मेरा घर और मैं अध्याय 3
ठीक है मैम।” संतोष इतना कहने के बाद क्लास से बाहर जा कर खड़ा हो गया। संतोष के जाने के बाद श्रीमती कौशिक बचो को पड़ने लग गई। श्रीमती तनु गैलरी से कंप्यूटर लैब की तरफ जा ही रही थी। नज़र संतोष पर पद गई संतोष क्लास बहार खड़ा देख कर श्रीमती तनु उसकी तारफ चल दी।
“संतोष आज क्लास से बहार कैसे।” श्रीमती तनु ने संतोष के पास आ कर पुछने लगी। संतोष श्रीमती तनु की तरफ देखा कर बोला, “सुप्रभात महोदया।” विश करने के बाद संतोष चुप हो गया। संतोष को चुप देख कर एक बार फिर से बोली, “तुम ने बताया नहीं तुम बाहर क्यों खड़े हो।”
“वो क्या है मिस आज मिसेज कौशिक ने मुझे कुछ इतिहास के सवाल पुची थी, जिन्का जवाब में गलत दिया। इस्ली मुझे बहार खड़ा कर रख है।” संतोष ने कहा। मिसेज तनु संतोष की और देखा और बोली, “अगर तुम चाहो तो मिसेज कौशिक से बात कर सकती हूं। मेरे कहने पर तुम क्लास में बैठा लेगी।”
“नहीं मिस इतनी सजा तो मुझे मिलानी चाहिए तकी आए मैं कोई गलत न करू।” संतोष ने श्रीमती तनु को एक कारण बता कर सहायता लेने से मन कर दिया। अब श्रीमती तनु भी कुछ नहीं कर सकती थी। इसलिये वो वहां से चली गई।
क्लास खतम होने के बाद मिसेज कौशिक संतोष को लंच टाइम में मिलाने को कह कर चली गई। उसके बाद संतोष ने अपनी क्लास में चला गया। उसके बाद संतोष से किसी भी शिक्षक ने कुछ नहीं कहा। लंच टाइम होता है संतोष मिसेज कौशिक के केबिन की और चल दिया।
“क्या मैं अंदर आ सकता हूँ मैडम।” संतोष ने केबिन के सामने जा कर बोला। संतोष की आवाज़ सुन कर श्रीमती कौशिक ने कहा, “हाँ आओ।” संतोष आंदर चला गया। संतोष को अंदर आने के बाद श्रीमती कौशिक अपनी कुर्सी से खादी हो गई और चलते हुए संतोष के पिच आ गई। फ़िर। मिसेज कौशिक ने केबिन का डोर लॉक कर दिया।
“तो संतोष तुम्हें बहुत अच्छा है, मुझे पंगा लेने का। आज मैं बताता हूं।” श्रीमती कौशिक ने अपने आलमरी की तरफ जाते हुए बोली। संतोष ने कुछ नहीं कहा, वो बस श्रीमती कौशिक को ही देख रहा था, क्या वह करने वाली थी उसके साथ। मिसेज कौशिक ने अपना खोल कर उस में से एक पाताली सी छडी निकली और संतोष के पास आ गई।
“संतोष जल्दी से अपना पंत उतर कर झुक जाओ।” श्रीमती कौशिक ने कहा। सन्तोष श्रीमती कौशिक की बात सुन परशान हो गया, वो कैसे उनके सामने अपनी पंत उतर सकती थी।
“पर मिस।” संतोष ने अभी इतना ही कहा था की मिसेज कौशिक ने हमें बिच में ही रोक दिया। मिसेज कौशिक फिरसे बोली, “संतोष तुम अभी अपनी पंत उतरते हो या कल सबके सामने प्रार्थना में उतरोगे। ये तुम भी अच्छी तरह जाने हो की प्रिंसिपल सर भी मेरी बात को नहीं टालेंगे।” संतोष ये बात अच्छी तरह जनता था की प्रिंसिपल सर मिसेज कौशिक की बात बिलकुल मन नहीं कर सकते। क्या लिए उसे आपने आपने उतर कर झूक गया।
संतोष अब श्रीमती कौशिक के सामने सिर्फ और कपड़ों में था। जब मिसेज कौशिक ने संतोष को अंडरवियर ने देखा तो उनका खून ही खोल गया, फिर गुसे में बोली, “सेल मदरचोद ये अंडरवियर तेरी मां आ कर उतरेगी। चल जल्दी से ये भी उतर।”
संतोष मिसेज कौशिक की मां की गली सुन कर बहुत ज्यादा ही गुस्सा आया, कुछ सोच कर उसे अपना अंडरवियर भी आला कर दिया। श्रीमती कौशिक ने संतोष के गंद पर हम छडी से लगार 10 छडी मारी। संतोष ने अपने मुह से एक आवाज भी नहीं निकली थी। मार्ने के बाद श्रीमती कौशिक ने कहा, “अपना अंडरवियर और पंत ऊपर कर, निकली यहां से। आज के बाद मेरी किसी भी काम में अपनी ये गंद में घुसपैठ, वारन अगली बार तेरी सी गंद में प्रिंसिपल सर का लुंड आया होगा। मेरी बात।” मिसेज कौशिक ने संतोष का लुंड अभी तक नहीं देखा, क्योकी उसे अपना अंडरवियर हलका सा ही किया था, जिस उसे गंद दिख खातिर। संतोष पंत पहन वाला से निकल गया।
दीपक और रामू मिल गए का उपयोग करने के लिए संतोष जब बहार गया। दीपक ने संतोष के चाहरे को देख कर समझ गया था की जरा कुछ हुआ है, क्योंकि उसके चाहरे पर अंश के निशान साफ पता चल रहा था, संतोष के पोचने के बाद भी।
“भाई क्या बात है। मिसेज कौशिक ने कुछ किया क्या तेरे साथ।” दीपक ने संतोष से पुचा। दीपक के बात करने के तारिके से संतोष को पता चल गया था की दीपक गुसा आया हुआ है।
“भाई तू शांत हो जा। तू जाना चाहत है ना, तो सुन मिसेज कौशिक ने मुझे मारा और मां की गली दी।” संतोष की बात सुन कर दीपक के साथ रामू का भी दिमाग घूम गया।
“साली रंदी इतनी हिम्मत ही उसे मेरी दोस्त को मारा और गली भी दी। साली को अभी जा कर बताता हूं।” रामू गुसे में बोल मिसेज कौशिक के केबिन की और बढ़ गया। संतोष ने जल्दी से जा कर रामू को राका और बोला, “भाई पहले मेरी बात सुन।” रामू संतोष को घुर कर देखा और बोला का इशारा किया।
“भाई मिसेज कौशिक को हम ऐसे नहीं जाने देंगे। हमें साली ने मेरी मां को गली दी है, मैं हमें साली अपनी रंडी ना गया तो मैं भी अपने पापा की औलाद नहीं। तू अभी शांत हो जा।” संतोष ने कहा।
“फिर ये तय हुआ की उस साली रंडी मिसेज कौशिक तू अपनी पर्सनल रैंड बनेगा। पर भी तेरी हमें छोडे लुंड से कुछ नहीं होने वाला।” रामू ने संतोष की बात सुन खुश हो कर कहा। संतोष उसी बात सुन मस्कुरा दिया और बोला, “तो क्या हुआ मेरी ता छोटा है, पर तुम दोनो का तो बड़ा है। फिर तुम दोनो मरते रहना। क्यू मैं ने सही कहा ना?”
“ये तू ने ठीक कहा। अब आगे बता क्या करना है।” दीपक ने कहा। रामू भी दीपक की बात सुन हंस दिया।
“देख तुम दो हमें पर नज़र रखो। मैं सुना है की स्कूल के बाद मिसेज कौशिक अपने प्रिंसिपल से चुदती है। बस एक बार यूज चुदाई करते हुए पके ले, फिर देख साला ये प्रिंसिपल भी अपना कुट्टा बन कर रहेगा।” संतोष ने कहा। रामू कुछ सोचते हुए बोला, “तुझे कैसे पता की मिसेज कौशिक स्कूल के बाद प्रिंसिपल से चुदती है।”
“वो सब छोड, आज स्कूल के बाद हम मिसेज कौशिक को प्रिंसिपल से चुदाई करते समय पकेगे। हां दीपक अपना सेलफोन देर से आना।” संतोष ने कहा। संतोष की बात सुन कर रामू और दीपक समझ गए थे कि संतोष सेलफोन का क्या करने वाला है।
“ठीक है। पर घर से फोन लगाने में समय लग जाएगा।” दीपक ने कहा। संतोष दीपक की बात सुन कर बोला, “अरे पागल तू ये कैसे भूल गया की छुटटी होने के बाद 30 मिनट तक टीचर्स की मीटिंग चलती है। जब तक हम घर जा कर फोन भी ले आएंगे।” संतोष की बात सुन दो खुश हो गए। यहाँ संतोष की बात खतम हुई थी उधार बेल लग गई।संतोष और उसके दोस्त क्लास में चले गए। संतोष को बैठाने दीकत हो रहा था, क्योकी उसकी गंद की बंदई जो हुई थी। पर संतोष किस तरह अपने दर्द को बरदस्त कर एक के बाद एक क्लास लिया और स्कूल की छुट्टी होने के बाद संतोष अपने दोस्तों के साथ बहार चला गया।
“दीपक और रामू तुम दोनो घर जाओ। खाना खाने के बाद तुम दोनो यहां आ जाना। मुझे राधिका मैडम को घर देखना है। इसलिय मुझे उनके साथ जाना होगा।” संतोष ने अपने दोस्तो से कहा। संतोष की बात सुन कर दीपक और रामू घर के लिए निकल गए। स्कूल से सारे बचे जा चुके थे सिर्फ संतोष को छोड कर। संतोष को स्कूल में खड़ा देख कर श्रीमती कौशिक उसके पास आ गई।
“तुम यहां क्या कर रहे हो। तुम्हें पता है स्कूल की छुट्टी हो गई है। चलो आओ यहां से, वर्ना थिक नहीं होगा तुम्हारे लिए।” श्रीमती कौशिक ने संतोष को धमकते हुए बोली। संतोष अभी कुछ कहता, की तबी एक तरह से आवाज आई, “है मैं ने रोका है मिसेज कौशिक।” राधिका को संतोष और अपनी तरह आते देखा।
“कही आपके साथ तो कोई बातिमिज़ी तो नहीं किस लड़के ने।” राधिका अपने पास आते हुए देख श्रीमती कौशिक ने कहा। राधिका ने अपनी बगीचा ना में हिला कर ये बात दी की जो वो कह रही है वैसा कुछ नहीं है। “तो फिर अपने ही क्यों रोका हुआ है।”
“मिसेज कौशिक आपको तो पता है। मैं यहां पर नई हूं। यहां पर नहीं मेरा कोई घर है जहां में रह सका।” राधिका ने श्रीमती कौशिक से कहा। मिसेज कौशिक ने भी अपना बगीचा हं में हिला दी। “मैं ने बचाओ से पुचा यहां कोई जग जहां मैं रह सकती हूं। तो मैं संतोष बताया की उसके पास एक घर है जहां पर में रह सकती हूं। मैं इसलिय है रोका था तकी मैं वो जहां देख कर तय कर मैं राह शक्ति हु की नहीं।”
“ओके, अगर आपको जग पसंद नहीं आई तो आप मेरे घर रह सकती है।” श्रीमती कौशिक ने कहा।
“ठीक है। श्रीमती कौशिक। चलो संतोष। और अलविदा श्रीमती कौशिक।” उसके बाद संतोष राधिका के साथ स्कूल से चला गया। वही मिसेज कौशिक को ये बात कुछ अच्छी नहीं लगी थी। फिर वो कुछ सोची हुई मीटिंग रूम की तरफ चल दी।
“अच्छा संतोष श्रीमती कौशिक तुमसे चिड़ती क्यू है।” राधिका ने संतोष से पुचा। संतोष राधिका की और देख, फिर उसे अपने श्रीमती कौशिक के बिच हुई साड़ी बात बता दी, आज के कांड को छोड़ के। संतोष की बात सुन कर राधिका हंसने लग गई। संतोष भी हंस दिया।
“वैसे तुम ने उसके साथ अच्छा किया। पर मेरी बात हमेश ध्यान रखना कभी किसी टीचर की कोई गलत होती है टू यूज मत बताना, क्योकी कुछ टीचर्स मिसेज कौशिक के जैसे होते हैं, जो इस बात को अपना मानता है। पर तुम मेरी गल्ती निकल सकते हैं। क्योकी मेरा मनाना है की, इसे आप कुछ सिखते हो।” राधिका ने बड़े ही प्यार से समझौता हुए बोली। सन्तोष को भी राधिका की बात समझ आ गई थी। ऐसे ही दोनो इधर उधार की बात करते हुए हम घर आ गए।
“मिस ये रहा, जहां आप आराम से रह सकती है। आपको कोई दीकत या परशानी नहीं होगी। मैं पापा से कह कर लाइट का भी बंदोबस्त कर दूंगा।” संतोष ने राधिका को घर दिखते हुए बोला, फिर गेट खोल कर और चल दिया। राधिका भी संतोष के पिचे पिचे चल दी।
“मिस ये है ड्राइंग रूम जहान पर आप अपने दोस्तों के साथ बैठा शक्ति है और खाना खा शक्ति है।” संतोष ने घर के अंदर परवेश करते हुए कहा। राधिका भी घर को अंदर से देख कर खुश हो गई क्योकी बहार से घर पेस्टर नहीं किया हुआ था। फिर संतोष एक तरह चलते हुए कहा, “मिस ये है किचन जहां पर खाना बनाना शक्ति है। पर आपको खाना बनाना कोई जरूरी नहीं है, क्योकी खाना में खुद अपने घर से ले आउंगा आपके लिए।”
“संतोष इसकी कोई जरुरत नहीं है। मैं खाना खुदा ही बना लुंगी।” राधिका ने कहा। “ये बताओ में नहूंगी कहा, और सुनूंगी किधर।”
“याहान मिस।” संतोष ने बेडरूम का दरवाजा का दरवाजा खोला हुआ बोला। राधिका ने जब और देखा तो कोई बनियां और लुंगी में सो रहा था। राधिका हमें आदमी को देख और संतोष की बात सुन कर शॉक्ड हो गई। संतोष राधिका को शॉक्ड में देख कर बोला, “क्या हुआ मिस। आप के चेहरे का रंग क्यू उड गया।”
“संतोष जरा अपने पिछे तो देखो।” राधिका की बात को सुन कर जब संतोष ने पिच देखा तो एक आदमी बिस्तर पर सोया हुआ था। हमें आदमी को देख कर संतोष और गया और इस्तेमाल जगने लगा।
“चाचा उठो चाची आपको बोला रही है।” संतोष की बात सुन वो आदमी उठा कर बैठा गया। और अपनी शर्ट पहंते हुए बोला, “तेरी चाची को चेन नहीं है, रात में सोने देती है ना दिन में, 24 घंटे छुट में खुजाली मची रहती है साली के।” राधिका उस आदमी की बात सुन उसका चेहरा ही शर्म से लाल हो गया था। जब वो रूम से बहार आया तो किसी औरत को देख कर हेयरन हो गया, क्योकी उसे आपने बात जोर से कही थी। “माफ करना मैडम मुझे नहीं पता था कि आप भी यहां पर है।” माफ़ी माँग वहाँ से चला गया।
“सॉरी मिस। मुझे नहीं पता था चाचा जी यहाँ सो रहे थे।” संतोष ने राधिका से माफ़ी मांगते हुए कहा। राधिका भी संतोष की बात को समझ बोली, “मुझे पता है, संतोष तुम ऐसा कुछ नहीं कर सकते। वैसा तुम्हारे चाचा थे।”
“नहीं मिस मेरे चाचा तो समय स्कूल में होंगे। ये तो रामू के पिता थे। वो क्या है ना, हमारे ही जमीन के बगल में उनका भी जमीन है। शायद वो फसल को देखने आए होंगे, फसल देखने के बाद यही पर सो गए होंगे।” संतोष ने कहा। संतोष की बात सुन राधिका इतना तो समझ गई थी की संतोष के घर वाले पढ़े लिखे लॉग द। “मिस ये बेडरूम है जहान पर आ तो शक्ति है, इस के साथ बाथरूम है।” संतोष ने बाथरूम का दरवाजा खोलते हुए दिखया। संतोष का घर देख राधिका उस बोली, “तुम्हारा ये घर तो शहर के घर की तरह बना हुआ है। बस बाहर से थोड़ी कमी है।”
“अच्छा मिस आप आराम किजिये में शाम को आप मिलाता हूं।” संतोष ने कहा। राधिका संतोष की और देख कर बोली, “ठीक है संतोष।” फिर संतोष वहां से चला गया। संतोष के जाने के बाद राधिका बेडरूम में जा कर अपना बैग खोल, कपड़ा निकल बाथरूम में फ्रेश होने चली गई। राधिका ने संतोष के जाने के बाद घर का दरवाजा बंद कर दिया था। तकी कोई अंदर ना आ जाए।
वही संतोष घर पाहुच कर अपनी मां को अपनी टीचर मिस राधिका के बारे में बता दिया था। संध्या भी ये जान कर खुश थी की संतोष ने अच्छा काम किया था आज। संध्या ने संतोष को ताजा होने को कहा और संतोष अपनी मां की बात सुन अपने कमरे में चला गया। संतोष कोई टाइम का पता ही नहीं चला, कितना समय हो गया था। जब वो फ्रेश हो कर बाथरूम से बहार आया और अपने कामरे में तंगी दीवाल घाड़ी की तरफ उसकी नजर गई तो उसे अपना मथा ही पिट लिया। क्योकी खादी में 3:30 बज रहे थे।
वही दीपक और रामू संतोष का इंतजार कर रहे थे, की वो अब आएगा। जब वो नहीं आया तो दीपक रामू को अपने साथ ले कर और चल गया। ये देखने की मिसेज कौशिक और प्रिंसिपल सर चुद रही थी ये नहीं। रामू और दीपक जब मीटिंग रूम के पास से गुजरे तो उन कुछ आवाज सुना दी।
“दीपक लगता है, प्रिंसिपल मिसेज कौशिक को इज रूम में छोड रहा है। चल जलदी देख कोई जगहा जहान से उन दोनो की चुदाई देख खातिर।” जब दोनो हमें कमरे के पास गए तो हमारे कमरे की खिड़की थोड़ी खुली हुई थी। दीपक और रामू खिड़की से अंदर देखा तो मिसेज कौशिक घोड़ी बनी थी और प्रिंसिपल पिचे से उसे चुन अपना लुंड दाल कर छोड रहा था। दीपक ने जल्दी से अपना फोन निकला उनकी छुडाई की वीडियो बनाने लग गया।
कोई 20 मिनट के बाद प्रिंसिपल सर मिसेज कौशिक के छुट से अपना लुंड निकला। मिसेज कौशिक ने बिना के पल गए प्रिंसिपल के लिंग को अपने मुह में ले कर चुसा। जब लुंड पूरी तरह साफ हो गया तो अपने मुह से निकला, मिसेज कौशिक कपड़े पहनने लग गई।
“दीपक काम हो गया है, निकल यहां से। कही चपरासी न गए।” रामू ने दीपक को कहा। दीपक को भी रामू की बात सही लगी। इसलिये वो रामू के साथ चला गया। दोनो जैसे ही स्कूल से बहार आए स्कूल का चपरासी गया।
“तुम दो यहां क्या कर रहे हो।” चपरासी ने उन्हे स्कूल के बहार निकलते हुए देख कर पुचा लिया।
“वो चाचा हम तो संतोष का यहां इंतजार कर रहे थे। हमने देख एक कुट्टा और गस गया तो हम आपको यहां पर देखा आप नहीं देखे तो हम हमें कटे को भागे और चल गए। निकलते हुए देख ली।” रामू ने कहा।
“अच्छा हुआ हम यहां और हमें कटे को भाग दिया। अगर प्रिंसिपल सर ने ये काम किया होता तो सोच आपके साथ किया होता।”
‘अच्छा अच्छा अच्छा है ठीक है। अब जाओ यहां से।” चपरासी ने रामू से कहा। रामू भी दीपक को साथ ले कर वहां से चला समलैंगिक। वही चपरासी मन में, ” साला खुद किसी मैडम को यहां रोक कर चुदाई करता है, और मुझे भागा देता है। साला कहता क्या मुझे मां नहीं चोद देता अगर मुझे कहता तो।”
“सर आपने तो आज मेरी हलत ही खराब कर दी। लगता है आज आपके कोई दावा खाई थी, जब आप इतनी देर तक मेरी लेटे रहे।” मिसेज कौशिक ने अपनी सीधी पहंते हुई बोली। प्रिंसिपल उसकी चाची को डिबेट हुए कहा, “तुम थिक कह रही हो। मैं आज कह ही खाई थी, अगर दावा नहीं ली होती तो तेरे ऊपर चढ़ते ही झड़ गया होता।”
“अच्छा जरा बताओगे वो भला क्यों।” मिसेज कौशिक ने अपने शादी का फाल बनाने के बाद अपने पेटीकोट के अंदर करते हुए बोली।
“अब तुझे क्या बातें मेरी रैंड, मिसेज राधिका खन्ना के चुची और उसकी बड़ी गंद देख कर मेरा तो बुरा हाल हो गया था। एक पहले काम थी क्या जो दुसरी आ गई।” प्रिंसिपल ने मिसेज कौशिक के निप्पल को कास के गलते कहा।
“आउच मार ही डालो क्या मुझे, एक पहले ही इतनी बेदर्दी से इनको मसाला है, और अभी लगे हुए हो।” मिसेज कौशिक अपने शादी का पल्लू थिक करते हुए बोली। फिर श्रीमती कौशिक अपने आपको प्रिंसिपल से अलग करते हुए गेट की और बढ़ गई।
“अच्छा सुन कर रविवार है। मिलना कर के स्कूल आ जाना। तेरी मस्त चुदाई करुंगा।” प्रिंसिपल ने अपने पंत के ऊपर से ही अपने लुंड को मसाला हुए बोले। मिसेज कौशिक प्रिंसिपल की बात सुन कर कहा, “स्कूल में नहीं, हम वही मिलेंगे जहां हर रविवार को मिलाते हैं।”
“ठिक, जैसी तेरी मर्जी।” प्रिंसिपल ने कहा और फिर दो कमरे से बाहर चले गए।संतोष को ये समझ आ चुका था। अब वहां जाने का कोई फैसला नहीं है। क्योकी टाइम बहुत हो चुका था। क्या लिए तैयार हो कर आला चला गया। जब पर उसकी मां और चाची खाने के टेबल पर बैठी हुई बात कर रही थी। संतोष अपने पास आता देख, संध्या रशोई में चली गई, और जब वापसी आई तो उसके हाथ में खाने की थाली थी, जिस्म चार रोटी, थोड़ा चावल, दो कटोरी में सब्जी और दाल थी। संध्या वो खाने की थाली ला कर संतोष के आगे खा दी।
“मां ये तो बहुत ज्यादा था। मैं इतना नहीं खा सकता।” संतोष ने खाने को देख कर कहा। संध्या ने उसे घुर कर देखा तो वह चुपचाप थाली से रोटी उठा, फिर एक निवल तोड़ सब्जी लग अपने मुह में दाल कर खाने लगा। फिर संतोष ने कुछ नहीं कहा, वह चुपचाप खाना खाने लगा गया। संध्या और कंचन बड़े ध्यान से संतोष को देख रही थी।
“बेटा तुम अब बड़े हो रहे हो। तुम्हारे शरीर को खुरक की जरूरत है। इस लिए तुम किसी किसी रोक तोक के ये सब खाना चाहिए। अगर तुम अपने हैं शारिर का ध्यान नहीं रखोगे तो तुम्हारे पास। से ना तुम्हारे लिए थिक होगा और न हमारे लिए।” कंचन ने संतोष को समझौता हुए कहा। संतोष भी अपनी चाची की बात बड़े ही ध्यान से सुन कर समाज ने कोशिश कर रहा था। आगर उस दिन से सब क्या हुआ है, जो उसके साथ सब ऐसा कर रहे हैं। ना उसकी बहनो ने उपयोग तांग किया और नहीं उसकी मां और चाची ने। सन्तोष चुपचाप सोचते हुए खान खा रहा था।
“तुम कोई जवाब नहीं दिया अपने चाची के बातो का। क्या वो गलत कह रही है, इस तरह से फिर से बैठा हो।” संध्या की आवाज़ ने संतोष को अपने सोच से बाहर निकल और कहा, “नहीं मां न आप गलत कह या कर शक्ति हो, न नहीं चाची। यहां तक मेरी बहन भी मेरे भले के लिए ही कुछ करती है।” संतोष ने कहा और अपने हाथ से चावल और सब्जी को मिला कर खाने लग गया।
“ठीक है। तुम खतम करो, मैं रशोई से कुछ ले कर आती हूं। इसे खत्म करने के बाद इस्तेमाल करना है।” संध्या अपनी बात कही और खादी हो कर रासोई की और चली गई। जब वो बहार आई तो उसके हाथ में एक गिलस था। संतोष अपना खाना खतम कर चुका था। और जैसे ही उसे अपने मुह को धो कर ऊपर देखा तो उसकी मां एक हाथ में एक बड़ा सा गिलस था। हमें गिलास को देख कर संतोष को रहा नहीं गया और उसे पुच ही लिया, “मां अब ये क्या है।”
“ये लो और खुद ही देखो ये क्या है।” संध्या ने हमें गिलास को संतोष की तरफ बढ़ते हुए बोली। संतोष ने जब हमें गिलास को ले कर देखा तो उसमें दूध था।
“मां अब ये दूध। मैं अभी तो खाना खाया और ये इतना दूध कैसे पी सकता हूं।” संतोष ने कहा।
“मैं ने कब कहा अभी पी। 5 मिनट के बाद पी लेना। पर ये तुम्हें पीना ही मिलेगा। आगर तुम्ने है नहीं पीया तो मैं तुम्हारे पापा से कह दूंगा।” संध्या अपनी बात कह कर उसे पास ही बैठ गई थी। सन्तोष के पास अब कोई चारा नहीं बचा था, हमें दूध को नुकसान करने के लिए। इस लिए संतोष ने बिना समय गया हम दूध कर पी कर खतम कर दिया।
“माँ मैं खेतो पर जा रहा हूँ। पिता जी भी आज शहर गए हैं। संतोष ने बिना नाम लिए उसने वो बात बता दी थी, जिस बात को संध्या भी अच्छी तरह जनता थी। प्रयोग याद आता है, की कैसे जब संतोष 8 साल का था, और उसके पति बीमार पड़े गए। कैसे उसके खेतो में फसल बरबाद कर दिया था, आज तक पता नहीं चला की उसकी फसल कैसे बरबाद हो गई थी का इस्तेमाल करें। “क्या हुआ मां, कहा खो गई। मैं जाऊं ना।”
“हां तू जा शाम जल्दी घर आ जाना।” संध्या ने कहा। संतोष उसके बाद वहां से चला गया। संतोष के जाते ही कंचन अपनी जेठानी से बोली, “दीदी आप क्या सोचा लग गई थी। और ये संतोष ऐसा क्यों कह रहा था।”
‘कंचन कुछ बात ऐसी है अगर किसी को ना पता चले तो ही अच्छी है और इस लिए तुम फिर कभी है में मुझे नहीं पूछूंगा।’ संध्या अपनी देवरानी को समझौता हुए कहा। दी. फिर दो जेठानी और देवरानी घर के काम में ला गई।
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“अरे सेल कहा रह गया था। अगर हम तेरा इंतजार करते तो आज कुछ नहीं हाथ आने वाला था।” दीपक ने कहा। संतोष दीपक और रामू को पल पर मिल गया था, जो अपने खेतो की तरह जा रहा था। दीपक ने रुकते हुए इस्तेमाल करो ये बात कही थी।
“यार दीपक मैं तुझे क्या कहु। मैं राधिका मैडम को अपना घर दिखा कर जल्दी ही वहां से निकलने वाला था। पर इस गंडू का बाप वहां पर कच्चे और बनियां में सोया हुआ था। बता मैं क्या करता।” संतोष ने कहा। दीपक ये सुन कर में दीया है। और कुछ सोचते हुए बोला, “इस के बाप को तुमने ही हमें हलत में देखा की राधिका मैम ने भी।”
“मवरी नज़र तो बाद में पहले राधिका मैम ने ही उन्हे देखा था। चलो छोड़ ये बताता क्या मिला तुझे।” संतोष ने दीपक से कहा। रामू ने अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा था, जैसे को अपने बाप के बारे में सब कुछ मालुम हो।
“ये देख।” दीपक ने अपने सेलफोन निकला एक वीडियो प्ले कर के दिया। संतोष हमें वीडियो को देखने लगा। जब वीडियो खतम हुई तो उसे कहा, “क्या मस्त छुडाई करता है यार ये प्रिंसिपल भी। ये साली चिल्ला तो ऐसी रही थी जैसे कोई रैंडी हो।”
“अब बता क्या करने वाला है।” दीपक ने कहा। संतोष उसके फोन में कुछ करने लग गया, थोड़े डर उसके फोन के साथ खेलने के बाद उसने दीपक को फोन इस्तेमाल वापस कर दिया।
“अभी तो कुछ नहीं करना है। कुछ दिन इंतजार कर फिर बताता है क्या करना है। अच्छा तुम दोनो घर जाओ। चाची कर पर इंतजार कर रही होगी, तुम दोनो, जहां तक मुझे लगता है तुमने खाना भी नहीं है। ” संतोष ने रामू की और देखते हुए कहा। रामू ने संतोष को अपनी और इस तरह देखते हुए, देख कर बोला, “सेल मेरी तराफ इस तरह क्यू देख रहा है तेरी नियत तो ठीक है ना।”
“सेल अपनी सोच अपने पास रख, और घर जा कर खाना खा ले। बिक्री तेरा चेहरा देख ऐसा लग रहा, पता नहीं कितने दिनों का भुखा हो। ले जा दीपक अपने साथ चुतियो को।” संतोष ने कहा। फिर दीपक और रामू वहा से चले गया।
थोड़ी दूर जाने के बाद रामू ने दीपक से कहा, “यार जरा वीडियो देख, हमें गंडू ने डिलीट तो नहीं कर दिया।” दीपक का रामू की बात सुन कर जब उसे वीडियो देखा तो नहीं था। “क्या हुआ नहीं है ना। मुझे पता था साला वो कुछ ऐसा ही करेगा।”
“यार कोई मैं हम वीडियो को कॉपी कर के किसी और फोल्डर में भी सेव कर रख है।” दीपक ने जल्दबाजी हुई कहा।
“सेल छुटिये वो तुझे पागल दिखता है क्या। सेल इतनी डेर अपनी मां नहीं चुड़वा रहा था फोन के साथ। उसे हमें भी डिलीट कर दिया होगा।” रामू ने फतकारते हुए बोला। जब दीपक ने हमें फोल्डर में देखा तो वीडियो डिलीट नहीं हुआ
“यार हम फोल्डर से वीडियो डिलीट नहीं हुई है।” दीपक ने खुश होते हुए बोला। रामू कुछ सोच बोला, “बिक्री एक बार प्ले कर के तो देख ले वही वीडियो है भी की नहीं।”
‘सेल मैं कोई प्ले वाले नहीं करने वाला। सेल इस वीडियो को देख पता नहीं कितनी बार लुंड हिला चुका है। चल जल्दी चल, नहीं तो घर मेरा बाप मेरी गंद मार लेगा। कोई बचने भी नहीं आएगा।” फिर वो दो चल गए।
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पिंकी चलेगी आज शाम को।” कमला ने पिंकी से पुचा। इस समय पिंकी कमला के घर आई थी। दोपहर के समय हो रहा था। कमला की मां और बड़ी बहन अपने अपने काम में सो रही थी। खेतो पर गया हुआ था।कमला पिंकी के साथ बिना कपड़ो की थी।
“साली मैं नहीं जा रही तेरे साथ। पिचाली बार देखा वेखा कुछ नहीं, मेरी बुरी मोटी जाति इतनी अलग।” पिंकी ने कमला के ऊपर को दबते हुए बोली।
“पिंकी तू ना में मत दबया कर। तेरे इस हरकत की वजह से मेरी चुत में जो आग लग जाती है न। बड़ी मुश्किल से बुझती है। तेरी ही वजाह से में रामू के आने वाला पता। साला वो कमल काम था मेरी चो को, कुट्टे को भी अपना ऊपर चढ़ा ली है।” कमला ने अपनी छुट के दाने को हलका हलका मालते हुए बोली। पिंकी कमला की बात सुन उसे अपनी दो उंगली उसकी छुट के और घुसा कर, और बहार करने लग गई। “आहा माँ छोड साली मेरी इस चुची को। आहा उउउइइइइइ माँ”,
“क्यू मजा आ रहा है ना। बोल तो निकल लू अपनी उंगली तेरी है छुट से।” पिंकी ने अपने हाथ की गति बढ़ते हुई बोली। कमला का जिस्म utezana से भर चला था। पिंकी के हमले से है। कमला पिंकी मन नहीं कर सकती थी, क्योकी कमला को पिंकी के द्वारा किया गया हर हरकत का उपयोग उतेजित करती थी।
“अच्छा बता चलेगी की नहीं मेरे साथ, आहा मां मैं गई।” अभी कमला के मुह से यही निकला था की पिंकी ने उसे निप्पल को काट लिया। जिस करन कमला के मुह से एक चिख निकल गई और उसका झटका (ऑर्गेज्म) रुक गया। “साली कुटिया कोई इस तरह करता है क्या। कितना तेज़ काटा है मेरी निप्पल को। देख खून निकल गई है।”
“साली रंद ये क्यू नहीं कह रही है की तू झड़ नहीं पाई।” पिंकी ने जल्दबाजी हुई बोली। फिर उसे अपना जिभ निकल कर जहान से खून निकल रहा था बातें लग गई। पिंकी के हमले के करन कमला का जिस्म फिर से उठना की लहर दौड़ गई। कमला पिंकी के इसी हरकत की वजह से है कदर पैदा हुई की उसकी छुट से रिशव सुरु हो गया।
“पिंकी प्लीज इस बार मुझे बिच में मत रखना, नहिइइ भी मैं पागल हो जाऊंगी।” कमला ने टूटी हुई सांसो से कहा। कमला में अब इतनी हिम्मत नहीं बची थी की वो कुछ कह खातिर। पिंकी ये बात अच्छी तरह से जनता थी की कब कमला को ओर्गामा होने दी थी और कब नहीं। कमला को अपने बस में करने ले लिए।
“कमला अगर तुझे झटका है तो बोल, मल्किन मुझे जाने दिजिए। मैं आपकी गुलाम और कुटिया हूं।” पिंकी ने कहा। कमला काम आग के उच्च पर पाहुच गई थी, अपने ऑर्गेज्म पाने के लिए अभी कुछ भी कर शक्ति थी। कमला ने वही कही जो पिंकी इस्तेमाल कहने को कही थी
“आहा इस्सिइइइआटा आआआआह्ह्ह उइउउम्म्म माँ माँइइइंन गई।” कमला के चिख के साथ बिस्तर पर गिर गई। कमाल की छुट से काफ़ी मात्रा में पानी छोटा था। ब्यातर के देख कर ऐसा लग रहा था कि उसे लूट दिया हो। कुछ पल के बाद पिंकी अपने हाथ को कमला के मुह के पास आई, कमाल बिना एक पल गए उसके हाथ को चैट लग गई। कमला पिंकी के हाथ को तब तक चट्टी रही जब तक उसके हाथ पर लगा हुआ उसकी छुट का पानी साफ नहीं हो गया।
“पिंकी तुमने बताया नहीं चलेगा मेरे साथ।” कमला ने कहा। कोई 10 मिनट के अंतराल में कमला को सांसो को संभलने में।
“साली मैं तेरे साथ क्यों जाओ। कुछ तो बनाना है वहा पर जा कर, न ही मुझे कुछ देखने को मिलता है ठीक से। हमारे दिन तो ही हो गई थी मेरा साथ, तुझे पता भी है मेरे साथ क्या हुआ। ” पिंकी ने कहा। कमला समझ गई थी की उसके साथ ऐसा कुछ हुआ था जो इस्तेमाल नहीं पता।
“क्या हुआ था तेरे साथ। तूने मुझे बताया भी नहीं।” कमला ने बोली। पिंकी गहरी संस ली और छोदते हुए बोली, “मुझसे लड़के ने पिच पकड़ा लिया था, उसका लुंड मेरी कमल बोर के ठोकर मार रहा था, पहले तो धीरे-धीरे मार रहा था और मुझे भी मजा आया था। थी की अगर मैं पैंटी नहीं पानी हुई होती है उसका लुंड बोर में होता।” हमें दिन को याद कर पिंकी जिस्म ही काफ गया। अभी उपयोग ऐसा लगा रहा था की अभी वो उसके पीछे से कर रहा हो।
“क्या तू ने उसका चेहरा देखा था।” कमला ने कहा।
“नहीं मैं ने उसका चेहरा नहीं देखा था। हां पर मुझे मालुम है वो तेरी हम रंडी के औलाद के साथ आया था।” पिंकी ने कहा, फिर कुछ सोचते हुए बोली, “तुझे विश्वास नहीं होगा यार। हमें लड़कों का लुंड मोटा और लंबा बहुत था। अगर किसी औरत के और भी एक बार चला गया ना, उसे भी चिख निकल दे।”
“तुझे कैसे पता की उसका लुंड मोटा और लंबा था। क्या तूने अपने हाथ में लिया था।” कमला ने कुछ सोचते हुए बोली।
“हाथ में तो नहीं पर उसके को छू जरूर था। उसकी लंबी और मोटाई इस लिए पता पर रही हू क्योकी उसे लुंड ढकका मरते समय 3 इंच बहार तक आ जाता था। अब तुम सोच मेरी गंद के आला 3 इंच बहार आना कोई ममौली नहीं हो सकती।”
कमला पिंकी की बात को सुन कर कुछ सोच में पैड गे। याद आया की रामू ने तो कहा था की संतोष का लुंड 4 इंच लंबा और 1 इंच मोटा है। जहां तक मुझे याद है रामू के साथ तो सिर्फ संतोष ही आया था। शायद पिंकी हमें हमले की वजह से डर गई होगी इस लिए इस्तेमाल से पता नहीं चला होगा। सच में पागल है ये पिंकी भी। “ओए किस सोच में डब गई। क्या तू हमें लड़कों को जनता है, वो कौन था।” पिंकी ने कमला को हिलाते हुए कहा।
“नहीं यार मैं उसे नहीं जनता, और नहीं मुझे उसके बारे में रामू ने कुछ पता था।” कमला ने कहा। “तू चल रही है की नहीं।”
‘सॉरी यार में नहीं जाने वाली अब तेरे साथ। और हां जब तू रामू से मिले टू यूज जरूर पुचना वो लडका कौन था। ठीक है। अब मैं चलती ही 5 बजने जा रहे हैं। मां घर पर मेरा इंतजार कर रही होगी।” पिंकी ने कहा और चली गई। कमला कुछ सोचने लग गई।कमला पिंकी की बात को सुन कर कुछ सोच में पड़ गई। याद आया की रामू ने तो कहा था की संतोष का लुंड 4 इंच लंबा और 1 इंच मोटा है। जहां तक मुझे याद है रामू के साथ तो सिर्फ संतोष ही आया था। शायद पिंकी हमें हमले की वजह से डर गई होगी इस लिए इस्तेमाल से पता नहीं चला होगा। सच में पागल है ये पिंकी भी। “ओए किस सोच में डब गई। क्या तू हमें लड़कों को जनता है, कौन था वो?” पिंकी ने कमला को हिलाते हुए बोली।
“नहीं यार मैं उसे नहीं जनता, और नहीं मुझे उसके बारे में रामू ने कुछ पता था।” कमला ने कहा। “तू चल रही है की नहीं।”
‘सॉरी यार मैं नहीं जाने वाली अब तेरे साथ। और हां जब तू रामू से मिले टू यूज जरूर पुचना वो लडका कौन था। ठीक है। अब मैं चलती हूं, 5 बजने जा रहे हैं। माँ घर पर मेरा इंतजार कर रही होगी।” पिंकी ने कहा और वहा चली गई। कमला कुछ सोचने लग गई।
अब अगे
संतोष जब अपने खेत पर पाहुचा तो उसे देखा की एक लड़की उसके खेत के तरफ जा रही थी। संतोष ने सोच शायद सोच (पोटी) करने जा रही हो। क्या लिए संतोष ने हमें लड़की को नहीं टोका है। खेत के पास ही आम का बगीचा था, जो 1.5 ऐकड़ में फेल हुआ था। संतोष उस बगीचे में चला गया। फिर वह एक पेड़ के पास बैठा गया। संतोष को बैठे हुए अभी कोई 5 मिनट ही हुआ था की एक लड़का आया और मेरी खेत में चल गया, वह लड़का भी हमें लड़की के तरफ ही चला गया।
“साला ये क्या मजारा है। अभी वो लड़की गई और अभी ये लड़का। लगता है दाल में कुछ काला है।” संतोष धीरे बुबुदया। फिर संतोष ने 5 मिनट इंतजार किया। जब उन दोनो में से कोई भी नहीं आया तो संतोष उठा और हमें तारफ चल दिया।
वो दो आपने ही मस्ती में लगे हुए थे, उन्हे तो बात का भी डर नहीं था की कोई आज जाएगा। उन्हे तो किसी के आने की खबर था न हुई, कोई उनकी रासलीला देख रहा था। संतोष ने देखा की वो लड़की हमारे लड़कों के लुंड को अपने मुह में ले कर चूस रही थी, जैसे कोई लॉलीपॉप हो।
“कौन है बिक्री हो। मेरे खेत में क्या कर रहा है। और तेरे साथ ये लड़की कौन है।” संतोष ने धमकते हुए कहा। संतोष की आवाज सुन दोनो की हलत ही खराब हो गई। वाह लडका तो झट से अपना लुंड उस लड़की के मुह से निकला और नौ दो ग्यारा हो गया। अब वहां पर सिरफ वो लड़की खादी थी जो बिलकुल नंगी थी। संतोष ने उसका चेहरा देखा तो उसके होस उद गए।
“ओह तू है, क्या खुशी है तू तो, जैसी कोई रैंडी हो। चल आज तेरे घर पर तेरे नंगे में बता रहा हूं। चाची देख तेरी बेटी दिन दहाड़े क्या गुल खिला रही थी।” संतोष ने कहा, और अब खराब कर उसके कपड़े उठा लिया। उस लड़की ने जैसे संतोष के हाथ में अपने कपड़े देखे तो वह बहुत ही डर गई।
“भाई प्लीज ये कपडे मुझे दे दो। मैं घर कैसे जाऊंगी, बिना कपड़ो के।” उस लड़की ने संतोष को रोते हुए बोली और उसके जोड़ी पाक ली।
“देख रेखा, ना तो मैं तेरा भाई नहीं तू मेरी बहन है। राही बात कपड़े की तो ये कपड़े तेरी मां ही लेकर जाएगी मेरे पास से। भूल गई उस दिन की बात को, तेरी मां ने मेरी मां को, सिर्फ तेरी वजह से। क्यू रे मैं ने हमें दिन कब तुझे पेश करता हुआ देखा था, जो तूने अपनी मां से ये कहा दिया, की मैं तुझे पेश करता हूं देख रहा था। साली खुद तो हम कमल से थी और राही लगा दिया मेरा।” संतोष ने अपनी बात पूरी की और रेखा को जोड़े से ढका दे दिया। “भाग साली मेरी खेत से। और जा कर अपनी मां से कह दे मैं ने तेरे कपड़े लिए हैं।” संतोष खेत बहार चल दिया। रेखा ने जब ये देखा की संतोष उसके कपडे ले कर जा रहा था तो वो दौड़ कर उसके आगे जा कर खादी हो गई।
“देख संतोष, चाह तो तू भी मेरे साथ वो सब कर ले जो वो लड़का करने आया था। मैं तुझे मना नहीं करुगी पर ये कपड़े मुझे दे दे।” रेखा की बात सुन संतोष खुश हो गया। संतोष ने जो कसम कहीं थी उस दिन, आज वो पुरा हो रहा था।
“ठीक है। चल फिर मेरे साथ। कपड़ा भी तुझे तब मिलेगा, जब मैं तुझे अच्छी तरह छोड दूंगा।”संतोष ने रेखा से कहा। उसके बाद संतोष एक तारफ चल दिया, और रेखा भी नंगी ही उसके पीछे हो ली। संतोष अपने खेतो से होते हुए अपने आम के बगीचे में आया, रेखा भी उसके पीछे पिचे चल रही थी। आम के बगीचे को देखा कर इस्तेमाल लगा संतोष इस्तेमाल याही किसी पेड़ के पास ले जा कर छोडेगा। जब संतोष पिचे मुदा तो देखा रेखा एक पेड़ के पास खादी थी, और किसी सोच में दुबी हुई थी। “ओए रैंडी तुझे यहां नहीं चोदने वाला, चल मेरे पिचे चुपचप।”
संतोष की आवाज़ सुन कर रेखा अपने सोच से बाहर आई, और उसके पीछे हो ली। संतोष अपने बगीचे से निकल कर जगल की तरह हो लिया, जो ठिक उसके बगेचे से लग कर था। संतोह रेखा को लेकर उसी खंडहार में आ गया। जब वो अकेला यहां आया था।
“ये तू मुझे कह ले आ गया।” रेखा अपने आपको खंडहर में देख कर घबड़ा गई थी। रेखा को दार लगाने लगा था, कहीं संतोष उपयोग मार ना दे, उस दिन की वजह से। संतोष उसके मन के भाव को समझ गया था और रेखा को शांत करने ले लिया बोला, “मैं तुम्हें मारुगा नहीं। मैं तो तुम्हें यहां है लिया आलय हू, तकी तुझे अच्छी तरह छोड सकु।” चल हमें दीवाल को पाकर।
संतोष की बात को सुनाने के बाद रेखा बिलकुल शांत हो गई थी। रेखा दीवाल को पक्का कर झुक गई। संतोष उसके पास गया और उसके जोड़े को फेल दिया दिया। जैसे ही संतोष ने ये किया, रेखा की छूत और गंद के छेद खुल कर सामने आ गया। संतोष ने रेखा की छुट में अपनी उंगली दाल, और बाहर करने लगा गया।
“तेरी छुट तो बड़ी टाइट है। लगता नहीं तू ज्यादा लोगो से चुड़ी है। तेरी गंद का छेड़ दो बहुत ही तंग देख रहा है।” संतोष ने अपनी हाथ की गति बढ़ते हुए बोला। रेखा भी संतोष के किए जा रहे हैं हरकेत के कारण से मस्त हो गई थी और अपनी गंद पिचे ढकेल रही थी।
“आआह्ह्ह्ह मां तुम थिक सोच रहे हूडू आआ उइइइइइ मैं सिरफ दो लोगो से ही चूड़ी हूं। रेखा ने उतेजाना के मार लद्दाती हुई आवाज में बोली। संतोष रेखा की बात सुन कर खुश हो गया की आज एक छुट मिलने वाली थी, जो सिरफ दो लोगो से ही चुड़ी थी।
“अच्छा ये बताता वो दो कौन है।” संतोष ने कहा। रेखा संतोष के बात को सुन कर मस्ती में अपनी गंद पिचे ढकेलते हुए बोली, “एक को तुमने देखा ही लिया था इस्तेमाल दिन। और आ रहा है उसका नाम जानते ही हूं।” अब रेखा ने इतना ही कहा था की उसकी छुट से पानी की धार बह निकली। देख कर कोई भी यही कहता, की वह मूट रही थी। संतोष ने छुट में उंगली करते हुए ही अपनी पंत और अंडरवियर उतर कर एक तरह रख दी थी। संतोष सिरफ शर्ट में ही उसके पीछे खड़ा था
संतोष का लुंड पूरी तरह खड़ा हो गया था। संतोष भी उत्जित था, पर उसे खुद पर कबू रखा था। संतोष ने रेखा की कमर को पकड लिया, जब वो झड़ रही थी। संतोष ने बिचे इस्तेमाल अपने से सात लिया था। संतोष का लुंड उसकी छुट के रस से पुरा भीगा था। संतोष उसे बड़े उठा को अपने हाथो में पक्का लिया और धीरे-धीरे दबाने लगा था।
थोड़े देर बाद रेखा फिर से उसी रूप में आ गई थी, जिस रूप में पहले थी। रेखा के मुह से एक बार फिर से छात्ररिया निकलना सुरु हो गई थी। “संतोष अब मुझे और बरदस्त नहीं हो रहा। कृपया अपने लुंड को मेरी छुट में डाला कर मुझे ठंडा कर दो।” रेखा ने अपने सांसो को कबू करते हुए बोली। संतोष उसकी बात सुन कर मुस्कान दिया।
“ठीक है। पर जरा हमें आदमी का नाम तो बता जिसे तेरी छुट को सील को तोड़ा था।” संतोष ने अपने लुंड को उसकी छुट के छेद पर रखे हुए बोला। रेखा अब सोच में पड़ गई थी की कैसे उसका नाम बता दे। संतोष रेखा को चुप देख कर हलक सा ढाका दिया और उसके लुंड के सुपड़े का हलक सा भाग और चला गया। संतोष ने फिर से अपने लुंड को बहार निकला लिया। ऐसे ही संतोष करता रहा, जब तक रेखा बाईचेन नहीं हो गई।
“कृपया संतोष अपना लुंड मेरी छुट में दाल दो। मैं और बरदस्त नहीं कर सकती।” रेखा ने संतोष के आगे गिद्धिदते हुए कहने लगी।
“तुम्हे सिरफ उसका नाम बताना है, जिस तेरी सील तोदी थी। फिर ये डंडा तुम्हारे अंदर। और जब तक उसका नाम नहीं जान लेता मैं ऐसा ही करता रहूंगा। और हां तुझे नंगे झड़ने भी नहीं दूंगा।” संतोष अपने कर में लग गया। रेखा के पास अब कोई चारा नहीं था। हमें आदमी का नाम बताने के सिवा।
“ठीक है। तुम उसका नाम ही जनाना चाहते हो ना। तो सुनो उसका नाम। जिस मेरी सील तोदी और कोई नहीं मेरा बाप था। अब मैं उसके आगे कुछ नहीं बताऊंगी।” रेखा ने बड़े ही मुश्किल से अपने बाप को बताया था, रेखा की आंखों में हम पल को याद कर के आसन भी आ गए थे। जिस रेखा ने अपने हाथ से पोच लिया।
“क्या बात है। साली रंदी तेरी मां मुझे और मेरे मां को गली दे रही थी। यहां उसकी बेटी अपने बाप से चूड़ा रही थी। चल छोड़ मैं तेरी प्यास बुझा देता हूं।” संतोष ने इसी के साथ जोर का धक्का मार दिया। संतोष का आधा लुंड रेखा की छुट में चला गया। और रेखा के मुह से एक दर्द भरी चिखा उस खंडहार में गुंज गई। रेखा की छुट से खून भी निकल कर संतोष के लुंड पर लग गया था।
आगर रेखा पहले से चुड़ी नहीं होती तो आज संतोष के लुंड अपने छुट में लेटे ही बेहोश हो गई होती। रेखा को दर्द बहुत ही ज्यादा हो रहा था। पर उसे खुद के दर्द को कबू करने की बहुत कोशिश की, और जब दर्द बरदस्त से बहार हो गया तो रोने लग गई। संतोष को जब अपने लुंड के ऊपर कुछ गरम सा एहसास हुआ। फिर संतोष ने हलका सा अपने लुंड को बहार निकल कर देखा तो हम पर खून लगा हुआ था “संतोष प्लीज जल्दी से अपना लुंड मेरी छुट से निकल लो। मुझे बरदाश्त नहीं कर पा रही। आहा मां प्लीजी मैं आ गया।” रेखा ने संतोष के आए मिन्नत करते हुए बोली।
“तुझे कुछ नहीं होगा जानेमन। तू तो ऐसे बोल रही है। जैसे पहली बार ले रही है। तेरे बाप ने जब अपना लुंड डाला होगा, तबी तो दर्द हुआ होगा। आज थोड़ा सा और से ले।” संतोष ने कहा और वापस से अपना लुंड उसकी छुट में दाल कर छोडने लग गया। रेखा अपने दर्द को बरदास्त करते हुए हुए संतोष के ढकको को झेलती रही। संतोष पहली बार किसी लड़की को छोड रहा था वह अपने ही धुन में रेखा को चोदने में लगा था।
रेखा अपने दर्द को बरदाश्त करने में लगी थी। वही संतोष अपनी कसम पूरी करने में लगा हुआ था। संतोष ने अभी तक अपना पूरा लुंड रेखा की छुट में नहीं डाला हुआ था। 10 मिनट के बाद रेखा की छुट में संतोष के लुंड के लिए जग बना गई। रेखा संतोष के ढक्को का भूलभुलैया ले रही थी। आब उसके मुह से दर्द और भूलभुलैया की सिसकारी निकल रही थी जो वातवरन को और काम बना रही थी।
“आआआह्ह्ह आआआआआआआआ मां आआ आ रहा है। उइइइइआ आआह मां और तेज और जोर से ढाके लगाओ। मैं झंडे के बहुत ही आ और आ और ऐसे आया हूं।” रेखा चिलये जा रही थी। रेखा को अब संतोष के ढक्को से बहुत मजा आ रहा था संतोष उसकी कमर पक्का कर ढकके लगाये जा रहा था।
“आआस माँ माँ 3 गई” रेखा ने एक चिख के साथ बोली। संतोष ने भी मोका देख कर एक जोर का धक्का मार अपना पुरा लुंड रेखा की छुट के अंदर दाल दिया। अभी रेखा थिक से झरी भी नहीं थी की पुरा लुंड और जाने की वजह से उसका झटका बिच में ही रुक गया और एक दर्द भारी चिख उसके मुह से निकल गई।
“आहा माँ मर गई आआ बिक्री हरामी कम से कम मुझे झड़ तो लेने देता है” रेखा ने गुसे में संतोष को गली देते हुई बोली। रेखा ने अपने दर्द को बरदाश्त कर लिया था। संतोष रेखा की गली सुन कर गुसे में आ गया और बोला, “साली रंदी की औलाद मुझे गली दे रही है। तुझे आज बताता हूं गली देने का क्या अंजम होता है।” संतोष ने रेखा की छुट के और अपने लुंड ऐसे पिलाने लग गया जैसा कोई मशीन किसी में छेद में जा रही हो। अब रेखा की हलत खराब हो गई थी। पुर संतोष ने बिना एक पल गवये उपयोग जब तक छोडता रहा था, जब तक रुकने की भीख नहीं मांगे लग गई।
“आह माँ संतोष प्लीज मेरे छुट में से अपना लुंड निकल लो। मैं और तुम्हें नहीं सेह सक्ती हूं। मेरी छुट में दर्द होने लगा है। तुम इस स्थिति में मुझे एक घंटे से छोड़ रहा हूं। ये मुझे नहीं मालुम। और तुम हो की झड़ने का नाम ही नहीं ले रहे हो।” रेखा ने रोते हुए कहा। रेखा की बात बिलकुल सच थी संतोष प्रयोग 1 घंटे छोड रहा था। और रेखा 10 12 बार झड़ गई थी। पर संतोष अभी तक नहीं झड़ा था।
“बस मेरी जान मैं भी आने वाला हूं।” संतोष ने रेखा को चुची को जोर से दबते हुए बोला। पर संतोष ने अपने ढक्को की स्पीड पहले से डबल कर दी थी। रेखा एक फिरसे गरम हुई और झड़ भी गई। रेखा का ये 13 बार हो चुका था। अब रेखा संतोष के ढक्को के कारण से रोने लग गई थी क्योकी उसकी छुट में जालान होने लग गया था। वही संतोष अपना राखी शॉर्ट मार्टे हुए रेखा की छुट के अंदर ही अपना माल भरने लग गया। रेखा भी संतोष के वीर्य को अपनी छुट के और महसूस कर के एक बार और झड़ गई।
संतोष ने अपना लुंड उसकी छुट से निकला एक तरह खड़ा हो गया। और जैसे ही संतोष ने रेखा को छोटा वही वही बैठा गई। और पेशाब करने लग गई।
संतोष पेशब करते हुए बड़े ध्यान से देख रहा था का इस्तेमाल करते हैं। उसे आज पहली बार किसी लड़की को अपने समाने है पेशाब करते हुए हुए देख रहा था। संतोष को ये दृष्टि बहुत ही लुभ रहा था।
संतोष एक तरफ बैठा और आराम करने लग गया। कोई 20 मिनट के बाद रेखा उठी और अपने कपड़े पहनने लग गई जो उसके पास में रेखे हुई थी। वही संतोष अपने कपड़े पहनने कर एक तरह चला गया था। रेखा ने संतोष की और देखा तो वो पर नहीं था, खुद को अकेला पा कर रेखा दार गई थी रेखा ने जल्दी से कपड़े पहनने और संतोष को आवाज लगाने लग गई। 2 मिनट के बाद संतोष आया तो उसके हाथ में 4-5 अनार थे।
“ये लो रेखा घर जा कर खा लेना। तुम्हारे तकत मिलेगी।” संतोष ने 2 अनार उसे और बड़े होते हुए कहा। फिर सहारा दे कर हमें जंगल से बहार ले आया। अपने आम के बगीचे में छोड अपने घर चला गया का प्रयोग करें। रेखा बड़ी मुश्किल से अपने घर की और चल दी। वह अपने जोड़े को फेला कर चल रही थी। शाम के कोई 7 बज रहा था। अंधेरा होने की वजह से उसकी और किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। ऐसे चलते हैं रेखा अपने घर चली गई। जब रेखा घर पाहुची तो आंगन में कोई नहीं था। जो उससे पुच खातिर की क्या हुआ। रेखा चुप चाप अपने रूम चली गई। बिस्तर पर चलो गई। पता नहीं चला कब और आ गई का प्रयोग करें।
वही संतोष घर पाहुचा तो आंगन में ही उसकी मां और चाची मिल गई। अभी वो दो कुछ कहती है संतोष अनार को दिया और अपने रूम में चला गया। संध्या और कंचन बस उपयोग देखता रह गई।
“दीदी आज तो हमारे लिए अनार ले कर आया है। देखो ना कितना लाल और बड़े हैं। ऐसा आना तो बाजार में भी नहीं मिला।” कंचन ने अपनी जेठानी बोली।
“हां तू ठीक कह रही है। चल अंदर रख और खाने की तयारी कर है।” संध्या ने कहा और रशोई घर में चली गई। कंचन भी अपने जेठानी के पिचे हो ली।