मेरा घर और मैं अध्याय 6
राधिका झडने के बाद वैसे बिस्तर पर पड़ी रही। पता ही नहीं चला की कब उसकी आंख लग गई का इस्तेमाल करें। आगर समय कोई राधिका कोई देखता है तो खड़े खड़े झड़ जाता है क्योकी राधिका की छुट के होठ पूरी तरह फेल हुए और उसके अंदर का लाल रंग का छेद साफ दिख रहा था। हमारे छेद को देख ऐसा लग रहा था की मुश्किल से 3 बार ही राधिका चूड़ी हो।
शाम के 4 बजे राधिका की आंख खुल। वो भी तब जब उसका फोन बजने लगा। राधिका ने आधा खुली आंखों से अपने फोन की और देखा और अपना हाथ बढ़ा कर इस्तेमाल किया। अपने कान पर लगा ली। जैसे ही उस तरह से आवाज सुनी तो उससे मुह से एक ही शब्द निकला, “क्या? बस में आधे घंटे में पाहुच रही हूं।” राधिका जल्दी से तयार हुई और घर को लॉक किया और अपनी कार ले कर निकल गई।
खाना खाने बाद संध्या ने संतोष को हॉल में बैठने के लिए बोल दिया, जब तक वह बरतन धोती। संतोष भी अपनी मां की बात मान कर वही हॉल में बैठा और टीवी ऑन कर के देखने लग गया। आला सिरफ 2 हाय लोग रहे गए थे, एक संध्या और दसारी कंचन, बाकी सब अपने में जा चुकी थी।
“दीदी आज दिन से मेरी बोर पानी छोड़े जा रही है। आपको विश्वास नहीं होगा की मैं ने दिन भर अपने 3 पैंटी बदल दिए हैं। अब ये चौथी पैंटी भी गिली हो गई है।” कंचन ने एक बार्टन को धोते हुए अपनी जेठानी से ये बात कही। संध्या भी ये सुन कर मस्कुराते हुए इस्तेमाल देखने लगी और एक थाली को जो धोया हुआ था एक सुखे कपड़ों से साफ करते हुए बोली, “लगता है मेरी देवरानी कुछ ज्यादा ही कामुक हो गई है और इस्तेमाल एक जबर्दस्त है। तो देवर जी से कह देती हूं की वह तुम्हारे रात भर सोने न दे, जब तक तुम्हारी बोर का भोसड़ा न बन जाए।”
“दीदी इतना बांध नहीं आपके देवर में की वह मेरी बोर का भोसड़ा बना दे। आज भी मेरी योनि ऐसी लगती है जैसी कुंवारी हो, 2 बच्चों के बवजूद भी। आपके देवर वैसा ही 10 मिनट ज्यादा नहीं टिक पाता है।” कंचन ने हंसते हुए बोली, संध्या ये सुन कर हेयरन हो गई की कंचन की योनि आज भी कुमारी जैसी है। और उसका देवर अपनी बीवी को ठीक से चौद भी नहीं पता अब। “किस सोच में डब गई दीदी। कहीं जेठ जी की याद तो नहीं आ रही है।”
“अरे मैं उनके नंगे में नहीं सोच रही हूं। मैं तो ये सोच रही हूं कि अभी उम्र ही क्या है। जो तुझे थिक से ठंडा नहीं कर पाटे। क्या देवर जी पहले भी ऐसे ही जैसे अब है।” संध्या ने एक अलग ही राग थप्पड़ दिया था कंचन के सामने। अब कंचन को भी लगा था वही सच्ची संध्या के सामने ना आ जाए।
“क्या दीदी आपके देवर जी पहले ऐसे नहीं द पहले तो मेरी बहुत अच्छी तरह से लेते हैं, कुछ साल से टिटि-फिश हो गए हैं। अच्छा दीदी जेठ जी तो आपको छोडते नहीं होंगे रात में।” कंचन ने संध्या को ही लापेट लिया अपनी बातो में। संध्या भी मुस्कुराते हुए बोली, “जैसा तेरा हाल है वैसा ही मेरा हाल है। अब उनके बस की नहीं रही मुझे ठंडा कर के लिए। मुझे तो खुद अपने आप ठंडा करना पड़ा है।”
ऐसे ही बात करते हुए, दोनो ने बरतन साफ कर लिए। उसके बाद संध्या जूस का गिलास फ्रिज से निकल कर हॉल में आ गई और वही कंचन अपने काम में चली गई। पर जाने से पहले संध्या ने कहा दिया था की जो पैंटी और ब्रा लायी थी, कल पहन कर दिन में दिखेंगी का प्रयोग करें। अब हॉल में सिर्फ संध्या और संतोष ही। संतोष ने हॉलीवुड फिल्म देख रहा था जब संध्या वहा पाई।
“बेटा ये ले, सारा पी कर खतम कर।” संध्या ने जूस का गिलास संतोष की तरफ बढ़ते हुए बोली। संतोष ने एक बार अपनी मां की तरफ देखा जो एक रात में उसके पास बैठी थी और उस रात से उसके लिए और कोमल उसे साफ दिख रहे थे। संतोष अपनी मां से जूस लिया और अपनी मां की तरफ देखते हुए जूस को पीने लगा।
“मां ये लो मैं पी लिया है। अब और कोई काम तो नहीं है मुझसे।” संतोष ने खाली गिलस अपनी मां की तरफ बढ़ते हुए ये बात कहा था। संध्या भी मुस्कुराते हुए बोली, “बेटा कल स्कूल से आने के बाद तुम्हारे साथ चलना है।”
“ठीक है मां, कौन जा रहा है अपने साथ और कहां पर।” संतोषी ने अपनी मां से जाने की इच्छा से पुचा की उन्हे कहा जाना है। संध्या ने बड़े प्यार से अपने बेटे को गले लगाय और बोली, “बेटा ये एक सरप्राइज है। ये तुम्हारे कल वह जा कर ही पता चलेगा।” और कास के गले लगा लिया, जिस कारण से उसके कथोर और कोमल स्तान संतोष के साइन में दब गए। इस्का असर ये हुआ की संतोष का नागराज खड़ा होने लगा और अपने लिए गुफा की तलाश करने लगा। संतोष के लिंग का एहसास संध्या को भी हो गया था, क्योकी वह उसके योनि से होते हुए उसके कभी से जा लगा। संध्या के मुह से के आहा निकला गई।
“क्या हुआ माँ?” संतोष ने जब अपनी मां के मुह से आह की आवाज सुना तो पुचा। संध्या अपने बेटे के होठ पर अपने होठ रख कर चुम लिया, ये चुम्मने बस कुछ सेकंड के लिए थे। पर इस्का एहसास दोनो को कारा गया। जहां एक तरह संध्या की योनि रोने लग गई थी वही दुसरी तारफ संतोष का कामदंड से कुछ बुंदे विर्या का निकला कर उसके अंडरवियर को भीगो दिए थे। संध्या ने जलदी से अपने आप पर कबू की और बोली, “कुछ नहीं बेटा। अच्छा तुम अब जा कर सो जाओ कल तुम स्कूल भी जाना है।”
“ठिक है माँ।” संतोष संध्या के गले से अलग हो गया। पर जैसे ही संतोष अलग हुआ संध्या की नजर उसके शॉर्ट पर चली गई, जहां पर उपयोग के विशाल और मोटा अजीब नजर आया, जो संतोष के शॉर्ट के अंदर छिपा हुआ था। हमारे सामने देख कर संध्या के आंखों में चमक आ गई।
“अच्छा मैं चली सोने, तुम भी टीवी बैंड कर के सोने जाओ।” संध्या अपने बेटे से बोली, और पिचे मिट्टी कर अपने कमरे की और चल दी। वही संतोष की नज़र अपनी माँ के मदमस्त और बड़ी से गंद पर टिक गई। संध्या अपने कुल्हो को बड़े ही अदा के साथ मटकाते हुए चली जा रही थी। संतोष हमें बड़ी गंद को तक देखता रहा जब तक वह अपने रूम में न चली गई।
वही संध्या अपने मन में सोचते हुए जा रही थी, “हाय कितना बड़ा और मोटा लिंग है संतोष का। जींस में तो सही से पता भी नहीं चल रहा था जब मैं ने बाजार में देखा था। अब तो और भी बड़ा दिख रहा था। अगर गलत से भी मेरी छूत में चला गया तो मार ही जाऊंगी, मेरी छू का तो सत्यानास ही कर देगा। संध्या की छुट से जो पानी निकल रहा था, वह उसकी पूरी पैंटी को भीगो दिया था। और जब अपने रूम पाहुची तो देखा रमेश सो चुका था। संध्या ने अपनी नाइटी निकल कर एक तरह से रख दी और बिस्तर पर अपने जोड़ी फेला कर, जब अपनी पैंटी को देखा तो उसका मुह खुला का खुला रह गया, क्योकी उसकी पैंटी पूरी भीगी थी और ऐसा लग ने उस दिया था।
संध्या ने अपनी पैंटी निकल कर एक तरह से रख दी और अपनी छुट में ऐसी दाल दी। फिर अपनी उंगली को और बाहर करने लग गई और संध्या के मुह से आआआह उउउउ आआ iiiइम्मम्म की आवाज निकल कर रूम में फेल हो गई। संध्या ने अपना हाथ की गति बढ़ा दी, और अपने एक हाथ से आपकी कोमल और सख्त चुची को जोर से मसाला रही थी। ये सिलसिला तब खतम हुआ जब उसकी छुट ने अपना रस बहा दिया। संध्या की छुट से काफ़ी मत्र में पानी निकल था और जिस वजह से वह ठक भी गई थी। क्या लिया संध्या उसी तरह इतनी गई, जिस हलत में बिस्तर पर लेटी हुई थी।
संतोष टीवी बैंड कर के अपने रूम में जा कर अपना शॉर्ट निकला और अपना अंडरवियर निकला कर एक बार अपने लिंग को देखा जो पूरी तरह से खड़ा था। संतोष अपने को एक बार अपने हाथ से हिलाया और फिर बिना कुछ किए ही बिस्तर ले गया। और अपनी आंखे बंद कर ली सोने के लिए।
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सुबाह 6 बजे उसकी आंख खुल तो पाया उसका लुंड अभी खड़ा था। संतोष उठा और बाथरूम में चला गया पेशब करने के लिए। पेशाब करने के बाद संतोष के लुंड में तनव कम होने लगा और वो पल भी आया, जब संतोष लुंड शांत हो कर आला झूल गया। लुंड अभी भी कभी बड़ा दिख रहा था। संतोष ने अपना लिंग को पानी से धोया और बहार आ गया। फिर संतोष सिरफ लोवर पहन कर खेते को तरफ चल दिया।
सभी घर में उठ गए थे सिर्फ रमेश और संध्या को छोड कर। सभी अपने अपने काम में लगे हुए थे। रमेश की निंद आज संध्या से पहले खुली तो देखा की संध्या नागन अवस्ता में सोया हुई थी। रमेश अपनी बीवी को इस तरह देख कर, उसका लुंड खड़ा हो गया, वह अपना अंडरवियर में हाथ कर अपने लुंड को बहार निकल कर हिलाने लगा, रमेश मुश्किल से 2 मिनट में झड़ गया। और बाथरूम में चला गया। थोड़े डेर बाद रमेश जब वापस आया तो अपनी बीवी को देखा और मस्कुराते हुए कहने लगा।
“खास में तुम्हारी कोई मदद कर सकता है। पर क्या करू मेरे में इतनी तकत नहीं बच्ची की मैं तुम्हें वो सुख दे सकू, जिस तुम्हें चाहता है। मुझे डर है कहीं तुम अपनी जिस्म की आग में कुछ कदम न कोई गलत। मुझे कुछ तो करना होगा, अपनी बीवी के लिए।” रमेश अपने ख्यालो में खोया हुआ बस अपनी बीवी को देख रहा था। वही संध्या आंख खुली तो उसे देखा का उसका पति जिस्म को घोर रहा था जो बिना वस्त्र के सामने आने वाली थी। संध्या मस्कुराती हुई बिस्तर से उठी और अपने पति के पास जा कर बोली, “आगर देखना हो गया हो तो मैं जान।”
“हां हां तुम जाओ। मैं चला खेतो पर। पर तुमने नाइटी क्यू नहीं पहाड़ी थी रात में सोटे समय।” रमेश ने अपनी के तख्त और मुलायम स्तान को देखे हुए पुचा। संध्या अपने पति के बिलकुल पास आ गई और अपने हाथ आगे बढ़ कर अपनी पति का लुंड पकाड़ लिया और धीरे से दबते हुए बोली, “क्योकी कल रात आग लगी थी मेरे जिस्म में, अपने जिस्म की आग को बुझाने थी पर क्या करू ये तो मेरे किसी काम का नहीं रहा, इस लिए मुझे उनगली करनी पड़ी। अब तुम समझ ही सकते हैं की मैं हूं, इसलिए से क्यो सोया हुई थी।” संध्या ने लुंड को कास के बड़ा और बाथरूम में चली गई फ्रेश होने। रमेश को दर्द हुआ पर उसे कुछ कहा नहीं, और इस्तेमाल भी लगा की उसकी ही गलत है जो अपनी बीवी को जिस्मानी सुख नहीं दे सकता। फिर अपने दर्द को चुपटे हुए घर ऐ निकला गया।
उसके बाद कुछ नहीं हुआ संतोष अपने समय पर घर आ गया। फिर वह तैय्यर हो कर पिंकी के साथ स्कूल चला गया। आज मिसेज राधिका स्कूल नहीं आई थी। संतोष छुट्टी के बाद स्कूल से अकेला ही निकल गया और वही पिंकी कमला के और अपने सहेलियों के पास चली गई। संतोष जब घर की तरफ जा रहा था तो रास्ते में ही इस्तेमाल लाजवंती या लज्जो दिख गई। संतोष उसके पास चला गया।
“अच्छा भाभी मार्केट से क्या खरीदा।” संतोष लाजवंती के पास पाहुच कर धीरे से बोला। संतोष की आवाज सुन कर लज्जो खुश हो गई और मस्कुराते हुए उसकी तरह देखने लगी। “क्या देख रही हो भाऊजी। कुछ लगा हुआ है क्या मेरे चेहरे पर।”
“देख रही हू की ये सिद्ध सदा सा मेरा देवर आज कल बिलकुल बड़ा गया है। अपने भाऊजी से पुच रहा है की मार्केट से मैं क्या लिया है।” लाजवंती मुस्कुराते हुई बोली।
“तो बता कुत्ते तो क्या चला जाएगा आपका भाऊजी। कल को मदद ही मिलेगी मुझसे, अगर मुझे पता होगा तो।” संतोष ने हंसते बोला और अपना एक हाथ लाजवंती के कुल्हो पर रख कर धीरे से दबा दिया।
“हाए दय्या क्या करता हो देवर जी। किसी ने देखा लिया तो क्या सोचेगा मेरे नंगे में। कुछ तो शर्म करो।” लाजवंती की मुस्कान हुई बोली और पिच से संतोष का हाथ हट्टा दी।
“अच्छा जी। तो बता क्यू नहीं देती की क्या लेई हो बाजार से। तुम मुझे बता दो। मैं वहां हाथ नहीं लगा।” संतोष ने एक बार फिर से लाजवंती के कुल्हो को दबा दिया। पर इस बार थोड़ा जोर से दबया था।
“आआआ मां कोई इस तरह से दबाता है क्या। तुम तो मेरी जान ही ले लोगे। तुम ये जनाना है की मैं बाजार से क्या लाया हूं तो तुमसे कहा तो था कल घर पर आ जाना दोपहर में। देखो दोपहर है। चलो मेरे साथ, दिखा देती हूं घर में की मैं क्या ले कर आई हूं।” लाजवंती ने कहा और इधर उधार देखने लग गई। जब हमने पाया की कोई नहीं है तो उसे अपना हाथ बढ़ा कर संतोष का लुंड पक्का लिया और जल्दी ही अपना हाथ पिचे खिच ली। “हाय दइया ये बहुत ही बड़ा और मोटा है।”
“क्या हुआ भाऊजी दार गई क्या मेरे शेर को देख कर। आपके बस का नहीं है जो मेरे शेर को धर कर खातिर। अच्छा मुझे कहीं जाना है, मां के साथ तो आज तो नहीं, पर कल पक्का आउंगा। ये देखने की मेरी। ने क्या खरीदा है बाजार से।” संतोष ने बार चारो देखा और अपना हाथ आगे बढ़ा कर लज्जो की छू को पक्का का जोर से मीश दिया है। लाजवंती को बहुत तेज दर्द हुआ पर महल को देख कर अपने मुह से एक आवाज भी नहीं निकलने दी। संतोष मस्कुराते हुआ अपने घर चला गया।
जब संतोष घर पाहुचा तो वहां पर उसकी मां, उसके पापा और चाची तयार हो कर हॉल में बैठी थी। संतोष को देखते ही संध्या ने जल्दी से तैयार होने का इशारा किया का उपयोग करें। संतोष बिना एक पल गए अपने रूम में चला गया और स्कूल ड्रेस निकला कर एक जींस और शर्ट पांकर आ गया। संतोष को देख कर उसकी मां हंसते हुए बोली, “ओए उल्लु काम से कम बालो में कांघी तो कर लेता और मुह तो धो लेता।”
“माफ करना माँ जल्दी में मैं भूल गया था। बस अभी आया।” संतोष इतना कहने के बाद अपने मां के कमरे में चला गया और मुह धोया और बालो में कंघी कर के बहार आ गया। “चल माँ अब।” फिर सब वहां से निकल गए।
जब संतोष घर पाहुचा तो वहां पर उसकी मां, उसके पापा और चाची तयार हो कर हॉल में बैठी थी। संतोष को देखते ही संध्या ने जल्दी से तैयार होने का इशारा किया का उपयोग करें। संतोष बिना एक पल गए अपने रूम में चला गया और स्कूल ड्रेस निकला कर एक जींस और शर्ट पांकर आ गया। संतोष ने देख कर उसकी मां हंसते हुए बोली, “ओए उल्लू काम से कम बालो में कंघी और मुह तो धो लेता।”
“माफ करना माँ जल्दी में मैं भूल गया था। बस अभी आया।” संतोष इतना कहने के बाद अपने मां के कमरे में चला गया और मुह धोया और बालो में कंघी कर के बहार आ गया। “चल माँ अब।” फिर सब वहां से निकल गए।
संतोष अपने मां पापा और चाची के साथ समय एक गांव में मौजुद था। हमारे गांव का नाम था सालपुरा, गांव की बहुत पुरानी परंपरा थी, और परंपरा को आज तक वही जान पाया जिस शादी में गांव में हुई थी। संतोष अपने परिवार के साथ समय इसी गांव के एक घर में मौजुद था।
“मां हम यहां क्यों आए हैं। ये अपने रिस्तेदार है क्या?” संतोष ने धीरे से अपनी मां से पुचा। संध्या अपने बेटे की बात सुन के उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। संतोष अपनी मां को मुस्काना देख फिरसे कहा, “बोलो ना मां, अपने कोई रिश्तेदार है क्या ये लोग। जो हम यहां आए हैं।”
“बेटा हम यहां पर तुम्हारी बहन गीता के लिए रिश्ता देखने आए हैं।” संध्या ने अपने लाल से बोली। अभी आगे कुछ बोलती के लड़के वाले आ गए।
“माफ करना बहन जी। हम खेतो में थे इसलिए थोड़ी देर हो गई। आपने कुछ लिया की नहीं अभी तक।” एक महिला ने हाथ जोड़ा कर अपने डर से आने कर बताते हैं हमें महिला ने माफ़ी मांगते हुए ये बात कहीं थी। संध्या खादी हो कर उस महिला के हाथ पके के बैठा कर बोली, “बहन में माफ़ी मांगे की क्या ज़रूरी है। हमें पता है कि आप सब अपने खेत पर थे, जहां पर गने की फसल की कटाई चल रही है।” संध्या ने बड़े शांत और अपनेपन भाव से सामने वाली महिला से कहा था। फिर सब कुर्सियों पर बैठे गए।
“चंदा बेटी जरा महमानों के लिए कुछ अच्छे के लिए ले आ। और अपने भैया से बोल जल्दी तयार हो कर निचे आ जाए।” हमें महिला ने अपनी बेटी को आवाज लगते हुए बोली, जो रासोई घर में काम कर रही थी। चंदा के साथ दो महिला और थी एक शदीशुदा तो दशरी बिना शादी के। “ये मेरे पति राजवीर सिंह, ये मेरी नंद कांता। और मेरा नाम सुमन सिंह है।”
“जी नमस्ते आप सबको।” संध्या ने हाथ जोड़ कर कहा। “ये मेरा बेटा संतोष अभी 10वें में है। ये मेरी पति रमेश रावत, ये मेरी देवरानी कंचन रावत।” अभी संध्या ने अपने परिवार का परिचय ही दी थी की एक लड़की हाथ में खाने का समान कर आ गई। वाह लड़की खाने का सामान टेबल पर रख दी। फिर हाथ जोड़ कर अभिवंदन किया और अंदर चली गई। “ये कौन थी।”
“ये मेरी सबसे छोटी बेटी निवेदिता सिंह। मेरे दो बेटे भी हैं। एक की शादी हो गई है और वह शहर में काम करता है। वही रहता है, हर हफ्ते गांव आ जाता है छुट्टी वाले दिन। लेकर आ, कथोरी में दाल कर। अभी मैं ने जिस्को आवाज लगी ये मेरी बहू है।” अभी सुमन ने अपनी बात ही पूरी की थी ऊपर से एक लडका उतरते हुए आला आया। देखने में शरिर थाका था। सीडियों पर से किसी उतरने की आवाज सुन संध्या का ध्यान उधार चला गया। “ये मेरा सबसे छोटा बेटा सागर सिंह।” सागर उतर कर अपने मां के पास आ गया और सबको हाथ जोड़ कर नमस्ते कर एक तरफ बैठा गया।
“बेटा कहां तक पढे हो।” रमेश ने सिद्ध सवाल ही किया सागर के बैठे जाने पर।
“उकल मैं ने एमबीए फर्स्ट डिवीजन से पास किया है। अभी मैं एक कंपनी में सेल्स मैनेजर हूं। माहिन के 50k मेरी सैलरी है, कमीशन अलग।” सागर ने अपना पुरा परिचय दे दिया। संध्या ये सुन कर खुश हुई की लड़का पढ़ा लिखा हुआ है और काम भी अच्छा लाता है और लड़का सुंदर भी है।
“बहन जी हम ये रिश्ता मंजूर है। आप आ कर मेरी बेटी को देख लिजिए।” संध्या ने हां कर के मोहर लगा दी की वह अपनी बेटी की शादी सागर से करना चाहता है। सागर मां भी ये बात सुन कर खुश हो गई। जब महिलाओ ने हां कर दी तो मर्दो कहा चलने वाली थी तो उन लोगों ने भी अपना बगीचा है में हिला दिया।
“बहन जी अगर आपके पास लड़की की कोई फोटो है तो…….” सुमन ने अपनी बात बिच में ही रहने दी। संध्या अपनी समाधान की बात सुन मस्कुरा दी और अपने पर्स से गीता की फोटो निकल कर अपनी समाधान की तरफ बढ़ा दी। सुमन ने जब फोटो देखा तो खुश होते हुए बोली, “बहन जी हम लड़की देखने जाने की कोई जरूरत नहीं है। हम वहां पर सिरफ लड़की को सगुण देने और शादी तारिक बताए के लिए आएंगे।”
“जैसी आपकी मर्जी बहन जी। हमें इसमे कोई मुश्किल नहीं है।” संध्या ने कहा और थाली में राखी बर्फी का एक पेशाब उठा कर सुमन को खलिया दी। सुमन ने भी वैसा ही किया, फिर सब ने एक दसरे को मिठाई खिलाकर मुह मीठा किया। उसके बाद संध्या ने अपने पति रमेश के हाथ से 5001 रुपये और एक पाटली से सोने (गोल्ड) चेन सागर के हाथ में रख कर, लड़की का रोपा कर लिया। “बहन जी अब से लड़का हमारा हुआ और लड़की आपकी।”
“अब हम जाने की इज्ज़त दिजिये।” संध्या ने सगुण का काम पूरा करने के बाद जाने की जांच की। फिर संध्या के साथ सभी खड़े हो गए। संतोष ने बिच कुछ नहीं बोला, बस वहां पर क्या रहा है वही देखता रहा। संध्या ने भी बात नोट किया पर उसे कुछ नहीं कहा।
“बहन जी ठीक है, हम आपको जाने से रोकेंगे नहीं पर हम जो भी देंगे आप लेने से मन नहीं करेंगे।” इतना कहने के बाद सुमन वहां से अपने कमरे में चली गई और कोई 10 मिनट के बाद जब वापस आई तो उसके हां में कुछ समान था। सुमन संतोष के पास चली गई और बोली, “बेटा ये बॉक्स अपनी बहन को देना, जिस सागर की शादी होने वाली है। ये तुम्हारे लिए हैं।” सुमन ने एक नोट गड़ी संतोष हाथ में रखते दी। 500 के नोट की गद्दी थी। संतोष बॉक्स तो ले लिए था पर पैसे लेने से मन कर रहा था। ये देख कर फिर से सुमन ने कहना सुरु किया, “बेटा ये हमारे यहां का रिवाज है और इसे लेना पड़ेगा। अभी तो तुम इतने से डर रहे हैं, अभी तो ऐसे बहुत से रिवाज है, जिन्हे तुम ही क्या तुम नहीं होगा। चाहते की तुम्हारी बहन यहां खुश रहे।”
संतोष ने जब ये सुना तो पैसे रख लिया और बोला, “नहीं मौसी मैं ऐसा कभी नहीं चाहुंगा की मेरी बहन खुश न रहे। मैं तो उसे खुशी के लिए अपने जान भी दे दू।” ये सुन सुमन खुश हो गई और आगे बढ़ कर संतोष को गले लगा ली। बस यहीं सुमन से गलत कर दी इस्तेमाल अपने गले लगा कर। जैसे सुमन ने संतोष को गले लगा उसे बुरा ने रोना सुरु कर दिया और उसे चुचक सख्त हो गए। और इसका एहसास संतोष को भी हुआ और उसके नागदेव को भी, जो पंत के और अपना सर उठान लगा। सुमन को इसका पता चलता है पहले ही वह सुमन से अलग हो गया का उपयोग करें। “ठीक है आंटी। अब हम जाने का इज्ज़त दिजिये।” उसके बाद संध्या अपने परिवार के साथ उस गांव से निकल गई।
नए चरित्र की जानकारी
1. सुमन सिंह (ये 48 वर्ष सुंदर और महिला है। इस्की शारिर की बनावत ऐसी है की अभी भी 30 वर्ष की लगती है। लगता है कमर (कमर) 30 कि है जो एक भारी हुई शारिर के महिला के लिए बहुत ही सातिक है। सुमन की कुल्हे भी बहुत ही बड़े और बहार की और निकले हुए हैं।)
2. राजवीर सिंह (आयु 52 वर्ष, अपने गांव के मुखिया है। बहुत नेकदिल है। इस्की ये कमजोरी है, वो है सुंदर महिला। अपने गांव की बहुत महिला है, जमीन भी नहीं है। पैसे की कोई कमी नहीं है। बहुत है।)
3. शंकर सिंह (आयु 35 वर्ष। सुमन सिंह और राजवीर का बड़ा बेटा, कंप्यूटर विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है एमएससी। ये आईटी कंपनी में मांगर है। वेतन भी अच्छी है, लड़की इसकी कमजोरी है,)
4. सपना सिंह (शंकर सिंह की पत्नी। 33 वर्ष महिला, शादी के 3 वर्ष हो गए हैं पर अभी तक मां नहीं बन पाई। इस्का भी एक करन है, ये आपको कहानी में पता चलेगा। 36 के चुची, 28 की कमर ( कमर) और 38 गैंड। स्नातक है बीएससी से।)
5. सागर सिंह (ये सुमन और राजवीर का छोटा बेटा, 30 साल। एमबीए किया है, एक कंपनी में सेल्स मैनेजर है। हाइट भी नॉर्मल है। बहुत ही सिद्ध है, पर एक काम है, वो है लड़कियों को तड़ना।)
6. निवेदिता सिंह (सुमन की बड़ी बेटी, 28 वर्ष की सुंदर लड़की, शादी के लिए बहुत से रिश्ते आए हैं। रसायन शास्त्र में एमएससी से किया हुआ है। घर पर ही रहती है। 36 के मध्यम आकार की इसके उपहार उसके देखे पर दिलकास लगता है। 28 की कमर और 36 की गंद जो बहार को निकली हुई है।)
7 चंदा सिंह (सुमन सिंह की छोटी बेटी, 25 वर्ष की है। बीए किया है वो भी हिंदी से। कॉलेज लड़के इसके पीछे मिले थे, पर उसे किसी को भी घास नहीं डाली। इस्का तो एक नियम था जिस पर इसका दिल आएगा। उसे अपना बिल दे देंगे। ये अपने दोस्तों हमेश कहती थी। 34 की चुची, 26 की कमर और 36 की गंद।)
8 कांता राठौड़ (40 की कामुक महिला, 3 बचाओ माँ है पर कोई नहीं कह सकता है कि तीन बच्चे हैं। साल में 4 माहिन अपने मायाका में बिटती है।)
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संतोष के जाने के बाद जब पिंकी घर पाहुची तो सिद्ध अपने कमरे में चली गई। और अपने कपड़े बदलने के बाद अपनी मां को धुंध ने लगी। जब वो कहीं नहीं मिली तो पिंकी सिद्ध अपनी बड़ी बहन गीता के कमरे में चली गई। और समाने का नज़र देख कर उसके होश ही उद गए। गीता एक सिरफ पैंटी में खादी थी और उसके ऊपर पर्वत के समान खड़े थे। उसके पैंटी उसके कुल्हो को ढकने में सक्षम नहीं। और पैंटी भी सिरफ आए उसके योनि को ढक (छुपाएं) पा रही थी।
“ओए वहा खादी ही रहेगी की और भी आएगी।” गीता अपने कामरे का दरवाजा खुलने की आवाज सुन कर पिच मिट्टी गई थी, अपनी बहन को देख को उसकी जान जान आई। उसके लगा की संतोष ने दरवाजा खोला था। पिंकी अपनी बहन की बात सुन और आई और दरवाजा सात दिया।
“दीदी आप तो पैंटी में बहुत ही सुंदर लग रही हो। अगर आपको हलत में किसी लड़के ने देखा लिया तो वही अपना पंत गीला कर दूंगा।” पिंकी ने मुस्कुराते हुए बोली। गीता भी अपनी छोटी बहन की बात सुन कर शर्म गई और उसका चेहरा लाल हो गया। “हाए है आपका शर्मना, कहीं मैं पागल ना हो जाऊं।”
“चुप कर शैतान की नानी। चल ये बता किसी लिए आई है।” गीता ने पिंकी को दाता हुई बोली, और अपनी ब्रा उठा ली जो बिस्तर पर एक तरह से रखा था जाने के लिए। जब गीता ब्रा उठने के लिए झुकी तो उसका कुल्हे छोड कर और बड़े हो गए। पैंटी उसे कुल्हो के डर में सीमा गई और साथ ही उसे योनि के होथ दिखने लगे।
“दीदी इज एंगल से तो आपकी ये कुल्हे और भी बड़े हो गए हैं और आपकी पैंटी आपकी छुट्टर के बीच सीमा गई है। जिस वजह से आपकी बुरी साफ दिखने लगी है।” पिंकी ने तो सामने का नज़र ही अपने शब्द में बयान कर दी। पिंकी की बात सुन जल्दी से खादी हुई और बोली, “ये बता किस लिए आई है।”
“आरे दीदी आप गुसा क्यों होती हो। मैं तो आपकी टैरिफ ही कर रही थी।” पिंकी की बात सुन गीता उसको गुसे में गौरी, पिंकी ये देख जल्दी से बोली, “आप घुर क्यों रही हो। मैं बात तो रही हूं। मां कहा है।”
“मां पापा चाची और संतोष के साथ कहीं बाहर गई है। शाम तक घर पर आएगी। तुझे क्या काम पड़ा मां से।” गीता ने पिंकी की और देखते हैं पुचा और अपने ब्रा का अखरी हक लगाने लगी।
“दीदी मैं कमला के घर जा रही हूं पढ़ने के लिए। शाम तक आउगी। यही बाते के लिए मां को धुंध रही थी।” पिंकी बोली।
“ठीक है चली जा पर 5 बजे तक घर आ जाना वर्ना अगली बार जाने नहीं दूंगा।” गीता ने कहा और अपनी सलवार उठा कर पढ़ने लगी। गीता की बात सुन पिंकी वहा से भाग निकली, अपनी सहेली के घर।”दीदी दीदी कहां हो तुम, देखो हम सब आ और तुम्हारे लिए हैं।” संतोष घर के अंदर दखिल होते ही, जोर जोर से चिल्लाने लगा था। संध्या जो उसके पिचे ही आ रही थी, संतोष की हरकत से मस्कुराती हुई और आ गई। उसके पीछे ही कंचन और रमेश भी। वही संतोष के इस तरह चिल्लाने की आवाज सुन कर नीतू और नीलम अपने कमरे से निकल कर, आने लगी तो वही गीता रशोई घर में सब्जी कटा छोड, बहार आ गई। “जल्दी आओ दीदी।”
“ओए पागल इस तरह चिल्ला क्यो रहा है।” गीता रशोई से बहार आते ही जोर से, पर उतने ही प्यार से बोली। संतोष भाग कर गीता के पास गया और अपने गले लगकर कास लिया। और इसका असर संतोष पर तो कुछ नहीं पड़ा, पर गीता पर इस्का जोर दार असर हुआ था। पहली ये की उसकी तख्त और नज़र गोले संतोष के देखे में दस गए और दशहरा उसकी योनि से आश की बुंद निकल कर उसकी पैंटी गिली करने लग गई। यही नहीं रुका उसके जिस्म के अंदर के अलग ही आग लग गई थी। “ओए गढ़े छोड़ मुझे और ये बात क्योकी बुला रहा था।” गीता खुद को संभल ली थी और संतोष को अपने से लगा कर दिया।
“माँ जरा वो बॉक्स देना।” संतोष अपनी मां के तरफ जाते हुए कहा। संध्या अपने बेटे की बात सुन थेले से बॉक्स निकले कर उसे दे दी। संतोष उसे ले कर अपनी दीदी के पास आया और इस्तेमाल दे दिया। “दीदी खोल कर देखो और बताओ कैसा है।”
गीता हमें बॉक्स को देख कर समझ तो गई थी की ये गहनों का बॉक्स है। फिर खुश होते हुए गीता ने बॉक्स खोल ली तो उसके अंदर डेमोंड का हर था। ये देखा कर गीता खुश हो कर अपने भाई के लगे लग गई। जहां पहले गीता पर असर हुआ था वही अब संतोष पर हुआ उसका लुंड अपना सर उठा कर गीता के योनि पर जा लगा। गीता को अपनी बुरी पर सखत कोई चीज महसूस हुई थी, जो उसे बुरा को चौडा करने में लगा हुआ था। संतोष जल्दी से अलग हुआ और बोला, “दीदी बताओ ना कैसा लगा ये हार।” वही नीतू और नीलम ने भी हमें हार को देख लिया और अपनी मां के आप आ कर बैठ गई थी।
“भाई हार तो बहुत सुंदर है। मुझे ये पसंद भी है। पर मेरे लिए…” गीता ने आखिर ये बात दी की इस्तेमाल हर पसंद आ गया, पर थोड़ी उलझन में आ गई थी, इतने उसके लिए इतना मेहंगा हार , उसके लिए क्यो लाया। उसका उलझन भी जल्दी ही दूर हो गई, जब संतोष ने उसके सामने एक लड़के का फोटो लाकर रख दिया और फिर से बोला, “अब ये बताये ये कैसा लगा आपको।”
गीता ने अपने भाई के हाथ से फोटो ले कर देखी और बोली, “लद्दा तो ठीक है। पर मुझे क्या दिख रहा है।”
“दीदी आप यहां बैठिए और थिक से देख कर बताइये की ये लड़का आपको पसंद है की नहीं।” संतोष ने अपने से कहा। और उसके पास ही उसके कदमों में बैठा गया। गीता थोड़ी देर हमें फोटो को ध्यान से देखी और बोली, “लडका तो मुझे पसंद है। पर मेरे पसंद होने ऐ क्या?”
“दीदी हमने ये लडका आपके लिए पसंद किया है। आउ हार भी उन्होन आपके लिए दिया है। उन्हे आप पसंद भी आ गई है।” गीता अपनी भाई की बात सुन कर शर्म गई। और अपनी मां की तरफ देखने लगी, ये जाने के लिए उसका भाई उसके तांग तो नहीं कर रहा। जब संध्या ने अपनी बगीचा हां में हिला कर सहमति दी तो वह उठा कर रशोई घर में चली गई।
“तो आप सब दीदी की शादी पक्की करके आ रहे हैं। कब का दिन निकला है।” नीतू ने अपनी मां से पुचा और मुस्कान दी। संध्या अपनी बेटी के सर पर हाथ फेरे हुई बोली, “बेटा अपना रिश्ता पक्का हुआ है। दिन और तारिक लड़के वाले फोन कर के बताएंगे। हां इतना तो पक्का है आने वाले 2 -3 महिनो में गीता की शादी और हो जाएगी। चली जाएगी।”
“चल जा कर थोड़ा ठंडा पानी और कुछ खाने के लिए आ।” संध्या ने अपनी बेटी से बोली। नीतू और नीलम अपनी मां की बात सुन कर रासोई घर में चली गई। तो वही संतोष फ्रेश होने अपने रूम में।
उसके बाद सभी रात का खाना खाने के कमरे में चले गए। पर हां पिंकी को आज दात पद गई थी क्योकी वाह 7 बजे घर आई थी। संतोष अपने ही सपनों में खोया हुआ था, पर उसका कामदंद जग रहा था। वही गीता अपने आने वाले भविष्य की बारी में सोच रही थी, लेति हुई बिस्तर पर। वही कंचन और संध्या अपनी बुरी में उनगली कर, झरने के बाद वैसे ही सो गई।
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अगले दिन
स्कूल का समय
“संतोष खड़े हो जाओ और ये सवाल है ब्लैकबोर्ड पर, तुम्हारे पास 2 मिनट का समय है हल करने के लिए। अगर नहीं हुआ तो सोच लेना मैं तुम्हारे क्या हाल कर सकती हूं।” तीसरी अवधि चल रहा था स्कूल का। और ये क्लास थी मिसेज कौशिक की, आते ही संतोष को खड़ा कर दिया था तकी वाह इस्तेमाल सजा देने खातिर। संतोष बिना समय गवे बेंच से खड़ा और मिसेज कौशिक के पास चला गया
“मिस चोख।” संतोष बोर्ड के पास खड़े होते ही, लिखने के लिए चोख मंगा। मिसेज कौशिक ने अपने हाथ का चोख संतोष के तराफ बढ़ा दी। संतोष ने चोख लेने के बाद ब्लैकबोर्ड पर दिए हुए प्रश्न हल करें करने लगा, जिसमे उपयोग 4 मिनट लग गए। “मिस हो गया। आप देख लिजिये।”
“ठीक है का जवाब। पार टाइम तुमने ज्यादा लगा दिया। 2 की जगाह 4 मिनट, इसलिय तुम सजा मिल लेगी। लंच टाइम में तुम मेरे केबिन में आ जाना।” श्रीमती कौशिक बोली और तुम अपनी सीट पर जा कर बैठ जाओ। संतोष भी बिना कुछ कहे, चुप चाप बैठा गया।
लंच टाइम तक संतोष चुपचाप अपनी क्लास में बैठा पढ़ा रहा। लंच होता है संतोष मिसेज। कौशिक के केबिन में चला गया। जहां पर पहले ही मिसेज कौशिक अपनी कुर्सी पर बैठी थी और हाथ में एक पाटली छडी थी। संतोष को और आता देख बोली, “दरवाजा बंद कर दो।” संतोष ने बिना कोई टाइम वेस्ट किया दरवाजा बंद कर दिया। और मिसेज कौशिक के सामने आ कर खड़ा हो गया। “आज तुम 20 छडी लगेगे।”
“ठीक है मिस। मैं तैयार हूं। पर मार्ने से पहले मेरी बात भी सुन लिजिए।” संतोष ने मिसेज कौशिक को डरते हुआ बोला। मिसेज कौशिक ये देख कर खुश हो गई, संतोष के चेहरे पर डर देख कर। पर आज ये खुशी कुछ ही पल के लिए थीं मिसेज कौशिक के लिए।
“बोलो क्या कहना चाहते हैं।” मिसेज कौशिक ने संतोष की और घोरत्र हुई, बेरहमी से बोली।
“मिस आपका फोन मिलेगा, मैं आपको कुछ देखना चाहता हूं। प्लीज मिस।” संतोष ने कहा। मिसेज कौशिक ने संतोष को रोता हुआ देख कर उन्होनें अपना फोन, संतोष को दे दिया। संतोष ने उसमे कुछ किया और एक वीडियो प्ले कर के दे दिया।
“ये क्या है। तुम इतने बड़े गए हो की मुझे ये असली वीडियो दिख रहे हो।” श्रीमती कौशिक ने गुसा होते हुए संतोष से बोली।
“मिस पहले वीडियो तो देख लिजिये पुरा उसके बाद कहना।” संतोष ने ये बात कॉन्फिडेंस के साथ मिसेज कौशिक से कहा। संतोष को इस तरह से बोलना और वीडियो को देखने पर जोर डालना, मिसेज कौशिक को कुछ गद्दार लगी, तो वह वीडियो देखने लग गई। जैसे जैसे वीडियो का देखा आगे बढ़ा रहा था मिसेज कौशिक के चेहरे का रंग भी उड़ता जा रहा था।
“कैसी लगी ये फिल्म मिस करने के लिए।” संतोष हसते हुए बोला। श्रीमती कौशिक के पास कोई जवाब नहीं था। वाह संतोष के कदमो में आ गिरी। “प्लीज मिस। मुझे पाप का भागी मत बनाओ। आप खादी हो जाए।”
“प्लीज संतोष तु वीडियो…” मिसेज कौशिक ने हाथ जोड़कर हुई बोली।
“चिंता मत किजिये। ये वीडियो सिर्फ मेरे पास ही रहेगा।” संतोष ने कहा।
“बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं अब तुम तांग नहीं करुंगी।” श्रीमती कौशिक बोली।
“मिस यू तो थिक है। पर मेरे दिल का क्या, जो इस्तेमाल दिन मुझे आपके बातो से मेरा दिल रोया था। उसके लिए तो आपको सजा मिलेगी। पर आज नहीं कल से। क्योकी लंच खतम होने वाला है।” संतोष इतना कह कर मिसेज कौशिक के केबिन से बहार चला गया। वही मिसेज कौशिक आने वाले कल के बारे में सोचने लगीलंच के बाद संतोष अपनी क्लास के सबसे आखिरी बेंच पर बैठा हुआ किसी सोच में गम था। वही मिसेज राधिका क्लास को मैथमेटिक्स का एक सॉल ब्लैकबोर्ड पर समझौता रही थी, वाह वपस स्कूल के समझौता होने के अंतिम समय में आई थी और उन्होनें आती ही मिसेज तनु शर्मा से उनका पीरियड उनसे ले लिया था तकी वहां आज की क्लास . मिसेज राधिका ब्लैकबोर्ड पर सावल को समझौता हुए बार बार पिच देख रही थी, इस लिए तकी सब बच्चे हमें सावल को सही से स्मझ खातिर हैं। श्रीमती राधिका ध्यान बार संतोष पर ही चला जटा, क्योकी वह समाने न देख कर अपना सर निचे किए हुए बैठा हुआ था। मिसेज राधिका ने आवाज भी दी, पर उसे सुना नहीं दिया, मानो ऐसा लग रहा था संतोष वहां पर मौजूद ही ना हो। जब उसके आगे बैठे हुए बच्चों ने उपयोग हिलाने के लिए पिचने की कोषिश तो, श्रीमती राधिका ने मन कर दिया।
“संतोष तुम्हारा ध्यान किधर है। मैं तुम्हें कब से आवाज दे रही हूं।” मिसेज राधिका ने जोर से चिल्ला कर बोली, जो उसके पास ही आ गई थी, हम लड़कों को रुकने के बाद। संतोष मिसेज राधिका की आवाज सुन कर हड़बड़ा कर उठा कर कड़ा हो गया।
“क्षमा देवी।” संतोष ने राधिका से माफ़ी मांगते हुए बोला और साथ ही उसे अपना बगीचा भी झुका दी। अभी समझ नहीं रहा था की मिसेज राधिका कैसे यहां पर आ गई, जब की ये क्लास तो मिसेज तनु शर्मा की थी का इस्तेमाल करें। संतोष को फिर से सोचा में दुबा हुआ देख कर श्रीमती राधिका ने बोली, “संतोष क्या बात है। तुम्हारा ध्यान किधर है, ब्लैकबोर्ड पर न होकर और अभी भी मुझे ऐसा लग रहा है।”
“ऐसी बात नहीं मिस। वो क्या है ना मेरे सर में दर्द हो रहा है, हलका हलका है मेरा ध्यान वहां पर नहीं था।” संतोष ने सुरक्षित झूठ बोला श्रीमती
राधिका से और उनके आंखों में देखने लगा, तकी उसकी बात पर उन विश्वास हो जाए। और हुआ भी यही मिसेज राधिका संतोष की बात का विश्वास कर ली।
“ठीक है। तुम यह सवाल मुझसे बाद में भी समाज लेना, जब तुम्हारा सर दर्द चला जाए और मन करे या चाहे। और हां चाहे तो मेरे घर आ कर भी।” श्रीमती राधिका ने मुस्कुराते हुए संतोष से बोली। संतोष ने भी अपना बगीचा है में हिला दी। “ठिक है तुम आराम से बैठा जाओ।”
“साला आज हो क्या गया है मुझे। जब से मिसेज कौशिक साथ मैं ने वो सब किया, तब से ही मेरा मन विचित्र सा हो गया है। राह रह कर मुझे ऐसा लग रहा है। वही दी मैं गलत करने जा रहा हूं। कह रहा है की मैं थिक कर रहा हूं। जैसे को ऐसा मिलना ही चाहिए।” संतोष ऐसे ही अपने मन और दिमाग के बीच जंग लड़ता रहा और अंत में दिमग जीत गया और उसे निश्चय किया कि वो श्रीमती कौशिक को सबक पढ़ा के ही रहेगा। ऐसे ही लास्ट पीरियड भी खतम हो गया। संतोष स्कूल की छुट्टी होने के बाद अपने दोस्तो से मिला और घर के लिए निकला गया।
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वही छुट्टी के बाद पिंकी अपनी सहेलियां के साथ घर के लिए निकल गई। उसके साथ कमला, निधि, उर्मिला, बबीता थी, ये पिंकी की खास सहेलियां थी, जिन्के साथ अपना समय बताती थी। पिंकी अपने ही धुन में चली जा रही थी।
“क्या बात है पिंकी। किसी सोच में दुबी हुई है। जरा हम भी तो बता।” कमला ने पिंकी के इस तरह शांत रहने का करन जाने के लिए अपनी बात कही थी। पर जब पिंकी ने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो कमला एक बार फिर से बोली, “ओए गुलाबो किसी ने कहीं तेरी परी का रस तो नहीं पी लिया, फिर समलैंगिक तूने कोई जगार देख लिया और तुझे वो पसंद है।”
“तू अपना मुह ही बंद रख साली रंडी। जब भी मुह खोली, लुंड लेने के लिए ही खोलती है। और मेरे पास कोई लुंड नहीं है, जो तेरी मुह दाल दू।” पिंकी भडकते हुए बोली। पिंकी की बात सुन कमला मस्कुरा दी। ये देख पिंकी ने फिर से बोली, “साली रंडी अगर तेरी बोर में इतनी हीखुजली ही रही है तो, जा कर रामू और उसके दोस्तो से अपनी बुरी को खुजली मितवाले।”
“अरे मेरी सोनपुरी तू नारज क्यू हो रही है। मन की मेरी आला खुजली हो रही है। वो मैं बाद में देख लुंगी।” कमला ने कहा। और उसे तारफ मस्कुरा कर देखने लगी और फिर से बोली। “मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तेरी गुलाबी परी को किसी ने देखा है और उसका रस भी पी लिया है, और इस लिए तू इतना भदक रही है।”
“सच में तू पाकी रंडी है, तुझे कुछ भी कह लो, पर तुझे कोई फरक नहीं पदने वाला। बाल्की उल्टा है तेरी बुरी की खुजली बढ़ जाती है। मेरे पास वो हाथ नहीं है, जिस मैं तेरी जी फाद साकु राही है, इस लिए मेरी बात मान, शाम को चली जा अपने यार के पास और जी भर के अपने बुरे फड़वा ले उसके लुंड से। क्यू री बबिता मैं ने थिक कहा ना।” पिंकी ने कहा और मुस्कान दी।
“तू कभी गलत बोलता है भला जो आज बोलेगी। पिंकी ठिक कह रही है कमला जा कर मीटवाला ले अपनी बुरी की खुजली रामू और उसके दोस्तो से।” बबिता ने जल्दबाजी हुई बोली। बबीता देखने भारी शारिर की मल्किन थी और उतना ही सुंदर भी, पर पिंकी से कम ही थी। उसके देखे के बड़े से माश के गोले उसकी सुंदरता में चांद लग रहे थे, वही उसे बड़ी हुई कुल्हे किसी भी आदमी का पीन निकलने में सक्षम थे। स्कूल की लाल रंग की सलवार-सूट में गुलाब की तरह दिख रही थी।
“तू तो रहने ही दे बबिता, जिंटा मेरी जगह खुली नहीं होती, इस्तेमाल कहीं ज्यादा तेरी बुरी में होती है, जो आपके यार रणदीप और उसके दोस्तो से जब तक चुद नहीं जाती तब तक तेरी बुरी और मुझे मिलता है।” कमला ने एक लग ही धमाका किया था, सबके सामने। ये बात सिर्फ कमला को ही पता थी। प्रंतु आज सब को पता चल गई थी।
“क्या री बबिता ये क्या कह रही है। मुझे तो लगा, की तू सिरफ रणदीप से ही कार्ति है। कमला तो कुछ और ही कह रही है।” उर्मिला ने बबिता से बोली। उर्मिला भी देखने में किसी से कम नहीं थी, छोटी सी उर्म में ही उसके देखे के लिए 32 वर्ष महिला से काम ना थे। उसके ऊपर पर्वत की तरह मान के गोले खड़े थे। वही उसके मध्यम आकार के भारी भरकम कुल्हे भी काम न किसी के जान लेने के लिए। उर्मिला की बातों से बबिता चिड़ है गई,
“मेरे छोड। तू भी कुछ कम नहीं है, अपने ही ऋषि भाई से चूड़ावती है। अपने जोड़े को फेला कर। भाई और जोर से और जोर, ऐसे ही चिल्ला रही थी ना हम दिन।” उर्मिला ये सुन कर सैन सी हो गई थी। नहीं पता था की उसकी खास दोस्त उसके नंगे में सबको बता देंगे का प्रयोग करें। बबिता को बात का है पता चली थी, क्योकी एक दिन वह उर्मिला के घर अपनी कॉपी लेने गई थी, और घर का दरवाजा बंद न होने की वजह से और चली गई, फिर जब वो आगे बढ़ी तो एक कमरे में इस्तेमाल करें की और काम आवाज़ आ रही थी और ये आवाज़ थी एक लड़की की। जब बबीता उस कमरे के पास गई तो खड़की पूरी हुई थी। खिड़की खुली होने के करन उसने उर्मिला को किसी लड़के के साथ छुडाई करते हुए देख लिया, वह जाने के लिए वहां रुक गई, की वह लड़का कौन है, जो उसकी सहेली की बाजा रहा है। पर उर्मिला के मुह से भाई कहने जाने पर, पता चल गया की उर्मिला को चौदने वाला कोई और नहीं, उसका सागा भाई था। स्कूल में बबीता ने उपयोग ये बात पुचा तो पहले तो मन किया पर जब उसे ये कहा की दोनो चुदाई की वीडियो बना ली है तो उर्मिला दार गई और सुने काबुल कर लिया। उसके बाद बबीता ने बताया की उसके पास कोई वीडियो नहीं है।
“उर्मिला तूने अपने ही भाई से।” पिंकी ने कहा।
“देख पिंकी मन की मैं अपने भाई से करता हूं। पर ये मेरी मजबूर है। ऐसा क्यों है मैं किसी को नहीं बताता शक्ति।” उर्मिला ने नज़रे झुक कर बोली। उर्मिला को में कोई पश्चिम नहीं थी, हुआ ये था की एक बार उर्मिला के मां-बाप शादी में गए थे अपने किसी रिश्ते में। घर पर वो और उसका भाई हाय। रात को उसका भाई सरब के नशे में घर आया और अपनी बहन को सिरफ ब्रा और पैंटी में देखा तो अपने आप को रोक नहीं पाया और उसके ऊपर चढ़ गया। उर्मिला रोटी रही उसका भाई चोदता रहा अपने 5 इंच लम्बे और 1.5 मोटे लुंड से, अपने कुछ क्षनिक भर के सुख के लिए।
“उर्मिला तू टेंशन मत ले ये बात यहां से बहार नहीं जाएगी। मैं वादा करता हूं। अगर तुम में से किसी ने भी ये बात कही और कहीं तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा।” पिंकी ने अपनी सहेलियां को धमकते हुए बोली। सभी ने हां में अपना बगीचा हिला दी।
“वैसे तू क्या कह रही थी पिंकी की मैं रामू और उसके दोस्तो से अपनी खुजली मितवा लू। पर तुझे ये नहीं पता की रामू के सिरफ दो ही दोस्त है, एक दीपक और दशहरा तेरे भाई संतोष।” कमला ने कहा और उसके चाहरे पर एक गहारी मुस्कान आ गई। जैसे वह कुछ ऐसा कहने वाली थी, जिस पिंकी का सर झुक जाए। “दीपक और रामू का तो थिक था, पर” कमला अपनी बात बिच में ही रोक दी और पिंकी की और देखने लगी। पिंकी को कुछ ना बोले देख कमला फिर से बोलना सुरु की। “वो दोनो तो मेरी प्यास भी बुझा देंगे। पर तेरे भाई अपने 4 इंच लंबे और 1 इंच मोटे लुंड से… तू समझ रही है ना। मैं क्या कहना चाहता हूं।”
कमला की बात सुन बबिता, उर्मिला और निधि पिंकी को घुर कर देखने लगी। घुर कर देखने का कर भी था, कमला उन लड़कों में से थी, जो अपने गांव के ज्यादा तर आदमी और लड़कों का लुंड देख राखी थी। पिंकी अपनी सहेली को, इस तरह अपनी और देखने से परशान सी हो गई।
“अच्छा कमला जरा ये तो बता की तुमने मेरे भाई का वो कब देखा लिया।” पिंकी ने कमला से पुचा। पिंकी ने ये बात ली पुची थी की तकी वाह जान खातिर उसके भाई के औजर के नंगे में वह कैसी जनता है। “बतायेगी भी फिर अपने मन से जो चाहे कह दे।”
“मैं ने नहीं रामू ने देखा है और उस ने मुझे बताया था। इस लिए मुझे तेरे भाई के लुंड के नंगे में पता है।” कमला ने कहा। अब पिंकी भी कुछ नहीं कह सकती थी क्योंकि जिसे आपने बताया था वह उसके भाई का दोस्त रामू था।
“क्या हुआ अपने भाई के नंगे में जान कर शर्म आ रही है। रो मत हम किसी से नहीं कहेंगे।” कमला ने पिंकी से जल्दबाजी हुई बोली। उसका साथ बाकी सब ने भी हंस दिया। पिंकी के घुर के देखने ने सभी चुप हो गई, प्रंतु वो सब भी मुस्कान रही थी।
“चल आज एक तेज लगते हैं।” पिंकी मस्कुरेट हुई बोली। पिंकी के हरकत को देख कर, उसकी बात सुन कर और उसके चेहरे पर आई मुस्कान को देख कर, कमला और बाकी सब बालों हो गई। यहाँ कमला ने उसके भाई का मज़ाक उड़ आया था। और वही पिंकी मस्कुरा रही थी। “किसी सोच में पड़ गई कमला।”
“कैसी शार्ट।” कमला ने कहा।
“शर्त ये है की अगर तेरी बात सच हुई तो मैं वो करुंगी, जो तुम मुझसे कहोगी। अगर तू गलत हुई तो तुम सब को मेरे भाई से चुदना होगा और उसके बच्चों की मां मनाना होगा।” पिंकी ने गुरते कहा। पिंकी ने एक ऐसी चाल चल दी थी की अगर वो सब पिचे हटी तो, उनका हरना तय था, और वही कमला ने जो बात कही थी, वो झूटी सबित होती। अगर वो सब मनाती है तो उन सभी की छुट का सत्यानास होना तय थी। एक तरह से वो सब उसके भाई की राहेल बन जाएगी। “बोल मंजूर है।”
“ठीक है। मैं तयार हूं।” कमला ने कहा।
“अब तुम सब बताओ।” पिंकी ने कहा। पिंकी की बात सुनाने के बाद बबीता और उर्मिला कमला की तरफ देखने लगी, और पुच रही थी क्या वो हां कहे या नहीं। कमला ने अपना बगीचा हिला कर, हां कहने के लिए कहा।
“हमें भी मंजूर है।” बबीता और उर्मिला ने कहा। अब सिरफ निधि रह गई थी। उसे कुछ नहीं कहा, कमला की बात सुनाने के बाद भी, हां हांसी जरूर थी।
“निधि हां कर दे। कमला झूठ नहीं कहेगी।” उर्मिला ने निधि से बोली और उपयोग समझौता लगी। पर उसे कुछ नहीं कहा। बबीता ने भी उपयोग समझौता, पर वो नहीं मणि, यहां तकौर उसे पिंकी के जिस्म की लालच भी दी।
“तुम तीनो मेरी बात ध्यान सुन लो। अगर कमला की बात सच भी हुई तो मैं कभी भी पिंकी से, ऐसे कुछ नहीं करने को कहुगी, जिससे उसे इज्जत पर आंच आए। और मैं तुम तीनो के लिए हां कहती हूं। न लगे की मैं ने तुम्हारा साथ नहीं दिया।” निधि ने एक समझौता भारी बात कही थी। पिंकी ये सुन कर खुश हो गई, कोई तो है जो उसके लिए सोचा है।
“निधि अगर तू शार्प हरती भी है तो तुझे कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। तूने ये दीया की तू मेरी सबसे अच्छी सहेली है।” पिंकी बोली और निधि को गले लगा ली। “और हां तुम सब भी मेरी शार्प से आज़ाद हो, पर मेरी भाई से 1 महिने ताल चुदना होगा।” उसके बाद पिंकी और निधि अपने रास्ते हो गई। वही कमला, बबीता और उर्मिला आप में बात करते हुए चली गई।
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“हां तो मेरे प्यारे देवर जी कैसे आना हुआ अपनी भाभी के घर आज।” लालवंती मुस्कुराते हुए संतोष से बोली। संतोष खाना खाने के बाद अपनी मां से खेतों का कह कर लालवंती के घर आ गया था। इस समय उसके घर पर सिरफ वो अकेले ही थी, सास अपनी बेटी को ले कर अपने भाई घर गई हुई थी कुछ दिनों के लिए, तो ससुर खेतो पर था और रात में ही आने वाला था। पति शहर में काम करता था, शहर में होने के करण वाह सिरफ शनिवार को ही आता था वो भी 7 बजे बाद और रविवर शाम को चला जाता था। घर पर समय सिरफ संतोष और लाजवंती ही मौजुद है।
“क्या भाभी अपने ही तो कहा था की जब मैं घर आउंगा, तबी आप मुझे दिखेंगी, की आप क्या ले कर आई हैं, बाजार से। तो वही देखने आया हूं।” संतोष बिस्तर पर बैठाने के बाद बोला। लाजवंती ये सुन बहुत खुश हुई गई।
“अच्छा तो तुम वो देखने आए हो। ठीक है। मैं दीखा दूंगा। पर तुम भी कुछ दिखाना होगा।” लालवंती ने कहा। संतोष कुछ समझ नहीं आया की उपयोग क्या दिखाना होगा, इसलिये उसे पुच ही लिया। “भाभी मुझे क्या दिखाना होगा। मैं तो ऐसा कुछ नहीं खड़ी है जिसे मैं दिखा सका।”
“देखो देवर जी, बात ऐसी है की मैं जो चिज खड़ी है वो हर कोई नहीं देख सकता, इस्तेमाल करें औरत देख शक्ति है या उसके पति या उसका चाहने वाला। तुम तो थारे मेरे देवर।” लालवंती ने कहा। लाजवंती झुक कर एक किताब उठने लगी। संतोष उसका पिचवाड़ देख पागल सा हो गया, उसके लिंग ने उसके पंत के अंदर बगवत करना सुरु कर दिया था।
“मैं भी तो आपका चाहने वालों में से हूं। अब देखना ही है तो इतना नखरे क्यों कर रही हो।” संतोष लाजवंती के पिचवाड़े को देखते हुए कहा। लाजवंती भी जानबुझ कर वैसा ही झुकी रही तकी वह संतोष के नागराज को जगा खातिर। जैसा उसे सोचा था वैसा ही हुआ।
“लज्जो लज्जो ओ लज्जो।” घर के बाहर से ही लाजवंती को कोई आवाज लग रही थी। लाजवंती आवाज सुन कर बहार चली गई। पर जाने से पहले संतोष को बोली, “देवर जी जरा तुम यह बैठा। मैं जरा देख कर आया कौन आया है।” लाजवंती के जाने के बाद संतोष बिस्तर से उठा और हमें तारफ चला गया जहां पर अभी कुछ डर पहले लालवंती खादी थी और एक किताब रख रही थी, जिस संतोष ने देखा था। जब संतोष ने हमें किताब वहन निकल कर देख तो उसपर लिखा था ‘भाभी की जवानी’। संतोष ने जब हमें किताब को खोला तो पहले ही पेज पर लिखा था ‘देवर का बड़ा लुंड भाभी के गुफा में, उसे जल्दी से पेज बदल और देखने लगा उसे कुछ नंगी तस्वीर भी देखे। अगली कहानी थी ‘देवर का केला भाभी के मुह में’, ‘भाभी की छुट का पानी’ संतोष उस किताब को देखने लग हुआ था।
“अरे कजरी तू. तू आज अपने मयके जाने वाली थी।” लाजवंती ने कजरी को देख कर पुचा। लाजवंती और कजरी की कल ही बात हुई थी, जहां कजरी ने अपने घर जाने की बात हमें बताई थी। “चल और चल, संतोष आया हुआ है।”
“तू सच कह रही है। अगर ये हमारे जल में फस गया तो समझ ले बड़े ही मजे है।” कजरी हंते हुए बोली और अंदर की तरफ चल दी। वही लाजवंती घर का मुख्य दरवाजा बंद कर अंदर की तरफ चल दी।