दी मेरे सामने खड़ी थी मैने देखा कि उनके सूट पर बहुत झुर्रियाँ पड़ी
हुई है खास कर उनके उभारो के आस पास.मुझे ये अच्छी से याद था कि जब हम
बॅंक आने वाले थे तो दीदी ने प्रेस किया हुआ सूट पहना था. तो फिर क्या ये
काम उस आदमी के हाथो का है…..मुझे अब थोड़ी थोड़ी जलन भी हो रही थी कि
दीदी मुझसे झूठ क्यो बोल रही है.. और अचानक ही मैने उनसे पूछा लिया “ आप
वाहा अंधेरे मे….” “
“अरे वाहा मैं वॉश रूम गयी थी..” दीदी मुस्कुराती हुई मेरी बात को वही
काटती हुई बोली.
ये सब बात सोचते सोचते मे काफ़ी गर्म हो गया था और मेरा लंड अकाड़ने लगा
था अब मुझे वाकयी पेशाब जाना था नही तो मेरा खड़ा होता लंड अंजलि दीदी
देख सकती थी..और अगर मैं उस जगह जाता हू तो मुझे ये भी पता चला जाएगा कि
वाहा टाय्लेट है भी कि नही क्योंकि अंधेरे मे तो कुछ नज़र नही आ रह था उस
जगह. फिर मैने दीदी क वेट करने के ले बोला और फटाफट उस अंधेरे कोने की
तरफ़ चला गया..जैसे कि मैने सोचा था कोने मे टाय्लेट था मुझे ये जान कर
खुशी हुई कि दीदी सही बोल रही है..मैने वाहा पेशाब किया और बाहर आने लगा
पर पता नही मुझे उस अंधेरे कमरे मे जाने की इक्षा हुई..मैने फिर दीदी की
तरफ़ देखा तो वो अभी भी अपना सूट ठीक कर रही थी…मेरे दिमाग़ मे फिर से
शाक पैदा हुआ और मैं उस रूम मे घुस गया ..उंधर अंधेरा तो था पर इतना भी
नही ..क्योंकि उप्पर रोशन दान से रोशनी आ रही थी ..मैं इधर उधर देखने लगा
..रूम मे सीलन होने की वजह से थोड़ी बदबू भी थी..हालाकी रूम के काफ़ी
हिस्से मे टूटा फर्नीचर पड़ा हुआ था फिर मैं एक कोना खाली था मैं उस तरफ
गया. रूम के फर्श पर काफ़ी धूल जमी हुई थी.. तभी मेरी नज़र रूम की ज़मीन
पर पड़े कदमो पर गयी..लगता था मानो कोई थोड़ी देर पहले ही रूम से गया है
और वो अकेला नही था क्योंकि दो जोड़ी पैरो के निशान थे ..पर मुझे एक बात
समझ नही आई कि वो उस कोने की तरफ़ क्यो गये है ..खैर मैं उनके पीछे आगे
बढ़ा ..तो मैने देखा के उसकोने मे पैरो के निशान गायब थे और फर्श पर पड़ी
मिट्टी काफ़ी हिली हुए लग रही थी मानो जैसे किसी के बीच काफ़ी खिछा तानी
हुई हो..तो क्या ये निशान उस आदमी और दीदी के है..मैं ये सोच ही रहा था
की दीदी की आवाज़ आई और मैं जल्दी से बाहर आ गया.
फिर हम घर आने के लिए चल पड़े दीदी मुझसे थोड़ा आगे चल रही थी..मैने पीछी
से दीदी की बॅक देखी उनके रेस्मी बालो जो पोनी टेल मे बाँधती थी उसमे से
काफ़ी बाल बाहर आए हुए थे ..मानो कि वो दो लोगो के बीच हुए रगड़ मे आ गये
हो . तभी मेरी नज़र दीदी की गर्दन के पिछले हिस्से पर गयी वाहा एक पिंक
सा निशान पड़ा हुआ था..मानो किसी ने वाहा काटा हो..एक तो दीदी इतनी गोरी
थी सो वो निशान और ज़्यादा उभर का नज़र आ रहा था.. पूरे रास्ते मे मैं
आसमंजस मे रहा. मैं ये ही सोच रहा था कि शायद दीदी सही बोल रही है..वो
आदमी भी तो पॅंट की ज़िपार बंद करता हुआ ही बाहर आया था.शायद मेरा दिमाग़
खराब हो गया है..राज के साथ रह रह कर और वो सारे गंदी क्लिप्स देख कर ही
मुझे ये गंदे खियाल आ रहे है.. कुछ देर बाद ही हम घर पहुच गये इस दोरान
दीदी और मुझे मे कोई बात न हुई थी. रात को मुझे नींद नही आ रही थी रह रह
कर बॅंक वाली घटना मेरे दिमाग़ मे चल रही थी.और कई अनसुलझे सवाल दिमाग़
मे आ रहे थे..और उनमे सबसे बड़ा सवाल ये था कि दीदी ने उस आदमी को रोका
क्यो नही था…और क्या दीदी वकाई उस अंजान आदमी के साथ उस कमरे मे अकेली
थी…पर एक बात पक्की थी जो भी हुआ था पता नही क्यू उसने मेरे अंदर वासना
और हवस का एक बीज ज़रूर बो दिया था….ये सब सोचते सोचते ही अचानक मेरा हाथ
मेरे अब तक खड़े हो चुके लंड पर चला गया ..ये सारी बाते सोच सोच कर मैं
इतना गरम हो चुका था कि जैसे ही मैने अपने लंड पर हाथ लगाया उसमे से पानी
निकल गया..और फिर मुझे नींद आ गयी.
अगले दिन स्कूल के बाद मे राज के साथ साइबर केफे जा रहा था..के मुझे जोरो
से पेशाब लगा…अछा हुआ कि साथ मे ही सरकारी टाय्लेट था सो मे उसमे गुस्स.
गया.मैने अपना पॅंट की जिपर खोली और पेशाब करने लगा..तभी राज भी उधर आ
गया और मेरे बराबर मे खड़ा होकर वो भी पेशाब करने लगा..
“आजा …आजा….अहह…याल्गार” वो अपना मूह उपर करता हुआ बोला. तभी अचानक मेरी
नज़र उसके लंड पर चली गयी..बाप रे कितना बड़ा था उसका..ना चाहते हुए भी
मैं उसके लंड का साइज़ अपने से कंपेर करने लगा. राज का लंड ढीला पड़ा हुआ
था फिर भी वो इतना बड़ा लग रहा था..और इतना तो मेरा खड़ा होकर भी नही
होता होगा..तभी राज ने मुझे अपने लंड की तरफ़ घूरते हुए देख लिया..
“क्यू कैसा लगा…गन्दू” वो मुझे चिड़ाता हुआ बोला. मैने कोई जवाब नही दिया
और अपने पॅंट की ज़िप बंद करने लगा..”.
“अबे बोल ना…बड़ा है ना…साले इस पर तो लड़किया मरती है” वो हस्ते हुए
अपने लंड से पिशाब की बची कुछ बूंदे झाड़ता हुआ बोला.
हम टाय्लेट से बाहर निकले ही थे के मुझे लगा कोई मुझे बुला रहा है. मैने
पीछे मूड कर देखा तो पाया कि अंजलि दीदी मेरी तरफ़ आ रही थी.उन्होने आज
ब्लू जीन्स और ग्रीन टॉप पहना था..हालाकी वो ज़्यादा जीन्स वागरह नही
पहनती थी पर कभी कभार चलता था.
“क्या बात है..साले तू तो छुपा हुआ रुस्तम निकला …कोन है ये.आइटम” राज
दीदी को घूरता हुआ बोला.मुझे बड़ा गुस्सा आया राज पर. पर गुस्से को मैं
मन मे ही दबा गया
“मेरी दीदी है…प्लीज़ उनको आइटम मत बोल…” मैने चिढ़ते हुए जवाब दिया .
दीदी अब हमारे पास आ चुकी थी.उनके पास आते ही उनके बदन पर लगी डेयाड्रांट
की खुसबु मैं महसूस कर सकता था.
“कहा जा रहा है ..और ये श्री मान कोन है” दीदी राज की तरफ़ देखते हुए बोली.
मैं कुछ बोलता इससे पहले ही राज आगे बढ़ा और अपना हाथ आगे कर
बोला..”जी..जी मेरा नाम..राज शर्मा है.मैं इसका दोस्त हू. दीदी ने भी
रिप्लाइ मे अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.
“ओके नाइस टू मैंट यू राज” दीदी राज से हाथ मिलाती हुई बोली.
मैने देखा राज की नज़रे अब सीधी दीदी के बूब्स पर थी.टॉप्स की उपर से
दीदी के बूब्स की गोलाइया काफ़ी आकर्षक लग रही थी.शायद दीदी ने भी राज को
अपने बदन का मुआईना करते हुए देख लिया था. वो थोड़ा सा शर्मा गयी.
“दीदी मे साइबर केफे जा रहा था..स्कूल के कुछ असाइनमेंट्स बनाने है” मे बोला.
“अच्छा चल ठीक ..है जल्दी घर आ जाना..मुझे तेरी थोड़ी हेल्प चाहिए आज” दीदी बोली
मैने हा मे सिर हिलाया.
“आप फिकर ना करे दीदी मैं इसको खुद ही घर छोड़ दूँगा” राज दीदी की आँखो
मे देखता हुआ बोला और अपना हाथ फिर से हॅंडशेक के लिए बढ़ा दिया.
“थॅंक्स यू राज” दीदी ने भी अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.
“और हा दीदी ..अगर मुझसे कोई हेल्प चाहये तो ज़रूर बताना” ये बोलते हुए
राज ने दीदी के हाथ को हल्का सा दबा दिया.ये सब इतना जल्दी हुआ कि शायद
दीदी भी ना समझ पाई थी.
फिर दीदी मूडी और घर जाने लगी .राज जींस के उप्पर से अंजलि दीदी के सुडौल
और उभरे हुए चोतड़ो को देख रहा था.और अपने एक हाथ से अपने लंड को खुज़ला
रहा था.ये देख मेरे दिल मे एक कसक सी उठी..ना जाने क्यू ?
साइबर केफे मे उसने मुझसे दीदी के बारे मे कई क्वेस्चन्स पूछे..मुझे ये
सब अच्छा नही लग रहा था..राज एक बिगड़ा हुआ और आवारा लड़का था…बाद मे वो
मुझे घर भी छोड़ने आया..हालाँकि मैं उसे अपना घर नही दिखाना चाहता था पर
मेरे ना चाहने के बाद भी वो मेरे घर तक आ गया था.वो तो घर के अंदर भी आना
चाहता था पर मैने उसको कोई बहाना मार कर बाहर से ही चलता कर दिया.
मैं घर के अंदर घुसा.तो देखा..चाचा जी घर आ चुके है और टीवी पर न्यूज़
देख रहे थे. चाची किचिन मे खाना बना रही थी.
“आज बड़ी देर लगा दी..स्कूल से आने मे” चाचा जी चाइ की चुस्की लेते हुए
बोले. मैने उनके पैर छुए और बोला ” स्कूल के काम से साइबर केफे गया था
चाचा जी”.
“अरे भाई तुझे अंजलि पूछ रही थी..पता नही क्या काम है “.वे बोले.
“दीदी कहा है ..” मैने पूछा
“उपर रूम मे जा पूछ ले क्या काम है” चाचा जी बोले.
मैं उप्पर रूम की तरफ़ बाढ़ चला. अंदर घुसते ही मैने देखा कि दीदी अपने
बेड पर पेट के बाल लेटी हुई है..उनके बाल खुले हुए एक साइड मे लहरा रहे
है .उस वक्त उन्होने पाजामा और टी शर्ट पहना हुआ था.और वो कुछ लिख रही
थी.
पता नही क्यू अब जब भी मैं दीदी को अकेले मे देखता था तो मेरे दिल मे कुछ
कुछ होने लगता था.मैने अपना स्कूल बॅग मेज पर रखा ..
“आ गये सर..कितनी देर लगा दी” दीदी लिखती हुई बोली.
“सॉरी दीदी..टाइम थोड़ा ज़्यादा लग गया” मैने जवाब दिया.
“चल कोई बात नही…” दीदी उठकर बैठ गयी
“यार ..सर मे बहुत दर्द हो रहा है..तू एक काम करेगा” दीदी अपने माथा
सहलाते हुए बोली
“जी .दीदी …”मैं उत्सुकता से बोला
“मेरे सर की मालिश कर देगा क्या”
मेरी तो मानो लौटरी ही लग गयी ..कब से मे दीदी के उन लंबे खूबसूरत सिल्की
बालो को छूना चाहता था. मैं फॉरन तैयार हो गया.
“ओह्ह मेरे राजा भाई” दीदी मुस्कुराती हुई अपने बेड से उठी. और मेरे बॅड
के पास नीचे बैठ गयी.मैं बेड पर बैठा था फिर मैने अपने टाँगे थोड़ी खोली
और उनके बीच दीदी बैठ गाएे . मेरी टाँगे दीदी के साइड मे दोनो तरफ़
थी.दीदी को इतना पास देख मेरा दिल धड़कने लगा..
“दीदी…तेल..कहा है” मैं थोड़ा हकलाता हुआ बोला. मैं नर्वस हो गया था
इसलिए हकला रहा था शायद.
“अरे बिना तेल के कर दे यार” दीदी बोली
फिर आंटिसिपेशन मे अपने काँपते हुए हाथो को मैने दीदी के बालो मे डाल
दिया ..वाह क्या रेशमी बाल थे..उसमे से आती शॅमपू की खुसबु को सूंघते ही
मेरे लंड मे हरकत शुरू हो गयी थी.. मुझे अब मानो थोडा थोड़ा नशा होने लगा
था .मैने मालिश शुरू कर दी..ग्रिप अच्छी नही बनी तो मैं थोड़ा आगे सरक
गया अब दीदी का सर मेरी पॅंट के अंदर खड़े होते लंड के बहुत पास था..तभी
मेरी नज़र दीदी के अगले हिस्से पर गयी..और मैने देखा कि टी- शर्ट थोड़ी
लूज होने की वजह से दीदी की चूचिया थोड़ी थोड़ी नज़र आ रही थी..ये पहली
बार था जब मैने उनको इतना पास से देखा था..दीदी ने शायद ब्रा नही पहनी
थी..और जैसे जैसे मैं दीदी के सर की मालिश करता मेरे हाथो के प्रेशर से
दीदी के साथ साथ उनकी चूचियाँ भी बड़े मादक तरीके से हिल जाती..इस सब से
मुझे इतना जोश चाढ़ गया था कि मैने दीदी के सिर को थोड़ा ज़ोर से रगड़
दिया..
“आआआ..ह…आराम से कर ..अनुज.र” दीदी बोली
मुझे तो मानो नशा हो गया था.. मुझे फिर याद आया कि कैसे राज दीदी को देख
रहा था….आख़िर वो दीदी को ऐसे क्यो देख रहा था..फिर मुझे हर उस आदमी की
याद आई जो दीदी को घूरते रहते थे..वो खूबसुर्रत लड़की जिससे सब बात करने
के लिए भी तरसते थे अभी मेरे इतनी पास बैठी है..इन्सब बातो मे मैं ये भी
भूल गया था कि वो मेरी बड़ी बहन है..वासना मुझ पर हावी हो चुकी थी..तभी
मुझे एक आइडिया आया मैने फिर दीदी के बालो को इकट्ठा कर अपने राइट हॅंड
मे भर कर अपने पॅंट मे खड़े होते लंड की उप्पर डॉल दिया..फिर मैं दीदी के
रेस्मी बालो को उसपर रगड़ने लगा.
” अरे दोनो हाथो से कर ना…” दीदी अपनी बंद आखो को थोड़ा खोलते हुए बोली.
फिर.एक दो बार मैने दीदी के सिर को मालिश के बहाने पीछे कर अपने खड़े लंड
पर भी लगाया..मैं बस झड़ने ही वाला था कि ..चाची रूम मे आ गयी..
“क्या बात है बड़ी बहन की सेवा हो रही है” चाची हमारे पास आते हुए बोली.
मेरा सारा मज़ा किरकिरा हो गया था..
“मम्मी ..सच मे अनुज बहुत अच्छी मालिश करता है…आपसे भी अछी..हा हा
हा”दीदी हस्ते हुए बोली
“अच्छा चलो जल्दी करो खाना लग गया है..दोनो हाथ मूह धोकर नीचे आ जाओ..” चाची बोली
‘ओके जी “दीदी अपने बालो का जुड़ा बनाते हुए बोली. फिर वो उठ गयी और नीचे
जाने लगी.मैने अपने आप को कंट्रोल मे किया और नीचे चला गया.
पीछले कुछ महीनो मे मेरा अंजलि दीदी के प्रति नज़रिया बदलने लगा था..अब
अंजलि दीदी मुझे अपनी बड़ी बहन लगने के बजाय एक जवान लड़की ज़्यादा लगने
लगी थी…पर थी तो फिर भी वो मेरी बहन ही..वो मुझे कितना प्यार करती
थी..हमेशा मेरा साथ देती थी..उन्होने मुझे सग़ी बहन से भी ज़्यादा प्यार
दिया.. .मेरा उनके बारे मे गंदा सोचना पाप था….नही नही से सब ग़लत है
..मेरा दिल आत्म ग्लानि से भर गया…..पर अगर कोई और ये सब दीदी के साथ करे
तो..कोई अंजान..जिसका दीदी से रिश्ता सिर्फ़ लंड और छूट का हो तो..ये
सोचते ही मेरे अंदर का शैतान जागने लगा…मुझे फिर वो बॅंक वाली घटना याद
आई …और राज का उस तारह से दीदी को देखना …
जून का महीना था मेरे एग्ज़ॅम्स ख़तम हो चुके थी पर दीदी के फाइनल एअर के
एग्ज़ॅम चल रहे थे.दीदी ज़्यादा तर अपने रूम मे पढ़ती रहती थी..एक दिन
मैं घर के बाहर खड़ा कुछ समान ले रहा था..दुक्कान घर के सामने रोड के
दूसरी तरफ़ थी ..हमारे घर की एक साइड कुछ खाली जगह पड़ी हुई थी..मैने
देखा उस खाली जगह पर एक अधेड़ उम्र का आदमी पिशाब कर रहा था….जैसा कि
इंडिया मे अक्सर होता है ..कि जहा खाली जगह देखो बस उस को टाय्लेट बना
लो..वैसे तो सब कुछ नॉर्मल था..पर तभी मैने देखा को वो आदमी पिशाब करता
करता बार बार उप्पर देख रहा है…पर वो उप्पर क्यो देख रहा था…खैर कुछ देर
बाद वो आदमी वाहा से चला गया..मैं भी घर आ गया ..समान चाची को देकर मैं
सीधे उप्पर रूम मे गया जहा दीदी पढ़ रही थी…दीदी तो रूम मे नही थी..पर
मैने देखा के रूम की खिड़की खुली हुई है..वो खिड़की उस खाली पड़े हिस्से
की तरफ मे खुलती थी…मुझे कुछ शक हुआ ..और मैं खिड़के को बंद करने के लिए
आगे बढ़ा. ..मैने खिड़की से नीचे झाँका तो मुझे वो जगह सॉफ सॉफ नज़र आई
जहा उस आदमी ने पिशाब किया था..पर मुझे ये समझ नही आया कि वो बार बार
उप्पर क्यो देख रहा था..तभी मेरे दिमाग़ की घंटी बजी..क्या इस खिड़की पर
अंजलि दीदी खड़ी थी…ये सोचते ही मेरे लंड मे एक कसक सी उठी…पर बिना किसी
सबूत के मैं कैसे दीदी पर शक कर सकता हू..अब मैने प्लान बनाया कि मैं ये
जान कर ही रहूँगा..अगले दिन मैं फिर उस दुकान पर खड़ा था पर इस बार मेरा
माक़साद समान लेना नही था..ठीक शाम को 6 बजे वो बुढ्ढा अंकल पेशाब करने
के लिए उस कोने की तरफ़ बढ़ा.उसकी चाल से लगता था कि वो एक शराबी है ..वो
थोड़ा एडा तेरछा चल रहा था..फिर वो पेशाब करने लगा..
यही मोका था मैं
तुरंत जल्दी से घर के अंदर गया और उप्पर रूम की तरफ़ जाने लगा..रूम का
दरवाजा बंद था हालाकी कुण्डी नही लगी थी शायद अंदर से..अंदर क्या हो रहा
होगा इस आशा मे मेरा हाथो मे पसीना आ गया था …काँपते हाथो से मैने रूम का
दरवाजा हल्का सा खोला और अंदर चुपके से झाका..अंजली दीदी खिड़की के पास
खड़ी थी..और उनका एक हाथ टी-शर्ट के उप्पर से अपनी बाई चूची को हल्के
हल्के सहला रहा था..और उनका दूसरा हाथ जिसमे दीदी ने पेन पकड़ा हुआ था
उसको पजामि के उप्पर से शायद अपनी चूत पर गोल गोल घुमा रही थी.. दीदी
लगातार खिड़की से नीची झाँक रही थी ..चेहरा..शरम से लाल था..उनके चेहरे
पर वासना छाई हुई थी…फिर दीदी थोड़ा और आगे की तरफ़ झुक गयी जिससे अब
उनके बॅक प्युरे तरह से मेरे सामने थी ..तभी मैने देखा की उन्होने अपना
नीचला हिस्सा हिलाना शुरू कर दिया है..वो अपने नीचले हिस्से को नीचे
देखते देखते दीवार पर रगड़ने लगी थी….पता नही क्यो ये सब देखते देखते
मेरा हाथ पॅंट के उप्पर से मेरे लंड पर चला गया ये सब देख मेरा लंड इतना
टाइट हो चुका था कि जितना पहले कभी नही हुआ था ..और मैं मूठ मारने
लगा…अच्छा था उस वक्त घर मे और कोई ना था..नही तो मैं पकड़ा जा सकता
था…अब ये पक्का हो गया था कि दीदी भी सेक्स की इच्छुक हो गयी है.. तभी
दीदी ज़ल्दी ज़ल्दी अपना नचला हिस्सा दीवार पर रगड़ने लगी और उनके हाथ अब
ज़ोर ज़ोर से अपनी कड़क हो चुकी चूची को दबाने लगे.
“एयाया..हह..इसस्सस्स…” हल्की से आवाज़ मेरे कानो मे पड़ी और मेरे लंड ने
पानी छोड़ दिया..वो आवाज़ दीदी के खुले होंठो से निकली थी ..शायद उनको भी
ऑर्गॅज़म हुआ था..मैने अपने आप को संभाला और घर के बाहर आ गया..बाहर आकर
मैने देखा कि वो बुढ्ढा अंकल भी जा चुका था..
अगले दिन मेरी स्कूल बस मिस हो गयी थी.क्योंकि मैं सही से सो नही पाया था
सारी रात दीदी के बारे मे सोचता रहा था .करीब 10 मिनट मे बस आई मैं फटा
फट बस मे चढ़ गया.बस मे काफ़ी भीड़ थी .मैं साइड मे खड़ा था कि तभी कोई
मुझ से टकराया..मैने मूड कर देखा तो पाया कि ये वही अंकल थे जो उस दिन घर
के साइड मे पेशाब कर रहे थे.वो अंकल देखने मे बड़ा झगड़ालु टाइप लग रहा
था..रह रह कर वो लोगो को गंदी गंदी गालिया दे रहा था..बस मे लड़कियाँ और
औराते भी थी ..पर वो किसी की शर्म नही कर रहा था.उसकी बॉडी लॅंग्वेज देख
कर वो मुझे अभी भी थोड़ा नशे मे लग रहा था उसके मूह से शराब की बदबू भी आ
रही थी.. खैर वो थोड़ा आगे निकल गया .और मैं खिड़की से बाहर देखने
लगा..तकरीबन 5 मिनट के बाद मेरी नज़र उस अंकल पर दोबारा गयी..और जो सीन
मैने देखा वो मेरे लंड को खड़ा करने के लिए काफ़ी था..अंकल एक 30-32 साल
की शादी शुदा और्रत की पीछे चिपका खड़ा था.उसका अगला हिस्सा साड़ी के
उप्पर से उस और्रत के कूल्हे से बिकुल चिपका था और वो धीरे धीरे धक्के
लगा रहा था..मैने औरत के चेहरे की तरफ़ देखा तो पाया कि उसके चेहरे पर जो
एक्सप्रेशन था वो उसकी माजबूरी बयान कर रहा था..अंकल उस औरत की मजबूरी और
बस की भीड़ का पूरा फ़ायदा उठा रहा था..अब मैं समझ गया था कि अंकल तो
पक्का हारामी इंसान है. शायद ये उसका रोज का काम था . वो उस औरत के साथ
लगभग 15 मिंट्स तक ऐसे ही साडी की उप्पर से मज़े लेता रहा ..फिर मेरा
स्टॅंड आ गया और मैं बस से उतर गया.
आज कल स्कूल मे मेरा मन नही लग रहा था और लगता भी कैसे हर वक्त तो दिमाग़
मे सेक्स की बाते ही चलती रहती थी. मैं चाहे कितना भी कोशिस कर लू अपना
दिमाग़ इस चीज़ से हटाने मे पर फिर भी कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता था जिसकी
वजह से मेरे अंदर का छुपा हुआ हवस का शैतान जागने लगता था. उप्पर से
अंजलि दीदी के बारे मे भी मेरा नज़रिया बदलने लगा था..अब वो मुझे अपने
बड़ी बहन ना लग कर एक जवानी से भरपूर लड़की नज़र आने लगी थी जो अपनी
मदमस्त जवानी लुटवाने को तैयार बैठी थी. अब हालत ये होगये थे कि अब जब भी
दीदी घर पर होती तो ना जाने दिन मे कितनी बार उनको चुपके चुपके देख कर
मूठ मारने लगा था….जैसे जैसे दिन बीतने लगे वैसे वैसे मेरी हवस भी बढ़ने
लगी..और इसी दौरान एक दिन अंजलि दीदी ने मुझसे बोला कि उनको कॉलेज से एक
सर्वे करने का असाइनमेंट मिला है .
सर्वे मे उनको झुग्गी झोपड़ी मे रहने वाले ग़रीब तबके के लोगो को सॉफ
सफाई के बारे मे जागरूक करना है. दीदी बोली के उनके साथ सर्वे पर जाने
वाली पार्ट्नर ( रीमा ) बीमार हो गयी है और वो मुझे अपने साथ ले जाना
चाहती है. मेरे भी एग्ज़ॅम्स ख़तम हो गये थे सो मैने हा कर दी. अगली सुबा
करीब 9 बजे मैं दीदी के साथ सर्वे पर निकल गया. दीदी ने उस दिन ब्लॅक सूट
और वाइट कलर की चूड़ीदार पजामि पहनी थी और अपने सेक्सी लंबे बालो का
उन्होने जुड़ा बनाया हुआ था .ब्लॅक ड्रेस मे दीदी का गोरा बदन एक अलग ही
रंगत बिखेर रहा था. हम कुछ देर बाद एक स्लम एरिया मे पहोच गये ….और जैसे
सोचा था वैसी ही गंदगी वाहा फेली हुई थी..हर जगह कूड़ा …गंदी नालिया
…वाहा से आ आ रही बदबू की वजह से दीदी ने अपना मूह अपनी चुन्नी से कवर कर
लिया था. ज़्यादा तर मर्द अपने घर से जा चुके थे रॉटी पानी का जुगाड़
करने के लिए और जो कुछ बचे थे वो अपनी भूकी आँखो से दीदी की जवानी को
निहार रहे थे. उनको शायद ये यकीन नही हो रहा था कि इतनी खूबसूरत जवान
लड़की उनकी इस गंदी सी बस्ती मे क्या कर रही है….
” अरे कहा जा रही है..आजा…मेरे पास..मेरी जान” एक आदमी कुछ पीता हुआ
बोला..वो शायद चरस पी रहा था..
“बेह्न्चोद रंडी की. गंद देख…क्या उभरी हुए गांद है…आजा रानी तुझे मस्त
कर दूँगा अपने लंड से..”.दोसरा आदमी अपना लंड दीदी को देख खुजलाता हुआ
बोला.
दीदी और मैं ये सब सुन रहे थे..पर क्या करते ..उन ..बेकार लोगो से और
क्या उम्मीद की ज़ा सकती है..सो दीदी ने उनकी बातो को इग्नोर कर दिया और
हम बस्ती के अंदर घुस गये. बस्ती तो मानो एक भूल भुलैया थी ..छोटी छोटी
तंग गलिया..
“अनुज चल इस घर मे चलते है.” दीदी एक झोपड़ पट्टी की तरफ़ इशारा करते हुए बोली.
हम अंदर दाखिल हो गये . अंदर एक बुढ्ढि औरत रोटी बना रही थी..हमे अंदर
आता देख बोली ” कोन हो और क्या चाहिए”
“कुछ नही माता जी हम एक सर्वे कर रहे है और हमे आपको सफाई के बारे मे कुछ
बाते बतानी है” दीदी मुस्कुराती हुई बोली.
“ये सर्वे क्या होता है..देखो मेरे पास टाइम नही है..मुझे काम करने जाना
है..तुम लोग जाओ” वो औरत झेन्प्ते हुए बोली. दीदी ने उसको बहुत समझाया पर
वो ना मानी सो हम वाहा से बाहर आ गये. इसी तरह हम हर झुगी मे जाकर लोगो
को साफाई की इंपॉर्टेन्स बताने लगे कुछ लोगो ने हमारी बात सुनी और कुछ नी
नही. खैर ये सब करते करते हमे दोपहर के 2 बज गये.
“दीदी और कितना घूमना पड़ेगा..मैं थॅंक गया हू” मैं दीदी की तरफ़ देखता हुआ बोला.
“ओह्ह..मेरा प्यारा भाई थक्क गया…आइएम सो सॉरी तुम मेरी वजह से कितना
परेशान हो गये ना..” दीदी बड़े प्यार से मेरी तरफ़ देखते हुए बोली. तभी
मैने देखा कि सामने से कोई लड़खदाता हुआ हमारी तरफ़ आ रहा है..जैसे ही वो
साया हमारे करीब आया . उसको देखते ही मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन निकल
गयी…
…और ये हाल सिर्फ़ मेरा ही नही बल्कि अपने चेहरे पर डर से आया पसीना
पोछती हुई अंजलि दीदी का भी था दीदी ने भी उसको पहचान लिया था..वो इंसान
कोई और नही बल्कि वोही अंकल था जिसको दीदी अपने रूम से नीचे झाक कर पेशाब
करते हुए देखती थी..शायद अंकल भी दीदी को पहचान गये थे क्योंकि वो रुक
गया था और दीदी को देख कर उसके गंदे चेहरे पर शैतानी हसी आ गयी थी..
” अरे वाह किसी ने सही कहा है जब भगवान देता है तो झप्पड़ फाड़ कर देता
है..आज जुए मे भी मे 10’000 रुपेये जीता और अब…” अंकल मुस्कुराता हुआ
बोला
“बेटे पहचाना मुझे ..कुछ याद आया ..” वो बड़ी बेशर्मी से अपना लंड अपनी
पॅंट के उप्पर से खुजलाता हुआ बोला.
अंजलि दीदी तो मानो सुन्न पड़ गयी थी..उनका खूबसूरत चेहरा शर्म से लाल हो
गया था..वो दोनो कुछ सेकेंड तक लगातार एक दूसरे की आखो मे देखते रहे ..वो
शायद ये भी भूल गये थी कि मैं भी वही साथ मे खड़ा हू. अंकल तो मानो आखो
ही आखो मे दीदी से कुछ कह रहा था…तभी दीदी ने अपनी नज़रे नीची कर ली..
“भाई क्या हुआ..यहा कैसे..” अंकल बोला
दीदी ने कुछ ना बोला ..दीदी को कोई जवाब ना देते देख मे बोल उठा.” हम यहा
सर्वे करने आए है…”
“वाह वाह..अच्छा है…किस चीज़ का सर्वे” वो अब मेरी तरफ़ देखता हुआ
बोला. अंकल की आखो मे अब चमक आ चुकी थी..
“हम यहा लोगो को सफाई की इंपॉर्टेन्स बताने आए है” मैने तुरंत जवाब दिया.
“बहुत अछा .कितना नेक काम कर रहे हो आप लोग …मेरी खोली यही पास मे है
मुझे भी कुछ बता दो…”
“नाअ..नही हमे अब घर जाना है..” दीदी काँपती आवाज़ मे बोली.
अंकल एक बड़ा हारामी इंसान था इतना अच्छा मौका भला वो कैसे छोड़ता. उसने
फॉरन अंजलि दीदी का गोरा हाथ अपने गंदे से हाथ ले लिया और बोला ” अरे ऐसे
कैसे..आप लोग मेरे मेहमान है मुझे भी मेहमान नवाज़ी का मोका दो..” दीदी
तो मानो उसके हाथ की गुड़िया सी बन गयी थी. अंकल तो मुझे ऐसे इग्नोर कर
रहा था जैसे कि मैं वाहा हू ही नही उसका सारा ध्यान दीदी पर ही केंद्रित
था. मुझे अंकल की ये हरकत बुरी लग रही थी..और मैं चाहत्ता तो उनको रोक भी
सकता था ..पर ना जाने क्यू मेरे अंदर छुपा वो हवस का भूका शैतान मुझे से
सब करने से रोक रहा था..और कुछ ही देर मे हम दोनो अंकल के झोपडे के अंदर
थे. झोपड़ी कुछ ज़्यादा बड़ी ना थी फिर भी उसमे दो हिस्से थे..यहा वाहा
कुछ खाली शराब की बोटले पड़ी थी..समान के नाम पर एक पुरानी चारपाई .एक
लकड़ी की मेज , एक बड़ा सा बक्सा और कुछ छोटा मोटा घरेलू समान था…दीदी और
मैं चारपाई पर बैठे थे…
“देख लो ये है मेरा हवा महल..हा हा हा ..” वो अपनी जेब से एक शराब की
बॉटल निकाल कर मैंज पर रखता हुआ बोला.
दीदी अब भी उस आदमी से नज़रे नही मिला पा रही थी..अंकल कुछ देर के लिए
झोपड़ी के दूसरे हिस्से मे गया और थोड़ी देर बाद वापस आया तो उसके बदन पर
सिर्फ़ लूँगी बँधी थी…अंकल बिल्कुल दुब्ब्ला पतला था ..उसके सीने पर उगे
सफेद होते बॉल काफ़ी घने थे .
” अरे भाई मुझे भी तो बताओ..सफाई के फ़ायदे ..देखो मेरा घर कितना गंदा है
..और मेरे यहा सफाई करने वाला भी कोई नही..” वो पास पड़े इस्तूल को दीदी
के बिल्कुल पास रख उसपर बैठता हुआ बोला. अब मेरी नज़र दीदी पर थी दीदी की
साँसे तेज चल रही थी जिसकी गवाही सूट मे क़ैद उनकी छातियाँ ज़ल्दी ज़ल्दी
उप्पर नीचे होकर दे रही थी. दीदी की घबराहट सिर्फ़ मैने ही नही बल्कि
उनके पास बैठे अंकल की पारखी नज़र ने भी देख ले थी.” अरे बिटिया क्या हुआ
तुमने तो कोई जवाब ही नही दिया..” और अंकल ने अपना उल्टा हाथ खाट पे बैठी
दीदी की राइट जाँघ पर रख दिया. दीदी को तो मानो 11’000 वॉल्ट का करेंट
लगा गया और उनके बदन ने एक झटका खाया..
” उन्न..अंकल हम लेट हो रहे है..हम आपको किसी और दिन समझा देंगी” दीदी ने
पहली बार अंकल की आँखो मे देखते हुए बोला.
“अरे अभी तो सिर्फ़ दोपहर के 2 बजे है. और बाहर बहुत गर्मी है थोड़ी देर
बाद चले जाना बिटिया..” अंकल अपना हाथ जो कि अभी भी दीदी की जाँघो पर रखा
था उसको धीरे धीरे से सहलाते हुए बोले. दीदी ने अपने हाथो मे पकड़े हुए
रेजिस्टर ( जो कि उन्होने सर्वे की इंपॉर्टेंट जानकारी लेने के लिए लिया
हुआ था ) उसको जोरो से जाकड़ लिया.
“तुम्हारा नाम क्या है.” अंकल सीधा दीदी की ऊपर नीचे होती हुई छातियो को
देखते हुए बोला.
“जीई..मेरा..ना..नामाम है …अंजलि “
दीदी को अपने इतना पास देख वो अंकल बहुत ही उतावला लग रहा था.अगर मैं
वाहा मोजूद ना होता तो शायद अब तक वो दीदी के कपड़े फाड़ उनकी जवानी
लूटना शुरू भी कर चुका होता.
“तुम इतना क्यो डर रही हो बिटिया..इसमे डरने वाली क्या बात है….” बोलकर
अब अंकल स्टूल से उठकर चारपाई पर दीदी की लेफ्ट साइड मे खाली पड़ी जगह पर
बैठ गया.वो जब उठ रहा था तो मेरी नज़र यका यक उसकी लूँगी पर बनते हुए
टेंट पर गयी..वो टेंट अभी ज़्यादा बड़ा नही बना था फिर भी अंकल के खड़े
होने पर वो सॉफ नज़र आ रहा था…और ये सिर्फ़ मैने नही दीदी ने भी देखा था.
“पानी पीओगी..” अंकल बोला.
दीदी ने सोचा कि अगर वो हा करती है तो अंकल उठ कर पानी लेने चला गाएगा
जिससे कि उनको थोड़ा सकून मिलेगा.
“हंजी” दीदी धीरे से बोली
पर अंकल तो मंझा हुआ शिकारी था उसने तुरंत मेरी तरफ देखा और बोला ” अरे
बेटा छोटू जा अंदर जा एक ग्लास पानी ले आ..ग्लास अलमारी से निकाल लेना और
पानी का मटका वही नीचे रखा है “. मैं भी क्या करता उठ कर झोपड़ी के दूसरे
हिस्से मे चला गया.अब मेरी बड़ी बहन उस अंजान अंकल के साथ अकेली थी मेरा
दिल जोरो से धड़कने लगा..फिर मैने सामने अलमारी मे रखे एक पीतल के ग्लास
को हाथ मे उठाया ही था कि मुझे..अचानक दीदी की हाथो मे पहने कड़ो की खनक
ने की आवाज़ आई..मानो दीदी अपने हाथो को जोरो से हिला रही है…मेरे दिमाग़
मे ख़तरे की घंटी बजने लगी …और फिर ‘”आआ..इसस्स्शह…..” दीदी के मूह से
निकली ये सीत्कार बहुत धीरे होने के बावजूद मेरे अब तक सतर्क हो चुके
कानो मे आई. दूसरी तरफ़ क्या हो रहा होगा..ये सोचते ही मेरे लंड मे करेंट
फैलने लगा. जो दीवार झोपडे को बाटती थी मैं चुप चाप उसके पास जाकर खड़ा
हो गया अब मैं देख तो कुछ नही पा रहा था पर हल्की हल्की आवाज़े मुझे
ज़रूर सुनाई दे रही थी..
और मैने सुना
दीदी : आह..अंकल….प्लीज़ अब घर जाने दो..’
अंकल: ” इस.हह..ऐसे कैसे जाने दू मेरी जान…..मुझे तो अपने किस्मत पर यकीन
ही नही हो रहा है..जिस लड़की को सोच सोच कर मैने इतना मूठ मारा ..वो आज
मेरे घर मे..आहह..”
दीदी : “उन..ह…अंदर ..मेरा छोटा भाई है प्लीज़…..अहह..मे बदनाम हो जाउन्गी…”
अंकल : “क्यो क्या हुआ जब तू मुझे पेशाब करते हुए देखती थी…तब तुझे शर्म
नही आती थी..साली तेरे बारे मे सोच सोच कर मैने कितनी रंडिया चोदी है
.क्या तुझे इस बात का ज़रा भी इल्म है”
तभी दीदी के काँपते होटो से फिर एक सिसकारी निकली.”आहह.इसस्स्स्स्शह….वो
मेरा भाई उन..अंदर…….आईशह…”.
अंकल : “अच्छा..अब समझ आया ..तू अपने भाई के पास होने से डर रही है..तू
रुक मे कुछ करता हू अभी..”
दीदी कुछ ना बोली..
मैं सोच मे पड़ गया क्या वाकई दीदी मेरी वजह से हिचाक रही है..??
मैं तुरंत पानी का ग्लास लेकर उस तरफ़ निकला ही था कि मेरे पैर से एक
शराब की खाली पड़ी बॉटल टकरा गयी..इस आवाज़ से कुछ पल के लिए सब शांत हो
गया और मैं उस तरफ़ जहा वो दोनो थे..चल पड़ा ..उधर आते ही मैने देखा कि
दीदी के बालो का जुड़ा खुला हुआ है.और उनके बाल फेले हुए है और दीदी अपना
दुपट्टा सही कर रही है. अंकल अभी भी दीदी की बगल मे बैठे थे और वो अपने
लूँगी मे खड़े लंड को शायद मुझसे छुपाने की कोशिश कर रहे थे.
“ला इधर ला पानी..” अंकल मेरे हाथ से पानी का ग्लास लेते हुए बोले.
मेरे नज़र अभी भी दीदी पर ही थी जो कि मुझसे नज़र नही मिला पा रही थी.
” ले बिटिया.पानी पी ले..” अंकल पानी का ग्लास दीदी की तरफ़ बढ़ाते हुए बोले.
पर दीदी ने पानी नही पिया. इस पर अंकल ने थोड़ी देर तक कुछ सोचा और
बोला..” चल तेरे लेए ठंडा मँगाता हू”
फिर उसने मुझे पेप्सी की बॉटल लाने के लिए कुछ पैसे दिए और बोला कि
नुक्कड़ पर एक पान की दुकान है वाहा से एक ठंडी पेप्सी ले आओ. वो तो मुझे
एक नोकर के तरह ट्रीट कर रहा था..पर मुझे उसका मकसद समझ आ गया था..सो मैं
तुरंत बाहर जाने की लिए बढ़ा ही था कि ..अचानक दीदी मुझे कुछ बोलने को
हुई..शायद बोलना चाह रही थी कि ” अनुज मुझे इस आदमी के साथ अकेला मत छोड़
कर जा ” पर अंकल ये भाप गये वो तुरंत बोल पड़ा जल्दी जा बेटा नही तो
दुकान बंद हो जाएगी..फिर मैं बाहर आ गया..पर मेरे दिमाग़ मे भी कुछ चल
रहा था..और इस बार मैं किसी भी हालत मे ऐसा सुनहरा मौका छोड़ना नही चाहता
था.. मैं घूम कर उस झुगी की दोसरि तरफ़ चला गया..और अंदर झाँकने के लिए
कोई जगह ढूँढने लगा…मैं अंदर क्या हो रहा होगा सोच सोच कर बहुत ज़्यादा
एग्ज़ाइटेड होने लगा था..ज़ल्दी ही मुझे एक जगह मिल गयी ..दीवार मे एक
छेद हुआ पड़ा था .वो छेद कोई ज़्यादा बड़ा तो नही था पर फिर भी मुझे अंदर
का नज़ारा सॉफ नज़र आ रहा था…अंकल की खोली (रूम ) बिल्कुल कोने मे थी सो
कोई मुझे वाहा उधर झाँकते हुए देख भी नही सकता था..फिर मैने अंदर देखना
शुरू किया..और जैसा मैने सोचा था वैसा ही हो रहा था..अंकल ने अंजलि दीदी
को अपनी बाहो मे जकड़ा हुआ था..उसका एक हाथ दीदी की कमर को उपर से नीचे
तक सहला रहा था..
“अब तो शाराम छोड़ दे मेरी जान…अब तो तेरे भाई को भी मैने बाहर भेज दिया
है” अंकल दीदी की जांझो(थाइस) को सहलाते हुए बोले.
“अंकल..प्लस्सस्स…आह..प्ल्ज़्ज़ मुझे घर जाने दो” दीदी अंकल का हाथ अपने
जाँघो से हटाने की कोशिस करते हुए बोल रही थी.
” इन सेक्सी बालो को क्यू बाँध रखा है तूने..बह्न्चोद..खोल इन्हे..”वो
दीदी की जुड़ी को खोलते हुई बोला.
शायद उसको भी लड़कियो के लंबे बाल बहुत पसंद थी..और दीदी के बाल लंबे
होने के साथ साथ एकदम सिल्की भी थे. बालो की चमंक ओर शाइन ये बता रही थी
कि दीदी उनकी कितनी देख रेख करती है.अंकल के लिए ये सब मानो सपना सा ही
था जिसका वो पूरा फ़ायदा उठना चाह रहे थे. जोश मे आकर अंकल ने दीदी के अब
तक बिखर चुके बालो को अपने हाथो मे भर कर उनमे अपना मूह डाल दिया और बालो
की खुशुबू सुघने लगे..जैसे जैसे दीदी के बालो से आती खुशुबू उस गंदे आदमी
के दिमाग़ मे जाने लगी वैसे वैसे उसका लंड लूँगी मे खड़ा होने लगा..ये
देख सिर्फ़ अंकल ही नही दीदी भी हैरान थी..अब तो दीदी को भी अपने बालो की
इंपॉर्टेन्स का पता चल गया था..और शायद वो अपने आप पर थोड़ा घमंड भी करने
लगी थी..हालाँकि वो घमंड थोड़ी देर के लिए ही था..क्योंकि अंकल अब दीदी
के बालो को अपने बालो से भरी छाती पर रगड़ने लगा ..और इससे दीदी के बॉल
खिचने लगे तो दीदी कराह उठी.”आआऐसशह…धीरे कारू….दर्द होता है..”
अंकल का जोश अब बढ़ता ही जा रहा था..और जिस तरह से वो दीदी के जाँघो को
सहला रहा था दीदी भी थोड़ा थोड़ा बहकने लगी थी ..अब दीदी के हाथो ने अंकल
के हाथो को पकड़ा तो हुआ था पर वो उनको रोक नही रही थी
“तेरी उम्र क्या है..”
“जी..तीइश्ह्ह्ह्ह्ह…23” अंजलि दीदी काँपती आवाज़ मे बोली.
“किसी ने तुझे पहले चोदा है…” अंकल दीदी की गर्दन पर आए पसीने को अपने
खुरदूरी जीब से चाट ते हुए बोला. अंकल की खुरदरी जीब अपनी गर्देन पर लगते
ही दीदी के बदन ने एक झटका खाया..और दीदी की आँखे इस अनोखे मज़े के आनंद
मे बंद होने लगी.
“बोला साली…चुदी है किसी से पहले….वैसे तुझे देख कर लगता नही की तू अभी
ताक चुदाई से बची होगी…”
“आआअहह…नही मैं कवारी हू…”दीदी ने अपनी बंद आखो को और ज़्यादा बंद करते
हुए जवाब दिया.
अंकल को तो मानो कुबेर का ख़ज़ाना मिल गया जब दीदी ने बताया कि वो अभी
कवारी है.वो जल्दी खड़ा हुआ और फटाफट अपनी लूँगी खोल एक तरफ़ फैंक दी वो
अब पूरा नंगा दीदी के सामने खड़ा था दीदी अभी भी चारपाई पर बैठी थी. उसका
लंड रुक रुक कर झटके खा रहा था ..ये देख मेरा हलक सुख गया था तो आप समझ
सकते है कि दीदी की क्या हालत हुई होगी. लंड काफ़ी बड़ा लग रहा था ..
“हाथ मे ले इसे..” अंकल को दोबारा नही बोलना पड़ा और ना चाहते हुए भी
दीदी का हाथ अपने आप उस विशाल लंड पर चला गया. और क्यू ना जाता इसी को तो
वो अपने रूम से चुपके चुपके देख कर अपने बदन को सहलाती थी..
दीदी के ठंडे नरम नरम हाथो को स्पर्श पाकर लंड ने एक ज़ोर का झटका मारा.
और अंकल के मूह से निकला “एयेए.हह…साली…क्या नरम हाथ है तेरे..रंडी…अहह.”
अपनी बड़ी बहन को उस अंजान बुढ्ढे आदमी का लंड इस तरह से हिलाते देख
मुझसे कंट्रोल नही हुआ और मैने भी आना लंड पॅंट का जिपपर खोल बाहर निकाल
लिया और मूठ मारने लगा..
तभी मेरी किस्मत ने मुझे फिर से धोका दिया..और अंकल ने दीदी को चारपाई से
उठा कर एक तरफ़ खड़ा किया..वो पता नही क्या करना चाह रहा था.फिर वो झुका
और चारपाई को वाहा से उठाने लगा..मैने देखा की दीदी की आँखो मे मानो नशा
फेला हुआ था..वो लगातार अंकल की टाँगो मे लटकते लंड को बिना पलके बंद किए
देखती ही जा रही थी..शायद दीदी ने पहली बार लंड इतना पास देखा था..कुछ इस
मिनिट बाद अंकल ने खाट झुग्गी ( रूम ) के दूसरी तरफ़ वाले हिस्से मे बिछा
डी और फिर वो दीदी का हाथ पकड़ उन्हे उसे हिस्से मे ले गया…अब मुझे कुछ
भी नज़र नही आ रहा था..मुझे अपनी किस्मत पर गुस्सा आने लगा…इतना अच्छा
मोका मेरे हाथ लगा था..मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मुझे ..चारपाई के
ज़ोर ज़ोर से हिलने के आवाज़ आने लगी…चर…चार..चार” और बीच बीच मे दीदी की
सिसकिया भी आने लगी…”अहह…इस्शह….”
क्या अंकल दीदी की चुदाई करने लगा है..ये सोचते ही बेचैन होने लगा..मैने
फटा फॅट अपना लंड वापस अपने पॅंट मे डाला..और कोई जगह अंदर देखने के लिए
ढूढ़ने लगा…
फिर तभी मेरी किस्मत दोबारा खुली और मैने देखा कि दीदी भागती हुई दोबारा
झुगी के उसी हिस्से मे आ गयी जहा वो पहले थी…उन्होने अपने दोनो हाथो से
अपनी सफेद चूड़ीदार पाजामी पकड़ी हुई थी.नीचे लटकता हुआ नाडा से बता रहा
था कि दीदी की पाज़ामी खुली हुई है….
“नही मैं ये सब नही करवाउंगी..प्लज़्ज़्ज़….छोड़ दो मुझे..अंकल..आपको
पैसे चाहये तो वो ले लो….प्ल्ज़ मेरी जिंदगी मत बर्बाद करो” दीदी की आँखो
मे अब आसू आ चुके थे..तभी दूसरी तरफ़ से अंकल बाहर आया …अंकल की आँखे हवस
के नसे से लाल हो रही थी..
“साली…थोड़ी देर पहले तो बड़े मज़े से करवा रही थी..अब क्या हुआ तुझे
..तुझे लगता है कि मैं तेरे जैसा कोरा और जवान माल बिना चोदे जाने
दूँगा…” अंकल दीदी के तरफ बढ़ते हुए बोला..दीदी धीरे धीरे पीछे होने लगी
और वो शैतान आगे बढ़ने लगा…दीदी की ऐसी हालत देख मैं सोच मे पड़ गया कि
आज की तारीख मे लड़की होना कितना बड़ा गुनाह है और उपर से अगर लड़की दीदी
जैसी खूबसूरत हो तो क्या कहना…..
फिर मैने दोबारा अंदर चलते हवस के नंगे नाच पर अपना ध्यान केन्दरित किया
.और जो मैने देखा उससे मेरा हाथ दोबारा मेरे लंड पर चला गया …दीदी दीवार
से सटी खड़ी थी और अंकल का एक हाथ सूट के उप्परसे उनकी लेफ्ट चूची को दबा
रहा था और दूसरे हाथ से वो दीदी की पाजामी के अंदर हाथ डालने की कोशिश कर
रहा था….
“बह्न्चोद …क्या..मुलायाम चुची है तेरी रानी.आज तक मैने इतनी चूचिया दबाई
पर तेरे जैसी कड़क और मुलायम चुचि किसी की ना थी .आइ….” वो दीदी की
चूचिया दबाता हुआ बोला..
उधर दीदी अपनी पूरी ताक़त के साथ अपनी पाजामी मे घुसने की कोशिस करते
अंकल के हाथो को रोक रही थी..जब उनको लगा के वो अंकल के हाथ को नही रोक
पाएगी तब वो अचानक दीवार की तरफ मूड गयी….अब दीदी की पीठ अंकल और मेरी
तरफ़ थी…
“मुझे छटपटती लड़किया बहुत पसंद है..साली ..कुतिया आज तो मैं तेरी चूत को
चोद चोद कर भोसड़ा बना दूँगा…” वो बुढ्ढा अंकल फिर पीछे से ही दीदी से
लिपट गया और अपने दोनो हाथो से दीदी को अपने गिरफ़्त मे ले लिया…दीदी की
अब ऐसी हालत देख मुझे उन पर दया भी आ रही थी…पर मेरे अंदर पैदा हो चुकी
हवस मुझे ये सब देखने के लिए उकसा रही थी..तभी एक ही झटके मे अंकल ने
दीदी की पाजामी को अपने अनुभवी हाथो से सरका कर नीचे कर दिया और फिर नीचे
बैठ कर दीदी के गोरे गोरे चूतड़ पर चढ़ि हरी (ग्रीन ) कछि (पॅंटी ) देख
ने लगा…उसने फिर कछि पर हल्का सा किस किया और अपने दोनो हाथो से कछि के
उप्पर से दीदी के चूतड़ो को मसलने लगा..फिर एक झटके मे दीदी की हरी कछि
को उसने नीचे सरका दिया..अब चूतड़ पूरे नंगे हो चुके थे…दीदी के चूतड़ तो
ब्लू फिल्म वाली लाकियो से भी अच्छे थे एक दम गोल और सुडोल..उभरे हुए
बाहर की तरफ़ निकले हुए दीदी के चूतड़ देख मेरा लंड पागल हो गया था तो आप
सोच भी सकते है कि अंकल का क्या हाल हुआ होगा क्योंकि दीदी तो उनकी पास
ही खड़ी थी.फिर बिना कोई वक्त गवाए अंकल ने अपने गंदा सा मूह दीदी के
गोरे गोरे चुतदो मे घुसा दिया और वो उन्हे चाटने लगा..अंकल की खुरदूरी
जीब, मूह पर आई दाढ़ी (बियर्ड) और उनके मूह से आती गरम गर्म सासो को
महसूस कर दीदी के मूह से ना चाह कर भी एक सिसकारी निकल गई
…”आआ..इसस्स्स्स्स्स्स्सश….मा….इसस्शह…” दीदी के लिए ये एक नया अनुभव था
और उनके चूतड़ अपने अप अंकल के जीभ का सपर्श पाने के लिए..अंकल के मूह मे
घुसने की जदोजहद करने लगे..अंकल की जीभ दीदी के चुतड़ों की दरारो मे
उप्पर से नीचे उनकी चूत तक घूम घूम कर अपना कमाल दिखाने लगी…अब दीदी की
आखे मस्ती मे फिर से बंद होने लगी थी और उन्होने प्रतिरोध बंद कर दिया
था..दीदी की कवारी चूत चाट चाट कर उसका रस पीते ही अंकल जोश से भर गया
…लड़की अब उसके काबू मे दोबारा आ गयी थी…इस बार उसने समय गवाने की कोशिश
ना की और खड़ा होकर उसने अपना तना हुआ लोड्ा अब तक झूक चुकी अंजलि दीदी
की चूत (पुसी) पर रख दिया..ये सोच कर कि अब तो दीदी कोई कोई चुदने से नही
बचा पाएगा…तभी मुझे लगा कोई मेरे अलावा भी शायद कोई और ये सब देख रहा
है..वो जो कोई भी था वो बंद दरवाजे से अंदर झाक रहा था..क्योंकि दरवाजा
थोड़ा थोड़ा हिल रहा था.( मानो की कोई बड़ा उत्सुक था अंदर देखने के लिए
) .पर .मेरे लंड ताव मे आ गया और ..””फाकच्छ..फ़ाच्छ..मेरे लंड ने पानी
छोड़ दिया..इतना तेज ऑर्गॅज़म मुझे पहले कभी नही हुआ था….मेरी टाँगे काप
रही थी. तभी फॅट की ज़ोर से आवाज़ हुई और मैने देखा कि अंकल ज़मीन पर
बेहोश पड़ा है..उसका सर खून से लत्पथ है…और दीदी के हाथ मे एक टूटी काच
की बॉटल है….
हुआ ये था कि जैसे ही अंकल अपना लंड दीदी की चूत मे डालने वाला था तभी
दीदी का हाथ साइड मे रखी शराब की बॉटल पर आ गया और उन्होने वो बॉटल अंकल
के सर पर दे मारी थी…दीदी फटाफट अपनी पाजामी पहनने लगी…मैं भी अब वकाई मे
घबरा गया था..सो मैं भी अपने छुपी हुई जगह से बाहर आगेया और दीदी की तरफ़
बढ़ा. मैं जैसे ही झुगी के गेट पर पहुचा..दीदी बाहर आ रही थी फिर वो मेरे
पास आई और बोली अनुज ज़ल्दी चल यहा से…मैने कुछ और नही पूछा और फिर फटाफट
हम वाहा से निकल कर अपने घर आ गये..पर घर आते आते भी मेरे दिमाग़ मे एक
सवाल चल रहा था..कि..आख़िर वो कोन था जो दरवाजे से अंदर झाक कर ये सब देख
रहा था….
“अरे अंजलि तुम्हारा सरवे कैसा रहा आज” चाचा जी रोटी का टुकड़ा तोड़ते
हुए बोले. हम सब रात का खाने खा रहे थे.
“जीई…जी अच्छा था” दीदी हकलाती ज़बान से बोली.
“अरे बेटा तुम इतनी परेशान क्यू लग रही हो..तबीयत तो ठीक है ना तुम्हरी’
चाचा जी दीदी की तरफ़ देखते हुए बोले.
“हाँ..हॅंजी..पापा..जी.. बस मुझे थोड़ा सा सर मे दर्द है” दीदी नज़रे
नीची करती हुई बोली.
” और तुम्हारी गर्दन पर ये निशान कैसा है” चाचा जी दीदी की गर्दन के
निचले हिस्से पर पड़े निशान की तरफ़ इशारा करते हुए बोले. आप लोग तो अब
समझ ही गये होंगे के वो निशान किसने दीदी को दिया था. दीदी तो मानो सुन्न
ही पड़ गयी थी.
“जी वो एयेए…वाहा काफ़ी गंदगी थी इसी वजह से कोई कीड़ा काट गया था” दीदी
निशान को अपने हाथो से छुपाते हुए बोली.
मैं ये सब चुप चाप देख रहा था और खाना खा रहा था.
” भाई. मैने ये भी सुना है तुम्हरे छोटे भाई ने तुम्हारी बहुत मदद की आज
सरवे मे ‘ चाचा जी मुस्कुराते हुए मेरी तरफ़ देखते हुए बोल रहे थे.
“हा.. बहुत मुदद की मैने ..उस शराबी गंदे बुढ्ढे को अपने जवान बहन थाली
मे परोस कर दे दी थी आज…बलात्कार होता होता बचा था आज दीदी का..”…मैने मन
मन मे अपने आप से कहा.और फिर मैं हल्का सा मुस्कुरा दिया. दीदी सूप पीते
पीते मुझे देख रही थी. मानो कि जान ना चाहती हो कि मैं क्या जवाब दूँगा..
“पापा मेरे सर मे बहुत दर्द हो रहा है मैं दवाई ले कर सोने जा रही हू”
दीदी नॅपकिन से अपना हाथ पोछ्ते हुए बोली और उठी कर उपर रूम मे चली गयी
कुछ देर बाद मैं भी सोने के लिए रूम मे आ गया.
“अनुज तुझसे एक बात पूछूँ..प्ल्स सच सच बताना” दीदी की आवाज़ मेरे कानो मे आई.
रूम की लाइट्स बंद थी और रात के शायद 11 बज रहे थे. मैं डर गया और सोचने
लगा कही दीदी जानती तो नही है कि मैने उनका वो नंगा नाच देखा है.
“आ..हा हाजी दीदी पूछो” मैं झिझकते हुए बोला.
“तूने इतनी देर क्यो लगाई थी वाहा आने मे..और तू कब वापस आया था” दीदी भी
थोड़ा हिचकिचाते हुए बोली
“मैं तभी तभी ही आया था दीदी”मैने फटाक से जवाब दिया.
“पर तेरे पास कोल्ड ड्रिंक तो नही थी” दीदी बोली
अब मैं फस गया ….मैने अपने आप से कहा . पर फिर मैने समय की गंभीरता को
समझते हुए जवाब दिया ” दीदी सभी दुकाने बंद थी ..मैं बहुत घुमा पर कही भी
कोल्ड ड्रिंक नही मिली थी. सो खाली हाथ वापस आ गया .”
दीदी को अब शायद यकीन हो गया था कि मैने वो सब नही देखा था क्योंकि फिर
दोबारा उन्होने कोई सवाल नही किया. और दिन की बात याद करते करते मुझे ना
जाने कब नींद आ गयी पता ही ना चला.