मां बेटी और बेटा CHAPTER 2
आखिर में दोनों घर पहुंच ही गए।जय ने जबतक ऑटोवाले को पैसे दिए तब तक कविता ने दरवाज़ा खोला और अंदर चली गयी। जय दरवाज़े पर पहुंचा तो कविता उसकी तरफ देखके मुस्कुरा रही थी। जय उसके पीछे आया तब तक कविता बाथरूम में घुस चुकी थी, और दरवाज़ा बंद करने लगी। जय दरवाज़ा के पास दौड़ के पहुंचा पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जय ने कविता को आवाज़ लगाई, पर कविता कुछ नहीं बोली। जय कविता के जवाब की प्रतीक्षा कर रहा था। कविता ने फिर कहा, जय सब्र करो, सब्र का फल बहुत मीठा होता है।
जय बोला- अब सब्र नही हो रहा है दीदी।
कविता बोली – जाओ घर का सामान ले आओ लिस्ट किचन में टंगी है। पहले वो काम कर आओ। हम तुम्हारा और हमारा आज का दिन यादगार बना देंगे।जब तुम वापिस आओगे तो तुमको तुम्हारी दीदी नहीं , तुम्हारी कविता जानू मिलेगी। एक नए अवतार में।
जय कविता की बात मानकर, लिस्ट लेके बाजार से सामान लाने चला गया। उसने दरवाज़ा बाहर की ओर से बंद कर दिया। जय बाजार की ओर निकल तो रास्ते में उसे एक तरकीब सूझी। उसने सारा सामान बढ़ा के लेने की सोची। ताकि बाद में फिर उसे एक हफ्ते तक बाहर जाने की जरूरत ना पड़े। रास्ते मे उसे एक मेडिकल स्टोर दिख तो उसने 2 पैकेट कंडोम और वियाग्रा की गोलियां ले ली। जब वो लौट के आया तो कविता अभी तक बाथरूम में ही थी। कविता तभी बाहर निकली, वो इस वक़्त गज़ब ढा रही थी। उसके बदन पे कपड़े के नाम पर एक सफेद तौलिया लिपटा हुआ था। कविता के बाल भीगे हुए थे, आंखों में अपने छोटे भाई में एक मर्द मिल जाने की वजह से एक अजीब कामुकता बसी थी। वो तौलिया उसकी चुचियों को आधा ढके हुए था, यानी ऊपर से आधे खुले थे। चुचियों की ऊपरी अर्ध गोलाइयों उसके यौवन की परिपक्वता की गवाही दे रहे थे।उसकी जांघों का जोर जहां खत्म होता था, वहीं तक तौलिया उसको ढके था। उसकी जाँघे बिल्कुल चिकनी थी।
कविता की नज़र जय की ओर गयी, तो देखी की जय पूरे एक हफ्ते का राशन और सब्जी ले आया था। कविता उसके पास आई, वो जय के हाथों से सामान लेकर किचन की ओर जाने लगी। जय अवाक होक उसे देखे ही जा रहा था।जय ने फौरन दरवाज़ा बंद कर दिया। तौलिया भीगकर कविता के चूतड़ों से चिपक गया था, इस वजह से उसकी चूतड़ों का का दिलनुमा आकार साफ पता चल रहा था। उसकी चाल उसके चूतड़ों के हिलने से बहुत ही सेक्सी लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि कविता के बदन पर तौलिया बस उसके चुचियों और गाँड़ की वजह से टिका हुआ था।जय ने कहा – अबसे एक हफ्ते तक हम घर से बाहर नहीं जाएंगे। और पूरी मस्ती करेंगे। कविता मुस्कुराई, बोली, अच्छा जी!
जय ने अपनी जीन्स और टी शर्ट उतारकर सोफे पर फेंक दी। और कविता के पास किचन में घुस गया। उसने कविता को पीछे से पकड़ना चाहा तो कविता मुड़ गयी। उसने कंडोम के पैकेट को निकाल जो जय लाया था। उसने बोला इसे क्यों लाये हो?? जय- ताकि सेफ रहे हम। तुम कहीं ……. अआ…..वो…. जाओ।
कविता- वो .. वो क्या? कि कहीं तुम्हारा बच्चा हमारे पेट में ना आ जाये।
जय- हाँ, वही .. वही। कविता जय के करीब गयी उसके आंखों में आंखे डालकर बोली, जब तक तुम अपने लण्ड का पानी हमारे बुर में नहीं गिराओगे तब तक इसका कोई डर नहीं, तुम्हारे लण्ड का सारा मूठ तो हम पी जाएंगे। और रही इस कंडोम की बात तो हमारे बीच कोई परत नहीं होनी चाहिए और उस पैकेट को फेंक दी। कविता ने हंसकर कहा।
जय ने कविता के गीले बालों पर हाथ फेरा, शैम्पू की खुसबू आ रही थी। जय ने कविता को कमर से पकड़कर अपनी बाहों में ले लिया। कविता के गुलाबी गालों पर वो हाथ फेरने लगा। कविता ने अपने मुलायम गाल से जय के हाथों पर दबाव बनाकर ये जताया कि वो उसके साथ है। जय ने फिर कविता के होंठो को अपनी उंगलियों से छुआ,उसके होंठ कांप रहे थे एक मर्द के एहसास से। कविता की आंखें अनायास बन्द हो गयी। जय ने कविता के आंखों को चूमा और कहा – आंखें खोलो। कविता ने धीरे से अपनी आंखें खोली। फिर जय कविता के होंठों के करीब अपने होंठ लाया और वो कब मिल गए दोनों को पता ही नहीं चला। दोनों इस चुम्मे में खो गए थे। जय कविता के होंठों को कुल्फी की तरह चूस रहा था। कविता उसके होंठो को ठीक वैसे ही चूस रही थी, जैसे कोई बच्चा चॉक्लेट चूसता रहता है। दोनों एक दूसरे के मुंह में जीभ घुसाके चूस रहे थे। जब सांस उखड़ जाती तो कुछ पल थमते फिर होंठों का रसपान करने लगते। कविता की बांहे जय के गर्दन पर जमी हुई थी। दोनों में से कोई दूसरे को छोड़ने को तैयार ही नहीं था। जय ने आखिर इस सिलसिले को तोड़ा और कविता के गर्दन पर चुम्मों की बौछार कर दी। कविता की चुचियाँ तन गयी थी, जो जय के सीने से रगड़ खा रही थी। जय का दाहिना हाथ कविता के दोनों चूतड़ों को बारी बारी से मसल रहा था। जैसे ही जय का हाथ उसके चूतड़ों पर गया कविता ने सहयोग के तौर पर उसके हाथों पर अपने हाथ रख दिया था। जय ये महसूस करके जोश में आ गया। और कविता का तौलिया निकाल दिया।पलक झपकते कविता नंगी हो गयी। कविता ने अपना चेहरा जय के सीने में छुपा लिया। जय ने कविता के चेहरे को सीने से अलग किया, उसके माथे पर एक किस करके बोला, तुमने ही कहा था कि हमारे बीच कोई परत नहीं होनी चाहिए। कविता कुछ नहीं बोली सिर्फ कामुक होकर अपने दोनों हाथ अपने सर के पीछे रख लिया और खुद एक कदम पीछे हटके खड़ी हो गयी। फिर बोली- सही कहा था, अब देखो हमको।
ऊफ़्फ़फ़फ़ ………………. क्या दृश्य था वो। कविता एक नर्तकी की मुद्रा में थी। कविता की उन्नत चुचियाँ एक दम कड़ी हो चुकी थी, जो कामुकता की वजह से तनी हुई थी। उसने जान बूझकर अपनी चुचियाँ और बाहर निकल थी। चुचियों पर हल्के भूरे रंग के निप्पल अंगूर के जैसे लग रहे थे। चुचियों की गोलाइयां एक दम पके बड़े आमों की तरह थी, जो अपने चूसे जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इस आमंत्रण को जय ठीक से स्वीकार भी नही कर पाया था कि उसकी नज़र कविता के समतल पेट पर गयी। हल्की चर्बी थी, पर वो उसके कमर और पेट को कामुक बना रहा था। जय ने कविता की नाभि की गहराई अपनी आंखों से नापी, जो कि कविता के पेट का मुख्य आकर्षण था।कविता की नाभि अंडाकार और गहरी थी।
जय ये सब देख ही रहा था कि कविता घूम गयी, दूसरी ओर। ये तो बिल्कुल जय के सपने जैसा था, जिसमे एक औरत पीछे मुड़के खड़ी होती थी। पर वो कभी उसका चेहरा नहीं देख पाया था। उसे अब महसूस हुआ कि वो और कोई नही उसकी बहन ही थी। कविता ने अपने बाल आगे कर लिया।और अपनी नंगी पीठ अपने छोटे भाई को दिखाने लगी। कविता के गोरी होने की वजह से उसकी पीठ में कंधे के पास बड़ा सा तिल साफ दिख रहा था। उसके बाद कविता ने अपनी गाँड़ लहराई। कविता के चूतड़ों की थिरकन बहुत सेक्सी लग रही थी। कविता के चूतड़ों का आकार दिलनुमा था। गाँड़ की दरार बहुत सटीक थी। गाँड़ पर भी दो तिल थे। चूतड़ बिल्कुल तरबूज़ जितने बड़े थे। कविता ने अपने चूतड़ों को अलग किया और फिर छोड़ दिया। वो ऐसा चार पांच बार की। फिर अपने चूतड़ों को पकड़के हिलाने लगी। उसे दबाया और हल्के थप्पड़ मारे। जय ये सब देखते हुए अपना लण्ड रगड़ रहा था। कविता पीछे , मुड़ी और बोली, भाई क्या हुआ तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे। अच्छा नहीं लग रहा है क्या तुमको? अपनी चूतड़ को सहलाते हुए बोली।
जय- कोई पागल ही होगा जिसको ये अच्छा ना लगे। दीदी तुम एक दम बढ़िया कर रही हो। क्या शरीर है तुम्हारा। तुमको तो फिल्मों की हीरोइन बनना चाहिए। हम तुम्हारे अंग अंग को पहले जी भरके मन में बसाना चाहते हैं।
कविता- तो फिर देखो लेकिन औरत देखने की नहीं महसूस करने की चीज़ है। आओ हमारे पास और महसूस करो हमको। कविता ने इठलाते हुए कहा।
जय उसके करीब गया और कविता की नंगी पीठ को ऊपर से सहलाते हुए उसकी कमर तक हाथ फेरा। उसकी पीठ पर जो तिल थे, उसे चूमा और एक हाथ कविता की गांड पर दूसरे से कविता की बांयी चूची को थाम लिया। जय ने इसे पहले भी महसूस किया था, पर आज कविता मन से उसका साथ दे रही थी। उसने उसकी गाँड़ और चूची दोनों को खूब मसला। उसके निप्पल को जब वो छेड़ रहा था, तो कविता सीत्कार उठती, इससस्स…………
कविता को पीछे से जकड़े हुए उसने अपना लौड़ा उसकी गाँड़ पर रगड़ने लगा। कविता को अपनी गाँड़ पर अपने छोटे भाई का चुभता लौड़ा बहुत मस्त लग रहा था। उसका एक हाथ उसके लौड़े को अंडरवियर के ऊपर से ही महसूस करने लगा। जय ने कविता को झटके से अपनी ओर घुमा लिया।कविता की गाँड़ की दरार में उसने उंगलिया घुसा दिया। और इधर कविता के अंगूर समान निप्पल्स को मुंह मे रखके चूसने लगा। कविता को अपनी चुचियों को चुसवाने में बड़ा मजा आ रहा था। वो अपनी चूची को उठाके जय के मुंह मे देने लगी। जय उसकी चुचियों को पूरा आनंद से चूस रहा था। कविता- आआआ……… आआहह…… भा…भाई …..चूस…..सो…..। ऊफ़्फ़फ़फ़…… आआहह…. खूब चूसो। बहुततत….. अच्छा लग रहा है।
जय ने उसके आनंद को बनाये रखा, और खूब चूसा। कविता के बुर से पानी लगातार बह रहा था। जय ने उसकी दोनों चुचियों को खूब चूसा। कविता जय के लण्ड को सहला रही थी।
जय ने अपना अंडरवियर उतारना चाहा तो कविता ने उसे रोक दिया। और खुद ही सिंक के पास फर्श पर घुटनो के बल बैठ गयी। जय के लण्ड को अंडरवियर के ऊपर से ही चाटने लगी। उसके लण्ड की खुसबू सूंघ रही थी। जय का अंडरवियर कविता ने गीला कर दिया अपने थूक से।फिर उसने जय के लण्ड को बाहर निकाला अंडरवियर से। जय ने अंडरवियर को फिर निकाल दिया। कविता ने जय के लण्ड को अपने चेहरे पर लगाके उसके साइज को नापा, लगभग पूरा चेहरा की लंबाई कवर हो गया। कविता हंस रही थी, बोली- हमारे चेहरे के बराबर है, तुम्हारा लण्ड।
जय- यही कल रात तुम्हारी चुदाई किया था। और ज़ोर से हंसा। अब खूब चुदोगी इससे।
जय के लण्ड को कविता ने अपने मुंह मे भर लिया। जय का लण्ड चुसाने का ये पहला अनुभव था। कविता ने बिल्कुल वैसे ही चूसना शुरू किया जैसे ब्लू फिल्मों में करते हैं। कविता ने उसके लण्ड को पूरा थूक से नहला दिया। उसका थूक जय के लण्ड से धागों की तरह लटका हुआ था। वो पूरा मन लगाके लण्ड को चाट रही थी।कभी लण्ड के सुपाडे को जीभ से रगड़ती, और चूसने लगती। लण्ड के छेद को जीभ से छेड़ती। फिर लण्ड पर थूककर अपने हाथों से मलती। और फिर लण्ड को मुंह मे भरकर चूसने लगती। कविता चूसते हुए बोली- भाई तुम्हारा लण्ड बहुत मस्त है। एक दम कड़क है, आहहहहह…. हहदहम्ममम्म…. चप….. चप….. उम्म……।
जय कुछ नहीं बोल पा रहा था, उसके मुंह से केवल आआहहहहहहहह………..ऊफ़्फ़फ़फ़…… ओह्हहहहहह…… तुममम्म…… कमाल की लण्डचुस्सकर हो कविताताता…. जानू।
कविता ने फिर जय के लण्ड को पूरा मुंह मे घुसा लिया। और जय को देखती रही। मुंह मे लण्ड होने की वजह से उसके गाल फूल गए थे। और वो तिरछी नज़रो से जय को देख रही थी। कुछ देर वैसे रुकने के बाद उसको उबकाई आयी और पूरा लण्ड बाहर आ गया। लौड़ा पूरा थूक से सन चुका था। कविता की आंखों में इस वजह से आंसू थे और हांफ रही थी। कविता ने जय को देखा और कहा इसे गैगिंग कहते हैं भाई। हम ये खीड़े के साथ किए थे, आज लण्ड के साथ कि हूँ।
जय ने जोश में कहा- हाँ, पता है हमको, हम भी इसका फैन हैं, तुम बहुत मस्त कर रही हो, बिल्कुल ब्लू फिल्म की रंडियों की तरह। सॉरी गाली दी।
कविता- चुदाई का मज़ा तो गालियों के साथ ही आता है। हमको कोई एतराज़ नहीं है, जो मन चाहे गाली दो। बोलके कविता ने फिर लण्ड मुंह मे ले लिया।
जय- क्या बात है मेरे मुंह की बात छीन ली, आजसे तू हमारी रंडी है कविता दीदी। दीदी से रंडी बन गयी है।
कविता फिर लण्ड चूस रही थी, तब जय ने उसके बालों का गुच्छा बनाके कसके पकड़ लिया, जिससे उसके बाल हल्के खींच रहे थे। तब उसने लण्ड को बाहर निकाल लिया, कविता का मुंह खुला था, जय ने उसके खुले मुंह मे थूक की गेंद बनाके गिराया, जो सीधा उसके मुंह मे गिरा। कविता वो जय को दिखाके पी गयी, और बोली- और थूको , प्लीज और दो, मुंह खोल दी। जय ने फिर वैसे ही किया। इस बार भी कविता ने वही किया।
कविता तुम कितनी बड़ी रंडी हो, हमको विश्वास नहीं हो रहा है कि हमारी शरीफ दीदी के अंदर इतनी बड़ी रंडी रहती है। जय बोलकर अपना लण्ड कविता के मुंह पर रगड़ने लगा। उसके पूरे चेहरे को अपने लण्ड पर लगे थूक से भिगो दिया। कविता को ये बहुत ही उत्तेजक लग रहा था। कुछ देर उसके चेहरे पर ऐसा करने के बाद। उसने कविता को बालों से पकड़कर किचन की दीवार से लगा दिया, जिससे वो पीछे पूरी तरह से चिपक गयी, अब वो और पीछे नहीं जा सकती थी। जय ने कविता के मुंह मे लौड़ा डाल दिया। कविता का मुंह पूरा उसके लौड़े से भर गया। कविता के मुंह को जय बेरहमी से चोदने लगा। जय ठोकर मारता तो उसका आंड कविता के ठुड्ढी और होंठों से टकरा जाते थे। कविता की आंखें बिना पालक झपकाए जय की आंखों को निहार रही थी। गर्मी की वजह से दोनों पसीना पसीना हो चुके थे। पर कोई रुकने का नाम नही ले रहा था। जय लौड़ा निकालता और उसपर लगा थूक कविता के चेहरे पर मल देता। कविता के मुंह से थूक के धागे बन बनके फर्श पर गिर रहे थे। जय- क्यों कविता रंडी दीदी मज़ा आ रहा है, चुदाई में।
कविता सिर्फ हल्का सर हिलाके गूँ गूँ गूँ गूँ गूँ गूँ गूँ……… गों गों गों गों करके जवाब दे रही थी।
फिर जय ने कविता को बालों से पकड़े हुए ही उठाया और उसे पकड़के किचन से बाहर ले आया। जय कामुकता से बोला- क्या मस्त रंडी छुपी थी इस घर में और मैं ब्लू फिल्में देखता था। सच मे लड़की में त्रियाचरित्र के गुण होते ही है। साली ऊपर से ढोंग रचती है पवित्र होने का और अंदर से उतनी बड़ी रांड के गुण छुपाये रहती है।
कविता कुछ सोची ये सुनके और हसने लगी, क्या बात बोला तुमने, एक दम सच।
जय कविता को अपने कमरे में ले गया। और उसको बिस्तर पर धकेल दिया।
कविता- अब क्या करोगे हमारे राजा भैया? वो मुस्कुराते हुए कामुकता से बोली। जय- तुम्हारी बुर का स्वाद चखना है। चल अपना पैर फैलाकर बुर को खोल।
कविता- वाह, तुम बुर को चुसोगे, आ जाओ। इस बुर को जूठा कर दो, अभी तक किसीने नहीं चूसा है इसको।
जय ने कविता की टांगों के बीच जगह बनाई और बैठ गया। आज तो दिन में सब खुल्लम खुल्ला हो रहा था। उसने बुर के करीब आके उसको पहले सूँघा। सूंघने से उसमे बुर की सौंधी सी खुसबू आ रही थी। कविता की बुर गीली हो चुकी थी। उसमें से लसलसा पदार्थ बह रहा था, जो कि बुर को चिकना बना रही थी। बुर की दोनों फाँक को कविता ने अलग कर रखा था। अंदर सब गुलाबी गुलाबी था। फैलाने से बुर की छेद हल्की दिखाई दे रही थी। उसने बुर के ऊपर थूक दिया और उसपर खूब माल दिया। उसने करीब 5 6 बार थूका। फिर बुर की चुसाई में लग गया। उसने जीभ से बुर की लंबी चिराई को सहलाना शुरू किया। और अपनी दांयी हाथ की मध्य उंगली उसकी बुर में घुसा दी।
कविता चिहुंक उठी। ऊफ़्फ़फ़फ़ ऊफ़्फ़फ़फ़,………… आआहह, ऊईईईई, आआहह…. आऊऊऊऊऊ। जय बहुत अच्छा लग रहा है। आआहह उसके हाथ जय के सर के पीछे थे, जो जय को बुर की तरफ लगातार धकेल रहे थे।
जय तो कविता की रसीली बुर चूसने में तल्लीन था। जय के मुंह से केवल लप लप लप लप लप …….लुप लुप लुप…… सुनाई दे रहा था।
कविता कामुकता से लबरेज़ अब बकते जा रही थी- जय और चूसो खूब …. आआहह ऐसे ही…..ऊफ़्फ़फ़फ़….. ऊउईईई।जय की उंगलियां उसके बुर की गहराई में उतार रही थी। जय कभी उसके बुर के दाने को चूसता, कभी दांतो से हल्का काट लेता। ऐसा करके वो कविता को चरम सुख की ओर ले जा रहा था। वो बुर को पूरा मुंह मे भरके लपलपाती जीभ से चाट रहा था। तभी कविता ने उसके सर को अपनी जांघों के बीच जकड़ लिया, और दोनों हाथों से उसके सर को बुर पर धकेलने लगी। एक चीख आईईईईईईईईई, के साथ, वो फिर निढाल हो गयी।
कविता ने अपने भाई को अपने बांहों में भर लिया । जय ने बोला- बिना लण्ड लिए ही झड़ गयी।
कविता- उसका टाइम भी आएगा भाई, सब्र करो। हम रात के लिए कुछ तो बचाके रखे।
जय- फिर इसे कैसे मनाऐं ? लण्ड की ओर इशारा करके बोला।
कविता- इसका पूरा रस बचाके रखो। अब से वो हमारा है। रात को इसको हम मनाएंगे। जय के लण्ड और आंड को सहलाते हुए बोली। उसके माथे को चूमी और उसका सर अपनी चुचियों में छुपा लिया।
कविता और जय यूँही लेटे हुए सो गए। तब शाम के करीब 5 बज रहे थे। जय कविता के चुच्चीयों पर सर रखके सोया था। कविता की चुच्चियाँ अभी भी तनी हुई थी। जय का सर दोनों चुच्चीयों के बीच में था। कविता का दाहिना हाथ उसके सर पर था। जय का दाहिना हाथ कविता के बुर पर रखा था। जय के मुंह और चेहरे पर कविता की बुर के रस चिपके हुए थे, उसके मुंह मे कविता के बुर की महक आ रही थी। कविता का मुंह खुला हुआ था। उसके बाल बिखरे हुए थे, जय ने उसके बालों को उसकी मुंह की चुदाई के लिए हैंडल की तरह इस्तेमाल जो किया था। जय का लण्ड अभी थोड़ा शांत था, हालांकि जय ने अभी तक अपने लण्ड का रस नहीं निकाला था। उसके आंड में वीर्य कुलबुला रहे थे। दोनों बिहारी भाई बहन हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में एक नया इतिहास लिख रहे थे। एक दूसरे पर नंगे परे भाई बहन नींद की गहराइयों में सोए हुए थे, कि तभी कविता के मोबाइल की घंटी बजी जो कि बाहर हॉल में सोफे पर पड़ी थी। कविता की नींद खुली, लेकिन जय अभी भी सो रहा था। कविता ने जय की टेबल पर रखी उसकी रिस्ट वॉच में मिलमिलाती आंखों से टाइम देखा तो शाम के सात बजे चुके थे। उसने जय को देखा और उसके हाथ को अपने बुर से हटाया। फिर उसके सर को उसके आहिस्ते से हटाया, तो जय करवट मारके दूसरी साइड सो गया। कविता बिस्तर से उठी, उसके कोई भी कपड़े वहां नहीं थे। जय का तौलिया था, जो वो लपेट के बाहर आयी। उसने मोबाइल उठाया तब तक फ़ोन कट चुका था। उसने देखा कि उसकी माँ का फोन था। कविता अपने फोन से जब तक डायल करती, तब तक उधर से फिर फोन आ गया।
कविता- हेलो। माँ प्रणाम।
ममता- खुश रहो। कैसी हो?
कविता- ठीक हैं, माँ। तुम कहाँ पहुंची?
ममता- अरे ये ट्रेन बहुत लेट है। सुबह तक पहुंचाएगा। और जय कैसा है?
कविता- वो भी ठीक है। तुम खाना खाई?
ममता- हाँ, खाये थे। ट्रेन में ही खाना दे रहा था। तुमलोग खाना खाए कि नहीं?
कविता- हाँ, खाये हैं दोनों लोग।
कविता को ज़ोर से पेशाब लगी थी। वो अपने दोनों पैर को भींच रही थी। वो प्रतीक्षा कर रही थी कि कब ममता फोन काटे।
ममता- ख्याल रखना दोनों, हम पहुँचके फोन करेंगे।
कविता- अच्छा मां, प्रणाम रखते हैं।
कविता ने फोन काटा और भागके बाथरूम गयी। तौलिया कमर तक उठा लिया, जिससे कमर के नीचे का हिस्सा पूरा नंगा हो गया और उसकी गाँड़ फुदक कर बाहर आ गयी। उसने शीट पर बैठके अपने बुर से मूत की धार मारी। एक सीटी के जैसे हल्की आवाज़ गूँजी मूत की धार निकलने से पहले। कविता ने अपना मूतना खत्म किया और पानी से बुर को साफ करने लगी। बुर साफ करने के बाद उसने खुदको आईने में देखा। बाल बिखरे हुए थे, काजल निकल गया था, लिपस्टिक का पता ही नही चल रहा था। वो खुद को देख रही थी, तो उसे लगा कि उसका अक़्स उससे ये कहना चाह रहा है कि तुम कैसी लड़की हो कविता सारे ज़माने में तुमको अपना भाई ही मिला इश्क़ लड़ाने और चुदवाने के लिए?
कविता ने अपने मन में ही उत्तर दिया, तो क्या हुआ कि वो हमारा भाई है। प्यार रिश्ते देखकर थोड़े ही होता है। तुम क्या चाहती हो कि हम उस आरिफ के साथ प्यार करें या उस बैंक मैनेजर से जो सिर्फ हमसे अपनी हवस मिटाना चाहते हैं। बाहर ये सब करेंगे तो घर की बदनामी होगी, और दुनियावाले ना जाने क्या क्या बोलेंगे। यहां तो घर की बात घर में ही रहेगी। वैसे भी हम छब्बीस साल के हो चुके हैं, और इस शरीर को चुदाई की भूख तो लगती है ना। कबतक हम बैगन और गाजर से काम चलाएंगे। एक मर्द का एहसास तुमको क्या पता, शरीर की तड़प क्या होती है। हमारे भाई की आंखों में हमने सच्चा प्रेम देखा है अपने लिए। और ये बात तुम भी जानती होकि हम भी तीन साल से उसको चाहते हैं, ये और बात है कि हमने कभी उसको पता नहीं लगने दिया। जानती रहती थी कि उसने हमारी कच्छी में मूठ मारी है, और वही कच्छी हम खोजके पहनते थे।अब हम दोनों के बीच में रिश्ते अलग मोड़ ले चुके हैं। समाज भले ही हमे भाई बहन बुलाये पर अब हम दोनों प्रेमी प्रेमिका हैं। कविता ने अपने अक़्स को मुंहतोड़ जवाब दिया।
कविता ने फिर झुककर अपना चेहरा पानी से धोया, और बाहर आ गयी। बाहर आके उसने लाइट जलाई। और अपने कमरे में जाकर उसने शलवार और कमीज पहनी। अभी ब्रा पैंटी कुछ नहीं पहनी। बाल बनाये, चेहरे पर क्रीम और पाउडर, आंखों में काजल लगाया। फिर खुदको आईने में देखा, संतुष्ट होकर उठ गई। माथे पर दुप्पट्टा रखके पूजा घर में पहुंच गई। उसने दिया जलाया और अगरबत्ती जलाई। फिर घर मे सांझ दी,जैसा कि बिहार के घर की लड़कियां करती हैं। फिर बालकनी में रखे तुलसी को भी दिया दिखाया। इसके बाद पूरे घर मे दिया को घुमाया। कविता जब दिया लेके जय के कमरे में गयी तो जय अभी भी सो ही रहा था। कविता उसे देखके मुस्कुरा उठी, क्योंकि उसका लण्ड तना हुआ था। कविता ने उसे उठाया नहीं। सांझ देने के बाद कविता सीधे रसोई में घुस गई। वो सोच रही थी, की जय के उठने से पहले खाना बना ले। कविता ने फौरन पनीर की सब्जी बनाई और रोटियां। उसे तकरीबन 45 मिनट लगे खाने बनाने में।
वो अपने माथे का पसीना पोंछते हुए बाहर आई, और पंखे के नीचे बैठ गयी। दुप्पट्टा निकाल दिया और अपने कमीज को ऊपर की ओर से फैलाया, ताकि अंदर तक हवा जाए। कविता थोड़ी देर ऐसे ही बैठी रही। तभी कविता की आंखों को पीछे से दो हाथों ने ढक लिया। कविता मुस्कुरा उठी। जय जाग चुका था। जय उसके कानों के पास आया और बोला, आई लव यू । कविता उसके हाथों को हटाके उसके हाथों को चूमते हुए बोली, लव यू टू ।
जय उसके बाजू में आके बैठ गया और टी वी ऑन कर दिया। इस वक़्त वो अपने गंजी और हाफ पैंट में था जो उसने कमरे से निकलने से पहले पहन लिया था। जय ने कविता के कंधों पर हाथ रख दिया, कविता खुद उसके पास खिसक के चिपक गयी। कविता ने अपने भाई के गठीले बदन को गौर से देखा। कोई 38 का सीना होगा उसका, उसके बाइसेप्स भी काफी टाइट थे। जय के चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी, पर फिर भी वो चॉकलेटी बॉय लग रहा था। टी वी पर इस वक़्त वही ब्लू फिल्म शुरू हुई जो जय देखने बैठा था, जब आरिफ एसोसिएट्स से फोन आया था। वो वैसे ही छोड़ के चला गया था। उसमें हीरो हीरोइन को ज़मीन पर लिटाके चोद रहा था। लड़की के ठीक पीछे लड़का लेटा हुआ था। दोनों करवट लिए हुए थे। लड़की , जोश में फ़क मी, फ़क मी चिल्ला रही थी। हीरो उसको पीछे से पकड़े हुए था, और खूब ज़ोरों से चोदे जा रहा था। लड़की खूब मस्ती से चुदवा रही थी। तभी लड़का बोला, आई एम गोंना कम….. बेबी….आआहह। और खड़ा हो गया, लड़की फुर्ती से उठकर घुटनों पर बैठ गयी।
हीरो अपना लण्ड हिला रहा था और हीरोइन, उसके आंड सहलाते हुए कह रही थी, गिम्मी योर कम प्लीज……प्लीज……आई एम थ्रस्टी। और अपना मुंह खोलके जीभ से होंठों को चाट रही थी। हीरो उसके बाल पकड़े हुए उसके मुंह के पास लण्ड हिला रहा था। तभी उसके लण्ड से मूठ की धार निकली और हीरोइन के मुंह और चेहरे पर गिरी। इस तरह करीब 4 5 बड़ी धार निकली और उसके पूरे चेहरे को भिगो दिया। हीरोइन ने पहले पूरे मूठ को मुंह पे लगाया और फिर इकट्ठा कर पी गयी। वो उंगलिया चाट ही रही थी, की स्क्रीन धुंधली हो गयी और वो सीन खत्म हुआ। दोनों भाई बहन ये सीन देखके गरम हो गए थे। पूरे कमरे का माहौल कामुक हो चला था। तभी दूसरा सीन शुरू हुआ कि कविता की हल्की हंसी छूट गयी, बोली, खाना नहीं खाओगे कि यही देखने का इरादा है।
जय, बोला कि, खाना भी है और खिलाना भी है।
कविता- सिर्फ खाओगे, पियोगे नहीं क्या?
जय- पियूँगा लेकिन तू क्या पीयेगी?
कविता- तुम जो पिलाओगे, पियेंगे।
जय वासना में लीन होकर पूछा- कितना पियोगी?
कविता कामुकता से कांपते हुए बोली- जितना पिलाओगे।
जय- क्या पियोगी? कविता- वही जो अभी उसने पिया।
जय- बोल ना साली उसने क्या पिया, शर्म आ रही है क्या?
कविता ने पूरी बेशर्मी से उसके लंड को छूकर आंखों में आंखे डालकर बोली- तुम्हारा मूठ पियूंगी। आखरी बूंद तक चूस जाऊंगी।
जय और कविता एक दूसरे की आंखों में देखकर ये सारी बातें कर रहे थे। जय ने कविता के होंठो को छुआ तो कविता ने उसकी उंगली मुंह में रख ली। और उसको चूसने लगी। टी वी से लड़की की चुदाई के दौरान मुंह से निकली सीत्कारे पूरे कमरे में गूंज रही थी। कविता अपने भाई की गंजी उतार दी, और उसकी मज़बूत छाती को अपने हाथों से सहलाने लगी। जय ने कविता के कमीज की डोरियां खोल दी। उसकी कमीज को उठाके निकालने लगा। कविता ने अपने दोनों हाथ ऊपर करके उसका सहयोग किया। चुकी उसने अंदर अंडरगारमेंट्स नहीं पहने थे, तो उसकी गोरी चुच्चियाँ एक दम नंगी हो गयी। जय ने दोनों चुच्चियों को दोनों हाथों से पकड़ लिया। और कसके दबाने लगा। कविता सीत्कार उठी………… आआहह ह ह ह ह ह ह …….. जय ने उसके दोनों चुच्चियों का मर्दन चालू ही रखा। कविता की आंखे बंद होके, चेहरा छत की ओर ऊपर हो गया था। जय को चुच्चियों को मसलने में बड़ा मजा आ रहा था। जय ने उसकी चुच्चियों को लाल कर दिया। पर कविता कोई शिकायत नहीं कर रही थी। कविता की चुच्चियाँ कड़क हो चुकी थी और निप्पल्स भी। कविता के मुंह से कामुक सीत्कारों के अलावा और कुछ नहीं निकल रहा था। तब जय ने अपनी बहन को अपने गोद मे बैठने को कहा। कविता उछल कर उसकी ओर मुंह करके उसके गोद मे बैठ गयी। कविता ठीक उसके लण्ड पर बैठ गयी, जोकि सीधा उसके गाँड़ के दरार में सेट हो गयी। कविता ने अपने भाई के हाथों को थाम लिया और उसे अपनी चुच्चियों पर ज़ोर से दबाने लगी।
कविता- भाई….. आआहह…… और मसलो आईईईईईईईईई, ऊऊह। बहुत अच्छा लग रहा है। तभी जय ने उसकी चुच्चियों पर एक थप्पड़ मारा, और पूछा- अब कैसा लगा?
कविता- आआहह……. अच्छा लग रहा है।
कविता की चुच्चियाँ लाल हो गयी थी। पर जय ने उसकी चुच्चियों पर 5 6 थप्पड़ मारे। कविता को इसमें एक अजीब आनंद मिल रहा था।
जय ने फिर कविता की एक चुच्ची को मुंह मे भर लिया, और उसे ज़ोर ज़ोर से चूसने लगा। कविता को तो बस यही चाहिए था। अपने भाई को अपनी चुच्ची पकड़के पिलाने लगी। कविता- आआहहहहहहहहहह भैया चूस लो, अपनी दीदी की चुच्चियों को। जितना मन चाहे पियो।
जय कविता के निप्पल को छेड़ रहा था जीभ से, हलका दांत भी गदा रहा था, बीच बीच में। कविता की दूसरी चुच्ची का मर्दन जारी था। कविता उसके सीने को सहला रही थी। उसकी बुर से पानी बहने लगा था। जो उसकी सलवार को भिगा रहा था। कविता ने तभी अपने हाथ ऊपर किये और अपने बालों को खोलने के लिए क्लचर निकालकर टेबल पर रख दिया। जब उसने हाथ उठाये तो जय की नज़र उसकी काँखों पर परी। उसकी काँखों का रंग उसके बाहों के रंग से हल्का गहरा और सांवला था। कांख में बाल एक दम हल्के थे।उसमें से हल्का पसीना चू रहा था। वो बहुत ही सेक्सी लग रहा था। जय ने चुच्ची को अब तक खूब चूस लिया था। उसने कविता की काँखों में जीभ से चाटा। स्वाद हल्का नमकीन था पसीने की वजह से। जय को उसकी कांखे बहुत उत्तेजक लग रही थी। जय ने वहाँ पर फिर चुम्मा किया। कविता को गुदगुदी हो रही थी, वो हंस भी रही थी। पर अपनी काँखों को पीछे नहीं किया। जय ने कविता को हाथ ऊपर उठाएं रखने के लिए कहा। कविता बोली- ऊउईईई…… ऊफ़्फ़फ़फ़….. अपनी बड़ी बहन की कांख को चाटने में मज़ा आ रहा है, ये तो हम कभी सोचे नहीं थे।
जय- बहुत आआहह हहहहहहहह,,….. मस्त लग रहा है चाटने में।
कविता अपनी कमर धीरे धीरे हिला रही थी। जय ने एक हाथ से कविता के सलवार का नारा खोल दिया। और उसके बड़े मस्त चूतड़ों को सहलाने लगा। जय ने कविता के काँखों में थूक दिया, और कविता ने उसे पूरे कांख में मल दिया। कविता ये सब खुलकर हंसते हुए कर रही थी। कविता की ये हरकत बहुत ही कामुक थी। उसने अपने दोनों काँखों पर जब उसका थूक रगड़ लिया। जय ने कविता के मुंह के पास अपना हाथ लाया।कविता उसका इशारा समझ गयी। उसने ढेर सारा थूक उसकी हथेली पर मुंह से गिरा दिया। फिर खुद भी उसमे थूका। जय ने उसे कविता की गाँड़ की दरार में मल दिया। कविता अब बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। उसकी गाँड़ जय के लण्ड को तेजी से रगड़ रही थी। उसकी कमर की हरकत तेज़ हो चली थी। आखिर में उसने जय के आंखों में देखा और, लगभग भीख मांगते हुए बोली- अब बर्दाश्त नही हो रहा है। आआहह हहहहहहहह भाई प्लीज अब अपनी बहन को चोद दो।
जय- चल पहले अपनी सलवार उतार।
कविता उसकी गोद से झट से उतर गयी। और अपनी सलवार उतार दी। कविता पूरी नंगी हो चुकी थी। उसके बाल खुले हुए थे। चेहरे पर कामुकता के भाव साफ दिख रहे थे। जय ने अपना अंडरवियर उतार के फेंक दिया। दोनों भाई बहन अपने घर के हॉल में नंगे हो चुके थे। कौन जान सकता था कि उस फ्लैट के अंदर दो भाई बबहन एक दूसरे की जवानी का आनंद उठा रहे हैं। कविता अपनी बुर को हाथ से रगड़ रही थी। जय ने कहा- थूक लगा तू अपनी बुर पर। कविता ने अपनी हाथों से मुंह से थूक निकालके अपने बुर और जय के लण्ड पर लगाया। और जय के गोद मे वापिस चढ़ गई। उसकी बुर से तो कोई नदी खुल चुकी थी। कविता ने उसके लण्ड को बुर में घुसा लिया। जय कविता को कमर से कसके पकड़े हुआ था।
कविता लण्ड घुसते ही पागल हो उठी- उम्म्म्म्ममम्ममम्म…… ऊऊईईईईईईईई…… ऊफ़्फ़फ़फ़ ककक्याआ एहसास हहहहै। ओह्ह। भाई तुमको मज़ा आ रहा है ना। कविता धीरे धीरे उसके लण्ड को बुर में घुसाए हुए अपनी गाँड़ हिला रही थी।
जय को कविता के चेहरे पर वासना की परत साफ दिख रही थी, वो खुद भी उसके गिरफ्त में था। जय कविता के चुचियों को मसल रहा था। कविता से बोला- तुम इस वक़्त कितनी मस्त लग रही हो, जैसे कोई सांप चंदन से लिपट रहता है, ठीक वैसे ही हमसे चिपकी हुई हो। तुम हमेशा ऐसी ही रहो। कितना मज़ा आ रहा है तुम्हारे बुर का एहसास पाकर। तुम कमाल हो दीदी।
कविता अब उसके लण्ड पर खूब कूद रही थी। उसके लैंड को अपनी बुर की गहराइयों में उतार रही थी।
कविता- तुम्हारा लण्ड……. हमारे बुर के पूरे अंदर है। हम मस्त हो रहे हैं तुम्हारे लण्ड से। हम कैसे हैं, हाई अपने ही भाई के लण्ड से चुदवा रहे हैं। हमको तो कहीं जगह नहीं मिलेगी। कविता हांफते हुए बोल रही थी। वो लण्ड पर लगातार उछल रही थी, जिससे उसके बुर में लण्ड अंदर बाहर हो रहा था।
जय अपनी बहन के चूतड़ पर एक चाटा मारा। कविता और जय दोनों इस उत्तेजना में बह रहे थे।
जय ने कविता की चुच्चियाँ पकड़े हुए कहा- हां तुम को कहीं और जगह नहीं मिलेगी, सिर्फ हमारे लण्ड पर मिलेगी। तुम तो एक नंबर की छिनार निकली। साली कुत्ती कहीं की। बुर में छब्बीस साल की आग को आज हम मिटा देंगे। जितना चुदना है चुदो, कोई रोकने वाला नहीं है।
कविता- ऊफ़्फ़फ़फ़, हाय हमारा भाई ही हमको गालियां देके चोद रहा है। आआहह हहहहहहहह…..हहदहम्ममम्म लेकिन हमको शर्म नही आ रही है। बल्कि बुर और पानी छोड़ रही है। कैसी लड़की हैं हम, बहुत गंदी, आआहह हहहहहहहह
जय- गंदी नहीं तुम रंडी हो। अपने भाई की रांड बन बैठी हो। अपने भाई की रखैल बनोगी कविता।
कविता- बनूँगी?? बन चुकी। आजसे हम तुम्हारी रखैल। अपने ही भाई की रखैल बनने का मज़ा ही कुछ और है। कविता अपने चूतड़ों को रगड़ते हुए बोली। जय ने कविता को कहा- सुनो, अब तुम उतरो । कविता बोली- क्यों भाई इतना मज़ा तो आ रहा है।
जय ने उसके बाल पकड़ लिए और बोला- अरे साली, खुद ही चुदति रहेगी या हमको भी चोदने देगी। कविता के बाल पकड़े हुए ही जय खड़ा हुआ, और कविता को सोफे पर बैठने का इशारा किया।
जय- चल चूस ये अपनी बुर के रस से सना हुआ लौड़ा। कविता ने लण्ड को पकड़ना चाहा तो जय ने उसको एक थप्पड़ मारा और बोला- तुम इसको अपनी जीभ से साफ करो, अपने हाथ से लण्ड पकड़ेगी तो पूरा चाट कहाँ पाओगी। कविता ने लपलपाती जीभ से उसके पूरे लण्ड को चाट लिया। सारा रस पी गयी। जय ने फिर कविता को बोला चल कुतिया बन जा।
कविता सोफे पर ही पीछे मुड़ गयी। घुटनो के बल बैठी सोफे की पीठ पकड़के। कविता इस पोजीशन में कमाल लग रही थी। उसकी गाँड़ ऊपर की ओर उठी थी। जय ने उसकी गाँड़ पर सटासट 8 10 थप्पड़ मारे। कविता से बोला- गाँड़ और बाहर निकाल छिनार साली।
कविता की गाँड़ लाल हो गयी। कविता को दर्द हो रहा था, पर दर्द और कामुकता के मिश्रण से उसके चेहरे पर आया भाव उसको और चुदक्कड़ बना रहा था। जय ने कविता की गाँड़ को फैलाया। सामने कविता की गाँड़ का छेद दिख रहा था। जय ने उसपे थूका, उस चुलबुली, झुर्रीदार गहरी भूरी छेद पर थूक पूरा फैल गया। और सडकते हुए उसकी बुर पर चला गया। और दो चार बार थूकने से वो पूरी गीली हो गयी। जय ने कविता की बुर में अपना लण्ड घुसा दिया। लण्ड घुसते ही फिरसे कविता काम सुख के अथाह समुंदर में गोते खाने लगी।
जय उसके बालों को पीछे से किसी घुड़सवार की तरह पकड़े हुए खींच रहा था। जय ने कविता की गाँड़ को देख तो कल रात की बात याद आ गयी। उसने लण्ड निकाल लिया और किचन की ओर जाने लगा। कविता को कुछ समझ नहींआया, वो बोली,” कहाँ जा रहे हो?
जय ने कुछ नहीं कहा, बल्कि तुरंत लौट आया बर्फ के टुकड़ों के साथ। बर्फ का टुकड़ा निकालके उसने कविता की गाँड़ में उस टुकड़े को ठूसने लगा। कविता को बस ज़रा सा दर्द हुआ, और वो टुकड़ा गाँड़ में घुस गया। जय ने पूछा- कैसा लग रहा है दीदी? कविता बोली- तुम लण्ड डालो ना बुर में, प्लीज। जय ने कहा- पहले हम जो पूछे हैं उसका जवाब दो। कविता- जैसे किसीने हमारी गाँड़ में बर्फ डाल दिया हो और ज़ोर से हंसी। जय ने एक एक करके तीन बर्फ के टुकड़े डाल दिये। और फिर लौड़ा कविता की बुर में डालके चोदने लगा। कविता एक हाथ से सोफे को पकड़ी थी, दूसरे से अपने दाहिने चूतड़ को। वो पीछे मुड़के अपने भाई की आंखों में आंखे डालके चुदवा रही थी। अब जय ज़ोर ज़ोर से धक्का मार रहा था, और कविता भी अपनी गाँड़ पीछे करके धक्के खा रही थी। ताकि लण्ड पूरा अंदर तक जाए।
जय कामोन्माद में बड़बड़ा रहा था- क्या बुर पाई है हमने तेरी कविता, तुमको चोदकर हम बहनचोद हो गए। क्या मज़ा आ रहा है अपनी सगी बड़ी बहन को नंगा करके चोदने में। दुनिया के लिए हम तुम्हारे भैया, पर घर के अंदर हम सैयां हैं तेरे।
कविता- हाँ भैया…….. सॉरी सैयां। अबसे तुम सच मे हमारे सैयां हो। और हम तुम्हारी क्या हैं भैया?
जय- तुम सजनी हो और क्या?
कविता – नहीं, हम तुम्हारी रररर….. । जय ने बोला- बोल शर्मा क्यों रही है, क्या चाहती है हम बोलें?
कविता- हाँ, तुम कहो। जय- तुम हमारी रखैल हो, रंडी कहीं की। रांड हो तुम कुत्ती साली।
कविता- आआहह……. जब गालियां देते हो तो बुर से और पानी निकलता है। हम तुमको बहनचोद बनाये हैं। अपनी बहन का चुदक्कड़पन रंडिपन कैसा लग रहा है।
जय- विश्वास नहीं हो रहा है कि तुम हमारी सीधी साधी दीदी हो। कितनी बड़ी रंडी हो तुम। अपने घर मे सबको ऐसी बहन मिल जाए तो कोइ बाहेर क्यों जाएगा। सच कहते हैं, वक़्त रहते लड़की की शादी हो जानी चाहिए, नहीं तो लड़की को बचा पाना मुश्किल है।
कविता अपने बारे में इतनी गंदी और घिनौनी बाते सुनकर, और कामुक हो उठी। वो अब चरम सुखके करीब थी। भाई और ज़ोर से धक्के मारो, बहुत मज़ा आ रहा है। हमारा छूटने वाला है। जय ने बोला कि हमारा भी छूटेगा, बस हो ही गया है।
कविता बोली, देखो उस फिल्म में भी हीरो का छूटने वाला है। आआहह हहहहहह, भाई तुम कितना मस्त छिड़ रहे हो, आईईईईईईईईई……..एआईईईई, आआहह हहहहहहहह
कविता का निकल चुका था। जय को महसूस हुआ कि कविता की बुर उसके लण्ड को चूस रही है। जय ने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया, और कविता फुर्ती से उसके लण्ड के पास अपना चेहरा ले आयी। जय कुछ बोल नहीं पाया, कविता के खुले मुंह मे उसने 8 10 झटको के साथ अपने आंड का रस गिरा दिया। जय की टांगे कांप रही थी, कविता उसके लण्ड को पकड़के चूस रही थी, आखरी बूंद तक वो चूसती रही। जय कविता को देखके मुस्कुराया। और खुद सोफे पर बैठके उसे अपनी गोद मे बैठा लिया। कविता भी उसे देखके मुस्कुराई- बहुत मज़ा आया हमको, हमने पहले क्यों नहीं किया ऐसा? कविता उसके गाल को सहलाते हुए बोली।
जय हाँफते हुए- दीदी सारी कसर पूरी कर देंगे इस एक हफ्ते में। कोई है नही घर पर माँ भी नही और तुम्हारी छुट्टी भी है।
कविता का मुंह खुला रह गया- मतलब? दिन रात चुदाई ही चुदाई होगी।
जय- हाँ, तुमको अभी बहुत चोदेंगे ।
कविता – यही बात है तो पहले खाना खा लेते हैं, ताक़त भी तो चाहिए। उसके गोद से उतरने लगी। जय ने कविता को उतरने दिया। कविता उतरके अपने कपड़े पहनने लगी, तो जय ने उसके हाथ से कमीज ले ली, और कोने में फेंक दिया। कविता बोली- ये क्या?
जय- ससससस, कपड़ो की ज़रूरत नहीं है दीदी। फिर हम उतार ही देंगे। जाओ ऐसे ही खाना लगाओ। हम भी ऐसे ही रहेंगे और तुम भी, जब तक हम दोनों अकेले रहेंगे। बस पूजा करते टाइम कपड़े पहनना फिर तुरंत नंगी हो जाना।
कविता- तुम तो बहुत शैतान हो भाई, पर आईडिया ठीक है।
कविता फिर फर्श पर बिखरे कपड़ों को उठाके रूम में रख आयी। जय रूम से अपनी हार्ड ड्राइव ले आया जिसमे पोर्न भारी हुई थी। कविता नंगी ही खाना निकाल रही थी। थोड़ी देर में कविता मटकती चुचियों के साथ नंगी ही जय को थाली देने आ गयी। कविता को उसने झटके से गोद मे बिठा लिया। कविता- हमको अपनी थाली लाने दो।
जय- तुम इसीमे खाओगी, और हम जो निवाला चबाकर देंगे उसको ही खाओगी। तुम हमको मुंह मे निवाला डालके दो। कविता ने एक निवाला बनाके दिया। जय उसे अपने मुंह मे चबाकर आधा कविता को किस करके उसके मुंह मे दे दिया। कविता को ये बड़ा मज़ेदार लगा। कविता फिर निवाला बनाके जय को दी, जय ने फिर वैसे ही किया।दोनों भाई बहन नंगे सोफे पर बैठके खाना खाने लगे।
कविता- तुमको ये कैसे सूझा ?
जय- ये सब इस खुराफात दिमाग की उपज है। अभी और चीज़े हैं। तुम्हारे लिए कुछ नियम लागू होंगे कल से।
कविता- कैसे नियम??
जय- बताते हैं।
क्या हैं वो नियम, आखिर जय कविता के साथ क्या क्या करने वाला है??
जानेंगे अगले अपडेट में।
जय अपनी बहन को अपने गोद में नंगी बैठाए हुए था। उसका लण्ड कविता की गाँड़ के नीचे दबा हुआ था। कविता अपने भाई के मुंह मे चबाया हुआ निवाला बड़े शौक़ से खा रही थी। उसे ये बहुत उत्तेजक और अलग लग रहा था। आखिर कोई बहन अपने ही भाई के गोद मे नंगी बैठके ऐसे खाना थोड़े ही खाती है। जय जब उसे निवाला देता था, तो उसको चुम्मा भी लेता था। कविता इसमें बड़े मजे से चुम्मा दे रही थी। जय बीच बीच में कविता की लटों को संवारता भी था। कविता बोली- ऐसे खाने में हमको मेहनत ही नहीं करनी पड़ेगी, सब तुम चबाके दे रहे हो। जय- ऐसे जूठा खाने से प्यार बढ़ता है, कविता दीदी। कविता – तुम हमको बस कविता कहो ना, अब तो तुमको पूरा हक है। जय- जानते हैं, पर इस रिश्ते में रहकर जब हम तुमको चोदते हैं तभी तो मज़ा आता है। कभी सोची हो कि तुम इतनी उत्तेजना में क्यों आ जाती हो जब तुम चुद रही होती है। क्योंकि तुम अपने सगे छोटे भाई से काम क्रीड़ा कर रही होती हो। ये जो रिश्ता हमारे बीच है, हमारी चुदाई में गरम मसाला के तरह है, जो हमारी चुदाई को मसालेदार बना देती है। इसीलिए जब चुदाई के दौरान कभी तुम्हे कविता दीदी या रंडी बोलते है, भाई बहन का पवित्र रिश्ता ताड़ ताड़ और ज़लील होता है। तभी तो तुम्हारी बुर और पानी छोड़ती है।
कविता हंसी और जय को चुम्मा लेते हुए बोली- सही कहा भैया, चुदाई तो पति पत्नी भी करते हैं, गर्लफ्रैंड और बॉयफ्रेंड भी करते हैं, पर उसमे चुदाई वैध है। पर भाई बहन के रिश्ते में तो चुदाई का सवाल ही नहीं उठता। तभी तो मज़ा आता है इतना तुमसे चुदने में। हाय देखो ना सुनके ही चुच्चियाँ तनने लगी।
जय- हाँ दीदी इसलिए हम इस रिश्ते को बनाये रखेंगे। और ये हमारी सच्चाई भी है। हमारा लण्ड भी तनने लगा है, तुम्हारी बुर से सटके।
कविता- भाई तुम कितने अच्छे हो ।
दोनों ने खाना लगभग एक घंटे में खाया। कविता थाली लेके उठने लगी। उसने उठकर जय के लण्ड को छू लिया, और हंसते हुए किचन की ओर जाने लगी। जय ने कविता को पीछे से देखा, जब वो चल रही थी तो उसकी गाँड़ हिलोडे मार रही थी। कभी उछलके दांये तो कभी बायें। जैसे किसी धुन पर नाच रही हो। कविता की गाँड़ थी भी बहुत मस्त। उन मस्त बड़े चूतड़ों से उसका यौवन खूब निखर जाता था। बड़े बड़े तरबूज़ जैसे थे उसके चूतड़। चलते वक़्त उसकी चाल की वजह से चूतड़ों में जो कंपन होती थी, तो किसी भी मर्द का दिल आ जाये। यहाँ तो खैर वो नंगी चल रही थी, जो जय को पागल बना रही थी। कविता की आवाज़ जब उसके कानों से टकराई, तो वो होश में आया।
कविता- दूध पियोगे ना भाई, हम लेके आ रहे हैं।
जय शैतानी से – तुम्हारे पास दूध है??
कविता पूरी गंभीरता से बोली – हाँ, भाई है ना। बहुत है 1 लीटर। आज तो ज़्यादा भी है।
जय- पर हमको तो दिखा नहीं। कविता- भाई, है बेफिक्र रहो, हम रखे हैं।
जय – है पक्का ना?
कविता की दिमाग की बत्ती तब जली, वो दरवाज़े पर आई थप्पड़ का इशारा किया और जय से झूठा गुस्सा दिखाते हुए हंसकर बोली, आते हैं , खूब पिलायेंगे तुमको हम दूध। जय ने हंसकर बोला- आ जाओ वहां से क्या बोल रही हो।
कविता बोली रुक जाओ ज़रा आती हूँ, फिर अंदर चली गयी।
जय अपने कमरे में गया और वियाग्रा की गोली ले आया। फिर अपनी जगह पर बैठ गया। कविता फिर दूध लेके आ गयी। कविता के हाथ मे दो गिलास दूध थे। कविता ने दोनों को टेबल पर रखा। जय ने अपनी हार्ड ड्राइव कनेक्ट कर दी थी, उसमें उसने एक गंदी पोर्न फ़िल्म लगा दी। स्टार्टिंग में ही कुछ सीन्स थे, जो कि पूरी फिल्म की ट्रेलर जैसी थी। हीरोइन्स के नाम अभी स्क्रीन पर आ रहे थे। उसमें एक लड़की दूसरे लड़की की चुदती हुई गाँड़ से ताज़ा निकला लण्ड चूस रही थी, और उस लड़की की गाँड़ भी चाट रही थी।
अगले सीन में दो लड़कियां उसका मूठ मुंह मे भरकर एक दूसरे की मुंह मे डाल रही थी। कविता ये सब देख रही थी। वो अपने भाई को टोक भी नही रही थी, तभी जय ने कविता को देखा। कविता एक टक वो सीन देखे जा रही थी। जय ने कविता को खींचके अपने गोद मे बिठा लिया, अपनी बांयी जांघ पर। कविता अभी भी स्क्रीन देख रही थी। जय- क्या सोच रही हो, दीदी?
कविता अपने गले से थूक घोंटकर हल्की आवाज़ में बोली- ऊउ। कविता की नज़र जय पर पड़ी। कुछ नहीं, भाई ऐसे चुदने में कोई खतरा तो नहीं होता ना। जिस तरह वो एक दूसरे की गाँड़ चाट रही है। पता नहीं पर हमको ये सब देखकर बड़ा मजा आता है।
जय- तुम करोगी ? कविता दीदी।
कविता- हम क्या बोलें, हमारे यहां लोग ऐसे चुदाई थोड़े ही करते हैं। पर करने में मज़ा आता होगा ना?
जय- तुम ठीक कहती हो, पर आजकल भारत मे भी लोग ये सब करना शुरू कर चुके हैं।ये तो कुछ भी नहीं है, लोग इससे गंदी चुदाई भी करते हैं।
कविता- कैसे? जय- वो बाद में बताऊंगा। पहले ये लो और वियाग्रा की एक टेबलेट उसको दे दी। कविता बोली ये कैसा टेबलेट है ? जय ने खुद एक टेबलेट दूध के साथ ले ली। कविता ये वियाग्रा है इससे चुदाई की टाइमिंग बढ़ जाती है। कविता बोली- इसकी क्या ज़रूरत है? तुम तो अच्छे से कर ही रहे हो। जय बोला आज की रात तुमको बहुत चुदना है, इसलिए ये खा लो। देखो हमने भी खा लिया है।
कविता- ठीक है, तुम कहते हो तो खा लेते हैं। उसने भी दूध के साथ ले लिया। कविता फिर बोली- तुमने कहा था कि कुछ नियम बनाओगे। बताओ ना।
जय- बताएंगे पहले दूध तो पी लो।
कविता- नहीं भाई पहले बताओ ।
जय – ठीक है, हम तुम्हारे लिए 3 नियम बनाये हैं। पहला अभी से एक हफ्ते तक तुम नहाओगी ही नहीं।
कविता- भाई पर ……….
जय बीच मे ही काटते हुए बोला- सससस…….. पहले सुन लो। दूसरा तुम बिन कपड़ो के रहोगी, जब तक तुम और हम अकेले रहेंगे।
कविता- और तीसरा ?
जय- ये की हम जब चाहे तब तुम्हारे लिए नियम बना सकते हैं और बदल सकते हैं।
कविता- ये कैसे नियम बनाये हो तुम? हम नहाएंगे नहीं तो शरीर पर कितना गंदगी हो जाएगा। पसीना से बदन में नोचने लगेगा। ऊपर से गर्मी का महीना चल रहा है, हमारा तो हालात खराब हो जाएगा। कपड़े तो चलो नही पहनेंगे, पर बिना नहाए रहना बहुत दिक्कत हो जाएगा।
जय ने कविता के चूतड़ पर हल्का बिठ्ठू काट लिया। कविता चिहुंक उठी, उसके मुंह से आआहहहहहहह,
जय- तभी तो मज़ा आएगा, तुम नहीं नहाओगी तो तुम्हारे बदन में एक अजीब सी खुसबू पनपेगी, जब दोनों चुदाई करेंगे और बुर लण्ड का पानी एक दूसरे के बदन पर लगेगा, जो कि पसीने से मिलेगा तब तुम्हारे बदन से जो खुसबू आएगी, कितनी कामुक होगी। तुम्हारे बदन के हर हिस्से पर हम मूठ लगाएंगे। जब तुम नहीं नहाओगी तो वो तुम्हारे बदन पर डिओ जैसा काम करेगा। तुम चेहरा नहीं धो सकती हो, मेक अप कर सकती हो, पर सेंट या डिओ नहीं लगा सकती। बाल में सिर्फ कंघी करोगी, पर बाँधोगी नहीं। पसीना आये तो पोछना नहीं है, उसे ऐसे ही लगे रहने देना, हाँ पसीने को तुम सुखाने की कोशिश कर सकती हो, सिर्फ पंखे के नीचे जाके। तुम जब ऐसे रहोगी,तो फिर हम तुम्हारे बदन को चाटेंगे। ऊफ़्फ़फ़फ़ सोचके ही मज़ा आ रहा है
कविता अपने भाई को बस देखती रही, जिस बेशर्मी से वो ये सब बोल गया, उसके मन को भी रोमांचित करने लगा। कविता, क्या तुम भी नहीं नहाओगे?
जय- अगर तुम चाहो तो? कविता- दोनों ऐसे ही रहेंगे।
कविता ने फिर बोला, की तीसरा नियम तुमने बहुत सोच समझ के बनाया है, जब मन चाहे वो करोगे? शैतान कहीं का। जय मुस्कुराया और बोला, ऐसे ही IAS की तैयारी थोड़े ही करते हैं, कविता दीदी। कविता भी हंस पड़ी जोर से। उसकी बत्तीसी दिख रही थी। हीरे जैसे दांत थे कविता के। हंसते हुए उसकी चुच्चियाँ हिल रही थी, ” क्या… क्या बोले, IAS की तैयारी, यही सब पूछते हैं क्या, UPSC की परीक्षा में, हाहाहाहा…… । कविता हंसती जा रही थी। जय भी हंसते हुए कविता को देखे जा रहा था। उसने अपनी दीदी को बहुत दिनों बाद ऐसे हंसते देखा था। उसने कविता के गाल में बने डिंपल को खूब निहारा। जय आखिर बोल उठा, ” हंसो, हंसते हुए तुम कितनी सुंदर लगती हो, तुम्हारी हंसी तो जैसे कहीं खो गयी थी, बहुत दिनों बाद लौटी है। इस सुंदर चेहरे से ये हंसी खोने मत दो। तुम जब हंसती हो, तो हमारे चारों ओर खुशियां फैल जाती हैं।”
कविता- अच्छा जी, हमारे राजा भैया को हमारी हंसी बहुत अच्छी लगती है। तो लो ये हंसी अबसे बरकरार रहेगी, इन होंठों पर। कविता की आंखे नसीली हो रही थी। वो आगे बोली- एक बात बताओगे राजा भैया, अपनी ही बड़ी बहन को इस तरह नंगी गोद में बिठाके, ब्लू फिल्म दिखाना तुमको कैसा लगता है। जय,” बहुत अच्छा लग रहा है, की तुम नंगी हमारे गोद मे बैठी हो, एक दम निर्लज्जता से। असल में तुम ऐसी हो दीदी, बाहर की दुनिया के लिए जो तुम नाटक करती हो ना, एक दम साफ सुथरी, पवित्र व शुद्ध विचारों वाली, जिसे बाहर दुनिया बहुत अच्छी लड़की कहते हैं, वो तुम्हारा स्वाभाविक रूप नहीं है। तुम्हारा स्वाभाविक रूप ये है, हम सिर्फ तुम्हारे इस वक़्त के नंगेपन की बात नही कर रहे हैं, बल्कि उस कविता की बात कर रहे हैं, जो इस वक़्त समाज के अनुरूप अच्छे बुरे होने की डर से दूर है। जो बंद कमरों में रहती है तो, ब्लू फिल्म्स देखती है। जिसने अपनी कामुकता को दुनिया के लिए खत्म कर दिया है, पर बंद कमरे में कामुकता से लबरेज़ हो मूठ मारती है। ये तुम्हारा असली रूप है कविता दीदी। अपनी कामुकता को तुम अभी ही खुलके जी सकती हो। तुम जैसी काम की देवी हमारे साथ नग्नावस्था में बैठेगी तो मज़ा तो आएगा ही ना।
कविता ये सुनकर कामुक हो उठी। वियाग्रा की गोली भी धीरे धीरे असर कर रही थी। कविता ने जय की आंखों में देखा और बोली- ये लो इस काम की देवी का प्रसाद और उसके होंठों को चूमने लगी। अपने रसीले होंठ उसके होंठों को सौंप दी। जय ने कविता के होंठों को अपने होंठों से भींच लिया, और चूसने लगा। कविता जय की ओर मुड़ गयी, और दोनों पैर उसके कमर के इर्द गिर्द रखके उसकी गोद में ही बैठी रही। जय ने उसके कमर को पकड़के अपनी ओर कसके चिपका लिया। कविता के हाथ जय को कसके पकड़े हुए थे, उसकी दोनों हथेली जय की पीठ पर टिके थे। जिससे वो उसे अपनी ओर लगातार खींच रही थी। दोनों एक हो जाना चाहते थे।
जय के हाथ भी कविता की गर्दन से लेकर गाँड़ तक को पूरा महसूस कर रहे थे। कविता ने करीब 5 मिनट चले इस चुम्बन को, तोड़ा और जय की आंखों में देखकर बोली, ” आज तुमको दिखाते हैं, हम।
जय- क्या दिखाओगी, कविता दीदी?
कविता- अपनी दीदी का स्वाभाविक रूप देखने है ना तुमको। आज तुमको अपना काम रूप दिखाएंगे। उधर वो ब्लू फिल्म चलने दो, और इधर तुम अपनी बड़ी बहन के साथ असली ब्लू फिल्म का आनंद लो।
जय- क्या बात है, तुम तो बिल्कुल मस्त हो गयी हो हमारी जान। वियाग्रा अब धीरे से जय पर भी असर कर रहा था। उसने कविता के बाल खींचे और उसके पूरे चेहरे को चूमने लगा। कविता के गाल,पलकों, माथे,नाक सब पर चुम्मों की बौछार लगा दी। कुछ ही पलों में सैंकड़ो चुम्मे धर दिए। कविता कामुक सिसकारियां भर रही थी। उसने कविता के गालों को चाटा, उसकी पूरे गालों पर थूक चमकने लगी। जीभ से हल्के हल्के उसकी ठुड्ढी को भी चाट रहा था। कविता अपने निचले होंठ को दांतों में दबाके इस गीले एहसास का आनंद ले रही थी। जय कविता की ये हालात देखके खुश हो रहा था, लेकिन वो चाहता था कि कविता ये सब करते हुए ब्लू फिल्म भी देखे। इस स्थिति में कविता ब्लू फिल्म नहीं देख पा रही थी। जय- तुम ठीक से फ़िल्म नहीं देख पा रही हो क्या? कविता- नहीं, बस आवाज़ सुन रहे हैं। जय- उतरो, दीदी तुमको अच्छे से दिखाएंगे। कविता- अब हम नहीं उतरेंगे, उसकी चुम्मी लेते हुए बोली। जय बोला- ठीक है तुम बैठी रहो। तुम अपने टांगों से हमारे कमर पर कैंची बना लो और हमको कसके पकड़ लो। कविता ने ठीक वैसे ही किया।
जय ने कविता को गोद में उठाये ही टी वी से लैपटॉप व हार्ड ड्राइव को डिसकनेक्ट कर दिया और कविता ने एक हाथ से लैपटॉप उठा लिया और फिर दोनों कविता के रूम की ओर जाने लगे। इस दौरान जय का तना हुआ लण्ड कविता की बुर को छू रहा था। कविता को जब भी अपनी बुर पर जय का लण्ड छूता हुआ महसूस होता वो अपने हाथ के नाखून उसके पीठ में गड़ा देती और अपनी चुच्चियों को उसके सीने में। कविता तब तक जय को गीली चुम्मियां भी लगातार देती रही। जय सब बर्दाश्त करते हुए किसी तरह कविता के कमरे में पहुंचा। कविता को उसने उसके बिस्तर पर पटक दिया। कविता की आंखों और चेहरे पर चुदाई की प्यास हर पल गहरी हो रही थी। पर जय उसे अभी और तड़पाना चाहता था। वो चाहता था कि कविता पूरी चुदासी हो जाये। उसने कविता के सामने लैपटॉप में ब्लू फिल्म चला दी। कविता फिरसे जय के गोद में बैठ गयी, पर इस बार वो जय की तरफ पीठ की हुई थी। कविता थोड़ा हिल डुलकर लण्ड को अपनी गाँड़ की दरार में बैठा ली।
फ़िल्म में हीरोइन अपनी गाँड़ में डिल्डो घुसा रही होती है। वो सिसयाते हुए उसको अंदर बाहर कर रही थी। थोड़ी देर बाद उसने डिल्डो निकाला, तो कविता ने देखा कि उसकी गाँड़ बहुत खुल गयी थी। गाँड़ की छेद की चौड़ाई भी बढ़ गयी थी। उस लड़की ने फिर अपनी हथेली की चार उंगलिया उसमे घुसा रही थी। उसने उस डिल्डो को चाट लिया, जिसमे उसके गाँड़ की रस लगी पड़ी थी। फिर उंगलिया भी बाहर निकालके चूसी। 3 से 4 काले अफ्रीकी मूल के लोग आए। वो गोरी लड़की उनके बड़े बड़े लण्ड को चुसाने लगी, बारी बारी से। उन सबने उस लड़की को अलग अलग तरह से चोदा।वो एक साथ 3 लण्ड ले रही थी एक बुर में, एक गाँड़ में, एक मुंह मे और एक का लण्ड चुसाने को उसके मुंह पर लहराता रहता था।
कविता अत्यधिक कामुक हो उठी थी ऐसी चुदाई देखकर। उसकी सांस तेज़ चल रही थी सीने में सांस तेज़ होने से कड़क चुच्चियाँ हिल रही थी। अपनी गाँड़ से जय के लंड को रगड़ रही थी। उसकी कमर लगातार हिल रही थी। उसने अपने भाई के कंधे पर सर रखके कहा- भाई, अब बर्दाश्त नहीं हो रहा। डालो ना लण्ड को। जय ने कहा- इतनी आसानी से नहीं देंगे। चल नीचे बैठ जाओ, घुटनो पे। कविता एक आज्ञाकारी विद्यार्थी जैसे उसकी टांगों के बीच फर्श पर घुटनो के बल बैठ गयी। जय ने बोला,” खुदको जितना निर्लज बना सकती हो, बनाओ। हमको रिझाओ अपनी बुर चोदने के लिए।”
कविता ने अपनी चुच्चियाँ पकड़के उसमे थूक दिया। और अपनी चुच्चियों पर मलने लगी। जय की आंखों में देखते हुए, एक हाथ से अपनी बुर में उंगली घुसाई, उसकी उंगलियां उसके बुर के रस से भीग चुकी थी। कविता ने वो उंगलियां जय को सुंघाई, और खुद अपनी जीभ निकालके कामुकता से चाटने लगी। एक एक करके उसने उन तीनों उंगलियों को चूसा जो उसके बुर के रस से भीग चुकी थी। उसने जय के लण्ड को अपनी चुच्चियों के बीच फंसा लिया और हाथों से दबाते हुए, चुच्चियाँ ऊपर नीचे करने लगी। जय को कविता अपनी बड़ी बड़ी आंखों से निहारे जा रही थी। जय ने फिर कविता की गर्दन पकड़के उसे करीब लाया। उसने कविता के चुच्चियों के बीच लण्ड फंसा था, उसपर थूक दिया, कविता और ज़ोर से रगड़ने लगी। जय को ये अजीब सी मस्ती लग रही थी। लण्ड रागड़वाने में, उसने कविता को उठने को कहा, और उसको बिस्तर पर कुतिया बनने को कहा। कविता उछलके कुतिया बन गयी। उसकी बुर से बहुत रस चू रहा था। जय ने उसकी बुर को अपनी चार उंगलियों से दबाके सहलाया। ऐसे करते हुए कविता की गाँड़ के छेद को अंगूठे से छेड़ रहा था। कविता इस दोहरे स्पर्श से अभिभूत हो गयी। जय ने देखा कविता मस्त हो चली थी, वो अपने अंगूठे को उसकी गाँड़ में घुसाने लगा। कविता इस हमले के लिए तैयार नही थी। उसने उसके हाथ को रोकते हुए कहा, आआहहहहहहह….. दर्द हो रहा है। जय ने उसकी एक नया सुनी और उसके हाथ को धकेल दिया, ” चुप कर, बर्फ के टुकड़े ले सकती है तो उंगली क्यों नही। क्या शानदार छेद है ये गाँड़ की। जय ने उसके चूतड़ों पर कसके चार पांच तमाचे धर दिए। कविता की गाँड़ लाल हो गयी। उसकी गाँड़ बहुत टाइट थी, अंगूठा घुसाते वक़्त जय को ये एहसास हुआ। जय उसकी गाँड़ मारने को आतुर था पर उसकी गाँड़ इसके लिए अभी तैयार नहीं थी। जय ने उसकी गाँड़ में अंगूठा घुसाए ही उसकी बुर में लण्ड रगड़ने लगा।
कविता पागल हो उठी, ” भाई घुसा दो ना प्लीज।
जय- क्या? बोल क्या चाहिए कविता रंडी।
कविता – लण्ड चाहिए तुम्हारा हमारे बुर में। चोदो ना लण्ड घुसाके। अपनी बहन की बुर को।
जय- तुम क्या हो, बताओ दीदी? अपना परिचय दो।
कविता- हम तुम्हारी रंडी हैं, अपने छोटे भाई की रंडी। हाँ रंडी शब्द ही हमको सूट करता है। ऐसी रंडी जिसने अपने भाई को भी नहीं छोड़ा।
जय ने ये सुनके उसकी बुर की गहराइयों में लण्ड उतार दिया। कविता की सिसकारी बड़ी ज़ोर से निकली, जो पूरे कमरे में गूंज उठी। जय उसकी गाँड़ को सहलाते हुए, खूब ज़ोरों से चोद रहा था। कविता ज़ोरों से किकया रही थी, किसी कुत्ती की तरह। जय उसे बहुत ही रफ़ लेकिन पैशनेटलि चोद रहा था। कोई 15 मिनट तक ऐसे चोदने के बाद उसने कविता के मुंह मे अपना लण्ड दे दिया, कविता उसे खूब मज़े से चूसने लगी।
कविता- कितना स्वादिष्ट लग रहा है, तुम्हारे लण्ड पर लगा हमारी बुर का रस।
जय- चाट ले अच्छे से रांड दीदी, तेरे लिए ही है, आज की रात खूब पिलाऊंगा तुमको।
कविता- लप ….लप पपपपपप हहम्मम्म कितना प्यारा है, भाई ये लण्ड मन कर रहा है उम्र भर चूसते रहें।
जय- चूसो जितना मन करे, तुम्हारा ही है। अब तो सारी जिंदगी इसका मज़ा ले लेना। कविता लण्ड उठाके उसके आंड को चूसने लगी। जय- आआहह क्या चूसती है रे तू। चाट जीभ से।
कविता कोई 5 मिनट तक चूसती रही, ऐसे ही। जय ने उसे बिस्तर से नीचे उतार दिया और दिवाल की ओर कर दिया। कविता दीवाल पर अपनी दोनों हथेली के सहारे खड़ी थी। जय ने उसको गाँड़ बाहर की ओर निकालने को बोला। कविता अपनी गाँड़ बाहर निकाली और चूतड़ों को फैलाया। जय घुटनो पर बैठ गया, और उसकी गाँड़ चाटने लगा। कविता उसके सर को पकड़कर अपनी गाँड़ रगड़ने लगी। चाटो, भैया अपनी दीदी की गाँड़। ऊफ़्फ़फ़फ़ आआहह……
जय अपनी जीभ से उसकी गाँड़ को छेड़ रहा था। उसकी गाँड़ की दरार को चाट रहा था। उसने अपनी एक उंगली उसकी गाँड़ में घुसा रखी थी, जिसे वो अंदर बाहर कर रहा था। वो उसपर थूक भी लगा रहा था। एक पल को हट जाता और गाँड़ पर थूक देता। फिर दूसरे पल चाटने लगता। कविता खुद अपने चूतड़ों पर चाटें लगा रही थी। जय फिर कविता के पीछे खड़ा हो गया और उसे उसी हालत में खड़ा रख उसकी बुर में लण्ड पेल दिया। कविता लण्ड के घुसते ही अपनी कमर हिलाने लगी। वो उसे ऐसे ही चोदे जा रहा था। कविता और जय वियाग्रा के असर में थे, इसलिए आज की चुदाई जैसे खत्म ही नही हो रही थी। करीब आधे घंटे की लंबी चुदाई के बाद दोनों आखिर में चरम सीमा पर पहुंचने लगे। जय ने कविता को बिठाके उसके चेहरे पर मूठ की धार निकाली। कविता का चेहरा उससे पूरी तरह भीग गया। कविता उसका लण्ड चूस रही थी, और अपनी बुर के दाने को भी रगड़ रही थी। जय के छूटने के बाद वो भी छूट गयी। दोनों बिस्तर पर लेट गए। कविता के ऊपर जय लेटा था। तभी उनकी नज़र लैपटॉप पर पड़ी।
करीब 45 मिनट के सीन में उस लड़की को बहुत गंदे से चोदा उन्होंने की उसका मेकअप पूरा निकल गया। फिर उन सबने उसे अपना मूठ पिलाया, जो उस लड़की के चेहरे पर भी गिरा। कविता की बुर ये देखकर और पनियाने लगी। जय कविता की बुर को अपनी हथेली से सहला रहा था। कविता के गर्दन पर चुम्मा लेते हुए वो बोला,” अब देखना की आगे क्या करते हैं, ये इसके साथ।
कविता ने देखा कि सब मिलके उस लड़की को नंगी फर्श पर लिटा देते हैं और मूतने लगते हैं। लड़की उनकी पेशाब की पीली धार को मुंह मे रखके पीने लगती है, और उसमें नहा भी रही होती है। वो ये सब हंसते हुए कर रही थी। कविता ये देखकर भौंचक्की रह गयी। कविता को ये कुछ नया लगा। उसने अपने भाई को बोला, ये सब कैसे करती हैं, इनको मज़ा आता होगा ये सब करने में? घिन्न नहीं लगता होगा ऐसे?
जय- इनको इसके बहुत पैसे मिलते हैं, यही इनका काम है। देखो ना कितने मन से कर रही है। ये जो सेक्स है ना, बहुत अजीब है। इसे जितना गंदा करके, जितना घिना के करते हैं ना उतना मज़ा आता है। ये सब एक बार मे नहीं हो सकता, वक़्त लगता है। पर जब इसकी आदत लग जाती है ना, चुदाई का मज़ा दुगना हो जाता है।
कविता- तुमको ये सब अच्छा लगता है, हम जानते है पर करने की हिम्मत है या ऐसे ही बोलते रहते हो।
जय- हमको आज़मा रही हो। तुमको मूतते हुए हमको देखना है। वो भी जब तुम अपनी बुर की धार हम पर मारोगी। विश्वास नहीं तो अभी दिखा देंगे, पर क्या तुम कर सकती हो ऐसे? कविता उस सवाल के लिए तैयार नहीं थी, वो बोली, छी हमको उसमे मज़ा नहीं आएगा। हम तुम्हारा थूक पी सकते हैं बस।
जय- कोई जबरदस्ती नहीं है, तुम मानोगी हम जानते हैं।ये कहकर उसने कविता के खुले मुंह में थूक दिया, थूऊऊऊ। कविता ने उसके होंठों पर लगे थूक को जीभ से समेट के मुंह मे ले ली, और घोंट गयी। कविता और जय एक दूसरे को कामुकता से देख रहे थे।
उस रात जय ने पूरी रात कविता को 4 बार चोदा। और फिर दोनों वैसे ही थकान से चूर होकर सो गए।