मां बेटी और बेटा CHAPTER 1
ममता- उम्र 46 साल । ममता का बदन काफी भर हुआ है। वो जवानी के किनारे को छोड़ चुकी है पर जवानी उसके बदन को नहीं छोड़ सकी थी। ममता के बाल एकदम गहरे काले घने हैं जो कि उसकी गांड तक आते हैं। अपने बालों का खूब ख़्याल रखती है। उसका चेहरा अभी भी काफी आकर्षक था। गोरा रंग, आंखें गहरी काजल से सजी हुई। गोरे गाल उठे हुए बिल्कुल किसी रसमलाई की तरह। गुलाबी रसीले हल्के मोटे होंठ। चुचियां का साइज कोई 38 होगा।
कविता की उम्र 26 साल है और वो एक सी ए के पास असिस्टेंट का काम करती है। उसकी शादी ममता की बड़ी चिंता है। ऐसा नहीं है कि कविता शादी नहीं करना चाहती पर परिवार की सारी जिम्मेदारी सिर्फ उसीके कंधों पर है। उसके पिताजी की पेंशन कोई 26-27 हज़ार आती है। जिससे दिल्ली में गुज़ारा मुश्किल है। इसलिए वो 12वीं के बाद अस्सिस्टेंट का काम करने लगी जहां से उसे 15 हज़ार मिल जा रहे थे। कविता बिल्कुल अपनी माँ पर गयी है।मदमस्त जवानी, गोरा बदन, हर जगह सही उभार चुचियाँ, गांड सभी गदरायी हुई। मस्त कजरारे नैन, मक्खन जैसे गाल, लंबी घुंघराली ज़ुल्फें, रस से भरे गुलाबी होंठ, एक मदहोश करने वाली आवाज़, उफ्फ्फ क्या खूब दिखती थी वो? बिल्कुल परी सी
जय – अभी 21 साल का है । वो अभी ग्रेजुएशन फाइनल ईयर में है। वो पढ़ने में काफी होशियार है । वो IAS की तैयारी भी कर रहा है। उसने अभी ही कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं में पास भी किया था पर वो बस IAS बनना चाहता था इसलिए उसने कहीं और जाने का सोच ही नहीं। उसके अंदर कोई बुराई नहीं थी ना वो सिगरेट और नाही शराब को हाथ लगाता था। वो शरीर से भी तन्दुरुस्त था। उसकी एक ही बुरी आदत थी वो लड़कियों के नंगे जिस्म के पीछे लाड़ टपकाता था। उसे पोर्न देखने का भी बहुत शौक था। उसके लैपटॉप में बहुत गंदी से गंदी पोर्न फिल्मों का संग्रह था। जिसे वो अकेले में बैठकर देखता था।
कविता आज काम जल्दी खत्म करना चाहती थी। क्योंकि आज उसके भाई जय का जन्मदिन था। वो जल्दी से नंदानी ग्रुप की फ़ाइल के कागज़ को इकट्ठा कर उन्हें सही क्रम से लगाने लगी जैसा कि उसके बॉस आरिफ ने कहा था। मन ही मन वो सोच रही थी कि आखिर जय के लिए क्या गिफ्ट ले? कविता ने अपने भाई को हमेशा अपना दोस्त माना था और वो उसके साथ दोस्तों जैसे ही बर्ताव भी करती थी। आखिर उसके जीवन में कोई और था ही नहीं। सारी सहेलियां तो बिहार में छूट गयी और उन सब की शादी के बाद 2 बच्चे भी हो गए। कविता के बाबूजी अमरकांत झा पटना से 17 कि मी दूर गांव मिठनपुरा के रहने वाले थे। जो कि सरकारी स्कूल में शिक्षक थे । उनका 8 वर्ष पूर्व देहांत हो गया था। जिसके बाद कविता के चाचा शशिकांत झा ने इन लोगों को गांव की कोई भी ज़मीन देने से इनकार कर दिया था। और नाहीं कोई हिस्सा दिया। एक तो पूरा परिवार सदमे में था उसपर ये बवाल। कविता के मामा ने उस समय इनको अपने साथ दिल्ली ले आये। जय तो बहुत छोटा था और ममता अभी अभी विधवा हुई थी। कविता ने उन दोनों को संभाला और मामा सत्यप्रकाश झा के साथ दिल्ली आ गयी और काम ढूंढने लगी। आखिरकार एकाउंटेंसी से 12वीं का फायदा मिला और आरिफ एसोसिएट्स में उसे जॉब मिल गयी। अब बीते 8 साल से वो पूरी ईमानदारी और लगन से काम करती आई है। उसने कभी किसी को शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। सब उससे खुश थे। बीते दिनों की बातें किसी फिल्म की रील की तरह उसके सामने चल रही थी। और इसी बीच उसके बॉस आरिफ ने उसे आवाज़ लगाई। कविता….यहां आना ज़रा।
कविता अचानक से होश में आते हुए जी.. सर आये।
कविता ने दरवाजा खोला और बोली- सर …
नंदानी ग्रुप की फ़ाइल तैयार हो गयी क्या? आरिफ ने सर झुकाये ही पूछा।
कविता- जी सर ….साथ में लेकर आये हैं हम।
ठीक है रख दो।
कविता- सर …वो आज…हहम्म…. थोड़ा जल्दी छोड़ देते तो… आज कुछ काम है।
आरिफ ने घड़ी की ओर देखा 3 बजने में अभी 5 मिनट थे । फिर बोला ठीक है… ओके जाओ।
कविता झट से पीछे मुड़ी और उसका हाथ टेबल पर रखी किताबो से जा टकराया। जिससे सारी किताबे ज़मीन पर गिर गई।
कविता ने हड़बड़ा कर सारी चीज़ें उठानी शुरू की। आरिफ ने बोला कि आराम से कविता ऐसी भी क्या जल्दी है। आज कुछ खास है लगता है। कविता ने सारी किताबें टेबल पर रखते हुए कहा-आज हमारे छोटे भाई का जन्मदिन है सर।
आरिफ बोले ओक आराम से जाना और कल केक जरूर लाना।
जरूर सर कविता ने जवाब दिया।
कविता फिर लपककर अपनी पर्स और छाता लेकर आफिस से बाहर आ गयी। उसने बगल की इंडिया बैंक की शाखा में प्रवेश किया। जहां से उसे पैसे निकालने थे। शाखा में घुसते ही मैनेजर ने उसे अपने केबिन में बुला लिया। आइये कविताजी बताइये क्या मदद करुं आपकी?
कविता ने बोला कि मुझे कुछ पैसे निकालने हैं। माँ की शाइन करवाके लेके आयी हूँ चेक पर।
जी बिल्कुल बिल्कुल अरे मोहित ये ले जा करवाके ले के आ।
और बताइये क्या लेंगी आप ?
कविता- जी?
मतलब कुछ पियेंगी चाय ठंडा।
मैनेजर उसके साथ फ़्लर्ट करने की कोशिश कर रहा था।
कविता ने जवाब में कहा – जी नहीं कुछ नहीं।
मैनेजर कोई 38 40 साल का होगा। वो कविता के रूप को और यौवन को आंखों से चख रहा था। कविता के आंखों को काजल और मस्करा ने झील बना दिया था। उसके गालों पर लाली छाई थी और होंठो पर गुलाबी लिपस्टिक की परत थी। गला सुराहीदार था। कविता की चुचियाँ का कटाव सलवार सूट का गला डीप होने की वजह से साफ दिख रहा था।गर्मी की वजह से पसीना गले से टपकते हुए सीधे चुचियाँ की वादियों में ही गिर रहा था। कविता की गले की चैन भी चुचियो के बीच ही फसी थी। उसे शायद इसकी खबर नहीं थी।मैनेजर का बस चलता तो वहीं कविता को नंगी कर देता और अपनी टेबल पर उसे खूब रगड़के चोदता। कविता अपना मोबाइल देख रही थी। तभी मोहित ने पैसे लेकर दे दिए।
कविता ने पैसे लिए और चली गयी।
मैनेजर ने मोहित से बोला – क्या गज़ब की माल है रे मोहित? बहुत मज़ा आएगा कसम से…
मोहित हंसता हुए बोला- साहब आपके साइड की ही तो है। आप भी पटना के और ये भी पटा लो।
मैनेजर बोला – हाँ यार है तो पर शादी करके बीवी नही अपनी रंडी बनाना है ।
और दोनों ने जोर के ठहाके लगाए।
ममता भी आज काफी खुश थी। दिल्ली में गर्मी का मौसम था। इसलिए वो नहाने चली गयी दोबारा। ममता ने अपनी धुली हुई साड़ी उठायी। और गमछा उठाके बाथरूम चली गयी। ममता ने आईने के सामने अपने बाल खोल दिये और फिर अपनी साड़ी वहीं उतार दी। फिर अपनी ब्लाउज उतारकर हेंगर पर टांग दिया। अपने कमर पर साया कसके बंधने की वजह से उसकी कमर पे निशान बन गए थे। उसने साये की नाड़े को खींचकर ढीला किया और दोनों पैर उसमे से निकाला। ममता अब एक छोटी कच्छी और ब्रा में थी। कच्छी और ब्रा दोनों गुलाबी रंग के थे जिसपर फूल बने हुए थे। उसका गोरा चमकदार बदन बहुत ही मादक लग रहा था। फिर ममता ने शीशे में देखते हुए अपनी ब्रा की हुक खोल दी । ब्रा खुलते ही ममता की 38 की चुचियाँ फुदककर बाहर आ गयी। ममता के निप्पल/चूचक हल्के भूरे रंग के थे। उसके खूबसूरत कबूतरनूमा चुचियाँ किसी स्वच्छंद पक्षी की तरह उड़ना चाहती थी। इसके बाद उसने अपनी कच्छी को उतार दिया। और दोनों ब्रा और कच्छी को वहीं हुक से लटका दिया। फिर उसने अपनी बुर पर बढ़ी हुई केश की ओर देखा और मन में सोचा कि झाँठे काटे की ना। वैसे तो ममता 46 की थी पर तन बदन का कसाव अभी भी 35 का ही था। फिर उसने अपनी बुर को ऊपर से सहलाया। और बोली कल साफ करूँगी।
ममता फिर अपनी मस्त चौड़ी गांड को बाथरूम में रखे मचिया पे टिका दिया। और अपने नंगे बदन पर मग से पानी डालने लगी। पानी उसके बदन पर मक्खन की तरह फिसल रहा था। वो बिल्कुल अद्भुत स्त्री लग रही थी। एक औरत के बदन में जो हर मर्द चाहता है वो सब था ममता के पास। ममता ने नहाने के दौरान वहीं बैठे बैठे पेशाब भी कर दिया। पेशाब की वजह से पानी हल्का पीला हो गया। जिसे उसने पानी से ही बहा दिया।
कुछ देर बाद उसने अपने जिस्म पर साबुन लगाया। अपनी काँखों, गर्दन , चुचियाँ, गांड, गांड की दरार, और अंत में बुर पर भी। सब जगह लगाने के बाद उसने खूब बदन को रगड़ा। वैसे तो वो इतनी गोरी थी कि मैल भी उसपर बैठे तो इतरा के, पर वो ऐसा होने नहीं देती थी। इसके बाद उसने साबुन को पानी से साफ किया। और एक दम साफ हो गयी। चुकी घर में कोई नहीं था इसलिए बाथरूम से सिर्फ साया बांध के आ गयी।
साया उसके चुचियों के ठीक ऊपर बंधा था और गांड को बस ढके हुए था। उसकी जाँघे और गांड मोटी और हल्की चर्बीदार थी। उसका पेट भी ठीक ऐसे ही था।
अक्सर इस उम्र की औरतों को ये चीज़ें और कामुक बना देती हैं। भड़ी हुई चूतड़ों से औरतो की चाल निखर जाती है। क्योंकि जब वो चलती हैं तो चूतड़ों के हिलने से औरतें मर्दो के दिलों की धड़कने बढ़ाती हैं, ठीक वही चाल अभी ममता की हो चुकी है। अपने भाड़ी नितम्भों की उछाल उसके काबू में नहीं थी। ठीक वैसे ही उसकी चुचियो की चाल होती थी।पर ब्रा पहनने से उनकी हरकत काफी कंट्रोल रहती थी।
ममता ने फिर साड़ी पहनी और बिन ब्लाउज पहने ही खाना खाने लगी। वो मेज़ पर बैठी खा रही थी कि तभी घर की घंटी बजी।
ममता ने फौरन हाथ धोया और स्लीवलेस ब्लाउज पेहेन ली। जिसमे आगे आधी चुचियाँ साफ दिख रही थी और पीछे पूरी पीठ लगभग नंगी ही थी।
ये सब उसने दिल्ली में आकर ही पहना था। भले ही वो विधवा थी पर कविता उसे कभी भी ऐसा महसूस नही होने देती थी। बल्कि उसीने अपनी माँ को इस तरह के डिज़ाइनर ब्लाउज सिलवाया था।
ममता ने दरवाजा खोला सामनेउसका बेटा जय था जो कि अभी कोचिंग से आया था। ममता उसे देख मुस्कुराई। जय ने भी बदले में मुस्कुराया।
ममता बोली आ गए तुम??
जय बोला- हाँ माँ , आज बहुत पढ़ना है। तुम जल्दी खाना लगा दो।
ममता बोली आजा हाथ धो के।
ममता ने खाना निकालके लगा दिया। और दोनों साथ मे खाना खाने लगे।
दोनों खाना खा रहे थे , तभी ममता के हाथ के निवाला से दाल चावल छूट कर उसकी चुचियों पर गिर गया, जिसका उसे पता नहीं चला। पर जय की नज़र वहां पर चली गयी। उसकी माँ की चुचियों की दरार में वो 2 चावल के दाने जो दाल से लथपथ थे फंसे हुए थे। ममता बेखबर थी कि उसका बेटा उसकी चुचियाँ ताड़ रहा है।
जय एक बहुत ही कामुक लड़का था। वो पढ़ाई में भले ही अच्छा था पर उसको औरतों के नंगे जिस्म का बड़ा शौक़ था। वो हमेशा औरतो को एक ही नज़र से देखता था। उसका बस चलता तो अपनी आंखों से ही औरतों के कपड़े उतार देता। और सब औरतों को नंगा ही रखता। अब सामने अपनी माँ को ही देख रहा था, पर उसका लंड ये देखकर खड़ा हो रहा था।
ममता के बाल खुले हुए थे उसके होंठो के पास एक तिल था। तभी ममता ने जय से बोला कि कुछ और लोगे तुम??
जय- नहीं माँ।
ममता फिर उठी और थाली उठाके किचन की ओर चल दी। जय ममता की ओर ही देख रहा था। ममता के मटकते चूतड़ों से उसकी नज़र ही नहीं हट रही थी। जैसे किसी गाने की धुन पे ममता के चूतड़ थिरकन कर रहे हो?
ये देख जय का लौड़ा पूरा खड़ा हो गया। ममता की साड़ी काफी नीचे बांधी थी इसलिए उसकी गांड की दरार ऊपर से हल्की बाहर झांक रही थी। उफ्फ्फ ये सीन तो जय के हद के बाहर था। वो उठा और हाथ धोके सीधा अपने कमरे में भागा। और दरवाज़ा बैंड करके सीधा बिस्तर पे लेट गया। और अपनी माँ ममता के बारे में सोचने लगा। अपनी माँ को ही देखके कैसे उसका लौड़ा खड़ा हो गया। छी छी कैसा लड़का हैं हम, लेकिन हम क्या करे सब तो अपने आप ही हुआ है। माँ को ऐसे देखके तो किसीका भी लौड़ा खड़ा हो जाएगा।
लेकिन ये तो कहीं से न्यायपूर्ण नहीं है, की हम अपनी ही माँ को देखके लौड़ा खड़ा करें । उसने मैन बहलाने के लिए लैपटॉप खोल लिया और ब्लू फिल्म देखने लगा पढ़ाई करने की जगह। उस फिल्म में एक महिला को 2 लोग चोद रहे थे। एक महिला की बुर और दूसरा उसकी गांड मार रहा था। महिला को बुरी तरह चोद रहे थे। जय को ऐसी फिल्में ही पसंद थी जिसमे औरतों को बुरी तरह चोदा जाए। जय देखता रहा और फिर थोड़ी देर बाद अपने लंड से पानी निकाल दिया। और फिर वो सो गया।
जय की नींद तब खुली जब शाम के 6 बजे थे। वो जब अपने कमरे से बाहर निकला तब कविता हॉल में गुब्बारे लगा रही थी । वह एक हाफ टॉप और नीचे शलवार पहनी हुई थी। जय अपने दरवाजे पर खड़ा होकर सब देख रहा था। ममता उसकी मदद कर रही थी। ममता ने साड़ी पहन रखी थी जो कि हल्के पीले रंग की थी।जो कि कॉटन की थी।गर्मी का मौसम था इसीलिए उसने भी बस कंधों तक आनेवाली ब्लाउज पहनी हुई थी जिसमें उसकी काँखों के हल्के छोटे बाल साफ दिखाई दे रहे थे। वहां की चमड़ी भी सावली थी। कहने को वो हॉल था पर जगह ज़्यादा बड़ी नही थी। तभी ममता की नज़र अपने लाडले पर गयी।
ममता बोली – उठ गया तुम? जाओ जाके मूंह हाथ धोओ। कविता ने बहुत तैयारी की है तुम्हारे लिए।
कविता ने जय की ओर देखा और मुस्कुराई।
जय ने दोनों की ओर एक बार देखा और बाथरूम की ओर चल दिया। बाथरूम में घुसके उसने अपना लण्ड बाहर निकाला और मूतने लगा । तभी उसकी नज़र कविता की कच्छी पर गयी। जो उसने अभी थोड़ी देर पहले उतारी थी। कच्छी लाल रंग की थी जिसपे उजले रंग की छोटे फूल बने हुए थे। उसने जब देखा तो उसे छुए बिना ना रह सका, उसने झट से वो पैंटी उठा ली। उसे हाथों में मसला और नाक के करीब लाकर सूँघा। उसे सूंघने से उसके दिमाग पर वो असर पड़ा जैसे वियाग्रा खाने से लण्ड पर पड़ता है।
अपनी सगी बहन की पैंटी उसे वो सुकून दे रही थी जो उसे ब्लू फिल्म से भी नही मिल रही थी। उस पैंटी को उसने अपने लण्ड पर रख लिया और कविता के बुर के बारे में सोचने लगा। उसने अभी तक ब्लू फिल्मों में विदेशी चूतों को देख था पर कभी देशी बुर के दर्शन नहीं किये थे। जय तो बस कविता की पैंटी को ऐसे मसल रहा था जैसे कविता की बुर को ही मसल रहा था। अपने लण्ड को पैंटी की कोमल फैब्रिक पर रगड़ता हुआ ना जाने कब उसका मूठ निकल गया और उस पैंटी को सरोबार कर गया। जय को होश आया तब उसने पैंटी को वहीं गंदे कपड़ो के बीच घुसा दिया। और हाथ मूंह धोके बाहर आ गया। तब उसने कविता को देखा कि कविता केक पर कैंडल्स लगा रही थी। ममता किचन में खाना बना रही थी। वो अपने कमरे में जाके बैठ गया। करीब आधे घंटे बाद कविता और ममता ने जय को आवाज़ लगाई बाहर आने के लिए। पर वो बाहर नही आया। दोनों उसके कमरे में आई। और ममता बोली कि बेटा चल बाहर आ देख तो दीदी ने तेरे जन्मदिन की क्या क्या तैयारी की है। चल आजा ।
कविता बोली भाई आओ ना बाहर चलो केक काटते हैं। आज मेरे दोस्त मेरे भाई का जन्मदिन जो है।
आओ ना बाहर प्लीज भैया।
जय को अपने जन्मदिन से कुछ खास लगाव नहीं था। क्योंकि ये वही दिन था जिस दिन उसके बाबूजी की मृत्यु हुई थी।
उसनेअपनी माँ की ओर देखा और कहा, किस बात की खुशी मनाये हम माँ। आज का दिन शायद आप लोग भूल रहे हैं।इसी दिन मेरे बाबूजी मरे थे, और आपके भी कविता दीदी। मुझे इस दिन कोई खास खुशी नही होती। काश मेरे बाबूजी यह होते तो और वो रोने लगा।जोर जोर से।
ममता की आंखों से तो आँशु की धाराएं बहने लगी। उसने अपने बेटे को सीने से लगा लिया और कविता भी उठकर बगल में रखे अपने बाप की फोटो को देखने लगी। उसकी आँखों से भी आंशु बह रहे थे। ममता फफक फफक कर रो पड़ी। कुछ बोलने चाहती थी पर बस इतना ही बोल पाई की …. तेरे बाबूजी……तेरे बाबूजी…….. फिर दौड़कर कमरे से बाहर भाग गई और हॉल में बैठ गयी ।
जय बोल उठा कि कविता दीदी तुम खुद बोलो की हम कैसे ये दिन की खुशी मनाये …. हा…. हा।। कविता कुछ बोले बिना अपने भाई को अपने सीने से लगा लिया। हमारे नन्हे भैया हम जानते हैं कि तुम और हम सब बाबूजी को कितना याद करते हैं। पर मेरी एक बात का जवाब दो अगर बाबूजी होते तो क्या वो आज तुम्हारा जन्मदिन नही मनाते। वो भी तो यही करते। और इस खुशी को हम पुराने दुःख से क्यों ढकने दे। ये छोटी खुशी में हम उस गम को भुला देंगे। तुम मेरे राजा भैया हो और बहादुर भी हो। बाबूजी की तरह मज़बूत बनो। आओ देखो मैंने और माँ ने तुम्हारे लिए क्या क्या किया है। चलो चलो।
जय अपनी बहन की चुचियों पर सर रखे हुए था। उसने तो जान बूझकर ये रोना धोना किया था ताकि अपनी बहन के करीब चिपक सके। और उसे ये मौका मिल गया था। उसने कविता की नंगी कमर को पकड़ रखा था उसके टॉप के अंदर घुसाके। फिर दोनों बाहर आये। तो देखा कि माँ भी संभल चुकी थी। जय ने ममता के पास जाके बोला कि आओ माँ केक काटते हैं।फिर जय ने केक पर पड़े कैंडल्स बुझाये। और केक काटने को हुआ तभी उसके मामा आ गए। अरे मेरे लिए तो रुको। तभी ममता बोली आइये भैया आइये ना। फिर सबने मिलके केक काटा और खाना खाया।
ममता और उसका भाई फिर बाहर कुर्सी पे बैठके बातें करने लगे। तभी कविता हाथ मे गिफ्ट लेके अपने भाई के पास पहुंची। कविता ने उसे एक स्मार्टफोन गिफ्ट किया । जय ने गिफ्ट तो ले लिया पर मन मे
कि असल गिफ्ट कब दोगी मेरी जान कविता।
कविता मुस्कुराके बाहर चली गयी।
रात के करीब 2 बज रहे थे। जय के मामा जा चुके थे। तभी प्यास की वजह से जय की नींद खुली। थोड़ी देर तो वो अलसा कर लेता रहा पर जब बर्दाश्त नही हुआ तो उसे झक मारके उठना पड़ा। उसने कदमो को नींद में ही किसी तरह खींचते हुए किचन में घुसा । उसने फिर बिना बत्ती जलाये ही टटोलते हुए फ्रिज का दरवाजा खोला और पानी की बोतल निकालकर पीने लगा। वो अंधेरे में ही खड़ा था। तभी उसे लगा कि किचन में कोई आया है। अचानक आहट सुनने से उसकी नींद काफूर हो गयी। उसने महसूस किया कि आने वाले को उसकी कोई भनक नही है। पहले तो उसे लगा कि कोई चोर है पर जो आया था वो और कोई नहीं उसकी दीदी कविता थी। उसने फ्रिज से खीरा निकाला और बर्फ के टुकड़े और तेजी से बिना देखे अपने कमरे की ओर भागी। जय को लगा कि कुछ तो बात है। जय ने फौरन दरवाज़े पर जाकर देखा कविता सिर्फ ब्लैक पैंटी और हॉफ टॉप पिंक जो कि उसकी नाभि के ऊपर तक ही आ रही थी। कविता अपने कमरे तक पहुँच कर दाएं बाये देखा और कमरे में घुस गई। उसने सोचा कि उसे किसी ने नहीं देखा। जय ने सोचा कि आखिर इस हालत में कविता खीरा और बर्फ लेने क्यों आयी थी। ये जानने के लिए उसके पास एक ही रास्ता था। कविता का कमरा और जय का कमरा साथ मे ही थे और उन दोनों की खिड़की भी एक तरफ ही गली में खुलती थी। जय अपने कमरे की ओर भागा और अपनी खिड़की से कूदकर छज्जी पर खड़ा हुआ और सतर्क होकर कविता के कमरे की खिड़की तक पहुंच गया। खिड़की बंद नहीं थी क्योंकि गर्मी का मौसम था और उधर ही कूलर भी लगा था। जय ने अंदर झांक के देख तो नाईट बल्ब जल रही थी। कुछ समझ में नही आ रहा था। पर कुछ पल बाद उसकी आंखें अभयस्त हो गयी तो सब दिखाई देने लगा।अंदर कविता बिस्तर पर नंगी ही पड़ी हुई थी। और अपने मोबाइल पर ब्लू फिल्म देख रही थी। और वो खीरा जो वो लेके आयी थी उसे अपनी बुर में घुसा कर मूठ मार रही थी। उसने पहले 2 बर्फ के टुकड़े अपनी बुर में घुसा लिया और फिर खीरा घुसाया था। कविता ब्लू फिल्म देखते हुए मूठ मार रही थी। उसकी मुंह से आनंद की किलकारी फुट रही थी। और कुछ कुछ बड़बड़ा भी रही थी। उफ्फ्फ…… आआहह……… हहहम्ममम्म……. ईश श श श…… ये बुर हमको बहुत परेशान करती है….. पर मज़ा भी यही देती है ऊफ़्फ़फ़फ़। हाय ……
कविता अपने होंठों को दांतों में दबाके बुर के ऊपरी हिस्से को मसल भी रही थी। कविता ने मुंह से थूक निकाला और अपने बुर पर मल दी। और ब्लू फिल्म देखने लगी। ब्लू फिल्म में शायद हीरोइन अपनी गाँड़ मरवा रही थी। कविता ने ये देख तो उसने बर्फ का एक टुकड़ा अपनी सिकुड़ी हुई गाँड़ के छेद में घुसानी चाही। उसने थूक हाथ पर निकाला और गाँड़ के छेद पर मल ली। और बर्फ के टुकड़े को गाँड़ में घुसाने लगी। उसकी गाँड़ की छेद थूक की वजह से काफी गीली हो चुकी थी । लेकिन फिर भी बर्फ का टुकड़ा गाँड़ में घुसाने में उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन घुसाके ही मानी। फिर बड़बड़ाई की पता नही ये हीरोइन कैसे गाँड़ में इतना बड़ा ले लेती हैं। लेकिन मज़ा बहुत आ रहा है और वो लेने में और भी मज़ा आएगा…. आआहह,,… ऊईई….
उधर बाहर से सारा नज़ारा जय देखकर पागल हो रहा था। अपनी सगी बहन को नंगा बिस्तर पर देख उसका लौड़ा फड़क कर खड़ा हो गया। वो वहीं खड़ा होकर कविता के निजी पलों को देखकर लौड़ा घिस रहा था। उसने मन में सोचा वाह मेरी दीदी तो मेरी ही जैसी कामुक निकली। क्या माल है कविता, बिल्कुल मस्त जवानी है। मेरी बहन हुई तो क्या है तो एक जवान लड़की, आखिर किसी ना किसी को तो जवानी की सौगात देगी ही, क्यों ना वो मैं ही बनू? तभी उसकी नज़र कविता पर पड़ी जो अचानक से मुड़ी तो उसकी नज़र भी जय पर पड़ी।
कविता बस उसे देखती ही रही और जय भी उसे ही देखता रहा। कविता ने खुद को चादर से ढक लिया और मोबाइल बन्द कर दिया। जय फिर भी उसे देखता रहा और मूठ मारता रहा। कविता की आंखों में शर्म तैर रही थी, पर नज़रें बेबाक हो अपने भाई को देखती रही। कविता को देखते हुए जय ने उसे एक बार इशारा किया कि दरवाज़ा खोलो। और वो खिड़की से अपने रूम में दाखिल हो कर कविता के दरवाजे पर खड़ा हो गया। कविता की हिम्मत नही हुई कि दरवाज़ा खोले पर जय दरवाज़ा पर से हल्के आवाज़ में ही आवाज़ लगाता रहा कि कविता दीदी दरवाज़ा खोलो। ताकि ममता ना उठ जाए। कविता ने कोई जवाब नही दिया, पर जय लगातार वही खड़ा रहा। कविता को काटो तो खून नही, और हो भी क्यों ना उसके सगे भाई ने उसे नंगा खीरा बुर में घुसाकर मूठ मारते हुए देखा था। करीब 15 मिनट तक ऐसा ही चला।
उधर जय को लगा कि अब कविता दरवाज़ा नहीं खोलेगी , वो निराश हो गया। पर तभी अंदर से छिटकनि खुलने की आवाज़ आयी।
जय ने दरवाज़ा को धक्का दिया , तो देखा कविता अपने बिस्तर पर बैठी थी चादर लपेट कर। कविता को कुछ समझ नही आया था इसीलिए उसने कपड़े नहीं पहने थे। जय ने दरवाज़ा बंद कर दिया और अपनी बहन के पास गया। उसने कविता के चेहरे को ठुड्ढी से पकड़कर ऊपर उठाया, कविता अपने नाखून चबा रही थी। उसने जय की ओर देखा जय ने भी उसे देखा। फिर जय ने बगल से मोबाइल उठाया स्क्रीन लॉक खोला और देखा तो फिर से ब्लू फिल्म चालू हो गयी। उसमे दो लड़के बारी बारी से एक लड़की को चोद रहे थे। उसने उसे चालू ही छोड़ दिया और कविता की आंखों में देखा जैसे पूछ रहा हो कि हमारी दीदी ये सब तुम भी करती हो? कविता अभी तक अपने नाखून चबा रही थी और जय को देखते हुए उसके आंखों के पूछे सवाल का मानो जवाब दे रही थी कि आखिर मेरी उम्र की लड़कियां माँ बन गयी हैं तो क्या मैं ये सब भी नही कर सकती।
कविता की आंखों में शर्म जरूर थी पर पश्चाताप नहीं।
कविता की अभी ताज़ी उतारी हुई पैंटी जो कि कविता के पैरों के नीचे फर्श पर पड़ी हुई थी, को जय ने उठाया और सूँघा, उसपर जैसे काम वासना सवार हो गयी। कविता सब देख रही थी पर कुछ बोली नहीं। कविता के बुर के रस से सरोबार थी वो कच्छी। जय ने फिर अपनी बॉक्सर उतार दी, उसने अंदर कुछ नही पहना हुआ था। उसका करीब आठ इंच का तना हुआ लण्ड बाहर आ गया। उसने कविता की कच्छी को अपने लण्ड पर फंसा लिया।
कविता ने कुछ नही कहा बस जय से आंखों का संपर्क तोड़कर उसके लण्ड को देखने लगी। बिल्कुल मस्त फूला हुआ सुपाड़ा था, मोटाई भी कोई 3 इंच की रही होगी। कविता के हाँथ अनायास ही लण्ड की ओर बढ़ गए। वो उसे छूने ही वाली थी कि जय ने उसका हाथ पकड़कर अपने लण्ड पर रख लिया। कविता ने उसका लौड़ा पकड़ के महसूस किया और जय की आंखों में देखा। कविता मानो कह रही हो कि उसका लौड़ा बहुत तगड़ा है। हालांकि उसने इतने करीब से किसी का भी तना हुआ लौड़ा नहीं देखा था। वो अपने दाये हाथ के नाखून अभी भी चबा रही थी।
जय ने कविता के चादर को हटाना चाहा तो कविता ने उसे झट से एक थप्पड़ मारा। पर जय ने इसका बुरा नहीं माना।
उसने फिर कोशिश की कविता ने उसका हाथ झटक दिया इस बार । जय ने फिर कोशिश की तो कविता ने फिर से एक थप्पड़ मारा उसे। इसके बाद जय ने कविता के खुले हुए बाल को खींच के पकड़ लिया और कविता के चेहरे को ऊपर उठाया और एक थप्पड़ उसके गाल पर मारा। कविता के गाल लाल हो गए पर उसने कुछ नही किया। अब जय ने कविता के चादर को उसके बदन से अलग किया, इस बार कविता ने कोई विरोध नहीं किया। अब कविता पूरी नंगी हो चुकी थी अपने छोटे भाई के सामने। उसकी आंखें अनायास ही बंद हो गयी।
खामोशी में भी एक धुन होती है। वो धुन बिना कोई शोर के बहुत कुछ कह जाती है। अब कुछ लोग सोचेंगे कि खामोशी में कौन सी धुन होती है और वो क्या कह जाती है?? इस सवाल का जवाब बस वो दे सकता है जिसने उस खामोशी के पल को जिया है।सवेरे का अस्तित्व सिर्फ रात से है। अगर रात ही ना हो तो सवेरे की अहमियत खत्म हो जाती है। अगर हम विज्ञान को हटा दे तो ये पूछना की सवेरा क्यों होता है या रात ही क्यों नही रहती, ये सवाल बेकार हैं या इसके उलट। ठीक वैसे ही जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जिसे बस जी लेना जरूरी होता है उनका मतलब बस होने से है, उसमे गलत या सही की कोई गुंजाइश नहीं होती।
शायद वही पल अभी कविता और जय के जीवन मे आया था। 21 वर्षीय जय इस वक़्त अपनी 26 वर्षीय दीदी के साथ पूरा नंगा खड़ा था। कविता शायद पहली बार किसी मर्द के सामने नंगी बैठी थी। जय ने कविता के हुश्न को अब तक कपड़ों में ढके हुए देखा था पर इस वक़्त कविता बिल्कुल अपने जन्म के समय के आवरण में थी अर्थात निर्वस्त्र। जय ने कविता को बालों से कसकर पकड़ रखा था। उसने कविता के चेहरे को देखा कविता की आंखे बंद थी। उसकी पलकें घनी थी और आंखों में काजल लगा हुआ था। उसके भौएँ बनी हुई थी, गाल भरे हुए थे एक दम गोरे। होंठ गुलाबी थी जो बिना लिपस्टिक के भी मदमस्त लग रहे थे। उसके होंठ कांप रहे थे। और बड़ी ही धीरे से वो अपने मुंह मे इकट्ठा हुए थूक को निगल रही थी। उसकी सुराहीदार गर्दन की चाल थूक गटकने की वजह से मस्त लग रही थी। उसका भाई जय अपनी बहन के इस रूप को देखकर पागल हो रहा था। वो भी बड़ी आराम से गले से थूक घोंट रहा था ताकि आवाज़ ना हो जाये।
जय ने झुककर कविता के होंठों के करीब अपने होंठ लाये और उसके होंठो से अपने होंठ चिपका दिए। जैसे चिंगारियाँ फूटी दोनों के होंठ मिलने से । जय ने कविता के होंठों को पूरा अपने मुंह में लिया हुआ था। कविता के होंठ हल्के मोटे थे , जिसे जय चूस रहा था। उसके होंठों का सारा रस लगातार पी रहा था। फिर कविता के मुंह में उसने अपने जीभ को घुसा दिया। कविता ने कोई प्रतिरोध नही किया, अपितु उसके जीभ को चूसने लगी। दोनों भाई बहन बिल्कुल किसी प्रेमी युगल की तरह काम मे लिप्त होने लगे थे।
जय ने कविता को फिर बिस्तर पर लिटा दिया, और जो नाईट बल्ब की मद्धिम रोशनी थी उसे बंद कर दिया । कविता को महसूस हुआ कि जय ने लाइट बंद कर दी है। उसने आंखें खोली, तो अंधेरा था। पर तभी जय ने बड़ी CFL लाइट जलाई, जिसकी रोशनी में दोनों के नंगे बदन नहा गए। कविता ने आंखों पर अपने हाथ रख लिए। और दूसरे से अपनी जवानी यानी चुचियाँ और बुर को ढकने की व्यर्थ प्रयास करने लगी। जय ने अपनी गंजी उतार फेंकी थी और बॉक्सर तो वो पहले ही उतार चुका था। वो बिस्तर पर कविता के बाजू में लेट गया। उसने कविता के अथक असफल प्रयास को अंत कर दिया जब उसने कविता के हाँथ जिससे वो अपने बुर और चुचियाँ ढकना चाह रही थी उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया और किनारे दबा दिया।
कविता के 26 साल का यौवन अब अपने भाई के सामने बिल्कुल साफ नंगा था। कविता की चुचियाँ बिल्कुल दूधिया थी और उस पर हल्के भूरे रंग के चूचक मुंह मे लिए जाने के लिए बिल्कुल वैसे तने थे जैसे बारिश के बाद कुकुरमुत्ते खड़े हो जाते हैं। चुचियों कि शेप बिल्कुल आमों की तरह थी। इन आमों को अब तक किसीने नहीं चूसा या चबाया था। 1* साल से कविता के सीने से लटक रहे थे। जय ने बेसब्री नहीं दिखाई बल्कि कविता के जिस्म को आंखों से पी रहा था।
कविता ने हिम्मत जुटाई और हल्के आवाज़ में कहा कि, लाइट बंद कर दो।
जय ने उसकी आँखों से उसके हाँथ को हटाते हुए, बोला क्यों दीदी??
कविता ने आंखें बंद करके कहा, शर्म आ रही है। उसकी आवाज़ में कंपन थी।
जय ने कहा, दीदी आंखें खोलो और हमको देखो सारी शर्म चली जायेगी। आंखे खोलो ना, देखो हमको तो कोई शर्म नही आ रही हैं।
कविता ने फिर भी आंखे नहीं खोली। जय ने ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया बल्कि वो अपनी दीदी के यौवन को फिर से घूरने लग गया। उसने फिर कविता के पेट को सहलाते हुए चूमा। गुदगुदी की वजह से कविता कांप रही थी। उसने कविता की नाभि में भी चुम्मा लिया और उंगली से उसके कमर और नाभि के आसपास के हिस्से को छेड़ रहा था। कविता इस गुदगुदी से सिहरकर कांप जाती थी। फिर उसने अपनी जवान दीदी के उस हिस्से को देख जहां से इंसान पैदा होता है। यानी कविता की योनि, बुर, चूत, फुद्दी, पुसी, मुनिया इत्यादि। कविता के बुर पर हल्के कड़े छोटे बाल थे, ऐसा लगता था मानो 3 4 दिन पहले ही साफ किये हों। जिससे उसकी बुर का हर हिस्सा साफ दिख रहा था। बुर की लगभग 4 इंच की चिराई थी और रंग गहरा सावँला था।। बुर बिल्कुल फूली हुई थी, और चुदाई ना होने की वजह से अभी बुर की शेप बिल्कुल सही थी। बुर की पत्तियां हल्की बाहर झांक रही थी।उससे एक अजीब सी महक आ रही थी। जो उस के बुर के रस की थी। बुर से लसलसा पदार्थ चिपका हुआ था।
जय मदहोश होकर सब देखता रहा और मन में बोल आज देसी बुर के दर्शन हो गए वो भी अपने ही दीदी की।
जय ने बुर को अपने हाँथ के शिकंजे में ले लिया और उसे मसलने लगा। और कविता की बांयी चूची की घुंडी को मुंह मे भर लिया और चूसने लगा। दूसरे से कविता की दायीं चूची को दबाने लगा। कविता ने कोई विरोध नही किया। बल्कि उसका हाथ जय के सर पर आ गया। जय ने चूची चूसते हुए कविता की ओर देखा क्योंकि उसे कविता से किसी प्रोत्साहन की उम्मीद नहीं थी। पर उसका हाथ उसके सिर पर रखना कविता की सहमति का प्रतीक था। कविता को कूलर चलने के बावजूद पसीने आ रहे थे, शायद ये डर, विषमय और सुख का मिला जुला असर था। जय ने कविता की चुचियों की अदला बदली की। करीब 7 – 8 मिनट चूची की चुसाई के बाद उसने एक बार फिर कविता को बोला, प्लीज आंखें खोलो ना दीदी। पर कविता ने कोई जवाब नही दिया बल्कि वो लगातार आहें भर रही थी। अपनी चूची की चुसाई का आनंद ले रही थी। आज उसे मालूम हुआ कि इन चुचियों का चुदाई में मर्द कैसे इस्तेमाल करते हैं। जय ने फिर कविता की टांगो के बीच जगह बनाई और खुद बैठ गया।वो कविता की जांघों को सहला रहा था। कविता के बुर के करीब अपना चेहरा लाकर उसने उसे सूँघा। बिल्कुल यही खुसबू उसकी पैंटी से आ रही थी जब उसने बाथरूम से उसकी पैंटी में मूठ मारा था। उसने ब्लू फिल्मो में देखा था कि मर्द बुर को खूब मज़े से चूसते हैं पर उसकी हिम्मत नहीं हुई, वैसे भी उसके लिए ये उत्तेजना संभालना मुश्किल हो रहा था। उसने अपने लौड़ा कविता के बुर पर सटाया। कविता आह कर उठी।
जय ने कविता की बुर पर थूक दिया जैसा उसने कविता को देते हुए देखा था। और थूक जाकर बुर के रस से मिलकर बुर को चिकन कर गयी। कविता कुंवारी जरूर थी पर खीरे और गाजर की वजह से झिल्ली टूट चुकी थी। जय ने अपना लण्ड जब घुसाया तो बस हल्की दिक्कत हुई। बाकी लौड़ा पूरा अंदर घुस गया। जय को तो लगा जैसे जन्नत के दरवाजे किसीने खोल दिये हो। बुर की गर्मी का एहसास उसे अपने लण्ड पर पागल बना रहा था। कविता की आंखे इस एहसास के साथ खुल गयी कि एक लौरा अभी अभी ज़िन्दगी में पहली बार उसकी बुर में समा गया है। कविता को अपनी तरफ़ देखते जय का हौसला और जोश बढ़ गया। कविता की आंखों से अब शर्म जा चुकी थी, वो आँहें भर रही थी। आआहह…. आआदह …ऊफ़्फ़फ़फ़.. आआहह.…………………
कविता बोल रही थी, और ज़ोर से आआहह………. और ज़ोर से……ऊईई माँ….. आईई
जय कुछ बोले बिना ही उसकी इन बातों से उत्तेजित होने लगा । उसने कविता की आंखों में आंखे डालकर उसे चोदना शुरू किया। कविता ने भी अपने भाई को बाहों में भड़ लिया और आहें भर रही थी। उसने अपनी टांगो को जय के कमर के इर्द गिर्द कैंची बना ली। और उसे चुम्मा देने लगी। दोनों के नंगे जिस्म अब वासना के खेल की चरम सीमा पर पहुंचने ही वाले थे। कविता के होंठ अभी जय के होंठो को चूस रहे थे, की जय को महसूस हुआ कि कविता की बुर उसके लण्ड को अंदर की ओर खींच रही है। कविता ने इस वक़्त चुम्बन तोड़ दिया और ज़ोर ज़ोर से आहें भरने लगी , जय ने महसूस किया कि उसका माल भी झड़ने वाला है। कविता ने अपने नाखून जय की पीठ में गड़ा दिए। जय ने बोला कि दीदी मेरा माल गिरने वाले है। कविता अब तक झड़ चुकी थी। उसने बोला जब एक दम निकलने वाला हो तब बाहर निकल लेना भाई। जय ने बोला जानता हूं कि बाहर ही निकालना चाहिए, कविता दीदी।
तभी जय बोला कि निकलने वाला है, और लण्ड बाहर निकाला, कविता ने झट से उसके लण्ड को अपने मुंह मे भर ली। जय के लिए ये बिल्कुल अचंभा था कि कविता ने उसका लण्ड मुंह मे ले लिया, पर वो कुछ सोच समझ पाने की स्थिति में नहीं था। और कविता के मुंह मे अपना पूरा मूठ निकाल दिया। कविता अपने बुर के रास से सने लौड़े को मुंह मे लेके उसके मूठ को मुंह मे इकठ्ठा कर ली। जय के लौड़े से करीब 7 8 झटको में सारा मूठ कविता के मुंह मे समा गया। जय आआहह… आआहह करता रहा और बिस्तर पर निढाल हो गया। उसकी जाँघे कांप रही थी। कविता ने उसके लौड़े को अभी तक नहीं छोड़ा था, वो चूसे जा रही थी। जब तक उसका आखरी बूंद ना निकल गया। जय ने कविता की ओर देखा तो उसने एक झटके में पूरा लौड़े के रस को निगल गयी।
जय ने कविता को अपने ऊपर खींच लिया और उसे बाहों में जकड़ लिया। दोनों की नज़रे मिली। कविता ने अपना मुंह उसके सीने में ढक लिया। दोनों वहीं उसी हालत में सो गए।
कविता अपने छोटे भाई के ऊपर अपनी सुध बुध खोकर नंगी ही सोई हुई थी। जय ने उसे अपनी बाहों में पकड़ रखा था। ये एक अद्भुत नजारा था, कहने को दोनों भाई बहन थे पर इस समय दोनों ब्लू फ़िल्म के हीरो हीरोइन लग रहे थे। जय की आंखों में नींद कहाँ थी इतनी खूबसूरत बला उसकी बाहों में थी। जय ने कविता की ज़ुल्फ़ों को एक किनारे किया। कविता ने एक आंख खोली तो सामने जय को खुद को घूरते हुए पाया। कविता का चेहरा भावविहीन था, खुदको अपने छोटे भाई की बाहों में नंगा पाकर भी उसके चेहरे पर ना खुशी, ना दुख था। शायद उसके मन में कोई कशमकश चल रही थी, सही और गलत की पर , उसमे इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपने भाई को कुछ मना कर सके। उसके आंखों में हल्की ग्लानि उतर आई थी। भाई बहन की सारी मर्यादा टूट चुकी थी। जिस भाई को उसने अपने कभी अपने गोद मे उठाया था, आज उसके लण्ड को अपने बुर में समाकर उसे शायद खुद से दूर कर दिया था।जय कविता के आंखों में देखते ही समझ गया कि कविता के मन मे क्या चल रहा है। कविता उठकर बैठ गयी, और चादर जो नीचे गिरी हुई थी उसे उठाकर खुद को ढक लिया। जय ने उसे नहीं रोका, वो उठकर कविता के ठीक पीछे बैठ गया। कविता बिस्तर के किनारे अपने पैर फर्श पर रखके बैठी थी। जय ने कविता के कंधे पर सर रख दिया, कविता हटना चाहती थी पर जय ने उसे बाहों में पकड़ लिया। कविता के कानों के पास जाकर उसने कहा- कविता दीदी हम जानते हैं कि तुम क्या सोच रही हो। तुमको अभी खुद से बहुत घृणा हो रही होगी। तुम्हे लग रहा होगा कि तुम दुनिया की सबसे गिरी हुई लड़की हो। औऱ अगर तुम वैसा सोच रही हो तो तुम गिरी हुई नही बल्कि अच्छी शरीफ लड़की हो। कोई भी लड़की अपने सगे भाई से ये सब नहीं करना चाहती है। पर वो पल ऐसा था कि हम दोनों अपने आप में ना रहे। उस वक़्त हम भाई बहन से मर्द और औरत बन गए थे। ये ही तो संसार मे होता है, मर्द औरत ही संसार को बनाते हैं। ये रिश्ते नाते कोई मायने नही रखते हैं, अगर ऐसा होता तो ना तुम्हें नंगी देखकर हमारा लण्ड खड़ा होता, ना तुम ये जानते हुए की में तुम्हारा भाई हूँ, नंगी होते हुए दरवाज़ा खोलती, और ना तुम्हारी बुर मुझे देखकर पनियाती। कविता बोली- बस करो भाई, जय ने कविता के चेहरे को अपनी ओर घुमाया, उसकी आंखों से आंसू गिर रहे थे ।
जय- दीदी इसमें शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं है। हमने कुछ गलत नहीं किया, हां ये समझने में हो सकता है कि तुम्हे कुछ वक्त लगे, पर तुम कुछ कर मत बैठना।
तभी बाहर से ममता की आवाज़ गूँजी , कविता ….. कविता………….. उठ ज़रा । कविता और जय दोनों चौकन्ने हो गए। कविता झट से उठी। दोनों की नज़र घड़ी पर पड़ी इस वक़्त 5:30 हो रहे थे। कविता ने उसे कहा कि तुम जल्दी जाओ यहां से। पर कोई जगह नहीं थी, इसलिए जय नंगा ही पलंग के नीचे घुस गया। कविता ने कहा, हाँ माँ बस खोल रहे हैं दरवाज़ा। ज़रा एक मिनट । कविता ने जय के बॉक्सर और अपनी पैंटी को पलंग के नीचे खिसका दिया, और खुद नाइटी पहन ली। जल्दी में बस वही पहन सकती थी। उसने दरवाज़ा खोला तो ममता कमरे में घुस गई। और हड़बड़ाते हुुए बोली देखो हमको गांव जाना होगा। वहां तुम्हारे चाचाजी की तबियत बहुत खराब है। भले ही उन्होंने कुछ सही गलत जो भी किया हमारे साथ, लेकिन वो हमारे रिश्तेदार भी हैं। हम नहीं जाएंगे तो कौन जाएगा?
कविता पहले से डरी हुई थी उसे लग रहा था कि माँ सब जान ना जाये पर ये सुनके उसका मूड खराब हो गया उसने अपनी माँ को गुस्से में कहा वो आदमी जिसने हमे सड़क पर छोड़ दिया, जिसने हमे सुई के बराबर ज़मीन नहीं दी। आप उसके पास जाओगी, मरता है तो मरे वो कमीना आदमी।
ममता बिस्तर पर बैठते हुए बोली , देखो कविता तुम बड़ी हो गयी हो, तुम्हे क्या हमने यही सिखाया था। बड़ों का सम्मान किया करो।
नीचे रवि भी ये सुन रहा था, डर से उसके पसीने छूट रहे थे । वो क्या करता बस सोच रहा था कि कब माँ यहां से जाए और वो अपने कमरे में भागे।
कविता बोली क्यों माँ क्यों करे उस आदमी का सम्मान जो सम्मान के योग्य ही नही है। तुम बहुत भोली हो। तभी कविता की नज़र रवि की गंजी पर गयी जो फर्श पर पड़ी हुई थी। उसे काटो तो खून नहीं, दिल जोरों से धक धक करने लगा।
कविता के माथे से पसीना बहने लगा। ममता की नज़र उस पर नहीं पड़ी थी। कविता ने सोचा कि माँ को किसी तरह भगाना होगा । ममता तब तक बोलती ही जा रही थी, पर कविता के कानों से वो बाते लौट गई।
ममता ने आखिर में पूछा, क्या बोलती हो कविता??
कविता ने कहा- तुमको जो ठीक लगता है, करो में क्या बोलू।
ममता ने कहा- ये मत भूलो की वो तुम्हारे चाचा ही नही मौसाजी भी हैं। में अपनी बहन से भी मिल लूंगी।
उधर बिस्तर के नीचे घुसे हुए रवि अपनी माँ और कविता के पैर ही देख पा रहा था। तभी कविता के पैर ने उसकी गंजी को धक्का मारा और वो सीधा उसके मुंह पर लगा। उसने गंजी को तुरंत अपने पेट के नीचे छुपा लिया।
ममता उठी और बोली की जाते हैं जय को उठा देते हैं, टिकेट कटाकर मुझे अगली गाड़ी में बिठा देगा।
कविता – माँ जय तो अभी अभी सोया होगा, IAS की तैयारी जो कर रहा है, थोड़ी देर बाद उठाना , तब तक तुम समान पैक कर लो। टिकेट हम ऑनलाइन काट देते हैं।
ममता- कितना ख़याल है छोटे भाई का, ठीक है जल्दी काट दो।
कविता – हाँ माँ, तुम जाओ।
ममता चली गयी। कविता दरवाज़ा लगाके पीछे मुड़ी तो जय बाहर आ चुका था। उसने बॉक्सर और गंजी हाथ मे रखी थी। कविता बोली, जल्दी पहन लो और जाओ यहां से। जय ने अपने बॉक्सर और गंजी पहनी और जाने लगा। तभी उसने कविता को चुम्मा लेना चाहा पर कविता ने उसे रोक दिया। जय ने कुछ नही बोला और जाने लगा। तभी कविता ने कहा- रुको, और अपना हाथ बढ़ाकर उंगलिया हिलाई, जैसे कुछ मांग रही हो।
जय ने फिर अपनी जेब से कविता की पैंटी निकालकर उसके हाथ मे रख दी।
अब जाओ, कविता बोली।
जय भागकर अपने कमरे में घुस गया।
सुबह के आठ बजे चुके थे, कविता ने तत्काल में स्वर्णजयंती एक्सप्रेस का टिकट काट दिया था, जो साढ़े नौ बजे नई दिल्ली से खुलती थी। ममता और जय ऑटो से स्टेशन की ओर निकल रहे थे। ममता ने कविता को कहा कि अपना और जय का ध्यान रखना। और ऑटो में बैठ गयी।
ममता को ट्रेन की सीट पर जय ने बैठने का इशारा किया और बोला, माँ ये 49 नंबर है तुम्हारी सीट। गाड़ी खुलने वाली है , मैं निकलता हूँ। और ममता के पैर छूकर उतर गया। ममता ने उसे खिड़की से ही गालों पे चुम्मा लिया और बोली ध्यान रखना, और दीदी को परेशान मत करना ज़्यादा। ट्रेन चल पड़ी।
ममता हाथ हिलाते हुए जय की नज़रों से ओझल हो गयी।
जय वापिस ऑटो पकड़के घर पहुंच गया। रास्ते भर कल रात की बाते उसके दिमाग मे चल रही थी। जब घर पहुंचा तो 10:35 हो रहे थे, घर पर ताला लगा था, शायद कविता आफिस जा चुकी थी। उसने बगल की आंटी से चाभी ली जैसे हर बार चाभी उनके पास ही छोड़ के जाते थे। दरवाज़ा खोलकर वो अंदर अपने कमरे में पहुंच गया।
वो कमरे में पहुंच कर पढ़ाई करने लगा। दरअसल वो पढ़ने की कोशिश कर रहा था, पर रात की बातें उसके दिमाग में घूम रही थी। कविता के नंगेपन और जवानी की चासनी में डूबी उसकी चुचियाँ, उसका बुर, उसकी गाँड़, उसकी नाभि, उसकी जाँघे, उसका पूरा बदन उसकी आँखों के सामने आ रहा था। उसकी पढ़ने की नाकाम कोशिश कोई एक घंटे चली।अंत मे उसने किताब बंद कर दी और लेट गया। उसका लौड़ा अनायास ही खड़ा हो गया था।
जय कविता के कमरे में घुस गया। वहाँ उसने कविता की अलमारी खोली। वो कविता की कच्छीयाँ ढूँढने लगा। उसे वहाँ कविता की 3 4 कच्छीयाँ मिली। तभी उसको ध्यान आया की आज उसकी माँ ममता भी नही है। कविता की कच्छीयाँ लेकर वो ममता के कमरे में गया वहाँ उसको अपनी माँ की ब्रा और पैंटी मिल गयी। उन दोनों की ब्रा और पैंटी लेकर वो हॉल में आ गया, और खुद पूरा नंगा हो गया। उसके बाद उसने वहीँ इन्सेस्ट ब्लू फिल्म लगाई। और अपनी माँ बहन की ब्रा पैंटी के साथ खेलने लगा। वो सोच रहा था कि मैं कहाँ इन ब्लू फिल्मों में सुकून ढूंढता रहता था, जो मज़ा मेरी घर की औरतों की अंडरगारमेंट्स में हैं वो कहीं और कहां मिलेगी। मेरी माँ ममता क्या माल है, एयर मेरी बहन वो तो माँ की परछाई है। कल रात मुझे अपने जन्मदिन का बेहतरीन गिफ्ट मिला, अपनी सगी बड़ी बहन को चोदना सबको नसीब नहीं होता। अगर खुद की माँ और बहन के बारे में सोचके मेरा इतना बुरा हाल हो जाता है, तो बाहर के मर्द तो उनके बारे में क्या क्या घिनौनी बातें सोचते होंगे।
तभी उसका मोबाइल बजने लगा। उसने इग्नोर कर दिया क्योंकि कोई अनजान नंबर था। वो फिर ममता और कविता के खयालों में खोने लगा, की मोबाइल फिर से बजने लगा।
उसने मोबाइल उठाया- हेलो?
दूसरी तरफ से- जय बोल रहे हो?
जय- हाँ जी, आप कौन?
मैं आरिफ एसोसिएट्स से बोल रहा हूँ, तुम्हारी बहन यहाँ बेहोश हो गयी है, मैन डॉक्टर को दिखा दिया है, घबराने की कोई बात नहीं है, इसे यहां से ले जाओ।
जय- जी मैं अभी आया, तुरंत।
जय ने फुर्ती से उठकर कपड़े पहने और भागता हुआ बाहर पहुंचा। वहां उसने ऑटो ली और करीब 15 मिनट में वो वहां पहुंच गया।
जय- क्या हुआ दीदी को?
आरिफ़- अरे कुछ नहीं ज़रा सा चक्कर आया है, डॉक्टर ने बताया कि स्ट्रेस की वजह से ऐसा हुआ है। बैठ जाओ। मैंने इसे एक हफ़्ते की छुट्टी दे दी है। कविता को आराम की ज़रूरत है।
जय- कोई डरने वाली बात नहीं है ना?
आरिफ- अरे नहीं यार, रिलैक्स डॉक्टर ने कहा है कि कुछ भी घबराने की ज़रूरत नहीं है, बस थोड़ा आराम चाहिए, वैसे तो मैं किसीको इतनी छुट्टी नहीं देता, बट कविता ने कभी भी इन 8 सालों में इतनी लंबी छुट्टी नहीं ली है। इसलिए छुट्टी पर भेज रहा हूँ। ये लो प्रेस्क्रिप्शन, और दवाइयां। मैंने एक हफ्ते की ले दी हैं।
जय- थैंक यू सर।
आरिफ- ठीक है, इसे ले जाओ।
जय अंदर गया जहाँ कविता लेटी हुई थी। जय ने कविता को गोद मे उठाया और और बाहर आके ऑटो में बिठाया, कविता का पर्स और छाता वो फिर ले आया। और ऑटो में बैठ गया। कविता होश में थी, पर थोड़ी कमज़ोरी थी।
जय ने ऑटोवाले को कहा भैया आराम से ले चलो।
थोड़ी देर में वो अपने घर पहुंच गए। कविता अब तक संभल चुकी थी, और ऑटो से उतर के घर की ओर जाने लगी। जय ने ऑटोवाले को पैसे दिए। जैसे ही वो मुड़ा की कविता लड़खड़ा रही थी, हल्की कमज़ोरी से। उसने कविता की बांह को अपने गर्दन में डाला और उसे गेट तक ले गया। दरवाज़ा खोलके, उसको उसके कमरे तक वैसे ही ले गया। कविता लेट गयी।
जय ने उसे वैसे ही छोड़ दिया और वहीं बैठ गया।
शाम को करीब पांच बजे कविता की नींद खुली, अब वो पूरी तरह ठीक हो चुकी थी। उसे सारी घटना विधिवत याद थी। उसने देखा जय वहीं पलंग से लगके बैठकर सो रहा था। उसने उसको देखा तो उसे उठाया,
कविता- जय….जय… उठो।
जय- अऊ.. आय दीदी तुम ठीक हो? कब उठी ?
कविता- अभी अभी। कविता ने उसे बिस्तर पर बैठने का इशारा किया।
जय- दीदी आखिर, कैसे हुआ ये?
कविता नज़रें झुकाये हुए-हम कल रात की बातें सोच रहे थे, और पता नही कब हम बेहोश हो गए।
जय कविता के करीब आया, और बोला- दीदी तुम भी ना, कुछ गलत नहीं हुआ है। हम दोनों ही वयस्क हैं, और ये हो जाता है। क्या हम नहीं समझते हैं कि तुमको सेक्स की ज़रूरत है। 26 साल की लड़की अगर सेक्स नहीं चाहेगी तो क्या बुढ़िया होकर सोचेगी। ये तो ज़रूरत है शरीर की, किसी और के साथ करोगी बाहर में तो, ख़तरा होगा। हमलोग अगर घर में ही एक दूसरे को खुश रखें, तो इसमें बुराई क्या है। तुम भी ब्लू फिल्में देखती हो और हम भी एक दूसरे से छुपाकर। पर जानते हैं कि दूसरा देख रहा है। हमारी तरफ देखो ना। कविता उसकी आँखों मे भोले बच्चे की तरह देखने लगी।
कविता- पर हम भाई बहन होकर चुदाई कैसे कर सकते हैं, जय? क्या हमने अपने रिश्ते को कलंकित नहीं किया है??
जय- तुमको क्या लगता है खाली हमने तुमने ऐसा किया है, अरे आदिकाल से ऐसा हो रहा है समाज में। रति ने अपने बेटे के साथ, यमी बहन होकर अपने भाई के साथ संभोग करना चाहती थी। अर्जुन से स्वर्ग की अप्सरा जो कि उसकी माँ थी वो भी उससे संभोग करना चाहती थी। तुम मुस्लिमों में ले लो चाचा, फूफा की बेटी के साथ शादी हो जाती है। ये रिश्ते नाते सब अपनी जगह हैं, अगर तुम बाहर जाके ये सब करोगी तो दुनिया तुमको बदचलन, रंडी, और ना जाने क्या क्या बोलेगी। जो हम या माँ तो बिल्कुल नही चाहेंगे। अरे, तुम्हारे साथ कुछ गलत नही होने देंगे हम। राखी का वचन है। जहाँ तक रही हमारी बात तो , हम अब तुमको एक बात कह देना चाहते हैं, आई लव यू, कविता। भले ही तुम हमारी दीदी हो, पर अब सच्चाई यही है। और हम तुमको आज से नहीं बहुत पहले से प्रेमी की तरह चाहते हैं। बस कह नहीं पाते थे, की तुम क्या सोचोगी? पर आज साला निकल ही गया। अगर हमारा बस चले तो तुमसे ही शादी करेंगे।
जय उठके जाने लगा। तभी कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया। कविता बिस्तर से उठी और जय की आंखों में देखा,” इतना प्यार करते हो हमसे। हम कभी सोचे नहीं थे कि कोई हमको इतना चाहेगा। पता है आज दिन भर हम क्या सोच रहे थे। कि हम कितनी घटिया लड़की हैं जो अपने ही भाई के साथ, अपने बिस्तर पर चुदाई की। हमको तुमसे ज़्यादा खुदसे घिन्न हो रही थी। हमको तो आज मन कर रहा था कि सुसाइड कर लें। छोटे हो हमसे तुम पर बड़ी बात सिखा दिया तुमने। आखिर प्यार कोई रिश्ते देखकर थोड़े ही होता है। हम भाई बहन हैं भी तो इस समाज के लिए, पर समाज से पहले हम दोनों को प्रकृति ने औरत और मर्द बनाया है, और ये रिश्ता समाज के रिश्ते से कहीं ऊपर है। मैं इन रिश्तों के बंधनो को तोड़कर आज तुमसे प्रेमिका का रिश्ता जोड़ती हूँ। अब चाहे जो हो, ये कविता आज से तुम्हारी है। इसके बाद तुमसे समाज का बंधन ज़रूर जोरूँगी, पति- पत्नी का।
जय- कविता दीदी, आई लव यू।
कविता- सिर्फ कविता कहो। आई लव यू टू जय। तुम हमको अकेले मत छोड़ना, हमारा साथ निभाना।
जय ने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसको किस करने लगा। अबकी बार कविता उसे एक अलग ही तरह से चूम रही थी।
कविता अपने छोटे भाई के सीने पर अपनी चुचियाँ को गड़ा दिया और उसके सर के आजु बाजू अपना सर डाल दिया और उसको खूब ज़ोर से चुम्मा लेने लगी। कविता अपनी जीभ से जय के मुंह को टटोल रही थी। कविता को इस तरह चूमता देख जय ने कविता को कमर से पकड़ लिया और वो भी उसे उसी तरह पैशनेट चुम्मा लेने लगा। करीब 5 मिनट बाद दोनों सांसें उखाड़ जाने की वजह से रुके, वरना वो अलग नहीं होते। कविता जय की आंखों में देख रही थी, पर इस बार शर्म की जगह मोहब्बत ने ले ली थी।
जय- कविता दीदी तुम तो बहुत ही मस्त किस करती हो।
कविता- हहम्म, मज़ा आया की नही।
जय- बहुत मज़ा आया दीदी, आज हम कितने खुशनसीब है कि हमको अपनी दीदी में ही एक बहन और औरत दोनों का प्यार मिल रहा है।
कविता- क्या मतलब? तुम ये भाई बहन का रिश्ता अभी कायम रखोगे?
जय- हाँ, दीदी ये तो हमारी पहली सच्चाई है, पर दूसरी सच्चाई ये है कि हम तुम्हें अपनी गर्लफ्रैंड बनाना चाहते हैं। जय ने उसके बालों को सवारते हुए कहा।
कविता- तो तुम सबके सामने हमको दीदी बनाये रखोगे और अकेले में हम दीदी से बीवी बन जाएंगे। ये बोलकर कविता और जय दोनों ठहाके मारकर हँसे।
जय- वो तो तुम्हे एक दिन बनना है, जानू।
जय ने बोला कि चलो में तुम्हे कहीं बाहर घुमा के लाता हूँ।
कविता- पर तेरे पास पैसे कहा से आये?
जय- कल मामाजी ने दिए थे, 5000।
कविता- अच्छा, पर तुम्हे उनसे पैसे नहीं लेने चाहिए थे। हमको अच्छा नहीं लगता कि कोई हम पर दया करके पैसे दे। उन्हें लगता है कि हम तंगी में जीते हैं।
जय- अरे कविता तुम कहाँ से कहाँ पहुंच गई, चलो ना।
कविता- जय हमको मामाजी की आंखों में हमेशा दया दिखती है, हमारे लिए जो हमको अच्छा नहीं लगता। यही सोचके उन्होंने पैसे दिए होंगे।
जय- उन्होंने कोई गिफ्ट नहीं लाया था, इसीलिए रुपये दिए। ताकि अपने हिसाब से कुछ ले लूँ। तुम आओ मेरे साथ।
कविता- ओह…. अच्छा ठीक है। हम फ्रेश हों लेते हैं।
जय -ठीक है, हम भी कपड़े बदल लेते हैं।
थोड़ी देर बाद कविता बाहर आ गयी।
कविता इस वक़्त काली कलर की लेग्गिंग्स और लाल कुर्ती में थी। जय टी शर्ट और जीन्स में था।
जय ने उसे देखा तो बोल पड़ा, क्या हॉट लग रही हो कविता। कविता मुस्कुराई, तुम भी बहुत हैंडसम लग रहे हो। जय कविता के साथ बाहर आया। और ऑटो ले ली। उसमे बैठके दोनों PVR मॉल को निकल पड़े।
बाहर गर्मी थी, तो कविता और जय दोनों को पसीने आ रहे थे। कविता की कुर्ती से उसकी चुचियों की दरार साफ दिख रही थी। जिसमे उसके गले का लॉकेट फंसाथा। पसीने की वजह से चुचियाँ का हिस्सा जो दिख रहा था, बिल्कुल चमक रहा था। कविता इस बात से बेखबर थी कि जय उसकी चुचियों को निहार रहा है। जय ने एक शरारत की उसने पहले कविता को अपनी दायीं बांह से खुद से चिपका लिया। कविता मुस्कुराते हुए उसके करीब आ गयी। उसने फिर कविता की लेग्गिंग्स में अपना हाथ पीछे से घुसा दिया।
कविता चौंक उठी- आंखों से इशारा करके बोली निकालने के लिए। पर जय कहाँ मानने वाला था। वो मुस्कुराके उसकी पैंटी में हाथ घुसा दिया, और कविता की गाँड़ की दरार में उंगलिया फेरने लगा। कविता धीरे से बोली, जय यहां नहीं प्लीज।
जय ज़ोर से बोला- क्या , यहां नहीं जानू। कविता को ये छेड़ छाड़ पसंद आ रही थी, वो झूठा गुस्सा भरा चेहरा बनाके उसे डराना चाही, पर जय ने उसे चूम लिया। कविता की हंसी छूट गयी। जय बोला हँसी तो फंसी।
तब तक वो पहुंच चुके थे , जय ने ऑटोवाले को पैसे दिए और वो चला गया। तब जय ने अपने हाथों को सूँघा जिससे उसने कविता की गाँड़ को टटोला था, कविता ये सब देख रही थी। वो मुस्कुराई और बोली जल्दी चलो। जय ने सोचा, कविता को ये घिनौना नही लगा, की मैं उसकी गाँड़ को टटोलकर सूंघ रहा हूँ, कोई और होती तो शायद घृणा करती ।
वो कविता के पीछे हो लिया। वहां टिकट की लाइन में भीड़ थी। लेडीज की लाइन में तीन चार ही लोग थे। कविता ने बोला कि टिकेट मैं ले लेती हूँ। और टिकेट की लाइन में लग गयी। जय ने देखा कि कविता एक दम मस्त माल लग रही है। ब्राह्मण होने की वजह से रंग तो पूरा गोरा था। कविता की चुचियाँ क्या मस्त तनी हुई थी और गाँड़ का उभार तो उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रहा था। उसका भोला सा चेहरा। उसकी गोल बड़ी बड़ी आंखें , हाई चीक बोन्स की वजह से उसका चेहरा और निखर रहा था। उसने अपने बाल क्लचर में बांध रखे थे। कानों में से लटकता झुमका मैटेलिक रंग का था। जिसमे दो गोलाकार बॉल लगे हुए थे, उसे और आकर्षक बना रहे थे। होंठो पर हल्की लाल लिपस्टिक, आंखों में गहरा काजल वो बिल्कुल बॉलीवुड की हीरोइन लग रही थी।
तभी कविता ने जय को टोका- जय ये लो, टिकेट।
जय लगभग सपने से जागते हिये बोला – अरे तुमने हमको क्यों नही बोला? पैसे थे ना।
कविता- जब तक हम हैं तब तक तुमको पैसे खर्च नही करने हैं। जब तुम IAS बन जाओगे तब करना।
जय- तब तुमको हम बीवी बनाके रखेंगे, और इस साल ये होक रहेगा।
कविता- अच्छा है पर, माँ को कैसे मनाओगे?
जय- उन्हें समझाऊंगा की हम दोनों प्यार करते हैं।
कविता- वो बोलेंगी की ये गलत है, तब ?
जय- उनको समझायेंगे,…… क्योंकि…… ये गलत नहीं है?
तभी एंट्री शुरू हो गयी। कविता और जय ने जाकर कार्नर की सीट ले ली। जय ने पूछा कि ये कार्नर की सीट कैसे मिली। कविता ने आंख मारी की मैंने माँग ली थी। जय ने कविता की ओर देखा और बोला , क्या बात है, जानू??
पिक्चर शुरू हो गयी, पर जय का ध्यान कविता के ऊपर था। उसने कविता के बाजू में अपना हाथ रख लिया। कविता खुद खिसक कर जय के करीब आ गयी। थोड़ी देर पिक्चर चलने के बाद फ़िल्म में एक सीन था जिसमे हीरो जॉन अब्राहम दरवाज़ा तोड़के हीरोइन बिपाशा बासु के पास आके उसे किस करने लगता है और फिर सेक्स सीन होता है।
जय ने कविता से पूछा कि दीदी, मुझे तुम से कुछ पूछना है?
कविता ने कहा- हाँ पूछो।
जय – कल की रात तुम जानती थी कि तुम नंगी हो फिर भी तुमने दरवाज़ा क्यों खोला, ये जानते हुए की हम तुम्हारे साथ क्या करेंगे? हाल के अंधेरे में जय ने हिम्मत जुटाकर ये सवाल किया, ये सोचकर कि शायद अंधेरे में कविता उसका चेहरा नहीं देख पाएगी।
कविता- उस वक़्त हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि हम क्या करें। तुम हमको नंगी देख चुके थे। और शायद हमको वासना की तलब थी। ब्लू फिल्म देखकर हम जोश में भी थे। कोई मर्द ही उस समय हमको शांत कर सकता था, दिमाग ने दिल से कहा। और उस समय तुम ही दिखे।
कविता ने जय को गाल पर चुम्मा दिया और उसका हाथ अपने सीने पर रख लिया।
जय- जब हम तुमको चोद…. सॉरी सेक्स कर रहे थे। तब तुम क्या सोच रही थी??
कविता- इसमें सॉरी की क्या बात है, हिंदी में सेक्स को चुदाई ही बोलते हैं। और तुम हमको चोद रहे थे। लड़कियां चुदती हैं और लड़के चोदते हैं। उस वक़्त हम बस ये सोच रहे थे, की कैसे अपनी प्यास बुझाए। तुम्हारा लण्ड जब हमारे बुर में था, तो बहुत मज़ा आ रहा था। जैसे आसमान में उड़ रहे हों। उस समय एक बार भी ग्लानि नहीं हुई। हाँ चुदाई के बाद हुई थी। कविता ने पूरा बेबाक होकर उत्तर दिया, शायद ये हॉल का अंधेरा उनके जीवन मे नया प्रकाश लेके आएगा।
जय – तुम कितनी मस्त हो कविता। कितने खुलेपन के साथ तुमने जवाब दिया है। तुमने लंड का रस कैसे पिया? हमको उम्मीद नहीं थी।
कविता उसकी आँखों मे देखकर बोली- सच कहें तो ये हम ब्लू फिल्मों में देखते थे। कि लड़कियां मूठ पी जाती हैं। हम भी पीकर देखना चाहते थे कि कैसा लगता है। तुम अगर मेरे बुर में निकालते तो माँ बनने का खतरा भी था। हम कहीं पढ़े भी थे कि लड़कियों को मर्दों का मूठ पीना चाहिए, उससे चेहरे में निखार आती है। हमको उसका स्वाद भी बहुत अच्छा लगा।
जय- तुम तो अलग निकली कविता, एक तो तुम हिंदुस्तानी और उसमें बिहारी उसकर ऊपर से ब्रह्मिन लड़की होकर ये सब कैसे कर पाई।
कविता- जब विदेशी लड़कियां ऐसा करती है , तब तुमलोग सोचते हो कि हिंदुस्तानी, लड़कियां ऐसा क्यों नही करती। कर दिया तो आश्चर्य। बिहार ने भारत को ही नहीं विश्व को पहला लोकतंत्र दिया है, तो बिहार की बाला मूठ नहीं पी सकती क्या। वर्ण व्यवस्था तो ढकोसला है, और एक सेकंड को मान भी लें तो सबसे ऊपर हम ब्राह्मिन ही हैं, हर चीज़ की शुरुवात तो हम ही करते हैं। कविता बोलके हसने लगी।
कविता के तर्कों को सुनकर जय चुप ही हो गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वो उसकी दीदी है, जो इन विषयों की भी जानकार है।
कविता बोली- हम बाथरूम से आते हैं। जय ने बोला कि एक और बात पूछनी थी। कविता बोली आते हैं, फिर पूछना।
जय का लण्ड खड़ा हो चुका था, कविता की बातें सुनकर।जय उसका बेसब्री से इंतज़ार करने लगा।
कविता को 5 मिनट बाद आता देख उसको सुकून मिला। कविता आकर बैठी तो जय ने फौरन पूछा, की उस दिन पैंटी क्यों नहीं लाने दी अपने कमरे से?
कविता- उस दिन शर्म आ रही थी, घिन हो रही थी अपने आप से। पर आज नहीं और जय के हाथ मे कविता ने कुछ रख दिया। जय ने गौर से देखा तो कविता की पैंटी थी, जो वो पहन कर आई थी। उसमें उसकी बुर का पानी भी लगा था। कविता बाथरूम जाकर खोल आई थी।
जय- तुम्हें ….
कविता- पता था, की यही पूछोगे।और जय के लण्ड पर हाथ फेरने लगी। वो बिल्कुल कामुक हो चुकी थी।
तब जय ने कविता से एक आखरी सवाल किया- कविता दीदी तुम कमाल हो। पर ये बात पूछनी है, की हमको रफ़ चुदाई अच्छी लगती है, तुमको कैसी पसंद है।
कविता जो कि कामुक हो चुकी थी, और अब पूरी तरह खुल चुकी थी, बोली- शायद हो सकता है कि तुम्हें हमारा जवाब सुनके आश्चर्य लगे पर खुश जरूर होंगे। हमको बिल्कुल ब्लू फिल्मों की हीरोइन की तरह चुदना पसंद है।
मर्द और औरत का जब चुदाई का समा बंधता है तो उसको एक सुखद एहसास सिर्फ औरत देती है। ये औरत पर निर्भर करता है कि वो अपने यार को किस हद तक कि खुशी देगी। मर्द तो हमेशा ही औरतों से कुछ ज़्यादा चाहते हैं, पर क्या वो चुदाई की गहराइयों में उतरकर खुद को भुलाकर अपने साथी को संतुष्टि की चरम सीमा पर पहुंचने में मदद कर सकती है? पहले तो चुदाई का मतलब सिर्फ बुर की चुदाई होती थी।दर असल ब्लू फिल्मों की वजह से आजकल चुदाई के मायने भी बदल गए हैं, अब हर कोई औरत को वैसे ही चोदना चाहता है, जैसे उस फिल्म में हीरोइन चुदती हैं। जिसमे उनकी बुर की चुसाई और चटाई के साथ साथ गाँड़ की चुदाई, गाँड़ से लौरा निकालके उनको चटवाना, उनके मुंह पर थूकना व माल निकालना, चुदाई के दौरान उनको गाल और गाँड़ दोनों पर थप्पड़ मारना, मर्द की गाँड़ चाटना और भी कई तरह से गंदी और घिनौनी चुदाई के जिसे KINKY कहते हैं, शामिल है। अगर कुल मिलाके देखा जाय तो औरतो को चुदाई का सामान समझ लिया गया है। कुछ लड़कियों को ऐसे चुदना पसंद है, हम उनमे से एक हैं।हमको ऐसे ही चुदना है खुलकर,क्या आज ऐसा दो भाई बहन के बीच देखने को मिलेगा? कविता की आंखों में ठरक साफ झलक रही थी।
जय ने अब एक पल भी बर्बाद करना ठीक नहीं समझा और कविता को चूमने लगा। कविता बोली, चलो भाई घर चलते हैं।
जय ने उसका हाथ पकड़ा और पिक्चर आधी छोड़ कविता को घर ले जाने के लिए ऑटो पकड़ ली। दोनों अब बर्दाश्त कर नहीं पा रहे थे।आधे घंटे का सफर मानो एक युग जैसा लग रहा था।