लॉकडाउन में मेरा परिवार

 

 लॉकडाउन में मेरा परिवार

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 परिचय:

 मेरा गांव मध्य प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों के जंगल के बीच बसा है।  गांव छोटा सा है और गांव में यही कोई 20 घर है और आबादी 120 के आस पास होगी।

 कृषि और पशुपालन गांव के लोगों का मुख्य पेशा है।  जो लोग मेहंदी करते हैं, वैसा परिवार सुखी संपन्न हैं।  कुछ लोग अपने बच्चन को निकत के शहरों में पढ़ने आते हैं।  वैसा ही बच्चन में एक मैं हूं, जो प्राथमिक शिक्षा के खराब हाई स्कूल की पढाई के लिए गांव से दूर शहर में रहा।  मेरा नाम राहुल है और समय 21 साल का है।  क्या समय मैं ग्रेजुएशन कर लिया हूं।

 

 आगे बढ़ने से पहले मेरे परिवार का परिचय जान लेते हैं।  मेरे घर में 3 लोग ही हैं।

 1. राहुल (मुख्य) – 21 साल।

 2. बिकास (मेरे पिताजी) – 42 साल।

 3. बिमला (मेरी मां) – 46 साल

 मेरी माता जी मेरे पिताजी से बड़ी हैं।  क्यों पिताजी ने अपनी भाभी से शादी किया था।  मेरे पिताजी के बड़े भाई की आकस्मिक मृत्यु के बाद उन्हें अपनी भाभी से शादी करना पड़ा।

 

 मेरे खंडन में 3 परिवार हैं।  थिनो परिवार मिल जुलकर कृषि एवम पशुपालन का कार्य करता है, लेकिन घर अलग है और चुल्हा भी अलग जलता है।  खानदान के अन्य सदस्य हैं:

 4. राकेश – पिताजी के बड़े भाई – 51 साल।

 5. अमृता – राकेश ताउजी की बीबी – 50 साल।

 6. संध्या – पिताजी की दीदी (मेरी बुवा) – 48 साल

 7. मोहन – मेरे चाचा (पिताजी से छोटे) – 40 साल।

 8. रेखा – मेरी चाची (मोहन की बीबी) – 36 साल।

 9. कंगना – बड़े ताऊ की बेटी – 26 साल।

 10. बिक्रम – संध्या बुवा के पति – 60 साल

 11. बिजय – कंगना का पति (मेरे जीजा) – 31 साल

 

 हमारा घर गांव की मुख्य भिड़ से करीब 300 मीटर की दूर पर है।  3 घर एक जग पर हैं।  घर के पास आम, कटहल, इमली के पेड़ हैं।  सारे घरों के दरवाजे बिच के बड़े आंगन की या खुलते हैं।

 मेरी माताजी पहले जिन्की पत्नी पतली वे खंडन में सबसे बड़े भाई थे।  मेरी मां से शादी के 5 साल बाद वे ब्यूलाड ही स्वर्ग सिद्ध गए।  राकेश ताऊजी और मेरे पिताजी किसान हैं।  गांव में खेती बारी का काम सम्भलते हैं।  लेकिन मेरे चाचाजी एक शिक्षक हैं, और वे गांव से 20 किमी दूर शहर में एक स्कूल में पढ़ते हैं।  वे वही रहते हैं।  रेखा चाची भी उनके साथ ही रहती हैं।  वे महिन में 2-3 बार सप्ताहांत में और स्कूल के छुटियों के समय गांव जया कटे हैं।

 

 दसरे कहानियों के संरक्षक / अध्यायों की तरह मेरे खंडन के मर्द किसी हीरो की तरह नहीं दिखते हैं, और ना ही उनका लुंड दसरे कहानियां के मर्दों की तरह 9-10” लंबा है।  मेरे खंडन की महिलायें भी स्वर्ग की अप्सराओं या फिल्मी हीरोइन की तरह गोरी चिकनी नहीं हैं।  सभी साधरण ही देखते हैं।  गांव के प्रधान मुक्त वतावरन में रहने, अपने खेत की सब्जियां खाने और खेत खलिहान में मेहंदी करते रहने के करन सब लोग 40-50 की उमर में भी स्वस्थ हैं।

 मैं भी एथलेटिक बॉडी वाला हूं।  फुटबाल खेलता हूं, स्विमिंग जनता हूं।  कद 5’6″ हाय है।  पिताजी भी 5’4” के हैं, ताऊजी भी करीब उतने ही अच्छे हैं।  शरिर में चार्बी नहीं है।  मोहन चाचा शिक्षक हैं, तो उनका होना बेहतर लगता है।  उनकी हाइट भी 5’5” जैसा होगा।

 अमृता ताई और बिमला माँ 5’1″ जैसी ऊँची होगी।  मेरी मां बिमला और अमृता ताई का वजन नियमन में है।  अमृता ताई सांवली हैं।  बिमला (मां) गेहुंवे रंग की।  रेखा चाची इंटर तक पढाई की हैं।  गोरी है और अच्छी तरह से तैयार रहती है।  वे शहर में रहती हैं, इसिलिए थोड़ा वजन बढ़ा हुआ है।  5’2” हाइट होगी, लेकिन वजन 70 किलो आस पास होगा।

 साड़ी महिलायें साड़ी पहेली हैं।  गांव की महिला की तरह ही सीधी-सादी जीवन शैली है उनकी।  गांव की लड़कियों और महिलाओं में प्रकृति सुंदर रहती है।  बिना मेकअप के भी वे सुंदर लगती हैं।

 

 संध्या बुवा थिगनी है, 4’10” ऊंची होगी।  सांवली भी है।  वे भी अपनी ऊंचाई के हसब से मोती लगती हैं।  उसकी शादी पास के गांव में हुई है।  बड़े ताऊजी की बेटी कंगना मुझसे बड़ी है।  उसकी शादी हो चुकी है।  मोहन चाचा का 1 बेटा 10 साल का है और वो अपने पिताजी के स्कूल में चौथी कक्षा में पाता है और 1 बेटी 2 साल की है।  अमृता ताई और मां खेतो में काम करती हैं।  लेकिन चाची खेतों पर ज्यादा नहीं जाति है।  घर के काम पे ही उलटी रहती है।

 

 क्योंकी मैं 12 साल की उमर से दूर शहर में पद था, और गांव सिरफ छुटियों में आता था।  इसिलिए मुझे गांव के बारे ज्यादा पता नहीं था।  हाई स्कूल कम्पलीट करते करते मुझे कफी बदला आया और मुझे भी सेक्स की तरफ झुक आने लगा था।  लड़की अच्छी लगने लगी, उन्हें निहारने की आदत शुरू हो गई।  हमें समय उमरा 15-16 की राही।  मुठ मारने की शुरुआत हो चुकी थी और दिन में 2-3 बार मुठ मारने लगा।  हलत ऐसे हो गई की बिना मुथ मारे निंद नहीं आती थी और जब सुबह उठा तो लुंड खड़ा मिला था और मुथ मारकर ही उठा था।

 गांव जटा तो ज्‍यादातर समय घर पे ही बिटी थी।  कभी कभी गांव के लड़कों के साथ बेल बकरी चरण जाता था।  ताऊजी, पिताजी और चाचाजी के साथ पहाड़ियां को काटकर बने खेत में काम करने जाता था।  सब कुछ ठीक लगता था।

 

 पिचले साल 2020 मार्च में कोरोना के करन लॉक डाउन हुआ।  लॉकडाउन से बस पहले मैं गांव चला गया था।  क्योंकी क्लास बैंड हो गए थे।  गांव में कोरोना का डर नहीं था।  गरमी की शुरुआत हो चुकी थी।  मैं गांव के लड़कों के साथ गांव से होकर गुजराती एक छोटी नदी में नहीं जाने जाता था।  घर में बाथरूम नहीं है तो सभी नदी में ही नहीं जाने जाते हैं।

 वहां गांव के लड़के तारः की बातें करते हैं।  उनके साथ 2-4 दिन रहने के बाद पता चला की मेरे गांव का महल कितना उन्मुक्त है।  वे अक्सर लड़कियों की बातें करते हैं।  किस लड़के का पड़ौसी गांव की किस लड़की से चक्कर चल रहा है, किस किसको छोड़ा, यही बात होती थी।  मैं चुपचप उनकी बातें सुनता था।

 

 हमारे कुछ खेत गांव से 2-3 किमी दूर पहाड़ियों के बीच की घाटी में भी हैं।  उन खेतों में गरमी में भी पानी रहता है।  बरसात से पहले उन खेतों को जोतकर रखा जाता है।  खेतों की मरम्मत की जाति है।  उधार बहुत कम लोग जाते हैं।  अप्रैल में एक दिन सुबाह को राकेश ताउजी और पिताजी हाल खेतो में काम करने उन खेतो की या चले गए।  1 घंटे बाद मेरी माँ विमला और बड़ी ताई अमृता भी खाना लेकर खेतो की या चले गए।

 तब तक मैं भी नदी से नाहकार घर आया था।  उसके बाद मैं क्या करता!  मैंने सोचा, की बहुत दिन से जंगल के बीच के खेत को देखा नहीं।  इसिलिए मैं घर से निकला और उन खेतों की या चला गया, जहां मेरे ताऊ, पिताजी, मां और ताई काम करने गए हुए थे।

 जंगल में पिता जी और ताई जी:

 गांव से करीब 2 किमी दूर पहुंचा तो रास्ते के पास घनी झडिय़ों से किसी महिला की खिलखिलाने की आवाज आई।  मैं चौंका की सुनसान जंगल में कौन महिला है तारह ​​हंस रही है।

 मैं रुखा, और जिधर से आजा आई उधार देखने लगा।  थोड़ी देर बाद एक मर्द की आवाज आई, “आह, ऐसा ही चूसो भाभी, बड़ा माजा आ रहा है !!”  मैं हेयरन रहा गया, “यार, कौन यहां हो सकता है और ये क्या चक्कर है !!”

 मैं रुखकर सुन्ने लगा, उधार और आवाज आई, “ज़रा धीरे धीरे चुसिये भाभी, नहीं तो आपके मैं में ही झड़ जाउंगा।”

 मैं दबे पंव, झड़ियों को बिना हिलाए आवाज की दिशा में जाने लगा।  करीब 15 कदम दूर झडिय़ों में जाने पर जो मैंने देखा, मैं हेयरन रहा गया।  मैने देखा की झड़ियां के बिच एक बड़े छायादार पेड़ के आला मेरे पिताजी और अमृता ताई।  जमीं पर लुंगी बिचाया हुआ था और उसपर मेरे पिताजी एकदम नंगे लेटे हुए थे।  अमृता ताई की साड़ी पेड़ के तने के पास राखी हुई थी।  वे सिर्फ पेटीकोट में थी।  ब्लौज के बटन भी खुले हुए थे।  अमृता पिताजी के जोड़ी के बिच बैठककर पिताजी के लुंड को चुस रही थी।  पिताजी उनकी चुचियों को सहला रहे थे।

 “भाभी, बहुत मजा आ रहा है।”

 “हां रे, मुझे भी तुम्हारा लुंड अच्छा लग रहा है।  ऐसा लग रहा है, जैसे मैं कोई रसदार फल चुस रही हूं।”

 पिताजी का लुंड किसी बेंट की तरह कड़क दिख रहा था।  लुंड यही कोई 6 ”लंबा रहा होगा।  मैं झडिय़ों के बीच छिपा था, जहां से मैं उन देख तो सकता था, लेकिन वे मुझे नहीं देख सकते।

 थोड़ी देर बाद पिताजी उठे।  उन्होन ताई जी को भी उठा।  अमृता पेटीकोट में कमल की सुंदर लग रही पतली।  थोड़ी देर में पिताजी ने अमृता का पेटीकोट का नाडा खोल दिया, जिस पेटीकोट जमीन पर गिर गया।  पेटीकोट के खुलते ही अमृता ताई बिलकुल नंगी मेरे पिताजी के सामने थी।  उनकी छुट झंटों से भारी थी।  उनके चुतड़ सांवले लेकिन चिकने द.  उन्को देखे मेरी हलत खराब हो गई थी।  जिंदगी में पहली बार कोई औरत एकदम नंगी देखा था।

 थोड़ी देर में मेरे पिताजी ने ताई जी को अपनी या खिंचा और जोर से जकड लिया।  ताई जी ने भी उन्हें कास के झकझड़ लिया।  वे ऐसे ही 1 मिनट जैसे रहे।  शायद वे एक दसरे की शरिर की गरमी महसूस कर रहे थे।  फिर थोड़ी देर में अमृता में पिताजी के मस्तक को चुमा।  जवाब में पिताजी ने भी ताई जो चुमा, गैलन को चुमा, कानूनों को चुमा, और मैं में जीब दलकर चाची के जीवन को चुना लगे।  उनके हाथ ताई जी चुदाद को सहला रहे थे।  इधर चाची भी पिताजी के चुदाद को सहलाने लगी।

 थोड़ी देर बाद पिताजी ताई जी की गार्डन को चुम्ते हुए, दोनो चुचियों को चुनने लगे।  फ़िर आला आया।  नाभी पे जीभ घुमाकर ताई जी को गुडगुडी करने लगे।  चाची खिलखिलाने लगे, “हाय हाय हाय … बिकास, गुडगुड़ी हो रही है।”  उसके बाद पिताजी ताई जी के सामने बैठककर झांठों को सहलाने लगे।  फिर अमृता की बुर में उनगली से दलकर और बाहर करने लगे।  फिर उसे ताई को लिखा और उसे बुर में जिभ डालकर चटने लगे।  चाची आसमान की या चेहरा कर आंख बंद कर ली, मनो उन्हे स्वर्ग की अनुभूति हो रही हो।

 3-4 मिनट ऐसे चुत चटवाने के बाद ताई जी बोली, “देवर जी, अब बरदस्त नहीं होता, अब अपने लुंड से छोडिये।”

 पिताजी ताई के टंगों के बिच आकार, अपने लुंड को ताई जी छुट से लगा और धीरे-धीरे उसपर डबव डालने लगे।  पिताजी का लुंड देखते देखते ताई जी की झंझट भरी छुट में समा गई।  पिताजी धीरे उन्हें चोदने लगे।  ताई जी मस्त होकर आंखें बंद कर चुदाई का आनंद लेने लगी।  4-5 मिनट हौले हौले चोदने के बाद पिताजी ने लुंड निकला और ताई जी बुर के सफेद पदार्थ से होने वाले लुंड को ताई जी के मुंह पे दाल दिया।  ताई जी बड़े प्यार से अपनी ही चुत के रस से साने लुंड को चुनने लगी।  उस समय पिताजी चेहरा ऊपर करके आंख बंद किए थे, जैसे हम अक्सर मुथ मरते समय करते हैं।

 उसके बाद पिताजी आला गड्ढे के बाल ले गए।  चाची अब पिताजी की तरफ मुंह करके लुंड पर बैठ गई और धीरे-धीरे अपनी चुतद को ऊपर आला करने लगी।  3-4 मिनट इसी तरह चुदाई चलती रही।  थोड़ी देर बाद पिताजी पद्माशन की मुद्रा में बैठे और ताई जी उनके लुंड पर दुबारा बैठा कर उनसे लिपट गई।  उनके जीवन एक दसरे की जीब को चुस रहे थे।  इसी मुद्रा में कुछ डर रहने के बाद दोनो उठे और ताई जी झुक गई।  पिताजी उनके पिचे आकार अपना लुंड चाची के चुत में पल दिया।  धीरे धीरे उन्हें चोदने लगे।  उसके बाद वे तेजी से हिलने लगे।  2-3 मिनट बाद उनने अपनी बाद में बड़ी थी।  वे पासिन से लठपथ होने लगे।  चिडिय़ों के चाहने की आवाज़ के बिच जंगों और चुतद के तकराने से “थाप थाप” की आवाज़ आ रही थी।

 अपनी स्पीड बढ़ाने के साथ साथ पिताजी ने कहा, “भाभी ….. भाभी … आहा … भाभी … आप बहुत मस्त हैं … बहुत मजा आ रहा है … आह्ह्ह्ह … मेरा निकलने वाला है।  आआह भाभीइइइइइ।”

 उसके बाद अचानक उनकी पिताजी शांत पद गए और ताई जी के ऊपर शांत पढ़ गए।  मैं समझ गया की पिताजी ताई जी की छुट में झड़ गए।

 उसके बाद पिताजी ने ताई के ऊपर से हट कर आला बैठे गए।  उसका लुंड बर के रस से सना हुआ था।  ताई ने अपने बुर को अपने हाथ से चियर के देखा और कहा, “देवर जी, तुमने मेरी छुट को पूरी तरह भर दिया।”  और वे पिताजी के मुरझाए लुंड को चुनने लगी।

 

 ये दृश्य देख मेरी हलत बहुत खराब हो गई थी।  लुंड पूरी तरह टनक गया था।  मैं चुपचप झड़ियां से बहार आया और खेतो की या चल दिया।  ताई और पिताजी की वाह चुदाई करीब 30 मिनट तो चली होगी।

 लेकिन उस चुदाई ने मेरे दिमाग में उथल पुथल मचा दिया।  जो देखा वो बड़ा अजीब था।  लेकिन एक सुखद दृश्य भी था।  देवर भाभी की चुदाई के किस सुना था।  लेकिन ये मेरे घर में भी होता है, ये मैंने देखा भी लिया।

 झरने में मां और ताऊ:

 याही सोचते सोचते मैं जंगलों के बिच के अपने खेत तक पांच गया।  तब तक करीब 10 बज रहे थे।  हाल खिनचने वाले अपने जमानत खेत के पास पेड़ के आला लंबी रसियों से बंधे मिले।  लेकिन वहां मेरी मां और राकेश ताऊजी भी नहीं दिख रहे हैं।  मैंने सोचा शायद वे घर चले गए।  या जंगल की या जलावन की लकड़ी लेन गए होंगे।  उन खेतों से थोड़ी दूर एक झरना था, जहां साल भर पानी रहता है।  मैं हमसे तारफ चला गया।  झरने के पास का चायदार पेड।  वहन पहंचने पर मेरे लिए दसरा आचार्य मेरा इंतजार कर रहा था।

 

 

 वहन देखता, की मेरे ताउजी झरने में नहीं है।  झरना करीब 3-4 फीट गहरा था।  वे कमर तक पानी में।  मेरी माँ झरने के कितने कपड़े धो रही थी।  मैं बालों था की ताउजी मेरी मां के सामने नहीं हैं।  जबकी गांव के सामाजिक नियम के अनुसर जेठ और बहू एक दसरे के सामने नहीं होते हैं।

 मैं दूर से ही झडिय़ों पर चुपकर उनको देखने लगा।  समाज गया, की मेरे पिताजी अगर अपनी भाभी को छोटे होंगे तो मेरे ताऊजी मेरी मां को भी छोड सकते हैं।

 मैं जितनी दूर पर था, उतने से उनकी बातें सुन नहीं सकता था।  मेरी मां ने कपड़े धोना खतम किया।  इतने में ताऊजी बहार निकले।  वे एक छोटा गमछा लपेटे हुए थे।  वे मेरी मां के पास आए और उनको उठाकर झरने के बिच ले गए।  मैं देखता के बाल, क्यों गांव में एक जेठ अपने छोटे भाई की बीबी को छू नहीं सकता हूं।

 मेरी मां की तरफ से कोई विरोध नहीं हुआ।  बाल्की वे हंस रही थी।  झरने के अंदर दों छत्ती तक दुबे हुए थे।  माँ भी कम नहीं पतली।  मेरी मां ने ताऊजी को अपने पास खिचड़ी कर उनसे लिपट गई।  मां के हाथ पानी के अंदर गए, और थोड़ी देर में उनके हाथों में ताउजी का गमछा था।  माँ ने हमें गमचे को किनारे की या फेंक दिया।  मां के हाथ पानी के अंदर थे, शायद वे ताउजी के लुंड सहला रही थी।

 ताऊजी मेरी मां के चुचियों को सहला रहे थे।  थोड़ी देर में ताउजी ने मेरी मां का ब्लाउज हटा दिया।  और किनारे की तरफ फेंक दिया।  मेरी मां ने ब्रा नहीं कहना था।  बड़ा होने के बाद आज पहली बार मां की चुचियां देखा था।

 थोड़ी देर बाद ताउजी ने मां की साड़ी और पेटीकोट भी किनारे की या फेंक दिया।  उसके बाद वे पानी में खेलेंगे।  पानी से एक दसरे को छेड़ने लगे।  पानी मुं में लेकर एक दसरे पे फूंकने लगे।  एक दसरे को जाने लगे।  ऐसे ही 12-15 मिनट खेलते रहे।

 उसके बाद वे बहार निकले।  गेहुंवे रंग की मेरी मां उर्फ ​​हिस्सेदार पानी में भींगा बहुत सेक्सी लग रहा था।  तौजी का लुंड भी तगड़ा ही लग रहा था।  6″ जैसा ही लगा। मेरी मां की बुर भी झंटों भरी पतली। जब वे बहार निकली तो झंटों से पानी तपने लगा। उस उम्र में भी सेक्सी लग रही थी।

 बहार आकार ताऊ जी किनारे राखी पत्थर पे बैठे गए।  मां उनके शरिर पर साबुन लगाकर उन्हें नहलाने लगी।  पीठ को रागद कर नहला रही थी।  उसके बाद ताउजी ने भी मां को सबुन लगाकर नहलाया।  वे दुबारा साथ में ही पानी में घुस गए।  फिर वे पानी में खूब लिपटा चिपी की।  थोड़ी देर में बाद वे बहार निकले।

 ताउजी ने मेरी मां को झरना किनारे एक पत्थर पे लिटाया।  और चुने लगे।  तौजी का लुंड भी झंटों से भरा था।  फिर ताउजी मेरी मां के छुट पे मुंह लगाकर चाटने लगे।  छुट की चुसाई से मेरी मां चटपटा रही थी।  ताऊजी यूं ही 5-6 मिनट बर छटे रहे।  उसके बाद वे मां के चेहरे के पास अपना लुंड लेकर आए।  माँ बड़े प्यार से उनके लुंड को चुस रही थी।  थोड़ी देर लुंड चुस्वाने के बाद ताउजी उठे।  माँ भी उठ गई।  वे दून दुबारा लिपट गए और एक दसरे को चुने लगे।  मैं बालों था की गांव में हूं तारह ​​भी लुंड चुसाई और बुर चाटई होता होगा।  मैं सोचता था, की गांव के लोग सिरफ बर में लुंड दलकर छोटे हैं।

 उसके बाद ताउजी एक पत्थर पे बैठे और मां उसके खड़े लुंड पे बैठा गई।  उसी पोज में ताउजी मां को छोडते रहे।  कभी मां खुद को ऊपर निचे करके चूड़वा रही थी तो कभी ताऊजी आला से उन ढकका मार रहे थे।  कुछ मिनट बाद मां उनके लुंड के ऊपर से हटी और बुर रस से भारी लुंड को दुबारा चुन लागी।  उसके बाद वे आला चट्टान पे चलो गई और अपने जोड़े को घुटनो से मोडकर रख ली।  तौजी उनकी टंगों के बिच बैठा और अपना लुंड मां की छुट में धीरे धीरे डालने लगे।  और फिर उन्हें हौले चोदने लगे।

 वे इसी तरह हौले छोटे रहे।  बिच बिच में लुंड निकल कर बर को चैट लेटे।  इसी तरह 5 मिनट जैसा छोडते रहे।  फिर उन्होन ढाका मारने की स्पीड बड़ा दी।  मैं समझ गया की ताउजी अब झटके वाले हैं।  थोड़ी देर में वे शांत होकर मां के ऊपर ही लेटे रहे।

 

 उसी तरह थोड़ी देर रहने के बाद दोनें उठे और दुबारा झरना के पानी में घुस गए।  और नाहकार निकले और कपड़े पहनने लगे।  उन्हें वही छोड मैं चुपचाप घर की या चल पाड़ा।

 

 दोपहर तक सब घर आ गए थे।  उन देख के लगता नहीं की जंगल में एक बहू अपने जेठ से चुदके आई है और एक भाभी अपने देवर से।  सब कुछ सामान्य लग रहा था।  लेकिन अब मुझे शक होने लगा की घर में और भी कुछ होता रहा है।  पता नहीं, अब मैं भी घर की औरतों को अलग नज़रिये से देखने लगा।  अब मैं घर में होने वाले दसरे संबंध के बारे में सोचने लगा की मेरे खंडन में ऐसा किस था तक हो रहा है।  मैं सोच रहा था की चाची भी अपने जेठ से चुडवती होगी !!  क्या चाचा जी भी मेरी मां और ताई जी को छोटे होंगे।

 

 दोपहर को खाना खाकर मैं थोड़ी देर सो गया।  माँ, ताई जी और चाची जी घर के काम में व्यास हो गई।  मैंने जसुसी करने की देन ली।

 उस दिन शाम को मैं ताऊ जी के साथ बेल बकरीयां चरण गया।  ताऊ जी ने पुछा, “बेटा, क्या कॉलेज में किसी लड़की को पसंद करते हो?”

 मैने कहा, “नहीं ताऊजी।”

 उसे समझौता, “बेटा, ख़ूब मन लगाकर कर पढाई करो।  हम लोग तो नहीं पढ़े पाए।  तुम्हारे दादा जी जब मारे तो मैं और तुम्हारे पिताजी बहुत छोटे छोटे थे।  मैं तो खेतों में उनकी मदद करता था।  तुम्हारे पिताजी थोड़े ही पढ़े पाए।  तुम्हारे चाचा जी उससे ज्यादा पढ़ लिए तो वे मास्टर जी बन गए।  तुम अपने चाचा से भी ज्यादा पढ़ना और उनसे भी बड़ा आदमी बनाना।  और याद ठीक से नहीं पढ़ेगा तो हमारी तरह खेती बड़ी करना पड़ेगा।”

 मैंने कहा, “ठीक है, ताऊजी।”

 उन्होन फिर कहा, “शहर की लड़कियों के चक्कर में नहीं पड़ना।  उसे कुछ हसील नहीं होता।  समय की बरबादी है।  फिर भी ऐसा कुछ है, तो मुझे बताना।”

 मैंने कहा, “नहीं ताऊजी, ऐसा कुछ नहीं है।”

 फिर उसे कहा, “ऐसे जवानी में मजा तो लेना चाहिए।  लेकिन थोड़ा संभलके।  मैंने तो अपने समय बहुत मजा किया था।”

 उनकी बातें सुनकर मुझे थोड़ी हिम्मत हुई, “तौजी कैसा मजा किया?”

 “वाही, लड़कियों के साथ वाले माजे।”

 “कैसी?”

 “मैंने तुम्हारी ताई जी शादी से पहले ख़ूब मजे की।”

 “मतलब शादी से पहले दसरी औरतों के साथ?”

 “हान।”

 फिर उसे बताया की उसे और ताई जी ने भाग कर शादी किया था।  ताई जी पडोसी गांव से हैं, जो मेरे गांव से 4 किमी दूर है।  ताउजी उनसे मिलने रात को जाते थे और ताईजी उनके साथ चुपके से घर से निकल जाती थी।  गांव से बहार खेतो में 1-2 बार माजा करके अपने अपने घर चले जाते हैं।

 मैंने अंजान से बैंकर पुछा, “ताऊजी, ये किस तरह का मजा होता है?”

 तौजी हेयर मेरी तारफ देख रहे थे।  आगे कुछ नहीं बोला।

 पिताजी और रेखा चाची

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 लॉकडाउन से बस पहले रेखा चाची भी छोटी बेटी के साथ गांव आ गई थी।  चाची से कुछ डर बात किया।  उस दिन मां, ताई और चाची ने दूधकर खाना बनाया और हम सब ने एक साथ खाना खाया।  चाची ने बताया की चाचा जी तो शहर में ही रह गए।  लॉकडाउन खतम होते ही गांव आएंगे।  रात को खाना खाने के बाद सभी अपने अपने कामरे में सोने चले गए।  चाची की बेटी को बड़ी ताई अपने साथ सुलाने ले गई।

 मैं अपने कामरे में बिस्तर में लाता था।  गरमी लग रही थी।  मुझे निंद नहीं आ रही थी।  मैंने हवा आने के लिए खिड़की खोल रखा था।  करीब 12 बजे चांद की रोशनी में देखा की कोई रेखा चाची के घर की या जा रहा था।  हमें शक ने लुंगी पहन रखा था।  मैने पचचन लिया का उपयोग करें।  वाह मात्र पिताजी।  उसके दरवाजे हल्के से दस्तक किया।  थोड़ी देर में दरवाजा खुला।  और वो चाची के घर घुस गया।

 मैं भी थोड़ी देर बाद चुपचाप घूमकर रेखा चाची के घर के पिचे की या चला गया।  पिचे तारफ बगीचा था और एक खिड़की थी।  गरमी के करन खिड़की खुला ही रखा गया था।  मैं अंदर देखने की कोशिश करने लगा।

 अंदर से आवाज आ रही थी।

 “बहुत डर कर दिया आपने जेठ जी।”

 पिताजी बोले, “कोई बात नहीं बहू।  मैं ठक गया था।  आपकी जेठानी को छोडकर सो गया था।  थोड़ी देर में आपकी जेठानी बिमला ने उठाकर भेजा है।”

 मैंने अंदर देखने की कोहली की।  अंदर एक सोलर लैंप जल रहा था।

 कामरे में एक तारफ एक खटिया था और दसरी तारफ एक 7’x5′ वाला साधरण पलंग।  बिच में चैटी बिचि हुई थी।  पिताजी और चाची खटिया पर आगल बगल बैठे हुए थे।

 पिताजी बोले, “मेरा मोहन कैसा है?  बड़ा लड़का कैसा है?  लॉकडाउन में उन दोंनों को यहां आना चाहिए था।  क्या महौल में शहर में डर है।  लेकिन कोरोना अभी गण से दूर है।”

 “आप सही कहते हैं।  मैने बाबू के पापा को बोला था।  लेकिन उनको नौकरी वाली जग पर रहने को कहा गया।  शायद कुछ काम रहेगा।  इसिलिए उनको रुकना पढ़ा।”

 थोड़ी देर में चाची उठकर पिताजी की गोदी में बैठ गई।  उसे पिताजी के गले में अपने हाथ फँसा दिए।  पिताजी अपनी बहू के बालो को सहलाने लगे।  सहलाते सहलाते बहू के बंधी हुई बाल को खोल दिए।  फिर उसे रेखा चाची के माथे को प्यार से चुमा।  बड़े प्यार से बहू के गैलन, कानून, गले को चुन लेने लगे।  जब पिताजी चुमते तो चाची अपनी आंख बंद कर लेते हैं।  चाची भी अपने जेठ को चुनने लगी। थोड़ी देर में पिताजी ने चाची के होंठ पर किस किया और जवाब में चाची ने भी पिताजी को किस किया।  थोड़ी देर में उसे चाची का आंचल हटा दिया और ब्लोज के ऊपर से उसे चुचियां सहलाने लगे।  फिर उसे अपने हाथ बहू की पीठ में ले जकार पिचे से ब्लोज के हुक खोल दिए और ब्लौज हटा दिया।

 ब्लौज हटे ही रेखा चाची की बड़ी बड़ी चुचियां बहार आ गए।  सोलर लैंप की रोशनी में रेखा की चुचियां बड़ी मस्त लग रहे थे।  पिताजी चुचियों को चुन लेने लगे, सहले लगे।  पिताजी बोले, “बहू, शरीर को तुम्हीं नहीं कहना आज!”

 “हां जेठ जी गरमी है इसिलिए नहीं कहना।”  कहते हैं रेखा ने भी अपने जेठ का गंजी हटा दिया और उसके छत्ती को सहलाने लगी।  पिताजी उसकी बूब्स को सहला रहे थे।

 कुछ डर में चाची ने पिताजी की लुंगी हटा दिया।  पिताजी चड्डी नहीं कहने द.  लुंगी खोलकर चाची उसका लुंड सहलाने लगी।  चाची के हाथ लगते ही लुंड खड़ा हो गया।  उससे वह खूबसूरत खेलेंगे, लुंड के सुपड़े को आगे पिचे करने लगी।

 पिताजी और रेखा चाची दोंन खड़े हुए।  पिताजी रेखा के सामने बैठे और साड़ी को उठने लगे।  उनकी टंगों पर हाथ परते हुए धीरे-धीरे जांघों तक साड़ी उठा दिए।  वे चाची की टंगों और झंगों को चुनने के लिए लगे।  रेखा उत्तेजना में आंखें बंद कर ली।  थोड़ी देर में पिताजी ने रेखा की सारी खोल दिया और पेटीकोट भी खोल दिया।  उसे अंदर पैंटी नहीं पहना था।  रेखा भी पूरी नंगी हो गई थी।  उस्का गोरा ने सोलर लैंप में चमकने लगा।  उसकी मंसल तगेन बड़ी मस्त लग रहे थे।  उसके बुर में हलके बाल थे।  शायद ट्रिम कार्ति होगी।  अपनी 36 साल की उम्र के हसब से चाची मोती लगती हैं।  पिताजी ने रेखा चाची को खटिया में लिखा।  रेखा के जोड़ी आला जमीन पर और कमर से ऊपर खटिया पर था।  पिताजी उसकी टंगों के बिच बैठा कर रेखा की टंगों को चुम्ने, चटने, सहलाने लगे।  धीरे धीरे जंगों की या बड़े।  और फिर अचानक बुर में जीब घुसकर चाटने लगे।  रेखा बोली, “आह जेठ जी, बड़ा अच्छा लग रहा है।”  वाह पिताजी का सर अपनी बुर में दबने लगी।  पिताजी छप्पर कर बर चटने में लगे हुए थे।

 कुछ डर चुट चटने के बाद पिताजी ऊपर नाभि की या चैटे गए, हमें बिच पिताजी ने एक उनगली रेखा की चुटकी में घुसा दिया और उनगली से गिली हो चुकी बुर को छोडने लगे।  कुछ डर बाद पिताजी खड़े हो गए।  रेखा चाची शायद इसरा समाज गए।  उसे पिताजी के 6” लम्बे लुंड को मैं में लेकर चुनने लगी।

 थोड़ी देर लुंड चुसवाने के बाद पिताजी ने फिर से रेखा को खटिया पर लिटाया और दुबारा उसके बुर को चाट कर जिला कर दिया और अपना लुंड उसके बुर के दरवाजे पर रख दिया।  रेखा ने पिताजी की कमर को पकडकर अपनी तरफ खिंचा जिससे लुंड उसके बुर में घुस गया।  लुंड के बुर में जाते ही पिताजी हौले कमर हिलाने लगे।  पिताजी के हाथ चाची के चुचियों पर और होते चाची के मुंह में।  चाची ने अपने जेठ को अपने में जकड लिया।  उन्हें देख मेरा लुंड भी खड़ा हो चुका था।

 वे डोनों उसी तरह धीरे-धीरे छुडाने करने लगे।  कितना अच्छा दृश्य लग रहा था।  मेरे खंडन में इतना अच्छा प्रेम है।  खानदान की हर औरत हर मर्द से चुदवा रही है।  वाह!  ऐसा सिर्फ अश्लील फिल्म में देखा था.  यहां विशालव में हो रहा था।

 दिन के उजले में जेठ और बहू एक दसरे को छुटे भी नहीं।  एक दशरे का नाम भी नहीं लेते हैं।  लेकिन मेरे घर में ये सब सामाजिक बंदिशें खतम करके प्यार मोहब्बत छुडाई चल रही है।

 कुछ देर उसी तरह चुदाई करने के बाद रेखा बोली, “भैया, रुकिए!”  पिताजी ने अपना लुंड रेखा के बुर से बहार निकला।  रेखा उठी और अपने बुर के रस से लठपथ पिताजी के लुंड को चुनने लगी।  थोडी डेर चुन के बाद रेखा ने पिताजी से कहा, “अब आप आगे लेटे।  मैं आपको चोडुंगी।”  उसे पिताजी को आला छत्ताई पर लिया दिया।  रेखा चाची ने चुदाई से गिली हो चुकी बुर को पिताजी के मुंह पर रख दिया।  पिताजी फिर से चाची की बुर चाटने लगे।  उसी बिच रेखा भी आगे झुक कर पिताजी का लुंड ढोना है चुन लेने लगी।  दोनो को कोई जल्दी नहीं।

 कुछ डेर 69 पोज में मैं चुसा चाट करने के बाद, रेखा घुम गई और पिताजी के लुंड को किली बैंकर उसके ऊपर बैठ गई।  और धीरे धीरे कमर ऊपर निचे करने लगी।  खुली खिड़की ने मुझे बेहद खूबसूरत मंजर देखा दिया।

 एक इंटर पास बहू मिडिल स्कूल वाले जेठ से चूड़ा रही थी।  पिताजी रेखा की चुचियां सहला रहे थे।  रेखा चाची उठी और खटिया के सहे झुक गई।  पिताजी शायद इसरा समाज गए और पिचे से चाची की बुर में लुंड डालकर हौले चोदने लगे।  रेखा बोली, “आह भैया, इसी तरह अहिस्ते किजिये।”

 पिताजी उन्हें धीरे धीरे चोदने लगे।  बिच बिच में एक जोरदार झटका मरते।

 “भैया, आप तो दीदी को छोडके आए हैं, ऐसी जल्दी नहीं निकल रहा है।”

 करीब 5-6 मिनट कुटिया जैसा चुडवाने के बाद रेखा सीधी हो गई।  उसे पिताजी का लुंड बर से बहार निकल गया।  रेखा अब छताई पर गड्ढे के बाल चलो गई।  और उसे अपनी टंगेन फेला दी।  पिताजी चाची की टंगों के बिच घुस्कर लुंड फिर से बुर में दाल दिया।  क्या बार पिताजी जोर से ढकके मारने लगे हैं।  रेखा ने पिताजी को जोर से जकड लिया।  कामरे में थप्पड़ की आवाज आ रही थी।  कुछ डर ज़ोरदार चुदाई के बाद पिताजी ने गति बढ़ा दिया।  वे हनपने लगे … “ह्ह्ह्ह हह हा, बहू … हह हह्ह!”

 थोड़ी देर में वे दोंन संथ गो गए।  पिताजी रेखा की बुर में ही झड़ गए थे।  पिताजी बोले, “बहू, इस घर में जितनी औरते हैं, सब को छोड लिया।  लेकिन आपकी बात ही अलग है।”

 चाची ने भी कहा, “मैं किस्मत वाली हूं, ऐसा ससुराल मिला।  पति और दोनो जेठ, जेठानिया सबसे प्यार मिलता है।  सभी मेरा ख्याल रखते हैं।”

 पिताजी फिर बोले, “बहू, आपको एक काम करना है।  क्या घर के सबसे बड़े बेटे राहुल को घर और गांव में होने वाली रिस्तों के बारे पता नहीं है।  कभी ना कभी तो पता चलना ही है।  पता नहीं क्या सोचेगा वो।  इसिलिए आप इस्तेमाल अपने धंग से इन बैटन के बारे में बताइये।  आप जवान हैं।  आपकी बात जरूर करेगा।”

 रेखा चाची ने कहा, “ठीक है, भइया।  मैं कोषिश करुंगी।”

 उनकी बात सुनकर मैं हेयरन रहा गया।  की मेरे खंडन में क्या हो रहा है और मुझे पता ही नहीं।  मेरी हलत खराब हो चुकी थी।  लुंड से लस्सा लस्सा निकल रहा था।  लुंड का टोपा चिकना हो गया था।  मैं उनको वही छोड़ दिया और अपने कामरे में आकर मुथ मारा।  20-25 बार मुठियाते ही मैं झड़ गया था।  उसके बाद मुझे बहुत अच्छी और आई।

  

 झरने के पास सामूहिक चुडाई:

 सुबा उठा से 7 बज रहे।  तब तक ताऊजी और पिताजी काम पर जा चुके थे।  माँ ने कहा, “बेटा, आज तो तुम बहुत डर तक सोया।  जाओ नाडी जाओ और डेटम करके आओ।”

 मैंने कहा, “ठीक है मां।”  और मैं नदी की या चला गया।

 जब मैं वापस घर लौट तो मेरी मां बिमला और अमृता ताई खेतान की या पिताजी और ताऊजी के लिए खाना लेकर जा चुकी थी।

 रेखा चाची ने मुझे अपने घर बुलाया और नास्ता दिया।  उसके बाद उसकी छोटी बेटी के साथ घर के आंगन में थोड़ी देर खेला।  हमारे दिन चाची को देखने का नजरिया बदल गया था।  क्योंकि रात को उसे अपने जेठ जी से चुदते देख चुक्का था।  मैं सोच रहा था की सीधी सादी सी दिखने वाली चाची रात को किस तरह सामाजिक नियम तोडकर अपने जेठ से चुडवा रही थी।

 अचानक रेखा चाची ने पुछा, “ऐसे क्या देख रहे हो बेटा?”

 “कुछ नहीं चाची।”

 “मुझे ध्यान से देख रहे हैं।  कुछ गद्दार है क्या?”

 “नहीं चाची, मैं देख रहा था की आप कितनी अच्छी हैं।  आप लोग ताई जी, मां और आप मेरा कितना ख्याल रखती हैं।”

 “हां, वो तो है।  हम सब तुमेन बहुत प्यार करती हैं।”

 उस समय उन्होन हलके हरे रंग की साड़ी पहनी हुई थी।  बहुत अच्छी लग रही थी।  मैंने उनकी तारीख में कहा, “चाची मैं देख रहा था की हरे रंग की साड़ी में आप कितनी अच्छी लग रही है।  जब मैं कामने लगूंगा तो आप लोगों के लिए सुंदर सुंदर साड़ी लहंगा।”

 रेखा चाची ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है बेटा।”

 उस समय करीब 9 बज रहे थे।  मैंने उनसे कहा की मैं गांव में घुमने जा रहा हूं।  और मैं घर से निकल गया।  और जंगल के बिच के खेतो की या चला गया, जहां मेरे ताउजी और पिताजी काम करने गए थे।  मैं जब वहां पहला तो दूर से देखा की ताउजी और पिताजी हल जोत रहे थे।  मां और ताई वहां खेत से घास फुस निकल रही थी।

 मैं दूर से ही झड़ियां में चिपकर उन देख रहा था।  करीब 1 घंटे बाद 10 बजे के बाद काम बंद किया।  बैलों को वही चरण के लिए छोड़ दिया।  पहले अमृता ताई और मां पास के झरने की या चली गई।  झरने के पास चायदार पेड।  थोड़ी देर में ताउजी और पिताजी भी झरने की या चले गए।

 मैं समझ गया आज भी कुछ होने वाला है।  थोड़ी देर में मैं भी चुपके चुपके उसी जग झड़ियों में मैं पांच गया, जहां से मैंने कल मां और ताउजी को देखा था।

 वहन देखा तो आज मुझे और हिरानी हुई।

 बिमला और अमृता झरने के किनारे पेटीकोट को चुनियों के ऊपर बंद कर कपडे धो रही थी।  हमें तारह ​​दोंन बड़ी मदद लग रही थी।  पिताजी और ताऊजी वही बड़े पत्थरों पर बैठे हुए थे।  अपना अपना बनायें उतरे दिये।  राकेश ताऊ धोती लपेटे द और पिताजी गमछा लपेटे हुए थे।  जब ताई जी और मां ने कपड़े धोना खतम किया तो हम वही कपड़े धोने वाली पत्थर पे बैठ गई।  अमृता ताई ने ताऊ जी को इशारा किया।  तौजी ताई के पास पहले और ताई के पीछे बैठे गए।  उन्हें देख पिताजी भी मां के पास पहंचे और मां के पीछे बैठे गए।

 पिताजी अपनी बीबी की चुचियां दबाने लगे और ताऊजी अपनी बीबी के।  थोड़ी देर ऐसा करने के बाद ताउजी ताई का हाथ पकडकर झरने के अंदर ले गए।  पिताजी भी कहां पिछे रहते हैं।  वे भी अपनी बीबी के साथ झरने के पानी में चले गए।

 उन्होनें एक-एक बार दुबकी लगा।  जिनसे उनके शरिर पूरी तरह भिंग गए।  ताई जी और मां के पेटीकोट उनके शरीर से चिपक गए।

 वे बहार निकली और बदन पर सबुन लगाने लगी।  जंगों में सबुन लगा के लिए जब उन लोगों ने अपनी पेटीकोट ऊपर सरकार तो उनकी चिकनी जंघन गजब लग रहे थे।  जंगों की सफाई के बाद दोंनों ने छती पे लपेटे पेटीकोट को आला कमर पर सरकार और सबुन लगाने लगी।  सबुन से सनी उन दूनों के बदन सूरज की रोजिन में चमक रहे थे।  अमृता ने बिमला की पिट पर सबुन लगा और बिमला ने अमृता ताई की पिट पे सबुन माला।  

उसके बाद दोंन झरने के अंदर जा कर दुबकी लगायी।

  अमृता ताई ने पिताजी का हाथ पक्का और बहार लेकर आए और झरने किनारे के पत्थर पे बैठा कर अपने देवर को सबुन लगा लागी।  इतने में राकेश ताऊ भी मां के साथ बहार निकले और उसी तरह मां भी ताऊजी को सब लगा लगी।

  उसके बाद ताई ने पिताजी का गमछा हटा दिया और मां ने भी अपने जेठ की धोती खोल दिया।  पिताजी और ताऊजी एक दम नंगे हो गए थे।  दोंनों के लुंड के पास झटका बहुत।  अब तक उनके लुंड खड़े नहीं हैं।  ताई और मां उनके लैंडों पे सबन लगा कर मुथियाने लगी।  दोनो औरतेन मर्दों की पिट और जोड़ी को तौलिये से रागने लगी।  फिर उन्होन विकास (पिताजी) और राकेश के लंडन पर सबुन लगाकर लुंड को मुठ मारने लगी।  लुंड पर नारी का स्पर्श होने से दोंनों के लुंड खड़े हो गए।  दूर से ऐसा लग रहा था की पिताजी का लुंड तौजी से थोड़ा मोटा और लंबा था।

  उसके बाद वे फिर से पानी में घुस गए।  1-2 बार दुबकी लगाये।

  उसके बाद पिताजी ने मां को और ताउजी ने ताई को अपने पास खिनचा और उन्हें अपने शारिर से झकझक लिए।  दोंनों के हाथ अपनी बिबियों के चुचियों को सहला रहे थे।  कभी उनके हाथ पानी के अंदर चले जाते हैं, शायद वे अपनी अपनी बिबियों के चुत्तद सहला रहे थे।

  थोड़ी देर में राकेश ताऊ ने अपनी बीबी अमृता का पेटीकोट खोला और झरना किनारे फेंक दिया।  उधार मां ने भी अपना पेटीकोट उतर फेंक दिया।  अब वे चारोन पूरी तरह नगने थे।  पिताजी और ताऊजी दोंनों के बदन गतिला था।  एकदम स्वस्थ।  मेहंदी करने से ऐसा ही होता है।  थोड़ी देर में वे सभी पानी से बहार निकले।

  झरने के किनारे एक पेड़ के छाया में हरि हरि घास उगे हुए थे।  घास के ऊपर ताऊजी और पिताजी चलो गए।  अमृता और मां बिमला उन दोंनों के बीच बैठ गई।  अमृता ताई अपने पति राकेश का लुंड सहलाने लगी और फिर चुना शुरू कर दिया।  माँ भी अपने पति विकास के लुंड से खेलने लगी और फिर उपयोग चुन लागी।  2-3 मिनट अपने अपने पतियों के लुंड चुनने के बाद उन पार्टनर चेंज किया।  अब मां अपने जेठ जी का लुंड चुस रही थी और ताई अपने देवर का।  ऐसे लुंड चुसाई चलता रहा।

  थोड़ी देर में पिताजी ने अपनी भाभी को आला घास पर लिटाया और मां वहीं ताई के बगल में घास पर जाने दें।  पिताजी ताई के बुर चाटने लगे और ताऊजी अपनी बहू का।  दूर से लुंड और बुरें के दर्शन एक से नहीं होप आ रहे थे।  पर क्या हो रहा था, साफ पता चल रहा था।  थोड़ी देर फिर साथी बदला गया।  अब पिताजी अपनी बीबी की चुत चाट रहे थे और ताऊजी अपनी बीबी का।

  3-4 मिनट चुत चैटे के बाद उन अपनी अपनी बिबियों के बुर में लुंड दाल कर छोडना शुरू कर दिया।  थोड़ी देर अपनी बिबियों की चुदाई के बाद वे दोंन आला घास पे चलो गए।  बिमला उठी और अपनी जेठानी के बुरे रस से साने जेठ जी लुंड चुननी लगी।  अमृता ताई भी बिमला के बुर के रस से सना हुआ अपने देवर का लुंड चुनने लगी।  लंदन को चुनने के बाद बिमला अपने जेठ के लुंड पे बैठा कर हौले चुतद हिलाने लगी।  उधार अमृता ताई भी अपने देवर के लुंड पे बैठा कर अपने देवर को चोदने लगी।  इसी तरह चुदाई चलता रहा … 3-4 मिनट बाद पिताजी उठे और ताई के बुर में लुंड डालकर ही उनको उठाकर झरने के पानी में ले गए।  कमर तक की घरेई तक पांच कर पिताजी अपनी भाभी को वैसे ही पानी के अंदर छोडने लगे।

  उधार राकेश ताऊ ने मां को घास पर कुटिया बनार पिचे से उनकी बुर में लुंड पेल कर छोडने लगे।

  पिताजी ने अमृता ताई के बुर से लुंड निकला।  और दोंनों ने एक बार पानी में दुबकी लगा।  उसके बाद वे दोंन बहार निकले।  ताई जी ने पिताजी का लुंड चुसा तकी वो चिकना हो जाए।  उसके बाद वो भी मां के बगल में कुटिया बन गई।  ताऊ जी ने मां के बुर से लुंड निकल कर ताई जी के बुर में पल दिया।

  और पिताजी ने राकेश ताऊ की चुदाई से गिली हो चुकी अपनी बीबी की बुर पे लुंड पल दिया।  दोनो अपनी अपनी बीबी को छोने लगे।  धीरे धीरे स्पीड बड़ा दिए।  बिच बिच में लुंड को बुर के अंदर रख कर शांत हो जाते थे।

  इसी तरह उनकी चुदाई 8 मिनट जैसा कुट्टा पोज में चली।  अचानक ताउजी तेजी से हिलने लगे और जोर डर शॉट मारकर शांत हो गए।  राकेश अपनी बीबी अमृता के बुर में झड़ चुके थे।  इधर पिताजी अपनी बीबी को छोड रहे थे।  थोड़ी देर में ताउजी अपना लुंड अमृता के बुर से निकले और बिमला के सामने लेकर आए।  मेरी मां ने अपने जेठ के सिकुद चुके लुंड को चुनने लगी।  पिताजी मां के बुर से लुंड निकल कर ताई जी बुर में गुसा दिए और अपने भैया के विर्या से भारी गिली बर को छोड़ने लगे।  वे यूं ही 2-3 मिनट धीरे धीरे छोटे रहे।  इसी बिच मां और ताउजी पानी में चले गए और नहीं गले।

  इधर पिताजी ने अमृता को आला घास पे लिटाया।  उसे अपनी भाभी की तंगों साथ रखकर ऊपर उठा और बुर के पास बैठाकर अपना लुंड अमृता ताई की बुर में घुसा दीये।  इस तरह वे ताई जी को ज़ोर से चोदने लगे और 2 मिनट में वे भी शांत हो गए।  वे अपनी भाभी के बुर में जद चुके थे।  थोड़ी देर शांत रहने के बाद उन्होन अपना लुंड निकला और ताई के बुर को चने गले।  ताई जी चटपटा रही थी।  पिताजी शायद अपने वीर्या और अपने बड़े भाई के वीर्य से भारी हुई चुत को चैटने का आनंद ले रहे थे।

  उसके बाद वे दोंन भी पानी में गए।  दुबारा नाहया।  सब अपने अपने कपड़े पहनने लगे।  मैं उन्हें वैसे ही छोडकर वहां से चुपचप निकल गया।

  सब कुछ सपना सा लग रहा था।  की मेरे गांव और मेरे खंडन में है तक रिस्तों की मर्यादा को तर तर करके चुदाई के बड़े लिए जा रहे हैं।  और मुझे पता नहीं।  अब मुझे शक होने लगा की मैं विशाल में किसका बेटा हूं।  जब घर की औरतेन घर में है, तो क्या गारंटी है कि वे गांव के दसरे मर्द से नहीं चूड़ी हैं।  जब चाची अपने जेठ से चुडवा रही हैं तो मेरे चाचा भी अपनी भाभीओं यानि बिमला और अमृता को भी छोड़ देंगे।

  ताऊ, ताई और चाची की चुड़ाई:

  जब मैं घर पहुंचा तो 12 बज रहे थे।  आधे घंटे में मां और ताई जी भी आई।  थोड़ी देर बाद ताउजी और पिताजी भी बैलों को हांकते आए आए।  मेरी मां ने मुझे और पिताजी को खाना खिलाय़ा।  घर में सब नॉर्मल लग रहा था।  उन देख के लग ही नहीं रहा था कि थोड़ी देर पहले झरने के पास मां, पिता जी, ताई और ताऊ ने सामूहिक छुडाई किया था।

  शाम को मैं ताउजी के साथ बेल बकरिया चरण गया।  आज हम जंगलों की तरफ चरण ले गए।  ताऊ जी मुझे जंगलों के पेड़ पौधों के बारे, 3-4 जडी बुटियों के बारे बताया।

  रात का खाना खाकर मैं अपने काम में चला गया।  रूम में जकार मैंने आज चाची, माँ और ताई जी की चुदाई के दृश्य याद करके मुठ मारा और सो गया।  आज कुछ ज्यादा ही मजा आया मुथ मरने में।  करीब 2 बाजे मुझे पेशाब लगी तो मेरी निंद टूट गई।  मैं पेशाब करने निकला।  लेकिन कुछ सोच कर मैं अपने रूम वापस नहीं गया।  मैं चाची के घर के पिचे तारफ चला गया।  की आज वहां क्या हो रहा है।  अंदर हमें रात भी सोलर लैंप जल रही थी।  खिडके से झंक के देखा तो जमीन पर बिछी हुई चाटाई पर 3 लोग सो रहे थे।  उनमे 2 महिला थी और एक मर्द था।  वो मर्द मेरे राकेश ताऊ थे।  एक तो मेरी रेखा चाची थी, दसरी महिला मेरी ताई अमृता थी।

  ताऊ जी अपनी बीबी और बहू के बिच में नंगे सोए हुए थे।  अमृता और रेखा ने अपने एक जोड़ी ताऊ जी ऊपर रखे थे।  उन्दोन के कपडे अस्त-व्यस्त द।  शायद उन लोगों ने एक बार चुदाई कर लिया था।  मैं थोड़ी देर देखा और वापस जाने का सोचा।  इतने में देखा की रेखा चाची उठी और ताऊजी के लुंड को सहलाने लगी।  सहलाने से लुंड खड़ा होने लगा।  उसके बाद उसे अपने जेठ ला लुंड चुस्ना शुरू किया।  ताऊजी नन्द में ही रहे।  कुछ डर में चाची ने अपनी साड़ी ऊपर उठाया और अपने बड़े जेठ जी के लुंड के ऊपर धीरे से बैठ गई और लुंड को बुर में लेकर चुपचाप बैठी रही।  फिर धीरे धीरे ऊपर आला होने लगी।  थोड़ी देर में उसे अपनी जेठानी को जगाया।  अमृता ताई उठी तो देखा की रेखा अपने जेठ के लुंड पे बैठी हुई है।  वाह रेखा की चुचियों को सहलाने लगी, पिट सहलाने लगी, चुट्टाड सहलाने लगी।

  राकेश ताऊ चुपचप लेटे हुए थे।  पता नहीं निंद में द या यूं ही चुप द।  थोड़ी देर में रेखा अपने जेठ के ऊपर से हटी और अमृता ने उसे जगा ले लिया।  2 मिनट जैसा धीरे धीरे अपने पति को चोदने के बाद उसे अचानक ज़ोरदार झटका मारा।  उसे राकेश उठ गया।  उसे देखा अमृता ने छोड़ दी है।  वो वैसे ही शांत रहे।  अमृता अपना काम करती रही।  राकेश को उठा देख रेखा ने अपना बुर राकेश के मन पर रख दिया।  राकेश बहुरानी की झंझट भरी बरचटने लगे।

  थोड़ी देर बाद अमृता ने बुर से लुंड निकला।  अब रेखा ने अमृता के बर के रस से सनी हुई राकेश के लुंड को चुनी और फिर उसके ऊपर बैठा गई।  उधार अमृता राकेश के मुंह के ऊपर बैठा गई।  राकेश अमृता की छुडाई से गिली हो चुकी बुर को चुनने लगे।

  सब अहिस्ता अहिस्ता काम हो रहा था।  किसी को जल्दी नहीं।  कोई तबादतो छुडाई नहीं।  पोर्न फिल्मों की तरह कोई हो हल, आह उउउ नहीं।

  थोडी डेर बाद दोनो औरतेन उत्थान पास के पलंग पर आगल बगल चलो गई।  राकेश ने दोंनों का बुरा बारी बारी से छटा।  फिर उसे रेखा के बुर पे पे दिया दिया।  एक हाथ से अमृता की बुर में उन्गली करने लगे।  रेखा की मंसल गोरी जंघ सोलर लैंप की रोशनी में चमक रहे थे।  उसकी बड़ी चुचियां हर ढकके के साथ हिल रहे थे।

  रेखा की छुडाई के बाद वे अमृता के बुर में लुंड पेल दिए और दसरे हाथ से रेखा की बुर को छोडने लगे।  अमृता की सांवली चिकनी जंग भी बड़ी सुंदर लग रहे थे।

  फिर उन लोगों ने स्थिति बदल दीया।  अब चाची पलंग पर चलो गई और अमृता उसके ऊपर चिपक गई।  दूनों एक दसरे को चुनने लगी।  चुचियों को सहलाने लगी।  राकेश ताऊ ने पहले लेटी रेखा की बुर में लुंड घुसया और 8-10 ढके देने के बाद उसके ऊपर चिपकी हुई अमृता की बुर में कुत्ते की शैली में लुंड छोड दिया।  इसी तरह वे कभी रेखा की बुर को छोटे और कभी अमृता की बुर में लुंड घुसते।

  अब तक चुदई शुरू हुए 30 मिनट से ज्यादा हो गए थे।  उन लोगों की छुडाई देखके मेरा लुंड भी खड़ा हो गया।  राकेश ताऊ अब रेखा को छोड रहे थे।  अचानक ताऊ ने चोदने की गति बढ़ा दिया।  रेखा की बुर छोडते समय उसके झांझ उसकी झांघ से तकरा रहे थे और पेट ऊपर अमृता के चुट्टा से।  अब कामरे में पच्छा, थाप्प थप्प की आवाज़ आ रही थी।  3 मिनट जैसा ज़ोरदार चुदाई के बाद राकेश बोला, “अमृता, मेरा निकलने वाला है!”  रेखा बोली, “आज मेरे अंदर ही झड़िये!  भर दिजिये बुर में पानी।”  अमृता बोली, “मुझे भी थोड़ा चाहिए!”

  छोटे छोटे ताऊ रेखा की बुर में झड़ गए।  फिर उसे अपने लुंड को रेखा की छुट से निकल कर अमृता की बुर में दाल दिया और बाकी के वीर्य अमृता की बुर में गिरा दिया।

  अमृता रेखा के ऊपर से उतरी और रेखा की जंगों के बिच बैठा कर अपने पति के वीर्य से भारी रेखा की बुर को चटकर साफ करने लगी।

  मैं खिडकी के पास ही था।  थोड़ी देर बाद अमृता बोली, “अब सूबा होने होली है, अब हमन चलना चाहिए।”

  ताऊ बोले, “हां, तुम सही बोलती हो।”

  रेखा की आवाज़ आई, “आज तो 2 बार की चुदाई में बहुत मजा आया।  घर में इतना प्रेम भाव है, सब एक दसरे का इतना ख्याल रखते हैं, मुझे मोहन की कमी नहीं सतती है।”

  अमृता ताई बोली, “घर के 3 चुदक्कड़ मर्दों से चुड़ी हूं, लेकिन ऐसी ढलती उमर में किसी जवान लड़के से चुदाने की इक्षा है।”

  “दोनो जेठ जी और मोहन सभी चुदाई में अच्छे हैं, लुंड भी कमल के हैं, लेकिन मेरा भी मन किसी छोकरे से चुडवाने का है।”  रेखा बोली.

  “लेकिन किसके पास जाने।  गांव में जवान छोकरे तो हैं, लेकिन किसी पे भरोसा नहीं कर सकते हैं।  छोड तो देंगे, लेकिन बात घर के बाहर जा सकती है।”  ताई बोली।

  ताऊ जी बोले, “अरे घर में एक जवान लड़का है, और तुम लोग बहार की बात कर रही हो!”

  “मतलब!”  ताई पुछी।

  “अपना राहुल कैसा रहेगा?”

  “राहुल!!”  चाची बोली.  “ठीक तो है, तो कैसे माने?  क्या वो राजी होगा?  उसकी पड़ई पे असर तो नहीं होगा?”

  “वो तुम लोग जानो।”  ताऊ जी बोले।  “तुम लोगों की खूबसूरत और अनुभव कब काम आएगा?

  उसके बाद वे अपने अपने कपड़े ठीक करने लगे।

  मैं वहां से चुप चाप निकल गया और अपने रूम में चाची और अमृता ताई के बुरे को याद करके मुठ मारा और सो गया।

  जंगल में फिर सामुदायिक खेल

  अगले दिन सूबा 7 बजे उठा।  तब तक ताऊ जी, पिताजी और अमृता ताई और मां खेतो की या जा चुके थे।  मैं नदी की या गया और आधे घंटे बाद आया।  रेखा चाची ने नास्ता खिलाड़ी।  लेकिन आज मैं चाची को अलग नजरों से देख रहा था।  उनकी अनुभव आंखों ने शायद मुझे देख लिया था।

  वो मेरे सामने ही ज़मीन पर बैठा गई।

  उसे पुचा, “राहुल बेटे, तुम्हारी कोई लड़की दोस्त है?”

  “नहीं चाची।”

  मैं उसके पुछने का मतलब थोड़ा समझ तो गया, लेकिन अंजान सा बना रहा।

  “गाँव में तुम्हारी उमर के सारे लड़कों के तो लड़की दोस्त हैं।”

  “पटा नहीं चाची, मैं तो बहार ही रहता हूं ना।  यहाँ कौन मुझे पसंद करेगा?”

  “क्यों नहीं पसंद करेगी, तुम इतने सुंदर तो देखते हो!”

  “कहां चाची, आप तो चने के झड़ पे चढा रही है!”

  “नहीं बेटे, मैं सच कह रही हूं।”

  “चाची, याद आप मेरी चाची नहीं होती और आप मेरी उमर की होती तो क्या आपको पसंद करती?”

  “क्यों नहीं कार्ति?  जरूर कार्ति मेन।  मैं तो अब भी पसंद करता हूं।”

  “क्यों झूठ बोलती है चाची?”

  “क्या तुम ही पसंद नहीं करोगे।  मैं बुद्धि हो गई ना !!”

  “नहीं चाची, आप तो अभी जवान ही हैं।  जवान लडकियां भी आपके सामने पिकी लगती हैं।”

  तब तक मेरा नास्ता खतम हो गया था।  और मैं घर से निकला और वही खेतों की या चल दिया।  जब वहन पहंचा तो ताऊजी और पिताजी खेतो में हाल जोत रहे थे और ताई जी और मां खेत के किनारे एक पेड़ के नीचे बैठी हुई पतली।  मैं दूर से उनको देखता रहा।  सोच रहा था, की मौत मार्के खुद को संतोष करने के बदले अब अपने घर की औरतों को ही छोडके मजा लूं।  घर में इतना कुछ चल रहा है, सारे लोग एक दसरे को छोड रहे हैं तो मैं क्यों पिचे रहूं?

  करीब 9:00 बजे राकेश ताउ और विकास (पिताजी) ने खेत जोतकर खतम किया और हाल चलाना बंद किया।  उन बैलों को हाल से मुक्त किया।  दोंनों ने बाल्टी में रखा पानी से हाथ मुझे धोया और पेड़ की छनव में बैठे गए।  अमृता ताई और बिमला मां ने दोंनों को खाना दिया।  गरमी बढ़ने लगी थी।

  अपने पतिओं को खाना देकर अमृता ताई और बिमला (मां) वहन से जंगल की या चली गई।  शायद जलावां की लकड़ियां लेन गई होगी।  थोड़ी देर बाद राकेश ताऊ और विकास (पिताजी) भी जंगलो की या चल दिए।

  8-10 मिनट बाद मैं भी उनको दुंधने जंगल की या चल दिया।  कुछ दूर जाने पर मुझे पिताजी और ताऊ जी दिखे।  फिर जंगल में अमृता ताई की सुरीली आवाज में गाना सुनायी दिया, “आजा आई बहार, दिल है बेकरार, ओ मेरे राजकुमार तेरे बिन रहा ना जाए”।  शायद वो तौजी और पिताजी को बुला रही पतली।

  आवाज दो पहाड़ियों के बिच सुखी नाले के पास एक बड़े बरगद पेड़ (बरगद का पेड़) की तरफ से आ रही थी।  राकेश ताऊ और विकास पिताजी आवाज की दिशा में चले गए।  मैं भी उस बरगद पेड़ की तरफ पहाड़ी के दसरे उसके रास्ते से गया।  उधार सिरफ हमारे खेत हैं इसिलिए गणव के दसरे लोग जंगल के हम तारफ नहीं जाते हैं।

  हमारे बरगद पेड़ की छाया में अमृता, बिमला, राकेश और विकास बैठे हुए थे।  मैं हम जग से 30 मीटर जैसा दूर घनी झडिय़ों की आड़ में छिपकर उन देखने लगा।  इतने दूर से उन लोगों की बातें सुनिए नहीं दे रही थी।  लेकिन और पास जाने का जोखिम नहीं उठा सकता था।  मैं उनका तमाशा देखने लगा।

  पेड़ के आला जलावन की लकड़ियां की 2 गठारी रखे हुए थे।  2 बोतल में पानी रखा था।

  वे चरण छाया में आराम कर रहे थे।  अमृता और बिमला जोड़ी लम्बा करके जमीं पर बैठी पतली।  पिता जी ताई की भगवान में सर रखकर देते हैं और राकेश ताऊ मेरी मां की भगवान में सर रखे हुए थे।  दोनो महिलायें उनका सर सहला रही पतली।  बिच-बिच में दून उन औरतों की चुचियां सहला रहे थे।

  थोड़ी देर बाद अमृता ताई ने मेरे पिताजी को अपनी गॉड से उठा और खादी हो गई।  उसे अपनी साड़ी कमर तक उठा और पिताजी के सर को अपनी साड़ी के अंदर धन दिया।  मेरी मां भी अपने जेठ को भगवान से हटाई और अपनी साड़ी कमर तक सरकार दी पिताजी अपनी भाभी की सारी के अंदर उसका बुर चैट लगे लगे।  अमृता ऊपर आसमान की या देखने लगी।  राकेश ताऊ अपनी बहू के जोड़े को फेलकर उसका बुर चटने लगे।  अमृता ने अपना ब्लूज हटा दिया, जिससे उसे चुचियां बहार आ गई।  माँ ने भी अपना ब्लोज हटाया।  अमृता और बिमला ने सारी नहीं हटा।  बिमला ने अब अपना सारे ऊपर तक उठा तो पता चला पिताजी उसका चुत चाट रहे थे।  कुछ डर बुर चने के बाद उसे अमृता को बिमला के बगल में लिटा दिया और दुबारा उसका बुर चने लगे।  अप्रैल का महिना में गरमी बहुत लग रही थी।  लेकिन हमें गरमी में भी बरगद की छांव में वे चुदाई का आनंद उठा रहे थे।

  कुछ डर बर चटने के बाद ताऊ और पिता जी ने अपने पार्टनर बदल दिया।  अब राकेश ताऊ अपनी बीबी अमृता के सामने खड़े हो गए और पिताजी अपनी बीबी के सामने खड़े हो गए।  दोनो औरतेन अपने पतियों के सामने बैठे और उनके लुंगियों और निकर को खोल दी।  पिता जी और राकेश ताऊ के झटके लुंड बहार आ गए थे।

  अमृता और बिमला अपने पतियों का लुंड सहलाने लगी, और फिर चुनने लगी।  उन लोगों को कोई हड़बड़ी नहीं थी।

  थोड़ी देर लुंड चुस्वाने के बाद वे चारों रुके।  सबने बगल में राखे बोतल से पानी पिया।  अब पिताजी ने मां को बरगद पेड़ के तने के पास ले गया।  माँ ने अपना एक जोड़ी पेड़ के तने पे टिकाया।  उसे उसी बुर खुल गई।  पिताजी उसके आला बैठककर उसका बुर फिर से चाटने लगे।  चाट-चटकर बर को गीला किया और उसमे अपना लुंड पेल दिया।  और खड़े-खड़े ही अपनी बीबी को छोडने लगे।  राकेश ने भी अपनी बीबी को उसी तने के पास ले गया और अमृता को कुटिया जैसा झुककर उसका साड़ी उठा और बुर को चाट-चटकर दुबारा जिला किया और फिर पिच से बुर में लुंड गुसाकर छोडने लगे।  प्रकृति की भगवान में ये चुदाई दृश्य बड़ा मनोरमम लग रहा था।

  उसके बाद उन लोगों ने फिर से पार्टनर बदल लिया।  ताऊ और पिताजी दून आला जमीन पर पद्माशन की मुद्रा में बैठे गए।  बिमला अपनी अस्त-व्यस्त साड़ी को उठाकर अपने जेठ की गोदी में बैठ गई और अमृता ने भी अपनी साड़ी को कमर तक उठाकर अपने देवर की गोदी में बैठाकर ऊपर आला होने लगी।

  इसी तरह छुडाई लीला चलती रही।  अब फिर उन लोगों ने आसन बदल लिया।  अब डोनों औरतों ने अपनी सरियां और साया खोल दिया और पूरी तरह नंगी हो गई।  उन्होनें पेटीकोट को जमीन पर बिचया और उसपर आगल बगल चलो गई और अपनी टंगों को घुटने से मोड दिया।  अब पिता जी तूरंत अपनी भाभी के जोड़े के बिच घुस गए और ताऊ अपनी बहू की टंगों के बिच घुस गए और दोंनों ने दुबारा चुदाई चालू कर दिया।  फिर अनहोन पार्टनर बदला।  अब ताऊ अपनी बीबी को चोदने लगे और पिताजी अपनी बीबी को।  धीरे-धीरे छोटे छोडते दोंनों ने अपनी रहता बड़ा दिया।  4-मिनट जैसा जोर से हिलने के बाद दो अपनी अपनी बिबियों के छुट के अंदर झड़ गए।

  उसके बाद चारो पेड़ की छाया में नंगे ही बैठे और फिर से पानी पिया।

  मैने घाडी देखा।  उन लोगों की छुडाई 40 मिनट से ज्यादा चली।  मैं वही छोडकर चुपचाप उन जग से निकल गया।  मुझे भी प्यार लग रही थी।  मैं अपने खेत के पास पांछकर खेतों का पानी पिया और वही एक पेड़ की छाया में बैठा उन लोगों का इंतजार करने लगा।  20 मिनट बाद वे चारो जंगल तारफ से आते देखे।  माँ और ताई अपने सर पर लकड़ियाँ की गठारी लेकर आ रही थी।  वे मेरे पास पाहुंचे तो ताई बोली, “अरे बेटा तुम!  कब आए यहां?”

  “मैं घर में बोर हो रहा था।  थोड़ी देर पहले आया हूं।  सोचा आप लोगों के साथ काम कर थोड़ा खेती बारी भी सिख लुंगा।  इसिलिए आ गया।”

  “बहुत अच्छा किया बेटा।”  माँ बोली।

  “ये जग कितना अच्छा लगता है माँ!  आप लोग कितना मेहंदी करते हैं, गरमी में भी काम करते हैं।”

  “हां बेटा, दुनिया में मेहंदी तो करना ही पदता है।  तुम बस पढाई अच्छे से करो।”  ताऊ जी बोले।

  उसके बाद हम सब एक साथ घर आ गए।  उन लोगों को देखके लग ही नहीं रहा था कि थोड़ी देर पहले जंगल में उन लोगों ने सामूहिक छुडाई की थी।

  घर पहूँचा तो देखा की संध्या बुवा आई हुई थी।

  दो भाई और एक बहन की चुड़ाई:

  मैने संध्या बुवा को प्रणाम किया।  वाह मुझे देख बहुत खुश हुई।

  “कैसे हो बेटा?”

  “मैं ठीक हूं बुवा।”

  “बेटा, बहुत दिन बाद तुम देख रही हूं।  कितना बड़ा हो गया है!  अपने पिता और ताऊ से भी ऊंचा हो गया है!”

  “ऐसा नहीं है बुवा, आप लोगों के लिए मैं छोटा बच्चा ही हूं।”

  रेखा चाची ने सबके लिए दोपहर का खाना बना रखा था।  हम सबने दूधकर दोपहर का खाना खाया।  मैं घर के पिचे तारफ एक छायादार पेड़ के आला खटिया ले गया और वही आराम करने लगा।

  थोड़ी देर में संध्या बुवा भी वहन आई।

  “आराम कर रहे हैं बेटा!”

  “हां बुवा।  ऐये बैठाये।”  कहकर मैं भी खटिया से उत्थान खटिया के किनारे बैठा गया।  बुवा भी खटिया पर मेरे बगल में बैठ गई।  वह राकेश ताऊ से छोटी और पिताजी से बड़ी हैं।  उमरा में वे अमृता ताई से छोटी लेकिन बिमला मां से बड़ी हैं।  50 साल की हैं।  बुवा की ऊंचाई कम है 4’10” जैसा है और सांवली है, थोड़ी मोटी लगती है।  चुचियां थोड़े बड़े आकार के लगते हैं।  फिर भी मेरी नज़र से देखो तो ख़ूबसूरत लगती है।

  “माँ श्री नहीं आए क्या बुवा?”

  “नहीं बेटा, गांव में बहुत काम है।  मुझे पता चला तुम आए हो, इसिलिए तुम्हें देखने आ गई।  सुना है शहर में कोरोना आ गया इसिलिए सब बंद कर दिया गया है।”

  “हां बुवा, हमारा कॉलेज भी बंद हो गया।  इसिलिए मैं भी गांव चला आया।  अब यहां के कुछ काम सिखूंगा।”

  “बहुत अच्छा बेटे, सब काम सीखना चाहिए।  लेकिन पढाई में ज्यादा ध्यान देना।”

  ऐसे ही हम दोंनों ने 1 घंटा जैसा बता किया।  गरमी में उसका शरिर पासिन से भीग गया था।  उसकी ब्लौज भी भिंग गई थी और यूज वाह सेक्सी लग रही थी।  शाम को मैं नदी तारफ गया और नहाके आ गया।

  शाम को रेखा, संध्या, अमृता, बिमला सबी नहीं आई।  रात को सबने दूधर खाना बनाया और हम सबने एक साथ खाना खाया।  मैं जल्दी ही सोने चला गया।  मुझे पता था की आज के सामूहिक चुदाई में संध्या बुवा भी शामिल होगी।

  बड़े ताऊ के घर में बड़ा कर्मा था।  उसमेई 2 पलंग द.  बुवा का बिस्तारा ताऊ के घर में ही बिचया गया।

  रात के करीब 11 बजे निंद खुली।  मैंने सोचा जरा की आज क्या होने वाला है।  मैं चुप चाप ताऊ के घर के मेहमान कमरे की तरफ गया।  दरवाजा अंदर से बंद था।

  अंदर से बात करने की आ रही थी, “दीदी आप इतने दिन बाद आई।  हमारी याद नहीं आई आपको?”  ये पिताजी की आवाज थी।

  “ऐसी बात नहीं है।  वहा ससुराल में काम बहुत रहता है।  इसिलिए बार बार आ नहीं सकती।”

  ताऊजी बोले, “छोड़ो, तुम दामाद जी ख़ूब छोटे होंगे, इसिलिए इधर आती नहीं तुम!”

  “नहीं भैया, उनमे अब वो बात नहीं।  वे तो 60 साल के हो गए हैं।  सप्त में 1 बार ही हो रहा है।”

  “कोई बात नहीं दीदी, आज आ ही गई हो तो थोड़ा मजा करता है।  भैया दीदी की साड़ी खोल दिजिये।”

  दरवाजा से अंदर देखना मुश्किल था।  मैं घर के साइड वाले खिंदकी की या गया।  मेरी किस्मत अच्छी थी, साइड वाली खिडकी थोड़ी खुली हुई थी।  अंदर देखा तो मेरा लुंड टनक गया।  राकेश ताऊ संध्या बुआ की ब्लोज खोल रहे थे।  विकास (पिताजी) अपनी दीदी के पास बैठाकर उनकी साड़ी को कमर तक उठाकर झंगों को सहला रहे थे।  पलंग पर रेखा, अमृता और बिमला बैठी थी।  ताऊ ने अपनी बहन की ब्लौज हटकर चुचियों को चुनने लगा।  पिता जी ने भी संध्या की साड़ी और साया खोलकर हटा दिया।  थिगनी सी सांवली बुवा सोलर लैंप की रोशनी में अलग ही लग रही थी।  उसके बुर में बाल बहुत बढ़े हुए थे।

  इसी बिच रेखा चाची उठी और उसे पहले बड़े जेठ की लुंगी खिंचकर खोला और फिर छोटे जेठ विकास की लुंगी भी हटा दिया।  दोनो ने और कुछ नहीं कहना था।  लुंगी हटे ही 6 – 6″ के लुंड बहार आ गए।  अमृता ताई और मां उन्हें चुप चाप देख रही पतली।  रेखा भी संध्या बुवा और अपने जेठ को छोडकर अपनी जेठानियों के साथ बैठा गई।  जैसे आज सबी 2 भाईयों और 1 बहन की छुडाई देखना चाहते हैं।

  कामरे में संध्या अपने भाईयों के साथ नंगी लिपि हुई थी।  सामने बड़ा भाई इस्तेमाल चिपका हुआ था और पिचे से छोटा भाई इस्तेमाल जकड़ा हुआ था।  संध्या और राकेश एक दसरे के होंठ में जीभ डालकर चुस रहे थे।  पिचे से पिताजी उसकी बगीचा को चुम रहे थे।  पिट चैट रहे।  संध्या एक हाथ से विकास का लुंड पकड़ी हुई थी और दसरे हाथ में राकेश का लुंड सहला रही थी।  दोंनों के लुंड लोहे की तरह शक हो गए थे।

  पिताजी धीरे-धीरे संध्या की पिट को छत्ते चुमते हुए उसे मोती चुतड चाटने लगे।  और आला बैठक संध्या की बुर सहलाने लगे।  इतने में ताऊ भी उसे चुचियों को सहलाते हुए, चुने हुए धीरे-धीरे निचे आए।  वे भी आला बैठकें संध्या की बुर की झंटों को सहलाने लगे।

  थोड़ी देर बाद दोनो भाई उठे और संध्या दोनो भाईयों के बिच बैठा गई।  वह अपने भाईयों का लुंड बारी बारी से चुनने लगी।  कभी छोटे भाई का लुंड चुस्ति तो कभी बड़े भैया का लुंड चुस्ति।

  पिता जी बोले, “भैया दीदी तो बड़ा मस्त चुस रही है!”

  ताऊ बोले, “हां छोटे, मुझे भी बड़ा माजा आ रहा है।”

  अमृता, बिमला और रेखा उन लोगों को देख कर मजे ले रही थी।

  थोड़ी देर में पिताजी ने संध्या बुआ को उठा और पलंग पर अमृता, रेखा और मां के बीच में दिया।  रेहा ने संध्या की एक तांग एक तार खिंचा और बिमला ने दुसरी तांग दुसरी तराफ खिंचा।  इस तरह संध्या की दो टंगेन करीब 160 डिग्री में फेल गई और उसे बुर खुल गई।  अमृता ने उसके टंगों के बिच बैठककर संध्या के बुर को चाटना शुरू कर दिया।  वो अपनी नानद के बुर को 3 मिनट जैसी चट्टी।  संध्या पलंग पर उत्तेजना से हिल दुल रही थी।

  उसके बाद बिमला ने उसका बुर चटना शुरू की।  उसी तरह फिर रेखा ने भी बड़ी नानद का बुरा ख़ूब छटा।  बुर चाट चाट कर गिला हो गया।  उसके बाद राकेश ताऊ आए।  अमृता ने अपने पति का लुंड पकड़कर संध्या के बुर के दरवाजे पर लगा और पाने पति की कमर को आगे ढकेला।  उसे पिताजी का लुंड संध्या की गिली बुर में समा गया।  उसी हाल में अमृता ने दोंनों को पडके 2 मिनट जैसा पक्के रखा, मानो वे अपनी बहन की बुर की घरेई और गरमी माफ रहे हैं।

  उसके बाद पिताजी ने कमर हिलाना शुरू किया।  वे धीरे-धीरे चोदने लगे का उपयोग करें।  संध्या बोली, “भैया, बहुत अच्छा लग रहा है।  अब एक बार विकास को भी छोडने दिजिये।”

  राकेश ताऊ नफरत.  रेखा ने चुदाई से गिली हो चुकी संध्या की बुर को फिर से छटा।  अमृता ताई संध्या के बर से रस से सनी अपने पति के लुंड को चुनने लगी।

  माँ ने अपने पति के लुंड को चुस्कर गिला किया और संध्या की बुर के दरवाजे पर निशान लगाकर विकास की कमर को ढकेला जिस लुंड संध्या की बुर में घुस गया।  पिताजी भी बिना ही संध्या की बुर में चुपचप लुंड घुसा राखे।  थोड़े डेर बाद वे भी कमर आए पिछे करने लगे।

  “आह्ह्ह भाई, तुमसे मैं बहुत बार चुड़ी हूं।  लेकिन अब भी मन नहीं भरता रे!”

  “हां, दीदी आप को चोदने में बड़ा मजा आता है।”

  “क्या भैया, मेरी चुत अच्छी नहीं लगती क्या?”  रेखा बोली.

  “ऐसा नहीं है बहू, छोडने में तो सबकी बुरी अच्छी लगती है।”

  जब पिताजी संध्या को छोड रहे थे, तो राकेश ताऊ संध्या के बगल में ले गए।  देखें पिताजी ने संध्या को छोडना बंद किया और उसकी बुर को दुबारा चाटा।  रेखा ने अपने बड़े जेठ का लुंड चुसा।  संध्या उठी और छोटे भाई की चुदाई से गिली हुई चुत को बड़े भाई के लुंड के टोपे में रखकर उसपर बैठ गई और अपने बड़े भाई को छोडने लगी।  उसके बाद वाह आगे झुक गई और अपने बड़े भाई के होने को चुन लेने लगी।

  अब पिताजी भी संध्या के आए और अपने भैया के लुंड से चुड़ी हुई बुर में अपना लुंड डालेंगे।  संध्या के बर में 2 लुंड घुस चुके थे।  यानी डबल पैठ वाली छुडाई चल रही थी।

  एक बांध अश्लील फिल्म जैसा दृश्य था.  मेरा लुंड भी कड़क हो चुका था।  लुंड से लास-लस्सा पानी निकला रहा था।

  फिर पिताजी नफरत करते हैं।  अमृता ताई ने झुक्कर पिताजी लुंड फिर लिया और चुना लगी।  बिमला फिर से राकेश के लुंड से चुड़ी हुई संध्या की बुर को चाट रही थी।

  थोड़ी देर बाद संध्या उठी और पलंग से आला उतर कर उसके पास झुक गई।  राकेश ताऊ उसके पीछे आए और पिचे से उसे बुर में लुंड दलकर अपनी बहन को छोडने लगे।  पिताजी पलंग पर चड गए और संध्या के सामने गए।  संध्या अपने छोटे भाई के लुंड को चुनने लगी।  पिचे से ताऊ ने रफ़्तार बदल दिया।  अब चुदाई तेज होने लगी।  कामरे में जांघों के तकराने की आवाज आ रही थी।  3-4 मिनट जोरदार छोडने के बाद ताऊ जी संध्या की बुर में झड़ गए।

  झडने के बाद वे हट गए।  अमृता ने तुरंत लपक कर संध्या के बुर के रस और ताऊ के वीर्य से भींगा हुआ लुंड चुनने लगी।  अब पिताजी भी संध्या के आए और उसे बुर लुंड डालकर जोर से छोडने लगे।  थप्प्प्प थप्प, पच्छ्ह्ह पच्छ।  कुछ डर बाद वे भी अपनी दीदी के बुर में झड़ गए।  पिता जी ने लुंड निकला तो मां ने उसका लुंड चुना शूरु कर दिया।  उधार रेखा चाची अपने दोनो जेठ के वीर्य से भारी संध्या की बुर चाट रही थी।

  राकेश, विकास और संध्या के चेहरे में शांति के भाव थे।  दोनो भाईयों ने अपनी बहन को फिर अपने बिच में लिया और इस्तेमाल करेंगे, मानो उसका शुक्रिया अदा कर रहे हैं।

  टिनों भाई बहन चुदाई के करन पास से लठपथ हो गए थे।  अमृता ताई ने पास के घड़े से पानी लाया और तीन को पानी पिलाया।

  “तुम भाई बहन तो बहुत अच्छे से छुडाई करते हो!”  अमृता बोली.

  “हां दीदी, ये टिनों जवानी से ही छुडाई करते आ रहे हैं ना।!  भाई बहन में इतना अच्छा प्यार है।”  माँ बोली।

  “हां बिमला, ये तो है।  मेरी पहली छुडाई भैया से ही हुई थी और विकास की पहली छुडाई मैंने ही किया था।”  संध्या ने बताया।

  तब तक मेरी हलत खराब हो चुकी थी।  मैं खिडकी के पास से वापस अपने कामरे की या गया।  मैं घर के पिचे तारफ बनी टॉयलेट में पेशाब करके आया और अपने कामरे में जाकर संध्या बुवा के नाम पर मुंह मारा और सो गया।

  बबलू के रहस्य:

  दसरे दिन सूबा थोड़ा जल्दी 6 बजे उठा।  पाता चला, उस दिन खेतो की या पिताजी, राकेश ताऊ, अमृता ताई, बिमला मां के साथ संध्या बुआ भी काम करने चली गई थी।  मैं समझ गया आ जंगल में फिर मंगल होने वाला है।

  मैं नदी की तरफ गया।  नदी के पास हमें दिन गांव का ही एक लड़का बबलू मिला।  उसकी उमरा मेरे जितना ही होगा।  10वीं तक पढ़ा है, गरीबी के करन अब नहीं पढ़ा पाया।  गांव में ही खेती-बारी, पशुपालन का काम करता है।  उसके साथ नदी किनारे बात किया।  साथ में डेटम किया।

  उसे पुछा, “क्या राहुल भाई, शहर में कोई माल पता क्या?”

  मैने जवाब दिया, “नहीं भाई।  कोई नहीं है मेरी।  हम जैसे गांव वाले लड़कों को कौन पसंद करेगा शहर में!

  “हां यार वो तो है।  साला सहर की लौडिय़ां बड़ी सुंदर होती है।”

  मैने पुचा, “तुम्हारी कोई है क्या?”

  उसे कहा, “हां, काम चलन के लिए पडोसी गांव की एक लड़की पता हूं।  उमरा में 5 साल बड़ी है।  लेकिन सप्त में एक बार तो मौका देखे अपने और उसके गांव के बीच के जंगल में छोड लिया करता हूं।  कभी कभी रात को इस्तेमाल करने उसके गांव जाता हूं।”

  “भाई, सप्त में 2 बार तो मिल जाता है ना तुझे।  मैं तो साला मुंह मरके ही जिंदा हूं।  मेरी किस्मत में तो कुट्टा मूट दिया है।”

  “मैं तो घर में भी अपनी भाभी को छोटा हूं।  सप्त में 3-4 बार तो भी चूड़वा लेती है।”

  “क्या बोल रहा है?  तुम्हारे भैया को पता चला तो नारज नहीं होंगे !!”

  “अरे नहीं।  भैया ने ही तो भाभी जी को चोदने को बोला था।  काई बार तो हम दों दूधकर भाभी को छोटे हैं।  भाभी बड़ी चुडैल औरत है।”

  “लेकिन तेरी भाभी तो सीधी-सादी लगती है!”

  “भाई उसके सिद्धे-सादी कपड़े पे मत जाओ।  मैं जनता हूं वो क्या है।  भैया का लुंड इतना मोटा और तंदूरुष्ट है, फिर भी 2 लुंड चाहिए होता है।”

  “चलो यार तुम तो किस्मत वाले हो।  मेरी तो भाभी भी नहीं है।”

  “चुदाई करोगे?  बोलो तो भाभी से बात करू?”

  “नहीं यार।  लेकिन क्या वो राज़ी होगी?”

  “भाई, पुछने में क्या जाता है?

  “ठीक है, बात करो।  लेकिन मुझे कुछ नहीं आता है।”

  “कोई नहीं, वो पहली बार में डर तो रहता ही है।  खोज जोगे।  हम दोंन साथ में चोदेंगे इस्तेमाल।”

  “और कितनों को छोटा तुमने?”

  “गाँव में ऐसा ही चलता है।  मैं से स्कूल की पढाई के बाद गांव में ही रहा।  अब तक 8 औरतों को छोटा हूं।”

  “औरतों को या लड़कियों को?”

  “पड़ोसी गांव की 3 लड़कियों को छोटा हूं।  लेकिन साला भाभियों, चचियों, ताई लोगों, ददियों को चोदने में ज्यादा मजा आता है।  वो लोग ज्यादा अच्छे से चुदती हैं।”

  “बापरे!  ऐसा करते हो!”

  “हां, तुम चाचा तो कहीं जोगाड़ कर लूं।  पडोसी गांव में तेरे जैसा एक पढ़ी लिखी लड़की है।”

  मैं कुछ नहीं बोला।

  बबलू ने फिर कहा, “आज मैं अपनी भाभी से बात करता हूं।  शाम को मिलना।”

  “ठीक है।”  मुख्य बोला।

  उसके बाद मैं नदी में नाहया।  बबलू ने बोला की उसे तो बहुत काम है, इसिलिए दोपहर को नहीं आएगा।

  नहाके मैं घर आया।  रेखा चाची ने नास्ता खिलाड़ी। 

बुरा करके मैं एक बोतल में पानी लेकर घर से निकला गया।

  

   झरने में फिर से धमाल:

   मैं वही खेतों की या चला गया।  उस दिन थोड़ी जल्दी निकला इसिलिए जल्दी ही पहुंचा।  हम दिन वे हमारे दसरे खेत में काम कर रहे थे।  मैं दूर से उनकी हरकतों को देखने लगा।  खेत के पास 2 छायादार पेद।  राकेश ताऊ और विकास पिताजी हल चला रहे थे।  संध्या बुवा, अमृता ताई और बिमला मां भी घास-फुस निकल रही पतली।  मिट्टी के ढेलों को लकड़ी के हाथौदों से तोड़ रही थी।

   करीब 8:30 बज रहे थे।  थोड़ी देर शायद उन ठकावत लगी।  पचों काम बैंड किया और बैलों को भी छाया में लेकर आए।  पचों छाया में बैठे गए।

   सबने अपने शरिर से एक ही तौलिये से पासा पोंचा।  और फिर पानी पिया।  थोड़ी देर बाद मां ने सबके लिए खाना निकला।  पहले ताऊ और पिताजी को दिया।  वे दों खाना खाकर वही जमीन पर चले गए।  शायद थोड़ा सुस्ताना चाहते थे।

   उसके पद संध्या, अमृता और बिमला ने भी खाना निकला और खाया।  किसानों के लिए चावल ही बुरा होता है।  थोड़ी देर बाद संध्या बुवा अपने बड़े भाई राकेश के पास गई और उसके लुंगी को ऊपर सरकार उसका लुंड निकल ली।  फिर उसे थोड़ी देर सहलाई।  फिर उसे अपने सारे उठाकर अपनी बुर को लुंड के टोपे पर रखकर बैठ गई।  उधार ये देखकर ताई अमृता भी अपने देवर विकास की लुंगी से लुंड बहार निकली और उसके लुंड को चुनना शुरू कर दी।  फिर अपनी साड़ी कमर तक उठाकर लुंड के ऊपर बैठ गई।

   संध्या अपने बड़े भाई को और अमृता अपने देवर को हाल ही में छोडने लगी।  मेरी माँ बिमला वपस खेत में काम करने लगी, जैसे उपयोग उनकी चुदाई से कोई सरोकार नहीं।  10 मिनट हल्की चुदाई के बाद संध्या और अमृता ताऊ और पिताजी के ऊपर से हट गई।  और फिर वे चरण भी फिर से पानी पिकर वापस खेत में काम करने लगे।

   मैं दूर ही झडि़यों के पिच से उन देख रहा था।  पिचले कुछ दिनों की घाटनों ने मुझे अलग तारिके सोचने को मजबूर कर दिया।  मैंने अब सोच लिया की अब मैं भी खेल की शुरुआत करुंगा है।  वैसे भी मेरी पढाई पूरी हो चुकी थी।

   आधा घंटा और काम करने के बाद हाल जोतने का काम खतम हो गया।  बैलों को हल से मुक्त कर दिया गया।  संध्या, अमृता और बिमला ने भी काम बंद कर दिया और वे टिनों झरने की या चली गई।  पिता जी और राकेश बाकी काम करते रहे।

   मैं भी चुपचाप हमें झरने के या चला गया।  और उस जग चुप गया जहान से पहले भी झरने में छुडाई देखा था।

   हमारे आने में साल भर पानी रहता है।  और उसके आस पास के पेड़, झड़ियां हरि भारी रहती हैं।  गरमी में भी वो जगा ठंडा ठंडा लगता है।  अलग अलग तरह के पांची भी वहन ज्यादा ही देखते हैं।

   वहा देखा, की अमृता, बिमला और संध्या सिर्फ पेटकोट में हैं।  ऊपर कुछ नहीं पहिनी थी।  टिनों की चुचियां मस्त लग रही थी।  टिनों झरने किनारे की पथरों पर बैठक ताऊ और पिताजी के निकर, गंजी, टी-शर्ट और अपनी सारे धो रही थी।  उसके बाद टिनों झरने के पानी में गई और टायरकी करने लगी।  गांव की औरतेन अच्छी तारक भी होती हैं।  फिर वो बहार निकली और संध्या ने अमृता को कुछ इशारा किया।  वह झरना किनारे पत्थर पे बैठा गई।  अमृता उसके पिचे आकार तौलिया में सबुन लगा और संध्या का पिट रागने लगी।  उसके बाद संध्या ने भी अमृता का पिट रागड़ा।  हमें समय माँ बिमला अपने टंगों और जांघों में सबुन लगाकर खुद को साफ कर रही थी।  वो भी बाद में संध्या को इशारा करके अपनी पिट रागदवा ली।

   थोड़ी देर में ताऊ और पिताजी भी वहां आ गए।  वे भी लुंगी में ही झरने के पानी में घुस गए।  और दुबकी लगाये।  थोड़ा अपने शरिर को हाथ से रागादे फिर वे दोंन झरने के पानी में तेरे लागे।  ये देखर अमृता, बिमला और संध्या भी झरने में घुस गई और सभी पानी में चुवा चुई खेलने लगे।  पानी 3-4 फीट घरा था।  कहीं उससे ज्यादा भी था।

   उसके बाद सब बहार निकले।  पिता जी और ताऊ दोंनों झरना किनारे एक पत्थर पर बैठे गए।  संध्या ने अपने भाइयों को सब लगा और पिट रागड़ा।  अमृता और बिमला उन्हें देख रही थी।  सबुन लगाने के बाद राकेश और विकास फिर से पानी में नहाये और वापस उसी पत्थर पर बैठे गए।

   अमृता ने जकार अपने पति राकेश का लुंगी खिचकर उतर दिया और उसे धोकर सुखा दी।  मां ने विकास का लुंगी निकला और धोकर सुखा दिया।  अब राकेश और विकास पूरी तरह नंगे कर दिए गए।

   संध्या ने एक हाथ से विकास का लुंड सहलाने लगी तो दसरे हाथ में राकेश का।  दोंनों के लुंड खड़े हो गए थे।  अमृता, बिमला और संध्या पेटीकोट में ही थी।  उसके बाद संध्या ने विकास का लुंड चुस्ना शुरू।  और बदले में विकास अपनी दीदी की चुचियां सहलाने लगे।  इधर बिमला अपने जेठ का लुंड चुनने लगी।  ये देखर अमृता ने अपना पेटीकोट उतरा और पूरी नंगी हो गई और अपने पति को पत्थर पर लिटा कर उसके मुंह के ऊपर बुर रखकर बैठ गई।

   उन लोगों को हमा की तरह कोई जलदबाज़ी नहीं थी।

   ना ही कोई चिख चिल्ला रहा था।  सब आराम से कर रहे थे।  फिर बिमला अपने जेठ का लुंड चुना बैंड की तो अमृता तुरंत अपनी कमर को राकेश के मुंह से हटाकर उसे कमर के ऊपर ले आई और लुंड के ऊपर बुर रखकर बैठा गई।  अमृता अब संध्या को विकास का लुंड चुनने में मदद कर रही।

   दोनो ने पिताजी का लुंड खोब चुसा और संध्या ने भी अपना पेटीकोट उतर फेनका और अपने भाई के लुंड पर बैठाकर इस्तेमाल छोडने लगी।  अमृता ताई ने अपना पेटीकोट उतरा और टिनों के पेटीकोट को धोकर पास के पत्थर पर सुखने के लिए फेला दी।

   उधार संध्या अपने भाई को और बिमला अपने जेठ को छोडे जा रही थी।  अब अमृता डोनों मर्दों के बिच में पीठ के बल चलो गई।  ये देखो संध्या अपने भाई के ऊपर से हटी और अपनी भाभी का बुर चाटने लगी।  थोड़ी देर के बाद उसके ऊपर चिपक कर दे गई और अपनी भाभी की चुचियों को सहलाने लगी।  उन दूनों की बुर एक जग थी।  विकास उठा और अपनी भाभी और बहन के बुरे को बारी बारी से चुमा और आला लेटी भाभी अमृता की बुर में लुंड दलकर इस्तेमाल करने लगे।  2 मिनट भाभी को चोदने के बाद उसे लुंड ऊपर लिपि हुई संध्या के बुर में पेलकर छोडने लगे।

   उधार बिमला अपने जेठ की चुदाई की जा रही थी।  अब वो भी उसके ऊपर से उठी।  राकेश भी उठे और उसे अपनी बहू को चुमा।  बिमला भी अमृता के बगल में चलो गई और अपनी टंगों को घुटनो से मोड लिया।  ये देख कर ताऊ ने बिमला की बुर में लुंड डाला और इस्तेमाल करने लगेंगे।

   थोड़ी देर बाद राकेश ताऊ ने बिमला के बुर से लुंड निकला और विकास को इशारा किया।  विकास हमें समय अपनी दीदी को छोड़ रहा था।  उसे संध्या के बुर से लुंड निकला।  दोनो ने जग बदली।  राकेश ने पहले संध्या की बुर में लुंड डाला।  उधार विकास भी अपनी बीबी के बुर में लुंड दलकर इस्तेमाल करने लगेंगे।  संध्या की बर में 50-60 ढकके मारने के बाद राकेश ने आला लेटी अमृता के बुर में लुंड दलकर छोडने लगे।

   कुछ डेर में संध्या अपनी भाभी के ऊपर से हटकर बिमला के ऊपर 69 की मुद्रा में झुक गई।  उस समय संध्या के बुर के आला बिमला का मुंह था और बिमला के ऊपर संध्या का मुन।  पिताजी बिमला को छोडे जा रहे थे।  बिमला संध्या का बर चाट रही थी और संध्या अपने भाई के लुंड से चुद रही बिमला की बुर को चाट रही थी।

   उधार राकेश बगल में ही अमृता को छोडे जा रहे थे।  इधर विकास ने लुंड बिमला के बुर से निकला से संध्या ने बुर के रस से भींगी लुंड को चुनने लगी।

   क्या खूबसूरत दृश्य था।  मैंने अश्लील फिल्में ऐसी छुडाई देखी.  लेकिन गांव में ऐसा होता देख के बड़ा ताजब लगा।

   लुंड मेरा खड़ा हो चुका था।  मैंने भी अपना लुंड निकला और मुथियाने लगा।

   उधार अब संध्या बिमला के ऊपर से हटी और अमृता और बिमला के बिच ले गई।  अमृता उत्कर उसे बुर के ऊपर बैठ गई।  इधर राकेश अपनी बहन की बर में फिर से लुंड डाला और उसे छुडाई करने लगा।  माँ बिमला पिचे से ताऊ से लिपट गई।  पिताजी मां के पिचे आए और खड़े खड़े ही अपना लुंड पिचे से मां के बुर में दाल दिए।  धीरे धीरे ताऊ ने संध्या को चोदने की गति बढ़ा दिया।  ये देखकर बिमला उसके पीछे से हट गई।  ताऊ की छुडाई बयान होने लगी।  संध्या ने अपने जोड़ी हवा में उठा दिया।  ये देख उसकी एक जोड़ी को पिताजी ने पक्का और दसरे जोड़ी को बिमला ने।  4 मिनट जैसा जोरदार चुदाई के बाद राकेश ताऊ संध्या की बुर में झड़ गए।

   उधार अमृता संध्या के मुंह के ऊपर ही बैठी थी।  तौजी ने लुंड अपनी बहन के बुर से निकला और वही बैठाकर लंबी सांस लेने लगे।  उसके हटे ही पिताजी ने संध्या की बुर में लुंड गया दिया।  अपने बड़े भाई की विर्या से भरकर चिकनी हो चुकी बुर को छोड रहे थे।  फिर उसे भी कमर हिलाने की स्पीड बढ़ा दी।  कुछ डर ज़ोरदार छोडने के बाद विकास भी अपनी दीदी की बुर में झड़ गए।  उसे जब लुंड निकला से बिमला और अमृता ने दूधर संध्या का बर खोब छटा।

   उसके बाद वे पचों फिर से झरने में घुस गए और नहीं लगे।  नाहकर कापड़े पाने।  सुखाए हुए कपड़ो को इकत करके ऊपर खेतो की या चल दिए।

   तब तक मैं भी मुंह मार्कर झड़ चुका था।  उसके जाने का बाद मैं भी वहां से वापस घर की या निकला गया।

   घर पहूँचा से रेखा चाची ने आम का शरबत बना रखा था।  उसे मुझे शरबत दिया।  उसे पाइन से गरमी में राहत का एहसास हुआ।  रेखा ने उस समय ढेर रंग की साड़ी पाहन राखी थी।  बड़ी ख़ूबसूरत लग रही थी।  मैंने उसे बोला, “चाची आज तो आप बहुत सुंदर दिख रही है।”

   उसे बोला, “बेटा, चाची से झूठ बोले शर्म आती है!”

   “नहीं चाची, आप तो बहुत बहुत खूबसूरत है।  चाचा कितने खुशिस्मत हैं जो आप जैसी खूबसूरत बीबी मिली उन्को।”

   “बेटा, तुमेन तो और सुंदर बहू मिलेगी।”

   “पटा नहीं चाची, मुझे तो कोई पसंद नहीं करता है।”

   “हैं, तुम कहते ही नहीं होंगे!”

   “हां, मुझे डर लगता है।”

   ये कहकर मैं अपने रूम में गया।

 

   दोपहर को राकेश, विकास, अमृता, संध्या और बिमला भी घर आ गए।  रेखा चाची ने उन सबको भी आम का शरबत पिलाया।  फिर थोड़ी देर सबने आराम किया।  मां और ताई ने झट-फट खाना पकाया और हम सबने साथ में दोपहर का खाना खाया।

   मैं घर के पिचे तारफ छायादार पेड़ के आला खटिया लेकर चलो गया।  एक प्रतियोगी परीक्षा की सामान्य ज्ञान वाली किताब पढने लगा।  आधे घंटा बाद संध्या बुवा आई और खटिया पर मेरे बगल बैठा गई।

   “छाया में पढाई कर रहे हैं बेटा?”

   “हान बुवा।”

   “बेटा तुम बहुत पढाई करते हो।  ये अच्छी बात है।  तुमेन इस तरह पढ़ते देख के बहुत अच्छा लगता है।”

   “कोशिश कर्ता हुं बुवा।”

   “लेकिन बेटा पढाई के साथ थोड़ा घुमना फिरना भी चाहिए।  गांव के नंगे, गांव के काम भी सीखना चाहिए।”

   “वो तो सही है बुवा।  कल से मैं भी आप लोगों के साथ खेत में जया करुंगा।”

   “ये तो बहुत अच्छी बात होगी।”

   हलंकी दिखने में वह साधरण ग्रामीण औरत लगती है, लेकिन उसे आवाज बहुत ही मीठी लगती है।

   वो बोली, “बेटा तुम देखते देखते इतना जवान हो गया है।  अब तो तुम्हारी शादी करनी पड़ेगी।  कोई लड़की देखी की नहीं?”

   “नहीं, मैं तो गांव में नहीं रहता हूं ना।  किसी को नहीं जनता हूं।”

   “हां बेटा, वो तो है।  तुम सहर वालों के चक्कर में मत रहना।  तुम्हारी करा दें क्या?”

   “शादी करके क्या मिलेगा बुवा?  मैं तो कामता भी नहीं हूं।”

   बुवा बोली, “बेटा, शादी करने से तुम्हें प्यार करने वाली बीबी मिलेगी। अच्छा खाना मिलेगा।”

   “वू तो आप लोगों से भी मिलता है। आप लोग मां, बड़ी ताई, चाची और आप मुझे कितना प्यार करती हैं!”

   “लेकिन जवानी वाला प्यार तो नहीं मिलता ना तुम! तुम कहो तो लड़की देखो क्या मैं?”

   मैं बोला, “देख लीजिये।”

   “कैसी लड़की चाहिए बेटा?”  वो पुछी।

   “मुझे तो आप, चाची, बड़ी ताई और मां जैसी चाहिए। मुझे आप लोग बहुत अच्छी लगती हैं। आप लोग कितना प्यार करता हूं।”

   “बेटे, हम तो बुद्धि हो गई हैं।”

   “कहां बड़ी लगती है?  आप को देख कोई भी आपको बड़ी नहीं बोलेगा।  जवान भाभियों जैसा लगता है आप।  आप लोग अच्छी साड़ी सीखेंगे, छोटा श्रृंगार करेंगे तो अब भी जवान लड़के आपको पसंद करेंगे।”

   सुनकर वो थोड़ा शर्मा गई।

   इसी तरह थोड़ी देर और बात किया।  फिर वह वहां से चली गई।  मैं फिर पढ़ने लगा।  थोड़ी देर में झपकी आ गई।

   शाम को मैं नदी गया।  वहान बबलू मिला।  हम दोंन साथ नहीं।  उसे बताया, “आज मैंने अपनी भाभी से बात किया।”

   “तो क्या बात हुई?”

   “मैंने तुम्हारे नंगे बात किया।  वो भाभी मान गई है।”

   “लेकिन मैं तो तुम्हारी भाभी से ज्यादा नहीं बात किया हूं।  कैसे मान गई!”

   “नया लुंड चाहिए भाई का प्रयोग करें।”

   “लेकिन मुझे तो चोदना नहीं आता है।”

   “तुम चिंता न करो।  सब हो जाएगा।  करने से ही खोजोगे ना!”

   “हां भाई, तुम सच बोले हो।”

   “आज भैया घर पर नहीं हैं।  वह आज ही अपना ससुराल कुछ काम से गया है।”

   “अच्छा!”

   “अरे वहन जकार वह अपनी साली को छोटा है।”

   “अरे बाप्रे, साली को भी!”

   “हां, भइया चुदाई के बड़े खिलाड़ी हैं।  ठीक है, कल सुबह मिलते हैं।”

   “अच्छा!”

   फिर हम दों अपने अपने घर चले गए।

 

   फिर से परिवार तांडव:

   रात का खाना उस दिन जल्दी मिल गया था।  हमारे दिन बुवा रेखा चाची के घर सो गई थी।  राकेश और ताई अपने घर, मां और पिताजी अपने घर सो गए।  मेरा कमरा अलग से बने एक छोटे घर में था।  मैं भी जल्दी ही सोने चला गया।  क्यों रात को मुझे घर में छुडाई देखनी थी।

   रात के 12:30 बजे मेरी निंद टूटी।  मैंने पानी पिया और रूम से निकला।  ताऊ के घर की या गया।  वहन कोई हलचल नहीं थी।  मुझे लगा बुवा तो रेखा चाची के घर है, शायद वही कुछ होगा।  इसिलिए मैं रेखा के घर के पिचे की खिड़की की या गया।  गरमी के दिन खिड़की पूरी राखी जाती है।  मैं खिंदकी के पास गया तो अंदर से थप्पड़-थप्प की आवाज आ रही थी।  मैं समझ गया चुदाई चालू है।

   मैंने चुपके से अंदर देखने की कोषिश किया।  अंदर सोलर लैंप जलया गया था।  अंदर देखा तो एक पलंग में संध्या बुवा और रेखा चाची आगल बगल लेति हुई थी।  राकेश ताऊ अपनी बहू रेखा को गपगप छोड रहे थे।  पिता जी अपनी दीदी को छोड रहे थे।  अमृता अपने पति के पिचे नंगी लिपि हुई थी।  माँ अपने पति विकास के पीछे लिपट कर उसके छत्ती को सहला रही थी।  आज थोड़ा स्पीड में चुदाई चल रही थी।  रेखा बोली, “जेठ जी, और जोर से छोडिये।  इस्स्स्स .. इम्म्म्मा!  दीदी बड़ा मजा आ रहा है।”

   उधार संध्या भी बोली, “उउउ विकास, थोड़ा जोर से छोडो ना रे!  उइइ… ऊ…आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्अअअअअअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ताकि धन्यवाद करना चाहिए ताकि ताकि उसे मदद मिल सके.

   राकेश और विकास उन औरतों को छोडे जा रहे थे।  थोड़ी देर बाद राकेश और विकास ने हिलना बंद किया।  अब रेखा, बिमला, स्नेहा और अमृता एक लाइन में बिस्तर पर जाने दें।  पिता जी ने एक किनारे लाते रेखा के बुर में लुंड पेला और कमर हिलाने लगे।  साथ में वे उसकी चुची सहला रहे थे।  उधार राकेश ताऊ ने भी दसरे किनरे अपनी बीबी अमृता की टंगों को फेलकर छोडना शुरू कर दिए।  बिमला और संध्या बिच में अपनी अपनी चुचियां सहला रही थी।  3-4 मिनट बाद पिता जी ने चाची के बुर से लुंड निकला और बगल में लेटी बिमला के बुर में लुंड गुसाकर चोदने लगे।  इधर राकेश ने भी अपना लुंड अमृता के बुर से निकल कर बहान संध्या के बुर में घुड़दिया।  अब चुदाई फिर धिमी हो गई थी।

   राकेश और पिताजी आराम से छोड रहे थे।  बिच में हिलना बैंड करके चुद रही औरतों को चुनने लगते थे।  उन सब में रेखा चाची सबसे गोरी लगती हैं।  संध्या का रंग सबसे काला है।  लेकिन चुदने में किसी से कम नहीं।  अब पिता जी ने बिमला के बुर से लुंड निकला और ताऊ ने भी संध्या के बुर से लुंड निकला।  पिता जी अब संध्या के टंगों के बिच आए और ताऊ अब बिमला के जोड़े के बिच।  संध्या और बिमला ने अपने जोड़ी ऊपर की या उठा दिया।  जिनसे उन दूनों की बुर साफ दिखने लगी।  उन चारो औरतों की चुत झांठों से भारी थी।

   ताऊ ने बिमला का बरचटना शुरू किया और उधार पिता जी अपनी दीदी का बुर चाटने लगे।  छपर-छप्पर बर चटकर जिला किया और पिता जी अपनी दीदी संध्या के बुर को छोडने लगे।  उधार ताऊ भी अपनी बहू बिमला को चोदने लगे।  कामरे में थप्प-थप्प, पुच्छ-पच्छ की आवाज आ रही थी।

   कुछ डेर की चुदाई के बाद पिताजी ने संध्या के बुर से लुंड निकला और भाभी अमृता की चुत में लुंड घुसा दिया।  उधार ताऊ ने भी बिमला का बुर छोडकर अपनी छोटी बहू रेखा की चुत में लुंड पल दिया और गपगप छोडने लगे।

   मैने राकेश ताऊ की ढकके को जिन्ना शुरू किया।  उन दूनों ने चुदाई एक गति में जारी रखा।  राकेश ताऊ जब रेखा चाची के बर से लुंड निकले तो 327 ढकके लगा चुके थे।

   अब चारो औरतें बिस्तर से ऐसे।  रेखा ने पास रखी मिट्टी के गड़े (मिट्टी के बर्तन) से एक जग पानी और 2 गिलास लाया।  उसे पहले राकेश और विकास को पानी दिया और उस गिलास में अमृता, संध्या, बिमला और रेखा ने भी पानी पिया।

   उसके बाद वे सभी थोड़ी देर चुपचप पलंग पर बैठे।  शायद थोड़ा रिलैक्स हो रहे थे।  कुछ डेर बाद अमृता ने पिताजी को पलंग पर लिटाया और संध्या ने राकेश को भी बगल में दिया।  बिमला पिताजी के सिरहाने बैठक उसके मुंह को किस करने लगी।  इधर रेखा भी अपने बड़े जेठ के बगल बैठक में इस्तेमाल करें चुम्ने लगी।

   संध्या अपने बड़े भाई का लुंड चुस्ने लगी और अमृता अपने देवर का लुंड चुनने लगी।  थोड़ी देर लुंड चुनने के बाद अमृता अपने देवर के लुंड को किली बनार बैठा और संध्या अपने भैया के लुंड को किली बनार बैठा गई।  अमृता और संध्या “शीर्ष पर महिलाएं” स्थिति में उन मर्दों को छोड रही थी।  उधार रेखा भी किस करना छोडकर अपने जोड़ी को राकेश के सर के अगर बगल बगल रखकर उसके मुंह के ऊपर बर रख कर बैठ गई और अपना बर चटवाने लगी।  इधर बिमला भी अपने पति के मुंह पर अपनी झंझट भरी चुत रखकर उससे चुत चटवाने लगी।

   अक्सर पोर्न फिल्म में दिखने वाला सीन मेरे घर में लाइव चल रहा था.  ये खेल पता नहीं कब से चला आ रहा था।

   अमृता बोली, “संध्या, आज इन दूनों का पानी मैं अपने चुत में लुंगी।  तुम 2-3 दिन से अपने चुत में ले रही हो।”

   “ठीक है भाभी, आज भैया और भाई के लुंड का पानी आपको ही मिलेगा।”  संध्या बोली।

   “दीदी, उसके पहले मैं भी दून जेठ को आज जी भरकर छोडना चाहता हूं।”  रेखा बोली.

   ये सुनकर अमृता बोली, “ठीक है रेखा, आ जा मेरी जगा ले ले।”  ये कहकर वो मेरे पिताजी के ऊपर से हट गई।  और रेखा भी अपने बड़े जेठ के मुंह के ऊपर से उत्थान छोटे जेठ विकास के लुंड के टोपे पर अपना चुट रखा और बैठा गई और ऊपर आला होने लगी।  उधार बिमला भी अपने पति के मुंह से हटकर राकेश ताऊ के मुंह के ऊपर चुप रख दी।  संध्या अब भी बड़े भाई के लुंड की सवारी कर रही थी।  अमृता अब पिताजी के मुंह के ऊपर बैठ गई।

   मैंने रेखा चाची के हिलने को जिने लगा।  वो जब 166 बार ऊपर आला हुई तो पिताजी ने अमृता का चुत चटना बंद किया और कहा, “भाभी, अब आप आ जाए मेरे लुंड के ऊपर।”

   अमृता बोली, “नहीं विकास, तुम मुझे कुतिया बनाके छोडो उसमे थोड़ा तंग लगता है।”

   ये कहकर अमृता ने अपना बुर पिताजी एमुंह के ऊपर से हटा दिया और पलंग के आला उतर कर पलंग के सहे झुक गई।  रेखा भी विकास के लुंड के ऊपर से हाथ गई।  विकास उठे और अमृता के पीछे आकार उसकी चुत में निशान लगाकर लुंड चुत में उतर दिया।  उधार संध्या और बिमला भी राकेश के ऊपर से हाथ गई।  संध्या भी आला उतर कर अमृता के बगल में पलंग के सहेरे आगे झुक गई।  राकेश पलंग से आला उतरे और संध्या की चुत में कुट्टे की तरह लुंड दाल दिए।  अब जोर दार चुदाई शूरु हो चुकी थी।  पिताजी अपनी भाभी को जोर से धक्का देने लगे।  मैं अब हम ढक्कों की सांख्य जिने लगा।  धीरे धीरे तेज होता गया।  पिताजी लंबी लंबी बिना लेने लगे।  और 370 जोर्डर ढककों के बाद उसे एक लंबा जोरदार धक्का मारा, अमृता की कमर को कसके पकाड़ा और छिल्लये, “आह भाभी, मैं गया!”  अमृता बोली, “सारा पानी और आने दो।  आह्ह्ह इस्स्स… ऐसा लग रहा है जैसा गरम गरम और पिचकारी लग रहा है।”

   थोड़ी देर कासके पकेने के बाद पिताजी ने अमृता को ढिला छोड़ दिया।  और अपना लुंड निकला।  जैसे ही पिताजी ने लुंड निकला, रेखा ने लपक्कर पिताजी का मुरझाया लुंड चुना शूरु कर दिया।

   अमृता अब पलंग में गड्ढे के बाल देर से गई।

   उधार राकेश भी संध्या की चुदाई बंद करके अमृता की टंगों को फेलाया।  और अपने भाई की वीर्य से भारी गिली अमृता की चुत में तपाक से लुंड घुड़दिया और जोर से छोडने लगे।  उसके ढककों से पलंग भी हिलने लगा।  अमृता की एक तांग को एक तरह से संध्या ने पक्का लिया और दसरी तांग को रेखा ने पक्का लिया।  अमृता ताई की टंगेन 160 डिग्री मेई फेलि हुई थी।  उसे ताऊ जी अपना लुंड झड़ तक पल रहे थे।

   उसके धक्कों की रफ़्तार भी तेज़ होती गई।  450 से ज्यादा ढकके लगा चुके थे।  फ़िरुउसने एक लम्बा धक्का मारा और अमृता की कमर को जकड लिया।  वे चिखे, “ओह रे अमृता, मैं झड़ गया रे!  तुम्हारी चुत अब भी चिकनी है.!”  अमृता आंख बंद करके अपने पति का वीर्य अपने चुत में ले रही थी।

   अपना लुंड अमृता की चुत में खली करने के बाद ताऊ ने अमृता के बुर से लुंड निकला।  बिमला अपने जेठ के मुर्झाये लुंड को चुस्कर साफ करने लगी।  अमृता ताई निदाल हो चुकी थी।  वैसा ही तांग फेलकर लेति रही।  लम्बी बिना लेने लगी।  ये देखो संध्या बोली, “कैसा लगा भाभी!”  उसके बाद संध्या अपने भाईयों के विर्या से भारी अमृता की छुट को चटने लगी जैसी जो विर्या बहार आ रहा है, चैटकर पी रही हो का उपयोग करें।  “बहुत नमकीन नमकीन स्वद लग रहा है, भाइयों के पानी से भारी छुट भाभी।”  वो बोली।

   झड़ने के बाद राकेश और विकास नंगे ही बहार निकले।  और थोड़ी देर में वापस आ गए और वही पलंग पर ले गए।  शायद वे पेशाब करने गए।  रेखा चाची ने अपनी साड़ी, और घर के दसरे तारफ चली गई, जिधर उसकी छोटी बेटी सोई हुई थी।  बाकी औरतेन वही पलंग पर नंगी ही चलो गई।

   मेरा लुंड कब से कड़ा था और प्री-कम से लस्लासा हो गया था।  मैं भी उनको वही सोटा छोडकर वहां से चला गया और पेश करके अपने कमरे में गया।  उस समय 1:30 बज रहे थे।  मतलाब उनकी छुडाई 1 घंटे चली।  मैंने अपना पंत शर्ट उतरा, पूरा नंगा हो गया।  पैरासूट नारियल तेल निकला और 10 मिली जैसा आपने लुंड पर डाला और चिपचिपा लुंड को खोब मुंह मारा।  कभी रेखा चाची की चुत को याद कर, कभी संध्या की चुत को, कभी अमृता की चुत को याद किया तो कभी अपनी मां की छुट को याद कर लुंड का सुपाड़ा आया पिछे किया।  अपनी गोठियों को भी सहलय।  एक घंटे से मैं उत्तेजित था, तो 4 मिनट में ही बहुत सारा गढ़ा माल निकल गया।  उसके बाद अच्छी और आ गई।

   दुसरे दिन सूबा 6 बजे उठा।  हम दिन गुरुवर (गुरुवार) का दिन था।  गांव की मान्यता के अवसर गुरुवर को बैलों, भैंसों को आराम दिया जाता है।  दिया जाता है का वीकली ऑफ।  हमारे दिन कोई हल नहीं चलता है।

   मैं घर से बहार निकला तो आंगन में पिता जी और ताऊ जी बैठे हुए थे।  अच्छे कपड़ों को रख रखा था।  मैने पुछा, “कहीं जा रहे हैं क्या?”

   पिता जी बोले, “बेटा, हम दों तुम्हारी बुवा के गांव जा रहे हैं।  वहां के खेत में तुम्हारे फूफा को मदद करेंगे।  एक सप्त वही रहेंगे।  तुम इधर उधर ज्यादा मत घुमना।  बैल बकरियों को संभलने में मां, बड़ी मां और बुवा को मदद करना।  घर पर ही रहना।  बहार धूप भी बढ़ गया है।”

   मैं बोला, “ठीक है पिताजी!  लेकिन मैं घर में अकेले बोर हो जाता हूं।”

   उसके बाद वो राकेश ताऊ और पिता जी घर से निकल गए।

   मैं भी नदी की या चला गया।  वहा मुझे बबलू फिर मिला।  उसे बोला, “राहुल, आज रात को तो भाभी की खूबसूरत तुकाई किया मैंने।  भैया नहीं है ना!”

   “अच्छा!  यार तुम तो बहुत माजे करते हो।  मेरी तो साला किस्मत खराब है।”

   “भाई, किस्मत बनानी पड़ी है।  अपने आप कोई चीज नहीं मिलती है।”

   “सही है।”

   “कल दोपहर 2 बजे गणव के आला तारफ बड़े पीपल पेड़ के पास मिलना।”

   “क्यों, क्या है वहा पर?”

   “क्या आयेगा तब पता चलेगा।  तुम बस आ जाना कल।”

   मैने बोला, “ठीक है।  कल या आज?”

   “कल।”  उसने कन्फर्म किया।

   उसके बाद मैं घर की या चल दीया।

  

   चाची बनी मेरा पहला प्यार:

   जब मैं वापस घर पहुंचा से 7:30 बज रहे थे।  मां, संध्या बुवा और अमृता ताई जंगल की या चली गई थी।  रेखा चाची ने रोटी-सब्जी का नास्ता दिया।  मैं नास्ता करके अपने रूम में आ गया।

   4-5 दिन से मेरे घर के लोगों की छुडाई देख कर मेरा दिमाग नए तारिके से सोचने लगा।  पोर्न फिल्म में देखने वाले सीन लाइव होते हुए देखा।

   थोड़ी देर बाद चाची आम का शरबत लेकर आई और मुझे पाइन को दिया।  वो वही मेरे बगला मेरे बिस्तर पर बैठ गई।

   मैंने पुछा, “बच्ची कहां है?”

   “वो अभी सो रही है।”

   “अकेले!  यहां लेके आई का प्रयोग करें।”

   चाची अपने घर गई और बेटी को लेकर आई।  उसके घर के अंदर वाले कामरे के बिस्तर में इस्तेमाल सुला दिया।  और फिर मेरे बगल बैठा गई।

   “चाची, चाचा कब आएंगे?”  मैंने पुछा।

   “पटा नहीं, जब लॉकडाउन खतम होगा तब शायद आएगा।”

   “आपको उसे याद नहीं आती चाची?”

   “याद तो आता है, लेकिन तुम लोग हो ना साथ में!”

   “हां, ये तो है।”

   हमें समय पिंक कलर की साड़ी पहन राखी थी।  वाह कॉलेज की पढाई 12वीं की है।  इसिलिए पहने का सालिका अच्छी तरह आता है।  गोरा बदन और गुलाबी साड़ी बहुत सुंदर लग रही थी।  मैंने कहा का उपयोग किया, “चाची, गुलाबी साड़ी में है तो आप बहुत सुंदर लग रही है।”

   “अरे कहाँ, अपनी चाची से ऐसा मज़ाक करते हैं क्या?”

   “नहीं, आप तो स्वर्ग की अप्सरा जैसी लग रही है।  काश मुझे भी आपके जैसी खूबसूरत लड़की मिल जाए!  लेकिन मुझे तो कोई पसंद नहीं करता है।”

   “तुम तो कितने हैंडसम लगते हो।”  उसे मेरा बाइसेप्स पक्का और कहा, “देखो, मसल्स कितना मजबूर लग रहा है।”

   “कहां आप तो चने के झड़ पे चड्ढा रही है!  सच कहूं तो आप विद्या बालन जैसी लग रही हैं।”

   ये सुनकर वो मेरे से सत के बैठा गई।  उसे मेरा हाथ पक्का और कहा, “समाज लो मेरे जैसी मिल गई तो!”

   “मुख्य उपयोग बहुत प्यार करुंगा।”

   “कैसी?”

   “पा … पता नहीं” मैं हकलाते हुए बोला।

   उसके चुनने से मेरा लुंड अपने आप खड़ा होने लगा।  रेखा ने निकर के अंदर उठ रहे हैं तंबू को देख लिया।  उसे मुझे कहा, “राहुल, मैं तो बड़ी हो गई, नहीं तो तुमसे जरुर प्यार करता।”

   “आप तो अभी जवान हैं।  मेरा बस चले तो आप ही को प्यार करता है।”

   ये सुन्ते ही उसे मेरे माथे को चुम लिया।  मैं सिहर उठा।  उसे फिर से मेरे माथे को चुमा।  क्या बार जवाब में मैंने भी इस्तेमाल किया वैसा ही उसके माथे की बिंदी पर चुमा है।

   वो फ़िर आगे बड़ी।  उसे मुझे माथे, आंख, कान, गल, बगीचा पर चुमा और कहा, “आई लव यू बेटे!”

   “मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ चाची!”  मैने जवाब दिया।

   मैंने हिम्मत करके उसके होठों पर किस किया।  उसे भी रिप्लाई में मेरे होठों को किस किया।

   “तुम बहुत खूबसूरत हो चाची।”

   “क्या सचमुच!”

   “हां चाची।  ये मुझे क्या हो रहा है?”

   मैने उसका हाथ पकडकर उत्थान।  वो बहुत ही खूबसूरत लग रही थी।  मैंने कहा, “चाची आपको देख कर बेकाबू हो रहा हूं।  आप हैं ही इतनी सुंदर की जी भरकर देखने का मन करता है।”

   “ओह राहुल, साची!”

   “हां, चाची, मुझे करीब से जी भर कर देखने दिजिये।”

   मुख्य उपयोग इतनी नाज़दिक और ध्यान से कभी नहीं देखा था।  मैंने उसकी आंखों में आंखें डालकर देखा।  फिर उसके होठों में अपने होठों ने दिया और इस्तेमाल किस करने लगा।  उसे भी जवाब में मुझे किस करना लागी।  उसे मुझे धीरे से ढकेलकर मेरे बिस्तर पर लीता दिया और मेरे ऊपर ले गई।  और मुझे चुमने लगी।  मेन अस समय टी-शर्ट पहना था।  उसे मेरे टी-शर्ट को उतर दिया।  वो मेरी चाटियों को सहलाने लगी।

   “कितना हट्टा-कट्टा हो गया रे तू!”

   मैं कुछ नहीं बोला।  किसी महिला का स्पर्श क्या होता है, आज महसूस हो रहा था।

   थोड़ी देर में वो मेरे शरिर को चुमती रही।  मेरी छटी पर जीभ फिराने लगी।  मुझे अजीब गुडगुडी हो रही थी।  वो धीरे-धीरे मेरे पेट तक आई।  निकेर के अंदर तंबू बन चुका था।  उसे पंत के ऊपर से ही लुंड पर हाथ पेरा तो मैं चिहुंक गया।  “ओह चाची!”

   वो समझ गई की मैं तयार हो रहा हूं।  वो बोली, “बेटे, इस्का इस्तमाल किसी लड़की के साथ किया की नहीं?”

   “नहीं चाची!”

   “अपनी चाची से प्यार करेगा?”

   “हां चाची।”

   मैंने चाची को बोला, “आप साड़ी में बहुत सुंदर लग रही है।  आपका फोटो खिनचना चाहता हूं मोबाइल से।  1-2 फोटो पोज दिजिये ना!”

   वो बोली, “ठीक है।  खिंच लो।”

   उसे अपना आंचल और बाल ठीक किया और पोज देने लगी।  मेन 8-10 फोटो लिए।  कुछ क्लोज अप फोटो लिया।  बहुत खुश हुई फोटो देखा का प्रयोग करें।  “चाची, ये देखी कितनी प्यारी और सुंदर लग रही है आप!  एकदम परी जैसी।  फिल्म की हीरोइन से भी ज्यादा सुंदर।”

   ये कहकर मैंने मोबाइल रखा और उससे लिपट गया।  और फ़िर इस्तेमाल करें चुम्ने लगा।  मैंने उसका आँचल पकाड़कर देखा तो उसका आँचल उसकी छत्ती से आला सरक गया।  उफ्फ… मुझसे रहा नहीं गया।  मैने उसे जोर से जकड लिया।  मैं कणप रहा था।  वो मेरी उत्तेजना समझ गई थी।

   उसे मेरे हाथ को अपने चुचियों के ऊपर रखा।  मैं ब्लौज के ऊपर से उपयोग सहलाने लगा।  मैंने ब्लौज के बटन खोलने की कोषिश की।  लेकिन मुझसे नहीं खुल रहा था।  रेखा ने मेरी मदद किया।  ब्लौज के हुक खोल दिया।  उसे ब्रा नहीं वहां रखा था।  शायद दूध पिलाती हैं इसिलिए।

   ब्लौज खुलते ही उसके बड़ी गोल-गोल गोरी चुचियां मेरे सामने थी।  मैं उन चुनियों से खेलने लगा।  निप्पल चुस्ने लगा तो दूध आने लगा।  इसे वो भी जोश में आने लगी।  “आह राहुल, ऐसे ही चुस्ते रहो।  बड़ा अच्छा लग रहा है।”

   इसी बिच मैंने फिर अपने से चिपका लिया का उपयोग करें।  मेरी चाय उसकी चुचियों से चिपकी हुई थी।  मेरी सांस तेज चलने लगी।  मैं उसके गड्ढे को सहलाने लगा।

   वो भी मेरी गड्ढे को सहलाने लगी।

   मेरा लुंड निकल के अंदर तंबू बना हुआ था।  चाची से लिपटने से लुंड चाची की पेट में चुभ रहा था।  ये महसूस कर चाची ने मेरा निकर आला सरकार और चड्डी भी सरकार दिया।  और उसे मेरा लुंड अपने हाथ में ले लिया।  उसके तो मेरा लुंड पक्काने से मुझे बहुत अच्छा लगा।  ये किसी महिला का पहला हाथ था जो मेरे लुंड को पक्का था।

   इसी बिच मैंने उसे साड़ी उतारने की कोषिश किया तो उतर नहीं पाया।  वो समझ गई।  वो मुझे खिंचकर बिस्तर पर बैठा और बिस्तर पर जाने दो।  मैं अब पूरी तरह नंगा हो चुका था।

   रेखा ऊपर पूरी तरह नंगी थी।  आला साड़ी और पेटीकोट में थी।  मैंने आला से साड़ी उठाया।  जैसे जैसे साड़ी घुटने से ऊपर उठी उसी गोरी, मंसल, चिकनी जंग दिखने लगी।  मैं उनकी टंगों को सहलाने लगा, उसकी जगों पर हाथ फिरने लगा।  फिर मैं उसके गोरी चिकनी जोड़ी को चुमते, सहलते हुए ऊपर घुटनों तक और फिर धीरे-धीरे जांघों तक आया।  उसकी खूबसूरत को आज पहली बार इतने सामने से देख रहा था।  ऐसा लग रहा था, मनो सब सपना है।

   मैंने साड़ी को फिर से उतरना चाहा।  तब रेखा ने खुद साड़ी खोला और पेटीकोट भी हटा दिया।  अब वो पूरी नंगी मेरे सामने पड़ी थी।  इतनी खूबसूरत बदन!  उफ्फ!

   मैंने उसे नहीं में जिभ दलकर उससे चैट लगा।  एक हाथ से उसे चुत के ऊपर की झोंपड़ी को सहलाने लगा।  मैंने कहा, “चाची, आप बहुत ख़ूबसूरत हैं।”

   “धन्यवाद राहुल।”

   मैंने चाची के जोड़ी फेलाया।  और उसकी चुत को ध्यान से देखने लगा।  मैं पहली बार किसी औरत या लड़की की चुत को इतने करीब से देख रहा था।  बहुत ध्यान से देखने लगा।  छुट थोड़ी गिल्ली-गिल्ली लग रही थी।  गुलाबी लग रही थी।

   इतना ध्यान से देखते हुए चाची बोली, “ऐसा क्या देखा है?”

   “पहले कभी नहीं देखा चाची।”

   मैने झुक्कर उसकी चुत को सुंघा।  बहुत मधोश करनी वाली खुशबू थी।  “क्या खुशबू है आपकी मुनिया से!”

   चाची हांसी, “हाय हाय हाय”।

   उसके बाद मैंने झंटों के बिच की गुलाबी चुत पर अपना जीवन लगाकर छटा।  एक नमकीन-नमकीन सा स्वाद आया।  उसकी चुत चिप-चिपा रही थी।  मैने थोड़ा रुका।  चाची को देखा, उसे आंख बंद कर रखा था।  मैंने फिर से चाची गुलाबी चुत में जीभ डाला और उसकी गिली चुत को चाटने लगा।  छुट के रस का स्वाद अच्छा लगने लगा।  कुछ रस को मैं चैट कर गटकने भी लगा।  सुदुप-सुदुप चाट रहा था।  वो मेरे सर को अपनी छुट में दबाने लगी।  मैं और जोश में चुत चाटने लगा।  मैं बहुत डेरी तक चुत चाटा।  उसकी चुत मेरे लार और चुत के रस से गिली हो चुकी थी।  मैं छप्पर्र-छप्पर्र चते जा रहा था।

   रेखा बोली, “बस कर राहुल!”

   “बहुत स्वस्थ लग रहा है। चने दिजिये। आपको अच्छा नहीं लगा क्या?”

   “बहुत मजा आ रहा है बेटे!”

   मैं लगतार चुत चुस्ता चट्टा रहा।  उसकी बुर से गीला रस निकलता रहा।  अचानक उसके चुट से बहुत ज्यादा रस निकल गया।  शायद उसका ओगाज़्म हो गया था।  वो उठी और बगला रखे जग से पानी निकल कर पानी पाई ली।  वो लंबी बिना लेने लगी।

   थोड़ी देर में वो मेरे बगल बैठ गई।  उसे कहा, “राहुल, तुमने कहां पढ़ा?”

   “बस अपने आप हो गया चाची।  आप हैं ही इतनी खूबसूरत की मुझसे रहा नहीं गया।  कुछ गलत कर दिया क्या?”

   “नहीं रे।  बहुत अच्छा लगा।”  वो बोली और उसे मुझे बिस्तर पे लताया।  और मेरे मुं में अपना मुंह दलकर मेरा जीब चुन लेगा।  ऐसे ही हम एक दुसरे की जीवन को अच्छे रहे।  आला मेरा लुंड आसमान को सलामी दे रहा था।

   उसके बाद चाची ने मुझे बड़े ध्यान से देखा, “कितना हैंडसम हो गया तू?  जब मैं शादी होके यहां आई तो तुम छोटे और दुबल पाताल लगते हैं।”

   वो मेरी बगीचा और छत्ती को चुम्ते हुए आ गई।  उसे मेरा लुंड अपने हाथ में लिया और लुंड के सुपड़े को आला किया फिर ऊपर किया।  फ़िर आला किया।  “तुम्हारा हटियार तो बहुत बड़ा भी है।  तुम्हारे चाचा से भी बड़ा।” 

 मेरा लुंड खड़ा होने पर 7” से थोड़ा ज्यादा होता है।  पिताजी और ताऊ से तो बड़ा ही था।

    रेखा ने अपना मैं आला लाया और बड़े प्यार से मेरे लुंड के सुपड़े को मैं लिया और उसपर जीभ फिराने लगी।  ये अनुभव मेरे लिए अभूतपूर्व था।  ऐसा आनंद पहले नहीं मिला।  फिर उसे लुंड को अपने मैं में और बाहर करने लगी।  30-40 बार करने के बाद वो रुकी।  और मेरे तत्वों से खेलने लगी।  मेरे लुंड के आस-पास के झटके को सहलाने लगी।  वो फिर छुकी और दुबारा लुंड चुनने लगी।  मैं चुसाई का मजा ले रहा था।

    थोड़ी देर लुंड चुनने के बाद वो अपने जोड़े को मेरी कमर के दो तार रखकर बैठ गई और मेरे लुंड के सुपरडे को अपनी छुट की छेड़ पर निशान लगाकर धीरे से बैठा गई।  मेरा लुंड धीरे धीरे उसकी गिली चुत को चिरता हुआ चुत में समा गया।  वो मेरे लुंड को पूरी तरह चुट की गहरियों में मैं लेकर चुपचाप मेरे ऊपर बैठी रही।  ये भी मेरा पहला अनुभव था।  ऐसा लगा जैसा मेरा लुंड किसी गरम, नारम, चिपचिपी छेद में समा गया है।

    “आह चाची, इतना मजा आ रहा है।  आपकी मुनिया कितनी गरम लग रही है।”

    वो अब धीरे-धीरे अपनी कमर ऊपर करने लगे।”  शायद 20 बार जैसा ऊपर आला हुई की मुझसे कंट्रोल नहीं हुआ, मेरी कमर अपने आप आला से झटका मारने लगा।  8-10 धक्का लगा ही था की मैं उसकी चुत के अंदर ही झड़ गया।  वो मेरे लुंड को पूरा खाली होने तक लुंड के ऊपर बैठी रही।  मेरा लुंड उसके बाद सिकुद चुका था।

    “सॉरी चाची!  मैं आपके अंदर गंडा कर दिया।”

    “ये गंदा नहीं है बेटे, इससे मुझे बहुत मजा मिला।”

    वो मेरे ऊपर से उठी।  उसकी चुत से मेरा कुछ वीर्य बहार निकला रहा था।  वो पलंग से आला उतरी और पास राखी तौलिया से मेरे पासिन को पोंचने लगी।  उसे मुझे फिर से चुमा और कहा, “बहुत खूबसूरत राहुल।  अब आराम कर लो.  बाद में फिर करेंगे।”

    मैं उसी हाल में लेटा रहा और अपनी सांसों को समने लगा।

    उस समय 9 बज रहे थे।  चाची ने अपने कपड़े ठीक किया और सारे पहिनी और अपनी बेटी को देखने और के काम में गई।

    मुझे पेशाब लगी।  मैंने भी निकर और टी-शिट पहना और घर के पिच तारफ चला गया।

    ये मेरी पहली छुडाई थी।  मैं जल्दी झड़ गया था।  क्या बात को चाची भी समझौता होगी।  लेकिन वो खुश लग रही थी।  शायद जवान लुंड पाने की खुशी थी।

  

    संध्या बुवा को जंगल में छोड़ा:

    जब वापस आया तो चाची ने बोला, “बेटा, थोड़ा ड्रम में पानी भर देना।”

    मैं 2 बाल्टी लेकर गया और हैंड पंप से 2 बार पानी लेकर ड्रम में भर दिया।

    मैं घर के पिचे तारफ खटिया ले जकार पढ़ने लगा।  लेकिन हमें दिन पढाई में मन नहीं लग रहा था।  एक नई खुशी मिली थी आज।  एक नया अनुभव मिला था, उसी के बारे में सोचा था।

    उस दिन 10:30 बजे अमृता, बिमला और संध्या काम करके आ गई थी।  हमने 1 बजे दोपहर का खाना खाया।  3 बजे संध्या बुवा मेरे पास आई, “बेटा, आज चलो मेरे साथ जंगल, बैलों को चरके आते हैं।”

    मैं तुरंत तयार हो गया।  फिर हम दों हमारे गए-बैलों को लेकर जंगल चले गए।  बुवा ने एक फ्लोरल प्रिंट वाली जॉर्जेट साड़ी पहन रखा था।  मैं निकर के ऊपर लुंगी और बिना आस्तीन का टी-शर्ट कहना था।  हम चरते हुए जंगल में 2.5 किमी जैसा दूर निकल गए।  उधार कम ही लोग जाते हैं।  जंगल में 2 पहाड़ियों के बिच एक जग हरि पट्टी वाले पौधे मिले, जिसे गए-बैल खूब खाते हैं।

    संध्या बुवा एक जग बैठ गई।

    मैं थोड़ी दूर खड़ा रह गया।  वो बोली, “वहन क्यों खड़ा है बेटा।  आ जाओ, थोड़ा आराम कर लो।  ठक गए होंगे।”

    मैंने कहा, “आटा हूं बुवा।”  मैं हमसे जग से थोड़ी दूर गया, और पेशब करके आया।

    मैं बुवा के पास एक पत्थर पर बैठा गया।  गए-बैल हरि पाटिया खा रहे थे।  करीब 4 बज रहे थे।  गरमी कम हो गई थी।  बुवा ने हाथ में पकाड़ा हुआ पानी का बोतल मुझे दिया।  मैं पानी पिकर थोडा रिलैक्स हुआ।  फिर हम दून बात करने लगे।

    “फूफा कैसे हैं!”  मैंने पुछा।

    “तुम्हारे फूफा बुद्धे हो गए हैं।  इसिलिए तुम्हारे पिता जी दोंन वहां काम करने गए।”

    “और कौन है वहा?”

    “मेरी छोटी नानद आई है।  वो काम कर देती है।”

    “हां, उसे भी बहुत दिन से नहीं देखा।”

    वो बोली, “कितना अच्छा लगता है ना राहु ये जंगल!”

    मैं, “हां, शहर में ऐसी हरियाली कहां।  साफ हवा, कम गरमी, चिड़ियों का आवाज।”  मैं समझ गया था, बुवा चुडवाना चाहता होगा और मैंने भी सूबा चाची को छोडने के बाद अब और चुदाई करना चाहता था।

    वो सरक कर मेरे पास आई और बोली, “बेटा तुमें देखके बहुत खुशी हुई।  कितना लंबा हो गया।”

    “मुझे भी आप दूधकर बहुत खुशी हुई।”

    मैं फिर बोला, “आप लोग कितनी अच्छी हैं।  आप भी मुझे बहुत अच्छी लगती है।”

    वो बोली, “तुम्हारी उमर अब जवान लड़कियों को पसंद करने की है।  कब तक हम बुद्धियों के साथ रहेगा।  हमारा पकाया खाना खायेगा!”

    “आप कहां बुद्धि हुई है!  इतनी खुसुरत तो लगती है आप।”

    “क्या बेटे, बुवा से ऐसे झूठ बोले हो!”

    “सच्ची में, आप को देखेंगे कौन बोलेगा की आप पिता जी की दीदी है!  आप को जवान लड़का लोग भी देखेंगे तो शादी कर लेगा।”

    “दत्त बदमाश, माई टिग्नि, काली को कौन पसंद करेगा?”

    “मेरे फूफा कितनी नसीब वाले हैं जो आप की शादी उससे हुई।”

    “पटा नहीं बेटा!”

    मैं बोला, “मुझे तो आप बहुत प्यारी लगती हैं।  आप मेरी बुवा नहीं होती तो आपको जरूर प्यार करता।”

    उसे मेरी हाथी को अपनी हथेली में लिया और सहलाने लगी।  उसका स्पर्श पकार मैं फिर कण उठा।  वो मेरी हलत समझ गई।  पंत के अंदर मेरा लुंड खड़ा होने लगा।  बुवा पंत के अंदर बनते तंबू को देख लिया।

    “तुम अब बदनाम भी हो गए।  ये देखो पंत के अंदर तुम्हारी जवानी बहार अच्छें को बेटा है।”

    मेन जेएनपी गया।  “पटा नहीं क्यों अपने आप ऐसा हो रहा है।”

    उसे मुझे बड़े प्यार से माथे पर चुमा, “हमारा प्यारा बेटा, जवान हो गया।”

    मैं चुपचप रहा।  उसे मुझे फिर से चुमा, “जी करता है, तुझे जी भर के प्यार करुं!”

    और फिर मेरे मुंह पर किस किया।  बोली, “बुवा को प्यार करेगा बेटा?”

    “हां, लेकिन मुझे नहीं आता प्यार करने के लिए।”

    उसे अपना हाथ मेरे लुंड के ऊपर रखा।  मैं सिहर उठा और पिछे सरक गया।  उसे मुझे फिर से पक्का और मैं पर किस किया।  क्या बार मैंने भी जवाब में चुमा का इस्तेमाल किया है।  उसे मेरे सर को पक्का और मेरे मुंह में अपनी जीवन डालकर मेरे जिभ से जिभ लाडा दिया।  मुझे उसके मन का स्वद अच्छा लगा।  मैंने भी उसे जीभ को चुसा।  मैं मधोश हुआ जा रहा था।  3 मिनट जैसा ऐसा ही एक दसरे की जीब चुस्ते रहे।  अब मैं भी हरकत में आ गया।

    मैं बोला, “बुवा, बड़ा अच्छा लगा।  आपका जीभ बहुत मीठा लगा।”

    उसे जगा के आस पास के पौधों की छोटी डालियों को पतियों के साथ थोड़ा और एक समतल जग बिचा दिया और मुझे वहां बुलाया।

    मैं उसके पास गया तो उसे मैंने अपने पास खिंचा और मेरे मन को दुबारा किस किया।  हम फिर से एक दसरे के मन को चुस रहे थे।  इसी बिच उसे मेरा टी-शर्ट उतर दिया और पास के एक पौधे पर लटका दिया।  मैं ऊपर नंगा हो गया था।

    “कितना गबरू लगता है तुम!  आज तुझे जी भरके देखेंगे मेरे बेटे!”

    वो मुझसे चिपक गई और मेरी गड्ढे को सहने लगी।  उसे मेरा लुंगी भी हटा दिया।  मेरी उत्तेजना बढ़ते जा रही थी।  मैंने उसका आंचल हटाकर उसका ब्लोज खोलने की कोषिश किया।  लेकिन हुक नहीं खोल पाया।  संध्या ने मेरी मदद किया।  ब्लौज के हुक खोलकर ब्लोज उतर दिया।  वो भी ब्रा नहीं पहाड़ी थी।  ब्लौज उतरते ही सामने मेरी सांवली सी बुवा की झूली चुचियां आजाद हो गई।  चुचियां रेखा चाची की तरह गोल नहीं।  थोड़े लम्बे और झूले हुए थे।  मैं उसकी चुचियों को सहलाने लगा।  उसके निपल्स मुंह में लेकर चुनने लगा।  वो बोली, “आह बेटे, धीरे करो।  आराम से।”

    मैं उसकी चुचियों को सहलता रहा।  फिर हमें अपनी या खिचड़ी लिया।  उसकी उन्चाई मेरे मुकबले बहुत कम थी।  मैं 5’6″ और वो 4’10” की।  इसिलिए उसका सर मेरे कंधे के आला था, उसकी चुचियां मेरे पेट से टकरा रही थी।  लुंड निकार फड़ कर उसकी नाभि में घुसने को बेटा लग रहा था।  मैंने उसकी साड़ी खिचने लगा।  वो छुडाई की मांजी हुई खिलाड़ी थी तो मैं नया जोशीला जवान जिसे चुदाई का अनुभव नहीं।

    उसे अपनी साड़ी खुद खोली और पेटीकोट भी खोल दिया।  पेटीकोट गिरते ही मेरी सांवली थिग्नि बुवा नंगी मेरे सामने खादी थी।  उसे पैंटी भी नहीं कहना था।  मुख्य उपयोग देखता रह गया।  अब तक ताऊ और पिता जी से चुदते हुए दूर से देखा था।  मुख्य उपयोग एक तक देख रहा था।  मैंने उसके लिए जिस्म को अपनी या खिंचा और जकड लिया।  मैं उसकी शरिर की गरमी महसूस करने लगा।

    तब उसे भी मेरे निकले के इलास्टिक के अनादर उनगली दलकर मेरे निकर और छड्डी को आला सरकार दिया।  मैं अब उसके सामने पूरा नंगा खड़ा था।  वो मुझसे लिपट गई।  वो मेरी छटियों को चुम्ने लगी।  एक हाथ से मेरा लुंड पकडकर हिलाने लगी।

    “मेरा राजा बेटा।  इतना प्यारा बीटा।  जवान बेटा.!”

    फिर वो मेरे सामने बैठा और मेरे जोड़े को सहलाने लगी।  धीरे धीरे उसके हाथ मेरे जांघों तक ऐ।  और मेरे जंगों को चुनने चाटने लगी।

    मैं उसके सामने नंगा खड़ा था।  वो मेरे लुंड को पकडकर बड़े ध्यान से देखने लगी।  लुंड के सुपड़े को प्यार से पिछे किया।

    वो बोली, “तुम्हारा हाथी तो बड़ा अच्छा है रे।  तुम्हारे फूफा से भी बड़ा है।”

    “पटा नहीं, मैंने तो उनका नहीं देखा है।”

    “मैं तो देखता हूं ना!”  वो मुसकुराकर बोली।

    उसके बाद उसे मेरे लुंड को मैं में लिया और चुन लिया।

    “आह बुवा, ये आपने क्या कर दिया!  बड़ा अच्छा लग रहा है।”

    वो लुंड धीरे धीरे छूट रही।  सुपड़े पर बड़े प्यार से जीब चलाती रही।  एक हाथ से मेरे औरों से खेल रही थी।

    3-4 मिनट लुंड चुनने के बाद, वो उठी और अपनी पेटीकोट को पत्नियों के ऊपर बिचाया।  उसके ऊपर अपनी साड़ी भी बिचा दी।  और उसके ऊपर चलो गई।  “आजा बेटे, अपनी बुवा को प्यार कर दे आज।”

    मैं भी उसकी टंगों के बीच बैठा गया।

    मैं उसकी जोड़ी को दबने लगा।  मंसल झंघों को सहलाने, दबाने लगा।  उसके बाद वो पलटकर पेट के बाल चलो गई।  उसकी काली, गोल चुतड़ मेरे सामने थी।  मैं उसकी चुतड को सहलाने लगा।  उसी गड्ढे को दबने, सहलाने लगा।  मालिस किया।  वो सीटकर कर रही थी, “इस्स्स बड़ा अच्छा लग रहा है रे।”

    वो फिर पलट गई।  मैं अब उसके जिस्म को ध्यान से देखने लगा।  फिर उसके ऊपर चिपक गया और वैसा ही चुपचाप चिपका रहा।  बड़ा अज़ीब सा अहसा था।  नारी के जिस्म से निकलती गरमी का एहसास बड़ा अच्छा लग रहा था।  मेरी छटी उसकी चुचियों के ऊपर थी।  लुंड उसके चुत के पास जान में था।  मैं उसके शरिर के ऊपर आ गए पिचे होकर अपनी छत्ती को उसकी चुची से रागद रहा था।  वो मेरी पिट पर हाथ फेर रही थी।  फिर मैं धीरे-धीरे आला आया।  उसके चुचियों को चुस्ते-चट्टे हुए आला नभि में जीव घुसा कर घुमने लगा।  उसे गुडगुडी हुई और वो हांसी, “हाय हाय हाय, हाय हाय हाय!”

    मैंने जीभ को नाभि से निकल कर चुत की या ले गया।

    अब मैं उसे चुत को ध्यान से देखने लगा।  उसकी चुत भी झंटों से भारी थी।  उभरी उभरी बैठो हाय।  मैं उसकी झोंपड़ियों से खेलने लगा।  उसकी चुत को सहलाने लगा।  जंगों पर हाथ फिरने लगा।  उसकी जनता को हटाकर उसकी चुत को ध्यान से देखने लगा।  उसकी चुत के दरवाजे के मन फेल हुए थे।  बिच में गुलाबी रंग का छेद जो बहुत ढिला लग रहा था।  ऐसा लग रहा है की काई वर्षो की छुडाई से ऐसा हो गया।  उमरा का असर भी था।  बहुत बार चुड़ी हुई थी।  मैंने छू के देखा तो छुट गिली गिली हो चुकी थी।  मैने चुत के पास मुंह ले जकार सुनूंगा।  उसके बुर से अलग सी महक आ रही थी, जो रेखा चाची से अलग थी।

    “बुवा, आपका ये तो बहुत सुंदर है, अलग सी खुशबू है।”

    “इसे चुत बोल बेटा, बर बोल।”

    मैंने अपनी जीभ निकल कर गिली गिली छुट पर भीदा दिया और चुत को चाटने लगा।  उसे आपने जोड़ी और फेल दिया दिया और मेरा सर छुट में दबने लगी।  मैं धीरे-धीरे छप्पर-छप्पर सुदुप-सुदुप चुत चटने लगा।  बुवा की चुत का स्वाद थोड़ा अलग लग रहा था।  मैं कुछ डर तक उसे चट्टा रहा।  अब मुझसे भी रहा नहीं गया।  मैं चुत चटना छोडकर उसके ऊपर आया और उसके मुंह को चुन लिया।

    मेरा लुंड अब बुवा के चुत के पास था।  बुवा ने मेरा लुंड पकाड़ा।  उसे लुंड को चुत के दरवाजे पर लगा और मेरी कमर को खिचने लगी।  मेरा लुंड उसे चुत में धीरे-धीरे समाने लगा।  मैंने भी अपने कमर का भर उसकी चुत पे छोड़ दिया था।  लुंड संध्या की गिली और ढीली चुत के अंदर जद तक घुस चुका था।  ऐसा लग रहा था मानो लुंड किसी गरम नर्म मुलायम गुफा में धन गया है।  बड़ा सुखाड़ अहसास था ये।  पहली बार बुवा के चुत में गया था।

    इतने वर्षों से मुझे छुडाई का मौका नहीं मिला।  आज एक ही दिन में दुसरी छुट छोड रहा था।

    “आह्ह्ह्ह बुवाआ!  ये कहां घुस गया है।”

    “क्यों, अच्छा नहीं लगा क्या?  वाह पुच्ची।

    “पहली बार ऐसा मजा आ रहा है।”

    वो सचमुच कल्पना और अभूतपूर्व आनंद था।  मैं वैसे ही उसकी चुत की गहरेई में लुंड गुसाकर उसके शरिर को जोर से पका कर लिपटा रहा।  बुवा ने भी जवाब में अपने हाथ को मेरी पिट पर जकड लिया।

    “बुवा, मुझे बहुत अच्छा लगा रहा।  इसमे इतना मजा आता है अब पता चला।’

    “हां बेटे, ऐसे भी मेरे अंदर रहो।  मुझे तुम्हारे बड़े हाथी को और महसूस करने में बड़ा मजा आ रहा है।”

    ये कहकर वो धीरे-धीरे आला से अपनी कमर ऊंचाने लगी।  उसी मेरा लुंड उसे चुत में और बाहर होने लगा।  मुझे और अच्छा लगने लगा।  अब मेरी कमर भी अपने आप आए पिचे होने लगी।

    मैं वैसा ही उसे छोटा रहा।  कुछ डेर बाद मैंने उसकी चुत से लुंड निकला।  मैं दुबारा अपनी जीभ उसकी चुत पर राखा और चुदाई से गिली हुई चुत को चाटने लगा।

    उसके बाद मैं उसके बगल में गया।  बुवा उठी और उसके चुत से गिली हुई लुंड को पक्काकर बोली, “कितना प्यारा है रे तुम्हारा लुंड।  छट्टू (मशरूम) जैसा दिखता है!”  वो लुंड को फिर से चुनने लगी।

    उसके बाद वो मेरे ऊपर आकार मुझसे लिपट गई।  मुझे चुमने लगी।  उसी बिच उसे मेरे लुंड को अपनी चुत से लगा उर अपनी कमर को आला दबने लगी, जिस मेरा लुंड उसे चुत को चिरता हुआ उसी में चुत में समा गया।  वो मुझे चोदने लगी।  वो मुझसे छोटे राही, छोटे राही।  हम डोनों रिस्ते-नतों को भूलकर चुदाई के सुख के सागर में मिले लगे रहे थे।  एक 48 साल की औरत अपने से आधी उमर के जवान लौंडे से चुड़वा रही थी, अपने भाई के बेटे से चुड़वा रही थी।

    बुवा देखने में कोई खास नहीं।  लेकिन औरत का जिस्म किसी रंग से नहीं, उसे अनुभव, अहसास, प्यार, काला, इक्षा से सुंदर होता है।  ये मैं समझ गया था।

    मैं उसे अपने लुंड के ऊपर रखे ही उठाकर बैठा गया।  वो अब मेरे ऊपर गोदी में बैठी थी।  और मैं पद्मासन की मुद्रा में था।  वो उच्छल उचचल कर चूड़ा रही थी।

    सुबा रेखा चाची को छोटे समय जल्दी जद गया था।  अब डर से छोड रहा था।

    कुछ डेर बाद वो उठी और पास के एक ऊंचे पत्थर पर बैठा गई।  हमें पत्थर की ऊंचाई मेरे कमर के बराबर थी।  उसे आपने जोड़ी फेला दिया जिससे उसे चुत खुल गई।  मैं उसके पास गया और उसके सामने खड़ा होकर अपना लुंड उसकी चुत से सत्या और एक तेज झटका दिया, “थप्प!”

    लुंड चुट की दीवारों को रगड़ता हुआ चुत में जद तक समा गया था।  मैं हममें स्थिति में ही चुपचाप रहा।  वो बोली, “हे राहुल!  क्या मस्त झटका मारा रे!”  ये सुनकर मैंने लुंड बहार निकला, और फिर से जोरदार धक्के के साथ चुत में घुड़दिया दिया।  ये सिलसिला 25 बार जैसा किया।

    “हाय हाय हाय, बड़ा मस्त लग रहा है रे।”

    फिर मैंने स्पीड दीमा किया।  ढिली चुत में लुंड बड़े आराम से और-बहार हो रहा था।  पता नहीं क्यों, खूबसूरत रेखा चाची को चोदने से भी ज्यादा मजा उस थिगनी, काली बुवा को चोदने में आ रहा था।  शायद वतावरन का प्रभाव था।  जंगल में पांचियों की आवाज आ रही थी।  हरियाली थी, ताजी हवा थी, छाया थी।  समाज की नज़रों में ये गलत हो रहा था, लेकिन उसमे एक जवान लड़के और एक ढाली उमर की औरत को बहुत आनंद मिल रहा था।

    मैंने उसे चुत में पुरा लुंड गुसेड़ा और बुवा को गोदी में उठाकर खड़ा हो गया और वैसा ही इधर उधार घुमने लगा।  वो हंसने लगी, “हाय हाय हाय, ये क्या कर रहा है बेटे।  ठक जाएगा तुम!”

    मुख्य उपयोग वापस पैटन के ऊपर बिछी हुई साड़ी के ऊपर लेकर आया और लिटा दिया।  फिर से उसका चुट चटने लगा।  इसबार मैंने बहुत जोर-जोर से छपर छपर को साफ सुदुप चटने लगा।  बुर बुरी तरह ठूक और चुत के रस से भींग गई।  उसकी झंट भी भिंग गए थे।

    फिर मुझसे रहा नहीं गया।  मैने तुरंत उसकी टंगों को फेलया और लुंड को उसकी चुत में लगाकर फिर से जोरदार झटका मारा और चुत की घराई में उतर दिया।

    अब मैं जोर से छोडने लगा।  थाप्प थाप्प थाप्प, थाप्प थाप्प।  वो अब चिल्लाने लगी, “और ज़ोर से, हां और और … इस्स, हाय हाय ही बिमला … तेरा बेटा तो बहुत मजा दे रहा है रे।  आह्ह्ह बेटे… ऐसे ही हाय।”

    मैं और तेज झटके मारने लगा।  फिर अचानक ऐसा लगा जैसे मेरे अंदर का कौशल कानून बहार आ रहा है।  लुंड और मोटा लगने लगा।  मैंने एक जोरदार झटका मारा और बुवा की छुट से अपनी कमर को चिपका दिया।  मुख्य “आह्ह्ह्ह बुवाआ!”

    और मैं उसकी चुत में गरम गरम लावा भरने लगा।  वो आंख बंद करके मेरे वीर्या को अपने अंदर ले रही थी।

    मैं उसके ऊपर अतीत होकर लिपट गया।  थोड़ी देर में उसके चेहरे को देखने लगा।  उसमे अजीब से संतुष्टि दिख रही थी।  मेरा लुंड अब सिकुद चुका था।

    मैं उसके जोड़े के बिच से निकला गया।  संध्या बुवा भी उत्कर मेरे बगल में बैठ गई।  मैंने उसकी चुत को देखा।  मेरा कुछ वीर्य उसकी चुत से बहकर निकल रहा था।

    मैंने बैलों की या देखा।  कुछ जमानत आराम से टूटे खा रहे थे और कुछ छाया में बैठे थे, जैसे हमारा इंतजार कर रहे थे।  उनका पेट भर चुका था।

    मैंने बुवा को फिर से चुमा और कहा, “धन्यवाद बुवा।  क्या चुदाई में ऐसा मजा आता है, ये खुशी देने के लिए।”

    “कोई नहीं बीटा।  मुझसे भी तुमसे चुदकर बहुत मजा आया।  वर्षा बाद इतनी तृप्त हुई हूं।”

    “क्या फूफा नहीं छोटे हैं?”

    “नहीं रे!  लेकिन तुम्हारे बहुत अच्छे से छोटा।  कहन सिख तु?”

    “अपने आप हो गया।  आपने ही सीखा दिया!”

    उसके बाद वो वही मेरे सामने बैठककर पेश करने लगी।  मैं भी उसके बगल में पेशाब करने लगा।  उसके बाद उसे पेटीकोट और साड़ी, बलूज पहन लिया।

    मैंने भी अपने शॉर्ट्स और टी-शर्ट पाहन लिया।  लुंगी को कांधे पर लटका लिया।  मैंने बगल में राखी पानी बोतल से पानी पिया और बुवा को भी दिया।

    चुदाई में बहुत समय निकल चुका था, जिस्का पता ही नहीं चला।  सूरज पहाड़ियों के पिचे चुप चूका था।  हम डोनों ने गए बैलों को वापस गांव तरफ हांकना शुरू किया।

    रास्ते में मैं बुवा को पुछा, “आपकी शादी कब हुई थी?”

    “जब मैं 18 साल की थी, तब शादी हुई।  तुम्हारे फूफा टैब 30 के।”

    “मतलब 12 साल बड़े हैं आप?”

    “हां रे।”

    “बुवा और कब मिलेगा?  या तुम अखिरी है?”  मुख्य पुछा।

    “मिलेगा बेट।  अब तो मैं तेरी ही हूं।  लेकिन, ध्यान रहे की मैं तुम्हारी बुवा हूं।  हर जग नहीं कर सकते हैं।  मौका देखके चुदाई करेंगे।”

    “ठिक है।”  कहकर मैंने उसके चुतड़ में हलका चपत मार दिया।  वो हंस दी, “बदमाश कहीं का!”

    गांव पहिने पर हम दों ऐसे बात कर रहे हैं जैसे कुछ न हुआ हो।

   

    घर आने के बाद मैंने मां, ताई, चाची और बुवा को घर के काम में मदद किया।  हैंड पंप से 4 बार पानी लाया।  और मैं नाडी नहीं चला गया।

    नदी से लौट पर देखा घर के आंगन में छत्ताई बेचाकर घर की सारी औरते बैठा हुई थी।  माँ सब्जी कट रही थी।

    माँ बोली, “आ गया बेटा!”

    मैं भी वही चट्टाई पर बैठा गया।

    अमृता ताई अपने घर के अंदर गई और मेरे लिए शरबत लेकर आई।

    वो बोली, “चाची के बना शरबत तो रोज़ पिता है, आज ताई का बनाया शरबत पियो।”

    मैंने शरबत पिया, “बहुत अच्छा है बड़ी माँ।”

    माँ बोली, “मुर्गा खायेगा बेटा?  हम लोगों को तो खाने का मन कर रहा है।”

    मैं बोला, “हां, बहुत दिन से मुर्गा मन्स नहीं खाया हूं।  लेकिन पिताजी और ताऊ जी नहीं हैं।”

    अमृता ताई बोली, “उनकी चिंता ना करो बेटे, तुम्हारे फूफा उनको सब खिलाड़ी दूंगा।  उनके घर मुर्गा, बकरा बहुत है।”

    और वो मुरगियों के बड़े में और एक मुर्गा पकाकर लायी और मुझे देते हुए बोली, “ये लो बेटा, इस्को काट दो।”

    मैंने मां की या देखा।  वो बोली, “जा बेटा, तुम्हारी बड़ी मां प्यार से दे रही है।”

    मैं हमें मुरगे को लेकर गया और उसे काटकर चिकन पीस बनाया।  चाची ने मसाला पीसा।  सबने मिल्कर हमारे घर खाना बनाया और चिकन पकाया।  देसी स्टाइल में चिकन केले में गांव की महिला का कोई मुकाबला नहीं।  अमृता और मां ने हमें दिन आंगन में ही खाना लगा दिया।  सबसे पहले मुझे दिया और फिर सबको परोसा गया।

    चिकन बहुत स्वाद बना था।

    मैंने कहा, “बड़ी मां, मान तो बहुत बड़ा पकाया है आपने।”

    वो बोली, “बेटा ये तुम्हारी चाची ने बनाया है, हमको कहां ये सब आता है!”

    चाची बोली, “बेटा, ये तुम्हारी बड़ी मां के प्यार का मसाला से बना है।  अच्छा तो अच्छा ही रहेगा।”

    और सब हंसने लगे।

    संध्या बुवा ने कहा, “भाभी, हम लोगों का लाडला सब काम सीख गया है।  पढाई भी करता है।  और घर के काम भी।”

    मैं बोला, “बुवा, कल से मैं भी आप लोगों के साथ खेत में मैं काम करूंगा।”

    खाना खाने के बाद हम सब आंगन में बैठकर बातें करने लगे।  चाची और बुवा बहुत खुश लग रही थी।  9 बजे तक बात करते रहे।  बड़ी माँ बोली, “मुझे तो आने लगी, चलो सब सोने।”

    उसके बाद अमृता ताई और मां एक साथ सोने चली।  संध्या बुवा अकेले ही ताई के घर में सोने चली गई, चाची अपनी बेटी के साथ अपने घर चली गई।

    मैं अपने छोटे घर में आ गया।  अपना टी-शर्ट, शॉर्ट्स और चड्डी उतर कर तौलिया लापेट कर बिस्तर पर ले गया।  मैने मोबाइल निकला और सबह को खिनचे गए चाची के फोटो देखने लगा।  गुलाबी साड़ी में बहुत खूबसूरत फोटो आया था।  मैं आज की चुदाई के दृश्य याद करने लगा।  कैसे एक ही दिन 2 छुट छोड़ चुका था।  मुझे छुडाई का चस्का लग चुका था।  किसी को भी छोडने का मन करने लगा था, लेकिन मैं थाक भी गया था।  मैं दरवाजा को खुला ही रख दिया, तकी ताजी हवा आती रहे।

    सोचते सोचते कब आंख लग गई पता नहीं।  लेकिन उस दिन से मेरी जिंदगी बदल गई थी।

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