रिश्तों की गर्मी अध्याय 1

रिश्तों की गर्मी

लेखक-अभय

गर्मी की उस दोपहर मे सर पर तप्ता सूरज मेरी परीक्षा ले रहा था मंज़िल अभी भी दूर थी प्यास से गला सूख रहा था पर पानी भी नही था मेरे पास पिछले चार दिनो से सफ़र जारी था मेरा अंजाना सफ़र और अंजानी मंज़िल थी रास्ता पूरी तरह से सुनसान पड़ा था बस गरम लू ही थी जो साय साय करते हुवे कहर ढा रही थी मैं आस लगा रहा था कि कुछ साधन मिल जाए तो सफ़र आसान हो जाए पर आज इस राह का मैं एक्लोता मुसाफिर ही था

अपने धीमे कदमो से मैं उस कच्चे रास्ते पर चलता ही जा रहा था पर अब मेरे पैर जवाब देने लगे थे मैने सोचा कि कही मैने ग़लत रास्ता तो नही पकड़ लिया कोई नक्शा भी नही था मेरे पास उपर से थकान से बुरा हाल था तो सोचा कि कुछ देर आराम ही करलू तो एक खेत के पास नीम की छाँव मे बैठ गया छाँव मिली तो शरीर भी कुछ सुस्त हुआ और ना जाने कब मेरी आँख लग गयी पता नही कितनी देर मैं पेड़ के नीचे सोता रहा

आँख तब खुली जब किसी ने मुझे आवाज़ दी ओ शहरी बाबू कॉन हो तुम और मेरे खेत मे क्या कर रहे हो अपनी आखे मलते हुए मैने देखा कि कोई गाँव की औरत है सांवला सा रंग तीखे नैन-नक्श उमर कोई 33-34 होगी पर बेहद ही कसा हुवा जिस्म था उसका मैं उसको देखते ही रह गया पलके झपकाना भूल गया तो वो बोली बाबू जी कहाँ खो गये मैने सकपकाते हुवे अपना थूक गटका और काँपते हुवे लहजे मे कहा कि जी मुसाफिर हूँ थोड़ा सा थक गया था तो सोचा कि पेड़ के नीचे बैठ जाउ पता नही चला कि कब आँख लग गयी माफी चाहता हूँ 

वो बोली कोई बात नही बाबू 

मैने कहा कि जी मुझे अर्जुनगढ़ जाना है आप बता सकती है कि वो गाँव कितना दूर है तो वो बोली बाबू तुम गाँव के किनारे पर ही हो बस कोई 1 कोस और रह गया है मैं भी अर्जुनगढ़ की ही हू और ये मेरे खेत है यहाँ पर मैने अपना सामान उठाया और उसको कहा कि जी बड़ी प्यास लगी है

यहाँ पानी मिलेगा क्या तो वो बोली कि थोड़ी दूर कुआँ है आओ पानी पिलाती हू तो मैं उसके पीछे पीछे चल पड़ा उसने बाल्टी कुवे मे डाली और मुझे पानी पिलाने लगी ऐसा ठंडा पानी था उस कुवे का मैं तो फ्रिड्ज के पानी को भूल गया कुछ पलो के लिए मैं जैसे अपने आप को भूल ही गया तो उस औरत ने फिर से मुझे वर्तमान मे लाते हुवे कहा कि बाबू पानी पियो ध्यान कहाँ है तुम्हारा तो मैं पानी पीने लगा जी भर कर पिया मैने

मैने उसको धन्यवाद किया और अपने सामान को संभालते हुवे चलने लगा तो उसने कहा बाबू मैं भी गाँव मे ही जा रही हू आओ तुमको छोड़ देती हू तो मैं उसके पीछे पीछे चल पड़ा कुछ दूर आगे आने पर उसने पूछा कि बाबू गाँव मे किसके घर जाओगे तो मैने कहा कि जी मुझे ठाकुर यूधवीर सिंग की हवेली पे जाना है तो ये सुनते ही उस औरत ने अपने सर पर जो घास का गट्ठर उठाया हुवा था वो उसके सर से नीचे गिर गया

उसने जहर भरी नज़रो से मेरी ओर देखा और कहा कि मुझे नही बताना कोई रास्ता-वास्ता तुमको अपने आप चले जाना और अपने गट्ठर को उठा कर बड़बड़ाती हुई आगे की ओर चली गयी मेरी तो समझ मे ही नही आया कि इसको क्या हुआ तो मैं भी आहिस्ता आहिस्ता उसी औरत की दिशा मे चल पड़ा जब मैने उस गाँव मे कदम रखा तो शाम ढल रही थी गाँव मे हर कोई मेरे भेस को ही देखे क्योंकि मैं बाहर से आया था तो लोग थोड़ी अजीब नज़रो से मुझे देख रहे थे

चोपाल पर कुछ बुजुर्ग बैठे थे मैने उनको राम राम किया और उनके पास बैठ गया उन्होने कहा मुसाफिर कहाँ से आए हो और किसके घर जाओगे तो मैने कहा बाबा मैं बड़ी दूर से आया हू और मुझे ठाकुर यूधवीर सिंग की हवेली जाना है हवेली का नाम सुनते ही उनके चेहरो का रंग जैसे उड़ सा गया तभी एक बुड्ढे ने पूछा कि बेटे तुम अजनबी आदमी तुम्हारा वहाँ क्या काम तो मैने कहा कि बाबा मुझे वहाँ से बुलावा आया है

उस बुजुर्ग की बूढ़ी आँखो मे कई सवाल दिखे मुझे उन्होने कहा बेटा हवेली तो वो किसी जमाने मे हुआ करती थी पर आज तो बस एक इमारत ही रह गयी है मैने कहा बाबा मुझे तो वही बुलाया गया है कुछ सवाल मेरे मन मे भी है इसी लिए तो मैं इतने दूर से यहाँ आया हू तो उन्होने कहा कि बेटा गाँव के दूसरी ओर पहाड़ो के पास है ठाकुर की हवेली पर बेटा अब रात घिरने को आई है तुम आज यही गाँव मे रुक जाओ

सुबह मैं किसी को तुम्हारे साथ भेज दूँगा वो तुम्हे वहाँ तक छोड़ आएगा तो मैने कहा बाबा आप मुझे मुनीम राइचंद के घर पहुचा दीजिए तो उन्होने कहा कि बेटा राइचंद जी को कैसे जानते हो तो मैने कहा कि उन्होने ही मुझे इस गाँव मे बुलवाया है तो वो बोले बेटा तुम कॉन हो तो मैने कहा बाबा बताया तो था कि मैं मुसाफिर हू फिर उन्होने एक लड़के को मेरे साथ भेज दिया मैने राइचंद के घर का दरवाजा खटखटाया

तो जिस औरत ने मुझे कुँए पर पानी पिलाया था उसी ने दरवाजा खोला और मुझे देखते ही मुझ पर बरस पड़ी और बोली कि अरे तुम ,तुम मेरे घर तक कैसे आए हम हवेली के बारे मे कुछ नही जानते जाओ चले जाओ यहाँ से और गुस्सा करने लगी मैने कहा जी आप मेरी बात तो सुनिए मुझे मुनीम राइचंद जी से मिलना है उसने अपनी कजरारी आँखॉको फैलाते हुवे कहा कि तुम मुनीम जी को कैसे जानते हो

मैने कहा मैं उन्हे नही जानता वो मुझे जानते है उन्होने ही मुझे यहाँ बुलाया है तभी अंदर से आवाज़ आई लक्ष्मी कॉन है किस से बात कर रही है तो उसने मुझे अंदर आने को कहा और अपने बैठक मे ले गयी वहाँ पर एक 45-50 साल का आदमी बैठा था रोबीला इंसान था मैने हाथ जोड़कर उनको नमस्ते किया तो वो बोले मैने आपको पहचाना नही तो मैने कहा जी मेरा नाम देव है ये सुनते ही जो पान के बीड़े की पेटी उनके हाथ मे थी वो उनके हाथ से नीचे गिर गयी

उनकी आँखे हैरत से फैल गयी उन्होने अपने चश्मे के शीशे को बनियान से पोन्छा और कहा ज़रा फिर से बताना तो मैने कहा जी मैं देव हूँ उन्होने मुझे अपने सीने से लगा लिया उनकी आँखे पानी से भर आई वो बोले मुझे पता था कि आप ज़रूर आएँगे उन्होने कहा लक्ष्मी देख क्या रही है इनका स्वागत कर आज हमारे द्वार पर देख कॉन आए है

मेरी खुद समझ नही आ रहा था कि ये क्या बात कर रहे है आख़िर ये कैसा राज है राइचंद जी ने मुझे बिठाया और लक्ष्मी से कहा की तुम खड़ी खड़ी क्या देख रही हो जाओ और देव जी के लिए कुछ भोजन का प्रबंध करो सफ़र करके आए है फिर उन्होने मेरी ओर मुखातिब होते हुवे कहा की मालिक आप ने आने से पहले मुझे अगर इत्तिला कर दी होती

तो मै स्टेशन पर खुद आपको लेने आता आपने इतनी तकलीफ़ उठाई मैने कहा जी आपका शुक्रिया पर ये मेरा पहला मोका था अकेले यात्रा करने का और फिर मै हिन्दुस्तान भी तो पहली बार आया हू तो सोचा की थोड़ा सा माहोले भी देख लूँगा फिर मैने उनसे कहा की सबसे पहले आप मुझे ये बताए की आपने मुझे लंडन संदेशा क्यो भिजवाया

और ये हवेली और ठाकुर यूधवीर कोन है और मेरा इन सब से क्या लेना देना है मै तो इंडिया का निवासी भी नही हू तो वो बोले देव बाबू पहले आप कुछ भोजन कर ले थोड़ा सा आराम कर ले फिर मै आपको सब बाते बताता हू भूख तो मुझी भी लगी थी और थकान भी काफ़ी थी तो मुझे उनकी बाते सही लगी कुछ ही देर मे भोजन लग गया तो मै खाने पर ऐसे टूट पड़ा जैसे की कई जन्मो का भूखा हू

खाने के बाद राइचंद जी ने कहा की मालिक आप थोड़ा आराम करे सुबहा आप एक नयी दुनिया देखेंगे उन्होने मेरे प्रति जिग्यासा जगा दी थी मैने कहा नही जो भी बात है अभी बताइए पर उन्होने कहा की सुबह हम हवेली चलेंगे फिर आप खुद ही समझ जाओगे उन्होने मेरा बिस्तर लगा दिया पर आँखो मे नींद ही नही आई अच्छा भला जी रहा था अपनी जिंदगी मे

अनाथ था बचपन से ही शंघर्षो से भरी ज़िंदगी जीया था पर फिर भी खुश था कॉलेज का लास्ट यियर चल रहा था पर एक शाम आए खत ने ज़िंदगी को उथल पुथल करके रख दिया था ये लेटर इंडिया से किसी राइचंद ने भेजा था और साथ मे जहाज़ की टिकेट भी थी मुझे अर्जेंट्ली इंडिया बुलाया गया था पर कुछ भी सॉफ सॉफ नही बताया गया

मुझे भी थोड़ी सी उत्सुकता हो गयी थी इसके कई कारण थे पहला तो की मै बेशक लंडन मे रहता था पर मेरा रंग रूप इंडियन्स जैसा ही था दूसरा जिन लोगो ने मुझे पाला था वो भी इंडियन्स ही थे और फिर इतने दिनो तक कभी किसी ने मुझे खत नही लिखा था पर ठीक मेरे 20वे जनमदिन पर आए उस खत मे कुछ तो राज़ था तो मैने भी फ़ैसला कर लिया की चलो चलते है

और फिर एक मुश्किल सफ़र के बाद आख़िर मै अर्जुन गढ़ आ ही गया था अपने दिल मे कई सवाल लिए जिसका जवाब बस मुनीम जी के पास थे सोचते सोचते आँख लग गयी सुबह मैं उठा तो सूरज सर पर चढ़ आया था मैने अंगड़ाई ली और बाहर आया ये गाँव मे मेरी पहली सुबहा थी मैने अपने कपड़े लिए और बाथरूम मे घुस गया पर साला ये तो ज़ुल्म ही हो गया

दरवाजे की कुण्डी नही लगी थी तो मैने सोचा की कोई नही है पर अंदर लक्ष्मी नहा रही थी उसके मस्ताने बदन को पानी की बूँदो मे लिपटे हुए देख कर मेरा दिमाग़ तो एक दम से झंझणा गया इस से पहले मैने कभी किसी औरत या लड़की को नंगा नही देखा था तो मेरे लिए ये एक दम से अलग सा अनुभव था

एक दम से हुई इस घटना से लक्ष्मी भी हक्का-बक्का रह गयी थी मेरा तो दिमाग़ ही सुन्न सा हो गया था की क्या करू लक्ष्मी बस इतना ही बोली कि जाआ ज़ाआा जाओ यहा से मै बाथरूम से बाहर निकलने ही वाला था कि बाहर से आवाज़ आई माँ कहाँ हो तुम मुझे खाना दो मै स्कूल जा रही हू ये सुनते ही लक्ष्मी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे वापिस बाथरूम मे खीच लिया

और खुद चिल्लाते हुवे बोली कि मै नहा रही हू तुम खुद ही ले लो और चली जाओ फिर लक्ष्मी मेरी ओर देखते हुवे फुसफुसा के बोली मेरी बेटी स्कूल ना चली जाए तब तक यही रहो कही उसने तुम्हे यहा से निकलते हुवे देख लिया तो मेरे बारे मे पता नही क्या सोचेगी पर बाथरूम के अंदर भी रुकना कोन सा आसान था ख़ासकर जब आप किसी नंगी औरत के साथ हो

मेरी नज़र बार बार उसके जिस्म पर जाने लगी तो वो बोली अपना मूह दूसरी तरफ करके खड़े हो जाओ पर मुझे तो जैसे उसकी बात सुनी ही नही सांवला रंग था पर उसका शरीर भरा हुवा था मोटी मोटी बोबे मास से भरी हुवी ठोस जंघे और काले काले बालो से धकि हुवी योनि जिसे मै बालो की वजह से देख नही पाया मेरी साँसे लड़खड़ाने लगी थी धड़कन बढ़ गयी थी

लक्ष्मी भी परेशन हो गयी थी क्योंकि ये कुछ पल बड़े ही मुश्किल थे वो एक अंजान के साथ बाथरूम मे नंगी खड़ी थी मेरी नज़र नीचे गयी तो मैने देखा कि मेरा लंड निक्कर मे टेंटहाउस बनाए खड़ा है लक्ष्मी भी चोर नज़रो से मेरे लंड की तरफ ही देख रही थी तभी उसकी बेटी ने कहा की माँ मै जा रही हू तो कुछ देर बाद मै भी बाहर निकल आया

करीब एक घंटे बाद मै नहा धोकर तैयार हो गया था लक्ष्मी ने मुझे नाश्ता करवाया और मैने उस से बाथरूम वाली घटना के लिए माफी माँगी पर उसने बात नही की मै नाश्ता कर ही रहा था की राइचंद जी अपने साथ एक वकील को ले आए उन्होने कहा आप नश्ता कर ली जिए फिर हम हवेली चलते है तो मैने फटाफट से काम निपटा दिया और अपना सामान उठा लिया

बाहर एक कार खड़ी थी हम बैठे और वो धूल उड़ाती हुवी चल पड़ी हवेली की ओर कोई 15-20 मिनिट बाद मै एक बेहद ही विशाल इमारत के सामने खड़ा था किसी जमाने मे ये बड़ी आलीशान रही होगी पर आज इसकी हालत कुछ ख़ास नही थी गेट पर एक बड़ा सा ताला लटका पड़ा था वकील ने एक पुरानी जंग लगी चाबी निकाली और ताला खोलने की कोशिश करने लगा पर वो नही खुला

मुनीम जी ने बाहर से कुछ आदमी बुलवाए और ताले को तुडवा दिया जंग खाया हुवा गेट चर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्ररर करते हुवे खुल गया और मै अंदर दाखिल हो गया हर तरफ बस धूल-मिट्टी और जाले ही लगे थे ऐसा लग रहा था जैसे की सदियो से किसी ने झाँक कर भी नही देखा था इस तरफ फिर अंदर के कुछ खास कमरो का ताला भी तोड़ा गया और सफाई करवाई जाने लगी

हवेली के बीचोबीच एक विशाल पेड़ था उसके चारो और चबूतरा बना हुवा था तो वही पर हमारे लिए कुर्सिया और मेज लगवा दी गयी तो अब बारी थी मेरे सारे सवालो के जवाब जानने की तो मैने कहा मुनीमजी अब मुझे आप बताए सारी बात तो राइचंद जी बोले मालिक बताना क्या है ये हवेली घर है आपका आप यहाँ के मालिक है मैने कहा सर आपको कोई ग़लत फहमी हुवी है

तो वो बोले देव साहब कोई ग़लत फहमी नही है आप ही इस हवेली के मालिक है मैने कहा पर मै तो अनाथ हू और इंडिया से मेरा क्या लेना देना तो वो बोले आपको कुछ भी याद नही है मैने कहा क्या याद नही है मेरी धड़कन बढ़ गयी थी मै बुरी तरह से उतावला हो रहा था मैने कहा आप लोग प्लीज़ साफ साफ बताए कि ये सब क्या हो रहा है क्या मामला है

तो राइचंद जी ने राज़ की पहली परत को खोलते हुवे कहा की आप ठाकुर खानदान के आख़िरी चिराग है आप ठाकुर यूधवीर सिंग जी के पोते है ये सुनकर मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी मैने कहा पर मै तो ब्रिटिश हू तो वो बोले नही आप यहा के ही हो यहा के हालत कुछ ठीक नही थे उस टाइम तो आपको उस टाइम सलामत रखने के लिए आपके पिता के दोस्त के घर भिजवा दिया गया था तो मैने कहा अगर ऐसा था तो मुझे ये बात क्यो नही बताई गयी और फिर मै हमेशा ग़रीबी मे ही क्यो जिया तो राइचंद जी बोले की हमें हमेशा आपका ख़याल था हमारे लोग हर पल आपकी हिफ़ाज़त को आपके आस पास ही मोजूद थे ये 18 साल का समय कैसे निकाला है ये हम ही जानते है

उन्होने कहा सोचिए अगर आप इस खानदान के वारिस नही है तो कैसे आप लंडन के रॉयल स्कूल मे पढ़े तो मैने कहा की वो तो कोई हमेशा मेरी फीस भर देता था ……… एक मिनिट!!!!!!!!!!!!!!!! तो वो आप थे जो मेरी फीस भरा करते थे उन्होने कहा वो आपका ही धन था मै तो बस उसका रखवाला हू मालिक मैने कहा जब आपने मेरी वहाँ इतनी मदद करी है तो फिर मुझे उसी टाइम क्यो नही बताया तो वो बोले कि आपके दादाजी की ये हसरत थी की आप एक आम इंसान की तरह जिए

ताकि आपको आम आदमी के दुखो का पता रहे और आप ठाकुर होते हुवे भी आपका दिल ग़रीबो की मदद करे मैने कहा मुझे तो विश्वास नही हो रहा है पर अब आप कह रहे है तो मान लेता हू उन्होने कहा की यही सच है छोटे ठाकुर मैने कहा अगर ऐसा है तो फिर मेरा परिवार कहाँ है और ये हवेली बंद क्यो पड़ी है तो उन्होने कहा ये एक लंबी कहानी है………………….

समय के साथ आप सब कुछ जान जाओगे पर पहले आप वकील साहिब के साथ कुछ कार्यवाही को निपटा ले मैने कहा पर मुझे तो कुछ नही चाहिए मेरा भी एक परिवार था यही बहुत है मेरे लिए तो वो कहने लगे कि नही अब आप आ गये है अब आप अपनी विरासत को संभाले और मुझे मेरी ज़िम्मेदारी से मुक्त करे वैसे ही गाँव मे लोग ताने देते है कि ठाकूरो का सब कुछ खा गया

मैने कहा हाँ वो तो है और अगर अब मुझे यही रहना है तो थोड़ा ठीक से सफाई वग़ैरहा करवा दीजिए और पानी का इंतज़ाम भी तो वो बोले आप चिंता ना करे दो-चार दिन मे सारा काम हो जाएगा वो बोले जब तक यहा रहने लायक नही होता आप मेरे ही घर रहेंगे तो मैने कहा नही अब मै यही रहूँगा फिर गाँव मे आप ही तो अपने हो आपके घर तो आता ही रहूँगा

वो बोले जैसी आपकी इच्छा पर आपकी सुरक्षा के लिए मै कुछ आदमी तैनात कर देता हू मैने कहा इसकी कोई ज़रूरत नही है और होगी तो बाद मे देख लेंगे वो बोले आप भी अपने पुरखो की तरह ही ज़िद्दी हो राइचंद जी बोले पर आज तो आपको मेरे घर ही ठहरना होगा क्योंकि यहा तो सबकुछ चूहो ने कुतर डाले होंगे फिर उनका आग्रह मै टाल ना सका और उनके घर आगया

अगले रोज भी मै थोड़ा सा लेट ही उठा तो लक्ष्मी ने कहा की आप तैयार हो जाओ मै नाश्ते की व्यवस्था करती हू और अगर आपकी कोई फरमाइश हो तो मुझे ज़रूर बताना मैने कहा नही मुझे तो गाँव का खाना बढ़िया लगा आप जो चाहे बना दे फिर मैने कहा मुनीम जी कहाँ है तो वो बोली की वो तो सुबा सवेरे ही सहर चले गये आपके लिए गाड़ी छोड़कर गये है

कह रहे थे की अगर आप कही जाना चाहे तो ड्राइवर आपको ले जाएगा मैने कहा इसकी कोई ज़रूरत नही है वैसे मै गाँव तो देखना चाहता हू पर कार से वो मज़ा नही आएगा फिर मै जल्दी से तैयार हो गया तो लक्ष्मी बोली की अगर आप अकेले जाएँगे तो कही वो मुझ पर गुस्सा ना करे की ठाकुर साहब को अकेला क्यू जाने दिया तो मैने कहा आप क्या ठाकुर साहब कहते रहते हो आपके तो मै बेटे जैसा हू

अगर आपने आज के बाद मुझे साहब कहा तो मै यहा नही आउन्गा तो वो बोली जी ठीक है आगे से हम आपको आपके नाम से ही पुकारेंगे पर अकेले मे और हँस पड़ी लक्ष्मी ने काफ़ी टाइट ब्लाउस पहना हुवा था तो उसकी आधे से ज़्यादा चूचिया बाहर को आने को मचल रही थी मेरी निगाह से कब तक वो बची रहती मैं उन्हे घूर्ने लगा तो लक्ष्मी ने कहा क्या देख रहे हो मैने नज़र बदलते हुवे कहा कुछ नही और घर से बाहर निकल आया

गाँव का माहौल शहर से बड़ा ही अलग और हरा भरा था हर तरफ पेड़ लगे हुवे थे हरियाली छाई थी हर तरफ मै घूमते घूमते गाँव से थोड़ी से बाहर की तरफ निकल आया तो मुझे नदी दिखी तो मै उस ओर बढ़ गया मैने थोड़ी दूर से ही देख लिया था की नदी मे औरते नहा रही थी और कुछ कपड़े धो रही थी तो मै वही पास की झाड़ियो मे थोडा छुप गया

और उनको नहाती हुवी देखने लगा आक्च्युयली उनको नहाते हुवे मुझे वो पल याद आ गया जब मैने लक्ष्मी को नंगा देख लिया था और अब मै इधर इन औरतो को देख कर आ गया था मै थोड़ा और छुप सा गया ताकि मुझ पर किसी की नज़र नही पड़े और वहाँ के नज़ारे लेने लगा ऐसा हॉट नज़ारा मैने आज से पहले कभी नही देखा था तो मेरी नसे ज़ोर मारने लगी

ना जाने कब मेरा हाथ मेरे लंड पर पहुच गया और मै उसको पेंट के उपर से ही मसलने लगा बड़ा अच्छा लग रहा था ये सब ये गाँव ये एक अलग ही दुनिया थी मै उन औरतो को देख देख कर काफ़ी उत्तेजित हो गया था मुझे लगा कि मुट्ठी मार ही लू यही पर फिर सोचा की अगर किसी ने यहा मुझे ऐसे इनको देखते हुवे पकड़ लिया तो कही मुसीबत ना हो जाए

तो मै वहाँ से खिसक लिया पहले मैने लक्ष्मी को नंगा देखा और अब इन औरतो को तो मेरे मन के तार बार बार झंझणा रहे थे और लंड पैंट मे बार बार अकड़ रहा था तभी मुझे कुछ ध्यान आया और मेरे पैर अपने आप हवेली की तरफ बढ़ रहे थे और 20-25 मिनिट बाद मै उसी जगह के दरवाजे पर खड़ा था पर आज दरवाजा बंद नही था

तो मै अंदर ही चला गया राइचंद जी ने कुछ लोग काम पर लगा दिए थे जो हवेली की सॉफ सफाई कर रहे थे ताकि उसे कुछ रहने लायक बनाया जा सके उन मजदूरो मे से कुछ लोग तो कल वाले ही थे तो उन्होने मुझे नमस्ते किया और कहा की बाबूजी आप यहा तो मैने कहा की बस ऐसे ही घूमने आ गया आप अपना काम करते रहे मै ज़रा इधर उधर टहल लेता हू

कुछ देर मै हवेली को एक टक देखता रहा और फिर मै उपर की मंज़िल पर जाने को सीढ़िया चढ़ता चला गया जगह जगह जाले लगे थे तो मै उनको हटा ता हुवा उपर चढ़ गया आज एक तो गर्मी बहुत ही ज़्यादा पड़ रही थी और एक यहा का महॉल भी पता नही कैसा था इसमे एक अजीब सा सूनापन था मैने अपने माथे का पसीना पोन्छा और आगे बढ़ने लगा

हर कमरे पर एक मोटा ताला लगा हुवा था जो की जंग खाया हुवा था देखने से ही पता चलता था कि पता नही कब से ये बंद है मै थोड़ा सा उत्सुक तो था पर मै बिना राइचंद जी से पूछे इन कमरो को नही खोलना चाहता था तो मै आगे बढ़ गया तो कुछ और सीढ़िया दिखाई दी तो मै उपर की मंज़िल की ओर चला गया मैने सोचा की यार इतनी बड़ी हवेली मे तो बहुत लोग रहते होंगे किसी टाइम मे और आज यहा एक दम वीरान है इस मंज़िल पर कुछ कबूतर गुटार गुटार कर रहे थे जैसे ही उन्हे मेरे कदमो की आहट सुनी वो भाग खड़े हुवे पल पल मेरा दिल तेज़ी से धड़कता जा रहा था उमस की वजह से गर्मी भी कुछ ज़्यादा ही लग रही थी मेरा गला जैसे सूख गया था तभी मेरी निगाह एक कमरी की खिड़की पर गयी उसका थोड़ा सा काँच टूटा हुवा था

तो मैने उस खिड़की पर जमी धूल को अपने हाथो से सॉफ किया और अंदर की ओर झाँका तो देखा की हर तरफ धूल की मोटी परत चढ़ि है हुई है एक कोने मे बड़ा सा बेड था और एक साइड मे शृंगार की टेबल थी दीवारों पर कुछ तस्वीरे जड़ी हुवी थी जो धूल से जैसे दबने को ही थी मुझे कौतूहल होने लगा तो मैने कुछ सोचा और तुरंत ही नीचे आया और मजदूरो से हथौड़ा लेकर उपर आ गया

और उस कमरे के ताले को तोड़ दिया मैने जैसे ही गेट खुला मुझे तुरंत ही अपने सर को नीचे झुकाना पड़ा व्हिइीईईईयचहिईीईईईई करते हुवी ढेरो चमगादड़ दरवाजे से बाहर निकले मेरी तो जैसे रूह ही जम गयी थी अचानक से मै बुरी तरह सी डर गया था सांसो की रफ़्तार काबू से बाहर हो गयी थी तो मै वही कमरे मे पड़ी एक मिट्टी से भरी कुर्सी पर बैठ गया और अपनी सांसो को दुरुस्त करने लगा

कुछ देर बाद मै उठा और कमरे को देखने लगा छत पर एक बड़ा सा फनूस लगा था जो कभी इस कमरे को रोशनी से आबाद किया करता था दीवारो पर लगी कुछ तस्वीरो को मैने अपनी शर्ट की आस्तीन से सॉफ किया तो कुछ तस्वीरे एक औरत की थी देखने से ही पता चलता था कि कितना तेज था उस औरत के माथे पर कुछ तस्वीरो मे वो खिल खिलाती हुवी दिख रही थी

कुछ मे वो बगीचे मे बैठी हुवी थी मैने कुछ और तस्वीरो को सॉफ किया तो वो किसी आदमी की थी कड़क मुन्छे हाथो मे बंदूक लिए चेहरे से रोब टपक रहा था मैने वो तस्वीरे देखी और फिर खुद को देखा और विचार करने लगा कि क्या मै सच मे इन्ही का वंशज हू

पता नही कैसी कशिश थी उन तस्वीरो मे लगा की बस देखता ही जाउ उनको एक लगाव सा हुवा मुझे उन चेहरो के साथ पता नही मै कितनी देर रहा उस कमरे मे मेरी तंद्रा तब टूटी जब नीचे से कोई मुझे ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगा रहा था मैं गॅलरी मे आया और झाँक कर देखा तो मैने लक्ष्मी को खड़ा देखा

वो अपने सर पर दोनो हाथ रखे मुझे पुकार रही थी जब मैने उसको देखा तो मेरी नज़र उसकी तनी हुवी चूचियो पर चली गयी मैने कोशिश की कि मै ऐसा कुछ ना सोचु पर मेरा मन माना ही नही कुछ देर तक उसके बोबो को देखने के बाद मैने कहा जी अभी आया और नीचे पहुच गया

तो वो बोली पता है आपको सारे गाँव मे ढूँढ कर अब इधर आई हू आपका अकेले यहाँ आना ठीक नही है कम से कम बता कर तो आते मैने कहा वो तो मै घूमते घूमते इधर आ गया लक्ष्मी बोली मालिक आप थोड़ा सा सावधानी बरते ऐसे अकेले घूमने से आपको ख़तरा है तो मैने कहा मुझ अंजान को कैसा ख़तरा तो वो बोली अब आप अंजान नही रहोगे जल्दी ही सबको मालूम हो जाएगा कि ठाकूरो का अंतिम वारिस लोट आया है और फिर गाँव मे भी कई दुश्मन है मैने कहा एक मिनिट जब मै किसी को जानता ही नही हू तो फिर दुश्मन कहाँ से हो गये तो लक्ष्मी दबी आवाज़ मे बोली की मालिक समय आने पर आपको सब पता चल जाएगा मै आपकी बातों का उतर नही दे सकती हू अभी आप घर चले भोजन का भी समय हो गया है

मैने कहा पर मेरे सवालो का जवाब कोन देगा तो लक्ष्मी बोली सब कुछ समय पर छोड़ दीजिए और अभी घर चलिए तोमै उसके साथ घर आ गया पर मेरे मन मे एक तूफान सा चल रहा था और कोई भी आसानी से मेरे सवालो का जवाब नही दे रहा था तो मै उलझ सा गया था अनचाहे ही ज़िंदगी मे एक ऐसा मोड़ आ गया था जो मुझसे झिल नही रहा था

मै अपने ख़यालो मे खोया हुवा था तो लक्ष्मी ने मेरा ध्यान तोड़ते हुवे कहा की आपको खाना परोस दू तो मैने कहा नही मुझे भूख नही है तो वो बोली भूख क्यो नही है आपं सुबह भी अच्छे से नाश्ता नही किया था मैने कहा जी मुझे सच मे भूख नही है तो वो कहने लगी की आप आराम करे मै ज़रा खेतो की ओर होकर आती हू अगर कुछ चाहिए तो नौकरो से कह देना

मैने कहा अगर आप बुरा ना माने तो मै भी आपके साथ खेत मे चलूं इधर मेरा मन भी नही लगेगा और थोड़ा घूम भी लूँगा तो लक्ष्मी ने कुछ सोचा और फिर बोली की ठीक है आ जाइए और मै उसके साथ खेतो की ओर चल पड़ा रास्ते मे लक्ष्मी मुझसे बात करती जा रही थी और लंडन के बारे मे भी पूछ रही थी वहाँ के लोग कैसे है और मै उनके हर सवाल का जवाब दे रहा था

ऐसे ही बाते करते करते हम लोग खेतो में आ गये तो लक्ष्मी ने कहा की आप बैठो मै ज़रा कुवे की मोटर चला कर ज्वार मे पानी छोड़ देती हू मैने कहा मै भी आपकी मदद करू क्या तो वो बोली आप रहने दीजिए पर मैने ज़िद की , कि नही मै भी काम करूँगा तो वो बोली की आप क्यू मुझे पाप का दोषी बनाना चाहते है आपप मालिक लोग है हम पर पाप ना चढ़ाए

तो . मै वही खड़ा हो गया और लक्ष्मी अपना काम करने लगी तभी पानी के बहाव से खेत की एक साइड की नाली टूट गयी और पानी खड़ी फसल मे जाने लगा तो लक्ष्मी ने अपने लहंगे को जाँघो तक चढ़ा लिया और कास्सी लेकर नाली को सही करनी मे जुट गयी और मेरी नज़र उसकी साँवली पर चमकीली जाँघो पर पड़ गयी तो एक पल मे ही मेरा लौडा पैंट मे खड़ा हो गया और बाहर आने को मचलने लगा

कसम से बड़ा ही मोहक नज़ारा था वो मैने सोचा काश ये अपने लहंगे को थोड़ा सा और उचा कर ले तो मज़ा ही आ जाए उसकी टाँगे बड़ी ही चिकनी और मस्त लग रही थी मुझे मेरा गला सूख गया दिल तो किया कि एक इसको यही पर पकड़ लू पर ऐसा कर नही सकता था तो बस उसकी टाँगो का नज़ारा देखता ही रहा काफ़ी देर तक वो नाली को ठीक करती रही और मै उसको देखता रहा

लक्ष्मी के पैर कीचड़ मे सन गये थे तो फिर उसने कस्सि को साइड मे रखा और खेली पर अपने पैर रख कर उनको धोने लगी तो उसका घाघरा और भी उठ गया और अब काफ़ी अंदर का नज़ारा दिखने लगा वो अपनी मस्ती मे मगन थी तो उसको ध्यान नही था कि मै उसके बदन को नज़रो से पी रहा हू ना जाने क्यो वो मुझे बड़ी अच्छी लगने लगी थी

फिर वो मेरे पास आई और बोली की आइए आगे को चलते है तो मै उसके पीछे पीछे कच्ची पगडंडी पर चल पड़ा उसके खेत दूर दूर तक फैले हुवे थे अपनी गोल गान्ड को मटकाती हुवी वो आगे आगे चले जा रही थी जैसे कोई मस्त हिरनी जंगल मे विचरण कर रही हो मेरा लंड चीख चीख कर कह रहा था कि मुझे इसकी गान्ड मे डाल दे पर मै कुछ कर नही सकता था

थोड़ा आगे जाने पर खेत दो भागो मे बॅट गये एक तरफ तो ज्वार खड़ी थी और दूसरी ओर गन्ने की फसल लहलहा रही थी पास मे ही एक झोपड़ी सी बनी थी तो लक्ष्मी मुझे अंदर ले गयी और बोली कि आप आराम करो मैं ज़रा अभी आती हू तो मैने कहा आप मुझे अकेला छोड़ कर कहाँ जा रही है तो वो बोली मै बस अभी आई पर मैने कहा की नही आप जहा भी जा रही है मुझे भी ले चलिए

तो वो अपनी चुनरिया को उंगली मे घूमाते हुवे बोली की मैने कहा ना की मै अभी आई पर मैने सोचा कही ये मुझे छोड़ के ना चली जाए तो मैने कहा नही आप के साथ ही चलूँगा तो वो झुंझलाते हुवे बोली की मुझे पेशाब करने जाना है मैने कहा तो जल्दी जाओ वो तुरंत ही झोपड़ी से बाहर निकल गयी और पीछे की तरफ चली गयी मैने देखा की दीवार मे एक खिड़की है जिस से पीछे का दिख सकता है

तो मै उत्सुकता से खिड़की से बाहर देखने लगा लक्ष्मी ने अपने घाघरे को कमर तक उपर किया और झट से नीचे मूतने को बैठ गयी मेरी नज़र उसके गोल मटोल कुल्हो के कटाव पर ठहर गयी और मेरा बुरा हाल होने लगा उफफफफफफफफफफफफफफफ्फ़ क्या नज़ारा था मुझे लगा कही मै अपने होश ही ना खो दूं पर अभी गजब होना तो बाकी ही था कुछ देर वो मूत ती रही

फिर वो उठी और अपनी टाँगो को थोड़ा सा चोडा कर के खड़ी हो गयी जिस से उसकी खुली टाँगो से मुझे उसकी चूत दर्शन हो गये काले घने बालो के बीच दुबकी हुवी उसकी गुलाबी रंग की चूत को इस पोज़िशन मे मै अच्छे से निहार पा रहा था एक दो सेकेंड बाद लक्ष्मी अपना हाथ चुत पर लेके गयी और जो पेशाब की एक दो बूंदे वहाँ लगी थी उनको अपने हाथ से सॉफ कर दिया

जब उसकने अपनी चूत को हथेली से दबाया तो उसके बड़े बड़े चूतड़ एक अनचाही ताल से थिरक से उठे पर ये सब ज़्यादा देर नही चला फिर उसने अपने घाघरे को नीचे किया और वापिस आने लगी मै तुरंत जंगले से हटा और चारपाई पर आकर बैठ गया पर मेरा हाल बुरा हो गया था पसीना बह चला था शरीर से और लंड तो बस गुस्से से फन फ़ना रहा था

अंदर आने पर लक्ष्मी ने कहा की मै थोड़ी सी घास काट लेती हू फिर हम घर चलेंगे मैने अपना थूक गटका और कहा की आप घास काट लो मै आस पास थोड़ा सा घूम लेता हू तो वो बोली नही देव बाबू शाम घिर आई है थोड़ी देर मे अंधेरा हो जाएगा तो आपका ऐसे अकेले रहना ठीक नही है आप मेरे साथ ही रहिए

पता नही क्यो मैं लक्ष्मी की बात नही काट पाया वो जल्दी जल्दी से घास काटने लगी और मै अपनी आँखे उसके बदन से सेकने लगा पता नही क्यो पर मेरे दिल मे उसको चोदने का ख्याल कुछ ज़ोर्से ही आ रहा था मेरा खुद पर काबू रख ना बड़ा मुश्किल हो रहा था पर मै रिस्क लेना नही चाहता था करीब घंटे भर बाद हम गाँव की तरफ हो लिए अंधेरा होने लगा था

रास्ते मे मैने लक्ष्मी से पूछा की आपके कितने खेत है तो वो बोली बाबू हमारे तो बस 10 बीघा ज़मीन है उसी मे खेती करते है वो भी आपके दादा जी ने मुनीम जी को दान मे दी थी सब कुछ आपकी ही देन है मैने कहा आप मुझे मेरे परिवार के बारे मे कुछ बताती क्यो नही तो वो बोली की समय आने पर आप खुद ही जान जाएँगे और कुछ बाते ऐसी है की आप नही जानो तो ठीक रहेगा

मै वही रुक गया तो लक्ष्मी बोली वहाँ क्यो खड़े हो गये तो मैने कहा मुझे अभी सब कुछ जान ना है अपने बारे मे अपने परिवार के बारे मे , अगर वो है तो कहा है और आख़िर क्या हुवा था आप मुझे शुरू से हर एक बात बताओ अभी तो वो बोली मालिक मुनीम जी आ जाए तो आप उनसे ही पूछ लेना पर मेरा दिमाग़ अब झल्लाने लगा था तो मैने कहा नही मुझे आप अभी सबकुछ बताइए वरना मै अभी वापिस चला जाउँगा

लक्ष्मी विनती करती हुवे बोली मालिक आप अभी घर चलिए अगर आपकी यही चाह है तो मै आपको बताती हू की आप को हमने यहा क्यू बुलाया है और तेज तेज कदमो से घर की ओर चलने लगी मै भी उसके पीछे पीछे हो लिया घर आए हाथ मूह धोया और उन्होने मुझे बैठक मे बैठने को कहा लक्ष्मी की लड़की शरबत ले आई आज पहली बार मैने उसे देखा था

11वी मे पढ़ती थी पर बदन माँ की तरह ही उसका भरा भरा हुवा था शरबत का खाली गिलास ट्रे मे रखते हुवे मैने पूछा की राइचंद जी कब तक आएँगे तो वो बोली बापू तो 3-4 दिन बाद ही लोटेंगे तब तक हम है ना यहाँ आप को जो भी चाहिए हमे बताइए मैने कहा नही ठीक है कुछ देर बाद लक्ष्मी भी आ गयी और नीचे कालीन पर बैठ गयी तो मैने कहा आप नीचे क्यो बैठे हो उपर कुर्सी पर बैठो तो वो बोलीमालिक के आगे मै कैसे उपर बैठ सकती हू

तो मै उठा और लक्ष्मी के हाथो से पकड़ कर उसको खड़ा कर दिया मेरे हाथ उसकी गुदाज बाहो मे धसने लगे मैने उसको पास रखी कुर्सी पर बिठा दिया और कहा की मै कोई मालिक वालिक नही हू मै तो बस एक इंसान हू ज़िसकी ज़िंदगी थोड़ी बदल सी गयी है पिछले कुछ दिनो मे, देखिए कुछ दिनो पहले मुझे पता भी नही था की मेरा भी कोई घर है परिवार है पर अब मेरे दिल मे हुक उठ गयी है

मै अब बड़ा ही परेशान सा हो गया हू आप मेरी तरफ तरस खाइए और मुझे बता भी दीजिए की आख़िर कहाँ है मेरे घर वाले और क्या हुवा था जिसकी वजह से मुझे अपने घर से इतनी दूर जाना पड़ा बोलते बोलते मेरा गला रुंध गया और आँखो मे आँसू आ गये मैने अपने हाथ लक्ष्मी के आगे जोड़ दिए और कहा आप से मै भीख माँगता हू प्लीज़ मुझे मेरे परिवार के बारे मे बताइए

मेरा दिल तड़प उठा था आज तक अनाथो की तरह ही तो जीता आया था मै यहा आके पता चला की मेरा घर भी है मै अपने घर वालो से मिलना चाहता था मैने अपना सर लक्ष्मी के पाँवो मे रख दिया और कहा की मुझ पर अहसान कीजिए तो उन्होने मुझे उठाया और अपने गले से लगा लिया और मेरे आँसुओ को पोंछते हुवे बोली की बस देव बस आप रोइए मत मै आपको सब बता ती हू

तभी बिजली चली गयी और चारो तरफ अंधेरा हो गया लक्ष्मी ने लालटेन जला दी पर मेरा दिल भी जलने लगा था लक्ष्मी ने अपनी लड़की को कहा की तू अंदर जा और खाने की व्यवस्था कर तो उसने कहा की माँ मुझे भी जान ना है की गाँव मे लोग जो बाते करते है वो सच है या झूठ तो मैं उसको टोकते हुवे बोला की क्या कहते है गाँव वाले तो लक्ष्मी अपनी लड़की को देखते हुवे बोली की तू चुप कर

पर वो भी वही जम कर बैठ गयी तो लक्ष्मी ने एक निगाह उस पर डाली और फिर मेरी ओर देखते हुवे बोली की देव बाबू अगर आप जान ना ही चाहते है तो सुनिए ये बात उस दिनों की है जब मै नयी नयी ब्याह कर इस गाँव मे आई ही थी गाँव मे आपके खानदान का राज चलता था लोग कहते है की आपके पुरखो ने ही ये गाँव बसाया था आपके दादा जी का सिक्का चलता था बड़े बड़े अधिकारी अफ़सरो की भी हिम्मत नही होती थी की कोई उनकी बात को टाल दे

हर तरफ बस उनकी ही चर्चा थी उन दिनों हवेली के दरवाजे हमेशा सबके लिए खुले रहते थे चाहे दिन हो या रात हो मदद माँगने वालो को हमेशा वहाँ मदद मिलती थी कोई भी हवेली से खाली हाथ नही आया भगवान के बाद लोग अगर किसी को पूजते थे तो बस ठाकुर यूधवीर सिंघ जी को सब कुछ सही चल रहा था पर फिर आपके पिता जी विलायत से पढ़कर वापिस गाँव आ गये

उन दिनों वो बिल्कुल आप जैसे ही लगते थे दूर से देखने पर ही पता चलता था की कोई सजीला बांका नोजवान आ रहा है और स्वाभाव तो आप के दादा जी से भी बढ़कर एक दम सादगी से भरपूर कभी किसी को मना करना तो उनके स्वाभाव मे नही था देव बाबू आप कभी आईने मे गोर से देखना खुद को आप को अपने पिता ठाकुर वीरभान सिंघ जी की छवि ज़रूर दिखेगी

बाहर तेज हवाए चलने लगी थी आसमान बादलो के शोर से जैसे फटने को ही था लक्ष्मी ने लालटेन की लो को थोड़ा और तेज किया और अपना गला खंखारते हुवे कहना शुरू किया , देव सब सही चल रहा था पर आपके पिता से एक ग़लती हो गयी जिसका ख़ामियाजा सारे गाँव को ही भुगतना पड़ा इसी लिए गाँव वाले अब ठाकूरो के नाम से भी नफ़रत करते है

ये सुनकर मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गयी तो मैने कहा ऐसा क्या हो गया था लक्ष्मी ने कुछ घूट पानी पिया और बताने लगी की यहाँ से कुछ कोस एक और गाँव है नाहरगढ़ वहाँ भी यहा की तरह ही ठाकूरो का राज चलता था एक दिन आपके पिता घुड़सवारी करते करते उस ओर निकल गये तो उन्होने देखा की कुछ लोग एक मजदूर को पीट रहे है आपके पिता ने जाकर बीच बचाव किया

पर बात बढ़ी और आपके पिता ने उन लोगो को बुरी तरह से घायल कर दिया अर्जुनगढ़ और नाहरगढ़ के बीच वैसे तो कभी कोई नाराज़गी की बात नही थी पर जिन लोगो से आपके पिता उलझ पड़े थे उनमे से एक वहाँ के ठाकुर का छोटा बेटा भीमसेन भी था जो की बहुत ही घटिया और आवारा किस्म का आदमी था वैसे तो बात छोटी सी थी पर भीम सेन के मन मे एक आग जल गयी थी

थोड़े दिन मे ही ये बात घर घर मे फैल गयी थी की दोनो गाँव के ठाकूरो के लड़को मे कुछ हुवा है पर सदियो से दोनो गाँवो मे बड़ा ही प्रेम था तो आपके बुज़ुर्गो ने बात को जैसे तैसे संभाल लिया और बात आई गयी हो गई कुछ दिन शांति से गुज़रे पर वो कहते है ना की होनी को कोन टाल सकता है समय अपनी चल खेल रहा था धीरे धीरे मुझे आज भी याद है उन दिनों जब गाव मे डर का महोल पसरा पड़ा था हर गली खून से रंग गयी थी हम लोग बस जी ही रहे थे कैसे भी करके उन दिनों उनकी हर एक बात को मै बड़े ही गोर से सुन रहा था बाहर हवाए और भी तेज हो चली थी लक्ष्मी ने बताना शुरू किया की आपके पिता की कीर्ति हर ओर होने लगी थी जितना मान आपके दादा का था उस से कही ज़्यादा अब आपके पिता का था उस छोटी सी उमर मे ही उन्होने सारे गाँव का दिल जीत लिया था

पर वो कहते है ना कि तकदीर मे क्या लिखा कौन जाने, तो समय बदलने को बेताब खड़ा था दुनिया मे जितनी भी नफ़रत के कारण है वो जर,ज़मीन और जोरू है ऐसा लोग कहते है और आपके पिता भी कुछ ऐसा ही काम कर बैठे

………………………………………………………………… कुछ पल खामोशी छाई रही फिर मैने कहा आगे क्या हुवा तो लक्ष्मी बोली आपके पिता ने भी एक ग़लती की वो मोहब्बत कर बैठे तो मैने कहा कि तो उसमे ग़लत क्या था आख़िर प्यार करना कोई गुनाह थोड़ी ना है

लक्ष्मी कहने लगी देव बाबू तब जमाना आज जैसा नही था और गाँवो मे तो आज भी प्रेमियो को मार कर पेड़ पर टाँग दिया जाता है तो उन दिनों की तो आप पूछो ही मत मैने कहा मेरी माँ का क्या नाम था तो वो बोली की वसुंधरा देवी पर सब उन्हे छोटी ठकुराइन कहते थे मैने कहा क्या मेरी माँ वो ही औरत थी जिनसे मेरे पिता ने प्रेम किया था तो लक्ष्मी बोली कि हाँ वो वही थी और साथ मे वो नाहरगढ़ के ठाकूरो की बेटी भी थी

लक्ष्मी ने पास रखी सुराही से पानी का जग भरा और मुझे पकड़ाते हुवे बोली की थोड़ा पानी पी लो मैने खिड़की से बाहर अंधेरे मे देखा दूर कही बिजली चमक रही थी मैने कुछ घुट भरे और जग को नीचे रख दिया मेरे सर की हर एक नस तेज़ी से भड़क रही थी आज ज़िंदगी मे पहली बार मुझे अपने परिवार के बारे मे जान ने का मोका मिला रहा था

पर यहा कुछ भी ऐसा नही था जो नॉर्मल हो बल्कि मेरे मन मे कुछ और नये सवाल खड़े हो गये थे मैने कहा अगर मेरी मा नहार्घर की थी तो भी उनके विवाह मे क्या दिक्कत थी तो लक्ष्मी बोली देव बाबू आप को सच मे कुछ नही पता सदियो से इन दोनो गाँवो मे भाई चारा था और सभी लड़कियो को बेटी का दर्जा देते थे दोनो गाओ मे इस कदर प्रेम था की वो लोग एक दूसरे के यहा विवाह नही करते थे

सब कुछ ठीक था पर आपके पिता ना जाने कैसे वसुंधरा को दिल दे बैठे कमसिन उमर की वो चुहल बाजी ना जाने कब मोहबत मे बदल गयी पर असली धमाका तो तब हुवा जब चारो दिशाओ मे इन दोनो के प्रेम के किससे सुनाई देने लगे कुछ समय तक तो इन सब बतो को अफवाह ही माना गया पर वो कहते है ना की धुआ वही उठता है जहा आग हो एक दिन भीमसेन ने अपनी बहन को आपके पिता के साथ देख लिया

भीम सेन तो पहले से ही आपके पिता से खार खाए बैठा था और फिर उसकी बहन दुश्मन से इश्क़ कर बैठी थी उसकी रगो मे भी तो ठाकुरोका ही खून दोद रहा था भीमसेन भी अपनी जगह सही था अपने खानदान की इज़्ज़त को यू किसी और के साथ देख कर किसी का भी खून खोलेगा ही तो वाहा पर बड़ी बहस बाजी हो गयी उसे वसुंधरा को गलिया देना शुरू कर दिया

ठाकुर वीरभान ने बड़ी कोशिश की उसको समझने की पर वो कहा मान ने वाला था आपके पिता के प्यार ने भीमसेन के मान मे जलती नफ़रत की ज्वाला मे घी का काम कर दिया था जब उनसे नही सहा गया तो वो भीमसेन से उलझ गये पर वसुंधरा देवी बीच मे आ गयी एक तरफ उनकी मोहबत थी और दूसरी ओर उनका भाई उन्हे डर था की कही ये दोनो आपस मे कुछ कर ना बैठे

तो उसने वीरभान जी को अपनी कसम देकर वहाँ से भेज दिया और भीमसेन वसुंधरा देवी को अपने साथ नाहरगढ़ ले गया ये कोई छोटी घटना नही थी आख़िर ठाकूरो की इज़्ज़त का मामला था तो शाम होते होते नाहरगढ़ से सैकड़ो आदमियो को लेकर भीम्सेन उसके और भाई और उसके पिता यानी आपके नाना बड़े ठाकुर रंजीत सिंघ भी हवेली के सामने आ गये

और आपके दादा जी को ललकारा जिस हवेली को कभी कोई नज़र उठा कर भी नही देखता था जिस हवेली मे लोग आज तक फरियाद ही लेकर आते थे आज उसके दरवाजे पर एक शिकायत आ गयी थी शिकायत तो क्या थी समझ लीजिए की एक सैलाब ने दस्तक दे दी थी ये एक ऐसी तूफान की आहट थी जो आया और अपनी साथ इस हवेली का सबकुछ बहा ले गया सारी खुशिया जैसे कही खो ही गयी

मेरा दिल धड़ धड़ करके धड़क रहा था साँसे मेरे काबू मे नही थी मै पल दर पल उलझता ही जा रहा था बाहर टॅप टॅप करके बारिश की बूंदे बरसने लगी थी खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी पर वो मेरे पसीने को सूखा नही पा रही थी लक्ष्मी ने कहा की खाने का समय हो गया है आप पहले कुछ खा ले फिर मै आपको पूरी बात बताती हू पर मैने मना करते हुवे कहा की मुझे भूख नही है आप आगे बताए

कुछ देर लक्ष्मी चुप रही फिर वो बताने लगी जिस दिन वो लोग हवेली तक आए उस दिन आपके दादा जी किसी काम से बाहर गये हुवे थे वरना वो मनहूस दिन टल जाता और आपके पिता भी वाहा नही थे ठाकुर भीमसेन की ललकार को सुनकर आपके चाचा ठाकुर आदित्या जिन्होने जवानी मे नया नया कदम ही रखा था और ठाकूरो का खून तो वैसे भी उबाल मारता ही रहता है

पर फिर भी उन्होने थोड़ी समाझधारी दिखाते हुवे रंजीत सिंघ से कहा की आप लोग अंदर आइए पिताजी आने ही वाले है जो भी है आप उनसे बात कर लेना पर भीमसेन पर तो उस दिन जैसे खून सवार था उसने आदित्या को बुरा भला कहना शुरू किया तो हवेली के लोग भी भड़क उठे पर आदित्या ने उन्हे शांत करवाया धीरे धीरे गाँव के लोग भी जुटने लगे थे

आदित्या ने काफ़ी कोशिश की उन लोगो को समझाने की परंतु जब काल सर पर नाच रहा हो तो बुधि काम नही करती भीमसेन जो की लगातार बदजुबानी कर रहा था उसने हवेली की औरतो को जब नंगा करने की बात की तो ठाकुर आदित्या की सबर का बाँध टूट गया और उन्होने ना चाहते हुवे भी हथियार उठा लिया देखने वाले बता ते है की दोनो तरफ से तलवारे खिच गयीथी

पर भीमसेन पूरी तैयारी से आया था और उसे तो अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेना था तो आदित्या और वो आमने सामने आ गये उमर भी क्या थी उनकी बस जवानी मे कदम ही तो रखा था तो दोनो पक्षो मे गरमा गर्मी होने लगी भीमसें ने जैसे ही ज़ुबान खोली आदित्या का पारा गरम तो था ही बस फिर युध शुरू हो गया चारो तरफ मार काट मच गयी

आदित्या की बंदूक से चली गोली ठाकुर रंजीत सिंघ की छाती को बेधती चली गयी और वो वही पर गिर पड़े तभी पीछे से भीमसेन ने आदित्या पर वार कर दिया और उनको लहू लुहन कर दिया गाँव के लोग भी हवेली के लिए लड़ने लगे पर तब तक भीमसेन ने अपना काम कर दिया था हवेली का दरवाजा खून से रंग गया था और कुछ दीवारे भी

जब आपके पिता वापिस आए तो देखा की गाँव पूरी तरह से सुनसान पड़ा है तो उनका माथा ठनका वो तेज़ी से हवेली की ओर आए और वाहा का नज़ारा देख कर उनका कलेजा ही जैसे फटने को हो गया हवेली के दरवाजे पर लाषो का ढेर लगा पड़ा था और सबसे उपर आपके चाचा ठाकुर आदित्या का कटा हुवा सर रखा था ये सुनकर मेरा दिल रो पड़ा आँसू आँखो से बहने लगे ऐसा लगा जैसे मेरी किसी ने जान ही निकल दी हो मेरी रुलाई छूट पड़ी

कुछ देर मै सुबक्ता रहा फिर लक्ष्मी बोली देव इन आँसुओ को संभाल लो इन्हे यू जाया ना करो और मेरी आँखो से आँसू पोंछने लगी पर मेरा दिल भरा हुवा था तो मै रोता ही रहा लक्समी बोली इसी लिए तो हम ये सब आपसे छुपा कर रखना चाहते थे क्योंकि हुमे पता था की आप ये सब सहन नही कर पाएँगे बाहर बारिश अब कुछ ज़्यादा तेज हो गयी थी

मैने टूट ती हुवी आवाज़ मे पूछा फिर क्या हुवा…………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………… वो बताने लगी बोली आपके पिता ने जब वो मंज़र देखा तो वो किसी बुत की तरह खड़े रह गये अपने भाई की लाश देख कर वो जैसे टूट ही गये थे कितनी ही देर वो अपने भाई के शव से लिपट कर रोते रहे फिर उन्हे कुछ सूझा तो वो अंदर गये तो उनको और भी सदमा लगा मैने कहा अंदर क्या हुवा तो वो बोले की अंदर आपकी दादी सा की लाश पड़ी थी और पास मे ही हवेली की और औरते भी मरी पड़ी थी

पूरा परिवार तहस नहस हो गया था तब तक हम लोग भी हवेली पहुच गये थे मैने मालकिन की लाश पर कपड़ा डाला आपके पिता का बहुत ही बुरा हाल हो गया था वीरभान जी तो जैसे पागला ही गये थे उनकी आँखो मे जैसे खून सा उतर आया था उन्होने अपनी जीप निकली और हथियार लेकर चल पड़े नहार्घर की ओर एक ऐसा तूफान शुरू हो गया था जिसने दोनो गाँवो को तबाह ही कर दिया

अब इतना बड़ा कांड हो गया था तो ज़िले की पुलिस भी मुस्तैद हो गयी थी और आपके पिता को नाहरगढ़ की सीमा पे ही रोक लिया गया था पर ठाकुर साहब एक तूफान बन चुके थे उनको बस यूधवीर सिंघ जी ही रोक सकते थे उनको खबर भिजवा दी गयी थी पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था जैसे ही ये मनहूस खबर उनको पता चली उसी पल उनको लकवा मार गया

और उनको इलाज के लिए ले जाना पड़ा दूसरी ओर जैसे तैसे करके ठाकुर वीरभान को पोलीस ने रोका वरना कुछ लाषे और गिरती उस रात दोनो गाँवो मे शायद ही कोई घर होगा जहा चूल्हा जला हो हवाए भी जैसे रो पड़ी थी उस दिन हस्ती खेलती हवेली किसी विधवा दुल्हन की तरह हो गयी थी

मुनीम जी तो बड़े ठाकुर के पास चले गये थे पर मै पूरी रात यही पर थी बड़ा ही दिल दहलाने वाला मंज़र था वो पोलीस ने सारी लाषो को कपड़े से ढक दिया था पर दीवारो से ताज़ा खून अभी भी टपक रहा था हवेली की सुरक्षा बढ़ा दी गयी थी पर अब यहा कोई नही था जिसे सुरक्षा की ज़रूरत थी और दूसरी ओर ठाकुर वीरभान को पोलीस ने बड़ी मुश्किल से संभाला हुवा था

तभी तेज हवा से खिड़की ज़ोर से खड़खड़ाई तो मेरा ध्यान टूटा बाहर बारिश अब और तेज हो गयी थी और एक तूफान मेरे सीने मे भी उमड़ आया था मै बस रोना चाहता था दहाड़ मार मार कर रोना चाहता था भगवान ये तूने कैसा ज़ुल्म किया परिवार से मिलाया भी नही भी ये दर्द आख़िर मुझे क्यो दिया और ये दर्द भी ऐसा था की कोई दवा इसका इलाज नही कर सकती थी बस मुझे अब इसको सहते रहना था

मैं उठा और खिड़की से बाहर बरसती बारिश को देखने लगा पर ये बारिश उस बरसात के सामने कुछ भी नही थी जो मेरे दिल मे हो रही थी पता नही मै कितनी देर तक वही खड़ा खड़ा उस तूफ़ानी बारिश को देखता रहा जब मेरा मन कुछ हल्का हुवा तो मै लक्ष्मी की ओर मुड़ा और कहा की आगे क्या हुवा बताइए तो लक्ष्मी बोली रात बहुत हो गयी है आप अभी सो जाइए कल बात करेंगे तो मै गुराते हुवे बोला की सुना नही तुमने मैने क्या कहा है

तो लक्ष्मी ने बताना शुरू किया की अगले दिन सारा गाँव शमशान घाट मे मोजूद था आज कई लाषो को का दाह-संस्कार किया गया था आपके पिता बदले की आग मे इस कदर जल रहे थे की उन्होने उस समय प्रतिगया ली की वो अपने घरवालो की चिता की राख ठंडी होने से पहले भीमसेन का सर काट देंगे पोलीस भी मोजूद थी वहाँ पर ठाकूरो का रुतबा इतना ज़्यादा था की वो बस देखते ही रहे

एक ऐसी ज्वाला भड़क उठी थी की जिसमे दोनो गाँव झुलस रहे थे वो गाँव जिनके संबंधो मे इतनी मिठास थी अब नफ़रत पैदा हो गयी थी एक दूसरे के बैरी हो गये थे हर तरफ बस तनाव सा फैल गया था यहा तक की हवओ ने भी अपना रुख़ मोड़ लिया था देव बाबू, उस दिन हवेली पर ऐसा ग्रहण लगा की आज तक उजाला नसीब नही हुवा उसकी हर एक बात मेरे दिल पर बिजली गिरा रही थी और बाहर आसमान जैसे फटने को ही था

वो कहने लगी की भीमसेन के खानदान का भी रोब हुवा करता था तो पोलीस उसे चाहकर भी गिरफ्तार नही पर पाई इधर आपके पिता उसके खून के प्यासे हो चुके थे हवेली के बाहर चप्पे चप्पे पर कड़ी सुरक्षा थी परंतु आपके पिता ना जाने कैसे सबको गच्चा देकर निकल भागे और वसुंधरा के घर जा पहुचे एक कयामत हुवी थी जिसमे हवेली लुट गयी थी

और ऐसा ही कुछ अब नाहरगढ़ मे होने वाला था बताने वाले बता ते है की उस रात ठाकुर वीरभान ने ऐसा रक्तपात मचाया की आज भी कभी उस रात का जिकर हो जाए तो लोगो की हड्डिया कांप जाती है एक ऐसा ज़लज़ला बरसा था उस दिन भीमसेन के गाँव पर की बस फिर कुछ नही बचा ठाकुर वीरभान ने अपनी कसम पूरी की और टीले के शिव मंदिर मे भीमसेन का कटा हुवा सर अर्पण कर दिया

ये एक बहुत बड़ी घटना थी उस समय की दो खानदान तबाह हो गये थे हवेली अब पहले जैसी नही रही थी पर समय अपनी गति से चलता रहा कुछ दिन गुजर गये आपके दादा जी भी हस्पताल से घर आ गये थे पर लकवे से उनकी दोनो टाँगे खराब हो गयी थी दोनो बाप-बेटो मे अब पहले जैसा प्यार नही रहा था बड़े ठाकुर तो ज़्यादातर अपने कमरे मे ही रहते थे ऐसे हो थोड़ा समय और गुजर गया

पर वीरभान के मन मे अब भी कही वसुंधरा के प्रति प्रेम का सागर हिलोरे मार रहा था और ऐसा ही कुछ वसुंधरा के मन मे भी चल रहा था और वैसे भी मोहबत कहा किसी के रोकने से रुकी है वो कहा ऊँच-नीच समझती है तो एक दिन वीरभान वसुंधरा को अपनी पत्नी बना कर हवेली ले आए वसुंधरा का बड़ा भाई और उसकी मान की इतनी हिम्मत नही थी की वो वीरभान का विरोध कर सके

जब बड़े ठाकुर को ये बात पता चली तो वो कुछ नही बोले पर उनके दिल मे ये मलाल ज़रूर था की इस लड़की के पीछे उनका पूरा परिवार काल के गाल मे समा गया पर बेटा जब उसे घर ले ही आया तो बस मान मसोस कर रह गये वसुंधरा देवी के आने से आपके पिता तो प्रसन्न थे पर अब हवेली मे वो बात नही रही थी एक अजीब सा सन्नाटा सा 24 घंटे छाया रहता था

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