मेरा घर और मैं अध्याय 8
“हां तो दीदी आपको लड़की पसंद आया की नहीं। अगर आपकी ना है तो में मां से कहूं, आपको लड़की पसंद नहीं है।” संतोष ने अपनी दीदी गीता से कहा। खाना खाने के बाद अब गीता अपने कामरे में आराम करने आ गई थी, वही संतोष अपनी मां के द्वारा दिया गया अनार का जूस पीने के बाद सिद्ध अपने दीदी के काम आया। गीता एक नाइटवियर पहनी हुई थी, जो उसके जंग तक आ रही थी, हमारे नाइटवियर में उसके कुछ थोड़ा ज्यादा ही दिख रहा था। संतोष अपनी दीदी को हलत में देख उसका भी एक पल के लिए मन विचित्र हो गया था पर जल्दी ही खुद पर कबू पा लिया। संतोष को अपने कमरे में देख कर गीता शर्म रही थी, संतोष के अचानक आ जाने के करन, वो आज तक संतोष के सामने तार के वास्तु में नहीं आई थी, ये पहला समय था, जब गीता सामने है आई थी। संतोष भी एक बार अपने बहन की बदन को देख और फिर अपनी नज़र आला कर ये बात बोली थी।
“संतोष मेरी छोड, मुझे ये लड़का पसंद आया की नहीं। क्या तुझे ये लड़का सही लगा मेरे लिए। अगर हां तो मुझे ये रिश्ता मंजूर है।” गीता ने संतोष से ही सॉल पुच ली, का उपयोग लडका अच्छा लगा की नहीं। गीता की बात सुन वाह उपयोग ही देखने लग गया, वही गीता का जिस्म में संतोष को अपनी तरफ है फिर से देखे जाने पर उसका जिस्म उतेजित होने लगी थी, अपने पास संतोष के इस तरह होने एहसास जिस्म ने ही उस पर। गीता के चुचक (निप्पल) काठोर हो गया द जो उसके नाइटी से साफ दिख रहे थे, क्योकी गीता ने ब्रा नहीं पहनी थी।
“दीदी मुझे तो लड़की में कोई बुरा नहीं दिख रहा है। पढ़ा-लिखा भी अच्छा है, बटे भी अच्छा करता है। नौकरी भी ठीक है। घरवाले भी सही है। मुझे तो लड़का पसंद है। पसंद है।” संतोष ने अपनी दीदी से कहा। उसका ध्यान गीता के दो पर्वत के बिच के घटियों में था, साथ हमें चुचक पर जो बहार आने के लिए जोर लगा रहे थे। संतोष का अजनबी भी लोअर के अंदर अपना मज़ा उठाये बैठा था।
“ठिक है तू मां से कह दे की मुझे लड़का पसंद है। अच्छा अब तू अपने काम में जा, मुझे सोने दे।” गीता अपने जिस्म के हाथो मजबूर होने के करन उसमे अपने भाई को जाने के लिए कहा। संतोष भी शुभ रात्रि बोल कामरे से निकला गया। पर जाने से पहले अपने विशाल अजगर के दर्शन अपनी बहन को कर गया।
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“आप से एक बात पुचु, सच सच बताओगे।” संध्या अपने पति रमेश के बगल में लेटी हुई थी और उसके छत्ती पर अपना कोमल हाथ फेरेट हुई बोली। रमेश का लिंग लुंगी के अंदर खड़ा हो गया था, अपनी बीवी के हाथ के कोमल स्पर्श से ही। रमेश ने भी अपना एक हाथ संध्या के दिनों पर रख कर दबने लगा गया।
“हां पुच शक्ति हो, तुम्हें जो कुछ भी पूछना है। मेरे बस में हुआ तो मैं जवाब जरूर दूंगा।” रमेश उसक कोमल और तख्त उभार को अपने कथोर हाथ में ले कर धीरे धीरे दबते हुए बोला। संध्या ने भी रमेश को मन नहीं किया, अपनी कुछ दबवाने का मजा लेने लगी। उसकी छुट ने भी रोना सुरु कर दिया था जो उसकी पैंटी को गिला कर रही थी।
“क्या संतोष सच में ही रोड पर मिला था। कहीं ऐसा तो नहीं की ये तुम्हारे किसी प्यार की निशनी हो, जो वहां पर रह कर…” संध्या ने अपने पति से पुची। साथ ही उसे अपना एक हाथ उसके लिंग पर ले जा कर मुठ मारने लगी, तकी वह कोई विरोध न कर खातिर। और हुआ भी याही रमेश ने उसकी बात का बुरा नहीं माना और उसकी चुची को कास के दबने लगा। अखिर रमेश अपनी पत्नी की बात का बुरा क्यू मानता, वैसा भी संतोष उसका बेटा नहीं था।
“संध्या सच में ही मुझे संतोष रोड पर ही मिला था। बेहोशी के हलत में।” इतना कहने के बाद रमेश ने अपना मुह उसकी चुचक पर लगा दिया था और चुना लग गया था। और फिर दसरे हाथ से दुसरी चुनी को दबने लगा। संध्या भी मन नहीं कर रही थी उसे पता होने बावजुद की रमेश उसे ठंडा नहीं कर पाएगा।
“तुम ने बहुत ही अच्छा किया जो उपयोग (संतोष) यहां ले आए। काम से कम हम एक बेटा तो मिल गया, अपना वंश आगे बढ़ने के लिए।” संध्या खुश थी की उसके पति ऐसा कोई काम नहीं किया था, जैसा आज तक वह सोचती आ रही थी। रमेश उस समय कसम भी खाया था पर संध्या के मन के किसी कोने में ये बात बैठी थी उसका पति उसे झूठ बोल रहा है। पर आज इतने साल के बाद भी वही जवाब सुन कर उसकी मन की वो बात की संतोष रमेश की औलाद है निकल गई। पर हां उसके मन में संतोष लिए एक रिश्ता पनप चूका था, वो क्या था ये सिरफ या सिर्फ संध्या जनता थी या समय, बाकी कोई नहीं।
“आह्ह्ह्ह बस मेरी मां मैं झड़ जाऊंगा। तुम्हारे इस तरह करने से। एक तो पहले ही तुम्हारे रूप-योवां में पागल रहता हूं। अब तुम्हारे ये प्यार भरा स्पर्श।” बड़ी ही मुश्किल से अपना लुंड संध्या के हाथ से आजाद करा प्यार था। अगर एक पल और उसके हाथ में होता तो रमेश धर हो गया होता उसके हाथ में ही। रमेश ने उसके अमृत कलश को भी अपने मुह से निकला दिया था।
“रमेश, आप अगर मुझे ऐसे ही छोड़े रहे तो कहीं मैं बहक ना जान। पहले तो आप थिक मुझे ठंडा कर दे जिस से मेरी जिस्म की गरमी कम हो जाती थी। आप के लिए मैं जिस्म की आ गई। है इतने सालों से। पर अब नहीं रख सकती। हां तो आप मेरी प्यास भुजा दो, फिर मैं बहार निकल जाऊं अपने जिस्म की प्यास बुझने के लिए। आप मुझसे बातो मैं क्या करू। मैं आप से ये बात कह रही हूं।” संध्या ने अपनी छुट के दाने को मसाला हुए बोली। रमेश भी अपनी बीवी की हलत देख रहा था की किस तरह वो अपनी छुट के साथ खेल रही है और उसके छुट से रस बह रहा है। ये हाल संध्या का उस दिन से हुआ था, जब उसे अनार को क्या, जो संतोष लकर दिया था। रात रात भर संध्या बिस्तर पर तड़पती रहती और जब उसके बस की बात नहीं होती तो मैं उनगली कर के शांत करता खुद को। पर अब वो भी काम नहीं आ रहा था।
“संध्या मैं समझ सकता हूं। पर मेरे बस की बात नहीं है अब। बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं 10 मिनट से ज्यादा नहीं कर सकता या रुक सकता हूं। करता हूं। अब तुम किसी से भी अपने जिस्म की प्यास ठंडा करवा शक्ति हो, मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं। पर हां इतना जरुर कहुंगा की घर की मरियाद और सम्मान अब तुम्हारे हाथ में है। चलो अब आपके लिए मैं फेल हूं। चैट कर तुम्हें आज ठंडा कर दू. ये मैं तब तक करता रहूंगा, जबतक तुम्हें कोई मिल नहीं जाता।” रमेश आगे बढ़ कर संध्या के जोड़े फेलाया दिया, संध्या ने भी पुरा साथ दी।
रमेश अपना जीभ का कमल दिख गया लग गया, वह अपनी जिभ को योनि द्वार से ले कर दने (भगशेफ) तक ले जाता। वही संध्या अपने ही हाथो से चुनी को दबा रही थी, आला रमेश लगा हुआ था तो ऊपर खुद संध्या। छुट से पानी की धार पहले से तेज हो गया था और वो खट्टा-मीठा रस रमेश के मुह से होते हुए उसके पेट में जा रहा था। संध्या सच में ही पागल हो गई, जब रमेश ने अपनी जिभ हमें अच्छे अंग पर ले गया, जहां उसे सिवा कोई भी हमें उनसे हाथ तक नहीं लगा था। आज वहां पर रमेश की खुदरी जिभ जा पाहुची थी और अपने लार से भीगो रही थी।
“आहा माँ वहा नहीं रमेश, वहा नहीं… आआह उइइओ माँ।” संध्या अभी आगे कुछ कहती की रमेश ने अपनी दो उनगली उसकी बुरे में घुसा दी और अंगुठा उसकी छुट के दने के पर। रमेश अपनी जीभ का कमाल उस भूरे से छेड पर दिखने लगा, साथ ही अपने उन लोगों का उसमें मटर के दान के समान छुट के दने पर और उस गुफा में, जहां उसका लुंड भी झुक जाता था, अपना ला कमाल दिखलाता है। ये खेल संध्या के लिए बरदाश्त के बहार हो गया था, वह अपनी जिस्म पर कबू नहीं कर पा रही थी जिस वाहन से अपना सर दया गए थे घुमा रही थी और कमर (कमर) ऊपर उठा जटा बिस्तर से 3 इंच। उसका हाथ अपने स्तान को बेहरामी से मसलन में लगे हुए थे।
“अहस्स माँ मैं गाइइइइइ।” संध्या की ये अखरी शब्द जो उसके मुह से निकले थे। उसका जिस्म पूरी तरह से आ गया था, उस पल और जब ढिला होने लगा तो उसकी योनि से योनि-रस की बाद आ गई थी, जो रमेश के मुह के अंदर पूरी तरह से साका, जिस वहां से बिस्तर भी गिला। संध्या का शरीर 2 मिनट तक झटका खाता रहा, जब शांत हुआ तो उसकी योनि से वो मिथ-खट्टा पानी बहना बंद हो गया था।
संध्या बसुद बिस्तर पर पड़ी हुई थी। रमेश उसके पास बैठा हुआ उसकी बुरा और उसके चेहरे को देख रहा था, जहां चेहरे पर शांतुष्टि की चमक थी, वही रस से बड़ी वो योनि चमक रही थी।
रमेश का भी नहीं हुआ था। पर उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ा, वह बिस्तर से उठा बाथरूम में चला गया, फिर मुठ मार खुद को पानी बहा, जिसमे मुश्किल से 2 मिनट लगे होंगे उसके लुंड विर्या निकले में। वीर्य निकलने के बुरे उसे अपने लुंड को पानी से धोया और वापसी बेडरूम में आ गया। जहान उसे पाया की संध्या तो छुकी थी। रमेश उसके बगल में गया, फिर रमेश आज संध्या के द्वार की गई बात को सोचने लगा। हमें पता भी नहीं चला की कब उसकी आंखे बोझिल हुई और आंख लग गई।
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रात बहुत कुछ हुआ जहान कंचन अपने पति की चुदाई से संतोष हो जाति थी, वही आज रात वह प्यासी ही रह गई, क्योकी उसका पति 10 मिनट में ही उसकी छुट के अंदर अपना माल निकल एक तराफ है। बार झड़ जाती थी, पर वही आज ऐसा नहीं हुआ। कंचन का पति रूपेश झड़ने के बाद सो गया था। कंचन भी हमें अनार के प्रभाव से ना बच साकी। और रूपेश शायद ही अब कभी कंचन की जिस्म को शांत कर सकता था। कंचन खुद को शांत करने के बाद वो भी वही पर पास गई।
गीता ने भी अपनी छूत को रागद कर शांत किया था, खुद को। जिसमे उसके 30 मिनट लग गए थे। उसकी योनि से पहले से कहीं ज्यादा पानी निकला था और वो ये देख कर हेयर भी हुई थी की आज उसे बुरा से पहले कहीं ज्यादा रस निकला था। पर कुछ सोच कर वाह शांत हो गई और बाथरूम में जा कर अपनी छुट को पानी से साफ किया, फिर वैसा ही आ कर सो गई।
नीलम और नीतू जल्दी ही तो छुकी थी, पर निंद में होने बाद भी उसकी छुट ने पानी बहा रही थी, वह पल भी आया जब दोनो की योनि से एक पानी धर बह चला और उसकी पैंटी और पजामी गिली हो गई। क्योकी दोनो के ही सपने एक जैसे थे, दोनो ही किसी लड़के से चुदवेई करवा रही थी, पर दोनो ही हम लड़के के सकल नहीं देख पाई थी। क्योकी उसका चेहरा किसी नाकाम से ढाका हुआ था।
पिंकी की तो अपने ही ख्यालो में खोई हुई सो रही थी। यूज़ टू ये भी नहीं खबर था की उसकी छुट रिस रही थी, जिस वजह से उसकी पैंटी गिली हो रही थी। उसके चेहरे को देख ऐसा लग रहा था वो बहुत ही खुश हो। उसके चेहरे की चमक और मुस्कान अगर अभी कोई देख लेता तो इस्तेमाल करने के लिए कुछ भी कर सकता था।
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सुबाह का वक्त था जब सबी डाइनिंग टेबल पर बैठे हुए थे, खाने का इंतजार कर रहे थे। वही संतोष अभी तक नहीं आया था, अपने रूम से। जब की उसकी चारो बहने यहां पर मौजुद थी। संध्या और कंचन रशोई घर में थी। रूपेश अपने भाई रमेश से किस बात को लेकर बात कर रहा था, रमेश भी उसकी बात सुन और समझने की कोष कर रहा था। चारो बहने आप में ही लगी हुई थी, उनका विशेष था गीता की शादी को ले कर।
“भाई आप ही बोलो मैं क्या करू। यहां से रोज आ और जा नहीं सकता। क्योकी मेरे ट्रांसफर दूर हुआ है और पोस्ट भी अच्छी मिली है, अब मैं जहां जा रहा हूं, वहा वाइस प्रिंसिपल को तौर पर। कंचन को अभी ले जा नहीं सकता, क्योकी वहा का महल मुझे पता नहीं कैसा है।” रूपेश ने अपनी प्रमोशन की बात सबको बता दी थी और अपने भाई से कोई हाल चाह रहा था। शादी की बात के बाद रमेश ने अपने भाई के मुह से उसकी प्रमोशन की बात सुनी थी और वो खुश भी बहुत हुआ था। सभी खुश थे, सिवाय कंचन के और इस्का भी एक करना था।
“ये तो अच्छी बात है, की मेरा प्यारे भाई को तारकी मिली और मैं खुश भी हूं। तू कंचन की फिकर मत कर। यहां पर तेरी भाभी और भांजी भी है, जो उसका ख्याल रखीगी।” रमेश समझौता हुए कहा का प्रयोग करते हैं। क्या बात को लेकर रूपेश और रमेश में चर्चा हो रहा था। रूपेश अपनी पत्नी को छोड कर जाने नहीं चाहता था, क्योकी वह अपनी बीवी को अच्छी तरह जनता था। की कंचन अपने जिस्म को मुश्किल से 15 दिन तक ही कबू कर सकती थी। वही रमेश अपने भाई को हमें पोस्ट से होने वाले लाभ के नंगे में समझौता रहा था, जो उसके बीवी और बेटी के भविष्य के लिए बिलकुल सही भी था।
“मैं समझ सकता हूं रूपेश तू क्या कहना चाह रहा है। पर अपनी बीवी और बचाओ का सोच कर देख, अगर फिर भी लगे की तुझे नहीं जाना चाहिए तो मैं तुझे रोकूंगा नहीं। चाह से पूछूंगा। क्या करना चाहिए। वो मेरे तार ही बोलेगी।” रूपेश अपने भाई की बात सुन सोच में पड़ गया। भी लगाना लगा था का उसका भाई सही कह रहा है। और कंचन अपने जिस्म कोमी गरमी को कुछ दिन लिए कबू कर सकती है।
“ठीक है भाई। फिर मैं सबको बताता हूं। की मेरी पोस्टिंग बटौर वाइस प्रिंसिपल XXX गांव में हो गई है। और मुझे परसो ही वहां जाना है।” रमेश खुश हो कर अपने भाई को गले लगा लिया। रमेश हमेश अपने भाई को खुश देखना चाहता था।
“ओये तु संतोष कहा रह गया। अभी तक नहीं आया।” संध्या आते ही सबसे पुचने लगी। “अभी तक उठा नहीं क्या? इस स्कूल जाने का समय हो चुका है। अभी तक आला आया ही नहीं।” कंचन भी रोटी ले कर आ गई थी और संध्या सब्जी और रायता। खाने के मेरे पर खाना लग चुका था, फल पहले ही रखे हुए थे, पानी से भरा हुआ जग भी रखा था।
“माँ मैं देख कर आती हूँ।” पिंकी उठते हुए बोली। तो कंचन ने वही पर बैठा दी और बोली, “बेटा स्कूल के लिए डेरी होगी। तुम बैठा कर खाओ मैं देख कर आती हूं।”
कंचन संतोष के कमरे की तरह बढ़ चली थी, जहां पर इस्तेमाल वो नजर देखने को मिलने वाला था जिसके लिए वो सालो से प्यासी थी। कंचन मस्त अपने ही धुन में चली जा रही थी। संतोष के रूम के पास आने के बाद भी कंचन बिना सोचे समझे रूम का दरवाजा खोल दिया, और अंदर का नजर देख कर उस जिस्म में करंट से दुआ गया और उसका असर उसकी चुची और छुट दोनो पर हुआ। संतोष निर-वस्त्र रूम में खड़ा था और अपने शरीर को तौलिय से पोच रहा था, उसका विशाल अजगर आला झूल रहा था। संतोष अपने जिस्म को पोचने के बाद हमें भयानक अंग को भी पुछ रहा था और पोचने के बाद उसे अपने हाथ में ले कर हिलाने लगा। फिर संतोष ने अपने लिंग के चमकी को पिचे खिच, हम लाल और मोटे सुपड़े को बहार निकला, पास में रखे एक पूंछ को उसके चारो और लगा, फिर से धक दिया।
कंचन ये नज़र देख कर, सच में ही उसे छुट ने इतना बनी बहाया की आज तक बिना चूड़े नहीं हुआ था। कंचन ध्यान तब भंग हुआ जब संतोष आला झुका कर अपना शर्ट उठान लगा जो आने के पास एक जहां पर रखा हुआ था, अभी जो कुछ भी देखा था कंचन ने हमें मध्यम से ही देखा था। संतोष का ध्यान अपने पर था, शायद इसलिए लिए कंचन को न देखा हो या फिर देख कर देखा कर दिया था।
कंचन ने जल्दी से दरवाजा बंद किया पर धीरे तक उसकी आवाज संतोष तक ना जा खातिर। और हुआ भी वाही, कंचन दरवाजा लगाने के बाद, फिर दरवाजा खत खता। “कौन है?” संतोष अपनी पंत कहते हैं बोला।
“बेटा मैं हूं। जल्दी उठ जा स्कूल का टाइम हो गया है।” कंचन ने अपनी सांसो को कबू करते हुए बोली। अभी उसे बिना फूल रही थी, हमें नज़र को देखने के बाद से, और शायद ये कुछ दिन तक ऐसा ही रहने वाला था।
“बस चाची 2 मिनट में आला आता हूं। आप चलो।”, संतोष ने अपने बालो में कंघी करते हुए कहा। संतोष ने अपना स्कूल ड्रेस पहन लिया था कंचन अपने भतीजे की बात सुन वह से चली गई। वही संतोष बालो में कंघी करने के बाद अपना बैग एक बार देखा और फिर अपने कंधे पर तंग अपने कमरे से निकल गया।जब संतोष खाने के मेरे पर पाहुचा तो देखा की सभी बैठे हुए नास्ता कर रहे थे। उसकी मां संध्या भी बैठी थी। संतोष भी अपनी मां के बगल में जा कर बैठा गया।
“बेटा आज देरी कैसे हो गई। तुम तो रोज सुबह जल्दी उठ जाते थे फिर आज कैसे?” संध्या ने अपने बेटे से ये देखा कि किया। और फिर उसके लिए थाली लगाएंगे। आज भी रोज की तरह उसकी थाली भरी हुई थी। संध्या अपने बेटे की और हमें थाली को बढ़ा दी। “अब जल्दी से इसे खतम कर, उसके बाद तुम्हें दूध भी पीना है। जिसको मैंने और रशोई में रखा हुआ है।”
“मां सूबा सूबा इतना सारा खाना। मुझे तो अभी भुख भी नहीं लगी है। तो फिर भला मैं इतना कैसे खा सकता हूं।” संतोष ने खाने की और देखा और फिर अपनी मां से ये बात कहीं थी। ये आज पहली बार जो हो रहा था उसके साथ, इसे पहले तो इस्तेमाल नस्ता में सिर्फ 2 रोटी और सब्जी मिली थी खाने के लिए। अब उसकी आदत भी ऐसी हो गई थी, जिस वजह से उसे इतनी इतनी भुख नहीं लगती थी, जो यह सब खा खातिर।
“अब मुझे कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए। समझे। चुपचाप इसे खतम करो।” इतना कहने के बाद संध्या उठ कर रशोई घर की तरफ चली गई। तो वही संतोष अपने हाथ का प्रयोग खाना खाने के लिए करना लगा। क्योकी उपयोग पाता था की अगर उसकी माँ ने जो कह दिया, ताला नहीं जा सकता का उपयोग करें। वही रमेश खुश हो रहा था, अपनी बीवी की हरकत को देख कर, रूपेश हेयर था अपनी भाभी की हरकत से है। संध्या जब बहार आई तो उसके हाथ में बड़ा सा गिलास था, जो दूध से भरा हुआ था। संध्या चल कर अपनी जगह पर आई और बैठ गई और फिर हम गिलास को संतोष के तरफ रख दी।
“भाभी बड़ा ही ध्यान दिया जा रहा है अपने लड़े पर। कभी हमें भी इतने प्यार से दूध पिला दिया करो।” रूपेश ने मास्करी करते हुए अपनी भाभी से कहा। संध्या उसकी बात सुन कर हंस दी
“तुम तो रहने ही दो देवर जी। जैसे मैं कभी तुम्हें दूध पिलाया ही ना हो। भूल गए वो दिन जब कंचन यहां बिहा कर नहीं आई थी तो मैं ही तो तुम्हें दूध पिलाया करती थी।” संध्या ने कहा। रूपेश भी ये बात सुन कर जेप सा गया क्योकी संध्या सच में ही अपना दूध उपयोग पीलती थी। रूपेश ने तो कही पर अपने भाभी के उन मदमस्त स्तान जो दूध से भर होते थे उन्हे निकल कर पी लिया करता था। क्योकी घर पर वो दोनो ही तो हुआ करते थे। रमेश तो अपनी फौज की नौकरी पर हम समय हुआ करता था। क्या वजाह से उनको कोई रोकने वाला नहीं था। रात रात भर रूपेश संध्या के दुग्गड़ कलास को निछोड़ कर रख देता था। यहां तक रूपेश ने अपनी भाभी के योनि का रस भी एक बार चख लिया था। “अब लड़कियों की तरह शर्मना बंद करो देवर जी। स्कूल के लिए तुम डेरी हो रही है।” संध्या ने दीवाल-घड़ी की और देख चेताया।
“अच्छा मैं आप सब को कुछ बताना चाहता हूं।” अपनी भाभी की बात सुनाने के बाद, एक बार संध्या के स्टेनो को देख जो ब्लाउज में कैद थे, पर क्लीव साफ दिख रही थी। रूपेश ने अपने आप को ठीक करते हुए ये बात कही। सबी उसकी बात सुन, उसी तरह देखने लगे की अब वो क्या कहने वाला है। “मेरा तबादला बतौर उप-प्रधानचर XXX गांव में हो गया है। और मुझे दो दिन बाद वहां पर जान है। अब मेरा वतन भी बढ़ गया है।”
“ये बहुत ही अच्छी खबर सुनायी तुमे रूपेश। भगवान तुम्हारे दिन रात तारकी देता रहे।” संध्या ने खुश होते हुए बोला। रूपेश भी अपनी भाभी की बात सुन कर खुश हो गया। “अच्छा मैं चलता हूँ।” रूपेश इतना कह वहां से खड़ा हो गया और घर से बहार चला गया। कंचन भी उठी और रसोई घर में जा कर अपना हाथ धो और अपने कमरे में जा कर बट्टुआ और कलाम लिया और घर से बाहर चली गई, जहां पर रूपेश हाथ धोने के बाद उसका ही इंतजार कर रहा था।
“मैं आपसे रात को बात करती हूं।” कंचन ने वो कलाम अपने पति के शर्ट के जेब में फंसा और बट्टुआ हाथ में थामा दी। फिर घर के अंदर की तरफ चल दी। रूपेश ने भी कुछ नहीं कहा क्योकी इस्तेमाल स्कूल के लिए डेरी हो रही थी।
संतोष ने भी अपना नास्ता और दूध खतम किया और फिर अपना बैग उठा लिया। “माँ मैं चलता हूँ।” इतना कहने के बाद झुक कर संध्या के जोड़े छुआ। आज संध्या ने भी उसके सर पर हाथ रख अपना सिरवाड़ दे दिया। जो आज से पहले कभी भी अपने जोड़े को हाथ तक नहीं लगाती थी। “छुट्टी होते ही सिद्ध घर। वर्ण ठीक नहीं होगा।” संध्या ने संतोष से बोली। ये उसका रोजा का काम था। चाह कितना भी नफ़रत करती थी। उसे कभी नहीं चाहा की संतोष को कुछ भी हो। यहाँ तक जब संतोष बीमार पड़ गया था, तबी संध्या पुरी रात जाग कर उसका देखभाल करती रही। हमें समय रमेश किसी काम से शहर गया हुआ था।
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संतोष और पिंकी आज स्कूल डर से पाहुचे। प्रार्थना संपन्न हो चुकी थी। सभी बच्चे अपनी अपनी क्लास में जा चुके थे। संतोष और पिंकी भी जब अपनी क्लास में जा रहे हैं तो रास्ते में ही स्कूल के प्रिंसिपल मिस्टर महेंद्र सिंह मिल गए।
“संतोष और पिंकी आप दोनो देर से हो। तुम्हें पता है न देर आने की क्या साजा होती है।” महेंद्र सिंह ने जोर से उन दोनो की और देखते हुए बोला। प्रिंसिपल की आवाज सुन कर क्लास से कुछ टीचर भी बाहर आ गए थे, जिसमे से मिसेज कौशिक और मिसेज तनु शर्मा भी थी।
“जी सर मुझे पता है की डेरी से आने पर 10 दांडे मिलते हैं। पर सर आज हम पहली बार डर से आए हैं। इस हम माफ कर दिजिए।” संतोष माफ़ी माँगने लगा। पर प्रिंसिपल इस्का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, बाल्की उल्टा संतोष को झड़ पर गई।
“तुम दो अभी के अभी मेरी ऑफिस में आओ, अपना बैग क्लास में रख कर।” प्राचार्य महेंद्र सिंह ने गराजते हुए कहा। संतोष और पिंकी अपनी अपनी क्लास की और चल दिए अपना बैग रखना। वही दो के जाते ही, सभी टीचर अपनी अपनी क्लास में हो लिए। सिर्फ मिसेज कौशिक और मिसेज तनु शर्मा को छोड कर। वही प्रिंसिपल के चेहरे पर एक कमी मुस्कान थी। स्कूल के सभी टीचर ये अच्छी तरह जाने द की प्रिंसिपल स्कूल की लड़कियों के साथ क्या करता था, गलत होने पर। यहाँ तक टीचर भी इस्तेमाल करती थी, क्योकी उन्हे भी ये नहीं बख्शता था।
“आज फैन्स गई चिड़िया जाल में। बहुत ही उद रही थी। साली का बंदन पुरानी सरब की तरह है, जब भी उसके बंदन को देखता, मुझे पागल कर देता है। आज तो मस्त उसकी मखमली गंद को मजा लुंगा से, क्या अपने हाथो होगा जब मैं उसे गंद को बे-परदा कर अपने हाथो से आप पर मारुंगा। खामो खा इसके चक्कर में संतोष भी आ गया। अगर वो अकेले मिलता तो माफ भी कर देता।” महेंद्र सिंह अपने ही सोच में गम चलते हैं ऑफिस में जा पाहुचा। वही मिसेज तनु अब अपनी क्लास में थी तो मिसेज कौशिक किस सोच पड़ी थी, अब संतोष उसके साथ क्या करेगा। जब उपयोग ये पता चलेगा की उसके बहन के साथ प्रिंसिपल क्या करने वाला था। एक बार तो मिसेज कौशिक का मान किया की जा कर प्रिंसिपल को आगा कर दे पर कुछ सोच कर चुप अपनी क्लास में हो ली।
वही पिंकी अपना बैग रख, वापस प्रिंसिपल के ऑफिस की और चली गई। प्रिंसिपल जब पिंकी को देख तो खुश हो गया क्योंकि संतोष अभी नहीं आया था। “पिंकी आओ और दरवाज़ा बंद करो।” पिंकी ने अंदर परवेश किया और दरवाजा लगा दी।
वही दसारी तारफ संतोष जब क्लास में गया तो क्लास इंचार्ज श्रीमती माया ब्लैकबोर्ड पर कुछ समझ रही थी। “संतोष आज देर कैसे। आज पहली बार है, लिए छोड़ रही है। अपने स्थान पर जा कर बैठा और इसे ध्यान से समझो।”
“मिस, प्रिंसिपल सर ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया है।” संतोष ने श्रीमती माया से कहा। वाह समझ गई की संतोष की आज खैर नहीं। “मैडम क्या मैं जान।”
“संतोष 10 मिनट बाद चले जाना। पहले इसे समझ लो। ये जरुरी है, क्योकी वर्ष परीक्षा में आ सकता है।” श्रीमती माया ने हमें स्मझते हुए बोली। संतोष को लगा की मैडम सही कह रही थी तो उसे हां में बगीचा हिला कर, अपनी सीट पर जा बैठा। उसके बाद श्रीमती माया ब्लैकबोर्ड पर समाधान लगी।
(नोट:- स्कूल में जिस भी लड़कियों का जिक्र होगा वो सबी 18+ की होगी। जिंके साथ सेक्सुअल हरकत होगी।)
“पिंकी आज तुम देर हो गई, जिसके लिए तुम 15 थप्पड़ पड़ेंगे।” प्रिंसिपल ने एक कमी मुस्कान अपने होठो पर लाते हुए बोला। प्रिंसिपल पिंकी के उन्नत उभार को देखने में लगा था तो वही पिंकी किसी सोच में पड़ी थी, उसकी स्कूल ड्रेस में कैद उसके उन्नत स्टेन बहुत ही कामुक दृष्टि दे रहे थे। पिंकी इज बात से बेखबर की प्रिंसिपल की नियत उस पर खराब हो चुकी थी और उसके जिस्म को पाने के लिए इस्तेमाल देखे जा रहा था।
“पर बहार तो अपने कहा था की 10 डंडा पडेगा। आप तो यह 15 बोल रहे हैं।” पिंकी ने बात का ध्यान नहीं दिया था के उसके भाई ने 10 दांडे की बात कही थी, जिस्को प्रिंसिपल ने हां में बगीचा हिला कर अपना समर्थन दिया था। प्रिंसिपल पिंकी को व्यवहार करता देख खुश हो गया क्योकी इस्तेमाल एक मोक्का और मिल गया था।
“पिंकी तुम मुझसे प्यार कर रही हो। तुम्हें पता होना चाहिए की तुम्हें इसकी और साजा मिलेगी। अब जहां तुमको 15 थप्पड़ पड़ने वाले थे उसकी जगा 20 पद।” प्रिंसिपल ने एक अलग ही फरमान सुना दिया। पिंकी ये सुन कर फिर से बोल पड़ी, “पर सर।”
“25, अगर अब अपना मुह खोला तो ये और बढ़ जाएंगे। जो तुम्हारे लिए थिक नहीं होगा।” प्रिंसिपल ने पिंकी को चेताया की उसके बोले पर उसके लिए थिक नहीं होगा। क्या लिया वाह चुप रहे। “शायद तुम अपने भाई की बात से नहीं सुनी थी। तुम्हारे भाई ने 10 दंडे कहे, और मैं ने 15 थप्पड़। ये दंड तुम्हें पता है कहां पाएंगे।”
“जी नहीं, मुझे नहीं पता।” पिंकी ने धीरे से डरते हुए बोली। अब उसके बोले के तारिके में एक अलग ही धंड आ गया था जिसे लग गया था कि वो डर गई थी।
“कोई नहीं मैं बताता हूं। ये डंडे तुम्हारे गधे (क़ांड) पर पढ़ने वाले हैं। अब तुम बता क्या तुम वही पर खा शक्ति हो उतने दांडे। अब तो तुम समझ ही गई होगी की मैंने ऐसा क्यों कहा था। तो क्या तुम पर दांडे खा शक्ति हो, बोल। तुम ने मुझसे प्यार किया है, इस लिए ये बढ़ कर 15 हो गए हैं।” प्रिंसिपल जोर से बोला, उसकी तेज आवाज सुन कर पिंकी दार के कापने लगी। वही प्रिंसिपल मन ही मन बहुत खुश हो रहा था। “बोलो मारु दांडे तुम्हारे गधे (गांद) पर।”
“नहीं सर मुझे नहीं खाने वहां पर दांडे। आप मुझे थप्पड़ ही मार लिजिये।” पिंकी सुभक्ते हुई बोली।
“ठीक है। तुम अपनी सलवार आला कर, टेबल को पक्का कर झुक जाओ। और हां कोई व्यवहार नहीं, और नहीं तुम्हारे मुंह आवाज निकली।” प्रिंसिपल ने साफ शब्दों में समझौता दिया था की मार पड़ने पर चिखा या चिलया तो उसके लिए थिक नहीं होगा। प्रिंसिपल ने अपना ये ऑफिस क्लास से काफ़ी दूर पर बनाया था तक ऐसी कोई भी आवाज़ क्लास तक ना जाये।
प्रिंसिपल की बात सुन कर पिंकी का चेहरा पीला पद गया था क्योकी आज से पहले उसे अपने कपड़े किसी (मर्द) के सामने नहीं उतरते। पर आज उपयोग अपने बाप के उमर के समान प्रिंसिपल (मर्द) के आगे पद रहे थे। वैसा भी उसके पास अब कोई चारा नहीं था। आज समझ आया पिंकी को की जो लड़की प्रिंसिपल के ऑफिस से आती थी उनको बैठने में कोई दर्द होता था। पिंकी ने कुछ सोच और प्रिंसिपल से फिर से बोली, “सर ये आप थिक नहीं कर रहे हैं, मेरे साथ गलत कर रहे हैं। आप ऐसी कोई साजा नहीं दे सके। क्योकी ये नियम के खिलाफ है। आगर आपके मेरे तो साथ है। मैं अपने घर वालों को बोल दूंगा।” पिंकी का यूं धमकना देख कर, प्रिंसिपल के पास दीया है।
“अच्छा तो तुम मेरी शिकायत अपने माता-पिता से करोगी। ठीक है कर देने। मां को देखना की कैसे में तुम्हारी गांद पर मारा है। जब तुम्हारे माता-पिता आएंगे मेरे पास तो मैं तब उने बताऊंगा की तुम स्कूल में क्या करता हूं। कहने पर यहां की टीचर और लडकियां वही कहेंगे, जो मैं उन कहूंगा।” प्रिंसिपल उल्टा पिंकी को ही धमक दिया था। अब पिंकी को इतना तो समझ आ गया था की वो अब कुछ नहीं कर सकती। “अब मैं जैसा कहा है, वैसा ही करो।”
पिंकी अब रोटे हुए अपनी सलवार की आखिरी में अपना हाथ प्रशंसकों आला करने लगी। ये देख कर प्रिंसिपल का लुंड खड़ा होने लगा गया। प्रिंसिपल ने अपने लुंड को पंत के ऊपर से ही अपने हाथ से मसाला लगा। पिंकी ये देख कर और रोने लगी। पर उसके मुह से आवाज नहीं निकल रही थी। “जल्दी करो।” प्रिंसिपल जोर से बोला।
पिंकी दर के एक ही बार में अपनी सलवार घुटने तक ले आई। और झुक कर टेबल को पक्का ली। प्रिंसिपल आगे बढ़ और उसकी कमीज को उसके कमर (कमर) तक चड़ा दिया और सलवार को और आला कर दिया। और उसके जोड़े को फेलने लगा, पर जोड़ी में सलवार थी, जिस वजह से पिंकी की तांगे सही से नहीं फेल पा रही थी। इस्लिये प्रिंसिपल ने उसकी सलवार उसकी जोड़ी से निकल एक तरह से कुर्सी पर रख दिया और जोड़ा को फेलाया दिया। जिस करन पिंकी की पैंटी और छुपी उसकी फूल हुई बुरी साफ देख रही थी। पैंटी सिक्कुड कर पिंकी के गांद की डर में आ गई थी।
प्रिंसिपल अपना चेहरा उसकी कुल्हो के बिच ला कर जोर से फुक मारी। हरकत से पिंकी के रोरे तक खड़े हो गए। प्रिंसिपल ने बार अपने नाक उसे बुरा सता, जोर से बिना और खिचा और खड़ा हो गया। फिर उसे कुल्हो को सहलाते हुए बोला, “क्या खुशबू है तेरी बुरी की है। लगता है अभी तक उनगली भी नहीं डाली है इसके अंदर। सच में कमला सही बोल रही थी की तेरी बुरी अंछुई गुलाब मास है। “
पिंकी ये सब सुन कर हेयरन हो गई, और प्रिंसिपल की ऐसी हरकत को देख, उसकी रूह तक कान गई थी। अब दार लगने लगा था कहीं उसकी छुडाई ही ना कर दे का प्रयोग करें। और है लिए उसे रोना सुरू कर दी। उसके मुह से हल्की आवाज भी निकलने लगी थी। ये देख प्रिंसिपल को दार लगाने लगा था कहीं ये मार पैडने पर चिल्ला ना दे। अगर इसके भाई ने सुन लिया तो उसके लिए थिक नहीं होने वाला था। इस लिए उसने कुर्सी पर रखा हुआ सलवार उठ कर पिंकी के दोनो हाथ पिचे ला कर बंद दिया और अपना रूमाल निकला उसके मुह में थुश दिया।
अब प्रिंसिपल खुश हो गया था की पिंकी के मुह से कोई आवाज नहीं निकलने वाली। अब जैसा चाहा उसकी गांद के साथ मजा ले सकता था। प्रिंसिपल ने अपना खेल सुरु कर दिया। उसे अपना हाथ पिंकी के एक कुल्हे पर रख, पहले तोह सहलाया फिर दबाने लगा। थोड़े डेर ऐसा करने के बाद जोर के थप्पड़ उसके हमें कुल्हे पर मार दिया जिस्को वह सहला रहा था। थप्पड़ लगते ही पिंकी के आंखों से निर बह चले, जो उसकी कोमल और गोर गालो को भीगोटे हुए टेबल पर आ गिरे। प्रिंसिपल ने अब की बार दसरे कुल्हे को वैसा ही किया जैसा पहले वाले के साथ किया और फिर पहले से ज्यादा तेज थप्पड़ हमें कुल्हे पर। पिंकी चिख जोर से, पर वो चिख उसके अंदर ही रह गई, कपड़ा होने की वजह से, अगर उसके मुह में कपड़ा नहीं होता तो पुरा स्कूल ही उसमें चिखो से गंज उठा।
प्रिंसिपल ऐसे करते हुए पिंकी के दो कुल्हे लाल कर दिए थे। अब तो आलम ये था की अगर प्रिंसिपल उसके कुल्हे को छूत भी तो हमारी आंखों से आशु निकल जाते हैं। प्रिंसिपल ने प्योर 18 थप्पड़ मार लिए थे, पिंकी कोमल और नज़र कुल्हो पर। दोनो कुल्हे पर 9 9 थप्पड़ पड़े थे। अब सिरफ 2 थप्पड़ मारने को रह गए थे। प्रिंसिपल ने पिंकी के मुह से अपना रुमाल निकला अपने जेब में रखा।
“हां तो पिंकी अभी भी 2 बाकी है। क्या तुम 2 और खाने को तैयार हो।” प्रिंसिपल ने पिंकी को सिद्ध करते हुए बोला। पिंकी ने हाथ जोड़ कर बोली, “नहीं सर अब में एक भी थप्पड़ नहीं खा सकती।” और इतना कह कर वो रोने लगी। सच में ही उपयोग बहुत ही ज्यादा दर्द हो रही थी। उसके कुले सुज गए द मार खा कर। अब शायद ही क्लास में बैठा शक्ति थी। उसके दिमाग से कमला का नाम भी निकला था, जिस प्रिंसिपल ने सुरु में कहा था।
“तो थिक है। मैं अब थप्पड़ नहीं मारूंगा। पर एक थप्पड़ की जहान तुम्हें अपनी बुरी को एक मिनट तक चुनने देना होगा। बोलो मंजूर है।” पिंकी अब थप्पड़ नहीं खा सकती थी और न ही उसमें इतनी हिम्मत थी। इस्लिये उसे अपना बगीचा है में हिला दी। प्रिंसिपल ये देखते ही खुश हो गया। “गुड गर्ल, दसरे थप्पड़ के बदले तुम्हारे मेरे लुंड को एक पर चुमाना होगा।” पिंकी से हां कर दी।
प्रिंसिपल ने बगल में रखे सोफ़े पर पिंकी को लेटा कर उसे पैंटी निकला दिया, फिर उसके जोड़े को फेला कर अपना मुह उसे हलकी भूरे रंग के रोये से भरे हुए बुरे पर रख कर चुम लिया। फिर उसके बुरे के लैबो को अपने हाथ से फेल कर अपनी जिभ से चैट लगा। पिंकी की बुरी मार के वजह से जो हला सा रस छोटा था प्रिंसिपल की जिभ इस्तेमाल साफ कर अपने अंदर लेने लगी। प्रिंसिपल ने शुद्ध एक मिनट तक पिंकी गुलाबी बोर को छत्ता रहा। फिर वह वहां से उठा और एक तरह खड़ा हो गया।
“पिंकी जल्दी से अपनी पैंटी और सलवार पहनो।” पिंकी ने प्रिंसिपल की बात मान जल्दी से अपनी सलवार और पैंटी पहचान ली। वही प्रिंसिपल अपना पंत की ज़िप खोल अपना लुंड भर निकल कर हिलाने लगा। इस खेल में प्रिंसिपल के लुंड से भी वीर्य की बुंद निकल कर उसके अंडरवियर को गिला कर दिया था। साथ ही उसके विर्या से उसके लुंड का सुपाड़ा भीग गया था। “पिंकी जल्दी से इसे अपने मुह में लो और फिर चली जाना।” प्रिंसिपल की बात मान पिंकी अब बड़ी और उसके मोटे सुपड़े को अपने मुह ले ली। और जैसे ही पिंकी निकलने को हुए प्रिंसिपल ने उसके सर को पक्का कर अपना लुंड उसके मुह के अंदर और दाल दिया। 2 3 बार उसके मुह में ढका लगने के बाद अपना लिंग निकला लिया।
“अगर तुमने ये बात किसी से कहा तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा।” धमकते हुए प्रिंसिपल ने पिंकी से बोला। पिंकी ने भी अपना बगीचा है में हिला दी। “ठीक है अब जाओ। यहां से काफ़ी समय हो गया है।” पिंकी ने जैसे ही ऑफिस का दरवाजा खोल और बहार को निकली, ठीक सामने संतोष खड़ा था। पिंकी के चेहरे को देख कर संतोष गुसे से भर गया।
“पिंकी अपने हाथ दिखो मुझे।” संतोष ने जोर से बोला। प्रिंसिपल ने भी ये बात और से सुन ली। उसे जल्दी से अपना लुंड पंत के अंदर दाल ने लगा। पिंकी ने अपना हाथ आया नहीं किया। तो संतोष ने अपना हाथ आगे बढ़ कर उसके हाथ को पक्का आ गया किया। “पिंकी अपनी मुठी खोलो।”
“संतोष रहने दे। और चल यहां से।” पिंकी ने संतोष को और न जाने और वहां से ले जाने की कोषिश की। पर संतोष का पारा पहले हाई हुआ पड़ा था, पिंकी के चेहरे को देख, और इस तरह से कुछ न कहते देख, समझ आ गया की जरा कुछ उल्टा हुआ है उसके था।
“मैं कहा न अपना हाथ देखा।” संतोष ने जोर से और अपनी आंखे दिखते हुए बोला। पिंकी दर के मारे अपना हाथ खोल दी। पिंकी के हाथ पर कोई निशान नहीं द और नहीं उसके चेहरे पर। “तू यहां से कहीं मत जाना। अगर तू गई तो अच्छा नहीं होगा।” इतना कह संतोष और चला गया और ऑफिस का दरवाजा बंद कर दिया। पिंकी बहार ही खादी हो गई।