लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) अध्याय 3
मुझे देखते ही सब खुश हो गये, मोहिनी भाभी मेरी टाँग खींचते हुए बोली…
लो जी.. आ गये देवर राजा.. बड़े आटिट्यूड वाले हैं.. भाभी बेचारी कब से इंतेज़ार में हैं.. कि उनके प्यारे, दुलारे, जगत से न्यारे देवर जी आएँ तो वो उन्हें लाड करें..
मेने हँसते हुए.. पीछे से उनके गले में बाहें डाल दी और बोला – क्या
भाभी.. मुझे आपसे ये उम्मीद नही थी… आप मेरी ही टाँग खींचने लगी..
वो हँसते हुए बोली – अरे मेरे प्यारे देवर्जी.. यहाँ सब कब्से तुम्हारा इंतेज़ार कर रहे हैं… और तुम हो कि अभी तक सोए पड़े थे…
खैर चलो… आज आपकी छोटी भाभी का नंबर है लाड करने का.. बड़ी से तो बहुत लाड ले लिया.. जाओ जाकर उनकी गोद में बैठो..
फिर मेरे कान में फुसफुसा कर बोली – लल्ला नयी भाभी पर कोई रहम मत करना… पूरा वजन रख कर बैठना आराम से…
मे मुस्कराते हुए कामिनी भाभी के आगे अपने घुटने टेक कर बैठ गया… और उनके चिन को उठा कर फेस अपनी तरफ कर के बोला –
भाभी बिना देवर की ओर देखे ही लाड करोगी…?
उन्होने मुझे एक बार भरपूर नज़र डालकर देखा… एक सुर्ख लाल जोड़े में वो इस समय बहुत सुंदर लगा रही थी…कुछ – 2 इस तरह की छवि…..
एक दम चाँद का टुकड़ा… होंठों पर सुर्ख लिपीसटिक.. गोरे-2 गाल, हल्की सी लाली लिए..
लेकिन मेकप के बाद भी उनके एक गाल पर कुछ निशान सा था…
उन्होने अपनी प्यारी सी मीठी सी आवाज़ में कहा – देवर जी आइए ना मेरी गोद में बैठिए…
मे – आप मुझे झेल पाएँगी….…?
मेरी बात पर सभी हँसने लगे…और कामिनी भाभी ने शर्म से नज़र झुका ली…
मेने बुआ से पूछा – मेरी बात पर आप सभी लोग हंस क्यों रहे हो…?
बुआ – वो तेरे बड़े भाई को झेल चुकी है, तुझे झेलने में क्या तकलीफ़ होगी…इस बात पर बुआ समेत सभी ज़ोर-2 से हँसने लगे….!
मेने झेन्प्ते हुए कहा – अरे मे तो अपने वजन की बात कर रहा था….!
कामिनी भाभी – कोशिश करूँगी…, आप बैठिए..!
मे अपनी तशरीफ़ लेकर उनकी गोद में बैठने लगा.. मेने धीरे-2 कर के अपना सारा वजन उनकी जांघों पर डाल दिया….
उनकी मांसल जांघों का स्पर्श अपने कुल्हों पर फील होते ही मेरा पप्पू जीन्स में कुलबुलाने लगा..
उन्होने मेरे गालों पर हाथ फेर्कर प्यार से सहलाया और फिर अपने लिपीसटिक से पतले होंठ रख कर दोनो तरफ चूम लिया… लिपीसटिक के निशान मेरे दोनो गालों पर छप गये…
मेने उनके कान में फुसफुसा कर कहा… भाभी में भी आपके गालों पर किस करना चाहता हूँ…
वो मेरी बात सुनकर शरमा गयी.. मेने कहा.. बोलिए ना भाभी.. प्लीज़ एक बार बस…
वो – अपने भैया से पुच्छ लीजिए… ना..
मेने भैया से कहा – भैया.. मे भाभी को किस करना चाहता हूँ.. अगर आप इज़ाज़त दें तो..
वो बोले – अरे यार ! आज तुम भाभी देवर के बीच कोई कुछ नही बोलेगा… तुम दोनो आपस में ही डिसाइड करो भाई…
मेने भाभी की तरफ देखा.. उन्होने मौन स्वीकृति देदि… फिर मेने भाभी के दोनो गालों का चुंबन लिया और फुसफुसाया..
भाभी लगता है भैया ने आपको रात बहुत ज़ोर से काटा है.. निशान अभी तक है..
शर्म से उनकी गर्दन झुक गयी… मे अभी उनकी गोद से उठने की सोच ही रहा था कि चाची बोली पड़ी…
लल्ला ! भाभी की गोद से बिना नेग लिए मत उठना…
वाउ ! ये तो डबल धमाका हो गया… ! हां तो भाभी क्या देंगी.. अपने देवर को..?
वो – जो भी चाहिए माँग लो..!
मे – तो ठीक है… मुझे एक सॅमसंग का स्मार्ट फोन चाहिए… (जो उस समय नया लॉंच हुआ था मार्केट में)…
वो – ठीक है… जब आप गौने के लिए आओगे… आपका फोन आपको मिल जाएगा…
मेने एग्ज़ाइट्मेंट में भाभी के गालों को फिर से चूम लिया और उन्हें थॅंक्स बोलकर गोद से उठ गया……………!
दूसरे दिन शांति बुआ को अपने घर वापस जाना था, सुबह ही सुबह वो तैयार होने में लगी थी.. मे जब जाग के आया तब तक वो जाने के लिए तैयार खड़ी थी…
मेने बुआ को स्माइल किया… और उनके पैर छूते हुए कहा… क्यों बुआ ! कल रात मज़ा आया..
वो भी मुस्कराते हुए बोली – बहुत मस्त चोदता है तू… कभी आना मेरे घर.. तब देखूँगी.. तुझ में कितना दम खम है…
और हँसते हुए उन्होने मुझे अपने गले से लगा लिया…, बुआ के खरबूजों ने मेरे सोए हुए शेर पर फिर अटॅक कर दिया…
मेने उनके कान में कहा.. ज़रूर आउन्गा बुआ… आपका चॅलेंज मुझे मंजूर है… मेरी हॉट डार्लिंग बुआ…..
बीते एक हफ्ते में निशा ने मेरे दिल पर इस कदर कब्जा कर लिया था कि मुझे उठते-बैठते, सोते-जागते बस उसी के ख्याल आते रहते…
बुआ के जाते ही मे फिर उसके ख़यालों में खोने लगा…
भाभी मेरी हालत से अन्भिग्य नही थी, लेकिन घर की भीड़-भाड़ के चलते वो भी कुछ नही कर सकती थी…
धीरे-2 एक-एक कर के रिस्तेदार विदा होने लगे.. भाभी ने निशा को और कुछ दिनो के लिए रोक लिया था… उनका भाई राजेश अपने घर लौट गया था…
बड़ी बुआ भी जा चुकी थी.., एक हफ्ते बाद कामिनी भाभी भी पहली बार विदा होकर अपने घर चली गयी.. और दोनो भाई अपनी ड्यूटी पर लौट गये…
एक दिन मे छोटी चाची के यहाँ उनके आँगन में पड़ी चारपाई पर लेटा था, चाची सिरहने की तरफ पलटी लगाए बैठी थी, मेरा सर उनकी गोद में रखा हुआ था…
मेने चाची के खर्बूजों को दबा कर कहा – आअहह.. चाची ये तो और ज़्यादा फूल कर गुदगूदे होते जा रहे हैं…
वो – हां लल्ला.. अब इनमें दूध भी तो बनेगा ना… बच्चे के लिए.. जैसे-2 दिन नज़दीक आते जाएँगे वैसे-2 इनमें दूध आता जाएगा…
मेने एक चुचि को मसल्ते हुए कहा – तो अभी चूस कर देखूं क्या.. दूध निकलेगा इनमें से..?
वो – नही लल्ला, अभी नही, वो तो बच्चे के जन्म के बाद ही आएगा…! लेकिन लल्ला.. अब मेरा मान बहुत करता है वो करने का… प्लीज़ कुछ करो ना.. !
मे – मुझे कोई प्राब्लम नही है चाची.. आप कहो तो अभी अंदर चलते हैं…?
वो- नही अभी नही.. एक काम करना, कल कॉलेज से जल्दी सीधे यहीं आ जाना..
मेने हां बोलके एक बार और उनके चुचे मसल दिए… उनके मुँह से आहह..
निकल गयी… जबाब में उन्होने मेरे लंड को पकड़ कर मरोड़ दिया….!
आययईीीई…क्या करती हो चाची… उखाड़ोगी क्या..? मेने सिसकते हुए कहा…
वो हँसते हुए बोली – जब तुमने मेरी चुचि मसली थी, तो कुछ नही, अब अपनी बारी आई तो चिल्लाने लगे…
अभी हम आगे कुछ और करते, कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट सुनाई दी…
मे उनकी गोद से उठ कर बैठ गया.. सामने देखा तो निशा, रूचि को गोद में लिए खड़ी थी..
मे उनकी गोद से उठ कर बैठ गया.. सामने देखा तो निशा, रूचि को गोद में लिए खड़ी थी..
चाची – आओ निशा ! अंदर आओ, वहाँ क्यों खड़ी रह गयी… ?
वो हमारे पास तक आई.. मे भी चारपाई से खड़ा हो गया और रूचि के गाल पर किस करने के लिए अपने होंठ आगे किए…
मे जैसे ही उसको किस करने वाला था कि रूचि ने अपना सर पीछे हटा लिया.. और मेरे होंठ निशा के गाल पर जा टिके…
रूचि ताली बजाते हुए हँसने लगी और चिल्ला कर बोली … दादी देखो ! चाचू ने मौसी को क़िस्सी कर दी…ओहोहो… ! चाचू ने मौसी को क़िस्सी करदी…!
उसके साथ चाची भी हँसने लगी… और हम दोनो झेंप गये.. मेने उसे सॉरी बोला…
वो रूचि को झूठा गुस्सा दिखा कर बोली – रूचि ! तू बहुत शैतानी करती है..
ठहर अभी तेरी पिटाई करती हूँ….
रूचि उसकी गोद से उतार कर मेरी गोद में आ गयी.. और मेरे गले से लिपट गयी…!
रूचि के गाल पर एक पप्पी कर के मेने उसे चाची के पास चारपाई पर बिठा दिया………
चाची बोली – तुम दोनो बैठो, मे ज़रा गाय-भैंस को चारा डाल कर आती हूँ..
और वो बहाना कर के वहाँ से चली गयी.. मेने कहा, निशा जी बैठिए ना.. !
वो – नही मे ऐसे ही ठीक हूँ.. आप बैठिए..
फिर बोली – आप मुझे निशा जी क्यों बुलाते हैं..? खाली निशा बोला कीजिए ना प्लीज़…!
मे – आपको अच्छा लगेगा..?.. तो उसने कहा – हां ! और हो सके तो ये आप की वजाय तुम कहो तो मुझे और ज़्यादा अच्छा लगेगा..
मे – ठीक है, जैसा तुम कहो… वैसे निशा ! तुमने मेरी बात का अभी तक कोई जबाब नही दिया…?
वो – कॉन सी बात का..?
मे – मेने उस दिन कहा था.. ना ! कि मे तुम्हें पसंद करने लगा हूँ.. क्या तुम भी मुझे पसंद करती हो..?
वो बिना कोई जबाब दिए मेरी तरफ देखने लगी.. पता नही कैसा जादू था उसकी आँखों में की मे उसकी आँखों डूबने लगता था……!
कुछ देर बाद उसने अपनी पलकें झुका ली.. लेकिन कोई जबाब नही दिया.. मेने उसके हाथ अपने हाथों में ले लिए और फिरसे अपना सवाल दोहराया, बताओ ना प्लीज़…!
वो – अगर मे ना कहूँ तो आप मान लेंगे कि मे आपको पसंद नही करती..…?
मे – फिर भी मे तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ…!
वो – सच कहूँ… तो मे आपको पहली नज़र से ही चाहने लगी थी, तब मुझे आपके बारे में ये भी पता नही था.. कि आप कॉन हो…?
मे – सच..! तुम सच कह रही हो..? ओह निशा… आइ लव यू… ये कहकर मेने उसे अपनी बाहों में भर लिया…
वो – आइ लव यू टू अंकुश जी… मे भी आपसे प्यार करने लगी हूँ.. लेकिन अभी छोड़िए प्लीज़ … चाची आ गयी तो क्या सोचेंगी..
मेने उसे अपने सीने से लगाकर कहा – तुम चाची की चिंता मत करो जान… वो कुछ भी नही कहेंगी…
तुम नही जानती तुमने मुझे कितनी बड़ी खुशी दे दी है… ये कहकर मेने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके पतले-2 रसीले होंठों को चूम लिया…
वो बुरी तरह से शरमा गयी, उसका शरीर थर-थर काँपने लगा, साँसें भारी होने लगी…
रूचि फिर ताली बजकर चिल्लाई… ओहो ! चाचू ने फिर मौसी की क़िस्सी कर दी…!
रूचि की आवाज़ सुनकर हम दोनो अलग हो गये…
निशा रूचि को थप्पड़ दिखाते हुए बोली – ठहर शैतान.. अभी बताती हूँ तुझे…
और फिर मुस्कराते हुए प्यार से उसने रूचि को अपनी बाहों में समेट लिया,
उसके गाल पर एक प्यार भरा किस कर के मेरी ओर देखकर वो मुस्काराई, और उसे गोद में लेकर खिल-खिलाती हुई घर की तरफ भाग गयी…
मे मन ही मन मुस्करता हुआ, उसे जाते हुए देखता रहा………!
रात को खाना खाते समय भाभी ने कहा – लल्ला जी… कल निशा को छोड़ आना.. अब बहुत दिन हो गये उसको यहाँ… घरवाले खम्खा परेशान हो रहे होंगे…
मेरी तो ये सुन कर साँस ही अटक गयी.., खाना गले में अटक गया.., मुझे खाँसी का ठन्स्का सा लग गया…
भाभी – क्या हुआ… अच्छे से खाना खाओ.. इतनी भी क्या जल्दी है…ये कहकर मुझे पानी का ग्लास पकड़ा दिया…
मेने चोर नज़रों से निशा की तरफ देखा, वो भी भाभी की बात सुन कुछ दुखी सी लग रही थी…
मे – ऐसी भी क्या ज़रूरत आन पड़ी एकदम से भाभी.. मुझे कल कॉलेज भी जाना ज़रूरी है.. कोर्स बहुत पिछड़ गया है भैया की शादी के चक्कर में….!
भाभी – तो कोई बात नही कॉलेज से लौट कर छोड़ आना.. अब सारी जिंदगी ये यहाँ तो नही रह सकती ना.., वैसे भी तुम्हारी बुलेट रानी के लिए है ही कितना दूर..
मे – ठीक है.. फिर दोपहर के बाद ही निकल पाएँगे…
अब साला चाची से भी कल का वादा किया है, तो वो भी निभाना तो पड़ेगा वरना वो बुरा मान जाएँगी..…,
मेने अकेले में भाभी को ये बात बताई.. तो वो बोली – कोई बात नही, मॅनेज कर लेना…
शाम को थोड़ा लेट चले जाना और रात वहीं रुक जाना.. मेने कहा – वैसे भाभी इतना भी अर्जेंट नही है.. निशा का जाना.. और कुछ दिन रहने दो ना.. !
वो मेरी तरफ गहरी नज़रों से देखते हुए बोली – तुम उसको रोकने के लिए इतना प्रेशर क्यों डाल रहे हो…? बात क्या है..? कुछ लफडा लगता है..क्यों..?
मे नज़र नीची कर के बोला – नही भाभी ऐसा वैसा कुछ नही, बस मे तो यूँही कह रहा था… !
वो – अच्छा वो सब छोड़ो.. अब मुझे सच..सच जबाब देना.. जो मे पुच्छू उसका..
मे – हां ! पुछिये…
वो – तुम्हें निशा कैसी लगती है..?
मे – अच्छी है, सुन्दर है.. इसमें छिपाने जैसा क्या है.. जो सच है सो है..
वो – तुम उसे पसंद भी करते हो…
उनके इस सवाल पर में गड़बड़ा गया… जल्दी से कोई जबाब नही दे सका.. तो नज़र अपने आप झुक गयी…
मेरी ओर से कोई जबाब ना पाकर वो फिर बोली – वो भी तुम्हें पसंद करती है..?
मेने अपनी नज़र ऊपर की और उनकी ओर देखने लगा… मुझे अपनी ओर देखते हुए पाकर वो बोली –
लल्ला ! मे तुम दोनो के बारे में सब जानती हूँ, और इसलिए उसे यहाँ से भेज रही हूँ…. जिससे तुम दोनो कहीं बहक ना जाओ, और समय से पहले कुछ ऐसा हो जो नही होना चाहिए…
मे तुम दोनो से नाराज़ नही हूँ.. बल्कि मे तो खुद चाहती हूँ.. कि आगे चल कर तुम दोनो एक हो जाओ..
निशा के लिए तुमसे अच्छा जीवन साथी और कोई हो ही नही सकता.. लेकिन रिश्तों की कुछ मर्यादाएँ होती हैं, जिन्हें हमें निभाना पड़ता है..!
मे मुँह बाए, बस उनके चेहरे को ही देखता रहा.. उनके चेहरे पर किसी भी तरह के कोई भाव नही थे… जस्ट चिल…
मे भाभी के गले से लग गया… मेरी आँखों से दो बूँद आँसुओं की निकल पड़ी और मेने रुँधे गले से कहा-
सच में आप मेरे लिए भगवान का रूप हो भाभी… हम दोनो एक दूसरे से बहुत प्यार करने लगे हैं.. और अब एक दूसरे के बिना रहने की कल्पना भी नही कर सकते…
वो – लेकिन कुछ साल तो तुम दोनो को इंतेज़ार करना पड़ेगा… लेकिन ये मेरा वादा है तुमसे.. कि चाहे जो भी हो, मे तुम दोनो को मिलाकर ही रहूंगी…
अब तुम जाओ.. और बिना किसी शक-सुवह के सो जाओ… कल बहुत मेहनत करनी है.. ये खाकर मेरे गाल पकड़ कर हँसने लगी…
मेने एक बार भाभी के गालों पर किस किया और सोने चला गया..
दूसरे दिन कॉलेज में दो घंटे बिताने के बाद में जल्दी घर आ गया और सीधा छोटी चाची के पास पहुँच गया…
चाची अभी -अभी नहा कर चुकी थी, मेरे आवाज़ देने पर उन्होने गेट खोला, तो देखा वो उसी अंदाज में अपना पेटिकोट चुचियों पर चढ़ाए हुए थी..
गेट खोल कर वो अपने कमरे की तरफ चल दी.. मेने भी फटाफट दरवाजा बंद किया और उनकी मटकती गान्ड का पीछा करते हुए उनके कमरे में आ गया…
उनकी मटकती गान्ड के सीन ने मेरे लंड को खड़ा कर दिया…
चाची ने अभी तक अपना बदन भी नही पोंच्छा था… पानी की बूँदें किसी मोती के दानों की तरह उनके गोरे मादक बदन पर चमक रही थी…
अंदर जाकर वो पालग पर पड़े अपने कपड़े उठाने ही वाली थी, कि मेने पीछे से उनकी गान्ड में अपना लंड सटा दिया… और कमर में बाहों का लपेटा डालकर उनके बदन से पानी की बूँदों को चाटने लगा…
चाची कपड़े पहनना भूल गयी और अपनी आँखें मीन्चे आनंद के सागर में गोते लगाने लगी…
उनके हाथ से पेटिकोट भी छूट गया… और अब वो उनके पैरों में पड़ा अपनी गुस्ताख़ी की भीख माँग रहा था…
हाल ही में नाहया हुआ बदन, जो दिसंबर की सर्दी में और ज़्यादा ठंडा हो गया था… मेरे शरीर की गर्मी से गरमाने लगा…
मेने अपना पॅंट खोल दिया और फ्रेंची से अपना गरमा-गरम लंड निकाल कर चाची की मदमस्त ठंडी-2 गान्ड से रगड़ दिया…
अहह…………मेरे……….लल्लाआअ……..रजाआाआआ……
कितना गरम है.. तुम्हारा तो…
चाची ! मेने थोड़े बनावटी गुस्से से कहा – ये तुम्हारा.. मेरा… क्या..कहती रहती हो… सीधे-2 नाम नही ले सकती… जाओ .. रखलो अपनी धर्मशाला… मुझे नही चाहिए…
इतना बोल कर मे अलग हो गया और अपना पॅंट उठा लिया…..
अरे…मेरे राजा…मुन्ना….नाराज़ हो गया… चाची ने मेरा लंड अपनी मुट्ठी में लेकर कहा – तुम्हारा ये लंड महाराज कितना गरम है.. लो अब ठीक है..
ऐसे नाराज़ ना हुआ करो मेरे होनेवाले बच्चे के पापा… मुझे ऐसे शब्द बोलने में थोड़ी झिझक लगती है.. पहले कभी बोले नही ना इसलिए… आगे से ख्याल रखूँगी…
मेने चाची के होंठ अपने मुँह में भर लिए और उन्हें चूसने लगा…
चाची भी मेरा साथ देने लगी, और साथ-साथ मेरा लंड भी मसल्ति जा रही थी…
मेने चाची की चूत में अपनी दो उंगलियाँ डाल दी और उन्हें अंदर बाहर करके चोदने लगा…
चाची की आँखे लाल होने लगी… वासना की खुमारी उनके सर चढ़ने लगी.. और उनकी चूत गीली हो गयी…
अब मेने उनकी चुचि को दबाते हुए कहा – अह्ह्ह्ह…चाची आपकी ये चुचियाँ कितनी मस्त हो गयी हैं…जी करता है चूस्ता ही रहूं…
तो चूसो ना रजाआ….आअहह…हान्न्न….और ज़ोर से…. खाजाओ… बहुत परेशान करती हैं… काटो…आहह….ज़ोर से नहियीईईईईईई….
मेने चूस-चूस कर उनकी चुचियों को लाल कर दिया… उत्तेजना में कयि जगह दाँत से काट भी लिया… जिससे खून झलकने लगा था….
सॉरी चाची ! मेने आपको काट लिया….
कोई बात नही … मुझे दर्द नही हुआ….
अब हम दोनो से ही और इंतेज़ार करना मुश्किल हो रहा था… सो मेने चाची को लिटा दिया… और उनकी चूत को हाथ से सहला कर चूम लिया… उनकी टाँगें मेरे लंड के स्वागत में खुल गयी…
चाची का पेट अब थोड़ा सा उभर आया था, जिससे उनकी नाभि का गड्ढा थोड़ा कम गहरा हो गया था…
एक बार मेने उनके उभरे हुए पेट को चूमा और अपना मूसल उनकी रसीली गागर के मुँह से अड़ा कर अंदर डाल दिया….
अहह………..आराम से करना…. लल्ला… तुम्हारे बच्चे को चोट ना लग जाए… नही तो कहेगा… कैसा निर्दयी बाप है.. पेट में भी मारता है…
मेने धीरे-2 धक्के लगाकर उनकी चुदाई करने लगा… आजकल उनकी चूत मेरे लंड को कुछ ज़्यादा ही जाकड़ लेती थी… जिससे हम दोनो को ही बहुत मज़ा आता…
एक बार झड़ने के बाद मेने चाची को घोड़ी बना दिया… और उनकी गान्ड को चाटते हुए कहा…
चाची ! आपकी गान्ड कितनी मस्त है… इसमें एक बार लंड डालके देखें..?
वो – नही लल्ला ! दर्द होगा..
मे – प्लीज़ चाची ! कई दिनो से मन था मेरा लेकिन कहा नही… पर आज मान नही मान रहा… प्लीज़ तोड़ा देखें तो सही.. कैसा लगता है…
वो – तुम भी ना लल्ला… बहुत जिद्दी हो… ! अच्छा वहाँ से तेल की शीशी ले लो और अच्छे से सुराख और अपने लंड पे लगाके तब डालना…
मेने फ़ौरन हेर आयिल की शीशी ली.. थोडा चाची की गान्ड के छेद पर डाला और उंगली से उसे अंदर तक चिकना कर दिया…
फिर अपने लंड पर चुपडा… और उनकी गान्ड के भारी-2 पाटों को अलग कर के उनके छेद पर टिका दिया…..
गान्ड के छेद पर लंड का अहसास होते ही चाची की गान्ड का छेद खुलने-बंद होने लगा…
मेने बॉटल से दो बूँद तेल की और टपका दी… और इस बार अपनी दो उंगलियाँ एक साथ अंदर डाल दी, चाची ने चिहुन्क कर अपनी गान्ड के छेद को सिकोड कर मेरी उंगलियों पर कस लिया…..
हइई… लल्ला… क्या करते हो… मेरी गान्ड चटख रही है…
मेने उनकी गान्ड पर दूसरे हाथ से चपत मार कर कहा – ऐसे गान्ड भींचोगी तो चट्केगी ही ना, इसको थोड़ा ढीला छोड़ो…
मेरी बात मानकर चाची ने अपनी गान्ड को थोड़ा ढीला कर लिया, अब मेरी दोनो उंगलियाँ आराम से अंदर तक पहुँच पा रही थी…
उनकी गान्ड का छेद अब थोड़ा सा खुल गया था, मेने उंगलियाँ बाहर निकाल कर दो बूँद तेल और डाला और उसे उंगली से अंदर कर के अपने लंड को उसके छेद पर फिर से रख दिया…
एक हल्के से धक्के के साथ मेरा पूरा सुपाडा गान्ड के अंदर जाकर फिट हो गया..….
लल्ला…. थोड़ा धीरे करो… मेरी गान्ड फट रही है…हाईए… बस करो…
मेने चाची की चौड़ी चकली पीठ को चूमते हुए उनकी चुचियों को थाम लिया और ज़ोर ज़ोर से मसल्ने लगा..
चाची की गान्ड में लंड की चुभन कुछ कम होने लगी तो मेने और थोड़ा पुश किया… और आधा लंड अंदर कर दिया..
हइई…लल्लाअ … लगता है आज नही छोड़ोगे… मुझे…अरे मारीी…उफफफफफ्फ़..
अब मेने अपने एक हाथ को उनकी कमर की साइड से नीचे ले जाकर उनकी चूत को सहला दिया और अपनी दो उंगलियाँ चूत के अंदर कर के उसे चोदने लगा…
अब मेने अपने एक हाथ को उनकी कमर की साइड से नीचे ले जाकर उनकी चूत को सहला दिया और अपनी दो उंगलियाँ चूत के अंदर कर के उसे चोदने लगा…
चूत की सुरसूराहट में चाची अपनी गान्ड का दर्द भूल गयी… और सिसकियाँ…भरने लगी…
मौका देख कर मेने एक और धक्का मार दिया और मेरा पूरा लंड गान्ड की सुरंग में खो गया…
वो दर्द से कराह उठी.. तकिये में मुँह देकर बेडशीट को मुत्ठियों में कस लिया…
लेकिन मेने अपनी उंगलियों से उनकी चूत चोदना जारी रखा.. और धीरे-2 कर के गान्ड में लंड अंदर – बाहर करने लगा…
चाची के दोनो छेदो में सुरसुरी बढ़ने लगी और वो अब मस्ती से आकर गान्ड मरवाने लगी…
चूत से उंगलियाँ बाहर निकाल कर उनकी गान्ड पर थपकी देते हुए धक्के लगाने में मुझे असीम आनंद आ रहा था….
चाची भी भरपूर मज़ा लेते हुए अब अपनी गान्ड को मेरे लंड पर पटक रही थी,
जब उनकी मोटी गधि जैसी गान्ड मेरी जांघों से टकराती, तो एक मस्त ठप्प जैसी आवाज़ निकलती… मानो कोई टेबल पर थाप दे रहा हो…
10 मिनिट तक उनकी गान्ड मारने के बाद मेरा पानी उनकी गान्ड में भर गया.. और हम दोनो ही पस्त होकर बिस्तर पर लेट गये…
5 मिनिट के बाद मेने चाची की चुचि को सहलाते हुए पूछा – चाची ! गान्ड मारने में मज़ा आया कि नही…
वो – शुरू में तो लगा कि मेरी गान्ड फट गयी.. बहुत दर्द हुआ .. लेकिन बाद में मज़ा भी खूब आया… लेकिन आहह…. अब फिर से दर्द हो रहा है…माआ…
पर तुम चिंता मत करो , कुछ देर में ठीक हो जाएगा… तुम बताओ.. तुम्हें मज़ा आया या नही…
मे – मुझे तो बहुत मज़ा आया… लेकिन लगता है चाची.. ये तरीक़ा सही नही है..
वो तो आपकी गान्ड ऐसी मस्त है कि मे अपने आप को रोक नही पाया वरना कभी नही मारता…
वो – कोई बात नही… मेरे राजा… तुम्हारे लिए तो मेरी जान भी हाज़िर है.. ये निगोडी गान्ड क्या चीज़ है…
चाची अब खुल कर गान्ड, लंड, चूत बोलने लगी थी…
मे अपने कपड़े पहन कर घर आया, आज अपनी जान निशा को जो चोदने जाना था…
आकर फ्रेश हुआ… खाना खाया और उसके गाओं जाने की तैयारी में जुट गया…
निशा का मान नही था जाने का, लेकिन भाभी का आदेश था, जाना तो पड़ेगा ही..
भाभी का गाओं कोई 30-35 किमी ही दूर था हमारे यहाँ से, सिंगल रोड था.. पूराना सा.. लेकिन वहाँ ज़्यादा नही चलते थे..
रोड खराब होने के कारण थोड़ा जल्दी निकलना था जिससे दिन के उजाले में ही पहुँच जायें तो ज़्यादा अच्छा था.. वैसे तो ज़्यादा से ज़्यादा 1 घंटा ही लगना था..
हम दोनो को निकलते-2 सबसे मिलते मिलते.. 5 बज गये.. ठंडी के दिन थे.. 5 बजे से ही दिन ढालने लगता था…
एक दूसरे से अपने प्रेम का इज़हार करने के बाद भी निशा मेरे साथ खुल नही पा रही थी… बाइक पर भी वो मुझसे दूरी बनाए हुए बैठी थी…
मेने गाओं निकलते ही कहा – निशा इतना दूर क्यों बैठी हो जैसे मे कोई पराया हूँ..
वो – ऐसा क्यों बोलते हो जानू…! बस मुझे शर्म आती है… और कोई बात नही..
मे – मुझसे अब कैसी शर्म…? अब तो हम दोनो प्रेमी हैं ना !
वो – फिर भी मुझे शर्म आती है… , मे चुप हो गया, और गाड़ी दौड़ा दी…
अचानक से सड़क में एक गड्ढा आया, मेने एकदम से ब्रेक लगाए… बुलेट की पिच्छली सीट थोड़ी उँची सी होती है.. ड्राइवर सीट से…
सो ब्रेक लगते ही वो सरकती हुई मेरी पीठ से चिपक गयी.. और डर के मारे मेरे सीने में अपनी बाहें लपेट कर चीख पड़ी…
मे – क्या हुआ डार्लिंग ?
वो – आराम से नही चला सकते..?
मे – आराम से चलाने का समय नही है मेरी जान…! रोड खराब है… लेट हो गये तो रात में इन खद्डो में वैसे भी मुश्किल होगी.. तुम ऐसे ही बैठी रहो ना.. क्या दिक्कत है..
वो हूंम्म.. कर के मुझे कस के पकड़ कर बैठ गयी… मे बीच-2 मे ब्रेक मार देता तो वो और ज़्यादा चिपक जाती…
उसके 32” के ठोस उरोज मेरी पीठ पर दब रहे थे… कुछ देर में उसकी शर्म कम हो गयी और उसने मेरे कंधे से अपना गाल सटा लिया, फिर मेरे गाल को चूमकर बोली – अब खुश..!
मे – तुम्हारा साथ तो मेरे लिए हर हाल में खुशी ही देता है.. जानेमन… तुम खुश हो कि नही.. या अब भी शर्म आ रही है..?
वो – आप मुझे बिल्कुल बेशर्म बना दोगे…
मे – अरे यार ! ऐसे बैठने से भी कोई बेशर्म हो जाता है क्या..? मेने उसे और थोड़ा खोलने के लिए कहा…
निशा मेरे सीने को पकड़ने से मुझे ड्राइविंग में थोड़ा प्राब्लम होती है.. तुम ना मेरी कमर को पकड़ लो…
वो – आप जहाँ कहोगे वहीं पकड़ लूँगी जानू.. और ये कह कर उसने मेरी जांघों पर हाथ रख लिए…
मेने कहा – थोड़ा अंदर की साइड में पाकड़ो, नही तो तुम्हें सपोर्ट नही मिलेगा…
वो – धत्त… अब आप मुझे बिल्कुल बेशर्म करना चाहते हैं… फिर कुछ सोच कर.. अच्छा चलिए आपकी खुशी के लिए ये भी सही.. और उसने अपने हाथ मेरी जाँघो के जोड़ पर रख लिए…
गाड़ी के जंप के कारण उसके हाथ भी इधर-उधर होते.. तो उसकी उंगलिया मेरे लंड को छू जाती … आहह… ये हल्का सा टच ही मेरे लिए बड़ा सुखद लग रहा था…
वो भी अब अपनी शर्म से निकलती जा रही थी और अपनी उंगलियों को मेरे लंड के ऊपर फिरने लगी…
पीछे से वो और अच्छे से चिपक गयी, अब उसकी जांघें मेरी जगहों से सात चुकी थी.. जो कभी-2 गाड़ी के जंप से आपस में रगड़ जाती…
हम दोनो पर एक अनूठा सा उन्माद छाता जा रहा था… लेकिन ये उन्माद कुछ ही देर का था… उसका गाओं आ चुका था, और वो फिरसे मुझसे दूरी बना कर बैठ गयी…
हम जब उसके घर पहुँचे तो घर में अकेली उसकी माँ थी, उसके भाई राजेश शहर में नौकरी पर थे, जो हफ्ते के हफ्ते ही आते थे, पिताजी अभी खेतों से आए नही थे..
निशा को मेरे साथ देखकर वो चोन्क्ते हुए बोली – ये कॉन है बेटी..?
निशा – इनको नही पहचाना मम्मी…? ये दीदी के छोटे देवर ! अंकुश नाम है इनका…
मम्मी – ओह..! आओ बेटा बैठो…! माफ़ करना कभी देखा नही ना तुम्हें इसलिए पुच्छ लिया..
मे – कोई बात नही मम्मी जी.. वैसे भी मे भैया की शादी में ही आया था…
मम्मी – हां ! लेकिन तब तुम बहुत छोटे से थे… अब देखो… क्या गबरू जवान हो गये हो…
मे- ये सब आपकी बेटी का ही कमाल है मम्मी जी…!
वो एकदम से चोन्क्ते हुए बोली – मेरी बेटी का…? वो कैसे…?
मे – अरे मम्मी जी ! भाभी मेरा इतना ख़याल रखती हैं.. कि पुछो मत.. मुझे कभी अपनी माँ की कमी महसूस नही होने दी…
वो – ओह हां ! मोहिनी है ही ऐसी, यहाँ भी सबका बहुत ख़याल करती थी..
कुछ देर में निशा के पिताजी भी आ गये.. वो भी मिलकर बड़े खुश हुए.. और घर के हाल-चाल पुच्छे…
खाना पीना खाकर वो लोग जल्दी ही सोते थे… सो कुछ देर और इधर-उधर की बातें हुई.. और वो दोनो सोने चले गये…
जाते हुए निशा की मम्मी ने उससे कहा – निशा बेटा सोने से पहले लल्ला जी को ध्यान से दूध पिला देना…..!
सोने के लिए जाते हुए निशा की मम्मी ने उससे कहा – निशा बेटा सोने से पहले लल्ला जी को ध्यान से दूध पिला देना…..
निशा का घर उनके घर की ज़रूरत के हिसाब से जैसा मध्यम वर्गिया ग्रामीण लोगों का होना चाहिए उस हिसाब से ही था..
तीन कमरे, जिनमें एक में उसके मम्मी-पापा, एक में निशा और एक उसके भाई का था, एक बड़ा सा बैठक कम हॉल जिसमें एक टीवी भी लगा हुआ था…
हॉल से बाहर एक वरांडा… उसके बाद थोड़ी खाली जगह जो बौंड्री से घिरी हुई थी..
हम इस समय हॉल में बैठे टीवी देख रहे थे…मे सोफे पर था, और वो साइड में पड़ी सोफा चेयर पर बैठी थी..
मेने उसकी मम्मी के जाने के कुछ देर बाद निशा से कहा – क्यों डार्लिंग… क्या ख़याल है…?
वो मेरी तरफ मुस्कराते हुए बोली – किस बात का…?
मे – अपनी मम्मी की अग्या का पालन नही करोगी.. ?
वो हंस कर बोली ओह ! वो..! तो अभी चाहिए.. या सोने से पहले…
मेने कहा शुभ काम में देरी नही करना चाहिए.., मेरी बात सुनकर वो चेयर से उठी, और मेरे आगे से होकर किचेन की तरफ दूध लाने के लिए जाने लगी…
मेने उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया… तो वो एक झोंके के साथ मेरी गोद में आ गिरी… गिरने से बचने के लिए उसने मेरे गले में बाहें डाल दी…
वो मेरी आँखों में देखते हुए बोली – क्या करते हो…? खुद ही कहते हो दूध लाने को और रोक भी रहे हो…!
मे उस दूध की बात नही कर रहा जानेमन, मुझे तो ये वाला दूध पीना है……ये कहकर मेने उसके एक संतरे पर अपना हाथ रख दिया…
हटो बदमाश कहीं के…., उसने मुझे हल्के से सीने में मुक्का मारा… कितना ग़लत-सलत सोचते हो…
मे – इसमें क्या ग़लत कहा है मेने.. दूध ही तो माँगा है.. नही पिलाना है तो मत पिलाओ.. मे सुबह मम्मी को बोल दूँगा… कि आपकी बेटी ने मुझे दूध दिया ही नही…
उसने शर्म से अपना चेहरा मेरे सीने में छुपा लिया… मेने उसकी थोड़ी को अपनी उंगलियों से ऊपर कर के उसका चेहरा उठाया… और उसकी झील सी गहरी आँखों में झाँकते हुए कहा-
तुम कितनी मासूम हो निशु…मे सच में बहुत शौभग्यशाली हूँ जिसे इतनी मासूम, और सुंदर सी प्यारी सी लड़की का प्यार मिल रहा है…
मे तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ मेरी जान… आइ लव यू…!
आइ लव यू टू जानू… कहकर वो मेरे सीने से लिपट गयी….!
मेने धीरे से उसकी पीठ पर हाथ रख कर सहला दिया… और एक हाथ से उसके गाल को सहलाकर उसके होंठ चूम लिए…
मे तुमसे दूर नही रह सकती जानू..! वो कुछ देर बाद बोली, तो मेने कहा – मे कॉन सा तुमसे दूर रह सकता हूँ… लेकिन हमें कुछ दिन तो रहना ही पड़ेगा..
वो – अगर तुम मुझे नही मिले तो में मर जाउन्गि… अंकुश..!
सीईईईईईईईई… उसके होंठों पर उंगली रख कर कहा मेने – ऐसे मरने गिरने की बात नही करते… भाभी ने मुझे प्रॉमिस किया है… चाहे कुछ हो जाए.. हम मिलकर ही रहेंगे..
वो – सच ! क्या दीदी को पता है हमरे प्यार के बारे में…?
मे – हां ! और ये बात उन्होने खुद से ही कही है… अब हमें बस कुछ सालों तक इंतजार करना पड़ेगा…
वो फिरसे मुझसे लिपट गयी..ओह ! जानू मे आज बहुत खुश हूँ… लेकिन एक प्रॉमिस करो.. तुम जल्दी-2 मुझसे मिलने आया करोगे… कम से कम महीने में एक बार..
मे – मुझे कोई प्राब्लम नही है… लेकिन तुम खुद सोचो.. मेरा बार-2 यहाँ आना क्या लोगों में शक पैदा नही करेगा..? क्या तुम्हारे मम्मी-पापा ये चाहेंगे…?
वो – तो फिर मे कैसे रहूंगी इतने दिन … कम-से-कम फोन तो करते रहना..
मे – हां ! ये सही रहेगा.. हम रोज़ रात को फोन से बात कर लिया करेंगे..
इतनी देर से निशा मेरी गोद में बैठी थी… उसकी गोल-मटोल छोटी लेकिन मुलायम गान्ड की गर्मी से मेरा लंड टाइट जीन्स में व्याकुल होने लगा…
मे अपने कपड़े नही लाया था, सो मेने निशा से कहा – यार मुझे कुछ चेंज करना है… ये जीन्स में कंफर्टबल नही लग रहा…
वो मेरी गोद से उठ खड़ी हुई, और मेरा हाथ पकड़ कर अपने भैया के रूम में ले गयी… उसकी अलमारी से एक पाजामा और टीशर्ट निकाल कर मुझे पकड़ा दिया…
मेने अपने कपड़े निकाल दिए और टीशर्ट पहन ली… मेने जैसे ही अपनी जीन्स निकाली…
मेरे फ्रेंची में खड़े मेरे पप्पू को देखकर वो शर्मा गयी और अपना मुँह फेर लिया…
मेने उसे कुछ नही कहा और मुस्कुरा कर पाजामा पहन लिया…
मेरे सोने का इंतेज़ाम भी इसी रूम में था, तो फिर हम दोनो उसमें पड़े पलंग पर बैठ गये…
मेने फिर एक बार निशा को अपनी गोद में खींच लिया और उसके होंठ चूमकर कहा
निशा ! मेरी एक इच्छा पूरी करोगी..?
वो – क्या..? अगर मेरे बस में हुआ तो ज़रूर पूरी करूँगी..!
मे – मुझे तुम्हारे रूप सौंदर्य के दर्शन करने हैं..?
वो – क्यों ? अभी क्या मे पर्दे में हूँ..?
मे – तुम्हारा ये संगेमरमर सा बदन तो पर्दे में है ना…!
ये आप कैसी बहकी-2 बातें कर रहे हो…? भला ये भी कोई इच्छा हुई..? वो थोड़ा नाराज़गी भरे स्वर में बोली…
मे बस तुम्हारे इस सुन्दर बदन की छवि अपने मन में बसाना चाहता हूँ.. जिसके सहारे आने वाला लंबा समय गुज़ार सकूँ..
मे तुमसे कोई ज़ोर जबर्जस्ती नही करूँगा, अगर अपने प्यार पर भरोसा कर सको तो..
वो खामोशी से मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, …फिर कुछ सोच कर बोली….
ठीक है ! मे आपसे सच्चा प्रेम करती हूँ… और आशा करती हूँ.. कि आप भी एक सच्चे प्रेमी की नज़र से ही मुझे देखेंगे..
ये कह कर वो मेरी तरफ पीठ कर के खड़ी हो गयी… और बोली… देख लीजिए जैसे देखना चाहते हैं..
मे उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया… और उसके गले पर अपने प्यासे होंठ रख दिए…
उसके होंठों से एक मीठी सी सिसकी निकल पड़ी.. और उसने कस कर अपनी आँखें बंद कर ली…
उसकी कमीज़ की पीठ पर एक ज़िप थी, जो उसके गले से लेकर कमर तक पहुँचती थी… मेने उसके कंधों पर अपने हाथ रखकर उसे सहलाते हुए… अपने हाथ धीरे-2 उसकी ज़िप पर ले आया..
कुछ देर ज़िप के आस-पास हाथों को फिराया… और उसकी ज़िप का लॉक अपने अंगूठे में लेकर धीरे-2 नीचे की तरफ खींचने लगा…
जैसे जैसे उसकी ज़िप नीचे को खुलती जा रही थी …. उसकी दूधिया रंग की पीठ किसी संगमरमर सी चिकनी मेरी आँखों के सामने किसी अनमोल खजाने की तरह खुलती जा रही थी…
कमर तक ज़िप खोलने के बाद मेने उसकी पीठ पर उसकी ब्रा की स्ट्रीप के ठीक ऊपर अपने गीले होंठ रख दिए….
उसकी पीठ काँप कर और अंदर को चली गयी, और उसके मुँह से एक और सिसकी निकली…इस्शह…..सस्सिईईईईईई…..
अब में उसकी पीठ को ऊपर की तरफ चूमता हुआ… उसकी नंगी पीठ पर अपने हाथ फिरा रहा था… निशा तो जैसे कहीं खो ही गयी थी…
फिर मेरे हाथ उसकी पीठ सहलाते हुए कंधों पर पहुँचे और उसकी कमीज़ को दोनो बाजुओं से नीचे सरका दिया….
उसकी कमीज़ उसके बदन से सरसराती हुई… उसके कदमों में जा गिरी…
मेने उसे कंधों से पकड़कर अपनी तरफ घुमाया… वो किसी कठपुतली की तरह मेरे हाथों के इशारों पर चल रही थी…
जब मेरी नज़र उसके उभारों पर पड़ी….उफफफफफफफफफफफफफ्फ़….. क्या दूधिया… बदन था उसका… गोल-गोल टेनिस की बॉल के साइज़ के उसके दूधिया उरोज एक छोटी सी गुलाबी रंग की ब्रा में क़ैद उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे…
दोनो के बीच की चौड़ी खाई… मुझे ललचा रही थी…, मे अपने आपको रोक नही पाया…और झुक कर उसके उभारों के बीच की खाई पर अपने तपते होंठ रख दिए…
निशा ने आअहह….. भरते हुए मेरे सर को पकड़ लिया…, फिर मेने उसके उभारों के दोनो ओर की ढलान को बारी-बारी से अपनी खुरदूरी जीभ से चाटा,…और उन्हें चूमते हुए उसके सपाट पेट की तरफ बढ़ने लगा…
निशा अपनी आँखें मुन्दे अपने अंतर्मन में इस असीम आनंद की अनुभूति को महसूस कर के दूर कहीं आसमानों में उड़ चली थी….
मन नही माना तो मेरे शरारती हाथ एक बार उसके सुंदर उरोजो पर टिक ही गये.. और उन्हें सहलाते हुए… उसकी बगलों से होते हुए, उसकी पतली कमर पर आ टिके…
मेरे हाथ किसी स्वचालित यन्त्र की तरह उसकी पतली कमर को सहलाते हुए, मेरी उंगलियाँ उसकी सलवार के नाडे की गाँठ पर थी.…
कुछ ही देर में निशा की सलवार भी उसके कदमों में जा गिरी….
मे थोड़ा पीछे होकर निशा के कदमों में बैठ गया…, और उसके संगेमरमरी बदन की सुंदरता का रस अपनी आँखों से पीने लगा…
आहह…. क्या सुडौल जांघें थी उसकी… लेशमात्र भी एक्सट्रा फॅट नही था उसके बदन पर… साँचे में ढला उसका दूध जैसा गोरा बदन किसी संगेममर की मूरत जैसा मेरे सामने था……
निशा मात्र दो छोटे-से अधोवस्त्रों में मेरे सामने किसी बेजान मूरत सी खड़ी थी…
उस कमसिन कली ने अपने प्रियतम की इच्छा का सम्मान करते हुए अपने अन्छुये कोमल बदन को उसके हवाले कर दिया था… किसलिए…?
निशा मात्र दो छोटे-से अधोवस्त्रों में मेरे सामने किसी बेजान मूरत सी खड़ी थी…
उस कमसिन कली ने अपने प्रियतम की इच्छा का सम्मान करते हुए अपने अनछुए कोमल बदन को उसके हवाले कर दिया था… किसलिए…?
एक विश्वास पर… जो उसके निश्छल प्रेम ने उसके अंदर पैदा किया था… उसने अपने प्रियतम पर आँख बंद कर के भरोसा कर लिया था…
मे उसकी केले जैसी चिकनी जांघों को सहलाते हुए उन्हें चूमने, चाटने लगा…मेरी छुवन से उसका बदन थर-थरा रहा था…
मे घुटने मोड़ कर बैठा था, मेरे हाथ बड़े प्यार और दुलार से उसके सरीर पर तैर रहे थे… वो शरीर के जिस हिस्से में होते, निशा के शरीर का वो हिस्सा… किसी जुड़ी के मरीज़ की तरह काँपने लगता…
फिर मेने उसकी पतली कमर को अपने हाथों के बीच लेकर उसे पलटा दिया… अब उसकी छोटी सी पेंटी में कसे उसके गोल-गोल नितंब मेरे सामने थे.. इन्हें मे हौले-2 सहलाने लगा…
मेरी उंगलियाँ उसकी छोटी सी पेंटी की एलियास्टिक में फँस गयी, और उसे नीचे को खींच दिया……
निशा की बॉल के साइज़ के उसके नितंब एकदम गोल-2 सुडौल, गोरे-2, थोड़े बाहर को निकले हुए मेरी आँखों के सामने थे, जिन्हें सहलाकर मेने चूम लिया….
नीचे बैठे ही मेने उसे अपनी तरफ पलटा लिया, जांघों के जोड़ के बीच की कलाकृति अब मेरे सामने थी…जिसकी सुंदरता बयान करने लायक मेरे पास शब्द नही थे…
हल्के हल्के बालों से सजे पतले-2 बंद होंठों के बीच एक पतली सी रेखा जैसी उसकी रस सुरंग, जो नीचे से ऊपर की तरफ थोड़ी सी मांसल दिखाई दे रही थी…
मेने अपने हाथ से उसे एक बार बड़े प्यार से सहलाया… और निशा की टाँगों को थोड़ा सा अलग कर के एक किस उसकी प्यारी मुनिया के बंद होंठो के ऊपर कर दिया…
ईइसस्स्स्शह……आअहह……ना चाहते हुए निशा के मुँह से एक दबी सी सिसकी निकल ही गयी…
मेने फिर से उसे पलटा दिया और फिरसे एक बार उसके नितंबों को चूमा…
नितंबों के बाद उसकी कमर, फिर उसकी पीठ चूमते चूमते मे ऊपर उठता चला गया, फिर मेरी उंगलियों ने उसकी ब्रा के हुक भी खोल दिए…
उसकी पीठ से सट कर खड़ा होते हुए मेने उसके कान की लौ को चूमकर कहा-
जान ! तुम सचमुच सुंदरता की जीती-जागती मूरत हो… तुमने आज अपना ये संगेमरमर सा सुंदर बदन दिखाकर मुझे अपना दीवाना बना दिया है..
अब में तुम्हारे इंतेज़ार में कुछ वर्ष तो क्या.. सदिया गुज़ार सकता हूँ..
ये कहकर मेने उसके अनार जैसे उरोजो को अपनी मुट्ठी में भर लिया और सहलाने लगा..
निशा एकदम से पलट कर मेरे गले से लिपट गयी, उसके उरोज मेरे सीने में दब कर रह गये,…
वो दीवानावार मेरे चेहरे पर अनगिनत किस करते हुए बोली…
मेरे प्रियतम को ये दासी पसंद आ गयी… ये मेरे लिए किसी सौभाग्य से कम नही है… आइ लव यू जानम…
आइ लव यू टू प्रिय…! अब तुम अपने कपड़े पहन लो.., तुम्हारे रूप रस का पान कर के मे धन्य हो गया…
निशा ने फिर एक बार मुझे कसकर अपने गले लगाया और कपड़े पहन कर रूम से बाहर निकल गयी मेरे लिए दूध लेने….
मे खुद पर आश्चर्य चकित था, कि एक कमसिन बाला.. पूर्ण रूप से नग्न मेरे सामने थी और मेरे मन में एक बार भी उसे भोगने की इच्छा तक नही हुई…
क्या ये मेरा उसके लिए निश्चल प्रेम था ? जो शायद मेरी जिंदगी में पहली और आख़िरी बार हुआ था…
दूसरे दिन सुबह-सुबह मे निशा और उसके मम्मी पापा से विदा लेकर अपने घर वापस चल दिया… वो मुझे गाओं के बाहर तक छोड़ने आई…
विदा होते वक़्त स्वतः ही हम दोनो की आँखें छलक गयीं.. हम एकदुसरे को किस कर के अंतिम बार गले मिले..
फिर एकदुसरे को बाइ बोलकर अपने अपने घर को चल दिए…
रास्ते में ही शांति बुआ का घर पड़ता था, जो निशा के गाओं से ज़्यादा दूर नही था, तो सोचा बुआ का हाल चाल पूछते हुए ही निकलता हूँ…
कभी आया तो नही था पहले बुआ के यहाँ, तो लोगों से पुछ्ते-पाछ्ते पहुँचा.. उनके दरवाजे पर..
बुलेट की आवाज़ सुन कर एक लड़की घर के अंदर से भागती हुई आई…मे उस लड़की को देखता ही रह गया…
स्कूल यूनिफॉर्म में वो शायद स्कूल जाने के लिए तैयार ही हुई थी, सफेद रंग की शर्ट और स्लेटी लाल चौखाने की घुटनों तक की स्कर्ट में वो एक बहुत ही सुंदर गुड़िया जैसी लगी मुझे…
उसकी कसी हुई शर्ट में क़ैद 32-33” के उसके उसके चुचे बटन तोड़कर बाहर निकलने को आतुर हो रहे थे,
पतली सी कमर के नीचे थोड़ी उठी हुई गान्ड, देख कर मेरे अंदर कुछ – 2 होने लगा…
अपनी बड़ी -2 कजरारी आँखें मटका कर वो बोली – कॉन हो तुम… किससे मिलना है…?
मे – शांति बुआ का घर यही है…?
वो – हां ! लेकिन तुम कॉन हो जो मम्मी को बुआ बोल रहे हो…?
मे – ओह तो तुम उनकी बेटी हो, मेरा नाम अंकुश है, … अभी कुछ दिन पहले मेरे भैया की शादी थी, तुम उसमें शामिल नही हुई थी…
वो – ओह अंकुश भैया… नमस्ते ! सॉरी, मेने आपको पहचाना नही, आओ..आओ… फिर वो बुआ को आवाज़ देते हुए चिल्लाई… मम्मी…मम्मी…
अंदर से बुआ की आवाज़ आई… क्या है वीजू…देख नही रही.. तेरे लिए नाश्ता तैयार कर रही हूँ, स्कूल के लिए लेट हो रहा है…
तब तक मे बाइक स्टॅंड कर के उसके पीछे – 2 अंदर आया, उसके मटकते कूल्हे मुझे अपनी ओर लुभा रहे थे…
वो – मम्मी थोड़ा बाहर आकर देखो तो सही, कॉन आया है…
बुआ अपने माथे का पसीना अपने पल्लू से पोंछती हुई रसोई से बाहर आई…
और मुझे देखते ही…सी.छोतुउुुुउउ… चिल्लाते हुए दौड़कर मेरे सीने से लग गयी…!
उनकी ये हरकत देख कर पास खड़ी विजेता अपनी बड़ी – 2 आँखें फाडे उन्हें देखने लगी…
मेने बुआ से पूछा – बुआ ये आपकी बेटी है..?
वो – हां ! बड़ी वाली विजेता… तूने देखा तो है इसे कई बार गाओं गयी है मेरे साथ…
मे – ये वही विजेता है ना.. जिसकी नाक बहती रहती थी…
बुआ हँसते हुए बोली – हहहे… हां ! वही विजेता है, अब देख.. अब नही बहती इसकी नाक…!
विजेता गुस्सा होते हुए बोली – क्या मम्मी आप भी चिडाने लगी मुझे… फिर वो मेरी तरफ आँखें तरेर कर बोली…
आपने कब देखी मेरी नाक बहते हुए…? हां !
बुआ – अरे नही बेटा ! एक बार जब में तुझे लेकर गाओं गयी थी, तब तुझे सर्दी हो गयी थी… तो तबकि बात कर रहा है छोटू…
वैसे बड़े भाई की बात का क्या बुरा मानना…! बेटा तू बैठ पहले मे इसको स्कूल भेज दूं.. फिर बैठ कर बात करते हैं.. ठीक है,
और वो फिरसे रसोई में घुस गयीं… विजेता मुझे घूर-2 कर देख रही थी.. मेने कहा – माफ़ करना मेरी गुड़िया, मे तो ऐसे ही मज़ाक कर रहा था..
तुझे बुरा लगा तो सॉरी ! और मेने अपने कान पकड़ लिए तो वो खुश हो गयी.. और बोली – कोई बात नही भैया…
फिर वो बुआ को आवाज़ देकर बोली – मम्मी जल्दी करो मे लेट हो रही हूँ…
मेने कहा – कितना दूर है तेरा स्कूल…?
वो – अरे भैया.. दूसरे गाओं में है, यहाँ से 3 किमी दूर है और मुझे साइकल से जाना पड़ता है, फिर घड़ी की तरफ देख कर बोली –
ऑफ.ओ.. मे तो ऑलरेडी लेट हो गयी… अब पहला पीरियड तो मिलने वाला नही है…मम्मी…जल्दी…करो प्लीज़ !
बुआ – अभी लाई… बस दो मिनिट…
मे – तू कहे तो मे छोड़ दूं तुझे स्कूल…
वो – फिर उधर से कैसे आउन्गि…?
तब तक बुआ किचेन से उसका टिफेन बना कर ले आई,… और बोली – स्कूल छूटने के बाद भैया ही ले आएगा तुझे.. क्यों छोटू ! ले आएगा ना…!
मे – मुझे तो जाना था बुआ अभी… वो मे निशा को छोड़ने आया था, लौटते में सोचा आपसे भेंट करता चलूं…
बुआ – अरे तो शाम को चला जइयो.. अभी सुबह सुबह क्या करेगा… घर जाकर..
मेने कहा ठीक है, फिर चल विजेता.. तुझे स्कूल छोड़ देता हूँ..
दूसरे गाँव का रास्ता थोड़ा उबड़ खाबड़ था.. विजेता मेरे पीछे दोनो ओर को पैर कर के बैठी थी..
कभी ब्रेक लगाने पड़ते थे तो वो मेरे से सॅट जाती.. और उसके कच्चे अनार मेरी पीठ पर दब जाते…फिर जब गाड़ी उच्छलती तो वो रगड़ जाते…
मेरा लंड उसके स्पर्श से ही सर उठाने लगा था, …एक बार तो ज़ोर से ब्रेक लगते – 2 भी गाड़ी एक खड्डे मे चली ही गयी और ज़ोर से उच्छल गयी,
अब बुलेट पर पीछे कुछ ज़्यादा ही झटका लगता है..तो पहले तो वो मेरे ऊपर गिरी और फिर ऊपर को उछलि, जिसकी वजह से उसके अनार तो पीठ से रगडे ही…
साथ ही उसकी मुनिया भी मेरी कमर से रगड़ा खा गयी, और वो ज़ोर से सिसक पड़ी… शायद उसको भी मज़ा आया होगा…
मेने कहा – क्या हुआ विजेता…?
वो बोली – भैया धीरे – 2 चलाओ, ये रास्ता बहुत खराब है, साइकल से चलना भी मुश्किल हो जाता है…!
मे – हां वो तो मे देख ही रहा हूँ, पता नही लोगों का ध्यान इस तरफ क्यों नही जाता…
खैर जैसे तैसे कर के हम उसके स्कूल पहुँच ही गये, उसे स्कूल छोड़ कर मे बुआ के घर वापस आ गया…..
जब मे घर लौटा तो बुआ घर में झाड़ू लगा रही थी… वो एक लो कट गले की मेक्सी पहने हुए थी,
झुक कर झाड़ू लगाने से उनके बड़े-2 खरबूज जैसे स्तन लटक कर बाहर को झाँक रहे थे…
मे वहीं खड़ा होकर ये नज़ारा देख रहा था, कि इतने में उनकी नज़र पड़ गयी… और सीधी खड़े होते हुए हंस कर बोली – क्यों रे बदमाश, क्या देख रहा था…?
मेने भी हँसते हुए कहा – कुछ नही बुआ, तुम्हारा समान सामने आ गया तो देखने लगा…
वो – चल बैठ मे थोड़ी देर में झाड़ू मारकर फिर बैठती हूँ तेरे पास…
मेने बुआ से पूछा – बुआ वाकी लोग कहाँ गये…?
वो – तेरे फूफा इस समय खेतों में होते हैं… छोटी यहीं गाँव के स्कूल में है, उसका स्कूल जल्दी शुरू हो जाता है, दो घंटे में आ भी जाएगी…
इतना बोलकर वो फिरसे झुकर झाड़ू मारने लगी, टाइट मेक्सी में बुआ की चौड़ी गान्ड झुकने से और ज़्यादा बड़ी दिख रही थी…
शायद वो नीचे पेटिकोट और पेंटी भी नही पहने थी, जिस कारण से उसके दो पाटों के बीच की दरार किसी नाली की तरह सॉफ सॉफ दिखाई दे रही थी…
सोने पे सुहागा ये था, कि जब वो खड़ी हुई थी, तो मेक्सी का कपड़ा उसकी गान्ड की दरार में फँस गया था, जो अभी तक बेचारा निकलने के लिए फडफडा रहा था..
लेकिन दोनो पाटों का दबाब इतना ज़्यादा था, कि वो वहाँ से टस से मस नही हो पाया…
बुआ की गान्ड के नज़ारे ने मेरे लंड की ऐसी तैसी करदी, वो साला जीन्स के अंदर फडफडाने लगा…
मे चुपके से बुआ के पीछे गया, और उसकी गान्ड से जाकर चिपक गया,….
वो तो एकदम से हिल ही गयी, और अपनी गान्ड को मेरे लंड पर और ज़ोर से दबा दिया, तो मेने भी झुक कर बुआ के खरबूजों को पकड़ लिया…
वो झाड़ू छोड़कर खड़ी हो गयी, और अपनी गान्ड को मेरे लंड के आगे दबाते हुए बोली – निगोडे ! थोड़ा सा तो सबर करले,
मुझे पता है, तुझे मेरी गान्ड ने परेशान कर रखा है…ये हरामजादी दिनो दिन चौड़ी ही होती जा रही है…
मेने बुआ की चुचियों को मसल्ते हुए कहा – लगता है, फूफा जी, इस पर ज़्यादा ध्यान देते हैं.. तभी ये चौड़ी होती जा रही है…
वो – नाअ रे ! उन्हें गान्ड मारने का शौक नही है, पर वो ज़्यादा तर पीछे से ही करते हैं…
अब छोड़ मुझे झाड़ू मारने दे… फिर आराम से बैठते हैं…
मेने झुक कर बुआ की मेक्सी को उठाकर उनकी गान्ड को नंगा करते हुए कहा – इतना समय नही है बुआ… मेरा लंड अब और इंतेज़ार नही कर पाएगा…
इतना कह कर मेने अपनी जीन्स उतार दी, और फ्रेंची की साइड से लंड बाहर निकाल कर बुआ की गान्ड की दरार में फँसा कर ऊपर से नीचे रगड़ने लगा…
मेरे नंगे लंड का अहसास अपनी नंगी गान्ड पर होते ही बुआ सारी ना नुकुर भूल गयी, और अपनी आँखें बंद कर के उसने अपने हाथ सामने की दीवार पर टिका दिए…
मेने अपना एक हाथ नीचे लेजा कर बुआ की माल पुआ जैसी चूत को मुट्ठी में भरके मसल दिया…
बुआ की चूत रस छोड़ने लगी, उसने भी अपना हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख कर और दबा दिया, और सिसकते हुए बोली –
सस्सिईईई….हाईए रे…ये क्या कर दिया तूने… मेरी चूत में आग लगा दी…अब और देर मत कर…
मेने अपनी दो उंगलियाँ बुआ की चूत में डाल दी… और अंदर बाहर करने लगा…चूत हद से ज़्यादा गीली हो गयी…
फिर मेने बुआ की मेक्सी को उसके सर के ऊपर से निकाल कर उसे पूरी तरह नंगा कर दिया…
अपने लॉड को थूक लगा कर गीला किया, और बुआ की गीली चूत में पेल दिया…
सरसराता हुआ मेरा साढ़े आठ इंच लंबा और सख़्त रोड जैसा लंड जैसे ही जड़ तक बुआ की चूत में गया,
थप्पाक से मेरी जांघें उसके भारी चुतड़ों पर पड़ी, और इसी के साथ ही बुआ के मुँह से एक लंबी कराह निकल गयी….
हआइईईई रीईए…. बेरहम… नाश्पीटे … मार्डलाअ.. रीई, तोड़ा आराम से डालता…फाड़ दी मेरी चूत मुए….. ने…
लेकिन मेने अनसुना करते हुए, अपने धक्के शुरू कर दिए, और बुआ की वो चुदाई की, कि वो चकर्घिन्नि बन गयी…
एक बार खड़े-खड़े चोदने के बाद, जब वो झड गयी, तो फिर हम तखत पर आ गये…
बुआ को घोड़ी बना कर पहले कुछ देर उसकी चूत मारी, उसके बाद मेने अपना लंड उसकी गद्देदार गान्ड में पेल दिया…
उलट पलट कर मेने बुआ को अच्छे से रगड़-रगड़ कर दो बार चोदा…
बुआ की सारी खुजली मिट गयी… तो मेने कहा – बुआ देखलो मेने आपका चॅलेंज पूरा कर दिया… फिर मत कहना…
वो – हां रे छोटू.. तू सच में मर्द हो गया है, मेरे जैसी दो बच्चों की औरत को झंड कर दिया…
उसके बाद उन्होने मेरे लिए चाय बनाई, और अपना काम ख़तम कर के नहाने चली गयी…
इतने में फूफा भी आगये, और उसके कुछ देर बाद उनकी छोटी बेटी भी स्कूल से आ गयी…
सबने मिलकर खाना खाया, उसके बाद मे विजेता को लेने उसके स्कूल चला गया…
विजेता ने घर आकर बताया कि कल से उसकी रक्षाबन्धन की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं जो जन्माष्टमी तक चलेगी..…
तो मेने कहा, बुआ ये वैसे भी भैया की शादी में नही जा पाई थी, क्यों ना इसे मे अपने साथ ले जाउ.. रामा दीदी के साथ इसका मन भी लगा रहेगा…
मेरी बात सुन कर विजेता भी कहने लगी… हां मम्मी मे भैया के साथ जाउन्गी… मेने मामा, मामियों को कब से नही देखा…
फूफा जी ने भी हां करदी तो फिर बुआ ने उसे पर्मिशन दे ही दी, और उसी शाम मे विजेता को लेकर अपने घर वापस लौट लिया…
रास्ते में बहुत ज़्यादा कुछ नही हुआ, मे बस थोड़ा बहुत उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में ही पूछा…
लेकिन स्कूल जाते-आते वक़्त की हल्की सी मस्ती याद आते ही, विजेता ने थोड़ी बहुत हरकतें ऐसी की जो हम दोनो के शरीर में मस्ती भरने के लिए काफ़ी थी…
विजेता को मेरे साथ देख कर भाभी ने पूछा – अरे देवर जी ये कौन है..? एक को लेकर गये थे, और दूसरी के साथ लौटे हो…ये क्या चक्कर है भाई..!
मेने हँसते हुए कहा – कोई चक्कर नही है भाभी ! ये शांति बुआ की बेटी विजेता है.. आप नही जानती इसको.. मेरे बताते ही रामा दीदी ने उसे पहचान लिया.. और वो उसके गले लग गयी…
फिर कुछ देर इधर-उधर की बातें की और अपने घर गाँव के हाल चाल पुछे…
कॉलेज में मेरी एक अलग ही इमेज थी, एक ज़िम्मेदार स्टूडेंट की, … जो कॉलेज की व्यवस्थाओं में भी सहभागिता रखता था…. टीचर्स और प्रिन्सिपल तक मेरी बात का सम्मान करते थे..
हालाँकि हमारे कॉलेज में लड़कियाँ भी थी, और ऐसा भी नही था… कि मे कोई ब्रह्मचारी था… आप सभी जान ही चुके हैं…. लेकिन…
लेकिन अपने कॉलेज में मेने अपनी एक साफ-सुथरी इमेज कायम कर रखी थी… लड़कियों से कोसों दूर रहना मेने अपना नियम सा बना लिया था…
ठाकुर सूर्य प्रताप सिंग…. जिनकी इस कस्बे में बहुत लंबी चौड़ी ज़मीन जयदाद थी… एक तरह से कस्बे के ज़मींदार थे…प्रशासनिक कार्यों में भी इनकी अच्छी ख़ासी पैठ थी…
कॉलेज को मान्यता दिलवाने में भी इनका बहुत बड़ा योगदान रहा, …
कस्बे के सभी बड़े छोटे व्यापारी, किसान सब इनका बड़ा आदर करते थे… या कह सकते हैं इनके एहसानो तले दबे रहते थे…डरते थे इनसे…
ठाकुर साब की बेटी रागिनी भी इसी कॉलेज में थी, उसके सब्जेक्ट अलग थे… आर्ट्स के और मे साइन्स सेक्षन में था…
रागिनी का एक बड़ा भाई भी था, भानु प्रताप सिंग… जो अपने पिता की दबन्गयि में चार चाँद लगाने में एहम भूमिका निभाता था…
कॉलेज की ज़्यादातर लड़कियाँ रागिनी की चापलूसी करती रहती या यूँ कहो… कि उसके पैसों से मौज करती, और उसकी हां में हां मिलाती रहती थी…
मे आज अपना लास्ट पीरियड अटेंड कर के थोड़ा लाइब्ररी चला गया एक दो बुक लेनी थी..
कॉलेज की ज़्यादातर लड़कियाँ रागिनी की चापलूसी करती रहती या यूँ कहो… कि उसके पैसों से मौज करती, और उसकी हां में हां मिलाती रहती थी…
मे आज अपना लास्ट पीरियड अटेंड कर के थोड़ा लाइब्ररी चला गया एक दो बुक लेनी थी..
मेने कुछ बुक्स इश्यू कराई, और जैसे ही लाइब्ररी के गेट से निकल कर लॉबी में कदम रखा ही था..
उधर रागिनी तेज – तेज कदमों से चली आ रही थी, इधर मेरा निकलना हुआ और उसका घुसना सो हम दोनो ही एक दूसरे से टकरा गये,
रागिनी की चुचियाँ मेरे सीने से आकर लगी, मेरे हाथ से बुक्स छूट कर फर्श पर गिर पड़ी…
अचानक से टकराने के कारण, वो कुछ डिसबॅलेन्स हो गयी, और पीछे को गिरने लगी.
मेने फ़ौरन अपना हाथ उसे सहारा देने के लिए पीछे किया, और उसकी मखमली गान्ड को कस लिया…
दूसरे हाथ से उसके कंधे को पकड़ कर उसे गिरने से बचा लिया…और वो फिरसे खड़ी हो गयी…
उसके साथ रोज की तरह 4-5 लड़कियाँ भी चिपकी हुई थी… उसे खड़ा कर के, मेने ज़मीन से अपनी बुक्स उठाई.. और खड़ा होकर उसे सॉरी बोलने ही वाला था… कि तडाक से एक तमाचा मेरे गाल पर पड़ा…
मेने अपना एक हाथ अपने गाल पर रख कर सहलाया और उसकी तरफ देखा… वो अपनी कमर पर दोनो हाथ रखे हुए गुस्से से भुन्भुनाइ…
साले हरामी, देख कर नही चल सकता.. आँखें क्या घर छोड़ कर आता है…
मे उससे उलझना नही चाहता था.. सो मेने उसे सॉरी बोला… और वहाँ से चला आया…
हालाँकि गुस्से से मेरा चेहरा लाल हो रहा था… लेकिन फिर भी मेने अपने गुस्से पर काबू किया, अपनी बुलेट उठाई और घर को चल दिया…
वो पीछे से मुझे जाता हुआ देखती रही… जब तक की मे उसकी आँखों से ओझल नही हो गया…
उसकी एक फ्रेंड ने उसकी बाजू पकड़ कर कहा – अब चल, वो तो चला गया,… अब किसे मारेगी..?
वही लड़की फिर बोली – वैसे उस बेचारे की ग़लती क्या थी..?
दूसरी – हां यार ! वो तो बेचारा गेट से निकल ही रहा था, तू ही उससे टकरा गयी.. और बिना सोचे समझे तूने उस बेचारे को थप्पड़ मार दिया…
तीसरी – कितना डीसेंट लड़का है, फिर भी सॉरी बोला उसने, और बिना कुछ कहे चुप चाप चला गया..
चौथी – मे उसे स्कूल से ही जानती हूँ, वो बस अपनी पढ़ाई से मतल्व रखता है.. किसी से आज तक उसका झगड़ा तक नही सुना हमने..
पहली – अरे ये वोही अंकुश है ना, जिसने स्कूल में चेल्लेंज देने वाले लड़के को पछाड़ दिया.. था.
दूसरी – हां ! वोही अंकुश है, और जानती है.. इसका एक भाई डीएसपी है, और उसकी शादी यहाँ के एमएलए की लड़की के साथ हुई है…
तीसरी – फिर भी देखो… उसको ज़रा सा भी घमंड नही है… प्रिन्सिपल वग़ैरह सब उसे बहुत मानते हैं.. वो चाहता तो तेरे खिलाफ शिकायत भी कर सकता था..
चौथी – पर्सनॅलिटी देखी उसकी… ऐसा हमारे कॉलेज में तो क्या.. आस-पास भी कोई नही है… कितना हॅंडसम, क्या हाइट और बॉडी.. एकदम फिल्मी हीरो लगता है..
कितनी ही लड़कियाँ तो उसके आगे बिछ्ने को तैयार रहती हैं… लेकिन वो किसी को आँख उठाकर भी नही देखता…..
लड़कियों के मुँह से मेरे बारे में ये सब सुनते-2 रागिनी झल्ला उठी और चिल्लाते हुए बोली –ओह… विल यू शट अप ऑल ऑफ यू…बिच.
जाओ जाकर उस हीरो का लॉडा चूसो… इतना ही पसंद है तो.. लेकिन मेरे कान खाना बंद करो तुम लोग.. उहह…. फिल्मी हीरो ! माइ फुट…
पहली – तो तुझे अब भी लगता है कि ग़लती उसकी थी…? मुझे लगता है, कि तुझे उससे माफी माँगनी चाहिए..
रागिनी – क्यों..? वो कोई लाट साब है..?
वो – क्योंकि टकराई तू उससे, और तमाचा भी मारा उसको.. ग़लती तेरी ही है..
रागिनी भड़क उठी और बोली – जा इतना ही उसका ख्याल है तो जाके तू उससे माफी माँग.. यहाँ क्यों खड़ी है..?
उसकी बात सुनकर वो लड़की वहाँ से चल दी… उसके पीछे- 2 वाकी की लड़कियाँ भी चली गयी…
अपनी दोस्तों को यूँ उसे अकेला छोड़ जाते हुए देखकर, रागिनी गुस्से से अपने पैर पटकती हुई तेज-तेज कदमों से वहाँ से चली गयी…
आज पहली बार रागिनी को किसी लड़के की वजह से उसकी दोस्त जो हमेशा उसके साथ रहती थी, उसकी हर हां में हां मिलाती थी, उसके किसी फ़ैसले का विरोध करने का कभी सोच भी नही सकती थी, वो उसे यूँ छोड़ कर चली गयी थी…
रागिनी तमतमाया चेहरा लिए अपने घर पहुँची… उसकी माँ के पुछ्ने पर भी उसने कुछ नही बताया.. और जाकर सीधे अपने कमरे में बिस्तर पर धडाम से गिर पड़ी…
वो खुली आँखों से आज हुए सारे घटना क्रम को सोचने लगी… कभी उसे उस लड़के पर गुस्सा आता, तो कभी अपनी दोस्तों को गालियाँ देने लगती…
जब इस सबसे भी उसका मन नही भरा.. तो वो अपने व्यवहार को चरितार्थ करने लगी…
उसने शुरू से लेकर घर लौटने तक का सारा घटना क्रम कई बार- रीवाइंड कर कर के देख डाला…
आख़िर में मन के किसी कोने से उसे धिक्कार सुनाई दी… और सवाल आया..
तू सिर्फ़ एकबार अपने बाप-भाई के रुतवे को अलग रख कर सोच रागिनी, जो व्यवहार तूने उस लड़के के साथ किया है, क्या वो सही है…?
फिर उसे अपनी फ्रेंड की वो बातें याद आने लगी…
कॉलेज में उसका कितना मान है, उसके परिवार की शान भी कोई कम नही थी…
एमएलए की लड़की उसकी भाभी है…
वो चाहता तो वो उसे भी सबक सिखा सकता था… लेकिन उसके बड़प्पन ने उसे ऐसा करने नही दिया…
अब रागिनी का मन ग्लानि से भरने लगा था… और अंत में उसने फ़ैसला कर लिया कि वो कल सबसे पहले जाकर अंकुश से माफी माँगेगी… !
जैसे ही रागिनी ने मन ही मन ये फ़ैसला लिया कि वो कल जाकर अंकुश से माफी माँगेगी, उसका मन अप्रत्याशित रूप से शांत हो गया…
अब उसके मन मस्तिष्क में, नफ़रत की जगह अंकुश के लिए दूसरी ही भावनाएँ पनपने लगी, और वो उसका प्यार पाने की कल्पना करने लगी.
उसकी पर्सनॅलिटी उसके दिलो-दिमाग़ पर छाती जा रही थी, इन्ही ख्वाबों ख़यालों में ना जाने कब उसका हाथ उसके नाज़ुक अंगों के साथ खेलने लगा, और उपसर मस्ती भरी खुमारी छाने लगी.
कभी वो अपनी चुचियों को मसलकर फील करती कि ये अंकुश उनको मसल रहा है, तो कभी उसका हाथ अपनी चूत पर महसूस करती, और उसे अपने हाथ से सहलाने लगती.
रागिनी की खुमारी कब वासना में बदल गयी, उसे पता ही नही चला और उसकी उंगलियाँ चूत के अंदर जाकर एक्सर्साइज़ करने लगी…
वो अपनी उंगलियों को चूत में अंदर बाहर करती हुई, फील करने लगी, जैसे अकुश का लंड उसकी चूत में अंदर बाहर हो रहा हो…
उसके मुँह से मादक सिसकियाँ निकलने लगी…. आअहह…अंकुशह….और जोरी सीए…चोद्द्द….बोलते हुए उसकी उंगलियों की रफ़्तार तेज होती चली गयी…
आख़िरकार वो लम्हा भी आ पहुँचा जिसकी चाहत हर शरीर को होती है,
उसकी कमर किसी धनुष की तरह बिस्तेर से ऊपर उठती चली गयी, और एक चीख मारते हुए उसकी चूत ने अपना कामरस छोड़ दिया…
अपने गीले हाथ को वो काफ़ी देर तक देखती रही, फिर उसे बेडशीट से पोन्छ कर साँसों को इकट्ठा करते हुए उसके चेहरे पर एक सुकून भरी स्माइल खेल गयी..
अपने खुद के हाथों से अपना चूतरस निकालने में आज उसे एक अलग सा ही मज़ा आया था, जो इससे पहले कभी नही मिला..,
इसी खुमारी में ना जाने कब उसकी आँखें बंद होती चली गयी…
उधर अपना हीरो… अंकुश शर्मा यानी कि मे.. जब घर पहुँचा…
आज कॉलेज मे जो कुछ भी उसके साथ हुआ था, उसे तो वो बुलेट की आवाज़ में ही भूल चुका था, ऊपर से मस्त हवा के झोंके अपने साथ उसके गुस्से को भी उड़ा ले गये थे..
इससे पहले की मे घर तक पहुँचता, कि रेखा दीदी जो भैया की शादी के बाद से अभी तक यहीं जमी हुई थी.. मेरे घर से अपने घर की ओर जा रही थी..
मुझे रास्ते में ही रोक कर एक अर्थपूर्ण स्माइल करते हुए बोली – क्यों रे हीरो.. सवारी कहाँ से चली आ रही है…?
मे – कॉलेज गया था.. आप सूनाओ क्या चल रहा है..?
वो तंज़ कसते हुए बोली – हमारा क्या चलेगा..? दिन काट रहे हैं, तू तो कभी बात भी नही करता…और क्यों करेगा हमारे जैसे छोटे लोगों से…
मे – ऐसा क्यों बोल रही हो दीदी..? वैसे और किसी से बात करते देखा है आपने मुझे..? अब समय ही नही मिलता है, … अब मे कोई जान बूझकर तो ऐसा नही करता ना…!
वो – हां भाई ! वैसे भी दूसरों से फ़ुर्सत मिले तभी तो हमारी तरफ ध्यान जाए भी जनाब का.. क्यों..?
मे – किसकी बात कर रही हो.. ?
वो – क्यों अपनी साली के पीछे -2 नही घूम रहा था जब तक वो यहाँ रही..? और उस रात शांति बुआ के साथ….???
उसने जान बूझकर बात अधूरी छोड़ दी… मेने उसके चेहरे की ओर देखते हुए पूछा.. शांति बुआ क्या..? क्या कहना चाहती हो आप…?
वो – मुझे सब पता है बच्चू…. उस रात क्या हो रहा था… लेकिन मुझे ये भी पता है, कि उसमें तेरी कोई ग़लती नही थी..
मे तो एकदम सन्न रह गया उसके मुँह से ये सब बातें सुनकर, और मन ही मन सोचने लगा.. तो क्या इस भेन्चोद ने सब कुछ देखा था उस रात…?
मुझे चुप देख कर वो बोली – देख भाई.. तू चिंता ना कर, मे किसी को कुछ नही बताउन्गी.. तू ना थोड़ा सा हमारे ऊपर भी नज़रें इनायत कर्दे बस…
मेने फिर भी बचाव की आख़िरी कोशिश करते हुए कहा – मेरी समझ में नही आ रहा दीदी, कि आप क्या बोल रही हो…?
वो तुनक कर बोली – अच्छा ! तो साफ साफ सुन, जिस रात बारात लौट कर आई थी, उस रात तू शांति बुआ के बगल में ही सो गया था… ये तो याद होगा…?
मे – हां ! जगह नही बची थी कहीं, तो सो गया उसमें क्या…?
वो – तो ! रात में शांति बुआ ने मौके का फ़ायदा उठाया, और तेरे ऊपर चढ़ कर चुद रही थी… अब आया कुछ याद…?
और अगर फिर भी तू मुझे चूतिया समझ रहा हो तो, उसके बाद तूने बुआ को पीछे से जबरजस्ति चोदा था… अब बोल !
मेने उस रात की तेरी चुदाई लाइव देखी थी, और सच कहूँ तो तभी से मेरी चूत भी तेरा ख़याल आते ही पानी छोड़ने लगती है यार,
ये कहकर वास्तव में ही वो साड़ी के ऊपर से ही अपनी चूत को मसल्ने लगी…
मे हथियार डालते हुए बोला – ठीक है दीदी आप जो चाहती हैं, वो मे करने को तैयार हूँ.. बोलिए कब और कहाँ करवाना है..?
वो – अभी आजा ना ! घर में, मे और आशा ही हैं, उसको में अभी खेतों पर भेज देती हूँ…
मे – ठीक है, तो फिर चलिए, मे अभी आधे घंटे में आता हूँ आपके पास…
उधर जब मे घर पहुँचा तो मुझे देखते ही भाभी बोली –लल्ला जी थोड़ा समय निकाल कर पंडित जी से बड़े देवर जी के गौने का मुन्हुर्त निकलावाके लाना है.. बाबूजी बोलके गये हैं..
मेने कहा ठीक है भाभी.. मे चला जाउन्गा… उसके बाद मे फ्रेश हुआ, और अपने कपड़े चेंज कर के खाना खाया और निकल लिया रेखा दीदी के घर की तरफ..
रास्ते में ही आशा दीदी मिल गयी जो अपने खेतों की तरफ जा रही थी, मेने पूछा कि कहाँ जा रही हो, तो उसने कहा – माँ-बापू को खाना देने जा रही हूँ..
तुम कहाँ जा रहे हो..
मेने कहा – रेखा दीदी ने बुलाया है किसी काम से.. मेरी बात सुनकर, वो अपनी बड़ी – 2 आँखें मटकाते हुए बोली – रेखा दीदी को तुमसे ऐसा क्या काम पड़ गया..?
मेने कहा – एक काम करो जल्दी लौट के आ जाओ, खुद ही देख लेना और ये कहकर मेने अपनी एक आँख दबा दी..
वो सब समझ गयी.. और बोली – बेस्ट ऑफ लक… लेकिन मेरे लिए थोड़ा बचा के रखना …अपना… परसाद… और हँसती हुई तेज तेज कदमों से खेतों की तरफ चली गयी…
उनके घर पहुँचने तक रेखा दीदी ने अपने बच्चे को दूध पिलाकर सुला दिया था,
अब वो उसे गाय या भैंस का ही दूध देती थी…अपना दूध पिलाना तो उसने कब का बंद कर दिया था..
मे जैसे ही उसके घर पहुँचा तो, झट से उसने दरवाजा बंद कर दिया.. और मुझे हाथ पकड़ कर अंदर ले जाने लगी…
मेने कहा – दीदी तुम चलो कमरे में, मे टाय्लेट कर के बस एक मिनिट में आया..
उसके जाते ही मेने दवाजे की संकाल खोल दी और ऐसे ही उसे भिड़ा रहने दिया…
मे जब उसके कमरे में पहुँचा तो वो अपनी साड़ी उतार चुकी थी… खाली ब्लाउज और पेटिकोट में उसके कसे हुए पपीते जैसे गोल बड़े-बड़े चुचे आधे बाहर को उबले पड़ रहे थे…
मेने जाकर उसके उन दोनो पपीतों को पकड़ कर ज़ोर से मसल दिया… उसके मुँह से अहह… निकल गयी….
वो नीचे ब्रा नही पहने थी, सो चुचियों को मसल्ते ही उसके निपल ब्लाउज के अंदर से ही खड़े होकर सल्यूट मारने लगे…
मेने उसके निप्प्लो को मसल्ते हुए उसके होंठों पर किस किया और बोला… दीदी !
तुम्हारे ये कलमी आम तो एक दम पक गये हैं… जी करता है चूस-चूस कर खा जाउ…
तो खा ना भेन्चोद… देखता क्या है… मे कब्से तुझे खिलाने के लिए कह रही हूँ…
पर तू तो कहीं और ही मुँह मारता फिरता है… सीईईईईईईईईई…. धीरे मरोड़.. ना..भोसड़ी के तोड़ेगा क्या मेरी घुंडीयों को…
मेने चटक-चटक कर के उसके ब्लाउज के सारे बटन तोड़ दिए.. और उसके नंगे कलमी आमों पर पिल पड़ा….
वो बुरी तरह से सीसीयाने लगी…. हाईए….. खाजा मेरे रजाआ… भेन्चोद… चुसले इनको…. आईईई… मदर्चोद…. काटता क्यो है… चुतिये…
उसके मुँह से गालियाँ सुन कर मेरी उत्तेजना और बढ़ने लगी… मेरा एक हाथ उसकी चूत को सहला रहा था…
उसने भी मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में ले रखा था, और वो उसे मसल और मरोड़ देती…
फिर मेने उसके पेटिकोट का नाडा भी खींचकर तोड़ दिया…
वो शिकायत भरे लहजे में बोली – तू मेरे कपड़े साबित नही छोड़ेगा लगता है..
उसकी पेंटी गीली हो गयी थी… और माल पुआ जैसी चूत पेंटी के ऊपर से ही फूली हुई दिख रही थी…
उसकी चौड़ी दरार देखते ही मेने उसकी माल पुआ जैसी चूत को अपनी मुट्ठी में भर कर ज़ोर से मसल दिया…
आईईईई…………आराम सीई…..भेन के लौडे… ये तेरी बेहन की चूत है… किसी रंडी की नही जो बुरी तरह से दबोचने में लगा है….
मेने कहा – दीदी… तू अगर अपनी पेंटी को बचाना चाहती है.. तो इसे जलादी से उतार दे…,
वो बोली – तू तो अभी सारे कपड़े पहना है.. और मुझे पूरा नंगा कर दिया..
ये कह कर उसने मेरी टीशर्ट निकाल दी, और लोवर को भी खींच दिया… अपनी पेंटी को उतार कर वो मेरे लंड को मुट्ठी में भरके बोली –
अहह…. क्या मोटा तगड़ा मस्त लंड है तेरा….
तेरे इस मस्त लंड से चुदने के लिए मेरी चूत कब्से फड़-फडा रही थी… अब इसको अपनी चूत में अंदर तक लूँगी….हुउऊंम्म…
आअहह….ये सोचकर ही मेरी चूत पनिया गयी रीई… देख तो कितना रस छोड़ रही है हाईए …ये कहकर वो मेरे लंड को मसल्ते हुए मूठ मारने लगी…
मेने एक हाथ से उसके एक पपीते को दबा दिया, दूसरे हाथ की दो उंगलियाँ उसकी रसीली चूत में पेल दी, और अंदर-बाहर कर के उसे चोदने लगा…
वो हाए-2 कर के अपनी कमर चलाने लगी…
फिर मेने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत से बाहर निकाली और उसके मुँह में डाल दी… वो अपने ही चूतरस को चटकारे लेकर चाटने लगी…
फिर मे उसके पीछे आ गया, और उसके भारी भरकम गान्ड के पाटों को मसलते हुए, थोड़ा आगे को झुका दिया…
उसकी गान्ड का छेद खुल बंद हो रहा था..
मेने अपना मुँह उसकी गान्ड के पाटों के बीच डाल दिया, और उसकी गान्ड के छेद को जीभ से कुरेदते हुए उसकी चूत में उंगली कर दी…
उसकी चूत और ज़्यादा रस बहाने लगी…
अब उसे और सबर करना मुश्किल हो रहा था, तो उसने मुझे पलंग पर धक्का दे दिया और खुद मेरे ऊपर आकर मेरे मुँह पर अपनी भारी भरकम गान्ड लेकर बैठ गाइिईई……….
मेरे मुँह में उसकी चूत से बूँद-2 कर के शहद टपक रहा था, जिसे मे चासनी की तरह चाटता जा रहा था,
वो भी मेरे ऊपर लंबी होकर पसर गयी, और मेरे लौडे को अपने मुँह में भर कर शॅपर-शॅपर कर के लॉलीपोप की तरह चूसने लगी…
मुझे बाद में पता लगा कि इस पोज़िशन को 69 की पोज़िशन कहते हैं…
मेरी जीभ उसकी चूत में घुसी पड़ी थी, साथ ही उसकी कौए की चोंच जैसी क्लिट जो अब और भी बाहर आ रही थी अपनी उंगलियों में पकड़ कर दबा दिया…
वो बुरी तरह से अपनी कमर को मेरे मुँह पर पटाकने लगी…उसकी गान्ड का छेद खुल-बंद हो रहा था…
मेने अपने दूसरे हाथ का अंगूठा, उसकी गान्ड के सुनहरे छेद पर रख कर फिराया, फिर उसे उसकी चूतरस से गीला कर के धीरे से गान्ड के सुराख में घुसा दिया…
जबादुस्त तरीके से उसकी गान्ड ने मेरे अंगूठे को कस लिया, और अपनी चूत को और ज़ोर से मेरे मुँह पर दबाने लगी…
धीरे – 2 मेने अपना पूरा अंगूठा उसकी गान्ड में डाल दिया, वो गूँग – 2 करते हुए उत्तेजना में मेरा पूरा लंड अपने गले तक निगल गयी…
जिस स्पीड से मेरे हाथ हरकत कर रहे थे, उतनी ही स्पीड से वो मेरे लौडे पर अपना मुँह चला रही थी…
मेरी हरकतें वो ज़्यादा देर तक सहन नही कर पाई, और अपनी चूत का ढक्कन खोल दिया, चूत ने अपना सारा शहद मेरे मुँह में उडेल दिया…!!!
वो अभी मेरे उपेर से लुढ़क कर साइड में लेट कर लंबी-2 साँसें ले ही रही थी, कि मेने उसकी टाँगों को ऊपर कर के अपनी छाती से सटा लिया,
उसकी फूली हुई चूत जो की अब टाँगें ऊपर होने से और ज़्यादा मधु-मक्खी के छत्ते की तरह उभर आई थी, अपनी हथेली से दबा कर रगड़ दिया….
और अब अपना मूसल जैसा सख़्त कड़क लंड उसकी ताज़ा झड़ी हुई चूत में पेल दिया…..
अरे…मारररर……..दिया रीईए…उहह…माआआअ… धीरे…से डालल्ल्ल…कुत्तीए… इसकाअ…एक दिन में ही भोसड़ा बना देगा क्या…भेन्चोद….
बहुत हरामी है तू…भोसड़ी के .. वो दर्द से लिपटी आवाज़ में बोली…. कॉन से जन्म का बैर निकाल रहा है मदर्चोद….
तुमने ही तो कहा था… खा जा मुझे… फाड़ दे मेरी..चूत… अब क्या हुआ….मेने मज़ा लेते हुए कहा…
वो – अरे तेरा फघोड़े जैसा लंड, इतना शख्त और कड़क है … एक दम मोटे डंडे जैसा…. मैया रीि…. अंदर तक चीर डाला रे मेरी चूत को इसने……
आअहह…..उउउफ़फ्फ़……….
अगर मे एक बच्चे की माँ नही होती.. तो तू मार ही डालता मुझे…आहह……
फिर मेने आराम से अपना मूसल बाहर खींचा… उसने एक राहत भरी साँस अपने नथुनो से निकाली….
अभी वो अच्छे से अपने आप को संभाल भी नही पाई थी, कि मेने फिरसे एक ताक़तवर धक्का उसकी चूत पर मार दिया….
वो फिरसे बिलबिला कर गालियां देने लगी…धीरीए…..कुत्ते….हइई र्रइ….
ऐसे ही कुछ धक्कों तक चलता रहा, वो चुदती भी जारही थी.. और साथ-2 कुछ ना कुछ बड-बड़ाती भी जा रही थी..
मेरे धक्कों की स्पीड के हिसाब से ही उसके मुँह से गालियाँ निकल रही थी.. जो मुझे और ज़ोर से चोदने को भड़का रही थी…
15-20 मिनिट तक हम दोनो ही जमकर चुदाई में लगे रहे.. अब वो भी अपनी गान्ड उछाल-2 कर मस्त होकर चुद रही थी…
फिर हम दोनो ने एक साथ ही अपने – 2 नल खोल दिए और झड़ने लगे…
मेरे गाढ़े – 2 रस से उसकी पोखर लबा लब भर गयी, … वो भी आज पहली बार इतनी गहराई तक लंड लेकर बुरी तरह से झड़ी थी….
आज उसके बोर की अच्छे से सफाई हो गयी थी…
हमारे गाँव के पंडित जी जो हमारे घर में होने वाले सभी वैदिक कार्यों को संपन्न करते हैं.. उनका घर बीच गाँव में है…
50 वर्षीय पंडित जी के दो संतानें थी, बड़ा लड़का जिसकी उम्र कोई 23-24 की होगी..
उसकी शादी एक साल पहले हो चुकी थी, दूसरी बेटी, उसकी शादी उसके भाई से भी एक साल पहले हो गयी थी..
घर पर पंडित जी, उनकी पंडितानी, और बेटे की बहू.. यही तीन प्राणी रहते थे…
बेटी की शादी हो चुकी थी, और बेटा शहर में रहकर कुछ नौकरी धंधा करता है… महीने दो महीने में एक बार घर आता है..
मेने पंडित जी के घर का दरवाजा खटखटाया… कुछ देर बाद अंदर से एक सुरीली सी आवाज़ आई… कॉन है…?
मेने बाहर से आवाज़ दी – मे हूँ… अपने पिताजी का नाम लेकर उनका बेटा…अंकुश.
थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला… सामने एक 20-21 साल की गोरी-चिटी, शादी शुदा बेटे की बहू… जिसके गोल-गप्पे जैसे कश्मीरी आपल जैसे लाल-लाल गाल… देखते ही जी करे खा जाउ..
गोल चेहरा, बड़ी बड़ी कटीली काली आँखें, नज़र डालते ही सामने वाला घायल हो जाए…
वो साड़ी पहने हुए थी.. कस्के लपेटी हुई सारी के पल्लू में से उसके कठोर मस्त कबूतर अपने होने का आभाष दे रहे थे…
छ्हरहरे बदन की उस नवयौवना की पतली सी कमर के नीचे.. थोड़ा उभरे हुए उसके कूल्हे…
उसने अपनी साड़ी थोड़ी नाभि के नीचे बाँध रखी थी.. जो उसकी पतली सी सारी में से अपनी सुंदरता का बखान खुद ब खुद कर रही थी…
मेने उसे पहले कभी नही देखा था… तो उसे एकटक देखता ही रह गया… वो भी मुझे घूर-घूर कर देखे जा रही थी…
नज़रें चार होते ही, हम दोनो ही जैसे एकदुसरे में खो गये…
कुछ देर तक हम दोनो ही एक दूसरे को देखते रहे… फिर जब पीछे से पंडितानी की आवाज़ सुनाई दी, तो चोंक पड़े…, उसने फ़ौरन अपनी नज़रें झुका ली..
पंडितानी – कॉन है बहू…?
मेने अपना परिचय दिया और पंडित जी के बारे में पूछा.. तो उसने बताया कि वो तो पड़ोस के गाँव गये हैं.. शाम तक ही लौटेंगे…
मेने अपने आने का कारण बताया और शाम को आने का बोल कर वापस अपने घर लौट आया…
शाम को पंडितजी खुद आकर बाबूजी को गौने की तिथि बता गये….
दूसरे दिन मे समय पर अपने कॉलेज पहुँचा…मेने बुलेट स्टॅंड की.. और अपनी क्लास की ओर चल दिया…
अभी मे ग्राउंड क्रॉस कर के लॉबी में एंटर हुआ ही था कि रागिनी अपने सीने पर किताबें चिपकाए मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी…
मेने उसके साइड से निकल कर आगे बढ़ने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया…
मेने पलट कर उसकी तरफ देखा… तो वो मेरा हाथ थामे अपनी नज़रें झुकाए खड़ी थी…
मे एकटक उसकी ओर ही देख रहा था, और मन ही मन सोच रहा था, कि ये भेन्चोद अब और क्या नया बखेड़ा खड़ा करना चाहती है…
जैसे-तैसे कर के मेने अपने गुस्से को कल काबू में किया था… अब अगर इसने कोई ग़लत हरकत करने की कोशिश की, तो मे साली की माँ चोद दूँगा…
मे अभी ये सब सोच ही रहा था, कि उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और अपने दोनो हाथ जोड़ कर बोली – मुझे माफ़ करदो अंकुश, अपने कल के व्यवहार के लिए मे बहुत शर्मिंदा हूँ..
मे तो मुँह फाडे उसको देखता ही रह गया… अचानक ये चमत्कार कैसे हो गया.. यार, ये शेरनी… भीगी बिल्ली कैसे बन गयी… ज़रूर इसकी ये कोई चाल होगी…
मे – देखो..! मे कल की बात को कल ही भूल चुका हूँ… अब मुझे तुमसे कोई शिकायत नही है… प्लीज़ मेरा रास्ता छोड़ो.. मुझे लेक्चर अटेंड करने के लिए लेट हो रहा है..
वो – तो सिर्फ़ एक बार कह दो कि तुमने मुझे माफ़ कर दिया..
मे – अरे यार ! जब मे कह रहा हूँ.. कि मे कल की बात को भूल चुका हूँ.. तो अब इसमें माफ़ करने की बात कहाँ से आ गयी…
वो – इसका मतलव तुम मुझसे नाराज़ नही हो…?
मे – नही ! मे तुमसे नाराज़ नही हूँ… अब मे जाउ…?
वो – तो अब हम फ्रेंड्स हैं..? और ये कह कर उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…
मेने भी कुछ सोच कर अपना हाथ आगे कर दिया… तो उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर चूम लिया और थॅंक्स बोलकर वहाँ से भाग गयी…
मे उसकी थिरकति गान्ड को देखते हुए वहीं खड़ा रहा और उसकी इस हरकत का मतलव निकालने की कोशिश करता रहा.. फिर अपना सर झटक कर अपनी क्लास में चला गया…!
लास्ट लेक्चर अटेंड कर के मेने स्टॅंड से अपनी बाइक ली और किक मारकर कॉलेज से चल दिया…
अभी मे कॉलेज के गेट से बाहर निकल ही रहा था, कि देखा ! गेट के ठीक सामने एक खुली जीप खड़ी थी, 5 लड़के जो शक्ल से ही आवारा किस्म के लग रहे थे.. जीप के नीचे खड़े थे…
उनमें से एक लड़का, जो 5’4” हाइट होती, गोरा रंग चौड़ा शरीर, किसी फुटबॉल जैसा, चेहरा घनी दाढ़ी से भरा हुआ… बड़ी-2 लाल – लाल आँखें, देखते ही उसने मुझे हाथ देकर रुकने का इशारा किया…
मेने बाइक रोक दी लेकिन एंजिन अभी भी चालू ही था.. मेरे दोनो पैर ज़मीन पर टीके हुए अभी भी में बाइक की सीट पर ही बैठा था..
वो फुटबॉल जैसा फिर बोला – ओये… ये डग-डग बंद कर…मेने बाइक का एंजिन बंद कर दिया और गाड़ी को साइड स्टॅंड पर लगा कर खड़ा हो गया…
वो मेरे पास आया, अब मेरी हाइट 6’2” , और वो मेरे सामने टिंगा सा तो मुझसे बात करने के लिए उसे अपना थोबड़ा उठाना पड़ा,
वो ऊँट की तरह अपनी गर्दन उठा कर बोला – तेरा ही नाम अंकुश है..?
मे – हां ! क्यों ? क्या काम है..? बोलिए.. मेने शालीनता बनाए हुए कहा..
वो – तू जानता है मे कॉन हूँ…? भानु प्रताप सिंग नाम है मेरा… ठाकुर सूर्य प्रताप का बेटा…
मे – जी बड़ी खुशी हुई आपसे मिलकर.. बोलिए मे क्या सेवा कर सकता हूँ आपकी..?
वो – सेवा तो हम तेरी करने आए हैं… साले.. बहुत चर्बी चढ़ गयी है.. तुझे.. ये कहते हुए उसने अपना हाथ ऊपर कर के मेरा गिरेवान पकड़ लिया…
मे – देखिए भाई साब ! शायद आपको कोई ग़लत फहमी हुई है… मे तो यहाँ सिर्फ़ पढ़ाई करने आता हूँ.. मेने ऐसा कुछ नही किया जो आपकी शान के खिलाफ हो…
वो – अच्छा ! अब हमें बताना पड़ेगा कि तूने क्या किया है..? साले तेरी खाल खींच कर भूस ना भर दिया तो मेरा नाम भानु प्रताप नही…
अभी वो और कुछ कहता या करता… रागिनी भागते हुए वहाँ आई, उसने अपने भाई का हाथ मेरे गिरेवान से झटक दिया.. और बोली…
रागिनी – ये आप क्या कर रहे हैं भैया…?
वो – इस हरम्जादे ने तेरे साथ बदतमीज़ी की है… और तू इसे ही बचा रही है…
रागिनी – आपको कोई ग़लत फहमी हुई है, इसने मेरे साथ कोई बदतमीज़ी नही की, ग़लती मेरी ही थी… और आपसे किसने कहा कि इसने मेरे साथ कोई बदतमीज़ी की है..?
आप जाइए यहाँ से प्लीज़… मे बाद में आपको सब बताती हूँ.. फिर मेरी ओर पलट कर बोली – सॉरी अंकुश.. मे अपने भाई की तरफ से तुमसे माफी मांगती हूँ..
उसका भाई अपने दोस्तों के साथ वहाँ से चला गया… मेने रागिनी की बात का कोई जबाब नही दिया और बिना कुछ कहे अपने घर चला आया…!
उधर रागिनी का बदला हुआ रबैईया देख कर उसकी फ्रेंड्स आश्चर्य चकित थी, वो आपस में ख़ुसर-पुसर करने लगी…
टीना – अरे यार ! आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया..
मीना – हां यार ! कल तो ये शेरनी की तरह दहाड़ रही थी… और आज खुड़ने ही उसे अपने भाई से बचा लिया… आख़िर कुछ तो बात हुई है.. चलो पुछ्ते हैं..
वो चारों रागिनी के पास पहुँची… जो मेरे बिना कुछ बोले वहाँ से चले आने की वजह से अपने भाई पर गुस्से से भुन्भुना रही थी…
रखी – हाई रागिनी ! आज तो तू कुछ बदली-2 सी लग रही है…
रागिनी – यू शट-अप…! पहले ये बताओ.. तुम लोगों ने मेरे भाई से क्या कहा..?
रीना – अरे ! तू हमारे ऊपर क्यों भड़क रही है यार ! हमने ऐसा-वैसा कुछ नही कहा…
मीना – तुझे तो पता ही है.. कि हमने तुझे भी कल समझाया था… फिर हम तेरे भाई को क्यों ऐसा-वैसा कुछ कहेंगे..
वो तो पुच्छ रहा था.. कि रागिनी के साथ कल कॉलेज में क्या हुआ… तो हमने उसे सारी बात बता दी…
अब तुम दोनो भाई-बेहन अपने आगे किसी को कुछ समझते हो नही…
टीना – मे फिर कहती हूँ रागिनी… इससे पहले कि अंकुश का पेशियेन्स जबाब दे जाए… तुम दोनो भाई-बेहन सही रास्ते पर आ जाओ… वरना तुम्हारी पूरी फॅमिली के लिए मुशिबत हो सकती है.. आगे तुम्हारी मर्ज़ी…
राखी – वैसे आज तेरा बर्ताव देख कर अच्छा लगा… क्या तेरी कोई बात हुई थी उससे..
रागिनी ने उसकी बात का कोई जबाब नही दिया और वो वहाँ से चली गयी…
इधर जब मे घर पहुँचा.. तो आते ही भाभी ने लपक लिया, और बोली – अच्छा हुआ लल्ला तुम आ गये.. मे अभी सोच ही रही थी कि कैसे और किसके साथ जाउ…
मे – कहाँ जाना है आपको…?
भाभी – अरे ! वो पंडितजी की बहू को कल शाम से ही ना जाने क्या हो गया है..?
कल शाम को वो अंधेरे में शौच के लिए गयी थी… वापस आकर बड़ी अजीब-अजीब सी हरकतें कर रही है…
चाची बता रही थी.. कि उसके ऊपर कोई भूत – प्रेत का चक्कर हो गया है…, अब जल्दी से फ्रेश हो जाओ, और मुझे वहाँ ले चलो… देखें तो सही, हुआ क्या है उसे ?..
मे सोच में पड़ गया,…कि यार ! कल जब में उनके यहाँ गया था.. तब तो वो एकदम भली चन्गि थी, तो अब अचानक से ही क्या हुआ…?
खैर चलो देखते हैं, ये भूत ब्याधा होती क्या है…? ये सोचते -2 मे फ्रेश होने चला गया…
ज्ब हम पंडित जी के घर पहुँचे.., उनके चॉक (आँगन) में लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था, औरतें और मर्द बैठे आपस में बतिया रहे थे…
कोई कुछ कह रहा था, तो कोई कुछ बता रहा था…
जितने मुँह उतनी बातें.. सब अपनी अपनी राई देने में लगे थे.., आप बीती या सुनी सुनाई दास्तान एक दूसरे के साथ शेर कर रहे थे…
हां ! सब्जेक्ट एक ही था…भूत प्रेत के चक्कर…
चूँकि हमारा परिवार गाँव के प्रतिष्ठित लोगों में शुमार होता है, .. और अब तो एमएलए के घर से संबंध जुड़ने से और ज़्यादा मान सम्मान मिलने लगा था…
हमें देखते ही पंडितानी ने भाभी का स्वागत सत्कार किया…,
जब भाभी ने उनकी बहू के बारे में पूछा तो वो हमें उस कमरे में ले गयी.. जहाँ वो लेटी हुई थी..
गेट खुलने की आवाज़ सुनते ही उसने अपनी बड़ी – 2 आँखें और ज़्यादा चौड़ी कर के खोल दी, जिसमे आग बरस रही थी…, उसके इस रूप को देखकर एक बार तो मुझे भी डर लगने लगा…
सामने अपनी सास के साथ भाभी और मुझे देखते ही वो झट से उठ कर बैठ गयी… और भारी सी आवाज़ निकालकर गुर्राते हुए बोली…
तू फिर आ गयी… साली हरम्जादि… कुतिया… मे तुझे जान से मार दूँगा… वो अपनी लाल-लाल आँखें दिखाकर, और हाथों के पंजों को फैलाकर अपनी सास के ऊपर झपटी…, मानो वो उसका गला ही दबा देना चाहती हो…
भाभी चीखते हुए बोली – लल्ला जी जल्दी से पकडो इसे.. !
मेने झपटकर आगे से उसके कंधे मजबूती से पकड़ लिए…और उसे फिरसे बिस्तेर पर बिठा दिया,
वो झटके मार-मारकर मेरी पकड़ से छूटने की कोशिश कर रही थी…
और हुंकार मारते हुए ना जाने क्या 2 अनप-शनाप बकने लगी… उसकी गर्दन लगातार झटके मार रही थी… इस वजह से उसका आँचल नीचे गिर गया…
सरके बाल चारों ओर बिखर गये, और अब वो किसी हॉरर मूवी की हेरोइन प्रतीत होने लगी थी…
वो आगे को झुक कर अपने सर को आगे पीछे कर के गोल – 2 घूमने लगी…मुँह से गुर्राहट बदस्तूर जारी थी.
उसकी गोल-गोल सुडौल, दूध जैसी गोरी-गोरी चुचियाँ आधी – आधी तक मेरी आँखों के सामने नुमाया हो गयी….
कुछ देर तो मे भी उसकी मस्त कसी हुई जवानी में खो गया… जिससे मेरी पकड़ कुछ ढीली पड़ने लगी…
लेकिन फिर जल्दी ही मेने अपने सर को झटक कर उसे कंट्रोल किया और उसकी आँखों में झाँकते हुए बोला –
क्यों कर रही हो ऐसा, क्या मिलेगा तुम्हें अपने घरवालों को इस तरह परेशान कर के… ?
मेरी बात सुनकर, एक पल के लिए उसके हाव- भाव बदले……
मानो, वो मुझसे कुछ कहना चाहती हो… लेकिन दूसरे ही पल वो फिरसे वही सब करने लगी…और घूर-2 कर अपनी सास को खा जाने वाली नज़रों से देखने लगी..
भाभी ने पंडितानी को कमरे से बाहर जाने का इशारा किया…, उनके बाहर जाने के बाद हम तीन लोग ही रह गये उस कमरे में,
भाभी ने अंदर से कमरे का गेट बंद कर दिया… और उसके पास जाकेर बैठ गयी…
उन्होने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रख कर सहलाया… और बोली – देखो वर्षा….. ये जो तुम कर रही हो, उससे तुम्हारे घर की कितनी बदनामी हो रही है, पता है तुम्हें…?
लोगों का क्या है, उन्हें तो ऐसे तमाशे देखकर और मज़ा आता है, परेशानी तो तुम्हारे अपनों को ही हो रही है ना…
मे जानती हूँ कि तुम्हारे ऊपर कोई भूत-प्रेत का चक्कर नही है…फिर क्यों लोगों का तमाशा बन रही हो…?
भाभी की बात सुन कर वो एक बार के लिए चोंक पड़ी…, और झटके से उसने अपना सर ऊपर किया…
भाभी ने आगे कहा.. चोंको मत…, और बताओ मुझे असल बात क्या है… क्यों कर रही हो ये सब..?
कुछ देर वो यौंही बैठी भाभी को घूरती रही…, मानो उसके मन में कोई अंतर्द्वंद चल रहा हो…, फिर उनके कंधे से लग कर वो फुट – फुट कर रोने लगी, और सुबक्ते हुए बोली …
आप ठीक समझ रही हैं दीदी… लेकिन मे क्या करूँ.. आप खुद ही समझ लीजिए मेरी इस हालत का ज़िम्मेदार कॉन है..?
भाभी उसकी पीठ सहलाते हुए हंस कर बोली – तुझे कल मेरे इस देवर का भूत घुस गया था, है ना..!
उन्होने मेरी तरफ इशारा कर के कहा.., तो उनकी बातें सुनकर उसने अपनी नज़रें झुकाली..
मे भाभी की बात सुनकर चोंक पड़ा…, कुछ कहना ही चाहता था.. कि भाभी ने मुझे चुप रहने का इशारा किया….
फिर वो उससे बोली – तू फिकर मत कर मे सब ठीक कर दूँगी.. बस जैसा मे कहती हूँ, वैसे ही करना… ठीक है..
फिर उन्होने उसकी कमर में चुटकी लेते कुए कहा – अब तू आराम कर, और अपना ये नाटक कल तक और ऐसे ही जारी रखना…..
भाभी की बात सुनकर वो मंद-मंद मुस्कराने लगी, हम दोनो उठ कर बाहर की तरफ चल दिए, वो तिर्छि नज़र मुझ पर डाल कर लेट गयी…
बाहर आकर भाभी ने पंडितनी को अकेले में बुलाया और बोली –
चाची जी, मेरे गाँव में एक भूत भगाने वाला ओझा है.., घर जाकर मे अपने पिताजी को चिट्ठी लिख दूँगी, वो सब संभाल लेंगे, आप बस कल लल्ला जी के साथ वर्षा को उसके पास भेज देना..
चिंता करने की कोई बात नही है.. सब ठीक हो जाएगा…! कल सुबह 10 बजे उसको तैयार करवा देना… ठीक है, मे अब चलती हूँ.
रास्ते में मेने भाभी से पूछा – ये आप वहाँ क्या कह रहीं थीं…? मेरा कॉन्सा भूत है जो घुस गया उसके अंदर…?
भाभी हँसते हुए बोली – चलो घर जाकर शांति से सब कुछ समझाती हूँ तुम्हें..
मे रास्ते भर यही सोच-सोच कर परेशान होता रहा, की आख़िर ऐसा क्या देखा भाभी ने और ये क्यों कहा.. कि मेरा भूत घुस गया है उसके अंदर… आख़िर असल बात क्या है…?
मेरी मनोस्थिति देखकर भाभी मन ही मन मुस्करा रही थी…
घर आकर उन्होने मुझे अपने पास बिठाया और मेरे गाल पर प्यार से सहलकर बोली – हाँ लल्ला ! अब पुछो क्या पुच्छना चाहते हो..?
मे – वही जो आपने वहाँ उससे कहा था.. वो क्या है..?
वो हँसते हुए बोली – तुम्हारे अंदर एक बहुत ही प्यारा सा भूत रहता है, जब तुम उससे कल मिले थे, तो वो भूत उसके अंदर घुस गया..
मे – मेरे अंदर कॉन्सा भूत है.. ? और वो मुझे क्यों नही दिखता..? ये आप कैसी बातें कर रही हो भाभी …?
मुझे तो डर लग रहा है.. प्लीज़ बताइए ना..!
वो हँसते हुए बोली – वही भूत जो थोड़ा – थोड़ा हम सबमें घुस चुका है…तुम्हारे अंदर से… मुझे, रामा को, आशा, को चाची को और शायद अब रेखा को भी .. है ना..!
मे अभी भी नही समझा भाभी… आप सबको कब और कैसे लगा…?
वो – अरे मेरे बुद्धू राजा !.. तुम्हें देख कर तो किसी भी औरत या लड़की को भूत लग ही जाते हैं.. और वो तुम्हारा प्यार पाने को तड़पने लगती है.. समझे कुछ… कि अभी भी नही समझे मेरे अनाड़ी देवर जी…
इतना कह कर भाभी ने मेरे गालों को कच-कचाकर अपने दाँतों से काट लिया और फिर अपनी जीभ और होंठों से सहलाने लगी… जैसे पहले किया करती थी..
मेरे पूरे शरीर में रोमांच की एक लहर सी दौड़ गयी.., मेने झपट्टा मार कर भाभी को पलंग पर गिरा दिया और उनके ऊपर छाता चला गया…
उनके मस्त उभारों को मसल कर, चूत को सहला दिया… वो भी मेरे लंड को पाजामा के ऊपर से ही पकड़ कर मसल्ने लगी…
हम दोनो के हाथ हरकत में आ गये, और इसी तरह एक दूसरे के अंगों के साथ खेलने लगे..
जल्दी ही हमारे कपड़े बदन छोड़कर पलंग से नीचे पड़े थे…
कितनी ही देर तक हम एक दूसरे के बदन से खेलते रहे.. अपने अरमानों को शांत करते रहे…,
कमरे के अंदर वासना का एक तूफान सा आया, और जब वो गुजर गया तो फिरसे हम एक दूसरे की बाहों में पड़े बातें करने लगे..
भाभी मेरे होंठ चूम कर बोली – देखो लल्ला कल तुम वर्षा को मेरे गाँव ले जाने के बहाने कहीं जंगल में अच्छे से उसके साथ मंगल करना.. जिससे उसके शरीर की भूख शांत हो जाए…
वो बेचारी जब से शादी होकर आई है, उसका पति उसके साथ नही रहता है.. अब इस नयी उमर में वो बेचारी कैसे अपने पर काबू रखे..
जब कल उसने तुम्हें देखा.. और शायद तुमने भी उसे प्यार भरी नज़रों से देखा होगा… तो उसकी भावनाएँ भड़क कर बाहर आ गयी..
वो पुरुष का प्यार पाने के लिए तड़प उठी, उसे कोई और रास्ता नही सूझा और उसने ये भूत वाला नाटक कर डाला..
अब तुम्हारा ही लगाया हुआ भूत है तो तुम्हें ही उतारना होगा ना..कह कर भाभी खिल-खिलाकर हँसने लगी…
मेने भाभी को कस कर गले से लगा लिया और बोला – सच में भाभी आप जादूगरनी हो.. झट से उसकी नब्ज़ पकड़ ली आपने…
लेकिन आपको ये पता कैसे लगा.. कि वो ये सब नाटक कर रही है…?
भाभी – तुम्हें याद होगा, .. जब तुम उसे संभालने की कोशिश कर रहे थे, तब एक पल को उसके विचार तुम्हारी आँखों में देख कर बदले थे.. मे तभी समझ गयी.. कि असल चक्कर ये है…
मे – आप सच में बहुत तेज हो भाभी.. साइकोलजी की आपको बहुत नालेज है.. ये कैसे आई आपके अंदर ..?
वो – अपने परिवार को संभालते-2 अपने आप ही आ गयी.. बस…! अब तुम थोड़ा अपना कॉलेज का काम वाम कर्लो.. मे शाम के कामों को देखती हूँ..
कल सुबह ही उसको लेकर जाना है तुम्हें उसके घर तक मे भी तुम्हारे साथ चलूंगी.. जिससे कोई तुमसे उल्टे सीधे सवाल ना करे…..!
ये कहकर और अपने कपड़े पहनकर भाभी, किचन की तरफ चली गयी, और मे अपने कमरे में आकर कॉलेज का काम करने बैठ गया…..!
दूसरे दिन प्लान के मुतविक में वर्षा को लेकर चल दिया… मेरी मंज़िल वो झील थी जहाँ मेने रामा दीदी की सील तोड़ी थी…
उस हसीन पलों के याद आते ही, मेरे लंड में सुरसुरी होने लगी,
गाँव से निकल कर कुछ आगे जाते ही वर्षा भौजी मेरी पीठ से किसी जोंक की तरह चिपक गयी…
मेने कहा – भौजी ज़रा कंट्रोल करो… वरना ये मेरी बुलेट रानी नाराज़ हो गयी तो दोनो ही किसी झड़ी में पड़े मिलेंगे लोगों को…
वो – देवर जी मे आपको कैसे बताऊ कि, आज मे कितनी खुश हूँ.. जबसे आपको देखा है.. मेरे दिन का चैन, रातों की नींद हराम हो गयी थी..
मेने कहा – भौजी ! आज तो मे आपको खुश कर दूँगा… लेकिन कल को क्या करेंगी..?
वो हँसते हुए बोली … कल फिरसे भूत घुसा लूँगी…
मेने कहा – मे मज़ाक नही कर रहा भौजी… बताइए क्या करेंगी…?
वो – कभी-2 तो मौका दे ही सकते हो ना आप…
मे – लेकिन कब तक…?
वो – आगे की बाद में देखेंगे.. अभी से अपना मूड खराब क्यों करें… वैसे हम जा कहाँ रहे हैं..?
मेने कहा – वो आप मुझ पर छोड़ दीजिए… आज मे आपको जन्नत की सैर कराने ले जा रहा हूँ…
मेरी बात सुनकर उसने अपने कबूतर मेरी पीठ में गढ़ा दिए, और हाथ आगे कर के जीन्स के ऊपर से ही मेरा लंड पकड़ कर दबा दिया…
बातें करते -2 कब हम वहाँ पहुँच गये पता ही नही चला.. ठंडी का मौसम था.. तो लोग ना के बराबर ही थे..
क्योंकि झील में नहाने की हिम्मत तो कोई कर नही सकता था..
वहाँ की प्रकरातिक सुंदरता देख कर वर्षा भौजी खुश हो गयी..
मेने अपनी बुलेट रानी, एक पेड़ के पास खड़ी करदी, और घस्स के हरे-भरे मैदान में घुस गये…
वो मुझसे से चिपक कर चल रही थी, जिससे उसके कबूतर मेरे बाजू से सट गये..
मैदान पार कर के हम घूमते-घामते.. हम जंगल के बीच एकांत में पहुँच गये…
एकांत पाते ही वो मुझसे अमरबेल की तरह लिपट गयी और बेतहाशा मेरे चेहरे को चूमने लगी….
उसका उतावला पन देख कर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी… और मे भी उसका साथ देने लगा..
उसकी सारी खोल कर मेने नीचे गिरादी और उसके कुल्हों को कस कर दबाते हुए उसके होंठों को चूसने लगा…
उसने भी मेरे होंठों को अपने होंठों में भर लिया, हम एकदुसरे से मानो कॅंप्टेशन करने लगे की देखें कॉन किसके होंठ ज़्यादा चूस पाता है..
फिर एक दूसरे की जीभ आपस में टकराने लगी.. बड़ा मज़ा आरहा था हमें इस खेल में..
जंगल के शांत वातावरण में पक्षियों के कलरव की ध्वनि के बीच हम एक दूसरे में समा जाने की जी तोड़ कोशिश में लगे थे..
उसने मेरे जीन्स की ज़िप खोल दी और उसको नीचे खिसका कर मेरे लंड की कठोरता को अपनी मुट्ठी में लेकर परखने लगी…
अब उसे अपने अंदर लेने की उसकी इच्छा और ज़्यादा प्रबल हो उठी थी…
मेने उसके ब्लाउज के हुक्स खोल दिए और उसकी ब्रा में कसे हुए उसके 33” के पुष्ट उरोजो को मसल्ने लगा….
अहह………देवेरजीीइई…. मेरे रजाआअ… मस्लो इनको… बहुत तडपाते हैं.. ये… मसलवाने को…कोई नही है.. इनकी खबर लेने… वाला…..उफफफफफफफ्फ़…हइईई…..रामम्म….और ज़ोर से मस्लो…..इन्हें…
उसकी ये शायद फेंटसी रही होगी… सेक्स के समय बड़बड़ाने की… जिसे आज वो खुले वातावरण में पूरा कर लेना चाहती थी…
उसने मेरी टीशर्ट को भी निकाल कर एक तरफ फेंक दिया… मेरी पुष्ट छाती देखकर वो मंत्रमुग्ध हो गयी… और अपनी जीभ से उसे चाटने लगी…
कभी मेरे सीने के बालों को सहलाती… कभी उन्हें अपनी मुट्ठी में कसकर खींच देती…
फिर उसने मेरे छोटे – 2 चुचकों को चाट लिया…. मेरे मुँह से सीईईईईईईईईई…..आहह.. भौजिइइई…. बहुत गरम हो तुम….
हां ! मेरे रजाअ… अह्ह्ह्ह…मेरी गर्मी निकाल दो प्लीज़… मे बहुत प्यासी हूँ…वो सिसकते हुए बोली
चिंता मत कर मेरी सोनचिरैया… आज तेरी सारी गर्मी निकाल दूँगा…
फिर मेने उसके पेटिकोट को भी उससे अलग कर दिया… ब्रा- पेंटी में वो बहुत सुंदर लग रही थी… 34-26-34 का उसका गोरा बदन मेरी बाहों में किसी मछली की तरह मचल रहा था..
वो मेरे लंड को मसले जा रही थी… मेने उसकी पीठ सहलाते हुए.. उसकी ब्रा के हुक खोल दिए….
अह्ह्ह्ह… क्या मस्त गोल-गोल इलाहाबादी अमरूदो जैसी उसकी गोरी-2 चुचियाँ जिस पर किस्मिस के दाने जैसे उसके कड़क निपल बहुत ही मन मोहक लग रहे थे…
लगता है.. पंडित के लौन्डे ने जितना वर्क-आउट करना चाहिए था.. उतना भी नही किया था शायद… अभी भी वो किसी कमसिन कली जैसी ही लग रही थी…
मे – अहह…वर्षा रानी तुम्हारी चुचिया तो अभी भी कुँवारी कली जैसी ही हैं…
वो – मे पूरी की पूरी ही कुँवारी हूँ… मेरे राजाजी…
मे – क्या..? रवि भाई ने अभी तक तुम्हें चोदा नही…?
वो – उसकी उंगली जैसी लुल्ली से क्या चुदाई होगी.. उसकी आवाज़ उत्तेजना से काँप रही थी…
मेने उसकी एक चुचि को अपने पूरे मुँह में भर लिया और दम लगा कर सक करने लगा…
वो मस्ती से भर उठी… और अपने दोनो हाथों से मेरे सर को दबाती हुई… पीछे को लहरा गयी….इसस्शह….हइई… चूसो मेरे रजाआ…. खा जाओ इन्हें.. हइईए…..मैय्ाआआअ…….कितनाअ…मज़ाअ…हाईईइ…इनमें…उफफफ्फ़….माआ..
वो बाबली सी हो गयी थी… मे भी आज उस मस्तानी लौंडिया को पूरा मज़ा देना चाहता था…
दूसरे अमरूद को अपनी मुट्ठी में कस लिया और मसलने लगा… उसकी टाँगें काँपने लगी थी…उसने मेरा एक हाथ अपनी पीठ पर रख दिया…
एक टाँग मेरी कमर से लपेट कर अपनी गीली चूत को मेरे लंड के ऊपर रगड़ने लगी…
मेने उसके कूल्हे पकड़कर उसे उठा लिया… और वो मेरी गोद में आकर किसी बच्चे की तरह अपनी दोनो टाँगों को मेरी गान्ड पर लपेटकर बैठ गयी…
और फिर अपनी कमर चला कर, रस से भीगी हुई चूत को मेरे रोड जैसे शख्त लंड पर रगड़ने लगी…
चूस-चुस्कर मेने उसकी चुचियों को लाल कर दिया.. कयि जगह काट भी लिया…
निपल तो सुर्ख हो चुके थे उसके… लेकिन मस्ती से भरी वो बाला मेरे इस सेक्षुयल टॉर्चर को भी झेल गयी…
अब हम दोनो को ही संभालना मुश्किल हो रहा था.. मेने उसे नीचे उतरने का इशारा किया… और फिर उसकी पेंटी को खींच दिया…
हइई…मे मर जन्वान्न्न….ह…क्या गोरी-चिटी.. चिकनी चूत उसकी.. जो रस से सराबोर होकर दिन के उजाले में और चमक रही थी….
मे उसकी टाँगों के बीच बैठ कर उसकी मुनिया को सहलाता रहा, वो मेरे बालों में उंगलियाँ डाल कर फेरने लगी..
फिर मेने उसकी मुनिया के होंठों के ऊपर लगे उसकी रस की बूँदों को अपनी जीभ से चाट लिया…..
उफफफफफफफफ्फ़……माआआआ…..सीईईईईईईईईय्ाआआआहह……और चाटो मेरे दिलवर..
मेने उसकी रिक्वेस्ट को ठुकराया नही और दो-तीन बार और चाट लिया… वो मस्ती से झूम उठी… उसने मेरे सर को अपनी प्यारी रस-गगर के मुँह पर दबा दिया…
मेने अपना सर उठा कर उसकी तरफ देखा तो वो अपना सर पीछे की तरफ कर के मस्ती से आसमान को निहार रही थी…
मेने उसे आवाज़ दी… भौजी… ! तो उसने मेरी ओर देखा ..हुम्म्म.. बस इतना ही बोली वो..
मे – तुम्हारी रसीली मुनिया का रस चूस लूँ.. ?
वो – हइईए….पुछ्ते क्यों हो जानू… ये सब कुछ तुम्हारा है.. अब.
मेने उसकी तरफ मुस्करा कर उसकी मुनिया के होंठ खोल लिए और अपनी जीभ से उसके अन्द्रुनि गुलाबी हिस्से को चाट लिया…
मस्ती में उसकी आँखे बंद हो गयी, अपनी एक टाँग उठाकर उसने मेरे कंधे पर टिका ली, और मेरे सर के बालों में अपनी उंगलियाँ फँसाए, वो किसी दूसरी दुनिया की सैर पर निकल पड़ी…
अपनी जीभ की नोक को अंदर तक पेल कर, मे उसकी चूत को किसी कुत्ते की तरह चाटने लगा.. फिर उसके भग्नासा (क्लिट) को अपने होंठों में दबा कर अपनी एक उंगली उसकी चूत में डाल दी…
वो दर्द से कराह उठी… आह.. इसका मतलब इसकी चूत उंगली लायक ही है अभी..
मेने उसके क्लिट को चूस्ते हुए धीरे-2 अपनी उंगली को अंदर-बाहर कर के उसे चोदने लगा…
उसकी मुनिया लगातार रस बहा रही थी.. जिसे में अपनी जीभ से चाटता जा रहा था…
आख़िरकार उसकी रस से भरी गगर छलक पड़ी.., उसने मेरे मुँह को बुरी तरह से अपनी रस गगर के मुँह पर दबा दिया…
वो अपने पंजों पर खड़ी होकर किल्कारियाँ मारती हुई झड़ने लगी…..!
मेने खड़े होकर उसको चूमते हुए पूछा – मेरी सेवा पसंद आई.. भौजी…?
वो – वादा करो देवर्जी… ऐसी सेवा मुझे आगे भी मिलती रहेगी… जब आपकी इच्छा हो तब.. मे आपसे कोई ज़ोर ज़बरदस्ती से नही कहूँगी… बस जब आपका मन करे..
मे कोशिश करूँगा, वादा नही कर सकता…, लेकिन अभी तो पूरी पिक्चर वाकी है मेरी जान.. उसे तो देखलो…
वो मेरे होंठों को चूमकर बोली – आपके ट्रेलर से ही पता लग रहा है कि.., पिक्चर सूपर हिट होगी..
मे – तो फिर अब मेरे बबुआ की भी थोड़ी सेवा हो जाए… ये कह कर मेने उसके कंधों पर दबाब डाल कर उसे बिठा दिया..,
अपने घुटनों पर बैठ उसने मेरा अंडरवेर नीचे कर दिया.. जिसे मेने अपने पैर से दूर फेंक दिया…
सबसे पहले उसने मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में पकड़ा और बोली – आहह…. ये इतना गरम क्यों है देवर जी…?
सामने इतना गरम कुंड जो है… मेने हँसते हुए उसकी बात का जबाब दिया तो वो उसे अपने गाल से रगड़ते हुए बोली
कितना लंबा तगड़ा हथियार है तुम्हारा, मेरी छ्होटी सी चूत की तो धज्जियाँ उड़ा देगा ये..….!
मे – ऐसा नही है भौजी, देखना कितना मज़ा देता है ये, आज के बाद तुम्हारी गुलाबो इसको ही लेने को तड़पति रहेगी..…
वो हूंम्म… कर के उसको उलट-पलट कर देखने लगी.. फिर उसने एक बार उसे चूम लिया…उउउम्म्म्मम…पुकछ…कितना प्यारा है ये…
हाथ से आगे पीछे करते हुए उसे एक बूँद उसके पी होल पर मोती जैसी चमकती नज़र आई, जिसे उसने अपनी जीभ की नोक पर ले लिया और चखने लगी…
हूंम्म्म… टेस्टी है… कह कर उसने मेरे लाल सेब जैसे सुपाडे को मुँह में भर लिया….और चूसने लगी…!
मेने उसके सर पर हाथ रख लिया और उसे सहलाने लगा… वो धीरे-2 उसे अंदर और अंदर लेती जा रही थी…
सीईईई…अह्ह्ह्ह… राणिि…ज़रा मेरे सिपाहियों की भी सेवा करती जाओ साथ में.. मेरी बात पर उसने सवालिया नज़र से मेरी तरफ सर उठा कर देखा..
मेने कहा… नीचे मेरे टट्टों को भी सहलाओ साथ में और चूसो भी… तो वो वैसा ही करने लगी… अब मुझे और ज़्यादा मज़ा आने लगा…
कुछ देर की चुसाई और सेवा भाव से मूसल राज आती प्रशन्न हो गये… और एकदम लट्ठ की तरह शख्त होकर ठुमके लगाने लगे…
मेने उसे वहीं घास पर लिटा दिया… और उसकी टाँगें मोड़ कर उसकी मुनिया को सहलाया, उसका हौसला बढ़ाया.. और फिर उसे चूम कर अपना सुपाडा उसकी गरम चूत के मुँह पर रख दिया…
मेरे लंड की गर्मी पाकर उसकी चूत में संकुचन होने लगा.. मानो वो अपने दोस्त को चूम रही हो… और कह रही हो कि आओ मेरे प्यारे.. मेरे आँगन में तुम्हारा स्वागत है…
मेने एक हल्का सा धक्का देकर अपने सुपाडे को उसके छोटे से छेद में फिट कर दिया… उसकी आह… निकल गयी.. और वो उफ़फ्फ़…उफफफ्फ़… करने लगी…
मे – क्या हुआ रानी…?
वो बोली – थोड़ा टाइट है… आराम से ही डालना..
मेने कहा – फिकर मत करो.. तुम्हें कुछ नही होगा… थोड़ा सहन कर लेना बस..
ये कह कर मेने एक अच्छा सा शॉट लगाया और मेरा आधा लंड उसकी कसी हुई चूत को चीरते हुए अंदर फिट हो गया…
वो दर्द से बिल-बिला उठी… मेने उसके होंठों को चूम लिया और उसकी चुचि सहलाते हुए कहा… बस थोड़ा सा और… फिर मज़ा ही मज़ा…
वो थोड़ी देर करही, मे उसकी चुचियों की मालिश करता रहा… और हल्के हल्के से आधे लंड को अंदर बाहर किया… जब उसे कुछ अच्छा लगने लगा और मस्ती से कमर हिलाने लगी…
मौका देख मेने एक और फाइनल शॉट लगा दिया… मेरा पूरा लंड किसी खूँटे की तरह उसकी कसी हुई चूत में फिट हो गया…
आआंन्नज्….माआआ….मररर्र्ररर…गाइिईईईईईईई….रीईईई……वो दर्द से तड़पने लगी …
उसकी चूत के होंठ पूरी तरह खुल चुके थे…
मेने उसे ज़मीन से उठा कर अपने सीने से लगा लिया… होंठ चूस्ते हुए उसके सर को सहलाया.. और फिरसे लिटा कर उसके निप्पलो से खेलने लगा…
एक-दो मिनिट में ही उसका दर्द कम हुआ तो मेने अपना लंड सुपाडे तक बाहर निकाला.. देखा तो उसपर कुछ खून भी लगा हुआ था…
सही माइने में आज ही उसकी सील टूटी थी…
मेने फिरसे अपना लंड धीरे-2 अंदर किया… तो वो इस बार सिर्फ़ सिसक कर रह गयी…
कुछ देर आराम-आराम से अंदर-बाहर कर के उसकी चूत को अपने लंड के हिसाब से सेट किया… अब उसे भी मज़ा आने लगा था…
मेने अपनी स्पीड बढ़ा दी और अब घचा घच.. उसकी कसी चूत में लंड चलाने लगा… जब पूरा लंड अंदर जाता तो वो अपने पेट पर हाथ रख कर उसे महसूस करती..
जब मेने पूछा तो वो बोली – देखो ये यहाँ तक आ जाता है… आअहह…बड़ा मज़ा दे रहा है… और ज़ोर से करो…हइई….माआ… में गयी.ईयी……हूंम्म्म..
वो झड रही थी… जिससे उसके पैरों की एडीया मेरी गान्ड पर कस गयी…और वो मेरे सीने से चिपक गयी..
मे उसे उसी पोज़ में लिए हुए खड़ा हो गया… वो मेरे सीने से चिपकी हुई थी…. मेने उसकी जांघों के नीचे से अपने हाथ निकालकर उसे अपने लंड पर अधर उठा लिया….
कुछ देर उसको अपने लंड पर अपने हाथों के इशारे से मेने आराम आराम से उसे कूदाया..
वो अब फिरसे गरम होने लगी… और खुद ही अपनी कमर उच्छल-2 कर मेरे लंड पर कूदने लगी..
मेरी स्टॅमिना देख कर वो दंग रह गयी… 10 मिनिट तक में उसे हवा में लटकाए ही चोदता रहा… और अंत में मेने ज़ोर से उसे अपने सीने में कस लिया..
मेरे साथ-साथ वो भी झड़ने लगी.. और मेरे गले से चिपक गयी….
कुछ देर बाद में उसे गोद में लेकर वही घास पर बैठ गया.. वो मेरे होंठ चूमते हुए बोली – आज मेने जाना की सच्चा मर्द क्या होता है… और चुदाई कैसे होती है..
उसके बाद हम ने अपने शरीर साफ किए… वो वहीं पास में बैठ कर मूतने लगी..
उसके मूत से पहले ढेर सारी मलाई निकलती रही.. जिसे वो बड़े गौर से देखती रही..
मूतने के बाद वो फिरसे मेरी गोद में आकर बैठ गयी,
हमारे हाथ धीरे – 2 फिरसे से बदमाशियाँ करने लगे, जिससे कुछ ही देर में हम फिरसे गरम हो गये…
फिर मेने उसे घुटने मोड़ कर घोड़ी बना दिया, और पीछे से उसकी चूत में लंड डालकर चोदने लगा…
इसी तरह मेने कई आसनों से उसे तीन बार उसे जमकर चोदा.. वो चुदते-2 पस्त हो गयी..
कुछ देर बैठ कर, हम कपड़े पहन कर मैदान में आ गये.. और एक पेड़ की छाया में लेट गये..
एक घंटा अच्छे से आराम करने के बाद घर लौट लिए…
घर आकर मेने उसके सास-ससुर को बताया कि उसका इलाज़ तो हो गया है.., लेकिन कुछ दिनो तक हर हफ्ते उसे ले जाना होगा…
तो वो बोले – बेटा अब तुम ही इसे ले जा सकते हो.. हमारे पास और कॉन है.. तो मेने भी हां कर दिया…
पंडित – पंडिताइन ने मुझे खूब आशीर्वाद दिया.. हम दोनो मन ही मन खुश हो रहे थे…
कुछ देर चाय नाश्ता करने के बाद मे अपने घर आ गया और भाभी को सारी बात बताई…
वो हँसते हुए बोली – वाह देवेर जी ! मेरी सोहवत में स्मार्ट हो गये हो… हर हफ्ते का इंतेज़ाम भी कर लिया… मान गये उस्ताद…!
मेने हँसते हुए कहा – अरे भाभी ! बेचारी मिन्नतें कर रही थी.. कि समय निकल कर मुझे भी प्यार कर लिया करना.. सो मेने ये तरीक़ा सोच लिया…
इस तरह से पंडित जी की बहू वर्षा की समस्या का समाधान मेरी भाभी ने कर दिया….
रामा दीदी और विजेता दोनो पक्की वाली सहेलियाँ हो चुकी थी, दोनो एक ही साथ रहती, साथ-2 खाती, और साथ ही सोती…विजेता यहाँ आकर सबके साथ घुल-मिल गयी थी…
भाभी का नेचर तो था ही सबको प्यार करना, सो वो इतनी घुल मिल गयी हमारे घर में की एक दिन भी उसे अपने घर की याद नही आई…
रामा दीदी तो मेरे साथ हर तरह से खुली हुई थी, वो कभी भी मुझे छेड़ देती, मुझे तंग करती रहती, कहीं भी गुद गुदि कर देती,
मेरे भी हाथ उसके नाज़ुक अंगों तक पहुँच जाते…, उन्हें मसल देता, जिसे देख कर विजेता शॉक्ड रह जाती..
शुरू शुरू में तो उसे ये सब बड़ा अजीब सा लगा, कि सगे भाई बेहन ऐसा एक दूसरे के साथ कैसे कर सकते हैं…
इसके लिए उसने दीदी को बोला भी…तो उन्होने कहा – अरे यार इसमें क्या है, अब भाई बेहन हैं तो इसका मतलव ये तो नही की हम खुश भी ना हो सकें… कुछ ग़लत नही है, बस तू भी एंजाय किया कर..
मेरा भाई तो बहुत बड़े दिलवाला है, उसमें सबके लिए प्यार समाया हुआ है…
दीदी की बात से वो भी धीरे-2 मेरे साथ हसी मज़ाक, छेड़-छाड़ करने में उसके साथ शामिल होने लगी…
धीरे –2 उसकी भावनाएँ खुलने लगी…रही सही कसर रामा दीदी पूरी कर देती उसके नाज़ुक अंगों के साथ छेड़-छाड़ कर के….!
इसी दौरान एक दिन आँगन में हम तीनों बैठे थे, कि अचानक रामा दीदी मुझे गुदगुदी कर के भाग गयी…
मेने उसका पिछा किया और थोड़ी सी कोशिश के बाद मेने उसे पीछे से पकड़ लिया..
मेरे हाथ उसकी चुचियों पर जमे हुए थे, वो अपनी गान्ड को मेरे लंड के आगे सेट कर के अपने पैर ऊपर उठाकर एक तरह से मेरी गोद में ही बैठी थी..
मेने उसके कान को अपने दाँतों में दबा लिया…वो खिल-खिलाकर हँसते हुए मुझे छोड़ने के लिए बोलने लगी…
हमारे बीच के इस खेल को चारपाई पर बैठी विजेता देख रही थी, वो अपने मन में कल्पना करने लगी, कि रामा की जगह वो खुद है, और मे उसकी चुचियों को मसल रहा हूँ…
मेरा लंड उसकी गान्ड से सटा हुआ है… ये सोचते – 2 वो गरम होने लगी.. और अनायास ही उसका हाथ अपनी चुचि पर चला गया, वो उसे दबाने लगी, और उसके मुँह से सिसकी निकल गयी…
उसकी आँखें भारी होने लगी… उसे ये भी पता नही चला कि कब हम दोनो उसके पास आकर बैठ गये…
उसका एक हाथ अभी भी उसकी चुचि पर ही था, जिसे वो अपनी आँखें बंद किए धीरे-2 दबा रही थी…
मेरी और रामा दीदी की नज़रें आपस में टकराई, तो वो उसकी तरफ इशारा कर के मुस्कराने लगी…
फिर उसने विजेता के कंधे पर हाथ रख कर उसे हिलाया, वो मानो नींद से जागी हो, अपनी स्थिति का आभास होते ही वो शर्मा गयी, और अपनी नज़रें नीची कर ली.
रामा दीदी को ना जाने कहाँ से राजशर्मा कीसेक्सी कहानियों की एक किताब मिल गयी, शायद रेखा या आशा दीदी के पास रही होगी, क्योंकि वो तो बेचारी अकेले कभी बाज़ार गयी नही थी..
तो एक रात वो दोनो अपने कमरे में साथ बैठ कर उस किताब को पढ़ रही थी…
पढ़ते – 2 उन दोनो पर वासना अपना असर छोड़ने लगी, और वो किताब को पढ़ते – 2 एक दूसरे के साथ समलेंगिक (लेज़्बीयन) सेक्स करने लगी.
वो स्टोरी भी शायद ऐसी ही कुछ होगी, जिसे वो पढ़ते – 2 एक्शिटेड होने लगी और उसमें लिखी हुई बातों का अनुसरण करने लगी…
रामा ने उसके होंठों पर किस किया तो विजेता गन गाना गयी, उसके शरीर में झूर झूरी सी होने लगी, और उसने भी उसको किस कर लिया…
अब वो दोनो एक दूसरे होंठों पर भूखी बिल्लियों की तरह छीना छपटी सी करने लगी…
जैसे – 2 रामा उसके साथ करती, वो बस उसका अनुसरण करने लगती… क्योंकि उसे इस खेल में इतना मज़ा आ रहा था, जो आज से पहले उसने सोचा भी नही था…
किस्सिंग करते – 2 रामा उसके बूब्स दबाने लगी जो उसके बूब्स से भी 21 थे…
फिर जैसे ही रामा का हाथ उसकी टाँगों के बीच उसकी कोरी करारी मुनिया पर गया, उसने अपनी टाँगें भींच ली…और उसके मुँह से मादक सिसकारी फुट पड़ी..
सस्सिईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई………….उईईईईईईईईईईईईईईईईईई…….डीडीिईईईईईई…….नहियीईईईई
रामा ने उसे छेड़ते हुए कहा – क्यों मेरी जान… मज़ा नही आया क्या…
वो – आहह… दीदी कुछ अजीब सी गुदगुदी होने लगती है…
रामा – इसी को मज़ा कहते हैं..मेरी गुड़िया रानी…टाँगें खोल अपनी, देख कितना मज़ा आता है…
उसने अपनी टाँगें खोल दी और उसके बूब्स प्रेस करते हुए अपनी चूत मसलवाने लगी…
दोनो की हालत बाद से बदतर होती जा रही थी…अब उन्हें अपने कपड़े किसी दुश्मन की तरह लगने लगे और वो दोनो जल्दी ही ब्रा और पेंटी में आ गयी…
अब सिचुयेशन ये थी, कि रामा पलंग के सिरहाने से पीठ टिकाए बैठी थी अपनी टाँगें फैलाए, और विजेता उसकी टाँगों के बीच बैठी अपनी टाँगें पसारे बैठी थी…
दोनो एक दूसरे के होंठों को चूस्ते हुए, रामा उसकी गीली चूत को ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थी, और विजेता उसकी….
विजेता – आअहह…दीदी… बहुत मज़ा आरहा है… और ज़ोर से रगडो मेरी चूत को..
रामा – मज़ा आरहा है ना…! पर मेरी जान ! जो मज़ा किसी मर्द के हाथ से मिलता है, वो मेरे हाथों से नही मिलने वाला…
वो उसके मुँह की तरफ देखते हुए बोली – क्यों मर्द के हाथ से ज़्यादा क्यों आता है…?
रामा – वो तो तू जब हाथ लगवाएगी तभी पता चलेगा…!
फिर रामा ने उसकी ब्रा और पेंटी भी निकाल दी, बिना कपड़ों के जब उसकी उंगलियाँ विजेता की गीली चूत पर पड़ी, वो मस्ती से भर उठी.. और उसकी कमर हवा में लहराने लगी.
रामा अपने हल्के हाथों से उसके दाने को सहला रही थी…जिससे उसकी चूत और ज़्यादा रस बहाने लगी…
अब उसने भी अपने सारे कपड़े निकल फेंके, और उसकी टाँगों के बीच आकर बैठ गयी,
रामा ने अपना मुँह विजेता की कोरी कुँवारी चूत पर रख दिया और वो उसकी चूत को अपनी जीभ से चाटने लगी…
विजेता तो पता नही कहीं दूसरे ही लोक में पहुँच चुकी थी, लेकिन रामा से भी नही रहा जा रहा था, सो वो उसके मुँह के ऊपर अपनी गीली चूत रख कर उसके ऊपर लेट गयी …
अब वो दोनो 69 की पोज़िशन में आ गयी, और रामा के इशारे पर वो भी उसकी चूत को चाटने लगी…
कमरे में चपर – चपर की आवाज़ सुनाई देने लगी, मानो दो बिल्लियाँ दूध की हांड़ी से दूध चाट – 2 कर पी रही हों…
एक बार रामा ने अपने होंठों को उसकी कोरी चूत के होंठों पर कस कर सक कर लिया…
विजेता को लगा मानो उसके अंदर से कुछ खिंचा चला जा रहा हो, उसकी गान्ड के गोल गोल गुंबद आपस में कस गये…
उसकी देखी देखा, उसने भी रामा की चूत को कस्के सक कर लिया…
वो दोनो ही गून..गून करते हुए अपना-अपना कामरस छोड़ने पर मजबूर हो गयी…
जब दोनो ही अपने – 2 स्खलन को पा चुकी… और एक दूसरे की टाँगों में मुँह डाले पड़ी रही….
अभी वो ढंग से स्खलन की खुमारी से निकल भी नही पाईं थी, कि भड़क से दरवाजा खुला…!
मे किसी काम से रामा दीदी के कमरे में गया था, दरवाजे को हल्का सा दबाब डालते ही वो खुलता चला गया…
सामने का नज़ारा देख कर मेरा मुँह खुला का खुला रह गया…
उन दोनो की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी, विजेता ने झट से उसे अपने ऊपर से धकेल दिया और फटा फट से बेड शीट दोनो के ऊपर डाल ली…
मे उल्टे पैर वापस जाने को पलटा, कि तभी रामा दीदी बोली – भाई रुक तो…!
मेने बिना उनकी तरफ पलटे ही बोला – मे सुवह बात करता हूँ आपसे…!
वो – कोई बात नही, तू बोल ना क्या काम था…?
मे – नही कोई खास नही बस ये देखने आया था, कि आप लोग सो तो नही गये…
कुछ देर बैठ कर गप्पें मार लेता और कुछ नही..बस !
वो – तो आ ना, बैठ… बातें करते हैं…
उसकी बात सुन कर विजेता उसके कान में फूस फुसाई… दीदी ! क्या कर रही हो.. जाने दो ना उनको..
रामा उसको घुड़कते हुए बोली – तू चुप कर…! बैठने दे ना उसे भी, चादर तो ओढ़ रखी है ना हमने, फिर क्या प्राब्लम है तुझे…?
फिर उसने ज़िद कर के मुझे पलंग पर बैठने को मजबूर कर दिया… और में उनके बगल में बैठ कर बातें करने लगा….!
मे जिधर बैठा था, उधर विजेता थी, और उसके साइड में रामा दीदी…., मे पालती लगा कर उनकी तरफ मुँह कर के बात कर रहा था…
दीदी ने चादर के अंदर से ही अपना हाथ विजेता के ऊपर से होते हुए मेरी जाँघ पर रख लिया, और बातें करते हुए उसे सहलाने लगी…
विजेता उसकी हरकत को बराबर देखे जा रही थी…वो धीरे – 2 से उसको मेरी तरफ पुश करते हुए उसका बदन मेरे बगल से सटा दिया…
विजेता ने उसकी तरफ घूर कर देखा, मानो कहना चाहती हो कि ऐसा क्यों कर रही हो..
उसने अपनी आँखों के इशारे से उसे चुप चाप मज़ा करने को कहा… तो वो फिर से मेरी तरफ मुँह कर के बातों में शामिल हो गयी…
रामा – वैसे भाई, तूने हमें किस हालत में देखा था…?
मे उसकी बात का कोई जबाब नही दे पाया, और देना उचित भी नही समझता था, क्योंकि रामा को तो कोई प्राब्लम नही थी,
वो तो मेरे साथ सब कुछ कर चुकी थी, लेकिन विजेता को बहुत फ़र्क पड़ना था, वो अभी इन सब बातों से अंजान थी..
जब कुछ देर तक मेने कोई जबाब नही दिया तो वो फिर बोली – छोटू बता ना यार ! तूने हमें किस हालत में पाया था…?
मे कुछ बोलता उससे पहले विजेता बोल पड़ी…दीदी प्लीज़ ! मत पूछिए ना भैया से ऐसा सवाल..
वो उसको घुड़कते हुए बोली – तू चुप कर.. तुझे क्यों प्राब्लम हो रही है…?
विजेता – भैया कैसे बता पाएँगे… अपनी बहनों के बारे में ऐसी बात…आप क्यों शर्मिंदा करना चाहती हैं बेचारे को…?
रामा – भैया की चमची…तू ज़्यादा जानती है उसके बारे में या मे, चुप-चाप लेटी रह… और उसने विजेता बेचारी को चुप करा ही दिया…
फिर वो मेरे से बोली – हां ! बोल भाई… अब बता भी दे.. ना, क्यों ज़्यादा नखरे कर रहा है, धरी लुगाई की तरह…
उसके जुमले पर हम तीनों ही हँसने लगे…, मेने कहा – सुनना ही चाहती हो.. नही मानोगी..? तो लो…….
और मेने उन दोनो के ऊपर से चादर खींच कर एक तरफ को उच्छाल दी, और बोला – इस हालत में देखा था… अब खुश.
विजेता तो शर्म से दोहरी हो गयी, उसने अपनी टाँगें जोड़कर घुटने अपने सीने से सटा लिए…
लेकिन रामा ने मेरे ऊपर छलान्ग ही लगा दी.. और मुझे पलंग पर लिटा कर मेरे ऊपर बैठ गयी… एक दम नंगी, और गुर्राकर कर बोली…
तेरी ये हिम्मत, अब देख तू … इतना कह कर उसने मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया…
मेरे हाथ उसके मोटे-मोटे तरबूजों पर कस गये और मे उसकी मखमली गान्ड को मसल्ने लगा…
विजेता ये सीन देख कर भोंचक्की सी रह गयी, अपनी बड़ी-2 कजरारी आँखें फाड़ कर हम दोनो को देखने लगी…
मेरे होंठ छोड़ कर वो बोली – विजेता तू इसके कपड़े निकाल… इसकी हिम्मत कैसे हुई हमें नंगा करने की…
विजेता तो बेचारी वैसे ही शॉक्ड थी, ये बात सुन कर और ज़्यादा सुन्न पड़ गयी…
जब विजेता की तरफ से कोई रिक्षन ना हुआ तो उसने मेरे ऊपर बैठे हुए ही उसको भी बाजू से पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया और बोली – अब भी शरमाती रहेगी… मेरी लाडो..
मज़े ले ना हमारे साथ, आज देख तुझे हम दोनो मिल कर स्वर्ग की सैर पर ले चलते हैं… ऐसा मौका तुझे फिर कभी नही मिलेगा मेरी जान… आजा, चूस भाई के होंठ…
उसे मेरे होंठों से लगा कर खुद मेरे कपड़े निकालने लगी, और दो मिनिट में ही मुझे भी अपनी लाइन में खड़ा कर लिया…
मेने विजेता को अपनी बाहों में कस लिया और उसके नाज़ुक अन्छुए मादक गोल-2 उरजों को चूसने – चाटने लगा…प्रथम पुरुष स्पर्श उसके लिए वरदान साबित हुआ..
और जैसा रामा ने उससे कहा था, दुगना मज़ा उसको आ रहा था…
रामा ने मेरे लंड को अपने मुँह में भर लिया, और लॉलीपोप की तरह उसे चूसने लगी…
मे – देख वीजू… दीदी कैसे मेरा लंड चूस रही है, सीखले, जिंदगी में बहुत काम आने वाला है ये तेरे…
वो गौर से उसे लंड चूस्ते हुए देखने लगी…
कुछ देर लंड चूसने के बाद रामा उसके ऊपर बैठ गयी, और धीरे- 2 पूरा लंड अपनी चूत में डालकर कमर चलकर चुदने लगी या कहो मुझे चोदने लगी…
मेने विजेता को अपने मुँह पर बिठा लिया, और उसकी कुँवारी चूत को अपने जीभ से चाटने लगा…
रामा मेरे लंड को अंदर बाहर करते हुए विजेता के होंठ चूसने लगी,
ज़्यादा से ज़्यादा मज़ा कैसे लिया जाता है, इसे किसी को सिखाने की ज़रूरत नही होती, सब अपने आप आने लगता है…
यही विजेता के साथ भी हुआ, और वो अपनी चूत को मेरे मुँह से घिसते हुए, होंठ चूसने में अपनी बड़ी बेहन का साथ देने लगी
उन दोनो की सिसकियाँ कमरे में गूंजने लगी, वातावरण चुदाईमय हो गया था…
कुछ देर के धक्कों के बाद रामा झड़ने लगी, और मेरे ऊपर बैठ कर हाँफने लगी…
रामा – भाई अब देर मत कर, अपनी गुड़िया रानी को खोलने का समय आ गया है..
विजेता की चूत पानी बहाते-2 तर हो चुकी थी, तो मेने उसे लिटा दिया और उसकी टाँगों को मोड़ कर चौड़ा दिया.
रामा ने उसकी फांकों को अपने हाथ से खोल दिया, उसका बारीक सा लाल रंग का छेद दिखने लगा…
रामा ने मेरे लंड को अपने हाथ में लेकर उसकी चूत के छोटे से छेद के मुँह पर रख कर कहा – भाई, लगा धक्का और अपना लंड डाल कर चौड़ा कर्दे इसके छेद को भी…
मेने अपने लंड को हाथ का सपोर्ट देकर हल्का सा धक्का दे दिया कमर में…
मेरा सुपाडा उसके संकरे छेद में फिट हो गया, विजेता के मुँह से कराह निकल गयी…
रामा ने उसके होंठों को अपने मुँह में ले लिया और उन्हें चूसने लगी, मौका देख कर मेने एक तगड़ा शॉट लगा दिया, और मेरा लंड विजेता की चूत को फाड़ता हुआ, आधे से ज़्यादा अंदर चला गया…
विजेता ने रामा का सर पकड़ कर अपने से दूर कर दिया और हलाल होते बकरे की तरह डकराती हुई चीख पड़ी….
अरईईईईईई……मैय्ाआआ………रीई….मारगइिईईईईईईईईईईई……ओउफफफ्फ़……मेरी चूत फाड़ दी…..सालीए….हर्मीईिइ….बेहन भाई…दोनो ही हरामी हूओ….
रामा उसे – प्यार से पूचकारते हुए उसके गालों को थप थपा कर शांत करने की कोशिश करने लगी…
विजेता मुझे रोने के साथ – 2 गाली देते हुए बोली – अब निकाल भोसड़ी के, या मार ही डालेगा भेन्चोद…अभी भी सांड की तरह चढ़ा हुआ है मेरे ऊपर
हाई…मम्मी…उन्ह..हुंग…कहाँ फँस गयी मे…इन चोदुओ के बीच.
मे उसके निप्प्लो को सहलाते हुए बोला – बस मेरी गुड़िया हो गया सब, अब कुछ नही होगा तुझे आइ सपथ..…
निपल के सहलाते ही उसमें सेन्सेशन होने लगा जिससे उसका चूत का दर्द कुछ कम लगने लगा, मेने धीरे से अपने लंड को बाहर की ओर खींचा,
विजेता ने एक लंबी सी साँस छोड़कर राहत की साँस ली, की चलो आफ़त टली…लेकिन दूसरे ही पल उसका मुँह फिर खुल गया, वजह मेरा 3/4 लंड फिरसे उसकी चूत में जा चुका था…
ऐसे ही 3/4 लंड की लंबाई से उसको धीरे-2 चोदने के बाद उसको अच्छा लगने लगा, अब वो भी अपनी कमर को उचकाने लगी थी…
जब वो फुल मज़े में आ गयी, तो मेने एक फाइनल शॉट लगा दिया और मेरा पूरा 8”लंबा और ढाई इंच मोटा खूँटा, उसकी नयी फटी चूत में सेट होगया….
वो एक बार फिरसे कराह उठी, लेकिन इस बार वो इस झटके को झेल गयी थी, क्योंकि अब उसकी कुँवारी चूत रस छोड़ने लगी थी…
मेने उसकी एक टाँग को अपने कंधे पर रख लिया जिससे लंड अंदर बाहर होने में आसानी होने लगी…
रामा उसके सर के पास बैठ कर उसकी टाइट चुचियों को चूस रही थी..
दो तरफ़ा हमले से विजेता आनंद सागर की लहरों में उतरती डूबती हुई बुरी तरह से अपनी कमर को झटके देते हुए झड़ने लगी..
उसकी आँखें मज़े के आलम में अपने आप मूंद गयी, और उसके पैर मेरी कमर से कस गये…
दो-टीन मिनिट रुक कर मेने उसे निहुरा कर घोड़ी बना दिया, और आहिस्ता से उसकी नयी चुदि चूत में लंड डाल दिया…
एक दो झटकों में उसे फिर से तकलीफ़ हुई, लेकिन जल्दी ही वो फिरसे मज़े ले लेकर अपनी गान्ड को मेरे लंड पर पटक-पटक कर चुदाई का आनंद लूटने लगी…
10 मिनिट उसे इस पोज़ में चोदने के बाद मेने अपना वीर्य उसकी नयी फटी चूत में उडेल दिया, और उसकी खेती की पहली सिंचाई कर दी…
उन दोनो जंगली बिल्लियों ने 15 मिनिट में फिरसे मेरे लंड को तैयार कर दिया, और इस बार मेने रामा को अपने ऊपर बिठा कर उसे चोदने लगा…
हम तीनों रात भर पलंग पर उछल कूद मचाते हुए, चुदाई का भरपूर आनंद उठाते रहे, मेरी स्टॅमिना, एक साथ दो चुतो को ठंडा करने की थी..
इसका मुख्य कारण था, शुरू से ही भाभी की ट्रैनिंग, और दिदियो का मुझे सिड्यूस कर के कलपद कर के छोड़ देना..
जिस कारण से धीरे – 2 मुझे अपने पर कंट्रोल करने की ट्रिक अपने आप ही आती गयी…
उसी का फ़ायदा उठाकर मेने उन दोनो को पूरी तरह से तृप्त कर दिया, और वो मेरे दोनो ओर मुझसे लिपट कर सो गयी…
अगले दिन से विजेता की छुट्टियाँ ख़तम हो रही थी, मुझे ही उसे छोड़ने जाना था,
उसने शाम को ही बोला था कि उसे किसी भी तरह स्कूल के समय तक वहाँ पहुँचना है…
तय हुआ कि सुबह पौ फटने से पहले ही निकल लेंगे, जिससे वो समय पर अपने स्कूल भी जा सकेगी, और लौट कर मे अपना कॉलेज भी अटेंड कर लूँगा…
15-20किमी का रास्ता बुलेट से मेरे लिए कोई ज़्यादा समय नही लगना था, फिर भी बुआ के घर पहुँचना, उसके बाद उसकी अपनी तैयारी कर के स्कूल निकलना,
इन सारी बातों को ध्यान में रख कर हम 5 बजते ही घर से चल पड़े…
विजेता ने एक टाइट शर्ट और घुटनों तक की स्कर्ट पहन रखी थी, जिसमें वो अभी भी एक स्कूल जाती हुई कमसिन लड़की ही लग रही थी…
बारिस का मौसम था, घने बादलों के चलते, काफ़ी अंधेरा था अभी…गाड़ी की हेड लाइट में हम 35-40 की स्पीड में मस्त सुबह – सुबह की ठंडी हवा का लुत्फ़ उठाते हुए जा रहे थे…
घर से निकलते ही विजेता की मस्तियाँ शुरू हो गयी… अब वो पहले वाली शर्मीली, छुयि-मुई सी विजेता तो रही नही थी..
वो पीछे से मेरी पीठ से चिपक कर अपने दोनो हाथों को आगे कर के मेरे लंड को पॅंट के ऊपर से ही सहलाने लगी…
मुझे अपनी पीठ पर उसकी कठोर चुचियों के उभार महसूस हो रहे थे, ऐसा लग रहा था कि शायद उसने उन्हें शर्ट के बाहर ही निकाला हुआ था..
जब उसके निपल मेरी पीठ से रगड़ते तो शरीर में एक झंझनाहट जैसी होने लगती.
मेने उसके हाथ पर अपना हाथ रखकर कहा – ये क्या हो रहा है वीजू…?
वो मेरे कान की लौ को अपने दाँतों में दवा कर बोली – आप दोनो भाई बहनों ने एक सीधी साधी लड़की को बेशर्म कर दिया, अब पुछ्ते हो कि क्या हो रहा है…
मेने उसी हाथ को साइड में ले जाकर उसकी नंगी जाँघ को सहलाते हुए कहा – वो तो ठीक है डार्लिंग, लेकिन अब चलती बाइक पर ये सब मत करो,
अभी भी बहुत अंधेरा है, मेरा ध्यान भंग हो गया, और गाड़ी लहरा गयी तो सिंगल रोड पर हम झाड़ियों दिखेंगे…
विजेता अपने कड़क हो चुके निप्पलो को मेरी पीठ पर रगड़ते हुए बोली – तो धीरे – 2 आराम से चलाओ ना भैया, इतनी भी क्या जल्दी है आपको मुझसे दूर होने की…?
मे – अरे यार ! इससे भी क्या धीरे चलाऊ…? अच्छा ठीक है, जो तेरी मर्ज़ी हो वो कर…
मेरे मुँह से इतना कहना ही था कि उसने मेरे पॅंट की जीप खींच दी, और अपना हाथ अंदर डाल कर मेरे लंड को अंडरवेार के बाहर निकाल लिया…
रास्ते में भरपूर अंधेरा था, ऊपर से सुबह होने को थी, इस वक़्त किसी वहाँ के गुजरने के भी कोई चान्स नही थे, सो वो खुलकर अपनी मनमानी पर उतर आई..
मेरा लंड तो उसके हाथ लगते ही अपनी औकात पर आ चुका था, शख्त, गरम लंड को मुट्ठी में कसकर विजेता मेरे कान के नीचे चूमकर उसे मुठियाते हुए बोली..
ये क्या लत लगादि आप लोगों ने मुझे, अब मेरी मुनिया बहुत खुजने लगी है… सीईईईईईई…मम्मूऊऊउ…..कुछ करो ना भैया…. प्लीज़….!
उसका दूसरा हाथ अपनी चूत पर था, जिसे वो खूब ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थी….
फिर अचानक से बोली – भैया बाइक रोको, मुझे आपकी गोद में बैठना है…!
मे उसकी बात सुनकर झटका ही खा गया, पीछे मुड़कर जैसे ही देखा तो उसने मेरे गाल को ज़ोर से काट लिया और बोली… रोको ना जल्दी से…
मेने धीरे-2 कर के बुलेट एक साइड में रोक दी…
वो फ़ौरन से उतर कर रोड की साइड में बैठकर मूतने लगी, मेने उसकी तरफ से ध्यान हटा लिया, मुझे पता ही नही लगा कि कब उसने अपनी पेंटी निकाल कर स्कर्ट की जेब में डाल ली…
दो मिनिट बाद आकर वो मेरे आगे, मेरी तरफ मुँह कर के मेरी जांघों के ऊपर बैठ गयी…
मेने जब उसके ऊपर ध्यान दिया, तो पाया, उसकी शर्ट के ऊपर के सारे बटन खुले हुए थे, और नीचे उसने ब्रा भी नही पहनी थी…
मेरा लंड तो ऑलरेडी तना हुया खड़ा ही था, सो वो मेरी गोद में बैठ कर उसे अपने हाथ से पकड़कर अपनी गीली चूत के होंठों, जो अब पहले के मुक़ाबले थोड़े फूले हुए से लग रहे थे, पर रख कर घिसने लगी…
मेने एक हाथ से उसकी एक चुचि को सहलाते हुए कहा – अब तो चलें….
जबाब में उसने बस हूंम्म्म…ही कहा,
मेने किक लगाई, और गियर डाल कर बुलेट आगे बढ़ा दी…
वो मेरे लंड पर अपनी चूत को रगड़े जा रही थी, बीच – 2 में मेरे होंठों को भी चूस लेती…
मेने भी अपना एक हाथ उसकी स्कर्ट में डालकर उसके चूतड़ को मसल दिया…वो चिंहूक कर ऊपर को हुई,
इसी दरमियाँ मेरा लंड उसके छोटे से छेद के ठीक सामने आ गया, ऊपर से बाइक एक छोटे से खड्डे में कूदी, नतीजा !
मेरा आधा लंड सर-सरकार उसकी गीली चूत में घुस गया…
उसके मुँह पर पीड़ा की एक लहर सी दौड़ गयी, और वो थोड़ा ऊपर को उचकी, जिससे मेरा लंड सुपाडे तक उसकी चूत से बाहर आ गया,
लेकिन दूसरे ही पल, वो उसपर फिरसे बैठ गयी…. और अपने होंठों को कसकर भीचकर, धीरे-2 कर के मेरा पूरा लंड उसने अपनी नयी चुदि चूत में ले लिया…
कुछ देर वो यौंही मेरे सीने से कसकर चिपकी बैठी रही, लंड को अपनी चूत के अंतिम सिरे तक फील करती रही…, लेकिन वो कहते है ना, कि बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती…
बाइक के झटकों ने उसे फिरसे उछल्ने पर मजबूर कर दिया… जिससे मेरा लंड उसकी चूत में अंदर-बाहर होने लगा…
थोड़ी देर में ही उसको अच्छा लगने लगा और वो खुद से मेरे लंड पर उच्छल कूद करने लगी…
मे कभी इस हाथ से तो कभी दूसरे हाथ से उसके गोल-2 गेंद जैसी गान्ड को मसल रहा था, इससे ज़्यादा मेरे पास करने को था भी कुछ नही…?
आख़िर था तो मे भी एक नौजवान मर्द, कब तक अपने ऊपर कंट्रोल करता, सो मेने एक पेड़ के नीचे लेजाकर बाइक रोक दी,
एक पैर से साइड स्टॅंड लगाया और विजेता की गान्ड के नीचे हाथ लगाकर, उसे अपनी गोद में लिए ही, बाइक की सीट से खड़ा हो गया….
मेरा लंड अभी भी जड़ तक उसकी चूत के अंदर ही था…
मेने बड़े इतमीनान से विजेता को नीचे उतारा, पुकछ की आवाज़ के साथ मेरा लंड उसकी चूत से बाहर आ गया, मानो किसी बच्चे के मुँह से दूध की निपल निकाल ली हो…
उसके बाद हम दोनो ने फटाफट अपने सारे कपड़े अपने बदन से अलग किए, और विजेता का मुँह बाइक के हॅंडल की ओर कर के उसे आगे को झुका दिया,
उसकी एक टाँग बाइक की सीट पर रख दी, आगे उसने बाइक के हॅंडल को पकड़ लिया…
अब उसकी एक टाँग बाइक की सीट पर घुटना टेके हुए रखी थी, और दूसरी टाँग से ज़मीन पर खड़ी बाइक के टॅंक पर झुक गयी….
पीछे से उसकी चूत बाहर को हो गयी, जो अब लंड डालने के लिए परफेक्ट पोज़िशन थी, सो मेने अपना लंड पीछे से उसकी गीली चूत में पेल दिया.
विजेता के मुँह से एक जोरदार सिसकी निकल पड़ी, जो उस शांत वातावरण में गूँज कर रह गयी….
आआअहह……….सस्स्सिईईईईईईईईईईईई…… मेरे प्यारे भैय्ाआअ…..चोदो अपनी गुड़िया को….मिटा दो मेरी चूत की खुजलीइीइ……. आआईयईईई…. माआ…. ऊओ…. आअहह….. उउउफफफ्फ़….
मे घचा घच उसकी चूत में लंड पेले जा रहा था, वो लगातार सिसकती हुई अपनी एक उंगली को पीछे लाकर अपनी गान्ड के छेद को सहलाती जा रही थी….
खुले आसमान के नीचे, हमें किसी के आने का भी डर भय नही रहा… बस लगे थे अपनी-2 मंज़िल पाने में…
और आखिकार हमें हमारी मंज़िल मिल ही गयी… विजेता चीख मारती हुई अपनी गान्ड को पीछे उछाल कर झड़ने लगी…
मेने भी दो-चार धक्के कस कर मारे और उसे अपने लंड से चिपककर उसकी दूसरी टाँग को भी हवा में उठा लिया और अपनी पिचकारी उसकी चूत में छोड़ दी…
कुछ देर हम यौंही चिपके खड़े रहे, फिर उसने पलट कर मेरे होंठों को चूम लिया और बोली – थॅंक यू भैया, आइ लव यू मी स्वीट भैया…
मेने उसके उरोजो को सहला कर पूछा – तू खुश तो है ना गुड़िया…
वो मेरे सीने से लिपट कर बोली – मे बहुत खुश हूँ भैया, जी तो कर रहा है, कि सारी उमर आपसे ऐसे ही चिपकी रहूं, लेकिन काश ये हो पाता,
फिर वो मेरे लॉड को एक बार चूम कर बोली – बहुत याद आएगा ये निर्दयी मेरी मुनिया को…बट कोई नही, इट’स आ पार्ट ऑफ लाइफ…, हो सके तो आते रहना भैया..
कोशिश करूँगा गुड्डो… अब चलो वरना तू स्कूल नही जा पाएगी…जब मेने ये कहा, तो वो बेमन से खड़ी हुई, और अपने कपड़े ठीक कर के हम वहाँ से चल पड़े.
10 मिनिट बाद हम बुआ के घर पर थे, विजेता को छोड़कर मे दरवाजे से ही लौट लिया…
बुआ ने रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन मेने उनसे बाद में आने का वादा किया और वहाँ से सीधा कॉलेज के लिए लौट लिया…
दूसरे दिन सनडे था, मे तोड़ा लाते तक सोता रहा, जब काफ़ी दिन चढ़ गया तो भाभी ने दीदी को मुझे उठाने के लिए भेजा…
जब वो मुझे उठाने मेरे कमरे में आई, उस समय मे सपने में विजेता की रास्ते वाली चुदाई की पुनरावृत्ति कर रहा था….
मेरा पप्पू इकलौते बरमूडे में अकड़ कर टेंट की शक्ल अख्तियार कर के ठुमके मार रहा था…
जैसे ही रामा की नज़र उसपर पड़ी, उसने अपने मुँह पर हाथ रख लिया और होंठों ही होंठों में बुदबुदाई…
हाईए…राम.. सपने में ही कितना बबाल मचाए हुए है इसका तो, फिर वो धीरे से मेरे बगल में आकर बैठ गयी, और बड़े प्यार से मेरे गाल को चूम लिया, फिर हाथ फेरते हुए मुझे आवाज़ दी…
मे नींद में ही कुन्मुनाया और अपनी एक टाँग उसकी जाँघ पर रख दी…
अब मेरा लंड उसकी जाँघ से आकड़ा हुआ था, उसकी चुभन से रामा के मुँह से सिसकी निकल गयी, और स्वतः ही उसका हाथ मेरे लंड पर पहुँच गया…
वो उसे धीरे-2 सहलाने लगी, अभी वो उसे बाहर निकालने के बारे में सोच ही रही थी, कि भाभी की आवाज़ ने उसे रोक दिया…
अरे क्या हुआ लाडो, तुम भी जाकर लल्ला के साथ सो गयी क्या…?
उसने हड़बड़कर मेरा लंड ज़ोर से भींचकर खींच दिया…
भड़भडा मेरी आँख खुल गयी, देखा तो वो पलंग के नीचे खड़ी खिलखिला कर हँस रही थी,
मेने आँख मलते हुए गुस्से से उसको देखा.. तो उसने मेरे बरमूडा की तरफ इशारा करते हुए कहा –
जल्दी उठ, भाभी बुला रही हैं, कब तक सोता रहेगा… 8 बज गये..
इतना कहकर वो कमरे से बाहर चली गयी, जब मेने अपने तंबू को देखा तो समझ में आया, असल माजरा क्या है..
मे फटा फट बिस्तर से उठा, नित्य कर्म किए और भाभी को बोलकर ऊपर के कमरे में जाकर एक्सर्साइज़ में लग गया…
कुछ देर बाद रूचि भी आ गयी, और वो भी मेरे साथ-साथ अपने हाथ पैर हिलाने लगी…
आख़िर में मेने पुश-अप करना शुरू किया तो रूचि बोली – चाचू मुझे चड्डू खाने हैं..
मेने कहा – चल फिर आजा मेरी बिटिया रानी अपने घोड़े की पीठ पर….
वो मेरी पीठ पर लेट गयी, और कसकर मुझे पकड़ लिया, मेने डंड पेलना शुरू कर दिया…
वो मेरे शरीर के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी, जिससे उसके मुँह से किलकरियाँ निकल रही थी…कुछ देर बाद नीचे से भाभी की आवाज़ सुनाई दी,
रामा ! लल्ला की एक्सर्साइज़ हो गयी होगी, उनका बादाम वाला दूध तो तैयार कर देना लाडो… और देखो, रूचि कहाँ है, उसे भी थोड़ा तैयार कर देना, मे लल्ला की मालिश करती हूँ…
मे अपना डंड पेलने में लगा पड़ा था, मेरे साथ-साथ रूचि भी ऊपर नीचे हो रही थी, और खिल-खिलाकर हस्ती भी जा रही थी…
कुछ देर बाद भाभी एक लंबा सा मुरादाबादी ग्लास बादाम वाले दूध का भरके ऊपर आई,
कुछ देर तो वो चुप-चाप हम चाचा भतीजी को देखती रही, फिर अंदर आते हुए बोली – अब बस करो पहलवान जी, बहुत हो गयी बरजिस…
और रूचि से बोली – तू नीचे जा, बुआ से तैयार होले…
मेने भाभी को देखा, जो अब भी एक वन पीस मेक्सी (गाउन) में थी, उन्हें देखकर मेने एक्सर्साइज़ बंद कर दी, रूचि दौड़ती हुई नीचे चली गयी…
भाभी ने तौलिया लेकर मेरा पसीना पोन्छा, कुछ देर मे खुली छत पर टहलता रहा, अपना पसीना सुखाता रहा, और साँसों को कंट्रोल करने लगा…
फिर भाभी ने अंदर बुलाकर मुझे दूध का ग्लास पकड़ा दिया, जिसे मे एक साँस में ही गटक गया…
भाभी – ज़रूरत से ज़्यादा एक्सर्साइज़ भी मत किया करो, वरना ये शरीर कम होने जाग जाएगा…
मे – आप ही ने तो कहा है, की खूब मेहनत करो, जिससे खूब पसीना निकलेगा, और शरीर मजबूत होगा…
वो – हां ! हां ! ठीक है, चलो अब इस चटाई पर लेटो, तुम्हारी मालिश कर देती हूँ,
मे इस समय मात्र एक शॉर्ट में ही था, सो पेट के बल लेट गया, भाभी ने कमरे में ही रखी एक स्पेशल आयुर्वेदिक तेल जिसमें कई तरह के मिनरल्स थे निकाली और मेरी मालिश करने लगी,
पहले उन्होने मेरे दोनो बाजुओं की मालिश की उसके बाद अपनी पिंडली तक की मेक्सी को और ऊपर चढ़ाया और मेरी जांघों पर बैठ गयी…
मेरी पीठ पर तेल की धार डालते हुए भाभी ने पूछा – लल्ला ! बुआ की सोनचिरैया ऐसे ही बिना पंख फड़फडाए चली गयी…?
पहले तो मे भाभी की बात का मतलव समझ ही नही पाया, सो अपनी गर्दन मॉड्कर उनकी तरफ देखने लगा…
भाभी के होंठों पर मनमोहक स्माइल थी, वो मेरे कंधों पर अपने हाथों का दबाब डालते हुए रगड़ा मारती हुई बोली –
घूमो मत…मेने जो पूछा है उसका जबाब मुँह से दो…
मेने कहा – मे आपकी बात का मतलव ही नही समझा, तो जबाब क्या दूँ…?
भाभी – अरे राजे ! मे ये पुच्छ रही हूँ, कि विजेता के साथ कुछ किया या ऐसे ही कोरी की कोरी निकल गयी…
भाभी की बात का मतलव समझते ही मेरे होंठों पर मुस्कान आ गयी, फिर थोड़ा शब्दों का चयन करने के बाद बोला – आपको क्या लगता है…?
वो – अब मे क्या जानू..? इसलिए तो तुमसे पुछ रही हूँ,
मेने हँसते हुए कहा – भाभी ! हमारे घर के प्रेम-पूर्ण वातावरण में कोई चिड़िया आए, और वो प्रेम-प्रलाप ना कर पाए, ऐसा संभव है क्या…?
वो उत्तेजित होते हुए बोली – इसका मतलव वो भी दाना चुग गयी…? बताओ ना कैसे, कब, और क्या हुआ था…?
मेने उन्हें रामा दीदी और उसके बीच सेक्सी कहानियाँ पढ़ते-2 जो लेस्बियान सेक्स के दौरान जो कर रही थीं, वो सब डीटेल मेने बताया…
भाभी मेरी बातें सुनकर उत्तेजित हो रही थी, ना जाने कब उन्होने अपनी माक्ष्य निकाल कर एक तरफ फेंक दी, और वो मालिश करते हुए अपने नंगे आमों को मेरी पीठ पर रगड़ने लगी…
कुछ देर बाद उन्होने मुझे सीधा लेटने को कहा – मे जैसे ही पलटा, तो देखा, भाभी के शरीर पर कपड़े का एक रेशा तक नही था…
मेने झपट कर उनके आमों को पकड़ना चाहा, तो उन्होने मेरा हाथ झटक दिया और बोली.. अपने हाथ पैर मत चलाओ, बस ज़ुबान चलाओ, और आगे क्या हुआ वो बताओ…
मे उन्हें आगे की कहानी सुनने लगा…
जैसे – 2 हमारी थ्रीसम चुदाई का किस्सा आगे बढ़ रहा था, भाभी की हरकतें उतनी ही वाइल्ड होती जा रही थी,
उन्होने मेरे लंड को अंडरवेर से बाहर निकाल कर अपनी मुट्ठी में लेकर एक बार चूमा, और फिर अपनी नंगी चूत को मेरे तंबू पर बुरी तरह मसल्ने लगी…
चुचियों की घुंडिया, फूलकर कड़क हो चुकी थी, और अब वो किसी गोल काँच के कंचे की तरह मोटी होकर इस समय मेरे सीने पर बुरी तरह घिस रही थी…
मेरे हाथ उनकी गान्ड पर कस गये, और मे उन्हें मसल्ने लगा, तभी मुझे दरवाजे पर कुछ आहट महसूस हुई,
देखा तो रामा दीदी, दरवाजे में हल्की सी झिरी बनाकर हमें देख रही थी…
मेने भाभी के कान में कहा – भाभी… दीदी हमें देख रही है…
भाभी की आँखें मस्ती में मूंद चुकी थी, वो वासना भारी आवाज़ में बोली –
चुपके-चुपके क्यों देख रही हो ननद रानी, अंदर आ जाओ, मिलकर मज़ा करते हैं…
भाभी का इतना कहना था, कि रामा दीदी झट से अंदर आ गयी, और दरवाजा बंद कर के हमारे पास आकर चटाई पर बैठ गयी…
भाभी ने मेरे ऊपर सवारी किए हुए ही, झपटकर उसका सर अपने हाथों में जकड़ा, और उसके होंठों को अपने मुँह में भरकर उसके होंठ चूसने लगी…
भाभी इस समय अपने होशो हवास में नही लग रही थी, वासना उनके सर पर सवार थी, जो उनकी हरकतों से साफ-साफ लग रहा था…
वो दोनो एक दूसरे को किस करने में जुटी थी, मेने लेटे लेटे ही दीदी की कमीज़ में हाथ डालकर उसके संतरे को मसल दिया…
उसके बाद भाभी मेरे मुँह पर आकर बैठ गयी, और दीदी को मेरा लंड चूसने का इशारा किया…
उसने मेरा शॉर्ट निकाल कर अलग कर दिया, में भाभी की गान्ड मसल्ते हुए चूत से निकल रहे रस को चाट रहा था,
दीदी ने मेरे लंड को मुट्ठी में कसकर अपने होंठों से सुपाडे को चूमा, और अपनी जीभ से एक बार जड़ से लेकर टोपे तक चाटा..
भाभी ने उसकी पाजामी को पेंटी समेत उसकी जांघों तक सरका दिया, और अपने हाथ से उसकी चूत को सहलाने लगी.
रामा लंड के पी होल को जीभ से चाट कर वो उसे अपने मुँह में लेने ही वाली थी कि, तभी नीचे से बाबूजी की आवाज़ सुनाई दी…
रामा बेटी… कहाँ हो सब लोग…?