मैं उसका दीवाना वह मेरी दीवानी अध्याय 5

  मैं उसका दीवाना वह मेरी दीवानी अध्याय 5



मैं बाथरूम में घुस गया हाथ मुह धोकर आया तब तक रति ने खाना लगा दिया था मोमबत्ती की हलकी सी रौशनी में अपना तो वोही कैंडल लाइट डिनर हो गया था चुप चाप हम भोजन कर रहे थे बदन में थोडा सा दर्द होने लगा था ऐसे लग रहा तह की आज जैसे कोई बहुत भारी काम किया हो खाने के बाद मैंने पुछा- तुम्हारे पैर की खाल कैसे ही दवाई लगाई क्या 


वो- नहीं बस कपडे से साफ़ किया था सोने से पहले लगा लुंगी 


मैं- अभी लगाओ अब बस सोना है और क्या करना है लाओ दवाई मैं लगा देता हूँ बाकी काम बाद में मैं दवाई की ट्यूब को खोल ही रहा था की वो मोमबती भी दम तोड़ गयी कमरे में घुप्प अँधेरा हो गया 



दूसरी मोमबत्ती है क्या 


वो- नहीं ये छोटा सा टुकड़ा ही था पहले पता होता तो रख लेती 


मैं – चलो कोई बात नहीं 


रति बिस्तर पर बैठ गयी अँधेरे में बस अब हाथो से ही काम चलाना था अंदाजे से मैंने उसकी मैक्सी को ऊपर किया और उसकी जख्म पर दवाई लगाने लगा रति को थोडा दर्द होने लगा पर दवाई भी जरुरी थी उसकी कोमल जांघो को सहलाते हुए मैं दवाई लगा रहा था रति के बदन में एक बार फिर से गर्मी बढ़ने लगी थी 

आराम मिल रहा है पुछा मैंने 


वो- हाँ, उम्म्फ आज तो लगता है की जैसे पैरो की जान ही निकल गयी हो 


मैं- पैर दबा दू 


वो- नहीं नहीं 


मैं उसकी सही वाली जांघ पर अपनी उंगलिया फिराने लगा रति मेरे स्पर्श से बेचैन होने लगी मैं धीरे धीरे अपने हाथ को ऊपर चूत की तरफ ले जाने लगा उसकी पेंटी की लाइन को छूने लगा मैं 


वो पैर पटकते हुए- क्या कर रहे हो 


मैं- कुछ . . कुछ भी नहीं 


वो- सच में 


मैं- तुम्ही देख लो कुछ भी तो नहीं कर रहा 


ये कहने के साथ ही मैंने अपनी मुट्टी में उसकी चूत को कस लिया और भींच दिया 



आआआआआअह उफफ्फ्फ्फ़ की आवाज उसके मुह से निकली और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया 


मैं- रति…………….. छूने दो मुझे 


वो- क्यों मेरी परीक्षा लेने पे तुले हो क्यों सता ते हो मुझे इस कदर तुम, अब तो दर सा लगने लगा की कही मैं बह न जाऊ तुम्हारे साथ 


मैं उसकी चूत को मसलते हुए, – तो क्या हुआ क्या तुम्हारा हक़ नहीं अपने हिस्से की ख़ुशी को पाने का क्या तुम्हे इस जिस्म की अंगड़ाईयाँ मजबूर नहीं करती रति मैं बस चाहता हूँ की तुम भी इस ख़ुशी को महसूस करो आखिर कब तक अपने झूठे विश्वाश के बूते जीती रहोगी तुम, मैं कोई भंवर नहीं हूँ जो जिसे बस तुम्हारे यौवन के रस को चखने की प्यास है 


तुम्हे दिल से अपना मान लिया है सहयाद ये मेरी किस्मत का कोई करम था जो तुम्हारे दरवाजे पर मुझे ले आया

वो- पर तुम वो भी तो नहीं हो जिसको मैं ये सब सौंप सकूँ मैं 


मैं- तो फिर क्यों मैं यहाँ तक आ गया क्यों तुम मुझे मेरी पहली कोशिश पर ही नहीं रोक सकी , मन की मेरी तो फितरत आवारा ठहरी पर तुम तो मजबूत थी फिर क्यों इस वक़्त तुम इस हालात म मेरी बाहों में सिमटी पड़ी हो रति जरा कोशिश तो करो मेरे मन को समझने को तुम्हारे लिए इसमें कोई छल कपट नहीं बस अगर कुछ हैं तो बस एक निश्चलता , एक अपना पण तुम्हारे लिए मैंने बहुत कोशिश की इन बीते चार दिनों में हर पल खुद को रोका पर नहीं रोक सका तुम्हारे करीब आने से तुम्हारे रूप की ये जलती हुई पवित्र ज्योति मुझे खीच लायी तुम्हारे पास 



कच्छी का चूत के ऊपर वाला हिस्सा पूरी तरह गीला हो चूका था उसकी चूत से टपकते हुए योनी रस से मेरी उंगलिया चिप छिपी होने लगी थी मैं थोडा सा उसकी तरफ सरका और रति को बिना कुछ कहे अपनी बाहों में कैद कर लिया और उसके गालो को चूमने लगा वो मीठी मीठी सी सिस्कारियां भरते हुए मेरी गोद में चढ़ सी आई , मैंने अपने हाथो से उसकी पीठ को सहलाने लगा और थोड़ी देर बाद पूर्ण रूप से उस यौवन के छलकते प्याले को अपनी गोद में बिठा लिया मेरा तौलिया ना जाने कब का खुल चूका था मेरे कच्चे की कैद में मेरा लंड बेकाबू होकर बहार निकलने का प्रयास कर रहा था ऊपर से रति के गोद में आ जाने से उसकी गांड मेरे लंड पर पूरा दवाब डाले हुए थी 



रति- आः आह आह 


मैंने धीरे से उसकी मैक्सी को उसके बदन से आजाद कर दिया रति ब्रा-पेंटी में मेरी गोद में बैठी हुई एक नाकाम कोशिश कर रही थी पर उसका बदन जो अब जल रहा था उस आग में जिसको आज उस बरसात की सख्त आवश्यकता थी जो उसके तन मन को आज इस कदर भिगो दे, उसको औरत होने का सुख दे उसकी हर प्यास को आज भिगो दे उस बंजर जमीन पर मैं आज घनघोर बादल बन कर बरस जाना चाहता था कमरे की खुली खिड़की से चन चन कर ठंडी हवा अपने साथ बारिश के एहसास को भी ला रही थी उसके सेब जैसे गालो को अपने मुह में भरते हुए मैंने उसकी ब्रा को खोल दिया पल में ही उसकी कसी हुई छातिया मेरे सीने से आकार लग गयी उनकी नुकीली नोक मेरे सीने में धंसने लगी 



बिना देर किये मैंने अपने चेहरे को उसके उभारो पर झुका दिया और उसकी एक चूची को मुह में भर लिया रति इस बार अपनी आहो को मुह में कैद नहीं रख पायी और उसके होतो से आह फूट पड़ी उम्म्म्फफ्फ्फ़ आःह्ह यीईईईए ये क्या कर दिया तुमने आः उसके बदन में जैसे 440 वाल्ट का करंट दोड़ने लगा था उसकी चूची क्या गजब थी मैंने एक को पीने लगा और दूसरी को भेंचने लगा मदमस्त मस्ती की तरंग रति के कामुक बदन में हिलोरे लेने लगी कमरे के सन्नाटे को उसके लबो से फूटी आहे भंग करने लगी 



अब मैंने रति को बिस्तर पर पटक दिया और जल्दी से अपने कच्छे को उतार फेंका और जल्दी से दुबारा उसकी छातियो पर झुक गया पर इस बार मैंने उसके हाथ को लिया और लंड पर रख किया रति इ लंड को पकड़ लिया और अपनी मुट्ठी में कस लिया औरत के हाथ को महसूस करते ही लंड की नसे फूलने-पिचकने लगी मैं बारी बारी से उसके दोनों बोबो का रसपान करने लगा रति धीरे धीरे मेरे लड को सहलाने लगी मुझे ख़ुशी थी की रति खुले मन से मेरा साथ दे रही थी आखिर उसे भी तो हक था अपनी इच्छाओ को जीने का चाहे फिर ये रास्ता बेशक गलत ही क्यों ना था पर फिर भी …………….



करीब दस मिनट बाद मैं उसके बोबो से हट गया और उसकी कच्छी को उतरने लगा रति ने एक बार फिर से कम्जोर कोशिश की और कांपती सी आवाज में बोली- मानोगे नहीं मुझे भी पापिन करोगे ही अपने साथ 

मैं- ये कोई पाप नहीं है रति बस मिलन है दो दोस्तों का मिलन है दो हिस्सों का जो अब से पहले भटक रहे थे कही पर 


मैंने जैसे ही इलास्टिक को खीचा रति ने अपनी गांड को थोडा सा ऊपर कर लिया ताकि मैं उसकी कच्छी को आराम से उतार सकू , अब उस अँधेरे में हम दोनों बिलकुल नंगे थे मैंने उसकी नाभि पर हल्का सा चुम्बन अंकित किया रति के समूल में हलचल मच रही वो किसी मछली की तरह मचलने लगी की आस हो जल्दी से समुन्दर में मिल जाऊ मैंने अपने हाथो से उसकी चूत को टटोला छोटी सी अनछुई चूत उसकी बेहद ही चिकनी एक भी बाल नहीं वहा पर ऐसा लगता था की जैसे आज या कल ही सफाई की गयी हो उसकी बहुत चिकनी पूरी तरह से योनी रस से भीगी हुई 



मुझसे अब काबू ना रहा मैंने उसकी टांगो को सावधानी से थोडा सा फैलाया क्योंकि उसके पैर में जख्म भी तो था उस वजह से और अपने सर को उसकी जांघो के बीच में घुसा दिया , रति की चूत पर जीभ रखते ही मुझे मजा आ गया खारा खारा सा पानी मेरी जीभ से लड़ने लगा मेरी खुरदरी जीभ की रगड़ जो चूत पर पड़ी रति बुरी तरह से मचल पड़ी ओह्ह्हह्ह्ह्ह क्येआ किया तुम्नीईईईईईईईईईईई या क्याआआअ कर दिया ये तुमने मैंने मजबूती से उसकी टांगो को थामा और रति की पूरी चूत को अपने मुह में भर लिया रति की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी गम हो गयी उसकी धड़कने बढ़ गयी साँसे रुक्नो को आई 


उसकी चूत कर रस मेरे गले से नीचे उतरने लगा चूत की पतली सी दरार में मैं अपनी जीभ को घुसेड़ने लगा रति की गांड अपने आप उछालने लगी चूत से आती काम रस की मनमोहक खुशबू मेरे नथुनों से होती हुई दिल में उतरने लगी करीब ३-४ मिनट तक चूत को चाट ता रहा मैं रति ने अणि सिस्कारियो से जैसे पुरे कमरे को सर पर उठा लिया था मदहोशी के आलम में वो मेरे सर को बार बार अपनी चूत पर दबा रही थी मुझे थोड़ी मस्ती सूझीऔर मैंने उसकी चूत के भाग्नासे को अपने दांतों में दबा लिया क्या बताऊ उसका हाल कैसा था उस पल में 




रति मेरे इस वर को सह नहीं पाई और तेज आवाज करते हुए मेरे मुह में ही झड़ने लगी उसकी चूत के पानी के कतरे कतरे को मैंने अपने गले में उतार लिया लम्बी लम्बी सासे लेटे हुए रति बिस्तर पर निढाल पड़ गयी 


मैं भी उसकी बगल में लेट गया उसके बोबो को फिर से दबाते हुए मैंने पुछा- सच बताना कैसा लगा 


वो- हांफते हुए- कमीने हो तुम , बहुत ज़ालिम हो तुम 


मैं- मजा आया न 


वो-मेरी छाती मे मुक्का मारते हुए बोली- धत्त 



मैंने उसके आहत में फिर से अपने लंड को दे दिया और बोला – देखो ना इसको कितना गरम हो गया है 

तुम्हारे लिए


ये रति उसको सहलाने लगी और बोली- तुम पहले भी ये सब कर चुके हो ना 


मैं- हां कर चूका हूँ पर ये ना पूछना की किसके साथ वर्ना रात वो सब बताने में ही गुजर जायेगी और मैं तुम्हे प्यार नहीं कर पाउँगा 


रति लंड को हिलाने सा लगी 


मैं- रति इसको भी प्यार करो ना 


वो- कर तो रही हूँ न 


मैं- ऐसे नहीं जैसे मैंने तुम्हारे वहा पर कियावैसे ही इसको किस करो ना 


वो- मुझसे नहीं होगा 


मैं- क्या मेरे लिए नहीं करोगी 


वो- नहीं होगा नामैं कुछ एर के लिय खामोश हो गया करीब ५ मिनट बाद मुझे लंड पर कुछ गीला सा महसूस हुआ 


मैंने टटोला तो रति का सर था उसने लंड पर अपने कामुक होंठ रख दिए और उसको किस करने लगी मेरे मुह से आह निकली मैं बोला बहुत अ बढिया जरा मुह खोल कर इसको थोडा सा अन्दर ले लो 


रति ने अपना मुह खोला और मेरे सुपाडे को अपने होंतो में दबा लिया कसम से प्राण ही निकलने को आये रति धीरे धीरे करके पुरे लंड से खेलने लगी मुझे बड़ा मजा आने लगा था उसके गुलाबी होंतो में मेरा लंड कैद था धीरे धीरे करके उसने आधे लंड को मुह में ले लिया था उसके मुह से रिश्ता थूक लंड को चमका रहा था चिकना कर रहा था

पर मैं उसके मुह में नहीं झाड़ना चाहता था , अब मैं पूरी तरह से तैयार था उसकी चूत मारने को मैंने लंड को उसके मुह से निकाल लिया और रति को बिस्तर पर लिटा दिया एक तकिये को उसके कुलहो के नीचे लगाया ताकि उसकी चूत ऊपर उठ जाए और मुझे लेने में आसानी हो , मैंने थोडा सा थूक उसकी चूत पर लगाया और लंड को चूत पे सता दिया रति की चूत आज पहली बार लंड को अपने मुह पर महसूस कर रही थी रति का बदन बुरी तरह से कांप रहा था , मैंने सुपाडे को चूत के दरवाजे पर सेट किया और धक्का लगाया पर वो फिसल गया रति के मुह से आह निकली 



मैंने थोडा सा थूक और लगाया लंड पर बिलकुल भिगो दिया उसको एक बार फिर से लंड तैयार था इस बार जो धक्का लगाया उसकी चूत को फाड़ते हुए आधा सुपाडा अन्दर को सरक गया और इसी के साथ रति के गले से एक चीख निकल पड़ी अ”आः आह माँ मैं तो मरी रे ” उसका पूरा जिस्म अकड़ गया वो मेरी पकड़ से छुटने को जोर लगाने लगी पर मैंने उसको मजबूती से पकड़ा और एक धक्का और लगाया उसकी चूत अन्दर से इतनी गरम थी की मुझे लगा मेरा लंड जल ही जायेगा रति की रुलाई छुट पड़ी वो दर्द से रोने लगी पैरो को पटके पर मेरी पकड़ मजबूत 



मैंने थोडा सा जोर और लगाया और इस बार आधा लंड चूत में घुस गया , बेहद टाइट चूत उसकी लंड रोता रोता सा अन्दर को जाए 


रति रोते हुए-“बहुत दर्द हो रहा है मैंने तो मर ही गयी, आह निकालो इसे बहार ”


,मैं- बस हो गया हो गया अभी सब सही हो जायेगा 


पर चूत फटने का दर्द तो वो ही जाने उसे ही झेलना था मैंने लंड को थोडा सा पीछे को खीचा और पूरा जोर लगाते हुए फिर से आगे को ठेल दिया रति की चूत की पंखुडियो को फैलाते हुए मेरा पूरा लंड चूत में धंस चूका था मेरे अंडकोष उसकी जांघो के जोड़ से टकराए मैं उस पर छाता चला गया रति की रुलाई बढ़ गयी मैं चुपचाप उसके ऊपर लेता हुआ था 



करीब ५-७ मिनट बाद मैं बोला- बस अभी सब ठीक हो जायेगा बस थोड़ी हिम्मत रखो 


वो- क्या ख़ाक हिम्मत रखु मुझे तो सांस नहीं आ रहा है ऐसा लगता है किसी ने तेजधार छुरी घुसेड दी हो 


मैं- दो मिनट रुको तो सही 


मैंने अपने लबो को उसके लबो से जोड़ दिया और उनको चूमने लगा ताकि दर्द से उसका ध्यान हट सके 


मैं- तुम्हारे होंठ बहुत मीठे है 


वो- सच में 


मैं- तुम्हारी कसम मेरी जान चीनी भी कुछ नहीं जब इनका स्वाद आये 


वो- आह ये दर्द 


मैं – इस दर्द का भी एक सुख है रति उस सुख को सोचो 


मैंने लंड को अब धीरे धीरे से हिलाना शुरू कर दिया उसकी दर्द भारी सिस्कारिया तेज हो गयी 


रति- थोड़ी देर रुक जाओ ना बहुत दर्द हो रहा है 


मैं- ये दर्द तो सहना ही होगा तुम्हे, हर औरत सहती है 



मैंने अब लंड को किनारे तक बहार खीचा और रति की चूत में फिर से पेल दिया इस बार उसकी चीख मेरे मुह में ही दम तोड़ गयी अब मैंने उसको चोदना शुरू किया धीरे धीरे से हम दोनों के होंट ऐसे चिपके एक दुसरे से जैसे की फेविकोल का जोड़ हो कमरे की उमस से हम दोनों के शरीर से पसीना बह चला था कुछ देर बाद उसने अपने होंठ छुडाये और बोली दर्द कम होने लगा है मैंने कहा थोड़ी देर में गायब हो जायेगा और कस कर एक धक्का लगा दिया उसके बोबे मेरे हर धक्के पे बुरी तरह से हिल रहे थे 


बस अब मुझे इस सूखी जमीं पर बादल बनकर खूब बरसना था अपने प्यार की बूँद बूँद से रति को पुलकित कर देना था चूत को मारते हुए मैंने धीरे से उस से पुछा कैसा लग रहा है 


रति- कांपती आवाज में, बहुत अलग सा लग रहा है ऐसे अलग रहा है की जैसे मैं बहुत हलकी हो गयी हू मैं-

ये तो बस शुरुआत है 


मेरे धाक्को की रफ़्तार अपने आप बढती जा रही थी रति की टाँगे अब ऊपर को होने लगी थी आह आह करती हुई वो चुदाई के रंग में रंगती जा रही थी पूरा लंड उसकी चूत में झटके से अन्दर बहार हो रहा तह लंड जब बहार को खीचता तो लगता की चूत की पंखुड़िया उसके साथ ही आएँगी बहुत ही चिकनी और गरम चूत उसकी, चूत से जो पानी रिस रहा था उस से उसकी जांघे और मेरे अंडकोष पूरी तरफ से गीले हो चुके थे रति कभी किस करती कभी अपने हाथो को मेरी पीठ पर रगड़ते हुए चूत मरवा रही थी 



दो जवान जिस्म एक दुसरे में समा चुके थे घपा घप थप थप करते हुए मेरी टंगे उसकी टांगो से टकरा रही थी हम दोनों के होंठ थूक से पूरी तरह सने हुए थे उसका झटके खाता हुआ बदन पहली बार चुदाई के आनंद को प्राप्त करने की दिशा की और बढ़ रहा था साँसे सांसो में घुल रही थी धीरे धीरे उसके कुल्हे मेरे धक्को से कदम ताल मिलाने लगे थे चुदाई का सुरूर हम दोनों पर चा चूका था कमरे का वातावरण जैसे दाहक उठा था दिलो की आग जिस्मो की आग में तब्दील हो चुकी थी 



उसकी चूत बहुत ज्यादा पानी छोड़ रही थी मेरा मस्ताना लंड उसकी चूत की हर दिवार क चूम चूम जा रहा था अचानक से ही रति की पकड़ मेरे जिस्म पर बहुत कस गयी उसने अपनी टटांगो को मेरी कमर की तरफ लपेट लिया और मुझे कस के अपने सीने से लगा लिया उर पता नहीं क्या क्या बद्बदते हुए अपने चरम सुख को महसूस करने लगी, उसकी जिंदगी की पहली चुदाई , पहले सुख को प्राप्त कर लिया था उसने पर मैं उसको अब तेजी से चोदे जा रहा था रति बुरी तरह से हाई हाय करते चुद रही थी वो झड गयी थी इसलिए अब उसक परेशानी हो रही थी 



पर मैं क्या करू जब तक मेरा काम न हो कैसे छोड़ दू उसक पसीने से उसका पूरा बदन गीला हो चूका था वो कराहते हुए बोली छोड़ दो ना मुझे अब सहन नहीं होता है 


मैं- हांफते हुए बस दो मिनट रुको होने वाला है मेरा भी 


मैं धक्के पे धक्के लगाये जा रहा था बिना रुके हुए मेरे चेहरे पर सारा खून जमा होने अलग शरीर का जिस्म बुखार की तरह तपने लगा मेरा और फिर आह जैसे किसी ने बदन से पूरी ताकत निकाल ली हो मेरी मैं उसके ऊपर देह गया लंड से एक के बाद एक वीर्य की पिचकारिया उसकी गरम चूत में गिरने लगी मैं साख से टूटे किसी पत्ते की तरह उसके ऊपर ढेर हो गया

किसी दरख्त की टूटी शाख की तरह एक दुसरे के बाजु में पड़े थे हम लोग बाहर अब बरसात ही रही थी या नहीं पर अन्दर कमरे में अभी अभी एक बारिश थमी थी जिसमे मैं और रति बुरी तरह से भीग चुके थे , मैंने अपना हाथ उसकी छाती पर रखा , उसकी सांसे बहुत तेजी से चल रही थी मैंने उसको अपने सीने से चिपका लिया दिल को करार सा आ गया , थी कौन वो मेरे लिए एक अजनबी जो बस अब अजनबी ना रही थी , वो कैसे एक ताजा हवा के झोंके की तरह मेरे मन मंदिर में उतर गयी थी , क्या ये किस्मत का एक और इशारा था या बस मेरी आवारगी की एक और दास्ताँ 


उसके चेहरे पर उलझ आई बालो की लटो को सुलझाते हे बोला मैं-“रति, ”


वो-हूँ 


मैं- क्या सोच रही हो 


वो- अपने आने वाले कल के बारे में 


मैं- क्या दीखता है 


वो- कुछ नहीं 


मैं- रति, कभी सोचा नहीं था की तुम यु मेरी जिंदगी में आ जाओगी मेरा इस तरह तुम्हारे शहर में आना तुमसे मिलना सब किस्मत का ही तो लिखा है , जो पल तुम्हारे साथ जी रहा हूँ कल को जब यहाँ से जाना होगा कहीं मेरे पांवो की बेडिया ना बन जाये 


वो- कहना क्या चाहते हो 


मैं- कहीं मैं तुम्हे चाहने तो नहीं लगा 


वो- ऐसा नहीं हो सकता 


मैं- क्यों नहीं हो सकता 


वो- मत भूलो की मैं किसी और की थी और उसकी ही रहूंगी , मैंने अभी जो भी तुम्हारे साथ किया उसका भली भाँती अंदाजा है मुझे , जानती हूँ ये बहुत गलत किया है मैंने पर मेरा दिल फिर भी इसे सही कह रहा है 


मैं- दिल की बात दिल जाने मैं तो अपना हाल बता सकता तुम्हे 


वो उठने की कोशिश करते हुए- आः आह दर्द होता हैं 


मैं – कहा पर 


वो- कहीं नहीं 


मैं- बताओ ना 


वो- उठाओ मुझे जरा ऐसा लगता है की किसी ने जान ही निकाल ली हैं मेरी तो ओअः 



मैं उसकी चूत को अपनी मुट्ठी में भरते हुए, यहाँ दर्द होता है क्या 


वो- बड़े पाजी हो तुम भी , उठाओ न जरा सा , पानी पीना है मुझे 


मैं- मैं लाकर देता हूँ 


मैंने पानी का गिलास उसको पकडाया अँधेरे में कुछ बूंदे उसके पेट पर गिर गयी तो वो चिहुंक उठी 


मैं- क्या हुआ वो ठंडा पानी पेट पर गिर गया मैं हंसने लगा 


मैं फिर से उसके पास लेट गया और रति के हाथ को थाम लिया 


वो- क्या इरादा हैं 


मैं- तुम्हे प्यार करने का 


वो- अभी किया तो था 


मैं- और करना है 


वो-ना बाबा ना अभी तक दुःख रहा हैं मुझे 


मैंने चुपचाप अपने लंड को उसके हाथ में दे दिया लंड उसके हाथ में जाते ही फिर से तनाव में आने लगा रति अपने हाथ को लंड पर ऊपर नीचे करने लगी मैं अपनी ऊँगली को उसकी गहरी नाभि पर फिराने लगा उसके कोमल बदन में फिर से एक बार हलचल सी होने लगी , मैंने अपना मुह उसकी चूची पर लगाया तो उसने कस कर मेरे अन्डकोशो को मसल दिया दर्द और मजे का मिश्रित अनुभव हुआ मुझे , मैंने अपने दांतों से उसके निप्पल को काटा 



“आह , क्या करते हो दुखता हैं ना” 


मैंने उसको अनसुना कर दिया और अपना कम जारी रखा रति की साँसे धीरे धीरे फूलने लगी थी उसकी छातिया सख्त होने लगी थी वो अपने हाथ को तेजी से मेरे लंड पर ऊपर नीचे कर रही थी मैं बारी बारी से उसके दोनों बोबो को मसलते हुए पि रहा था मेरा औज़ार पूरी तरह फिर से तैयार हो चूका था बस अब ढील करने की कोई जरुरत नहीं थी दोनों जिस्म एक बार फिर से एक दुसरे में समा जाने दो बेताब होकर बिस्तर की चादर पर मचलने लगे थे



मैंने रति के कुलहो पर थाप दी और उसको टेढ़ी कर दिया उसकी एक टांग को हवा में थोडा सा खोला और अपने लंड को उसके कुलहो के बीच से होते हुए चूत के सुराख़ पर रख दिया थोडा सा थूक मला मैंने सुपाडे पर उसके पेट को थामा और लगा दिया निशाना मंजिल की और फुच की आवाज आई और लंड बढ़ चला चूत की गहराइयों की और , रति के जिस्म ने झटका खाया मैंने उसकी कमर को अपने बाह से दबोचा और एक पेल और मार दी 



“आह, धीरे से नहीं डाल सकते क्या तुम ”



मैं- अगली बार धीरे से डालूँगा अब तो गया न 



“ओह ,रति कितनी कामुक हो तुम , कितनी गरम चूत है तुम्हारी जैसे की कोई भट्टी सुलग रही हो अन्दर देखो तुम्हारे रूप की तपिश से किस तरह पिघल रहा हूँ मैं ”


मैंने लंड को और आगे को ठेला रति ने अपने चुतद और पीछे को सरकाए उसके पेट को सहलाते हुए मैंने चुदाई शुरू की 



“आह, थोडा आहिस्ता से मेरा पैर खीच रहा है ” बोली वो 


मैं – कुछ नहीं होगा तुम बस समा जाओ मुझमे , मैं बनकर 


रति ने खुद को और टेढ़ा कर लिया और अब हम दोनों के बीच ख़ामोशी सी छा गयी थोड़े वक़्त के लिए बस कुछ आवाज आ रही थी तो उखड़ी हुई साँसों की या फिर थप थप मेरी गोलियों की उसकी गांड से टकराने की एक बार फिर से जिस्म जिस्म को तौलने लगा था , हसरते फिर से रूमानी हो उठी थी चूत और लंड कामुक रस बहाते हुए, प्यास की होली खेलने लगे थे 


दनदनाता हुआ मेरा लंड रति की चूत के छल्ले को फैलता हुआ घमासान मचा रहा था ऊपर से उसकी रसीली चूत इतना रस छोड़ रही थी की मैं क्या बताऊ, बस ये मोसम बेईमान बाहर हो रहा था एक बेईमानी हम लोग बिस्तर पर कर रहे थे पैर की वजह से रति को अब टेढ़ी होने में परेशानी हो रही थी मैंने उसको सीधा लिटा दिया और सावधानी से उसकी टांगो को फैलाया 



मैं अपने लंड को अब उसकी चूत में ना डाल कर बस चूत के होंटो पर रगड़ रहा था कभी कभी जब वो उसके दाने से रगड़ खा जाता तो रति सिसक उठती, उसकी आह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था रति इस समय बहुत गरम हो चुकी थी , उसने खुद मेरा लंड चूत पर रख कर अन्दर डालने का इशारा किया जैसे ही मैंने अपनी कमर को आगे की तरफ किया एक बार फिर से मेरा लंड चूत की पंखुडियो को चूमता हुआ रति के गर्भाशय की तरफ बढ़ने अलग उसकी टाँगे अपने आप चोडी होने लगी मैंने बिना उसपे झुके उसको चोदने लगा रति अपने हाथो से मेरे सीने को सहलाने लगी 



चिकनी चूत में मेरा मस्ताना गरम लोडा तेजी से अन्दर बहार होने लगा था रति की आहे सीधा जाकर छत से टकरा रही थी , ऐसी गरम चूत को चोदना मेरे लिए सोभाग्य की बात थी हर धक्के के साथ मैं उसके ऊपर आता जा रहा था अब मैं बिलकुल उसपे गिर चूका था हमारे होंठ एक दुसरे से टकराने लगे थे उर फिर धीरे से मैंने उनको आपस में मिला लिया क्या मजा आ रहा था मुझे रति की गांड कामुकता की अधिकता से बहुत ज्यादा थिद्रक रही थी चूत का पानी रह रह कर छूट रहा था करीब बीस पचीस मिनट की घमासान चुदाई के बाद मैं और रति बस आग पीछे ही छुट गए, एक बार फिर से उसकी चूत ने मेरे वीर्य की छोटी से छोटी बूँद को अपने अन्दर सोख लिया था

“मत पूछ की क्या हाल है मेरा तेरे आगे , जरा देख क्या रंग है तेरा मेरे आगे ”


रात के उन लम्हों को अपनी आँखों में कैद किये कब रति की बाँहों में नींद आ गयी फिर मुझे पता ही नहीं चला सुबह थोड़ी सी ठण्ड के अहसास से आँख खुली तो देखा की रति की कम्बल की तरह मुझसे लिपटी हुई सो रही है गुलाबी चेहरे पर एक नूर सा था उसे देख कर ऐसे लग रहा था की जैसे किसी गुलाब के ताज़ा पत्ते पर शबनम की कुछ बूंदे बिखरी पड़ी हो , आहिस्ता से मैंने उसको अपने से दूर किया और अपने कपडे उठा कर बाथरूम में घुस गया , पूरा बदन एक मीठी सी कसक से कसमसा रहा था 



जब मैं वापिस आया तो देखा की रति भी जाग गयी है मुझे देख कर वो शरमाई और चादर से अपने बदन को ढक लिया


मैं- मुझसे कैसा पर्दा , देखने तो मुझे तुम्हारे इस हूँस्न को 


वो- मुझे शर्म आती है


मैं- अच्छा जी रात को तो बड़ी बेशर्मी हो रही थी 


रति- चुप रहो तुम, रात की कोई बात ना करो 


रति चादर लपेटे हुए ही उठी और बाथरूम में घुस गयी मेरा दिल तो किया की उसके पीछे पीछे बाथरूम में घुस जाऊ पर फिर जाने दिया मैंने दरवाजा खोला और बहार का हाल देखा घर के बहार बरसात के कारन जबरदस्त कीचड हुआ पड़ा था पर अपने को क्या था मैं आज के बारे में सोचने लगा , मुझे नीनू के साथ घुमने जाना था पर दिल रति के साथ रहने को कर रहा था , ये साला दिल भी अजीब चीज़ बनायीं उस उपरवाले ने कब क्या कर जाये कब धोखा दे जाये किसी को कुछ पता नहीं खैर,



रति ने मुझे चाय का गिलास पकडाया और पुछा-“ तो आज का क्या इरादा है ”


मैं- तुम्हे प्यार करना 


वो- उसके आलावा 


मैं- नीनू के साथ जाऊंगा कुछ इधर उधर घुमने, फिर तुमसे मिलूँगा शाम को सच कहू तो तुम्हारे साथ ही रहने को दिल करता है पर नहीं गया तो वो नाराज हो जाएगी 


रति- उसको नाराज करना भी नहीं चाहिए तुम्हे 


मैं- और तुम्हारी नाराजगी 


– मेरी कैसी नाराज़गी, मैं तो सफ़र की किसी सराय जैसी, वो हमकदम तुम्हारी 


मैं- तुम भी कुछ लगती हो मुझ में पूछो 


वो- कोई जरुरत नहीं ,तुम आराम से घुमो फिरो एन्जॉय करो , और हाँ शाम को जब आओ तो मकेनिक से पता करके आना मेरी स्कूटी ठीक की या नहीं 


मैं- ठीक है मालिको , और कोई हूँक्म आपका 


वो हँसते हुए- और कुछ नहीं 


मेरे कपडे थोड़े थोड़े से गीले थे तो मैं उनको प्रेस करके सुखाने लगा रति खाने की तैयारिया करने लगी बार बार हमारी नजरी एक दुसरे से टकरा रही थी बिना बात के जैसे कोई तो बात थी जो बरबस ही होंठो पर आकर रुक सी जा रही थी , ये कैसी कशिश थी जो पल पल हमे एक दुसरे की तरफ ला रही थी उसके गीले बालो से आती वो मनमोहक जादुई खुशबू मुझे धीरे धीरे से उत्तेजना की तरफ धकेल रही थी मेरा ध्यान प्रेस से ज्यादा रति के बदन से टपकती हुई कामुकता की तरफ हो रहा था , मेरे दिल में फिर से रति को चोदने की इच्छा प्रबल होने लगी 



आखिर मैं खड़ा हुआ और रति को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया और उसके गालो को चुमते हुए उसकी ठोस गोलाइयो से छेड़ खानी करने लगा 


रति-“छोड़ो ना मुझे खाना बनाने दो ”


मैं- बाद में बना लेना 


वो- मानो ना 


उसकी सलवार के नाड़े को खोलते हुए- मुझसे सब्र नहीं हो रहा खाना बाद में बना लेना पहले मुझे जो भूख है उसका सोचो 


रति मेरी गर्दन में हाथ फिराते हुए- तुम्हारी ये भूख कभी नहीं शांत होगी , अभी मुझे परेशान मत करो ना 


पर मैं कहा उसकी सुनने वाला था मैंने अपने रति की कच्छी को घुटनों तक सरका दिया और उसकी जांघो के बीच अपना लंड सरका दिया वो मेरे लंड को भीचते हुए बोली- तो नहीं मानोगे तुम 


मैं- करने दो ना 


वो – क्या करना है 


मैं उसके सूट को निकालते हुए- तुम्हे,…….. तुम्हे नहीं पता क्या करना है 


मैंने उसकी ब्रा के ऊपर से ही उसके छातियो से खेलने लगा रति की गर्दन पर किस करते हुए अपने लंड को उसकी टांगो के बीच एडजस्ट करने लगा रति थोड़ी ना नुकुर कर रही थी पर मुझे पता तह की जल्दी ही वो मान जायेगी , मैंने कस के उसके दोनों बोबो को बेदर्दी सी मसल दिया तो वो गुस्से से मेरी और देखने लगी मैंने प्यार से उसके गाल पर किस किया और फिर से चूचियो को मसलने लगा रति ने अपनी आँखे बंद कर ली और खुद को मेरी बाहों के हवाले कर दिया जल्दी ही उसके निप्पलस खड़े हो गए टीवी टावर की तरह उसके गोरे चेहरे का रंग सुर्ख होने लगा 



मैंने पास ही रखी तेल की सीशी से तेल लिया और रति की चूत पर मसलने लगा तेल से भीगी मेरी उंगलियों को की छेड़छाड़ को रति सह नहीं पा रही रही अपनी चूत पर मेरी एक पूरी ऊँगली अन्दर पहूँच चुकी थी उसकी टाँगे अपने आप खुलती चली गयी ,उसकी तेल से भीगी चूत को सहलाते हुए बड़े प्यार से मैं उसके निचले होंठ को अपने होंटो से लगाये हुए रति के साथ एक बार फिर से सम्भोग को तत्पर था, जल्दी ही उसकी योनी काम रस और तेल के मिश्रण से तरबतर हो चुकी थी मैंने उसको घुटनों पर झुकाया उसने अपनी टांगो को और खोला मेरे लिए 



बिना देर किये मैंने लंड को फिर से अपनी मंजिल से मिलाने की लिए चूत से छुआ दिया रति क गीले बालो ने उसकी पूरी पीठ को ढक रखा था उनको साइड में किया और पीठ पर किस करते हुए चूत की चुदाई शुरू कर दी रति ने अपने कुल्हो को टाइट किया पर लंड तो जाना ही था चूत में , चूत की मासूम , सुकोमल पंखुड़िया फिर से लंड के चारो और कसी जा चुकी थी ,रति ने एक आह भरी और मैंने उसे थोडा सा और आगे को झुका दिया उसकी कमर के चारो और मैंने अपने हाथ लपेटे और अब लगा कस कस के उसकी चुदाई करने 



लंड महाराज गरजते हुए उसकी चूत को दनादन पेले जा रहे थे रति की हवा में झूलती चूचिया बड़ी गजब लग रही थी पल पल उसके अन्दर और सामने की आरजू मेरी, दो तन मिलन कर रहे थे छप चाप की आवाज उसकी चूत से आ रही थी , रति के होठो से फूटती आहे मुझे और कामुक कर रही थी उसकी चूत के रस से पूरी तरह सना हुआ मेरा लंड उस छोटी सी चूत पर अपनी पूरी हकुमत चला रहा था मैं तो चाहता था की झड़ने तक रति को ऐसे ही घुटनों पर झुकाए रखु पर उसके पैर में लगी भी तो थी 



तो जल्दी ही वो उस पोजीशन से उकता गयी , और खड़ी हो गयी लंड चूत से बाहर निकल आया वो भी चुदाई के इस मुकाम पर मैंने जल्दी से उसके चेहरे को अपनी और किया और फिर से उन शरबती होंटो को चाटने लगा रति भी मेरा पूरा सहयोग करने लगी करीब दो मिनट बाद मैंने उसको पास रखी कुर्सी पर बिठाया और उसकी केले के तने जैसी चिकनी जांघो को अपने कंधे पर रख लिया रति कुर्सी पर अधलेटी सी हो गयी , और एक बार फिर से मेरा लंड चूत चुदाई करने लगा रति का पूरा बदन मेरे धक्के के साथ साथ हिल रहा था छुई की मदहोशी में हो क्या क्या बोल रही थी पर मजा बहुत आ रहा था 



उसकी चूत ने बहुत टाइट पकड़ बनायीं हुई थी मेरे लंड पर पर वो चूत ही क्या जिसे लंड चोद ना सके दाना दन बस चूत पर झटको की बरसात हो रही थी, मैंने रति को अपनी गोदी में ले लिया थोड़ी भारी थी वो पर जब लंड खड़ा हो तो क्या बोझ लगे, रति अब मेरे चेहरे को चूमते हुए मेरी गोदी में चुद रही थी मेरा पुरे चेहरे पर उसका थूक रिसने लगा था , उसके मोटे मोटे चुत्तदो को मजबूती से थाम रखा था मैंने , अगले दस पंद्रह मिनट बस हमारी साँसे ही उलझी रही एक दुसरे सी पसीना पसीना हो चुके थे हम दोनों , और फिर रति मेरी गोदी में ही ढेर हो गयी 



वो ऐसे लिपट गयी मुझसे की क्या बताऊ उसकी छातिया जैसे मेरे सीने में घुस ही जायेंगी चूत से टपकता पानी हमारी जांघो को गीला करने में लगा था , और तभी मेरे लं ने भी रही सही कसर पूरी कर दी उसकी चूत से जब मैंने लंड को बाहर खीचा तो काफी सारे वीर्य की बूंदे बाहर को छलक पड़ी,……………………….. एक बार फिर से मैंने उसको पा लिया था …


चुदाई का एक और दौर गुजर गया था रति मेरे आगोश से निकली और अपने कपडे पहन ने लगी मैंने भी आपके कपड़ो को दुरुस्त किया , रति चुपचाप रोटिया बनाने लगी मैं नीनू को फ़ोन करने के लिए एसटीडी पर चला गया ,उसने मुझसे स्पॉट बताया जहा हम मिलने वाले थे मैं उस से बात तो कर रहा था पर मेरा मन पूरी तरह से रति क चारो तरफ ही घूम रहा था , वापिस आकर मैंने खाना खाया और अपना बैग लेकर चल पड़ा ,मन तो नहीं कर रहा था पर नीनू भी मेरे लिए बहुत महत्त्व रखती थी , उस से भी तो नाता था अपना और उसको नाराज़ कर सकू इतनी हिम्मत नहीं थी मुझे



तय समय पर मैं पंहूँचा, नीनू पहले से ही मेरा इंतज़ार कर रही थी 


कैसे हो , पुछा उसने


मैं-“ठीक हूँ, तुम बताओ ”


वो- मैं भी ठीक हूँ, कल तो जबरदस्त बारिश हुई ना, 


मैं- हाँ हुई तो 


वो-यार मैंने ऐसी बारिश पहले नहीं देखि कभी वो भी बिना मोसम के 


मै- ये बिन मौसम की बारिशे भी अजीब होती है यार,


वो- तुम्हे क्या हुआ अब 


मैं- कुछ होना चाहिए था क्या 


वो- कुछ उखड़े से लगते हो 


– कुछ नहीं यार , दिल पर एक बोझ सा लगता है, 


– अक्सर कुछ हो तो उसको शेयर कर लेना चाहिए मन हल्का हो जाता है 


बात तो सही थी उसकी पर कैसे बताता की रति पिछले चार दिनों में कितनी अपनी सी लगने लगी थी मुझे , क्यों मेरी हर सांस जैसे उसका ही नाम ल रही थी मैं नहीं जानता की मेरे मन में उसके लिए ये क्या था , क्या ये प्यार था या बस आकर्षण ही था कुछ तो था जो उस से इतना जुड़ाव लगने लगा था मुझे , शायद रहा होगा किसी जन्म में कुछ वास्ता उस से, वर्ना यु ही कोई अपना सा कहा लगा करता है 



नीनू- “आओ एक चाय पीते है , साथ में तुम्हे जोधपुर की एक फेमस चीज़ भी चखाती हूँ ”


हमने पास ही थडी पर दो चाय और मिर्चिवड़ा बोला , लोग कहते हैं की जोधपुर आकर मिर्चिवड़ा न खाया तो आना बेकार , पूरी ही हरी मिर्च को बसन के घोल में पकाते है, जोधपुर की गरम दोपहर में गरम चाय के साथ इसका स्वाद, बस जबरदस्त से कम क्या कहूँ मैं, नीनू की हर बात में कोई ना कोई क्लास होती थी पर सादगी के साथ, यही उसकी सबसे अच्छी बात थी , ऊपर से उसकी और मेरी पसंद भी बहुत हद तक एक जैसे ही थी ,



चाय की चुस्कियां लेटे हुए मैंने पुछा-“ये कब पता चलता है की प्यार हो गया हैं ”


वो-एक दम से मेरी तरफ देखते हुए-“ तुम्हे हो गया क्या ” 


मैं- मुझे लगने लगा है शायद से 


वो- शायद से क्या हो गया या नहीं 


मैं- तुझे क्या लगता हैं


वो- तेरे मन की मैं क्या जानू 


मैं- तो फिर कौन जाने 


वो- पता नहीं 


मैं- नीनू , तूने किया किसी से प्यार 


वो- ना, रे, अभी तक तो नहीं किया अब मेरी तरफ कौन देखे मैं कौन सी श्रीदेवी हूँ 


मैं- कुछ तो बता , 


वो- ये तो प्यार करने वाला ही बता सके है यार, वैसे जो फिल्मो में दिखाते है वैसा कुछ हो रहा हैं क्या तुझे 


मैं- ना रे, बस कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा मन मेरा भटका सा लगे है , बस रोने को जी चाहे 


वो- बावला हुआ के 


मैं- हाँ बावला हुआ हूँ 


वो- देख, ये प्यार व्यार कुछ ना होवे है, क्यों अपना टाइम इस सब के बारे में खराब करते हो, तुम्हे मैं जब से जानती हूँ , तुम्हारा मन तो तबसे ही भटका भटका सा लगता हैं ,ये जो अजीब सी हरकते करते हो ना तुम , मुझे ये पागलपन के लक्षण लगते है, कल ही मेरे मामा बता रहे थे की पागल भी काफ़ी प्रकार के होते है मुझे तो लगे है घर पहूँचते ही तुम किसी डॉक्टर को दिखा ही लो एक बार .



मेरे मन में प्रबल इच्छा हुई की इसकी गांड पे लात दू, हम तो अपना दुखड़ा रो रहे है, इनको बकचोदी सूझ रही हैं 


मैं- हाँ, वापिस चलते ही डॉक्टर को दिखा आऊंगा क्या पता बीमारी बढ़ जाए आगे 


नीनू- मुझे कुछ कपडे खरीदने है तूम चलो मेरे साथ, उसके बाद तुम्हे मस्त लंच करवाउंगी 


मैं- चल ले चल तेरी मर्ज़ी जहा हो वाही पर ले चल 


लफ्जों की सौदे बाज़ी में उलझ कर रह गया था , मुझे पता था की नन्दू को अंदाजा हो चला था की मैं जो उस से कह रहा था, बात बड़ी गहरी थी पर शायद थोडा सा झिझक रही थी और मैं रति के प्रति अपनी भावनाओ को उसको चाह कर भिब बता नहीं पा रहा था , पर वो जो किसी आंधी- तूफ़ान की तरफ मेरी जिंदगी में आगयी थी उसका क्या , मेरे समूचे अस्तित्व को हिला कर रख दिया था रति ने, मानता हूँ की जिस्मानी रिश्ता जुड़ गया था उसके साथ पर मेरा और उसका रिश्ता था क्या, वो समझ नहीं आ रहा था 


मैं तो एक आवारा परिंदा था जिसकी चोंच बस घोंसले से बाहर निकली भर ही थी पर रति एक शादी शुदा औरत थी चाहे उसकी गृहस्ती में हजार समस्या थी पर उनका समाधान हो ही जाना था , अगर मैं उसके सामने अपना प्रणय निवेदन कर भी दू, तो वो मेरे साथ नहीं आएगी, उम्र में भी बहुत बड़ी थी वो पर उसको छोड़ो कैसे मैं सामना करूँगा अपने घरवालो का , क्या बताऊंगा उनको कैसे रति का परिचय करवाऊंगा उनसे ये सब तमाम सवाल मेरे दिमाग में घुमने लगे एक साथ , सर में दर्द होने लगा मैंने ऑटो वाले को रोकने क कहा और उतर गया 



नीनू भी मेरे पीछे आई और पानी की बोतल देते हुए बोली – क्या बात है क्या हुआ 


मैं- नीनू, एक समस्या का समाधान करो ना , कुछ भी समझ नहीं आ रहा हैं, ये जिंदगी कैसा खेल खेल रही है मेरे साथ कुछ पता नहीं 


नीनू मेरा हाथ पकड़ते हुए,- बताओ तो सही क्या बात हैं जब तक नहीं बताओगे , मैं कैसे कुछ कर पाऊँगी

हम लोग वही सड़क किनारे बैठ गए, मैं दो घूंट पानी पिया पर वो भी कलेजे को जा लगा नीनू एकटक मेरी और देखे जा रही थी , उसको समझ नहीं आ रहा था कुछ या वो सबकुछ जान कर भी अनजान बन रही थी 


वो- चलो अब बताओ भी बात क्या है 


मैं- यार ऐसा लगता है की जैसे मेरा चैन, करार सब छीन लिया हो किसी ने पिछले दिन जो इस शहर में गुजारे है मेरी जिन्दगी में तूफ़ान ले आये है, दिल पर काबू नहीं रहता मेरा 


वो- देखो, इस अल्हड उम्र में हर चीज़ जिस से हमारा लगाव हो जाता है उसे हम प्यार समझ लेटे है जबकि तुम एक बार ठीक से सोचो क्या प्यार के लिए हम अभी तैयार है , ज़िन्दगी की शुरुआत हो रही है बहुत कुछ करना है , एक मुकाम बनाना है और फिर वैसे भी हम तुम एक छोटे से गाँव से ही तो है क्या तुम्हे नहीं पता की वहा इन सब बातो की क्या औकात है 


मैं- नीनू , सब समजता हूँ मैं पर मेरा दिल , ये धड़कने कैसे काबू करू मैं इनपर देखो अभी भी कैसे धडक रहे है यार , मैं भी हर बात को समझ ता हूँ पर ये उलझने, कितना सुलझाऊ इन्हें 


वो- सुलझाने की कोई जरुरत नहीं सब ठीक होगा अपने आप 


अब मैं उसको क्या बताता की क्या गुजर रही है मुझ पर रति को छोड़ बेशक लिया था मैंने वो मेरी वासना थी पर कहीं ना कही मेरा मन उसको अपने अन्दर बसाने को मचल रहा था 


वो- मुझे लगता है की तुम कोई बात खुल के नहीं बता रहे हो मुझसे छुपा रहे हो 


मैं- नीनू, अगर कभी मैं जिंदगी की राह पर डगमगाऊ तो क्या तुम मुझे थाम लोगी 


वो- मैं कैसे थाम सकुंगी तुम्हे, थोड़े दिन बाद हमारी राहे अलग हो जाएँगी, फिर क्या पता किस मोड़ पर मिले ना मिले 


मैं- तो क्या अपनी दोस्ती बस इतनी ही है 


वो- एक लड़की और लड़के की दोस्ती की बिसात अब क्या बताऊ तुम्हे , देखो कल को मैं पढने के लिए या नोकरी के लिए कही और जाउंगी तुम कही और, फिर शादी हो जाएगी कुछ हदे हो जाएगी , अब तुम ना समझ तो हो नहीं इतनी दुनिया दारी तो जानते ही हो 


मैं- तुम्हारे मेरे बीच में दुनियादारी कब से आ गयी 


वो- पर सच भी तो वाही है ना 


मैं- तो अगर मैं कहूँ , की तुम मुझसे शादी कर लेना फिर तो ठीक रहेगा ना


वो- कैसे कर लुंगी तुमसे शादी और क्यों करुँगी बताओ जरा 


मैं- मैंने सोचा मैं तुमसे मतलब हम लोग प्यार करते है 


वो- कब से, मुझे भी तो बताओ 


मैं- नीनू , देखो मैं हमेशा से अकेला रहा अपनों के बीच भी और बहार भी , एका एक मेरे जीवन में बहुत कुछ घटित हो गया हालाँकि मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था की ऐसा भी हो सकता है तुमसे बाते होने लगी तुम्हे खुद का ही एक हिस्सा मानने लगा मैं , मैं ठहरा सीधा साधा , ये बनावटी बाते मुझे आती नहीं और ना मैं कोई चापलूसी करना चाहता हूँ पर कभी कभी मेरे मन में ये ख्याल भी आता हैं की तुम एक बेहतर जीवन साथी बन सकोगी मेरे लिए 



नेनू- देखो तुम बात को सीधे शब्दों में समझो, मेरा जो तुमसे नाता है वो एक पवित्र बंधन है हम दोनों कभी आपस में कुछ नहीं छुपाते है लगभग हर बात शेयर करते है पर इस रिश्ते की भी लिमिट है , हंसी मजाक एक जगह है पर हम लोग सचाई से भी तो मुह नहीं मोड़ सकते है मैं तुम्हे बहुत अच्छे से जानती हूँ और बस इतना ही कहूँगी की जितना भी समय हम साथ रहेंगे तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त रहोगे , क्या पता हमेशा के लिए मेरे मन में तुम्हारी याद रहेगी पर अभी इन सब बातो का कोई फायदा है ही नहीं , और जबकि तुम अब भी फालतू बातो की जगह अपने मन की असली परेशानी को छुपा रहे हो मुझसे 



नीनू ने लास्ट के शब्दों में सही जगह पे चोट कर दी थी, मुझे उस समय समझ में आया की ये लड़की मुझे मुझसे भी ज्यादा समझती हैं जानती है उसपे मर मिटने को जी चाहा मेरा पर मेरी भी मज़बूरी थी क्या बताता मैं उसको की कैसे रति के साथ रात गुजारी थी मैंने कैसे मेरे भटकते मन को वो भी एक किनारा लगने लगी थी मैं जानता था की अगर रति का यु जिक्र करूँगा तो फिर पिस्ता, बिमला सब तक बात जाएगी मेरे मन में चोर था डर था की कहीं नीनू मेरे बारे में कुछ गलत ना सोचने लगे कही वो मुझसे दूर ना चली जाए तो मैं सोचा की छोड़ इस बात को फिर कभी सोचेंगे 



मैंने बात बदलते हुए कहा – छोड़ो ना यार मेरी वजह से तुम्हारे अच्छे खासे मूड का नाश हो गया आओ चलो शौपिंग करते है , वैसे भी हम याहा घुमने फिरने आये है ये रोना धोना तो अपने शहर में भी कर लेंगे , नीनू मुस्कुराई पर उसके चेहरे पर तनाव की झलक मैंने पढ़ ली थी , 



अगले कुछ घंटे बस कपडे खरीदने में ही गुजर गए नीनू एक दूकान से दूसरी , दूसरी से तीसरी घुमाती रही कुछ खट्टी मीठी बाते होती रही एक बार फिर से मैं नार्मल होने लगा , मैंने सोचा क्यों इतना फिकर करू ज़िन्दगी को इसके हिसाब से चलने देता हूँ, जो होगा देखा जाएगा पर रति का वो मासूम चेहरा हट ता ही नहीं आँखों के सामने पर सच तो यही था की वो बस एक हसीं ख्वाब ही था मेरे लिए जो वक़्त के साथ धुंधला हो जाना था


पूरा दिन नीनू के साथ पैदल पैदल घुमने के बाद मैं बुरी तरह से थक गया था मैं घर पहुंचा तो रति मेरा ही इंतज़ार कर रही थी मुझे देख कर वो बोली- देर कर दी आज तो आने में 


मैं- हाँ वो नीनू को कुछ कपडे लेने थे तो पूरा दिन घुमाया उसने 


रति- चाय पियोगे


मैं- नहीं , भूख लगी है कुछ है तो दे दो 


वो- थोड़ी देर रुको मैं गरमा गरम बना देती हूँ 


मैं- अरे दिन का ही दे दो ना 


वो- रोटी तो है पर सब्जी नहीं है वैसे भी खाना तो बनाना ही है बस थोड़ी देर लगेगी 


मैं- रोटी और एक प्याज उठाता हुआ, अरे ये है ना बस इस से ही काम हो जायेगा हम तो गाँव के लोग है जो मिल जाये सही है बस पेट भरना चाहिए 


रति मेरी और देख के मुस्कुराने लगी , और बोली- तो क्या क्या ख़रीदा 


मैं- मैंने कुछ नहीं लिया बस वो ही कुछ कपडे कुछ चूडिया सब फालतू का सामान ले रही थी 


वो- तुम्हे भी कुछ लेना चाहिए था , यहाँ से खाली हाथ जाओगे क्या 


मैं- खाली हाथ क्यों जाऊंगा इतनी अनमोल चीज़ जो पा ली है मैंने यहाँ आके 


रति ने शर्मा के नजरे झुका ली, मैं रोटी खाने लगा , खाने के बाद मैंने पुछा- डॉक्टर को पैर कब दिखाना है 


वो- कल 


मैं- ठीक है 


मैं- आओ कुछ बात करते है 


वो- क्या बात करोगे 


मैं- जो भी मेरे दिल में है 


वो- और क्या है दिल में 


मैं- आओगी तभी तो बताऊंगा 


रति मेरे पास आकार बैठ गयी , 


मैं- रति, अगर मैंने कहूँ की मुझे तुम चाहिए तो क्या कहोगी


वो- मुझे पा तो लिया है तुमने 


मैं- उस तरह नहीं 


वो- तो फिर किस तरह 


मैं- तुम्हे सब है पता 


वो- मुझे नासमझ रहना ही ठीक है 


मैं- रति , ये प्यार क्या होता है 


वो- कुछ भी नहीं , दो दिन के चोंचले है , जब को हमे भा जाता है तो दिल बार बार उसको देखने को करता है , उसके दीदार को भटकता है , ये एक आकर्षण की उच्च स्टेज होती है पर थोड़े दिन बाद हर चीज़ की तरह इसका भी रंग उड़ने लगता है, देखो जब दो लोग दूर हो, पर उनकी पसंद, नापसंद मिलने लगे तो एक मन में भावना सी हो जाती है , पर वही लोग अगर साथ रहने लगे तो पता चलता है की प्यार है या नहीं 


मैं- तो फिर ये सब क्या है जो मेरे साथ हो रहा है, 


वो- बोला ना- कुछ नहीं जल्दी ही तुम भी इ आकर्षण के जाल से मुक्त हो जाओगे 


मैं- कुछ समझा नहीं 


वो- समझने की कोई जरुरत भी नहीं नहीं 


मैं- रति, क्या तुम मेरे साथ शादी करोगी 


वो- मैं पहले से ही शादीशुदा हूँ, और फिर अभी तुम्हारी उम्र ही क्या हैं ज़िन्दगी पड़ी है बाकी 


मैं- तुम बस नाम की शादीशुदा हो रति, कब तक टुकडो में जीती रहोगी 


वो- वो मेरी परेशानी है , देर सवेर अब ठीक हो ही जायेगा 


मैं- तो फिर ये सब क्यों, क्यों मुझे छुट दी की मैं इस कदर तुमसे जुड़ पाऊं , रति क्यों इस मुसाफिर को अपनि बाहों में पनाह दी मुझे, क्यों मेरे इस कदर पास आकर दूर चली जाओगी , मैं अपनी व्यथा किसे कहूँ, 

वो- कोई व्यथा हैं ही नहीं, ये जो भटकाव की बात तुम कर रहे हो , खुद को जान ने की कोशिश करो, ये जो मुखोटे है चेहरों पर इनको उतार कर खुद को महसूस करो कभी , रूह से जुडो , जिस दिन खुद को पहचान लोगे ये अंदरूनी एकाकीपन ख़तम हो जायेगा तुम्हारा 



वो- “जिंदगी में कब क्या हो जाये कोई कुछ नहीं कह सकता , मैंने कभी सोचा नहीं था की तुम या कोई और इस तरह मुझ से जुड़ जायेगा , जानती हूँ की ये जो रिश्ता हमने जोड़ा है कहने को तो कोई इसे हवस कहेगा, कोई कहेगा की कण्ट्रोल ना हुआ, हो सकता है की कोई मेरे लिए रंडी, वेश्या जैसे शब्दों का भी प्रयोग करे पर ये मैं जानती हूँ, ये तुम जानते हो की कहीं न कही अब सदा के लिए हम तुम एक दुसरे में जियेंगे, जीवन के किसी ना किसी मोड़ पर हमारी तुम्हारी यादे जुडी रहेंगी ”


“मैंने अपने जीवन की सबसे अनमोल चीज़ तुम्हे दी, तुमने मुझे औरत होने के सुख से परिचय करवाया , मैं बिलकुल ये नहीं कहूँगी की मैं बहक गयी थी, हालाँकि मुझे पता है की ये एक ऐसी गलती है जिसकी किसी भी कीमत से कोई भरपाई नहीं करी जा सकती है , पर इसके लिए मैं कभी कोई प्रायश्चित भी नहीं करुँगी कभी कभी लाइफ में कुछ फैसले ऐसे होते है जिनका हम पर कोई जोर नहीं होता है, ”


“तुम कहते हो क्यों नहीं, मैं बताती हूँ, ये जरुरी नहीं होता की हर रिश्ते को कोई नाम दिया ही जाए, कुछ बंधन समाज के हर प्रतिबंधो से ऊपर होते है, तुम मुझे समझे मैं तुम्हे समझी यही बहुत है जब कोई इंसान जाता है तो वो बस अपने साथ यादे ही ले जाता है कुछ यादे तुम अपने साथ ले जाओगे कुछ यादे मेरे पास रहेंगी, जो किसी हसीं ख्वाब की तरह हमारे होंठो पर मुस्कान की तरह सज जाएँगी ”


बस यही तो फलसफा है , हमारा तुम्हारा, मैं बताती हूँ, की क्या रिश्ता है तुम्हरा मेरा, जैसे सूरज का धुप से, जैसे चाँद का चांदनी से, जैसे सागर का किनारे से , तुम हो तो मैं हूँ मैं हूँ तो तुम हो 



मैं- “ नीनू भी यही बात बोल रही थी ”


रति- उसका हाथ थाम लो, ज़िन्दगी में काफ़ी जगह आएँगी जब तुम्हे उसकी जरुरत पड़ेगी, जब हमें पता हो की कोई है जो गिरने से पहले हमे संभाल लेगा तो जिंदगी की राहे थोड़ी आसन हो जाया करती है 



मैं- पर वो मुझे प्यार नहीं करती 


रति अपने माथे पर हाथ मारते हुए- ओह सत्यानाश, तुम रहोगे भोंदू के भोंदू ही 


अभी कितना समझाया तुम्हे, पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा तुम्हरे , चलो रात बहुत हो गयी है, नींद भी बड़ी आ रही लाइट बंद कर दो सोते है

दिल में एक हलचल सी मची थी जिसपर रति के शब्दों ने कुछ पलो के लिए अपने शब्दों से बाँध बना दिया था मैंने खुद को समझाया की ये जो अवसाद मेरे मन में भरा पड़ा है , इस से मुझे ही बाहर निकल ना पड़ेगा, चलो फिर से एक बार फिर मैं कोशिश करूँगा औरो की तरह जीने की, रति ने अपना सर मेरे काँधे पर टिका दिया हम दोनों ख़ामोशी से लेटे हुए थे , धड़कने भी कुछ खामोश सी थी , अरमान भी ठन्डे पड़ रहे थे, वो थी मैं था और थी ये तन्हाई जो एक बार फिर स मुझे अपने अपने आगोश में लेने को तड़प रही थी …………



वो-“क्या सोचने लगे ”



मैं- कुछ नही 


वो- चुप क्यों हो 


मैं- तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था 


वो- क्या सोच रहे थे 


मैं- एक आरजू है तुम्हे अपना बनाने की 


वो- तुम्हारे इल में झाँक कर देखो कही ना कही मैं मिल ही जाउंगी 


मैं- दिल मेरे पास है ही कहा , वो तो कब का कोई लुटेरी, लूट ले गयी


वो- कौन है वो चोरनी 


मैं- है कोई 


वो- कौन 


मैंने- रति के गाल पर हलके से चूमा और कहा- है कोई आस पास ही 


रति- अच्छा जी, और उस डाकू का क्या जिसने हमारा दिन का चैन और रात की नींद ही चुरा ली 


मैं- आपके शहर में डाकू भी हैं, पहले पता ना था वर्ना इधर आते ही नहीं , ये कैसा शहर है आपका जहा, चोर, लुटेरे भरे पड़े है 


रति- बाते बनाना तो तुमसे सीखे कोई 


मैंने अपना हाथ उसके पेट पर रखा और धीरे धीरे से सहलाने लगा वो मेर बाहों में सिमटने लगी, मैंने हाथ बढ़ा कर उसके सूट को निकाल दिया और ब्रा को भी आजाद कर दिया उसके उभारो को छेड़ने लगा 



रति किसी मछली की तरह मेरी बाहो से निकल गयी और बोली- बहुत जताते हो चाह हमसे 


मैं पीछे से उसको फिर से अपने आगोश में लेटे हुए- चाहना कोई गुनाह तो नहीं 


वो- गुनाह तो कर ही चुके हो अब तो सजा का वक़्त आया 


मैं- उसकी छातियो को मसलते हुए- कुछ दिनों में तुमसे बिछड़ना सजा से कम भी तो नहीं 


रति के मुह से आह निकली “आह, आहिस्ता से ”



मैं उसकी पीठ को चूमने लगा उसके बदना में सुगबुगाहट होने लगी, मैं दीवानो की तरह उसकी पूरी पीठ पर कमर पर अपने चुम्बन अंकित करने लगा रति गर्म होने लगी और मैं तो हमेशा ही तैयार रहता था चूत के समुन्द्र में दुब्किया लगाने को, जल्दी ही उसकी सलवार उसके पैरो में पड़ी थी , रति ने मेरे लंड को पकड़ लिया और अपनी मुट्ठी में लेकर उस से खेलने लगी , 


मैं- खिलौना बड़ा पसंद है तुमको 


वो- कुछ खेल , खेलने ही चाहिए ना


मैंने उसको लंड चूसने को कहा , थोड़ी ना- नुकुर के बाद रति अपने घुटनों के बल बैठ गयी और अपने होंठो को मेरे गोलियों पर रगड़ने लगी, मजा आने लगा फिर उसने अपना मुह खोला और गप्प से मेरे गुलाबी सुपाडे को अपने मुह में ले लिया औरत जब मजे से लंड चुस्ती है तो बड़ा सुख मिलता है उसकी जीभ मेरे सुपाडे पर गोल-गोल घूम रही थी मेरे पुरे बदन में गुड-गुडी होने लगी मेरी कमर हिलने लगी मैंने उसके मुह को पकड़ लिया और अपने लंड को उसके मुह में अन्दर बहार करने लगा रति ऊऊऊऊऊ ऊऊऊऊऊऊउ करने लगी मैं उसको अच्छे से लंड चुसाना चाहता था 



उसका थूक मुह से निकल कर उसकी टांगो पर गिर रहा था धीरे धीरे करके मैंने पूरा लन्ड उसके गले तक पंहूँचा दिया जब जब वो अपने दांत मेरे लिंग की खाल में लगाती तो बहुत मजा आता ऐसे लगता की वो उसे चबा ही डालेगी रति दिल खोल कर मेरे लंड को चूस रही थी दीवानगी की हद एक बार फिर से पार होने को तैयार हो रही थी सुदुप सुदुप स्र्र्रर्र्र्र करते हुए रति लंड को पुरे मजे से चूसे जा रही थी लंड की प्रत्येक नस मस्ती के तारो से झनझना उठी थी मेरी रगों में दोड़ता खून अन्डकोशो में जमा होने लगा था 


मैं स्खलन की और बढ़ने लगा उसके होंटो की गर्मी को मेरे लिए अब बर्दाश्त करना मुस्किल हो रहा था और फिर जल्दी ही मैंने उसके मुह को अपने लंड पर दबा लिया वीर्य की बूंदे उसके मुह में गिरते हुए गले की गहराई में उतरती चली गयी, रति को उसकी उम्मीद नहीं थी मेरा खारा सा पानी का स्वाद उसके पुरे मुह में घुल गया आज तो ऐसे झड़ने में मजा आ गया था 



खांसते हुए रति ने मेरे लंड को अपने मुह से निकाला और थूकने लगी पर देर हो चुकी थी मेरा पानी तो अब तक उसके पेट में पहूँच चुका था , खांसते हुए वो बोली-“बहुत गंदे हो तुम ”


मैं- क्या हुआ, चलो इस बहाने तुमने कोई अच्छी चीज़ टेस्ट कर ली 


रति ने पानी से अपने गले को खंखारना शुरू किया अब बारी मेरी थी काम रस को चखने की, पता नहीं क्यों मुझे तो चूत से टपकते हुए रस को पीना बहुत ही भाता था, मैंने उसकी टांगो को फैलाते हुए अपने लबो को चूत के मुहाने पर लगाया और काम चालु कर दिया 


रति की आहे फिर से कमरे में गूंजने लगी 



आह आह आराम से काटो मत काटो मत 



पर उसकी कौन सुने वो भी जब ऐसी करारी चूत हो जल्दी ही रति भी फोरम में अ गयी थी और अपनी गांड को हिलाते हुए अपने जोबन का रस मुझ पर चालकाने लगी थी पुच पुच पुच की आवाज उसकी चूत से आ रही थी समुन्दर का खारा पानी झर झर के बह रहा था मैंने शरारत करते हुए उसके भाग्नसे को मुह में लिया और उसको जीभ से रगड़ने लगा , रति की हालात हुई ख़राब उसके जिस्म का पूरा खून जैसे चेहरे में उतार आया हो रति का बदन अकड़ने लगा उसकी आँखे बंद हो गयी अपने आप उसकी गांड मेरी जीभ की ताल पर थिरक रही थी 



रति लगातार अपनी टांगो को पटक रही थी और फिर वो एक दम से ऐसे शांत पड़ गयी जैसे की प्राण ही छुट गए हो शरीर से, ढेर सारा पानी मेरे मुह में गिर पड़ा चटखारे लेटे हुए मैं पी गया इस से पहले की वो अपनी सांसो को दुरुस्त कर पाती मैंने अपने लंड को चूत पर रख दिया , रति चूँकि अभी अभी झड़ी थी पर चूत तो मारनी ही थी फिर इंतज़ार करने का क्या फायदा , रति मेरे नीचे पिसने लगी उसकी चूत गीली होने में थोडा समय ले रही थी जिस से उसको कुछ परेशानी हो रही थी पर एक बार लंड बस घुस जाए चूत में फिर वो अपने आप सेट हो जाता है 



जल्दी ही उसकी चूत मेरे लंड से ताल मिलाने लगी, वासना का तूफ़ान फिर से उमड़ आया था हूँमच हूँमच कर मैं ऊपर नीचे होते हुए रति को सम्भोग सुख से रूबरू करवा रहा था पल पल हर पल हम दोनों के अरमान एक दुसरे में यु ही समाये रहने के , उसकी दोनों टाँगे मेरे कंधो पर आ चुकी थी चुदाई का खुमार बरस रहा था हम दोनों पर एक इस सुख के लिए तो आवारा भँवरे कलियों के पीछे दिन रात मंडराया करते है ,रति मेरा पूरा साथ दे रही थी मेरे हर धक्के का जवाब देते हुए चूमा छाती के साथ गजब चुदाई चल रही थी तभी रति बोली – अन्दर म़त छोड़ना 



मैं कुछ नहीं बोला बस चोदता रहा उसको , साँसे बहुत तेज गरम हो गयी थी पल पल बहुत भारी लगने लगा था रति के बदन की गर्मी मेरे बदन में भरने लगी थी , मैंने उसको अपनी बाहों में कस लिया उसने अपने कुल्हे ऊपर किये और मैंने अपना पानी चूत में ही छोड़ इडया मेरा पूरा शरीर मस्ती में डूबता चला गया रति को साथ लिए लिए इस भवसागर को फिर से पार कर गया था मैं

उस रात हमने तीन बार चुदाई की, सुबह मेरी आँख थोडा देर से खुली रति तब तक नहा-धो चुकी थी 


वो- आज बहुत देर तक सोये 


मैं- हाँ थोडा थक सा गया था, मैं उठा और बाथरूम की तरफ जाने लगा तो वो बोली- 

“नंगे ही जाओगे कुछ तो पहन लो ”


मेरी निगाह अपने जिस्म पर गयी रात को मैं नंगा ही सो गया था , थोड़ी शर्म भी आई मैंने पास पड़ी चादर लपेटी और बाथरूम में घुस गया सर भारी भारी सा महसूस हो रहा था तो ठंडा होने के लिए काफ़ी देर तक नहाता रहा वापिस आया तब तक रति ने नाश्ता लगा दिया था , पर मैंने खाने से मना कर दिया 


वो- क्या हुआ 


मैं- थोडा सर दर्द हो रहा है 


वो- लाओ मैं मालिश कर देती हूँ 


रति मेरे गीले बालो में अपने हाथ फिराते हुए मालिश करने लगी और थोड़ी ही देर में मुझे राहत मिलने लगी शायद मेरी नींन्द पूरी नहीं हुई थी तो फिर से मुझ पर उसका असर होने लगा पता नहीं कब आँख लग गयी मेरी , पर ज़ब जागा तो शाम के चार बज रहे थे, आज तो बड़ा सोया था मैं , नीनू के साथ भी नहीं जा पाया था अब उसकी बाते सुनूंगा वो अलग एक कडक चाय पीकर कुछ होश में आया मैं , चाय की चुस्कियां लेटे हुए मैं गुजर गए पिछले हफ्ते के बारे में सोचने लगा कितना खूबसूरत था , और कब गुजर गया पता नहीं चला बिलकुल भी 


ऐसे लगता था की जैसे यही थी मेरी जिंदगी यही तो मैं जीना चाहता था घर की जरा भी याद नहीं आई थी मुझे दुनिया जैसे रति के चारो तरफ ही सिमटने लगी थी मेरी , शाम को मैं रति की स्कूटी ले आया था कुछ फोटो जो मैंने खीची थी वो भी ले आया था , ये जो तस्वीरे होती हैं ना, इनकी एक बात बहुत बुरी लगती है मुझे जब भी देखो , दिल को परेशान कर ही देती है कही ना कही, तस्वीरों को देखते हुए रति बोली- 

“तो, ये है तुम्हारी दोस्त ”


मैं- हूँ 


वो-अच्छी लड़की है 


मैं- मैं क्या बुरा हूँ 


रति- बुरे तो हो ही तुम, एक काम करो कल नीनू को यहाँ बुला लो मैं मिलना चाहूंगी उस से 


मैं- तुम क्यों मिलना चाहती हो उस से 


वो- तुम्हे ऐतराज़ है तो रहने दो 


मैं- मुझे क्या ऐतराज़ होगा, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था 

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