रजनी (सोनू के होंठों से अपने होंठों को अलग करते हुए, उखड़ी हुई साँसों के साथ)- सोनू बेटा आज तूने मुझे वो सुख दिया है, जिसके लिए मैं कई सालों से तड़फ रही हूँ। आज से तुम मेरे नौकर नहीं.. मैं तुम्हारी दासी बन कर रहूँगी.. तुझे दुनिया की हर वो चीज़ मिलेगी.. जिस पर तुम हाथ रख दोगे.. ये तुमसे रजनी का वादा है।
सोनू- वो मालकिन मुझे वो..
रजनी- हाँ.. बोल मेरे राजा अगर कुछ चाहिए तो…
सोनू- नहीं.. वो मैं कह रहा था कि आप मुझे रोज ये सब करने देंगीं?
रजनी- ओह्ह… मेरे लाल बस इतनी सी बात कहने के लिए इतना परेशान क्यों हो रहा है? सीधा क्यों नहीं कहता कि तू मुझे रोज चोदना चाहता है.. है ना..? बोल..
सोनू (शरमाते हुए)- हाँ.. मालकिन।
रजनी- चोद लेना मेरे राजा.. जब तुम्हारा दिल करे.. पर दिन में थोड़ा ध्यान रखना.. किसी को पता नहीं चलना चाहिए, चल छोड़ ये सब अभी तो आज पूरी रात पड़ी है।
यह कहते हुए रजनी ने सोनू को अपने ऊपर से हटा कर बिस्तर पर लेटा दिया और खुद उसके टाँगों के बीच में जाकर घुटनों के बल बैठ गई।
सोनू का अधखड़ा लण्ड अभी भी काफ़ी लंबा और मोटा लग रहा था, जिसे देख कर रजनी की आँखों में एक बार फिर से वासना जाग उठी।
उसने अपने काम-रस से भीगे सोनू के लण्ड को मुठ्ठी में पकड़ लिया और तेज़ी से हिलाने लगी।
सोनू- ओह्ह मालकिन धीरे ओह्ह..
रजनी ने लंड की तरफ मुस्कुराते हुए सोनू की तरफ देखा और फिर अपनी कमर पर इकठ्ठे हुए पेटीकोट से सोनू के गीले लण्ड को साफ़ किया और फिर झुक कर उसके लण्ड के सुपारे को अपने होंठों के बीच में दबा लिया।
सोनू का पूरा बदन काँप गया, उसने रजनी के सर को दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया।
‘ये क्या कर रही हैं मालकिन आप.. ओह..’
रजनी ने सोनू की बात पर ध्यान दिए बिना.. उसके लण्ड को चूसना शुरू कर दिया।
सोनू मस्ती में ‘आहह ओह्ह’ कर रहा था।
एक बार फिर से सोनू के लण्ड में तनाव आना चालू हो गया था।
जिसे देख कर रजनी की चूत की फांकें एक बार फिर से कुलबुलाने लगीं और वो और तेज़ी से सोनू के लण्ड को चूसते हुए, अपने मुँह के अन्दर-बाहर करने लगी।
उसके हाथ लगातार सोनू के अन्डकोषों को सहला रहे थे और सोनू के हाथ लगातार रजनी के खुले हुए बालों में घूम रहे थे।
रजनी बार-बार अपनी मस्ती से भरी अधखुली आँखों से सोनू के चेहरे को देख रही थी जो आँखें बंद किए हुए अपने लण्ड को चुसवा रहा था।
रजनी ने सोनू के लण्ड को मुँह से निकाला और सोनू के अन्डकोषों को मुँह में भर चूसना चालू कर दिया, ‘ओह्ह बस मालकिन.. ओह्ह..’सोनू को ऐसा लगा मानो उसकी साँस अभी बंद हो जाएगीं, उसका दिल बहुत जोरों से धड़क रहा था।
जब सोनू से बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने रजनी को उसके बालों से पकड़ कर खींच कर अपने ऊपर लेटा लिया। रजनी की चूचियाँ सोनू छाती में आ धँसीं।
दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे, सोनू ने अभी भी रजनी के बालों को कस कर पकड़ा हुआ था, पर रजनी के होंठों पर फिर भी मुस्कान फैली हुई थी।
नीचे सोनू का लण्ड रजनी की चूत के ऊपर रगड़ खा रहा था।
रजनी सोनू की आँखों में देखते हुए अपना एक हाथ नीचे ले गई और सोनू के लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर टिका दिया और सोनू के आँखों में देखते हुए धीरे-धीरे अपनी चूत को सोनू के लण्ड पर दबाने लगी।
रजनी के थूक से सना हुआ सोनू का लण्ड उसकी चूत के छेद को फ़ैलाते हुए अन्दर घुसने लगा।
सोनू को ऐसे लग रहा था, जैसे उसके लण्ड का सुपारा किसी चूत में नहीं.. बल्कि किसी तपती हुई भट्टी के अन्दर जा रहा हो।
सोनू की आँखें एक बार फिर से बंद हो गईं।
रजनी ने सोनू के दोनों हाथों को पकड़ कर अपनी चूचियों पर रख कर अपने हाथों से दबा दिया और अपनी चूत को तब तक सोनू के लण्ड पर दबाती रही, जब तक कि सोनू का पूरा 8 इंच लंबा लण्ड उसकी चूत की गहराईयों में समा कर उसकी बच्चेदानी के छेद से न जा टकराया।
रजनी (काँपती हुई आवाज़ मैं)- ओह्ह सोनू तेरा लण्ड कितना बड़ा है….ओह.. देख ना कैसे मेरी चूत को खोल रखा है.. ओह सोनू..
रजनी की चूत तो जैसे पहले से एक और जबरदस्त चुदाई के लिए तैयार थी और अपने अन्दर कामरस की नदी बहा रही थी।
सोनू का लण्ड अब जड़ तक रजनी की चूत में घुसा हुआ था और रजनी की चूत से कामरस बह कर सोनू के अन्डकोषों तक आ रहा था।
सोनू आँखें बंद किए हुए.. रजनी की चूचियों को अपने हाथों से मसल रहा था, बीच में वो उसके चूचकों को अपनी उँगलियों के बीच में दबा कर खींच देता, जिससे रजनी एकदम से सिसक उठती और उसकी कमर अपने आप ही आगे की ओर झटका खा जाती।
ज्यों ही लण्ड चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता उसी पल रजनी के बदन में मस्ती की लहर दौड़ जाती।
‘हाँ.. सोनू उफ्फ और ज़ोर से मसल, मेरे चूचुकों को ओह्ह ओह आह्ह..सोनू.. चोद डाल मुझे… देख ना मेरी फुद्दी कैसे पानी छोड़ रही है.. तेरे लण्ड के लिए.. ओह सोनू ओह्ह हाँ.. ऐसे ही और ज़ोर से मसल.. ओह ओह आह्ह..’
रजनी अपनी कमर को हिलाते हुए सिसकारी भर रही थी और अपने दोनों हाथों को सोनू के हाथों पर दबा रही थी।
सोनू भी जोश में आकर नीचे लेटे हुए ऊपर की ओर धक्के लगाने की कोशिश कर रहा था.. पर दुबले-पतले सोनू का बस नहीं चल रहा था.. ऊपर जवानी से भरपूर रजनी जैसे गदराई हुई औरत जो उसके लण्ड पर उछल रही थी।
सोनू तो बस अब आँखें बंद किए हुए रजनी की कसी चूत के मज़े लूट रहा था।
रजनी अब एकदम गर्म हो चुकी थी, उसने सोनू के हाथों से अपने हाथ हटाए और सोनू के ऊपर झुक कर उसके होंठों को अपने होंठों में भर लिया।
जैसे ही सोनू के हाथ आज़ाद हुए.. सोनू अपने हाथों को उसकी गाण्ड पर ले गया और उसके चूतड़ों को ज़ोर-ज़ोर से मसल कर दोनों तरफ फ़ैलाने लगा।
रजनी ने अपने होंठों को सोनू के होंठों से हटाया और सोनू के सर के दोनों तरफ अपनी हथेलियों को टिका कर अपनी गाण्ड को पूरी रफ़्तार से ऊपर-नीचे करके, अपनी चूत को सोनू के लण्ड पर पटकने लगी।
सोनू का लण्ड हर चोट के बाद करीब आधा बाहर आता और फिर पूरी रफ़्तार के साथ रजनी की चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ अन्दर घुस जाता।
रजनी तो मानो आज ऐसे निहाल हो गई थी, जैसे उससे स्वर्ग मिल गया हो।
रजनी- हाँ.. सोनू ओह्ह और ज़ोर से मसल मेरीईई गाण्ड को.. ओह्ह ह सोनू देख मेरी फुद्दी फिर पानी छोड़ने वाली है आह्ह.. राजाआअ ओह ओह आह्ह.. आह्ह.. आह्ह..
रजनी का बदन एक बार फिर से अकड़ने लगा और उसकी चूत से पानी की नदी बह निकली।
सोनू भी नीचे लेटे हुए कमर हिलाते हुए झड़ गया।
रजनी झड़ कर निढाल होकर सोनू के ऊपर ही लुढ़क गई।
जब रजनी की साँसें दुरस्त हुईं तो रजनी सोनू के ऊपर से उठ कर उसके बगल में लेट गई।
पूरे कमरे में अब चुदाई की खुशबू छाई हुई थी।
रजनी ने करवट के बल लेटते हुए, सोनू को अपने से चिपका लिया और सोनू ने भी उसे अपनी बाँहों में भरते हुए, अपने चेहरे को रजनी की चूचियों में दबा दिया।
रजनी आज कई सालों बाद झड़ी थी.. वो भी एक के बाद एक.. दो बार।
अब उससे अपना बदन हल्का महसूस हो रहा था, होंठों पर संतुष्टि भरी मुस्कान और दिल में सुकून था।
अब ना तो सोनू कुछ बोल रहा था और ना ही रजनी।
दोनों एक-दूसरे के आगोश में खोए हुए कब सो गए, पता ही नहीं चला।
रात के 3 बजे के करीब सोनू की नींद टूटी, शायद.. अभी वो पूरी तरह से जगा हुआ था।
सोनू के हिलने के कारण रजनी की नींद भी उखड़ गई।
लालटेन की रोशनी में उसने अपने आपको सोनू की बाँहों में एकदम नंगा पाया।
सोनू अब भी उसकी चूचियों को मुँह में दबाए हुए ऊंघ रहा था जिसे देख कर एक बार फिर रजनी के होंठों पर प्यार भरी मुस्कान फ़ैल गई।
उसने बड़े ही प्यार से एक बार सोनू के माथे को चूमा और फिर उसके बालों को प्यार से सहलाने लगी, वो मन ही मन सोच रही थी कि इस रात की सुबह कभी ना हो..
पर यह शायद मुमकिन नहीं था और शायद कल चन्डीमल भी वापिस आ सकता था और जो प्यास उसकी आज कई सालों बाद बुझी है, शायद फिर पता नहीं कब तक उसे इस जवान लण्ड के लिए प्यासा रहना पड़े।
यही सोचते हुए.. रजनी लगातार अपने हाथ की उँगलियों को सोनू के बालों में घुमाए जा रही थी, जिससे सोनू जो कि अभी गहरी नींद में नहीं था.. पूरी तरह से जाग गया।
उसने अपनी आँखें खोल कर रजनी की तरफ देखा.. उसके होंठ रजनी की गुंदाज चूचियों के चूचुकों के बेहद करीब थे।
सोनू से रहा नहीं गया और उसने रजनी के बाएं चूचुक को मुँह में भर कर ज़ोर से चूसना चालू कर दिया।
अपने कड़क चूचुक पर सोनू के रसीले होंठ महसूस करते ही.. उसके बदन में सनसनी दौड़ गई।
रजनी ने दोनों हाथों से सोनू के सर को पकड़ कर पीछे किया.. जिससे रजनी का चूचुक ‘पक्क’ की आवाज़ से सोनू के मुँह से बाहर आ गया।
सोनू ने रजनी के चेहरे की तरफ देखा।
दोनों की नजरें आपस में मिलीं.. रजनी की आँखों में चाहत के साथ-साथ लाखों सवाल थे।
कहाँ तो वो सोनू को चन्डीमल के खिलाफ इस्तेमाल करके.. चन्डीमल की इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ाना चाहती थी और कहाँ आज वो खुद सोनू के मूसल लण्ड की गुलाम हो कर रह गई थी जो इस वक़्त तन कर रजनी की चूत के पास उसकी जाँघों को ठोकर मार रहा था.. जैसे रजनी की चूत के लिए अपना रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा हो।
रजनी ने सोनू की आँखों में देखते हुए, अपने होंठों को उसके होंठों की तरफ बढ़ा दिया और अगले ही पल सोनू रजनी की चूचियों को मसलते हुए, उसके होंठों को चूस रहा था।
रजनी ने अपने हाथों को सोनू की पीठ पर कस कर.. उसे अपने ऊपर खींच लिया।
जैसे ही सोनू रजनी के ऊपर आया.. रजनी ने अपनी टाँगों को फैला लिया, जिससे सोनू का नीचे का धड़ उसकी गुंदाज जाँघों के बीच में आ गया..
सोनू ने रजनी के होंठों से अपने होंठों को हटाया और उसके गर्दन और चूचियों के ऊपर वाले हिस्से को चूमने लगा।
रजनी के बदन में एक बार फिर से वासना की आग भड़कने लगी।
रजनी अभी भी उसके पेट पर अपने हाथों को घुमा रही थी और सोनू उसके बदन के हर अंग को चूमता और चाटता हुआ नीचे उसके पेट पर आ गया।
रजनी अब धीमी आवाज़ में सिसकियां भर रही थी।
नींद से अभी-अभी जागी रजनी को आज तक ऐसे खुमारी नहीं छाई थी.. उसने अपने दोनों हाथों को ऊपर ले जाकर सर के नीचे रखे तकिए को कस कर पकड़ लिया।
उसकी कमर लगातार थरथरा रही थी, उसके पेट में उठ रही लहरों से जाहिर हो रहा था कि रजनी कितनी गरम हो चुकी है और अब उसकी चूत में फिर से सुनामी आने लगी थी- ओह्ह सोनू ओह मेरी जान…. उफफफफफ्फ़ और मत तड़फाओ अपनी गुलाम मालकिन को ओह्ह ओह्ह..
सोनू ने एक बार रजनी के कामुक चेहरे की ओर देखा।
उसका पूरा चेहरा पसीने के सुनहरी बूँदों से भीगा हुआ था और उसके रसीले होंठ थरथरा रहे थे।
फिर उसने अभी जीभ निकाल कर रजनी की नाभि में घुसा दी।
रजनी के बदन में करेंट सा दौड़ गया.. उसने तकिए को छोड़ कर सोनू के सर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
‘ओह सोनू आह्ह.. सीईई नहियिइ ओह मत कर मेरे लालल्ल्ल ओह बसस्स्स उफफ्फ़ क्या कर रहा हाईईईई, ओह्ह छोड़ दे.. रा..जाआ…’
सोनू उसकी नाभि और पेट के निचले हिस्से को चूमता हुआ और नीचे उसकी चूत की तरफ जाने लगा..
जब रजनी को इस बात का अहसास हुआ, तो उसने अपनी जाँघों को भींचना शुरू कर दिया।
रजनी- ओह्ह सोनूऊऊ मत्तत्त कर नाआअ.. मैं मर जाऊँगी.. ओह ओह्ह सीईईईई ओह सोनू न.. नहीं ओह्ह ओह्ह ओह्ह..
रजनी की आवाज़ मानो उसके हलक में अटक गई हो, कुछ पलों के लिए उसकी साँस रुक गई और उसके पूरा बदन ऐसे अकड़ गया.. मानो जैसे उसको दौरा पड़ गया हो।
उसने अपने हाथों से सोनू के सर को पीछे करने के कोशिश की, पर उसको लगा जैसे उसके बदन ने उसका साथ छोड़ दिया हो।
कुछ पलों की खामोशी के बाद मानो जैसे कमरे में तूफान आ गया।
रजनी लगभग चीखते हुए सिसकारियाँ भरने लगी।
रजनी- ओह्ह ओह्ह आह्ह.. आह्ह.. आह्ह.. बेटा ओह छोड़ दे मुझे.. ओह मैं पागल हो जाऊँगी.. बेटा ओह मेरी फुद्दी को मत कर बेटा ओह्ह..
रजनी अपनी गाण्ड को बिस्तर से ऊपर उछालते हुए मछली के तरह तड़फ रही थी।
उसकी चूत के कामरस ने इस कदर उसकी चूत को गीला कर रखा था कि उसकी चूत से पानी निकल कर गाण्ड के छेद को नम कर रहा था।
जब मस्ती में आकर रजनी अपनी गाण्ड को ऊपर की ओर उछालती, तो सोनू की जीभ रजनी की गाण्ड के छेद पर रगड़ खा जाती और रजनी के बदन में और मस्ती की लहर दौड़ जाती।
रजनी का पूरा बदन मस्ती में कांप रहा था।
जब रजनी से बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने सोनू को कंधों से पकड़ कर ऊपर खींच लिया और अपना हाथ नीचे ले जाकर सोनू के लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर लगा दिया।
गरम सुपारा चूत के छेद पर लगते ही.. जो सुख की अनुभूति रजनी को हो रही थी, उसे शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल था।
सोनू को ऐसे लग रहा था, जैसे उसके लण्ड का सुपारा किसी दहकते लावा का नदी में चला गया हो।
‘ओह्ह मालकिन आपकी चूत बहुत गरम है.. मेरा लण्ड पिघल जाएगा..’
सोनू का बदन भी मस्ती में काँप रहा था, उसने अपनी कमर को आगे की तरफ धकेला, सोनू के लण्ड का सुपारा रजनी की चूत के छेद को फ़ैलाता हुआ अन्दर जा घुसा और रजनी के मुँह से मस्ती भरी ‘आहह’ निकल गई।
रजनी ने अपनी बाँहों को सोनू की पीठ पर कस लिया और उसके होंठों को जो कि उसकी चूत के कामरस से भीगे हुए थे, अपने होंठों में भर लिया।
सोनू ने भी अपनी रजनी के होंठों को चूसते हुए एक और जोरदार धक्का मार कर अपना पूरा का पूरा लण्ड रजनी की चूत की गहराईयों में उतार दिया।
रजनी के बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई और सोनू की पीठ पर तेजी से अपने हाथों को फेरने लगी।
अब सोनू भी लगातार अपने लण्ड को रजनी की चूत की अन्दर-बाहर कर रहा था और रजनी भी अपनी गाण्ड को उछाल-उछाल कर अपनी चूत को सोनू के लण्ड पर पटक रही थी।
रजनी जो कि थोड़ी देर पहले मायूस हो गई थी, अब सब कुछ भूल कर एक बार फिर से अपनी जाँघों को फैलाए हुए, सोनू के लण्ड को अपनी चूत में ले रही थी।
चुदाई का ये दौर करीब 15 मिनट चला। झड़ने के बाद दोनों जब अलग हुए.. दोनों बहुत थक चुके थे।
अगली सुबह जब रजनी उठी, तो उसने अपने आप को सोनू की बाँहों में एकदम नंगा पाया.. अपनी इस हालत को देख कर रजनी के होंठों पर मुस्कान आ गई।
उसने सोनू के चेहरे की तरफ देखा, जो अभी भी ख़्वाबों की दुनिया में था।
रजनी ने झुक कर सोनू के माथे को चूमा और फिर उसके बालों को सहलाते हुए उसको जगाया।
सोनू नींद से जगा और रजनी की तरफ देखने लगा।
‘अब उठ जा शहजादे.. सुबह हो गई है.. वो बेला भी आती होगी..’
ये कह कर रजनी ने एक बार सोनू के होंठों को चूमा और फिर बिस्तर से उतर कर अपनी साड़ी पहनने लगी..
पीछे बिस्तर पर लेटा हुआ सोनू रजनी के गदराए बदन को देख रहा था, उसे अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कल पूरी रात ये बदन उसकी बाँहों में था और उसने रजनी को रात को जी भर कर चोदा था।
बेला के आने का वक्त हो रहा था, इसलिए सोनू भी बिस्तर से उतर कर लुँगी पहन कर पीछे बने अपने कमरे में चला गया।
पीछे जाने के बाद उसने अपने कपड़े जो कल रात भीग गई थे, उन्हें सूखने के लिए डाल दिया और दूसरे कपड़े पहन कर शौच के लिए खेतों की तरफ चला गया।
दूसरी तरफ बेला के घर पर आज उसका पति आया हुआ था।
उसके साथ किसन नाम का एक आदमी भी था।
बेला ने उनके लिए चाय बनाई और बेला का पति रघु बेला को कमरे से बाहर ले आया।
बेला- क्या है जी, आप आज सुबह-सुबह कैसे आ गए?
रघु- वो दरअसल ये जो किसन बाबू हैं.. पास के गाँव में रहते हैं। इनका एक बेटा है.. सुभाष नाम है उसका, उसने कहीं पर हमारी बेटी बिंदया को देख लिया होगा, अब वो बिंदया से शादी करना चाहता है, घर-बार भी अच्छा है.. ज़मीन जायदाद भी है, अब तुम बोलो क्या कहती हो?
रघु की बात सुन कर बेला कुछ देर के लिए सोच में पड़ गई, पर घर आए इतने अच्छे रिश्ते को ठुकराना नहीं चाहती थी।
‘जी मुझे तो कोई हरज नहीं है, अगर घर-बार अच्छा है तो रिश्ता तय कर देते हैं.. लेकिन इनकी कोई माँग तो नहीं है?’
रघु- अरे किसन भाई साहब बहुत अच्छे हैं। उन्होंने कहा है कि वो हमारी छोरी को दो कपड़ों में भी अपने बेटे के साथ ब्याह कर ले जाएंगे।
बेला- ये तो बहुत अच्छी बात है.. आप जल्दी से रिश्ता पक्का कर दीजिए।
दूसरी तरफ सोनू नदी की तरफ बढ़ रहा था।
आज उसके चेहरे पर अलग ही मुस्कान थी.. वो अपनी ही धुन में नदी की तरफ बढ़ रहा था, थोड़ी दूर चलने पर अचानक से उसका ध्यान किसी लड़की के हँसने की आवाज़ की ओर गया।
उसे ये आवाज़ कुछ जानी-पहचानी सी लगी.. एक पल के सोनू के कदम मानो जैसे रुक गए हों। गन्ने के खेतों के बीच दो लड़कियों के हँसने की आवाज़ आ रही थी.. थोड़ी देर बाद वो आवाज़ नज़दीक आने लगी और एकाएक बेला की बेटी बिंदया.. अपने पड़ोस में रहने वाली लड़की के साथ खेत से बाहर आई.. दोनों की नजरें आपस में टकरा गईं।
सोनू को देखते ही बिंदया के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई।
बदले में सोनू ने भी उसकी तरफ मुस्करा कर देखा, तो बिंदया ने शर्मा कर अपने सर को झुका लिया और आगे बढ़ने लगी।
शौच के बाद जब सोनू घर पहुँचा तो आज उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वो इस आलीशान घर का नौकर ना होकर मालिक हो।
जब वो घर पहुँचा तो रजनी रसोई में खाना बना रही थी।
रजनी को खाना बनाते देख सोनू ने रजनी से पूछा।
सोनू- मालकिन आज आप खाना क्यों बना रही हैं? बेला काकी नहीं आई क्या?
रजनी (खाना बनाते हुए)- आई थी.. पर आज उसकी लड़की को देखने वाले आए हुए थे.. इसलिए बोल कर चली गई, अब शाम को ही आएगी।
सोनू (थोड़ा निराश होते हुए)- ओह्ह अच्छा।
रजनी- जा मुँह-हाथ धो ले.. मैं खाना लगा देती हूँ।
सोनू पीछे जाकर हाथ-मुँह धोने लगा। जब वो हाथ-मुँह धो कर आगे आया तो रजनी रसोई में नहीं थी, सोनू रजनी के कमरे में गया, जहाँ पर रजनी आईने के सामने खड़ी होकर अपने आप को संवार रही थी।
आईने में सोनू के अक्स को देख कर रजनी के होंठों पर कातिल मुस्कान फ़ैल गई- क्या देख रहे हो?
रजनी ने मुस्कुराते हुए अपने बालों को संवारते हुए पूछा।
सोनू- जी वो कुछ नहीं.. मैं तो खाना के लिए आया था।
रजनी- उम्मह अच्छा रुक ज़रा मैं अपने बालों को बाँध लूँ।
सोनू वहीं खड़ा होकर रजनी को सँवरते हुए देखने लगा। रजनी भी बार-बार आईने में से सोनू की तरफ देख रही थी।
‘मालकिन एक बात बोलूँ.. अगर आप बुरा ना माने तो।’
रजनी ने पीछे मुड़ कर सोनू की तरफ देखा।
रजनी- हाँ.. बोल ना मेरी जान।
सोनू- मालकिन आज आप ये बाल खुले रहने दीजिए।
रजनी (सोनू की बात सुन कर रजनी के होंठों पर मुस्कान और फ़ैल गई)- क्यों बँधे हुए बाल अच्छे नहीं लगते?
सोनू- नहीं वो बात नहीं है.. बस आप इन खुले हुए बालों में बहुत खूबसूरत लग रही हो।
रजनी उठ कर खड़ी हो गई और सोनू के पास आकर उसके गले में अपनी बाँहें डालती हुई बोली- अब तुमने कहा है.. तो चल आज बाल खुले छोड़ देती हूँ।
रजनी ने नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी, नीले रंग की साड़ी और ब्लाउज उसके ऊपर बहुत जंच रहा था।
सोनू को भी पता नहीं चला, कब उसके हाथ रजनी की कमर पर आ गए।
दोनों की गरम साँसें एक-दूसरे के होंठों से टकराने लगीं। जिसे महसूस करके रजनी के होंठ काँपने लगे, सोनू ने अपने होंठों को रजनी के रसीले होंठों पर रख दिया और उसके होंठों को ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा।
रजनी भी अपना आपा खोते हुए उससे एकदम से चिपक गई, सोनू अपने हाथों से उसकी कमर को सहलाते हुए उसके चूतड़ों पर पहुँच गया और साड़ी के ऊपर से उसके चूतड़ों को मसलने लगा।
दोनों एक-दूसरे से ऐसे चिपके हुए थे, मानो जैसे उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता.. पर तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
रजनी ने अपने होंठों को सोनू के होंठों से अलग किया और मुस्कुराते हुए बोली- चलो बाहर कोई आया है.. रजनी ने बाहर दरवाजे के पास जाकर दरवाजा खोला तो बाहर कान्ति खड़ी थी।
उसे देखते ही रजनी का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा।
‘अरे चाची जी आप आईए ना..’ रजनी ने अपने होंठों पर झूठी मुस्कान लाते हुए कहा।
कान्ति के अन्दर आने के बाद रजनी ने दरवाजा बंद किया।
कान्ति (अन्दर आकर पलंग पर बैठते हुए)- और बहू क्या कर रही थी?
रजनी- वो चाची.. खाना बनाया है अभी.. और इसको खाना देने वाली थी।
रजनी ने सोनू की तरफ इशारा करते हुए कहा जो कि कान्ति के सामने नीचे चटाई पर बैठा हुआ था।
कान्ति- क्यों आज वो मरी बेला नहीं आई क्या?
रजनी- नहीं चाची जी… आज उसके घर में कोई आया हुआ था।
कान्ति- अच्छा ठीक है।
रजनी- चाची जी आप भी खाना खायेंगी?
कान्ति- हाँ.. बहू जा मेरे लिए भी ले आ।
रजनी रसोई में गई और सोनू और कान्ति के लिए खाना परोस कर ले आई।
खाना खाने के बाद सोनू पीछे अपने कमरे में चला गया।
रात को ठीक से ना सोने के कारण सोनू को लेटते ही नींद आ गई।
दोपहर को जब सोनू उठ कर अपने कमरे से बाहर आया तो उसने देखा कि रजनी और बेला आपस में कुछ बात कर रही थीं और बेला का चेहरा भी रजनी की तरह से खिला हुआ था।
रजनी थोड़ी देर बात करने के बाद आगे चली गई और सोनू कुएं के पास आ गया, जहाँ पर बेला पानी निकाल रही थी।
‘क्या बात है काकी.. आज बहुत खुश नज़र आ रही हो?’
सोनू बेला के पास जाकर कहा।
बेला (सोनू की तरफ मुस्करा कर देखते हुए)- अरे सोनू आ ना.. आज एक खुशखबरी है।
सोनू- अच्छा बताओ हमें भी तो पता चले।
बेला- वो बिंदया का रिश्ता पक्का हो गया है।
सोनू बेला की बात सुन कर थोड़ा सा निराश हो गया।
‘अच्छा.. पर अचानक से कैसे?’
बेला- अब क्या करते.. इतना अच्छा रिश्ता आया था कि मना ही ना कर सके और वैसे भी बेटी माँ-बाप के सर पर बोझ होती है.. जितनी जल्दी शादी हो जाए, हम गंगा नहा आएँ।
सोनू- ओह्ह ठीक है.. वैसे बेटी की शादी कब करवा रही हो?
बेला- 3 दिन में ही बेला की शादी करवा देंगे।
सोनू- अच्छा ठीक है, मैं आगे जाकर मालकिन से पूछ लेता हूँ कि कोई काम तो नहीं है।
बेला (सोनू को पीछे से आवाज़ लगाते हुए) हाँ.. सेठ जी भी आ गए हैं। तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे कि कहीं नज़र नहीं आ रहा।
सोनू घर के आगे की तरफ आ गया, पर चन्डीमल दुकान पर जा चुका था, दीपा और सीमा अपने-अपने कमरों में आराम कर रही थीं और रजनी रसोई में चाय बना रही थी।
सोनू रसोई में जाकर रजनी के पीछे खड़ा हो गया।
जब रजनी को अपने पीछे से क़दमों की आहट हुई, तो रजनी ने पीछे मुड़ कर सोनू की तरफ देखा और रजनी के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई।
‘उठ गए जनाब..’ रजनी ने आगे की तरफ मुँह करते हुए कहा।
सोनू- हाँ.. वो बाबू जी कब आए।
रजनी- आए थे चले गए दुकान पर और बाकी अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे हैं।
सोनू ने आगे बढ़ कर रजनी को पीछे से बाँहों में भर लिया और उसकी पीठ के खुले हुए हिस्से पर अपने होंठों को रख दिया।
‘आह क्या कर रहा है.. सभी घर में हैं।’
रजनी ने कसमसाते हुए कहा। सोनू ने अपने हाथों को ऊपर ले जाकर रजनी की चूचियों को हाथों में भर कर मसल दिया।
‘आह छोड़ ना.. क्या कर रहा है.. किसी ने देख लिया तो।’
सोनू- पर फिर कब करने दोगी?
रजनी (सोनू के पीछे हटाते हुए)- अरे दो दिन सबर रख.. फिर मुझे चाहे सारा दिन अपनी बाँहों में लेकर रहना.. ठीक..
सोनू- दो दिन.. क्या सेठ जी और बाकी सब फिर से बाहर जाने वाले हैं?
रजनी- नहीं.. वो नहीं.. हम दोनों जाने वाले हैं।
सोनू- हम दोनों.. पर कहाँ?
रजनी- मेरे मायके और तुम्हारे सेठ जी ने कहा कि मैं अकेली नहीं जाऊँगी… तुम भी साथ में चलोगे.. मेरा सामान उठाने के लिए।
रजनी ने मुस्कुराते हुए सोनू को देखने लगी।
सोनू भी रजनी को मस्त निगाहों से देखने लगा।
‘अच्छा अब बाहर जाओ.. मैं दीपा और सीमा को चाय देने जा रही हूँ। अब परसों तक मेरे पास भी ना फटकना.. नहीं तो किसी को शक हो जाएगा।’
सोनू रसोई से बाहर आ गया और पीछे बने अपने कमरे में जाने लगा।
पीछे बेला अभी भी कपड़े धो रही थी।
सोनू बिना बेला की ओर ध्यान दिए अपने कमरे में चला गया, बेला को ये बात कुछ रास नहीं आई और वो भी उठ कर सोनू के पीछे उसके कमरे में आ गई।
बेला- अरे सोनू क्या हुआ..? बड़े खोए हुए से हो?
सोनू (एकदम से चौंकते हुए)- कुछ नहीं काकी वो बस थोड़ी तबियत ठीक नहीं है।
बेला (सोनू के माथे पर हाथ लगाकर देखते हुए)- बुखार तो नहीं है.. कहीं आज कल मालकिन तुमसे कुछ ज्यादा ‘काम’ तो नहीं करवा रही है ना?
बेला ने आँख नचाते हुए कहा।
सोनू- नहीं वो बात नहीं, वो कल रात जब बारिश हो रही थी। तब पेशाब करने के लिए बाहर गया तो भीग गया था।
बेला- ओह्ह.. अच्छा, लो मैं अभी तुम्हारी तबियत रंगीन कर देती हूँ।
ये कह कर बेला सोनू के सामने पलंग पर बैठ गई और सोनू के पजामे के नाड़े को खोल कर सरका दिया।
जैसे ही सोनू का लण्ड पजामे के क़ैद से बाहर आया, बेला ने उसे अपनी मुठ्ठी में भर लिया।
‘ये क्या कर रही है काकी? कहीं मालकिन आ गई तो?’
बेला- अरे तो चुप रह कर मज़ा ले ना.. वो नहीं आएगी। वैसे भी तेरे इस मूसल लण्ड का स्वाद कब से नहीं चखा।
बेला ने सोनू के मोटे लण्ड को देखते हुए कहा और फिर एकदम से झुक कर उसके लण्ड के सुपारे को मुँह में भर लिया और अपनी जीभ की नोक से उसके लण्ड के सुपारे को कुरेदने लगी।
सोनू का बदन बुरी तरह काँप गया.. मस्ती की लहर उसके पूरे बदन में दौड़ गई।
‘वाह मजा आ गया, तेरे लण्ड का स्वाद चख कर…’ बेला के सोनू लण्ड को मुँह से निकाल कर सोनू की ओर देखते हुए कहा और फिर से उसके लण्ड को मुँह में भर कर चूसने लगी।
सोनू अपनी अधखुली आँखों से बेला की तरफ देख रहा था और उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि बेला उसके मोटे और लंबे लण्ड को आधे से ज्यादा मुँह में भर कर चूस रही है।
बेला तेज़ी से अपने सर को आगे-पीछे हिलाते हुए, सोनू के लण्ड को मुँह के अन्दर-बाहर कर रही थी और सोनू भी बेला के सर को दोनों हाथों से पकड़े हुए… अपनी कमर को हिलाते हुए अपने लण्ड को चुसवा रहा था।
‘ओह्ह काकी मेरा पानी ओह्ह… निकलने वाला है.. ओह्ह और ज़ोर से चूस्स्स साली आह्ह.. अह.. और अन्दर ले..’
बेला ने करीब 5 मिनट तक सोनू के लण्ड को बिना रुके हुए चूसा और सोनू के लण्ड ने उसके मुँह में अपने वीर्य की बौछार कर दी।
सोनू के पानी की एक भी बूँद उसने बाहर नहीं गिरने दी।
थोड़ी देर बाद जब सोनू की साँस सामान्य हुई, तो उसने बेला की तरफ देखा।
सोनू- अरे काकी… आप ‘वो’ पी गईं?
बेला- हाँ.. और इसमें क्या बुराई है.. तेरे लण्ड का पानी तो मेरे लिए अमृत है।
ये कह कर उसने सोनू के लण्ड को अपनी साड़ी के पल्लू से पौंछा और सोनू ने अपने पजामा ऊपर करके बाँध लिया।
‘तू भी आएगा ना.. मेरी बेटी की शादी में?’
बेला ने सोनू की तरफ देखते हुए पूछा।
अब सोनू उससे क्या कहता.. पर उसने बेला का मन रखने के लिए उससे ‘हाँ’ कह दिया।
रात के वक़्त की बात थी, सोनू खाना खाने के बाद अपने कमरे की तरफ जा रहा था कि चन्डीमल ने उससे पीछे से आवाज़ लगा दी, ‘अरे ओ सोनू ज़रा सुन तो।’
सोनू- जी सेठ जी।
चन्डीमल- बेटा.. तू कल अपनी बड़ी मालकिन के साथ उसके मायके जा रहा है, ठीक से तैयारी कर ले, वहाँ तुझे 7-8 दिन तक रहना पड़ सकता है।
सोनू- जी सेठ जी।
चन्डीमल- अच्छा ठीक है, अब तू जा.. तैयारी कर ले। कल सुबह तुझे निकालना होगा।
चन्डीमल की बात सुनने के बाद सोनू पीछे अपने कमरा में आ गया।
आज सोनू के मन में ढेरों सवाल थे.. आख़िर रजनी के मायके में भी तो लोग होंगे।
फिर मालकिन ने कैसे कह दिया कि वो सारा दिन मुझसे चुदवाएगी।
क्या ऐसा सच मैं हो सकता है?
अगली सुबह जब बेला सेठ चन्डीमल के घर पहुँचती है, तो सेठ के घर के बाहर तांगा खड़ा देख कुछ सोच में पड़ जाती है।
‘आज इतनी सुबह-सुबह कौन आ गया सेठ जी के घर…?’ ये बोलते हुए बेला सेठ के घर के अन्दर दाखिल होती है।
जैसे ही वो घर के आँगन में पहुँचती है, तो रजनी अपने बैगों के साथ तैयार खड़ी हुई दिखती है।
बेला- आप कहीं जा रही है मालकिन?
रजनी- हाँ.. वो मैं मायके जा रही हूँ।
बेला- अचानक से कैसे और अकेली जा रही हैं क्या?
रजनी (अपने होंठों पर घमंड से मुस्कान लाते हुए)- नहीं तो.. सोनू भी साथ जा रहा है।
बेला ने एकदम से चौंकते हुए पूछा- क्या.. सोनू?
रजनी- हाँ.. वो 7-8 दिन के लिए जा रही हूँ ना… तो सामान थोड़ा ज्यादा है। इसलिए सोनू साथ में जा रही हूँ।
बेला अपने मन में सोचती है कि साली छिनाल की चूत में ज़रूर खुजली हो रही होगी।
‘अच्छा वैसे सोनू भी 8 दिन रहेगा?’
रजनी- हाँ क्यों… तुम्हें कोई परेशानी है?
रजनी बेला को आँखें दिखाते हुए बोली।
बेला घबराते हुए बोली- नहीं मालकिन.. आप ऐसा क्यों सोच रही हैं?
बेला बिना कुछ बोले रसोई में चली गई।
उसके बाद सोनू ने अपना और रजनी का सारा सामान उठा कर तांगे में रख और खुद तांगे में आगे की तरफ बैठ गया और रजनी तांगे के पीछे की तरफ बैठ गई।
रजनी के मायके का गाँव उनके गाँव से कोई 3 घंटे के दूरी पर था.. उस जमाने में बस या और कोई साधन नहीं हुआ करता था क्योंकि एक गाँव से दूसरे गाँव तक लोग तांगे में ही सफ़र किया करते थे और जो लोग ग़रीब थे, वो तो इतना लंबा सफ़र भी पैदल चल कर ही करते थे।
दोपहर हो चुकी थी, तांगे वाला भी चन्डीमल के गाँव से ही था।
इसलिए रजनी और सोनू के बीच में पूरे रास्ते कुछ ज्यादा बातचीत नहीं हुई थी।
जब वो रजनी के मायके पहुँचे तो उनका स्वागत रजनी की माँ, भाई और भाभी ने किया।
तीनों रजनी को देख कर बहुत खुश थे, वो सोनू और रजनी को घर के अन्दर ले आए और रजनी को उसकी माँ ने अपने साथ पलंग पर बैठा लिया और अपनी बहू रेशमा को सोनू और रजनी के लिए चाय नास्ता लाने के लिए कहा। रमेश रजनी का भाई भी उनके साथ बैठ गया।
जया (रजनी की माँ)- और बेटी कैसी हो? आख़िर तुम्हें अपनी माँ की याद आ ही गई।
रमेश- हाँ दीदी.. आज आप बहुत समय बाद आई हो, आप तो जैसे हमें भूल ही गईं।
रजनी (मुस्कुराते हुए)- नहीं माँ.. ऐसी कोई बात नहीं है.. वो दरअसल इनको (चन्डीमल) काम से फ़ुर्सत नहीं मिलती और आप तो जानती ही हो, वो मुझे अकेले कहीं नहीं भेजते।