मां और बेटे का प्रेम कहानी सीजन 1 एपिसोड 4
मा ने उसे लिपटा लिया और प्यार से स्तनपान करने लगी. शशिकला आँखे बंद
करके मा का स्तनगार चूसने मे मग्न थी, मानों किसी बच्चे को
मनपसंद चीज़ मिल गयी हो, अपनी जांघों मे उसने मा की एक टांग पकड़
ली थी और अपनी बुर उस पर घिस रही थी.
शायद वह बहुत देर चुसती पर मा अब बहुत कामतूर हो गयी थी, उसके
निपल मे से चुदासी की ऐसी मिठास निकलकर उसके सारे शरीर मे दौड़ रही थी
कि उसके मूह से एक आह निकल पड़ी. शशिकला तुरंत उठाकर मा की टाँगों के
बीच बैठ गयी और मा की पैंटी उतार दी. मा की घनी झान्टो पर उसकी नज़र
टिक गयी.
मा तोड़ा शरमा गयी “बहुत बाल है ना शशि? मैने कई बार सोचा कि निकाल
दूं पर वो मानता ही नही ….” और अचानक चुप हो गयी जब उसे ख़याल आया कि
वह मेरे बारे मे याने अपने बेटे के बारे मे कहने ही वाली थी.
“बहुत अच्छे बाल है दीदी, घने और घूंघरले, रेशमी, मुझे अच्छे लगते
है पर सिर्फ़ बड़ी उमर की औरतों मे. किसके बारे मे बोल रही थी दीदी तुम, किसे
झान्टे अच्छी लगती है तुम्हारी? बताओ ना? अरे ऐसे शरमा रही हो जैसे नयी
दुल्हन! खैर, बाद मे बता देना, उई & मा & कितनी गीली है दीदी तुम्हारी बुर,
इतनी मस्त हो गयी है मेरी दीदी मेरे पास आकर!” मा की बुर मे उंगली करते
हुए शशिकला ने कहा. उंगली निकालकर चाटी, मा की आँखों मे आँखे
डालकर शैतानी से आँखे बड़ी करके और गर्दन मटकाकर कहा कि लाजवाब
है और फिर झुक कर मा की बुर मे मूह डाल दिया.
मा की चूत पर शशि घंटे भर लगी रही, उससे खेला, खोल कर देखा,
चूमा, चाटा, मूह मे लेकर चूसा, उंगलियाँ अंदर बाहर की और जीभ अंदर
डाली, हर तरह से मा की बुर का स्वाद लिया. मा इतनी बार झड़ी की उसे याद ही नही
रहा. सुख के शिखरों पर वह चढ़ती रही, एक से एक उँचे वासना के
शिखर!
दर्जनों बार झड़कर आख़िर मा तड़प कर शशिकला को अपने से दूर करके
सिमट कर लेट गयी, उसे अब यह सहन नही हो रहा था. “बस कर शशि, मार
डालेगी क्या!” कहकर मा लस्त होकर पड़ी रही. शशिकला उसके पीछे लेटकर
उसकी ज़ुल्फों मे मूह छिपा कर उसके स्तनों को सहलाते हुए लेट गयी.
सम्हलने के बाद मा तृप्त थके स्वर मे बोली “तू जादूगरनी है मेरी बच्ची,
क्या करती है, पागल हो जाउन्गि मैं”
“अच्छा लगा दीदी अपनी छोटी का प्यार?”
“बहुत अच्छा लगा रानी, आ मेरे आगोश मे आ जा” कहकर मा ने पलटकर
शशिकला को बाहों मे ले लिया. मा और शशिकला की वह पहली रात एक
धुन्द कर देने वाली रति मे गुज़री. एक दूसरे के शरीर को उन्होने हर तरह से
भोगा, एक दूसरे के अंगों का स्वाद लिया और प्यार की बातें की. सोने मे रात के
तीन बज गये. फिर भी वे ठीक से नही सोई क्योंकि उनकी वासना धधक रही थी.
मा की नींद तड़के खुली तो देखा कि शशिकला उसकी बाहों से निकलकर फिर
उसकी जांघों के बीच मूह दिए पड़ी है “ओ मा तू शुरू हो गयी फिर से,
तेरी जीभ है या बिजली मेरी बच्ची, ओह ओह मत कर ना, चल शैतान, कम से कम
ऐसी सिकसती नैन मे तो आ जा, दीदी को भी ज़रा फिर से अपनी बुर का शहद
चखने दे” कहकर मा ने उसे पलटकर उसकी बुर से मूह लगा दिया. एक
दूसरे की बुर चूस कर दोनों औरतें फिर सो गयी.
H
जब मा की नींद सुबह खुली तो दस बज गये थे. शशिकला गहरी नींद मे
सो रही थी. मा उठाकर चाय बना लाई और शशिकला को उठाया. वह अंगड़ाई
देते हुए उठी “वह दीदी तुमने चाय बनाई? मा की याद आ गयी, वह भी ऐसे ही
चाय बनाकर लाती थी मेरे लिए, और किसी को नही बनाने देती थी.”
प्यार से कुछ देर चूमा-चाटी करके दोनों नहाने गयी. साथ साथ नहाई, एक
दूसरे को नहलाया, शरीर पर साबुन लगाया और प्यार से एक दूसरे को लिपट लिपट
कर खूब किस्सिंग की. मा का मन हो रहा था की फिर से वही घुटनों के बल
बैठ जाए और उस सुंदर युवती की टाँगों के बीच के खजाने को फिर चूसना
शुरू कर दे. पर उसने मन को समहाल लिया, सोचा ज़रा आराम के बाद दोपहर
को फिर से शुरू करेंगे.
बदन पोंछ कर वे बाहर आई. शशिकला बोली “दीदी, तुम बैठो, मैं नाश्ता
बनाती हू, ब्रंच, सीधे लंच ही कर लेंगे, फिर दोपहर को ‘काम’ करना है.
रात को काफ़ी काम हुआ पर अभी पूरा नही हुआ. वैसे यह काम कभी पूरा नही
होगा लगता है, उसके लिए सालों लग जाएँगे दीदी” मा की ओर देखकर शोखी
से वह बोली. फिर वैसे ही नंगी किचन मे जाने लगी.
मा को अटपटा लग रहा था. “अरे गाउन तो पहन ले हम दोनों, कोई आ जाएगा!”
“दो दिन कोई नही आएगा दीदी. मैने सब को छुट्टी दे दी है. इसीलिए तो मैने कहा
था कि कपड़े लाने की ज़रूरत नही है. और मैं चाहती हू कि मेरी दीदी ऐसी ही
अपनी पूरी नेचारल ब्यूटी मे मेरे पास रहे, जब मन होगा मैं इस ब्यूटी को चख
लुगी, कौन कपड़े उतारे बार बार!”
“ठीक है शशि, मैं ज़रा घर मे घूम कर देख लू, तेरे ड्रेस भी देखना है,
बहुत अच्छे ड्रेस है तेरे पास”
“शौक से देखो दीदी, घर तुम्हारा ही है” शशिकला बोली.
मा ने उस आलीशान घर को देखा, शशिकला के बेडरूम का मुआयना किया.
शशिकला की सब ड्रेस बड़ी खूबसूरत थी, और ब्रा और पैंटी के तो दर्जनों सेट
थे, हर तरह के, और हर रंग के. और उसकी चप्पले और शुज़, बड़ा सेक्सी
कलेक्शन था. एक से एक है हिल के नाज़ुक सॅंडल, पतले सोल, पतले स्ट्रैप और है
हिल की चप्पले. मा को मेरी याद हो आई. मैं होता तो पागल हो जाता.
एक द्रावार मे उसे डीवीडी का बड़ा खजाना दिखा. सब ब्ल्यू फिल्म थी, अधिकतर
लेस्बियन, वो भी बड़ी छोटी औरत-औरत संभोग की याने मिच्योर यंग लेज़्बीयन
वाली. कुछ पुरुष स्त्री और गे फ़िल्मे भी थी. पर डिल्डो कही नही दिखे. सेक्स की
भूखी इस लड़की के यहा डिल्डो न हो, यह बड़ा आश्चर्य था.
मा ने जाकर शशिकला को पीछे से बाहों मे भरके चूमा और बोली “बहुत
सेक्सी कपड़े है तेरे. और शशि, तेरे पैर कितने खूबसूरत है, और उतने ही
सेक्सी सॅंडल है, वो देखता तो पागल …” फिर मा चुप हो गयी. चेहरा लाल हो
गया कि ग़लती से फिर अपने बेटे का नाम उसके मूह से निकलने वाला था.
“अब तो बताना पड़ेगा दीदी, कौन है वो तेरा दीवाना? मैं जानती हू कि तुम
डाइवोर्स हो, शादी भी नही की है. बताओ कौन है दीदी, मेरी कसम” शशिकला
हाथ करते हुए बोली.
मा ने बात बदलने की कोशिश कि “अरे शशि, सब है यहाँ, इतनी ब्ल्यू फ़िल्मे
भी है पर डिल्डो नही है. क्यों, तुझे मज़ा नही आता फेकिंग मे, चूत मे लंड
डालकर मस्त चुदवाने का मज़ा ही और है, और तेरी जैसी जवान गरम कन्या
इसका मज़ा न ले ये मैं मान ही नही सकती.”
“बहुत मज़ा आता है मा … मेरा मतलब है दीदी, पर असली लंड से, इन रबर के
लन्डो से नही, वैसे है मेरे पास, अंदर रखे है, दो तीन तरह के, आज या कल
रात को दिखाउन्गि. उनका उपयोग मैं चुदवाने के बजाय चोदने मे ज़्यादा
करती हू. पर अब बताओ, बात बदलो नही, कौन है तेरा चाहने वाला?”
मा शरमाती हुई चुप रही तो हँसती हुई शशिकला बोली “मुझे मालूम है,
मैं बताती हू, तुम्हारा वो खूबसूरत बेटा. बोलो सच है या नही?”
मा को शक लगा. “तुझे कैसे मालूम?”
“मैने गेस कर लिया दीदी, सीधी बात है, तू हमेशा इतनी तृप्त दिखती है, खूब
सेक्स का मज़ा लेती होगी यह साफ है, चेहरे की यह चमक सिर्फ़ सेक्स से ही आती है.
बेटे पर बहुत प्यार है, ऑफीस मे अक्सर उसका ज़िक्र करती है, उसका फोटो तेरे
पर्स मे है, कही घूमने नही जाती बेटे के सिवाय, मुझे सब मालूम है, तुझे
घर बुलाने के पहले मैने पूरी जानकारी निकाली है, आख़िर जो औरत मेरी मा की
जगह ले रही है, उसके बारे मे पूरा मालूम करना ज़रूरी है मेरे लिए”
मा भोंचक्की हो कर चुप हो गयी. एक तो उसका चेहरा अब भी लाल था की
शशिकला को उसके और मेरे बारे मे पता चल गया है. अब मा की जगह वाली
बात से वह और अचरज मे पड़ गयी. फिर उसे कुछ कुछ समझ मे आया, क्यों
अचानक शशिकला ने उसे दीदी की बजाय मा कहा था अभी अभी; उसकी बुर मे
अजीब सी गुदगुदी होने लगी.
मा का चेहरा देख कर शैतानी से हँसती हुई शशिकला बोली “क्यों दीदी, जब
मा बेटे मे प्यार हो सकता है तो मा बेटी मे क्यों नही?” मा की शरमाई
बौखलाई हालत पर तरस खा कर फिर शशिकला बोली “चलो दीदी, लंच कर
लो और मुझे सब बताओ अपने बेटे के बारे मे. फिर मैं सब बताती हू, मा के बारे
मे और डॅडी के भी!”
“डॅडी के बारे मे? याने माथुर साहब? क्या कह रही है शशि?” मा ने पूछा.
“तो और क्या? मा और मेरे प्यार के बारे मे भी बताउन्गि और डॅडी और मेरे
भी, क्या दीदी, तुम बहुत भोली हो, जब मैं कह रही थी कि मुझे डिल्डो नही, सच
के लंड से चुदवाना अच्छा लगता है तो तुझे क्या लगा किस के लंड के बारे मे
बोल रही थी? वे मेरे सौतेले डॅडी है, वैसे असली होते तो भी मुझे फरक नही
पड़ता, बल्कि और मज़ा आता. अब चलो, मैं बेताब हू मा बेटे के प्यार की कहानी
सुनने को”
मा ने खाना खाते हुए मेरे और उसके बारे मे सब बताया. मेरी चप्पल फेटिश
के बारे मे भी बताया.
सुनकर शशिकला की आँखे चमकने लगी “बड़ा रसिक
लड़का लगता है, मालूम है डॅडी को भी इसका शौक है कुछ कुछ. मेरी
चाइस कितनी सही निकली दीदी, कैसे मैने तुझे ढूढ़ निकाला, है ना कमाल? अब
तू बैठ, मेरा खाना हो गया है पर स्वीट डिश बाकी है, वो मैं ले लेती हू” और
टेबल के नीचे घुस कर वह मा की बुर पर टूट पड़ी.
मा ने जब तक खाना ख़तम किया, शशिकला ने अपनी स्वीट डिश हासिल कर ली.
आख़िर मा ने उसे पकड़कर टेबल के नीचे से निकाला. “चल, कितना चुसेगी, अब
मुझे बता क्या बताने वाली थी. ऐसा कर, मेरी गोद मे आ जा, और आराम से बता”
मा शशिकला गोद मे लेकर सोफे मे बैठ गयी और उससे लिपटकर
चुम्बनो का आदान प्रदान करते हुए शशिकला ने अपनी कहानी सुनाई.
शशिकला की मा ललिता बाइसेक्सुअल थी. स्वाभाव बहुत कामुक था. पति से
डाइवोर्स के बाद कोर्ट ने ललिता को मा के नाते शशिकला की कस्टडी दे दी.
बचपन से ललिता अपनी बेटी को अपने पास सुलाती थी. शशिकला के उमर मे आते
आते ललिता का अपनी सुंदर कमसिन बेटी से ही चक्कर चल गया और मा बेटी मे
रति होने लगी. बेटी का जवान किशोर शरीर उसे इतना भा गया कि वह अपना सारा
खाली समय बेटी के साथ गुजरने लगी, बाहर की साथिनो से सेक्स उसने बंद
कर दिया.
शशिकला भी पूरी लेस्बियन बन गयी. ललिता के मासल स्तनों मे मूह छुपा
कर उसे जो सुकून मिलता था उससे वह मा की पूरी गुलाम हो गयी थी. पर मा के
समान ही उसकी कामुक बेटी को भी लंड की चाह थी. अपनी संपत्ति के कारण
ललिता बाहर के किसी ऐसे वैसे युवक के साथ अपनी बेटी का संभोग नही होने
देना चाहती थी. उसे भी बीच बीच मे लंड की भूख लगती थी. उसने सीधे
शादी कर ली, अपने से दस साल छोटे एक युवक, अशोक के साथ जो उसी की कंपनी
मे अभी अभी मैनेजर लगा था और जिसके साथ ललिता ने चक्कर चलना शुरू
कर दिया था.
अशोक जवान था, हॅंडसम था और ललिता की बहुत इज़्ज़त करता था. करीब करीब
अपनी मा से थोड़ी ही कम उमर की औरत से शादी करने मे उसे कोई
हिचकिचाहट नही हुई क्योंकि एक तो ललिता बहुत सेक्सी थी, दूसरे करोड़ों की
मालकिन थी और तीसरे ललिता ने शादी के पहले उसे साफ बता दिया था कि उसे ललिता
और उसकी बेटी शशिकला, दोनों की वासना पूर्ति करनी पड़ेगी. अशोक जैसे
युवक को और क्या चाहिए था!
शादी के बाद उनका यौन जीवन ऐसे निखारा की धरती पर स्वर्ग उतर आया.
हनीमून मे भी ललिता शशिकला को स्विट्ज़र्लॅंड साथ ले गयी थी. और उस किशोरी
की पहली चुदाई उसके सौतेले डॅडी ने ही की. अब हर रात मा , बेटी और डॅडी
एक पलंग पर सोते थे और कामदेव की पूजा करते थे.
दो साल पहले ललिता की आक्सिडेंट मे मौत के बाद शशिकला को सदमा
पहुँचा. पर अस्पताल मे मरने के पहले ललिता ने उसे कहा कि वह किसी अच्छी
सेक्सी ज़्यादा उमर की औरत को चुन ले जो उसे मा का प्यार भी दे सके और जिस्म की
भूख भी मिटा सके. अब तक शशिकला ने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नही दिया था
पर मा को देखने पर शशिकला को लगा जैसे उसकी खोज पूरी हो गयी है.
सुनते सुनते मा की बुर चूने लगी थी. वह जब कल्पना करती कि पलंग पर एक
मा अपने पति से चुदवा रही है और अपनी बेटी की बुर चूस रही है तो
चुदासी से सिसक उठती. इस बारे मे उसने कभी सोचा भी नही थी. आवेश मे
आकर उसने अपनी उंगली अपनी गोद मे बैठी शशिकला की बुर मे घुसेड दी और
कस के उसका मूह चूमने लगी.
चुंबन ख़तम होने पर शशिकला बोली “बिलकुल मा जैसे करती हो दीदी तुम,
वह भी ऐसे ही मुझे दबोच लेती थी, कभी कभी ज़बरदस्ती मुझे पलंग पर
पटक देती थी और मेरे मूह पर चढ़ जाती थी. घंटे भर मुझसे अपनी बुर
चुसवाती थी तब छोड़ती थी. कहती थी कि उसकी बुर मे इतना रस बनता है वह
सब उसकी बेटी के लिए है, और जब तक ख़तम नही होता, वह मुझे नही
छोड़ेगी. पर दीदी, अब तुम्हें दीदी कहना अच्छा नही लगता. मैं मा कहु
तुम्हें आज से? सबके सामने दीदी कहुगी”
मा की सांस तेज चल रही थी. उसने शशिकला को सोफे पर लिटाया और उसके सिर के
दोनों ओर घुटने टेक कर बैठ गयी. “मैं मा ही हू तेरी बेटी, मा का तरह प्यार
करूँगी आज से, और मा की तरह हुक्म भी चलाउन्गि. अब अच्छी बच्ची जैसे
अपना मूह खोल और जीभ निकाल. अपनी मा की चूत चूस, उसमे जीभ डाल. मेरे
बेटे का यह फ़ेवरेट आसान है, अब मेरी बेटी से भी करवाती हू. और खबरदार
उठने की कोशिश की तो, जब तक मैं न कहु, चुसते रहना. मा बड़े प्यार से
यह रस दे रही है तुझे, पूरा ख़तम करके ही उठना”
शशिकला मा का यह रूप देखकर खुशी से झूम उठी. उसे ऐसी ही मा
चाहिए थी. मा की चूत मे जीभ डालकर वह मा की बुर से रसते रस को पीने
लगी और मा अपनी कमर हिला हिलाकर उसके मूह को और जीभ को चोदने लगी.
मा ने आधे घंटे शशिकला को नही छोड़ा, लगातार उसके मूह को चोदति
रही. शशिकला ने भी मन लगाकर मा की बुर चूसी. आख़िर मा जब लस्त हो गयी
और सोफे पर लुढ़क गयी तो शशिकला उठकर एक ड्रॉयर से एक कमर मे
बाँधने वाला डिल्डो उठा लाई. डिल्डो के दो भाग थे, छोटा भाग उसने अपनी
बुर मे खोंसा और पट्टे से अपनी कमर मे बाँध लिया. वह अब बहुत मस्त हो
गयी थी.
“मा, अब मेरी बारी है, तू सुबह लंड या डिल्डो के बारे मे पूछ रही थी ना, ले अब
तेरी बेटी का लंड हाजिर है. समझ ले तेरे बेटे का लंड है, तेरा बेटा चोदता है
ना तुझे घंटों? अब मुझसे चुदवा ले, मैं भी अच्छा चोदति हू, मा तो
दीवानी थी मेरे चोदने की”
मा थक गयी थी, बुर भी शांत हो गयी थी, पर अब भी उसमे मीठी मीठी कसक
हो रही थी. सुबह की बातों से उसका सिर घूम गया था, मा बेटी की इस कथा से
उसकी वासना के रहे सहे बंधन भी टूट गये थे. फिर भी उसने हल्का विरोध
किया “अरे शशि बेटी, रुक ना, अभी मत चोद, थक गयी हू”
मा पर चढ़कर उसकी बुर मे डिल्डो घुसेड़ते हुए शशिकला बोली “एकदम
चुप मा, तुमने अपनी कर ली, अब मेरी बारी है. और थक गयी हो तो कौनसी
तुम्हें मेहनत करनी है. आराम से पड़ी रहो और अपनी बेटी से चुदने का लुत्फ़
उठाओ” और मा आगे कुछ कहती इसके पहले उसने मा पर झुक कर अपने
होंठों से मा का मूह बंद कर दिया और चोदने लगी.
इसके बाद तो मानों वहाँ कामुकता का भूचाल सा आ गया. दोनों औरतें
अब वासना के शिखर पर थी. पूरे दिन और रात उनका संभोग चलता रहा, बस
खाना खाने और कुछ देर आराम करने को वे रुकी, उनकी आग शांत होने का नाम
ही नही ले रही थी.
मा ने बताया की जब मैने रविवार को फ़ोन किया था तब उस शैतान शशिकला ने
उसे एक कुर्सी मे बिठा कर उसकी टाँगे हाथों पर फँसा दी थी कि उसकी चूत
पूरी खुल जाए और फिर मा को वह एक डिल्डो से चोद रही थी. बीच बीच मे जीभ से
मा के क्लिट को गुदगुदा रही थी. बेचारी मा को मेरा फ़ोन आया तो मा लेना नही
चाहती थी, पर शशिकला को पता चल गया और उसने मा से ज़िद की कि फ़ोन ले ले.
वह तो मा को इशारे से बोल रही थी कि अपने बेटे को बता दो कि क्या चल रहा
है पर मा ने मुझे यह बता कर टरका दिया था कि बिल्ली पैर चाट रही है
इसलिए गुदगुदी हो रही है. वैसे बात सच थी, शशिकला किसी बदमाश बिल्ली
से कम नही थी.
रविवार को भी दिन भर औरतों की रति चली. दोनों ने मिलकर सोफे पर लिपटे
हुए बैठकर दो तीन डी वी डी देखी और देखते देखते एक दूसरे के शरीर की
गरमाहट का स्वाद लिया. खूब गप्पें लगाई. मा ने विस्तार से शशिकला को
बताया कि मैं याने उसका बेटा उसके साथ साथ क्या क्या करता हू, कैसे मा की
सेवा करता हू. शशिकला ने अपनी मा के किस्से सुनाए, यह भी बताया कि
डॅडी के साथ उसका कैसा इश्क चलता है, डॅडी अपनी प्यारी बेटी की
फरमायशे कैसे पूरी करते है और खुद कैसे अपने मन की चाहत उससे
पूरी करवाते है.
रात को शशिकला फिर से चोदने के मूड मे आ गयी. “मा, चलो आज रात भर
तुझे चोदति हू, सब आसनों मे, बहुत दिन हो गये ये आसन आजमा कर, प्रैक्टिस
भी हो जाएगी, तुम भी बेटे के लंड के बिना कुलबुला रही होगी. मालूम है? मा
के साथ मैं अक्सर ऐसा करती थी खास कर जब डॅडी यहा नही होते थे”
रात भर उसने मा को डिल्डो से चोदा, एक पुरुष की तरह उसके अंग अंग को
मसला, सुबह तक मा की हालत खराब कर दी. आख़िर जब मा सुबह निकलने को
तैयार होने लगी तब उससे चला नही जा रहा था, शरीर लस्त सा हो गया था. तब
शशिकला ने उसे अपनी कार से घर छोड़ दिया.
माँ को यह सब बताने मे रात हो गयी. मैं सुन सुनकर पागल हो जाता था तो
मा की गान्ड मारने लगता था. मा की बुर की हालत देखकर मैने उसे चोदा
नही, हाँ रात भर गान्ड मारी और बीच बीच मे चूत चूसी. मन मे मुझे
बहुत संतोष था कि आख़िर मा को अपनी पूरी वासना पूरी करने का खूबसूरत
साधन मिल गया.
मा के दिन अब बड़े मस्ती मे गुजरने लगे. शशिकला ने उसे पर्सनल अस्सिटेंट
बना लिया. अब वह मा को हर जगह अपने साथ रखती. बिज़नेस के लिए जब बाहर
जाती तो मा को भी ले जाती. दोनों साथ साथ होटल मे रुकती, दो अलग कमरे लेती
पर रात एक ही कमरे मे गुज़ारती. शनिवार रविवार को तो अक्सर मा गायब
रहती.
एक मायने मे मेरा बुरा हाल हुआ, मा अब आधे दिन घर मे नही होती. उसके
रूप का दीवाना मैं उसके शरीर को तरस कर रह जाता. रोज रति की आदत पड़ गयी थी,
एक दिन भी खलल पड़ जाने पर मेरी हालत खराब हो जाती. वैसे मा यह कसर
पूरी कर देती थी जब यहाँ होती. स्त्री स्त्री संभोग के बाद अपने बेटे से स्त्री
पुरुष संभोग के लिए वह आतुर रहती और मुझे ऐसे अपने आगोश मे लेती
जैसे बिछड़ी नायिका अपने प्रेमी से चिपट जाती है. और मुझे किस्से सुनाती कि
शशिकला के साथ क्या क्या किया.
यह सब ज़्यादा दिन ऐसे . चलना संभव नही था. एक दिन रात को मा थोड़ी
गंभीर लगी. शशिकला काम से दो दिन को बाहर गयी थी, इस बार मा को बिना
लिए. मैं खुश था कि अब दो तीन दिन मा सिर्फ़ मेरी है. वैसे मा से उसकी और
शशिकला की चुदाई के किस्से सुन सुन कर मेरा भी मन मचल उठता था कि उस
मादक युवती के उस जवान शरीर को भोगने मिले तो क्या बात है.
मा को मैने पूछा कि क्या बात है, क्या सोच रही हो?
मा बोली “बेटे, शशिकला कह रही थी कि शायद समय आ गया है कि हमारे
दो परिवार आपस मे मेल जोल बढ़ा ले.”
“कौन से दो परिवार मा? तुम्हारा मतलब है शशिकला और माथुर साहब का
परिवार और अपना परिवार?” मैने पूछा.
“हा बेटे, देख, इन दोनों परिवारों मे बहुत सेम है. यहाँ एक मा और बेटे
का आपस मे इश्क है, वहाँ एक बाप और बेटी का है, भले ही सौतेले हों. अब
तक दोनों परिवारों को जोड़ने वाली कड़ी सिर्फ़ मैं और शशिकला हू. वह कह
रही थी कि अब अनिल और उसके डॅडी अशोकजी भी इसमे शामिल हो जाएँ तो अच्छा
है. दोनों को मालूम है ही. तुझे मालूम है कि मेरा और शशिकला का आपस
मे चलता है और माथुर साहब को भी मालूम है. फरक सिर्फ़ इतना है कि तूने
अभी तक उन दोनों को देखा नही है, सिर्फ़ फोटो देखा है. तेरी फोटो भी मैने
शशिकला को दिखाई है”
“माथुर साहब को मालूम है याने माँ? वे तुझसे कैसे पेश आते है? और
शशिकला क्या बोली” मैने उत्सुकता से पूछा.
“वे मुस्काराकर निकल जाते है, बड़े अदब से पेश आते है, और कुछ नही बोलते.
पर शशिकला बोल रही थी कि …… ” मा का चेहरा लाल हो गया और वह चुप हो
गयी. फिर बोली “शशिकला तो तुझपर फिदा है, कहती है मा, मेरे छोटे भाई से
मेरी पहचान करा दो, अपनी मा की इतनी सेवा करता है, बहुत अच्छा बेटा है,
शायद बड़ी बहन की भी इतनी ही अच्छी सेवा करेगा. कह रही थी कि कितना
चिकना लड़का है”
मेरा खड़ा हो गया. शशिकला के उस जवान खूबसूरत रूप को भोगने का
मौका शायद मुझे मिल जाएगा यह सोच कर लंड उछलने लगा. वह मुझे
चिकना कह रही थी इस बात से भी मन मे एक अजीब सा संतोष हुआ. माँ मेरे
लंड को पकड़कर सहला रही थी, मेरी हालत पर मुस्करा दी. अब भी कुछ
कहना था उसे पर हिचक रही थी.
“मा तू क्या बता रही थी, बोल ना? रुक क्यों गयी”
“बेटे, वो बदमाश शशिकला बोल रही थी कि उसके डॅडी याने माथुर साहब
को मैं बहुत अच्छी लगती हू. शशिकला बोल रही थी कि क्यों न सब अगले
शुक्रवार को उनके घर मे मिले और शनिवार रविवार वही बिताएँ. पर बेटे,
तुझे ये चलेगा? माथुर साहब और मैं …. याने वह शैतान लड़की हमे ऐसे ही
नही बुला रही है. ज़रूर वह खुद तुझे पकड़ लेगी और मुझे अपने डॅडी के
हवाले कर देगी” मा किसी तरह बोली.
“तो क्या हुआ मा? मज़ा करो. माथुर साहब तुझे अच्छे लगते है या नही?”
मैने मा के उरोज दबाते हुए पूछा.
“हाँ, अच्छे हॅंडसम आदमी है. वह बदमाश कह रही थी कि उसकी मा
माथुर साहब के हथियार की याने …” मा फिर शरमा कर रुकी तो मैं बोला “लंड
की” और हँसने लगा.
“हा रे नालयक, वही, कह रही थी कि बड़ा शानदार है, उसकी मा और वह
दोनों दीवाने थे उसके, कह रही थी कि दीदी अब तुम मालकिन बन जाओ उस हथियार
की. डॅडी वैसे ही दीवाने है तेरे, उन्हें भी उमर मे बड़ी औरतें बहुत अच्छी
लगती है, और तेरे सौंदर्य पर तो मरते है वे, तेरी गुलामी करेंगे जैसे मेरी
मा की करते थे, उनसे जो चाहे करवा लेना.” मा की आँखे चमक रही थी.
“चलो मा, हम ज़रूर चलेंगे, मज़ा करेंगे, मैं भी अपनी उस बहन का प्यार
पाने को आतुर हू”
उस रात हमने जो चुदाई की, वह पागलों जैसी चुदाई थी. हमारी हवस ठंडी
ही नही होती थी. आगे के बारे मे सोच सोच कर हम ऐसे बहकते थे कि फिर शुरू
हो जाते थे. हम रात भर जुटे रहे, मा ने दूसरे दिन छुट्टी ले ली. बोली शशि ने
कहा है कि आराम करो.
मैं खुश था. आख़िर मा को भी एक अच्छा हॅंडसम जवान आदमी मिलने वाला
था. और मुझे एक बेहद खूबसूरत जवान युवती.
फिर मा के कहने पर ही हमने निश्चय कर लिया कि बचे दो दिन सब संभोग
बंद रहेगा. शशिकला और अशोक माथुर से मिलने के समय यह ज़रूरी था कि
हम ताजे तवाने हों, ठीक से परिवारों की आपस की मुलाकात के लिए पूरे ज़ोर मे
हों. दो दिन कैसे गये यह पता ही नही चला.
इस बार कपड़ों पर हमने ज़्यादा ध्यान नही दिया. मा ने वही काली साड़ी,
स्लीवलेस ब्लॉज़ और काली ब्रा और पैंटी पहनी और मैने सादा टी शर्ट और जींस. हम
साथ कपड़े भी नही ले गये. मा को पहले ही अनुभव था “बेटे, घर मे घुस
कर जब कपड़े निकलोगे उसके बाद सिर्फ़ सोमवार को सुबह ही ज़रूरत पड़ेगी
उनकी.”
टैक्सी मे बैठकर हम दोनों अपने दूसरे परिवार से मिलन के लिए चल दिए
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टैक्सी मे बैठकर मा ने शशिकला को फ़ोन लगाया “बेटी, हम आ रहे है,
आधे घंटे मे पहुँच जाएँगे” शशिकला ने कुछ पूछा. मा बोली “हाँ
हाँ, अनिल भी है, बहुत खुश है, अपनी दीदी से मिलने के लिए बेताब है” मा
फिर कुछ देर सुनती रही, फिर शरमा कर हंस दी “चल बदमाश, आकर खबर
लेती हू तेरी. क्या कहा? फिर से बोल, सुना नही ठीक से.”
शशिकला बहुत देर उसे कुछ बताती रही. मा बीच बीच मे मेरी ओर देखकर
हंस पड़ती. अब उसकी नज़रों मे भी शैतानी भर गयी थी. “अच्छा, तू कहती
है तो यही करेंगे, बेचारों की हालत खराब हो जाएगी पर, इन्हें इतना
तरसाना ठीक नही है” शशिकला ने फिर कुछ कहा और मा ने हार मान ली
“मेरी बच्ची, तू कहती है वही होगा. तू मानेगी थोड़े!” कहकर मा ने फ़ोन
बंद कर दिया. मैने पूछा तो मुसकाराकार बोली “पता चल जाएगा तुझे, बड़ी
बदमाश लड़की है, क्या क्या सोचती रहती है!”
हम उनके फ्लैट पर पहुँचे. मैं देखता रह गया. क्या आलीशान बिल्डिंग थी.
दरवाजा एक नौकर ने खोला. अंदर शशिकला और अशोकजी बैठे थे. उठकर
उन्होने हमारा स्वागत किया. मैं शशिकला को देखता रह गया. क्या रूप था
उसका. आज वह भी साड़ी पहने थी, बिलकुल मा जैसी, दोनों एक सी पोशाक मे
थी. मा की साड़ी काली थी और शशिकला की गहरी गुलाबी. शशिकला की गोरी
चिकनी बाहे, पारदर्शक पल्लू मे से दिखता ब्लॉज़, उसके लो कट मे से
उभर आए उसके स्तनों के बीच की खाई, उसमे फँसी एक सोने की चेन, गोरे
चिकने पेट की नाभि और उसके वे खूबसूरत पाँव, एक नाज़ुक कली है हील की
सॅंडल मे लिपटे हुए. देखकर मुझे नशा सा चढ़ने लगा.
अशोक माथुर लगते नही थे कि सैंतीस साल के होंगे, याने मुझसे उन्नीस बीस
बरस बड़े. बस तीस के आसपास के लगते थे. गोरा छरहरा मजबूत बदन और
चेहरे पर एक आत्म विश्वास. उन्होने हँसके मुझसे हाथ मिलाया, फिर मा को
देखने लगे. उनकी नज़र मे वो प्यास थी कि मैं समझ गया कि मा के उस
लुभावने रूप को देखकर उनकी क्या हालत हो रही होगी. मुझे विश्वास हो
गया कि मेरी तरह ही वे भी उमर मे बड़ी मिच्योर औरतों के भक्त है.
शशिकला बोली “दीदी, पहले डिनर कर लेते है, फिर नौकर को छुट्टी दे देते है,
हम फिर आराम से बातें करेंगे”
डिनर मे बस इधर उधर की बातें होते रही. मुझे शशिकला के पास बैठाया
था और मा माथुर साहब के पास बैठी थी. वाइन बहुत अच्छी थी, मुझे भी
उन्होने पिलाई. डिनर ख़तम होते होते मुझपर हल्का सा नशा छा गया.
“रामू, तुम अब जाओ, कल मत आना” कहकर शशिकला ने उसे छुट्टी दे दी. फिर हमे
बोली “मेरे बेडरूम मे चलते है, मैने एक बहुत अच्छे मूवी खरीदी है, वह
देखेंगे.”
शशिकला के बेडरूम का पलंग मैं देखता रह गया, करीब सात फीट चौड़ा
और आठ फीट लंबा था. दो जोड़े आराम से उसमे सो सकते थे. टीवी के अलावा
वहाँ सोफे और कुर्सियाँ भी थी.
मैं और अशोकजी एक एक कुर्सी मे बैठ गये. मा और शशिकला सोफे मे पास
पास बैठ गयी, सहेलियों की तरह. शशिकला ने पिक्चर शुरू की. पाँच
मिनिट मे मेरा खड़ा हो गया.
एक बड़ी ही कामुक पिक्चर थी, एकदम क्लियर प्रिंट था. आक्ट्रेस और आक्टर भी
एकदम सुंदर थे. एक चुदैल फैमिली की कहानी थी. माता पिता, उनकी दो
लड़किया और उनके पति, एक किशोर बेटा, एक नौकरानी और एक नानी. जल्द ही वे
जोड़ियाँ बना बना कर शुरू हो गये. किशोर बेटा मा पर चढ़ा था. दोनों
जमाई मिलकर अपनी बीवियों की नानी को एक साथ आगे पीछे से चोद रहे थे,
डॅडी अपनी एक बेटी के साथ इश्क फर्मा रहे थे और नौकरानी दूसरी बेटी से
लिपटी थी.
मेरी सांस चलने लगी. अशोक साहब भी लंबी साँसें लेते हुए देख रहे थे
“शशि कहाँ से लाई ये, कितनी अच्छी प्रिंट है!”
शशिकला अब मा से लिपट कर उसे चूम रही थी. “आपको अच्छी लगी डॅडी,
मैने पेंट हाउस मे एड देखा था, कोरियर से मॅंगा ली.” मा भी अब शशिकला
को बाहों मे लेकर उसके होंठ चूमते हुए धीरे धीरे उसकी जांघे सहला
रही थी. मा बेटी का इश्क यहाँ भी शुरू हो गया था.
मैं कभी पिक्चर देखता, कभी मा और शशिकला को. समझ मे नही आ
रहा था कि कौन सा दृश्य ज़्यादा सेक्सी है. अशोकजी भी मा को बार बार देख
रहे थे. उनके पॅंट मे तंबू तन गया था, मेरी तरह. धीरे से उन्होने अपने
तंबू पर हाथ फेरा. मुझसे नही रहा गया. अपने आप मेरा हाथ जींस के उपर से
मेरे लंड को सहलाने लगा. मुझे यह तो मालूम था कि आज रात क्या होगा पर
कैसे होगा इसका अंदाज़ा नही था. शायद हम जोड़ियाँ बनाकर दो कमरों
मे चले जाएँगे, यही मुझे लगता था. बहुत कर मेरी और शशिकला की जोड़ी
बनने वाली थी और उधर मा और अशोक माथुर की.
जब दो मिनिट बाद मैने अपने तंबू पर हाथ फेरा तो शशिकला बोली “चलो
मा, टाइम हो गया, अब इन्हें ऐसे खुला छोड़ना ठीक नही है.” वह उठकर
अशोकजी के पास पहुँची और उन्हें चूम कर उनके कपड़े उतारने लगी. “मज़ा
आ रहा है डॅडी? और मज़ा लूटेंगे आप, ज़रा सब्र कीजिए”
अशोक साहब चुपचाप कपड़े उतरवाते रहे. जल्द ही वे हमारे सामने नग्न खड़े थे.
उनका गोरा छरहरा गठा शरीर मा बड़ी उत्सुकता से देख रही थी.
शशिकला ने उनका जंघिया उतारा और मेरे मुँह से भी एक आश्चर्य का उद्गार
निकल आया. क्या खूबसूरत लंड था, और कितना बड़ा और शक्तिशाली! एकदम
गोरा डंडा था, नसों से भरा हुआ, थरथराता हुआ. लाल सुपाडा किसी रस
भरे टमाटर जैसा लग रहा था. करीब करीब नौ इंच का ज़रूर होगा. अब तक
मैने ब्ल्यू फिल्मों मे बहुत गोरे मस्त लंड देखे है पर जब अपने अलावा एक
और असली लंड, मुझसे बहुत बड़ा, प्रत्यक्ष मे देखा तो बहुत रोमाच
हुआ.