एक पुरुष और दो महिलाएं अध्याय 3

 

           एक पुरुष और दो महिलाएं अध्याय 3



अब सोनू के हाथ आज़ाद थे, जिसका पूरा फायदा उसने उठाना शुरू कर दिया।

उसने धीरे-धीरे बेला की चूचियों को अपने हाथों में भर कर दबाना शुरू कर दिया।

बेला एकदम मस्त हो चुकी थी, उसने अपने सर को सोनू के कंधों पर टिका दिया.. उसकी आँखें मस्ती में बंद हो गईं। 

बेला- सोनू छोड़ दे बेटा.. कोई आ जाएगा, मान जा.. मेरी बात.. ऊंह सीईई क्या कर रहा है धीरे सोनू आह्ह…

बेला ने सोनू के हाथों को पकड़ कर अपनी चूचियों से हटाया और सोनू से अलग होकर सोनू की तरफ देखने लगी।

उसकी चूचियाँ तेज सांस लेने से ऊपर-नीचे हो रही थीं।

सोनू एकटक बेला की ऊपर-नीचे हो रही गुंदाज चूचियों को देख रहा था।

आज सालों बाद जवान लड़के के हाथों का स्पर्श पाकर उसकी चूचियों के काले चूचुक एकदम तन गए और उसे अपने चूचकों के पास खिंचाव महसूस होने लगा।

सोनू ने जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसकी चूची को छुआ.. बेला एकदम मस्त हो गई और सोनू की ओर अपनी अधखुली आँखों से देखते हुए कहने लगी (मस्ती से भारी लड़खड़ाती आवाज़ में)- तुम किसी को बताओगे तो नहीं।

सोनू- नहीं काकी।

सोनू ने बस इतना ही कहा था कि बेला ने सोनू आगे बढ़ कर अपनी बाँहों में भर लिया।

उसकी चूचियां सोनू के छाती में धँस गईं। 

‘ओह्ह सोनू कब से तड़फ रही हूँ और जब से तुम्हारा लण्ड देखा है.. मेरी चूत में आग लगी हुई है.. तुम मुझे चोदेगा ना…’

सोनू- आहह.. काकी… आपने भी तो मुझे अपनी चूत दिखा-दिखा कर पागल कर दिया है… देखो ना मेरा लण्ड कैसे खड़ा हो गया है..

बेला- चल पीछे हट.. पहले मुझे बाहर का दरवाजा बंद करके आने दे।

तब तक तुम नीचे बिस्तर लगा.. फिर देख कैसे तेरे लण्ड का रस निचोड़ कर इसकी अकड़ निकालती हूँ। 

यह कह कर बेला थोड़ा सा पीछे हटी और अपने लहँगे को खोल कर ऊपर करके अपनी चूचियों पर बाँध कर बाहर चली गई।

जब बेला बाहर के दरवाजे को बंद करके वापिस आई तो सोनू ज़मीन पर बिस्तर लगा रहा था।

बेला ने मुस्कुराते हुए उसे देखा और फिर कमरे का दरवाजा भी बंद कर दिया।

दरवाजा बंद करने के बाद बेला, सोनू के पास आकर खड़ी हो गई और अपने लहँगे के नाड़े को जो कि उसकी चूचियों पर बँधा हुआ था.. को खोल दिया।

लहँगे के नाड़े की पकड़ उसकी चूचियों पर ढीली पड़ते ही.. लहंगा सरकता हुआ बेला के कदमों में आ गिरा।

सोनू के सामने बेला अब पूरी तरह से नंगी खड़ी थी।

उसकी 38 साइज़ की चूचियां तेज से साँस लेने के कारण ऊपर-नीचे हो रही थीं और नीचे चूत पर काली घनी और लंबे झांटें साफ़ दिखाई दे रही थीं जो रजनी की चूत से बिल्कुल अलग थी।

सोनू बेला को यूँ अपने सामने नंगा खड़ा देख कर पागल हो गया।

उसने आगे बढ़ कर उसे अपनी बाँहों में कसते हुए उसकी बाईं चूची को मुँह में भर लिया।

जैसे ही बेला की चूची का चूचुक पर सोनू के जीभ का स्पर्श हुआ, बेला सिसक उठी।

उसने सोनू के सर को अपने बाँहों में कस लिया। 

‘आह्ह.. सीई ओह सोनू चूस्स्स ले.. सब तेरे ही लिए है आज.. चूस और ज़ोर से चूस्स्स बेटा ओह..’

बेला पागलों की तरह सोनू की बाँहों में छटपटा रही थी।

उसके हाथ तेज़ी से सोनू के सर के बालों में घूमने लगे और होंठ सोनू के कंधों पर रगड़ खाने लगे।

मस्ती से अधीर हो चुकी बेला की चूत कि फाँकें कुलबुलाने लगीं।


नीचे सोनू का लण्ड बेला के पेट से सटा हुआ था, बेला अपना हाथ नीचे ले गई और सोनू के लण्ड के मोटे गुलाबी सुपारे को दो उँगलियों और अंगूठे के बीच में पकड़ लिया।

अंगूठे के नाख़ून से उसने सोनू के लण्ड के सुपारे से हल्का सा कुरेद दिया।

सोनू- आह.. काकी ये क्या कर रही हो ?

सोनू की आँखें भी मस्ती में बंद होने लगीं, बेला लगातार अपने अंगूठे को गोल-गोल घुमा कर सोनू के लण्ड के सुपारे को नाख़ून से कुरेद रही थी।

सोनू का लग रहा था, जैसे बेला उसके लण्ड को निचोड़ कर पूरा रस निकाल लेना चाहती हो।

अब सोनू भी बेला के हर हरकत का जवाब देने के लिए बिल्कुल तैयार था।

उसने बेला के चूचुक को मुँह से निकाला और दूसरी चूची को मुँह में भर कर चूसना चालू कर दिया।

बेला एक बार फिर से सिसक उठी। 

‘ओह हाआआ सोनू बेटा चूस दोनों तेरी हैं.. ऊंह सीईई और ज़ोर से चूस..’

सोनू बेला की चूची को चूसते हुए धीरे-धीरे अपना हाथ नीचे ले गया और बेला की जाँघों को फैला कर उसकी चूत की फांकों को अपने हाथ से दबोच लिया।

बेला का बदन एकदम से अकड़ गया, मानो जैसे उसकी साँस ही रुक गई हो, उसका मुँह खुल गया और उसने अपनी जाँघों को फैला लिया।

मौका देखते ही सोनू ने अपनी एक ऊँगली को बेला की चूत में पेल दिया।

‘ओह्ह सोनू अब और खड़ा नहीं रहा जाता बेटा ओह..’

बेला के बात सुन कर सोनू ने बेला की चूत से अपनी ऊँगली निकाली और अपनी बाँहों में भर कर उससे नीचे लेटा दिया।

जैसे ही बेला नीचे लेटी, उसने अपनी टाँगों को घुटनों से मोड़ कर फैला कर ऊपर उठा लिया, जिससे उसकी झाँटों से भरी चूत का मुँह खुल कर सोनू की आँखों के सामने आ गया।

चूत का गुलाबी कामरस से भीगा हुआ छेद देख सोनू का लण्ड और ज्यादा अकड़ गया।

बेला अब पूरी तरह गरम हो चुकी थी और उसकी चूत में सरसराहट इस कदर बढ़ गई थी कि वो एक पल और इंतजार नहीं करना चाहती थी।

‘ये ले बेटा.. देख मेरी चूत कैसे अपना पानी बहा रही है… अब और मत तड़फा बेटा… घुसा दे अपना मूसल सा लण्ड अपनी काकी की फुद्दी में…।’

बेला ने अपनी चूत की फांकों को हाथों से फैला कर सोनू को दिखाते हुए कहा, जिससे देख सोनू एकदम पागल हो गया और बेला की जाँघों के बीच घुटनों के बल बैठ कर अपने लण्ड के मोटे सुपारे को बेला की चूत के छेद पर लगा दिया जिसे बेला अपने हाथों से खोल कर सोनू को दिखा रही थी।

जैसे ही सोनू के लण्ड का गरम और मोटा सुपारा बेला की चूत के छेद पर लगा, बेला के बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई।

उसके कमर ने ऊपर की ओर झटका खाया और सोनू के लण्ड का सुपारा बेला की गीली चूत में जा घुसा।

बेला- ओह्ह.. सोनू कब से तरस रही थी.. मेरी फुद्दी.. तुम्हारे मोटे लण्ड के लिए.. ओह अब चोद डालो मुझे.. कस-कस ज़ोर से चोदो।

ये कहते हुए, बेला ने सोनू को कंधों से पकड़ कर उससे अपने ऊपर खींच लिया, जिससे सोनू का वजन बेला के ऊपर पड़ते ही.. उसके लण्ड का सुपारा बेला चूत की दीवारों को फ़ैलाता हुआ अन्दर घुसने लगा..

जिसे महसूस करते ही बेला सिसक उठी और अपनी टाँगों को उठा कर उसने सोनू की पीठ पर कस लिया। 

‘ऊंह मर गइईई रे.. बहुत मोटा लण्ड है.. तेरा.. ओह्ह..’

बेला ने अपनी गाण्ड को धीरे-धीरे ऊपर कर और उछालते हुए कहा। 

कुछ ही पलों में सोनू का पूरा लण्ड बेला की चूत की गहराइयों में जा घुसा। उसके लण्ड का सुपारा बेला के बच्चेदानी से रगड़ खा रहा था।

अब सोनू भी थोड़ा सामान्य हो चुका था और वो भी अपनी कमर को हिलाते हुए धीरे-धीरे अपने लण्ड को बेला की चूत की अन्दर-बाहर करने लगा।

बेला की चूत की दीवारें सोनू के मोटे लण्ड के ऊपर एकदम कसी हुई थीं.. मानो जैसे उसका सारा रस निचोड़ लेना चाहती हो।

बेला अपनी कमर को हिलाने से नहीं रोक पा रही थी, वो मस्ती के सागर में गोते खाते हुए.. लगातार अपने चूतड़ों को ऊपर की ओर उछालते हुए चुदवा रही थी।

बेला पागलों की तरह अपने हाथों से सोनू की पीठ को सहलाते हुए- ओह चोद दे बेटा..अब दिखा दे… तेरे लण्ड में कितना दम है।

बेला की बात सुन कर सोनू एकदम से जोश में आ गया और बेला के होंठों पर अपने होंठों को लगा दिया।

बेला तो पहले से ही मस्त हो चुकी थी, उसने भी अपने होंठों को ढीला छोड़ कर सोनू से चुसवाना शुरू कर दिया।

जैसे ही बेला की आवाज़ बंद हुई.. सोनू ने अपने लण्ड को सुपारे तक बाहर निकाला और पूरी ताक़त से फिर से बेला की चूत में पेल दिया।

सोनू का लण्ड पूरी रफ़्तार के साथ उसकी चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ.. बच्चेदानी से जा टकराया। 

बेला अपने होंठों को सोनू के होंठों से अलग करते हुए- ओह्ह.. मारा डाला रे…धीरे बेटा धीरे ओह्ह ऊंह आह्ह.. आह्ह.. आह्ह.. हाय.. धीरे.. बेटा.. उफफफफ्फ़..

बेला को बदन में दर्द और मस्ती के मिली-ज़ुली लहर दौड़ गई।

सोनू तो जैसे बेला को साँस लेने का मौका भी नहीं देना चाहता था.. एक के बाद एक ताबड़तोड़ धक्के बेला की चूत में लगाए जा रहा था और बेला मुँह खुला हुआ था और आँखें ऊपर को चढ़ी हुई थीं।

अब उसके मुँह से ‘आ..आह’ की हल्की आवाज़ ही निकल रही थी।


सोनू लगातार पूरी रफ़्तार से अपने लण्ड को बेला की चूत में अन्दर-बाहर कर रहा था।

उसके जाँघों के झटके बेला के पेट के निचले हिस्से और चूत के आस-पास टकरा कर ‘हॅप-हॅप’ की आवाज़ करने लगे।

जिसे सुन कर सोनू और जोश में आ गया और तेज़ी से बेला की चूत को चोदने लगा।

फिर अचानक से बेला का बदन अकड़ गया।

उसकी टाँगें जो ऊपर उठी हुई थीं, एकदम सीधी हो गईं और उसने अपने चूतड़ों को बिस्तर से ऊपर उठा कर सोनू के लण्ड पर अपनी चूत को ज़ोर से दबा दिया।

‘सोनू रुक जा बेटा.. ओह।’ 

कहते हुए एक बार फिर बेला की कमर झटके खाने लगी।

बेला झड़ गई थी, उसकी चूत जो इतने दिनों बाद चुदी थी..

सोनू के मोटे लण्ड के जबरदस्त धक्कों को ज्यादा देर ना झेल पाई और उसकी चूत से कामरस की नदी बह निकली।

जैसे ही बेला की कमर ने एक और झटका खाया.. सोनू का लण्ड फिसल कर बेला की चूत से बाहर आ गया और बेला की चूत से पेशाब की धार छूट पड़ी, जो सीधा जाकर सोनू की छाती पर गिरने लगी।

बेला की आँखें मस्ती में एक बार फिर बंद हो गईं। 

‘ओह्ह यह क्या किया काकी.. हटिए..’ सोनू चिल्लाता हुआ खड़ा हो गया।

गनीमत यह थी कि बेला बिस्तर के किनारे लेटी हुई थी और मूत की धार नीचे कच्चे फर्श पर गिर रही थी।

सोनू बेला को यूँ लेटे हुए देख रहा था.. और उसकी चूत से मूत की धार निकल कर नीचे गिर रही थी.. यह देख सोनू का लण्ड और अकड़ गया।

पेशाब करने के बाद बेला ने अपने चूतड़ों को नीचे टिका लिया और अपनी मदहोशी से भरी आँखें खोल कर सोनू के तरफ देखा।

बेला- ओह्ह.. सोनू मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हारा ये मोटा लण्ड मेरा मूत निकाल देगा। कसम से आज तक इतना बड़ा लण्ड नहीं लिया चूत में ।


सोनू उदास मन से एक ओर खड़ा हुआ बेला की तरफ देखते हुए- पर काकी अभी तो मेरा हुआ ही नहीं!

बेला के होंठों पर संतुष्टि से भरी मुस्कान फैली हुई थी- तो मैं कब तुम्हें मना कर रही हूँ, आज से ये फुद्दी तेरे ही मेरे राजा.. चल इधर आ मुँह लटका कर क्यों खड़ा है?

सोनू बेला के पास जाकर बिस्तर पर खड़ा हो गया, बेला नीचे अपने चूतड़ों के बल बैठी हुई थी, उसने तकिए को उठा कर अपने चूतड़ों के नीचे रखा और सोनू के लण्ड को मुठ्ठी में भर कर गौर से देखने लगी।

‘हाय राम.. यह तो सच में बहुत बड़ा है.. इसलिए तो मेरी चूत से मूत निकाल दिया तेरे लण्ड ने…’ फिर बेला ने सोनू के लण्ड को मुठ्ठी में भर कर तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया।

‘आह.. काकी धीरे ओह्ह.. काकी धीरे करो ना!’ बेला ने मुस्कुराते हुए सोनू के लण्ड के सुपारे को अपनी उँगलियों के बीच में लेकर ज़ोर से मसल दिया।

सोनू एकदम सिसकते हुए चिल्ला उठा। 

बेला सोनू के लण्ड को तेज़ी से हिलाते हुए- क्यों रे.. अब मैं क्यों रुकूँ.. जब मैंने तुम्हें रुकने के लिए कहा था, तब तो तूने मेरी एक भी नहीं सुनी.. बोल मारेगा अपनी काकी के फुद्दी..हाँ…

सोनू- हाँ काकी.. पहले मेरा लण्ड तो छोड़ो। 

सोनू की बात सुन कर बेला ने सोनू का लण्ड छोड़ दिया।

फिर वो दूसरी तरफ पलट गई और कुतिया के जैसी अवस्था में आ गई। 

‘ये चोद अपनी काकी की फुद्दी.. बेटा देख मैं तेरे लिए कुतिया की तरह अपनी चूत फैला कर कुतिया बनी हुई हूँ। अब डाल दे अपना मूसल सा लण्ड मेरी चूत में..।’

सोनू का लण्ड एक बार फिर से पूरे उफान पर था।

सोनू बेला के पीछे आकर घुटनों के बल बैठ गया।

बेला आगे से नीचे की ओर झुक गई और उसने अपनी गाण्ड को जितना हो सकता था ऊपर उठा लिया, जिससे बेला की चूत का छेद बिल्कुल सोनू के लण्ड की सीध में आ गया।

सोनू ने एक हाथ से अपने लण्ड को पकड़ा और एक हाथ से बेला की झाँटों भरी चूत की फांकों को पकड़ कर पेलने की कोशिश करने लगा।

ये देख बेला भी अपना एक हाथ पीछे ले आई और अपनी चूत की फांकों को एक तरफ से फैला दिया और दूसरी तरफ से सोनू ने जोर लगाया।

अब सोनू को बेला की चूत का गुलाबी छेद बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहा था।

सोनू ने अपने लण्ड के सुपारे को बेला की चूत के छेद पर टिका कर उसकी कमर को दोनों तरफ से पकड़ कर धीरे-धीरे अपने लण्ड के सुपारे को अन्दर पेलना शुरू किया।

बेला की आंखें फिर से मस्ती में बंद हो गईं।

सोनू के लण्ड के गरम सुपारे ने एक बार फिर बेला की चूत की दीवारों को रगड़ कर उसे गरम कर दिया।

‘ऊंह हाआअँ.. बेटा बहुत अच्छे बेटा हाआआं और घुसाओ… उफ़फ्फ़ ऊंह..’

ये कहते हुए बेला ने अपनी चूतड़ों को पीछे की तरफ धकेला।

सोनू का लण्ड बेला की चूत की दीवारों से रगड़ ख़ाता हुआ आधे से ज्यादा अन्दर घुस गया।

‘सुन बेटा तेरा लण्ड बहुत मोटा है.. पर तुझे अपनी काकी पर तरस खाने के कोई ज़रूरत नहीं है… चोद मुझे कुतिया की तरह.. रगड़ कर चोद.. ज़ोर-ज़ोर से पेल अपना लण्ड.. मेरी फुद्दी में.. तेरे मोटे लण्ड को चूत में लेने के लिए मैं कुछ भी सह लूँगी..’

सोनू ने बेला के दोनों चूतड़ों को फैला कर अपनी कमर को थोड़ा सा पीछे किया और फिर साँस रोक कर जोरदार धक्का मारा।


सोनू का लण्ड बेला की चूत की दीवारों को बुरी तरह फ़ैलाता हुआ एक ही बार में पूरा अन्दर घुस गया।

बेला- ओह.. सोनू मार दिया रे हरामी.. सालेए.. उफफफ्फ़ फाड़ दी मेरी चूत… ओह्ह..

सोनू- तूने ही तो बोला था काकी.. कि कस-कस के चोदूँ।

बेला- हाँ बोला था.. हरामी साले.. पर तेरा ये मोटा लण्ड उफफफ्फ़.. अब रुक क्यों गया है?

सोनू ने मुस्कुराते हुए बेला के चूतड़ों को दबोच कर एक के बाद एक जोरदार धक्के लगाने चालू कर दिए, सोनू की जाँघें बार-बार बेला के चूतड़ों से टकरा कर आवाज़ कर रही थीं।

बेला इस कदर मस्त हो गई कि उससे ये भी ध्यान नहीं रहा कि उसकी उँची हो रही कामुक सिसकारियों को कोई भी सुन सकता है।

बेला- हाँ चोद बेटा.. ओह… चोद अपनी काकीईईईईई की फुद्दी फाड़ दे.. ओह्ह आह्ह.. ह आह ओह धीरे.. ज़ोर से.. ओह..

सोनू अपना लण्ड बेला की चूत में जड़ तक पेलते हुए- क्या काकी कभी कहती हो धीरे. और कभी कहती हो ज़ोर से फुद्दी मारूं.. एक बात बोलो..

बेला- आह्ह.. ह.. बेटा तुम मेरी बात मत सुनो.. ओह बस अपने इस मूसल छाप लण्ड से मेरीईई चूततत फाड़ देए ओह्ह..

सोनू की मस्ती का कोई ठिकाना नहीं था।

उसने आगे झुक कर बेला की चूचियों को अपने हाथों में दबोच लिया और उनको अपनी तरफ खींचते हुए ताबड़तोड़ धक्के लगाने लगा।

बेला की चूत एक बार फिर झड़ने के कगार पर थी।

उसने भी अपनी गाण्ड को पीछे की तरफ उछालना शुरू कर दिया। 

‘ओह बेटा बस थोड़ी देर और ओह… मेरा होने वाला है।’

सोनू अब होश खो बैठा था और अपने आँखें बंद किए हुए, तेज़ी से धक्के लगा रहा था। 

‘काकी ओह.. मेरा भी होने वाला है…ओह्ह काकी।’

और फिर जैसे सोनू के लण्ड से वीर्य का सैलाब निकल कर बेला की चूत की दीवारों को भिगोने लगा।

सोनू के वीर्य को अपनी चूत की दीवारों पर महसूस करते ही बेला ने भी अपनी गाण्ड को तेज़ी से सोनू के लण्ड पर पटकना चालू कर दिया।

बेला- रुक जाआअ बेटा.. बस तेरी ये काकी की फुद्दी भी रसधार बहाने वाली है… ओह आह आह आह्ह..

फिर बेला भी शांत पड़ गई और आगे के तरफ लुढ़क गई।

सोनू का लण्ड जो की बिल्कुल सना हुआ था.. बेला की चूत से बाहर आ गया।

बेला की चूत से कुछ वीर्य निकल कर बाहर बिस्तर पर गिर गया।

बेला पेट के बल लेट गई, उसकी आँखें मस्ती में बन्द थीं और होंठों पर मुस्कान फैली हुई थी। 

बेला आँखें बंद किए हुए- तूने तो कमाल कर दिया छोरे… एक ही बार में दो बार मेरी चूत का पानी निकाल दिया.. तेरे इस लण्ड ने मेरी चूत को खोद-खोद कर झाड़ दिया।

सोनू- काकी आप कहो, तो एक बार और निकाल देता हूँ।

बेला- नहीं आज इतना बहुत है..बहुत देर रही है। अब सेठ के घर भी जाना है, चल जल्दी कर कपड़े पहन ले, कहीं बिंदया ना आ जाए। 

बेला की बात सुन कर सोनू अपना पज़ामा पहनने लगा, बेला ने भी अपने कपड़े पहने और बिस्तर को ठीक करके रख दिया।

उसके बाद दोनों सेठ के घर आ गए।

अभी दोपहर के 12 बज रहे थे.. जब दोनों सेठ के घर पहुँचे तो पता चला कि सेठ चन्डीमल घर पर था।

वो उसकी नई पत्नी सीमा और दीपा तीनों कहीं जाने के लिए तैयार थे।

रजनी ने बेला को बताया कि चन्डीमल सीमा को लेकर एक-दो दिन के लिए उसके मायके जा रहा था और साथ में दीपा भी जा रही है।

रजनी इस बात से बहुत खुश थी।

अब घर पर सिर्फ़ बेला और सोनू ही उसके साथ थे।

बाहर तांगे वाला खड़ा था, तीनों उस पर सवार होकर शहर स्टेशन की ओर निकल लिए।

बेला को अब सिर्फ़ अपने सोनू और रजनी के लिए ही खाना बनाना था।

आज बेला के चेहरा खिला हुआ था।

जो बयान कर रहा था कि कुछ समय पहले उसकी ज़बरदस्त चुदाई हुई है, इस बात काs अंदाज़ा रजनी मन ही मन लगा रही थी, क्योंकि दोनों काफ़ी देर से गायब थे।

खाना खाने के बाद सोनू अपने कमरे में चला गया।

अब उसे भी कोई काम नहीं था।

बिंदया भी खाना खा कर घर जा चुकी थी।

बेला ने बर्तन साफ़ किए और घर जाने के निकली, उसे आज बहुत मीठी-मीठी नींद आ रही थी, पर उसे रजनी ने आवाज़ लगा कर रोक लिया। 

‘अए सुन तो बेला.. कहाँ थी इतनी देर.. उस छोरे के साथ?’

रजनी ने ज़रा कड़क आवाज़ में पूछा।

बेला ने हड़बड़ाते हुए कहा- वो मालिकन.. नहाने नदी पर गई थी। 

रजनी- अच्छा.. आज-कल नदी पर बहुत जा रही हो तुम.. वैसे मुझे लगता है कि आज तुम कुछ और नहाई हो, देख कैसे बाल बिखरे हुए हैं तेरे…

बेला रजनी की बात सुन कर एकदम से सकपका गई- वो क्या था ना दीदी.. आज बहुत सर्दी थी, जिसकी वजह से नहीं नहाया।

रजनी- तो फिर तेरे को इतने देर कैसे लगी? 

बेला- वो दीदी वो वहाँ कपड़े धोने के कारण देर हो गई। 

रजनी को बेला की बातों से शक तो हो रहा था पर उससे पूरा यकीन नहीं था।

‘अच्छा चल ठीक है.. चल मेरे कमरे में आज बहुत खुजली हो रही है.. ज़रा मालिश तो कर दे।’

बेला- दीदी आज… पर दीदी मुझे घर पर बहुत काम है। 

बेला का मन अब कुछ भी करने को नहीं था।

रजनी- चलती है कि नहीं.. कि दूँ.. दो कान के नीचे..!

बेला फिर चुपचाप रजनी के कमरे में आ गई।



रजनी ने अपने कमरे को अन्दर से बंद किया और अपने कपड़े निकालने लगी। 

‘दीदी शाम को अच्छे से कर दूँगी.. अभी मेरे तबियत ठीक नहीं है।’

बेला ने मुँह बनाते हुए कहा। 

‘क्यों क्या हुआ तेरे को? चल इधर आ तेरी तबियत आज मैं हरी कर देती हूँ।’

यह कह कर रजनी ने बेला को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया और उसके लहँगे को एक झटके में उसकी कमर तक चढ़ा दिया। 

‘हाय दीदी.. क्या कर रही हैं आप?’ बेला ने खीजते हुए रजनी से पूछा, पर रजनी ने बिना कुछ बोले.. अपनी ऊँगली को बेला की चूत में पेल दिया।

रजनी की ऊँगली बेला की गीली चूत में फिसलती हुई अन्दर चली गई। 

‘आह दीदी ये ईए.. ओह…’

रजनी ने दो-चार बार अपनी ऊँगली बेला की चूत के अन्दर-बाहर की और फिर अपनी ऊँगली निकाल कर देखने लगी।

उसकी ऊँगली बेला की चूत और सोनू के कामरस से भीगी हुई थी, रजनी का शक और बढ़ गया। 

रजनी- ये क्या है.. रांड.. बोल क्या किया तूने उस छोरे के साथ? उसका लण्ड अपनी चूत में लेकर अब तेरा भोसड़ा ठंड हो गया हो गया ना?

बेला- ये.. ये.. क्या कह रही हैं दीदी आप.. वो तो मेरे बेटे की उम्र का है। 

रजनी- हाँ जानती हूँ मैं तुझे साली.. ज़रूर बेटा.. बेटा.. कह कर उसके लण्ड पर उछल रही होगी.. बोल.. नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।

बेला- दीदी वो वो..

इससे पहले कि बेला कुछ बोलती, रजनी अपनी दो उँगलियों को बेला की चूत में पेल कर अपने अंगूठे से उसकी चूत के दाने को ज़ोर से मसल दिया। बेला एकदम से सिसया उठी और अपनी कमर को उछालने लगी।

रजनी- देख साली कैसे अपनी गाण्ड उछाल रही है। ऐसे ही अपने गाण्ड उछाल-उछाल कर चुदवाई होगी ना तुम उस लौंडे से?

बेला- दीदी ग़लती हो गई.. माफ़ कर दो, उसने मुझे संभलने का मौका ही नहीं दिया।

रजनी- क्या उसने.. या तूने उसे मौका नहीं दिया.. जा री.. तेरी फुद्दी उसके लण्ड को देख कर लार टपकाने लगी होगी.. बोल साली.. मज़ा लेकर आई है ना.. जवान लण्ड का?

बेला- अब बस भी करो दीदी.. कहा ना ग़लती हो गई.. आइन्दा ऐसा नहीं होगा।

रजनी- चल साली जा अब.. आगे से उस छोरे से दूर रहना.. समझी।

बेला बिस्तर से खड़ी हुई और कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर निकल गई।

बेला तो चली गई, पर रजनी की चूत में बेला की चुदाई की बात सुन कर आग लग चुकी थी।

बेला के जाने के बाद रजनी ने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और अपने सारे कपड़े उतार कर बिस्तर पर लेट गई और अपनी चूत को मसलने लगी।रजनी ने अपने कमरे को अन्दर से बंद किया और अपने कपड़े निकालने लगी। 

‘दीदी शाम को अच्छे से कर दूँगी.. अभी मेरे तबियत ठीक नहीं है।’

बेला ने मुँह बनाते हुए कहा। 

‘क्यों क्या हुआ तेरे को? चल इधर आ तेरी तबियत आज मैं हरी कर देती हूँ।’

यह कह कर रजनी ने बेला को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया और उसके लहँगे को एक झटके में उसकी कमर तक चढ़ा दिया। 

‘हाय दीदी.. क्या कर रही हैं आप?’ बेला ने खीजते हुए रजनी से पूछा, पर रजनी ने बिना कुछ बोले.. अपनी ऊँगली को बेला की चूत में पेल दिया।

रजनी की ऊँगली बेला की गीली चूत में फिसलती हुई अन्दर चली गई। 

‘आह दीदी ये ईए.. ओह…’

रजनी ने दो-चार बार अपनी ऊँगली बेला की चूत के अन्दर-बाहर की और फिर अपनी ऊँगली निकाल कर देखने लगी।

उसकी ऊँगली बेला की चूत और सोनू के कामरस से भीगी हुई थी, रजनी का शक और बढ़ गया। 

रजनी- ये क्या है.. रांड.. बोल क्या किया तूने उस छोरे के साथ? उसका लण्ड अपनी चूत में लेकर अब तेरा भोसड़ा ठंड हो गया हो गया ना?

बेला- ये.. ये.. क्या कह रही हैं दीदी आप.. वो तो मेरे बेटे की उम्र का है। 

रजनी- हाँ जानती हूँ मैं तुझे साली.. ज़रूर बेटा.. बेटा.. कह कर उसके लण्ड पर उछल रही होगी.. बोल.. नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।

बेला- दीदी वो वो..

इससे पहले कि बेला कुछ बोलती, रजनी अपनी दो उँगलियों को बेला की चूत में पेल कर अपने अंगूठे से उसकी चूत के दाने को ज़ोर से मसल दिया। बेला एकदम से सिसया उठी और अपनी कमर को उछालने लगी।

रजनी- देख साली कैसे अपनी गाण्ड उछाल रही है। ऐसे ही अपने गाण्ड उछाल-उछाल कर चुदवाई होगी ना तुम उस लौंडे से?

बेला- दीदी ग़लती हो गई.. माफ़ कर दो, उसने मुझे संभलने का मौका ही नहीं दिया।

रजनी- क्या उसने.. या तूने उसे मौका नहीं दिया.. जा री.. तेरी फुद्दी उसके लण्ड को देख कर लार टपकाने लगी होगी.. बोल साली.. मज़ा लेकर आई है ना.. जवान लण्ड का?

बेला- अब बस भी करो दीदी.. कहा ना ग़लती हो गई.. आइन्दा ऐसा नहीं होगा।

रजनी- चल साली जा अब.. आगे से उस छोरे से दूर रहना.. समझी।

बेला बिस्तर से खड़ी हुई और कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर निकल गई।

बेला तो चली गई, पर रजनी की चूत में बेला की चुदाई की बात सुन कर आग लग चुकी थी।

बेला के जाने के बाद रजनी ने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और अपने सारे कपड़े उतार कर बिस्तर पर लेट गई और अपनी चूत को मसलने लगी।


रजनी अपनी चूत को मसलते हुए अपनी चूत की आग को ठंडा करने के कोशिश कर रही थी, पर रजनी जैसे गरम औरत को भला उसकी पतली सी ऊँगलियाँ कैसे ठंडा कर सकती थीं।

फिर अचानक से रजनी के दिमाग़ में कुछ आया और वो उठ कर बैठ गई।

‘अगर वो साली छिनाल उस जवान लौंडे का लण्ड अपनी बुर में ले सकती है तो मैं क्यों अपनी उँगलियों से अपनी चूत की आग बुझाने की कोशिश करूँ… चाहे कुछ भी हो जाए..आज उसे नए लौंडे का लण्ड अपनी चूत में पिलवा कर ही रहूँगी।’

यह सोचते ही बेला के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई और वो उठ कर अपनी साड़ी पहनने लगी।

साड़ी पहनने के बाद वो अपने कमरे से बाहर आकर घर के पीछे की ओर चली गई।

सोनू बाहर ही चारपाई पर लेटा हुआ था और सुनहरी धूप का आनन्द ले रहा था।

रजनी के कदमों की आवाज़ सुन कर वो उठ कर खड़ा हो गया और रजनी की तरफ देखने लगा। 

‘आराम कर रहे हो… लगता है आज बहुत थक गए हो तुम?’

रजनी ने मुस्कुराते हुए सोनू से कहा। 

‘जी नहीं.. वो कुछ काम नहीं था, इसलिए लेट गया।’

रजनी- अच्छी बात है, आज तुम आराम कर लो अभी.. क्योंकि रात को तुझे मेरी मालिश करनी है… समझे… थोड़ा वक्त लगेगा आज…

सोनू सर झुकाए हुए- जी।

रजनी पलट कर जाने लगी, वो अपनी गाण्ड आज कुछ ज्यादा ही मटका कर चल रही थी, जैसे वो घर के आगे की तरफ पहुँची, तो मुख्य दरवाजा पर किसी के आने के दस्तक हुई।

रजनी ने जाकर दरवाजा खोला, तो रजनी के चेहरे का रंग उड़ गया। सामने चन्डीमल की चाची खड़ी थीं, जो उसी गाँव में रहती थीं- और सुना बहू कैसी हो?

चन्डीमल के चाची ने अन्दर आते हुए रजनी से पूछा।

चन्डीमल की चाची का नाम कान्ति देवी था।

कान्ति देवी शुरू से ही गरम मिजाज़ की औरत थी। भले ही अपनी जवानी में उसने बहुत गुल खिलाए थे, पर अब 65 साल की हो चुकी कान्ति देवी अपनी बहुओं पर कड़ी नज़र रखती थी।

आप कह सकते हैं कि उसे डर था कि जवानी में जो गुल उसने खिलाए थे, वो उसकी बहुएँ ना कर सकें। 

कान्ति देवी को देख रजनी का मुँह थोड़ा सा लटक गया, पर फिर भी होंठों पर बनावटी मुस्कान लाकर कान्ति देवी के पैरों को हाथ लगाते हुए बोली- मैं ठीक हूँ चाची जी.. आप सुनाइए आप कैसी हैं?

कान्ति अन्दर के ओर बढ़ते हुए- ठीक हूँ बहू.. अब तो जितने दिन निकल जाएँ… वही जिंदगी, बाकी कल का क्या भरोसा। कल इस बुढ़िया की आँख खुले या ना खुले।

रजनी- क्या चाची.. अभी आपकी उम्र ही क्या है.. अभी तो आप अच्छे-भले चल-फिर रही हो। 

रजनी चाची को अपने कमरे में ले गई, कान्ति रजनी के बिस्तर पर पालती मार कर बैठ गई- वो गेन्दा कह गया था मुझसे कि आज रात तुम अकेली होगी.. इसलिए मैं तुम्हारे पास सो जाऊँ, इसलिए चली आई।

रजनी भले ही अपने मन ही मन बुढ़िया को कोस रही थी, पर वो उसके सामने कुछ बोल भी तो नहीं सकती थी। 

‘यह तो आपने बहुत अच्छा किया चाची… और वैसे भी आप हमें कब सेवा करने का मौका देती हो.. अच्छा किया जो आप यहाँ आ गईं।’

कान्ति- अब क्या बताऊँ बहू.. मुझे तो मेरी बहुएँ कहीं जाने ही नहीं देती, बस आज निकल कर आ गई।

रजनी- अच्छा किया चाची जी आपने। 

शाम ढल चुकी थी और रजनी का मन बेचैन हो रहा था। वो जान चुकी थी कि आज फिर उसकी चूत को तरसना पड़ेगा। 

बेला सेठ के घर से आ चुकी थी और खाना बनाने में लगी हुई थी और सोनू भी घर के छोटे-मोटे कामों में लगा हुआ था।

सोनू अपना काम निपटा कर पीछे अपने कमरे में चला गया।

बेला की बेटी बिंदया भी आ गई, बेला ने रजनी और कान्ति को खाना दिया।

रजनी और कान्ति देवी बाहर आँगन में बैठ कर खाना खा रही थीं।

बेला ने उन दोनों को खाना देने के बाद सोनू के लिए खाना परोसा और पीछे की तरफ जाने लगी। 

रजनी बेला को पीछे के तरफ जाता देख कर- अए, कहाँ जा रही है?

बेला रजनी की कड़क आवाज़ सुन कर घबराते हुए- जी वो सोनू को खाना देने जा रही थी।

रजनी- तुम रुको.. ये थाली बिंदया को दे.. वो खाना दे आती है, तू जाकर ये पानी गरम कर ला… इतना ठंडा पानी दिया है.. क्या हमारा गला खराब करेगी।

रजनी की बात सुन कर बेला का मुँह लटक गया, उसने बिंदया को खाना दिया और सोनू को देकर आने के लिए बोला और खुद मुँह में बड़बड़ाती हुई रसोई में चली गई।

बिंदया बहुत ही चंचल स्वभाव की थी, वो सोनू को घर के पीछे बने उसके कमरे में खाना देने के लिए गई और अपने चंचल स्वभाव के चलते वो सीधा बिना किसी चेतावनी के अन्दर जा घुसी।

अन्दर का नज़ारा देख कर जैसे बिंदया को सांप सूंघ गया हो, अन्दर सोनू पलंग पर लेटा हुआ था।

उसका पजामा, उसके पैरों में अटका हुआ था और वो अपने लण्ड को हाथ में लिए हुए तेज़ी से मुठ्ठ मार रहा था, उसके दिमाग़ में सुबह की चुदाई के सीन घूम रहे थे।

बिंदया की तो जैसे आवाज़ ही गुम हो गई हो।

सोनू बिस्तर पर लेटा हुआ अपने 8 इंच लंबे और 3 इंच मोटे लण्ड को तेज़ी से हिला रहा था और बिंदया सोनू के मूसल लण्ड को आँखें फाड़े हुए देखे जा रही थी।

सोनू इससे बेख़बर था कि उसके कमरे में कोई है।


बिंदया आज अपनी जिंदगी में दूसरी बार किसी लड़के का लण्ड देख रही थी।

पहली बार उसने लण्ड तब देखा था, जब उसका बाप उसकी माँ की चुदाई कर रहा था और बेला अपनी गाण्ड को उछाल-उछाल कर अपने पति का लण्ड अपनी चूत में ले रही थी।

बस फर्क इतना था कि उसके बाप का लण्ड सोनू के लण्ड से आधा भी नहीं था।

अपनी माँ की कामुक सिसकारियाँ सुन कर उससे उसी दिन पता चल गया था कि जब औरत की चुदाई होती है, तो औरत को कितना मजा आता है, बाकी रही-सही कसर उसकी सहेलियों ने पूरी कर दी थी।

जिसमें से कुछ उससे दो-तीन साल बड़ी थीं और उनकी शादी हो चुकी थी।

बिंदया अक्सर उनकी चुदाई के किस्से सुन चुकी थी, पर आज सोनू के विशाल लण्ड को देख कर उसकी चूत में एक बार फिर सरसराहट होने लगी।

बिंदया अक्सर अपनी सहेलयों से यह भी सुन चुकी थी कि लण्ड जितना बड़ा हो, उतना ही मज़ा आता है।

उसकी सहेलियाँ अकसर अपने पति के लण्ड के बारे में बात करती रहती थीं, जो अक्सर उसकी चूत में भी आग लगाए रखती थी।

यहाँ तो सोनू का विशाल लण्ड उसकी आँखों के ठीक सामने था.. उसके हाथ-पैर अंजान सी खुमारी के कारण काँपने लगे।

जिसके चलते उसके हाथ में पकड़ी हुई थाली में हलचल हुई और सोनू की आँखें खुल गईं। 

सोनू हड़बड़ा कर खड़ा हो गया, उसने देखा सामने बिंदया हाथ में खाने की थाली लिए खड़ी उसके लण्ड की तरफ आँखें फाड़े देख रही है।

जैसे ही दोनों के नज़रें मिलीं, बिंदया ने नज़रें झुका लीं और थाली को नीचे रख कर तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गई।

सोनू को समझ में ही नहीं आया कि आख़िर ये सब कैसे हो गया, पर अब वो कर भी क्या सकता था, उसने अपने पजामे को ऊपर करके बांधा और बाहर जाकर हाथ धोने के बाद आकर खाना खाने लगा।


खाना खाने के बाद सोनू अपने झूटे बर्तन लेकर घर के आगे आ गया। 

कान्ति खाना खाने के बाद रजनी के कमरे में चली गई थी.. पर रजनी अभी भी आँगन में लगे बड़े से पलंग पर बैठी हुई थी।

बेला और बिंदया नीचे चटाई पर बैठे खाना खा रहे थे।

सोनू ने अपने झूठे बर्तन रसोई में रख दिए और वापिस घर के पिछवाड़े की तरफ जाने लगा, पर रजनी ने उसे रास्ते में ही आवाज़ दे कर रोक दिया और अपने पास बुला लिया।

रजनी- सोनू सुन ज़रा मेरे पैर तो दबा दे, बहुत दर्द हो रहे हैं। 

यह कह कर रजनी उठ कर एक कुर्सी पर बैठ गई और अपनी साड़ी को घुटनों से ऊपर करके, एक टाँग उठा कर सामने पलंग पर रख दी, ताकि उसकी चूत सोनू को दिखाई दे सके।

बेला ये सब सामने बैठी देख रही थी।

‘साली छिनाल अब अपना भोसड़ा खोल कर बैठ गई है.. छोरे के सामने..’ बेला ने मन ही मन रजनी को कोसा, इसके अलावा और वो कर भी क्या सकती थी।

सोनू नीचे बैठ कर उसका एक पैर दबाने लगा।

उसका ध्यान भी रजनी के पेटीकोट के अन्दर ही था। 

बेला अपने मन में सोनू को भी गाली देती है- यह भी उसी की चूत देख रहा है.. साले मादरचोद इन सब मर्दों की एक ही जात होती है.. कुत्ते जहाँ चूत देखी, वहीं चाटना शुरू कर देते हैं।

खैर.. बेला अब रजनी के सामने तो कुछ बोल नहीं सकती थी, इसलिए वो खाना खाकर अपनी बेटी बिंदया के साथ चली गई और सोनू भी अपने कमरे में जा कर सो गया।

आज रात फिर रजनी की चूत को लण्ड के लिए और तड़पना था। 

अगली सुबह जब नाश्ते के बाद जब बेला अपने घर जा चुकी थी तो सोनू को रजनी ने बाजार से कुछ सामान लाने के लिए कहा।

जब वो सामान लाने के लिए घर से निकला, तो उसे बेला नदी की तरफ जाते हुए नज़र आई।

दोनों ने एक-दूसरे के तरफ देखा, पर बेला ने नखरा करते हुए अपना मुँह दूसरी तरफ मोड़ लिया।

जिस पर सोनू को थोड़ी हैरानी तो ज़रूर हुई, पर वो बिना कुछ बोले बेला के पीछे चल पड़ा।

वो बेला से कुछ फासला बना कर चल रहा था। 

बेला जानती थी कि सोनू उसके पीछे आ रहा है, पर उसने जानबूझ कर उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया।

कुछ ही देर में बेला नदी के घाट पर पहुँच गई, यहाँ पर वो नहाती थी..

पर आज बेला वहाँ नहीं रुकी और नदी के साथ आगे बढ़ने लगी। 

सोनू को कुछ समझ में नहीं आया, वो भाग कर बेला के पास गया- काकी ओ काकी.. सुनो तो.. कहाँ जा रही हो? 

बेला ने सोनू की तरफ देखते हुए कहा- क्यों तुम्हें क्या.. कहीं भी जाऊँ? 

बेला फिर से आगे चल पढ़ी और सोनू भी बेला के पीछे चल पड़ा।

जैसे-जैसे दोनों आगे बढ़ रहे थे, रास्ता और सुनसान होता जा रहा था।

चारों तरफ ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ बढ़ने लगीं, गाँव बहुत पीछे रह गया था।

आगे जंगल शुरू हो गया था।

काफ़ी दूर चलने के बाद बेला एक घाट पर रुकी और अपने साथ लाए हुए कपड़े की गठरी को नीचे रख कर अपनी चोली खोलने लगी।

सोनू यह सब पीछे खड़ा देख रहा था। 

‘क्यों रे क्या देख रहा है, मेरे पीछे क्यों आ गया.. जा तेरी मालकिन तुझे ढूँढती होंगी।’

सोनू- वो उन्होंने सामान लाने के लिए भेजा था। 

बेला- तो जा फिर.. सामान खरीद, यहाँ कौन सी दुकान खुली है। 

सोनू- आप नाराज़ हो मुझसे?

बेला- मैं भला कौन होती हूँ तुमसे नाराज़ होने वाली। 

सोनू- तो फिर काकी आप ऐसे क्यों बात कर रही हो?

बेला- अच्छा जा.. अब अपना काम कर, मुझे परेशान मत कर।

सोनू का चेहरा बेला के बात सुन कर उतर गया और वहीं घास पर नीचे बैठ गया।

बेला ने अपनी चोली उतार कर अपने लहँगे को अपनी चूचियों पर बाँध लिया और नदी में उतर गई।

वो कनखियों से सोनू की तरफ देख कर मन ही मन मुस्करा रही थी।

सोनू नदी के किनारे बैठा बेला को देख रहा था, बेला का लहंगा गीला होकर बेला के बदन से चिपक गया था।

सोनू का लण्ड अकड़ने लगा, पर आज लगता है कि सोनू को भी चूत के लिए तरसना पड़ सकता है।


नहाने के बाद बेला नदी से बाहर निकली और सोनू के पीछे जाकर अपने साथ लाया हुआ दूसरे लहँगे को उठा कर गीले लहँगे को उतार दिया।

सोनू ने पीछे की तरफ नहीं देखा, वो तो बस मुँह लटकाए बैठा हुआ था।

उसके बाद उसने दूसरे लहँगे को भी ऊपर करके अपनी चूचियों पर बाँध लिया और फिर गीले लहँगे को लेकर नदी के सीढ़ियों पर बैठ कर अपने उतारे हुए कपड़े धोने लगी।

सुनहरी धूप चारों तरफ फैली हुई थी, सोनू पीछे बैठा बेला को देख रहा था। 

जब बेला कपड़ों को रगड़ने के लिए आगे की ओर झुकती, तो बेला का लहंगा जो कि उसकी चूचियों पर बँधा हुआ था, उसके चूतड़ों से ऊपर उठ जाता और बेला के भारी चूतड़ों का दीदार सोनू को हो जाता।

बेचारे को क्या पता था कि वो दो चूत की आग के बीच में झुलस रहा है, जो कल से एक-दूसरे के हर पैंतरे को नाकामयाब करने के कोशिश कर रही थी।

अब सोनू के बर्दाश्त से बाहर हो जा रहा था, बेला जानबूझ कर अपने पैरों के बल बैठी हुई, बार-बार अपनी गाण्ड को ऊपर उठा लेती और पीछे बैठे सोनू को बेला के गाण्ड और झाँटों से भरी चूत की झलक पागल कर देती।

सोनू का लण्ड अब उसके पजामे में पूरी तरह तना हुआ था।

बेला ने अपने कपड़े धोए और उठ कर अपने कपड़े उठाने के लिए झुकी- आह्ह.. क्या क्या कर रहा है छोरे, यहाँ कोई देख लेगा.. हट जा अपनी मालकिन के पाँव दबा..

बेला ने सोनू को दूर धकेल दिया और अपने कपड़ों को घास पर डाल कर झाड़ियों के अन्दर जाने लगी।

यह देख सोनू भी उसके पीछे चला गया। 

‘क्या है.. अब आराम से मूतने भी नहीं देगा क्या.. पीछे क्यों आ रहा है?’

बेला ने जानबूझ कर गुस्सा दिखाते हुए कहा।

सोनू- पर काकी हुआ क्या है, मुझसे कोई ग़लती हो गई क्या?

बेला ने सोनू की बात का कोई जवाब नहीं दिया और थोड़ा आगे जाकर अपने लहँगे को अपनी कमर तक उठा कर पेशाब करने के लिए बैठ गई।

बेला सोनू से कुछ दूरी पर बैठी मूत रही थी और अब सोनू के लिए रुक पाना नामुमकिन था, वो आगे बढ़ा और बेला के पास जाकर नीचे बैठ गया।

बेला के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई- देखा, कैसे कुत्ते की तरह चूत को सूँघता हुआ पीछे बैठ गया है..

बेला ने अपने मन में सोचा, उसके होंठों पर लंबी मुस्कान फैली हुई थी जैसे उसने कोई जंग जीत ली हो।

तभी अचानक सोनू ने बेला के चूतड़ों के नीचे से ले जाकर बेला की चूत को अपनी मुट्ठी में भर कर ज़ोर से मसल दिया।

बेला एकदम से सिसक उठी।

पेशाब तो वो कर चुकी थी, बस अपनी गाण्ड और चूत दिखा कर सोनू को तड़फा रही थी.

‘उफफ्फ़ हट हरामीई ओह.. सोनू बेटा.. ये जगह ठीक नहीं है ओह सोनू..’

इससे पहले कि बेला कुछ और बोल पाती, सोनू ने अपनी दो उँगलियों को एक साथ बेला की चूत में पेल दिया।

बेला बुरी तरह छटपटाते हुए खड़ी हो गई, पर सोनू अपनी उँगलियों को तेज़ी से बेला की चूत में अन्दर-बाहर करने लगा।

सोनू भी खड़ा हो गया और एक हाथ से बेला के गदराए हुए पेट को पकड़ कर दूसरे हाथ को पीछे से उसकी चूत में डाल कर उँगलियों को अन्दर-बाहर कर रहा था।

बेला सोनू छूटने की कोशिश कर रही थी, जिससे वो आगे की ओर झुकने लगी और उसकी गाण्ड पीछे से और बाहर को आ गई। 

बेला- ओह्ह.. रुक जा रे छोरे.. क्या कर रहा हाईईईई ओह माआआ रुक आह्ह.. आह्ह… सुन नाअ.. चल घर चलते हैं.. यहाँ कोई देख लेगा बेटा।

सोनू बेला की बात सुन कर खुश हो गया और उसने बेला की चूत में से अपनी ऊँगलियाँ निकाल लीं।

जैसे ही बेला सोनू के गिरफ़्त से बाहर हुई, वो हँसती हुई आगे भाग गई। 

‘तू अब जा अपनी मालकिन के पैर दबा..’ बेला ने हँसते हुए कहा और आगे बढ़ने लगी।

सोनू का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा.. और तेज़ी से भाग कर बेला को पीछे से पकड़ लिया।

सोनू- ओह्ह.. तो अच्छा ये बात है, तुम्हें मालकिन से जलन हो रही है ना। 

बेला- जले मेरे जूती.. तू जा यहाँ से..

सोनू ने बेला को पीछे से बाँहों में भर लिया और उसके पेट को सहलाते हुए उसके पीठ पर अपने होंठों को रगड़ने लगा, बेला के बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई, पर फिर भी अपने पर काबू करते हुए बोली- नहीं.. यहाँ नहीं.. तू जा अभी.. मुझे घर जाने दे, मुझे अभी बहुत काम हैं..

सोनू- अब गुस्सा छोड़ो भी काकी.. मैं भी तो तुम्हारी तरह नौकर हूँ और उनकी बात ना आप टाल सकती हैं और ना ही मैं… इसमें मेरी क्या ग़लती है?

यह कहते हुए सोनू के हाथ बेला की चूचियों पर पहुँच चुके थे और उसने धीरे-धीरे बेला की चूचियों को दबाना चालू कर दिया।

बेला की आँखें मस्ती में धीरे-धीरे बंद होने लगीं। 

सोनू ने बेला को अपनी तरफ घुमाया और उसकी आँखों में देखते हुए बोला- अब और मत तड़पाओ काकी.. यह देखो मेरे लण्ड कैसे तेरी फुद्दी में जाने के लिए तरस रहा है..

यह कह कर सोनू ने बेला का हाथ पकड़ कर अपने लण्ड पर रख दिया और फिर सोनू ने अपना हाथ बेला के जाँघों के बीच घुसा दिया। 

बेला अपनी अधखुली मस्ती से भरी आँखों से सोनू की तरफ देखते हुए बोली- अगर कोई आ गया तो?

सोनू ने बेला की चूत की फांकों में अपनी उँगलियों को फिराया और फिर बेला की चूत के दाने को अपनी उँगलियों के नीचे दबा कर मसलना चालू कर दिया। 

‘कोई नहीं आएगा काकी..’

बेला छटपटाते हुए सोनू से लिपट गई और सोनू के लण्ड को पजामे के ऊपर से तेज़ी से हिलाने लगी।

सोनू ने बेला के होंठों को अपने होंठों में भर कर चूसना चालू कर दिया और बेला ने सोनू के पजामे का नाड़ा खोल दिया।

सोनू का पजामा उसकी जाँघों में आकर अटक गया। 

बेला ने अपनी कामुक नज़रों से एक बार सोनू के तने हुए 8 इंच लंबे लण्ड की ओर देखा और बोली- तेरा ये मूसल सा लौड़ा मेरे दिमाग़ पर ऐसा छाया हुआ है कि मैं तो इससे चाह कर भी भूल नहीं सकती।

सोनू ने बेला के आँखों में देखा और फिर से उसके होंठों पर होंठों को रख दिया।

बेला ने अपनी आँखें बंद कर लीं..दोनों एक-दूसरे को पागलों की तरह चूम रहे थे। 

सोनू ने अपनी जीभ बेला के होंठों में पेल दी और बेला उसकी जीभ ऐसे चाटने लगी, जैसे कोई कुल्फी हो।

फिर अचानक बेला ने अपने होंठों को सोनू के होंठों से अलग किया और अपने लहँगे का नाड़ा खोल दिया, जो कि उसकी चूचियों पर बँधा हुआ था।

नाड़ा खुलते ही बेला के पैरों मैं आ गिरा, बेला ने उस लहँगे को उठाया और एक बड़े से पेड़ की तरफ बढ़ी और फिर उसने लहँगे को पेड़ के नीचे रख दिया और सोनू को उसके ऊपर बैठने को कहा। 

सोनू भी अपना पज़ामा संभालते हुए उस पेड़ के नीचे आकर लहँगे के ऊपर बैठ गया।

उसने अपनी पीठ को पेड़ के तने से टिका लिया, उसने अपने पैरों को लंबा करके पहला रखा था।

बेला उसके पैरों के दोनों तरफ टाँगें करके खड़ी हो गई और फिर नीचे बैठते हुए सोनू के लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर लगा कर धीरे-धीरे अपनी चूत को सोनू के लण्ड के सुपारे के ऊपर दबाने लगी।

सोनू के लण्ड का मोटा सुपारा बेला की चूत के छेद को फ़ैलाता हुआ अन्दर जाने लगा। 

बेला अपनी चूत के छेद पर सोनू के लण्ड के गरम सुपारे का अहसास पाते ही सिसयाने लगी- ओह सीईईईई.. सोनू तू मुझे पागल बना कर छोड़ेगा ओह.. कितना मोटा है.. रे.. तेराअ…

जैसे ही सुपारा बेला की चूत में घुसा.. सोनू ने बेला की कमर को दोनों तरफ से पकड़ कर नीचे की तरफ दबा दिया। 

बेला की गीली हो चुकी चूत में सोनू का लण्ड फिसजया हुआ अन्दर जा घुसा। 

‘ओह्ह छोरे.. क्या कर रहा है, ज़रा भी सबर नहीं है.. ओह मार दियाआ रेए… ओह रुक जा ओह आह्ह.. ओह!’

सोनू नीचे से लगातार अपनी कमर को हिलाते हुए बेला की चूत में अपना लण्ड अन्दर-बाहर करने लगा।

उसके लण्ड ने बेला की चूत के छेद को बुरी तरह फैलाया हुआ था।

बेला की आँखें मस्ती में बंद हो गई, सोनू ने उसके ऊपर-नीचे हो रही चूचियों में से एक को मुँह में भर लिया और ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा।

बेला- ओह सोनू.. धीरे-धीरे अई बेटा.. ओह हाँ.. चूस ले.. बेटा मेरी चूची.. ओह सोनू हाँ.. ऐसे मसल…ऊऊओ मेरी गाण्ड कूऊऊ सलिएईई सब के नज़रें इसी पर रहती हैं.. ओह.. बेटा चोद अपनी काकी को.. चोद डाल बेटा.. अपनी काकी की फुद्दीई ओह..

बेला अपने पैरों के बल बैठ गई और सोनू के कंधों को पकड़ कर पागलों की तरह अपनी गाण्ड को ऊपर-नीचे उछालने लगी, लण्ड तेज़ी से बेला की चूत के अन्दर-बाहर हो रहा था।

बेला की चूत से निकल रहे कामरस से सोनू का लण्ड पूरी तरह भीग गया था, जिससे उसका लण्ड ‘फच-फच’ की आवाज़ करता हुआ अन्दर-बाहर हो रहा था। 

सोनू ने अब अपनी कमर हिलाना बंद कर दिया था और दोनों हाथों से बेला के चूतड़ों को मसलते हुए, उसकी दोनों चूचियों को बारी-बारी से चूस रहा था।

खुले आसमान के नीचे चुदाई का जबरदस्त दौर चल रहा था। 

बेला- ओह्ह.. बेटा ले.. मजा आ रहा है नाआअ.. अपनी काकी की फुद्दी मार कर्ररर.. ओह बेटा ले चूस्स्स लेए जीईए भरररर तुन्न्न् मुझसे नाराज़ तो नहीं हाईईईईई ओह…

सोनू- नहीं काकी मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।

बेला ने सोनू को ज़ोर से अपने बदन से चिपका लिया और सोनू ने भी बेला के चूतड़ों को फैला कर अपनी एक ऊँगली उसके गाण्ड के छेद में घुसा दी।

बेला एकदम तड़फ उठी और होंठों पर कामुक मुस्कान लाकर बोली- क्या इरादा है.. तेरा..आँ.. मेरी गाण्ड में ऊँगली कर रहा है।

सोनू इस पर कुछ नहीं बोला और धीरे-धीरे अपनी ऊँगली से उसकी गाण्ड के छेद को कुरदने लगा।

बेला अब पूरी तरह गरम हो चुकी थी और पूरी रफ़्तार से अपनी गाण्ड उछाल-उछाल कर सोनू का लण्ड अपनी फुद्दी में ले रही थी।

अब उसकी चूत में सरसराहट और बढ़ गई थी। 

उसका पूरा बदन काँपने लगा और फिर बेला का बदन एकदम से अकड़ गया और वो सोनू के ऊपर पसर होकर लुड़क गई।

सोनू के लण्ड ने भी लावा छोड़ दिया। 


बेला को चोदने के बाद सोनू सामान लाने के शहर चला गया और बेला अपने घर चली गई।

दूसरी तरफ रजनी अपने कमरे में कान्ति देवी के साथ बैठी बातें कर रही थी।

ऊपर से तो भले ही वो कान्ति देवी के साथ हंस-हंस कर बातें कर रही थी, पर मन ही मन वो उससे गालियाँ दे रही थी। 

‘और सुना बहू, नई दुल्हन लाने के बाद बेटा चन्डीमल तेरी तरफ ध्यान देता है कि नहीं?’ कान्ति देवी ने बातों-बातों में रजनी से पूछा। रजनी बेचारा सा मुँह लेकर बैठ गई। 

‘ये सारे मर्द ना.. एक ही जात के होते हैं.. पर तू फिकर ना कर, भगवान के घर देर है.. अंधेर नहीं..’

रजनी ने उदास होते हुए कहा- पर मुझे तो लगता है भगवान ने मेरे लिए अंधेरा ही रखा है, अब तो वो मुझसे सीधे मुँह बात भी नहीं करते। 

कान्ति- बोला ना.. सब मर्दों की एक ही जात होती है.. अपने अनुभव से बोल रही हूँ। कुछ दिन उसको नई चूत का चाव रहेगा, देखना बाद मैं सब ठीक हो जाएगा.. अच्छा चल मैं एक बार घर भी हो आती हूँ.. वहाँ की खबर भी ले लूँ। 

उधर सोनू बाज़ार से सामान खरीद कर वापिस गाँव आ चुका था।

अब दोपहर के 12 बज चुके थे।

जैसे ही सोनू घर में दाखिल हुआ, वो सीधा रजनी के कमरे में चला गया।

बेला भी आ चुकी थी और खाना बना रही थी। 

सोनू ने रजनी के कमरे में जाकर कहा- मालिकन सामान ले आया हूँ। 

रजनी- इतनी देर कहाँ लगा दी। 

सोनू- वो मालकिन ये जगह मेरे लिए नई है ना…इसलिए देर हो गई। 

रजनी- अच्छा ठीक है, जा रसोई में सामान रख दे और कुछ देर आराम कर ले।

सोनू जैसे ही रसोई में जाने लगा।

रजनी भी उसके साथ रसोई में आ गई।

वो किसी भी कीमत पर सोनू और बेला को एक पल के लिए अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी।

सोनू सामान रख कर पीछे अपने कमरे में चला गया।

बेला खाना बना कर अपना और अपनी बेटी का खाना साथ लेकर अपने घर वापिस चली गई।

अब रजनी घर पर अकेली थी और सोनू पीछे अपने कमरे में था। 

भले ही रजनी के पास ज्यादा समय नहीं था, पर रजनी ये वक्त भी बर्बाद नहीं करना चाहती थी।

वो जानती थी कि चाची कान्ति किसी भी वक्त टपक सकती है।

रजनी ने सबसे पहले मैं दरवाजा बंद किया और फिर घर के पीछे चली गई।

सोनू के कमरे में पहुँच कर उसने देखा कि सोनू अन्दर पलंग पर लेटा हुआ सो रहा था।

रजनी ने एक बार उसे अपनी हसरत भरी आँखों से ऊपर से नीचे तक देखा, फिर उसके पास जाकर उसके सर पर हाथ फेरते हुए उसे आवाज़ दी।

सोनू ने अपनी आँखें खोलीं, तो रजनी को अपने ऊपर झुका हुआ पाकर वो एकदम से हड़बड़ा गया और उठ कर बैठ गया। 

सोनू- क्या हुआ मालकिन आप आप यहाँ? 

रजनी- उठो.. खाना तैयार है, आकर खाना खा ले। 

रजनी ने एक बार फिर से सोनू के बालों में प्यार से हाथ फेरा और पलट कर बाहर चली गई।

सोनू को ये सब कुछ अजीब सा लगा, पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और उठ कर घर के आगे की तरफ आ गया।

पूरे घर मैं सन्नाटा छाया हुआ था, बस रसोई से बर्तन की आवाज़ आ रही थी।

सोनू रसोई में गया, यहाँ पर रजनी एक प्लेट मैं खाना डाल रही थी- आ गया तू.. चल बाहर जाकर बैठ.. मैं खाना लेकर आती हूँ।

सोनू- रहने दीजिए ना मालकिन.. मैं खुद ले लेता हूँ। 

रजनी- हाँ मैं जानती हूँ, तू बड़ा होशियार है.. सब खुद ले लेता है। 

सोनू रजनी के दोअर्थी बात सुन कर थोड़ा सा झेंप गया।

उसे भी शक हो गया कि हो ना हो रजनी को उसके और बेला के रंगरेलियों के खबर लग चुकी है।

वो चुपचाप बाहर आकर बैठ गया, थोड़ी देर बाद रजनी रसोई से बाहर आई।

उसने अपनी साड़ी के पल्लू को कमर पर लपेट रखा था और उसकी 38 साइज़ की चूचियां उसके ब्लाउज में ऐसे तनी हुई थीं, जैसे हिमालय की चोटियाँ हों।

इस हालत में सोनू के सामने आने मैं रजनी को ज़रा भी झिझक महसूस नहीं हो रही थी। 

रजनी- अरे नीचे क्यों बैठ गया तू.. उठ ऊपर उस कुर्सी पर बैठ जा.. नीचे फर्श बहुत ठंडा है, सर्दी लग जाएगी। 

सोनू- नहीं मालकिन.. मैं यहीं ठीक हूँ। 

रजनी- अरे घबरा मत.. ऊपर बैठ जा.. घर पर कोई नहीं है। 

सोनू बिना कुछ बोले कुर्सी पर बैठ गया, रजनी ने उससे खाना दिया और खुद सामने पलंग पर जाकर बैठ गई।

सोनू सर झुकाए हुए खाना खाने लगा, रजनी उसकी तरफ देख कर ऐसे मुस्करा रही थी..जैसे शेरनी अपने शिकार होने वाले बकरे को देख कर खुश होती है।

सोनू तो ऐसे सर झुकाए बैठा था, जैसे वहाँ और कोई हो ही ना।

रजनी जानती थी कि इस उम्र के लड़कों को कैसे लाइन पर लिया जाता है।

वो पलंग पर लेट गई, उसने अपनी टाँगों को घुटनों से मोड़ कर पलंग के किनारे पर रख दिया और अपनी साड़ी और पेटीकोट को अपने घुटनों तक चढ़ा लिया, ताकि सोनू उसकी चिकनी चूत का दीदार कर सके।

टाँगों के फैले होने के कारण साड़ी में इतनी खुली जगह बन गई थी कि सामने बैठे सोनू को रजनी की चूत साफ़ दिखाई दे सके, पर सोनू को तो जैसे साँप सूँघ गया था, वो सर झुकाए हुए खाना खा रहा था। 

‘अबे गांडू.. मादरचोद.. थाली में तेरी माँ चूत खोल कर बैठी है.. जो तेरी नज़रें वहाँ से हट नहीं रही हैं.. यहाँ मैं अपनी चूत खोल कर बैठी हूँ।’

रजनी ने मन ही मन सोनू को कोसा, पर सोनू तक रजनी के मन की बात नहीं पहुँची।

उसने खाना खत्म किया और उठ कर अपनी प्लेट रखने के लिए रसोई में चला गया।

जब सोनू रसोई में प्लेट रखने के लिए जा रहा था, तब रजनी को सोनू के जेब में से कुछ खनकने की आवाज़ सुनाई दी।

जिससे रजनी थोड़ी चौंक गई।

सोनू जब प्लेट रख कर वापिस आया तो रजनी ने उससे अपने पास बुला लिया। 

रजनी पलंग पर बैठते हुए- अरे सोनू इधर आ.. क्या है तेरी जेब में?

रजनी की बात सुन कर सोनू का रंग उड़ गया।

जब वो शहर गया था.. तो वहाँ से वो बेला के लिए पायल खरीद कर लाया था, पर बेला को देने का मौका नहीं मिला था।

अब वो बेचारा क्या कहता कि जो पैसे रजनी ने उस रात सोनू को दिए थे, उसमें से वो बेला के लिए पायल ले आया है।

सोनू को यूँ चुप खड़ा देख कर रजनी ने फिर से सोनू से पूछा, पर अब सोनू कर भी क्या सकता था, चारों तरफ से फँस चुका था। 

‘वो मालकिन.. वो पायल है..’


रजनी थोड़ा परेशान होते हुए- पायल कहाँ से लाया तू.. दिखा निकाल कर..

सोनू ने पायल निकाल कर रजनी की तरफ बढ़ा दी। 

‘क्यों रे, कहाँ से लाया और क्या करेगा इसका?’

सोनू- वो मालकिन जब मैं शहर गया था ना.. तब खरीदी थी। 

सोनू के हाथ-पैर डर के मारे काँप रहे थे।

रजनी गुस्से से सोनू की ओर देखते हुए- सच-सच बोल.. किसने कहा था.. पायल लाने के लिए?

रजनी की कड़क आवाज़ सुन कर सोनू की तो मानो जैसे गाण्ड फट गई हो।

उसका चेहरा ऐसे लटक गया जैसे अभी रो पड़ेगा। 

‘किसी ने नहीं कहा मालकिन..’

रजनी- तो फिर किसके लिए लाया था और बोल तुम्हारे पास पैसे कहाँ से आए? 

सोनू- वो.. वो.. मालकिन..! 

यह कहते-कहते सोनू एकदम चुप हो गया और सर झुका कर रजनी के सामने खड़ा हो गया, जैसे उसने बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।

रजनी- देख.. मैं कहती हूँ, अगर तू अपनी भलाई चाहता है, तो सब सच-सच मुझे बता दे.. वरना अगर सेठ जी को मैंने बता दिया तो तेरी खैर नहीं.. बोजया क्यूँ नहीं.. बोल?

सोनू- वो मालकिन आपने उस रात को मुझे रुपये दिए थे ना..

रजनी को याद आया कि रात को उसने सोनू को रुपए दिए थे।

‘हाँ तो.. तू उससे जाकर ये पायल ले आया.. चल ठीक है.. अब ये भी बता किसके लिए लाया था?’

सोनू- वो.. वो.. मालकिन…

रजनी- अब ये ‘वो.. वो..’ बंद कर.. सच-सच बता दे मुझे?

सोनू- आपके लिए मालकिन। 

गाण्ड फ़टती देख कर सोनू ने अपना पासा पलट दिया।

सोनू की बात सुन कर रजनी के चेहरे पर हैरानी और खुशी के भाव उमड़ पड़े।

उसके होंठों पर लंबी मुस्कान फ़ैल गई। 

‘तू सच बोल रहा है ना?’ रजनी ने आँखें टेढ़ी करते हुए पूछा।

सोनू ने बस ‘हाँ’ में सर हिला दिया। 

रजनी- मेरे लिए लाया था ये पायल? 

सोनू- हाँ मालकिन। 

यूँ तो रजनी को गहनों की कमी नहीं थी। वो हर समय सोने के जेवरों से लदी रहती थी, पर आज चाँदी की ये पायल जो सोनू लाया था, उसे पाकर आज उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। 

‘पर मेरे लिए क्यों खरीदा? वो पैसे तो मैंने तुम्हें खुश होकर दिए थे।’

सोनू- वो मालकिन.. आप मेरा कितना ख्याल रखती हैं.. मुझे कभी महसूस नहीं होने देती कि मैं एक नौकर हूँ.. इसलिए आपके लिए लाया था। 

रजनी- झूठ.. तुम झूठ बोल रहे हो.. मैं नहीं मानती। 

रजनी ने जानबूझ कर सोनू को ऐसा कहा।

सोनू- नहीं मालकिन.. कसम से आपके लिए ही लाया था। 

रजनी- अच्छा तो फिर जेब में लेकर क्यों घूम रहा था.. मुझे दी क्यों नहीं? 

सोनू- वो मालकिन वो वो.. मैं मुझे शरम आ रही थी। 

रजनी- ना.. मैं तो तभी मानूँगी, जब तू ये पायल मुझे खुद पहनाएगा.. कि तू मेरे लिए ही ये लाया था। 

यह कह कर रजनी ने अपनी साड़ी को घुटनों तक ऊपर कर लिया। 

अब सोनू के पास और कोई चारा नहीं था, वो नीचे पैरों के बल बैठ गया, रजनी ने बड़ी ही अदा के साथ अपना एक पैर सोनू की जांघ के ऊपर रख दिया।

सोनू उस पैर में पायल पहनाने लगा।

सोनू की नजरें बार-बार रजनी की मांसल और चिकनी टाँगों की तरफ जा रही थीं।

यह सब देख कर रजनी के होंठों पर मुस्कान बढ़ती जा रही थी।

जैसे ही रजनी के एक पैर में पायल पड़ी, रजनी ने वो पैर सरका कर दूसरा पैर भी उसकी जांघ पर रख दिया।

‘ले अब इसमें भी पहना दे..’

पहले वाले पैर की ऊँगलियाँ सीधा सोनू के लण्ड से जा टकराईं। अब तक बेजान पड़े.. सोनू के लण्ड को जैसे करेंट लगा हो और उसमें जैसे जान आ गई हो, उसका लण्ड पजामे में फूलने लगा। जिसे रजनी महसूस कर सकती थी..

उसके लण्ड से उठ रही गर्मी को अपने पाँव के तलवों में महसूस करते ही.. उसकी चूत में सरसराहट होने लगी।

‘अरे रुक क्यों गया.. ‘डाल’ ना..’

रजनी ने बड़ी सी अदा से मुस्कुराते हुए कहा।

जैसे कह रही हो..अपना लण्ड मेरी चूत में डाल दे, बेचारा सोनू दूसरे पाँव में पायल डालने लगा।

जो तोहफा वो बेला के लिए लाया था.. वो रजनी की हवस का शिकार होकर उसके पाँव में आ चुका था।

तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। 

रजनी बुदबुदाते हुए- आ गई बुढ़िया कवाब में हड्डी बनने…

सोनू- क्या मालकिन? 

रजनी- कुछ नहीं.. अब तू जाकर आराम कर.. शहर से आकर थक गया होगा। 

सोनू उठ कर पीछे चला गया और रजनी खिसयाते हुए बाहर आकर दरवाजा खोला.. बाहर कान्ति देवी खड़ी थी। रजनी को उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर वो उसके समय कर भी क्या सकती थी।


कान्ति देवी अन्दर आते हुए- बाहर बहुत ठंड है ना..?

रजनी झूठी मुस्कान अपने होंठों पर लाते हुए- जी चाची जी।

कान्ति- दरअसल मैं तुम्हें ये बताने आई थी कि मैं आज सुषमा के घर जा रही हूँ, उसके पोते की शादी है ना कल.. तो मैं आज रात नहीं रुक पाऊँगी.. ठीक है.. अब मैं चलती हूँ।

रजनी- जी चाची जी.. आप मेरी फिकर ना करें।

जैसे ही कान्ति के जाने के बाद रजनी ने दरवाजा बंद किया, रजनी ख़ुशी से उछल पड़ी, जैसे उसे मुँह-माँगी मुराद मिल गई हो।

अभी शाम के 4 बज चुके थे.. अब रजनी अपने और सोनू के बीच किसी को नहीं आने देना चाहती थी।

बेला के आने का वक्त भी हो रहा था।

बेला और रजनी दोनों एक-दूसरे को खूब अच्छी तरह से जानती थी। इसलिए रजनी के मन में ये शंका थी कि बेला हो ना हो बीच में अपनी टाँग जरूर अड़ाएगी। 

तभी रजनी कुछ ऐसा सूझा, जिससे उसके होंठों की मुस्कान और बढ़ गई।

वो घर के पीछे बने सोनू के कमरे की तरफ गई और बाहर से ही सोनू को आवाज़ दी। रजनी की आवाज़ सुन कर सोनू बाहर आया।

सोनू- जी मालकिन। 

रजनी- सुन.. तू ऐसा कर आज शहर चला जा दुकान पर.. तुम्हें तो पता है कि सेठ जी नहीं है, आज वहाँ जाकर थोड़ा काम देख ले कि वहाँ के लोग ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं.. दुकान बंद होते ही घर आ जाना और हाँ.. वहाँ शहर में ही कुछ खा लेना, लौटने में तुम्हें देर हो जाएगी।

सोनू- जी मालकिन.. मैं अभी चला जाता हूँ। 

सोनू घर से निकल कर शहर की तरफ चल दिया।

शहर गाँव से कोई 3-4 किलोमीटर दूर था, पैदल चल कर भी वहाँ 20-25 मिनट में पहुँचा जा सकता था।

उधर सोनू के जाने के बाद बेला घर पर आ गई और घर के छोटे-मोटे काम करने लगी।

रजनी- बेला सुन। 

बेला- जी दीदी। 

रजनी- बेला.. वो आज सोनू का खाना मत बनाना, वो शहर गया है.. आज रात वो दुकान पर ही रुकेगा.. खाना भी वहीं खा लेगा। 

बेला रजनी की बात सुन बेला उदास हो गई- जी दीदी।

आज बेला का मन भी काम में नहीं लग रहा था।

उसे रह-रह कर सोनू की याद आ रही थी।

उसने बेमन से खाना तैयार किया और अपनी बेटी और अपना खाना लेकर घर वापिस चली गई।

रात के 8 बजे सोनू दुकान बंद होने के बाद सोनू घर वापिस आने के लिए शहर से गाँव की ओर चला..

चारों तरफ घना कोहरा छाया हुआ था।

रात के अंधेरे और सन्नाटे की सरसराहट से उसकी गाण्ड फट रही थी। सुनसान रास्ते पर चलते हुए.. मानो उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो। 

वो बार-बार पीछे मुड़ कर देखता.. पर पीछे कोई नहीं होता।

सोनू की हालत खराब होती जा रही थी। सड़क के दोनों तरफ खेत थे.. गन्ने की फसल में हवा चलने से अजीब से सरसराहट हो रही थी। ऐसा लगता मानो अभी खेतों में से कोई निकल कर उसे धर दबोचेगा..

पर यह सिर्फ़ सोनू का वहम था।

डर के मारे उसके हाथ-पैर थरथर काँप रहे थे।

फिर अचानक से खेतों में से एक नेवला बड़ी तेज़ी से सड़क पार करके दूसरे तरफ के खेतों में गया।

सोनू तो डर के मारे चीख पड़ा, पर इतने सुनसान रास्ते पर उसकी चीख सुनने वाला भी नहीं था।

उसे ऐसा लग रहा था कि उसके दिल के धड़कनें रुक जाएंगी।

जैसे-तैसे सोनू किसी तरह गाँव पहुँचा और चैन की साँस ली। उसने सोच लिया था कि वो रजनी को बोल देगा कि वो आगे से रात को शहर अकेला नहीं जाएगा, वो बुरी तरह से डरा हुआ था।

उसने दरवाजे पर दस्तक दी।

रजनी तो जैसे उसके ही इंतजार में बैठी थी। 

रजनी- कौन है बाहर?

सोनू- जी.. मैं हूँ सोनू। 

सोनू की आवाज़ सुनते ही, रजनी के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई। 

उसने जल्दी से दरवाजा खोला।

जैसे दरवाजा खुला सोनू ऐसे अन्दर आया..जैसे उसकी मौत उसके पीछे लगी हो, उसका डरा हुआ चेहरा देख रजनी भी घबरा गई।

सोनू सीधा अन्दर चला गया.. रजनी ने दरवाजा बंद किया और सोनू के पीछे आँगन में आ गई।

‘क्या हुआ रे इतना घबराया हुआ क्यों है?’

सोनू नीचे चटाई पर बैठ गया, वो सच में बहुत डरा हुआ था। भूत देखा तो नहीं पर उसने भूतों के बारे में सुना ज़रूर था। 

‘वो.. वो.. मैं मुझे रास्ते में डर लग रहा था।’ सोनू ने घबराहट में हड़बड़ाते हुए कहा। 

रजनी- डर लग रहा था.. किससे?

सोनू- वो रास्ते में बहुत अंधेरा था, मैं आगे से रात को नहीं जाऊँगा। 

रजनी को सोनू के भोलेपन पर हँसी आ गई।


‘मैं आज यहीं सो जाऊँ मालकिन.. मुझे आज बहुत डर लग रहा है?’ सोनू ने रजनी की तरफ देखते हुए कहा।

सोनू की बात सुन कर रजनी को ऐसा लगा.. मानो आज उसकी मन की मुराद पूरी होने को कोई नहीं रोक सकता। 

रजनी खुश होते हुए- हाँ.. हाँ.. क्यों नहीं.. यहाँ क्यों तू मेरे कमरे में सो जाना। इसमें डरने की क्या बात है.. खाना तो खाया ना तूने? 

सोनू- हाँ मालकिन.. खाना खा लिया था। 

रजनी- तू चल मेरे कमरे में.. मैं अभी आती हूँ। 

यह कह कर रजनी रसोई में आ गई।

सोनू को अब भी ऐसा लग रहा था, जैसे उसके पीछे कोई हो।

वो डरता हुआ रजनी के कमरे में आ गया, वो सहमा हुए खड़ा था।

थोड़ी देर बाद अचानक रजनी के अन्दर आने की आहट सुन कर सोनू बुरी तरह हिल गया, पर जब रजनी को उसने देखा.. तो उसकी साँस में साँस आई।

रजनी हाथ में गिलास लिए खड़ी थी।

उसने गिलास को मेज पर रखा और मुड़ कर दरवाजा बंद कर दिया।

दरवाजा बंद करने के बाद उसने ओढ़ी हुई शाल को उतार कर टाँग दिया।

सोनू की हालत का अंदाज़ा रजनी को हो चुका था, अब वो इस मौके को जाया नहीं होने देना चाहती थी।

वो गिलास को मेज पर से उठाते हुए बोली- तू अभी तक खड़ा है, चल बैठ जा पलंग पर.. और ये ले पी ले। 

रजनी ने हाथ में पकड़ा हुआ गिलास सोनू की तरफ बढ़ा दिया।

सोनू- यह क्या है मालकिन?

रजनी- दूध है.. गरम है.. पी ले.. ठंड कम हो जाएगी।

सोनू- इसकी क्या जरूरत थी… मालकिन?

रजनी- ले पकड़ और पी जा..अब ज्यादा बातें ना बना।

सोनू ने रजनी के हाथ से गिलास ले लिया और खड़े-खड़े पीने लगा।

रजनी बिस्तर के सामने खड़ी हो गई और अपनी साड़ी उतारने लगी.. सोनू दूध का घूँट भरते हुए उसके गदराए बदन को देख रहा था, कमरे में लालटेन की रोशनी चारों तरफ फैली हुई थी।

रजनी ने होंठों पर कामुक मुस्कान लिए हुए अपने मम्मे उठाते हुए सोनू से कहा- आराम से बैठ कर ठीक से ‘दूध’ पी, ऐसे कब तक खड़ा रहेगा।

जो रजनी बोलने वाली थी, सोनू को कुछ-कुछ समझ में आ गया था, पर सोनू ने उस तरफ़ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

रजनी ने अपनी साड़ी उतार कर रख दी।

अब उसके बदन पर महरून रंग का ब्लाउज और पेटीकोट ही शेष था।

रजनी उसमें में बला की खूबसूरत लग रही थी।

सोनू अपनी नज़रें रजनी पर से हटा नहीं पा रहा था।

रजनी बिस्तर पर आकर बैठ गई और सोनू के सर को सहलाते हुए बोली- अरे अंधेरे से क्या डरना.. तू रोज रात पीछे अकेला ही सोता है ना.. फिर आज कैसे डर गया तू?

सोनू- वो मालकिन मैं लालटेन जला कर सोता हूँ।

रजनी- अच्छा ठीक है, आगे से कभी तुझे रात को नहीं भेजूँगी.. चल अब आराम से ‘दूध’ पी ले। 

सोनू- मालकिन वो मुझसे पिया नहीं जा रहा है। 

रजनी- क्यों क्या हुआ?

सोनू- आपने इसमें घी क्यों डाल दिया? मुझे दूध मैं घी पसंद नहीं है। 

रजनी- तेरे लिए अच्छा है घी.. पी जा मुझे पता है.. आज कल तू बहुत ‘मेहनत’ करता है। 

रजनी की बात सुन कर सोनू एकदम से झेंप गया।

सोनू ने दूध खत्म किया और गिलास को मेज पर रख दिया।

जैसे ही सोनू ने गिलास को मेज पर रख कर मुड़ा तो उसने देखा कि रजनी रज़ाई के अन्दर घुसी हुई उसकी तरफ खा जाने वाली नज़रों से देख रही है।

‘अब वहाँ खड़ा क्या है… सोना नहीं है क्या?’

रजनी ने सोनू से कहा..

पर सोनू को समझ में नहीं आ रहा था कि वो सोएगा कहाँ? क्योंकि वो रजनी के साथ बिस्तर पर तो सोने के बारे में सोच भी नहीं सकता था।

सोनू- पर मालकिन मैं कहाँ लेटूँगा?

रजनी- अरे इतना बड़ा पलंग है.. यहीं सोएगा और कहाँ?

सोनू- आपके साथ मालकिन.. पर..!

रजनी- चल कुछ नहीं होता.. आ जा।

यह कह कर रजनी ने एक तरफ से रज़ाई को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया, सोनू काँपते हुए कदमों के साथ बिस्तर पर चढ़ गया और रजनी के साथ रज़ाई में घुस गया।

जैसे ही वो रजनी के पास लेटा… रजनी के बदन से उठ रही मंत्रमुग्ध कर देने वाली खुश्बू ने उससे पागल बना दिया। रजनी उसके बेहद करीब लेटी हुई थी।

दोनों एक-दूसरे के जिस्म से उठ रही गरमी को साफ़ महसूस कर पा रहे थे।

रजनी- सोनू बेटा.. मेरी जाँघों में बहुत दर्द हो रहा है, थोड़ी देर दबा देगा?

सोनू- जी मालकिन.. अभी दबा देता हूँ।

रजनी (पेट के बल उल्टा लेटते हुए)- सच सोनू तू कितना अच्छा है.. मेरा हर दिया हुआ काम कर देता है… चल ये रज़ाई हटा दे और मेरी जाँघों की अच्छे से मालिश कर दे।

जैसे ही रजनी ने सोनू को मालिश की बात बोली, उससे उस रात की घटना याद आ गई, जब रजनी ने अपनी जाँघों की मालिश करवाते हुए अपनी चूत का दीदार सोनू को करवाया था।

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