मां बेटी और बेटा CHAPTER 7

 

            मां बेटी  और बेटा  CHAPTER 7




उधर दिल्ली के दूसरे ओर प्रीत विहार में ममता अपने छोटे भाई सत्यप्रकाश के साथ रक्षाबंधन मना चुकी थी। सत्यप्रकाश और ममता दोनों बातें कर रहे थे, और पुराने दिन याद कर रहे थे। हालांकि ममता और सत्यप्रकाश भाई बहन थे, पर वो ममता से उम्र में काफी छोटा था।कविता से सिर्फ 1 साल बड़ा था। ममता ने सत्य  एक माँ की तरह ही प्यार करती थी और उसका ध्यान रखती थी। सत्यप्रकाश की शादी अभी तक नहीं हुई थी। ममता और माया दोनों इस बात पर उसको बहुत समझाती थी, पर वो अभी शादी के मूड में नहीं था। आज भी वो यही कोशिश कर रही थी। 

ममता- तुमको इतना बार बोले हैं, शादी कर लो ना। घर पर पत्नी रहेगी तो सब संवारेगी। तुम्हारा ख्याल रखेगी। अब तुम ये मत कह देना कि, औरत ही ये सब कर सकती है, तुम अपना ख्याल खुद रख सकते हो। ये सुनके हमारे कान पक गए हैं। अब कब शादी करोगे। उम्र निकल जायेगी तब। हहम्मम्म।

सत्य- दीदी तुमको तो सब पता ही है। हम अभी शादी के मूड में नहीं है। क्यों ये सवाल करती हो। तुम तो जानती हो फुलवरिया( ममता का मायका) में अपना घर बनाने है। यहां भी अभी एकदम से सेटल नहीं हुए हैं। ये सब कर लेंगे तभी अपना घर बसायेंगे। और हम सबकुछ तो कर ही लेते हैं।कोई दिक्कत नहीं हमको। माया दीदी भी जब फोन करती है, तब यही बात सब बोलते रहती है। 

ममता- हमारा मन है कि तुम्हारे बच्चों को भी गोदी में खिलाऊँ रे। हमको बुआ बना दो ना। कोई पसंद है तो बता दो। उसको ही तुम्हारी दुल्हन बना देंगे।

सत्य शर्माते हुए- नहीं दीदी ऐसी कोई बात नहीं है। 

तभी उसका फोन बजता है। कॉल उसके आफिस से था। वहां कुछ जरूरी काम आ गया था। और छुट्टी होने के बावजूद उसको बुला लिया गया। सत्य बोलके निकल गया कि वो 2 3 घंटे में आ जायेगा। वो बोला कि दीदी तुमको शाम में हम ही छोड़ देंगे। तुम यहीं रहना। 

ममता किचन में जाकर बर्तन साफ करने लगी। साफ करने के बाद घर को थोड़ा व्यवस्थित करने लगी। वो सत्य के कमरे में गयी तो वहां उसे एक पुरानी अटैची मिली। उसने उस अटैची खोली। उसमे कुछ पुराने कागज़ वैगरह रखे हुए थे। उसमे एक एल्बम था जिसमे उसकी माँ कावेरी की पुरानी ब्लैक वाइट तस्वीर थी। 

 

कावेरी की मंगलसूत्र और कमरबंद था। गांव के ज़मीन के कागजात। सब देखने के बाद ममता सब वापिस रखने लगी। तभी उसकी नज़र एक पुराने डायरी पर पड़ी। उसके अंदर एक पुरानी चिट्ठी परी हुई थी। वो उसे जैसे ही पढ़ने वाली थी, की तभी उसका फोन बज उठा। ममता ने वो चिट्ठी वैसे ही मोड़ दी, और फोन उठायी। वो फोन में व्यस्त हो गयी। तभी सत्य भी वापिस आ गया। ममता बाहर बालकनी में बाते कर रही थी। वो अंदर अपने कमरे में गया और देखा सब कुछ खुला। उसने झट उठा के सब बंद कर दिया। उसे डर था कि ममता ने कहीं वो चिट्ठी ना पढ़ ली हो।पर फोन काटने के बाद ममता का कोई सवाल उस चिट्ठी के बारे में नहीं था, तो वो रिलैक्स हो गया।


खाना खाने के बाद जय और कविता, कविता के बिस्तर पर फिर चुदाई के खेल में भिरे हुए थे। कविता इस वक़्त जय के लण्ड को बुर में घुसाकर तेजी से उछल रही थी। उसकी चुच्चियाँ ऊपर नीचे होते हुए मस्त हिलोडे मार रही थी। कविता अपने बाल पकड़े हुए हाथ उठाये हुई थी। वो इस वक़्त तीसरी बार चुद रही थी। 

जय- आआहहहहहहह….अरे बुरचोदी भोंसड़ी साली, लण्ड कौन चूसेगा तेरी माँ। चल बीच बीच में उतरकर लण्ड से अपने बुर का पानी चाटा करो। वैसे भी तेरे बाप बन गए हैं हम।

कविता- सही बोले, लेकिन एक बात बताओ। तुम हमारे भाई भी हो, अब पति हो और बाप भी बन गए हो। कैसी रिश्तों की उलझन है। हा… हा…. हा

कविता लण्ड बुर से निकालती है, और जय की ओर देखते हुए, लण्ड चूसने लगी। जय उसके माथे को सहलाने लगा।

” आह आज ना तुम और ना हम रिलैक्स करेंगे, आज ये लौड़ा तुम्हारे हर छेद की खबर ले रहा है।

जय- वाह क्या मज़ा दे रही हो, बहुत मन से चूस रही हो लण्ड को। अच्छा लगता है ना? कविता लण्ड मुंह मे लिए भोला सा चेहरा बनाके सर हिलाई।

जय कविता की गाँड़ को सहला रहा था। 

जय- तुम्हारी पैंटी कहाँ गयी। बचा हुआ हलवा निकाल दिया क्या अपनी गाँड़ से?

कविता लण्ड चूसते हुए सर हिलाई। फिर बोली, उसको फ्रीज में रख दिये हैं। आराम से खाएंगे।

जय- ठीक है, कोई बात नही। लेकिन हम चाहते थे कि वो तुम्हारे गाँड़ के ओवन में ही रहे। मज़ा आ रहा था।

कविता- हम उससे भी मज़ेेदार चीज़ लेेंगे, तुमको और मज़ा आएगा।

जय- क्या?

कविता-  अभी नहीं डार्लिंग भाई, बाद में बताएंगे। तुमको अगर गाँड़ चाटनी है तो चाट लो, बाद में ये तुम्हारे चाटने लायक नहीं बस हमारे लिए रहेगी।


ये बोलना था कि जय ने कविता को घोड़ी बना दिया और उसकी चिकनी चूतड़ को फैला दिया। इसके बाद उसकी सावली भूरी गाँड़ की छेद जो हल्की खुली हुई थी, उसमे अपनी जीभ लगा दिया। कविता के होंठों पर कामुक मुस्कान थी। जय उसकी मस्त सुंदर चिकनी गाँड़ का स्वाद चख रहा था। कविता के चुत्तर मस्ती में हिल रहे थे। जय कभी कविता की गाँड़ तो कभी बुर चाट रहा था। कभी उसके बुर में उंगली डालता तो कभी उसकी गाँड़ में।थोड़ी देर बाद कविता झड़ गयी और जय के मुंह पर बुर का रस मूत की तरह बहा दी।जय उसे पागलों की तरह पी रहा था। पूरा बिस्तर गीला हो चुका था। जय उसकी आखरी बूंद तक चाट गया। कविता थकी सी मुस्कान दिये जय का सर पकड़ अपना बुर चटवा रही थी। 

कविता- ऐसा लग रहा है कि हमारे शरीर को निचोड़ लिए हो, और सारा रस निकालकर पी गए हो। उफ़्फ़फ़ 

जय उसकी ओर लपका और कविता को बालों से पकड़ा और अपनी ओर खींचा। उसकी आँखों मे आंखें डालकर बोला,” अभी से थकना मत और ना ही रिलैक्स करने देंगे, कविता दीदी। तुमको अभी और पेलना है।

कविता उसके लण्ड को पकड़ते हुए बोली- हम कब बोले कि रिलैक्स करो, बल्कि तुमको वियाग्रा खिलाये हैं। देखो लण्ड खड़ा ही है, और बुर भी फिर चुदने को तैयार है।काश आज माँ नहीं आये, और तुम सुबह तक हमको खूब पेलो।” कविता कामुकता से लबरेज़ थी।

जय ने फिर कविता को बिस्तर पर गिराया और खुद उसके ऊपर चढ़ गया। उसके बुर को चूमते हुए धीरे से उसकी नाभि,पेट और  चुच्ची के रास्ते ऊपर चेहरे तक चुम्मा लिया। चुम्मा कम चाटा ज्यादे। फिर उसकी बुर में लण्ड घुसाकर पेलना शुरू कर दिया। कविता पीछे हटने वाली कहां थी। उसने जय के पीठ को कसके पकड़ा था, साथ ही अपनी टांगे जय के कमर के इर्द गिर्द फंसा रखी थी। जय उसकी बुर की रिंग देख और उत्साहित था। वो बार बार लण्ड निकालकर उसकी बुर की रिंग पर पटकता था, और जोश में आकर खूब कसके चोद रहा था। कमरे के अंदर सिर्फ चोदने और चुदने की थाप, आवाज़ें गूंज रही थी। आआहहहहहहह, ओऊऊऊच्च, ओह्ह हहहहहहह, आ आ आ आ , उफ़्फ़फ़फ़फ़ , ऊईई माँ, मर गई ईईईईई, हाये, ओऊऊऊ, हे भगवान, ईशशशशश ऐसी आवाज़ें आ रही थी। जय ने फिर उसको गोद मे बैठाकर चोदा, जिसमे कविता जय के लण्ड पर बैठी थी, और जय भी उसको अपनी बाहों में पकड़कर बैठा था। सोनो एक दूसरे में चिपके हुए थे। कविता उसके माथे को चूम रही थी। दोनों भाई बहन उछल उछल कर चुदाई कर रहे थे। उस तरह करीब 10 मिनट चोदने के बाद कविता को जय ने करवट लिए लिटाया। फिर वो उसकी टांगों के बीच आकर, उसकी एक टांग अपने कंधे पर रख लिया। और कविता की गाँड़ में लण्ड घुसा दिया। और कविता गाँड़ मरवाने लगी। कविता ने देखा कि जय उसे इस वक़्त सिर्फ चोदना चाहता था। उसे फर्क नहीं पड़ रहा था, की वो उसकी गाँड़ चोदे या बुर। वो भी बस चुदना चाहती थी। जय ने उसकी चुच्ची को एक हाथ से कसके पकड़ा था। जय थोड़ी गाँड़ मारने के बाद, कविता के बुर में लण्ड घुसाके चोदता। फिर लण्ड निकाल वापिस गाँड़ मारने लगता। कविता लगातार अपने मटर के दाने को मसल रही थी। और इस क्रम में दो बार अब तक झड़ भी चुकी थी। एकदम धुवांधार चुदाई चल रही थी। कविता की गाँड़ काफी खुल चुकी थी, लगातार हो रही चुदाई से। जब भी जय लण्ड निकालता तो 10 के सिक्के जितना बड़ा छेद खुला रह जाता था। जय पिछले आधे घंटे से ज्यादा से कविता को चोद रहा था, पर वो अभी तक झड़ने का नाम नहीं ले रहा था। कविता- आआहहहहहह, ओऊऊऊ जय ययय…ययय ओह्ह लगता है तुम आज रुकोगे नही  क्या जानेमन भैया। बहन की बुर इतनी मस्त है क्या? हाये हमारा राजा भैय्य्या। अपना मूठ लेकिन हमारे मुंह मे ही देना, प्लीज।” कविता अपनी जीभ दिखाते हुए बोली।

जय ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि उसकी बेदर्दी से चुदाई चालू रखा। उसपर वियाग्रा सर चढ़ कर बोल रही थी। जय की कमर तेज़ी से हिल रही थी। और कविता उसके धक्कों को अपने ऊपर समाहित कर रही थी। कविता की मधुर आनंदमयी चीखें पूरे कमरे का माहौल और अधिक कामुक बना रही थी। उसने कविता को अलग अलग पोज़ में खूब चोदा। आखिरकार करीब एक घंटे चोदने के बाद जय का निकलने वाला था। जय- इधर आओ कविता दीदी, ये लो अब निकलने वाला है। आआहह

कविता फुर्ती से उठकर उसके लण्ड को चाटने लगी और हिलाने लगी। तभी मूठ की तेज और गहरी धार उसके गले से टकराई। कोई 7 8 लंबी धार निकली जय के लण्ड से। उसकी कमर हर झटके के साथ कविता के मुंह मे लण्ड पेल देती थी। सुपाड़ा लगातार हिल रहा था। कविता ने सारा मूठ मुंह मे ले लिया, उसने एक बूंद भी बाहर गिरने नहीं दिया। जय उसके बालों को पकड़कर अपने लण्ड पर दबा भी रहा था। जय पूरा गिराने के बाद लण्ड को बाहर निकाल कविता के गालों पर रगड़ दिया। कविता हसने लगी।उसने अपने गालों से उसके लण्ड को सहलाया और उसपर राखी के धागे को चूमा।

जय और वो दोनों हसने लगे।

जय- लण्ड पर बंधी तुम्हारी राखी आज तुम्हारी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ा रही है। जिस राखी को भाई हाथ पर पहन कर बहनों की रक्षा करते हैं, आज एक बहन ने उसी राखी को भाई के लण्ड पर बांध, रिश्तों की मर्यादा ताक पर रख, उस लण्ड से खूब चुद रही है। हा… हा हा…..हा…

कविता- उम्म्ममम्ममम्म… जय तुमको मज़ा नहीं आया क्या? अपनी सगी बड़ी बहन को राखी के दिन इतनी बुरी तरह चोदे हो तो।हम तो तुम्हारे लिए घर की इज़्ज़त, मान मर्यादा, रिश्तों की परवाह किये बगैर खुदको तुम्हारे हवाले कर दिए जान।

जय- तुम तो आज हमारा दिल जीत ली हो कविता रानी। आज तो मन कर रहा है, माँ से तुम्हारा हाथ मांग ले और तुमको हमेशा के लिए इस समाज की रिवाज़ के खिलाफ बीवी बना ले।

कविता – मांग लो ना माँ से हमको, किसने रोका है। माँ अब मना नहीं कर पायेगी। वो फिर से सुहागन बनकर घूमना चाहती है। तुम उसके सुहाग हो और हमारे भी। हम दोनों माँ बेटी को अपना लो, और इस घर में दोनों को पत्नी बनाकर रखो। हमको कोई एतराज़ नहीं है।

जय- तुम ठीक कह रही हो। वक़्त आ गया है, कि अब हम इस घर के मुखिया बने और तुम दोनों की जिम्मेदारी पति बनके उठाये। तुमको पता है, ममता को बच्चा चाहिए। और उसकी उम्र भी हो गयी है। जल्द ही उसकी कोख भरनी होगी, और उसके लिए हम तीनों के बीच शर्म की दीवार गिरानी होगी।

कविता जय को चुम्मा लिए जा रही थी। इस वक़्त शाम के 7 बज रहे थे। तभी आसमान में काले घने बादल आ गए। बिल्कुल अंधेरा सा हो गया। कविता जय के जिस्म से चिपकी हुई थी। बाहर आंधी तूफान जोर से चलने लगे। जय और कविता दोनों उठ बैठे। बिजली ज़ोर से कड़क उठी, तो कविता सहम कर जय के सीने से चिपक गयी। जय उसके चेहरे को उठाके चूमने वाला था, कि ममता का फोन आ गया। ममता ,” जय हम अभी नहीं आ पाएंगे। बहुत जोर की बारिश हो रही है। तुम दोनों ठीक से रहना। सत्य हमको सुबह आफिस के समय ले आएगा।”

जय- ठीक है, तुम अपना ध्यान रखना।”

कविता आंखों से इशारा करते हुए पूछी,” क्या हुआ? क्या बोल रही थी माँ?

जय- वो सुबह तक नहीं आएगी। 

कविता- ओह्ह, तो फिर वो मामाजी के यहां आज रात रुकेगी। 

जय कविता के होंठों को छूकर बोला,” तुम तो आज की रात का फायदा उठाओगी ना? 

कविता- इस रक्षाबंधन के दिन बहन भाई के साथ सुहागरात मनाएगी।” उसकी आँखों मे एक शैतानी प्यास और होंठों पर नटखट हंसी थी। वो जय को लिटाकर फिर उसके ऊपर चढ़ गई। और चादर ओढ़ ली। उस रात दोनों ने 4 से 5 बार चुदाई की। और सुबह 5 बजे सोए। दोनों एक दूसरे की बाहों में नंगे ही सोए थे। कविता की सुबह जब आंख खुली, तो बाहर से तेज धूप आ रही थी। उसने आंख मलते हुए घड़ी देखी तो 10 बज चुके थे। उसका पूरा बदन टूट रहा था। वो उठी पर चल नही पा रही थी। किसी तरह दीवार पकड़ते हुए बाथरूम पहुंचना चाहती थी। तभी वो गिर पड़ी और साथ मे कुर्सी भी गिर पड़ी। जय की नींद गिरने की आवाज़ से खुल गयी। जकय ने कविता को पड़े हुए देखा, तो उठकर कविता को सहकर देकर उठाया। पर वो ठीक से चल नही पा रही थी। जय ने ये देखा तो कविता को अपनी गोद मे उठा लिया, जैसे फिल्मों में हीरो हीरोइन को उठा लेता है। जय,” बहुत दर्द हो रहा है क्या कविता दीदी? कविता उसके गालों को सहला कर बोली,” नहीं, ये तो कल रात जो तुमने हमको जी भरके प्यार किया है ना उसी का असर है। ये दर्द बहुत मीठा है। इसकी आदत पड़ जाएगी।” और उसको चूम ली। जय फिर उसको बाथरूम तक ले गया, और गोद से उताड़ दिया।वो बाथरूम के अंदर चली गयी। खुद को आईने में देखा। उसके गर्दन और गालों पर लव बाइट्स थे। फिर उसने पूरे शरीर मे कई जगह जय के काटने के निशान पाए। चूतड़, पेट, कमर, चुच्ची सब जगह। वो ये देख, मुस्कुराई। उसकी बुर और गाँड़ चुद चुदकर दुख रही थी। वो हिम्मत जुटाकर फ्रेश होने लगी। तभी घर की घंटी बजी। ये और कोई नही ममता थी। कविता बाथरूम में थी, तो उसने सुना नही। जय ने एक तौलिया पहन लिया और दरवाज़ा खोला, सामने ममता थी। वो एक सेकंड के लिए अवाक रह गया, उसने सोचा ही नहीं, की ममता हो सकती है। फिर खुदको संभालते हुए बोला,” मामाजी कहां है? 

ममता- वो तो हमको नीचे छोड़ के चला गया। कविता ऑफिस गयी क्या?

जय- पता नहीं, शायद बाथरूम में है। क्यों?

ममता उसको गले लगाके बोली,” जब वो सामने नहीं तो, हम तुम्हारी माँ नहीं, बल्कि पत्नी हैं।” और जय को चूमने लगी। 

जय – दरवाज़ा तो बंद कर लो।” 

ममता- तुमको दरवाज़ा का पड़ा है, थोड़ा हमारा चेहरा को देखो, हमारे प्यासे होंठ, मुरझाई आंखें, जो तुम्हारे प्यार के लिए तड़प रहे हैं। और ममता जय के सीने को किस करते हुए नीचे आने लगी, और उसका तौलिया उतारने लगी। तभी जय ने ममता को बोला,” फिर तो हमको अपनी पत्नी की प्यास बुझानी होगी। चलो हमारे कमरे में।” मैन ही मन वो किसी तरह माम्यत को हॉल से कमरे में ले जाना चाहता था। ममता के होंठों को किस करते हुए, अपने कमरे में ले गया। वहां ममता का पल्लू, ब्लाउज और ब्रा तुरंत फर्श पर गिर गए। जय ममता को बेतहाशा चूम रहा था। और ममता भी छोटे समय मे मज़े ले लेना चाहती थी। क्या कहने इस घरके की जय की बहन छुड़ाकर बक़तरूम में थी, और जय अब अपनी माँ को प्यार कर रहा था।  ममता जय के खड़े लण्ड को तौलिए के ऊपर से सहला रही थी। ममता बिना देर किए, घुटनो पर बैठ गयी, और तौलिया हटा दी। जय का लण्ड खड़ा था, पर उसपर राखी बंधी देख ममता आश्चर्य में पड़ गयी। वो जय की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कुछ बोलने ही वाली थी कि, बाथरूम का दरवाजा खुला और कविता नंगी ही बाहर आ गयी। कविता ने महसूस किया कि जय अपने कमरे में कुछ कर रहा है। वो वहीं नंगी पहुंच गई, क्योंकि उसे पकता नहीं था, की ममता आ चुकी है और वो अभी उस कमरे में जय का लण्ड चूस रही है। कविता कमरे में घुसी, तो ममता जय का लण्ड पकड़ खुद अधनंगी हुई घुटनो पर बैठी है। जय पूरा नंगा, कविता पूरी नंगी और ममता अधनंगी। ममता और कविता ने अपनी आंखें हाथों से ढक ली। दोनों के मुंह से एक चीख निकल गयी।



एक खामोशी थी कमरे में, ठीक वैसे जैसे तूफान के आने से पहले होती है। ये तूफान या तो सब उजाड़ देगा या फिर इनकी ज़िंदगी और रिश्ते हमेशा के लिए बदल जाएंगे। ममता अपनी साड़ी से चुच्चियाँ ढक अपनी ब्लाउज और ब्रा फर्श से उठाने लगी। कविता बुत बनी खड़ी थी अपने मुंह को छुपाए। जय ने खुदको छोड़ पहले कविता को तौलिये से ढकने बढ़ चला। वो खुद पूरा नंगा था। जय ने कविता को ढक दिया और कविता ने फौरन उस तौलिये को लपेट लिया। ममता अभी अपनी ब्रा छोड़ ब्लाउज पहनने की कोशिश कर रही थी। पर वो जल्दबाज़ी में ठीक से पहन ही नही पा रही थी। कविता और ममता एक दूसरे की ओर नहीं देख रहीं थी। जय ने अपनी बॉक्सर जल्दी से पहन ली। ममता ने जल्दबाज़ी में अपनी ब्लाउज फाड़ ली। वो फिर कमरे से निकलकर अपने कमरे में ब्लाउज पहनने चली गयी। ममता जैसे गयी कविता भी निकलना चाहती थी, पर जय ने उसके हाथ को पकड़ लिया। कविता जय की ओर देखकर बोली,” जय अभी हमको जाने दो, प्लीज।“ वो लगभग भीख मांगते हुए बोली। जय,” क्या हुआ दीदी डर गयी? बस हो गया,कल तक तो बोल रही थी कि माँ से हम तुमको मांग ले। कविता की आंखों में आंसू आ गए थे,” हां, हम डर गए हैं। पता नहीं अब क्या होगा? कहीं हम तुमको खो ना बैठे?


जय- अभी तो शुरुवात हुई है ज़माने से लड़ने की, तुम्हारा प्यार इतना कमजोर नहीं हो सकता कि, अभी से डगमगाने लगे। अरे दीदी तुम साथ रहोगी तभी तो इस ज़माने से हम दोनों के लिए लड़ेंगे। ये रास्ता आसान नहीं होगा, ये तो तुमको भी पता था। 

कविता- पर… 

जय- पर वर कुछ नहीं तुम हमारे साथ निडर होकर रहो।”

जय उसे अपनी ओर खींच लिया और गले से लगा लिया। कविता उसके गाल सहलाते हुए बोली,” पर जय कैसे होगा? तुम खुद सोचो एक बहन अपनी माँ से खुद के सगे भाई से शादी की बात कैसे करेगी? इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए।

जय- अरे कविता दीदी, तुम वो बहादुर लड़की हो,जिसने हमको और माँ को तब संभाला जब पिताजी नहीं थे। तुमसे ज्यादा बहादुर लड़की हम नहीं देखे हैं। अगर ये हिम्मत तुममें नहीं हो सकती, तो इस दुनिया में कोई लड़की ऐसा नहीं कर सकती।” जय के इन शब्दों से कविता का भरोसा बढ़ा, और उसकी आँखों में देख दृढ़ निश्चय के साथ बोली,”हम थोड़ा देर के लिए घबरा गए थे। हमको माफ कर दो। भगवान जानते हैं कि हम तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकते हैं जानू भैया। खुद खत्म हो जाएंगे, पर तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेंगे।” 

“लेकिन अभी हमको कपड़े बदलने दो। क्योंकि अब हमको लड़ाई के साथ साथ माँ को इस रिश्ते के लिए मनाना भी है और उनको भी इसमें शामिल करना होगा।” कविता ये बोलते हुए दरवाज़े से निकल गयी। वो अपने कमरे में पहुंची और शलवार सूट पहनने लगी। उसने जैसे ही कपड़े पहने,की हॉल से ममता ने कविता को आवाज़ लगाई। 

कविता….कविता… बाहर आओ।”

कविता बाल खुले, पीला सूट पहनकर बाहर आई। जय अपने कमरे से सब देख रहा था। ममता नाइटी पहनी थी, मैरून रंग का। कविता बाहर आकर, सीधा ममता के पास गई,” बोलो माँ।”

ममता- क्या कर रही थी, तुम नंगी होकर जय के कमरे में। कबसे चल रहा है ये सब? हम घर पर नहीं रहते तो तुम दोनों आपस में ही….। अरे भाई बहन हो तुम दोनों, और ये घिनौना काम करते हो। अरे निर्लज… कहीं की।

कविता- माँ, हम आराम से बात करते हैं, आओ कमरे में चले। हम सब समझाते हैं तुमको।तुम गुस्सा मत हो।

ममता- क्या समझाएगी हमको। अरे हमारी आधी उम्र निकल गयी, समझ तो तेरी गंदगी से भरी पड़ी है। ऐसी कुलक्षिणी बेटी हुई है, की अपने सगे भाई से चुदवाती है। ज्यादे आग लगी थी, जवानी में शादी तक बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। 

कविता – माँ, यहां नहीं, प्लीज कमरे में चलो वहां बात करते हैं। यहां ठीक नहीं है।

ममता- आये हाये भाई के सामने नंगी घूम रही थी, तो ठीक था अब बात करना भी ठीक नहीं लग रहा। बेशर्म कहीं की राखी लण्ड पर नहीं कलाई पर बांधी जाती है। सारे जहां में भाई ही मिल था, रंगरेलियाँ मनाने। भाई बहन के पवित्र रिश्ते को कलंकित कर दिए हो दोनों। जो भाई तुम्हारे मंडप को सजता तुम, उसके साथ बिस्तर सजा ली। तुम दोनों को अंदाजा भी है, की क्या किया है तुम लोगों ने। सच कहते हैं, लड़की की जल्दी शादी कर देनी चाहिए, काम से कम मुंह तो काला नहीं करवाएगी। ठहर जा तेरी शादी इसी महीने कर दूंगी। अबसे तुम, अपने मामा के पास जाकर रहोगी, जब तक तुम्हारी शादी नही हो जाए। कम से कम अपने भाई के साथ ये काम तो नहीं करोगी, बेशर्म लड़की।

कविता- खुद तुमको शर्म आता है। जो हमको बेशर्म बोल रही हो।

ममता,” क्या कहा? 

कविता- वही जो तुम सुनी हो। हमको शर्म मत सिखाओ। खुद तो अपने बेटे का लण्ड चूस रही थी। माँ होकर बेटे के साथ ऐसा रिश्ता तुम बना सकती हो, तो भाई बहन के बीच रिश्ता बन गया तो तुमको मिर्ची काहे लग गया। हम जय को बहुत चाहते हैं। और उससे ही शादी करेंगे। रही बात शादी की तुम को अंदाज़ नहीं था, कि हमारा उम्र कितना हो गया है। हमारी उम्र की लड़कियों के दो दो बच्चे हो गए हैं। और हमारे नसीब में ये सब तो दूर, ज़िंदगी की परेशानियां, ही लिखी थी। हर लड़की चाहती है समय से उसकी शादी हो, बच्चे हो। उसके कुछ अरमान होते हैं। पर हम तो घर की खातिर अपने अरमान भुला बैठे। ये भूल ही गए थे कि हम एक लड़की भी हैं। ना किसी से मिलना, ना किसी से बात करना। पिछले कितने सालों से यही कर रही थे हम। तुम भी स्वार्थी निकली, घर चलाने के चक्कर मे भूल गयी कि लड़की की शादी समय पर की जाती है। नहीं तो जवानी में कदम बहक जाते हैं। फिर जय ने हमको आखिर ये एहसास दिलाया कि हम एक लड़की भी हैं। जो खुद को जिम्मेदारियों में खो चुकी है। तुम खुद तो शादी 18 साल मे की थी, पर यहां तो 26 हो गया है। कब तक खुद को संभालते। बाहर किसी और के साथ ये सब करते तो तुम्हारा नाम होता क्या? अरे और बेइज़्ज़ती होता। और मुंह मत खुलवाओ हमारा। तुम क्या क्या गुल खिलाई हो, हमको सब पता है।

ममता अवाक थी,” तुम पगला गयी हो क्या? तुमको तो …. ये बोलकर वो कविता को मारने के लिए आगे बढ़ी। और दो थप्पड़ मारा। कविता के गाल लाल हो गए। 

ममता- तुझ जैसी बेटी से अच्छा होता कि बांझन होती। ये दिन तो नहीं देखना पड़ता। तू तो एक नंबर की रंडी निकली, छिनाल कहीं की। 

कविता गाल सहलाते हुए- जैसी माँ वैसी बेटी। तुम हमसे बड़ी रांड हो जो तीन तीन मर्दों से चुदवाई हो। पहले बाबूजी से फिर, उस हरामी चाचा से और अब अपने बेटे से। तुम तो एक मिशाल हो रंडीपन के इतिहास में। 

ममता- चुप कर छिनाल, तुझे कुछ पता नहीं है। उसकी वजह कुछ और थी।

कविता- तुम जैसी औरत वजहें ढूंढती है। देखो हमको सब पता है। हमने ही तुमको और जय को खजुराहो भेजा था। क्योंकि वो तुमको पसंद करता था। तुम भी एक प्यासी विधवा थी। जय ने वहां तुम्हारे अंदर की दबी प्यास उजागर कर दी। तुम दोनों ने वहाँ मंदिर कम घूमे, और हनीमून ज्यादा मनाया है। तुम उसके साथ शादी कर चुकी हो, ये हमको पता है। हमको इससे कोई एतराज़ नहीं। लेकिन फिर हमें पता चला कि हर साल तुम गांव बहाने से क्यों जाती थी। उस हरामी शशिकांत चाचा से चुदवाने। कंचन ने तुम दोनों को देख लिया था, जिसकी खबर उसने हमको दी और हम जय को बता दिए। पर उसने तुमको ये बात तुमको चोदने के बाद बताई। क्योंकि वो तुमको हासिल नहीं पाना चाहता था। इतना अच्छा लड़का है वो।

ममता चुपचाप खड़ी थी। उसने अपनी ज़िंदगी में किसीके मुँह से इतने कड़े शब्द नहीं सुने थे। और आज अपनी ही बेटी उसको सब सुना रही थी, और ये सारी बातें, सच थी।

कविता- क्यों माँ, हम सच बोल रहे है ना? जब तुम ऐसी हो तो अपनी बेटी से क्या उम्मीद करती हो। हम तो स्वीकारते हैं, की जय के साथ हम चुदाई किये है। पर तुम तो पता नहीं किस किस का बिस्तर गरम की हो। हम इस घर का इज़्ज़त बाहर नहीं उछाले हैं। और तुम ही तो कहती हो कि बाहर, की बिरयानी खाने से अच्छा घर की दाल खाओ। और यहां तो शाही बिरयानी घर मे थी। किसी चीज़ का डर भी नहीं था। घर की चीज़ घर मे ही रहेगी। 

ममता नज़रें चुरा रही थी। कविता उसके करीब आयी और बोली,” क्या हुआ शर्म आ रही है। शर्माओ मत, क्योंकि हम दोनों की किस्मत इस घर के मर्द के साथ जुड़ी हुई है। हम तुम्हारे और जय के रिश्ते को स्वीकारते हैं, बदले में तुमको भी इस रिश्ते को स्वीकारना होगा। 

ममता – चुप हो जा बेशर्म लड़की, अपनी माँ से ऐसी बात करती हो। सौ रंडियाँ मरी होगी, तो तू पैदा हुई होगी। भोंसड़ीवाली शर्म को अपने भाई के लण्ड पर राखी पर छोड़ दी हो क्या। और उसे मारने के लिए फिर हाथ उठायी। इस बार कविता ने उसका हाथ रोक लिया।

कविता- बस बहुत हो गया। तबसे तुमको माँ बोल रहे हैं, इसलिए चढ़ रही हो। साली कुतिया, बेटे को मादरचोद बनाई हो। खुद को तो शर्म आती नही। और एक बात ज्यादा आग है ना तो तुम सड़क पर जाकर धंधा कर लो, क्योंकि हम तो जय के साथ ही रहेंगे उसके कमरे में।

ममता के अंदर आग लग गयी और वो चिल्ला कर बोली,” हम जय को बहुत प्यार करते हैं। हम दोनों शादी कर चुके हैं। 

कविता- वो हमको प्यार करता है समझी। और उसने हमारी मांग भी भड़ी है। हम दोनों ही उसकी बीवियां हैं। 

ममता- झूठ बोलती है हरामज़्यादी, बुरचोदी छिनरी कहीं की।

कविता- तुम तो सब अपना आंख से देखी हो, चुद्दक्कड़ बुढ़िया। 

ममता- अरे भाईचोदी, बुर में आग लगी थी, तो भाई का लण्ड ही ले ली।

कविता- भाई का ही लिए हैं, ना कि तुम्हारे जैसे बेटे का। मादरचोद बना दी हो बेटे को। खूब पसंद है उसका लौड़ा। बुर तो पहले से ही भोंसड़ा होगा, कुआँ बनवाएगी क्या? 

ममता- पसंद है तो, डायन कहीं की। और हम बुर का भोंसड़ा बनवाये या गाँड़ का गड्ढा। ये जय और हमारा मामला है।

कविता- डायन हम नहीं तुम हो। बेटे से पेलवती हो और खुद को सती सावित्री समझती है। हरामी कुत्ती साली।

ममता- अरे हराम की जनी तुम हो, हम नहीं।हम तो अपने बाप की पैदाइश हैं। तुम दोनों को तो पता भी नहीं है कि तुम्हारा बाप कौन है? 

कविता- जा जा कुछ भी बक रही है। 

ममता- जानना चाहती है, तुम दोनों शशिकांत की औलाद हो। तेरे बाप का तो खड़ा भी नहीं होता था। शशिकांत के साथ तेरी दादी ने हमको बच्चा पैदा करवाया। वो कंचन भी हमारी बेटी ही है। हम दोनों के तीन बच्चे हुए। माया ने कंचन को हमसे बचपन मे ही मांग लिया था। जिस शशिकांत को गाली देती है ना, उसीकी बेटी हो तुम। क्या हुआ? सांप सूंघ गया क्या? तुमलोगों ने साबित कर दिया कि हराम की औलाद, आखिर हरामी ही निकलती है। हो भले ही एक बाप के, पर हो तो हरामी ही ना। अब जिन बच्चों की नींव ही नाजायज रिश्ते पर पड़ी हो, वे तो ऐसी हरक़तें करेंगे ही।

कविता- कुछ भी मत बोल, अनाप शनाप बकती जा रही हो। वो हमारा बाप नहीं हो सकता। हमारा बाप अमरकांत झा हैं।

ममता को तब समझ आया कि वो क्या बोल गई, उसने सोचा कि उसे ये बात कविता को नहीं बतानी चाहिए थी। पर अब वो शब्द मुंह से निकल निकल चुके थे, और वापिस आ नहीं सकते थे।


तभी जय आ गया और बोला,” ये सब क्या चल रहा है? आपस मे लड़ाई बंद करो। चुपचाप होकर दोनों बैठ जाओ। ये बिल्लियों की तरह लड़ना बंद करो।”

कविता के मुंह से निकला,” देखो ना ये क्या बोल रही है?” 

जय खुद शॉक में था,” माँ, सच बताओ। कह दो की ये सब झूठ है। तुम हमारी माँ हो और अमरकांत हमारे बाबूजी।”

ममता- हम तुम्हारी माँ हैं, पर अमरकांत नही शशीजी तुम दोनों के पिता हैं। 

कविता- नहीं, उसने तो हमको, वहां से निकाल दिया था। कोई बाप ऐसा नहीं कर सकता। 

ममता- 2.55 करोड़ का चेक भेज सकता है ना। तुम दोनों को वो बहुत याद करते हैं। गांव में लोगों को शक हो गया था, कि तुम दोनों उनके बच्चे हो। तुम दोनों को यहां भेजने के बाद भी, अपनी वसीयत में तुमलोगों को ही उत्तराधिकारी बनाये हैं।

कविता- अच्छा मतलब वो सब एक ड्रामा था। फिर भी हम अमरकांत झा को ही बाप मानेंगे। उस आदमी के प्रति अब हमारे दिल मे कोई इज़्ज़त नहीं।

जय- हम दोनों उसकी औलाद हैं। पर उससे ये सच्चाई नहीं बदलती की हम और कविता एक दूसरे से प्यार करते हैं। हमारे भूतकाल से हमारे वर्तमान पर कोई प्रभाव नहीं पर सकता। हम तुमको भी बहुत प्यार करते हैं ममता। तुम दोनों ही हमारे जीवन की सच्चाई हो।

जय दोनों के बीच बैठते हुए बोला,” ममता, तुम अब शशिकांत का चैप्टर यहीं बंद करो। तुम अब हमारी हो और कविता तुम भी। अबसे उस आदमी को कोई जिक्र नहीं होगा। हम तुम दोनों का बात सुनें हैं। माँ, कविता सब सच बोल रही है। इसको सजा मत दो, जो कुछ किया है, हम दोनों ने साथ मे किया है। हम ही इसकी जवानी को लूटे हैं। ये बेचारी तो, सोच सोचकर मरी जा रही थी। बाद में हम इसको बताए कि, प्यार तो अंधा होता है। जैसे तुम्हारा और हमारा है। हम तुम दोनों को बेहद चाहते हैं और तुम दोनों को हमेशा के लिए अपनी बनाकर रखना चाहते हैं। 

ममता- कैसे होगा माँ बेटी, एक ही मर्द के साथ। ये अजीब है।

कविता- इन्हीं अजीब बातों में तो मज़ा है।

जय- सही बोल रही है, कविता। ममता तुम शुरू में भी झिझकी थी, हम दोनों के बीच जब खजुराहो में संबंध बने थे। अब इसको भी स्वीकार करो। देखो कविता में तुमको एक अच्छी बेटी के साथ साथ बहु भी मिलेगी। और हम तुम्हारे बेटे भी और जमाई भी। तुम्हारी नज़र में कविता से अछि लड़की नहीं हो सकती और हमसे अच्छा लड़का नहीं। क्यों ना हम इसी घर मे अपनी छोटी सी दुनिया बसा लें। जहां तुमको नाती पोते एक साथ मिले। 

ममता- हमको अभी कुछ समझ नहीं आ रहा। हम अभी कुछ नहीं कह सकते। अब हमारा सर दर्द कर रहा है। हम आराम करने जा रहे हैं। 

जय- कविता जाओ, अपनी सासू माँ का सर दबा दो।

ममता- उसकी कोई जरूरत नहीं है। और अभी हमने इसको अपनी बहू नहीं स्वीकार किया है। तो ये अभी हमारी बेटी ही है।

जय- ठीक है जैसा तुमको सही लगे। लेकिन उम्मीद है कि तुम हमारे प्यार को समझोगी।

ममता अपने कमरे में चली गयी। जय और कविता एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले, जय के कमरे में चले गए। अब शायद इस घर मे पहले से कुछ नहीं था। कम से कम घर के सारे राज़ पर्दे से बाहर आ चुके थे।

ममता अपने कमरे में लेटी थी, तभी उसे एक चिर परिचित आवाज़ सुनाई दी। सामने उसका अक्स फिर खड़ा था। इस बार वो एक सुहागन की तरह सजी थी। 

ममता- तुम फिर आ गयी? 

” हाँ, ममता हम तो ऐसे ही आते हैं। जब भी तुम्हारे मन मे कोई द्वंद्व होगा, तुम हमको अपने सामने पाओगी। कैसी लग रही हूँ, इस लाल जोड़े में? अच्छी है ना। तुम खुद को भी तो ऐसे ही देखना चाहती हो। जय की सुहागन बन इस घर को नया चिराग देना चाहती हो।”

ममता- हां, सही कहा। पर कविता हमारी बेटी भी जय को प्यार करती है। ये अजीब लग रहा है हमको। हम माँ बेटी कैसे घर के एकलौते मर्द को अपना पति बना ले? 

” हहम्मम्म, लेकिन इसमें हर्ज क्या है? जय तो तुमको दिलो जान से प्यार करता है। वो कविता को प्यार करता भी है, तो इसमें तुम्हारा कोई नुकसान नही है। क्योंकि कविता तुम्हारी इज़्ज़त करती है। वो तुम्हारे और जय के बीच कभी कोई दीवार नहीं बनेगी। ज़रा सोचो उसीने जय और तुमको खजुराहो भेजा और तुम दोनों करीब आये। कौन लड़की ऐसा करती है? याद है तुमको उस रात जब हम मिले थे, तो हजम सफेद कपड़ों में थे। पर आज इस लाल जोड़े में सिर्फ कविता की वजह से है। तुम सुहागन होकर भी सूनी मांग लेकर घूम रही हो। जय के नाम की सिंदूर क्यों नहीं लगाती हो? तुमको डर लगता था। पर अब इस घर में तुम ये कर पाओगी अगर तुम उन दोनों के रिश्ते को मंजूरी दे दो। दोनों तुमको बहुत खुश रखेंगे। और ये देखो।”

ममता के अक्स ने अपनी साड़ी पेट से उठायी तो, उसका पेट फूला हुआ था, जैसे सात आठ महीने का बच्चा हो। ममता वो देखी और पूछ उठी,” ये जय का बच्चा है।”

“ममता तुमने ठीक समझा। ये जय का बच्चा है, जो तुम्हारे पेट मे होगा। तुम दोनों के प्यार की निशानी। जय तुमको बहुत जल्दी फिर से माँ बना देगा, पर इस बार अपनी नहीं, बल्कि अपने बच्चे की। तुम भी तो यही चाहती हो। लेकिन इसके लिए तुमको कविता को समझाना होगा। और अगर तुम उनके रिश्ते को स्वीकार लोगों, तो फिर कविता इन दिनों में बहुत खयाल भी रखेगी। ये बच्चा तुम तीनों के रिश्ते के लिए अहम होगा। तुमने अगर ज़्यादा वक़्त लगाया तो, शायद तुम माँ ना बन पाओ। क्योंकि तुम्हारी उम्र भी ढल रही है। तुम चाहो तो, इसको इस साल हक़ीक़त में बदल सकती हो।”

ममता- पर…..

” पर वर क्या? तुम खुद सोचो कि इससे हसीन मौका अब नही आएगा। हा… हा.. हा”

और वो गायब हो गयी। ममता सोच में पड़ गयी। ” आखिर अगर बच्चे खुश हैं, तो इसीमें हम भी खुश हैं। वो दोनों हमेशा हमारे पास ही रहेंगे। अगर  कविता की शादी दूसरे से हो जाएगी, और हम जय के साथ रहेंगे शुरू में तो ठीक रहेगा। पर हमारे मरने के बाद जय अकेला हो जाएगा। हम अपना सुख तो भोग लेंगे, पर जय की जवानी की प्यास अधूरी रह जायेगी। उधर कविता की भी चिंता लगी रहेगी। ये ठीक रहेगा अगर कविता जय की बीवी बैंकर इसी घर मे रहे, वो उसका खूब ख्याल रखेगी। दोनों के बीच प्यार भी गहरा है। हम माँ होकर उन दोनों के बीच की दीवार नहीं बन सकते। उन दोनों नहीं हजम तीनों को एक होकर इस घर में रहना होगा।”

ये सोच ममता की नज़र घड़ी पर गयी, इस वक़्त शाम के सात बजे रहे थे। वो करीब 6 घंटो से सो रही थी। तभी उसको बुर से कुछ रिसता हुआ प्रतीत हुआ। उसने छुवा तो देखा कि खून लगा था। उसकी माहवारी शुरू हो गयी थी। वो बाथरूम गयी, और पैंटी बदली। फिर पैड लगाया और साफ सुथरी पैंटी पहन ली। मन मे खुश थी कि उसकी माहवारी चल रही है, क्योंकि बहुत जल्द नौ महीनों के लिए बंद हो जाएगी।

वो बेधड़क जय के कमरे की ओर बढ़ रही थी।

जय और कविता कमरे में बैठे एक दूसरे से बातें कर रहे थे। कविता बोल रही थी,” तुम बहुत भाग्यशाली हो जो ममता दीदी का प्यार तुमको मिला। वो तुम्हारा बहुत ध्यान रखेगी। ऐसी औरतें बहुत कम होती हैं।”

ममता घुसते ही बोली,” तुम्हारे जैसी लड़की भी तो कम होती हैं, जो अपने होने वाले पति को एक अधेड़ महिला के साथ बाटने को तैयार हो। आजकल ऐसी लड़कियां कहाँ करती है! 

जय और कविता खड़े हो गए,” माँ आओ ना। बैठो।”

ममता कविता के गाल पर हाथ फेरती हुई बोलती है,” अरे हमारी बच्ची, हमारा बात का बुरा मत मानना। हमने जो कहा था, गुस्से में। तुम दोनों अगर आपस में खुश हो तो एक माँ होने के नाते उसी में हमारी भी खुशी है।”

और आप जय साहब हम दोनों को संभाल लेंगे ना। दो बीवी में परेशान तो नहीं होंगे।” 

कविता- मतलब? 

जय- ममता मान गयी है, कविता। याहू…….. चाहे कोई मुझे जंगली कहे, केहनो दो जी कहता रहे… 

ममता और कविता- हम प्यार के तूफानों में घिरे हैं हम क्या करें। जय ने दोनों माँ बेटी को दांये बाएं गले से लगा लिया। तीनों फिर ज़ोर से बोले,” याहू……”

तीनो खूब हँस रहे थे। जय के एक बगल उसकी माँ और दूसरी तरफ उसकी दीदी थी, जो कि अब उसकी प्रेमिकाएं बन चुकी थी।





 जय ने ममता को होंठों पर चूमा फिर कविता को भी वैसे ही चूमा। फिर ममता ने उसके गाल पर चुम्मा लिया और फिर कविता ने। 

जय- आज तुम दोनों ने हमको बहुत बड़ी खुशी दी है। ममता और कविता तुम दोनों हमारी बीवी हो। ममता हमको तुम्हारे बीते हुए कल में कोई दिलचस्पी नहीं है, तुमने जो भी किया वो सब बीत गया। अबसे तुम एक नई शुरुवात करोगी। इस घर की जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। कविता, तुमको तो शुरू से ही, ममता और हमारे रिश्ते से कोई दिक्कत नहीं है। कल हमलोग नए घर देखने जाएंगे और घर फाइनल करने के बाद, हम तुमसे मंदिर में शादी करेंगे। और वहाँ, पर हम तीनों सुख से रहेंगे।”

कविता- हमको तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि तुम मान गयी हो माँ।

ममता- माँ नहीं, अबसे दीदी बुलाओ। अब हम दोनों माँ बेटी नहीं, बहनें हैं। वैसे भी जब बेटी जवान हो जाती है तो वो सहेली बन जाती है।

कविता- सच कहा दीदी। लेकिन जिस दिन शादी होगी उस दिन हमारी सासू माँ बनेंगी या माँ।

ममता- अपनी फूल सी बच्ची को विदाकर माँ का फर्ज पूरा करेंगे। फिर तुम्हारा स्वागत कर सासू माँ। और उसके बाद दोनों इसी घर की बहुएं बन कर रहेगी। 

कविता- जय कहीं ये सपना तो नहीं ?

ममता- ये क्या कर रही हो? चलो शादी तक नाम से बुला लो, फिर इनका नाम कभी मत लेना। औरतों को अपने पति का नाम नहीं लेना चाहिए।

जय ने ठीक उसी वक़्त कविता के गाँड़ पर चिकोटी काट ली। कविता- इससशशश, बिट्ठु काहे काट लिए? आहह। कविता चूतड़ सहलाते हुए बोली।

जय- तुमको सपने से जगाने के लिए कविता दीदी।” फिर ममता की ओर मुड़ा और बोला,” दीदी की माँ और सासु माँ दोनों बनोगी, हमको दामाद नहीं बनाओगी।हमको भी ससुराल का मज़ा चाहिए ना।” जय मज़ाक में मुंह बनाकर बोला।

ममता हंसते हुए बोली,” अरे बेटाजी, आप तो सैयांजी और दामादजी दोनों हैं। लेकिन ससुराल का मज़ा तो साली हो तभी आता है।

जय- तुम हो ना। वैसे भी तुम दोनों माँ बेटी कम, और बहनें ज्यादा लगती हो।”

ममता- बातें खूब बनाते हैं, आप भी ना।आप कुछ घर लेने की बात कर रहे थे। 

जय- हां हम और कविता वही देख रहे थे, लैपटॉप पर। हमदोनों ने एक घर देखा है। यहाँ से 12 कि मी दूर है। मेट्रो, हॉस्पिटल, मार्किट सब पास में हैं। पचासी लाख में मिल रहा है। कल हम तीनों देखने जाएंगे। वहां फिर कोई अच्छा दिन देख चले जायेंगे।

जय ने उन दोनों को अपने आस पास बिठाया। दोनों उससे चिपकी हुई थी। फिर उसने ममता को लैपटॉप पर वो घर दिखाया। ममता को भी घर पसंद आया। 

ममता- पर आप सत्यप्रकाश से सलाह ले लेना। ये घर की बात है। और सत्य यहां बहुत दिनों से है। 

जय- ठीक है।

ममता ने फिर घड़ी देखी तो शाम के 7 बज चुके थे। वो उठकर खाना पकाने जाने लेगी। तो जय ने पूछा,” कहां चली?

ममता- खाना पकाने। 

जय- आज खाना बाहर से मंगवा लेते हैं। आज तो मस्ती की रात होगी। हम तीनों साथ रहेंगे और मज़े करेंगे।

ममता- हम एक बात बोलना चाहते हैं। भले ही हम दोनों माँ बेटी के बीच रिश्ते बदल गए हैं, पर अभी हम कविता के सामने नंगी होकर चुदाई नहीं कर पाएंगे। इसमें थोड़ा समय लगेगा। आखिर है तो वो हमारी बेटी ना। हम आपको निराश नहीं करना चाहते, आप हमारी स्थिति को समझिए। प्लीज हमको थोड़ा समय दीजिये।

जय- ये क्या कह रही हो तुम? अब तो सब साफ हो गया है। फिर तुमको क्या तकलीफ है।

कविता- जय माँ ठीक कह रही है। हम जानते हैं ये इतना आसान नहीं होगा, की एक माँ अपनी बेटी के सामने अपने ही बेटे से चुदवाए। ये रिश्ता बना ये तो ठीक है, पर अभी तीनों का एक साथ सामूहिक चुदाई में संलग्न होने में समय लगेगा। हम माँ की बात से सहमत हैं। 

जय- ठीक है। तो तुम दोनों में से आज की रात हमारे साथ सोएगी। क्योंकि शादी तो तुम दोनों से किये हैं।

ममता ने कविता को उठाया और बोली,” आज की रात तो आपको अकेले सोना होगा क्योंकि, कविता की अभी ठीक से शादी नहीं हुई है आपके साथ। और हमको माहवारी आई है। आज की रात और कविता से शादी के दिन तक अब आपको अकेले रहना होगा।”

जय- ये क्या ज़ुल्म कर रही हो? दो दो बीवियां होते हुए अकेले सोना पड़ेगा।

ममता- कविता से दूर रहोगे कुछ दिन, तब तो आपको सुहागरात के दिन मज़ा आएगा।” कहकर ममता हंसी।

जय- लेकिन जब तुम नहीं रहोगी, तब तो हम इसको चोद लेंगे।

ममता- वो नहीं कर पाओगे, क्योंकि कविता कल से अपने मामा के पास रहेगी और अब शादी के दिन ही यहां आएगी। हम दोनों कुछ दिन वहां रहेंगी।

जय- पर मामा से क्या कहोगी? की तुम दोनों वहां क्यों रहने गयी हो? और शादी के बारे में तो उनको बताना ही पड़ेगा ना?

ममता- इसमें क्या बात है, क्या कोई बहन कुछ दिनों के लिए अपने भाई के यहां नहीं रह सकती? रही बात शादी की तो हम उसको समझ देंगे। और फिर कविता का कन्यादान भी उसीको करना पड़ेगा।

कविता- मामा कैसे मानेंगे माँ, इस रिश्ते के लिए। उनको भनक पड़ेगी तो पूरा भूकंप आया जाएगा। हमको नहीं लगता कि वो मंजूरी देंगे। और तुम तो कह रही हो कि उनसे हमारा कन्यादान करवाओगी। ये असंभव है।”

ममता- सब होगा। तुम दोनों का रिश्ता हम स्वीकार किये ना। ये भी तो असंभव था। लेकिन हुआ ना! तुम दोनों के बीच भी बहन का रिश्ता प्रेमी प्रेमिका का हो गया। हुआ ना! और हम दोनों माँ बेटे से पति पत्नी हो गए। हुआ ना! तुम दोनों वो सब हमपर छोड़ दो। “

कविता और जय आश्चर्य में थे।

उस रात जय अकेले ही सोया। और अगले दिन तीनों घर देखने गए। वो किसी सरदार का घर था। जय ने कविता को अपनी बीवी और ममता को कविता की बड़ी बहन बताया। उसे जल्द ही पैसों की जरूरत थी। वो तीन बी एच के था, आगे और पीछे दोनों तरफ लॉन था। टेरेस भी काफी बड़ा था। वो घर सड़क से लगभग 100 मी अंदर था। चारो तरफ लंबे लंबे पेड़ लगे हुए था। घर के आसपास अभी कोई दूसरा घर नहीं था। छत से सड़क दिखती थी। तीनों की अय्याशी के लिए ये घर एक दम परफेक्ट था। जय ने तो मन मे सोच लिया था कि किसको कहां कैसे कैसे चोदेगा। ममता और कविता भी मुस्कुरा रही थी, शायद वो दोनों भी नटखटी बातें सोच रही थी। फिर वो लोग वहां से चले आये, रजिस्ट्री का दिन तय हो गया आठवें दिन। जय फिर उन दोनों को मंदिर ले गया, वहां उन्होंने ने दर्शन किये। फिर मंदिर के अंदर पुजारी जी से शादी का दिन निकलवाया। पुजारीजी ने पूर्णिमा का दिन शुभ बताया, जो कि रजिस्ट्री के दो दिन बाद कि थी। वहां पंडितजी को एडवांस पैसे देकर शादी वाले दिन आने को कहा गया। पंडितजी ने हामी भर दी। 

शाम के तीन बजे उन दोनों को जय सत्यप्रकाश के यहां छोड़ने गया। पर उसका चेहरा उदास था, क्योंकि अब उसको दसवें दिन ही, अपनी बीवियां नसीब होंगी।

जय वहां कुछ देर रुका और फिर निकल गया। सत्यप्रकाश को पता थी कि दोनों आ रहे हैं, इसलिए उसने चाभी पड़ोस में दे रखी थी। 

उधर जय घर पहुंचा, तो उसे घर काटने को दौड़ा। उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। जय ने कविता को फोन लगाया, पर वो फोन नहीं उठाई शायद काम मे बिजी रही होगी। उसकी आंख कब लगी उसको पता ही नहीं चला।

शाम सात बजे, कविता ने फोन किया, तो उसकी आंख खुली। 

कविता- हेलो जानू।

जय- अरे दीदी, कहां थी तुम? कितना फ़ोन किये, तुमको।

कविता- काम कर रही थी। नाराज़ हो?

जय- नाराज़ नहीं, उदास हैं। तुम्हारी याद आ रही है।

कविता- हमारा हाल भी, वैसा ही है। मन कर रहा है कि कब तुम्हारे पास आ जाये। लेकिन इतने दिन दूर रहेंगे तो, शादी वाले दिन का मज़ा डबल हो जाएगा।

जय- ये दस दिन, कैसे काटेंगे। तुमलोगों के बगैर।

कविता- काटने तो पड़ेंगे। आज के बाद शायद हम फोन नहीं कर पाएंगे। माँ ने हमारा और अपना फोन शादी तक स्विच ऑफ करने बोला है। आई लव यू जान। उम्म्म्म्मममः

और फोन कट गया।

जय खुद को बिजी रखने लगा। सत्यप्रकाश भी अगले दिन जय के साथ घर घूम और उसने अपनी मुहर लगा दी। जय घर की खरीददारी, और अपने लिए शादी की मार्केटिंग करने लगा। ममता और कविता उधर अपनी मार्केटिंग खुद कर रहे थे। किसी तरह दिन निकले और रजिस्ट्री का दिन आ गया। चुकी रजिस्ट्री, कविता और ममता के नाम थी तो सत्य के साथ, वो दोनों सीधे रजिस्ट्री ऑफिस पहुंचे। जय और सरदारजी पहले से इंतज़ार कर रहे थे। जय ने जब दोनों को देखा तो मुँह से निकला,” उफ़्फ़फ़”।

कविता और ममता की फिटनेस काफी इम्प्रूव हो गयी थी। ममता ने भी वजन कम किया था। कविता जीन्स और टॉप में थी, उसके उभार बहुत सही लग रहे थे। ममता ने रेड कलर की सारी पहनी थी। उसे समझ नही आ रहा था, की किसको देखे। उसने पहले ममता को निहारा, ममता के पेट की चर्बी में कमी आयी थी। चेहरे पर भी सुधार था। वो गोगल लगाए हुए थी। उसके चेहरा देखने से साफ पता चल रहा था, की ब्यूटी पार्लर से आ रही है। एक दम ग्लोइंग चेहरा शायद उसने फेसिअल वगैरह कराया था। बाल भी डिज़ाइनर स्टाइल में कटे हुए थे। भौएँ भी बनी हुई थी। होंठों पर लाल लिपस्टिक, पैरों में सैंडल। उसने कभी ममता को इस रूप में नहीं देखा था। उसकी माँ शायद ही उसके सामने ब्यूटी पार्लर गयी थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि ममता एक हफ्ते में इतनी खूबसूरत लगने लगेगी। दूसरी तरफ उसकी बहन कविता थी, जिसको शायद ही उसने कभी जीन्स में देखा था। वो तो हमेशा शलवार सूट में रहती थी। उसने अपने गॉगल्स सर पर टिकाए थे। होंठों पर पिंक लिपस्टिक, आंखों में गहरा काला काजल। वो भी ब्यूटी पार्लर से सीधे रैंप पर मॉडल की तरह आ रही थी। पैरों में काली सैंडल थी। कानो में बड़े मैटेलिक रंग के गोल झुमके। दोनों की केमिस्ट्री भी पहले से अलग थी। ऐसा लग रहा था जैसे दोनों सहेलियां हो। दोनों बिल्कुल मस्त लग रही थी। 

“भाईसाहब, चले। सरदारजी ने जय को कंधे से हिलाकर कहा। मुझे और भी काम हैगा।”

दोनों मुस्कुराई और फिर सब अंदर चले गए। रजिस्ट्री होते होते चार घंटे लग गए। फिर भी अभी एक अंतिम प्रक्रिया बाकी थी। दोनों मा बेटी एक दूसरे से बात कर रहे थे। जय उनको देख रहा था। तभी सत्य उसके पास आया और बोला,” क्या बात है, जीजाजी सब चीज़ ठीक जा रहा है, आपके लिए तो, दो बीवियां ये घर। क्या किस्मत है आपकी।”

जय- अरे नहीं ये सब तो…. एक..एक मिनट आपने हमको जीजाजी बोला। आप क्या बोल रहे हैं? 

सत्य- अरे जीजाजी, आपका साला हैं हम, हमको सब पता है, कविता के साथ ममता दीदी को खजुराहो में … ऐं… ऐं. ऐं। और हसने लगा। 

तभी उन लोगों को अंदर बुलाने लगे। 

सत्य- शादी वाले दिन सब पता चल जाएगा।

जय और वो अंदर गए। सारी प्रक्रिया पूरी हुई। जय के दिमाग मे सत्यप्रकाश की बातें कौंध रही थी। दोनों माँ बेटी ने जय से नार्मल बातें ही की। फिर वो सब वहां से चली गयी। 

फिर शादी का दिन आ गया। और जय को उसके घर से लेने सत्यप्रकाश नई गाड़ी लेकर आये। गाड़ी फूलों से सजी थी। ये जय का इस घर मे आखरी दिन था। सत्य ने जय को फूलों का गुलदस्ता दिया और बोला,” आइए दामादजी, चलिए।” जय गाड़ी में बैठा और उत्सुकता से अपनी बारात जो वो खुद ही था लेकर निकल गया। कुछ 45 मिनट लगे वहां पहुंचने में। जय को तो ये सदियों सा लग रहा था। जब गाड़ी गेट पर खड़ी हुई तो, सत्य गाड़ी से निकला। जय ने देखा कि वहां माया खड़ी थी। माया भी सजी धजी थी। उसने जय की आरती उतारी। उसको तिलक लगाया। फिर सत्यप्रकाश उसको गोद मे उठाकर अंदर घर में ले गया। वहां बस माया और सत्यप्रकाश नज़र आ रहे थे। ममता कहीं दिख नहीं रही थी। जय आश्चर्यचकित था, की माया मौसी को भी सब पता चल गया है। तभी पंडितजी आ गए। जय और सबने उनके पैर छुए। शादी शुरू हुई। जय अब तक मंडप में अकेला बैठा था। तब पंडितजी ने बोला,” कन्या को बुलाइए।

तब जय की नज़र दरवाज़े पर गयी तो, कविता दुल्हन के जोड़े में बिल्कुल गुड़िया सी लग रही थी। लाल रंग का लहंगा, और बैकलेस चोली थी। माथे, में टीका, नाक में नथिया, कानों में झुमके, हाथों में कंगन, पैरों में पायल, हाथों में मेहन्दी, पैरों में भी मेहन्दी लगी थी, चेहरे पर पूरा ब्राइडल मेक अप था। मुस्कुराते हुए, वो मंडप में पहुंची तो, जय ने अपना हाथ बढ़ाया, कविता उसकी ओर देख मुस्कुराई और उसका हाथ थाम लिया। जय ने उसे अपने बगल में बिठा लिया। 

पंडितजी सत्यप्रकाश की ओर देख कर बोले,” उनको भी साथ में बुला लीजिए। एक साथ हो जाएगा।”

सत्य- पंडितजी, पहले ये वाला कीजिये, फिर वो होगा। आपको पैसे तो दे ही रहे हैं। है कि नहीं।”

पंडितजी मुस्कुराए बोले ठीक है, जैसा आप कहे।”

जय को उनकी बातें समझ नहीं आ रही थी। पता नही कोई और शादी कर रहा है क्या? 

पंडितजी, फिर मंत्र पढ़ने लगे। और शादी आगे बढ़ने लगी। इसी क्रम में जय ने कविता की मांग भड़ी, उसके साथ फेरे लिए। सत्यप्रकाश ने कविता का कन्यादान भी किया। जाय आश्चर्य में था कि आखिर ममता है, कहाँ?

और शादी भी सम्पन्न हो गयी। जय और कविता उठकर मंडप से जाने लगे, तो पंडित ने जय को रोक लिया,” अरे आप कहाँ चले। आपको तो अभी 2 घंटे और बैठना है। “

जय को कुछ समझ नहीं आया। उसका शून्य चेहरा देख पंडितजी, बोले,” अरे ऐसे क्यों देख रहे हैं। सत्यप्रकाशजी ने बताया था कि, आप दोनों बहनों से शादी कर रहे हैं।”

सत्यप्रकाश- इन्हें इस बात की जानकारी नहीं है पंडितजी।

जय- किस बात की जानकारी?

पंडितजी- इस बात की। और एक तरफ हाथों से इशारा किया। वो वही कमरा था, जिस कमरे से कविता आई थी। जय ने पलट कर देखा, तो माया ममता को पकड़े आ रही थी। ममता भी शादी के जोड़े में थी। जय की आंखें खुली की खुली रह गयी।

जिस तरह सुबह होने पर धरती दुल्हन की तरह सजती है, जिस तरह रात होने पर चांद और सितारे धरती का चांदनी से श्रृंगार करते हैं ठीक उसी तरह ममता का श्रृंगार और आवरण उसको धरती की ही तरह सुंदर बना रहा था। उस अधेड़ उम्र में भी वो, किसी नवयौवना सी लग रही थी। आंखें बिल्कुल हिरणी सी काजल से सजी थी। होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से थे। उसने भी पूरा ब्राइडल मेक अप किया था। दोनों माँ बेटी ने एक सा जोड़ा पहना था। वही आभूषण कानों, नाक, हाथ, पैर, सब वही था। कमर में दोनों माँ बेटी ने कमरबंद पहना हुआ था। गले में सोने का हार भी था, जो कि बेहद खूबसूरत लग रहा था। ममता धीरे धीरे अपने मोतियों से दांत मुस्कुराते हुए बिखेड़ रही थी। जय उसमे इतना खो गया था कि, उसे होश ही नहीं था। 

पंडितजी- जजमान, कहाँ खो गए? आपकी ही होनेवाली है ये भी। बहुत कम लोग हैं, जो आप जितने भाग्यशाली होते हैं। एक साथ दो लड़कियों से शादी सबकी नहीं होती। 

जय और ममता अब मंडप में बैठ गए और एक दूसरे का हाथ थामे हुए थे। कविता भी वहीं बैठ रश्मो रिवाज़ में मदद कर रही थी। सत्यप्रकाश ने फिर ममता का कन्यादान किया। ममता की मांग भरी और फिर उसके साथ सात फेरे लिए। जय और ममता के आंखों में खजुराहो का दृश्य जाग उठा। दोनों अपनी पहली शादी, के तर्ज पर एक दूसरे का हाथ थाम, फेरे ले रहे थे। आखिरकार विवाह संपन्न हुआ। जय की आज दो दो शादी थी। पंडितजी को लेट हो रहा था, वो बोले,” जजमान, बहुत विलंभ हो रहा है, मुझे रवाना करें। भोजन हम करेंगे नहीं, हमारी दक्षिणा दे दे।”

तीनों जय, ममता और कविता ने एक साथ पंडितजी के पैर छुवे। पंडितजी ने आशीर्वाद दिया,” अखण्ड सौभाग्यवती भव:। पुत्र रत्न प्राप्ति भव:। आप दोनों जल्द से जल्द इनके बच्चों की माँ बने और कुशल गृहणी का कर्तव्य निभाये।” पति के पैर छुइये और खुदको समर्पित कीजिये।”

ममता और कविता ने जय के क़दमों में बैठकर उसके पैर छुए, और होंठों से चूम लिया। जय ने दोनों को उठाया और गले से लगा लिया।”

उधर सत्यप्रकाश ने पंडितजी, को दक्षिणा दी और विदा किया। फिर माया ममता और कविता को अलग की और जय को देख बोली,” जीजाजी, कैसे पटा लिया, हमारी दीदी और उनकी बेटी को। आप तो कमाल कर दिये। एक औरत और उसकी बेटी दोनों को अपना लिए। और ज़रा देखिए ना, इन दोनों के चेहरे की खुशी। आज से पहले कोई भी औरत, सौतन बनने पर खुश नही होती थी। आपने दोनों पर जादू कर दिया है। वैसे इतनी आसानी से नहीं मिलेगी दोनों, क्योंकि हम आपकी साली हैं, कुछ लेंगे तभी इनको आपसे मिलवाएंगे।”

जय- क्या मौसी, आपको यहां देख हम पहले ही चौंके हुए हैं। आप हमारी टांग खिंचाई कर रही हैं। अब जब सब आपको पता ही है, तो ये लीजिए 10000 रु।

माया- ये हुई ना बात, पर अभी हम मौसी नहीं, आपकी साली हैं। और हम इतने में एक बीवी देंगे। चलेगा आपको? 

जय- ये लीजिए और 10000 रु अब तो ये दोनों हमारी हुई।

माया- हाँ, अब हुई ना बात। अब आप चाहे तो मौसी के आशीर्वाद ले सकते हैं।

जय ने उसके पैर छुवे और कविता ने भी। माया ने दोनों का माथा चूमा और आशीर्वाद दिया। फिर सत्यप्रकाश ने भी उनको आशीर्वाद दिया। रात के 11 बज चुके थे। सत्यप्रकाश ने कहा,” चलिए विदाई का समय हो गया है। आइए”

सत्यप्रकाश गाड़ी ले आया और जय भी पीछे गाड़ी में बैठ गया। माया दोनों को लेकर पीछे से आ रही थी। जय उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। इतिहास में शायद पहली बार हो रहा था कि माँ और बेटी एक साथ एक ही पति की बीवियाँ बनकर उसके साथ खुशी खुशी जा रही थी, और वो उनका अपना सगा बेटा और भाई था। माया और ममता की आंखों में आंसू थे, ठीक वैसे ही जब अमरकांत उसको दुल्हन बनाके ले जा रहा था, और आज उसी का बेटा फिर से उसे दुल्हन बनाके ले जा रहा था। कविता भी ये देख रो रही थी। तीनों एक दूसरे से लिपटी थी। फिर आखिकार कविता और ममता कार में जय के अगल बगल बैठ गयी। फिर सत्यप्रकाश उनको वहां से नए घर की ओर ले चला। तीनों पीछे की सीट पर बैठे थे। कोई 1 घंटे में वे नए घर पर पहुंच गए। घर तो जैसे दीवाली की रात जैसे सजा था। सत्यप्रकाश कार से उतरा और घर का दरवाजा खोला। अंदर जाकर उसने, रीति रिवाज की तैयारी जो कि पूरी थी, उसका समान ले आया। वहां पर दोनों ममता और कविता ने घर के बाहर हाथों के छाप लगाए। फिर वैसा ही बैडरूम और किचन में भी किया। दोनों फिर बैडरूम में चली गयी। और जय के हाथों में चाभी देकर सत्यप्रकाश बोला,” ये लीजिए घर की चाबी। आपलोग अब यहां निश्चिन्त होकर रहिए। हम रोज़ 5 बजे शाम में आएंगे और रात का खाना पहुंचाएंगे। सुबह और दोपहर का खाना आपलोगों के पास पहुंच जाया करेगा। हमने पास से ही बोल दिया है। और किसी चीज़ की जरूरत पड़े तो हमको जरूर बताइएगा।”

जय- मामाजी, ये सब क्या हुआ कैसे हुआ हमको कुछ समझ मे नहीं आया?

सत्य- अब अपनी बीवियों से पूछिए, जाइये आपका इंतजार कर रही हैं। इन दोनों का ख्याल रखियेगा। हमको इज़ाज़त दीजिये। काफी लेट हो गया है। हम कल आते हैं।” और वो पलटकर जाने लगा।

जय- आप हमको आप आप क्यों बोल रहे हैं?

सत्य- साला हैं हम, आप हमारी बड़ी दीदी के पति। तो फिर आपको आप ही बोलेंगे ना।” मुस्कुराके बोला ” ये दरवाज़ा बंद कर लीजिए।” और वो दरवाज़ा सटाकर चला गया। बाहर गाड़ी चालू होने की आवाज़ हुई और वो डोर होती चली गई।

जय अचंभित था, की आखिर ये सब कौसे हुआ? उसने दरवाज़ा बंद किया। और अपने सवालों के जवाब ढूंढने, अपनी सुहागरात की सेज की ओर जाने लगा। इस सवाल का जवाब उसकी दो नई नवेली दुल्हन के पास था। उसके कदम दरवाज़े के पास पहुंचे। और उसने दरवाज़ा खोला। उसकी आँखों के सामने एक दिलकश नज़ारा था।



कमरे के अंदर गोल्डन पीले रंग की एल ई डी लाइट चारों ओर जल रही थी। पूरा कमरा फूलों से सजा हुआ था। अन्दर कमरे में किंग साइज बिस्तर लगा हुआ था। पूरा बिस्तर गुलाब की पंखुड़ियों से सजा हुआ था। पलंग के हर ओर फूलों का गुलदस्ता लगा हुआ था। कमरे में बेहद आकर्षक सुगंधित इत्र की खुशबू माहौल को बेहद मनमोहक बना रही थी। जय ने देखा कि उसकी माँ ममता और बहन कविता दोनों उसकी दुल्हन बन उस सेज पर उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही हैं। आज इसी सेज पर एक बेटा अपनी माँ और बहन के साथ सुहागरात मनाने वाला था। जय को आता देख ममता और कविता दोनों बिस्तर से उतर गई, और जय की ओर चल दी। दोनों अपना लहँगा उठाये चल रही थी। पैरों में पायल होने की वजह से दोनों के चलने पर छम छम कर आवाज़ आ रही थी। दोनों के पैरों में मेहन्दी लगी हुई थी, और नाखून लाल रंग की नेल पोलिस से रंगे थे। दोनों उसके नज़दीक आई और फिर उसके पैरों में गिर गयी। दोनों ने उसके पैर पकड़ उसके चरणों को चूम लिया। कविता- आज हम दोनों को अपना करके, आपने हमको खूब मान दिया है। और हम चाहते हैं कि, आप हम दोनों को अपने चरणों में स्थान दें, ताकि आपकी खूब सेवा करें तन मन और धन से। 

ममता- आपकी अर्धांगिनी हैं हम दोनों। आप ही हमको पूरा करेंगे। हम दोनों आपकी हर छोटी छोटी बात का ख्याल रखेंगी। ताकि आपका ख्याल रखने में हम चूक ना जाएं। ये जीवन हमारा अब आपके इन कदमों में न्योछावर है। 

जय- तुम दोनों को क्या हो गया है? हम चाहते हैं कि, हमारे बीच वही रिश्ता रहे, जो शादी के पहले था। तुम दोनों हमारी माँ बहन रह कर हमारा बिस्तर में बीवी की तरह ख्याल रखो। पहले तो ये आप आप बोलना बंद करो। तुम दोनों चाहो तो घर के बाहर हमको आप आप बोल सकती हो। पर घर के अंदर तुम दोनों हमारी दीदी और माँ हो, और बिस्तर पर भी वही बनी रहोगी। तुम दोनों की जगह हमारे पैरों में नहीं हमारे दिल में है।” जय ने ममता और कविता को उठाकर कहा। 

ममता- ठीक है, जय हम तुम्हारी माँ ही बनकर तुम्हारे साथ रहेंगे और कविता भी तुम्हारी बहन बनकर ही रहेगी। पर तुम नाराज़ मत हो हमसे।” दोनों कविता और ममता जय को अपने साथ बिस्तर पर ले गयी। जय की ओर गिलास बढ़ाकर कविता बोली,” ये लो जय दूध पी लो। आज की रात पत्नियां अपने पति को दूध पिलाकर करती हैं। तुम्हारे लिए माँ ने स्पेशल केसर का दूध बनाया है।”

जय बिस्तर पर बीच में बैठा था, पीछे मसलन लगी थी। ममता और कविता दोनों उसके आजू बाजू बैठी थी। दोनों माँ बेटी अपने हाथ में दूध का गिलास पकड़े हुए थी। दोनों जय से चिपककर बारी बारी से जय को दूध पिला रही थी। जय कभी ममता के गिलास से तो कभी कविता के हाथ से दूध पी रहा था। 

जय दोनों को कमर से पकड़ कर बोला,” अच्छा, ये बताओ तुम दोनों को एक साथ शादी का विचार कैसे आया? और मामा को कैसे पटाया? माया मौसी कैसे और कब यहां आई? वो कैसे मान गयी? ये सब कैसे हुआ? 

कविता- शांत हो जाओ, इतने सवाल एक साथ करोगे तो हम जवाब कैसे देंगे। 

ममता- ये बताओ हम दोनों कैसी लग रहीं हैं? अपनी बीवियों की कुछ तारीफ भी करो आज की रात। 

जय- तुम दोनों तो एक दम लॉलीपाप लग रही हो। एक दम रसगुल्ला। दोनों का आज खूब रस चूसेंगे। ये बताओ कि तुम तो पहले कविता दीदी के सामने नंगी नहीं होना चाहती थी। पर अब उसके साथ सुहागरात मनाओगी। ये कैसे हुआ? जय दूध का एक घूंट लेकर बोला। अब तक वो दूध आधा पी चुका था। ममता और कविता ने गिलास को टेबल पर रख दिया और उसके और नज़दीक आ गयी। दोनों एक साथ बोली,” अभी हम सब बताएंगे, तुम बस मज़े लो।” फिर दोनों माँ बेटी एक दूसरे के होंठों को चूमने लगी। दोनों बहुत ही कामुक अंदाज़ में एक दूसरे को पकड़कर चूम रही थी। कभी जीभ चूसती तो कभी होंठों को। दोनों ने तिरछी नज़रों  से जय को देखा, जय उनको देखके आधा हिल गया। क्या सीन था, जो उसने ब्लू फिल्मों में देखा था। सामूहिक चुदाई से पहले लड़कियां एक दूसरे को किस करती हैं। यहां उसकी माँ और बहन एक दूसरे के साथ कर रही थी। जय ने उनको रोका नहीं, बल्कि उनकी चुनरी को उतार दिया और बिस्तर के नीचे फेंक दिया। दोनों अब सिर्फ लहँगा और चोली में थी। दोनों एक दूसरे को कसके पकड़ सहला रही थी। ममता और कविता ने किस करते हुए, एक दूसरे के चोली के धागे खोल दिये। चोली पीछे से पूरी बैकलेस थी, और उन दोनों ने ब्रा नहीं पहनी थी। जय ने उन दोनों के बाल खोल दिये। थोड़ी देर बाद उनकी किस टूटी और जय के गाल पर किस करके बोली,” अच्छा लगा।”

जय- बहुत अच्छा।

कविता- माँ और हम लेस्बियन हो गए हैं। हम दोनों के यहां से जाने के बाद माँ के पीरियड्स, तीसरे दिन रुके। हम दोनों एक साथ सोती थी। और हम सोचे कि ये माँ और हमारे बीच दूरियां मिटाने का एक सुनहरा मौका है। अगर हम दोनों को तुम्हारी बीवी बनना है, तो पहले हम दोनों को एक दूसरे को स्वीकारना पड़ेगा। और उस दिन हम दोनों तुम्हारी बातें कर रहे थे। हम माँ की मालिश कर रहे थे। और फिर…….

उस दिन……( फ्लैशबैक)

ममता- कविता ज़रा कमर पर मालिश कर दो।” ममता बिस्तर पर पेट के बल लेटी हुई थी। और साड़ी जांघों तक उठी हुई थी। कविता उसकी तेल मालिश कर रही थी। कविता लेग्गिंग्स और टॉप में थी। वो मालिश करने लगी।

ममता- कविता, तुम दोनों की शादी कैसे कराएं ये सोच रहे हैं? सत्य को कैसे मनाए कुछ समझ नही आ रहा है? वैसे तुम्हारी और जय की जोड़ी एक दम कमाल लगेगी।

कविता- हहम्मम्म माँ, इस उम्र में भी तुम कितनी जवान दिखती हो। तुम्हारी कमर, अभी भी बहुत सही है। तुम्हारी जवानी अभी भी खिल रही है। इसलिए तो जय तुम पर लट्टू हो गया।” कविता उसके तारीफों के पुल बांध रही थी। फिर बोली,” तुम हमारे और जय के लिए कैसे मान गयी माँ? क्योंकि उसी दिन हम दोनों एक दूसरे से लड़ रही थी और शुरू में इसके लिए तैयार नहीं थी? और कोई भी औरत अपने मर्द के साथ दूसरी औरत नहीं देख सकती चाहे वो कोई भी हो यानी उसकी बेटी ही क्यों ना हो?

ममता लेटे लेटे ही उसकी ओर मुंह घुमाके बोली- तुम और जय हमारी औलाद हो। हमको तुम दोनों की चिंता लगी रहती थी। तेरी शादी की तो सबसे ज्यादा। हम और सत्य एक दो लड़के भी देखने की सोच रहे थे। फिर तुम दोनों का कांड सामने आ गया। उस दिन हम बहुत गुस्सा में थे। लेकिन फिर हम ठंढा दिमाग से सोचे कि, तुम्हारा हमारे बाद अगर कोई सबसे ज्यादा ख्याल रख सकता है, तो वो है जय। और अगर जबरदस्ती तुम्हारी शादी कहीं और कर देते, तो ना तुम खुश रहती, ना जय और हम ही खुश रहते। ऊपर से हमारी जवानी ढलने में समय कहां है। हम अपने हिस्सा का खूब मजा करते, पर जय का प्यास अधूरा रह जाता। उसे तुम जैसी जवान बीवी भी चाहिए जो उम्र भर उसका साथ निभाये और उसको बेइंतेहा प्यार करे। वो प्यार हम तुम्हारे आंख में देखे। इसलिए अपनी बेटी को अपनी सौतन बनाने का फैसला कर लिया।”

कविता कमर पर मालिस करते हुए बोली – माँ, तुम बहुत प्यारी हो। लेकिन ये बात तुमने हमसे क्यों छुपाई कि हम शशिकांत की औलाद हैं?

ममता- ये बात जानकर तुम दोनों को कोई खुशी तो नही हुई आज भी। वैसे भी अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। वो उस वक़्त के हालात ऐसे थे, की ये सब करना पड़ा। हो तो तुम तीनो हमारे बच्चे ना!

कविता ममता की साड़ी उसके जांघों से ऊपर उठायी और चूतड़ों तक ले गयी, पर चूतड़ बाहर नहीं निकले बस जाँघे नंगी हुई। कविता जांघों को छूते हुए बोली,” माँ जांघ पर भी मालिस कर देते हैं।”

ममता- हाँ हाँ कर दो। आज महीना खत्म हुआ है। अच्छा लगेगा।

कविता तेल लगाके मालिश करने लगी। अचानक कविता को ऐसा लगा कि वो ममता की नंगी कमर और जांघ देखकर उत्तेजित हो रही है। उसने अपनी बुर से पानी चूता हुआ महसूस किया। कविता मालिश करते हुए, ममता की ओर देख रही थी। ममता की आँखे बंद थी। कविता ये सोच रही थी, की वो अपनी माँ को भी देखकर उत्तेजित हो रही थी। चुदाई किये हुए चार दिन बीत गए थे। ममता तभी पलटकर पीठ के बल लेट गयी। और अपनी साड़ी उठाकर सामने से जांघों को नंगा कर दिया। उसकी पीली कच्छी नीचे से दिखने लगी। ममता अपने दोनों हाथ ऊपर की ओर मोड़कर लेटी थी। कविता ने देखा कि ममता की पैंटी आगे से गीली थी। इसका मतलब ममता भी उत्तेजित है। कविता ने उसकी जांघों की मालिस चालू रखी। कविता ने देखा कि ये मौका है, अपनी काम पिपासा को शांत करने का। उसने ममता से कहा,” माँ, इस साड़ी और साया को खोल दो, नहीं तो तेल लग जायेगा तो खराब हो जाएगा।”

ममता जैसे इसी का इंतज़ार कर रही हो- ठीक कह रही हो।” और लेटे लेटे ही अपनी साड़ी खोल दी और साया का नारा खोल अलग कर दी। कमर से लेकर नीचे तक ममता अब सिर्फ कच्छी में थी। कविता ने देखा उसकी पूरी कच्छी गीली हो चुकी थी। कविता अब बार बार मालिस के बहाने उसकी बुर पैंटी के ऊपर से ही छू ले रही थी। जब जब वो ऐसा करती, ममता की हल्की सिसकी निकल जाती, और बुर से रस चूने लगता। उधर कविता का भी यही हाल था। उसकी बुर से भी अब रस खूब रिस रहा था। ममता की छाती उत्तेजना से ऊपर नीचे हो रही थी। चूचियाँ लगातार उठक बैठक कर रही थी। काम की आग में दोनों जल रही थी, पर माँ बेटी का रिश्ता उनके बीच झिझक बनके खड़ा था। कविता ने सोचा कि इस झिझक को तोड़ने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। कविता ने ममता की पैंटी पर ऊपर से हाथ रखा और बुर दबाते हुए बोली,” जय की याद आ रही है, माँ।” कविता झुककर ममता के चेहरे के पास आई। ममता ने उसकी ओर देखा,” हाँ, कविता तेरे भाई ने पता नहीं क्या जादू कर दिया है। ये जिस्म की प्यास बड़ी कमबख्त चीज़ है। देखो तुम्हारी माँ कैसे जल रही है।”

कविता उसकी आँखों मे देखकर बोली,” हम भी उस आग में अभी जल रहे हैं माँ। क्यों ना हम दोनों एक दूसरे के साथ आज की रात…….”

इतना कहना था कि ममता ने कविता को पकड़के होंठो पर चूम लिया। दोनों लंबा चुम्मा लेने लगे। 

( आज का दिन) तभी जय बोला,” अरे तुम दोनों चूमती रहोगी एक दूसरे को या आगे भी कुछ बताओगी।” ममता और कविता एक दूसरे के बाल पकड़े, होंठो से होंठो को मिलाए चूम रही थी। उन्होंने किस करते हुए तिरछी नज़रों से जय की ओर देखा। फिर मुस्कुराई। कविता बोली,” सॉरी हम दोनों उस दिन में डूब गए। फिर आगे सुनो…..

(फ्लैशबैक)

दोनों एक दूसरे के ऊपर चढ़ गई थी। किस करते हुए कब वो दोनों जंगली बिल्लियां बन गयी, पता ही नहीं चला।दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूमे जा रही थी। ममता ने कविता की टॉप उतार दी। वो उसके चूचियों की क्लीवेज के ऊपर चूम रही थी। कविता ममता की चूचियाँ दबा रही थी। उसने भी ममता के ब्लाउज के बटन खोल दिये। दोनों उठके बैठ गयी। और एक दूसरे की ब्रा उतार दी। दोनों ऊपर से बिल्कुल नंगी हो चली थी।कविता अपनी लेग्गिंग्स और कच्छी उतार फेंकी। और ममता के मुंह मे अपनी चुच्ची दे दी। ममता के जांघों पर वो इस वक़्त बैठी थी। ममता उसकी चुच्चियों को चूमते हुए, उसके चूचक चूस रही थी। कविता ममता के सर को पकड़े उसे अपनी चुच्ची पर दबा रही थी। दोनों की सांसें अब तेज़ चल रही थी। क्या दृश्य था, जिस माँ ने अपनी बेटी को दूध पिलाया था, वो बेटी आज अपनी माँ को अपनी चुच्ची चुसवा रही थी। कविता ममता की बुर को लगातार छेड़ रही थी। ममता ने भी अपनी गीली कच्छी उतार दी। दोनों माँ बेटी अब नंगी थी। ममता को कविता को देखकर उसकी जवानी याद आ गयी। वो बिल्कुल ममता पर जो गयी थी। वही बाल, वैसे ही आंखे, वही चेहरा, वही चुच्चियाँ, वही कमर, वैसे ही चूतड़, वही जाँघे। सच पूछो तो इस वक़्त ममता कविता के साथ नहीं अपने 21 साल पुराने जिस्म के साथ काम क्रीड़ा कर रही थी। ममता बारी बारी से उसकी चुच्चियाँ चूस रही थी।कविता की आँहें तेज हो रही थी। तब ममता ने कविता को लिटा दिया और उसके ऊपर आ गयी। उसके गालों को चूमा, फिर उसके रसीले होंठों को चूमने लगी। कविता अपनी माँ को गालों से पकड़के भरपूर सहयोग दे रही थी। दोनों की चुच्चियाँ एक दूसरे की चुच्चियों से दबी हुई थी।ममता की चूचियाँ कविता के मुकाबले भारी और बड़ी थी। उनके निप्पल आपस में रगड़ खा रहे थे। दोनों जानबूझकर एक दूसरे की चुच्चियों पर दबाव बना रहे थे। जिससे दोनों को असीम आनंद मिल रहा था। ममता उसको चूमते हुए नीचे की ओर बढ़ी, और उसकी चूचियों को दबाते हुए चूसने लगी।कविता के मुंह से सीत्कारें उठने लगी। ऊहहहहह, आआहहहहहहह, ऊऊईई कमरे में चारों ओर आवाज़ें गूंज रही थी। थोड़ी देर उसकी चुच्चियाँ चूसने के बाद, ममता उसके पेट को चूमते हुए, उसकी बुर पर पहुंची, जहाँ उसकी बेटी की बुर हल्की झाँटों से ढकी हुई थी। ममता ने देखा, वहां कविता ने छिदाई करवा रही थी। उसने इशारों से कविता से पूछा,” ये क्या है? कविता बोली,” आपके बेटे ने करवाया है।” और हंस दी। ममता को ये बहुत आकर्षक लगा। वो कविता की बुर को चूसने लगी।उसकी बुर तो पहले से ही काफी गीली थी। ममता की लपलपाती जीभ, उसके बुर पर एहसास होते ही और ज्यादा रस गिराने लगी। ममता ने ये खेल पहले भी माया के साथ खेला था, तो वो इस खेल की पुरानी खिलाड़ी थी। वो कविता की बुर में उंगलियां घुसाकर अंदर बाहर करने लगी। कविता अपने बुर के ऊपरी हिस्से को गोल गोल घुमाते हुए सहला रही थी। दूसरे हाथ से ममता के सर को पकड़े हुए थी। ममता कभी उसके बुर को हाथों से रगड़ती, कभी अपनी जीभ से उसके खट्टे नमकीन बुर के रस को चाटती। उसके बुर में एक एक करके अपनी दो उंगलियां घुसा देती और ज़ोर ज़ोर से अंदर बाहर करते हुए, हिलाती। बुर पर चिकनाई कम होती तो थूक देती थी। कविता तो जैसे सातवें आसमान पर थी। उसे कुछ अलग आनंद आ रहा था। एक पुरुष और एक स्त्री के हमबिस्तर होने का अपना अलग आनंद है ये उसे आज पता चल गया था। थोड़ी ही देर में वो जोरों से झड़ गयी। उसके बुर से ढेर सारा पानी निकला, जो बिस्तर को गीला कर गया। ममता ने उसकी ओर देखा, तो कविता अपनी पीठ बिस्तर से उचकाए, आहें भर रही थी। ममता का चेहरा उसके बुर के रस से भीग चुका था। वो उसके करीब आई और उसको चूमने लगी। कविता अपने होंठ पर उसके बुर के रस को महसूस कर रही थी। हालांकि, वो बुर के रस के स्वाद से परिचित थी। पर किसी औरत के होंठों से पहली बार चख रही थी। दोनों ने एक लंबा पैशनेट किस किया। कविता और ममता किस करते हुए बिस्तर पर बैठे हुए थे। माम्बत की जाँघे कविता की जांघों के ऊपर थे। दोनों की टांगे एक दूसरे की पीठ की ओर थी। अब कविता की बारी थी। दोनों की चुच्चियाँ आपस में टकरा रही थी। दोनों मुस्कुराते हुए अपनी चुच्चियाँ पकड़के निप्पल से निप्पल लड़ा रही थी। ये एक बेहद काम्यक नज़ारा था। कविता ने फिर  ममता के चेहरे को हाथों से सहलाया और उसके मुंह में उंगली घुसा दी। ममता वो कामुक अंदाज़ में चूसने लगी। कविता ने खुद अपनी माँ के चूचियों को हाथों से तौला। उसे वो बेहद आकर्षक लग रहे थे। उससे रहा नही गया, तो बिना देर किए, वो उसको चूसने लगी। ममता अब कामुकता से लबरेज़ भूल गयी थी, की कविता उसकी बेटी है। दोनों अपनी प्यास बुझाने में लीन थी। थोड़ी देर बाद कविता ममता की चुच्चियों को चूसने के बाद, उसको बिस्तर पर लिटा चुकी थी। ममता बिस्तर पर पेट के बल लेटी थी। कविता उसकी पीठ चूमते हुए, उसके कमर की ओर बढ़ी। उसकी कमर को चूमते हुए, कविता ममता की गाँड़ की दरार तक जा पहुंची। कविता ने फिर महसूस किया कि क्यों मर्द औरतों की गाँड़ के पीछे पड़े रहते हैं। औरतों की गाँड़ दर असल मर्दों को न्योता देती है। जिसकी गाँड़ जितनी सुडौल उतना बढ़िया आमंत्रण। ममता की गाँड़ इसका उत्कृष्ट उदाहरण थी। कविता ममता के चूतड़ों को चूम रही थी। वो उनको हटाकर अंदर के हिस्से को भी जीभ से चाट रही थी। कविता थूक कर उसकी गाँड़ को गीला कर दिया। और अपने हाथों से मल दी। वो गाँड़ चाटने लगी। तभी उसके नथुनों में बुर की रस की सौंधी सी कामुक खुश्बू टकराई। वो ममता के बुर से चूते रस की थी। कविता खुद को रोक ना सकी। वो ममता के बुर को चाटने लगी। वो किसी कुत्ती की तरह, जो बहते पानी को चाटती रहती है, बिल्कुल वैसे ही चाट रही थी। ममता उसके सर को पकड़के अपनी बुर पर दबा रही थी। इस तरह कुछ देर बुर चटवाने के बाद, ममता पलटी और कविता को बुर की ओर फिर ले आई। कविता अब अपनी जन्मस्थली को पहली बार सामने से देख रही थी। ममता की बुर आज भी गुलाब की पंखुड़ियों सी थी। बेहद आकर्षक और लज़ीज़। उसकी बुर से चूता रस थूक समान लसलसा था। और कविता के थूक की वजह से और चमकदार हो उठा था। कविता उसकी बुर को फैलाई और अपनी जीभ उसमें घुसा दी। ममता चिहुंक उठी। कविता के इस हमले से उसकी सीत्कारें गले से फुट पड़ी। बुर में कई दिनों बाद कोई दूसरा उसके बुर से छेड़खानी जो कर रहा था। कविता लगातार बुर की चुदाई कर रही थी अपनी जीभ से। ये कविता के लिए बिल्कुल नया अनुभव था। अपना बुर का रस तो सब खूब चख था, पर किसी और औरत का वो पहली बार चख रही थी। दोनों माँ बेटी काम के सागर में गोते लगा रहे थे। कविता की नाक से लेकर ठुड्ढी तक सब भीग चुके थे। कविता जब जीभ से थक गई तब उसने ममता की छितराई बुर में दो उंगलियां घुसा दी, और अंदर बाहर करने लगी। दूसरे से वो ममता के बुर को सहला रही थी। ममता बीच बीच मे उत्तेजना से अपनी बुर पर थपकियाँ मार रही थी। काफी देर ऐसा ही चलता रहा। पर ममता अभी झड़ी नही थी। कविता फिर उसकी टांगों के बीच आ गयी और अपना बुर और ममता का बुर आपस में चिपका दी। और कमर की ज़ोर से बुर को बुर पर रगड़ने लगी। ममता की दांयी टांग कविता के बाएं कंधे पर था। दोनों को इसमें आनंद मिल रहा था। दोनों ज़ोर लगाकर बुर को रगड़ रही थी। ममता अपनी चुच्ची खुद ही दबा रही थी, और खुले मुंह से आँहें भर रही थी। कविता भी सीत्कारें मार रही थी। बहुत उत्तेजक और कामोत्सर्जक दृश्य था। कविता के बाल खुले थे और उसकी नंगी चुच्चियाँ कमर की धुन पर हिल रही थी। अब ममता के लिए खुद को रोक पाना मुश्किल हो रहा था। कविता भी चरम सुख के निकट थी। दोनों माँ बेटी एक साथ झड़ गयी। और चीखें मारते हुए एक दूसरे पर निढाल हो गयी। दोनों को थोड़ी देर बाद होश आया। पर उनके बीच कोई ग्लानि नही लग रही थी। 

दोनों एक दूसरे की बांहों में बाँहे डाले थी। और एक दूसरे को चूम रही थी। 

कविता- माँ आज एक अलग ही आनंद आया। 

ममता- हाँ कविता, एक औरत का औरत के साथ बिल्कुल अलग अनुभव होता है। तुम आज पहली बार औरत के साथ ये की हो ना, इसलिए बहुत मज़ा आया होगा।

कविता- तुम कहना क्या चाहती हो, ये तुम्हारा पहला बार नही था। मतलब तुम किसी और औरत के साथ भी ये सब की हो माँ?

ममता- हाँ, कविता हम और तुम्हारी मौसी माया पहले भी ऐसा कर चुके हैं। 

कविता- तुम तो बहुत पहुंची हुई खिलाड़ी हो। सच सच बताओ तुम दोनों शशि के साथ भी एक साथ चुदी हो ना? है ना… है ना….

ममता- हां हम दोनों एक साथ बहुत बार शशीजी से चुदी हैं। एक ही बिस्तर पर, एक ही मर्द से।

कविता- हमको लग ही रहा था, तुम बहुत बड़ी छिनार हो माँ।

ममता हंसी तब तो तुझ जैसी छिनार बेटी हुई है, जो अपने भाई से चुदवाती है। अब अपनी माँ के साथ भी खुल गयी हो। 

कविता- सच कहा माँ, छिनार ही है हम दोनों। अब जब कि जय के साथ हम दोनों बीवी बनके रहेंगे, तो हमारे बीच ये खुलापन होना जरूरी था। जय बहुत देर इंतज़ार नहीं करनेवाला है। एक ना एक दिन हम दोनों को एक साथ बिस्तर पर चोदेगा ही चोदेगा। इसलिए हम दोनों का आपस में खुलना जरूरी था। 

ममता- सच कहा, कविता। ये हुआ तो ठीक ही हुआ। हम दोनों भी अब माँ बेटी के साथ साथ पक्की सहेलियां बन गयी हैं। 

कविता- माँ, एक बात पूछूँ, बुरा तो नहीं मानोगी?

ममता- पूछ ना।

कविता- तुम, शशि से खुश थी, ये रिश्ता जोड़कर? और जहां तक अब तुमको जान गए हैं, हमको लगता है, तुमको एक नए मर्द की तलाश थी। हमको लगता है उसका अब खड़ा भी नहीं होता होगा। वो पहले से ही बहुत नशेबाज था।

ममता- ये रिश्ता हम मजबूरी में जोड़े थे, पर बाद में मज़ा आने लगा था। हर औरत की शारीरिक ज़रूरत होती है। वो तेरे बाबूजी पूरा नहीं कर पाते थे। हाँ ये सच है कि अब शशिकांतजी का क्षमता कम हो गयी है। और जैसा कि तुमको पता है कि, घर की बात घर में रहे तो ठीक है। पहले शशिकांत थे और अब जय होगा। 

कविता- वाह माँ, तुमसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। पर हम भी तुमको बहुत कुछ सीखा सकते हैं। 

ममता- क्या?

कविता- हम दोनों को फिट होना पड़ेगा। अब चुकी हम दोनों जय से चुदवा चुके हैं, तो जानते हैं कि जय को अलग अलग तरीके से चोदना पसंद है।तुमको मैनीक्योर, पेडीक्योर सब करवाना होगा। फेसिअल वैगरह सब। अब लड़कों को खुद को फुल मेन्टेन करनेवाली औरतें चाहिए। हम लोग कल से वी * * सी जॉइन करेंगे। वहां फिटनेस के साथ साथ ब्यूटी का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। 

ममता- ठीक है। हमको भी जमाने के साथ चलना होगा। लेकिन जय को अभी कुछ नहीं बताएंगे। उसको चौंका देंगे।

कविता- हाँ, हम दोनों को देख उसके होश उड़ जाएंगे। 

(आज का दिन) 

उन दोनों के मुंह से ये बातें सुन जय का मुंह खुला था। ममता और कविता हसने लगी। दोनों ने उसका मुंह बंद कर दिया। एक साथ उसके होठों को चुम्मा लेकर। 

ममता- अब हम दोनों, में कोई शर्म लाज़ नहीं है। आज हम माँ बेटी अपनी सुहागरात एक साथ मनाएंगे। हम दोनों को एक ही बिस्तर पर चोदोगे जय।

जय ममता और कविता को बारी बारी से चूमा और बोला,” आज की रात, बहुत मजेदार होगी। आज तुम दोनों खूब चुदोगी, एक दूसरे के सामने, इसी बिस्तर पर। 

कविता- उससे पहले हम दोनों ने तुम्हारे लिए, कुछ प्लान कर रखा है। उसका मज़ा लूटो।

जय- क्या?

ममता और कविता मुस्कुराई और बिस्तर से उतर गई। फिर म्यूजिक सिस्टम पर गाना लगाया,” ये मेरा दिल प्यार का दीवाना…”

और नाचने लगी। दोनों बेहद कामुक तरीके से नाच रही थी। फिर दोनों ने एक एक करके अपने कपड़े गानों की धुन पर उतारने लगी। पहले चोली उतरी, फिर लहँगा सडकते हुए फर्श पर गिर गया, लाल पैंटी में दोनों कमर मटकाते हुए नाच रही थी। कभी गाँड़ पीछे से दिखाते हुए जोरों से हिलाती, तो कभी चुच्चियाँ। दोनों ने कोई आभूषण नहीं उतारे। दोनों एक दूसरे को चूम भी लेती। और एक दूसरे की चूचियाँ और गाँड़ दबा देती। खुद को सहलाती और कभी एक दूसरे को। उनके पैरों में जांघों तक मेहन्दी लगी थी, और हाथों में बांहों तक। चुच्चियों के निप्पल पर चारों ओर मेहन्दी से गोल गोल डिज़ाइन बने थे। दोनों नाचते हुए जय के करीब आयी, और उसको अपने साथ खींच लिया। जय उन दोनों को पकड़के नाचने लगा। दोनों फिर जय के कपड़े उतारने लगे। ममता उसका कुर्ता और कविता उसका पायजामा उताड़ दी। जय का कच्छा और बनियान भी उतरने में देर नहीं लगी। जय नंगा हो चुका था। उधर ममता की पैंटी में हाथ घुसाकर वो उसकी गाँड़ टटोल रहा था। कविता नीचे उसका लण्ड हाथों में पकड़े चूम रही थी। जय,” माँ दीदी तुम दोनों अपनी कच्छी उताड़ दो। हम नंगे है, तो तुम दोनों भी पूरी नंगी हो जाओ। इतना सुनना था, की ममता ने अपनी कच्छी उताड़ दी, और कविता ने भी बिना देर किए उसको उताड़ दिया। दोनों की बुर एक दम चिकनी थी। एक बाल भी नहीं था, जैसे उसपर कभी बाल ही ना उगे हो। और बुर के ऊपर जहां झांट होती हैं वहां भी मेहन्दी लगी थी। जय का लण्ड ये सब देखकर कड़क हो चुका था। आज की रात शायद ममता और कविता पूरा प्लान बना कर आआई थी। आज उन दोनों की खैर नहीं थी। जय खड़ा था, और ममता और कविता नीचे घुटनों पर बैठकर उसका लंबा लण्ड चूस रही थी। जय को वो दोनों भूखी शेरनी की तरह लग रही थी। जैसे भूखे को बहुत दिन बाद खाना मिलता है ठीक उसी तरह दोनों लण्ड पर टूट पड़ी थी। दोनों उसकी ओर देखकर लण्ड चाट रही थी। 

जय- तो उस रात तुम दोनों ने कितनी बार सेक्स किया?

कविता- तीन बार। लण्ड का सुपाड़ा चूसकर बोली।

 

जय- तुम दोनों बहुत चुद्दक्कड़ लग रही हो। आज बहुत चुदासी भी हो।तुम दोनों की खूब चुदाई करेंगे। 

ममता- हमलोग कब मना किये। तुम्हारे चुदाई का तरीका तो हम दोनों को पता है।एक दम गंदी और घिनौनी चुदाई करते हो। हम दोनों उसके लिए तैयार हैं। 

कविता- हम माँ को बहुत ब्लू फिल्म दिखाए हैं, ताकि उन सब चीजों से परिचित हो सके। आजकल हर मर्द चाहता है कि उसकी बीवी बिस्तर में ब्लू फिल्म की हीरोइन के तरह चुदवाये। 

दोनों आंड़ और लण्ड चूसते हुए बोली। 

जय अपना लण्ड चुसवा रहा था। उसका लण्ड पूरी तरह तन गया था। उसकी माँ ममता और दीदी कविता अपने मुंह से उसके लण्ड की सर्विसिंग कर रही थी। उसके लण्ड को दोनों बारी बारी से मुंह मे घुसाकर चूस रही थी। कभी कविता चूसती तो कभी ममता। दोनों अपने थूक से उसके लण्ड को नहला चुकी थी। ममता और कविता लण्ड चूसते हुए एक दूसरे को बीच बीच में चुम्मा भी ले लेती। चुम्मा लेते हुए दोनों एक दूसरे के होंठ जीभ सब चूसती। एक दूसरे के मुंह से लेर के धागे भी बन जाते थे। फिर दोनों बारी बारी से लण्ड और आंड़ चूसने लगती। दोनों लण्ड के आजु बाजू बैठी थी। और लण्ड को साइड से आधा होंठों के बीच दबाए सुपाडे से लेकर लण्ड के जड़ तक हिलाती। इस कामुक दृश्य को शायद ही कोई मर्द नहीं चाहेगा। जय ने उसी समय लण्ड पर थूका, और वो ममता के होंठों और कविता के नाक पर गिरा। दोनों उसकी ओर ही देख रही थी। उन्होंने अपने होंठ और नाक लण्ड पर रगड़ें, और सारा थूक लण्ड पर मल दिया। जय ने ऐसा तीन चार बार किया, और उनकी हरकतों को देखकर बोला,” दीदी तुम दोनों तो बिल्कुल पोर्नस्टार्स की तरह लण्ड चूस रही हो और उनके जितनी घिनौनी हरक़तें भी कर रही हो। हम कितना लकी हैं कि तुम दोनों हमारी बीवी बनी और सेक्स का असली आनंद दे रही हो।”

ममता लण्ड चूसना छोड़ बोली,” औरत का काम यही है, बाहर जितनी शरीफ बिस्तर में उतनी ही बड़ी रंडी। तुमको क्या लगता है कि, बस तुम मर्दों को मज़ा आता है, गंदी सेक्स में, जिसमें गालियां होती हैं, घिनौनी और गंदी चुदाई होती है। नहीं, हम औरतें भी इसको बहुत मज़े लेकर करती हैं।आज की रात तुमको सब बताएंगे। 

कविता- हां, जय हम दोनों आज तुम्हारे होश उड़ा देंगे।” कविता लण्ड पर थूकते हुए बोली। ममता और कविता अपने हाथों से लण्ड को थूक से मल रही थी। 

जय ने ममता को बोला,” अरे रंडी साली ये लण्ड को पूरा मुंह में घुसा ले, और अपनी बेटी को हरा। और तुम कविता रंडी तुमको इस कुतिया को हराना है। दोनों में से जो लण्ड का ठीक से सेवा करेगी वही पहले अपना बुर आज की रात चुदवायेगी।

कविता,” ये कैसे पता चलेगा, कि किसने अच्छी सेवा की?

जय- जो ज्यादा देर मुंह को लण्ड में पूरा घुसाके रखेगी, वही जीतेगी। उसकी बुर को हम सबसे पहले चोदेंगे। देखते हैं कि माँ जीतती है या तुम दीदी।

ये बोलना था कि ममता ने बिना देर किए, लण्ड मुंह में घुसा लिया। वो लण्ड के जड़ तक जा पहुंची। उसके ऊपरी होंठ जय के झांट से लड़ रहे थे, और निचला उसके आंड़ से। जय के मुंह से बस,” उफ़्फ़फ़फ़फ़”  निकला। कविता ममता का सर पीछे से दबा रही थी। जय उसकी नाक दबाए था। फिर भी वो बेचारी लण्ड से मुंह नहीं हटाई। उसके मुंह से लेर लगातार चू रहा था। ममता की आंखें जय की आंखों में लगातार देख रही थी। उसकी सांसें धीरे धीरे उखड़ने लगी। पर जय उसको और लंबा खींचने की प्रेरणा दे रहा था। आखिरकार 35 सेकंड तक रोकने के बाद वो स्वतः हट गई। वो जोर जोर से सांसें ले रही थी। आंख में लाल धागे खींच गए थे। जय ममता के बाल सहला रहा था। इस उम्र में ये बहुत बड़ी हिम्मत की बात थी। कविता अगले ही पल जय के तने हुए लौड़े को गले की गहराइयों में उतार गयी। लण्ड कविता के कंठ को छू रहा था। अबकी ममता कविता के सर को पकड़कर जय के लण्ड पर जोर लगा रही थी। उसने बोला,” हां, सोचो कि तुम इसी पल के लिए जन्मी हो। अपने भाई का लण्ड मुंह में जितनी देर घुसओगी उतनी देर ये तुमको चोदेगा। तुम हमारी बेटी हो, ये साबित करो। हर माँ चाहती है कि उसकी बेटी, उससे भी आगे निकले। तुम कर सकती हो।”

कविता अपनी माँ का प्रोत्साहन पाकर,बड़ी देर तक जूझी, पर आखिरकार अपनी माँ के बराबर देर ही कर पाई।

कविता खौ खौ कर खांस रही थी। ममता फिर आंड़ सहलाते हुए अपनी जीभ से पूरा लण्ड चाट रही थी। जय तो सातवें आसमान पर था। दोनों के ठुड्ढी, और चुच्चियों पर अत्यधिक थूक से चमक रहे थे, जो मुख चुदाई के बाद गिरे थे। जय उन दोनों के साथ बड़ी देर तक मुख मैथुन करने के बाद, उनको उठाया और बिस्तर पर चलने के लिए बोला। ममता और कविता बिना कपड़ों के और पूरे गहनों में थी। दोनों के मांग में टीका, कानों में झुमका, नाक में नथ, गले में हार, हाथों में लाल चूड़ियां, कमर में कमरबंद, पैरों में पायल, हाथों की उंगलियों में अंगूठियां, पैरों में बिछियां। कपड़ों के नाम पर बदन पर एक चिन्दी टुकड़ा भी नहीं था। दोनों बहुत ही कामुक अंदाज़ से गाँड़ मटकाते हुए चल रही थी। जांघों और बांहों तक लगी मेहन्दी भी किसी गहने से कम नहीं थी। जय उन दोनों के चूतड़ सहलाते हुए आगे बढ़ रहा था। 

जय- तुम लोगों ने मेहन्दी बहुत सेक्सी लगाई हुई है। बहुत मस्त लग रही हो दोनों। 

ममता- कविता ने ब्राइडल मेकअप के लिए बुलवाया था। हम दोनों ने एक साथ करवाया। 

तीनो बिस्तर पर पहुंच गए। कविता और ममता दोनों बिस्तर पर पहुंच कर घुटनो के बल बैठ गयी। जय उन दोनों के बीच आ गया और अपना चेहरा दोनों की चुच्चियों के सामने रख बोला,” अरे हमारी रंडियों अपना चुच्ची हमारे मुंह पर रगड़ो।


कविता और ममता खिलखिलाकर हंस पड़ी, और अपनी चूचियों को दोनों हाथों से पकड़ उसके मुंह पर रगड़ने लगी। जय का चेहरा चार चूचियों के बीच चहक रहा था। वो उन दोनों की बुर को सहला रहा था। जय बुर को जैसे मुट्ठी में बंद कर भींच लेता। दोनों सिसक उठती और आहें भरती। जय कभी ममता की चुच्ची चूसता तो कभी कविता की। वो बड़े जोरों से चूस रहा था। उसके दांत चूचियों के आस पास अपने निशान छोड़ रहे थे। दर्द होते हुए भी ममता ने कुछ नहीं कहा और नाहीं कविता ने। दोनों बस इस कामोन्माद में बहकर खुदको और जय को सम्पूर्ण सुख देना चाहती थी। कुछ देर ऐसे अपनी चुच्चियाँ चुस्वाकर दोनों उत्तेजित हो गयी। दोनों जय से लण्ड की भीख मांगने लगी। कविता बोली,” जय अब अपनी दीदी की बुर को चोदो, अब बुर से बर्दाश्त नहीं हो रहा। तुम्हारे लौड़े के लिए, देखो कितना पानी चुआ रही है। ये तुम्हारे लण्ड का स्वागत करने को बेताब है।”

ममता,” हाँ, बेटा सैयांजी अपनी मैय्या की बुर को ज़रा देखो, कैसे तड़प रही है, तुम्हारे जवान लण्ड के लिए। तुम्हारे जैसे मन चाहे वैसे पेलो। लिटाके, कुत्ती बना के, खड़ा करके, गोदी में लेकर। 

जय-  अभी नहीं, तुम दोनों का बुर अभी कहां चाटे हैं। इतना बढ़िया बुर का रस निकलता है। पहले तुम दोनों का बुर का रस पीकर, अपनी प्यास और बढ़ाएंगे, फिर तुम दोनों की ठुकाई शुरू करेंगे।

जय ने दोनों को एक दूसरे के ऊपर लेटने को कहा। ममता नीचे पीठ के बल लेट गयी और कविता उसके ऊपर लेट गयी। दोनों एक दूसरे की ओर देख रही थी।उनकी चुच्चियाँ आपस में दबी हुई थी। दोनों अपनी टांगे फैलाये थी ताकि बुर बाहर की ओर निकली हो। ममता और कविता की बुर बाहर की ओर निकल देख, जय उनकी टांगों के बीच आ गया। और जैसे कोई कुत्ता जूठा पत्तल चाटता है ठीक वैसे ही बुर को चाटने लगा। कविता की गाँड़, भी पहाड़ की तरह उठी हुई थी। जय उसको मसलते हुए बुर से रिसते हुए रस को चाटे जा रहा था। ममता और कविता उधर आपस में चुच्चियाँ रगड़ते हुए, एक दूसरे के मुँह में जीभ घुसाके उसका स्वाद चख रही थी। अपनी बुर में कभी जय के जीभ का एहसास होता, तो कमर खुद ही हिलने लगती थी। जय, ममता और कविता दोनों के बुर में दो दो उंगलियां घुसाके अंदर बाहर कर रहा था। उस घर की हर दीवार और  छत से माँ और बेटी की आवाज़ गूंज कर वापिस लौट रही थी। दोनों की काम वासना, अद्भुत कामुक आहें और सीत्कारों के माध्यम से बाहर आ रही थी। कभी जय उनकी बुर की फांकों को अलग कर बुर का रसास्वादन करता, कभी बुर के ऊपरी हिस्से जहां क्लाइटोरिस होता है उसको चाभता। ऐसा बहुत देर तक चला। जब जय ने मन भर उनके बुर का रस पी लिया, तब उसने सबसे पहले, कविता को ममता से अलग किया, और ममता की बुर पर थूक दिया। अपने तगड़े लण्ड से उसे बुर पर मलने लगा। ममता की बुर से छेड़खानी कर रहा था। ममता अब लण्ड के लिए लगभग तड़प रही थी। उसने जय की ओर कामुक नज़रों से देखते हुए कहा,” इस अभागन को और मत तड़पा, हम चुदाई के आग में जल रहे हैं, जिसका केंद्र ये बुर है। अपना लण्ड घुसा दो और पापिन को अपने लण्ड के एहसास से पवित्र होने दो।

जय- क्या बोलती हो कविता?

कविता- जय ये सच कह रही है, अपना लण्ड घुसाकर, तुम मादरचोदों के इतिहास को गौरव प्रदान करोगे। तुम्हारा लण्ड उस जगह घुस रहा है जहां से तुम इस दुनिया मे पैदा हुए हो। माँ को चोदो, और अब अपना बच्चा इसके पेट मे आने दो।” कविता ममता का पेट सहलाते हुए बोली।

ममता और कविता बहुत कामुक स्वर में ये बात बोली। जय कविता के गाल सहलाते हुए बोला,” तुम दोनों को चोदकर माँ बनाएँगे। दोनों के गोद में बच्चे खेलेंगे। पर हम इतनी जल्दी बच्चा नहीं चाहते। तुमलोगों को पहले ठीक से भोगेंगे। वैसे इस रंडी को जल्द ही बच्चा देना होगा, क्योंकि इसके पास टाइम कम है।”

जय अपना लण्ड ये बोलते हुए ममता की बुर की गहराइयों में उतार दिया। कविता ममता के पास जाकर उसको किस कर रही थी। कविता इस समय अपने घुटनों पर थी और ममता नंगी लेटी थी। ये ममता की तीसरी सुहागरात थी, जिसमे तीसरा दूल्हा उसकी बुर की चुदाई शुरू कर चुका था। जय एक हाथ से ममता की दांयी चुच्ची, और कविता की गाँड़ सहला रहा था। कविता अपनी गाँड़ के छेद पर, जय की उंगलियां महसूस कर मुस्कुराई और उसकी ओर देखकर बोली,” गाँड़ तो तुम्हारा सबसे पसंदीदा हिस्सा है, इसलिए हमने, अपनी गाँड़ की सफाई और ट्रेनिंग की है। आज की रात हर छेद तुम्हारे लण्ड  को स्वीकार करेगी।” 

ममता उधर खूब चुच्चियाँ दबाकर, चुदवाने में मशगूल थी। लण्ड का एहसास बड़े दिनों बाद मिला था। उसके होंठ दांतो तले आ गए। वो पूरी तरह सेक्स की चाह में, चुदवा रही थी। जय उसे चोदे जा रहा था।जय की कमर लगातार ममता की बुर में धक्कों के साथ, हिल रही थी। ममता की भी कमर हिल रही थी। कविता उससे लिपटी हुई थी। कविता ममता के बाल सहलाते हुए पूछी,” माँ, बेटे का लण्ड लेकर कैसा लग रहा है। बेटा ठीक से चोद रहा है ना? 

ममता जय के धक्कों की वजह से ऊपर नीचे हो रही थी, कविता के गाल सहलाते हुए कांपती आवाज़ में बोली,” बहुत अच्छा लग रहा है, जब बेटे का लण्ड माँ की बुर में घुसा हुआ है। जो बागबान फल उगाता है, उसे तो उसे चखना चाहिए।”

जय- माँ ये बात तो शाहजहाँ ने अपनी सगी बेटी के लिए कहा था। और तुम अपने बेटे के लिए कह रही हो।”

कविता- तुम्हारा इतिहास का रिवीजन हो रहा है। IAS बनोगे ना।

तीनों हंसे और फिर चुदाई के खेल में लग गए। एक माँ अपने बेटे से अपनी बेटी के सामने निश्चिन्त और निश्फिकर हो चुदवा रही थी। जय को ममता के चेहरे का भाव, उसकी हिलती चूचियाँ बार बार और जोर लगाने को प्रेरित कर रही थी। ममता के कांख के बाल साफ थे, जो हाथ उठाने की वजह से साफ दिख रहे थे। चूचियों पर निप्पल के आसपास गोलाकार डिज़ाइन में लगी मेहन्दी, मस्त लग रही थी। ममता की चुच्चियों को हाथों में दबाकर, पकड़ बनाये हुए थे। ममता, किसी नवयुवती की तरह चुदवाते हुए, जय के लण्ड के एहसास को महसूस कर रही थी। वो उस एहसास से मचल रही थी। 

ममता- बेटा, चोद और चोद अपनी,रंडी माँ को, जो अब तेरी दुल्हन भी है। इस दुल्हन का हर अरमान अपने बेटे से पति हुए, यानी तुझसे ही पूरा होगा। हम इस दुनिया का सबसे बड़ा सुख भोग रहे हैं। एक भूखी शेरनी, अपने बच्चे को खा जाती है और एक चुदाई की प्यासी औरत, अपने बेटे का लण्ड लेकर उस प्यास को बुझा सकती है। यही इस दुनिया की रीत है, आखिकार सही आदमी सही जगह पहुंच ही जाता है।

कविता- माँ, ये तुम्हारा बेटा, तुम्हारा खूब ख्याल रखेगा। तुम अब प्यासी नही रहोगी। तुमने जो इतने साल बगैर ठीक से चुदे गुजारे हैं, उसकी कमी पूरी कर लो। इस चुदाई का पूरा आनंद लो। ये तुम्हारा अधिकार है।”

ममता- हाँ बेटी, अब तो हमको कोई डर नहीं है। सब कुछ हमलोगों के सामने ही हो रहा है। आआहह…… लण्ड की प्यास तो अब तुम भी समझ गयी हो। एक औरत को अगर ठीक से चोदने वाला मिल जाये ऊऊईईईई….., तो वो आधी खुशी वैसे ही पा लेती है। ये अब तुम भी समझ जाओगी। ऊहहहहहह…..

कविता ममता की बुर के ऊपर हिस्से को मसल रही थी। दोनों बीच बीच में आपस मे किस भी कर रही थी। जय उन दोनों की कामुक बातें सुन रहा था, और माँ बेटी से सौतन बनी, दोनों औरतें, अपने पति के सामने आपस में प्यार भी कर रही थी। दोनों एक दूसरे को सहलाते हुए, ऐसी ही बातें कर रही थी। तभी ममता के अंदर का लावा फूट पड़ा। वो शायद पहली बार इस तरह इतनी जल्दी झड़ी थी। शायद ये अपनी बेटी के सामने, बेशर्मों की तरह बेटे से चुदने का असर था। वो लंबी चीख और आह भरते हुए, झड़ी। कविता उसे सहला रही थी। जय ने अपना लण्ड निकाला और कविता को कुत्ती बनाकर उसके बुर में लण्ड उतार दिया। कविता इस एहसास से अभिभूत हो उठी। पिछले 10 दिनों से बुर में बिना लण्ड लिए, वो जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी। जय का लण्ड घुसते ही वो पागल हो उठी। जैसे किसी प्यासे को रेगिस्तान में पानी का दरिया मिल गया होगा। जय उसके कमरबंद को पकड़े हुए, उसकी चुदाई कर रहा था। ममता जय के पास आकर उसे चूम रही थी। दोनों की जीभ आपस में टकड़ा रहे थे। 

ममता- अब हम समझ गए हैं, तुम हम दोनों के लिए ही जन्मे हो। तुमको हम इसी लिए जन्म दिए, ताकि तुम बड़े होकर हमको और हमारी बेटी को अपनी रखैल बनाकर चोदोगे। ये तो विधि का विधान है, की सौभाग्य से तुम हमारे कोख से पैदा हुए, नहीं तो तुमको हम दोनों कहाँ खोजते।

जय- हाँ, माँ तेरी बुर से पैदा हुआ हैं, ताकि इसी बुर को एक दिन चोदे। अपनी सगी बहन को तुम्हारे ही सामने, चोदे और तुमको दादी और नानी एक साथ बनाये। 

कविता- आआहह, ओह्ह अपनी दीदी को अपनी रांड बना लो। छिनार हैं हम दोनों। हमारे घर की सब औरतें छिनार है। हम, माँ, मौसी, नानी सब वैसे ही हैं।

जय- तुम सबको हम अपने बिस्तर की रानी बनाएंगे। तुमलोगों को कभी भी सेक्स की भूख नहीं सताएगी। 

ममता- जिस घर में तुम जैसा मर्द हो, उस घर में औरतें कभी प्यासी नहीं रह सकती। ये तो हमारा नसीब है कि, तुम हमको मिले हो।अब तो इस घर में माँ बेटी तुम्हारी दासी बनके रहेंगी। तुम जैसे चाहोगे, जब चाहोगे हम हाज़िर हो जाएंगी।

जय- माँ, तेरी बेटी और तुम हमेशा खुद को तैयार रखना। ये सेक्स की जो आंधी शुरू हुई है, ये कब रुकेगी ये अभी कहना मुश्किल है।

ममता जय के लण्ड पर थूक लगाकर कविता के बुर से अंदर बाहर होते लण्ड को जीभ लगाकर चाटने लगती है। वो जय के आंड़ को भी चाट रही थी। कविता लगातार हो रही चुदाई से खुद को संभाल ना पाई और कांपते हुए झड़ गयी। वो करीब दो बार झड़ी। पर जय का लण्ड अभी भी खड़ा था, और अभी तक गिरने का नाम भी नहीं ले रहा था। दोनों माँ बेटी ने एक दूसरे को खूब किस कर रही थी। जय बिस्तर पर लेट गया और ममता, उसके ऊपर चढ़ गई। वो जय के लण्ड को अपने बुर में घुसा ली, और खुद उछल उछल कर चुदवाने लगी। ममता अपने खुले बाल अपने हाथों से पकड़े हुए, जय की ओर घूमकर चुदवा रही थी। जय उसकी कमर पकडे हुए था। तब कविता उसके मुंह पर आकर अपना बुर उसके होंठों से छुवाने लगी। जय अपनी लपलपाती जीभ से उसकी बुर चाटने लगा। कविता की कमरबंद के आगे का छोटा झूमर उसके बुर तक लटका था, ठीक वैसे ही ममता के बुर पर भी एक झूमर लटका था। उसके हिलने से हल्की रुनझुन जैसी आवाज़ें आ रही थी। कविता के बुर का एहसास होते ही जय ने कविता को अपने मुंह पर बैठा लिया। कविता अपना बुर उसके मुंह पर रगड़ने लगी। दोनों माँ बेटी आमने सामने बेटे के लण्ड और भाई के मुंह से चुदाई का अनोखा आनंद उठा रहे थे। कविता की भी कमर हिलने लगी थी। और ममता तो अब आहें भर भरकर उछल रही थी। धीरे धीरे उत्तेजना फिर बढ़ रही थी। ममता के चूतड़ों पर जय ने कसके सात आठ चाटें मारे। पर ये उसके लिए और उत्साहवर्धक थे। ममता खुद ही, अपने चुच्चियों को मसल रही थी। कविता अपने चूतड़ों पर खुद ही थप्पड़ मार रही थी। वो ममता के कंधों पर हाथ रखे हुए थी। और फिर अचानक दोनों आपस मे किस करने लगी कामोन्माद में आकर। दोनों जैसे एक दूसरे को नोचना चाहती हो। दोनों खूब उछल उछल रही थी। तभी दोनों एक साथ झड़ी। जय के मुंह में कविता का बुर का रस बह गया। और उसका लण्ड ममता के बुर के रस से। पर जय इस बात से हैरान था कि वो अब तक कैसे नहीं झड़ा। दोनों माँ बेटी, जय के आजु बाजू लेट गए। जय कविता से कुछ पूछने ही वाला था, की तभी कविता बोली,” हम बाथरूम से आते हैं। हमको पेसाब लगा हुआ है।”

जय ममता की ओर घुमा,और पूछा,” हम अभी तक नहीं झड़े हैं।और सेक्स की भूख बढ़ ही रही है, ऐसा क्यों?

ममता- दूध में हमने कुछ आयुर्वेदिक औषधि मिलाई थी। इसलिए आज तुम्हारा बहुत देर बाद निकलेगा। आज पूरी रात कोई नहीं सोएगा। ना तुम ना हम और ना कविता।

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