मेरा घर और मैं अध्याय 10
संतोष हाथ मुह धो कर वापस से कजरी के कामरे जा चुका था। वही कजरी संतोष के लिए एक थाली में पूरी और सब्जी, साथ ही एक कटोर में खीर एक तरफ रख दी थी। फिर कजरी चली दी अपने कामरे के तारफ, जब वहा पर आई तो देखा की संतोष बिस्तर पर ही बैठा हुआ उसका इंतजार कर रहा था।
“बड़ा डर कर दी भाभी। मुझे तो लगा था कि बनाना बैठा हो, इस लिए डेरी हो रही है।” कजरी को कामरे के अंदर हाथ में थाली देख कर संतोष ने तंज कस्ते हुए कहा। वही कजरी मस्कुराते हुए अब बड़ी और थाली को संतोष के आगे रख कर दी। खाने को देख कर संतोष ने कहा, “वहा भाभी खाना तो लाजिज है। खा कर तो मजा आ जाएगा। पूरी देखो आपके गल के तरह फूले हुए हैं। वही सबजी तो आपके नैन के तार तो इतनी अच्छी। दुग्धकलश का दूध सारा निचोद कर दाल दिया हो।”
“अच्छा जी चलो पहले खा कर दो बताता की कैसा हुआ है। या सिरफ देख कर सब पता चल जाता है, क्या देवर जी।” कजरी ने संतोष की बात सुन कर मुस्कान दी। फिर एक निवाला पूरी और सब्जी का ले कर संतोष के मुह की तरफ बढ़ा दी। वही संतोष ने अपना मुह खोल हमें निवाले को और ले कर खाने लगे। संतोष ने भी ऐसे ही एक निवाला बनाया और कजरी के तार बढ़ा दिया। कजैर भी अपना मुह खोल कर उसके खा ली।
“पूरी सब्जी तो बड़ा ही स्वस्थ बना है। वैसा एक बात कहु कजरी भाभी आप बुरा न माने तो।” संतोष पूरी सब्जी का निवाला बनते हुए कहा। वही कजरी ने हां में बगीचा हीला कर अपना समर्थन दे दी संतोष हमें निवाले को कजरी के मुह के पास ले आया, और कजरी ने मुह खोल कर खान ली। “वैसे इस खीर को तो खाने जब ही मजा आया जब ये आपके ऊपर गिरा हो। और मैं अपने जीभ से चल कर अपने मुह में ले कर कहां।”
“अच्छा जी तो खीर को मेरे ऊपर गिरा कर खाने का मन कर रहा है मेरे देवर जी का। तो थिक खा लेना, पहले इसे पूरी सब्जी को तो खतम करो। उसके बाद खाते रहना जहां मन कर गिरा।” कजरी ने कामुक अड्डा के साथ बोली। फिर क्या था संतोष लग गया पूरी सब्जी खतम करने में। साथ ही संतोष ने कजरी को भी अपने हाथ से खिलाड़ी रहा। 10 मिनट में कजरी और संतोष ने खाना खा लिया था
“भाभी आप खीर को यही रख दो। और ये थाली रख आओ। जब तक मैं भी अपने हाथ धो लेता हूं उसके बाद खीर को साथ में खाएंगे।” संतोष ने कहा और बिस्तर से ऊपर गया अपने हाथ धोने के लिए। वही कजरी ने भी थाली में से खीर की कटोरी एक तार रख दी और थाली उठा कर कामरे से बाहर चली गई वही संतोष जब हाथ धो रहा था की घर का मुखिया द्वार पर खटखटने की आवाज आने। कजरी ने भी आवाज को सुन ली थी, जो नाल के पर अपने हाथ आने आ रही थी। “भाभी अब कौन आ गया, समय है। कहीं आपके सास और ससुर अपने बेटी को ले कर तो नहीं आ गए।”
“पटा नहीं देवर जी। तुम हाथ धोयो मैं जकार देखती हूं। की है वक्त कौन आ गया हम तांग करना।” कजरी बिना हाथ धोए ही मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गई, जब की संतोष अपने हाथ धोने लग गया। जब कजरी ने दरवाजा खोला तो सामने लाजवंती खादी थी। लाजवंती इस समय एक नीले रंग की जालिदार साड़ी पनी हुई थी जिसमे से उसके नीले रंग का ब्लाउज साफ दिख रहा था और आला उसकी रंग की पेटीकोट भी साफ दिखाई दे रहा था। इस साड़ी में लाजवंती कुमदुनी की फूल की तरह देख रही थी, क्योकी उसके गोरे शरीर पर ये नीले रंग काफी मनमोहक लग रही थी
“क्या कजरी दरवाजा खोलाने बड़ा डेरी कर दी कहीं कोई और तो नहीं है जो तेरे इस रूप का रसन करने में लगा हुआ था, जिस कारण से तुझे आने में डेरी हो गई, अगर ऐसा है तो मैं चली जाती हूं। साथ।” लाजवंती ने शरारती अंदाज में बोली, कजरी भी लाजवंती के हाथ को पक्का कर और खिच कर दरवाजा बंद कर दी। “तुझे बड़ा पता है। मैं और क्या कर रही थी। मुझे तो लगता है कि मेरे से जाद तेरी है, मैं खुशली हो रही है, जो ऐसे कपडे पाहन कर गांव में घूम रही है। खोटा गढ़ दे तुझे जी भर पेले।” कजरी अपना हाथ नल के पर धोने लगी।
“चाह तो मैं यही रही हूं कजरी। पर कोई मिल ही नहीं रहा। सब दूर से देख कर अपना पानी निकल लेते हैं, ऐसे गरम छोड़ देते हैं। अब तो बस संतोष बाबू का ही आश भी है। बस कैसे भी उन्हे अपने ऊपर चढाना है। फिर देख कैसे मेरी बोर की प्यास बुझती है। जब से उसका बन्स देखा है, तब से मेरे बदन में आग लगी हुई है।” लाजवंती ने अपने दिल का हाल कजरी को सुना दी। वही कजरी अपनी सहेली का हाल जान मुस्कान दी है। कजरी का जिस्म भी उसकी सहेली की तरह जल रही थी। दोनो का एक ही सहारा था, अब वो सिरफ था संतोष।
दोनो ही बात करते हुए संतोष के पास पाहुच गई। जहां कजरी ये जनता थी की संतोष उसके ही कामरे में बैठा हुआ है, वही लाजवंती ये नहीं जनता थी। जैसे लाजवंती ने अपना कदम कजरी के कमरे में राखी वैसा ही वहां पर संतोष के देख कर उसकी आंखें बड़ी हो गई।
“हाय लज्जो रानी तुम तो साड़ी में कुमदुनी के फूल की तरह दिख रही हो और वैसे ही खिली हुई है। लगता है मरने के इरादे से इस तरह सज कर बहार निकली हो।” संतोष बिस्तर पर से ही लेटे हुए बोला। संतोष लाजवंती के इस रूप को देख कर मधोश सा हो गया था। लाजवंती भी संतोष की बात सुन कर शर्मा गई। वो तो समझ ही नहीं पा रही थी की वो क्या कहे या क्या ना कहे। “बोलो भी लज्जो रानी। यह ऐसी ही खादी बस देखती रहेगी। अब तो खीर नील फूल पर गिरा कर ही खाउंगा।”
“क्यू देवर जी इज छिनार को देखते ही मुझे भूल गए। अभी तो थोड़े डर पहले मेरे ऊपर गिरा कर खाने वाले थे। अब छिनार के ऊपर है।” कजरी ने लज्जो की और देखते हुए बोली। फिर उसे एक हाथ लज्जो के बहार को निकली हुई मदमस्त गंद को काश लिया और जोर से डबा दी। लाजवंती अपना हाथ पिच ले जार कर कजरी का हाथ, अपने पिचवाड़े पर से हाथ दी और बोली, “हट साली तू नहीं सुधारने वाली। जब देखो तब मेरी गंद के पिचे ही पद जाती है। जब की तेरे भी कुछ कम नहीं है। ” कजरी में पिचवाड़े को पक्का के जोर से लाजवंती ने दबा दी।
“चिंता मत करो भाभी आज की खीर तो मैं दोनो के ऊपर गिरा कर कहूंगा। पहले किस पर गिरता है वह देखना है। क्योकी मेरे पास सिर्फ 2 घंटे ही बचे हुए हैं, मुझे स्कूल भी जाना है। के ऊपर खीर गिरा कर कहां।” संतोष ने दोनो के तार देख कर बोला। कजरी और लाजवंती सोच में पद गई की पहले कौन।
“ऐसा है देवर जी आप पहले लाजवंती के ऊपर ही गिरा कर खा लिजिये, लज्जो के बाद मुझे पर गिरा के लेना।” कजरी ने बहुत ही चालक से ये बात कही, क्योकी उपयोग पता था की लज्जो भी कुछ ऐसा ही कहेगी। जैसे ही लज्जो मन कर के उसके लिए कहेंगे, वो झट से साड़ी खोल पास जाएगी। पर हुआ इस्का उल्टा हाय।
“ठीक है कजरी। वैसा भी मुझे घर जल्दी जाना है। तो पहले मेरे ऊपर ही देवर जी अपना खीर गिरा का कर खा ले। आ जाओ देवर जी।” लाजवंती ने कजरी के तारफ मस्कुरा कर देखी और फिर ये बात कही। कहां आज संतोष कपडे देखने आया था, कहां अब खीर खा रहा था। संतोष उठा और लाजवंती के पास आ गया।
“अब आपके ऊपर खाना है तो मुझे आपके जिस्म से ये सब हट जाएगा। वर्ना खराब हो जाएगा।” संतोष ने लाजवंती की साड़ी के पल्लू को पक्का कर बोला। लाजवंती शर्म से गड़ी जा रही थी। वही कजरी ये देख कर मस्कुरा रही थी, दुख तो हुआ था की पहले वो ना हो साकी, पर खुश भी थी की लाजवंती के बाद उसका नंबर आएगा। वही संतोष लाजवंती के ऊपर से साड़ी उतर चुका था और ब्लाउज के बटन को रहा था।
“लज्जो देख कैसे मेरे हाथ में अनमोल और कोमल उभार आते ही तन कर खड़े हो गए। जैसे पहरेदार हो तुम्हारे इस्न के।” संतोष बातो बातो में ब्लाउज के आखरी बटन भी खोल दिया और सफेद रंग के ब्रा में उसके लिए गोरे उसे आंखों के सामने आ गया। संतोष ने उसके अनमोल खने को पकड कर मसाला लगा। “लज्जो अपने आंखे खोलो और देखो कैसे मेरे मसलन पर और कथार होने लग गए हैं। पर उतने ही कोमल जैसे रुई हो।”
“आह्ह्ह संतोष बाबू धीरे से। मुझे दर्द हो रहा है। आ मां” लाजवंती के मुह से सिसकारी फूट पड़ी। वही संतोष अपना एक था आला ले जा कर उसके पेटीकोट के नादे को पक्का कर खिच दिया। नाडा खुलते ही पेटीकोट लज्जो के कमर से आला उसके जोड़े में आ गिरा। संतोष लज्जो को अपने बहाने में उठा कर बिस्तर पर देता दिया और खीर की कटोरी से थोड़ा सा खीर उसके कभी में गिरा दिया। फिर अपना मुह लगा कर खाने लगा। कजरी इस नज़र को देख उसके जिस्म भी उत्तेजित हो गया और वह अपने हाथ से अपने चुची को पका कर दबने लगी है।
“संतोष बाबू ये कैसा जादू कर दिया तुमने। मेरा ये जिस्म मेरे कबू में नहीं आ रहा है। मां iiiiiiiiiuiii मां। मार गइइइइइ री।” लज्जो अपने जिस्म को कबू में नहीं रख पर रही थी। जैसे ही संतोष अपना मुह उसके कभी पर रख, खीर रखता उसे कमर तीर की तरह ऊपर उठ जाती और जब संतोष का मुह उसके कभी से हटा तो आला बांध से गिर जाति। इस खेल के करन लज्जो की कोमल और गुलाबी की पंखुड़ी के समान उसे बुरे के होठ खुल और बंद हो रहे थे, साथ ही चीरे से रिस रिस के पानी बहार आ रहा था और उसकी पैंटी को गिला करने में लगा हुआ।
“बस मेरी जान कुछ देने और रह गए है खीर के। उनके खतम होते ही तुम आज़ाद हो।” संतोष ने कहा। फिर उसे अपना मुह लज्जो के कभी पर लग दिया। जहां पहले संतोष खीर को मुह में लेने के बाद अपना मुह हटा देता था, पर इस बार संतोष ने ऐसा बिलकुल नहीं किया। बाल्की संतोष ने अपनी खुदरी जिभ को उसके कभी में घुमने लग गया। लज्जो की कमर ऊपर आला होने लगी थी। वही संतोष ने उसे कमर को कास के पकाड़ ली, हाथ कुछ इस तरह से रखे थे की उसमें कुल्हो के डर में संतोष की उनगली आ गई थी। संतोष लज्जो के कभी से अपनी जिभ तब तक नहीं निकली जब तक लज्जो के मुह से चिख न निकल गई।
“आहा मां मर गई। मैं गई संतोष बाबूउउउई।” लज्जो के मुह से ये आखिर शब्द निकले थे। उसकी बुरे के फांको से अमृत धारा बहा निकली थी जो उसकी पैंटी को पूरी भीगो दी थी। कजरी का हाल भी बहल हो गया था। उसकी योनि से भी रस की धारा बह रही थी जो उसकी पैंटी को गिली कर रही थी।
“कजरी आ जाओ अब तुम्हारी बड़ी है।” संतोष लज्जो के पास से उठ कर खड़ा हो गया और कजरी के तरफ बढ़ा गया। वही लाजवंती अपनी जिंगी की पहली ऐसे संकल्प का आनंद ले रही थी, जो बिना चुदाई के हुआ था फिर शादी के सुरु में ऐसा संकल्प महसूस की थी, अपने सुहागरात के दिन या उसके कुछ दिन बाद। ये बात सिर्फ लाजवंती ही बात शक्ति है। लाजवंती बिस्तर पर लेटे हुए अपनी आंखे बंद कर के पल को महसूस कर रही थी।
वही संतोष कजरी की साड़ी और ब्लाउज निकला चुका था और उसके चुची को अपने हथेली में कैद कर लिया था। कजरी ने ब्रा नहीं पहिनी थी या कुछ समय पहले ही निकल चुकी थी, फिर पहनी ही नहीं होगी। संतोष के हाथ लगते ही कजरी मचाल गई थी। उस्का शरिर कानप सा गया था।
“क्या बात है मेरी कजरी तुम इस तरह से कानप क्यू रही हो। जैसे तुम्हें ठंडा लग रही हो।” संतोष ने कजरी के उन सुडोल और कोमल रस भरे हुए संतरो को पक्का कर मिसाना सुरु कर दिया था। संतोष अपने हाथ का कमल उसके उन्नत उरोज पर दिख रहा था।
“देवर जी, मुझे यहाँ खड़ा नहीं रह पाउंगी। आहा माँ देवर जी।” कजरी के मुह से शब्द निकले तो सही, पर बहुत ही धीरे से और माधोशी के आलम में। कजरी संतोष ने गले में अपने बहने दाल कर झूल सी गई। संतोष ये देख कर उसे अपनी बहन में उठा कर लज्जो के बगल में लेटा दिया, पर उपयोग पहले कजरी के जिस्म से उसका पेटीकोट अलग कर चुका था। कजरी ने पैंटी पनी हुई थी। जो योनि रस से भीग चुकी थी।
“तुम तो पहले ही गिली हो चुकी हो कजरी। कहीं ऐसा न हो की मेरी खीर खतम करने से पहले मूट दो।” संतोष ने कजरी के गुलाबी होठो को चुम कर बोला। कजरी संतोष की बात सुन कर शर्मा गई और धीरे से बोली, “तो क्या हुआ देवर जी। आज तुम भी देख लेना की कैसे एक और लूटी है। कभी ऐसा नजर नहीं देखा होगा।”
“ये जो तुम देख रही हो कजरी भाभी न मुझे। पर शायद तुम ये भूल रही हो की मैं ने तुम्हें पहले भी लूटे देखा है। याद है ना वो खेत वाला दृश्य, या भूल गई।” संतोष ने कजरी के पैंटी उतरते हुए उस दिन का याद दिलाने लग गया।
“हमें दिन तो तुमने मुझे दूर से देखा था, शायद तुम्हें थिक से दिखी भी न दिया हो। पर आज तो बिलकुल पास से देख सके।” कजरी सच में कजरी थी, बात भी दिल खोल कर करती थी जिसे भी करती थी।
“कमर तो उठा जरा मेरी कजरी भाभी तकी मैं तुम्हें लूटे देख सकु, जब तुम लूट रही होगी।” संतोष ने पैंटी को निचे करते हुए कहा, कजरी भी अपनी कमर उठा दी। संतोष बिना के पल गए उसके जोड़े से पैंटी गयाब कर चुका था। कजरी अब बिलकुल निर्वस्त्र लाजवंती और संतोष के सामने बिस्तर पर लेति हुई थी। संतोष ने खीर का कटोरी उठा कर खीर को उसके कभी और उसे योनि के ऊपर तक दाल दिया। खीर का दूध कजरी के योनि चीर में प्रवेश कर चुका था।
कजरी ये नज़र देख कर उसका जिस्म कामुकता से भर गई। वही संतोष कजरी के दोनो जोड़े को फेल दिया और झुक कर अपना मुह उसकी योनि के पास ले आया, फिर अपनी जिभ निकल कर के हमें योनि चीर में लगा दिया। हलक डबवा बनते हुए अपनी जिभ को हमारे अंदर और परवेश कर, आला से ऊपर अपनी खुदरी जिभ को ले जाने लगा, बहुत ही आहिस्ता आहिस्ता। कजरी की कमर तो धीरे से ऊपर उठ भी गई थी और अपने सर को आधार करने लग गई थी। लाजवंती भी नजर को देख कर एक बार फिर से गरम होने लग गई थी।
“आहा मां देवर जी, ये आपने कहा से शिखा आ मां, सच में ही मैं तो पागल हो जाऊंगी। आ मां उउउइइ ऐसा स्वर्ग-आनंद तो मैं ने पहले कभी भी नहीं देख पाई।” कजरी अपनी उखड़ी हुई सांसो और माधोशी में खराब बददये जा रही थी वही संतोष अपने काम में लगा हुआ था। संतोष कभी कजरी की योनि को अपने जिभ से चैट तो कभी अपना मुह उसके कभी पर रख कर और घुमने लग जाता है। संतोष खीर कुछ ही पालो में खा कर खतम कर चुका था। बच्चा था तो सिर्फ खीर का रस जो संतोष अपने जिभ की कलाकार दिख कर साफ करने में मैं लगा हुआ था। वही लज्जो अपनी चुची को एक हाथ से दबने और एक हाथ आला ले जा कर अपनी योनि को रागद ने में लग राखी थी।
“मां मैं आ गया गइइ देवर जिइइइ।” इस के साथ कजरी योनि से ये फुवारा निकल गई। जो उसके बिस्तर पर और कुछ आला गिरे। अच्छा हुआ की संतोष कजरी के अखरी शब्द और उसके जिस्म की एथन को देख कर इस्तेमाल जोड़े के बिच से हट गया था वर्ना संतोष के सारे कपड़े गिले हो गए होते हैं। संतोष का उधर से हटना हुआ की उसके योनि से धारा बहार निकला ना।
संतोष और लाजवंती उसके बगल में लेटे हुए ये नजर देख रहे थे। कजरी के योनि से रुक रुक मूट निकल रहा था। संतोष कुछ पल कजरी के जोड़े के पास बैठा कर उसकी योनि से निकले रहे फुवरे को देखता रहा।
थोड़े डेर बाद जब कजरी शांत हुई तो संतोष ने कहा, “आप दोनो बचा हुआ खीर को खाना है। और अब आप दोनो कैसे खाओगे, ये आपको दोनो पर है।” संतोष ने कहा और बिस्तर पर पासर गया।
फिर क्या था दोनो मिल कर कुछ पालो में संतोष को निर्वस्त्र कर दिया और कपडो को एक तरफ रख दिया। उसके बाद कजरी ने हमें खीर के कटोरी को उठा कर देखा तो उसके अंदर बस हलक सा ही खीर था, जिसको कजरी ने उसके लिंग पर गिरा दिया। तो कुछ उसके देखे पर तो कुछ नाभि से और लिंग के बिच के उससे में। उस खीर को तारः गिराया की वो हलक सा ही खीर ही संतोष के उन उनके पर ठिक से लग गया था।
“लज्जो सुरु कर अपने देवर जी की सेवा। जरा हम भी तो दिखाये की हम इनसे कुछ कम नहीं है।” कजरी ने खाली कटोरी को एक तरफ रखने के बाद लाजवंती की तरफ देख कर बोली। “हां क्यू नहीं, सुरु करते हैं।”
फिर क्या था एक तरह से लज्जो तो दुसरी तारफ कजरी संतोष के निपल पर अपना मुह लगा दी। मुह में भर के चुन्नी लगी जिस तरह के बच्चे अपनी मां दूध को पीठ था। संतोष का शरिर है हमले से पूरी तरह से हिल गया। उसके जिस्म की साड़ी नासो में खून कर प्रवाह दुगनी रास्ता में दुआ ने लग गया। उनके इस तरह के हरकत की वजह से संतोष के लिंग से दो बंद वीर्य बहार निकला और ऊपर से आला गिर गया।
कजरी और लाजवंती संतोष के निप्पल को चुस कर लाल दी थी। संतोष के मुह से भी सिसकारी निकल कर कामरे में लगे थे। 5 मिनट में संतोष की हलत बिना पानी की मछली जैसी हो गई थी। एक बहार फिर से कजरी और लज्जो अपना अपना रुख संतोष के खास अंग की तरह कर दी। दोनो ही लिंग के 3 इंच अपने होते कर दिया और अपनी जिभ को निकल कर खीर को चाट कर अपने मुह में भरने में लग गई थी।
“भाभी, कैसा जादू कर दिया आप दोनो ने मेरे ऊपर की मैं अपने आप पर कबू नहीं कर पा रहा हूं। आह्ह्ह भाभी बस और नहीं। नहीं तो मेरा निकल जाएगा।” कजरी ये सुन कर मस्कुरा दी और बोली, “बस इतने में ही तुम्हारी ढीली ही गई। समय तो बड़ा शेर बन रहे थे।” कजरी के इस बात पर लज्जो हंसे लग गई, ये देख कर संतोष मुस्कान दिया।
“तो फिर देखा जाए कौन शेर है, कौन बकरी?”, संतोष की बात को सुन कर दोनो ही भदक गई और उसका विर्या निकलाने के लिए धवा बोल दी। नाभी के आला का सारा खीर कुछ पल पहले ही चैट कर साफ कर चुकी थी। अब बच्चा था तो सिरफ लुंड के ऊपर जिस वीर्या की कुछ बुंदे लगी थी निकल कर, तो कुछ लिंग आला झूला हमें आमोर्ड के ऊपर। एक तार कजरी ने लिंग के ऊपर अपनी जिभ को आला से ऊपर तक घुमा दी तो वही लज्जो ने अपने जिभ को लिंग के हम अमरोद के ऊपर से लिंग के ऊपर सिर तक। एक बार फिर से संतोष के लिंग से दो बुंद निकल कर आला के तार लुडक आया, जो सिद्ध कजरी के जिभ पर जा लगा। हरकत के करन कजरी की बोर ने पानी की निकलने की रफ्तार तेज हो गई है। तो संतोष ने अपने हाथ बढ़ा कर कजरी के बुरे में अपनी दो उनगली दाल दी। संतोष की उंगली को अपने बुरे के अंदर महसूस करते ही, कजरी के मुह से एक सिसकारी निकल कर कामरे में फेल हो गई। लज्जो का हाल भी कुछ कुछ कजरी से काम ना थी, उसे बुरा भी पानी बनाने में लगी हुई थी, जो उसकी पैंटी देख पर पता चलती थी।
कुछ ही पालो में ही पालो में कजरी और लाजवंती ने संतोष के लिंग के ऊपर गिरे हुई खीर को चाट कर साफ दी। तो वही संतोष का लिंग उनकी मुह के लार और ठुक से भीग चुका था
“संतोष बाबू अब मेरी गुलाबी परी की आग को ठंडा कर दो, अपने खुटे और दाल कर हैं। अपने खुटे को तब तक मत निकलना जब तक मेरी गुलाबी परी खुशी के आंसू न बहा दे।” कजरी ने अपने जोड़े को फेला दी और संतोष के होथो को चुनने के बाद बोली। संतोष भी कजरी की बात सुन कर मस्कुरा दिया और उठा कर बैठा और बोला, “चिंता मत करो कजरी भाभी आज अपनी गुलाबी परी का वो हाल करुंगा की वो रोना बंद कर देगी.. और लज्जो रानी आप को अपने आप में देखा था मैं ने जब आप दोनो ने मेरे विशाल और मोटे हाथी को देख कर आप दोनो को आंखे बड़ी और डर के भाव आ गए थे। पर योनि की तड़प ने सारा दर कुछ ही पालो में गयाब कर दिया, उसके उत्पन्ना ने ले लिए।”
संतोष की बात सुन कर दोनो ही मुस्कान दी। संतोष कजरी के जोड़े के बिच आ कर उसके जोड़े को और फेला दिया, जिससे कजरी की योनि के होठ और फेल गए और उसके अंदर के गुलाबी छेद साफ दिखलाई देना लगा। “मेरी कजरी भाभी तुम्हारी छेड को देख ऐसा लग रहा की आज तक इसके अंदर कुछ गया ही ना हो। संतोष इतना कहने के बाद हंसे लग गया। संतोष की बात सुन कर लज्जो और कजरी हंस दी। वही संतोष अपने हाथियार को पक्का के कजरी के योनि-रस से अपने हाथियार को भीगने के लिए ऊपर आला करने लग गया।
“संतोष बाबू, हाथियार तो ठिक ठक ही तुंहारे भैया का, पर जब महिन में एक बार जाए, ये 2 माहिने पर। तो ऐसा तो दिखेगा ही, पर यहां तो 3 माहिन हो गए हैं। पर हा लिए हैं। बात सच कहती है की तुम्हारे हाथियार के आगे उनका एक मिर्ची के समान ही है। अब और मत तड़ापाओ मुझे क्योकी ये मेरे बरदाश्त से बाहर होता जा रहा है। के अनुसर।” कजरी ने आहे भारते हुए बोली और संतोष के लिंग को अपने छेड़ पर ठिका दी और ढकके मारने का इशारा किया।
“लज्जो रानी जरा ध्यान रखना की मेरे खुटे के जाते ही तुम्हारी ये सहेली चिकने न लगे हैं।” संतोष के इतना कहने के साथ ही लज्जो कजरी के मुह के पास आ कर स्नान गई। वही संतोष ने पहले में लिंग को डबवा बनते हुए थोड़े से लिंग मुंड को कजरी के योनि द्वार के अंदर प्रवेश कर दिया अभी इतना ही लिंगमुंड और गया था की कजरी के चेहरे पर दर्द के भाव थे।
“कजरी भाभी संभलना अपने आपको। क्युकी अब आपको ज्यादा दर्द होने वाला है।” संतोष की बात सुन कर कजरी ने अपनी पालकी छपका दी। कजरी का इशारा मिला ही संतोष ने कजरी के कमर को पक्का कर एक मध्यम गति का ढाका मार दिया और 5 इंच लिंग को कजरी के योनि के अंदर दखिल कर गया। इस प्रहार के करन कजरी के मुह से एक चिख निकल गई, पर समय रहते हुए लज्जो ने अपने होथ कजरी के होथ से जोड़ दिया, चेतावनी उसे चिखा घर बाहर गली तक चली जाती और कोई गली में होता तो घर के और संतोष वही पर रुक गया और आला झुक कर कजरी के एक प्यार को अपने मुह में ले कर चुना लगा तो दुसरे को अपने हाथ में भर के दबने और मसाला लगा। कुछ पालो के बाद कजरी के शरीर में जो दर्द और दर्द थी, उसके जहान अब काम और उत्पन्ना ने ले लिया था और अपनी कमर को ऊपर उठा कर लुंड को अपने योनि के अंदर लेने का प्रयास करने थी
संतोष कजरी के क्रिया और हलचल को देख कर अपने खुद को जितना और गया था मैं नीचे और छोड कर भर निकला और फिर वापस जिस गति से निकला था का उपयोग गति में ढकेल दिया। ऐसे संतोष ने 2 मिनट तक करता रहा। जिस करन कजरी की कोमल छेद, संतोष के मुसल को अपने अंदर में प्रवेश करने में सक्षम हो गई थी। वही लज्जो अब एक तरह से अपने छोटू के साथ खेल रही थी अपने कोमल हाथो से। संतोष अब कजरी के कमर को पकड़ कर ढकके लग रहा था, ढकके सातिक ले में लग रहे थे।
“आहा मां आ गई और उईई ओह्ह्ह्ह देवर जी बस ऐसे अपने हाथों को चलते रहो। आज तक ऐसा आनंद कभी नहीं मिला मुझे। आ मां ऐसे ही आरा उओइक और जोर से।” कजरी काम सामने में जो मन में आए बोले जा रही थी। संतोष भी अपने रफ़्तार में कमी लाए बेगेर अपनी हाथी को धीरे धीरे और दलते गया। जिस वजह से कजरी को दर्द के साथ मजा भी मिल रहा था। और इस मिले झूला भव को उसके कोमल चेहरे पर देखा जा सकता था।
संतोष बिच बिच में झुक कर उसके मध्यम आकार के मन के गोले को अपने मुह भर के चुना लगता है तो कभी अपनी जिभ बहार निकल के चुचक के चारो घुमने लग जाता है। इस दोहरे हमले के करन कजरी का जिस्म ऊपर आला उठे लग गया था और उसके योनि से रस का बहाव भी पहले से ज्यादा हो गया था, जो लिंग के बाहर आने पर रस भी बहार आ कर उसकी कुल्हो के बिच जो भूरे रंग था उसे गिला करते हुए चादर पर गिरे लग गया था।
“आह मां देवर जी ऐसे ही और जोर से, मैं आने वाली हूं। आ मां ऐसे ही और जोर से आ मां ओह्ह्ह आआमा।” कजरी अपने आखिरी पड़वा पर थी। वही संतोष ने भी अपने बढ़ते हुए बोला, मैं आने वाला हूं कजरी, आहा कुछ पल रुक जा।” संतोष ने के बाद अपने पहले से दुगनी कर दी थी। 1 मिनट तक संतोष के लिंग से वीर्य की बाउचर कजरी के योनि के अंदर होती रही। जैसे लिंग से वीर्य का निकला बंद हुआ संतोष ने अपने खुटे को बहार निकला लिया।
फिर एक तारफ गिर गया। संतोष ने करवा ले कर कजरी के होठो को चुम कर फिर से सिद्ध ले आया। कजरी के योनि से वीर्या और योनि रस बहार निकला न सुरु कर दिया था। उसकी योनि पर कुछ खून के निशान भी तो जो है बात के सबत की उसकी योनि आज पूरी तरह से खुल गई थी। संतोष के लिंग के द्वार।
वही दुसरी तारफ लज्जो भी इस कदर पैदाजीत हो गई थी उसे अपनी उंगली अपनी छुट के अंदर घुसा कर नीचे भर कर रही थी। कजरी और संतोष से कुछ पल पहले ही, लज्जो की योनि ने अपना रस बहा दी थी उसके योनि से एक तेज धार के साथ निकल कर बिस्तर को भीगोना सुर कर दी थी।
क्या समय तीनो के हलत एक ऐसे ही है। तीनो की सांस तेज चल रही थी। वही कजरी और लज्जो की सांसे तेज चलने के करण उनके चुचि पर आला हो रही थी, देखने में ऐसा लग रहा था कि जैसा कोई गुब्बारे में हवा भर रहा हो, जो हवा निकलाने के कर फूल और पचक।
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