वासना का मस्त खेल अध्याय 4

जब तक मेरे होंठ सुलेखा भाभी की नंगी पीठ को चूमते हुए उनकी गर्दन तक पहुंचे, तब तक तो वो सहती रहीं, मगर जब गर्दन को चूमते हुए मैं ऊपर उनकी कानों की लौ के पास पहुंचा तो सुलेखा भाभी की बर्दाश्त के बाहर हो गया. वो अब जोरों से सिसक उठीं और तुरन्त ही फिर से घुमकर सीधी हो गईं.

मैं भी अब थोड़ा सा उठकर सुलेखा भाभी के आधा ऊपर आ गया और उनकी चूचियों को अपने सीने से दबाकर उनके लाल लाल गालों को चूमते हुए उनके रसीले होंठों की तरफ बढ़ने लगा.

सुलेखा भाभी का विरोध भी अब कम होता जा रहा था और वो भी शायद बस वो दिखावे के लिए ही कर रही थीं. क्योंकि उनका बदन तो अब कुछ और ही‌ कह रहा था.

सुलेखा भाभी के गालों को चूमते हुए मैं उनके रसीले होंठों पर आ गया था, जो कि अब जोरों से थरथराने लगे थे. मगर अब जैसे ही मैंने अपने होंठों से उनके होंठों को छुआ, सुलेखा भाभी के होंठ और भी जोरों से थरथरा गए. उन्होंने अब खुद ही अपने मुँह को खोलकर मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया और मुझे अपनी बांहों‌ में भरकर उन्हें जोरों से चूसने लगीं.

अब तो कुछ कहने को रह ही नहीं गया था. इसलिए मैंने भी सुलेखा भाभी को जोरों से भींच लिया और उनके रसीले होंठ को चूसते हुए धीरे से अपनी जीभ को उनके मुँह में घुसा दिया.

सुलेखा भाभी ने भी अपना मुँह खोलकर मेरी जीभ का स्वागत किया और उसे धीरे धीरे चूसते हुए मुझे अपनी बांहों में लेकर पलट गईं. अब सुलेखा भाभी मेरे ऊपर आ गयी थीं और मैं उनके नीचे था. इससे उनकी ठोस भरी हुई चूचियां मेरे सीने पर अपना दबाव बनाने लगीं.

मेरे हाथ अब खुद ब खुद ही सुलेखा भाभी की पीठ पर आ गए थे, जो‌ कि उनके ब्लाउज के बीच के खाली जगह को अपनी उंगलियों से गुदगुदाने लगे. जैसे जैसे मेरी उंगलियां उनकी नंगी पीठ पर घूम रही थीं, वैसे वैसे ही सुलेखा भाभी का बदन भी अब थिरकने सा लगा. मैं और सुलेखा भाभी बड़ी ही तन्मयता से एक दूसरे को चूम‌ रहे थे. ना तो सुलेखा भाभी को कोई जल्दी थी और ना ही मुझे!

सुलेखा भाभी की नंगी‌ पीठ को गुदगुदाते हुए धीरे धीरे मेरे हाथ साड़ी के ऊपर से ही अब सुलेखा भाभी के विशाल नितम्बों पर पहुंच गए. मैंने बस एक दो बार अपनी हथेलियों से उनके नर्म गुदाज और गोलाकर विशाल नितम्बों को सहलाया और फिर नीचे उनके पैरों की तरफ बढ़ गया.

हमारी इस गुत्थमगुत्था की लड़ाई में सुलेखा भाभी की साड़ी और पेटीकोट उनकी पिंडलियों तक ऊपर हो गए थे. जैसे ही मेरे हाथ उनकी मांसल जांघों पर से होते हुए थोड़ा सा नीचे की तरफ बढ़े, मेरे हाथ में उनकी साड़ी का छोर आ गया और मेरे हाथ उनकी नंगी चिकनी पिंडलियों पर घूमने लगे. इससे भाभी की पिंडलियां अपनी चिकनाहट के कारण मेरी हथेलियों को‌ गुदगुदी का सा एहसास करवाने लगीं.

मैं भी अब अपनी हथेलियों से धीरे धीरे सुलेखा भाभी के नंगी चिकनी पिण्डलियों को सहलाते हुए धीरे धीरे उनकी साड़ी को ऊपर की तरफ खिसकाने लगा … मगर उनकी जांघों पर पहुंच कर मेरे हाथ रुक गए. क्योंकि सुलेखा भाभी की साड़ी व पेटीकोट उनके नीचे दबे होने के कारण अब और ऊपर नहीं हो रहे थे. मैंने भी अब अपने हाथों को उनकी साड़ी व पेटीकोट के अन्दर घुसा दिया और अन्दर से ही उनकी चिकनी जांघों को सहलाता हुआ, फिर से ऊपर की तरफ बढ़ने लगा.

उधर ऊपर हमारे होंठ अभी भी एक दूसरे में गुत्थमगुत्था हो रहे थे, ना तो सुलेखा भाभी मेरे होंठों को छोड़ रही थीं और ना ही मैं उन्हें छोड़ने के मूड में था. जब मेरी जीभ सुलेखा भाभी के हाथ लगती, तो वो उसे जोरों से चूसने लगतीं … और जब मुझे सुलेखा भाभी की जीभ हाथ लगती, तो मैं उसे चूसने लगता. हम दोनों को ही अब होश नहीं रह गया था और सुलेखा भाभी की तड़प तो इस चुम्बन से ही प्रतीत हो रही थी. ऐसा लग रहा था कि वो बहुत दिनों से … दिन नहीं … शायद सालों से ही प्यासी थीं.

मेरे हाथ भी अब साड़ी के अन्दर सुलेखा भाभी की नर्म मुलायम जांघों पर से होते हुए पेंटी में कसे हुए उनके विशाल नितम्बों तक पहुंच गए थे. सुलेखा भाभी ने पेंटी पहन रखी थी. मगर वो पेंटी उनके भरे हुए नितम्बों को सम्भालने में नाकामयाब सी लग रही थी. क्योंकि पेंटी उनके बड़े बड़े गोलाकार नितम्बों पर बिल्कुल चिपकी हुई थी. ऐसा लग रहा था कि अभी ही सुलेखा भाभी के नितम्ब उस पेंटी के झीने से कपड़े को फाड़कर बाहर आ जाएंगे.

सुलेखा भाभी के पेंटी में कैद उनके विशाल नितम्बों को सहलाते हुए मैं अब वापस अपने हाथों को पीछे से ही उनकी जांघों के जोड़ की तरफ बढ़ाने लगा. मगर जैसे ही सुलेखा भाभी के विशाल नितम्बों की गोलाई खत्म होने के बाद मेरी उंगलियां उनकी जांघों के जोड़ पर लगीं … वो हल्की सी नम हो गईं. शायद काम क्रीड़ा का खेल‌ खेलते खेलते सुलेखा भाभी की चुत ने कामरस उगल दिया था, जिससे उनकी पेंटी भीग गयी थी.

उत्सुकतावश मैंने भी अब अपने हाथ को थोड़ा सा और नीचे उनकी चुत की तरफ बढ़ा दिया. मगर जैसे ही मेरी उंगलियों ने उनकी गीली चुत को छुआ, सुलेखा भाभी ने अपने दांतों को मेरे होंठों में गड़ा दिया, जिससे मुझे दर्द तो हुआ था, लेकिन मैंने अपने हाथ को वहां से हटाया नहीं बल्कि वहीं पर रखे रहा. चुत के पास से सुलेखा भाभी की पेंटी बिल्कुल गीली हो रखी थी और उसमें से गर्माहट सी निकल रही थी.

मुझसे अब रहा नहीं गया, इसलिए मैंने पीछे से ही एक बार जोर से भाभी की चुत को मसल दिया जिससे सुलेखा भाभी मेरे होंठों को अपने मुँह से आजाद करके थोड़ा सा ऊपर की तरफ उठ कर सिसक उठीं.

सुलेखा भाभी का पल्लू पहले से ही नीचे गिरा हुआ था. अब जैसे ही सुलेखा भाभी उचक कर ऊपर की तरफ हुईं, एक बार फिर से सुलेखा भाभी के लाल ब्लाऊज में कसी हुई बड़ी बड़ी सुडौल और भरी हुई चूचियां मेरे सामने आ गईं.

मैंने भी देर ना करते हुए अपने दोनों हाथों से उन्हें थाम लिया और सीधा ही अपने प्यासे होंठों को उनकी चूचियों की नंगी घाटी के बीच में लगा दिया.

“उह्ह … इई.श्श्शशश …” कहकर सुलेखा भाभी अब एक बार फिर से सिसकार उठीं और अपने दोनों हाथों से मेरे सिर को अपनी चूचियों पर जोरों से दबा लिया. मैंने भी धीरे धीरे उनकी चूचियों की घाटी को अपनी जीभ निकालकर चाटना शुरू कर दिया जिससे सुलेखा भाभी अपनी आंखें बंद करके जोरों से सिसकारियां सी भरने लगीं.

मगर मुझे इतने से सब्र नहीं हो रहा था. मैं तो भाभी की चूचियों को पूरी ही नंगी करके उनके रस को पीना चाह रहा था, इसलिए मैं अब उनके ब्लाउज के हुक खोलने लगा.
मगर जैसे ही मैंने उनके एक दो हुकों को खोला, सुलेखा भाभी ने अपनी आंखें खोल लीं- येऐ … क्याआ … कर … रहे … होओओ?
सुलेखा भाभी ने भर्राई सी आवाजें में कहा.

“बताया तो था डाक्टर से दवाई ले रहा हूँ.” मैंने सुलेखा भाभी की आंखों में देखते हुए कहा और शरारत से हंसने लगा, जिससे सुलेखा भाभी एक बार तो शांत सी‌ हो गईं.‌ शायद वो‌ कुछ सोचने‌ लगी थीं … मगर अगले ही पल वो मुझे अजीब ही नजरों से घूर घूर कर देखने लगीं. उनकी आंखों में तैरते वासना के गुलाबी डोरे अलग ही नजर आ रहे थे. वो मुझे ऐसे देख रही थीं, जैसे कि कच्चा ही खा ही‌ जाएंगी.

“अच्छा तो दवाई चाहिये तुम्हें? देती हूँ … अभी देती हूँ दवाई …” कहते हुए पहले तो सुलेखा भाभी ने अपने ब्लाउज के सारे हुकों को खोल दिया और फिर दोनों हाथों से अपनी ब्रा को पकड़कर एक ही झटके में ऊपर तक खींच कर अपनी चूचियों को बाहर निकाल लिया.

अब जैसे ही सुलेखा भाभी ने अपनी चूचियों‌ को ब्रा की कैद से आजाद किया, उनकी बड़ी बड़ी और सुडौल भरी‌ हुई चूचियां ऐसे फड़फड़ा कर बाहर आ गईं … जैसे कि वर्षों की कैद के बाद कोई पंछी आजाद हुआ हो.
“दवाई चाहिये ना? लेऐ … पीईई … पीईई ये दवाई …” कहते हुए सुलेखा भाभी ने अब खुद ही अपनी चूचियों को मेरे मुँह पर लगा दिया.

मैं तो जैसे जन्मों से उनके लिए ही प्यासा बैठा था … मैंने तुरंत ही उनकी चूचियों के भूरे भूरे निप्पलों में से एक को अपने मुँह में भर लिया और दूसरी चूची को अपनी हथेली में भर‌कर जोर से मसल दिया.

“इईई … उम्म्ह… अहह… हय… याह… आआह्ह्ह …” की मस्त सी आवाज में सुलेखा भाभी के मुँह से अब एक जोरों से सीत्कार निकल गयी.
ये सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ कि मुझे कुछ सोचने और समझने का मौका ही नहीं मिल पाया. पता नहीं यह सुलेखा भाभी की तड़प की वजह से था या फिर मेरी ही उत्तेजना कुछ ज्यादा जोर मार रही थी, पर जो भी हो मैं आज अपनी किस्मत पर फूला नहीं समा रहा था. इसलिए मैं भी पूरे जोश में भर कर उनकी चूचियों को अपने मुँह में लेकर जोर से चूसने लगा.

सुलेखा भाभी की चूचियों‌ को देखने से तो दूर उनको मसलने पर भी ऐसा बिल्कुल भी प्रतीत नहीं हो रहा था कि वो एक ग्यारह बारह साल‌ के बच्चे की मां भी हो सकती हैं. उनकी चूचियां अभी भी बिल्कुल किसी कुंवारी लड़की की तरह ही कसी हुई थीं. बाहर से तो मखमल सी मुलायम‌ और अन्दर से एकदम ठोस भरी हुई व बिल्कुल गुदाज थीं. मैं अब मस्त होकर सुलेखा भाभी की चूचियों को मसल मसल‌कर चूसने लगा.

“उफफ्फ … ले चूस … महेश्श्श … चूस … चूस ले … चूस लेऐऐ … आज इनकी सारी दवाई …” सुलेखा भाभी ने एक बार फिर से अब एक कामुक सिसकारी भरते हुए कहा और जोरों से मेरे सिर को अपनी चूचियों पर दबाने‌ लगीं.

सुलेखा भाभी की तड़प को देखकर अब मुझे भी समझ आ गया था कि सुलेखा भाभी पता नहीं कब से प्यासी थीं. इसलिए मैं भी उनकी‌ चूचियों को रगड़ रगड़ कर, मसल मसल कर और जोरों से निचोड़ निचोड़ कर उनके रस को पीने लगा और सुलेखा भाभी भी मस्ती से हल्की-हल्की सिसकारियां भरते हुए मेरे सिर को अपनी चूचियों पर दबा दबा कर मुझे अपनी चूचियों के रस को पिलाने लगीं.

सुलेखा भाभी की एक चूची का रस पीने के बाद मैंने उनकी दूसरी चूची को पकड़ लिया और उसका रस पीते पीते अपना एक हाथ उनके चिकने पेट पर से सहलाते हुए नीचे उनकी चुत की तरफ बढ़ा दिया.

सुलेखा भाभी की साड़ी व पेटीकोट को मैंने पहले ही घुटनों के ऊपर कर दिया था और अब मेरे व सुलेखा भाभी के ऊपर नीचे होने के कारण वो बिल्कुल ऊपर तक हो गए थे. इसलिए अब जैसे ही मेरा हाथ पेट पर से होते हुए नीचे की तरफ बढ़ा, मेरे हाथ में उनकी पेंटी में कसी गद्देदार बालों से भरी हुई‌ और फूली हुई चुत आ गई.

इस बात का अहसास सुलेखा भाभी को भी हो गया था कि मेरा एक हाथ अब उनकी चुत पर पहुंच गया है. इसलिए उन्होंने अब खुद ही अपने‌ हाथों व पैरों की सहायता से अपनी‌ पेंटी को‌ उतारकर अलग कर दिया‌ और‌ जल्दी से मेरी बगल‌ में हाथ डालकर मुझे‌ अपने‌ ऊपर खींच लिया.

सुलेखा भाभी के साथ मुझे जब इतना कुछ करने का मौक मिल रहा था, तो मैं उनकी उस फूली हुई चुत को‌ देखे बिना कैसे रह सकता था. मैं फिर से‌ सुलेखा‌ भाभी के बदन‌ से‌ उतरकर उनकी‌ जांघों के‌ पास‌ आ गया और उनकी गहरे काले घने बालों से भरी हुई चुत को बड़े ही ध्यान से देखने लगा.

शायद काफी दिनों से सुलेखा भाभी ने अपनी चुत के बालों को साफ‌ नहीं किया था. इसलिए उनकी चुत गहरे काले घने और घुंघराले बालों से भरी हुई थी जो उनकी योनि को छुपाने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे. चुत की फांकों के पास वाले बाल कामरस से भीग कर उनकी चुत से ही चिपक गए थे इसलिए चुत की गुलाबी फांकें और दोनों फांकों के बीच का हल्का सिन्दूरी रंग इतने गहरे बालों के बीच भी अलग ही नजर आ रहा था.

मैं अब अपने आप को रोक नहीं पाया और अपने दोनों हाथों से उनकी जांघों को फैलाकर सीधा ही अपने प्यासे होंठों को उनकी चूत रख दिया.
“उम्म् … इईई.श्श्शशश … आह्ह …” की एक‌ मीठी सीत्कार सी भरते हुए सुलेखा भाभी ने जोरों से मेरे सिर को अपनी चुत पर दबा लिया और मेरे नथुनों में उनकी चुत की वो मादक सी महक समाती चली गयी.

बेहद ही तीखी और मादक महक थी उनकी चूत की! वैसे तो हर किसी की चुत से ही महक आती है, लेकिन यह खुशबू अलग ही थी … एकदम पकी पकी सी. शायद कुंवारी और शादीशुदा चूतों की महक अलग अलग होती होगी. जैसे किसी कच्चे फल की तुलना में एक पके हुए फल की अलग ही खुशबू होती है, वैसे ही शायद कच्ची चुत और पकी हुई चुत की महक में भी अन्तर होता होगा.

सुलेखा भाभी की चुत की महक मुझे अब किसी की याद दिलाने लगी थी. इस तरह की महक मैं पहले भी ले चुका था … मैंने अपने दिमाग पर जोर दिया तो मेरे जहन में रेखा भाभी का ख्याल आ गया.

आपने मेरी एक पुरानी कहानी
गांव वाली विधवा भाभी की चुदाई
में मेरे और रेखा भाभी के बारे में पढ़ा ही होगा.

रेखा भाभी की चुत की महक भी बिल्कुल ऐसी ही थी और हो भी क्यों ना … दोनों सगी बहनें ही तो हैं और दोनों ही एक एक बच्चे की मां भी हैं. रेखा भाभी से सम्बन्ध बनाये मुझे काफी दिन हो गए थे, मगर फिर भी उनकी चुत उस महक और स्वाद को मैं अभी तक भुला नहीं पाया था.

सुलेखा भाभी की चुत की उस मादक महक ने मुझे दीवाना सा बना दिया था. इसलिए मैंने पहले तो अपने होंठों से उनकी चूत के हर एक हिस्से को चूमा और फिर अपने दोनों हाथों की उंगलियों से चुत की फांकों को फैलाकर उसे अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया जिससे एकदम नमकीन और कसैला, बिल्कुल रेखा भाभी की चुत के जैसा ही स्वाद मेरे मुँह में घुल‌ गया.

मगर जैसे ही मैंने चुत की फांकों के बीच चाटा ‘उफ्फ … इईईई …श्श्श्शशश … यऐ … ये …क् क्या आ कर अ रहे ऐ हो ओओह …’ सुलेखा भाभी ने एक ज़ोरदार आह भरते हुए कहा और अपनी‌ जांघों को फैलाकर दोनों हाथों से मेरे सिर को अपनी चुत पर जोर से दबा लिया मानो मुझे ही अपनी चुत के अन्दर ही घुसा लेंगी.

सुलेखा भाभी ने मुझे इतनी जोरों से अपनी चुत पर दबा लिया था कि मेरा दम सा घुटने लगा था. मैंने अब‌ अपनी‌ गर्दन हिलाकर उनको इस बात का अहसास करवाया, जिससे सुलेखा भाभी ने एक बार तो मेरे सिर को‌ तो छोड़ दिया मगर अगले ही पल उन्होंने मेरे सिर के बालों‌ को‌ पकड़कर मुझे फिर से अपने ऊपर खींच लिया.

मैं भी ढीठ हो गया था, इसलिए मैं अब फिर से फिसलता हुआ उनकी चुत के पास आ गया‌ और आऊं भी क्यों ना? उनकी चुत की उस मादक महक और स्वाद ने मुझे दीवाना जो बना दिया था. अभी तो मैंने सुलेखा भाभी की चुत का रस बस चखा ही था … अभी‌ तो‌ उसे चाट चाट कर पीना बाकी था.

सुलेखा भाभी की जांघों के पास आकर मैंने अब फिर से अपने प्यास से तड़पते होंठों को उनकी चुत पर लगा दिया. मगर पता नहीं सुलेखा भाभी को इस खेल के बारे में पता नहीं था या फिर अपनी तड़प के कारण वो कुछ ज्यादा ही उतावली हो रही थीं. इसलिए जैसे ही मैंने अब उनकी चुत को चूमा, उन्होंने मुझे पकड़ कर‌ अब नीचे‌‌ गिरा लिया और अपने पैरों को मेरे दोनों तरफ करके मेरी जांघों पर बैठ गईं.

मैंने अब फिर से उठने की कोशिश तो की मगर सुलेखा भाभी ने मुझे आंखें दिखाते हुए ऐसे घूर कर देखा, जैसे कि मुझे धमका रही हों. मैं अब चुपचाप पड़ा रहा और सुलेखा भाभी ने मेरी जांघों पर बैठे बैठे ही मेरे लोवर को पकड़कर नीचे खिसका दिया.

मेरा लोवर तो अब उतर गया, मगर उसके नीचे मैंने अण्डरवियर भी पहना हुआ था. जिसे देखकर एक बार तो सुलेखा भाभी झुंझला सी गईं मगर अगले ही पल उन्होंने मेरे अण्डरवियर में हाथ फंसा लिए और एक ही झटके में मेरे अण्डरवियर के साथ साथ मेरे लोवर‌ को भी उतारकर मुझे नीचे से नंगा कर लिया.

मुझे नंगा करने के बाद अब जैसे ही सुलेखा भाभी की नजर मेरे तन्नाये नंगे मूसल लंड पर पड़ी, तो एक बार तो उनका पूरा बदन कंपकंपा सा गया.
“यए … ये … ये … क क क्या आ … है?” टूटे फूटे शब्दों में उन्होंने बस इतना ही कहा और तुरन्त मेरे लंड को पकड़ कर अपनी मुट्ठी में ऐसे भींच लिया, जैसे कि वे उसका माप ले रही हों.

मेरा लंड तो पहले से ही तन्नाया हुआ था. अब सुलेखा भाभी के कोमल हाथों का स्पर्श पाते ही वो और भी जोरों से तमतमा कर फुंफकारने सा लगा जिससे सुलेखा भाभी की आंखें अब ऐसे चमक उठीं, जैसे की उन्हें कोई खजाना मिल गया हो.

सुलेखा भाभी ने मेरे लंड को बिल्कुल बीच में से पकड़ा था, जिससे मेरे लंड का सुपारा उनकी उंगलियों के घेरे से बाहर निकलकर बिल्कुल ऐसे ही फुंकार सा रहा था जैसे कि साँप को उसकी गर्दन से पकड़ने पर फुंकारता है. मगर सुलेखा भाभी ने भी उसकी गर्दन को पकड़कर दबोचे रखा और‌ उसे कस कर मरोड़ दिया.

अब तो मेरा सुपारा गुस्से‌ में आकर और भी जोरों से नसें सी फुलाने लगा‌.

मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में भींचकर सुलेखा भाभी ने अब एक जोर की सांस ली और फिर अपने पैरों को‌ मेरे दोनों तरफ करके सीधा ही मेरे पेट पर चढ़ कर बैठ गईं. मेरे पेट पर बैठकर भाभी एक हाथ से अपनी साड़ी व पेटीकोट को ऊपर उठाकर अपने घुटनों के बल खड़ी हो गईं और फिर दूसरे हाथ से मेरे लंड को पकड़कर अपनी चुत के मुँह पर लगा लिया जिससे मुझे अब अपने लंड पर सुलेखा भाभी की चुत की गर्मी महसूस होने लगी.

मेरे लंड को अपनी चुत के मुँह पर लगाकर सुलेखा भाभी ने एक बार तो मेरी तरफ देखा और फिर अपने शरीर को‌ कड़ा सा करके झटके से लंड पर बैठ गईं.
लंड खाते ही सुलेखा भाभी‌ के मुँह से ‘आआआह्ह्ह … उइईई … इश्श्शशह …’ की एक चीख सी निकल गयी और उनकी भूखी चुत एक बार में ही मेरे‌ पूरे लंड को निगल गयी‌.

मजा आ रहा है मेरी सेक्स स्टोरी में? अब तक इस मस्त मस्त कहानी में आपने पढ़ा कि सुलेखा भाभी अपने शरीर को‌ कड़ा सा करके मेरे लंड को अपनी चुत के मुँह पर लगाकर झटके से मेरे खड़े लंड पर बैठ गईं. जिससे उनकी चीख निकल गई.
अब आगे …

मेरे लंड को अपनी चुत से खाने के बाद सुलेखा भाभी ने एक बार फिर अब मेरी तरफ डबडबाई सी नजरों से देखा. शायद मेरे इतने बड़े लंड को एक बार में ही अपनी चुत में लेने से सुलेखा भाभी को पीड़ा हुई थी, मगर वो सारा दर्द पी गईं और खुद ही मेरे दोनों हाथों को पकड़कर अपनी चूचियों पर रखवा लिया.

मैंने भी अब उनकी दोनों चूचियों को अपने हाथों में थामकर उन्हें जोर से मसल दिया, जिससे सुलेखा भाभी के मुँह से फिर से एक तीव्र आवाज निकल गई ‘इईईई … श्श्शशश … आआ ह्ह्ह्ह्ह …’
उनकी मीठी सीत्कार सी फूट पड़ी.

मेरे हाथों में अपनी चूचियां थमाकर भाभी ने अब खुद मेरे सीने पर हाथ रख लिए और धीरे धीरे अपनी कमर को आगे पीछे हिलाकर धक्के लगाने शुरू कर दिए. जिससे मेरा लंड अब उनकी चुत की गीली दीवारों पर घिसने लगा और सुलेखा भाभी के साथ साथ मेरे बदन में भी आनन्द की लहरें उठने लगीं.

सुलेखा भाभी को देखकर मुझे प्रिया की याद आ गयी. प्रिया ने भी तो उस दिन मेरे साथ ऐसे ही तो किया था, जरूर उसने ये सब शायद कभी ना कभी भाभी को ही देखकर सीखा था.

धीरे धीरे भाभी की कमर की हरकत अब तेज‌ होने‌ लगी थी, इसलिए मैंने भी‌‌ अब उनकी चूचियों को जोरों से मसलना शुरू‌ कर‌ दिया. इससे‌ भाभी के मुँह से अब मादक सिसकारियां फूटना‌ शुरू हो गईं. भाभी ने अपनी आंखें बन्द कर रखी थीं. मगर उनके चेहरे के भाव अब लगातार बदल रहे थे. वे मजे से मेरे लंड को अपनी चुत से खाते हुए अपने खुद के होंठों को ही काट रही थीं.

उनकी मादक अदा देख कर मुझसे भी रहा नहीं गया, मैंने उठकर उनके होंठों को चूमने की कोशिश की, मगर सुलेखा भाभी ने मुझे धकेलकर फिर से बिस्तर पर गिरा दिया और दोनों‌ हाथों से मेरी टी-शर्ट को पकड़ कर उसे ऊपर खींचने लगीं. मैंने भी उठकर उनका सहयोग किया और अपनी टी-शर्ट को पूरा ही निकालकर एक बाजू रख दिया.

मुझे ऊपर से नंगा करके सुलेखा भाभी अब मुझ पर लेट गईं और अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को मेरे नंगे सीने पर रगड़ते हुए जोरों से धक्के लगाने शुरू कर दिए.

मैं तो जैसे अब पागल ही हो गया था क्योंकि नीचे से तो सुलेखा भाभी की गर्म गर्म चुत मेरे लंड की मालिश कर रही थी और ऊपर से भी उनकी बड़ी बड़ी और भरी हुई चूचियां मेरे सीने को गुदगुदाने लगी थीं. आनन्द से मेरे दोनों हाथ अब अपने आप ही सुलेखा भाभी की पीठ पर से रेंगते हुए उनके बड़े बड़े और गोलाकार नितम्बों पर आ गए. मैंने अपने दोनों हाथों से उनके नितम्बों को पकड़ लिया और उनको प्यार सहलाते हुए सुलेखा भाभी को आगे पीछे हिलाने में उनका सहयोग करने लगा जिससे सुलेखा भाभी की कमर की‌ हरकत अब और भी तेज हो गयी.

मेरे ऊपर लेटकर धक्के लगाने से भाभी के होंठ, तो कभी गाल अब बार बार मेरे होंठों को छू रहे थे. मुझसे रहा नहीं गया इसलिए मैंने अपने दोनों हाथों से उनकी‌ गर्दन‌ को‌ पकड़कर उनके होंठों को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें जोरों से चूसने लगा. मगर इससे सुलेखा भाभी के धक्के कुछ धीमे हो गए.

अब ये बात शायद सुलेखा भाभी को मंजूर नहीं हुई, इसलिए भाभी ने मेरे होंठों को अब एक बार तो जोर से चूमा. वे मेरे होंठों को छोड़कर फिर से ऊपर अपने हाथों के बल हो गईं और जोरों से धक्के लगाने लगीं. मेरे हाथ भी अब फिर से भाभी के नितम्बों पर आ गए, मगर इस बार मेरे‌ हाथों की उंगलियां फिसलती हुईं उनके नितम्बों की गहराई में घुस गयी थी‌. इसलिए मैंने अब अपनी एक उंगली से उनके गुदाद्वार को सहलाना शुरू कर दिया.

अब तो सुलेखा भाभी जैसे पागल ही हो गईं. उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे कंधों को पकड़ लिया- इईईई … श्श्शशश … आआ ह्ह्ह्हहह … उम्म्ह… अहह… हय… याह… इईईई … श्श्शशश … आआह्ह हह …’ की सिसकारियां भरते हुए अपनी चुत की गीली दीवारों को वो अब जोरों से मेरे लंड पर घिसने लगीं.

सुलेखा भाभी को देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि मैं उन्हें चोद रहा हूँ बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कि भाभी मुझे चोद रही हों. भाभी चेहरे पर पसीने की बूंदें उभर आई थीं और सांसें भी उखड़ गयी थीं. मगर फिर भी वो ऐसे ही जोरों से अपनी चुत को मेरे लंड पर घिसते हुए धक्के लगाती रहीं जिससे कुछ ही देर बाद अचानक से‌ उनके‌ हाथ मेरे कंधों पर कस गए और उनकी सिसकारियां मदमस्त कराहों में बदल गईं. उनकी‌ दोनों जांघें जोरों से मुझ पर कस गईं और ‘आह्ह् … ईश्श आह्ह् … ईश्श … आआह्ह् … ईश्श … आआआह्ह …’ की आवाजें निकालते हुए वो अपनी चुत से गाढ़े गाढ़े सफेद रस को मेरे लंड पर उगलने लगीं, जोकि मेरे लंड के‌ सहारे बहते मेरे‌ कूल्हों तक‌ पहुंचने लगा.

अपनी चुत के रस से मेरे लंड को‌ नहलाने के बाद सुलेखा भाभी निढाल‌ सी होकर अब मेरे ऊपर ही‌ लेट गईं और लम्बी लम्बी सांसें लेने लगीं.

सुलेखा भाभी का तो रस स्खलित हो गया था जिससे‌ वो‌ अब शिथिल पड़ गयी थीं. मगर मेरे अन्दर का ज्वार तो अभी भी जोर मार रहा था.‌ मुझे पता था कि स्खलित के‌ बाद भाभी तो अब कुछ करने‌ से रहीं, इसलिए मैंने‌ अब खुद ही कमान‌ सम्भाल‌ ली.

मैंने पहले तो अब अपने‌ दोनों हाथों से भाभी के नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर उठाकर उनकी चुत और मेरे लंड के बीच फासला बना लिया और फिर नीचे अपनी कमर को उचका उचका कर ताबड़तोड़ धक्के‌ लगाने शुरू कर दिए. इससे भाभी की ‘आआ … अह्ह्ह … उऊऊ … अह्ह्ह्ह …’ की कराहों के साथ साथ अब जोरों से ‘फाट् ट् … फाट् ट …’ की आवाजें भी निकलना शुरू हो गईं.

सुलेखा भाभी मेरे ऊपर निढाल होकर ढेर हो गयी थीं, मगर मेरे धक्के लगाने से वो अब फिर से कराहने‌ लगी थीं. क्योंकि मेरा मूसल लंड अब उनकी चुत के परखच्चे उड़ा रहा था. कुछ देर तो भाभी अब ऐसे ही कराहती रहीं, मगर फिर धीरे धीरे उनकी‌ कराहें सिसकारियों में बदल गईं और उनकी चुत में अब फिर से संकुचन सा होना शुरू हो गया.

शायद सुलेखा‌ भाभी फिर से उत्तेजित होने लगी थीं इसलिए उनकी सांसें भी अब गहरी हो गयी थीं.

मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि सुलेखा भाभी इतनी जल्दी कैसे गर्म हो गयी थीं. इसलिए अपनी तसल्ली के लिए मैंने अब धक्के लगाने बन्द कर दिए. जिससे भाभी ने मुझे अब एक‌ बार तो घूर कर देखा और फिर ये क्या … भाभी अब खुद ही फिर से अपनी कमर को चलाने लगीं. शायद भाभी की ये प्यास ही थी, जिसने इतनी जल्दी उन्हें अब फिर से उत्तेजित कर दिया था.

सुलेखा भाभी ने अब कुछ देर‌ तो धक्के तो‌ लगाये और फिर मुझे‌ बांहों‌ में भरकर वो‌ फिर से‌ पलट गईं,‌ जिससे एक‌ बार फिर अब भाभी मेरे नीचे आ गईं और मैं उनके‌ ऊपर चढ़ गया. इस उल्टा पल्टी में मेरा लंड सुलेखा भाभी की चुत से बाहर निकल गया था मगर मुझे अपने‌ ऊपर खींचकर भाभी ने अब पहले तो अपनी दोनों‌ जांघों के‌ बीच दबा लिया और फिर खुद ही अपने एक‌ हाथ से मेरे लंड को पकड़कर अपनी चुत के मुँह पर लगा लिया. मैंने भी अब जोर से धक्का लगाकर एक ही झटके ने अपने‌ लंड को‌ उनकी चुत की गहराई तक उतार दिया, जिससे एक बार तो भाभी ‘आआआह्ह् … उऊऊच्च्च् …’ कहकर जोरों से कराह उठीं, मगर साथ ही उन्होंने इनाम के तौर पर दोनों हाथों से मेरे सिर को‌ पकड़ कर बड़े ही प्यार से मेरे गालों पर एक चुम्मा भी दे दिया.

मैंने भी अब फिर से धक्के लगा‌कर अपने‌ लंड को‌ सुलेखा‌ भाभी‌ की चुत के अन्दर बाहर करना‌ शुरू कर दिया, जिससे अब फिर से भाभी के मुँह से‌ सिसकारियां फूटनी शुरू हो गईं.

सुलेखा भाभी की उत्तेजना तो जोर मार रही थी … मगर शायद वो थकी हुई थी. क्योंकि उनका एक बार स्खलित हो‌ चुका था और इसके लिए जो‌ भी मेहनत थी, वो सारी खुद भाभी ने ही की थी. भाभी ने अब धक्के लगाने में तो‌ मेरा साथ नहीं दिया मगर‌ फिर भी उन्होंने अपनी जांघों को पूरा फैलाकर अपने पैरों को मेरे पैरों पर रख लिया ताकि मुझे धक्के लगाने में आसानी हो जाए और मेरा पूरा लंड उनकी चुत में अन्दर तक‌ जाकर उनकी चुत की दीवारों की मालिश कर सके.

मैं भी अब अपने पूरे लंड को सुलेखा भाभी की चुत में अन्दर तक‌ पेलने लगा, जिससे भाभी‌ की सिसकारियां तेज हो गईं और अपने आप ही उनके पैर मेरे पैरों पर चढ़ गए. स्खलित के बाद सुलेखा भाभी‌ की चुत के अन्दर की दीवारें प्रेमरस से भीगकर अब और भी चिकनी और मुलायम हो गयी थीं जिससे मेरा लंड अब और भी कुशलता से उनकी चुत की मालिश कर रहा था.

यह खेल‌ खेलते खेलते मुझे‌ बहुत देर हो गयी थी, इसलिए मैं अब चरमोत्कर्ष के करीब ही था‌ मगर सुलेखा भाभी का एक बार रसखलित हो चुका था इसलिए मुझे पता था कि अबकी बार वो स्खलन में थोड़ा समय लेंगी.

मैं नहीं चाहता था कि सुलेखा भाभी‌ के स्खलन से पहले मेरा रस स्खलित हो जाए, इसलिए मैंने अब अपने धक्कों की गति को तो थोड़ा धीमा कर दिया और अपना एक हाथ आगे लाकर उनकी चूची को पकड़ लिया. मैं अब धीरे धीरे धक्के लगाते हुए भाभी‌ की दोनों चूचियों को भी मसलने‌ लगा जिससे भाभी मचल सी गईं. उन्होंने अपनी आंखें बन्द की हुई थीं और मुँह से सिसकारियां भरते हुए वो अपने खुद के ही होंठ को काट‌ रही थीं.

कसम से ऐसा करते हुए सुलेखा भाभी‌ का वो गोल गोल चेहरा इतना हसीन और मासूम सा लग रहा था कि मुझसे रहा नहीं गया. मैंने अब थोड़ा सा आगे होकर धीरे धीरे उनके होंठों को चूम‌ लिया. मगर जैसे मैंने उनके होंठों को चूमा, भाभी ने झट से अपनी आंखें खोल लीं और दोनों हाथों से मेरी गर्दन को पकड़कर मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया.

मेरे दोनों होंठों को मुँह ने भर कर सुलेखा भाभी उन्हें इतनी जोरों से चूसने लगीं कि कुछ देर तो मैं अब‌ भाभी के होंठों को चूमने के‌ लिए तरसता ही रह‌ गया. मगर फिर भाभी ने मुझ पर तरस दिखाते हुए मेरे एक‌ होंठ को आजाद कर दिया, जिससे मेरे हिस्से भी उनका एक होंठ आ ही गया. मैंने उसे तुरन्त ही अब अपने मुँह में भर लिया और जोरों से चूसने लगा. सुलेखा भाभी ने अब फिर से दरियादिली दिखाते हुए होंठ के साथ साथ अपनी जीभ को भी मेरे मुँह दे दिया.

मैंने भी अपना मुँह खोलकर उसका स्वागत किया और उसे होंठों से दबाकर जोरों से चूसने लगा‌ जिससे सुलेखा भाभी के मुँह का मीठा‌ मीठा व चिकना‌ सा स्वाद अब‌ मेरे मुँह में घुल गया. उत्तेजना के वश अब अपने आप ही मेरे धक्कों की गति फिर से बढ़ गयी थी.

सुलेखा भाभी की जीभ व होंठ को चूसते हुए मैं जोरों से धक्के लगाने लगा था जिससे भाभी‌ की सिसकारियां भी और तेज हो गईं‌‌ और उनके दोनों हाथ भी अपने‌ आप ही मेरी पीठ पर आकर रेंगने लगे‌.

कुछ देर सुलेखा भाभी की जीभ का स्वाद लेने‌ के बाद मैंने उनकी जीभ को छोड़ दिया और अपनी जीभ को‌ उनके मुँह में घुसा दिया. भाभी तो जैसे इसके लिए तैयार ही बैठी थीं, उन्होंने तुरन्त ही अपना मुँह खोलकर मेरी जीभ को अपने मुँह में भर लिया और उसे जोर से चूसने‌ लगीं.

सुलेखा भाभी को जल्दी से शिखर तक पहुंचाने के लिए मैं अब उन पर तीन तरफ‌ से हमला करने लगा, एक तरफ मेरा मूसल लंड उनकी चुत को उधेड़ रहा था, तो दूसरी तरफ मेरे होंठ उनको तपा रहे थे और अब तीसरी तरफ से मैंने उनकी चूचियों को भी मसलना शुरू कर दिया, जिससे भाभी अब कोयल के जैसे कूकने लगीं.

उनके पैर अब मेरी जांघों तक चढ़ गए और जोरों से सिसकारियां भरते हुए उन्होंने अब खुद भी नीचे से धक्के लगाने शुरू‌ कर दिए. सुलेखा भाभी का ये साथ पाते ही मैंने भी बहुत जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए, जिससे उनकी सिसकारियां और भी तेज हो गईं. उन्होंने मेरे होंठों को तो अब छोड़ दिया और दोनों हाथों से मेरी पीठ को पकड़कर जल्दी जल्दी अपनी कमर को उचकाते हुए मुँह से ‘इईईई … इश्श्शश … आआ … अह्ह्ह्हह …’ की आवाजें निकालने लगीं.

मुझे अब समझते देर नहीं लगी‌ कि सुलेखा भाभी भी अब अपने चरम के करीब ही हैं इसलिए मैं भी अब अपने सीने को ऊपर उठाकर अपने हाथों के बल हो गया और अपनी‌ पूरी ताकत व तेजी से धक्के लगाने लगा. अब तो सुलेखा भाभी जैसे पागल ही हो गयी थीं, वो जोरों से अपनी कमर को उचकाते हुए मुँह से बड़ी कामुकता से ‘इईईई … श्श्शशश … आआ … अह्ह्ह्हह …’ की किलकारियां सी मारने लगीं.

एक बार फिर से सुलेखा भाभी की किलकारीयों के साथ साथ कमरे में ‘फट … फट् ट …’ की आवाजें गूंजने लगीं. इस वक्त जितनी तेजी से भाभी अपनी कमर को उचका रही थीं, मैं उनसे दुगनी तेजी से धक्के लगा कर अपने लंड से उनकी चुत की धज्जियां सी उड़ा रहा था.

हम दोनों के ही शरीर अब पसीने से नहा गए और सांसें उखड़ने लगीं. सुलेखा भाभी का तो एक बार रस स्खलित हो गया था, मगर मैं अपने आप पर बहुत देर से संयम किये हुए था. मेरा सब्र का बाँध तो कब का टूट जाता, मगर मैं तो बस इसलिए ही रुका हुआ था कि एक बार फिर सुलेखा भाभी को उनके अंजाम तक पहुंचा दूँ.

आखिरकार मेरी कोशिश रंग लाई और कुछ ही देर बाद भाभी का बदन अब फिर से अकड़ने लगा … मेरा सब्र भी अब टूट ही गया था, इसलिए मैंने भी अब तीन चार ही धक्के अपने पूरे वेग से लगाये और सुलेखा भाभी को कस कर पकड़ लिया. भाभी की सिसकारियां अब पहले तो आहों में बदल गईं. उनकी आहें हिचकियों में बदलती चली गईं.

मैंने और सुलेखा भाभी ने अब एक दूसरे को जोरों से भींच लिया और हल्के हल्के धक्के लगाते हुए एक दूसरे के यौन अंगों‌ को अपने अपने प्रेमरस से सींचने लगे‌.

इस बार सुलेखा भाभी का स्खलन इतना उत्तेजक था कि हिचकियां लेते हुए एक बार तो वो सांस लेना भी भूल गईं. उनकी चुत की दीवारों के प्रसार और संकुचन को मैं काफी देर तक अपने लंड पर महसूस करता रहा.

अपनी अपनी कामनाओं को एकदूसरे पर उड़ेलकर हम दोनों ही अब एक दूसरे को बांहों में लिए लिए ही ढेर होकर बिस्तर पर गिर गए और लम्बी लम्बी सांसें लेने लगे.

कुछ देर तो हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे की बांहों में समाये पड़े रहे. फिर सुलेखा भाभी ने मेरी पीठ को थपथपाकर मुझे उठने का इशारा सा किया. मेरा अब भी उठने का दिल नहीं कर रहा था.

‘ऊऊ … क्या है? कुछ देर और लेटी रहो ना …’ सुलेखा भाभी पर पड़े पड़े ही मैंने कुनमुनाते हुए कहा.
‘ऊह … अह्ह … उठो ना … बहुत गर्मी‌ लग रही है.’ सुलेखा भाभी ने मेरे गालों को चूमते हुए कहा.

पसीने से हम दोनों के‌ ही बदन भीगे हुए थे जिससे शायद सुलेखा भाभी को दिक्कत हो रही थी. इसलिए मैं अब धीरे से उठकर भाभी के पास बैठ गया. मगर तभी मेरी नजर अनायास ही उनकी चुत पर चली गयी जिसमें से मेरे व उनके प्रेमरस का‌ बिल्कुल क्रीम जैसा गाढ़ा और सफेद‌ मिश्रण धीरे धीरे बहते हुए बाहर निकल रहा था. मिश्रित रस उनकी चुत के मुँह से निकलकर उनके नितम्बों की गहराई में समा‌ रहा था.

मेरे लिए तो ये बेहद ही अनूठा और उत्तेजक सा दृश्य था, जिसे मैं टकटकी लगाये बस देखता रह गया था. तभी शायद सुलेखा भाभी की नजर मुझ पर चली गयी. शर्म के मारे उन्होंने अब तुरन्त ही अपनी साड़ी व पेटीकोट से अपनी चुत को छुपा लिया और उठकर बिस्तर पर बैठ गईं.

बिस्तर पर बैठकर सुलेखा भाभी ने अब पास में ही पड़ी हुई अपनी पेंटी को उठा लिया और अपना मुँह दूसरी तरफ करके उस पेंटी से अपनी चुत व नितम्बों को साफ करने लगीं.

मैं अब भी बैठे बैठ सुलेखा भाभी को ही देख रहा था. अपनी चुत व नितम्बों को अच्छे से साफ‌ करने‌ के‌ बाद भाभी ने‌ पेंटी को‌ तो वापस बिस्तर पर पटक दिया और उठकर अपने‌ कपड़ों को सही करने लगीं.

मैं नहीं चाहता था कि सुलेखा भाभी अपने कपड़ों को ठीक करें, इसलिए मैंने उनका‌ हाथ पकड़कर फिर से अपनी तरफ खींच लिया.
“ऊह्ह … छ छोड़ … अब क्या है?” सुलेखा भाभी ने कसमसाते हुए कहा.
“इतनी जल्दी कहां जा रही हो?” मैंने सुलेखा भाभी को अपनी बांहों में भरकर उनके मखमली गालों को चूमते हुए कहा.
“बस्स … अब … एक बार में तो ऐसी हालत कर दी कि अभी तक बदन दुख रहा है … मेरी हिम्मत नहीं है अब … बाकी की दवाई अब तुम‌ उन दोनों से ही ले लेना …”

सुलेखा भाभी ने‌ ताना सा मारते हुए कहा और मेरे पास से उठकर फिर से अपने कपड़े ठीक करने लगीं.

सुलेखा भाभी‌ का‌ ‘उन दोनों’ से मतलब नेहा और प्रिया से था. यानि‌ कि‌ सुलेखा भाभी‌ को‌ भी अब नेहा और प्रिया के साथ ये सब करने से कोई ऐतराज नहीं था. इसका मतलब मेरी तो अब निकल पड़ी थी.

खैर अपने कपड़े सही करने‌ के बाद सुलेखा‌ भाभी ने हम दोनों के‌ प्रेमरस से भीगी उस पेंटी को बिस्तर से उठाकर अपने‌ ब्लाऊज में छुपा‌ लिया और फिर धीरे से कमरे का दरवाजा खोलकर पहले तो‌ इधर उधर देखा और फिर झटके में कमरे से बाहर निकल गईं.
सुलेखा‌ भाभी के‌ जाने‌ के बाद मैंने भी अब अपने‌ कपड़े‌ पहन‌ लिए और फिर से बिस्तर पर ढेर हो गया.

मगर कुछ देर बाद ही प्रिया मेरे कमरे में आ गयी. कमरे में आते ही उसने लगातार तीन चार थप्पड़ मेरे गालों पर लगा दिए.
“अब तू ये क्या कर रहा है? नेहा दीदी तो ठीक हैं … मगर मम्मी? मम्मी को भी नहीं छोड़ा तुमने?” प्रिया ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा.

एक बार तो अब मैं भी घबरा गया कि इसको‌ कैसे पता चल गया कि मेरे और सुलेखा भाभी के बीच कुछ हुआ है. मैंने दरवाजा तो बन्द किया हुआ था मगर शायद प्रिया ने हमें खिड़की से देख लिया था. भाभी को चोदते वक्त एक दो बार मुझे लगा भी था कि शायद खिड़की से कोई हमें देख रहा है, मगर सुलेखा भाभी के साथ मस्ती के चक्कर में मैंने ही ध्यान नहीं दिया था.

खैर मैंने अब जल्दी से खुद को सम्भाला और उसे सारी कहानी बताई, तब जाकर उसका गुस्सा कुछ शांत हुआ.

प्रिया के कमरे से बाहर जाने के कुछ देर बाद ही नेहा मेरे पास आ गयी … उसने मेरी पिटाई तो नहीं की, मगर उसका भी यही सवाल था. प्रिया के जैसे ही नेहा को भी मुझे अब सारी बात बतानी पड़ी … तब जाकर वो मानी.

चलो‌ मेरे लिए ये तो अच्छा ही हो गया‌ था‌ कि नेहा और प्रिया को भी सुलेखा भाभी के बारे में मालूम हो‌ गया‌ था. इससे मेरा काम‌ अब और भी आसान‌ हो गया‌ था क्योंकि अब प्रिया नेहा और सुलेखा भाभी तीनों को ही‌ एक‌ दूसरे के‌ बारे में मालूम हो गया था कि उनके मेरे साथ चुदाई के सम्बन्ध हैं‌ और तीनों को‌ ही‌ इससे शायद कोई‌ ऐतराज भी नहीं था.

इससे हुआ ये कि अब रोजाना ही मेरे सुलेखा भाभी, नेहा और प्रिया के साथ सम्बन्ध बनने शुरू हो गए.

मेरी तो‌ जैसे अब निकल‌ ही‌ पड़ी थी क्योंकि अब दिन में सुलेखा भाभी मेरे साथ रहतीं, तो रात में नेहा व प्रिया एक एक कर बारी बारी से मेरे पास आ जाती थीं.

बस अब उन तीनों को एक साथ एक ही बिस्तर पर चोदने की तमन्ना बाकी रह गई थी. ये भी पूरी हो ही जाएगी. जैसे ही उन तीनों की एक साथ चुदाई की कहानी बनेगी मैं आप सबके साथ सेक्स स्टोरी को साझा करूँगा.

मेरी कहानी आपको कैसी लगी, प्लीज़ मेल जरूर कीजिए

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