े के बीच हल्की सी जगह होती थी जहाँ से अंदर देखा जा सकता था. रूपाली फ़ौरन ज़मीन पर लेट सी गयी और कमरे के अंदर झाँका.


स्टोर के अंदर आते चावल की बोरियाँ हमेशा भरी रहती थी जिसकी वजह से कमरे के अंदर जगह नही होती थी. थोड़ी सी जगह बस दरवाज़े के पास ही होती थी ताकि अंदर जाने वाला दरवाज़ा खोलकर अंदर खड़ा हो सके और बोरियाँ बाहर निकाली जा सकें. इसी वजह से जैसे ही रूपाली ने अंदर नज़र डाली, उसको शंभू और कल्लो बिल्कुल दरवाज़े के पास ही नज़र आए. मुश्किल से 4 फुट का फासला था. इस तरफ रूपाली ज़मीन पर लेटी हुई देख रही थी, बीच में दरवाज़े और दरवाज़े के बिल्कुल पास ही दूसरी तरफ कल्लो और शंभू.


पहली नज़र पड़ते ही एक पल के लिए रूपाली को समझ नही आ सका के वो क्या देख रही थी. दरार छ्होटी सी ही थी इसलिए ज़्यादा नज़र आ रहा था और जो नज़र आ रहा था वो इंसानी शरीर ही थी पर कौन सा हिस्सा ये रूपाली को समझ नही आया. उसने गौर से देखा और समझने की कोशिश की. वो हिस्सा जो भी था वो हिल रहा था और थोड़ी देर गौर से देखने के बाद रूपाली समझ गयी के वो क्या था.


कमरे के दूसरी तरफ कल्लो नीचे ज़मीन पर लेटी हुई. उसका सर दूसरी तरफ और पावं दरवाज़े की तरफ थे और खुले हुए थे. उसने सलवार उतार रखी थी इसलिए रूपाली की नज़र सीधी उसकी टाँगो के बीच पड़ रही थी. कल्लो की दोनो टांगे उपेर हवा में उठी हुई थी और उसकी टाँगो को पकड़े हुए बीच में बैठे थे शंभू काका.


काका का चेहरा दरवाज़े की दूसरी तरफ यानी कल्लो की तरफ था और उनकी पीठ दरवाज़े की ओर. रूपाली को पिछे से उनकी पीठ और उनकी गांद दिखाई दे रही थी. वो अपने पंजो पर उकड़ू बैठे हुए और आगे पिछे हो रहे थे. उनके दोनो तरफ कल्लो की टांगे उपेर उठी हुई थी जिनको उन्होने अपने हाथ से पकड़ रखा था और आगे पिछे हिल रहे थे.


“हाए मेरी माँ” कल्लो की आवाज़ आई “ज़ोर से धक्का लगाओ”


ये बात सुनकर काका ज़ोर ज़ोर से अपनी कमर हिलाने लगे और तब रूपाली का ध्यान उनकी गांद के नीचे लटक रहे उनको आंडो की तरफ गया. वो जानती थी के ये क्या हैं पर इतने बड़े होते हैं वो ये पहली बार देख रही थी. आंडो से ही लगा काका की लड़कों वाली चीज़ थी जो कल्लो की ……


रूपाली की आँखें हैरत से खुल गयी.


वो कल्लो की लड़कियों वाली चीज़ के अंदर घुसी हुई और अंदर बाहर हो रही थी.


रूपाली का दिल धक से रह गया. तो लड़के ये यहाँ भी डालते हैं. उसको वो रात याद आई जब उसने अपने माँ बाप को देखा था. वो जानती थी के पापा ने मम्मी के पिछे से घुसा रखा था और अब काका ने कल्लो के आगे से. मतलब आगे पिछे दोनो तरफ घुसा सकते हैं?


रूपाली चुप चाप लेटी देखती रही. काका हिल रहे थे और वो लंबी सी चीज़ कल्लो के अंदर बाहर हो रही थी.


“और तेज़ … ज़ोर से …. ज़ोर से ….” कल्लो की आवाज़ आ रही थी.


“तो इसको गांद मारना कहते हैं” रूपाली ने उस दिन अपनी माँ के मुँह से निकले शब्दों के बारे में सोचा.

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