मां बेटी और बेटा CHAPTER 6

  

           मां बेटी  और बेटा  CHAPTER 6





गांव में दोपहर हो चली थी। बड़े से घर में, कंचन इस समय अकेले थी। शशिकांत तो कोर्ट गया था, और माया स्कूल में थी। कंचन जो कि अब जवान   हो चली थी, उसके अंदर भी चुदाई की भूख और प्यास दोनों जाग रही थी। आखिर वो भी तो उसी खून की पैदाइश थी। खुद को अकेला पाकर उसने पहले कमरे को बंद कर लिया। और अपने बिस्तर के नीचे दबी, अश्लील कहानियों वाली किताब निकाल ली, जो कि उसे उसकी सहेली नीलम ने दी थी। उसमें चुदाई की काफी तस्वीरें भी थी, जिसमे पूरी नंगी लड़कियां बेहद कामुक अंदाज़ में मर्दों से चुदते हुए नज़र आ रही थी। किसी ने अपनी बुर में तो किसीने गाँड़ में लण्ड ले रखा था। किसीके होंठ सुपाड़े से चिपके हुए थे, तो कोई लण्ड चूस रही थी। कही तो एक लड़की बुर और गाँड़ के साथ साथ अपने मुँह में लण्ड को घुसा रखा था। कंचन तस्वीरें देखने के साथ साथ उसमें ऐसी भद्दी कहानी पढ़ रही थी, जिसमें एक लड़की को उसके बाप और भाई चोदते हैं, वो भी एक साथ। कंचन को पता था, की गाँव में अक्सर लड़कियों के साथ, ऐसा होता है कि घर के मर्द ही उनको खूब चोदते हैं। उसकी पहचान की एक दो लड़कियों ने उसे बताया भी था, की कैसे उसके भाई और चाचा ने उनको रखैलों की तरह घर मे रखा है। कुछ तो अपने ननिहाल में मामा से चुदकर आती थी। तो उसे इन चीजों के बारे में पता था। वो मज़े लेकर उन कहानियों को पढ़ रही थी। ऐसे करते हुए कब उसकी सलवार के भीतर उसकी उंगलियां पहुंच गई पता ही नहीं चला। वो अपनी कच्छी के भीतर छुपी कुंवारी बुर को मसल रही थी। कहानी पढ़ते हुए उसने, अपनी सलवार और कमीज़ उतार दी। और सफेद रंग की ब्रा और पैंटी में पेट के बल लेट गयी। उस सफेद ब्रा पैंटी में वो कमाल की आइटम लग रही थी। गांव में रहने के बावजूद उसने काफी डिज़ाइनर और स्टाइलिश कपड़े ले रखे थे। उसकी मेक अप और परफ़्यूम से लेकर सैंडल तक सब कमाल थे। उस पर तो गांव के कई लड़के फिदा थे पर, उसकी ऊंची जात और स्तर के वजह से कोई उसे कुछ कह नही पाता था। नहीं तो अब तक वो किसी ना किसी से चुद चुकी होती। पर बेचारी के नसीब में भगवान ने लण्ड नहीं, फिलहाल उसकी उंगलियां ही दे रखी थी। वो सब कुछ पढ़ते हुए तेज़ी से बुर में उंगलियां अंदर बाहर कर रही थी। थोड़ी ही देर में उसकी किताब हाथ से छूट गयी और, आँख बंद हो गयी। उसने अपने होंठ दांतों में भींच लिए, और चुच्चियों को दूसरे हाथ से कसके दबाने लगी। उसके मुंह से अनायास ही सिसकारियां फूटने लगी। उसके बुर के अंदर का लावा आखिर फूट गया, और एक ज़ोर की ,” आआहहहहहहहहहह” के साथ वो झड़ गयी। कंचन की पैंटी पूरी तरह गीली हो चली थी। वो उसी तरह लेट गयी थोड़ी देर के लिए।


उधर दूसरी तरफ जय और ममता नवविवाहित जोड़े की तरह एक दूसरे के साथ प्यार जता रहे थे। ममता 46 साल की होकर भी किसी 18 साल की लड़की के समान जय की बाहों में पूर्ण नग्न अवस्था में समर्पण कर लेटी थी। दोनों खाना खाकर लेटे हुए थे। जय ममता के खुले बालों से खेल रहा था, और ममता उसकी छाती सहला रही थी।

जय- माँ, तुमसे एक बात पूछूँ? 

ममता- हां.. पूछो।

जय- इस बुर को तो हम चख लिए, अब अपनी भूरी छेद का जलवा कब दिखाओगी, उसका मज़ा कब दोगी?

ममता- भूरी छेद??? ……….खुलकर बोलो राजाजी।

जय ममता के गाँड़ के छेद पर उंगली दबाते हुए बोला,” तुम्हरी गाँड़, कब मरवाओगी? 

ममता हंसते हुए, ” धत, वो चुदवाने की चीज़ थोड़े ही है। वहां से तो हम हगते हैं।

जय- झूठ बोलती हो तुम, गाँड़ मरवा मरवाक़े ये छेद खुल गयी है और चूतड़ों का साइज भी डबल हो गया है। तुमको देख के अंधा भी कैह देगा कि बहुत गाँड़ मरवाई हो।

ममता ठहाके लगाते हुए हंसने लगी। फिर उसके होंठों को चूमते हुए बोली,” तुम सब मर्दलोग आजकल बुर के कम और औरतों की गाँड़ के ज़्यादा शौकीन होते जा रहे हो। कोई बात नहीं हम ये इच्छा पूरी करेंगे।

जय- माँ, औरतों की बुर से भी ज़्यादा मज़ा उनकी गाँड़ मारने में आता है। और सच बात तो ये है कि औरतें भी आजकल बुर और गाँड़ एक समान ही मरवाती हैं।

जय ममता के चूतड़ों को मसलते हुए बोला। जय, ” तुम अपनी गाँड़ का स्वाद हमको चखा दो। चलो खड़ी हो जाओ हमारे पैर की तरफ मुड़के, अपनी दोनों टांगे हमारी छाती के अगले बगल डालो, और अपनी भारी भरकम गाँड़ हिलाओ।” ममता ने ठीक वैसा ही किया, वो खड़ी हो गयी जिससे उसकी गाँड़ जय की ओर थी। उसने अपने बाल बांध लिए थे। और जय थप्पड़ चूतड़ पर पड़ते ही अपनी गाँड़ हिलाने लगी। वो पीछे देखते हुए मुस्कुरा भी रही थी। और जय उसकी गाँड़ की थिरकन में एक अजीब सा आनंद पा रहा था। ममता उम्रदराज़ होने के बावजूद काफी अच्छे से चूतड़ में हरकत ला रही थी। कभी वो अपने चूतड़ पर खुद थप्पड़ लगा देती, और उनको फैला के अपनी गाँड़ की छेद जय को दिखाती। फिर झुकती और ज़ोर ज़ोर से गाँड़ हिलाती। जय उसकी गाँड़ पर थूक देता तो वो उसपर खुद का थूक हथेली से रगड़कर चूतड़ को चमका देती। जय का लण्ड फिर सलामी देने लगा, उसने ममता की जांघ पकड़ ली और उसको अपने मुंह पर ही बैठा लिया। ममता उठना चाहती थी, पर जय ने उसकी गाँड़ की छेद को अपने मुंह के कब्जे में ले लिया। ममता अपने हाथ से अपने खुले बाल समेट ली और अपनी गाँड़ को रगड़ने लगी। वो मुस्कुरा रही थी। ज़िंदगी में पहली बार कोई उसकी गाँड़ चूस रहा था। उसे इसका अनुभव नहीं था। उसने जय को रोकना चाहा पर जय कहां मानने वाला था। उसने ममता की भूरी गाँड़ की छेद में अपनी जीभ घुसा दी और चाटने लगा।

ममता- आहह ! जय छोड़ो जीभ अंदर क्यों घुसा दिया? गंदी जगह है वो, वहां से टट्टी करते हैं हम। ममता उठना चाही तो उठ नहीं पाई, बल्कि जय ने उसकी मोटी जांघों को कसके पकड़ रखा था। इसलिए उठ ही नही पाई।

जय- माँ, तुमको मज़ा आ रहा है ना?  हमको तो तुम्हारी गाँड़ चाटने में बहुत मज़ा आ रहा है। तुम ऐसे ही बैठी रहो और हमको चाटने दो अपनी स्वादिष्ट गाँड़ को। 

ममता- मज़ा आ रहा है, पर वो तो गंदी जगह है ना। लेकिन अगर तुमको मज़ा आ रहा है, हमारी गाँड़ की छेद से छेड़छाड़ करने में तो हम अपने पिछले छेद को तुमको खूब चटवाएँगे। लो मज़े इस स्वादिष्ट मीठी गाँड़ की।

जय लपलपाती जीभ से ममता की गाँड़ के स्वाद का पूरा मज़ा ले रहा था। फिर उसने कहा,” तुमको भी इस गाँड़ का स्वाद चखाएंगे, तुम्हारी गाँड़ मारने के बाद अपने लण्ड पे।”

ममता अब तक गाँड़ चुसवाते हुए मस्त हो चली थी। उसे नहीं मालूम था कि गाँड़ चटवाने और चुसवाने में इतना आनंद आता है। जय ममता की गाँड़ को बेतहासा चूस रहा था। अब ममता गाँड़ को उसके मुंह पर रगड़ रही थी। ऐसा करते हुए जय के मुंह पर कभी ममता की गाँड़ छू जाती तो कभी उसकी गुलाबी बुर। उसकी चुच्चियाँ हिलोरे मार रही थी। और मस्ती में बड़बड़ा रही थी,” चाटो जी गाँड़ को, बड़ा अच्छा लग रहा है। उफ़्फ़फ़, हाय, क्या मज़ा है इस भूरी सिंकुड़ी छेद को चटवाने में। चाट ले बेटा, खूब चूस। 

गाँड़ और बुर का स्वाद थोड़ी और देर लेने के बाद, जय का लण्ड पत्थर की तरह कड़क हो चला था, जिसे अब ममता की गाँड़ ही अपने अंदर लेकर मोम सी पिघला सकती थी।

जय ने ममता के चूतड़ों पर एक तमाचा मारा, और बोला,” उठ, साली रंडी की बच्ची, छिनाल औरत, चल घोड़ी बन जा। 

ममता- हां हाँ जरूर। उफ़्फ़फ़ ये एक नया ही एहसास था। क्या मस्त मज़ा मिला हमको आज। आज इस लण्ड को अपनी गाँड़ की गहराइयों का एहसास कराएंगे। 

जय- पहले कुत्ती बनकर चूस इसे। अपने थूक से नहला दो इसे माँ। तुम्हारी गाँड़ तो पहले से ही गीली है।

ममता झुककर कुत्ती बन गयी, और अपने बाल संवारते हुए, लण्ड को अपने प्यासे मुंह मे गले तक ले गयी। वो लण्ड चूसने की पुरानी उस्ताद थी। लंड उसे वाकई बहुत कड़क लग रहा था। उसने अपने जुबान का भरपूर उपयोग किया। उसके आंड़ को सहलाते हुए, वो चूसने में पूरी मगन थी। जय ने अपने एक पैर ममता की पीठ पर रखा था, और ममता के बाल सहलाते हुए उसको खूब गालियाँ दे रहा था। मादरचोद, मा की लौड़ी, भोंसड़ीवाली, चुद्दक्कड़ रांड, और भी कई अलंकारों से उसको नवाज़ा। ममता गालियां सुनके और जोश में आ जा रही थी और चूसने की गति बढ़ जाती है। थोड़ी देर बाद जय ने ममता के मुंह से लण्ड निकाल लिया। फिर ममता उसी तरह घोड़ी बनी हुई थी, वो जय की ओर बेसब्री, और कामुक अंदाज़ से उसको पीछे आती देख रही थी। 

ममता- बेटा, इस रंडी की गाँड़ मारने के लिए तेल लगा लो। नहीं तो दुखेगा।

जय- तुम्हारी गाँड़ मादरजात, पहले से खुली हुई है हमारा थूक से ही गीला हो जाएगा। और ढेर सारा थूक गाँड़ की छेद पर मुंह से थूक दिया। ममता उसको अपने गाँड़ पर फैलाने लगी, फिर जय ने ममता की गाँड़ की छेद पर लण्ड टिकाया और पहले खूब रगड़ा लण्ड को उसकी भूरी सिंकुड़ी हुई छेद पर। ममता को ये एहसास हुआ और उसे लग गया, की उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा लण्ड उसकी गाँड़ में घुसने वाला है। वो वासना से ओत प्रोत थी। जय ने ममता के बाल को कसके पकड़ा, और लण्ड को दूसरे हाथ से गाँड़ में घुसाने लगा। लण्ड धीरे से गाँड़ की छेद की परिमिति को बढ़ाते हुए गाँड़ में प्रवेश करने लगा। जय धीरे से लण्ड घुसा रहा था। पर ममता की चीख अभी 1/3 सुपाड़ा घुसने समय ही निकलने लगी। जय डर गया और रुक गया, तब ममता पीछे मुरी, और हंसते हुए बोली,” अरे, जान मजाक किया था, डालो ना।

जय ने उसके बाल को कसके खींचा, ” साली देख अब तुम, कैसे तुम्हारी गाँड़ का गड्ढा बनाते हैं। इतना चोदूंगा की अपनी माँ को याद करोगी। बूझी तुम। रुक साली अभी बताते हैं, ये ले।

पूरा लण्ड एक साथ ममता की कसी हुई गाँड़ में उतर गया। ममता ने हालांकि गाँड़ बहुत मरवाई थी, पर इतना मोटा तगड़ा लौड़ा पहली बार ले रही थी। इसलिए उसकी चीख निकल गयी। वो लगभग रोते हुए बोली कि,” जय आराम से तो डालते, कहीं गाँड़ फट जाती तो।

जय- तुमको अब पता चला, कैसा लगता है गाँड़ में लण्ड घुसता है तो। अब तो घुस गया, थोड़ी देर में गाँड़ उसको जगह दे देगी, और तुमको मज़ा आएगा।

ममता- अरे, हमारे सैयां बेटाजी, हम अपना सब तुमको दे चुके हैं और साथ में मज़ा लूटना है ना। आआहह …..  थोड़ा देर बस लण्ड को गाँड़ में स्थिर रखो, फिर खूब चोदना। तुम तो लण्ड ऐसे डाले हो कि, गाँड़ से लण्ड डालके मुंह से निकाल दोगे।

जय- ठीक है माँ, पर तुमने ही हमको उकसाया, एक तो तुम्हारी मस्त थुलथुली चूतड़ों को देखकर और दूसरी तुम्हारी गाँड़ की भूरी छेद।

कुछ देर ऐसे ही रहने के बाद, ममता ने कहा,” हैं अब लगता है, की गाँड़ अभ्यस्त हो गयी है। अब चोदो अपनी माँ की गाँड़ को जितना जी चाहे। अब मज़ा आएगा बेटा सैयांजी।

जय ने ममता की गाँड़ की छेद जिसमें उसका लण्ड ऐसे फंसा था, जैसे गूँथे हुए आंटे में किसीने लकड़ी गाड़ दी हो, पर थूक दिया। गाँड़ की छेद के किनारे गहरे भूरे रंग के थे। जय ने अपनी उंगली से थूक को छेद के चारों ओर पोत दिया। फिर उसने लण्ड को धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा। लण्ड को उसने बमुश्किल आधा इंच ही अंदर बाहर कर रहा था। धीरे धीरे उसने अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की। उसे अपने लण्ड पर गाँड़ का कसाव मूंग के हलवे की तरह लग रहा था। लण्ड का एहसास, ममता को भी बहुत आनन्ददायक लग रहा था। गाँड़ के अंदर जो नर्व एन्डिंग्स होती है, इसलिए गाँड़ की चुदाई का मज़ा डबल हो रहा था। जय गाँड़ मारने में मस्त, ममता गाँड़ मरवाने में मस्त थी। धीरे धीरे उनकी मस्ती, अब आक्रामक कामुक जोश में बदलने लगी। जय अब आधे से भी ज़्यादा लण्ड अंदर बाहर कर रहा था। ममता भी अपनी गाँड़ पीछे करके लण्ड लेने में कोई कोतुआहि नहीं बरत रही थी। जय एक हाथ से ममता के बाल खींच रहा था, और दूसरे हाथ से उसके चर्बीदार चूतड़ को मसल रहा था। अब पूरी तेज़ी से गाँड़ मराई चल रही थी। ममता की गाँड़ से कुछ ग्रीज़ की तरह तरल पदार्थ रिसने लगा, और जय के लण्ड पर चिपकने लगा। चुकी वो गाँड़ की छेद पहले भी मरवा चुकी थी तो, गाँड़ से बाहर चूने लगी। जय ये सब देख रहा था, उसने सोचा,” क्यों ना अब ममता को उसकी गाँड़ से चूते इस रस को चटवाया जाए।

जय ने ये सोचकर कमर की हरकत रोक दी। फिर दोनों चूतड़ों को फैलाके अपने लण्ड को धीरे धीरे बाहर निकाला। गाँड़ की छेद उसके लण्ड की गोलाई इतनी चौड़ी हो चुकी थी, और लण्ड पर वो पदार्थ ढेर सारा चिपक गया था। गाँड़ के अंदर का हिस्सा गुलाबी रंग का साफ दिख रहा था। लण्ड बाहर निकलने की वजह से गाँड़ के अंदर का हिस्सा ममता की सांस के साथ,  ऊपर नीचे हो रहा था। जय ने गाँड़ के अंदर ही थूक दिया। वो ये दृश्य देखकर जैसे मदहोश हो रहा था, तभी ममता ने टोका,” क्या हुआ क्यों निकाल लिया लण्ड बाहर बेटा सैयांजी ? 

जय ने उसकी ओर मुस्कुरा के देखा और बोला,” इधर आओ और चूसो इस लण्ड पर लगे अपने गाँड़ की रस को। 

ममता पीछे घूम गयी और लण्ड को जड़ से पकड़ लिया, फिर जय की आंखों में देखते हुए, अपनी जीभ बाहर निकाली और लण्ड के निचले हिस्से को चाटने लगी। फिर, सुपाड़े को चूसी, फिर लण्ड के दांये बांये और फिर लण्ड के ऊपरी हिस्से पर अपनी जुबान फिराने लगी। जय उसके बालों को संवारते हुए उसकी ओर प्यार से देख रहा था। ममता ने उसकी ओर देखा और कहा,” हमारी गाँड़ मीठी है, बहुत बेटा सैयांजी। और मुस्कुराई। 

जय- क्यों ना होगी, तुम हो ही स्वीट, अब पता चला हम गाँड़ क्यों चाट रहे थे।

ममता के मुंह मे लण्ड था, पर हंसी रुक नही पाई। “अब रोज़ चटवाऊंगी और चाटूंगी, लंड से चुदवाने के बाद। राजाजी, ये एक नई चीज पता चली हमको।”

फिर जय ने लण्ड को छुड़ा लिया और बोला, अभी पहले तुम्हारी गाँड़ की चुदाई अधूरी है। तुम अपने बुर को मसलती रहना, तब तुमको और मज़ा आएगा।

फिर जय ने ममता को पीठ के बल अपने सामने लिटा दिया। उसके बाल बिखरे हुए थे। होंठों पर लण्ड चूसने के बाद चमक थी। आंखों में कामुकता की प्यास। चूचियों तनकर पहाड़ सी लग रही थी। जय ने उसके गाँड़ के नीचे तकिया, लगा दिया। और फिर उसकी गाँड़ में लण्ड घुसा दिया। ममता अपनी बुर मसलने लगी और जय उसकी दोनों चूचियों को अपने पंजों की गिरफ्त में ले लिया। अब फिर से घमासान चुदाई शुरू होने वाली थी।

जय ने अब ममता की फिर से गाँड़ मारनी शुरू की।ममता की गाँड़ भी ढीली हो चुकी थी। अब लण्ड के आवागमन में कोई दिक्कत नहीं थी। वो गाँड़ मरवाते हुए अपने बुर के दाने को छेड़ रही थी। जय ने उसकी बुर पर थूक दिया तो ममता उसे पूरे बुर पर मलने लगी।

ममता- आआहह, ऐसे ही आआहह उफ़्फ़फ़ चोदो इसस… हमको। लण्ड चाहे बुर में घुसे या गाँड़ में लड़की मस्त हो ही जाती है।

जय- माँ देखो ना तुम्हारी गाँड़ कैसे लण्ड को अपने अंदर समा रही है।जैसे लण्ड का स्वागत कर रही है, की आओ और हमको फैला दो। 

ममता- औरत की गाँड़ चुदने के लिए ही बनी है राजा, ये बात समझ लो। तो क्यों ना स्वागत करे वो। उस पर इतना मस्त लौड़ा, आआहह हहहहहह। चोदो अपनी माँ की गाँड़ को और अपने लण्ड की मोहर लगा दो। उफ़्फ़फ़

जय- तुम फिक्र मत करो माँ, तुम्हारी गाँड़ की तबियत से चुदाई होगी, कोई कमी नहीं रहने दूंगा। अपनी बीवी की हर ख्वाइश पूरी करेंगे। टुंगरी गाँड़ ने पहले से ही लण्ड को जकड़ रखा है, जैसे उसे अंदर खींच रही है, उफ़्फ़फ़। आह हहहहह, ओह्ह।

ममता- मूठ गिरने वाला है क्या, बेटा ?

जय- हाँ, पियोगी । आहहहहहह…

ममता – अंदर ही गिरा दो। हमारा भी होने वाला है।

जय- ठीक है, ये लो। 

करीब 15 मिनट की चुदाई के बाद जय ने मूठ अपनी माँ की गाँड़ में निकाल दिया। करीब 5-7 पिचकारी मारते हुए जय चीखता हुआ, ममता के चूचियों पर सर रखकर लेट गया। उधर बुर के मसलने और गाँड़ में मूठ की धाराओं को महसूस करके, ममता  भी झड़ गयी। और दोनों उसी तरह लेटे रहे। थोड़ी देर बाद जय का लण्ड धीरे से निकलने लगा, तो ममता ने अपनी गाँड़ में पास परी अपनी पैंटी घुसा ली। और फिर जय को गले से चिपका लिया। 

जय जैसे बेहोश था। दोनों चुदाई से थक चुके थे। इसलिए दोनों को नींद ने अपने आगोश में ले लिया।

उधर कंचन को होश आया। उसने अपनी गीली पैंटी उतारी और ब्रा भी। पूर्ण नग्न होने से वो तराशी हुई मूर्ति लग रही थी। अनछुए कोमल यौवनांग किसी मर्द के एहसास के लिए तड़प रहे थे। वो इससे बेखबर थी कि कोई मर्द उसे इस हालात में देख ले तो उसे लड़की से औरत बना देगा। उसकी उम्र शादी के बराबर की हो भी तो चुकी थी। जो वो कहानी पढ़ रही थी, उसे ख्याल आया कि कोई उसका भी ऐसा ही भाई होता, जिसके साथ वो जवानी के मज़े लूटती। वो इस बात से बेखबर थी कि किस्मत ने उसके तार उसके भाई से ही जोड़े हुए हैं, पर उसमें शायद अभी देर थी। क्योंकि अभी तो उसकी माँ ही उसके भाई के साथ अपनी बची खुची जवानी के मज़े ले रही थी। 

दूसरी तरफ जय लेटे हुए सोच रहा था, की कैसे ममता को अपने और कविता के रिश्ते के बारे में बताए। फिर उसने सोचा पहले मज़े लिए जाए, फिर सोचेंगे। तब ममता ने अपनी गाँड़ में ठूंसी हुई पैंटी निकाली और गाँड़ के छेद से निकलते जय के मूठ को अपने हाथों में इकट्ठा कर लिया, और बेहिचक पी गयी। जय ये देख बोला,” तुमको पीना था, तो पहले क्यों नही बोली? ममता- हां, पर इस तरह पीने से, मूठ का स्वाद बढ़ गया है। हम बोले थे ना कि तुमको विश्वास नहीं होगा,कि हम कितनी घिनौनी हरकते कर सकते हैं, चुदाई में।” 

ये बात सुनके जय का लण्ड फिर कड़क होने लगा।

माँ बेटे इस तरह 2 दिन तक उस होटल के कमरे में खूब मज़े किये। ममता और जय दोनों दिन नंगे ही रहे और दोनों सिर्फ खाने और हगने के अलावा कुछ नहीं की। यहां तक कि नहाए भी नहीं, बस चुदाई चुदाई और चुदाई। माम्नोंत और जय के पूरे बदन में लव बाइट्स भरे पड़े थे। दोनों का स्पेशल हनीमून पूरा हो चुका था।

ममता उदास थी, की ये दोनों मधुर दिन इतनी जल्दी खत्म हो गए। और कविता के सामने तो उसको जय को पति नही बल्कि बेटे का रिश्ता निभाना होगा। वो पूरे रास्ते ट्रेन में यही सब सोचकर उदास थी। 

जय उधर उमंग में था, की वो कविता से बहुत दिनों बाद मिलेगा। परसों राखी का त्योहार भी था। जय और ममता दिल्ली आते ही उस पवित्र रिश्ते में बंध गए जिसे वो दोनों होटल के कमरे में तार तार कर चुके थे



रात के करीब तीन बज रहे थे। ट्रेन दिल्ली से 1 कि मी दूर खड़ी थी, क्योंकि आगे सिग्नल नहीं मिल रही थी और गाड़ी समय से आधे घंटे पहले पहुंच गई थी। अभी ट्रेन में काफी कम लोग थे। दो सिपाही कंपार्टमेंट से गुजरते हुए निकल गए। ममता और जय दोनों का लोअर बर्थ था। ममता की आंखों से नींद गायब थी। खिड़की से छनकर दूर कहीं से आती रोशनी में जय को देख रही थी। उस कम्पार्टमेंट में इस वक़्त और कोई नहीं था। ममता को ना जाने क्या सूझा वो उठी और जय के करीब जाकर उसको चूम ली। उसके माथे को सहलाई। और वापिस अपने सीट पर जाने को मुड़ी, तभी जय ने उसके हाथ को पकड़ लिया। उसने ममता को खींच कर अपने पास लेटने का इशारा किया। ममता उसके साथ लेट गयी। जय ममता के चेहरे को गौर से देखा, उसे ममता की आंखों में एक दर्द महसूस किया। उसने इशारे से ही सर हिलाया, जैसे पूछ रहा हो,” क्या हुआ? ममता ने उसके चेहरे को सहलाते हुए कहा,” जय, अब हमलोग एक दूसरे से दूर कैसे रह पाएंगे। तुम्हारे साथ अब हमको एक बीवी बनके रहना है। अपनी मांग में सिंदूर लगाना है, तुम्हारे नाम का। पर कविता के होते हुए ये कैसे होगा? इधर हम तड़पेंगे और उधर तुम। 

जय- हहम्मम ये तो सच बात है। पर तुम फिकर मत करो, कोई ना कोई जुगाड़ लग जायेगा। 

ममता- कैसे होगा? एक सुहागन होकर हम विधवा बनके कैसे रहेंगे? 

जय- हमको कुछ दिन तो ऐसे गुजारने होंगे ना माँ? कविता दीदी को समझाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। 

ममता उसकी हथेली पर अपने होंठ रगड़ते हुए बोली,” यही सोचकर तो हमारी जान निकल रही है। तुम कब हमको पूरी तरह अपनाओगे।

जय- तुमको अपना तो चुके ही हैं जान। लेकिन ये दुनिया अभी हमारे प्यार को समझेगी नहीं, इसलिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा। हम बहुत जल्दी एक नया घर भी लेंगे। जहां, हमलोग अच्छे से रहेंगे, और वहां सब तुमको हमारी माँ नहीं, बल्कि पत्नी ही समझेंगे।

ममता- कब वो शुभ दिन आएगा, जान। 

जय उसके गले को चूमते हुए,” बहुत जल्द हमारी रानी। उस वक़्त और मज़ा आएगा।

ममता जय के सर को अपने चुच्चियों पर चिपकाए हुए थी। तभी गाड़ी धीरे से चलने लगी। ममता ने बोला,” उठ जाओ जय। अब स्टेशन आ जायेगा। 

पर जय ने ममता को और कसके पकड़ लिया। ममता मुस्कुरा उठी।

तभी गाड़ी फिर रुक गयी। दोनों ने खिड़की से बाहर झाँका फिर एक दूसरे को देखा, और एक दूसरे के होंठ चूमने लगे। कुछ देर चुम्बन करने के बाद, जय ने ममता को खड़े होने को कहा। ममता उठ खड़ी हुई, जय ने उसे बाथरूम चलने को कहा। उनका कंपार्टमेंट टॉयलेट के पास ही था। ममता बाथरूम चली गयी, पर दरवाज़ा बंद नहीं किया। जय पीछे से आया और बाथरूम में घुस गया। जय ममता को और अंदर जाने का इशारा किया और कुंडी लगा दी। यहां कुछ ज़्यादा सोचने समझने की बात नहीं थी। ममता ने अपनी साड़ी उठा ली और जय ने उसकी पैंटी घुटनो तक उताड़ दी। जय ने लण्ड निकालकर सीधा ममता की गीली बुर में लण्ड घुसा दिया। दोनों बिना शोर किये आहिस्ते आहिस्ते चुदाई कर रहे थे। ममता बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज़ रोके हुए थी। ममता के दोनों हाथ दीवार पर थे, और उसके सामने कोई भद्दी अश्लील सी चित्र बनी थी। दोनों ने बिना शोर किये जाने 10 मिनट में काम किया। और फिर दोनों बारी बारी अपनी जगह वापिस आ गए। जय ने ममता से कहा,” चोरी चोरी चुदाई का अपना ही मज़ा है, जान।” ममता को भी ये बड़ा अच्छा लगा।

फिर सुबह हो गयी और दोनों पवित्र मा बेटे के बंधन में वापिस बांध गए। सुबह करीब 5 बजे वो अपने घर पहुँचे। करीब 15 मिनट घंटी बजाई तो कविता ने आंख मलते हुए दरवाजा खोला। सामने अपने भाई और माँ को देखकर वो मुस्कुराई। और ममता के पैर छुए।

सब थके हुए थे, तो बात ज़्यादा नहीं हुई। सब सोने चले गए। वो रविवार का दिन था। इसलिए कविता ऑफिस नहीं गयी थी। सुबह 9 बजे उसने नास्ता बना लिया और ममता व जय को आवाज़ लगाई, पर दोनों घोड़े बेचकर सो रहे थे। कविता ने फिर पहले ममता को जगाया। ममता ने समय देखा तो हड़बड़ा गई और सीधे बाथरूम चल दी। तब कविता मौका देख जय के कमरे में घुस गई। जय सोया हुआ था, क्योंकि दो दिनों से अपनी माँ की बुर और गाँड़ चोद कर थका हुआ था। 

कविता ने उसे उठाने की बहुत कोशिश की, हिलाया डुलाया पर वो उठा नहीं। फिर उसने एक दूसरी तरकीब निकाली, उसने अपनी लेग्गिंग्स उतारी और फिर अपनी पहनी हुई कच्छी उतार ली। फिर, वो कच्छी जय के नाक के पास ले गयी। जैसे ही उसकी बुर की खुशबू से भरी कच्छी जय के नाक के पास आई, उसके नथुने उस गंध को पहचान गए और हिलने लगे। कविता हंस रही थी। जय धीरे धीरे सूंघने के बाद आखिर जग गया। कविता को अपने पास खींच लिया।

कविता- कितना जगाए, पर उठे नहीं। हमारी पैंटी सूंघ कर जाग गए, ऐसा क्यों?

जय- हहम्मम, क्योंकि उसमें तुम्हारे बुर की गंध आ रही थी, कविता दीदी।

कविता- नास्ता तैयार है बाहर आ जाओ, और खा लो। भूख लगी होगी तुमको तो?

जय- हमारी भूख तो तुम्हारा यौवन ही बुझाएगा, हमरी जानेमन।और कविता के होंठों को चूसने लगा। 

कविता खुद को छुड़ाते हुए बोली,” माँ, आ जायेगी। और आज बड़ा प्यार आ रहा है। इतने दिनों से तो हमको याद किये नहीं, और अब प्यार जता रहे हो। माँ से फुरसत मिलेगी तब ना। 

जय- कविता जान, तुम भी जानती हो, कि तुमको और माँ दोनों को हम बराबर प्यार करते हैं। तुम दोनों को खुश रखना है हमको। अभी से ऐसे करोगी तो कल तुम दोनों जब एक दूसरे की सौतन बनोगी, तब क्या करोगी?

ममता- हम मजाक कर रहे थे। तुम टेंशन क्यों लेते हो? हम दोनों माँ बेटी तुम्हारे साथ बहुत खुश रहेंगे, और तुमको भी खुश रखेंगे।

जय- तो फिर आ ना। और उसको चूमने के लिए और करीब लाया। तभी हॉल से ममता, के बाथरूम खोलने की आवाज़ आयी। कविता हड़बड़ा कर उठी, और अपनी पैंटी जय के हाथों से लेने की कोशिश की, पर जय ने उसकी पैंटी को अपने मुंह मे डाल लिया।

कविता उसकी ओर देख के हंसी, और अपनी लेग्गिंग्स पहन ली। जय ने फिर उसे पकड़ लिया और बोला,” क्या हुआ, इतने दिन बाद आया हूँ, दोगी नहीं?

कविता-  शशश…. माँ सुन लेगी। आज नहीं कल दूंगी, राखी के मौके पर। बहन का स्पेशल सरप्राइज। और वो भाग गई।

जय हंसता रहा, फिर उठकर फ्रेश हुआ और नास्ते की टेबल पर पहुंच गया। कविता और ममता दोनों पहले से बैठे थे। सब नास्ता करने लगे। खाना खाने के बाद वापिस से ममता सोने चली गयी। जय भी थका था वो भी सोफे पर सो गया। कविता अकेले घर की साफ सफाई में लग गयी थी। फिर वो अपनी माँ और जय के कपड़े धोने लगी। ऐसा करते काफी समय निकल गया।

शाम के समय जय के मामा का फोन आ गया। दरअसल हर साल राखी से पहले वो आते थे और ममता से राखी बंधवाते थे। लेकिन इस बार वो आ पाने में असमर्थ थे। ममता ने उससे कहा कि कोई बात नहीं जय हमको काल सुबह तुम्हारे यहाँ छोड़ देगा, वहीं तुमको रखी बांध देंगे। शाम को जय फिर हमें लेने आ जायेगा। सूर्यकांत को ये अच्छा आईडिया लगा। उसने भी हामी भर दी। 

अगली सुबह ममता जल्दी तैयार हो गयी और जय के साथ ऑटो में बैठकर तिलकनगर की ओर निकल पड़ी। दोनों ऑटो में कुछ देर शांत बैठे थे तभी ममता को जय ने कसके पकड़ लिया। ममता कसमसाते हुए खुद को छुड़ाने लगी, पर जय से खुदको छुड़ा नहीं पाई। पूरे रास्ते जय उसको ऐसे ही पकड़ा रखा। जय और ममता थोड़ी देर में सूर्यनाथ के यहाँ पहुंच गए। शाम को कितने बजे लेने आये तुमको?

ममता- सात बजे तक।

जय- इतनी देर यहां क्या करोगी तुम?

ममता- अभी से हमको इतना कड़ाई करोगे,बाद में तो हमको कहीं जाने नहीं दोगे।

जय- तुमको तो….

तभी दरवाज़ा खुला जय और ममता अंदर गए। थोड़ी देर बाद जय  ममता को छोड़कर वहां से चला गया। वो घर बेसब्री से वापिस जा रहा था। आखिर कविता से उसे भी तो राखी बंधवानी थी। 

थोड़े ही देर में वो अपने घर वापिस आ गया। रास्तेभर वो ये सोचता रहा,की आज कविता क्या क्या करेगी? उसे उसकी बातें याद आ रही थी, राखी के दिन बहन का स्पेशल गिफ्ट।

जय ने 3- 4 बार घंटी बजाई, पर फिर भी दरवाज़ा नहीं खुला। जय ने आवाज़ लगाई तो कविता अंदर से बोली, ” आई आई।” कविता ने दरवाजा खोला उसके दोनों हाथों में बेसन लगा हुआ था तो उसने किसी तरह दरवाज़ा खोला। जय ने फौरन दरवाज़ा बंद किया, और उसकी ओर देखा। कविता को अपने गोद में उठा लिया।

कविता- अरे हमको नीचे उतारो नहीं तो पकोड़ा जल जाएगा।

जय- इतने दिनों बाद मौके मिला है, और तुमको पकौड़ा का पड़ा है। 

कविता- तुमसे ज़्यादा आग हमारे अंदर लगी हुई है। पर सब्र रखे हुए हैं। उसने मुस्कुरा कर कहा। तुमको तो माँ ने खूब मज़े करवाये हैं, पापा।

जय- तुम हमको पापा बोली हो। तुम हमारी बेटी हो या बहन।

कविता- दोनों, बहन तो हम हैं ही, अबसे आपकी बेटी भी हैं, माँ के आशिक़।

कविता ने उसकी नाक पर बेसन लगा दिया।

जय- आज तुम हमारी बहन हो। ये कहके जैसे ही उसको चूमने वाला था, की कूकर की सीटी बज गई। कविता भागते हुए किचन में चली गयी। उसने वहीं से चिल्ला कर बोला,” जल्दी से नहा लो और तैयार हो जाओ।

जय- और तुम?

कविता- हम नहां चुके हैं। तुम जल्दी से तैयार हो जाओ।

जय तुरंत बाथरूम गया। वहां शेव किया, शैम्पू और फिर नहाने लगा। थोड़ी देर बाद वो बाहर निकला। अपने कमरे में तैयार होने लगा। कविता की आवाज़ बाहर से गूंजी, जय तैयार हो गए क्या? 

जय- बस आया।

जय बाहर आया तो देखा, कविता बाहर हॉल में बिल्कुल नए कपड़ों में सजी हाथ में थाली लिए खड़ी थी। थाली में राखी, मिठाई, दिया, अगरबत्ती और टीका लगाने को सिंदूर रखा था। वो मुस्कुरा रही थी। 

जय का मुँह खुला का खुला रह गया। कविता उसको अपनी ओर देखते हुए बोली,” आओ ना भैया, कभी हमको नहीं देखो हो क्या? आज हम और तुम मस्त रक्षाबंधन मनाएंगे। 

जय उसके तरफ निःशब्द होकर बढ़ चला। कविता ने फुल मेक अप किया था। लिपस्टिक की लाली उसके होंठों को गुलाब की पंखुड़ियों की तरह सजा रही थी। गालों पे रूज़ लगने से गाल पूरी तरह मुलायम और रसगुल्ले की तरह लग रहे थे। आंखों में काजल उसकी आँखों को शराब के पैमानों की तरह नशीला और उनमें डुबाने को तैयार थे। उसके बाल खुले हुए थे,जैसे कि जय को पसंद थे। जय उसके करीब आया तो उसने जय को आंखों से बैठने का इशारा किया। 

जय सोफे पर बैठ गया, उसने कविता को अपने पास बुलाया। कविता उसकी तरफ दो कदम बढाके सामने खड़ी हो गयी। फिर उसने अपने भाई के माथे पर टिका लगाया और उसकी आरती उतारने लगी। जय का मुंह खुला ही था।

कविता हंसती हुई आरती उतारती रही। फिर थाली टेबल पर रख उसके हाथों पर राखी बांध दी। फिर उसने जय के मुंह मे मिठाई दे दी। जय ने उसको भी मिठाई खिलाने के लिए थाली से मिठाई उठाया तो कविता बोली,” हमारे लिए अपने मुंह मे रखे मिठाई का आधा टुकड़ा दे दो भैया।”

जय ने मुस्कुराते हुए वही टुकड़ा बढ़ाया।कविता उस टुकड़े को मुंह मे दबा ली। कविता- हहम्म अब हमारा गिफ्ट दो।

जय- क्या चाहिए तुमको कविता दीदी बोलो ना?

कविता- तुम अपने हिसाब से दोगे ना, हम क्या बताएं?

जय- पर हम कुछ लाये नहीं तुम्हरे लिए।

कविता झूठा सा गुस्सा और बुरा मुँह बनाके बोली,” कैसे भाई हो तुम? बहन को एक गिफ्ट भी नहीं दोगे।” और दूसरे तरफ मुँह घुमा ली।

जैसे ही मुड़ी जय ने पीछे से उसके गले मे एक सोने का हार रख दिया, और मुस्कुराते हुए बोला,” ये पहला मौका है रक्षाबंधन का की हम तुमको कुछ दे सकते हैं, तो ये मौका कैसे जाने देते। खुश हो ना दीदी।”

कविता चहकती हुई,” हहम्म बहुत खुश जय।

जय- अब हमारा गिफ्ट दो।

कविता- आज जो गिफ्ट हम तुमको देंगे शायद ही किसी बहन ने अपने भाई को दी होगी।

जय- वो क्या?

कविता- जय अब हमदोनों एडल्ट रक्षाबंधन मनाएंगे। 

जय- वो कैसे कविता दीदी।

कविता हम बताते हैं कैसे। कविता ने जय की ओर पीठ की और बाल पकड़के आगे कर दिया। कविता की पीठ पूरी खुली हुई थी। उसकी चोली के दो धागे पीठ पर कसके बंधे थे। उसकी गोरी त्वचा गर्दन से लेके कमर तक पूरी खुली हुई थी। कविता ने ब्रा नहीं पहनी थी। उसने बोला,” जय हमारी चोली के धागे खोल दो।”

जय उसके कहे अनुसार, उसकी गर्दन के पास बंधे धागों की गांठ खोल दिया, फिर उसने पीठ के बीचों बीच की डोरियों को भी खोल दिया।। कविता के कंधों और बांहों पर चोली लटक रही थी। फिर जय ने कविता के दुप्पटे को उसके कंधों से उठाके फर्श पर गिरा दिया। कविता ने फिर अपनी कमर की ओर इशारा करके बोला,” अब इस घाघरे के नारे भी खोल दो।” कहकर उसने एक लंबी साँस ली। जय ने उसके घाघरे के नारे को एक झटके के साथ खोल दिया। घाघरे कविता के चूतड़ों पर हल्का टिका हुआ था। कविता ने अंदर पैंटी नहीं पहनी थी। जय ने कविता के घाघरे को पकडके फैला दिया, तो घाघरे फौरन ज़मीन पर जा गिरा कविता के पैरों में। जय ने फिर कविता के चोली को उसके कंधों से उतार दिया और कविता को अपनी बांहों में ले लिया। उनके गर्दन और कंधों को चूमते हुए उसकी बांहों से चोली उतार दी और कोने में फेंक दी। कविता बिल्कुल नंगी हो चुकी थी। जय के पायजामे में भी लण्ड कड़क होक तंबू बना चुका था।जो सीधा कविता के चूतड़ों से टकड़ा रहा था। कविता का हाथ उसके लण्ड पर जा चुका था। कविता जय की ओर मुड़ी और उसको धक्का देकर सोफे पर बिठा दिया। जय के कुर्ते को खोल दिया और फिर उसके पायजामे को भी खोल दिया। जय सिर्फ अंडरवियर पहने था। कविता ने उसे भी तुरंत उताड़ दिया। जय और कविता दोनों बिना कुछ बोले इन चीजों को अंजाम दे रहे थे। अब दोनों बिल्कुल नंगे थे। तब कविता जय के गोद में कूदकर बैठ गयी। और उसके लण्ड को अपनी गाँड़ के नीचे दबाकर हिलाने लगी। फिर उसने जय को अपनी चूचियों के बीच चिपका लिया। जय कविता को कमर से कसके पकड़े हुया था।

कविता ने जय को अपनी ओर घुमाया और उसकी आँखों मे गौर से देखने लगी। फिर बोली,” ये राखी तुमको याद दिलाएगी, की तुम अपनी दीदी को चोद रहे हो। अपनी सगी बहन को चोदोगे ना भैया? तुम्हारी ये बहन लण्ड की भूखी है, और मूठ की प्यासी है।”

जय,” तुम्हारी हर इच्छा पूरी करेंगे, दीदी।

कविता,” पर ऐसे नहीं, अभी तुम्हारे इस लण्ड पर भी राखी बांधेंगे।”

जय ये सुनकर पागल हो गया,” क्याआआआ?

कविता उसकी गोद से उतरी और उस थाली से एक राखी उठायी। फिर नीचे घुटनो पर बैठकर जय के लण्ड को चूमा, फिर उसने जय के लण्ड पर राखी बांध दी। जय को तो ये बिल्कुल मज़ेदार और चौकाने वाला लग रहा था। 

कविता,” अब आज इसको मत उतारना। आज हम एक नया रिश्ता शुरू कर रहे हैं।”

कविता ने फिर म्यूजिक ऑन किया, और एक बेहद सेक्सी गाना” एक तो कम ज़िन्दगानी” कमरे में बजने लगा। कविता उस गाने की बीट पकड़के नाचने लगी। कविता को अपनी माँ ममता से नाचने की कला विरासत में मिली थी। अब तो जय का बुरा हाल शुरू होने लगा। कविता बेहद कामुक मूव्स कर रही थी, जो कि उस भद्दे गाने की बोल से मिल रहे थे। जैसे अपने चूतड़ों को ज़ोर ज़ोर से हिलाना। चूचियों को उठा उठा कर हिलाना। होंठों को रगड़ना, आंखे मारना, अपनी बुर को वो इस सब के दौरान छुपाए हुए थी। जय खुश भी था और हैरान भी अपनी कविता दीदी का ये रूप देखकर। 

थोड़ी देर बाद गाना बंद हो गया, और जय ने ताली बजाई। कविता ने हंसकर आदाप के इशारे से धन्यवाद किया।

फिर, जय उसके पास आ गया और, दूसरा गाना लगाया,” गले लग जा,ना जा…मेरी इतनी सी हशरत है।”कटरीना और अक्षय कुमार वाला। और दोनों उस धुन पर नंगे नाचने लगे। इस दौरान जय और कविता ने एक दूसरे को कितनी बार चूमा, सहलाया उसका कोई हिसाब नहीं था। दोनों बिल्कुल एक दूसरे में मगन हो गए थे। जब गाना खत्म हुआ तो कविता जय के कमर के आसपास कैंची बनाकर उसके गोद में चढ़ी हुई थी। कविता को ऐसे ही उठाकर जय अब कमरे की ओर बढ़ चला। दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराते हुए हांफ रहे थे। जय कविता को कमरे में ले आया, तो कविता ने जय से कहा,” भाई आज का दिन यादगार बनाना होगा। तुम्हारे लण्ड पर जो राखी बांधी है उसकी कसम, आज पूरा दिन चुदवाएंगे। इसलिए आज हम और तुम वियाग्रा खा लेते हैं।”

जय- कहाँ रखी हो जान?

कविता- वहां रैक पर रखी है। आज के दिन की तैयारी है। 

पहले वो कविता को बिस्तर पर रखता है, फिर वियाग्रा लाता है और दोनों एक एक गोली खा लेते हैं। फिर जय को देख कविता बोलती है,” ये देखो जय, तुमको ये देखकर अच्छा लगेगा।

जय- क्या? 

कविता अपना बुर जय को दिखाती है, जहां वो पियरसिंग करवाई थी। जय तो अवाक रह जाता है। जय उसके ओर देखता है और बोलता है,” आई लव योर बुर दीदी।” और बुर को चूसने लगता है। कविता की सावली बुर पर हल्के बाल थे। उस पर मेटालिक रंग की पियरसिंग रिंग मस्त लग रही थी। कविता भी अपना बुर मज़े से चटवाने लगी। उसकी बुर का रस जय अपने जीभ से मज़े से चाटने लगा। बुर का नमकीन रस लगातार चू रहा था। कविता मुस्कुराते हुए जय को देख रही थी। जय पूरा मगन होकर बुर को फैलाके चाट रहा था। उसने बुर को अपने थूक से नहला दिया। 

कविता- उम्मममम, भैया आज बहुत दिनों बाद मिले हो, अपनी बहन की बुर कैसी लग रही है? कैसी लग रही है बुर की छिदाई? 

जय बुर चाटते हुए बोला,” दीदी तुम्हारी बुर बहुत मस्त है,खूबसूरत है। लिक… लिक…. और ये बुर की छिदाई जो तुम करवाई हो, वो तुम्हारी बुर पर चार चांद लगा दिया है। हमको पता होता तो तुम्हारे लिए मस्त डायमंड की रिंग लाते बुर पर पहनने के लिए। तुम आज हमारा दिल जीत ली हो।लिक…. लिक… उम्म्मम।

कविता- ऊ ऊ ऊ हमारे भैया, कितने अच्छे हो तुम। पर आज हमको तुम्हारा लण्ड चाहिए और कुछ नहीं। अपनी बहन को खूब चोदो इस रक्षाबंधन के पवित्र त्योहार पर। अपना लण्ड दो ना।

जय- कविता दीदी, आज दिनभर तुमको खूब चोदेंगे। टेंशन मत लो।

कविता- टेंशन बुर में है, भैया। प्लीज घुसा दो ना अपना लौड़ा।

जय- ठीक है, पर चुसोगी नहीं लण्ड को,सीधे घुसा दें बुर में।

कविता- हाँ, प्लीज अब घुसाओ, बाद में चूसेंगे।आज वियाग्रा इसलिए ही तो खाये हैं कि, तुम्हारा तंबू खड़ा रहे।

जय- ठीक है। तो तुम ऊपर आओ और हम लेटते हैं। 

कविता बिना देर किए जय के ऊपर आ गयी। फिर उसने जय के लण्ड पर थूक दिया। और उसके लण्ड को अपनी बुर पर सेट कर उसपर बैठते हुए पूरे नीचे चली गयी। लण्ड पूरी तरह उसके बुर में समा गया। उसके मुंह से एक लंबी आआहह निकली। इस वक़्त वो जय के छाती पर हाथ टिकाए थी और उसका चेहरा छत की ओर था। उसका मुंह खुला था। जय के हाथ कविता की चुच्चियों को मसल रहे थे। कविता की कमर धीरे धीरे हिल रही थी। जिससे उसे मज़ा आ रहा था। कविता,” उम्म्म्म्मममः, ऊफ़्फ़फ़, की आवाज़ें निकाल रही थी। जय के लण्ड पर बंधी राखी को कविता के बुर से चूते रस से भीग चुकी थी। उस राखी की किस्मत में भी शायद यही लिखा था, कि एक बहन का प्यार इस हद तक बढ़ जाएगा कि उसको भाई के लण्ड पर बंधना होगा।

जय कविता को निहार रहा था। कविता पूरी मस्त हो चली थी। अब उसकी कमर की स्पीड बढ़ चुकी थी। वो तेजी से अपने भारी चूतड़ों को उछाल रही थी। जय भी जोश में आ चुका था। पर वो इस वक़्त कविता की बेशर्मी और बेशब्री का मज़ा ले रहा था। कुछ आधे घंटे तक कविता ऐसे ही चुद रही थी। फिर वो चीखते हुए झड़ गयी। जय ने उसको अपनी बाहों में भर लिया। कविता बोली,” जय आई लव यू,। वो हांफ रही थी।

जय- आई लव यू टू, कविता दीदी। 


अब आगे क्या क्या होगा? आज दिनभर कविता और जय के बीच क्या क्या होगा? क्या ममता को जय और कविता के बारे में पता चल जाएगा? आखिर ममता उनके बदले रिश्ते की मंजूरी देगी? देखते हैं अगले भाग में।


कविता अपने भाई के ऊपर नंगी पड़ी हुई थी। जय उसके बालों को सहला रहा था। उसने कविता की चूचियों को अपने मुंह मे दबा रखा था। जैसे कोई बच्चा कविता अपने भाई के ऊपर नंगी पड़ी हुई थी। जय उसके बालों को सहला रहा था। उसने कविता की चूचियों को अपने मुंह मे दबा रखा था। जैसे कोई बच्चा अपनी माँ का दूध पीता है। साथ ही साथ वो उसके चूतड़ों को भी सहला रहा था। जय का लण्ड कविता की गाँड़ की दरार से चिपका हुआ था। उसका लण्ड तो फौलाद की तरह कड़क था। 

कविता- मज़ा आया तुमको जय भाईजानू?

जय- कविता दीदी तुम जब दीदी का चोला उतार, रंडी बन जाती हो तब हमको बड़ा मजा आता है। हमको बड़ा मजा आता है, जब तुम खुलके चुदती हो। 

कविता- ओह्ह हमारे जानू भैया। तुमको हम सारी उम्र मज़े कराएंगे। चाहे उसके लिए हमको जो करना पड़े। तुमको हम अपना स्वामी मानते हैं, और एक दासी का यही कर्तव्य है कि अपने स्वामी को खुश रखे।

जय- तो तुम हमारी दासी हो! तो जो हम कहेंगे तुमको करना पड़ेगा हमारी प्यारी रंडी कविता दीदी। 

कविता- हुक्म तो करके देखो तुम,ओह्ह सॉरी आप?

जय- ठीक है, बेड से उतरो और कुत्ती बन जाओ।

कविता ने वैसे ही किया। वो कुतिया की तरह चौपाया हो गयी। फिर जय उसके बालों को पकड़के उसको कमरे से बाहर ले आया, और उसके कमरे में ले गया। उसने पूछा,” लिपस्टिक कहा है तुम्हारी? कविता- वो वहां दराज़ में है। इतना कहना था कि जय ने एक थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया, और बोला,” कुतिया बोलती नहीं सिर्फ भौंकती है, जीभ बाहर लटकाती है। इशारों से बात कर हरामज़्यादी, कुत्ती कमीनी, तोहर माँ के चोदू, भोंसड़ीवाली, कुतिया की पिल्ली।

कविता का चेहरा लाल हो उठा। पर उसे समझ आ गया था कि जय शायद आज कोई नरमी नहीं बरतेगा। कहीं ना कहीं वो भी जय के हाथों जलील होना पसंद करती थी। कविता,” भौं भौं ( ठीक है)।

जय- ये हुई ना बात, कुतिया साली।

जय ने लिपस्टिक निकाला और कविता के माथे पर हिंदी में लिखा” रंडी”।

जय ने उसके सामने फर्श पर थूका, और कविता से बोला,” चाट ले इसे”। कविता एक पालतू कुतिया की तरह लपलपाती जीभ से बिना एक पल हिचके थूक चाट गयी।जय- और चाटेगी?

कविता- भौं भौं वुफ ( जरूर जरूर, हां)। जय ने उसके खुले मुंह मे थूक दिया। कविता उसे पेडिग्री समझ के निगल गयी।

जय- कविता माई बिच, हमारा फोन ले आओ। कविता जय का फोन अपने मुँह में उठा लाती है। जय कविता की गाँड़ को सहलाते हुए उससे फोन ले लेता है। फिर जय कविता की कुछ तस्वीरें निकालता है। कविता बिल्कुल कुत्ती बानी हुई थी। 

जय- तुम अब वापिस कविता दीदी बन सकती हो। 

कविता उठके जय के पास बैठ गयी। फिर जय ने उससे पूछा,” कैसा लगा दीदी? 

कविता- जय तुम बुरा तो नहीं मानोगे ना, या हमको गलत मत समझना। पर जो तुमने अभी किया, उसमे हमको बहुत मज़ा आया। हम आजतक ब्लू फिल्मों में देखे थे, ऐसे करते हुए। 

जय- हम बुरा काहे मानेंगे। पगला गयी हो क्या? तुमको अगर मज़ा आया तो हमको डबल मज़ा आया ये करने में।

कविता- नहीं माने हमको लगा कि कहीं, तुमको बुरा लगे कि तुम्हारी सगी दीदी को इस तरह घिनौना खेल पसंद है, इसलिए बोले थे। हमको हमेशा से इसी तरह चुदने का मन है। खूब गंदी चुदाई, गाली गलौच से भरी हुई। हमको एक दम घटिया सस्ती रंडी बनाकर चोदो। ऐसे चोदो की कल सुबह हम अपने नज़रों से गिर जाए। तुम तो बहुत प्यार से चोदते हो। ना तो भद्दी भद्दी गालियां देते हो, ना हमको जलील करते हो। हमको एहसास दिलाओ कि हम सिर्फ चुदने के लिए बने हैं। समझ लो कि तुम हमको खरीद लिए हो, और बस तुम्हारे लिए भोगने की चीज़ हैं। हमारे अंदर अपनी बहन को नहीं, एक कोठे की रंडी को देखो। तुमको खुश………

जय- एक मिनट…. एक मिनट…. तुम ये सब जो बोल रही हो। सच मे बोल रही हो ना। तुम सच मे हमारी शरीफ कविता दीदी हो ना। हमको नहीं पता था कि तुमको ऐसे चुदवाने का शौक है। अब तो बस तुम देखोगी की कैसे हम तुमको जलील कर करके चोदेंगे।

कविता- हमको हमेशा से ऐसे ही चुदने का मन है। पर शर्म से बोल नहीं पाती थी।

जय- अरे रंडी की बच्ची, चल अब शर्म को हमेशा के लिए टाटा बोल दो,क्योंकि अब जो तुम्हारे साथ होगा,उसमें तो शर्म को भी शर्म आ जायेगा। 

जा अपनी गंदी कच्छी ले आओ और किचन से गिलास और गाजर का हलवा ले आओ। 

कविता गाँड़ मटकाते हुए चली गयी। जय अपने लण्ड पर बंधी राखी को देखकर सोच रहा था कि क्या किस्मत है उसकी। कविता थोड़ी देर बाद वापिस आ गयी। उसके हाथ में गंदी मैरून रंग की पैंटी थी। दूसरे हाथ में कटोरी में गाजर का हलवा और गिलास था। जय के पास वापिस आकर बैठ गयी। जय ने कविता से कहा,” छिनाल सुन इधर सामने आओ। अपनी बुर को फैलाओ।” उसने उसकी पैंटी को कविता के बुर में घुसा दिया। उसके बाद उसने कविता को पीछे घोड़ी बनने को बोला। कविता तुरंत घोड़ी बन गयी, और पीछे मुड़कर बोली,” क्या करने वाले हो?”

जय- चल अपनी गाँड़ को फैला, तुम्हारी गाँड़ में ये पूरा गाजर का हलवा जाएगा।

कविता उत्साहित होकर- क्या??

जय- हाँ, सही सुना तुमने। चलो फैलाओ।

कविता ने वैसा ही किया,” ये लो”।

जय ने धीरे धीरे एक एक चम्मच करके पूरा गाजर का हलवा कविता की गाँड़ में ठूस दिया। कविता हंसते,मुस्कुराते हुए सब देख रही थी, और मज़े ले रही थी। तब जय ने कविता के बाल पकड़के अपनी तरफ घुमा लिया। और उसके हाथों में वो कटोरी पकड़ा दी। जय- कैसा लग रहा है तुमको, बुरचोदी साली?

कविता- सारा हलवा तो तुम हमारे गाँड़ में डाल दिये, अब क्या करोगे?

जय- वो अभी रहने दो। पहले अब लण्ड चूसो। पर जब तुम चुसोगी तो तुम अपना थूक इस कटोरे में चुआओगी। हमारे लण्ड से जो तुम्हारा थूक चुएगा वो भी इस कटोरे में और हम जो थूकेंगे वो भी इसी में। इसे फेंकना मत हराम की पिल्ली। 

कविता- ओह, वाओ ठीक है। 

और जय का लण्ड चूसने लगी। जय आराम से बेड पर बैठा था। और कविता अपने मुंह का जादू दिखा रही थी। जय कविता के चूतड़ों को सहलाते हुए उस पर थाप भी मार रहा था। कविता धीरे धीरे जय के लण्ड को कसके चूसने लगी। जय ने कविता को भद्दी भद्दी गालियां देने शुरू कर दिया,” क्या बात है माँ की लौड़ी, भोंसड़ीवाली, साली तुमको तो पोर्नस्टार होना चाहिए। कहां से बिहार में पैदा हो गयी, तुमको तो अमेरिका में पैदा होना चाहिए था, वो भी किसी पोर्नस्टार के घर या रंडी के। तुझ पे शराफत जचेगी ही नही।अच्छा हुआ अपना असली रूप खुलके बता दिया, अपने अंदर ऐसी खतरनाक जंगली बिल्ली छुपा के रखी थी, मादरचोद।

कविता मुस्कुराते हुए लण्ड चुसि रही थी। तभी जय ने लण्ड का दबाव कविता के हलक तक पहुंचा दिया। कविता हटना चाहती थी, पर जय ने उसपर जोर बनाये रखा। उसके होंठों जय के लण्ड के जड़ में बंधी रखी से टकड़ा रहे थे। कविता गूं….गूं… उबकाई के साथ स्वतः छूट गई। जय का लण्ड थूक से सना हुआ था, और लण्ड से थूक चूने लगा तो कविता ने कटोरी लण्ड के नीचे लगा दिया, और अपने मुंह से चूते हुए लेर को हाथों में इकठ्ठा कर उस कटोरी में डाल दिया। जय ने उसी वक़्त कविता से कहा,” अरे बड़े घर की छिनाल लड़की, इतने से काम नहीं चलेगा। तुमको टाइम बढ़ाना होगा।” कविता हाँ में सर हिलाई। और वापिस से जय के लण्ड को मुंह मे घुसा ली। जय- हाँ…. आआहह…आ..आ.. बहुत अच्छे अच्छा कर रही हो। ये लो इनाम।” और उसने उस कटोरी में थूक का बड़ा लौंदा गिरा दिया। कविता ने कटोरी बढाके उसमें थूक ले लिया। कविता फिर कटोरी को अपने मुंह के ठीक नीचे,जहां लण्ड उसके मुंह मे घुसा था, लगा दिया। उसके मुंह से लगातार थूक और लेर अब चूने लगे थे। जय को ये बेहद कामुक लग रहा था। कविता धीरे धीरे, अपनी स्पीड भी बढ़ा रही थी। उसने जय के लण्ड को और अंदर लेना शुरू किया। जय उसके गालों पर हल्की थपकियाँ मार रहा था। कविता धीरे से पूरा लण्ड अपने मुंह मे समा ली। और जय के लण्ड के अंतिम छोड़ तक जा पहुंची। जय ने उसका प्रोत्साहन बढ़ाया,” हां, कविता रंडी दीदी ऐसे ही, बहुत अच्छे। अभी मुंह मे लिए रहो, देखो कितनी देर तक रुक सकती है।कविता आँखे बड़ी करके जय की आंखों में देख रही थी। और जय के प्रोत्साहन से सांसे थाम कोई 15 सेकण्ड्स तक टिकी रही। फिर गैग रिफ्लेक्स की वजह से स्वतः अलग हो गयी। और हांफते हुए हंस रही थी। 

जय कविता को हंसता देख हसने लगा। कविता- ठीक कर रहे हैं ना हम?

जय- हहम्मम्म पर तुम इससे और अच्छा कर सकती हो, समझी। और ट्राय करो।” कविता के चेहरे को वापिस भीगे लण्ड पर झुका दिया। कविता फिर लण्ड चूसने की प्रक्रिया में लीन हो गयी। कविता इस बार खुदको ही हराने के चक्कड़ में थी। इस बार उसने पूरे 30 सेकंड तक पूरे लण्ड को अपने हलक में छुपाए रखा। जय को इतनी देर की उम्मीद नहीं थी। जय के आंड़ कविता के ठुड्ढी पर लटक रहे थे। कविता के चेहरे का निचला हिस्सा पूरी तरह गीला हो चुका था। उसके हाथों में रखी कटोरी आधी भर चुकी थी। आखिरकार कविता ने मुंह से लण्ड को निकाला। जय ने उसके लिए ताली बजाई। कविता करीब 10 मिनट तक लण्ड चूसती रही।

जय- चल अब तुम्हारी गाँड़ चोदेंगे, और मज़ा आएगा। 

कविता- पर उसमे तो हलवा भरे हुए हो। उसका क्या?

जय- लण्ड अपनी जगह बना लेगा। तुम कुतिया बन जाओ।

कविता फिर चौपाया हो गयी और जय के सामने अपनी भूरी छेद वाली गाँड़ परोस दी। जय ने उसके भारी भरकम चूतड़ों पर पहले थूका और तीन चार करारे थप्पड़ मारे। कविता थप्पड़ से उठे दर्द से ज्यादा आनंद महसूस कर रही थी। उसने खुद ही अपने चूतड़ पर तमाचे मारे सटाक… सटाक…,” और मारो, हमारे गाँड़ पर। लाल कर दो।” और अपनी गाँड़ हिलाने लगी। जय ने फिर और कसके झापड़ मारे। फट….फट….सट। 

जय ने फिर अपना लण्ड कविता की गाँड़ पर रखा, और पूछा,” क्यों रे रंडी की बच्ची, लण्ड चाहिए।

कविता- हहम्म, हां चाहिए हमको।

जय- क्या चाहिए कुत्ती खुलके बोल। उसके बाल खींचते हुए बोला।

कविता- लण्ड आपका लण्ड हमको अपनी गाँड़ में चाहिए।

जय- भीख मांग लण्ड के लिए।

कविता- प्लीज हम भीख मांगते हैं, ये मस्त लण्ड हमारी गाँड़ में डालो। हमारी गाँड़ मारिये ना प्लीज। उफ़्फ़फ़ प्लीज प्लीज।

जय ने कविता के गाँड़ में अचानक से लण्ड के आगे का हिस्सा घुसाया।कविता के मुंह से चीख निकली, पर जय को कोई फर्क नहीं परा। कविता के बाल पकड़े हुए, उसने लण्ड को घुसाना चालू रखा। कविता एक हाथ से अपने बांयी चूतड़ को पकड़े थी। गाँड़ के अंदर मौजूद गाजर का हलवा लण्ड के दबाव की वजह से और अंदर अंतरियों की ओर घुस गया। जय के लण्ड पर हलवे का दबाव एक गद्दे की तरह लग रहा। थोड़ी देर में में कविता की गाँड़ जय के घुसपैठिये लण्ड से अभ्यस्त हो चुकी थी। जय कविता की गाँड़ में लण्ड रखे उसकी गाँड़ के अंदर का पूरा अंदाज़ा लगा रहा था। एक तो कविता की गाँड़ में नेचुरल मूंग के हलवे जैसा टेक्सचर, था और अब गाजर का हलवा उसमें क़यामत ढा रहा था। कुछ देर ऐसे रहने के बाद जय कविता से पूछा,” मस्त गाँड़ है तुम्हारी कविता रंडी दीदी ?

कविता मुस्कुराते हुए,” धत्त, क्या अच्छा है? 

जय- पता है, तुम्हारी गाँड़ लाखों में एक है। उफ़्फ़फ़, क्या शेप है तुम्हारे चुत्तर का। उसने धीरे धीरे धक्के मारने शुरू किए। कविता के मुंह, से सीत्कारें, उठने लगी। जय ने उसकी गाँड़ पर बने टैटू को छूते हुए, कस कसके उसकी गाँड़ मारने लगा। कविता के पास चीखें मारने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जय को उसमे बेहद आनंद आ रहा था। गाँड़ मारते हुए, कविता की गाँड़ से हलवा थोड़ा थोड़ा नीचे गिरने लगा। पर जय ने कुछ नही कहा।अब कविता भी दर्द से निकल आनंद के चौखट चूम रही थी। 

कविता पीछे मुड़के, जय की ओर देखते हुए, बोली,” ऊऊऊ…हहहहहह हां….. ऐसे ही मारो गाँड़। इस रक्षाबंधननन… बहन का तोहफा है। मज़ा आ रहा है ना। हम भाईचोदी रंडी है। ऊऊऊ हहहहहहह आआहह, ऊफ़्फ़फ़।

जय- हम इस पावन अवसर पर तुम्हारी गाँड़ मार रहे हैं दीदी, वो भी अपने लण्ड पर तुम्हारी बंधी हुई राखी के साथ। इससे बड़ा घिनौना रिश्ता हम कायम नही कर सकते। तेरी गाँड़ में जो हलवा है, उससे मज़ा और बढ़ गया है। तुमको अभी लण्ड भी चुसायेंगे। तुम्हारी गाँड़ में हलवा मिक्स तैयार कर रहे हैं। तुम्हारी गाँड़ का स्वाद, हलवे का स्वाद और लण्ड का स्वाद मिक्स हो जाएगा। खाएगी ना।

कविता पे सेक्स और वियाग्रा का नशा चढ़ा हुआ था। उसने जीभ से होंठों को चाटते हुए कहा,” उम्म्महह, ऊफ़्फ़फ़ सोचके ही मुंह मे पानी आ रहा है। इस तरह तो और मज़ा आएगा। लाओ दो ना।

जय- सब्र करो रंडी रानी, तुमको मीठा फल मिलेगा। पहले अपनी गाँड़ की चुदाई तो करने दे।” जय उसको करीब पांच मिनट और चोदा, कविता के बार बार कहने पर उसने लण्ड निकाला और कविता भूखी कुतिया की तरह लण्ड चाटने लगी। लण्ड पर चिपचिपा लसलसा पदार्थ लगा हुआ था। कविता ने उसे जी भर के चाटा। कविता की बुर में उसकी पैंटी बाहर आ रही थी, जय ने वो पैंटी उसके मुंह मे घुसा दी। जय ने फिर लण्ड वापिस कविता की गाँड़ में घुसा दिया, और चोदने लगा। कविता के मुंह मे उसकी बुर के रास से भीगी पैंटी थी, जिससे उसकी आवाज़ सिर्फ गूं…गूं…. कर आ रही थी। कविता एक हाथ से अपना बुर रगड़ रही थी। पर दोनों में से कोई अभी रुकने को तैयार नहीं था। थोड़ी देर बाद जय ने फिर लण्ड निकाला, और कविता की खुली चुदी फैली गाँड़ को निहारा। उसने थूक उसकी गाँड़ में थूका। और फिर गाँड़ मारने लगा। जय ने फिर और थोड़ी देर कविता की गाँड़ मारी। फिर कविता के हाथों से कटोरी ले ली। उसने लण्ड निकाला, और उसकी गाँड़ में कटोरी में इकट्ठा थूक और लेर सब डाल दिया। उसने फिर लण्ड वापिस घुसा दिया। कविता की गाँड़ में एक मस्त मीठा मसाला तैयार हो रहा था। जय ने उसकी पैंटी निकालकर अपने गले में डाल लिया। कविता मस्ती में ठुकवाती जा रही थी। उसने बोला,”ऊफ़्फ़फ़, आआहह, ऊईई तुम बिल्कुल वैसे ही कर रहे हो, जैसा हमको चाहिए था। ऊफ़्फ़फ़। हमारी गाँड़ में सब मिला दिया। इसका क्या करेंगे? हमको खिलाओगे ना।

जय- हां डार्लिंग तुम्हारे लिए ही है, तुमको यही खाना है। अभी थोड़ी देर में हम मूठ भी गिरा देंगे। फिर तुम्हारा प्रोटीन भी आ जायेगा इस मीठे मसाले में। और ठहाका लगाके हंसा। कविता भी हंसने लगी। थोड़ी देर बाद जय बोला,” ऊफ़्फ़फ़ ओह्ह ओह्ह  लगता है मूठ गिरने वाला है। आह….आह।

कविता,” आआहह हमारा भी होने वाला है। आह ओऊऊऊ… अंदर ही गिराओगे ना। अपनी बहन को दे दो, अपना ताज़ा ताज़ा मूठ। हमको बहुत मस्त लगता है। आ जाओ चुआ दो। आआहहहहहहहहह

और दोनों एक साथ झड़ गए। जय ने मूठ की 5 6 लंबी पिचकारियां मारी। फिर उसने अपना लण्ड निकाला, और उसकी पैंटी कविता की गाँड़ में ठूस दी। 

कविता- ये क्यों ठूस दी।

जय- जहाँ तक तुमको जानते हैं दीदी, तुम कुछ भी बर्बाद नहीं करना चाहोगी। इसलिए पहले तुम लण्ड से सब चाटके साफ करोगी। और जो डिश तुम्हारी गाँड़ में है, उसे तुम्हारी पैंटी रोके रखेगी। 

कविता बिल्कुल माधुरी दीक्षित सी मूती से दांत बिखेड़ दी। पर वासना से डूबे उसकी आंखें बिना पालक झपके उसके लण्ड को निहार रही थी। जय के लण्ड पर मटमैले लाल रंग चढ़ा हुआ था। क्योंकि उसमें गाजर का लाल हलवा, थूक, मूठ का मिला जुला मिश्रण था। कविता घुटनो के बल नीचे बैठ गयी। और जय की ओर देखते हुए, लण्ड को उठाकर निचले हिस्से को चाटने लगी। फिर मुस्कुराते हुए बोली,” ये तो मीठा है।”

जय हंसते हुए,” क्यों नही जान तुम्हारे गाँड़ और गाजर की हलवे की मिठास मिलकर और मीठी हो गयी होगी।” कविता झट से बोली,” और तुम्हारा थूक और मूठ भी।” जय और कविता दोनों हंसे। कविता पूरा लण्ड साफ कर गयी और जय के लण्ड जे अंदर बचा खुचा मूठ भी चूस गयी। 

फिर जय ने कविता को कटोरी वापिस दे दी। और कविता हगने की पोज़ में बैठ गयी। कटोरी को ठीक गाँड़ के नीचे लगा लिया। कविता,” गाँड़ बहुत भारी लग रहा है, जैसे कि हगने के पहले लगता है।” 

जय,” तो अभी हगोगी ही ना, उस मीठे मसाले को जिसे अपने गाँड़ में भारी हुई हो।”

कविता,” पैंटी निकाल दो ना।” जय,” ये लो अभी निकाल देता हूँ।” वो पीछे से जाकर पैंटी निकाल देता है। पैंटी निकालने के बाद कविता की वीडियो रिकॉर्ड करने लगता है। कविता के गाँड़ से चिपचिपा लुवेदार पदार्थ निकलने लगता है। एकदम मटमैले लाल रंग सा। वो सीधा कटोरी में गिर रहा था। जय बड़े गौर से देख रहा था। कविता धीरे धीरे सब निकाल रही थी। कटोरी भर गई। जय ने पूछा, ” सब निकल गया।” कविता,” नहीं अभी इतना और है अंदर।” जय ने फिर पैंटी उसकी गाँड़ में घुसा दी। और चम्मच से गाँड़ के छेद के आसपास लटकती उस पदार्थ को कटोरी में डाल दिया। कविता की ओर कटोरी बढाके उसने कहा,” ये है सब्र का मीठा फल। खा लो।” 

कविता कटोरी ले लेती है और एक चम्मच खाती है,” उम्म्मम, बहुत टेस्टी है, वाओ, बहुत मजेदार है।” वो धीरे धीरे चम्मच से कहा रही थी, जबकि जय उसकी वीडियो बना रहा था। 

” मीठा है, साथ में प्रोटीन भी है इसमें, ये तो हेल्थी है।” तुमने तो कमाल कर दिया हमको एक नया डिश बाबाके खिलाये।”कविता बोले जा रही थी।

कविता,” क्या हम अच्छी लड़की नहीं हैं? अब ये तो हमारा मन हमको ये सब करबे को कहता है। हम जो हैं वही हैं। तुमको हम ऐसे अच्छे लगते हैं या शरीफ दीदी की तरह।”

जय उसके बाल संवारते हुए,” तुम एक बहुत अच्छी लड़की हो कविता दीदी। जैसी हो वैसे ही रहो। बल्कि तुम्हारा ये रूप देख हम और तुमको चाहने लगे हैं। तुम ये बताओ ऐसा घिनौना सेक्स ही तुमको पसंद है ना? 

कविता मैस्कुराते हुए,” हां, सही बोल रहे हैं। इसीमें तो मज़ा आता है।” कटोरी चाटते हुए बोली। वो सब खा चुकी थी। 

तभी पता नहीं जय को क्या सूझा कविता को बोला,” मूत पियोगी और घिनौना होगा। हम अपना मूत पिलाते हैं तुमको।

कविता गिलास उठा ली, और मुस्कुराते हुए जय के लण्ड के सामने गिलास रख दी। 


माँ का दूध पीता है। साथ ही साथ वो उसके चूतड़ों को भी सहला रहा था। जय का लण्ड कविता की गाँड़ की दरार से चिपका हुआ था। उसका लण्ड तो फौलाद की तरह कड़क था। 

कविता- मज़ा आया तुमको जय भाईजानू?

जय- कविता दीदी तुम जब दीदी का चोला उतार, रंडी बन जाती हो तब हमको बड़ा मजा आता है। हमको बड़ा मजा आता है, जब तुम खुलके चुदती हो। 

कविता- ओह्ह हमारे जानू भैया। तुमको हम सारी उम्र मज़े कराएंगे। चाहे उसके लिए हमको जो करना पड़े। तुमको हम अपना स्वामी मानते हैं, और एक दासी का यही कर्तव्य है कि अपने स्वामी को खुश रखे।

जय- तो तुम हमारी दासी हो! तो जो हम कहेंगे तुमको करना पड़ेगा हमारी प्यारी रंडी कविता दीदी। 

कविता- हुक्म तो करके देखो तुम,ओह्ह सॉरी आप?

जय- ठीक है, बेड से उतरो और कुत्ती बन जाओ।

कविता ने वैसे ही किया। वो कुतिया की तरह चौपाया हो गयी। फिर जय उसके बालों को पकड़के उसको कमरे से बाहर ले आया, और उसके कमरे में ले गया। उसने पूछा,” लिपस्टिक कहा है तुम्हारी? कविता- वो वहां दराज़ में है। इतना कहना था कि जय ने एक थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया, और बोला,” कुतिया बोलती नहीं सिर्फ भौंकती है, जीभ बाहर लटकाती है। इशारों से बात कर हरामज़्यादी, कुत्ती कमीनी, तोहर माँ के चोदू, भोंसड़ीवाली, कुतिया की पिल्ली।

कविता का चेहरा लाल हो उठा। पर उसे समझ आ गया था कि जय शायद आज कोई नरमी नहीं बरतेगा। कहीं ना कहीं वो भी जय के हाथों जलील होना पसंद करती थी। कविता,” भौं भौं ( ठीक है)।

जय- ये हुई ना बात, कुतिया साली।

जय ने लिपस्टिक निकाला और कविता के माथे पर हिंदी में लिखा” रंडी”।

जय ने उसके सामने फर्श पर थूका, और कविता से बोला,” चाट ले इसे”। कविता एक पालतू कुतिया की तरह लपलपाती जीभ से बिना एक पल हिचके थूक चाट गयी।जय- और चाटेगी?

कविता- भौं भौं वुफ ( जरूर जरूर, हां)। जय ने उसके खुले मुंह मे थूक दिया। कविता उसे पेडिग्री समझ के निगल गयी।

जय- कविता माई बिच, हमारा फोन ले आओ। कविता जय का फोन अपने मुँह में उठा लाती है। जय कविता की गाँड़ को सहलाते हुए उससे फोन ले लेता है। फिर जय कविता की कुछ तस्वीरें निकालता है। कविता बिल्कुल कुत्ती बानी हुई थी। 

जय- तुम अब वापिस कविता दीदी बन सकती हो। 

कविता उठके जय के पास बैठ गयी। फिर जय ने उससे पूछा,” कैसा लगा दीदी? 

कविता- जय तुम बुरा तो नहीं मानोगे ना, या हमको गलत मत समझना। पर जो तुमने अभी किया, उसमे हमको बहुत मज़ा आया। हम आजतक ब्लू फिल्मों में देखे थे, ऐसे करते हुए। 

जय- हम बुरा काहे मानेंगे। पगला गयी हो क्या? तुमको अगर मज़ा आया तो हमको डबल मज़ा आया ये करने में।

कविता- नहीं माने हमको लगा कि कहीं, तुमको बुरा लगे कि तुम्हारी सगी दीदी को इस तरह घिनौना खेल पसंद है, इसलिए बोले थे। हमको हमेशा से इसी तरह चुदने का मन है। खूब गंदी चुदाई, गाली गलौच से भरी हुई। हमको एक दम घटिया सस्ती रंडी बनाकर चोदो। ऐसे चोदो की कल सुबह हम अपने नज़रों से गिर जाए। तुम तो बहुत प्यार से चोदते हो। ना तो भद्दी भद्दी गालियां देते हो, ना हमको जलील करते हो। हमको एहसास दिलाओ कि हम सिर्फ चुदने के लिए बने हैं। समझ लो कि तुम हमको खरीद लिए हो, और बस तुम्हारे लिए भोगने की चीज़ हैं। हमारे अंदर अपनी बहन को नहीं, एक कोठे की रंडी को देखो। तुमको खुश………

जय- एक मिनट…. एक मिनट…. तुम ये सब जो बोल रही हो। सच मे बोल रही हो ना। तुम सच मे हमारी शरीफ कविता दीदी हो ना। हमको नहीं पता था कि तुमको ऐसे चुदवाने का शौक है। अब तो बस तुम देखोगी की कैसे हम तुमको जलील कर करके चोदेंगे।

कविता- हमको हमेशा से ऐसे ही चुदने का मन है। पर शर्म से बोल नहीं पाती थी।

जय- अरे रंडी की बच्ची, चल अब शर्म को हमेशा के लिए टाटा बोल दो,क्योंकि अब जो तुम्हारे साथ होगा,उसमें तो शर्म को भी शर्म आ जायेगा।

 

जा अपनी गंदी कच्छी ले आओ और किचन से गिलास और गाजर का हलवा ले आओ। 

कविता गाँड़ मटकाते हुए चली गयी। जय अपने लण्ड पर बंधी राखी को देखकर सोच रहा था कि क्या किस्मत है उसकी। कविता थोड़ी देर बाद वापिस आ गयी। उसके हाथ में गंदी मैरून रंग की पैंटी थी। दूसरे हाथ में कटोरी में गाजर का हलवा और गिलास था। जय के पास वापिस आकर बैठ गयी। जय ने कविता से कहा,” छिनाल सुन इधर सामने आओ। अपनी बुर को फैलाओ।” उसने उसकी पैंटी को कविता के बुर में घुसा दिया। उसके बाद उसने कविता को पीछे घोड़ी बनने को बोला। कविता तुरंत घोड़ी बन गयी, और पीछे मुड़कर बोली,” क्या करने वाले हो?”

जय- चल अपनी गाँड़ को फैला, तुम्हारी गाँड़ में ये पूरा गाजर का हलवा जाएगा।

कविता उत्साहित होकर- क्या??

जय- हाँ, सही सुना तुमने। चलो फैलाओ।

कविता ने वैसा ही किया,” ये लो”।

जय ने धीरे धीरे एक एक चम्मच करके पूरा गाजर का हलवा कविता की गाँड़ में ठूस दिया। कविता हंसते,मुस्कुराते हुए सब देख रही थी, और मज़े ले रही थी। तब जय ने कविता के बाल पकड़के अपनी तरफ घुमा लिया। और उसके हाथों में वो कटोरी पकड़ा दी। जय- कैसा लग रहा है तुमको, बुरचोदी साली?

कविता- सारा हलवा तो तुम हमारे गाँड़ में डाल दिये, अब क्या करोगे?

जय- वो अभी रहने दो। पहले अब लण्ड चूसो। पर जब तुम चुसोगी तो तुम अपना थूक इस कटोरे में चुआओगी। हमारे लण्ड से जो तुम्हारा थूक चुएगा वो भी इस कटोरे में और हम जो थूकेंगे वो भी इसी में। इसे फेंकना मत हराम की पिल्ली। 

कविता- ओह, वाओ ठीक है। 

और जय का लण्ड चूसने लगी। जय आराम से बेड पर बैठा था। और कविता अपने मुंह का जादू दिखा रही थी। जय कविता के चूतड़ों को सहलाते हुए उस पर थाप भी मार रहा था। कविता धीरे धीरे जय के लण्ड को कसके चूसने लगी। जय ने कविता को भद्दी भद्दी गालियां देने शुरू कर दिया,” क्या बात है माँ की लौड़ी, भोंसड़ीवाली, साली तुमको तो पोर्नस्टार होना चाहिए। कहां से बिहार में पैदा हो गयी, तुमको तो अमेरिका में पैदा होना चाहिए था, वो भी किसी पोर्नस्टार के घर या रंडी के। तुझ पे शराफत जचेगी ही नही।अच्छा हुआ अपना असली रूप खुलके बता दिया, अपने अंदर ऐसी खतरनाक जंगली बिल्ली छुपा के रखी थी, मादरचोद।

कविता मुस्कुराते हुए लण्ड चुसि रही थी। तभी जय ने लण्ड का दबाव कविता के हलक तक पहुंचा दिया। कविता हटना चाहती थी, पर जय ने उसपर जोर बनाये रखा। उसके होंठों जय के लण्ड के जड़ में बंधी रखी से टकड़ा रहे थे। कविता गूं….गूं… उबकाई के साथ स्वतः छूट गई। जय का लण्ड थूक से सना हुआ था, और लण्ड से थूक चूने लगा तो कविता ने कटोरी लण्ड के नीचे लगा दिया, और अपने मुंह से चूते हुए लेर को हाथों में इकठ्ठा कर उस कटोरी में डाल दिया। जय ने उसी वक़्त कविता से कहा,” अरे बड़े घर की छिनाल लड़की, इतने से काम नहीं चलेगा। तुमको टाइम बढ़ाना होगा।” कविता हाँ में सर हिलाई। और वापिस से जय के लण्ड को मुंह मे घुसा ली। जय- हाँ…. आआहह…आ..आ.. बहुत अच्छे अच्छा कर रही हो। ये लो इनाम।” और उसने उस कटोरी में थूक का बड़ा लौंदा गिरा दिया। कविता ने कटोरी बढाके उसमें थूक ले लिया। कविता फिर कटोरी को अपने मुंह के ठीक नीचे,जहां लण्ड उसके मुंह मे घुसा था, लगा दिया। उसके मुंह से लगातार थूक और लेर अब चूने लगे थे। जय को ये बेहद कामुक लग रहा था। कविता धीरे धीरे, अपनी स्पीड भी बढ़ा रही थी। उसने जय के लण्ड को और अंदर लेना शुरू किया। जय उसके गालों पर हल्की थपकियाँ मार रहा था। कविता धीरे से पूरा लण्ड अपने मुंह मे समा ली। और जय के लण्ड के अंतिम छोड़ तक जा पहुंची। जय ने उसका प्रोत्साहन बढ़ाया,” हां, कविता रंडी दीदी ऐसे ही, बहुत अच्छे। अभी मुंह मे लिए रहो, देखो कितनी देर तक रुक सकती है।कविता आँखे बड़ी करके जय की आंखों में देख रही थी। और जय के प्रोत्साहन से सांसे थाम कोई 15 सेकण्ड्स तक टिकी रही। फिर गैग रिफ्लेक्स की वजह से स्वतः अलग हो गयी। और हांफते हुए हंस रही थी। 

जय कविता को हंसता देख हसने लगा। कविता- ठीक कर रहे हैं ना हम?

जय- हहम्मम्म पर तुम इससे और अच्छा कर सकती हो, समझी। और ट्राय करो।” कविता के चेहरे को वापिस भीगे लण्ड पर झुका दिया। कविता फिर लण्ड चूसने की प्रक्रिया में लीन हो गयी। कविता इस बार खुदको ही हराने के चक्कड़ में थी। इस बार उसने पूरे 30 सेकंड तक पूरे लण्ड को अपने हलक में छुपाए रखा। जय को इतनी देर की उम्मीद नहीं थी। जय के आंड़ कविता के ठुड्ढी पर लटक रहे थे। कविता के चेहरे का निचला हिस्सा पूरी तरह गीला हो चुका था। उसके हाथों में रखी कटोरी आधी भर चुकी थी। आखिरकार कविता ने मुंह से लण्ड को निकाला। जय ने उसके लिए ताली बजाई। कविता करीब 10 मिनट तक लण्ड चूसती रही।

जय- चल अब तुम्हारी गाँड़ चोदेंगे, और मज़ा आएगा। 

कविता- पर उसमे तो हलवा भरे हुए हो। उसका क्या?

जय- लण्ड अपनी जगह बना लेगा। तुम कुतिया बन जाओ।

कविता फिर चौपाया हो गयी और जय के सामने अपनी भूरी छेद वाली गाँड़ परोस दी। जय ने उसके भारी भरकम चूतड़ों पर पहले थूका और तीन चार करारे थप्पड़ मारे। कविता थप्पड़ से उठे दर्द से ज्यादा आनंद महसूस कर रही थी। उसने खुद ही अपने चूतड़ पर तमाचे मारे सटाक… सटाक…,” और मारो, हमारे गाँड़ पर। लाल कर दो।” और अपनी गाँड़ हिलाने लगी। जय ने फिर और कसके झापड़ मारे। फट….फट….सट। 

जय ने फिर अपना लण्ड कविता की गाँड़ पर रखा, और पूछा,” क्यों रे रंडी की बच्ची, लण्ड चाहिए।

कविता- हहम्म, हां चाहिए हमको।

जय- क्या चाहिए कुत्ती खुलके बोल। उसके बाल खींचते हुए बोला।

कविता- लण्ड आपका लण्ड हमको अपनी गाँड़ में चाहिए।

जय- भीख मांग लण्ड के लिए।

कविता- प्लीज हम भीख मांगते हैं, ये मस्त लण्ड हमारी गाँड़ में डालो। हमारी गाँड़ मारिये ना प्लीज। उफ़्फ़फ़ प्लीज प्लीज।

जय ने कविता के गाँड़ में अचानक से लण्ड के आगे का हिस्सा घुसाया।कविता के मुंह से चीख निकली, पर जय को कोई फर्क नहीं परा। कविता के बाल पकड़े हुए, उसने लण्ड को घुसाना चालू रखा। कविता एक हाथ से अपने बांयी चूतड़ को पकड़े थी। गाँड़ के अंदर मौजूद गाजर का हलवा लण्ड के दबाव की वजह से और अंदर अंतरियों की ओर घुस गया। जय के लण्ड पर हलवे का दबाव एक गद्दे की तरह लग रहा। थोड़ी देर में में कविता की गाँड़ जय के घुसपैठिये लण्ड से अभ्यस्त हो चुकी थी। जय कविता की गाँड़ में लण्ड रखे उसकी गाँड़ के अंदर का पूरा अंदाज़ा लगा रहा था। एक तो कविता की गाँड़ में नेचुरल मूंग के हलवे जैसा टेक्सचर, था और अब गाजर का हलवा उसमें क़यामत ढा रहा था। कुछ देर ऐसे रहने के बाद जय कविता से पूछा,” मस्त गाँड़ है तुम्हारी कविता रंडी दीदी ?

कविता मुस्कुराते हुए,” धत्त, क्या अच्छा है? 

जय- पता है, तुम्हारी गाँड़ लाखों में एक है। उफ़्फ़फ़, क्या शेप है तुम्हारे चुत्तर का। उसने धीरे धीरे धक्के मारने शुरू किए। कविता के मुंह, से सीत्कारें, उठने लगी। जय ने उसकी गाँड़ पर बने टैटू को छूते हुए, कस कसके उसकी गाँड़ मारने लगा। कविता के पास चीखें मारने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जय को उसमे बेहद आनंद आ रहा था। गाँड़ मारते हुए, कविता की गाँड़ से हलवा थोड़ा थोड़ा नीचे गिरने लगा। पर जय ने कुछ नही कहा।अब कविता भी दर्द से निकल आनंद के चौखट चूम रही थी। 

कविता पीछे मुड़के, जय की ओर देखते हुए, बोली,” ऊऊऊ…हहहहहह हां….. ऐसे ही मारो गाँड़। इस रक्षाबंधननन… बहन का तोहफा है। मज़ा आ रहा है ना। हम भाईचोदी रंडी है। ऊऊऊ हहहहहहह आआहह, ऊफ़्फ़फ़।

जय- हम इस पावन अवसर पर तुम्हारी गाँड़ मार रहे हैं दीदी, वो भी अपने लण्ड पर तुम्हारी बंधी हुई राखी के साथ। इससे बड़ा घिनौना रिश्ता हम कायम नही कर सकते। तेरी गाँड़ में जो हलवा है, उससे मज़ा और बढ़ गया है। तुमको अभी लण्ड भी चुसायेंगे। तुम्हारी गाँड़ में हलवा मिक्स तैयार कर रहे हैं। तुम्हारी गाँड़ का स्वाद, हलवे का स्वाद और लण्ड का स्वाद मिक्स हो जाएगा। खाएगी ना।

कविता पे सेक्स और वियाग्रा का नशा चढ़ा हुआ था। उसने जीभ से होंठों को चाटते हुए कहा,” उम्म्महह, ऊफ़्फ़फ़ सोचके ही मुंह मे पानी आ रहा है। इस तरह तो और मज़ा आएगा। लाओ दो ना।

जय- सब्र करो रंडी रानी, तुमको मीठा फल मिलेगा। पहले अपनी गाँड़ की चुदाई तो करने दे।” जय उसको करीब पांच मिनट और चोदा, कविता के बार बार कहने पर उसने लण्ड निकाला और कविता भूखी कुतिया की तरह लण्ड चाटने लगी। लण्ड पर चिपचिपा लसलसा पदार्थ लगा हुआ था। कविता ने उसे जी भर के चाटा। कविता की बुर में उसकी पैंटी बाहर आ रही थी, जय ने वो पैंटी उसके मुंह मे घुसा दी। जय ने फिर लण्ड वापिस कविता की गाँड़ में घुसा दिया, और चोदने लगा। कविता के मुंह मे उसकी बुर के रास से भीगी पैंटी थी, जिससे उसकी आवाज़ सिर्फ गूं…गूं…. कर आ रही थी। कविता एक हाथ से अपना बुर रगड़ रही थी। पर दोनों में से कोई अभी रुकने को तैयार नहीं था। थोड़ी देर बाद जय ने फिर लण्ड निकाला, और कविता की खुली चुदी फैली गाँड़ को निहारा। उसने थूक उसकी गाँड़ में थूका। और फिर गाँड़ मारने लगा। जय ने फिर और थोड़ी देर कविता की गाँड़ मारी। फिर कविता के हाथों से कटोरी ले ली। उसने लण्ड निकाला, और उसकी गाँड़ में कटोरी में इकट्ठा थूक और लेर सब डाल दिया। उसने फिर लण्ड वापिस घुसा दिया। कविता की गाँड़ में एक मस्त मीठा मसाला तैयार हो रहा था। जय ने उसकी पैंटी निकालकर अपने गले में डाल लिया। कविता मस्ती में ठुकवाती जा रही थी। उसने बोला,”ऊफ़्फ़फ़, आआहह, ऊईई तुम बिल्कुल वैसे ही कर रहे हो, जैसा हमको चाहिए था। ऊफ़्फ़फ़। हमारी गाँड़ में सब मिला दिया। इसका क्या करेंगे? हमको खिलाओगे ना।

जय- हां डार्लिंग तुम्हारे लिए ही है, तुमको यही खाना है। अभी थोड़ी देर में हम मूठ भी गिरा देंगे। फिर तुम्हारा प्रोटीन भी आ जायेगा इस मीठे मसाले में। और ठहाका लगाके हंसा। कविता भी हंसने लगी। थोड़ी देर बाद जय बोला,” ऊफ़्फ़फ़ ओह्ह ओह्ह  लगता है मूठ गिरने वाला है। आह….आह।

कविता,” आआहह हमारा भी होने वाला है। आह ओऊऊऊ… अंदर ही गिराओगे ना। अपनी बहन को दे दो, अपना ताज़ा ताज़ा मूठ। हमको बहुत मस्त लगता है। आ जाओ चुआ दो। आआहहहहहहहहह

और दोनों एक साथ झड़ गए। जय ने मूठ की 5 6 लंबी पिचकारियां मारी। फिर उसने अपना लण्ड निकाला, और उसकी पैंटी कविता की गाँड़ में ठूस दी। 

कविता- ये क्यों ठूस दी।

जय- जहाँ तक तुमको जानते हैं दीदी, तुम कुछ भी बर्बाद नहीं करना चाहोगी। इसलिए पहले तुम लण्ड से सब चाटके साफ करोगी। और जो डिश तुम्हारी गाँड़ में है, उसे तुम्हारी पैंटी रोके रखेगी। 

कविता बिल्कुल माधुरी दीक्षित सी मूती से दांत बिखेड़ दी। पर वासना से डूबे उसकी आंखें बिना पालक झपके उसके लण्ड को निहार रही थी। जय के लण्ड पर मटमैले लाल रंग चढ़ा हुआ था। क्योंकि उसमें गाजर का लाल हलवा, थूक, मूठ का मिला जुला मिश्रण था। कविता घुटनो के बल नीचे बैठ गयी। और जय की ओर देखते हुए, लण्ड को उठाकर निचले हिस्से को चाटने लगी। फिर मुस्कुराते हुए बोली,” ये तो मीठा है।”

जय हंसते हुए,” क्यों नही जान तुम्हारे गाँड़ और गाजर की हलवे की मिठास मिलकर और मीठी हो गयी होगी।” कविता झट से बोली,” और तुम्हारा थूक और मूठ भी।” जय और कविता दोनों हंसे। कविता पूरा लण्ड साफ कर गयी और जय के लण्ड जे अंदर बचा खुचा मूठ भी चूस गयी। 

फिर जय ने कविता को कटोरी वापिस दे दी। और कविता हगने की पोज़ में बैठ गयी। कटोरी को ठीक गाँड़ के नीचे लगा लिया। कविता,” गाँड़ बहुत भारी लग रहा है, जैसे कि हगने के पहले लगता है।” 

जय,” तो अभी हगोगी ही ना, उस मीठे मसाले को जिसे अपने गाँड़ में भारी हुई हो।”

कविता,” पैंटी निकाल दो ना।” जय,” ये लो अभी निकाल देता हूँ।” वो पीछे से जाकर पैंटी निकाल देता है। पैंटी निकालने के बाद कविता की वीडियो रिकॉर्ड करने लगता है। कविता के गाँड़ से चिपचिपा लुवेदार पदार्थ निकलने लगता है। एकदम मटमैले लाल रंग सा। वो सीधा कटोरी में गिर रहा था। जय बड़े गौर से देख रहा था। कविता धीरे धीरे सब निकाल रही थी। कटोरी भर गई। जय ने पूछा, ” सब निकल गया।” कविता,” नहीं अभी इतना और है अंदर।” जय ने फिर पैंटी उसकी गाँड़ में घुसा दी। और चम्मच से गाँड़ के छेद के आसपास लटकती उस पदार्थ को कटोरी में डाल दिया। कविता की ओर कटोरी बढाके उसने कहा,” ये है सब्र का मीठा फल। खा लो।” 

कविता कटोरी ले लेती है और एक चम्मच खाती है,” उम्म्मम, बहुत टेस्टी है, वाओ, बहुत मजेदार है।” वो धीरे धीरे चम्मच से कहा रही थी, जबकि जय उसकी वीडियो बना रहा था। 

” मीठा है, साथ में प्रोटीन भी है इसमें, ये तो हेल्थी है।” तुमने तो कमाल कर दिया हमको एक नया डिश बनाके खिलाये।”कविता बोले जा रही थी।

कविता,” क्या हम अच्छी लड़की नहीं हैं? अब ये तो हमारा मन हमको ये सब करने को कहता है। हम जो हैं वही हैं। तुमको हम ऐसे अच्छे लगते हैं या शरीफ दीदी की तरह।”

जय उसके बाल संवारते हुए,” तुम एक बहुत अच्छी लड़की हो कविता दीदी। जैसी हो वैसे ही रहो। बल्कि तुम्हारा ये रूप देख हम और तुमको चाहने लगे हैं। तुम ये बताओ ऐसा घिनौना सेक्स ही तुमको पसंद है ना? 

कविता मैस्कुराते हुए,” हां, सही बोल रहे हैं। इसीमें तो मज़ा आता है।” कटोरी चाटते हुए बोली। वो सब खा चुकी थी।

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