चोरी का माल Chapter 3

 






                  चोरी का माल Chapter 3




इस वाक्य का अर्थ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। पता नहीं गौरी मेरे बारे में क्या सोचती होगी? क्या पता उसे मेरी मेरी इन भावनाओं का पता है भी या नहीं? पर मुझे नहीं लगता वो इतनी नासमझ होगी कि मेरे इरादों का उसे थोड़ा इल्म (ज्ञान) ना हो। खैर इतना तो पक्का है अब वो मेरी छोटी-मोटी चुहल से ना तो इतना शर्माती है और ना ही बुरा मानती है।


“गौरी एक बात पूछूं?”

“हओ”

“मेरा मन तो करता है मैं तुमसे बस बातें करता ही जाऊं? क्या तुम्हारा मन नहीं करता?”

“मेरा तो बहुत मन होता है … मैं तो चाहती हूँ ति साले दिन बातें ही तीये जाऊं.”

“पर करती तो हो नहीं?”

“तलती तो हूँ.”

“कहाँ करती हो? हर बात पर तो शर्मा जाती हो.”


गौरी अब फिर से मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी। माहौल बिल्कुल हल्का हो गया था।

“आप बातों-बातों में मुझे फंसा लेते हो तो मुझे शल्म आ जाती है?”

“अब तुम एक तरफ तो अपना भी कहती हो और फिर शर्माती भी हो?”

“आप जानबूझ तल ऐसा तलते हैं.”


“अच्छा भई अब बातों में नहीं फंसाऊंगा, वैसे ही फंसा लूँगा.”

“हट!”

हा हा हा … हम दोनों ही हंसने लगे थे।


“अच्छा गौरी वो तुमने कल वाली बात तो बताई ही नहीं?”

“तोंन सी बात?”

“ओह … तुम भी निरी भुलक्कड़ हो? वो कल शाम को तुम बता रही थी ना कि मधुर भी मेरे बारे में कोई बात बताती है?”

“ओह … अच्छा वो वाली बात?”

“हाँ?”

“आप बुला तो नहीं मानोगे?”

“किच्च”


“वो … वो … मधुल दीदी ने बताया ति वो आपसे बहुत प्याल तलती है.”

“यह तो मुझे पता है? पर इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है?”

“उन्होंने बताया था कि वो … आपको तई बाल प्याल से ‘लव लड्डू’ बुलाती हैं.” और फिर वो खिलखिलाकर हंस पड़ी।

“अच्छा! मधुर ऐसा बोलती है? आज आने दो मैं उसकी अच्छे से खबर लेता हूँ.”


“अले … नहीं … दीदी मुझे माल डालेगी। मैं इसलिये तो आपतो बताती नहीं हूँ। अब मैं तभी तोई भी बात आपतो नहीं बताऊँगी.” गौरी की डर के मारे रोने जैसी शक्ल हो गई थी।

“हा … हा … हा …”

गौरी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

हालांकि आज मौक़ा बहुत अच्छा था मैं उसके और मजे ले सकता था पर मैं उसे और ज्यादा परेशान नहीं करना चाहता था।


मैंने उससे कहा “अरे नहीं यार … मैं तो मजाक कर रहा था। भला मैं तुम्हारी कोई बात मधुर को कैसे बता सकता हूँ?”

“आपने तो मेली जान ही निताल दी थी.”

“अरे मेरी जान! मैं तुम्हारी जान कैसे निकाल सकता हूँ? तुम भी तो हमारी अपनी ऐसी बातें मधुर को थोड़े ही बताती हो? तो फिर मैं भला कैसे बता सकता हूँ बोलो?”

“हूँ.” अब गौरी की जान में जान आई।


हमने नाश्ता ख़त्म कर लिया था। गौरी बर्तन उठाकर रसोई में चली गई थी। वैसे नाश्ता तो बहाना था गौरी को सामान्य बनाना था और उसे इस बात के लिए पक्का करना था कि हमारे बीच हुई बातों को वो गलती से भी मधुर को ना बता दे। वैसे भी मधुर बहुत शक्की किस्म की औरत है उसे हमारे इस किस्सा-ए- तोता-मैना की जरा भी भनक लग गई तो लौड़े लग जायेंगे।


इस आपाधापी में 11 बज गए थे। मैं आँखें बंद किये सोफे पर ही लेट सा गया। आज मेरा प्रोग्राम शाम चार बजे तक फुल रेस्ट करने के साथ-साथ गौरी के साथ अगले प्लान के अनुसार गप्पे लगाने का था।


गौरी भी आज अच्छे मूड में लग रही थी। मेरे ख्यालों में उसका जवान जिस्म ही घूम रहा था। अभी तक तो सब कुछ मेरे प्लान के मुताबिक़ ही चल रहा था। बात-बात में गौरी का शर्माना अब थोड़ा कम होने लगा था और उसे भी अब रोमांटिक बातों में थोड़ा मजा आने लगता था।


जिस प्रकार अब वो अपने नितम्बों को थिरकाकर चलती है मुझे लगता है अब उससे अपनी जवानी का बोझ ज्यादा दिन तक नहीं उठाया जा सकेगा। लगता है अब गौरी फ़तेह की मंजिल ज्यादा दूर नहीं रह गई है। पता नहीं गौरी की गांड या चूत मारने को कब मिलेगी पर मन कर रहा है आज नहाते समय लंड को खूब तेल लगाकर उसके नाम से मुठ ही मार ली जाए।


मैं अभी अपने प्लान के बारे में सोच ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी। इस समय कौन हो सकता है? कहीं मधुर तो नहीं? जब तक मैं फोन उठाता घंटी बंद हो गई। आजकल लोगों में सब्र (पेशेंस) तो है ही नहीं। बस मोबाइल पर मिस कॉल दे दो सामने वाला अपने आप गांड मरायेगा (फोन मिलाएगा)।


एक सर्वे के अनुसार मिस कॉल दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा मारी जाने वाली चीज़ है। गांड तीसरे नंबर पर और मुठ अभी भी पहले नंबर पर है। भेनचोद भोंसले का फोन था। मुठ मारने के प्रोग्राम की ऐसी तैसी कर दी। अब उससे बात करने की मजबूरी थी। बात करने पर पता चला कि वह आज शाम को कहीं जा रहा है इसलिए अगर अभी मिलने आ सको तो ठीक रहेगा।

लग गए लौड़े! पूरे सन्डे की माँ चुद गई।


मैंने गौरी को बताया कि मुझे भोंसले साहब के घर जरुरी काम से जाना पड़ेगा. तुम दोपहर का खाना खा लेना, मेरे लिए बाद में बना देना।

“ओह …” आज गौरी ने ‘हओ’ के बजाय ‘ओह’ कहा था। उसके चहरे से लग रहा था जैसे मेरा अभी जाना उसे भी अच्छा नहीं लग रहा है। पता नहीं क्यों?


मैं कोई 12 बजे के आसपास तैयार होकर घर से निकला था।


रास्ते में मिठाई का एक डिब्बा खरीदा। फिर कार से भोंसले के घर पहुँचने में आधा घंटा लग गया।


डोर बेल बजाते ही थोड़ी देर में घर का दरवाजा एक कमसिन फुलझड़ी ने खोला। सर पर नाइके के टोपी, आँखों पर चश्मा, मध्यम कद, दो चोटी बनाए जवानी की दहलीज पर दस्तक देते भरे पूरे दो उरोज और पाजामे के अन्दर सिमटी पतली-पतली टांगों के ऊपर क़यामत ढाते दो गोल नितम्ब और पतली कमर।


मेरी निगाहें तो उसकी एक सटीक अनुपात में क्रमशः नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती हुई मखमली जाँघों से हट ही नहीं रही थी। रंग गोरा तो नहीं कहा जा सकता पर इतना सांवला भी नहीं था। शरीर का रंग कैसा भी हो कुंवारी चूत के अन्दर का रंग तो एक ही होता है और वह है गुलाबी और इसी गुलाबी रंग के पीछे, दुनिया के सारे लंड दीवाने होते हैं। रेशमी बालों में छुपी अनमोल वाटिका में खिले पुष्प की पंखुड़ियों की खुशबू मदहोश कर देती है। ऐसी लड़कियों के शरीर की खुशबू लंड को एकदम खड़ा कर देती है और वो मस्ती में झुमने लगते हैं।


किसी भी लंड के लिए ऐसी लड़कियों की गुलाबी चूत को सूंघना, चाटना और चोदना एक दिवास्वप्न ही होता है। आप मेरी हालत का अंदाजा बखूबी लगा सकते हैं मैंने अपने लंड को कैसे काबू में किया होगा।


मैं अवाक उसे देखता ही रह गया। एक बार तो मुझे भ्रम सा हुआ कहीं निशा (दो नंबर का बदमाश वाली) तो नहीं?


“प्रेम भैया?” उसने सुखद आश्चर्य से मेरी ओर देखते हुए पूछा।

जैसे अमराई में कोई कोयल कूकी हो। ओह! लगता है यह भोंसले की लड़की पारुल है। उसकी आवाज तो बहुत मधुर थी पर उसका ‘प्रेम भैया’ बोलना मुझे कतई अच्छा नहीं लगा।

“हा … हाँ … भ … भोंसले साहब हैं?” भेनचोद यह जबान भी खूबसूरत लौंडियों को देखकर पता नहीं क्यों गड़बड़ा जाती है।

“हाँ हाँ … आप अन्दर आइये वो आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं.”


“पापा! प्रेम भैया आये हैं?”

“आओ प्रेम.”

“गुड आफ्टरनून सर!”

“वैरी गुड आफ्टरनून!”

“बैठो.”

“थैंक यू सर.”


“वो तुमने फिर क्या प्रोग्राम बनाया?”

“ओह हाँ … वो जैसा आपने बताया मैं 2-3 महीने तक अपने टारगेट्स पूरे कर लेता हूँ फिर ट्रेनिंग का प्रोग्राम बना लेता हूँ.”

“हाँ यही ठीक रहेगा.”

“थैंक यू सर.”

“यह तुम्हारे लिए बहुत बड़ी अपोर्चुनिटी (अवसर) है। इसे मिस नहीं करना चाहिए। अगर तुम चेंज लेने में इंटरेस्टेड हो तो वह भी हो सकता है। और अगर यहीं कंटिन्यू करना हो तो भी ठीक है। पर यह हैड ऑफिस पर डिपेंड करता है।”


मैं अभी कुछ सोच ही रहा था कि अचानक मेरे कानों में आवाज सुनाई पड़ी- नमस्ते प्रेम जी.


ओह … यह तो भोंसले की पत्नी माधवी थी। बिल्कुल तारक मेहता का उलटा चश्मा वाली माधवी की तरह। मध्यम कद, पतली कमर के नीचे गोल मोटे खरबूजे जैसे कसे हुए नितम्ब। साली पूरी मोरनी लगती है। गुलाबी होंठों, मस्त उरोजों से लदी, नाभि दर्शाना साड़ी पहने उसे देखते ही डिग्गी राजा की तरह मुंह से निकल जाए- वाह क्या टंच माल है!

जब नाभि का छेद इतना सुंदर है तो इसके जांघों के बीचे का छेद कितना सुंदर होगा!


मैं उसे अवाक सा देखता ही रह गया। हालांकि मैं कई बार पार्टियों में उसे देखा है पर आज तो यह पूरी पटोला लग रही है। इसके नितम्ब देखकर तो लगता है यह साला भोंसले जरुर इसकी मस्त गांड का मज़ा लेता ही होगा। वरना इतने खूबसूरत नितम्बों का क्या फायदा? साली के लाल गुलाबी होंठ तो इतने रसीले लग रहे हैं कि अपने पप्पू को इसके मुंह में डाल दिया जाए तो बन्दा धन्य हो जाए।


“न .. न.. नमस्ते भाभीजी.” मैं हकलाता सा बोला।

“मधुर नहीं आई क्या?”

“हाँ … दरअसल आज उसकी तबियत थोड़ी खराब सी है।”

“ओह.. क्या हुआ?”

“कुछ ख़ास नहीं … वैसे ही जी ठीक नहीं है और सिर दर्द सा है।”

माधवी कुछ रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराने लगी थी। पता नहीं क्यूं?


“आप तो बड़े दिनों बाद आये हैं बताइये क्या लेंगे?”

मन में तो चूत थी, पर मैंने पानी बोला। अब बताओ होगा कोई मेरे जैसा शरीफ आदमी?

“माधवी! आज गर्मी बहुत है, ठंडा ले आओ.” भोंसले ने बीच में अय्यर की तरह भांजी मार दी।


माधवी ठंडा शरबत बना कर ले आई। कुछ औपचारिक सी बातें करने के बाद मैं वापस तो लौट आया। अलबत्ता मेरी आँखें देवदास की तरह पारो नाम की उस फुलझड़ी को ही ढूंढ रही थी। साली ये चुन-चुन चिड़िया भी एक झलक दिखाकर पता नहीं कहाँ फुर्र हो गयी। मेरा ख्याल है इसकी बुर घुंघराले रेशमी बालों से ढकी होगी। रस से भरी हुई। एक बार अगर चूम लो तो झट से पानी निकल जाए फिर तो चाहे पूरा लंड एक ही झटके में डाल दो पूरा गटक जायेगी।


मेरा इरादा जल्दी से जल्दी घर पहुँचने का था पर साली किस्मत हाथ में लंड लिए हमेशा तैयार रहती है। ऑफिस में साथ काम करने वाले गुलाटी का फ़ोन आया कि उसका बाइक से एक्सीडेंट हो गया है। उसे तो ज्यादा चोट नहीं आई पर उसकी पत्नी के सर में चोट लगी है। अब अस्पताल जाना भी जरूरी था।


अस्पताल के चक्करों में घर पहुंचते-पहुँचते शाम हो गई। पूरे सन्डे की छुट्टी के माँ चुद गई। आज मेरी इच्छा मधुर को खूब जोर से रगड़ने की हो रही थी। माधवी के नितम्ब और उस फुलझड़ी को देखकर तो लंड-बार बार तुपके छोड़ रहा था।


जब घर पहुंचा तो मधुर आश्रम से आ चुकी थी। उसने देरी का कारण पूछा तो मैंने उसे भोंसले और गुलाटी वाली बात बताई। मैंने उसे प्रमोशन वाली बात भी बताई। मेरा अंदाज़ा था मधुर मेरे प्रमोशन की बात सुनकर झूम ही उठेगी और फिर आज पूरी रात हम दंगल और हुडदंग मचाएंगे.

पर चाय पीते समय मैंने दो बातों को महसूस किया। एक तो मधुर ने मेरे प्रमोशन वाली बात पर कोई ख़ास तवज्जो (ध्यान) नहीं दिया था। और दूसरी बात आज गौरी भी कुछ उदास सी लग रही थी। पता नहीं मधुर ने कुछ बोल दिया था या कोई और बात थी? दोनों चुपचाप सी थी।


रात को मधुर से जब मैंने आश्रम के प्रोग्राम के बारे में पूछा तो उसने बताया कि गुरूजी के जन्मोत्सव का प्रोग्राम था। बहुत से भक्त आये थे। गुरूजी को पहले फलों और मिठाइयों से तौला गया और फिर आरती और भजन के बाद कुछ विशेष शिष्यों को दीक्षा भी दी गई थी। मधुर ने बताया था कि उसे भी गुरूजी ने दीक्षा दी है। उसके हाथ पर कलावा भी बाँधा है। आप तो जानते हैं मेरी इन सब पाखंडों में ज्यादा रूचि नहीं रहती। मुझे तो डर था ये साला गुरूजी कहीं दीक्षा या चमत्कार के नाम पर कुछ और ही गुल ना खिला बैठे।


आज टीवी देखने का मूड नहीं था। खाना खाने के बाद जब हम लोग बेडरूम में आ गए। मेरे लंड का तनाव अब बर्दास्त से बाहर हो रहा था। मैंने मधुर को अपनी बांहों में भींच लिया। मेरी इस प्रकार जल्दबाजी को लेकर अक्सर मधुर ना नुकर और नखेरे जरूर करती है पर आज वो बिल्कुल चुप थी।

“प्रेम!”

“हूँ”

“एक बात बताऊँ?”

“हूँ?”

“वो अगले सप्ताह सावन शुरू होने वाला है.”

“हाँ … तो?”

“वो … गुरूजी ने बोला है.”

“क्या?” मेरी उलझन बढ़ती जा रही थी। ये साली मधुर की बच्ची भी बात को इतना घुमा फिर कर बोलती है कि बन्दे का पानी कच्छे में ही निकल जाए।


“वो आज दीक्षा लेते समय मैंने अकेले में गुरूजी से एक बात पूछी थी.”

“क्या?” अब तो मेरी सहनशक्ति जवाब देने लगी थी। पूरे मूड की ऐसी तैसी हो रही थी।

“वो … मैंने गुरूजी से बच्चे के योग के बारे में पूछा था.”

“हुम् … फिर?”

“गुरु जी बोले मधुर तुम एक महीना इस सावन में व्रत रखो और शरीर को शुद्ध रखकर शुक्र के पाठ करो।”


“क्या मतलब?”

“ओहो … वो बोलते हैं एक महीने सावन में शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाना है।”

“साला एक नंबर का फतुरा है.”

“अरे नहीं प्रेम! आश्रम में मुझे 2-3 जोड़े मिले थे वो बता रहे थे कि उनको तो गुरूजी की कृपा से ही संतान सुख मिला है।”

“सब बकवास है.”


“तो क्या हुआ? बस एक महीने की ही तो बात है। करके देखने में क्या अहित (हर्ज) है?”

“मधुर तुम भी पढ़ी लिखी होकर किन फजूल बातों में लगी रहती हो.”


मेरा मूड का तो सारा गुड़ गोबर हो गया। कहाँ मैं आज मधुर को खूब लम्बे समय तक रगड़ने के मूड में था और यह साली लम्पट बाबाओं और राहू-केतु के चक्करों में उलझी हुई है।

“प्रेम! प्लीज समझा करो। कहते हैं जब दवा काम नहीं करे तो दुआ जरुर काम करती है। क्या पता भगवान् हमारी इसी बहाने सुन ले?”

“ठीक है तुम जैसा चाहो करो।”


किसी ने सच ही कहा है ‘लौडियों पे ध्यान देना और चूतियों को ज्ञान देना’ दोनों ही सूरतों में घंटा हासिल होता है।

मैं दूसरी ओर करवट लेकर सो गया।

आज तो सच में ही लौड़े लग गए।

कहानी जारी २हेगी

आपके चूतियापे भरे कमेन्टस के बाद


रात को देरी से नींद आई तो सुबह उठने में भी देरी हो गई। स्कूल जाते समय मधुर ने मुझे जगाया। अक्सर मेरे देरी से उठने पर वो बहुत उलाहना सा देते हुए मुझे जगाया करती है पर आजकल तो उसका यह चुलबुलापन जैसे गायब ही हो गया है।


जब मैं बाथरूम से बाहर आया, तब तक मधुर स्कूल जा चुकी थी। गौरी ने बताया कि आज दीदी नाश्ता करके नहीं गई, उनको आज स्कूल में जल्दी जाना था।


मधुर भी पता नहीं आजकल किन चक्करों में लगी रहती है। गौरी के आने के बाद उसके व्यवहार में अचानक बदलाव सा आ गया है। पहले तो हम कितना समय एक दूसरे के साथ बिताया करते थे और दिन में भी 2-3 बार किसी ना किसी बहाने ऑफिस में उसका फोन भी आ जाया करता था पर आजकल तो वो कितना लापरवाह सी हो गयी है कि जैसे मेरे लिए उसके पास समय ही नहीं बचा।


मैं हॉल में सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ने लगा। आज मैंने टी-सर्ट और बरमूडा पहना था। गौरी चाय बना कर ले आई थी। गौरी भी आज उदास सी लग रही थी। पता नहीं क्या बात थी? हो सकता है मधुर ने कुछ बोल दिया हो?


मैंने गौरी से पूछा- गौरी क्या बात है आज तुम उदास सी क्यों हो? कहीं मधुर के साथ कोई बात तो नहीं हो गई?

“किच्च.”

“तो क्या बात है?”

“तुछ नहीं.”

“ना कोई बात तो जरुर है? आज मधुर भी उदास सी थी, नाश्ता भी नहीं किया और तुम भी उदास लग रही हो? बताओ ना क्या बात है? तुम्हें मेरी कसम?”

“वो … वो …” कहते कहते गौरी रुक गई।


मेरे दिल की धड़कन और असमंजस बढता जा रहां था। पता नहीं कोई और बम तो नहीं फूटने वाला?

“प्लीज बताओ ना क्या बात है?”

“वो दीदी ने तल मुझे लूला दिया.”

“क … क्यों?”

“ऐसे ही?”

“कमाल है? ऐसे कैसे रुला दिया? कोई तो बात होगी?”

“वो दीदी ने मुझे एत पली और राजतुमाल ती तहानी सुनाई थी”

“हुम्! पर परी और राजकुमार वाली कहानी में रोने वाली क्या बात थी? गौरी प्लीज पूरी बात बताओ?”


फिर जो गौरी ने बताया वो आप भी सुन लें:

(इसे तोतली भाषा की बजाये सामान्य भाषा में लिखा है.)


कल आपके जाने के बाद दीदी लगभग 1 बजे ही आश्रम से लौट आई थी। आज वो बड़ी खुश नज़र आ रही थी। आपके बारे में पूछा तो मैंने बताया कि आप भोंसले साहब के घर गए हैं। फिर उन्होंने पूछा कि खाना खाकर गए या नहीं तो मैंने बताया कि नाश्ता करके गए हैं। खाने का मना कर दिया बोले ‘तुम खा लेना मैं आकर देखूंगा।’ दीदी ने मेरे बारे में भी पूछा कि मैंने खाना खाया या नहीं तो मैंने कहा कि नाश्ता कर लिया था अकेली के लिए खाना नहीं बनाया।


“तुम भी आलसी हो गई हो। समय पर खाना खा लेना चाहिए।”

“हओ! आपने खाना खाया या बनाऊं?”

“ना मैं आश्रम से खाकर आई हूँ?”

“हुम्”

“गौरी! देख मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ?”

मैंने उत्सुकता से उनकी ओर देखा तो उन्होंने पर्स से एक कलावा और काला धागा निकाला और कहा- यह आश्रम वाले गुरूजी ने दिया है. लाओ तुम्हारी कलाई पर बाँध देती हूँ.

“यह क्या है?”


“ओहो … एक तो तुम बहस बहुत करती हो?”

“सॉरी.”

“इससे तुम्हें नज़र नहीं लगेगी और कोई अशुभ नहीं होगा.”

मुझे कुछ समझ नहीं आया पर मैंने उनके कहे अनुसार वो धागा बंधवा लिया। फिर उन्होंने मेरे बाएं पैर पर भी एक काला धागा बाँध दिया।

“पैर पर इस काले धागे को बांधने से नहाते समय पाप नहीं लगता.”


“पाप … कैसे?”

“तुम भी बहुत भोली हो?”

सच में मुझे कुछ समझ नहीं आया कि नहाने से पाप कैसे लग सकता है।

“अरे बुद्धू! हम जब नहाते हैं तो सारे कपड़े उतार देते हैं ना? इससे निर्वस्त्र होने से पाप लगता है। अगर यह काला धागा बाँध लो तो फिर निर्वस्त्र होकर नहाने से कोई पाप नहीं लगता। अब समझी?”

“हओ”

“गौरी!”

“हुम्”

“वो तुम्हारे लिए उस दिन हम शॉर्ट्स और टॉप लाये थे ना?”

“हओ”

“वो पहना या नहीं?”

“किच्च.”

“अरे उसका क्या अचार डालोगी? पागल लड़की! गर्मी का मौसम है कभी कभी शॉर्ट्स पहन लिया करो?”

“हओ”

“चलो आज उसे पहन कर दिखाओ.”

“हओ”

मुझे शॉर्ट्स पहनने में थोड़ी शर्म तो आ रही थी पर दीदी का कहा टालना मेरे बस की बात नहीं थी। फिर मैं स्टडी रूम में गई और अलमारी से सफ़ेद शॉर्ट्स और टॉप निकाला। शॉर्ट्स थोड़ा टाइट सा था। पूरी जांघें दिखाई देने लग गई थी। जाँघों के संधि स्थल के बीच का भाग तो फूला हुआ सा लग रहा था और टॉप भी बस मेरे उरोजों को ही ढक रहा था पूरा पेट और नाभि सब दिख रहे थे।

मैंने आज ब्रा पैंटी भी नहीं पहनी थी। सच कहूं तो इन कपड़ों में मुझे दीदी के सामने जाने में शर्म सी आ रही थी।

मैं हिम्मत करके शर्म के मारे अपनी मुंडी नीचे किये धीरे धीरे बाहर आई तो दीदी मुझे देखती ही रह गई।


“हे भगवान्!”

“क्या हुआ?”

“ओहो … गौरी तुम तो बहुत ही खूबसूरत लग रही हो इन कपड़ों में … बिल्कुल नाजुक कलि जैसी।”

अब मैं क्या बोलती। मुझे तो असहज सा लग रहा था। मैं सिर झुकाए खड़ी रही।


फिर दीदी मेरे पास आई और मुझे ऊपर से नीचे तक एक बार फिर देखा और बोली- सच कहती हूँ अगर प्रेम तुम्हें इन कपड़ों में कोई देख ले तो सच में तुम्हारे ऊपर लट्टू हो जाए और तुम्हें अपनी बांहों में भरकर भींच ले।

मुझे तो बड़ी शर्म सी आ रही थी।

“एक तो तुम शर्माती बहुत हो? तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ़ करने के बाद भी कुछ नहीं बोला?”


मैं भला क्या बोलती। मुझे अपनी सुन्दरता के बारे में सुनकर अच्छा तो लग रहा था पर थोड़ी शर्म भी आ रही थी। फिर दीदी ने मुझे बांहों में भर कर अपनी छाती से लगा लिया- भगवान् करे तुम्हें किसी कि बुरी नज़र ना लगे.


मैं तो दीदी के इस प्रेम को देखकर अभिभूत सी हो गयी थी। मैंने अपनी पूरे जीवन में कभी माँ-बाप, मौसी या किसी और से ऐसे प्रेम का अनुभव नहीं किया था। फिर दीदी ने मेरे सिर को अपने दोनों हाथों में पकड़कर मेरे माथे और गालों पर कई चुम्बन लिए।

फिर उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों से लगा कर चूमना शुरू कर दिया। मेरे पूरे बदन में एक अनूठी सिहरन सी होने लगी थी। पूरा बदन एक नए रोमांच में भर गया। मुझे लगा मेरे अन्दर एक लावा सा भर गया है वो बाहर निकल जाने को आतुर है।


दीदी ने मुझे प्रथम चुम्बन के अहसास के बारे में बताया था कि ‘चुम्बन प्रेम भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। चुम्बन प्रेमानुभूति का प्रतीक है। प्रेम सागर में डूबे दो लोग अपनी भावनाओं को चुम्बन के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। सबसे खूबसूरत और कोमल इंसानी अहसासों को व्यक्त करने की सुन्दरतम अभिव्यक्ति है। प्रेम सागर में डूबे दो लोग अपनी भावनाओं को चुम्बन के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। चुम्बन इंसानी अहसासों को व्यक्त करने की सबसे खूबसूरत और कोमल अभिव्यक्ति है। इसके माध्यम से एक प्रेमी अपने साथी को अपने प्रेम को दर्शाता है। इससे इनके रिश्तों में मिठास आती है और इसी कारण हर प्रेमी की इच्छा होती है कि वो अपने साथी को प्यार भरा चुम्बन करे। प्रेम करने वाला पति या प्रेमी जब भी अपना प्रेम भरा स्पर्श उनके अधरों पर करता है तो उनमें अपनी ख़ूबसूरती का अहसास जाग उठता है।’


दीदी ने और भी बहुत सी बातें चुम्बन के बारे में बताई थी पर मुझे ज्यादा कुछ समझ नहीं आया था। फिर मैंने रात को दीदी ने जो मोबाइल दिया था उसमें यू ट्यूब पर विडियो में भी चुम्बन दृश्य देखे थे।


सच कहूं तो मेरे लिए तो यह सब अप्रत्याशित, अप्रतिम, अनूठा और अकल्पनीय सा था। मैं अपने आप को किसी सातवें आसमान में महसूस कर रही थी। मुझे तो लग रहा था जैसे मैं कोई परी हूँ और मेरे पंख लग गए हैं और अभी कोई देवदूत आकर मुझे अपने आगोश में लेकर उड़ जाएगा। एक मधुर सा, गुदगुदी भरा मीठा सा अनमोल अहसास! मैं निहाल हो गई।


मैं अपने रूमानी ख्यालों में डूबी थी कि अचानक दीदी बोली- तुम्हें परी और राजकुमार की कहानी सुनाऊँ?

“हओ”


एक राज कुमार था बहुत सुन्दर। रात को वह जब अपने बाग़ में सैर करने जाता था तो वहाँ रोज चांदनी रात में एक खूबसूरत परी उससे मिलने आया करती थी। दोनों में प्रेम हो गया।


एक दिन राजकुमार ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। परी ने मना कर दिया और बताया कि किसी परी का विवाह किसी आदमजात (मनुष्य) से नहीं हो सकता। विवाह उसी अवस्था में हो सकता है जब परी अपने पंख कटवा ले। परी ने पंख कटवाने से मना कर दिया और फिर परी उस रात के बाद कभी वापस उस राजकुमार से मिलने नहीं आई। बेचारे राजकुमार ने उस निष्ठुर परी के विरह में अपनी जान दे दी।


इतना कहकर दीदी चुप हो गई। मुझे तो यह कहानी सुनकर रोना सा आ गया। मुझे लगा मैं अभी जोर-जोर से रोने लगूंगी। मुझे उस दुष्ट परी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। अगर मैं उसकी जगह होती तो अपने पंख क्या अपनी जान दे देती पर उस राजकुमार को कभी छोड़कर नहीं जाती।


दीदी ने मुझे अपने पास सोफे पर बैठा लिया। मैं उस समय अपने सपनों के राजकुमार के बारे में सोच रही थी कि वो किसी दिन आएगा और फिर मेरे कोमल अंगों को सहलायेगा, उन्हें मदहोश कर देगा, मेरे गुप्त अंगों से खेलेगा और अपने बाहुपाश में लेकर जोर से भींच डालेगा। इन्हीं ख्यालों में मेरी योनि भीग गई थी और मैं सिसक उठी।


मैं गुमसुम हुई अभी भी उस परी और राजकुमार के बारे में सोच रही थी कि अचानक दीदी ने मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़कर कहा- गौरी मुझे आज एक वचन दे?

“क्या?” मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी। पता नहीं आज दीदी को क्या हो गया है।

“गौरी! अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरे ‘लव लड्डू’ का ख्याल रखना, वह बहुत भोला है।” कह कर दीदी ने मुझे एक बार फिर अपनी बांहों में भर लिया।


मुझे लगा दीदी अभी रोने लगेंगी। मेरी तो उनके इस प्रेम को देखकर रुलाई ही फूट पड़ी। दीदी ने मेरी आँखों से निकले आंसू अपनी साड़ी के पल्लू से पौंछे और फिर अपने पास सोफे पर बैठा लिया।

“गौरी!”

“हओ”

“पहले का जमाना कितना अच्छा होता था। एक पुरुष 2-2, 3-3 शादियाँ कर लेता था। मेरा वश चलता तो मैं तुम्हारी शादी करवा कर हमेशा के लिए तुम्हें अपने पास ही रख लेती?”

“दीदी मैं तो सदा आपके पास ही हूँ? मैं आपको छोड़कर तभी नहीं जाऊँगी।”

“हाँ मेरी लाडो! जा अब रसोई में जाकर खाना खा ले। मैं भी अब आराम करुँगी.”


मैं स्टडी रूम में आकर अपने बेड पर लेट गई। और बहुत देर तक इस घटनाक्रम के बारे में सोचती रही। मुझे सच कहूं तो कुछ भी समझ नहीं आया पर इतना तो जरुर समझ सकती थी कि दीदी के मन की गहराइयों में कोई ना कोई दुःख या बात जरूर पैठी है।


गौरी इतना कहकर चुप हो गई। सच कहूं तो मधुर के इस व्यवहार के बारे में मुझे भी कुछ समझ नहीं आया। हाँ उसे एक और बच्चे की चाहत तो जरुर है पर इसके अलावा और क्या बात हो सकती है? समझ से परे है।


मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ। आपने ऊपर वर्णित घटनाक्रम और मधुर के इस बदले हुए अजीब से व्यवहार के बारे में पढ़ा क्या आप कुछ समझ पाए? अगर आप लोग इस बारे में अपनी कीमती राय लिखेंगे या मेल करेंगे तो मुझे हार्दिक ख़ुशी होगी।


गौरी मेरे पास सोफे पर बैठी थी। उसने अब भी अपनी मुंडी नीचे झुका रखी थी। लगता है कुछ सोच रही थी। माहौल थोड़ा संजीदा (गंभीर) हो गया था।

“अरे गौरी!”

“हओ?” गौरी ने चौंकते हुए कहा।

“अरे यार! बातों बातों में यह चाय तो आज फिर ठंडी हो गई?”

“ओह … मैं दुबाला बनाकल लाती हूँ.” कहकर गौरी रसोई में चली गई।


थोड़ी देर में गौरी फिर से चाय बनाकर ले आई थी। अब तो वह बिना झिझके ही स्टूल के बजाये सोफे पर बैठने लगी थी।

मैंने गाँव वालों की तरह गिलास से सुड़का लगाकर चाय पीना शुरू कर दिया। मेरी इस हरकत पर गौरी मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी।


“गौरी एक बात बताऊँ?”

“हओ.”

“ये सुड़का लगाकर गिलास में चाय पीने का मज़ा ही अलग है? है ना?”

“आप भी निले बच्चे जैसे हलकतें कलते हैं.”

“अरे कभी-कभी बच्चे बन जाने में भी बहुत अच्छा लगता है। मेरा मन तो कई बार फिर से छोटा बच्चा बन जाने का करता है।

“त्यों?”

“हाय! बचपन के भी क्या मज़े थे? जो चाहो खाओ, जहां चाहो घूमो फिरो ना कोई फिक्र ना कोई फाका!”

हम दोनों ही हंसने लगे।


“एक और भी मजे वाली बात है?”

“त्या?”

“जो चाहो पहनो और अगर मन ना हो तो कुछ ना पहनो बस नंग-धडंग घूमो.”

“हट!” कह कर गौरी मंद-मंद मुस्कुराने लगी।


मेरा लंड बन्दूक की नली की तरह पूरा खड़ा हो गया था। उसका उभार और ठुमकना बरमूडा के ऊपर से स्पष्ट देखा जा सकता था। गौरी भी कनखियों से बार-बार इसकी ओर देख रही थी। उसके होंठ थोड़े कंपकंपा से रहे थे। उसने अपनी मुंडी नीचे झुका सी रखी थी और वह मुझ से नज़रें मिलाने से कतरा सी रही थी। मेरा लंड बार-बार ठुमके लगा रहा था। मुझे लगा मैंने अभी कुछ नहीं किया तो इसकी नसें फट जायेंगी।


प्रिय पाठको और पाठिकाओ! आप सोच रहे होंगे- ‘यार प्रेम गुरु … क्या चुतियापा कर रहे हो लोहा गर्म है मार दो हथोड़ा। क्यों अपने और हमारे लंड को तड़फा रहे हो? ठोक दो साली को।’


मित्रो! आपका सोचना अपनी जगह दुरुस्त हो सकता है पर मेरा मनाना है कि चुदाई से पहले किसी भी लौंडिया को मस्त करना बहुत ही ज़रूरी होता है। खैनी को जितना रगड़ोगे उतना ही मज़ा आएगा। प्रेम सम्बन्धों में थोड़ा धैर्य रखना बहुत ज़रूरी होता है इसमें में उतावलापन अच्छा नहीं होता। मैं चाहता हूँ गौरी मानसिक रूप से इसके लिए मन से तैयार हो जाए ताकि जब भी हम दोनों प्रेम के अंतिम पड़ाव पर पहुंचें और इस नैसर्गिक सुख को भोगें उसमें मन में लेश मात्र भी शंका, भय, पाप, ग्लानी या अपराध बोध का भाव ना हो।


“ग … गौरी! एक काम करोगी?”

“त्या?”

“पहले वादा करो कि ना नहीं कहोगी और शरमाओगी नहीं?”

“त्या?”

“ना वादा करो तब बताऊंगा?”

“थीत है”

“पक्का?”

“हओ.”


“वो शॉर्ट्स और टॉप पहनकर मुझे भी दिखाओ ना प्लीज!”

“हट!”

“क्या हट!”

“मुझे शल्म नहीं आएगी त्या?”

“इसका मतलब तुम अपनी दीदी से प्रेम नहीं करती?”

“वो तैसे?”

“देखो अब तो मधुर ने भी तुम्हें बोल दिया कि शर्माना नहीं चाहिए और तुमने मुझसे भी वादा किया है.”


“ओह … देखो आपने फिल मुझे बातों में फंसा लिया ना?”

“यार इसमें फ़साने वाली कौन सी बात है भला?”

“फिल भी आपते सामने शल्म तो आएगी ना?”

“ठीक है भई! कोई बात नहीं। एक तरफ अपना भी कहती हो और मेरी तो क्या अपनी प्रिय दीदी की भी बात नहीं मानती। ठीक है भई अपनी तो किस्मत ही खराब है.” कह कर मैंने एक लम्बी सांस ली और उदास होने का नाटक शुरू कर दिया।


गौरी कुछ सोचने लगी थी। उसके मन में उथल-पुथल सी चल रही थी। मैंने तो भावनात्मक रूप से उसे इस प्रकार अपनी बातों में उलझा लिया था कि अब मेरी बात मानने के सिवा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचा था।

“वो … तपड़े बदलने और पहनने में बहुत टाइम लगेगा तो आपतो ऑफिस जाने में देली हो जायेगी?”

“कोई बात नहीं मैं ऑफिस से छुट्टी मार लूँगा तुम उसकी चिंता मत करो.”


“दीदी तो पता चला तो मुझे और आपतो तच्चा चबा जायेगी?”

“प्लीज बस एकबार वो शॉर्ट्स और टॉप पहनकर दिखा दो फिर और कुछ नहीं मांगूंगा.”

“ओहो … आप भी बच्चों की तलह ज़िद कलते हैं.”

“गौरी देखो! मेरा दिल कितना जोर-जोर से धड़क रहा है? देख लो अब अगर कुछ हो गया तो तुम ही संभालना फिर?”


गौरी ने मेरी ओर तिरछी नज़रों से देखा। उसके चहरे पर दुविधा की स्थिति साफ़ झलक रही थी। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो चली थी। मुझे अपने प्लान पर पूरा यकीन था कि अब चिड़िया पूरी तरह मेरे जाल में फंस चुकी है और अब उसका निकल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।


“वो … वो … मैं शाम तो पहनतल दिखा दूंगी … प्लीज!”

“आह … हमें तो अपनों ने लूट लिया?” मैंने अपने सीने पर हाथ रखकर थोड़ा झुकने की एक्टिंग की।

“दीदी सच तहती है आप भी एत नम्बल के जिद्दी हो। अच्छा लुतो (रुको)” कहकर गौरी हंसने लगी।

हंसी तो फंसी।


और फिर नजाकत से अपने दोनों नितम्बों को मटकाते हुए वह वाश बेसिन की ओर जाने लगी। उसने पहले साबुन से अपने हाथ धोये और फिर चहरे पर पानी के छींटे मारे। फिर उसने माउथ फ्रेशनर से कुल्ला किया और फिर तौलिये से मुंह पोछते हुए स्टडी रूम (जहां गौरी के सोने की व्यवस्था है) की ओर जाने लगी।


पाजामे में कसे उसके नितम्बों की खाई तो जैसे मेरा कलेजा ही मांग रही थी। आज भी उसने अन्दर पैंटी नहीं पहनी थी। मुझे यकीन है अब तो उसे मेरी भावनाओं और इरादों का अच्छी तरह अंदाजा हो ही गया होगा।


हे लिंग देव! उसकी गांड का छेद तो अभी गुलाबी ही होगा। पता नहीं उसे देखने, छूने और चूमने का वक़्त कब आएगा। भरे जिस्म पर वो उठे हुए कसे कसे बड़े बड़े उरोज … वो पतला सा पेट … पतली सी कमनीय कमर … और फिर चौड़े नितम्ब और उसकी वो मादक जांघें … पतली लम्बी सुतवां मखमली रोम विहीन टाँगें … उफ़ … मैं बेसब्री से उसका इंतज़ार करने लगा.


और फिर कोई 15 मिनट के बाद स्टडी रूम का दरवाज़ा खुला …

जैसे आसमान में कोई आफताब चमका हो बादलों की ओट से पूर्णिमा का चन्द्र निकल आया हो … गौरी अपनी मुंडी झुकाए हौले-हौले चलती हुई मेरी ओर आने लगी.


आज पहली बार मैंने गौरी को इन कपड़ों में देखा था। सफ़ेद रंग की कसी हुई हाफ पैंट जैसी शॉर्ट्स और ऊपर गुलाबी रंग का टॉप। पतले गुलाबी होंठों पर हलकी लिपस्टिक, पैरों में स्पोर्ट्स शूज, सिर पर नाईके की टोपी, बालों कि एक चोटी उसके स्तनों के ऊपर जैसे पहरा सा दे रही थी।


मैं सच कहता हूँ अगर वो एक हाथ में टेनिस का रैकेट पकड़ ले तो लगेगा जैसे सिमरन (काली टोपी लाल रुमाल) ने ही दूसरा जन्म ले लिया है। मुझे लगा मैं गश खाकर वहीं गिर पडूंगा। उफ़ … जैसे क़यामत बस 4 कदम दूर है।


मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था और साँसें तेज हो गई थी मेरे कानों में सांय-सांय सी होने लगी थी। हलक जैसे सूख सा गया था और मुझे लगने लगा था जैसे मेरा दिल हलक के रास्ते अभी बाहर निकल आएगा।


गुलाबी टॉप के अन्दर कसे दो सिंदूरी आम, कमलनाल की तरह तरासी हुयी लम्बी छछहरी चिकनी बांहें। पैंटी और टॉप के बीच उसका नग्न मुलायम पेट पर नाभि का गहरा सा छेद। नाभि के नीचे उभरा हुआ सा पेडू, मखमली रोम विहीन पतली जाँघों का संधि स्थल के ऊपर का भाग थोड़ा सा उभरा हुआ। मैं तो मंत्र मुग्ध हुआ बस भगवान् के बनाए इस फित्नाकर मुजस्समे को देखता ही रह गया।


गौरी सोफे के पास आकर खड़ी हो गई। उसने अपनी मुंडी झुका रखी थी और शायद आँखें भी बंद थी। पता नहीं कितनी देर मैं उसे इसी तरह अपलक देखता ही रहा।


फिर धड़कते हुए दिल के साथ मैं सोफे से उठा। मुझे लगा मेरे पैरों का खून जम सा गया है। मैं गौरी के पास आ गया। उसने मारे शर्म के अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक सा लिया। उसके कुंवारे और अनछुए बदन से आती खुशबू ने तो मेरे सारे स्नायुतंत्र को मदहोश ही कर दिया। उसने शायद कोई परफ्यूम भी लगाया था।


मैंने धीरे से एक हाथ से उसकी ठोड़ी को पकड़कर ऊपर उठाते हुए कहा- गौरी, आँखें खोलो ना प्लीज?

उसने शर्माते हुए धीरे से अपनी आँखें खोली। उसकी सपनीली आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे। उसके अधर थोड़े काँप से रहे थे और तेज होती साँसों के साथ छाती का उभार ऊपर नीचे हो रहा था।

बेसाख्ता मेरे मुंह से निकल पड़ा …


एक हुश्न बेपर्दा हुआ और वादियाँ महक गई …

चाँद शर्मा गया और कायनात खिल गई …

तुम्हारे रूप की कशिश ही कुछ ऐसी है,

जिसने भी देखा बस यही कहा …

ख्वाबों में ही देखा था किसी हुस्न परी को,

किसे खबर थी कि वो जमीन पर भी उतर आएगी …

किसी को मिलेगा उम्र भर का साथ उसका

और उसकी तक़दीर बदल जायेगी।


हजारों सुनहरे सपने जैसे उसकी आँखों में तैर रहे थे। गौरी आँखें बंद किये हसीन ख्याबों में डूबी थी। मेरा एक-एक शब्द जैसे उसके कानों में किसी सुरम्य घाटी में बने मंदिर की घंटियों की तरह गूंजने लगा था। गौरी के दिल की धड़कन मैं साफ़ सुन सकता था। उसका गला भी सूख सा रहा था। साँसें तेज थी और उसके माथे और कनपटी पर जैसे पसीना सा झलकने लगा था।


“गौरी! तुम बहुत खूबसूरत हो!!!”


मैंने धीरे से अपने जलते होंठ उसके लरजते लबों पर रख दिए। उसका शरीर एक बार थोड़ा सा कांपा। मुझे लगता है वह इस स्थिति के पहले अपने आप को पहले से ही तैयार कर चुकी थी।


होंठों का गहरा मिलन और साथी का कसकर आलिंगन यह दर्शाता है कि आप मोहब्बत के चरम अवस्था पर जाने के लिए तन और मन से तैयार हैं। किसी भी लड़की या स्त्री को प्रेम करने वाला पति या प्रेमी जब भी प्रेम भरा प्रथम स्पर्श उनके अधरों पर करता है तो उनमें अपनी ख़ूबसूरती का अहसास जाग उठता है। चुम्बन प्रेमानुभूति का प्रतीक है और यहीं से प्रेम अंकुरित होता है।


मैंने अपने होंठों को उसके कोमल गुलाबी अधरों पर होले से फिराया। उसका पूरा बदन जैसे झनझना सा उठा। सारे बदन पर पसीना छा गया और रोएँ खड़े हो गये। कामदेव ने अपने तरकस से जैसे हजारों तीर एक साथ छोड़ दिए हों। प्रकृति ने इस काम में इतना रस भरा है तभी तो यह कायनात (सृष्टि) इतनी खूबसूरत लगती है। भगवान् की इस खूबसूरत रचना को इसी काम और प्रेम ने अमरता दी है। जैसे चांदनी की कि मनोहारिणी छटा किसी नदी के शीतल जल पर बिखर गयी, हवाओं में मधुर संगीत गूंजने लग, भौरों के सरस शोर से ‘काम’ राग का अलाप सुनाई देने लगा, दो आग में तपते शरीर की गर्मी से जैसे हिमालय की बर्फ पिघलने लगी।


मैंने अपना एक हाथ एक हाथ उसकी पीठ पर रखा और दूसरे हाथ से कमर को पकड़कर उसे अपने आगोश (आलिंगन) में ले लिया। अपने शरीर से चिपका लिया। मेरे ऐसा करने से मेरा तन्नाया लंड उसके पेडू से जा लगा।


गौरी अपने पंजों के बल थोड़ी सी ऊपर हो गयी अब तो मेरा लंड उसके जाँघों के संधि स्थल के बीच उभरे भाग पर रगड़ खाने लगा। उसके उरोज मेरे सीने से दबकर पिसने से लगे थे। मेरा एक हाथ फिसल कर उसके नितम्बों का जायजा लेने लगा।


हे भगवान् उसके खरबूजे जैसे गोल आकार के नितम्ब और उसकी गहरी खाई इतनी दिलकश थी कि मुझे लगा मेरा पानी तो बिना कुछ किये ही निकल जाएगा। गौरी का शरीर रोमांच और नए अनुभव से थिरकने सा लगा था। उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था साँसें बेकाबू सी होने लगी थी जैसे उसने अपनी सुध-बुध ही खो दी थी।


अचानक गौरी का शरीर थोड़ा सा अकड़ा। उसने अपने हाथ मेरी कमर पर जोर से कस लिए और मेरे होंठों को जोर जोर से चूमना शुरू कर दिया।

ईईईई ईईईई ईईईई ईईई …

अचानक उसके मुंह से एक किलकारी सी निकली और उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।


वह आसमान की बुलंदियों से कटी पतंग की तरह मेरी बांहों में झूल सी गई। लगता है यह उसका पहला ओर्गस्म था। उसने अपने काम जीवन का पहला परम आनन्द भोग लिया था।


मैंने उसे अपनी बांहों में भींच लिया और फिर एक साथ कई चुम्बन उसके होंठों, गालों और माथे पर ले लिए। वह तो जैसे सपनों की सतरंगी दुनिया में खो सी गई थी। बस अब तो प्रेम की अंतिम मंजिल जैसे 2 कदम नहीं दो बिलांद की दूरी पर ही खड़ी हम दोनों का इंतज़ार कर रही है।


मेरा लंड जोर जोर से बरमूडा के अन्दर उछल रहा था और उसने प्री-कम के कई तुपके छोड़ दिए थे। उत्तेजना इतनी ज्यादा थी कि मुझे लगने लगा था जल्दी ही कुछ नहीं लिया तो मेरा लंड कच्छे में ही शहीद हो जाएगा। मैं सोच रहा था अब अगर हम सोफे पर बैठ जाएँ तो दोनों को सहूलियत होगी।


पर इससे पहले कि मैं कुछ करता टेबल पर पड़ा मोबाइल गनगना उठा …


इस अप्रत्याशित मोबाइल से हम दोनों चौंक से गए। हे लिंग देव! इस समय कौन हो सकता है? गौरी छिटक कर मेरी बांहों से अलग हो गई। अब सिवा मोबाइल उठाने के कोई चारा नहीं था। मैंने स्क्रीन पर नंबर देखा।

ओह … यह तो मधुर का फ़ोन था …

लग गए लौड़े!!!


“हेलो … हाँ … मधुर …”

“बहुत देर लगाते हो मोबाइल उठाने में? क्या कर रहे थे?”

“ओह … सॉरी … वो … वो … मैं .. ” मैं चूतिये की तरह क्या बोल रहा था मुझे पता नहीं। मैं तो इस समय कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। मधुर का नाम सुनते ही गौरी स्टडी रूम में भाग गई और उसने दरवाजा बंद कर लिया।


“प्रेम वो … गुलाबो है ना?”

“भेन चुद गई साली की …”

“हेलो … क्या बोल रहे हो?” उधर से आवाज आई.

“ओह.. हाँ मेरा मतलब है अब क्या हुआ उसे? वो नगरपरिषद् वाला काम तो उसका करवा दिया था?”


“वो बीमार है, लगता है उसे हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा?”

“ओह … तो फिर?”

“वो घर पर और कोई नहीं है तो गौरी को एक बार अभी तुरंत घर जाना पड़ेगा.”

“ओह … ”

“तुम प्लीज ऑफिस जाते समय उसे घर छोड़ देना.”

“ठ … ठीक है.”

“और हाँ … उसे 2000 रुपये भी दे देना.”

“हुम्म …”


भेनचोद ये किस्मत भी लगता है भगवान् ने अपने लौड़े से ही लिखी है। मंजिल जैसे ही पास आती है नाव हिचकोले खाकर डूबने लगती है।


थोड़ी देर में गौरी कपड़े बदलकर आ गई।

“दीदी ता फोन था त्या? त्या बोला दीदी ने?”

“वो … वो तुम्हारी मदर की तबियत थोड़ी खराब है तो तुम्हें घर बुलाया है.”


“सब मेली ही जान ते दुश्मन बने हैं.”

गौरी की सूरत रोने जैसी हो गयी थी। मुझे लगता है गौरी को इस समय यहाँ से जाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था।

“तब जाना होगा?” उसने रुआंसी मरियल सी आवाज में पूछा।

“मैं ऑफिस जाते हुए तुम्हें ड्राप कर दूंगा.”

“आपते लिए नाश्ता बना दूं?”

“नहीं रहने दो गौरी! अब भूख नहीं है। मैं ऑफिस में ही कुछ खा लूँगा.”


तीन पत्ती गुलाब भाग -9

गौरी को उसके घर के पास ड्राप करने के बाद ऑफिस जाते समय मैं सोच रहा था ‘साली यह नौकरी भी एक फजीहत ही तो है। पता नहीं ये पढ़ाई-लिखाई, नौकरी चाकरी, घर-परिवार, रिश्ते-नाते, शादी-विवाह, बालिग-नाबालिग किस योनि निष्कासित (भोसड़ी वाले) का आइडिया था। आराम से जंगलों या गुफाओं में रहते, कंद-मूल-फल खाते, मर्ज़ी के मुताबिक मनपसंद चूत और गांड मारते, बच्चे पैदा करते और सुकून से मर जाते।’


मैंने बचपन में ‘अलादीन और जादू का चिराग’ नामक एक कहानी पढ़ी थी। जिसमें अल्लादीन जादू का चिराग लेने किसी गुफा में जाता है। वहाँ इंसानों के सिवा नदियाँ, झरने, तालाब, आलीशान मकान, फल और फूलों से लदे सुंदर बगीचे थे।

बस कोई ऐसी ही जगह हो जहाँ मैं गौरी और सुहाना को लेकर चला जाऊँ और फिर उन दोनों के साथ पूरी जिंदगी बिता दूँ। पूरी दुनिया में कितने भयंकर तूफ़ान और जलजले आते हैं। काश! भरतपुर में कोई सुनामी आ जाए। फिर तो मैं बस इस दीन दुनिया को छोड़कर गौरी और सुहाना के साथ किसी अज्ञात जगह पर चला जाऊं जहां हमारे सिवा और दूसरा कोई ना हो।


ऑफिस में किसी काम में मन लग रहा था। बस गौरी के ख्यालों में ही डूबा था। इस साली गुलाबो को भी आज ही बीमार पड़ना था। अगर आधा घंटा और मिल जाता तो बस गौरी फतह अभियान आज ही अपने मुकाम पर पहुँच जाता


कई बार तो मुझे डर सा लगता है और डर के कई वाजिब कारण भी हैं। कहीं मधुर को कोई शक तो नहीं हो जाएगा? कई बार यह भी ख्याल आता है कि कहीं मैं मधुर के साथ धोखा तो नहीं कर रहा हूँ? या गौरी की मासूमियत का नाजायज़ फ़ायदा तो नहीं उठा रहा?


हो सकता है गौरी अति उत्साह में या अनजाने में चुम्बन दे बैठी हो? बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ हो या उसे ख़याल आये कि यह सब गलत है तो क्या होगा? क्या पता अब गौरी वापस ही ना आये तो क्या होगा?

वैसे तो इस बात की उम्मीद कम है पर मान लो गलती से उसने मधुर को यह चुम्बन वाली बात बता दी तो? फिर तो निश्चित ही लौड़े लग ही जायेंगे!


मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ! मैंने अपनी बहुत सी प्रेमिकाओं को खोया है उनको खोने का दर्द मैं ही जान सकता हूँ। जिस प्रकार मैंने अपनी प्रेमिकाओं को खोया है कई बार तो लगता है वास्तव में ही मैं कोई शापित व्यक्ति हूँ जिसे अपनी हर प्रेमिका को अंत में खोना ही पड़ेगा। मैं सच कहता हूँ अब मैं गुलाब के इस तीसरे कांटे की जुदाई का जख्म बर्दाश्त नहीं कर पाउँगा। या खुदा … सॉरी हे लिंग देव!!!! मदद कर!!! अब गौरी को खोने का हौसला मेरे अन्दर नहीं है।


वैसे ज़िन्दगी में परेशानियां ‘चुनौतियों’ की वजह से कम और ‘चूतियों’ की वजह से ज़्यादा होती हैं। साला ये भोंसले भी सुकून से जीने भी नहीं देता। उसे हर समय केवल सेल्स टारगेट्स की ही लगी रहती है। अब उसने एक हफ्ते के टूअर का प्रोग्राम बना दिया है। आप मेरी हालत समझ सकते हैं।


शाम के सात साढ़े-सात का समय रहा होगा। मैं गाड़ी सर्विस के लिए देना चाहता था पर बाद में मैंने अपना इरादा मुल्तवी (प्रोग्राम बदलना) कर दिया। सोचा आज लेट हो गई है कल सुबह टूअर पर जाते समय गाड़ी सर्विस स्टेशन पर छोड़ दूंगा।


रास्ते में मैं मधुर के बारे में सोच रहा था। आज मैं सारी रात मधुर को अपनी बांहों में भरकर हल्का हो लेना चाहता था पर लगता है इन बाबाओं के चक्कर में एक महीने की पनौती लग ही जायेगी। पता नहीं उसके दिमाग में क्या चल रहा है? इस शुक्र और राहू-केतु के चक्कर में किसी बाबा ने ठोक बजा दिया तो मैं तो गली-गली यही गाता फिरूंगा कि ‘मैं लुट गया … बर्बाद हो गया.’ और फिर लोग पूछेंगे ‘कितने आदमी थे?’


गाड़ी पार्क करने के बाद मैं घर की ओर मुड़ने ही वाला था कि सुहाना एक हाथ में टेनिस का रैकेट और दूसरे हाथ में अपने झबरे कुत्ते की जंजीर पकड़े आती दिखाई दी।


हे लिंग देव! आज की शाम को तो तुमने वाकई बहुत ही सुहाना बना दिया है आज तो बहुत अच्छा सगुन हो गया। पिछले 15-20 दिनों में तो इस फुलझड़ी के दर्शन ही दुर्लभ हो गए थे।


सिर पर वही नाईके की टोपी, झक सफ़ेद रंग की स्कर्ट और छोटी सी निक्कर पैरों में स्पोर्ट्स सूज पहने ऊपर से नीचे बस क़यामत। पतली कमर के ऊपर एक जोड़ी सुडौल सांचे में ढली नारंगियाँ और तीखे कंगूरे। कांख के पास पसीने से गीली हुई शर्ट।


मेरा अंदाज़ा है उसकी पिक्की और बगलों में अभी हल्के हल्के मखमली रोयें ही होंगे जिन्हें झांट तो बिलकुल नहीं कहा जा सकता। लम्बी छछहरी गुदाज़ बाहें। कन्धों के ऊपर तक कटे घने काले मुलायम रेशमी बाल और कानों में वही सोने की छोटी-छोटी जानलेवा बालियाँ।


हे भगवान् कितना नयनाभिराम दृश्य था। मेरी आँखें तो उसकी पुष्ट गुलाबी जाँघों से हट ही नहीं रही थी। मस्त हिरनी की तरह कुलाचें सी भरती जैसे ही वो मेरे पास से गुजरने लगी उसके अल्हड़, अनछुए, कुंवारे बदन से आती खुशबू मेरे स्नायु तंत्र को एक ठंडी मदहोश करने वाली फुहार से सराबोर करती चली गई। उसके छोटे-छोटे कसे हुए नितम्बों की थिरकन देखकर तो मेरे दिल की धड़कन बेकाबू सी होने लगी।


मेरा मन तो करने लगा इस फुलझड़ी को बस एक बार बांहों में भरकर चूम लूं! मैं सच कहता हूँ अगर मैं कोई 18 साल का लौंडा लपाड़ा होता तो कब का उसे बांहों में दबोच लेता पर मेरे जैसे सामाजिक प्राणी के लिए यह कैसे संभव हो सकता था? मैं तो बस टकटकी लगाए उसे देखता ही रह गया।


हे लिंग देव! मेरे ख़्वाबों की शहजादी केवल एक कदम के फासले पर थी। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। मेरा लंड तो जैसे किलकारियां ही मारने लगा था। मैं सोच रहा था किसी बहाने से उसे थोड़ी देर रोक कर बात कर ली जाए और थोड़ा सा नयन सुख भोग लिया जाए। मैं अभी कुछ सोच ही रहा था कि उसका कुत्ता कुछ सूंघते हुए भों-भों करता मेरी ओर आने लगा।


“नो शुकु! नो!” सुहाना ने इसके गले से बंधी जंजीर से उसे अपनी ओर खींचा।


आज जिन्दगी में पहली बार मैंने सुहाना को इतनी नजदीक से देखा था और उसकी आवाज सुनी थी। आह … कितनी कोमल और सुरीली आवाज थी। जैसे कोई कोयल अमराई में कूकी हो या किसी ने जलतरंग पर कोई मीठी धुन छेड़ दी हो।


पर साले इस पिल्ले को उसकी नज़ाकत का अंदाज़ा कहाँ था? गौरी ने एक बार मुझे बताया था कि इस कुत्ते का नाम शाहरुख खान रखा हुआ है और ये लोग प्यार से इसे ‘शुकु’ बुलाते हैं।


इतने में अचानक कहीं से एक आवारा कुत्ता जोर से भोंकते हुए सुहाना और शुकु की ओर झपटा। उसने पहले तो एक झपट्टा शुकु की ओर मारा और फिर सुहाना के घुटनों और जाँघों पर पंजा मार दिया।

इस अप्रत्याशित घटना से उसके हाथ से जंजीर छूट गई और शुकु खान मियाँ प्यों-प्यों करते हुए कार के नीचे दुबक गए। इस आपाधापी में सुहाना के हाथ में पकड़ा टेनिस बैट भी गिर गया।


सुहाना की डर के मारे चीख सी निकल गयी- मम्मीईई ईईईइ …

उसकी घिग्गी सी बंध गई और वह दौड़ कर मेरे से लिपट गई।


यह सब घटनाक्रम इतनी तेजी से हुआ था कि एक पल के लिए तो मुझे भी कुछ समझ नहीं आया कि यह सब क्या हो गया है।

मुझे तो तब ध्यान आया जब उसने कसकर मुझे पकड़ लिया और उसके दोनों उरोज मेरे सीने से आ लगे। उसकी गर्म साँसें मेरे गले पर महसूस होने लगी थी। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि मैं उसे साफ सुन सकता था।


मैंने अपने एक हाथ से सुहाना की कमर को पकड़े अपने सीने से लगाए रखा और दूसरे में पकड़े बैग से उस कुत्ते को मारते हुए हटाया। इस आपा-धापी में मेरे हाथ में पकड़ा बैग भी गिर गया फिर मैंने ‘हट! हट!’ करते हुए उस कुत्ते को थोड़ा हड़काया।

बैग की मार और उसके गिरने से वह कुत्ता भाग गया।


अब मुझे सुहाना का ख़याल आया। सुहाना अभी भी सुबक रही थी। मैंने धीरे से उसे पुचकारा- अरे कुछ नहीं हुआ डरो नहीं, तुम तो बहादुर लड़की हो.

मेरा एक हाथ उसकी कमर पर था और मेरा दूसरा हाथ अपने आप उसके खरबूजे जैसे नितम्बों पर सरक गया।


हे भगवान् कितनी मादकता भरी हुई थी इन दो गुदाज़ गुम्बदों में। उसके कमसिन और अल्हड़ बदन से पसीने और किसी बॉडी स्प्रे (परफ्यूम) की मिली जुली खुशबू मेरे नथुनों में समा गई। मिक्की और सिमरन के बाद कोई किशोरी लड़की आज मेरे बाहुपाश में सिमटी हुई थी।

मैं सोच रहा था काश! वक़्त थम जाए और मैं सुहाना को इसी तरह अपने आगोश में लिए बाकी की जिन्दगी बिता दूं!


“बस … बस … डरो नहीं यू आर अ ब्रेव गर्ल!” मैंने उसके गालों पर लुढ़क आये आंसुओं को पोछा और फिर उसके गालों पर थपकी सी लगाई।


रुई के फोहे जैसे नर्म गुलाबी गालों पर किसी शबनम की बूंदों की तरह लुढ़क आये आंसू तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसके लाल गुलाबी फड़कते होंठ जैसे संतरे की फांक हों। मैं सच कहता हूँ मेरा मन तो उनपर एक चुम्बन ले लेने का करने लगा था।


इतने में आस पास के लोग शोर सुनकर आ धमके। सभी पूछने लगे ‘क्या हुआ? क्या हुआ?’

“कुछ नहीं वो … वो … कुत्ते के कारण थोड़ा डर गई है।”


इतने में संजीवनी बूंटी (सुहाना की मम्मी श्री) आ गई। वह भी थोड़ा घबराई हुई थी। अपनी माँ को देखकर सुहाना मेरी बांहों से निकल कर अपनी मम्मी से जा लिपटी और जोर-जोर से रोने लगी।


“की होलो बेबी?” (क्या हुआ बेबी) शायद उसने बंगाली भाषा में पूछा था।

“से … से … कुकुरा” (वो… वो… डॉगी?)

“आपनी कोथा ओ बीतेंन ना? दिखाबे ना?” (कहीं काट तो नहीं लिया? दिखाओ?” संजया ने घबराए हुए फिर पूछा।


फिर संजया ने उसकी स्कर्ट को थोड़ा ऊपर करते हुए उसके घुटनों और जाँघों को देखा। पता चला कुत्ते के पंजों से सुहाना के घुटनों और जाँघों पर खरोंच सी आयी है और उससे खून भी निकल रहा है। हे भगवान्! रोम विहीन, नर्म, मुलायम, भरी-पूरी पुष्ट स्निग्ध जांघें जैसे उनपर गुलाब का मुलम्मा (परत) चढ़ा हो। जाँघों के संधि स्थल का उभरा हुआ भाग तो जैसे स्पर्श और चुम्बन का का निमंत्रण ही दे रहा था। मैं सच कहता हूँ ऐसी खूबसूरत जांघें तो सिमरन की भी नहीं थी।


“ओह… कामता बा नाखा थेके?” (ओह… मुंह से काटा या पंजों से?)

“आमि … जानि ना?” (मुझे… पता नहीं?)

“ओह… गोड अब क्या होगा? वो मिस्टर बनर्जी भी यहाँ नहीं हैं?” संजया ने बेचारगी से मेरी ओर देखा।

“क… कोई बात नहीं … मैम … आप चिंता ना करें। मैं हूँ ना? गाड़ी निकालता हूँ, अभी डॉक्टर को दिखा देते हैं।” मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा।


“नो… मोम… आमि इंजेक्शन पाबेना ना.” (नो… मोम… मैं इंजेक्शन नहीं लगवाऊँगी.) कहकर सुहाना फिर जोर-जोर से रोने लगी।

“इट्स ओके बेबी… प्लीज… कूल डाउन” (ठीक है बेटा … हौसला रखो)


और फिर सुहाना को पास के नर्सिंग होम में दिखाया। डॉक्टर ने अपना उपचार कर दिया था। वापस लौटते समय संजया तो आज संजीवनी बूंटी के स्थान पर शहद की डली ही बन गई थी। उसने हाथ मिलाते हुए इस आपात स्थिति में किये गए इस सहयोग के लिए मेरा धन्यवाद किया और मुझे ‘कभी घर आने का न्योता’ भी दिया।


जिस प्रकार से उसने ‘कभी घर आने का’ न्योता दिया था मैं बाद में कई दिनों तक इस मनुहार भरे न्योते पर गंभीरता पूर्वक विचार करता रहा था। अलबत्ता अगले 5-6 दिन टूअर के चुतियापे में ही निकल गए।


दोस्तो! आप क्या सोचते हैं संजवानी बूंटी ने शिष्टाचारवश (औपचारिकता) ऐसा कहा था या कोई और बात हो सकती है? आप मुझे मेल करेंगे तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।


मैं जब टूअर से वापस आया तब तक कई चीजें बदल गई थी। मधुर का पुत्रयेष्टि प्रोग्राम शुरू हो चुका था। उसने पास के मंदिर में रोज सुबह-शाम एक-एक घंटे शुक्र के पाठ करने शुरू कर दिए थे और दिन में केवल एक बार हल्का भोजन लेकर व्रत भी करने चालू कर दिए थे। पिछले 5-7 दिनों से शुद्धता की तो वैसे भी कोई समस्या थी ही नहीं और अब उसकी हिटलरशाही के सामने मेरी औकात और हिम्मत उसे अशुद्ध करने की कहाँ थी। हमारे बेडरूम में ही उसने अपने सोने के लिए एक फोल्डिंग बेड अलग से डाल लिया था। शाम को नियमित रूप से गौरी को पढ़ाना भी चालू हो गया था।


ऑफिस में बहुत दिनों बाद कोई ढंग की लड़की ने ज्वाइन किया है। भरी हुई मांग और माथे की बिंदी दर्शाती है कि नई-नई शादी हुई है। रंग रूप तो ठीक-ठाक है पर उसकी लगभग 36-24-36 की फिगर दिलकश ही नहीं जानलेवा है। चलते समय जिस प्रकार उसके नितम्ब थिरकते हैं आप जैसे अनुभवी लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं कि यह साली गांड बाजी का मज़ा जरूर लेती होगी वरना इतने खूबसूरत नितम्बों का क्या फायदा।

भोंसले एक हफ्ते के लिए पूना गया हुआ है तो ऑफिस में शांति का माहौल है।


ओह … मैं भी क्या फजूल की बातें ले बैठा। मैं गौरी के बारे में तो बताना ही भूल गया!

गुलाबो की तबियत अब सुधरने लगी थी तो गौरी वापस आ गई है।


गौरी का तो रंग रूप ही निखर सा गया है। अगर मैं कहूं कि अब तो वह रूपगर्विता बन गई है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अब उसे अपनी सुन्दरता का अहसास होने लगा है और थोड़ी नाजुकी के साथ नखरे भी आने लगे हैं। अब यह उस चुम्बन का असर है या कोई दीगर बात है पता नहीं?


लगता है मधुर ने उसे सजना संवारना सिखा दिया है। वैसे भी नखरे तो जवान लड़की अपने आप सीख ही लेती हैं। कमर तक झूलते बालों को थोड़ा सा ट्रिम करवा दिया है और अब चोटी के बजाय बाल खुले रखने लग गई है। शर्ट या कुर्ते के ऊपर के बटन खुले रखने में अब वो ज्यादा नहीं शर्माती है। माथे पर एक छोटी से लाल बिंदी, कानों में सोने की छोटी-छोटी बालियाँ। साली पूरी मुज्जसमा बनी है।


दोस्तो! आप जरूर सोच रहे होंगे इन छोटी-छोटी बातों का यहाँ लिखने का क्या औचित्य है? क्यों हमारे और अपने लंड को तड़फा रहे हो? साली को पकड़ कर रगड़ क्यों नहीं देते? एक बार थोड़ा सा कुनमुनाएगी और बाद में अपने आप समर्पण कर देगी।

अब वो इतनी लोल भी नहीं है कि तुम्हारी मनसा और नियत अबतक ना समझ पायी हो। स्त्री तो एक नज़र में ही आदमी की नीयत और मनसा दोनों जान लेती है। और फिर अब इस इश्क की आग तो वह भी झेल ही रही होगी।

उसने जिस प्रकार उस दिन चुम्बन में इतनी दिलचस्पी दिखाई थी लगता है अब उससे अपनी जवानी का बोझ संभाला नहीं जा रहा है। तुम मानो या ना मानो उसके मन में भी प्रेम अंकुरित हो चुका है और वह भी इस नैसर्गिक सुख को भोग लेने के लिए उत्सुक और बेजार (आतुर) हो चुकी है। क्यों बेचारी कमसिन बुर को तड़फा रहे हो?


आप अपनी जगह सही हो सकते हैं पर मेरी सोच अलग है। मैं जानता हूँ वह मानसिक रूप से अपने आप को इसके लिए तैयार कर चुकी है। अगर मैं उसे बांहों में भरकर प्रणय निवेदन करूं तो उसके लिए मना करना अब संभव नहीं होगा। वह बहुत ही कम समय में अपना सर्वस्व मुझे बेझिझक सौम्प देगी। वह इस समय तन और मन की एक अजीब सी कश्मकश (धर्मसंकट) में फंसी है। उसका तन इस नैसर्गिक आनंद को भोग लेना चाहता है पर उसका अवचेतन मन और संस्कार उसे ऐसा करने से रोके हुए हैं।


मेरे प्रिय पाठको! आप नारी मन के अन्तःकरण में छिपी भावनाओं को नहीं समझ सकते? मेरी पाठिकाएं इसे बखूबी जानती और समझती हैं। स्त्री जब किसी से प्रेम करती है तो उसमें अपने प्रेमी को अपना सब कुछ सौम्प देने की चाहत सर्वोपरि होती है जबकि पुरुष के मन में प्रथम ख़याल सिर्फ उसे भोग लेने का रहता है। वह सब कुछ पा लेने की चाहत रखता है और स्त्री अपनी सबसे बड़ी ख़ुशी अपने प्रेमी की चाहत को परिपूर्ण करने में महसूस करती है। एक स्त्री और पुरुष की भावनाओं में यही बुनियादी फर्क है।


दोस्तो! मैं गौरी को भोगना तो जरूर चाहता हूँ क्योंकि यह तन और मन दोनों की ही आवश्यकता है। पर मैं इसके लिए किसी भी प्रकार की जोर-जबरदस्ती या जल्दबाजी के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ। मैं कोई उज्जड़, जंगली, गंवार, वहशी या अमानुष व्यक्ति नहीं हूँ जो किसी भी प्रकार का बलात्कार जैसा कृत्य करने पर आमादा हो। मैं तो गौरी के साथ अपने प्रथम मिलन को एक मिसाल और यादगार बनाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ उसे अपने प्रथम चुम्बन की तरह प्रथम मिलन के अनुभव की स्मृतियाँ भी जीवनपर्यंत रोमांचित करती रहें। और एक सबसे अहम् (विशेष) बात यह भी है कि जब भी वह मेरी पूर्ण समर्पिता बने उसके मन में लेश मात्र भी शंका, झिझक, अपराधबोध महसूस ना हो और ना ही उसके बाद भी पश्चाताप की कोई गुंजाइश ना रहे।


ओह… मैं भी कहाँ दार्शनिक बातें ले बैठा? आइए ‘गौरी फ़तेह अभियान’ का अगला सोपान को शुरू करते हैं। हे लिंगदेव! इस बार इस अभियान के बाकी के सोपान (पायदान) निर्विघ्न सम्पूर्ण कर देना।



तीन पत्ती गुलाब

भाग- 10

सुबह के लगभग 8 बजे हैं। रात को थोड़ी बारिश हुई थी इस वजह से मौसम आज थोड़ा खुशगवार (सुहावना) सा लग रहा है। अक्सर ऐसे मौसम में मधुर नाश्ते में चाय के साथ पकोड़े बनाया करती है। पर आजकल तो मधुर के पास मेरे लिए जैसे समय ही नहीं है। मधुर तो कब की स्कूल जा चुकी है.


और गौरी रसोई में चाय बनाते हुए कोई गाना गुनगुना रही है…

“मेरे रश्के कमर तूने पहली नज़र…!

नज़र से मिलाई मज़ा आ गया…!!”


साली यह गौरी भी बात करते समय तो तुतला सी जाती है और शब्दों का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाती पर गाना गाते समय तो कमाल करती है। अगर वह थोड़ी कोशिश और रियाज़ (अभ्यास) करे तो बहुत अच्छा गा सकती है।


थोड़ी देर में गौरी चाय लेकर आती दिखाई दी। आज कोई 7-8 दिनों बाद गौरी को देखा था।


आज उसने हल्के पिस्ता रंग की हाफ बाजू की शर्ट और पायजामा पहन रखा था। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे। लगता है आज उसने शर्ट के अन्दर ब्रा के बजाय समीज पहनी है। उसने अपने खुले बाल एक रिबन से बाँध कर चोटी के रूप में गर्दन के पास से होते हुए एक तरफ छाती पर डाल रखे थे। दोनों भोंहों के बीच एक छोटी सी बिंदी। लगता है आज उसने पहली बार सलीके से आई ब्रो बनाई है। मुझे तो लगता है यह सब मधुर का कमाल रहा होगा।


कुछ भी कहो, उसकी आँखें और भवें आज किसी कटार से कम नहीं लग रही है। मुझे लगता है आई ब्रो के साथ-साथ उसने अपनी सु-सु को भी जरूर चिकना बनाया होगा।

मेरा लड्डू (लंड) तो उसे देखते ही फड़फड़ाने लग गया है।


मैंने अपने पप्पू को पायजामें में सेट किया ताकि बेचारे को कम से कम अपनी गर्दन तो सीधी रखने में परेशानी ना हो। मैंने देखा गौरी ने तिरछी नज़रों से मेरी इस हरकत को नोटिस कर लिया था इसलिए वो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।


जैसे ही वह ट्रे रखने के लिए थोड़ा सा झुकी, खुले बटनों वाली शर्ट में कंगूरों के अलावा गोल गुलाबी नारंगियाँ पूरी दिखने लगी थी।

उसने चाय की ट्रे टेबल पर रख दी।


मुझे आश्चर्य हुआ आज गौरी चाय के लिए एक ही गिलास लाई थी।


“अरे गौरी आज एक ही गिलास क्यों? क्या तुम नहीं पिओगी?” मैंने पूछा।

“आज मैंने दीदी के साथ चाय पी ली थी।”

“ठीक है भई! तुम्हारे लिए तो तुम्हारी दीदी ही सर्वोपरि है।”

“आप ऐसा त्यों बोलते हैं?”

“तुम्हें तो पता है मैं अकेला चाय नहीं पीता?”

“ओह… पल मैंने तो एत ही तप चाय बनाई है?”

“तो क्या हुआ इसी में से आधी-आधी पीते हैं? जाओ एक खाली गिलास और ले आओ.”

“हओ”

गौरी रसोई से खाली गिलास ले आई और पास वाले सोफे पर बैठ गई।


मैं टूअर से आते समय गौरी के लिए सोनाटा की एक सुनहरे रंग की कलाई घड़ी और इम्पोर्टेड चोकलेट खरीद कर गिफ्ट पेपर में पैक करवा ली थी। मैंने जानकर इसे अपने बगल में सोफे पर रखा था ताकि इसपर गौरी की नज़र पहले ना पड़े।


अब मैंने वो दोनों पैकेट निकाल कर टेबल पर रखते हुए कहा- देखो तो गौरी यह क्या है?

“त्या है?” उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

“पता है … मैं यह गिफ्ट तुम्हारे लिए स्पेशल आगरा से लेकर आया हूँ.”

“सच्ची?” गौरी की आँखें ख़ुशी के मारे चमक उठी।

“त्या है इसमें?” गौरी ने दोनों गिफ्ट हाथ में पकड़ लिए।


उसे शायद विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं उसके लिए गिफ्ट लेकर आउंगा।

“गिफ्ट कोई बता कर थोड़े ही दी जाती है। अभी तो तुम अंदाज़ा लगाओ बाद में खोल देख लेना और मुझे भी दिखा देना।” कहकर मैं हंसने लगा।

अब गौरी थोड़ा उलझन में थी।


“पहले इसे अपने कमरे में रखकर आओ फिर हम दोनों चाय पीते हैं।”

“हओ”

“गौरी, यह बात मधुर को मत बताना प्लीज.”

“हओ थीत है।” गौरी रहस्यमई मुस्कान के साथ फटाफट उन दोनों पैकेट्स को अपने कमरे की अलमारी रख आई और फिर से बगल वाले सोफे पर बैठ गई। आज तो उसकी आँखों की चमक और ख़ुशी देखने लायक थी।


“गौरी! आज तो चाय में चीनी मिलाई है या फिर से भूल गई?” मैंने थर्मस से थोड़ी-थोड़ी चाय दोनों गिलासों में डालते हुए पूछा।

“तोई लोज-लोज थोड़े ही भूलती हूँ?” उसने हँसते हुए कहा।

“अगर भूल भी जाओ तो कोई बात नहीं उस दिन की तरह अपने बस होंठ लगा देना? अपने आप मीठी हो जायेगी।” कह कर मैं जोर जोर से हंसने लगा।

“हट!” गौरी तो गुलज़ार ही हो गई।


हे भगवान्! आज तो उसके पतले-पतले गुलाबी होंठ बहुत ही कातिल लग रहे हैं। इन होंठों से अगर वह मेरा पप्पू चूस ले तो खुदा कसम मज़ा आ जाए। पप्पू मियाँ तो लगता है आज ख़ुदकुशी करने पर आमादा है। वह जोर-जोर से ठुमके लगा रहा है और उसने प्री-कम के कई तुपके छोड़ दिए हैं।


“अच्छा गौरी एक बात बताओ?” मैंने चाय का सुड़का लगाते हुए पूछा।

“हुम्?”

“वो उस दिन तुम्हें कैसा लगा था?”

“तब?” गौरी ने हैरानी से मेरी ओर देखा। या… अलाह… उसके कमान सी तनी भोंहों के नीचे किसी हिरनी जैसी चंचल आँखें ऐसे लग रही थी जैसे कामदेव ने अपने तरकस के सारे बाण एक साथ छोड़ दिए हों।

“अरे वो… हमारा खूबसूरत अधर मिलन?”

“अध…ल मिन…ल?” उसने कुछ याद करने की कोशिश करते हुए मेरे शब्द दोहराए।


“अरे बाबा मैं उस दिन के चुम्बन की बात कर रहा था?”

“ओह… वो… हट!” गौरी जिस प्रकार शरमाई थी मुझे लगा मैं गश खाकर गिर पडूंगा। शर्माते हुए जब वो अपनी मुंडी नीचे झुकाती है तो खुले बटनों वाली शर्ट में छिपे दोनों गुलाबी परिंदों की चहलकदमी देखकर मन फड़फड़ाने लगता है। पता नहीं इनकी नज़दीक से देखने, छूने, मसलने और इनका रस पीने का मौक़ा कब आएगा। मैं तो बस अपनी जीभ अपने होंठों पर फिरा कर ही रह जाता हूँ।


“क्या हट?”

“मुझे ऐसी बातों से शल्म आती है?”

“इसमें भला शर्माने वाली क्या बात हो गई?”

“शल्म तो आती ही है ना?”

“अच्छा शर्म की बात छोड़ो तुम्हें अच्छा तो लगा ना?”

“किच्च… मुझे नहीं मालूम!” कह कर गौरी ने फिर अपनी मुंडी नीचे झुका ली।


मैं गौरी के मन के भावों को अच्छी तरह समझ सकता था। उसकी साँसें बहुत तेज़ हो रही थी और दिल की धड़कन भी बढ़ गई थी। वो अपने चहरे पर आई रोमांचभरी मुस्कान को छिपाने की नाहक कोशिश कर रही थी। मैं जानता हूँ उसे यकीनन यह सब अच्छा तो जरूर लगा होगा पर वह जाहिर तौर पर (प्रकट रूप में) नारी सुलभ लज्जा के कारण इसे मुखर शब्दों में स्वीकारने में अपने आप को असमर्थ पा रही होगी। वह कुछ असहज सा महसूस कर रही थी इसलिए अब बातों का विषय बदलने की जरूरत थी।


“अरे गौरी! अब वो तुम्हारी मदर की तबियत कैसी हैं?”

“ह… हाँ.. अब ठीत है.”

“थैंक गोड! जल्दी ठीक हो गई वरना तुम्हारे तो दीदार ही मुश्किल हो जाते.”

“तैसे?”

“तुमने तो हमें याद ही नहीं किया इन 7-8 दिनों में?”

“मैंने तो आपको तित्ता याद किया मालूम?”

“हट! झूठी?”

“सच्ची?”

“तो फिर फ़ोन क्यों नहीं किया?”

“आपने भी तो नहीं तिया?”


साली कितनी स्मार्ट बन गई है आजकल झट से पलटकर जवाब दे देती है।

“हाँ…. पर मैं मधुर से जरूर तुम्हारे बारे में पूछता रहता था.”

“पल दीदी ने तो बताया ही नहीं?”

“हा … हा … हा … उसे मेरे से ज्यादा चिंता तुम्हारी रही होगी ना!”

फिर हम दोनों इस बात पर खिलखिला कर हंस पड़े।


“गौरी! वो… अनार या अंगूर नहीं आई क्या?”

“बस एत बाल (एक बार) अस्पताल में मिलने आई थी फिल चली गई।”

“कमाल है?”

“सब मेली ही जान ते दुश्मन बने हैं?”

“और वो तुम्हारी भाभी?”

“वो पेट फुलाए बैठी है.” उसने अपने दोनों हाथों को अपने पेट पर करते हुए भाभी के प्रेग्नेंट होने का इशारा किया।


“अच्छा है तुम बुआ बन जाओगी?” मैंने हँसते हुए कहा।

“हओ! नौवाँ महीना चल लहा है। शायद अगले महीने के शुरू में बच्चा हो जाए।

“गौरी वो… अनार के क्या हाल हैं?”

“उस बेचाली ते तो भाग ही फूट गए हैं?”

“अरे… क्यों? ऐसा क्या हुआ?”

“टीटू लोज दालू पीतल माल-पिटाई तलता है।” (टीटू रोज दारु पीकर मार-पिटाई करता है।)

“क… कौन टीटू?”

“अले वो नितम्मा जीजू?”

“ओह…”

“बेचाली ते तीन बच्चे हो गए हैं और अब चौथे ती तैयाली है।”

“ओह …”


ये अनपढ़ निम्नवर्गीय परिवारों में लोग बस बच्चे ही पैदा करने में लगे रहते हैं। औरतें बेचारी 4-4, 6-6 बच्चे पैदा करती हैं और बाहर घरों में काम या मजदूरी करके घर चलाती हैं। पति की मार भी खाती खाती हैं और उनको को दारु पीने के पैसे भी देती हैं। सच में अनार के बारे में जानकार बहुत दुःख हुआ।


“और अंगूर के क्या हाल हैं?”

“वो तो खाय-खाय ते गुम्बी होय गई है.” गौरी ने अपने दोनों हाथों की मुठ्ठियाँ भींचकर अपनी कोहनियाँ उठाते हुए मोटे आदमी के नक़ल उतारते हुए कहा और फिर हम दोनों हँसने लगे।

“हा… हा…”

“वो भी घरवालों से मिलने नहीं आती क्या?”

“अले उसते नखरे तो बस लहने ही दो?”

“क… क्यों?… कैसे?”

“पता है … आजतल वो चाय नहीं पेशल तोफी (कॉफ़ी) पीती है और खाने में लोज बल्गल, पिज़्ज़ा, विदेशी चोतलेट पता नहीं त्या-त्या खाती है। औल लोज नए-नए डिजाइन ते सूट पहनती है।”

शायद गौरी के मन में कहीं ना कहीं अंगूर के लिए कुछ खटास और ईर्ष्या जरूर रही होगी। मैं तो सोचता था गौरी के मन में अंगूर के लिए उसके प्रोढ़ और लंगड़े पति (मुन्ने लाल) को लेकर सहानुभूति होगी पर यहाँ तो मामला ही उलटा लग रहा है।


“अच्छा?” मैंने हैरानी जताई।

“औल पता है उसने नई एटीवा की फटफटी (एक्टिवा स्कूटर) ली है तिसी तो हाथ भी नहीं लगाने देती। मेमसाब बनी घूमती लहटी है।”

“गौरी तुम्हारा भी स्कूटी चलाने का मन करता है क्या?”

“हओ! मेला तो बहुत मन कलता है। दीदी बोलती हैं उनते व्रत ख़त्म होने ते बाद मुझे भी फटफटी चलाना सिखाएंगी.”

“हुम्म”


“अम्मीजॉन (अमेजोन) से उसने सोनाटा ती घड़ी औल म्यूजित सिस्टम भी मंगवाया है। उसके तो मज़े ही मज़े हैं। औल सोलह हजाल ता तो नया मोबाइल लिया है साले दिन फेस बुत और यू-ट्यूब देखती लहती है।”

“तो फिर घर का काम कौन करता है?”

“घल ता साला ताम तो उसती पहले वाली लड़तियाँ तलती है और वो महालानी ती तलह लाज तल लही है। तितनी बढ़िया तिस्मत पाई है।” (घर का काम तो उसकी पहले वाली लड़कियां करती हैं और वो महारानी की तरह राज कर रही है। कितनी बढ़िया किस्मत पाई है।)

“अच्छा?”

“हओ”


“अच्छा गौरी एक बात तो बताओ?”

“त्या?”

“वो… अंगूर के कोई बच्चा-वच्चा हुआ या नहीं?”

“वा हलामजादी जीजू तो देवेई नाई तो बच्चो खां से होगो? बोलो?” शायद उसने फैजाबाद की क्षेत्रीय भाषा में बोला था। लगता है आज गौरी को अंगूर पर बहुत गुस्सा आ रहा है।

“क… क्या मतलब? क्या नहीं देती? खाने को नहीं देती क्या?”

“अले… आप समझे नहीं… वो… वो…” कहते कहते गौरी रुक गई।

“बोलो ना? क्या नहीं देती?”


अब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अनजाने गुस्से में कुछ अनचाहा बोल गई है। उसने मारे शर्म के अपनी मुंडी झुका ली थी। कोई और मौक़ा होता तो गौरी शर्म के मारे रसोई में भाग जाती पर आज वो शर्म से गडी अपनी मुंडी नीचे झुकाए बैठी रही।


ईईईस्स्स … हे लिंग देव! गौरी शर्माते हुए कितनी खूबसूरत लगती है तुम क्या जानो। शर्माने की यह अदा और उसके गालों पर पड़ने वाले गड्ढे तो किसी दिन मेरे कलेजे का चीरहरण ही कर डालेंगे। मेरा लड्डू तो अपना माथा ही फोड़ने लगा था। मन कर रहा था अभी गौरी को बांहों में लेकर 15-20 चुम्बन उसके गालों और होंठों पर ले लूं।


“हा… हा… इसमें शर्माने वाली क्या बात है?” मैंने हंसते हुए गौरी की ओर देखा।

“आप हल बाल मुझे बातों में फंसा लेते हो? अब मैं आपसे तोई बात नहीं तलूंगी.” गौरी ने मुंह फुलाते हुए उलाहना सा दिया।

“गौरी एक तरफ तुम मुझे अपना मित्र मानती हो और फिर बात-बात में शर्माती भी हो।”


“ऐसी बातों में शल्म नहीं आएगी क्या?”

“तो क्या हुआ? शर्म आएगी तो कौन सी यहाँ रुकने वाली है आकर अपने आप चली जायेगी तुम बेकार क्यों चिंता करती हो?”

फिर हम दोनों हंस पड़े।

अचानक गौरी ने नाक से कुछ सूंघने का सा उपक्रम किया। मैंने भी कुछ जलने की दुर्गन्ध सी महसूस की।

“हे भगवान् … मेला दूध…” कहते हुए गौरी रसोई की ओर भागी। शायद धीमी गैस पर उबलने के लिए रखा दूध किसी दिलजले आशिक की तरह जल गया था।


आज का सबक पूरा हो गया था।


अगले 2-3 दिन भरतपुर में बहुत जोरों की बारिश होती रही। बारिश इंतनी भयंकर थी कि प्रशासन को स्कूल बंद करने के आदेश देने पड़े। अब मधुर की घर रुकने की और मेरी गौरी से बात करने की प्रबल इच्छा होते हुए भी बात ना कर सकने की मजबूरी थी। अलबत्ता हम दोनों इशारों में जरूर एक दूसरे को अपनी मजबूरी दर्शाते रहे।


कई बार मन में आया गौरी से मोबाइल पर ही बात कर लूं पर फिर सोचा कहीं मधुर को इसकी भनक भी लग गई तो इस बार लौड़े नहीं लगेंगे अलबत्ता वो हम दोनों को काटकर कच्चा ही चबा जायेगी।


मेरा सामना जब भी गौरी से होता तो उसकी आँखों में आई चमक और नितम्बों की लचक से मैं इस बात का अंदाज़ा तो लगा ही सकता हूँ कि गौरी भी बात करने के लिए बहुत उत्सुक है पर मधुर के सामने वह ज्यादा बात करने से संकोच कर रही है।


आज 3-4 दिनों के बाद बच्चों के स्कूल दुबारा खुल गए हैं और मधुर स्कूल चली गई है। पिछले 3-4 दिनों में मधुर मुझे भी जल्दी उठा देती है।


सावन के महीने में सुबह-सुबह कितनी प्यारी नींद आती है और देर तक सोने में कितना मज़ा आता है आप समझ सकते हैं पर मधुर को कौन समझाए। वो कहती है ‘आप सुबह जल्दी उठकर योगा और प्राणायाम किया करो।’ साले इस योनिस्वरूपम (चुतिया) योग बाबा की तो माँ की…


आज भी मैं थोड़ा जल्दी उठ गया था। मधुर ने बेडरूम में ही चाय पकड़ा दी थी। आज मैंने कई दिनों बाद पप्पू का मुंडन किया था और तेल लगाकर मालिश भी की थी। बाथरूम से फारिग होकर जब तक मैं बाहर आया तब तक मधुर स्कूल जा चुकी थी।


गौरी तो जैसे मेरा इंतज़ार ही कर रही थी।



]तीन पत्ती गुलाब

भाग-11

आज भी मैं थोड़ा जल्दी उठ गया था। मधुर ने बेडरूम में ही चाय पकड़ा दी थी। आज मैंने कई दिनों बाद पप्पू का मुंडन किया था और तेल लगाकर मालिश भी की थी। बाथरूम से फारिग होकर जब तक मैं बाहर आया तब तक मधुर स्कूल जा चुकी थी।

गौरी तो जैसे मेरा इंतज़ार ही कर रही थी. Click to expand… “गुड मोल्निंग सल” एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ गौरी ने गुड मोर्निंग की।

“वैरी गुड मोर्निंग डार्लिंग!” मैंने गौरी को अपनी पारखी नज़रों से ऊपर से नीचे तक देखा।


आज गौरी ने भूरे रंग की जीन पैंट और टॉप पहना था। शायद आज गौरी ने टॉप के नीचे समीज या ब्रा नहीं पहनी थी तो मेरी निगाहें तो बस उसकी गोल नारंगियों और जीन पैंट में फंसी जाँघों और नितम्बों से हट ही नहीं रही थी।

गौरी मंद-मंद मुस्कुराते हुए मेरी इन हरकतों को देख रही थी।


“गौरी! इस भूरी जीन पैंट में तो तुम पूरी क़यामत लग रही हो यार … खुदा खैर करे!”

“त्यों?” गौरी ने बड़ी अदा के साथ अपनी आँखें तरेरी।

“कोई देख लेगा तो नज़र लग जायेगी.”

“बस-बस झूठी तालीफ़ लहने दीजिये.”


“मैं सच कह रहा हूँ। अगर कोई इन कपड़ों में तुम बाज़ार चली जाओ तो लोग तुम्हारी खूबसूरती को देखकर गश खाकर गिर पड़ेंगे.”

“तो पड़ने दीजिये मुझे त्या?” गौरी ने हँसते हुए कहा।

सुबह-सुबह गौरी को अपनी सुन्दरता की तारीफ़ शायद बहुत अच्छी लगी थी।


“आपते लिए नाश्ता ले आऊँ?”

“अरे यार नाश्ते के अलावा भी तो बहुत से काम होते हैं?”

“वो… त्या होते हैं?”

“अरे बैठो तो सही कितने दिनों से तुम्हारे साथ बात ही नहीं हो पाई।” मैंने गौरी का हाथ पकड़ कर सोफे पर बैठा लिया।

या अल्लाह… कितना नाज़ुक और मुलायम स्पर्श था। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। कमोबेश गौरी की भी यही हालत थी।


“तुम्हारा तो मुझ से बात करने का मन ही नहीं होता?”

“मैं तो बहुत बातें तलना चाहती हूँ पल …”

“पर क्या?”

“वो … दीदी ते सामने तैसे करती? बोलो?”

“हाँ यह बात तो सही है।”

मैंने गौरी का एक हाथ अभी भी अपने हाथ में पकड़ रखा था।


“अरे गौरी?”

“हुम्म?”

“वो… गिफ्ट कैसी लगी तुमने तो बताया ही नहीं?”

“बहुत बढ़िया है। मेरी बहुत दिनों से ऐसी ही घड़ी ती इच्छा थी।”

“देखो मैंने तुम्हारी इच्छा पूरी कर दी और तुमने तो मुझे धन्यवाद भी नहीं दिया?” मैंने हंसते हुए उलाहना दिया।

“थैंत्यू?” गौरी ने थैंक यू की माँ चोद दी।


“कोई ऐसे बेमन से थैंक यू बोलता है क्या?”

“तो?”

मैंने उसके हाथ को पहले तो शेकहैण्ड की मुद्रा में दबाते हुए हिलाया और फिर उसके हाथ को अपने होंठों से चूम लिया।

“ऐसे करते हैं थैंक यू? समझी?” कह कर मैं हंसने लगा।


गौरी तो शर्मा कर गुलज़ार ही हो गई। उसने कुछ बोला तो नहीं पर उसकी तेज होती साँसों के साथ छाती का ऊपर नीचे होता उभार साफ़ महसूस किया जा सकता था। उसकी नारंगियों के कंगूरे तो भाले की नोक की तरह तीखे हो गए थे। मैं चाहता था वह इस चुम्बन को अभी साधारण रूप में ले और असहज महसूस ना करे … इसलिए बातों का सिलसिला अब बदलने की जरूरत थी।


“अरे गौरी! वो… तुम्हारी पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है?

“थीत चल लही है।”

“आजकल मैडम क्या पढ़ा रही हैं?”

“2 दिनों से तो हिंदी पढ़ा लही हैं”

“हिंदी में तो कबीर और रहीम आदि के दोहे वगैरह भी पढ़ाती होंगी?”

“हओ… ये दोहे भी बड़े अजीब से होते हैं पेली बाल (पहली बार) में तो समझ में ही नहीं आते?”

“कैसे?”

“कल दीदी ने मुझे तबील (कबीर) ता एक दोहा पढ़ाया। आपतो सुनाऊँ?”

“हाँ… हाँ… इरशाद!”

‘प्रेम-गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।’


मैं दोहा सुनकर हंसने लगा। और गौरी भी खिलखिला कर हंसने लगी।


हालांकि कबीर ने प्रेम और परमात्मा के बारे में कुछ कहा होगा पर मैं सोच रहा था कि अगर कबीर की जगह कोई प्रेमगुरु होता तो यही लिखता कि ‘एक चूत में दो-दो लंड नहीं समां सकते।’


“ये कबीरजी भी जरूर थोड़े आशिक मिजाज रहे होंगे? कितनी गन्दी बात सिखा रहे हैं.” कह कर मैं जोर जोर से हंसने लगा।

मेरा अंदाज़ा था गौरी फिर शर्मा जायेगी पर आज गौरी ने ना तो ‘हट’ कहा और ना ही शर्माने की कोशिश की।


“अले नहीं … पहले मैं भी यही समझी थी पल बाद में दीदी ने इसता सही अल्थ (अर्थ) समझाया।” अब वह भी हंसने लगी थी। उसे लगा कि मैं भी निरा लोल ही हूँ और शायद उसकी तरह पहली बार में मुझे भी इस दोहे का अर्थ समझ नहीं आया होगा।


“क्या समझाया?”

दीदी ने बताया कि ‘जब हम परमात्मा से सच्चा प्रेम करते हैं तो दोनों का अस्तित्व एक हो जाता है फिर वहाँ दूसरे की संभावना नहीं रहती और द्वेत का भाव (अपने से अलग अस्तित्व होने की अनुभूति) समाप्त हो जाती है।’


अब मैं सोच रहा था जब लंड चूत में जाता है तब भी तो यही होता है। दोनों शरीर और आत्मा एक हो जाते हैं। अब बकोल मधुर आप इसे प्रेम मिलन कहें, सम्भोग कहें या फिर चुदाई या प्रेम गली? क्या फर्क पड़ता है?


“हा… हा… हां… कमाल है। मैं तो कुछ और ही समझा था.” मैंने हंसते हुए यह दर्शाया कि मुझे भी गौरी की तरह इसका अर्थ पहली बार में समझ नहीं आया ताकि उसे हीन भावना की अनुभूति ना हो।

गौरी भी अब तो जोर-जोर से हंसने लगी थी।


दोस्तों अब अगले सबक (सोपान) का उपयुक्त समय आ गया था।


मैंने गौरी का हाथ अभी भी अपने हाथ में ले रखा था। हे भगवान्! उसकी नाजुक अंगुलियाँ कितनी लम्बी और पतली हैं अगर इन अँगुलियों से वह मेरे पप्पू को पकड़ कर हिलाए तो आसमान की बजाये जन्नत यहीं उतर आये।


“अरे गौरी!”

“हओ?”

“तुम्हारे हाथ पर तो तिल है?” मैंने उसकी दांयी कलाई गौर से देखते हुए कहा।

“तिल होने से त्या होया है?” गौरी ने हैरानी भरे अंदाज़ में पूछा।

“अरे भाग्यशाली व्यक्ति के हाथ पर या कलाई पर तिल होता है।”

“अच्छा?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।


“हाँ… मैं सच कह रहा हूँ ऐसे जातक बहुत ही धनवान, साहसी और खूब खर्चीले होते हैं उनके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं।”

“पल मेले पास पैसे और धन-दौलत तहां है?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखते हुए कहा जैसे मेरी बात पर उसे यकीन ही नहीं हुआ हो।

“अरे! भगवान ने तुम्हें खूबसूरत हुश्न की कितनी बड़ी दौलत दी है और तुम बोलती हो मेरे पास धन और दौलत नहीं है?”

“प… ल…” उसे अब कुछ-कुछ विश्वास होने लगा था।


“एक और बात है… लड़कियों का भाग्य 18 साल के बाद बदल जाता है। अच्छा बताओ तुम्हारी जन्म तिथि क्या है?”

“जन्म तिथि तो पता नहीं पल मैं 18 ती हो गयी हूँ। मम्मी बताती हैं ति मेला जन्म नवलात्लों (नवरात्रों में गौरीपूजन के दिन) में हुआ था इसीलिए मेला नाम गौली लखा है।”

“यही तो मैं बोल रहा हूँ? देखो अब तुम्हारा भाग्य भी बदलने शुरुआत हो चुकी है।”


गौरी अब कुछ सोचने लग गई थी। शायद उसे अब लगने लगा था कि यहाँ आने के बाद उसकी तकदीर बदल जाने वाली है। यहाँ आने के बाद मैंने उसे जो सुनहरे सपने देखने सिखाए थे उन्हें अब वह हकीकत (मूर्त रूप) में देखने लगी है।

“आपको हाथ भी देखना आता है?”

“हओ, ज्यादा तो नहीं पर मोटी-मोटी बातें तो बता सकता हूँ.”


“मेला भी हाथ देखतल बताओ ना प्लीज?” गौरी अब अपने भविष्य जानने के लिए बहुत उत्सुक नज़र आने लगी थी।

“ऐसे नहीं, तुम दूर बैठी हो ऐसे में हाथ देखने में थोड़ी असुविधा होगी. तुम मेरे साथ ही सोफे पर इधर ही बैठ जाओ, फिर तसल्ली से हाथ देखता हूँ।”


गौरी कुछ सोचते और सकुचाते हुए मेरे पास बगल में सोफे पर बैठ गई। बाहर सावन की बारिश की हल्की फुहारे पड़ रही थी और यहाँ उसके कुंवारे बदन से आती खुशबू तो मुझे अन्दर तक हवा के शीतल झोंके की तरह मदहोश करती जा रही थी। उसकी एक जांघ मेरे पैर से छू रही थी। लंड तो चूत और गांड की खुशबू पाकर जैसे पाजामें में कोहराम ही मचाने लगा था और गौरी किसी हसीन सपने में जैसे खो सी गई थी।


“अरे वाह…” मैंने अँगुलियों से उसके हाथ को पकड़ते हुए उसके हाथ की लकीरों को बड़े गौर से देखते हुए कहा।

“त्या हुआ?”

“भई कमाल की रेखाएं हैं तुम्हारे हाथ में?” मैंने थोड़ा संशय बरकरार रखते हुए कहा।

अब तो गौरी की उत्सुकता और भी बढ़ गई।


मेरा अंदाजा है मधुर ने भी उसका हाथ और तिल देख कर उसे जरूर कुछ बताया होगा पर शायद गौरी अब उन बातों की तस्दीक (पुष्टि) कर लेना चाहती होगी।


वैसे गौरी के हाथ की रेखाएं ठीक-ठाक ही थी। शुक्र पर्वत उभरा हुआ था और कनिष्का अंगुली के नीचे दो स्पष्ट रेखाएं नज़र आ रही थी। इसका मतलब इसके जीवन में दो से अधिक पुरुषों का योग है और साथ ही चुदाई का खूब मज़ा मिलने वाला है। भाग्य रेखा भी ठीक-ठाक लग रही थी। विद्या की रेखा कुछ ख़ास नहीं थी पर मुझे तो उसे प्रभावित करना था।


“ओहो… बताओ ना प्लीज?” गौरी ने आजकल ‘प्लीज’ भी बोलना सीख लिया है।

“देखो यह जो अंगूठे के नीचे दो लाइनें बनी हैं उसका मतलब है तुम्हें दो संतान होंगी और पहली संतान लड़का ही होगा और बहुत सुन्दर।”

“औल…” गौरी थोड़ा शर्मा सी गई पर उसने ज्यादा कुछ नहीं बोला।


“और ये को अंगूठे के नीचे हथेली की ओर का उभरा हुआ सा भाग है ना?”

“हओ?”

मैं बोलने तो वाला था कि ‘अपने जीवन में तुम्हारी आगे और पीछे दोनों तरफ से खूब जमकर ठुकाई होने वाली है.’ पर प्रत्यक्षतः मैंने इसे घुमा फिरा कर कहना लाज़मी समझा “यह दर्शाता है कि तुम्हें बहुत प्रेम करने वाला पति या प्रेमी मिलेगा.”


ईईइस्स्स्स … अब तो गौरी मारे शर्म के दोहरी ही हो गई। उसके चहरे पर एक चमक सी आ गई थी।


“और हथेली पर यह जो रेखा है ना सबसे ऊपर वाली?”

“हओ?”

“इसे हृदय रेखा कहते हैं। यह बताती है कि तुम बहुत साहसी और मजबूत हृदय की हो। तुम बहुत सोच समझ कर अपना निर्णय लेने में सक्षम हो। और यह रेखा इस बात का भी इशारा करती है कि तुम किसी का दिल कभी नहीं दुखा सकती। तुम एकबार जिसे अपना बना लेती हो उसकी हर बात भी मानती हो और हर तरह से सहायता भी करती हो। बस एकबार सोच लिया कि यह काम करना है तो फिर तुम किसी की नहीं सुनती.” मुझे दबंग फिल्म वाला डायलाग (संवाद) ‘मैंने एक बार कमिटमेंट कर लिया तो फिर मैं अपने आप की भी नहीं सुनता’ चिपका दिया।


“हाँ यह बात तो सही है।” गौरी को अब मेरी बातों पर यकीन होना शुरू हो गया था।

उसकी आँखों की चमक से तो यही जाहिर हो रहा था। मेरा अंदाज़ा है शायद मधुर ने भी उसे थोड़ा बहुत इसी तरह का जरूर कुछ बताया होगा।


मेरी एक जांघ अब उसकी जांघ से बिलकुल सटी थी। हाथ देखने के बहाने मेरा हाथ कई बार उसकी जाँघों को भी छू जाता था। एक दो बार तो उसकी सु-सु के ऊपर भी लग गया था। मेरे ऐसा करने से गौरी ने अपनी एक जांघ को दूसरी के ऊपर रख लिया था। चूत गर्मी और खुशबू से पप्पू तो दहाड़ें ही मारने लगा था।


बार-बार मेरी नज़र उसके खुले बटनों वाली शर्ट के अन्दर छुपे उस खजाने की ओर बरबस खिंची चली जा रही थी जहां उसने दो कलसों में अमृत छिपा रखा था। जब वह थोड़ा सा झुकती है तो कंगूरों को छोड़कर पूरा खजाना ही नुमाया हो जाता है।

हे लिंग देव! इसके एक उरोज के ऊपर तो एक तिल भी है। याल्लाह… कितनी मादकता भरी है इन अमृत कलसों में। अगर एक बार इनका रस पीने मिल जाए तो आदमी मदहोश ही हो जाए। मैं तो उसकी गोलाइयों की घाटियों में जैसे डूब सा गया था।


“हुम्… ओल?”

मैं गौरी की आवाज से चौंका।

“और हाँ… गौरी ये जो तुम्हारी कलाई पर तिल है ना?”

“हओ?”

“इसका मतलब है धन-दौलत की तुम्हारे पास कभी कोई कमी नहीं आएगी और तुम जी भर के अपनी सारी इच्छाओं को पूरा करोगी। ऐसी स्त्री जातक पुत्रवान, सौभाग्यवती, धार्मिक व दयालु प्रवृति की होती हैं।”

“त्या पता?”

“अरे तुम्हें मेरी बातों पर यकीन नहीं हो रहा ना?”

“नहीं… वो… बात नहीं है?”

“तो…?”

“मैं सोच लही हूँ मैं इतनी भाग्यशाली तैसे हो सतती हूँ?”

“अच्छा तुम एक बात और बताओ?”

“त्या?”

तुम्हारे और कहाँ-कहाँ तिल हैं?”

“एक तो मेली ठोडी पल है.”


“वो तो दिख ही रहा है। इसीलिए तो तुम फ़िल्मी हिरोइन की तरह इतनी खूबसूरत हो। जिस स्त्री जातक की ठोड़ी पर तिल होता है वह खूबसूरत होने के साथ बहुत ही ईमानदार और स्पष्टवादी होती है और वह किसी का दिल तो तोड़ ही नहीं सकती। एक और बात है वह जातक बहुत शर्मीली होती है और उसे आम भाषा में लाजवंती स्त्री कहते हैं।” मैंने हंसते हुए कहा।


अब तो गौरी का रूप गर्विता बनना लाज़मी था।

“मेले पैल पल भी एक तिल है।”

“पैर पर कहाँ? निश्चित जगह बताओ?”

“वो… वो… घुटने से थोड़ा ऊपल”

“जांघ पर है क्या?”

“हओ” गौरी ने शर्माते हुए हामी भरी।

“मुझे पता था.”


“आपतो तैसे पता? दीदी ने बताया?” गौरी ने चौंकते हुए पूछा।

“अरे नहीं यार… जिन खूबसूरत लड़कियों की ठोड़ी या होंठों के ऊपर तिल होता है उनके गुप्तांगों के आस-पास या जांघ पर भी तिल जरूर होता है।” मैंने हंसते हुए कहा। कोई और मौक़ा होता तो गौरी जरूर शर्मा कर रसोई या अपने कमरे में भाग जाती पर आज वो थोड़ा शर्माते हुए भी वही बैठी रही।


मैंने अपनी बात चालू रखी- जिस स्त्री के गुप्तांगों के पास दायीं ओर तिल हो तो वह राजा अथवा उच्चाधिकारी की पत्नी होती हैं जिसका पुत्र भी आगे चलकर अच्छा पद प्राप्त करता है।


तीन पत्ती गुलाब़

भाग -12

सच्ची? आप झूठ तो नहीं बोल रहे ना?”

“किच्च! तुम्हारी कसम मैं सच बोल रहा हूँ। अगर तुम्हें यकीन ना हो तो तुम यू ट्यूब पर देख लेना उसमें तो हर प्रश्न का सही उत्तर मिल जाता है।”

“अच्छा?”

“हाँ पर कोई ऐसे-वैसे सवाल मत सर्च कर लेना?” मैंने हँसते हुए कहा।

“हट!” गौरी फिर शर्मा गई।

“अच्छा और कहाँ हैं?”

“मेले दायें दूद्दू (उरोज) पर भी एक तिल है।” उसने शर्माते हुए बताया।

“हे भगवान्!”

“अब त्या हुआ?” गौरी ने चौंक कर पूछा।

“ऐसा लगता है भगवान् ने तुम्हारा भाग्य खुद फुर्सत में अपने हाथों से लिखा है। अब तुम यकीन करो या ना करो पर यह बात सोलह आने सच है।”

“हुम्म” गौरी को अब भी पूरा यकीन तो नहीं हो रहा था पर मेरी प्रस्तुति इस प्रकार की थी कि उसे ना चाहते हुए भी यकीन करना पड़ रहा था।


“अच्छा गौरी एक काम करो?”

“त्या?”

“पर… छोड़ो तुमसे नहीं हो सकेगा?”

“त्या? प्लीज बताओ ना?”

“भई मैं बता तो सकता हूँ पर तुम्हें शर्म बहुत आती है? इसीलिए कहता हूँ तुम नहीं कर पाओगी? रहने दो.” मैंने उसकी उत्सुकता और बढ़ा दी।

“नहीं मैं तल लुंगी आप बताओ”

“शरमाओगी तो नहीं ना?”

“किच्च”

“अच्छा खाओ मेरी कसम?”

“तिस बात ते लिए?”

“कि तुम शरमाओगी नहीं और जैसा मैं बोलूंगा करोगी?” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।

“थीत है।”

“देखो अब शर्माना मत? तुमने मेरी कसम खाई है?”

“हओ”


“वो… जो… तुम्हारे दूद्दू पर तिल है ना?”

“हओ?”

“वो मुझे एक बार दिखाओ … ताकि मैं तिल की सही स्थिति सकूं और फिर तुम्हें उसका सटीक रहस्य बता सकूं।”

“हट!”

“देखो मैंने बोला था ना तुम से नहीं होगा.”

“ओह… पल उसमें तो मुझे बड़ी शल्म आयगी?”


“इसमें शर्म की क्या बात है? क्या तुम कपड़े बदलते समय या नहाते समय इनको नंगा नहीं करती?”

“पल बाथलूम में कोई देखने वाला थोड़े ही होता है?”

“क्यों? वहाँ मक्खी, मच्छर, छिपकली या तिलचट्टे तो देख ही लेते हैं?”

“हा… हां… वो… कोई आदमी थोड़े ही होते हैं?”

“अच्छा जी! दूसरे भले ही कोई देख लें पर दुश्मनी तो हमसे ही लगती है?”

“इसमें दुश्मनी ती त्या बात है?”

“और क्या? एक तरफ दोस्त कहती हो, दोस्त की कसम भी खाती हो और फिर बात भी नहीं मानती?


“वो… वो…” गौरी असमंजस में थी। उसे तिल का रहस्य भी जानना था पर शर्म भी महसूस कर रही थी। मेरा जाल इतना सटीक था कि अब उससे बचकर निकलना गौरी के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।

“तुम यह सोच रही हो ना इसके लिए दूद्दू (बूब्स) को नंगा करना होगा?”

“हओ?”

“तुम एक काम करो?

“?” गौरी ने मेरी ओर प्रश्न वाचक दृष्टि से देखा।

“तुम यह टॉप उतार देना और अपने दूद्दू के कंगूरों को ढक लेना बस। फिर तो शर्म नहीं आएगी ना?”


गौरी कुछ सोचे जा रही थी। उसका का संशय अब भी बरकरार था।

“तुम शायद यह सोच रही हो कि कपड़े उतार कर नंगा होने से पाप भी लगेगा?”

“हओ” गौरी ने कातर (असहाय) नज़रों से मेरी ओर ताका।


“देखो! मधुर ने इसीलिए तो तुम्हारे पैर पर काला धागा बांधा है कि सारे कपड़े उतारने के बाद भी पाप ना लगे? और तुम्हें तो सिर्फ टॉप उतार कर केवल बूब्स पर बना तिल ही दिखाना है तो फिर पाप लगने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.”

“पल…?” गौरी मेरे प्रस्ताव को स्वीकारने के बारे सोचने लगी थी।

“देखो कोई जबरदस्ती तो है नहीं। चलो… जाने दो। मैं जानता था तुम शर्म का बहाना जरूर बनाओगी?” मैंने ठंडी सांस लेते हुए मायूस लहजे में कहा।

“नहीं… बहाने वाली बात नहीं है?”

“और क्या बात हो सकती है?”

“वो… वो…?”


“ठीक है भई! हमारी किस्मत और औकात तो अब कीड़े, मकोड़े और मच्छरों से भी गई बीती हो गई है।”

“आप ऐसा त्यों बोलते हो?”

“हम तो चलो गैर ठहरे … पर तुम तो अपनी गुरु की बात भी नहीं मानती?”

“तौन गुलू?” (कौन गुरु?)

“तुम मधुर को अपनी दीदी और गुरु मानती हो ना?”

“हओ”


“मधुर ने भी तुम्हें कई बार समझाया है ना कि ज्यादा शर्म नहीं करनी चाहिए?”

“हओ”

“और तुम अपने गुरु की बात मानने से इनकार कर रही हो? पता है ऐसे आदमी के साथ क्या होता है?”

“त्या होता है?”

“वो मरने के बाद भूत बन जाता है।”

“नहीं… आप मज़ात तल लहे हैं?”

“नहीं मैं बिलकुल सच बोल रहा हूँ।”

“पल मैं तो आदमी थोड़े ही हूँ मैं तो लड़ती (लड़की) हूँ?”

“तो फिर तुम भूत की जगह भूतनी बन जाओगी या फिर उलटे पैरों वाली चुड़ैल!” मैंने हँसते हुए कहा।


“ओहो… आपने फिल मुझे फंसा लिया?”

“तुम्हारी मर्ज़ी। तुम्हें उलटे पैरों वाली भूतनी बनाना है तो कोई बात नहीं मत दिखाओ? मेरा क्या है तुम्हें भूतनी या चुड़ैल बनकर उलटे पाँव चलने में बहुत मज़ा आएगा?”

“हे माता रानी! … आपने मुझे तहां फंसा दिया।” गौरी अब हाँ… ना… के फेर में उलझ गई थी। अब उसके लिए मेरी बात मान लेने के अलावा कोई और रास्ता ही कहाँ बचा था।


“ओह … पल … आपतो ऑफिस में देल हो जायेगी मैं बाद में दिखा दूंगी … प्लीज!” गौरी बेबस (कातर) नज़रों से मेरी ओर ऐसे देख रही थी जैसे कोई मासूम हिरनी जाल में फंसने के बाद शिकारी को देख रही हो या फिर कोई निरीह जानवर हलाल होने से पहले कसाई की ओर देखता है।


“अरे तुम ऑफिस की चिंता मत करो. मैं आज वैसे भी ऑफिस में लेट जाऊँगा।”

“ओह… त्या आप बिना टॉप उतारे नहीं देख सतते? … प्लीज उपल से ही देख लो?” गौरी ने बचने का अंतिम प्रयास किया।

“बिना टॉप उतारे तिल दिखेगा कैसे और और बिना दिखे सही अंदाज़ा कैसे होगा?”

“ओह…” उसका चेहरा रोने जैसा हो गया था। उसकी कनपटियों और माथे पर हल्का पसीना सा आने लगा था। उसके साँसें भी बहुत तेज हो चली थी और छाती का ऊपर नीचे होता उभार किसी नदी में हिचकोले खाती नाव की तरह हो रहा था।


“गौरी! प्लीज दिखा दो ना बस एक बार… प्लीज… क्या तुम्हें ज़रा भी दया नहीं आती? कितनी कठोर हृदय बन गई हो?”

गौरी थोड़ी देर कुछ सोचती सी रही और फिर बाद में उसने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा “अच्छा आप आँखें बंद कलो” गौरी ने आखिर हार मान ही ली।

मैंने किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह झट से अपनी दोनों आँखें बंद कर ली।


अथ श्री वक्षस्थल: दर्शनम् तृतीय सोपान शुभारंभ!!

दोस्तो! दिल थाम के रखिये अब आलिंगन और चुम्बन के बाद वक्षस्थल के दर्शन और चूसन का तीसरा सोपान शुरू होने वाला है…


गौरी ने धीरे-धीरे अपना टॉप उतारना शुरू किया।


मैंने अपनी आँख हल्की सी खोली…


सबसे पहले उसकी भूरी पैंट में कैद कमर और नितम्बों के ऊपर उसका पेट और नाभि नज़र आई। मेरा लंड तो जैसे बिगडैल बच्चे (उद्दंड बालक) की तरह बेकाबू ही हो गया था। बार-बार ठुमके लगा-लगा कर नाचने लगा था। इतना सख्त हो गया था कि मुझे लगने लगा कहीं इसका सुपारा फट ही ना जाए।


मेरी साँसें तो जैसे बेकाबू सी होने लगी, कानों में सांय सांय सी होने लगी और दिल इस कदर जो-जोर से धड़क रहा था कि मुझे तो वहम सा होने लगा कि कहीं मेरे दिल की धड़कनें मेरा साथ ही ना छोड़ दें।


हे भगवान्! क्या कमाल की कारीगरी की है तुमने? पतली कमर और उभरे से पेडू के ऊपर गोल गहरी नाभि और उसके ऊपर एक जोड़ी गुलाबी नारंगियाँ। दो रुपये के सिक्के जितना कत्थई रंग का एरोला और ठीक उनके बीच में किसमिस के दाने जितने गुलाबी कंगूरे। कंगूरे तो तनकर भाले की नोक की तरह ऐसे खड़े हो गए थे जैसे किसी खजाने का रक्षक किसी घुसपैठिये की आशंका में सतर्क हो जाता है। और दायें उरोज के कंगूरे के एक इंच के फासले पर किसी सौतन की तरह एक काला सा तिल जिसे तिल के बजाये कातिल कहना ज्यादा मुनासिब (उपयुक्त) होगा।


गौरी ने अपना टॉप उतार कर पास के सोफे पर रख दिया। उसके शर्म के मारे अपनी दोनों हथेलियाँ अपनी बंद आँखों पर रख ली। याल्लाह … उसकी कांख में तो बाल तो क्या एक रोयां भी नहीं था। साफ़ सुथरी मुलायम चिकनी रोम विहीन कांख। लगता है सरकार का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ हर जगह सफलता पूर्वक काम कर रहा है।


उसके कुंवारे अनछुए कौमार्य की निकलती तीखी गंध किसी को भी मतवाला कर दे। उसकी साँसें बहुत तेज़ चल रही थी और मैं तो बस उसकी साँसों के साथ उसके उरोजों के उतार चढ़ाव में ही जैसे खो सा गया।

एक कमसिन अक्षत कौमार्य लगभग अर्धनग्न अवस्था में मेरे आगोश में बैठा जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रहा हो।


उफ्फ… पसलियों पर से सुंदर गोल उठान लिए हुए एक जोड़ी सुडौल रस कूप जिनके अग्र भाग में गुलाबी रंग के पेंसिल की नोक की तरह कंगूरे ऐसे लग रहे थे जैसे गुस्से में नाक फुलाए हों। दोनों गोल पहाड़ियों के बीच की चौड़ी सुरम्य घाटी तो ऐसे लग रही थी जैसे कोई बलखाती नदी अभी इनके बीच से बाद निकलेगी।


मैं तो बस इसे मंत्रमुग्ध होकर देखता ही रह गया। मुझे तो अपनी किस्मत पर जैसे रश्क होने लगा। मैं सच कहता हूँ मुझे तो ऐसा लगने लगा था जैसे मेरी सिमरन ही साक्षात मेरे सामने आ गई है और कह रही है ‘ऐसे क्या देख रहे हो? इन्हें प्रेम नहीं करोगे?’


गौरी लाज से सिमटी मेरी बगल में बैठी थी। उसकी आँखें अब भी बंद थी। उसके मासूम चेहरे को देख कर एक पल के लिए तो मेरे मन में ख्याल आया कहीं मैं यह सब गलत तो नहीं कर रहा? पर मेरे सभी साथी (आँखें, हाथ, नाक, होंठ, लंड, दिल, दिमाग) भला मेरी अब कहाँ सुनने वाले थे। और फिर दूसरे ही पल मेरा यह ख्याल हवा के झोंके की मानिंद फिजा में काफूर (गुम) हो गया।< मैंने एक हाथ उसके सिर के पीछे किया और दूसरे हाथ से उसके एक उरोज को बस हौले से स्पर्श कर दिया। एक नाज़ुक और रेशमी अहसास से मैं सराबोर हो गया। स्पंज की तरह कोमल गोल तरासे हुए उरोज… उफ्फ्फ्फ़… गौरी के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी। उसका शरीर हल्का सा कांपा और बंद होंठ लरजने से लगे। उसकी साँसें बहुत तेज हो गई और उसने अपनी जांघें जोर से भींच ली। उसके उरोजों के कंगूरे (घुन्डियाँ) किसी नादान और शरारती बच्चे की तरह कभी अपना सिर ऊपर उठाते कभी झुक से जाते। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि पंखे की आवाज के बावजूद भी मैं साफ़ सुन सकता था। एक सरसों के दाने के बराबर वो कातिल तिल ठीक ऐसा ही था जैसा उसकी ठोड़ी पर बना था। याल्लाह … उसकी सु-सु के गुलाबी पपोटों के पास भी ऐसा ही तिल कितना हसीन और कातिल होगा यह सोचकर ही मेरा लंड तो किलकारियाँ ही मारने लगा। मेरे कानों में सीटियाँ सी बजने लगी। यह उत्तेजना की चरम सीमा थी जिसे बर्दाश्त करना अब मेरे बस में नहीं था। मैंने इतनी उत्तेजना तो अपनी सुहागरात में भी अनुभव नहीं की थी। मैंने गौरी के दूसरे उरोज के कंगूरे पर अपनी अंगुलियाँ फिराई। गौरी के शरीर ने एक झटका सा खाया। मैंने धीरे से आगे बढ़ कर अपनी जीभ उसके दायें उरोज के कंगूरे पर रख दी। मेरी गीली नर्म जीभ का स्पर्श पाते ही उत्तेजना के मारे गौरी की हल्की चीख सी निकल गई- ईईईईईईई… यह चीख दर्द भरी नहीं थी बल्कि आनंद से भरी थी। गौरी का शरीर कुछ अकड़ सा गया और उसने मेरी तरफ घुमते हुए मेरा सिर अपनी छाती से भींच लिया। उसके बेकाबू होती साँसें मेरे सिर पर महसूस होने लगी थी। अब मैंने उसके एक उरोज को अपने मुंह में भर लिया और एक जोर की चुस्की लगाईं- सल … मुझे कुछ हो लहा है … आआईईई… मैं… मल जाउंगी सल! मैंने अपना दायाँ हाथ उसके नितम्बों पर फिराया। हे भगवान! पैंट में कसे हुए उसके नितम्ब तो लगता था आज और भी ज्यादा कठोर और भारी हो गए हैं। गौरी उत्तेजना के मारे उछलने सी लगी थी। वह लगभग मेरी गोद में आ गई थी। मैंने अपना हाथ उसकी नंगी पीठ और कमर पर फिराया और फिर दूसरे उरोज को अपने हाथ में पकड़कर हौले से दबाया। और फिर मैंने एक उरोज के चूचुक (कंगूरे) को अपने मुंह में लेकर पहले तो चूसा और फिर उसके अग्रभाग को हौले से अपने दांतों से दबाया। मेरे ऐसा करने से गौरी ने और जोर से मुझे भींच लिया। मेरे जीवन के ये स्वर्णिम पल थे। पिछले 1 महीने से जिस कमसिन सौंदर्य को पाने की मैंने कामना और कल्पना की थी आज वो हसीन ख्वाब जैसे हकीकत बनने जा रहा था। रुई के नर्म फोहे जैसे नर्म मुलायम गुदाज़ गोल नारंगियों जैसे रसकूपों के अहसास ने मेरी उत्तेजना को अपने चरम पर पहुंचा दिया था। मेरी उत्तेजना का आलम यह था कि मैं किसी भी तरह गौरी को आज ही और अभी पूर्णरूप से पा लेना चाहता था। गौरी के बदन ने एक झटका सा खाया और उसने अचानक मुझे अपनी बांहों से थोड़ा अलग किया और थोड़ा नीचे होकर मेरे होंठों को बेतहाशा चूमने लगी। संतरे की फांकों जैसे रसीले होंठों का यह रेशमी स्पर्श अब मेरे होंठों के लिए अनजाना कहाँ था। गौरी की साँसें उखड़ने सी लगी थी और उसके मुंह से पहले तो गूं … गूं … की आवाज सी निकली और फिर एक मीठी किलकारी के साथ वह मेरी बांहों में झूल गई और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी। शायद उसने अपने जीवन का प्रथम सुन्दरतम ओर्गस्म (परम कामोत्तेजना का आनंद) प्राप्त कर लिया था। मैंने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसके होंठों, गालों, गले, उरोजों और उनके बीच की घाटी पर बेतहासा चुम्बन लेने शुरू कर दिए। और फिर … जैसे ही मैंने उसके नितम्बों और जाँघों के संधि स्थल पर हाथ फिराने की कोशिश की … अचानक मेरी आँखों के तारे से चमकने लगे और मुझे अपने लिंग में भारी तनाव और भारीपन सा महसूस होने लगा। जैसे एक लावे का सैलाब (गुबार) सा मेरे शरीर में उठने लगा है और फिर… पिछले 15 दिनों से आजादी की जंग लड़ता हिन्दुस्तान आजाद हो गया। मेरा बहादुर वीरगति को प्राप्त हो गया। गौरी अचानक मेरी बांहों से अलग होकर अपना टॉप उठाते हुए बाथरूम की ओर भाग गई। मेरी हालत राहुल गांधी की तरह हो गई थी जैसे मैं भी अमेठी की तरह चुनाव हार गया हूँ। इसे कहते हैं खड़े लंड पे धोखा। दोस्ती! आज तो लौड़े लगे नहीं बल्कि पूरे ही झड़ गए थे। पर मुझे अपनी इस हार का कोई गम नहीं था क्योंकि वायनाड तो अभी बाकी था। और फिर मैं भी अशांत और बुझे मन से नहीं बल्कि एक नई आशा और विश्वास के साथ कपड़े बदलने बाथरूम में चला गया। अथ श्री वक्षस्थल: दर्शनम् सोपान इति!! कहानी जारी रहेnd Reply

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RE: Sex Vasna चोरी का माल

तीन पत्ती गुलाब

भाग-13

मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ!

एक शेर मुलाहिजा फरमाएं:


वो हमारे सपनों में आये और स्वप्नदोष हो गया।

उनकी इज्जत रह गई और हमारा काम हो गया।


मैं जानता हूँ मेरे पप्पू के चुनाव हार जाने और शीघ्र वीरगति को प्राप्त होने का समाचार सुनकर आपको बहुत गहरा सदमा लगा होगा।


आप लोगों ने कामुक कहानियों में अक्सर पढ़ा होगा कि ऐसी स्थिति में नायिका या प्रेमिका सेक्स के लिए तुरंत राजी हो जाती है और फिर नायक अपनी प्रेमिका के साथ घंटों सम्भोग करता है। और दोनों की पूर्ण संतुष्टि के बाद ही सारा ड्रामा ख़त्म होता है।


पर दोस्तो! ये सब बातें केवल किस्से-कहानियों में ही संभव होती हैं। वास्तविक जीवन में यह सब इतना जल्दी और आसान नहीं होता।


खैर आप निराश ना हों। आप सभी तो बड़े अनुभवी और गुणी है और यह भी जानते हैं कि ‘मेरा पप्पू जब एक बार कमिटमेंट कर लेता है तो फिर वह अपने आप की भी नहीं सुनता।’

पर सयाने कहते हैं वक़्त से पहले और मुक्कदर से ज्यादा कभी नहीं मिलता। बस थोड़ा सा इंतजार और हौसला रखिये शीघ्र ही आपको खुशखबरी मिलेगी।


वैसे देखा जाए तो एक तरह से यह सब अच्छा ही हुआ। आप को हैरानी हो रही है ना? मैं समझाता हूँ। गौरी उस समय उत्तेजना के उच्चतम शिखर पर पहुंची अपना सब कुछ लुटाने के लिए मेरे आगोश में लिपटी थी।

यकीनन मेरी एक मनुहार पर वो सहर्ष अपना कौमार्य मुझे सौम्प देती। पर ज़रा सोचिये इतनी जल्दबाजी में क्या उसे कोई आनन्द की अनुभूति हो पाती?


पता नहीं उसने अपने प्रथम शारीरिक मिलन (सम्भोग) को लेकर कितने हसीन ख्वाब देखे होंगे? क्या वो इतनी जल्दबाजी में पूरे हो पाते? मैं चाहता था वो जिन्दगी के इस चिर प्रतीक्षित पल का इतना आनन्दमयी ढंग भोग करे कि उसे यह लम्हा ताउम्र एक रोमांच में डुबोये रखे।


निश्चित रूप से मैं यह चाहता था कि उसे अपने इस प्रथम मिलन और अपने कौमार्य खोने के ऊपर कोई शंका, गम, पश्चाताप, ग्लानि या अपराधबोध ना हो। उसके मन में रत्ती भर भी यह संभावना नहीं रहे कि उसके साथ कहीं कोई छल किया गया है। मैं तो चाहता हूँ वह भी इस नैसर्गिक क्रिया का उतना ही आनन्द उठाये जितना इस कायनात (सृष्टि) के बनने के बाद एक प्रेमी और प्रेमिका, एक पति और पत्नी और एक नर और मादा उठाते आ रहे हैं।


दोस्तो! सम्भोग या चुदाई तो प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति है? उसके बाद तो सब कुछ एक नित्यकर्म बन जाता है। और इस अंतिम सोपान से पहले अभी तो बहुत से सोपान (सबक) बाकी रह गए हैं। अभी तो केवल तीन सबक ही पूरे हुए हैं अभी तो लिंग और योनि दर्शन-चूषण बाकी हैं और बकोल मधुर प्रेम मिलन और स्वर्ग के दूसरे द्वार का उदघाटन समारोह को तो बाद में संपन्न किया जाता है ना?


तो आइए अब लिंग दर्शन और वीर्यपान अभियान का अगला सोपान शुरू करते हैं.


सयाने कहते हैं जीवन, मरण और परण भगवान् के हाथ होते हैं। पर साली यह जिन्दगी भी झांटों की तरह उलझी ही रहती है। साले इन पब्लिक स्कूल वालों के नाटक भी बड़े अजीब होते हैं। इनको तो बस छुट्टी का बहाना चाहिए होता है। अब मधुर के स्कूल के प्रिंसिपल की वृद्ध माता के देहांत का स्कूल के बच्चों की छुट्टी से क्या सम्बन्ध है? स्कूल ने एक दिन की छुट्टी कर दी थी और अगले दिन रविवार था।

गौरी से 2 दिन बात करना संभव ही नहीं हो पाया। मैंने महसूस किया गौरी कुछ चुप-चुप सी है और मुझ से नज़रें भी नहीं मिला रही है।


आज लिंग देव का दिन है। मेरा मतलब सोमवार है। अब आप इसे श्रद्धा कहें, आस्था कहें, भक्ति कहें या फिर मजबूरी कहें मैं भी सावन में सोमवार का व्रत जरूर रखता हूँ। और इस बार तो मधुर ने विशेष रूप से सोमवार के व्रत रखने के लिए मुझे कहा भी है। अब भला मधुर की हुक्मउदूली (अवज्ञा) करने की हिम्मत और जोखिम मैं कैसे उठा सकता हूँ?

एक और भी बात है … क्या पता इस बहाने लिंग देव प्रसन्न हो जाएँ और मुश्किल घड़ी में कभी कोई सहायता ही कर दें?


मैं आज लिंग देव के दर्शन करने तो नहीं गया पर स्नान के बाद घर में बने मंदिर में ही हाथ जोड़ लिए थे।


गौरी आज चाय के बजाय एक गिलास में गर्म दूध और केले ले आई थी। मैंने महसूस किया गौरी आज भी कुछ गंभीर सी लग रही है।

हे लिंग देव !!! कहीं फिर से लौड़े तो नहीं लगा दोगे?


मैं उससे बात करने का कोई उपयुक्त अवसर ढूंढ ही रहा था।

वह दूध का गिलास और प्लेट में रखे दो केले टेबल पर रखकर मुड़ने ही वाली थी तो मैंने उससे पूछा- गौरी! आज चाय नहीं बनाई क्या?

“आज सोमवाल है.”

“ओह… तुमने चाय पी या नहीं?”

“किच्च”

“क्यों? तुमने क्यों नहीं पी?”

“मैंने भी व्लत (व्रत) लखा है।”


“अच्छा बैठो तो सही?”

गौरी बिना कुछ बोले मुंह सा फुलाए पास वाले सोफे पर बैठ गई। माहौल थोड़ा संजीदा (गंभीर) सा लग रहा था।

“गौरी क्या बात है? आज तुम उदास सी लग रही हो?”

“किच्च” गौरी ने ना बोलने के चिर परिचित अंदाज़ में अपनी मुंडी हिलाई अलबत्ता उसने अपनी मुंडी झुकाए ही रखी।


“गौरी जरूर कोई बात तो है। अब अगर तुम इस तरह उदास रहोगी या बात नहीं करोगी तो मेरा भी मन ऑफिस में या किसी भी काम में नहीं मिलेगा। प्लीज बताओ ना?”

“आपने मेले साथ चीटिंग ती?”

“अरे … कब?” मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा।

“वो पलसों?”


लग गए लौड़े!!! भेनचोद ये किस्मत भी लौड़े हाथ में ही लिए फिरती है। इतनी मुश्किल से चिड़िया जाल में फंसी थी अब लगता है उड़न छू हो जायेगी और मैं जिन्दगीभर इसकी याद में मुट्ठ मारता रह जाउंगा। अब किसी तरह हाथ में आई मछली को फिसलने से बचाना जरूरी था। अब तो किसी भी तरह स्थिति को संभालने के लिए आख़िरी कोशिश करना लाजमी था।


मैंने अपना गला खंखारते हुए कहा- ओह … वो … दरअसल गौरी मैं थोड़ा भावनाओं में बह गया था। मैं सच कहता हूँ गौरी तुम्हारे बदन की खूबसूरती देख कर मैं अपने होश ही खो बैठा था? पर देखो मैंने कोई बद्तमीजी (अभद्रता) तो की ही नहीं थी?

“आप तो बस मेले दूद्दू ही देखते लहे? तिल ते बाले में तो बताया ही नहीं?”

“ओह… स… सॉरी!”


हे भगवान् … लगता है मैं तो निरा नंदलाल या चिड़ीमार ही हूँ। इन 2-3 मिनटों में मैंने पता नहीं क्या-क्या बुरा सोच लिया था। मेरा तो जैसे अपने ऊपर से आत्मविश्वास ही उठ गया था। मैंने बहुत सी लड़कियों और भाभियों को बड़े आराम से अपने जाल में फंसाकर उसके साथ सब कुछ मनचाहा कर लिया था पर अब तो मुझे तो डर लग रहा था कि मेरे सपनों का महल एक ही झटके में तबाह होने वाला है। बुजुर्ग और सयाने लोग सच कहते हैं कि औरत के मन की बातों को तो भगवान् भी नहीं समझ सकता तो मेरी क्या बिसात थी।


ओह… हे लिंग देव! तेरा लाख-लाख शुक्र है लौड़े लगने से बचा लिया। आज तो मैं सच में ऑफिस में ना तो समोसे ही खाऊँगा और ना ही कोई और चीज … और तुम्हारी कसम चाय भी नहीं पीऊँगा। प्रॉमिस!!!


“अरे … वो दरअसल… तिल के बारे में बताने का समय ही कहाँ मिला? और फिर तुम भी तो बाथरूम में भाग गई थी? किसे बताता? बोलो?” मैंने उसे समझाते हुए कहा।

“पता है मेले तपड़े खलाब हो गए और मेला तो सु-सु निकलते-निकलते बचा.”


ओह … तो यह बात थी। मेरी तोते जान तो तिल का रहस्य ना बताने पर गुस्सा हो रही है। अब मेरी जान में जान आई। मैंने मन में कहा ‘मेरी जान अब तो मैं तिल क्या तुम्हारे एक-एक रोम का भी हिसाब और रहस्य बता दूंगा।’


आज तो गौरी सु-सु का नाम लेते हुए ज़रा भी नहीं शरमाई थी। शुरू-शुरू में मैं सोचता था इतना हसीन मुजस्समा अपना कौमार्य कहाँ बचा पाया होगा पर जिस प्रकार आज गौरी ने उस दिन अपना सु-सु के निकल जाने की बात की थी मुझे लगता है यह उसके जीवन का पहला ओर्गस्म (लैंगिक चरमसुख की प्राप्ति) था। और इसी ख्याल से मेरे लंड ने एक बार फिर से ठुमके लगाना शुरू कर दिया था।


“अरे तसल्ली से बैठो तो सही, सब विस्तार से बताता हूँ।”

गौरी पास वाले सोफे पर बैठ गई। मैंने आज उसे अपने बगल में सोफे पर बैठाने की जिद नहीं की।


अब मैंने तिल के रहस्य का वर्णन करना शुरू किया:

“देखो गौरी! वैसे तो हमारे शरीर पर बहुत सी जगहों पर तिल हो सकते हैं पर कुछ ख़ास जगहों पर अगर तिल हों तो उनका ख़ास अर्थ और महत्व होता है।”

“हम्म…”

“जिन स्त्री जातकों की छाती पर दायें स्तन पर तिल होता है वो बड़ी भाग्यशाली होती हैं। उनको पुत्र योग होता है। वे असाधारण रूप से बहुत सुन्दर और कामुक भी होती हैं और जिन स्त्री जातकों के बाएं स्तन पर तिल होता है उनको कन्या होने का प्रबल योग होता है। और हाँ एक और ख़ास बात है?” मैंने गौरी की उत्सुकता बढाने के लिए अपनी बात बीच में छोड़ कर एक लंबा सांस लिया।


“त्या?” गौरी ने बैचेनी से अपना पहलू बदला।

“और जानती हो जिस लड़की या स्त्री के दोनों उरोजों के बीच की घाटी थोड़ी चौड़ी होती है यानी दोनों स्तनों की दूरी ज्यादा होती है उनको एक बहुत बड़ी सौगात मिलती है?”

“अच्छा? वो त्या?” अब तो गौरी और भी अधिक उत्सुक नज़र आने लगी थी।

“दोनों उरोजों के चौड़ी घाटी के साथ दोनों कंगूरे अगर सामने के बजाय थोड़ा एक दूसरे के विपरीत दिशा में दिखाई देते हों तो उन स्त्री जातकों को एक साथ दो संतानों यानी जुड़वां बच्चों का योग होता है.”


“मैं समझी नहीं?” शायद यह बात गौरी के पल्ले नहीं पड़ी थी।

“ओह … तुम इधर मेरे पास आकर बैठो मैं समझाता हूँ।”

गौरी कुछ सोचते हुए मेरी बगल में आकर बैठ गई।

“तुमने देखा होगा कुछ लड़कियों के दोनों बूब्स ऐसे लगते हैं जैसे एक दूसरे के बिलकुल पास और चिपके हुए हों।”

“हओ”

“और उन दोनों के बीच एक गहरी खाई सी (क्लीवेज) भी नज़र आती रहती है?”

“हओ… मेली भाभी के दूद्दू भी ऐसे ही हैं।”

“अच्छा?”

“ऐसा होने से त्या होता है?”

“ऐसी स्त्रियों की संतान कुछ कमजोर पैदा होती हैं। उनको माँ के दूध की ज्यादा आवश्यक्ता होती हैं तो प्रकृति या भगवान् उनके स्तनों को थोड़ा बड़ा और पास-पास बनाता है ताकि बच्चे को दोनों स्तनों का दूध आसानी से मिल सके।”


अब पता नहीं गौरी को मेरी बात समझ आई या नहीं या उसे विश्वास हुआ या नहीं वह तो बस गूंगी गुड़िया की तरह मेरी ओर देखती रही।


“और जिन स्त्रियों के दूद्दू थोड़ी दूरी पर होते हैं? पता है उनके लिए भगवान् ने क्या व्यवस्था की है?” इस बार मैंने स्तनों या उरोजों के स्थान पर दूद्दू शब्द का प्रयोग जानकार किया था ताकि गौरी अपने बारे में अनुमान लगा सके।


अब गौरी अपने दुद्दुओं की ओर गौर से देखकर कुछ अनुमान सा लगाने की कोशिश करती लग रही थी। गौरी के दूद्दू भी थोड़े दूर-दूर थे। उनका आकार बहुत बड़ा तो नहीं था पर उनका बेस जरूर नारंगियों जैसा था पर ऊपर से थोड़े उठे हुए से थे और तीखे कंगूरे बगलों की ओर थोड़े मुड़े हुए थे। और उरोजों के बीच की घाटी चौड़ी सी लग रही थी।

शायद गौरी अब कुछ सोचने लगी थी।


“गौरी तुम्हारे दूद्दू भी तो थोड़े दूर-दूर हैं ना?”

“हओ…” कहते हुए गौरी कुछ शरमा सा गई।

“गौरी मुझे लगता है तुम्हारे भी जुड़वां बच्चे होंगे।” कहकर मैं जोर जोर से हंसने लगा था।


गौरी ने इस बार ‘हट’ नहीं कहा। अलबत्ता वह अपनी मुंडी नीचे किये कुछ सोच जरूर रही थी और मंद मंद मुस्कुरा भी रही थी।

“गौरी अगर जुड़वा बच्चे हो गए तो मज़ा ही आ जाएगा? कितने प्यारे और खूबसूरत बच्चे होंगे?”

“हट!!!” गौरी तो शरमाकर इस समय लाजवंती ही बन गई थी।

“तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा ना?”


“पल मेली तो अभी शादी ही नहीं हुई मेले बच्चे खां से होंगे?” साली दिखने में लोल लगती है पर कई बार मुझे भी निरुत्तर कर देती है।

“तो क्या हुआ? कर लो शादी?”

“किच्च! मुझे अभी शादी-वादी नहीं तलानी। दीदी बोलती है पहले पढ़ लिख तल तुछ बन जाओ।”


“अरे गौरी!”

“हओ?”

“यार बातों-बातों में यह दूद्दू ठंडा हो गया। एक काम करो इसे थोड़ा गर्म कर लाओ फिर हम दोनों आधा-आधा दूद्दू पीते हैं? तुमने भी तो व्रत कर रखा है?”

अब यह तो पता नहीं कि गौरी दूद्दू का असली मतलब समझी या नहीं पर वह रसोई में जाते समय मुस्कुरा जरूर रही थी।


गौरी थोड़ी देर में दो गिलासों में इलायची डला गर्म दूध ले आई और फिर से बगल वाले सोफे पर बैठ गई। अब मैंने प्लेट में रखे दोनों केले उठाये। मैंने देखा दोनों केलों का सिरा आपस में जुड़ा हुआ था।

“देखो गौरी यह दोनों केले भी आपस में जुड़वां लगते हैं?” मैंने हँसते हुए उन केलों को गौरी को दिखाया तो वह भी हंसने लगी।

“फिर मैंने दोनों केलों को अलग-अलग करके एक केला गौरी की ओर बढ़ाया। गौरी ने थोड़ा झिझकते हुए केला ले लिया।


मैंने एक केले को आधा छीला और फिर उसे मुंह में लेकर पहले तो चूसते हुए 2-3 बार अन्दर-बाहर किया और फिर एक छोटा सा टुकड़ा दांतों से काटकर खाने लगा। गौरी मेरी इन सब हरकतों को ध्यान से देख रही थी। वह कुछ बोली तो नहीं पर मंद-मंद मुस्कुरा जरूर रही थी।


“गौरी मैं बचपन में वो लम्बी वाली चूसकी (आइसक्रीम) बड़े मजे से चूस-चूस कर खाया करता था।”

“बचपन में तो सभी ऐसे ही तलते हैं।”

“तुम भी ऐसे ही चूसती हो क्या? म … मेरा मतलब चूसती थी क्या?”

“हओ… बचपन में तो मुझे भी बड़ा मज़ा आता था।”

“अब नहीं चूसती क्या?”

“किच्च”


“इस केले को आइसक्रीम समझकर चूस कर देखो बड़ा मज़ा आएगा?”

“हट!”

और फिर हम दोनों ही हंसने लगे।

“गौरी एक बात पूछूं?”

“हओ”

“गौरी मान लो तुम्हारे जुड़वां बच्चे हो जाएँ तो क्या तुम उसमें से एक बच्चा हमें गोद दे दोगी?”

मेरा अंदाज़ा था गौरी शर्मा जायेगी और फिर ‘हट’ बोलेगी पर गौरी तो खिलखिला कर हंस पड़ी और फिर बोली- दीदी भी ऐसा ही बोलती हैं।


“क्या … मतलब? कब? तुमने मधुर से भी इस बारे में बात की थी क्या?”

“नहीं एतबाल दीदी ने मेला हाथ देखकर बताया था.” गौरी ने शर्माते हुए अपनी मुंडी फिर नीचे कर ली।

“फिर तुमने क्या जवाब दिया?”

“मैंने बोला कि दीदी आप चाहो तो दोनों ही रख लेना। सब कुछ आपका ही तो है। मेरे और मेरे परिवार पर आपके कितने अहसान हैं मैं तो आपके लिए अपनी जान भी दे सकती हूँ।”


ओहो … तो गौरी को यह सारा ज्ञान हमारी हनी डार्लिंग (मधुर) का दिया हुआ लगता है। तभी मैं सोचूं उस दिन गौरी ने अपना हाथ देखने की बात मुझ से क्यों की थी? शायद वह इन बातों को कन्फर्म करना चाहती होगी। मुझे डर लगा कहीं इस बावली सियार ने वो भूतनी या चुड़ैल वाली बात तो मधुर से नहीं पूछ ली होगी?

“अरे कहीं तुमने मधुर से वो भूतनी वाली बात तो नहीं पूछ ली?”

“किच्च …” गौरी ने मेरी ओर संदेहपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा “दीदी से तो नहीं पूछा पल… तहीं आपने मुझे उल्लू तो नहीं बनाया था?”

“अरे नहीं… यार… इसमें उल्लू बनाने वाली कौन सी बात है? मैंने कई किताबों में इसके बारे में पढ़ा है।”

“मैंने इसते बाले में यू-ट्यूब पल सल्च तिया था। उसमें तो इसे सुपलस्टेशन… अंधों… ता विश्वास जैसा तुछ बताया? ये अंधों ता विश्वास त्या होता है मेली समझ में नहीं आया?”


एक तो यह साली मधुर किसी दिन मुझे मरवा ही देगी। इस लोल को अब यू-ट्यूब चलाना और सिखा दिया। गौरी शायद सुपरस्टिशन (अंधविश्वास) की बात कर रही थी। मुझे तो कोई जवाब सूझ ही नहीं रहा था।


“अरे नहीं … दरअसल अंधे व्यक्ति देख नहीं सकते तो उनको भूतनी या चुड़ैल पर विश्वास नहीं होता होगा इसलिए ऐसा बताया होगा?” मैंने गोलमोल सा जवाब देकर उसे समझाने की कोशिश की। अब पता नहीं मेरी बातों पर उसे विश्वास हुआ या नहीं भगवान जाने पर इतना तो तय था कि अब उसके मन की शंकाएं कुछ हद तक दूर जरूर हो गई थी।


बातों-बातों समय का पता ही नहीं चला 9:30 हो गए थे। गौरी बर्तन उठाकर रसोई में चली गई और मैं दफ्तर के लिए भागा।

जय हो लिंग देव !!!


कहानी जारी रहेगी.ind Reply

Yesterday, 02:20 PM, #28


desiaks  

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RE: Sex Vasna चोरी का माल

तीन पत्ती गुलाब

भाग -14

मुझे ध्यान आता है पिछले 15-20 दिनों में तो मधुर से ज्यादा कोई बात ही नहीं हो पाती है। ऐसा लगता है जैसे उसके पास मेरे लिए समय ही नहीं है। सुबह वह स्कूल में जल्दी चली जाती है और साम को या तो मंदिर में पूजा पाठ में लगी रहती है या फिर गौरी के साथ रसोई में लगी रहती है। और आप तो जानते ही हैं शुद्धता को लेकर रात को तो वह अलग सोने लगी है इसलिए रात वाली बातें तो आजकल वर्जित हैं।

अरे भई! मैं चुदाई की बात कर रहा हूँ।


आज रात को जब हम सोने का उपक्रम कर रहे थे तो मधुर ने कहा- प्रेम! ये गौरी है ना?

“हम्म?”

ये साली मधुर भी एकबार में सीधी तरह कोई बात करती ही नहीं। किसी छोटी सी बात को भी इतना घुमाफिरा कर सनसनी पूर्ण बनाकर करती है कि लगता है अभी कोई बम फोड़ देगी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था।


“आजकल पता नहीं इसका ध्यान किधर रहता है।”

“क… कैसे… ऐसा क्या हुआ?” मैंने हकलाते हुए पूछा। हे लिंग देव ! प्लीज लौड़े मत लगा देना।

“पढ़ाई में इसका मन ही नहीं लगता और पहले दिन जो पढ़ाओ वो दूसरे दिन भूल जाती है। किसी विषय पर पकड़ ही नहीं है इसकी!”

“अच्छा?”

“अंग्रेजी तो इसके पल्ले ही नहीं पड़ती?”


“मुझे लगता है इसका ऊपर का माला खाली होगा?” मैंने हंसते हुए कहा।

“नहीं जी… और दूसरी बातें तो जी में आये उतनी किये जाओ बस पढ़ाई से जी चुराती रहती है।”

मैंने मन में सोचा ‘इस बेचारी की चूत और गांड अब एक अदद लंड माँगने लगी है पढ़ाई-लिखाई में अब इसका मन कहाँ लगेगा। इसे तो अब कलम-किताब के बजाय लंड पकड़ना और प्रेमग्रन्थ पढ़ना सिखाओ।’


“प्रेम, क्या तुम एक काम कर सकते हो?”

“हाँ कर दूंगा.” मेरे मुंह से अचानक निकल गया।

पता नहीं मधुर क्या सोच ले तो मैंने तुरंत बात को संवारते हुए कहा- हां … हाँ … बोलो क्या करना है?

“तुम इसे रोज थोड़ी देर अंग्रेजी पढ़ा दिया करो.”

“पर … मेरे पास कहाँ समय होता है? सुबह तो ऑफिस जाना होता है और …” मैंने जानबूझ कर बहाना बनाया।

मधुर मेरी बात को बीच में ही काटते हुए बोली- प्लीज रात को 9 के बाद पढ़ा दिया करो.

“लगता तो मुश्किल ही है पर मैं कोशिश करूँगा?”


अब मैं सोच रहा था अब तो रात में भी गौरी के साथ 2-3 घंटे का समय आराम से बिताया जा सकता है। सुबह तो ऑफिस जाने की जल्दी रहती है तो ज्यादा बातें नहीं हो पाती पर अब तो शाम को भी अच्छा समय मिल जाएगा। अब तो अंग्रेजी के साथ में इसे जोड़-घटा और गुणा-भाग भी सिखा दूंगा।


“और अगर यह पढ़ने में जी चुराए तो मास्टरजी की तरह इसके कान भी खींच देना!” कहकर मधुर हँसने लगी।

“अरे नहीं … अभी छोटी है … सीख लेगी धीरे धीरे।” मैंने मधुर को दिलासा दिलाया।

मैं सोच रहा था ‘मेरी जान तुम चिंता मत करो बस तुम देखती जाओ कान ही नहीं इसकी तो और भी बहुत सी चीजें पकड़नी और खींचनी हैं।’


आज सुबह भी जब तक मैं फ्रेश होकर बाहर हॉल में आया मधुर स्कूल जा चुकी थी।


मेरे बाहर आते ही गौरी रसोई से बाहर आ गई और मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोली- गुड मोल्निंग सल!

“वेरी गुड मोर्निंग डार्लिंग!” मैंने उसे ऊपर से नीचे देखते और हंसते हुए जवाब दिया।

आजकल मेरे डार्लिंग बोलने पर गौरी ने शर्माना छोड़ दिया है।


गौरी ने आज काली पैंट और लाल रंग की चोखाने वाली डिजाइन की कमीज (शर्ट) पहन रखी थी जिसकी आस्तीन (बाहें) उसने फोल्ड कर रखी थी और ऊपर के दो बटन खुले थे। लगता है उसने आज भी ब्रा पैंटी नहीं पहनी है। अब पता नहीं उसे ब्रा पैंटी पहनना अच्छा नहीं लगता या वह जानकर ऐसा करती है?


उसके उरोजों के कंगूरे आगे से बहुत नुकीले लग रहे थे। मैं उस दिन तो जी भर कर इन्हें चूस ही नहीं पाया था। अब पता नहीं दुबारा कुच मर्दन और चूसन का मौक़ा कब मिलेगा? मैंने ध्यान दिया उसके गालों पर 2-3 छोटी-छोटी लाल रंग की फुंसियां सी हो रही थी जिनपर उसने कोई क्रीम सी लगा रखी थी। उसकी आँखें कुछ लाल सी लग रही थी अब यह नींद की खुमारी थी या उफनती, बलखाती, अल्हड़ जवानी का असर था या कोई और बात थी पता नहीं।


“आपते लिए चाय बनाऊं या तोफी?”

“अ… हाँ … चाय ही बना लो।” कहकर मैं अखबार पढ़ने लगा और गौरी चाय बनाने रसोई में चली गई।


थोड़ी देर में गौरी चाय बनाकर ले आई और अब हम दोनों सुड़का लगाकर चाय पीने लगे।

“आपतो एक पहेली पूछूं?” अचानक गौरी ने पूछा।

“हओ” आजकल मैंने भी गौरी के सामने उसी की तरह ‘किच्च’ औए ‘हओ’ बोलना शुरू कर दिया है।


“वो त्या चीज है जो हम एत हाथ से तो पतड़ सतते हैं पल दूसले हाथ से नहीं?”

“हम्म … कोशिश करता हूँ।”


मैंने पहले चाय का गिलास अपने दोनों हाथों से पकड़कर देखा और फिर अपनी नाक, कान, ठोड़ी, गला, पैर, पेट, घुटने और होंठ आदि सभी अंगों को पकड़ कर देखा। सभी तो दोनों हाथों से पकड़े जा सकते हैं फिर ऐसा क्या है जो एक हाथ से तो पकड़ा जा सकता है पर दूसरे हाथ से नहीं?


इसी दौरान मैंने एकबार गौरी के घुटनों और जाँघों पर भी दोनों हाथ लगा कर देख लिए थे पर बात बनती नज़र नहीं आई। मेरी इस हालत पर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। फिर मैंने अपने खड़े पप्पू को भी पायजामे के ऊपर से पकड़ ट्राई किया तो मेरी इस हरकत पर गौरी और जोर-जोर से हंसने लगी थी।

“यार कमाल है?… तुम बताओ?”

“आपने हाल मान ली?”

“हओ” मैंने अपनी हार की हामी भरी।


“अच्छा अब आप अपने एत हाथ से अपने दूसरे हाथ ता अंगूठा पतड़ो।”

मैंने गौरी के कहे अनुसार किया पर बात अभी भी पल्ले नहीं पड़ी।

“अच्छा अब इसी अंगूठे को इसी हाथ से पतड़ो?”

“ओह… कमाल है … मेरे दिमाग में तो यह बात आई ही नहीं?” मैंने हंसते हुए कहा।


गौरी तो अब हंस-हंस कर जैसे दोहरी ही होने लगी थी। आज तो वह अपनी विजय-पताका फहराकर बहुत खुश लग रही थी। हंसते हुए उसके गालों पर पड़ने वाले डिम्पल तो लगता है आज कलेजा ही चीर देंगे।

“लगता है तुमने यह सब यू ट्यूब पर देखा होगा?”

“हओ”

“अरे… गौरी!”

“हम?” गौरी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।


“ये तुम्हारे चहरे पर क्या हुआ है? कहीं किसी दिलजले आशिक मच्छर ने तो नहीं काट लिया?” मैंने हंसते हुए पूछा।

“नहीं… पिम्पल्स (मुंहासे) हो गए हैं?” गौरी अब थोड़ी गंभीर हो गयी थी।

“इन पर कुछ लगाया या नहीं?”

“दीदी ने पतंजलि फेसवाश बताया था पल फलक नहीं पड़ा.” गौरी अचानक उदास हो गई।

“ओह… अक्सर रात को देर से सोने पर या खाने-पीने में असावधानी रखने से भी ऐसा हो जाता है?”


मैंने एक बार गौरी से उसकी खाने-पीने की पसंद के बारे में पूछा था तो उसने बताया था कि उसे नूडल्स, डोसा, बर्गर, पेस्ट्री, पकोड़े आदि तैलीय चटपटी चीजें और मिठाई में रसमलाई और आइस-क्रीम बहुत पसंद है। फलों में उसे आम और लीची बहुत अच्छे लगते हैं। मुझे लगता है इस चौमासे (बारिश) की सीजन में यहाँ आने के बाद उसने यही सब खूब जी भर के खाया होगा उसके कारण भी और रात को देर से सोने के कारण भी पेट की गड़बड़ से यह मुंहासे हुए है। कई बार सेक्स का दमन करने से भी ऐसा हो सकता है।


“पता है दीदी त्या बोलती है?”

“क्या?” गौरी की बात संकर मैं चौंका।

“वो बोलती हैं- तुम्हारी जवानी फूट रही है? शादी के बाद ही ठीक होगी.”

“तो कर लो शादी?” मैंने हंसते हुए उसे छेड़ा।

“हट… आपतो मजात सूझ लहा है और मेली डल ते माले जान नितल लही है?”


“शादी में डरने वाली क्या बात है?”

“अले… शादी से नहीं?”

“तो?”

“मुझे डल है वो गुप्ताजी ती लड़ती ती तलह मेला चेहला तो खलाब नहीं हो जाएगा?”

“अरे हाँ… उसका तो मुहांसों के कारण पूरा चेहरा ही छेदवाली फटी बनियान जैसा हो गया है।” कह कर मैं हंसने लगा।


अलबत्ता गौरी की शक्ल रोने जैसी हो गयी थी।

“पर उसकी समस्या तो अब जल्दी ही ठीक हो जायेगी.”

“तैसे?”

“जल्दी ही उसकी शादी होने वाली है ना?” मैंने हंसते हुए कहा।

“हम्म …” गौरी उदास सी हो गई थी।


“गौरी, यह अक्सर हारमोंस में बदलाव के कारण होता है। और उभरती जवानी में तो खूबसूरत लड़कियों के साथ अक्सर ऐसा होता है। हमारे एक जानकार की लड़की थी। पता है उसकी सगाई हो चुकी थी और शादी होने वाली थी.”

“फिल?”

“फिर उसके चहरे पर मुंहासे हो गए जिसके कारण उसका चेहरा खराब हो गया तो उस बेचारी की तो सगाई ही टूट गई थी और फिर बहुत दिनों तक उसकी शादी नहीं हो पाई तो उस बेचारी ने आत्महत्या कर ली।”

“ओह… अब त्या होगा? मेला भी चेहला खलाब हो जाएगा त्या? हे मातालानी! मेले मुंहासे ठीक तल दो मैं आपतो नौमी ते दिन गुलगुले चढ़ाऊँगी” गौरी हाथ जोड़कर मन्नत सी माँगने लगी। उसे अपनी सुन्दरता खोने का डर सताने लगा था। मुझे लगा गौरी अब रोने ही लगेगी।


“गौरी इधर आओ! मैं देखता हूँ किस प्रकार के मुंहासे हैं? उभरती जवानी वाले या हारमोंस वाले?”


गौरी बिना किसी शर्म और हील-हुज्जत के मेरे बगल में सोफे पर आकर बैठ गई। उसकी जांघ अब मेरी जांघ से सट गयी थी। चूत की खुशबू से मेरा लंड एकबार फिर से किलकारी मारने लगा था। जैसे कह रहा था ‘गुरु आज मौक़ा भी है और बहाना भी अच्छा है साली का सोफे पर ही गेम बजा डालो।’


मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में पकड़ लिया। आह… रेशम के फोहों जैसे स्पंजी और गुलाबी गाल तो ऐसे लग रहे थे जैसे कह रहे हों ‘हमें चूमोगे नहीं?’ उसके होंठ काँप से रहे थे और सांसें बहुत तेज़ चलने लगी थी। उसकी साँसों के साथ उरोजों का उतार-चढ़ाव उसकी घबराहट दिखा रहा था। गौरी की आँखें बंद थी। मेरा मन तो सब कुछ भूलकर उसके गालों और अधरों को फिर से चूम लेने को करने लगा था पर मैंने अपने आप को बड़ी मुश्किल से रोक रखा था। लंड तो साला फिर से ख़ुदकुशी की धमकी ही देने लगा था।


फिर मैंने उन मुहांसों पर अपनी अंगुली फिराई। राई के दाने जितने 2-3 मुंहासे किसी खलनायक की तरह वहाँ खड़े मेरी ‘तोते जान’ को जैसे डरा-धमका रहे थे।

“थीत हो जायेंगे ना?”

“ओह… हाँ…” गौरी की आवाज सुनकर मैं चोंका।

“गौरी यह सब हारमोंस की गड़बड़ी से हुए लगते हैं.”

“तैसे? मैं समझी नहीं?”


मेरा मन तो कर रहा था साफ़ साफ़ बता दूं कि ‘मेरी तोते जान अब तुम अपने आशिकों को चु…ग्गा (चूत-गांड) देना शुरू करो तुम्हारी चूत और गांड को मेरे जैसे एक अदद लंड की जरूरत है। दोनों तरफ से खूब चुदाई का मज़ा लो ये कील मुंहासे सब ख़त्म हो जायेंगे।’


पर मैंने कुछ सोचते हुए कहा- देखो! किशोरावस्था के बाद उभरती जवानी में अक्सर ऐसा होता है। वैसे तो एलोपेथी में बहुत सी दवाइयां हैं पर इनका दुष्प्रभाव (साइड इफ़ेक्ट) भी होता है। आयुर्वेद में भी इसका इलाज़ तो है।

“प्लीज बताओ ना?” गौरी को कुछ आशा बंधी।


“चरक संहिता में 8 घटकों के मिश्रण से अष्टावहेल (एक लेप) बनाया जाता है। जिसमें नीम गिलोय और गुलाब की पत्तियाँ, एलोविरा का रस, बबूल का गोंद, हल्दी, एक चम्मच ताज़ा कच्चा दूध और शहद शामिल हैं। फिर इस अष्टावहेल में एक और चीज भी मिलाकर चहरे पर लगाया जाता है.”

“वो त्या चीज होती है?” गौरी ने अधीरता से पूछा।

“ओह… कैसे समझाऊं?”

“त्या हुआ बताओ ना?”

“ओह… यार मुझे शर्म भी आ रही है और झिझक सी भी हो रही है.” मैंने शर्माने का नाटक किया।

“ओहो… प्लीज बताओ ना? इसमें शल्म ती त्या बात है?”


“वो… वो… शादी के बाद ठीक हो जायंगे तुम चिंता मत करो.” मैंने एक बार फिर से उसे टालने का नाटक किया।

“नहीं… नहीं … मुझे अभी 5-7 साल शादी-वादी बिलतुल नहीं तलानी? आप इलाज़ बताओ ना?”

“यार… आज तो तुमने मुझे ही फंसा लिया… कैसे बताऊँ?”

“अच्छाजी… जब मुझे शल्म आती है तो आप मजात समझते हैं अब अपनी बाली (टर्न) आई तो जनाब तो शल्म आती है? मुझे पता है आप जानतल नहीं बताना चाहते?”


“ओह… अच्छा… रुको मैं बताने की कोशिश करता हूँ…” मैंने एक बार फिर से शर्माने और झिझकने का नाटक किया ताकि अब मैं उसे जो भी बताऊँ गौरी को सौ फ़ीसदी (प्रतिशत) यकीन हो जाए कि मैं जो भी बता रहा हूँ बिलकुल सच है और उसे ज़रा भी यह नहीं लगे कि मैं उसके साथ कोई छल कपट कर रहा हूँ।


फिर मैंने अपना गला खंखारते हुए कहा- दरअसल शादी होने के बाद दोनों पति पत्नी सेक्स का खूब आनन्द लेते हैं। इससे उनके शरीर में रक्त का संचार बहुत तेजी से होने लगता है जिसके कारण हारमोंस में बदलाव आ जाता है।

इतना कहकर मैं थोड़ी देर रुक गया।


मैं देखना चाहता था कि मेरी बात पर गौरी की क्या प्रतिक्रया होती है। वह ध्यानपूर्वक मेरी बात सुन रही थी और कुछ सोचे भी जा रही थी। शायद उसे थोड़ी शर्म तो जरूर आ रही थी पर उसने कुछ बोला नहीं अलबत्ता उसके चहरे से लग रहा था वो आगे जानने की उत्सुक जरूर है। लगता है चिड़िया अब सब कुछ सुनने, समझने और करने के लिए अपने आप को तैयार कर रही है।


“और… एक और बात है?”

“त्या?” उसने अपनी मुंडी ऊपर करते हुए पूछा।

“देखो गौरी ! सेक्स ईश्वर द्वारा मानव को प्रदत्त आनन्दायक क्रिया है यह कोई पाप कर्म नहीं है। इसमें पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका को जिन क्रियाओं में आनन्द मिले वो सब प्राकृतिक और निष्पाप होती हैं। अब चाहे वो आलिंगन हो, चुम्बन हो, सम्भोग हो या फिर अपने साथी के कामांगों को चूमना हो या चूसना हो।”


मैंने अपनी भाषा पर पूरा नियंत्रण रखा था। मेरी कोशिश थी कि किसी भी प्रकार का कोई अभद्र या अश्लील शब्द अभी मेरे मुंह से नहीं निकले। बाद में तो इसे चूत, गांड, लंड और चुदाई सब स्पष्ट शब्दों में बता भी दूंगा और सिखा भी दूंगा।


“गौरी एक बात तुम्हें और भी बताता हूँ?”

“त्या?”

“जब मधुर की शादी हुई थी तब मधुर को भी पिम्पल्स हो रहे थे.”

“अच्छा? फिल तैसे थीत हुए?” गौरी की आँखें जैसे चमक ही उठी। उसे लगने लगा था अब तो उसकी समस्या का समाधान अवश्य ही मिल जाएगा।

“यार प्राइवेट बात है.” मैंने फिर से थोड़ा शर्माने की एक्टिंग की।

“मैं भी तो अपनी साली बातें आपतो बताती हूँ आप त्यों नहीं बता लहे?”

“पता नहीं तुम क्या सोचोगी और विश्वास करोगी या नहीं?”

“तलुंगी… प्लीज बताओ?”


“मधुर ने अपने मुंहासों के लिए मेरे वीर्य का पान किया था? और तुम्हें विश्वास नहीं होगा उसके मुहांसे तो 15-20 दिनों में ही बिलकुल ठीक हो गए थे।”

“अच्छा?” गौरी आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगी। वह कुछ सोचने लगी थी मुझे लगा उसके मन में अभी थोड़ा संशय है।

“वो… आप दवाई ते बाले में बता रहे थे ना?” साली दिखने में लोल लगती है पर कितनी सफाई से बात का रुख मोड़ दिया है।


“वो दरअसल उस लेप (मिश्रण) में चिकनाई के लिए अपने पति का ताज़ा वीर्य मिलाया जाता है। अगर शादी नहीं हुई हो तो फिर अपने प्रेमी या किसी नजदीकी मित्र से सहायता ली जा सकती है।”

“ओह…”

“गौरी ! दरअसल दवाई तीन तरह से प्रयोग में लाई जाती है?”

“?” गौरी ने फिर आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

“एक तो लगाई जाती है दूसरी खाई या पी जाती है और तीसरी इंजेक्ट (सुई लगाना) की जाती है। मधुर ने लेप-वेप का झमेला ही नहीं किया उसने तो सीधे ही वीर्य-पान करके अपनी समस्या से छुटकारा पा लिया था।” कहकर मैं हंसने लगा।


गौरी भी थोड़ा शर्मा तो जरूर रही थी पर कुछ गंभीरतापूर्वक सोचती भी जा रही थी। मुझे लगता है उसे भी यह आईडिया जच तो रहा था। हे लिंग देव… बस थोड़ी सी मदद कर दे। मेरा लंड तो अब डंडे की तरह खड़ा हो गया था। उसे भी अब चुग्गे की उम्मीद और स्वाद की खुशबु नज़र आने लगी थी।


मैंने अपना प्रवचन जारी रखते हुए उसे आगे बताया-

“गौरी सुनने और देखने में यह थोड़ा गंदा सा काम लगता है पर विदेशों में तो वीर्यपान आम बात हैं। बहुत सी विदेशी फिल्म हिरोइनें तो ताज़ा वीर्य को अपने चेहरे पर लगाती भी हैं और शहद के साथ पीती भी हैं इससे उनकी सुन्दरता बढ़ती है और चहरे पर निखार आने लगता है। जानकारों के अनुसार चेहरे पर वीर्य लगाने से यह किसी एंटी-एजिंग (Anti-aging) उत्पाद की तरह काम करता है। 40 साल की औरत भी 25-26 की लगती है। वीर्य में एंटीऑक्सीडेंट गुण मौजूद रहते हैं जो त्वचा की झुर्री और त्वीचा के लचीनेपन जैसे विकारों को दूर करने में मदद करता है। चेहरे के लिए वीर्य बहुत ही फायदेमंद होता है इसलिए इसे आजकल अंतरराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बेचा भी जा रहा है।


वीर्य का सेवन करने से तंत्रिका विकास फैक्टर, ऑक्सीटोसिन, प्रोजेस्टेरोन, टेस्टोस्टेरोन, कोर्टिसोल और कुछ प्रोस्टाग्लैंडिन जैसे इंफ्लेमेटरी गुण प्राप्त होते हैं। वीर्य हमारे शरीर में मौजूद टीजीएफ-बीटा प्रोटीन की सहनशीलता को बढ़ाने में मदद करता है। यह चिंता और तनाव को दूर करने में मदद कर सकते हैं। यह प्रोटीन और विटामिन से भरपूर होता है। अब कोई इसे पीने के लिए तैयार हैं या नहीं इसका निर्णय उसे खुद लेना होता है।


आज तो मैंने भारी भरकम ज्ञान गौरी को दे डाला था। अब पता नहीं उसे क्या और कितना समझ आया पर वह लोटन कबूतरी की तरह मुंह बाए बस सुनती ही रही।

“गौरी शायद तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो तो तुम यू ट्यूब पर भी वीर्यपान के लाभ देख सकती हो.” मैंने गौरी फ़तेह अभियान के ताबूत में एक और कील ठोक दी।


“पल… एत बात मेली समझ में नहीं आई?”

“क्या?”

“यह लेप वाली बात मुझे दीदी ने त्यों नहीं बताई?” गौरी ने कुछ सोचते हुए कहा।

“भई! अब यह मियाँ-बीवी की निजी बातें होती हैं। खूबसूरत औरतों को तुम्हारी तरह शर्म बहुत आती है ना? इसलिए नहीं बताई होगी.” कहकर मैं हंसने लगा। अब तो गौरी के चेहरे पर भी मुस्कराहट ऐसे फ़ैल गई जैसे रात को चांदनी फ़ैल जाती है।


प्यारे पाठको और पाठिकाओ! आज का सबक मैंने जानबूझ कर अधूरा छोड़ा था। बस थोड़ा सा इंतज़ार कीजिये हमारी तोतेजान खुद ही वीर्यपान की इच्छा जाहिर करने वाली है।


कहानी जारी रहेगी.ind Reply

Yesterday, 02:23 PM, #29


desiaks  

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RE: Sex Vasna चोरी का माल

तीन पत्ती गुलाब

भाग-15

रात्रि भोजन (डिनर) निपटाने के बाद मधुर ने मेरी ओर इशारा करते हुए गौरी को समझाया- आज से सर तुम्हें नियमित रूप से रात को अंग्रेजी पढ़ाया करेंगे। मैं रसोई में तुम्हारी मदद कर दिया करुँगी. काम को जल्दी निपटा लिया करना ताकि ठीक से पढ़ाई हो सके।

“हओ …” अब बेचारी तोतेजान ‘हओ’ के अलावा और क्या बोल सकती थी।


“और प्रेम, अगर यह पढ़ाई में कोई कोताही बरते (आनाकानी करे) तो एक डंडा रख लो चाहो तो उससे इसकी अच्छी तरह पिटाई भी कर देना।”

डंडे वाली बात पर हम तीनों ही हंस पड़े। मेरा डंडा तो वैसे ही आजकल अटेंशन रहता है अब तो मधुर ने भी इजाजत दे दी है। अब डंडे का इस्तेमाल कहाँ, कब और कैसे करना है मैं सही समय पर अपने आप कर लूंगा। लिंग देव इस पढ़ाकू कबूतरी का भला करे।


“मैं सोने जा रही हूँ। आज से ही पढ़ाई शुरू कर दो। और गर्मी के सीजन में ये क्या पैंट-कमीज पहन रखी है वो शॉर्ट्स क्यों नहीं पहनती?” और फिर मेरी ओर मुस्कुराते हुए ‘गुड नाईट’ कहकर मधुर बेड रूम की ओर चली गई।


मेरी तोतेजान तो बेचारी सकपका कर रह गई।

“ग … गौरी तुम अपनी बुक्स वगैरह ले आओ.”

“हओ …” कहकर गौरी सुस्त कदमों से चलकर स्टडी रूम अपने कमरे में चली गई।


अब मैं सोच रहा था यह साली मधुर मेरे साथ कोई गेम तो नहीं खेल रही? जिस प्रकार उसने गौरी को शॉर्ट्स पहनने के लिए कहा था और बाद में मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा था, मुझे कुछ थोड़ी शंका भी होती है और डर भी लगता है। औरतों के बारे में एक बात जो जग जाहिर है कि वे अपनी पति को दूसरी लड़की या औरत के पास फटकने भी नहीं देती तो मधुर इस प्रकार मुझे और गौरी को खुली छूट कैसे दे रही है? पता नहीं इसके दिमाग में क्या खिचड़ी पक रही है?


प्रिय पाठको और पाठिकाओ! आप सभी तो बहुत ही अनुभवी और गुणी हैं आपको क्या लगता है मधुर के ऐसा करने के पीछे कोई प्लान या साज़िश तो नहीं? कहीं वह मेरी परीक्षा तो नहीं ले रही? मुझे गौरी के साथ अपने सम्बन्धों को आगे विस्तार देना चाहिए या यहीं विराम दे देना चाहिए? मैं आपकी अनमोल राय का मुन्तजिर और आभारी रहूंगा।


गौरी ने अपने कपड़े बदल लिए थे अब वह छोटी वाली निक्कर और सफ़ेद रंग का स्लीवलेस टॉप (जिसपर फूलों वाली डिजाईन बनी थी) पहन कर आ गई।

हे भगवान् … पतली कमर में बंधे निक्कर के ऊपर गोल गहरी नाभि तो किसी योगी की तपस्या भी भंग कर दे। उसने अपने बालों की दो चोटी बना रखी थी और इन शॉर्ट्स में तो वह टेनिस की खिलाड़ी जैसी लग रही थी।


आप सोच सकते हैं मुझे उस समय सिमरन की कितनी याद आयी होगी? पुष्ट और गुलाबी रंग की मादक जांघें देखकर तो मेरा पप्पू उछलने ही लगा। मैं तो उसे अपलक देखता ही रह गया। मेरे मुंह से ‘वाओ’ निकलते-निकलते बचा।


उसने अपनी 2-3 किताबें और कापियां अपनी छाती से चिपका रखी थी। साली इन किताबों की किस्मत भी कितनी बढ़िया है, गौरी की छाती से चिपकी हुई हैं। गौरी अपनी कॉपी-किताबें टेबल पर रखकर वहीं खड़ी हो गई।


“ब… बैठो गौरी! और अब यह बताओ तुम्हें अंग्रेजी में क्या-क्या आता है?”

“एत मिनट लुतो?” (एक मिनट रुको)


और फिर गौरी झुककर मेरे पैरों को छूने की कोशिश करने लगी। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि गौरी ये क्या कर रही है? मैं तो उसके कुंवारे बदन और स्लीवलेस टॉप में उसकी रोम विहीन कांख से आती मदहोश करने वाली खुशबू में ही खोया था। याल्लाह… अगर कांख इतनी कोमल और साफ़ सुथरी है तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इसने अपनी बुर (सॉरी… सु-सु) को कितनी चिकनी चमेली बनाया होगा?


मेरा ख्याल है उसने अपनी केशर क्यारी को रेज़र या हेयर रिमूविंग (बालसफा) क्रीम के बजाय वैक्सिंग से साफ़ किया होगा। अब तो उसके पपोटे मोटे-मोटे और गुलाबी नज़र आने लगे होंगे और दोनों पपोटों के बीच की दरार (झिर्री) तो कामरस में भीगी होगी। हे भगवान् उसके पपोटों को अगर थोड़ा सा खोल कर उसकी झिर्री पर जीभ फिराई जाए तो जन्नत यहीं यही उतर आये।


बस इन मुंहासों को ठीक करने वाला मेरा आईडिया उसे जम जाए तो अब मंजिले मक़सूद ज्यादा दूर नहीं रहेगी। हे लिंग देव ! अब इस वीर्य पान वाले सोपान को निर्विघ्न पूरा करवा देना अब अंतिम समय में लौड़े मत लगा देना प्लीज…!!!


“आप मुझे आशिल्वाद दो?”

“ओह… हाँ…” गौरी की आवाज सुनकर मैं अपने ख्यालों से वापस आया।

मैंने कहा- सदा प्रसन्न रहो और तुम्हारे मुंहासे जल्दी ठीक हो जाए।

मुझे लगा गौरी मुंहासे ठीक होने के लिए आशीर्वाद मांग रही है।


“अले… नहीं… अच्छी पढ़ाई ता आशिल्वाद?”

“ओह.. हाँ …” पता नहीं आजकल मेरा तो जैसे दिमाग ही काम नहीं करता मैं तो सुबह से इसके मुंहासों का इलाज करने के बारे में बहुत ही गंभीरता पूर्वक विचार किये जा रहा था।

“खूब पढ़ो। मेरा आशीर्वाद और प्रेम सदा तुम्हारे साथ रहेगा। मैं आज से तुम्हें अपनी प्रिय शिष्या के रूप में स्वीकार करता हूँ। कबूल है, कबूल है, कबूल है।”


अब हम दोनों ही हंसने लगे। गौरी मेरे दोनों पैर छूकर अपना हाथ अपने सिर पर लगाया और सोफे पर बैठ गई।

“गौरी तुमने तो कबूल है बोला ही नहीं?”

“हां… तबूल है.” गौरी ने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखकर कहा।

“तीन बार बोलो.” मैंने हंसते हुए उसे टोका।

“ऐसा तो शादी में बोला जाता है?” कहते हुए गौरी रहस्यमई ढंग से मुस्कुराई और फिर उसने बड़ी अदा से (सलाम बजाने के अंदाज़ में) तीन बार ‘कबूल है’ कहा।


“देखो तुमने मुझे गुरु स्वीकार किया है अब मेरी हर बात और आज्ञा तुम्हें माननी पड़ेगी और कुछ बताने में शर्म भी छोड़नी पड़ेगी.”

“हओ… ठीत है गुलुजी।” गौरी ने हंसते हुए कहा।

“गौरी एक काम तो आज से करो?”

“त्या?”

“एक तो ‘हओ’ और ‘किच्च’ की जगह अब ‘यस’ और ‘नो’ बोलना शुरू करो। और अंग्रेजी के छोटे-छोटे वाक्य बोलना शुरू करो जैसे थैंक यू, सॉरी, प्लीज, ओके, वेलकम, स्योअर … आदि।”

“हओ… सोल्ली… इ..यस” गौरी के मुंह से फिर हओ निकल गया।

“शुरू-शुरू में थोड़ा गड़बड़ होगा पर धीरे धीरे तुम्हें अंग्रेजी आने लगेगी। अब यस सर बोलो?” मैंने हंसते हुए कहा।

“यस सल” इस बार गौरी ने पूरे विश्वास के साथ बोला।


“अच्छा अब बताओ तुम्हें अंग्रेजी में क्या-क्या आता है?”

“मुझे तल्लस (कलर्स), वेजिटेबल ओल दिनों ते नेम, थ्लस्टी त्रो ती स्टोली, माय फ्लेंड ओल दिवाली का एस्से भी याद है ओल लीव एप्लीतेशन भी आती है।”

“अरे वाह … तुम्हें तो बहुत कुछ आने लगा है।”

“सब दीदी … सोल्ली मैडम ने पढ़ाया है? मुझे बस मीनिंग याद नहीं लहते।”


“गौरी, तुम्हें पार्ट्स ऑफ़ बॉडीज के नाम आते हैं क्या?”

“यस … आपतो सुनाऊं?”

“हाँ… हाँ सुनाओ.”

“नोज, टीथ, हैण्ड, फिन्गल, लिप्स, चिन, हेड, लेग, इअल, आइज, एब्डोमेन साले याद हैं.” गौरी ने अपनी अंगुली इन सभी अंगों पर लगाते हुए बताया।

बाकी सब तो ठीक था पर साली ने चूत, गांड, बोबे और नितम्बों के नाम नहीं बताये।


“वाह… बहुत बढ़िया!”

“अच्छा… घुटनों को क्या कहते हैं?”

“नीज”

“और… जीभ को?”

“टोंग”

“अंगूठे को?”

“हाथ वाले तो थंब ओल पैल वाले तो टो बोलते हैं।”


“वाह … शाबास तुम्हें तो सारे याद हैं. गौरी अगर तुम शरमाओ नहीं तो एक-दो मीनिंग और पूछूं?”

“हम?” उसने मेरी ओर आश्चर्य मिश्रित मुस्कान के साथ देखा।

“वो… दूद्दू को क्या बोलते हैं?”

“मिल्त” (मिल्क)

“अरे उस मिल्क की नहीं मैं तुम्हारे वाले दूद्दू की बात कर रहा हूँ?”

“ओह…” गौरी ने अपने दुद्दुओं को देखते हुए थोड़ा शर्माते हुए जवाब दिया- इनतो ब्लेस्ट बोलते हैं।

“हम्म… और प्राइवेट पार्ट को क्या बोलते हैं?”


गौरी कुछ सोचने लगी थी। मुझे लगा इस बार वह ‘हट’ बोलते हुए जरूर शर्मा जायेगी।

“प्लाइवेट पाल्ट तो प्लाइवेट पाल्ट ही होता है?” उसने बिना झिझके जवाब दिया।

“अरे नहीं … स्त्री के प्राइवेट पार्ट को वजिना और पुरुष के प्राइवेट पार्ट को पेनिस बोलते हैं।”

“पल… मैडम ने यही समझाया था?”

“ओके…”


“तल मैडम ने मुझे 20 मीनिंग याद तरने दिए थे?”

“फिर?”

“मैंने याद तल लिए.”

“अरे वाह… तुम सब काम मन लगाकर करती हो ना इसीलिए जल्दी याद हो जाते हैं।”

गौरी अपनी बड़ाई सुनकर मंद-मंद मुस्कुने लगी थी।

“गौरी मैं आज तुम्हें सेल्फ इंट्रोडक्शन देना सिखाता हूँ?”

“सेल्फ… इंट्लो…” शायद गौरी को समझ नहीं आया था।

“सेल्फ इंट्रोडक्शन माने अपने बारे में किसी को बताना?”

“ओके”


और फिर मैंने उसे अगले आधे घंटे तक सेल्फ इंट्रोडक्शन के बारे में 8-10 वाक्य अंग्रेजी में रटा दिए। गौरी अभी भी आँखें बंद किये मेरे बताये वाक्यों को रट्टा लगा रही थी। मेरी निगाहें बार-बार उसकी जाँघों के संधि स्थल के उभरे हुए भाग चली जा रही थी। एक-दो बार गौरी ने भी इसे नोटिस तो किया पर वह अपनी पढ़ाई में लगी रही।


उसकी जांघें इतनी चिकनी और गोरी थी कि उन पर नीले से रंग की हल्की-हल्की शिरायें सी नज़र आ रही थी। और घुटनों के ऊपर का भाग तो मक्खन जैसा लग रहा था। आज उसने जो फूलों वाली डिजाईन का स्लीवलेस टॉप पहना था वह पीछे से डोरी से बंधा था। उसमें कसे हुए उरोज किसी हठी बच्चे की मानिंद लग रहे थे जैसे जिद कर रहे हों हमें आजाद कर दो। जब वह पढ़ते समय थोड़ा झुकती है तो कई बार उसके नन्हे परिंदे अपनी गर्दन बाहर निकालने की कोशिश में लगे दिखते हैं।


मैंने एक बात नोटिस की है। आजकल गौरी ब्रा और पैंटी नहीं पहनती है। हो सकता है मधुर ने रात में सोते समय ब्रा पैंटी पहनने के लिए मना किया हो पर गौरी तो आजकल दिन में भी इन्हें कहाँ पहनती है। कच्छीनुमा निक्कर में इसके नितम्ब इतने कसे हुए लगते हैं कि किक मारने का मन करने लगता है।


अब तक लगभग 11 बज गए थे। गौरी को भी उबासी (जम्हाई) सी आने लगी थी। अब आज के सबक की एक और आहुति देनी बाकी थी।

“अरे गौरी!”

“यस?”

“एक बात तो बताओ?”

“त्या?”

“वो तुमने अपने मुंहासों का कोई इलाज़ किया या नहीं?”

“किच्च… नहीं” गौरी ने एक बार मेरी ओर देखा फिर अपनी मुंडी झुका ली।


“कोई दिक्कत?”

“मेली तिस्मत ही खलाब है?”

“क्यों? ऐसा क्या हुआ है?”

“वो आपने जो बताया मैं खां से लाऊँ?”

“ओह… गौरी यार अजीब समस्या है?”

गौरी ने प्रश्नवाचक निगाहों से मेरी ओर देखा।


“यार मैं तुम्हारी हेल्प तो कर सकता हूँ… पर…”

“पल… त्या?” गौरी ने मेरी ओर आशा भरी नज़रों से ताका।

“अब पता नहीं तुम मुझे गलत ना समझ लो?” मैंने जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी।

“नहीं … आप बोलो?”

“गौरी तुम कल बाकी चीजों का इंतजाम कर लेना फिर मैं उस 8वीं चीज के लिए कुछ करता हूँ।”


मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। पता नहीं क्यों गौरी से सीधे नज़रें मिलाने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। क्या पता गौरी क्या सोच रही होगी या क्या प्रतिक्रिया करेगी.

“हओ”

“अच्छा गौरी! सवा ग्यारह हो गए हैं अब बाकी कल पढ़ेंगे। आज जो पढ़ाया उसे दिन में अच्छे से याद कर लेना।”

“ओके सल … गुड नाईट.”

“ओके डीअर शुभ रात्रि.”


हे लिंग देव तेरी जय हो। मैं तो इस सावन में सोमवार के बाकी बचे सभी व्रत बड़ी ही श्रद्धापूर्वक करूंगा और तुम कहोगे तो भादों महीने में भी 

तीन पत्ती गुलाब

भाग -16

प्रिय पाठको और पाठिकाओ! आइए अब लिंग दर्शन और चूसन के इस सोपान की अंतिम आहुति डालते हैं…


आज सुबह-सुबह मधुर ने नया फरमान जारी कर दिया। आज प्रेम आश्रम में हरियाली तीज महोत्सव मनाया जाने वाला है तो हमारी हनी डार्लिंग (मधुर) अपनी सभी सहेलियों के साथ आश्रम में जाने वाली है।

मधुर ने लाल रंग की सांगानेरी प्रिंट की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज पहना है और कलाइयों में लाल रंग की चूड़ियाँ। हाथों में मेहंदी, पैरों पर महावर, मांग में सिन्दूर और होंठों पर गहरी लाल लिपस्टिक लगाई है।


लगभग 8 बजे सभी सहेलियां आश्रम जाने वाली हैं। स्कूल से आज उसने छुट्टी ले रखी है। आज का पूरा दिन आश्रम में बिताने वाली है। मधुर ने बताया कि वहाँ सभी सुहागन स्त्रियाँ हरियाली तीज महोत्सव मनाएंगी जिसमें मेहंदी प्रतियोगिता और गुरूजी के साथ झूला झूलने की प्रतियोगिता होगी। मुझे तो कई बार डर भी लगता है। आजकल इन बाबाओं के दिन खराब चल रहे हैं। किसी दिन साले किसी बाबा ने सच में झूला झुला दिया तो फिर मेरा क्या होगा? हे लिंग देव! कृपा करना।


मधुर के आश्रम कूच करने के बाद गौरी ने मेन गेट बंद कर दिया और रसोई में चाय बनाने चली गई और मैं हाल में सोफे पर बैठा अखबार पढ़ने लगा।


थोड़ी देर में गौरी चाय बनाकर ले आई। जब वह थर्मोस से गिलास में चाय डालने लगी तो मैंने कहा- गौरी, मुझे लगता है यह जिन्दगी तो चाय या कॉफ़ी में बीत जायेगी.

और फिर मैं अपनी बात पर हंसने लगा।

“वो तैसे?” गौरी ने आँखें नचाते हुए पूछा।

“अरे यार! क्या जिन्दगी है? सारे दिन भाग दौड़ और ऑफिस की मगजमारी? किसी के पास मेरे लिए समय ही नहीं है और ना ही कोई परवाह।”

“हम्म”


“जी में आता है मधुर और तुम्हें लेकर किसी हिल स्टेशन पर जाकर बस जाऊं.”

“ना बाबा ना … वहाँ तो बड़ी बालिश होती है.” गौरी ने हंसते हुए कहा।

“तो क्या हुआ रोज बारिश में खूब नहाया करेंगे. तुम्हें बारिश में नहाना अच्छा नहीं लगता है क्या?”

“बचपन के दिनों में जब बालिश होती थी तो मैं मोहल्ले के सभी बच्चों के साथ खूब नहाया कलती थी।” कह कर गौरी हंसने लगी।


“पता है मुझे भी बचपन में बारिश में नंगे होकर नहाने में बड़ा मज़ा आता था और सारे बच्चे कपड़े भीगने के डर से नंगे होकर नहाते थे ताकि घरवाले नाराज़ ना हों।”

गौरी अब खिलखिला कर हंसने लगी।

“अच्छा गौरी तुम भी सारे कपड़े निकाल कर नहाती थी क्या?”

“हट …” गौरी शर्मा गई।

“काश मैं भी उस समय तुम्हें नंगी नहाते देख सकता!”

“हट… ऐसी बातों से मुझे बहुत शल्म आती है।”


“गौरी पता है कई बार मैं क्या सोचता हूँ?”

“त्या?”

“मैं मरने के बाद अगले जन्म में मक्खी, मच्छर या कोक्रोच ही बन जाऊं?”

“आप मलने ती बात त्यों तलते हैं?”

“अरे यार, तुम्हारे लिए तो मैं सौ जन्म भी ले लूं?”

“तैसे? त्यों? मैं समझी नहीं?”

“अरे बड़ा मज़ा आएगा?”

“इसमें मज़े वाली त्या बात है?”

“हाय… तुम क्या जानो?”

“अच्छा आप बताओ?”

“मक्खी या मच्छर बनकर मैं बाथरूम में छिपकर बैठ जाऊंगा और मर्जी आये उसी खूबसूरत लड़की को नहाते समय मज़े ले-ले कर देखता रहूँगा? आह… तुम नहाते समय कितनी खूबसूरत लगती होगी?”

“हट!”

“सच्ची … गौरी मैं सच कहता हूँ तुम बहुत खूबसूरत हो।”


गौरी शरमाकर एक बार फिर से लाजवंती बन गई। अब वह छिपाने की चाहे लाख कोशिश करे पर उसकी झुकी हुई मुंडी और मंद-मंद मुस्कान से साफ़ पता चलता है कि वह इस समय वह रूपगर्विता बनकर अपने आप को बड़ी खुशनशीब समझ रही है।


“अरे गौरी?”

“हओ?”

“ये तुम्हारे मुंहासे तो बढ़ते ही जा रहे हैं?”

“हओ… मेली तिस्मत खलाब है। पता है आजतल इन मुंहासों ती चिंता में मुझे लात को नींद ही नहीं आती.” गौरी की शक्ल रोने जैसी हो गयी थी।


“हाँ… यार यह बात तो सच है। अगर चेहरा खराब हो गया तो बड़ी परेशानी होगी। अब देखो ना गुप्ताजी की लड़की का कितनी मुश्किल के बाद अब जाकर रिश्ता हुआ है और वो भी 40-45 साल का बुढ़ऊ के साथ।” मैंने जानकार गौरी को थोड़ा और डराया।

“हे भगवान्…” गौरी ने आह सी भरी।

मुझे लगा गौरी अब सुबकने लगेगी।


“अच्छा गौरी?”

“हओ?”

“तुमने वो बाकी चीजों का जुगाड़ किया या नहीं?”

“गुलाब ती पत्तियाँ, शहद, दूध ओल हल्दी ही मिली.”

“और बाकी चीजें?”

“किच्च… नहीं मिली?”

“ओह…?” मैंने एक लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा।

“गौरी ये लेप वाला भी झमेले का काम है। एक काम तो हो सकता है पर …” मैंने अपनी बात जानबूझ कर अधूरी छोड़ दी।

“पल… त्या?” गौरी ने कातर दृष्टि से मेरी ओर ताका।

“तुम से नहीं हो पायेगा.”

“आप बताओ… प्लीज?”

“शरमाओगी तो नहीं?”

“किच्च?”

“ओ.के. … चलो एक काम करो वो शहद, कच्चा दूध और गुलाब की पत्तियाँ आदि जो भी मिला वो सब एक कटोरी में डाल कर लाओ फिर कुछ करते हैं।”


मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। लगता है अब मंजिल बस दो कदम दूर रह गई है। सच कहूं तो इस समय मेरी हालत यह थी कि जैसे मुझे कैरूँ का खजाना ही मिलने जा रहा है और अब उत्तेजना और रोमांच में मुझे इस खजाने को कैसे संभालना है? कुछ सूझ ही नहीं रहा था। एक बात की मुझे और हैरानी हो रही थी? अभी तक मेरा पप्पू बिलकुल अटेंशन की मुद्रा में सलाम बजा रहा था पर अचानक वह कुछ ढीला सा पड़ गया था। कहीं आज भी उसकी मनसा धोखा देने की तो नहीं है?


हे लिंग देव! गच्छामी तव शरणम्!!!


थोड़ी देर में गौरी दो कटोरियों में शहद और कच्चा दूध और एक प्लेट में गुलाब और नीम की पत्तियाँ डालकर ले आई।

“गौरी बाथरूम में चलते हैं यहाँ सोफे पर शहद वगेरह गिर गया तो गंदा हो जाएगा और फिर मधुर तुम्हें डांटेगी.”


“हओ” गौरी ने मरियल सी आवाज में कहा।

गौरी अपनी मुंडी झुकाए मेरे पीछे पीछे ऐसे चल रही थी जैसे जिबह होने के समय कोई जानवर चलता है।


और फिर हम दोनों बेडरूम में बने बाथरूम में आ गए। मैंने बाथरूम की लाइट जला दी और पंखा और एग्जॉस्ट फैन भी चला दिया। गौरी ने दोनों कटोरियाँ और प्लेट वाशिंग मशीन पर रख दी।


“गौरी! देखो तुम मेरी प्यारी शिष्या हो। मैं यह सब केवल तुम्हारे हित के लिए ही कर रहा हूँ। मेरे मन में किंचित मात्र भी यह भावना नहीं है कि मैं तुम्हारा कोई नाजायज फायदा उठा रहा हूँ और ना ही मेरी मनसा और नियत में कोई खोट है। मैं तुम्हारे साथ कोई भी छल-कपट या फरेब जैसा कुछ नहीं कर रहा हूँ और ना ही कोई शोषण कर रहा हूँ। मैं जो भी कुछ कर रहा हूँ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बेहतरी और भलाई के लिए कर रहा हूँ। और हाँ… एक और बात है.”

“त्या?”


“देखो गुरु और डॉक्टर के सामने कोई शर्म नहीं की जाती। इस समय तुम मेरे लिए केवल एक मरीज हो और मेरा फ़र्ज़ है कि मैं अपनी प्रिय शिष्या की हर संभव सहायता करूँ ताकि तुम्हें इन मुंहासों से छुटकारा मिल जाए। अब तुम्हें भी अपने इस मर्ज़ (मुंहासों की बीमारी) के लिए कुछ त्याग और तपस्या तो करनी ही होगी। अपने भले के लिए और मर्ज़ को ठीक करने के लिए कई बार ना चाहते हुए भी शर्म छोड़कर कड़वी दवा पीनी पड़ती है। और तुम तो जानती हो कुछ पाने के लिए कुछ त्याग भी करना पड़ता है। तुम समझ रही हो ना?”

“हओ” गौरी ने मिमियाते हुए कहा।


मैं गौरी की मन:स्थिति अच्छी तरह समझ रहा था। इस समय वह एक दोराहे पर खड़ी थी। एक तरफ उसकी नारी सुलभ लज्जा एवं उसके संस्कार और दूसरी तरफ उसके चहरे के खराब हो जाने का भय। वह अंतिम फैसला लेने में कुछ हिचकिचा सी रही थी।


एक पल के लिए मेरे मन में यह ख्याल जरूर आया कि मैं कहीं इस मासूम का शोषण तो नहीं कर रहा? कहीं इसके साथ यह ज्यादाती तो नहीं है? पर दूसरे ही पल मेरा यह ख्याल जेहन से गायब हो गया। अब मेरा जाल इतना पुख्ता था कि अब किसी भी प्रकार से उसमें से निकल पाना गौरी के मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।


“गौरी अगर अब भी तुम्हें लगता है कि यह तुमसे नहीं हो पायेगा तो कोई बात नहीं … तुम्हारी मर्ज़ी!” मैंने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था अब वो चिर-प्रतीक्षित लम्हा आने वाला था जिसका इंतज़ार मैं पिछले एक महीने से कर रहा था।


“थीत है आप बताओ त्या तरना है?”

“गौरी कुछ भी करने से पहले तुम्हें मुझे एक वचन देना होगा?”

“त्या?”

“तुम्हें अब शर्म बिलकुल नहीं करनी है और जैसा मैं कहूं तुम्हें करना है.”

“हओ… थीत है।”


“सबसे पहले तो तुम हाथ जोड़कर भगवान जी से या मातारानी से यह प्रार्थना करो कि इस दवाई से तुम्हारे मुंहासे जल्दी से जल्दी ख़त्म हो जाएँ।”

गौरी ने मेरे कहे मुताबिक़ हाथ जोड़कर प्रार्थना की। मैंने भी हाथ जोड़कर प्रार्थना करने का सफल अभिनय किया। एक बात आपको बता दूं ज्यादातर हम भारतीय लोग धर्मभीरु होते हैं और किसी बात पर अगर धर्म या भगवान् का मुलम्मा (चासनी) चढ़ा दिया जाए तो सब कुछ आसानी से किया और करवाया जा सकता है।


प्यारे पाठको और पाठिकाओ! आपके दिलों की धड़कनें भी अब बढ़ गयी हैं ना? आप सोच रहे होंगे कि यार प्रेम क्यों अपना बेहूदा ज्ञान बखार कर हमारे लंडों और चूतों को तड़फा रहे हो? जाल में फंसी इस कबूतरी को अब हलाल कर दो। ठोक दो साली को।


चलो आपकी राय सिर माथे पर, आज मैं आपकी बात मान लेता हूँ…


“गौरी मुझे भी थोड़ी शर्म तो आ रही है पर अपनी प्रिय शिष्या की परेशानी के लिए मुझे अपनी शर्म पर काबू करना ही होगा।” मेरे ऐसा कहने पर गौरी ने मेरी ओर देखा।


उसकी साँसें बहुत तेज चल रही थी। इतने खुशनुमा मौसम में भी उसके माथे और कनपटी पर हल्की हल्की पसीने की बूँदें झलकने लगी थी।


“देखो, मैं अपना निक्कर उतारता हूँ। तुम्हें मेरे लिंग को पकड़कर बस थोड़ी देर हिलाना है और उसके बाद उसमें से वीर्य निकलने लगेगा। तुम्हें थोड़ी जल्दी करनी होगी, वीर्य नीचे नहीं गिरना चाहिए तुरंत कटोरी में डाल लेना। वीर्य ताज़ा हो तो जल्दी असर करता है। समझ रही हो ना?”

गौरी ने अपनी मुंडी झुकाए हुए सुस्त आवाज में ‘हओ’ कहा।


मैंने अपने बरमूडा (निक्कर) का नाड़ा खोल दिया। पप्पू महाराज जो अब तक सुस्त पड़ा था अब थोड़ा कसमसाने लगा है। अभी तो इसकी लम्बाई केवल 3-4 इंच ही लग रही है। पूर्ण उत्तेजित अवस्था में तो यह लगभग 7 इंच के आस पास हो जाता है। हे लिंग देव तेरा शुक्र है अभी इस पर अभी पूरा जलाल नहीं आया है वरना गौरी इसे देख कर डर ही जाती और हो सकता है अपना इरादा ही बदल लेती।



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